वारिस : सुरजीत के घर में कौन थी वह औरत-भाग 2

नरेंद्र ने जब से होश संभाला था उस का भी अमली चाचा से वास्ता पड़ता रहा था. जब भी उस के पांव की चप्पल कहीं से टूटती थी तो उस की मरम्मत अमली चाचा ही करता था. चप्पल की मरम्मत और पालिश कर के एकदम उस को नया जैसा बना देता था अमली चाचा.

काम करते हुए बातें करने की अमली चाचा की आदत थी. बातों की झोंक में कई बार बड़ी काम की बातें भी कह जाता था अमली चाचा.

‘कुदेसन’ के बारे में अमली चाचा से वह पूछेगा, ऐसा मन बनाया था नरेंद्र ने.

एक दिन जब स्कूल से वापस आ कर सब लड़के अपनेअपने घर की तरफ रुख कर गए तो नरेंद्र घर जाने के बजाय चौपाल के करीब पीपल के नीचे जूतों की मरम्मत में जुटे अमली चाचा के पास पहुंच गया.

नरेंद्र को देख अमली चाचा ने कहा, ‘‘क्यों रे, फिर टूट गई तेरी चप्पल? तेरी चप्पल में अब जान नहीं रही. अपने कंजूस बाप से कह अब नई ले दें.’’

‘‘मैं चप्पल बनवाने नहीं आया, चाचा.’’

‘‘तब इस चाचा से और क्या काम पड़ गया, बोल?’’ अमली ने पूछा.

नरेंद्र अमली चाचा के पास बैठ गया. फिर थोड़ी सी ऊहापोह के बाद उस ने पूछा, ‘‘एक बात बतलाओ चाचा, यह ‘कुदेसन’ क्या होती है?’’

नरेंद्र के सवाल पर जूता गांठ रहे अमली चाचा का हाथ अचानक रुक गया. चेहरे पर हैरानी का भाव लिए वह बोले, ‘‘ तू यह सब क्यों पूछ रहा है?’’

‘‘मैं ने सुरजीत के घर में एक औरत को देखा था चाचा, सुरजीत कहता है कि वह औरत ‘कुदेसन’ है जिस को उस का बापू बाहर से लाया है. बतलाओ न चाचा कौन होती है ‘कुदेसन’?’’

‘‘क्या करेगा जान कर? अभी तेरी उम्र नहीं है ऐसी बातों को जानने की. थोड़ा बड़ा होगा तो सब अपनेआप मालूम हो जाएगा. जा, घर जा.’’ नरेंद्र को टालने की कोशिश करते हुए अमली चाचा ने कहा. लेकिन नरेंद्र जिद पर अड़ गया. तब अमली चाचा ने कहा,

‘‘ ‘कुदेसन’ वह होती है बेटा, जिस को मर्द लोग बिना शादी के घर में ले आते हैं और उस को बीवी की तरह रखते हैं.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं चाचा.’’

‘‘थोड़े और बड़े हो जाओ बेटा तो सब समझ जाओगे. कुदेसनें तो इस गांव में आती ही रही हैं. आज सुरजीत का बाप ‘कुदेसन’ लाया है. एक दिन तेरा बाप भी तो ‘कुदेसन’ लाया था. पर उस ने यह सब तेरी मां की रजामंदी से किया था. तभी तो वह वर्षों बाद भी तेरे घर में टिकी हुई है. बातें तो बहुत सी हैं पर मेरी जबानी उन को सुनना शायद तुम को अच्छा नहीं लगेगा, बेहतर होगा तुम खुद ही उन को जानो,’’ अमली चाचा ने कहा.

अमली चाचा की बातों से नरेंद्र हक्काबक्का था. उस ने सोचा नहीं था कि उस का एक सवाल कई दूसरे सवालों को जन्म दे देगा.

सवाल भी ऐसे जो उस की अपनी जिंदगी से जुडे़ थे. अमली चाचा की बातों से यह भी लगता था कि वह बहुत कुछ उस से छिपा भी गया था.

अब नरेंद्र की समझ में आने लगा था कि होश संभालने के बाद वह जिस खामोश औरत को अपने घर में देखता आ रहा है वह कौन है?

वह भी ‘कुदेसन’ है, लेकिन सवाल तो कई थे.

यदि मेरा बापू कभी मां की रजामंदी से ‘कुदेसन’ लाया था तो आज मां उस से इतना बुरा सलूक क्यों करती है? अगर वह ‘कुदेसन’ है तो मुझ को देख कर रोती क्यों है? जरा सा मौका मिलते ही मुझ को अपने सीने से चिपका कर चूमनेचाटने क्यों लगती थी वह? मां की मौजूदगी में वह ऐसा क्यों नहीं करती थी? क्यों डरीडरी और सहमी सी रहती थी वह मां के वजूद से?

फिर अमली चाचा की इस बात का क्या मतलब था कि अपने घर की कुछ बातें खुद ही जानो तो बेहतर होगा?

ऐसी कौन सी बात थी जो अमली चाचा जानता तो था किंतु अपने मुंह से उस को नहीं बतलाना चाहता?

एक सवाल को सुलझाने निकला नरेंद्र का किशोर मन कई सवालों में उलझ गया.

उस को लगने लगा कि उस के अपने जीवन से जुड़ी हुई ऐसी बहुत सी बातें हैं जिन के बारे में वह कुछ नहीं जानता.

अमली चाचा से नई जानकारियां मिलने के बाद नरेंद्र ने मन में इतना जरूर ठान लिया कि वह एक बार मां से घर में रह रही ‘कुदेसन’ के बारे में जरूर पूछेगा.

‘कुदेसन’ के कारण अब सुरजीत के घर में बवाल बढ़ गया था. सुरजीत की मां ‘कुदेसन’ को घर से निकालना चाहती थी मगर उस का बाप इस के लिए तैयार नहीं था.

इस झगड़े में सुरजीत की मां के दबंग भाइयों के कूदने से बात और भी बिगड़ गई थी. किसी वक्त भी तलवारें खिंच सकती थीं. सारा गांव इस तमाशे को देख रहा था.

वैसे भी यह गांव में इस तरह की कोई नई या पहली घटना नहीं थी.

जब सारे गांव में सुरजीत के घर आई ‘कुदेसन’ की चर्चा थी तो नरेंद्र का घर इस चर्चा से अछूता कैसे रह सकता था?

नरेंद्र ने भी मां और सिमरन बूआ को इस की चर्चा करते सुना था लेकिन काफी दबी और संतुलित जबान में.

इस चर्चा को सुन कर नरेंद्र को लगा था कि उस के मां से कु छ पूछने का वक्त आ गया है.

एक दिन जब नरेंद्र स्कूल से वापस घर लौटा तो मां अपने कमरे में अकेली थीं. सिमरन बूआ किसी रिश्तेदार के यहां गई हुई थीं और बापू खेतों में था.

नरेंद्र ने अपना स्कूल का बस्ता एक तरफ रखा और मां से बोला, ‘‘एक बात बतला मां, गायभैंस बांधने वाली जगह के पास बनी कोठरी में जो औरत रहती है वह कौन है?’’

पार्क वाली लड़की : यौवन वाली नवयौवना की कहानी-भाग 2

हालांकि जैसेजैसे रिटायर होने का समय नजदीक आ रहा है, वे परेशान होते जा रहे हैं. उन्हें लगता है, जिंदगी की रेत उन की मुट्ठी से झर कर खत्म होने जा रही है. बस, चंद जर्रे और बचे हैं उन की बंद मुट्ठी में, फिर खाली…रीती…

फिर क्या होगा? यह सवाल अब हर वक्त उन के दिलोदिमाग पर हावी रहता है. वे तय नहीं कर पा रहे. हालांकि लड़का कहता है, ‘पिताजी, बहुत हो गया काम. अब तो आप रिटायर होने के बाद घर पर आराम करिए, सुबहशाम टहलिए. अपनी सेहत का खयाल रखिए.’ लेकिन फिर भी भविष्य को ले कर वे चिंतित हैं.

छोटे बच्चे अचानक गेंद ले कर पार्क के उस हिस्से में आ गए जिस में वह लड़की पढ़ रही थी. लड़की के माथे पर बल पड़ने लगे. वह परेशान हो उठी. उस की परेशानी वे सह न सके. बैंच से उठे और गेंद खेलते बच्चों के कप्तान के पास पहुंचे, ‘‘बेटे, यहां ये दीदी पढ़ती हैं तुम्हारी…इन की परीक्षा नजदीक है. इन्हें पढ़ने दो यहां. तुम्हें अपनी जगह खेलना चाहिए.’’

‘‘कैसे खेलें दादाजी?’’ कप्तान ने परेशान हो कर कहा, ‘‘हमारी जगह पर दूसरे लड़कों ने क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया है. आप उन्हें रोकिए, हमारी जगह न खेलें.’’

बात जायज थी. पर क्रिकेट खेलने वाले लड़के शक्ल से ही उन्हें उद्दंड लगे. उन से उलझना उन्हें ठीक न लगा. इसलिए उन बच्चों को ले कर वे दूसरे कोने में पहुंचे. वहां ताश खेलने वाला दल बैठा था. वे सचमुच चिंतित हुए कि बच्चे कहां खेलें? आखिरकार उन्होंने फैसला किया, ‘‘तुम लोग उस पानी की टंकी के पास वाले मैदान में खेलो, वहां कोई नहीं आता.’’

बच्चे मान गए तो उन्हें सचमुच खुशी हुई.

अनजाने ही या जानबूझ कर उस लड़की को परेशान करने की नीयत से ताश खेलने वाले लड़कों का वह दल एक दिन उस लड़की वाले कोने में आ जमा. लड़की आई और परेशान सी पार्क में अपने लिए कोई सुरक्षित कोना देखने लगी पर उसे कोई उपयुक्त जगह न दिखी. चिंतित, खिन्न, उद्विग्न वह उन के नजदीक बैंच के एक सिरे की तरफ आ खड़ी हुई.

‘‘कहो तो इन उद्दंड लड़कों से तुम्हारा कोना खाली करने को कहूं?’’ उन्होंने उस लड़की के परेशान चेहरे की तरफ एक पल को ताका.

‘‘रहने दीजिए. आप जैसे भले आदमी का अपमान कर देंगे तो हमें अच्छा नहीं लगेगा,’’ लड़की के स्वर के अपनेपन ने उन की रगों में एक झनझनाहट पैदा कर दी. ‘कितना मधुर स्वर है इस का,’ उन्होंने सोचा.

कुछ सोच कर वे बैंच से उठे. लड़कों के नजदीक पहुंचे. एक लड़के की बगल में जा कर बैठ गए. कुछ देर चुपचाप उन का खेल देखते रहे. वह लड़का बीचबीच में बैंच के पास खड़ी लड़की को देखे जा रहा था. मन ही मन शायद मुसकरा भी रहा था. उन्हें ऐसा ही लगा.

‘‘आप लोग तो शरीफ और पढ़ेलिखे लड़के हैं,’’ उन्होंने कहना शुरू किया.

‘‘इसीलिए बेकार हैं. घर में रहें तो मांबाप को खटकते हैं. यहां किसी को खटकते नहीं हैं, इसलिए ताश जमाते हैं,’’ वह लड़का बोला.

‘‘जिंदगी के ये खूबसूरत दिन आप लोग यों बेकार बैठ कर जाया  कर रहे हैं. आप लोगों को नहीं लगता कि इन दिनों का कोई इस से बेहतर उपयोग हो सकता था?’’ वे बोले.

‘‘जिंदगी खूबसूरत होती है खूबसूरत लड़की से, जनाब,’’ एक मुंहफट लड़का बोला, ‘‘और खूबसूरत लड़की मिलती है अच्छी नौकरी वालों को या आरक्षण वालों को. हम लोग न सिफारिश वाले हैं और न आरक्षण वाले, इसलिए यहां बैठ कर ताश खेलते हुए जिंदगी को जाया कर रहे हैं. अब बताइए आप?’’

‘‘इस उम्र में आप लोगों को इस तरह जिंदगी की लड़ाई से हार मान कर अपने हथियार नहीं डाल देने चाहिए. मेरा खयाल है, आप लोग वक्त जाया न कर के अपने रुके हुए कैरियर को कोई और मोड़ देने का प्रयास करिए. न कुछ करने से, कुछ करना हमेशा बेहतर होता है. अगर आप चाहें तो मैं आप लोगों की इस मामले में मदद करने को तैयार हूं.’’

उन की बात सुनते ही ताश खेलती उंगलियां एकदम थम गईं, सब के चेहरे उन की तरफ उन्मुख हो गए. वे सब उसी तरह शांत बने रहे, ‘‘मैं उस सामने वाले मकान में ऊपर वाले हिस्से में रहता हूं. अपनी डिगरियां और प्रमाणपत्र ले कर आएं किसी दिन, शायद मैं आप लोगों को कुछ सुझा सकूं.’’

‘‘जी, धन्यवाद, दादाजी,’’ कह कर वे सब लड़के वहां से उठ कर चले गए.

‘‘आप तो सचमुच जादूगर हैं,’’ वह लड़की पार्क के अपने उस कोने में आ कर उन के निकट ही घास पर किताबें लिए बैठ गई. उस ने उस दिन जामुनी रंग का सूट पहन रखा था और उस पर सफेद रंग की चुन्नी.

वह अपलक उस के चेहरे को ताकते रहे. उन का मन हुआ, उस से कह दें, ‘इस तरह हंसती हुई तुम कितनी अच्छी लगती हो. क्या नाम है तुम्हारा? कहां रहती हो? किस की बेटी हो? और कौनकौन हैं तुम्हारे घर में?’ पर वे कुछ न बोले, सिर्फ मुसकराते रहे.

‘‘गेंद खेलने वाले बच्चों को दूसरी जगह पहुंचा दिया और अब इन लड़कों को पता नहीं आप ने कान में क्या कह दिया कि सब गऊ बने हुए यहां से चले गए,’’ लड़की चकित थी.

‘‘मैं ने लड़कों को अपने उस सामने वाले घर को दिखा दिया. कह दिया, वे जिंदगी के ये खूबसूरत दिन यों जाया न करें. जरूरी समझें तो मेरे घर में आएं, मैं ऊपर वाले हिस्से में रहता हूं. शायद उन की मदद कर सकूं.’’

‘‘आप सिर्फ लड़कों की ही मदद करेंगे, मेरी नहीं?’’ पता नहीं क्या सोच कर लड़की मुसकराई, ‘‘अगर मैं किसी दिन आप से सहायता मांगने आऊं तो…?’’

‘‘आइए न किसी दिन. मुझे तो उस दिन का इंतजार रहेगा,’’ हालांकि वे कहना तो यह चाहते थे कि उन्हें तो उस दिन का बेताबी से इंतजार रहेगा. पर लड़की से वे पहली बार बोल रहे थे. सिर्फ इतना ही पूछा, ‘‘नाम नहीं बताना चाहोगी मुझे?’’

‘‘जी, ताना, लोग घर में तन्नू कहते हैं,’’ वह हंसी.

वे उस के हंसते गुलाबी अधरों और संगमरमरी दांतों को अपलक ताकते रहे, ‘कितनी प्यारी लड़की है, न जाने किस का जीवन संवारेगी.’

‘‘ताना, कुछ अजीब सा नाम नहीं लगता तुम्हें?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘हां, है तो अजीब ही. मेरे पिता बहुत अच्छे संगीतकार हैं. घर में हर वक्त रियाज करते रहते हैं. उन से कुछ कह नहीं सकती. पढ़ने में बाधा पड़ती है, इसलिए यहां चली आती हूं. ताना नाम उन्होंने ही दिया है, तान से या लय से मतलब बताते हैं वे इस का. पर मुझे पता चला है, विख्यात संगीतसम्राट तानसेन की महबूबा थी कोई ताना नाम की लड़की. और वह तानसेन से भी ज्यादा अच्छी गायिका थी. पिताजी ने जरूर उसी के नाम पर मेरा नाम रखा होगा, यह सोच कर कि मैं भी उन की तरह संगीत में रुचि लूंगी और अच्छी गायिका बनूंगी. पर मुझे संगीत में कोई रुचि नहीं है.’’

‘‘तुम शायद एमबीए की तैयारी कर रही हो?’’ वे बोले. हालांकि वे कहना तो यह चाहते थे कि आजकल के बच्चे कितने खोजी किस्म के हो गए हैं. बाप ने ताना का जो अर्थ बताया, उस से संतुष्ट नहीं होते. नाम का अर्थ खोजा और पता चला ही लिया कि ताना तानसेन की प्रेमिका थी. कोई बाप अपनी लड़की से यह कैसे कह देता कि उस का नाम उस संगीतसम्राट की महबूबा के नाम पर रखा है.

‘‘जी, आप ने कैसे जाना?’’ वह हंस दी.

एकदम निश्छल, भोली, बच्चों जैसे हंसी को वे अपलक ताकते रहे,

‘‘तुम्हारी किताबों से…और मैं यह भी जान गया हूं कि तुम्हें अंगरेजी में खास दिक्कत आ रही है.’’

पछतावा: थर्ड डिगरी का दर्द- भाग 2

‘बंद करो अपनी बकवास. मयंक तुम्हारे जैसा अपराधी नहीं, बल्कि वह एक सच्चा इनसान है. इस की मैं तहेदिल से कद्र करती हूं. तुम यहां से जाते हो कि पुलिस को बुलाऊं…’

‘ओह, मैं तेरे लिए इतना बेगाना हो गया हूं नैना कि पुलिस को बुलाने की धमकी दे रही हो? खैर, जाता हूं मैं. अगर मेरे प्रति थोड़ी सी भी ममता और प्यार हो, तो कल ओम सिनेमा घर के पास दोपहर के शो के दौरान मिलना…’ इतना बोल कर रतन वहां से चला गया.

‘‘अरे रतन, किन खयालों में डूबे हो?’’ अचानक नेता सुरेश राय लौकअप में बंद रतन को देखते ही बोल पड़े.

मंत्री सुरेश राय को देखते ही रतन अपने खयालों की दुनिया से वापस लौटा और अपने ऊपर होने वाले जोरजुल्म से बचने के लिए गुजारिश करते हुए बोला, ‘‘सर, मुझे किसी तरह इंस्पैक्टर से बचा लीजिए, नहीं तो वह मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा…’’

‘‘अरे रतन, तू बेकुसूर है. मेरे पास तेरी बेगुनाही के पुख्ता सुबूत हैं. एसपी ने इंस्पैक्टर छेत्री को फोन कर तुम्हें छोड़ने के लिए आदेश दे दिया है.’’

ठीक उसी समय इंस्पैक्टर राजन छेत्री आया और लौकअप पर तैनात सिपाही से रतन को छोड़ देने के लिए कहा.

बाहर निकलने के बाद मंत्री ने रतन को अपनी गाड़ी में बिठाया. तब रतन मंत्री के एहसानों के दबाव में बोला, ‘‘सर, मैं आप का यह उपकार जिंदगीभर नहीं भूल पाऊंगा.’’

‘‘अरे, कैसा उपकार? मैं तेरे काम आ गया तो बदले में तू भी तो मेरा काम कर देता है. तेरे जैसे जोशीले नौजवान मुझे बहुत पसंद हैं…’’ गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे हुए मंत्री सुरेश राय ने रतन की पीठ को धीरे से थपथपाया और फिर कहा, ‘‘तुम्हारी मदद से ही तो मैं अपने दुश्मनों के दांत खट्टे करता हूं.’’

उन की गाड़ी बीरपाड़ा शहर से काफी दूर निकल गई थी. अचानक ड्राइवर ने ब्रेक लगाया, दरवाजा खोल कर रतन बाहर निकल गया था. जहां सड़क पर एक बेबस लड़की ‘बचाओ… बचाओ…’ की आवाज लगाते हुए दौड़ रही थी और उस के पीछे 4-5 गुंडे लगे हुए थे.

यह देख कर मंत्रीजी के हाथपैर फूल गए. उन्होंने घबराते हुए रतन को आवाज लगाई, ‘‘अरे रतन, उन के पीछे क्यों भागे जा रहे हो. मेरी जान आफत में डालोगे क्या? ड्राइवर तुम्हें भी कई बार कह चुका हूं कि रात में गाड़ी अनजान जगह पर मत रोको…’

‘‘सौरी सर,’’ ड्राइवर ने माफी मांगी, लेकिन रतन पर मंत्री की बातों का कोई असर नहीं पड़ा.

रतन ने दौड़ रहे एक गुंडे को पकड़ा और उस के पेट में अपनी लात से 2-4 किक जमाई. वह तिलमिला उठा. वार करने की जगह अपनी जान बचा कर चाय बागान में वह भाग गया. रतन दूसरे अपराधियों की ओर बढ़ा, लेकिन वे सब अपने को फंसते देख कर नौ दो ग्यारह हो गए.

सड़क पर दौड़ रही लड़की हांफती हुई धम्म से गिर गई. रतन ने उसे अपने कंधे पर उठाया और गाड़ी की पिछली सीट पर डाल दिया.

‘‘अरे रतन, यह क्या चक्कर है. तुम्हें लड़की की जरूरत थी तो मुझ से बोला होता,’’ मंत्री सुरेश राय ने उस से अपना गुस्सा इजहार किया.

‘‘सर, गलत काम जरूर करता हूं, लेकिन शराब और शबाब से दूर रहता हूं. अनजान जगह पर किसी बेबस लड़की की जान बचाना कोई अपराध तो नहीं है. इनसानियत के नाते मैं ने अपना कर्तव्य निभाया है.’’

‘‘देखो, फालतू बातों के लिए मेरे पास समय नहीं है. हक और धर्म की बातें हम अपने भाषणों में करते हैं, अपनी जिंदगी में नहीं. अब इस लड़की को कहां छोड़ोगे?’’

‘‘इसे सिलीगुड़ी के किसी अस्पताल में ले जाएंगे सर,’’ विधान मार्ग पर बने सुभाषचंद्र नर्सिंग होम में उस अनजान लड़की को इलाज के लिए भरती करा दिया गया. साथ ही, इस की सूचना स्थानीय पुलिस को भी दी गई.

जब लड़की पर रतन की नजर गई, उस का कलेजा धकधक करने लगा. वह तो नैना थापा है, उसे देखने के बाद वह पत्थर की तरह वहीं खड़ा रह गया. कभी खून से लथपथ उस के सलवारसूट को देख रहा था तो कभी उस के मुरझाए चेहरे को. उसे सामूहिक हवस का शिकार बनाया था. दूसरे ही पल रतन के मन ने कहा, ‘यह लड़की तो मुझ से नफरत करती है. कहीं होश में आने के बाद कोई नई मुसीबत न खड़ी कर दे. अब यहां से निकलने में ही भलाई है.’

‘‘रतन, इस लड़की के पीछे तो तू ने अपना सारा काम चौपट कर दिया. पहले इसे उन बदमाशों से बचाया, उस के बाद अस्पताल में भरती कराया और अब इस के चेहरे पर टकटकी लगाए खड़ा है. आखिर क्या बात है?’’ नर्सिंग होम में देर होने पर नेता सुरेश राय ने रतन को टोका. ‘‘नहीं, नहीं सर,’’ वह हड़बड़ा कर बोल उठा और उन के साथ बाहर निकल गया. साथ ही जातेजाते रतन सोचने लगा, ‘इस लड़की का क्या भरोसा, कब क्या आरोप लगा दे, इस से दूर रहने में ही भलाई है.’

जब नैना को होश आया तो एक बार रतन का चेहरा उस के दिमाग में नाच उठा. टाइगर हिल में दी गई उस की चेतावनी उस के मन को झकझोरने लगी. उसे अपनेआप पर पछतावा होने लगा, क्यों उस ने आंख मूंद कर मयंक पर भरोसा किया. जिस ने उस की इज्जत लूट ली. उस के साथियों ने उस का सबकुछ छीन लिया.

नैना की आंखें भर आईं. उस को अंदर ही अंदर घुटन महसूस होने लगी. वह सोचने लगी कि उस से शैतान और इनसान को पहचाने में कैसे भूल हो गई?

अचानक नैना के सामने रतन और मयंक की तसवीरें उभर आईं. दोनों ही अपराधी थे. मयंक कई मासूम लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद उन की हत्या कर देता था, तो रतन कई बार बम धमाके कर चुका था. एक हैवान था, तो दूसरा शैतान. दोनों जनता के दुश्मन थे.

अस्पताल से घर आने के बाद भी नैना को चैन नहीं मिला. लोकलाज के डर से उस ने कालेज जाना बंद कर दिया था. दिनरात उस के घर में जमघट लगाने वाली सहेलियां, अब उस से बात करने में भी कतराती थीं. हमदर्दी जताने के बजाय तरहतरह के ताने देती थीं.

एक दिन नैना के घर रतन पहुंच गया. उस समय नैना की आंखों में आंसू थे. नैना की हालत देख कर रतन भी रोना आ गया.

रतन ने अपनी डबडबाई आंखों को रूमाल से पोंछा और फिर उस से बोला, ‘‘नैना प्लीज… मत रोओ, चाहे मयंक को सजा हो भी गई तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा…’’

एक घड़ी औरत : प्रिया की जिंदगी की कहानी- भाग 1

आतंकित और हड़बड़ाई प्रिया ने तकिए के नीचे से टौर्च निकाल कर सामने की दीवार पर रोशनी फेंकी. दीवार की इलैक्ट्रौनिक घड़ी में रेडियम नहीं था, इसलिए आंख खुलने पर पता नहीं चलता था कि कितने बज गए हैं. अलार्म घड़ी खराब हो गई थी, इसलिए उसे दीवार घड़ी का ही सहारा लेना पड़ता था. ‘फुरसत मिलते ही वह सब से पहले अलार्म घड़ी की मरम्मत करवाएगी. उस के बिना उस का काम नहीं चलने का,’ उस ने मन ही मन सोचा. एक क्षण को उसे लगा कि वह औरत नहीं रह गई है, घड़ी बन गई है. हर वक्त घड़ी की सूई की तरह टिकटिक चलने वाली औरत. उस ने कभी यह कल्पना तक नहीं की थी कि जिंदगी ऐसे जीनी पड़ेगी. पर मजबूरी थी. वह जी रही थी. न जिए तो क्या करे? कहां जाए? किस से शिकायत करे? इस जीवन का चुनाव भी तो खुद उसी ने किया था.

उस ने अपने आप से कहा कि 6 बज चुके हैं, अब उठ जाना चाहिए. शरीर में थकान वैसी ही थी, सिर में अभी भी वैसा ही तनाव और हलका दर्द मौजूद था, जैसा सोते समय था. वह टौर्च ज्यादा देर नहीं जलाती थी. पति के जाग जाने का डर रहता था. पलंग से उठती और उतरती भी बहुत सावधानी से थी ताकि नरेश की नींद में खलल न पड़े. बच्चे बगल के कमरे में सोए हुए होते थे.

जब से अलार्म घड़ी बिगड़ी थी, वह रोज रात को आतंकित ही सोती थी. उसे यह डर सहज नहीं होने देता था कि कहीं सुबह आंख देर से न खुले, बच्चों को स्कूल के लिए देर न हो जाए. स्कूल की बस सड़क के मोड़ पर सुबह 7 बजे आ जाती थी. उस से पहले उसे बच्चों को तैयार कर वहां पहुंचाना पड़ता था. फिर आ कर वह जल्दीजल्दी पानी भरती थी.

अगर पानी 5 मिनट भी ज्यादा देर से आता था तो वह जल्दी से नहा लेती ताकि बरतनों का पानी उसे अपने ऊपर न खर्च करना पड़े. सुबह वह दैनिक क्रियाओं से भी निश्ंिचत हो कर नहीं निबट पाती. बच्चों को जल्दीजल्दी टिफिन तैयार कर के देने पड़ते. कभी वे आलू के भरवां परांठों की मांग करते तो कभी पूरियों के साथ तली हुई आलू की सब्जी की. कभी उसे ब्रैड के मसालाभरे रोल बना कर देने पड़ते तो कभी समय कम होने पर टमाटर व दूसरी चीजें भर कर सैंडविच. हाथ बिलकुल मशीन की तरह काम करते. उसे अपनी सुधबुध तक नहीं रहती थी.

एक दिन में शायद प्रिया रोज दसियों बार झल्ला कर अपनेआप से कहती कि इस शहर में सबकुछ मिल सकता है पर एक ढंग की नौकरानी नहीं मिल सकती. हर दूसरे दिन रानीजी छुट्टी पर चली जाती हैं. कुछ कहो तो काम छोड़ देने की धमकी कि किसी और से करा लीजिए बहूजी अपने काम.

उस की तनख्वाह में से एक पैसा काट नहीं सकते, काटा नहीं कि दूसरे दिन से काम पर न आना तय. सो, कौन कहता है देश में गरीबी है? शोषण है? शोषण तो ये लोग हम मजबूर लोगों का करते हैं. गरीब और विवश तो हम हैं. ये सब तो मस्त लोग हैं.

‘कल भी नहीं आई थी वह. आज भी अभी तक नहीं आई है. पता नहीं अब आएगी भी या मुझे खुद ही झाड़ूपोंछा करना पड़ेगा. इन रानी साहिबाओं पर रुपए लुटाओ, खानेपीने की चीजें देते रहो, जो मांगें वह बिना बहस के उन्हें दे दो. ऊपर से हर दूसरे दिन नागा, क्या मुसीबत है मेरी जान को…’ प्रिया झल्ला कर सोचती जा रही थी और जल्दीजल्दी काम निबटाने में लगी हुई थी.

‘अब महाशय को जगा देना चाहिए,’ सोच कर प्रिया रसोई से कमरे में आई और फिर सोए पति को जगाया, ‘‘उठिए, औफिस को देर करेंगे आप. 9 बजे की बस न मिली तो पूरे 45 मिनट देर हो जाएगी आप को.’’

‘‘अखबार आ गया?’’

‘महाशय उठेंगे बाद में, पहले अखबार चाहिए,’ बड़बड़ाती प्रिया बालकनी की तरफ चल दी जहां रबरबैंड में बंधा अखबार पड़ा होता है क्योंकि अखबार वाले के पास भी इतना समय नहीं होता कि वह सीढि़यां चढ़, दरवाजे के नीचे पेपर खिसकाए.

ट्रे में 2 कप चाय लिए प्रिया पति के पास आ कर बैठ गई. फिर उस ने एक कप उन की ओर बढ़ाते हुए पूछा, ‘‘अखबार में ऐसा क्या होता है जो आप…’’

‘‘दुनिया…’’ नरेश मुसकराए, ‘‘अखबार से हर रोज एक नई दुनिया हमारे सामने खुल जाती है…’’

चाय समाप्त कर प्रिया जल्दीजल्दी बिस्तर ठीक करने लगी. फिर मैले कपड़े ढूंढ़ कर एकत्र कर उन्हें दरवाजे के पीछे टंगे झोले में यह सोच कर डाला कि समय मिलने पर इन्हें धोएगी, पर समय, वह ही तो नहीं है उस के पास.

हफ्तेभर कपड़े धोना टलता रहता कि शायद इतवार को वक्त मिले और पानी कुछ ज्यादा देर तक आए तो वह उन्हें धो डालेगी पर इतवार तो रोज से भी ज्यादा व्यस्त दिन…बच्चे टीवी से चिपके रहेंगे, पति महाशय आराम से लेटेलेटे टैलीविजन पर रंगोली देखते रहेंगे.

‘‘इस मरी रंगोली में आप को क्या मजा आता है?’’ प्रिया झल्ला कर कभीकभी पूछ लेती.

‘‘बंदरिया क्या जाने अदरक का स्वाद? जो गीतसंगीत पुरानी फिल्मों के गानों में सुनने को मिलता है, वह भला आजकल के ड्रिल और पीटी करते कमर, गरदन व टांगे तोड़ने वाले गानों में कहां जनाब.’’

प्रिया का मन किया कि कहे, बंदरिया तो अदरक का स्वाद खूब जान ले अगर उस के पास आप की तरह फुरसत हो. सब को आटेदाल का भाव पता चल जाए अगर वह घड़ी की सूई की तरह एक पांव पर नाचती हुई काम न करे. 2 महीने पहले वह बरसात में भीग गई थी. वायरल बुखार आ गया था तो घरभर जैसे मुसीबत में फंस गया था. पति महाशय ही नहीं झल्लाने लगे थे बल्कि बच्चे भी परेशान हो उठे थे कि आप कब ठीक होंगी, मां. हमारा बहुत नुकसान हो रहा है आप के बीमार होने से.

‘‘सुनिए, आज इतवार है और मुझे सिलाई के कारीगरों के पास जाना है. तैयार हो कर जल्दी से स्कूटर निकालिए, जल्दी काम निबट जाएगा, बच्चे घर पर ही रहेंगे.’’

‘‘फिर शाम को कहोगी, हमें आर्ट गैलरी पहुंचाइए, शीलाजी से बात करनी है.’’

सुन कर सचमुच प्रिया चौंकी, ‘‘बाप रे, अच्छी याद दिलाई. मैं तो भूल ही गई थी यह.’’

नरेश से प्रिया की मुलाकात अचानक ही हुई थी. नगर के प्रसिद्ध फैशन डिजाइनिंग इंस्टिट्यूट से प्रिया को डिगरी मिलते ही एक कंपनी में नौकरी मिल गई. दिल लगा कर काम करने के कारण वह विदेश जाने वाले सिलेसिलाए कपड़ों की मुख्य डिजाइनर बन गई.

नरेश अपनी किसी एक्सपोर्टइंपोर्ट की कंपनी का प्रतिनिधि बन कर उस कंपनी में एक बड़ा और्डर देने आए तो मैनेजर ने उन्हें प्रिया के पास भेज दिया. नरेश से प्रिया की वह पहली मुलाकात थी. देर तक दोनों उपयुक्त नमूनों आदि पर बातचीत करते रहे. अंत में सौदा तय हो गया तो वह नरेश को ले कर मैनेजर के कक्ष में गई.

फिर जब वह नरेश को बाहर तक छोड़ने आईर् तो नरेश बोले, ‘आप बहुत होशियार हैं, एक प्रकार से यह पूरी कंपनी आप ही चला रही हैं.’

‘धन्यवाद जनाब,’ प्रिया ने जवाब दिया. प्रशंसा से भला कौन खुश नहीं होता.

शायद : पैसों के बदले मिला अपमान- भाग 1

पदचाप और दरवाजे के हर खटके पर सुवीरा की तेजहीन आंखों में चमक लौट आती थी. दूर तक भटकती निगाहें किसी को देखतीं और फिर पलकें बंद हो जातीं.

सिरहाने बैठे गिरीशजी से उन की बहू सीमा ने एक बार फिर जिद करते हुए कहा था, ‘‘पापा, आप समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे? जब तक नानीजी और सोहन मामा यहां नहीं आएंगे, मां के प्राण यों ही अधर में लटके रहेंगे. इन की यह पीड़ा अब मुझ से देखी नहीं जाती,’’ कहतेकहते सीमा सिसक उठी थी.

बरसों पहले का वह दृश्य गिरीशजी की आंखों के सामने सजीव हो उठा जब मां और भाई के प्रति आत्मीयता दर्शाती पत्नी को हर बार बदले में अपमान और तिरस्कार के दंश सहते उन्होंने ऐसी कसम दिलवा दी थी जिस की सुवीरा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

‘‘आज के बाद अगर इन लोगों से कोई रिश्ता रखोगी तो तुम मेरा मरा मुंह देखोगी.’’

बरसों पुराना बीता हुआ वह लम्हा धुलपुंछ कर उन के सामने आ गया था. अतीत के गर्भ में बसी उन यादों को भुला पाना इतना सहज नहीं था. वैसे भी उन रिश्तों को कैसे झुठलाया जा सकता था जो उन के जीवन से गहरे जुड़े थे.

आंखें बंद कीं तो मन न जाने कब आमेर क्लार्क होटल की लौबी में जा पहुंचा और सामने आ कर खड़ी हो गई सुंदर, सुशील सुवीरा. एकदम अनजान जगह में किसी आत्मीय जन का होना मरुस्थल में झील के समान लगा था उन्हें. मंदमंद हास्य से युक्त, उस प्रभावशाली व्यक्तित्व को बहुत देर तक निहारते रहे थे. फिर धीरे से बोले, ‘आप का प्रस्तुतिकरण सर्वश्रेष्ठ था.’

‘धन्यवाद,’ प्रत्युत्तर में सुवीरा बोली तो गिरीश अपलक उसे देखते ही रह गए थे. इस पहली भेंट में ही सुवीरा उन के हृदय की साम्राज्ञी बन गई थी. फिर तो उसी के दायरे में बंधे, उस के इर्दगिर्द घूमते हुए हर पल उस की छोटीछोटी गतिविधियों का अवलोकन करते हुए इतना तो वह समझ ही गए थे कि उन का यह आकर्षण एकतरफा नहीं था. सुवीरा भी उन्हें दिल की अतल गहराइयों से चाहने लगी थी, पर कह नहीं पा रही थी. अपने चारों तरफ सुवीरा ने कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी सीमा बांध रखी थी जिसे तोड़ना तो दूर लांघना भी उस के लिए मुश्किल था.

लगभग 1 माह बाद दफ्तर के काम से गिरीश दिल्ली पहुंचे तो सीधे सुवीरा से मिलने उस के घर चले गए थे. बातोंबातों में उन्होंने अपने प्रेम प्रसंग की चर्चा सुवीरा की मां से की तो अलाव सी सुलग उठी थीं वह.

‘बड़ी सतीसावित्री बनी फिरती थी. यही गुल खिलाने थे?’ मां के शब्दों से सहमीसकुची सुवीरा कभी उन का चेहरा देखती तो कभी गिरीश के चेहरे के भावों को पढ़ने का प्रयास करती पर अम्मां शांत नहीं हुई थीं.

अगले दिन कोर्टमैरिज के बाद सुवीरा हठ कर के अम्मांबाबूजी के पास आशीर्वाद लेने पहुंची तो अपनी कुटिल दृष्टि बिखेरती अम्मां ने ऐसा गर्जन किया कि रोनेरोने को हो उठी थी सुवीरा.

‘अपनी बिरादरी में लड़कों की कोई कमी थी जो दूसरी जाति के लड़के से ब्याह कर के आ गई?’

‘फोन तो किया था तुम्हें, अम्मां… अभी भी तुम्हारा आशीर्वाद ही तो लेने आए हैं हम.’

सुवीरा के सधे हुए आग्रह को तिरस्कार की पैनी धार से काटती हुई अम्मां ने हुंकार लगाई, ‘तू क्या समझती है, तू चली जाएगी तो हम जी नहीं पाएंगे…भूखे मरेंगे? डंके की चोट पर जिएंगे…लेकिन याद रखना, जिस तरह तू ने इस कुल का अपमान किया है, हम आशीर्वाद तो क्या कोई रिश्ता भी नहीं रखना चाहते तुझ से.’

व्यावहारिकता के धरातल पर खड़े गिरीश, सास के इस अनर्गल प्रलाप का अर्थ भली प्रकार समझ गए थे. नौकरीपेशा लड़की देहरी लांघ गई तो रोटीपानी भी नसीब नहीं होगा इन्हें. झूठे दंभ की आड़ में जातीयता का रोना तो बेवजह अम्मां रोए जा रही थीं.

बिना कुछ कहेसुने, कांपते कदमों से सुवीरा सीधे बाबूजी के कमरे में चली गई थी. वह बरसों से पक्षाघात से पीड़ित थे. ब्याहता बेटी देख कर उन की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा फूट पड़ी थी.

सुवीरा भी उन के सीने से लग कर बड़ी देर तक सिसकती रही थी. रुंधे स्वर से वह इतना ही कह पाई थी, ‘बाबूजी, अम्मां चाहे मुझ से कोई रिश्ता रखें या न रखें, पर मैं जब तक जिंदा रहूंगी, मायके के हर सुखदुख में सहभागिता ही दिखाऊंगी, ये मेरा वादा है आप से.’

बेटी की संवेदनाओं का मतलब समझ रहे थे दीनदयालजी. आशीर्वादस्वरूप सिर पर हाथ फेरा तो अम्मां बिफर उठी थीं, ‘हम किसी का एहसान नहीं लेंगे. जरूरत पड़ी तो किसी आश्रम में चाहे रह लें लेकिन तेरे आगे हाथ नहीं फैलाएंगे.’

अम्मां चाहे कितना चीखतीचिल्लाती रहीं, सुवीरा महीने की हर पहली तारीख को नोटों से भरा लिफाफा अम्मां के पास जरूर पहुंचा आती थी और बदले में बटोर लाती थी अपमान, तिरस्कार के कठोर, कड़वे अपदंश. गिरीश ने कभी अम्मां के व्यवहार का विश्लेषण करना भी चाहा तो बड़ी सहजता से टाल जाती सुवीरा, पर मन ही मन दुखी बहुत होती थी.

‘जो कुछ कहना था, मुझे कहतीं. दामाद के सामने अनापशनाप कहने की क्या जरूरत थी?’ ऐसे में अपंग पिता का प्यार और पति का सौहार्द ठंडे फाहे सा काम करता.

दौड़भाग करते कब सुबह होती, कब शाम, पता ही नहीं चलता था. गिरीश ने कई बार रोकना चाहा तो सुवीरा हंस कर कहती, ‘समझने की कोशिश करो, गिरीश. मेरे ऊपर अम्मां, बीमार पिता और सोहन का दायित्व है. जब तक सोहन अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता, मुझे नौकरी करनी ही पड़ेगी.’

‘सुवीरा, मैं ने अपने मातापिता को कभी नहीं देखा. अनाथालय में पलाबढ़ा लेकिन इतना जानता हूं कि सात फेरे लेने के बाद पतिपत्नी का हर सुखदुख साझा होता है. उसी अधिकार से पूछ रहा हूं, क्या तुम्हारे कुछ दायित्व मैं नहीं बांट सकता?’

गिरीश के प्रेम से सराबोर कोमल शब्द जब सुवीरा के ऊपर भीनी फुहार बन कर बरसते तो उस का मन करता कि पति के मादक प्रणयालिंगन से निकल कर, भाग कर सारे खिड़कीझरोखे खोल दे और कहे, देखो, गिरीश मुझे कितना प्यार करते हैं.

2 बरस बाद सुवीरा ने जुड़वां बेटों को जन्म दिया. गिरीश खुद ससुराल सूचना देने गए पर कोई नहीं आया था. बाबूजी तो वैसे ही बिस्तर पर थे पर मां और सोहन… इतने समय बाद संतान के सुख से तृप्त बेटी के सुखद संसार को देखने इस बार भी नहीं आए थे. मन ही मन कलपती रही थी सुवीरा.

गिरीश ने जरा सी आत्मीयता दर्शायी तो पानी से भरे पात्र की तरह छलक उठी थी सुवीरा, ‘क्या कुसूर किया था मैं ने? उस घर को सजाया, संवारा अपने स्नेह से सींचा, पर मेरे अस्तित्व को ही नकार दिया. कम से कम इतना तो देखते कि बेटी कहां है, किस हाल में है. मात्र यही कुसूर है न मेरा कि मैं ने प्रेम विवाह किया है.’

इतना सुनते ही गिरीश के चेहरे पर दर्द का दरिया लरज उठा था. बोले, ‘इस समय तुम्हारा ज्यादा बोलना ठीक नहीं है. आराम करो.’

वारिस : सुरजीत के घर में कौन थी वह औरत-भाग 1

होश संभालने के साथ ही नरेंद्र उस औरत को अपने घर में देखता आ रहा था. वह कौन थी, उसे नहीं पता था.

बचपन में जब भी वह किसी से उस औरत के बारे में पूछता था तो वह उस को डांट कर चुप करा देता था.

घर के बाईं ओर जहां गायभैंस बांधे जाते थे उस के करीब ही एक छोटी सी कोठरी बनी हुई थी और वह औरत उसी कोठरी में सोती थी.

मां का व्यवहार उस औरत के प्रति अच्छा नहीं था जबकि उस का बाप  बलवंत और बूआ सिमरन उस औरत के साथ कुछ हमदर्दी से पेश आते थे.

नरेंद्र की मां बलजीत का सलूक तो उस औरत के साथ इतना खराब था कि वह सारा दिन उस से जानवरों की तरह काम लेती थी और फिर उस के सामने बचाखुचा और बासी खाना डाल देती थी. कई बार तो लोगों का जूठन भी उस के सामने डालने में बलवंत परहेज नहीं करती थी. लेकिन जैसा भी, जो भी मिलता था वह औरत चुपचाप खा लेती थी.

होश संभालने के बाद नरेंद्र ने घर में रह रही उस औरत को ले कर एक और भी अजीब चीज महसूस की थी. वह हमेशा नरेंद्र की तरफ दुलार और हसरत भरी नजरों से देखती थी. वह उसे छूना और सहलाना चाहती थी. पर घर के किसी सदस्य के होने पर उस औरत की नरेंद्र के करीब आने की हिम्मत नहीं होती थी. लेकिन जब कभी नरेंद्र उस के सामने अकेले पड़ जाता और आसपास कोई दूसरा नहीं होता तो वह उस को सीने से लगा लेती और पागलों की तरह चूमती.

ऐसा करते हुए उस की आंखों में आंसुओं के साथसाथ एक ऐसा दर्द भी होता था जिस को शब्दों में जाहिर करना मुश्किल था.

‘कुदेसन’ शब्द को नरेंद्र ने पहली बार तब सुना था जब उस की उम्र 14-15 साल की थी.

गांव के कुछ दूसरे लड़कों के साथ नरेंद्र जिस सरकारी स्कूल में पढ़ने जाता था वह गांव से कम से कम 2 किलोमीटर की दूरी पर था.

नरेंद्र के साथ गांव के 7-8 लड़कों का समूह एकसाथ स्कूल के लिए जाता था और रास्ते में अगर कोई झगड़ा न हुआ तो एकसाथ ही वे स्कूल से वापस भी आते थे.

सुबह स्कूल जाने से पहले सारे लड़के गांव की चौपाल पर जमा होते थे. एकसाथ मस्ती करते हुए स्कूल जाने में रास्ते की दूरी का पता ही नहीं चलता था और जब कभी समूह का कोई लड़का वक्त पर चौपाल नहीं पहुंचता था तो उस की खोजखबर लेने के लिए किसी लड़के को उस के घर दौड़ाया जाता था. हमारे साथ स्कूल जाने वाले लड़कों में एक सुरजीत भी था जिस के साथ नरेंद्र की खूब पटती थी. दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे. नरेंद्र कई बार सुरजीत के घर भी जा चुका था.

एक दिन जब स्कूल जाते समय  सुरजीत गांव की चौपाल पर नहीं पहुंचा तो उस की खोजखबर लेने के लिए नरेंद्र उस के घर पहुंच गया.

पहले तो घर में दाखिल हो कर नरेंद्र ने देखा कि सुरजीत को बुखार है. वह वापस मुड़ा तो उस की नजर सुरजीत के घर में एक औरत पर पड़ी जो उस के लिए अनजान थी.

वह जवान औरत गांव में रहने वाली औरतों से एकदम अलग थी, बिलकुल उसी तरह जैसे उस के अपने घर में रह रही औरत उसे नजर आती थी. चूंकि नरेंद्र को स्कूल जाने की जल्दी थी इसलिए उस ने इस बारे में सुरजीत से कोई बात नहीं की.

2 दिन बाद सुरजीत स्कूल जाने वाले लड़कों में फिर से शामिल हो गया तो छुट्टी के बाद गांव वापस लौटते हुए नरेंद्र ने उस से उस अजनबी औरत के बारे में पूछा था. इस पर सुरजीत ने कहा, ‘बापू ने ‘कुदेसन’ रख ली है.’

‘‘कुदेसन, वह क्या होती है?’’ नरेंद्र ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैं नहीं जानता. लेकिन ‘कुदेसन’ के कारण मां और बापू में रोज झगड़ा होने लगा है. मां कुदेसन को घर में एक मिनट भी रखने को तैयार नहीं, लेकिन बापू कहता है कि भले ही लाशें बिछ जाएं, कुदेसन यहीं रहेगी,’’ सुरजीत ने बताया.

‘‘मगर तेरा बापू इस कुदेसन को लाया कहां से है?’’

‘‘क्या पता, तुम को तो मालूम ही है कि मेरा बापू ड्राइवर है. कंपनी का ट्रक ले कर दूरदूर के शहरों तक जाता है. कहीं से खरीद लाया होगा,’’ सुरजीत ने कहा.

सुरजीत की इस बात से नरेंद्र को और ज्यादा हैरानी हुई थी. उस ने जानवरों की खरीदफरोख्त की बात तो सुनी थी मगर इनसानों को भी खरीदा या बेचा जा सकता है यह बात वह पहली बार सुरजीत के मुख से सुन रहा था.

‘कुदेसन’ शब्द एक सवाल बन कर नरेंद्र के जेहन में लगातार चक्कर काटने लगा था. उस को इतना तो एहसास था कि ‘कुदेसन’ शब्द में कुछ बुरा और गलत था. किंतु वह बुरा और गलत क्या था? यह उस को नहीं पता था.

‘कुदेसन’ शब्द को ले कर घर में किसी से कोई सवाल करने की हिम्मत उस में नहीं थी. बाहर किस से पूछे यह नरेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था.

असमंजस की उस स्थिति में अचानक ही नरेंद्र के दिमाग में अमली चाचा का नाम कौंधा था.

अमली चाचा का असली नाम गुरबख्श था. अफीम के नशे का आदी (अमली) होने के कारण ही गुरबख्श का नाम अमली चाचा पड़ गया था. गांव के बच्चे तो बच्चे जवान और बड़ेबूढे़ तक गुरबख्श को अमली चाचा कह कर बुलाते थे. दूसरे शब्दों में, गुरबख्श सारे गांव का चाचा था.

गांव की चौपाल के पास ही अमली चाचा पीपल के नीचे जूतों को गांठने की दुकानदारी सजा कर बैठता था. वह अकेला था, क्योंकि उस की शादी नहीं हुई थी. एकएक कर के उस के अपने सारे मर गए थे. आगेपीछे कोई रोने वाला नहीं था अमली चाचा के. गांव के हर शख्स से अमली चाचा का मजाक चलता था.

बड़े तो बड़े, नरेंद्र की उम्र के लड़कों के साथ भी उस का हंसीमजाक चलता था. आतेजाते लड़के अमली चाचा से छेड़खानी करते थे और वह इस का बुरा नहीं मानता था. हां, कभीकभी छेड़खानी करने वाले लड़कों को भद्दीभद्दी गालियां जरूर दे देता था.

शरारती लड़के तो अमली चाचा की गालियां सुनने के लिए ही उस को छेड़ते थे.

पार्क वाली लड़की : यौवन वाली नवयौवना की कहानी-भाग 1

वे अपनी बैंच पर बैठे रहते हैं और वह लड़की उस पार्क के कोने में. देखा जाए तो दोनों में न कोई समानता है, न संबंध, फिर भी पता नहीं क्यों, पार्क के उस कोने में बैठी लड़की उन्हें बहुत अच्छी लगती है. उस लड़की को भी उन का उस बैंच पर बैठे रहना अखरता नहीं बल्कि आश्वस्त करता है, एक प्रकार की सुरक्षा प्रदान करता है. बस, एक यही सूत्र है शायद, जो इन दोनों को इस पार्क से जोड़े हुए है. कैसी अजीब बात है, वे इस लड़की को देखदेख कर उस के बारे में बहुतकुछ बातें जान गए हैं, पर उस का नाम वे अब तक नहीं जान पाए. वह रोज इस पार्क में 5 बजे शाम को आ बैठती है. कल वह बसंती सूट पहन कर आई थी, परसों हलका हरा. कल वह जामुनी सूट पहन कर आएगी और परसों सफेद जमीन पर खिले नीले फूलों वाला.

जिस दिन वह बसंती सूट पहनती है उस दिन चुन्नी हलकी हरी होती है. हलके हरे सूट पर बसंती चुन्नी. जामुनी सूट पर सफेद चुन्नी और नीले फूलों पर वह नारंगी रंग की चुन्नी डाल कर आती है. वे माथे पर बिंदी नहीं लगाती. अगर लगाए तो उन का मन मचल जाए और वह मन ही मन गाने लगें, ‘चांद जैसे मुखड़े पर बिंदिया सितारा…’

ऐसा कटावदार चेहरा हो, और इतना गोरा रंग, ऐसा चौड़ा चमकता हुआ माथा हो और ऐसी कमान सी तनी हुई पतली, काली भौंहें और उन के बीच बिंदी न हो, जानें क्यों, उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगती. उन का कई बार मन हुआ, कभी इस लड़की से कहें, ‘बिंदी लगाया करो न, बहुत अच्छी लगोगी.’ पर कह नहीं सके. उम्र का बहुत फासला है. यह फासला उन्हें ऐसा कहने से रोकता है. कहां 55-56 साल की ढलान पर खड़े पकी उम्र के, उम्रदराज खेलेखाए व्यक्ति और कहां यह 20-22 साल की खिलती धूप सी बिखरबिखर पड़ते यौवन वाली नवयौवना.

लड़की हंसती है तो दाएं गाल पर गड्ढा बनता है. बायां गाल उन्हें दिखाई नहीं देता, इसलिए वे उस के बारे में निश्चित नहीं हैं. उस के दांत सुघड़ और चमकीले सफेद हैं. वह लिपस्टिक नहीं लगाती, पर अधर बिलकुल ताजे खिले कमलदल से नरम और कोमल हैं. बाल बहुत घने और काले हैं.

बालों की हठीली लट उस के माथे पर हवा के साथ बारबार आ जाती है, जिसे वह किताब पढ़ते समय अदा से सिर झटक कर हटाया करती है, पर अकसर वह हटती नहीं है. वह नाक में कील या लौंग नहीं पहनती, पर नाक छिदी हुई है. कानों में वह गोल, छोटी बालियां पहनती है, जो हमेशा हिलती रहने के कारण बहुत लुभावनी लगती हैं. लंबी गरदन में अगर वह काले मनकों की माला पहनने लगे तो अच्छा रहेगा.

यह लड़की किसी प्रतियोगिता में बैठने की तैयारी कर रही है. इस के पास वे जिन किताबों को देखते हैं वैसी किताबें उन के लड़के के पास रही हैं. उन का लड़का अब नौकरी में है. एमबीए करने के बाद एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सहायक मैनेजर. 15 हजार रुपए से तनख्वाह शुरू हुई है. बाप रे, आजकल की कंपनियां इन नएनए छोकरों को कितना रुपया दे देती हैं, जबकि वे 10 हजार रुपए पर पहुंचतेपहुंचते रिटायर हो जाएंगे.

इस लड़की को अंगरेजी में खास दिक्कत होती है. पार्क में आ कर अकसर वह अंगरेजी के वाक्यांश, मुहावरे और शब्दार्थ रटा करती है. यह लड़की चूडि़यां नहीं पहनती, कड़े पहनती है. अगर चूडि़यां पहने तो इसे लाल रंग की पहननी चाहिए, बहुत अच्छी लगेंगी इस की गोरी कलाइयों पर, वे कई बार ऐसा सोच चुके हैं. इस की लंबी, नाजुक, पतली उंगलियों में अंगूठी सचमुच बहुत अच्छी लगे, पर यह नहीं पहनती. लंबे नाखूनों पर नेलपौलिश नहीं लगाती, पर उन का कुदरती गुलाबी रंग उन्हें हमेशा अच्छा लगता है…अच्छा यानी…?

यों आजकल ढीलेढाले कुरतों का रिवाज है पर इस लड़की का कुरता ऊपर कसा हुआ और नीचे काफी ढीला होता है. पुराने जमाने में जिस प्रकार की फ्रौकें बना करती थीं, उस तरह का होता है. कसे हुए कुरते में उस के उभार बेहद आकर्षक और दिलकश प्रतीत होते हैं, तिस पर कुरते का नीचा कटा गला. जब कभी हवा से उस की चुन्नी उभारों पर से उड़ जाती है, गले के नीचे उस के पुष्ट उभार नजर आने लगते हैं, खासकर तब, जब वह पार्क की घास पर बेलौस हो, लेटी हुई पढ़ती रहती है.

पार्क में आते ही वह सैंडल उतार कर उन्हें पौधों के नजदीक रख देती है. सैंडल बहुत कीमती नहीं होतीं. कभीकभार वे मरम्मत भी मांगती रहती हैं, पर शायद उसे वक्त नहीं मिलता कि ठीक करवा लाए या फिर घर में कोई ऐसा नहीं जिसे वह मोची के पास तक भेज कर…वैसे अगर सुनहरी बैल्टों वाली सैंडल वह पहने तो एकदम परी लगे. मन हुआ, वे उस से कहें किसी दिन, पर कह नहीं सके.

ढीले कुरते के कारण कमर का अंदाजा नहीं लग पाता, पर जरूर उस की नाप…वह कौन सा आदर्श नाप होती है विश्व सुंदरियों की, 36-24-36 या ऐसा ही कुछ. वे अगर दरजी होते तो जरूर इस लड़की का कोई सूट तैयार करने के लिए मचल उठते.

इस लड़की को देखदेख कर ही वे यह भी जान गए हैं कि इस की माली हालत बहुत अच्छी नहीं है. बहुत खराब भी नहीं होगी, वरना उस के पास इतने रंग के सूट कहां से आते? पर इस ने शादी के बजाय पढ़ाई को तरजीह दी है. इस का मतलब है, इस के मांबाप इस की शादी के लिए पर्याप्त पैसा नहीं जोड़ पाए हैं और लड़की को अच्छा वर मिल जाए, इसलिए किसी अच्छी नौकरी में लगवाने के लिए इस का कैरियर बनाने का प्रयास कर रहे हैं. जरूर इस के मांबाप समझदार लोग हैं वरना इसे यहां अकेली पार्क में पढ़ने क्यों आने देते? वे इस पर शक भी तो कर सकते थे. नजर रखने के लिए यहां किसी न किसी बहाने दसियों बार आ भी तो सकते थे.

वे सोचने लगे, प्रतियोगिता के लिए इस के पास ज्यादा किताबें नहीं हैं. इस की तुलना में उन के लड़के के पास ढेरों किताबें थीं, एक से एक अच्छे लेखकों की देशीविदेशी किताबें. अकसर यह उन्हीं किताबों को ले कर यहां आती है और उन्हें रटती रहती है. घर में या तो कमरे कम हैं या फिर आसपास का माहौल अच्छा नहीं है वरना यह यहां आ कर क्यों पढ़ा करती? हो सकता है पासपड़ोस के लोग ऊंची आवाज में टीवी वगैरा चलाते हों. आजकल के पड़ोसी भी तो अजीब होते हैं, उन्हें दूसरों की तकलीफों से कुछ लेनादेना नहीं होता.

इस पार्क का सब से ज्यादा हराभरा वही कोना है, जहां हर शाम आ कर यह लड़की अपना अड्डा जमा लेती है. इस लड़की के सामने वाली बैंच पर वे भी कब्जा कर लेते हैं. अब हर शाम का यही काम हो गया है, बल्कि जब से पत्नी लड़के के पास चली गई है. वे दफ्तर से आने के बाद एकदम अकेले हो जाते हैं. घर में पड़ेपड़े जी घबराने लगता है. अखबार वे सुबह ही पढ़ डालते हैं. फिर शाम को उसे उठाने का मन नहीं होता.

टेलीविजन के सीरियल उन्हें पसंद नहीं आते. ज्यादातर पारिवारिक तनाव, लड़ाईझगड़े और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा वाले, मनमुटाव भरे, शत्रुता और बिखराव वाले सीरियल होते हैं.

फिल्में भी उन्हें पसंद नहीं आतीं. आजकल की हीरोइनें, बाप रे! एक गाने में 50 बार तो पोशाकें बदल जाती हैं और सिवा लटकेझटके, कूल्हे मटकाने व उछलकूद करने के उन्हें आता क्या है?

इन सब से अच्छा तो इस पार्क में आ कर बैठना है. ढलते सूरज का मजा लेना, खुली हवा, खिले हुए फूल, हरी, मखमली घास, पार्क के कोने में चहकते, गेंद खेलते बच्चे. उधर बैठी बतियाती महिलाएं. उस तरफ बैठे ताश खेलते लड़के. यहां आ कर उन्हें लगता है, जीवन  अभी खत्म नहीं हुआ है. अभी बहुतकुछ बचा है जिंदगी में जिसे नए सिरे से संजोया जा सकता है, जिसे नए सिरे से जीया जा सकता है.

ऐसा भी होता है- भाग 1

नई से नई फिल्में घरबैठे देख लेते थे. इस से पहले कि नई फिल्म लगे, हम देखने के लिए उतावले हो जाते थे. यह शौक मुझे मां से विरासत में मिला था. मुझे याद है कि एक बार मौसी व मौसाजी पूरे परिवार के साथ हमारे यहां आए थे. खूब रौनक रही और खूब मजा आया. परंतु कोई भी सत्कार बिना फिल्म दिखाए अधूरा रहता है. इसलिए उन्हें फिल्म दिखाना बहुत जरूरी था. उन के भी अपने कई कार्यक्रम थे. समय मिल ही नहीं पा रहा था. अंत में एक दिन सब ने रात वाले आखिरी शो में जाने का फैसला किया.

हमारी कार छोटी थी. सब उस में आ नहीं रहे थे. आखिर में मेरे दोनों छोटे भाइयों को पीछे डिकी में बिठा दिया गया. वे ढक्कन ऊपर उठाए बैठे रहे. रास्ते भर न केवल हम बल्कि देखने वाले भी हमारी दीवानगी पर हंस रहे थे. अब भी जब कभी मिलना होता है, उस घटना की याद ताजा हो जाती है.

स्पष्ट है कि फिल्में मेरे दिल व दिमाग पर सदा छाई रहती थीं. यहां तक कि मैं अकसर फिल्मी नायकों को देख कर सपनों में डूब जाती. मेरा पति भी ऐसा ही होगा, जो जहां एक ओर रोमांस करने में बड़ा भावुक व नाजुक होगा वहीं कठिनाई के समय अकेले ही 10-12 गुंडों से लोहा लेगा. इन सपनों में जीते हुए वह दिन भी आ पहुंचा जब मुझे अपने पति का चुनाव करना पड़ा.

मोहन अपनी मां के साथ मुझे देखने आए थे. सुबह ही मैं सौंदर्य विशेषज्ञा के यहां से सज कर आई थी. नायक पाने के लिए नायिका को न जाने क्याक्या करना पड़ता है. पूर्ण औपचारिकता के बाद मोहन की मां ने इच्छा प्रकट की कि मोहन लड़की से बात करना चाहता है. इस में किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी. हम दोनों को अकेला छोड़ दिया गया. न जाने क्यों, मेरा दिल धड़कने लगा, मानो कचहरी के कटघरे में खड़ी हूं.

मोहन पहली दृष्टि में ही मुझे अच्छे लगे थे. सुंदर और गोरेचिट्टे, सौम्य व बड़ीबड़ी भूरी आंखें. मेरे सपनों का नायक उभर रहा था. कद 190 सेंटीमीटर, वजन न कम न अधिक.

‘‘एक प्याला चाय और अपने हाथों से…’’

मैं चौंक पड़ी. मोहन मुसकरा रहे थे. मैं ने चाय बना कर प्याला आगे बढ़ाया तो हाथों में एक कंपन था. फिर भी मैं सावधान थी. मैं डर रही थी कि कहीं चाय छलक न जाए. अगर छलक ही गई तो? क्या मेरा नायक इस स्थिति पर कोई गाना गाने लगेगा?

‘‘क्या शौक हैं आप के?’’

मैं फिर चौंक पड़ी, ‘‘शौक? मेरे?’’

मोहन ने हंस कर कहा, ‘‘क्या यहां कोई तीसरा भी है?’’

मैं ने बौखला कर कहा, ‘‘नहीं तो.’’

‘‘तो फिर यह सवाल आप ही से पूछा है.’’

‘‘ओह.’’

‘‘ओह क्या?’’

‘‘हां, शौक के बारे में आप पूछ रहे थे. मुझे फिल्म देखने का बहुत शौक है.’’

‘‘खाना बनाना, सीनापिरोना, घर के काम…इन में शौक रखने की तो गलती नहीं करतीं आप?’’ मोहन की आंखों में शरारत थी.

मैं हंस पड़ी, ‘‘नहीं, ऐसी भूल नहीं करती. यह सब काम मां कर लेती हैं. वैसे मां के साथ मैं सब कामों में हाथ बंटाती हूं. आप ने वह फिल्म देखी है…’’

मैं ने फिल्म की कहानी शुरू कर दी. नायक, नायिकाओं के नाम गिनाने शुरू कर दिए. मोहन शांति से सुन रहे थे. मुझे लगा कि मेरी कहानी कुछ लंबी हो रही थी.

अचानक मुझे अपने धाराप्रवाह कथावाचन में अर्धविराम लगाते देख मोहन ने कहा, ‘‘आप को तो मालूम है कि मेरे पिता नहीं हैं. कई वर्ष पहले उन की मृत्यु हो चुकी है. मेरे लिए सबकुछ मेरी मां हैं. मैं उन्हें बहुत प्यार करता हूं.’’

उफ, मैं ने सोचा कि यह खलनायक कहां से आ गया. मैं ने शीघ्रता से कहा, ‘‘हां, मुझे मालूम है. आप ने ‘कभीकभी’ फिल्म देखी? उस में भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी,’’ और मैं फिर शुरू हो गई.

मोहन हंस रहे थे. कुछ देर सुन कर बीच में टोक दिया, ‘‘मैं यह कहना चाह रहा था कि मुझे ऐसी पत्नी चाहिए जो मेरी इन भावनाओं को समझ सके.’’

‘‘क्यों नहीं, यह तो हर पत्नी का कर्तव्य है. आप ने वह फिल्म देखी…’’

‘‘जानम, सिलसिला, अनाड़ी, खंडहर…’’

अब हम दोनों हंस रहे थे. कितने भोले हैं मोहन. नाम तो फिल्मों के गिना दिए पर इन में से कोई भी स्थिति यहां लागू नहीं होती थी. ओह, समझी. शायद ज्यादा चतुर होने की कोशिश कर रहे थे.

‘‘मैं यही कहना चाहता था. अगर आप को स्वीकार हो तो मैं बात पक्की करने के लिए मां से कह दूंगा.’’

कौन सी फिल्म थी वह? हां, ठीक तो है. मैं ने याद करते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘क्यों, क्या आप की मां मेरी मां नहीं हैं? ऐसा भी हो सकता है कि शायद आप से अधिक मैं उन्हें प्यार व आदर दे सकूं.’’

हमारा विवाह हो गया और मैं मोहन के यहां आ गई. और तो सब ठीक लगा पर सोने का कमरा देख कर बड़ी निराशा हुई. न वह बड़ा गोल पलंग और न फूलों से महकती सुहागरात की सेज, रात भी यों ही गुजर गई. मोहन अपनी मां का बखान कर के मुझे उबा रहे थे और मैं फिल्मी स्थितियां बना कर माहौल दिलचस्प करने का प्रयत्न कर रही थी. आखिर उन्हें ही हथियार डालने पड़े. मैं बोल रही थी और वह सुन रहे थे.

‘‘वाह, कितने अच्छे परांठे बने हैं,’’ मोहन कह रहे थे, ‘‘गोभी भर के बनाए हैं. जरूर मां ने बनाए होंगे. क्यों?’’

‘‘हां,’’ मैं ने उत्तर दिया.

‘‘तुम भी सीख लो. मां मूली के परांठे भी बहुत बढि़या बनाती हैं.’’

‘‘सीख लूंगी,’’ मुझे न जाने क्यों अच्छा न लगा. कल तो मैं ने भी बनाए थे, पर कुछ बोले नहीं थे.

मां ने रसोई से आवाज लगाई, ‘‘बहू, परांठे और ले जाओ. बन गए हैं. हां, तुम भी खा लो. गरमगरम सेंक रही हूं.’’

मैं परांठे ले आई. एक मोहन को दे कर दूसरा स्वयं खाने लगी.

मोहन ने मुसकरा कर कहा, ‘‘हैं न स्वादिष्ठ. एक काम करो. एक मेरे साथ खा लो और दूसरा मां के साथ खा लेना. उन्हें भी अच्छा लगेगा कि बहू उन का साथ दे रही है, क्यों?’’

मैं ने सिर हिला दिया. परंतु उन का आशय समझ रही थी. मुझे मां के साथ खाना चाहिए या उन के बाद. मेज पर कल मैं ने एक ताजा गुलदस्ता रखा था. देखा कि किनारे वाले फूलों की पखंडि़यां झड़ने लगी थीं. मोहन दफ्तर जाने के लिए उठ खड़े हुए थे.

‘‘मां, मैं जा रहा हूं,’’ जोर से बोले, और फिर धीरे से मुझ से कहा, ‘‘जाऊं? जाने की आज्ञा है?’’

मैं तय नहीं कर पा रही थी कि हंसूं कि रूठ जाऊं. अब मां से तो कह दिया है, मैं कौन होती हूं? मेरे गाल पर चुटकी काटते हुए वह शैतानी से हंसते हुए बाहर निकल गए.

दिन भर ऐसे ही काम में या सोतेजागते निकल जाता है. शाम होने की प्रतीक्षा है. मैं पत्नी हूं, मोहन की प्रतीक्षा में आकुल हो जाती हूं. एक यह मां हैं जिन्हें चिंता हो जाती है. बारबार खड़ी हो कर बाहर झांकती हैं. मुझे अच्छा नहीं लगता.

‘‘बहू, साढ़े 5 बज रहे हैं. मोहन आता ही होगा. बेसन तैयार है न. मोहन को पकौडि़यां बहुत अच्छी लगती हैं. आते ही बना लेना. चाय का पानी बाद में चढ़ा देना.’’

मैं चिढ़ जाती हूं. भुनभुनाती हूं मन में. दिन भर से कार्यक्रम बना रही हूं. मुझे क्या मालूम नहीं है कि आते ही पकौडि़यां बनानी हैं और फिर चाय का पानी रखना है. एक दिन मैं ने मोहन को टोका भी था.

उन्होंने हंस कर कहा था, ‘‘मां हैं न, उन्हें चिंता रहती है बेटे की. समझा करो.’’

‘‘मैं कुछ नहीं हूं? क्या मुझे नहीं पता कि कब आप के लिए क्या करना है?’’

‘‘क्यों नहीं,’’ उन्होंने उसी शरारती मुसकराहट से कहा, ‘‘जो चीज समझने में मां ने सारी जिंदगी निकाल दी, तुम तो 2 ही दिन में सीख गई हो.’’

बात उन्होंने हंस कर कही थी पर उस में जो तीखापन था वह मन में चुभ गया था. जब कभी बाजार जाते थे तो पहले मां से पूछते थे कि कुछ लाना है बाजार से? लेकिन मुझे उन से कहना पड़ता था कि आज यह लेते आना. मेरा संदेह अब विश्वास में बदलने लगा था कि मैं इस घर की दूसरी श्रेणी की व्यक्ति हूं. मेरा दरजा दूसरा है. पहले मां हैं यानी मेरी सास. यह परछाईं मेरे आगेपीछे कब तक रहेगी? ओह, मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए.

मोहन कोई भी चीज लाते हैं तो बिना मुझे बताए मां के हाथ में रख देते हैं, जैसे मैं एक अदृश्य व्यक्ति हूं, जो मौजूद तो है पर दिखाई नहीं देता. मैं ने न जाने कितनी बार कल्पना की थी कि आज आते हुए मिठाई लाएंगे और मां की नजर बचा कर कमरे में ले आएंगे. डब्बा खोलेंगे और प्यार से एक टुकड़ा उठा कर मुझे बांहों में समेटते हुए मुंह में रख देंगे.

खाली जगह : सड़क पर नारियल पानी बेचने का संघर्ष – भाग 1

वह इतनी जोर से चीखा कि सड़क पर चलते सभी लोग एक पल को सहम गए. उस ने नारियल काटने वाला बड़ा सा छुरा निकाला और हरे नारियल को हाथ में ले कर एक झटके में ऐसा काटा मानो किसी का सिर काट रहा हो. नारियल फट गया, उस में भरा पानी हाथों से होता हुआ नीचे तक फैल गया. वह कटे नारियल को हाथ में लिए बैठ गया और जोरों से चीखते हुए रो पड़ा.

बात ही कुछ ऐसी थी कि बदहाली और गरीबी से परेशान हो कर सुरेश गांव छोड़ कर वेल्लोर आ गया था. बीआईटी यूनिवर्सिटी के सामने उस ने नारियल पानी बेचने की एक दुकान लगा ली थी. दुकान क्या… एक डब्बा रखा, एक फट्टे पर 10-20 नारियल रखे और हाथ में बड़ा सा छुरा.

हालांकि सुरेश को नारियल काटने की आदत थी. गांव में वह मिनटों में नारियल के पेड़ पर चढ़ जाता था और तेज धार के छुरे से नारियलों को पेड़ से काट कर नीचे गिरा देता था.

पिछले 2 सालों से बरसात नहीं हुई थी. धान की फसल सूख गई थी. गांव में मजदूरी नहीं थी. मांबाप ने गांव छोड़ने की बात कही तब सुरेश ने उन्हें पुश्तैनी जगह छोड़ कर जाने से मना कर दिया और खुद जाने का फैसला लिया. वहां से वेल्लोर पास था. सीएमसी बहुत बड़ा मैडिकल कालेज था लेकिन सड़क पर बहुत से लोग दुकानें सजाए बैठे थे. उस के लिए कोई जगह नहीं थी. गांव के एक मुंहबोले अन्ना के झोंपड़े में उस ने पनाह ली थी. उसी ने नारियल पानी बेचने की सलाह दी थी. एक नारियल पर 5 से 10 रुपए बच जाते थे. दिनभर में 50-100 रुपए की आमदनी हो जाएगी. नारियल का कचरा सूख जाने पर ईंधन के लिए काम में आ जाएगा, लेकिन जगह की दिक्कत थी.

सुरेश आवारा की तरह जगह खोज रहा था. वेल्लोर के बीआईटी कैंपस के सामने जगह खाली थी और बहुत से लड़केलड़कियां वहां से गुजरते थे. वे जरूर नारियल पानी पीना पसंद करेंगे. उस ने अन्ना से कह कर अपने लिए 20 नारियल उधार ले लिए. छुरा भी मिल गया. एक बोरे में नारियल ले कर वह एक फट्टे को बिछा कर सड़क किनारे बैठ गया.

पहले दिन 5-7 नारियल ही बिके. स्ट्रा का एक डब्बा भी रख लिया था. शाम को बाकी बचे नारियलों को कंधे पर रख कर वह अन्ना के झोंपड़े में लौटा. चावल और रसम खा कर वह अपने गांव की याद में खो गया. यह गांव कभी यादों में से जाता क्यों नहीं है? क्यों बारबार बुलाता है?

सुरेश 6 फुट का एकदम काले रंग का लेकिन मेहनती लड़का था. एक पुरानी रंगीन लुंगी और गंदी सी  शर्ट, बाल उलझे हुए और ग्राहक को तलाशती आंखें.

अगली सुबह सुरेश फिर फट्टा ले कर वहां बैठ गया. 2 तरह के नारियल रखे. बड़ा पानी वाला 20 रुपए का, छोटा 15 रुपए का था. अंदर मलाई वाला भी था. पानी पीने के बाद वह नारियल को फाड़ कर अंदर की मलाई खरोंच कर दे देता था. 1-2 बार उस की भी बड़ी इच्छा हुई कि पानी पी कर देखे, मलाई खा कर देखे, लेकिन एक नारियल पर 10 रुपए का नुकसान हो जाएगा. अभी उसे रुपयों की जरूरत है, वह बिलकुल भी नारियल का पानी नहीं पी सकता.

यूनिवर्सिटी कैंपस से लड़कों का हुजूम निकलता था. कुछ पास आते, मोलभाव करते और आगे बढ़ जाते. लड़कालड़की आते तो एक नारियल में 2 स्ट्रा डाल कर एकसाथ पीते. वह देखता, उसे सबकुछ बहुत अजीब लगता. वह अपनी नजरें फेर लेता था.

कभीकभी लड़कालड़की इतना चिपक कर नारियल पानी पीते कि उसे लगता, उस के शरीर में कुछ गड़बड़ी हो रही है. वह नजरें घुमा लेता तो उन के हंसने की आवाज कानों में आती. वह नजरें नीची कर लेता.

वैसे भी सुरेश की उम्र अभी 20-22 साल की रही होगी. प्यार जैसे रिश्तों से उस का कोई नाता नहीं पड़ा था, फिर जिस गांव में वह रहता था वहां प्यार नहीं होता था, सीधे शादी और बच्चा पैदा होता था. लेकिन यहां जोकुछ हो रहा था, वह सब हैरानी की बात थी.

एक हफ्ता होतेहोते सुरेश की बिक्री बढ़ गई. वह तकरीबन 40-50 नारियल काटने लगा था. कचरा भी उठा कर अपने झोंपड़े में अन्ना के लिए ले आता था. उस ने अन्ना को 100-200 रुपए देने भी शुरू कर दिए थे. उन्हीं की जमानत पर तो वह नारियल उठा पा रहा था. थोड़े से रुपए उस ने गांव में भी भेज दिए थे और प्लास्टिक की एक पुरानी मेज ले ली थी जिस पर नारियल का ढेर रख लेता था. वह जानता था कि कालेज से कब लड़केलड़की बाहर आएंगे. इसलिए वह 3-4 नारियल पहले ही छील कर रख लेता था.

एक दिन एक ग्राहक आया. उस ने नारियल मांगा. सुरेश ने काट कर उसे दिया. उस ने पीया और 10 रुपए का नोट देने लगा. सुरेश ने कहा, ‘‘भाई, यह 20 रुपए का नारियल है.’’

‘‘मैं 20 रुपए ही देता, लेकिन नारियल में पानी नहीं था,’’ वह बोला.

‘‘भाई, अभी नारियल का मौसम नहीं है. पानी कम हो जाता?है. मलाई बन जाती?है,’’ सुरेश ने कहा.

‘‘नहीं… ये 10 रुपए रख,’’ कह कर वह चला गया. सुरेश को बहुत गुस्सा आया. सोचा कि अब ग्राहक से रुपए पहले लेगा, फिर नारियल काटेगा, लेकिन ऐसा करने पर दुकानदारी पर बुरा असर पड़ेगा. वह ग्राहक को देखसमझ कर रुपए मांगेगा.

धूप में खड़े रहने और दिनभर मेहनत करने से सुरेश का शरीर और काला मजबूत हो गया था. गरमी का मौसम जा चुका था, बरसात लग गई थी. कभी भी बरसात होने लगती थी. सामने की एक बड़ी दुकान के छज्जे के नीचे जा कर वह खड़ा हो जाता था. इस से ग्राहकी पर बुरा असर पड़ रहा था. दिन में 20-30 नारियल ही बिक रहे थे.

एक दोपहर बारिश हो कर रुकी ही थी कि सुरेश छज्जे की ओट से निकल कर अपनी दुकान के पास जा कर खड़ा हुआ. इतने में एक चमचमाती कार सड़क के उस ओर खड़ी हुई, उस में से एक मैडम उतर कर उस की दुकान पर आईं.

लिली: उस लड़की पर अमित क्यो प्रभावित था ?-भाग 1

लिली की बिंदास पहल ने अमित को मुश्किल में डाल दिया. एक दिन वह हंस कर बोली, ‘‘क्या तुम मुझसे दोस्ती करना पसंद करोगे?’’

उस रोज अमित  झेंप गया. उसे कोई जवाब नहीं सू झा. बस, मुसकरा दिया.

रातभर वह लिली के ही बारे में सोच रहा था. कल जब उस से मुलाकात होगी, तो वह क्या जवाब देगा? क्या उस के प्रस्ताव को ठुकरा देगा?

लिली पहली लड़की थी, जिस ने उसे प्रपोज किया. एक अदने से शहर  से जब वह मुंबई नौकरी करने  आया था, तब सिवा नौकरी के उसे

कुछ नहीं पता था. न ही यहां की लड़कियों के तौरतरीके, न ही इस शहर का मिजाज.

लिली अमित को एक रैस्टोरैंट में मिली थी, जहां वह अकसर खाना खाने जाता था. यहीं से दोनों में जानपहचान शुरू हुई.

लिली ने उसे अपना ह्वाट्सएप का नंबर दिया और कहा, ‘‘अगर हां हो, तो जरूर संदेश देना.’’

लिली खूबसूरत थी. छोटे शहर की लड़कियों से अलग उस का रूपरंग बहुत अच्छा. वह फैशनेबल थी.

अमित के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था. सोचविचार कर उस ने फैसला लिया कि वह लिली की पहल को नहीं ठुकराएगा.

अगले दिन जब अमित रैस्टोरैंट गया, तो सब से पहले उस की नजर लिली की चेयर पर गई. यही समय होता था लिली के आने का.

अमित ने चारों तरफ नजरें दौड़ाईं, मगर वह नहीं दिखी. वह बेचैन हो गया. आज उस के दिल में एक खालीपन का अनुभव हुआ. कुरसी पर बैठ कर वह खाने का इंतजार करने लगा. रहरह कर उस की नजर दरवाजे पर चली जाती.  तभी लिली आती दिखी. अमित का चेहरा खिल गया.

लिली ने मुसकरा कर उसे विश किया. उस के बाद अपनी चेयर पर बैठ कर लिली मोबाइल पर उंगलियां फेरने लगी. अमित से रहा न गया. उस ने तत्काल उसे मैसेज दिया, ‘शाम को खाली हो?’

लिली ने मैसेज का तुरंत जवाब दिया, ‘हां.’

इस तरह दोनों ने शाम को साथ बिताने का फैसला लिया. एक तय जगह पर दोनों मिले. मोटरसाइकिल पर बैठ कर मरीन ड्राइव पर आए. समुद्र के किनारे लगे चबूतरे पर बैठ कर दोनों आपस में बातचीत करने लगे.

‘‘तुम किस कंपनी में हो?’’ लिली ने पूछा.

‘‘मैं यहीं एक सौफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी में इंजीनियर हूं.’’

‘‘अकेले हो? मेरा मतलब शादी से है,’’ लिली ने पूछा.

‘‘अभी कुंआरा हूं,’’ कह कर अमित हंसा.

कुछ सोच कर अमित ने लिली से भी यही सवाल किया. जवाब में लिली ने बतलाया कि वह कुंआरी है. एक कुरियर कंपनी में नौकरी करती है.

इस तरह जब भी समय मिलता, वे दोनों एकदूसरे के साथ बिताना पसंद करते. धीरेधीरे दोनों के संबंध गाढ़े  होते गए.

एक रोज लिली गले में सुंदर सी चेन पहन कर आई थी. अमित ने देखा, तो तारीफ किए बिना न रह सका.

‘‘मां ने दी है. आज मेरा बर्थडे है,’’ लिली की इस बात से अमित को शर्मिंदगी हुई. बौयफ्रैंड होने के नाते यह हक सब से पहले उसे जाता था. काश, पहले पता होता, तो वह निश्चय  ही लिली को सरप्राइज दे कर निहाल  कर देता.

अमित कुछ सोच कर बोला, ‘‘देर से ही सही, आज तुम्हारा बर्थडे मेरे फ्लैट पर धूमधाम से मनेगा. मां से बोल दो कि आने में देर होगी.’’

अमित बहुत खुश था. लिली के साथ वह एक अच्छी सी दुकान में गया. वहां उस की पसंद के सोने के  झुमके दिलवाए. 40,000 रुपए का बिल चुकता किया.

लिली ने मना किया, मगर अमित के लिए अपने पहले प्यार का तोहफा था. उस के बाद केक और पिज्जा ले कर अपने फ्लैट पर आया. दोनों ने खूब मजे किए. रात 11 बजने को हुए. ‘‘अच्छा तो मैं चलती हूं,’’ कह कर लिली ने अपना पर्स संभाला.

अमित का मन तो नहीं था उसे छोड़ने का, मगर कैसे कहे. जुमाजुमा चार दिनों की मुलाकात थी. कहीं वह बुरा न मान ले.

लिली अमित के करीब आई. उस के गालों को हलके से चूम लिया. अमित का रोमरोम खिल उठा.

लिली के जाने के बाद अमित उस के ही ख्वाबों और खयालों में डूबा रहा. रहरह कर गालों पर अपनी उंगलियां फेरता तो ऐसा लगता लिली अब भी उस के करीब है. एक अजीब सी मादकता उस के ऊपर हावी हो गई. तभी मोबाइल फोन की घंटी बजी. फोन लिली का था.

‘‘पहुंच गई?’’ अमित ने पूछा.

‘हां,’ लिली का जवाब था, ‘क्या कर रहे हो? सोए नहीं?’ उस ने पूछा.

‘‘नींद नहीं आ रही,’’ अमित का जवाब था.

‘रात के 2 बज रहे हैं. औफिस नहीं जाना है?’

‘‘यार, तुम तो अभी से मेरी चिंता करने लगी?’’

‘क्या करूं. दिल के हाथों मजबूर हूं.’

‘‘ऐसा क्या देखा मु झ में?’’ पूछ कर अमित हंसा.

लिली सोच कर बोली, ‘कभीकभी भावनाओं के आगे शब्द कम पड़ जाते हैं,’ वह आगे बोली, ‘तुम ने मु झ में क्या देखा?’

अमित थोड़ा शरमाते हुए बोला, ‘‘तुम्हारे होंठ. जब गुलाबी लिपस्टिक लगा कर आती हो, तो ऐसा लगाता है मानो गुलाब की 2 पंखुडि़यां एकदूसरे को चूम रही हों.’’

‘ऐसा था तो पहल क्यों नहीं की?’ लिली ने शरारत की.

‘‘डरता था, कहीं तुम बुरा न मान जाओ.’’

‘मन तो नहीं कर रहा, पर क्या करें नौकरी जो करनी है. अच्छा, गुडनाइट,’ लिली ने मोबाइल का स्विच औफ कर दिया.

आज लिली सफेद कपड़े पर गुलाब रंग के फूल बने छींटे वाला पहन कर आई थी. बालों को खास तरीके से गूंथा था. लट चेहरे पर  झूल रही थी. गोरा रंग उस पर सुर्ख गुलाबी होंठ कयामत ढा रहे थे. अमित उसे देखता ही रह गया.

आज शाम दोनों ने फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाया. सिनेमाघर का सन्नाटा पा कर अमित की भावनाएं कुछ ज्यादा उबाल लेने लगीं. रहा न गया तो उस के होंठों को चूम लिया. लिली पहले तो सकपकाई, पर बाद में सहज हो गई.

यह सिलसिला अब ऐसे ही चलता रहा. अब दोनों के बीच कुछ भी परदा नहीं रहा.

एक रोज लिली परेशान थी. अमित ने उस की परेशानी की वजह पूछी, तो वह बोली, ‘‘मु झे 50,000 रुपए की सख्त जरूरत है.’’

यह पहला मौका था, जब लिली ने उस से रुपयों की डिमांड की. इज्जत का सवाल था, इसलिए वह मना न कर सका. तुरंत उस के खाते में 50,000 रुपए ट्रांसफर कर दिए.

अब लिली खुश थी. तकरीबन  2 महीने हो गए दोनों की दोस्ती को. बातोंबातों में लिली ने बताया था कि वह मुंबई में अकेली रहती है. मातापिता पूना में रहते हैं. क्यों न हम एकसाथ रहें?

अमित को यह अटपटा लगा. इस से अच्छा है कि दोनों शादी कर लें.  अमित यही चाहता था, मगर लिली तैयार नहीं हुई.

‘‘अमित, शादी कोई गुड्डेगुड्डी का खेल नहीं. पहले हम एकदूसरे को सम झ लें, फिर शादी कर लेंगे. लिव इन रिलेशनशिप में रहेंगे, तो एकदूसरे को सम झने में आसानी होगी,’’ दोटूक कह कर लिली ने अपनी मंशा जाहिर कर दी.

अब अमित को फैसला लेना था कि वह इसे स्वीकार करता है या नहीं.

अमित लिली को खोना नहीं चाहता था, वहीं उस के संस्कार बिना शादी किसी लड़की के साथ रहने की इजाजत नहीं दे रहे थे.

‘‘यह कैसा संबंध लिली? बिना शादी हम एकदूसरे के साथ रहें? क्या रह जाएगा हमारेतुम्हारे बीच? ऐसे ही  साथ रहना है, तो शादी कर लेने में क्या बुराई है?’’

‘‘कैसी दकियानूसी बात कर रहे हो? मैं बर्फ  नहीं, जो तुम्हारे साथ रह कर पिघल जाऊंगी? साल 6 महीने साथ  रह लेंगे तो क्या बिगड़ जाएगा?’’  लिली ने उलाहना दिया, ‘‘तुम कौन  सी दुनिया में रह रहे हो अमित. यह  नई दुनिया है. पुराने रिवाज टूट रहे  हैं,’’ लिली के प्रस्ताव के आगे  अमित ने हाथ खड़े कर दिए.

लिली कुछ कपड़े और एक सूटकेस ले कर अमित के पास रहने चली आई. लिली रविवार को अपने मांबाप से मिलने पूना जाती थी. अमित भी जाना चाहता था, मगर वह मना कर देती. पर क्यों, यह उस की सम झ से परे था.

लिली के रूपरंग में पूरी तरह डूबे अमित को लिली के सिवा कुछ नहीं सू झता. आहिस्ताआहिस्ता लिली अमित के हर मामले में दखल देने लगी. अमित पूरी तरह से लिली पर निर्भर हो गया.

अपने महीने की तनख्वाह लिली के हाथ में सौंप कर अमित निश्चिंत रहता. एक दिन लिली पूना गई, तो 3 दिन  बाद लौटी.

अमित परेशान हो गया. लिली को फोन लगाता, तो स्विच औफ  मिलता.  3 दिनों के बाद लिली लौट आई.

अमित ने शिकायत भरे लहजे में उस से हुई देरी की वजह पूछी, तो वह नाराज हो गई. वह बोली, ‘‘अमित, मैं तुम्हारी बीवी नहीं हूं. हम दोस्त हैं. बेहतर होगा, मेरे बारे में ज्यादा खोजबीन न किया करो.’’

यह सुन कर अमित को बुरा लगा. मगर यह सोच कर चुप रहा कि लिली ने सही कहा कि वे सिर्फ  दोस्त हैं.

अमित के बिगड़े मूड को लिली ने भांप लिया. सो, गलती सुधारने की नीयत से वह अमित के करीब आ कर बैठ गई. उस के बालों पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘डार्लिंग, नाराज मत होना. मां की तबीयत ठीक नहीं थी. उन्होंने रोक लिया, तो रुकना पड़ा.’’

लिली की सफाई पर अमित का मूड बदल गया.

‘‘तुम नहीं जानती कि मैं कितना परेशान था,’’ बच्चे सरीखा बरताव था अमित का. लिली उस की कमजोरी जानती थी.

सुबह दोनों अपनेअपने काम पर निकल गए. शाम को दोनों ने फिर से बाहर खाने की योजना बनाई. रात 10 बजे लौट कर आए. जैसे ही आराम करने के लिए बिस्तर पर गए, तभी लिली के मोबाइल फोन की घंटी बजी. वह बरामदे में आई. वह 15 मिनट बाद वापस आई. आते ही बिस्तर पर पड़ गई.

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