शेष चिह्न: भाग 1 – कैसा था निधि का ससुराल

निधि की शादी तय हो गई थी पर उस को ऐसा लग रहा था मानो मरघट पर जाना है…लाश के साथ नहीं, खुद लाश बन कर. उस का और मेरा परिचय एक प्राइवेट स्कूल में हुआ था जिस में मैं अंगरेजी की अध्यापिका थी और वह साइंस की अध्यापिका हो कर आई थी.

उस का अप्रतिम रूप, कमल पंखड़ी सा गुलाबी रंग, पतला छरहरा बदन, सौम्य नाकनक्श थे पर घर की गरीबी के कारण विवाह न हो पा रहा था.

निधि का छोटा सा कच्चा पुश्तैनी मकान था. परिवार में 4 बहनों पर एकमात्र छोटा भाई अविनाश था. बस, सस्ते कपड़ों को ओढ़तेपहनते, गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह खिंच रही थी.

बड़ी बहन आरती के ग्रेजुएट होते ही एक क्लर्क से बात पक्की कर दी गई तो पिता ने कुछ जी.पी.एफ. से रुपए निकाल कर विवाह की रस्में पूरी कीं. किसी प्रकार आरती घर से विदा हो गई. सब ने चैन की सांस ली. कुछ महीने आराम से निकल गए.

आरती को दान- दहेज के नाम पर साधारण सामान ही दे पाए थे. न टेलीविजन न अन्य सामान, न सोना न चांदी. ससुराल में उस पर जुल्मों के पहाड़ टूटने लगे पर वह सब सहती रही.

फिर एक दिन उस ने अपनी कोख से बेटे के बजाय बेटी जनी तो उस पर जुल्म और बढ़ते ही गए. और एक रात अत्याचारों से घबरा कर वह पड़ोसियों की मदद से रोतीकलपती अपने साथ एक नन्ही सी जान को ले कर पिता की देहरी पर लौट आई. उस का यह हाल देख कर पूरे परिवार की चीत्कार पड़ोस तक जा पहुंची. फिर क्याकुछ नहीं भुगता पूरे घर ने. आरती ने तो कसम खा ली थी कि वह जीवन भर वहां नहीं जाएगी जहां ऐसे नराधम रहते हैं.

इस तरह मय ब्याज के बेटी वापस आ गई. अत्याचारों की गाथा, चोटों के निशान देख कर फिर उसी घर में बहन को भेजने का सब से ज्यादा विरोध निधि ने ही किया. 3-4 वर्ष के भीतर  ही तलाक हो गया तो मातापिता की छाती पर फिर से 4 बेटियों का भार बढ़ गया.

मुसीबत जैसे चारों ओर से काले बादलों की तरह घिर आई थी. उस पर महंगाई की मार ने सब कुछ अस्तव्यस्त कर दिया. जो सब की कमाई के पैसे मिलते वह गरम तवे पर पानी की बूंद से छन्न हो जाते. तीजत्योहार सूखेसूखे बीतते. अच्छा खाना उन्हें तब ही नसीब होता जब पासपड़ोस में शादी- विवाह होते. अच्छे सूटसाड़ी पहनने को उन का मन ललक उठता, पर सब लड़कियां मन मार कर रह जातीं.

निधि तो बेहद क्षुब्ध हो उठती. जहां उस के विवाह की बात होती, उस का रूप देख कर लड़के मुग्ध हो जाते  पर दानदहेज के लोभी उस के गुणशील को अनदेखा कर मुंह मोड़ लेते.

निधि मुझ से कहती, ‘‘सच कहती हूं मीनू, लगता है कहीं से इतना पैसा पा जाऊं कि अपने घर की दशा सुधार दूं. इस के लिए यदि कोई रईस बूढ़ा भी मिलेगा तो मैं शादी के लिए तैयार हो जाऊंगी. बहुत दुख, अभाव झेले हैं मेरे पूरे परिवार ने.’’

‘‘तू पागल हो गई है क्या? अपना पद्मिनी सा रूप देखा है आईने में? मेरे सामने ऐसी बात मत करना वरना दोस्ती छोड़ दूंगी. परिवार के लिए बूढ़े से ब्याह करेगी? क्या तू ने ही पूरे घर का ठेका लिया है? और भी कोई सोचता है ऐसा क्या?’’

मेरी आंखें नम हो गईं तो देखा वह भी अपनी पलकें पोंछ रही थी.

‘‘सच मीनू, तू ने गरीबी की परछाईं नहीं देखी पर हम बचपन से ही इसे भोग रहे हैं. अरे, अपनों के लिए इनसान बड़े से बड़ा त्याग करता है. मैं मर जाऊं तो मेरी आत्मा धन्य हो जाएगी. बीमार अम्मां व बाबूजी कैसे जी पाएंगे अपनी प्यारी बेटियों को दुखी देख कर. पता है, मैं पूरे 28 वर्ष की हो गई हूं, नीतिप्रीति भी विवाह की आयु तक पहुंच गई हैं. मुझे कई लड़के देख चुके हैं. लड़की पसंद, शिक्षा पसंद, नहीं पसंद है तो कम दहेज. यही तो हम सब के साथ होगा. धन के आगे हमारे रूपगुण सब फीके पड़ गए हैं.’’

उस की बातों पर मैं हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘अरे, तू तो किसी घर की राजरानी बनेगी. देख लेना तेरा दूल्हा सिरआंखों पर बैठाएगा तुझे. धनदौलत पर लोटेगी तू्.’’

‘‘रहने दे, ऐसे ऊंचे सपने मत दिखा, जो आगे चल कर मेरी छाती में टीस दें. हां, तुझे अवश्य ऐसा ही वरघर मिलेगा. अकेली बेटी, 2 बड़े भाई, सब ऊंचे पदों पर.’’

‘‘कहां राजा भोज कहां गंगू तेली? बड़े परिवार की समस्या पर ही तो सोचती हूं ऐसा, अपनी कुरबानी देने की.’’

फिर आएदिन मैं यही सुनती थी कि निधि को देखने वाले आए और गए. धन के अभाव में सब मुंह चुरा गए. इतनी तगड़ी मांगें कि घर भर के सिर फिर जाते. यहां तो शादी का खर्च उठाना मुश्किल था. उस पर लाखों की मांग.

एक दिन गरमी की दोपहर में आ कर निधि ने विस्फोट किया, ‘‘मीनू, तुझे याद है एक बार मैं ने तुझ से कहा था कि अगर कोई मालदार धनी बूढ़ा वर ही मिल जाएगा तो मैं उस से शादी करने को तैयार हो जाऊंगी. लगता है वही हो रहा है.’’

मैं ने घबरा कर अपनी छाती थाम ली फिर गुस्से से भर कर बोली, ‘‘तो क्या किसी बूढ़े खूसट का संदेशा आया है और तू तैयार हो गई है?’’ इतना कह कर तब मैं ने उस के दोनों कंधे झकझोर दिए थे.

वह बच्चों सी हंसी हंस दी. फिर पसीना पोंछती हुई बोली, ‘‘तू तो ऐसी घबरा रही है जैसे मेरे बजाय तेरी शादी होने जा रही है. देख, मैं बूढ़े खूसट की फोटो लाई हूं. उस की उम्र 40 के आसपास है और वह दुहेजा है. 4 साल पहले पत्नी मर गई थी.’’

उस ने फोटो मेरे हाथ पर रख दिया. ‘‘अरे वाह, यह तो बूढ़ा नहीं जवान, सुंदर है. तू मजाक कर रही है मुझ से?’’

‘‘नहीं रे, मजाक नहीं कर रही… दुहेजा है.’’

‘‘कहीं दहेज के चक्कर में पहली को मार तो नहीं डाला. क्या चक्कर है?’’ मैं बोली.

‘‘यह मेरी मौसी की ननद का देवर है,’’ निधि ने बताया.

‘‘सेल्स टेक्स कमिश्नर है. तीसरी बार बेटे को जन्म देते समय पत्नी की मौत हो गई थी.’’

‘‘तो क्या 2 संतान और हैं?’’

‘‘हां, 1 बेटी 10 साल की, दूसरी 8 साल की.’’

‘‘तो तुझे सौतेली मां का दर्जा देने आया है?’’

‘‘यह तो है पर पत्नी की मृत्यु के 4 साल बाद बड़ी मुश्किल से दूसरी शादी को तैयार हुआ है. घर पर बूढ़ी मां हैं. एक बड़ी बहन है जो कहीं दूर ब्याही गई है, बढ़ती बच्चियों को कौन संभाले. वह ठहरे नौकरीपेशा वाले. समय खराब है. इस से उन्हें तैयार होना पड़ा.’’

‘‘तो तू जाते ही मां बनने को तैयार हो गई, मदर इंडिया.’’

‘‘हां रे. अम्मांबाबूजी तो तैयार नहीं थे. मौसी प्रस्ताव ले कर आई थीं. मुझ से पूछा तो मैं क्या करती. जन्म भर अम्मांबाबूजी की छाती पर मूंग तो न दलती. दीदी व उन की बेटी बोझ बन कर ही तो रह रही हैं. फिर 2 बहनें और भी शूल सी गड़ती होंगी उन की आंखों में. कब तक बैठाए रहेंगे बेटियों को छाती पर?

‘‘मैं अगर इस रिश्ते को हां कर दूंगी तो सब संभल जाएगा. धन की उन के यहां कमी नहीं है, लखनऊ में अपनी कोठी है. ढेरों आम व कटहल के बगीचे हैं. नौकरचाकर सब हैं.

‘‘मैं सब को ऊपर उठा दूंगी, मीनू,’’ निधि ने जैसे अपने दर्द को पीते हुए कहा, ‘‘मेरे मातापिता की कुछ उम्र बच जाएगी नहीं तो उन के बाद हम सब कहां जाएंगे. बाबूजी 2 वर्ष बाद ही तो रिटायर हो रहे हैं, फिर पेंशन से क्या होगा इतने बड़े परिवार का? बता तो तू?’’

मैं ने निधि को खींच कर छाती से लगा लिया. लगा, एक इतनी खूबसूरत हस्ती जानबूझ कर अपने को परिवार के लिए कुरबान कर रही है. मेरे साथ वह भी फूटफूट कर रो पड़ी.

निधि शाम को आने का मुझ से वचन ले कर वापस लौट गई. फिर शाम को भारी मन लिए मैं उस के घर पहुंची. उस की मौसी आ चुकी थीं और वर के रूप में भूपेंद्र बैठक में आराम कर रहे थे. निधि को अभी देखा नहीं था. मैं मौसी के पास बैठ कर वर के घर की धनदौलत का गुणगान सुनती रही.

‘‘बेटी, तुम निधि की सहेली हो न,’’ मौसी ने पूछा, ‘‘वह खुश तो है इस शादी से, तुम से कुछ बात हुई?’’

‘‘मौसी? यह आप स्वयं निधि से पूछ लो. पास ही तो बैठी है वह.’’

‘‘वह तो कुछ बोलती ही नहीं है, चुप बैठी है.’’

‘‘इसी में उस की भलाई है,’’ मैं जैसे बगावत पर उतर आई थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

प्यार के राही-भाग 1 : हवस भरे रिश्ते

उस दिन गजाला और मासूम राही की शादी बड़ी धूमधाम से हो रही थी. सभी लोग निकाह के वक्त का इंतजार कर रहे थे. मासूम राही दोस्तों के बीच सेहरा बांधे गपें मार रहे थे, तभी मौलवी साहब आए और निकाह की तैयारी होने लगी.

मौलवी साहब बोलते गए और मासूम राही निकाह कबूल करते गए. सारी रस्में खत्म होने के बाद सभी लोग मजे ले कर खाना खाने लगे.

अगली रात गजाला और मासूम राही अपने सुहागरात के कमरे में एकदूसरे के आगोश में खोए हुए थे और गरम तूफान की आग में जल रहे थे. कुछ मिनटों के बाद वह आग ठंडी हुई, तो वे एकदूसरे से अलग हुए.

गजाला की आंखें एकाएक फड़फड़ाने लगीं. वह सोचने लगी, ‘आज अपने प्यार को यह अंजाम देने के लिए हमें क्या नहीं करना पड़ा,’ फिर वह बिस्तर पर बिछे छोटेछोटे फूलों को सरसरी निगाहों से देखने लगी और अपनी प्यारभरी यादों में डूब गई. एकएक सीन उस के दिमाग में किसी फिल्म की तरह घूमने लगा और उस की आंखों में आंसू उमड़ आए.

मैं पटना में रह रही थी. मेरे पिता शौकत राही की 6 संतानें थीं, 4 बहनें और 2 भाई. मैं सब से बड़ी थी. हमारे अब्बा जान के पास काफी जमीनजायदाद थी. इसी वजह से हम सभी सुखचैन से जिंदगी गुजार रहे थे.

हमारे अब्बाजान के बड़े भाई जशीम चाचा के पास भी जमीनजायदाद थी, लेकिन उन्हें दिमागी चैन नहीं था, क्योंकि उन के कोई औलाद नहीं थी, इसलिए जशीम चाचा बारबार चाची डौली को किसी अनाथ बच्चे को गोद लेने के लिए कहा करते थे, लेकिन चाची हर बार टाल जातीं.

जब चाचा ने ज्यादा जिद की, तो चाची बोलीं, ‘‘देखिएजी, आप जिद कर रहे हैं, तो गोद लड़का ही लेंगे.’’

इस पर चाचा कहते, ‘‘नहीं, लड़की ही गोद लेंगे. आज के जमाने में लड़का और लड़की में फर्क ही क्या है?’’

तब चाची झल्ला कर बोलीं, ‘‘मैं समझती हूं कि जो हमारे बुढ़ापे में हमारी लंबीचौड़ी जायदाद को संभाल सके और हम दोनों को भी चैन की दो वक्त की रोटी दे सके, उसे ही गोद लेना चाहिए.’’

चाचा बेहद नरम दिल से बोले, ‘‘तुम्हारी बात तो ठीक है, लेकिन हम ऐसी बेटी गोद लेना चाहते हैं, जो हम दोनों की खिदमत कर सके. हम उस की शादी कर के दूल्हे को घरजमाई बना लेंगे. तब हम दोनों को दोहरा फायदा हो जाएगा. इस तरह हमें बेटाबेटी दोनों मिल जाएंगे.’’

इस पर चाची बोलीं, ‘‘जो करना है सो कीजिए, लेकिन मुझे तो बेटा ही चाहिए.’’

दूसरे दिन चाचा ने अपने नजदीकी दोस्त रमाशंकर को बुलाया और 10,000 रुपए दे कर कहा, ‘‘हम बच्चा गोद लेना चाहते हैं. तुम कोई लड़की ला कर हमें दो. हम तुम्हारे बहुत एहसानमंद रहेंगे. ले आने पर 40,000 रुपए और देंगे.’’

एक हफ्ते बाद रमाशंकर ने तकरीबन 9 साल का एक मासूम सा लड़का ला कर चाचा को देते हुए कहा, ‘‘लीजिए भाई जशीम राही, मैं ने अपना वादा पूरा किया. आप मेरा इनाम हवाले करें.’’

‘‘लेकिन यार, यह तो लड़का है. मैं ने तो किसी लड़की की गोद लेने की बात तुम से कही थी,’’ चाचा ने मजबूरी जाहिर करते हुए कहा.

‘‘यही लो. अब तक तो आप बिना औलाद के जी रहे थे, अब लड़का मिला है तो कह रहे हैं कि लड़की चाहिए. यह बेचारा कुदरत का मारा है. दानेदाने का मुहताज है. घर में इस के रहने से आप का दिल भी लगा रहेगा. इस मासूम को इतनी दूर से आप के पास ले आया हूं.’’

फिर कुछ सोच कर वे आगे बोले, ‘‘इस का नाम राही है. गांव में इस के मांबाप मजदूरी करते थे. इस के 4 भाईबहन हैं. गरीबी के चलते कई बार इस मासूम को भूखे पेट ही सोना पड़ता था. बाप शराबी है. एक दिन वह शराब के पैसे न दे सका तो इस बेचारे को ही शराब की दुकान में गिरवी रख दिया. वहीं से इसे छुड़ा कर लाया हूं.’’

चाचा ने रमाशंकर की मजबूरी समझी. बोले, ‘‘ठीक है, यह लो पैसे. आखिर डौली की ही इच्छा पूरी हुई.’’

मासूम को देख कर चाची बहुत खुश हुईं. उसे गोद में उठा कर वे बेतहाशा चूमने लगीं.

मासूम स्कूल जाने लगा. मैं तब

8 साल की थी. हम दोनों एक ही दर्जे में साथसाथ पढ़ने लगे. हमारे चाचा और हमारे अब्बा के मकान आमनेसामने थे, इसलिए हम दोनों अकसर एकदूसरे से मिलते रहते थे. दोनों साथसाथ खेलते और साथसाथ खाते 10वीं जमात पास कर गए. हम दोनों फुलवारी की तनहाइयों में घंटों बातचीत किया करते थे. बातबात में जब मासूम ने अपनी बीती कहानी मुझे सुनाई तो उस से मेरी हमदर्दी और बढ़ गई. मैं अकसर खानेपीने की चीजें ला कर मासूम को दिया करती. हम दोनों में लगाव बढ़ता गया.

मासूम राही मन लगा कर पढ़ता और चाचा का हाथ बंटाता. उस के बरताव, काम और पढ़ाई से चाचाचाची बहुत खुश थे. वे उसे अपने बेटे की तरह मानते और सारे जहां की खुशियां उस के कदमों में डाल कर उसे प्यार करते.

मासूम राही भी चाचाचाची को अम्मां और अब्बा कह कर पुकारता था. मैं सुबह उठ कर घर के कामों से निबटने के बाद उस के साथ कालेज जाया करती थी. शाम ढलने से पहले हर रोज हम फुलवारी में घूमने जाया करते थे.

वक्त गुजरता गया. हम दोनों ने बचपन की केंचुली उतार कर जवानी की दहलीज पर कदम रखा. दोनों जवां दिलों में एकदूसरे के लिए प्यारमुहब्बत का दरिया बहने लगा.

हम दोनों एकदूसरे के करीब आते गए, लेकिन अब बचपन की तरह खुलेआम नहीं, बल्कि चोरीछिपे एकदूसरे से मिलते रहे. हर प्यार करने वाले की तरह हमारा और मासूम राही का भी चोरीछिपे मिलना ज्यादा दिनों तक समाज से छिपा नहीं रह सका. फौरन ही महल्ले वालों को हमारी मुहब्बत की भनक लग गई. वे दबी जबान से हम दोनों की चर्चा करने लगे.

यह बात चाचा और चाची को पता लगी, तो उन्होंने मासूम को अपने दरबान और नौकरों से बुरी तरह से पिटवाया और बुराभला कहा. इधर मेरी भी हालत बदतर कर दी गई. हमारी अम्मी ने मुझे रस्सी से बांध दिया और डंडे से इतना पीटा कि मेरी पीठ से खून निकलने लगा. कई जख्म भी उभर आए थे.

मैं बेतहाशा चिल्ला रही थी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. वे लगातार मेरे सिर पर वार करने लगीं, जिस से मैं बेहोश हो गई.

जब होश आया, तो मैं अस्पताल में थी. सिर, पीठ, हाथ और पैर में पट्टियां बंधी थीं. अब्बाजान पास ही में कुरसी पर बैठे हुए थे.

जब मैं ने आंखें खोलीं, तो वे बोले, ‘‘बेटी, यह सब छोड़ दो, नहीं तो हम से बुरा कोई नहीं होगा. मासूम से तो मैं निबट लूंगा. जिस के बारे में कुछ भी सहीसही मालूम नहीं है, उस के साथ इश्क लड़ाने चली है. अगर आज के बाद तुम घर से निकली, तो तुम्हें मैं जान से मार डालूंगा.’’

जब मैं एक महीने के बाद ठीक हो कर अस्पताल से घर आई, तो मुझे पंख कटे पक्षी की तरह घर में कैद कर दिया गया. मैं मन मसोस कर रह गई.

उधर मासूम राही हमारी याद में तड़प रहा था. उस पर भी चाचा के गुंडे नजर रखे रहते थे. मासूम से नहीं मिल पाने के चलते मैं बेचैन सी रहने लगी. उन्हीं दिनों पता लगा कि मासूम राही पर भी चाचा और चाची ने इतनी सख्त पाबंदी लगा दी थी कि वह चाह कर भी मुझ से नहीं मिल पा रहा था.

जब मैं खुद को नहीं रोक सकी, तो उस से रात में मिलने का फैसला किया. मैं आधी रात को मासूम से मिलने के लिए दबे पैर चाचा के घर में घुस गई. मासूम चाचा के कमरे में सोया हुआ था.

जैसे ही मैं उस के कमरे से गुजरी, वैसे ही अचानक आहट पा कर चाची उठीं. उन्होंने ‘चोरचोर’ चिल्लाते हुए चाचा को जगाया और तुरंत बंदूक ला कर देते हुए बोलीं, ‘‘गजाला आई है. आज जान से मार दीजिए.’’

चाचा ‘चोरचोर’ चिल्लाते हुए हमारे पीछे भागे. मैं सिर पर पैर रख कर गली की ओर भागी. चाचा ने मुझ पर

3 गोलियां चलाईं. गहरा अंधेरा होने के चलते उन का निशाना ठीक नहीं बैठा. इस गली से होते हुए मैं अपने कमरे में जा कर लेट गई.

आधी रात को गोलियों की आवाज सुन कर महल्ले में अफरातफरी हो गई. मेरे अब्बाजान और महल्ले वाले दौड़दौड़े चाचा के घर पहुंचे और गोली चलाने की वजह पूछी. चाचा गहरे अंधेरे में मुझे ठीक से पहचान नहीं सके थे. फिर भी उन्हें पूरा यकीन था कि वह गजाला ही थी, इसलिए उन्होंने अब्बाजान को अलग ले जा कर कहा, ‘‘भाई, तुम्हारी इज्जत हमारी इज्जत है. गजाला आई थी.’’

अभी चाचा अब्बाजान को समझा ही रहे थे कि चाची सब के सामने बोल पड़ीं. ‘‘शौकत राही, समझा ले अपनी बेटी को. वह जवानी के जोश में आधी रात को मेरे घर में चोरों की तरह घुस आई. आज तो वह बच कर भाग गई, लेकिन आज के बाद अगर उस ने ऐसी हरकत की तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगी.’’

अब्बाजान ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा, ‘‘आप यह कैसे कह सकती हैं कि वह गजाला ही थी? आप ने इतने अंधेरे में उसे पहचान लिया? हमारी बेटी पर इलजाम मत लगाइए. वह कोई चोरउचक्का होगा.’’

इस पर चाची ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘अगर यकीन नहीं आता तो घर जा कर देखो, वह इस समय घर में मौजूद

नहीं होगी. वह कहीं गली में जा कर छिपी होगी.’’

Father’s Day Special- मुट्ठीभर स्वाभिमान: भाग 1

15 वर्ष हो चुके थे उसे विदेश में रहते. इसलिए इन खोखली औपचारिकताओं से उसे सख्त परहेज था. चाचा से मालूम हुआ कि अंतिम संस्कार के लिए रुपयों का प्रबंध करना है, दीनानाथजी की जेब से कुल 270 रुपए मिले हैं और अलमारी में ताला बंद है, जिसे खोलने का हक केवल सुकांत को है.

पड़ोस के घर से चाय बन कर आ गई थी, किंतु सुकांत ने पीने से मना कर दिया. अपने बाबूजी के मृतशरीर के पास खामोश बैठा उन्हें देखता रहा. उन के ढके चेहरे को खोलने का उस में साहस नहीं हो रहा था. जिस जीवंत पुरुष को सदा हंसतेहंसाते ही देखा हो, उस का भावहीन, स्पंदनहीन चेहरा देखने की कल्पना मर्मांतक थी. सुकांत ने अपने बटुए से 200 डौलर निकाल कर चाचा के हाथ में रखते हुए कहा, ‘‘इन्हें आप बैंक से रुपयों में भुना कर अंतिम संस्कार के सामान का इंतजाम कर लीजिए.’’

‘‘तुम नहीं चलोगे सामान लेने?’’

‘‘आप ही ले आइए, चाचा,’’ सिर झुकाए धीमे स्वर में बोला सुकांत.

‘‘ठीक है,’’ कह कर चाचा पड़ोस के व्यक्तियों को साथ ले कर चले गए.

घर में घुसने के बाद से ले कर अब तक पलपल सुकांत को मां का चेहरा हर ओर नजर आ रहा था. अपने बचपन को यहीं छोड़ कर वह जवानी की जिस अंधीदौड़ में शामिल हो विदेश जा बसा था, वह उसे बहुत महंगी पड़ी. लेकिन कभीकभी अपने ही लिए फैसलों को बदलना कितना कठिन हो जाता है.

पास ही बैठी चाची बीचबीच में रो पड़ती थीं. किंतु सुकांत की आंखों में आंसू नहीं थे. वह एक सकते की सी हालत में था. 2 वर्षों पूर्व जब मां का देहांत हुआ था तो वह आ भी न पाया था. अंतिम बार मां का मुख न देख पाने की कसक अभी भी उस के हृदय में बाकी थी. उस समय वह ट्रेनिंग के सिलसिले में जरमनी गया हुआ था. पत्नी भी घूमने के लिए साथ ही चली गई थी. दीनानाथजी फोन पर फोन करते रहे. घंटी बजती रहती पर कौन था जो उठाता. खत और तार भी अनुत्तरित ही रहे.

पत्नी के शव को बर्फ की सिल्लियों पर रखे 2 दिनों तक दीनानाथजी प्रतीक्षा करते रहे कि शायद कहीं से सुकांत का कोई संदेश मिले. फिर निराश, निरुपाय दीनानाथजी ने अकेले ही पत्नी का दाहसंस्कार किया और खामोशी की एक चादर सी ओढ़ ली.

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जरमनी से वापस आ कर जब सुकांत को अपने बाबूजी का पत्र मिला तो वह दुख के आवेग में मानो पागल हो उठा कि यह क्या हो गया, कैसे हो गया. उस के दिमाग की नसें मानो झनझना उठीं. मां के प्रति बेटा होने का अपना फर्ज भी वह पूरा न कर पाया. उस का हताश मन रो उठा. किंतु अब भारत जाने का कोई अर्थ नहीं बनता था. सो, एक मित्र को उस के घर पर फोन कर के सुकांत ने उस से आग्रह किया कि वह वापसी में बाबूजी को अपने साथ ले आए. न चाहते हुए भी दीनानाथजी चले गए.

बेटे का आग्रह ठुकरा न सके. पत्नी के इस आकस्मिक निधन पर अपनेआप को बहुत असहाय सा पा रहे थे. बेटे के पास पहुंच उस की बांहों में मुंह छिपा कर रो लेने का मन था उन का. बेटे के सिवा और कौन बांट सकता था उन के इस दुख को?

चले तो गए, किंतु वहां अधिक दिन रह न सके. बुढ़ापे की कुछ अपनी समस्याएं होती हैं, जिस तरह बच्चों की होती हैं. पहले तो हमेशा पत्नी साथ होती थी, जो उन की हर जरूरत का ध्यान रखती थी. किंतु अब कौन रखता? सुबह 4 बजे जब आंख खुलती और चाय की तलब होती तो चुपचाप मुंह ढांप कर सोए रहते.

पत्नी साथ आती थी तो बिना आहट किए दबे पांव जा कर रसोई से चाय बना कर ले आती थी. किंतु अब जब एक बार उन्होंने खुद सुबह चाय बनाने की कोशिश की थी तो बरतनों की खटपट से बेटाबहू दोनों जाग कर उठ आए थे और दीनानाथजी संकुचित हो कर अपने कमरे में लौट गए थे. फिर दोपहर होते न होते बड़े तरीके से बहू ने उन्हें समझा भी दिया, ‘बाबूजी, मैं उठ कर चाय बना दिया करूंगी.’

और उस के बाद दीनानाथजी ने दोबारा रसोई में पांव नहीं रखा. बहू कितनी भी देर से सो कर क्यों न उठे, वे अपने कमरे में ही चाय का इंतजार करते रहते थे.

सुकांत अपने काम में अत्यधिक व्यस्त रहता था. घर में दीनानाथजी बहू के साथ अकेले ही होते थे. उन की इच्छा होती कि बेटी समान बहू उन के  पास बैठ कर दो बातें करे क्योंकि पत्नी की मृत्यु का घाव अभी हरा था और उसे मरहम चाहिए था, किंतु ऐसा न हो पाता. 2-4 मिनट उन के पास बैठ कर ही बहू किसी न किसी बहाने से उठ जाती और दीनानाथजी अपनेआप को अखबार व किताबों में डुबो लेते. वे परिमार्जित रुचियों के व्यक्ति थे. बेटे ने भी उन से विरासत में शालीन संस्कार ही पाए थे. सो, किताबों से कितनी ही अलमारियां भरी पड़ी थीं.

अपने दफ्तर की ओर से सुकांत को फिर 1 महीने के लिए जरमनी जाना था और सदा की तरह इस बार भी उस की पत्नी शांता साथ जाना चाहती थी. वह सुकांत के बिना 1 महीना रहने को तैयार न थी. रात की निस्तब्धता में दीनानाथजी के कानों में बहू एवं सुकांत के बीच चल रही तकरार के कुछ शब्द पड़े, ‘बाबूजी को इस अवस्था में यहां अकेले छोड़ना उचित है क्या?’ सुकांत का स्वर था.

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बंद कमरे में हुई बाबू दीनानाथ की मृत्यु रिश्तेदारों व महल्ले वालों को आश्चर्य व सदमे की हालत में छोड़ गई थी. स्वभाव से ही हंसमुख व्यक्ति थे दीनानाथ. रोज सुबहसुबह ही घर के सामने से निकलते हर जानपहचान वाले का हालचाल पूछना व एकाध को घर ले आ कर पत्नी को चाय के लिए आवाज देना उन की दिनचर्या में शामिल था. पैसे से संपन्न भी थे. किंतु 2 वर्ष पूर्व पत्नी के निधन के बाद वे एकदम खामोश हो गए थे. महल्ले वाले उन का आदर करते थे. सो, कोई न कोई हालचाल पूछने आताजाता रहता. किंतु सभी महसूस करते थे कि बाबू दीनानाथ ने अपनेआप को मानो अपने अंदर ही कैद कर लिया था. शायद पत्नी की असमय मृत्यु के दुख से सदमे में थे. 70 वर्ष की आयु में अपने जीवनसाथी से बिछुड़ना वेदनामय तो होता ही है, स्मृतियों की आंधी भी मन को मथती रहती है. पीड़ा के दंश सदा चुभते रहते हैं.

जब तक पत्नी जिंदा थी, बेटे के बुलाने पर वे अमेरिका भी जाते थे, किंतु वापस लौटते तो बुझेबुझे से होते थे. जिस मायानगरी की चमकदमक औरों के लिए जादू थी, वह उन्हें कभी रास न आई. वापस अपने देश पहुंच कर ही वे चैन की सांस लेते थे. अपने छोटे से शांत घर में पहुंच कर निश्ंिचत हो जाते. किंतु अब यों उन का आकस्मिक निधन, वह भी इस तरह अकेले बंद कमरे में, सभी अपनेअपने ढंग से सोच रहे थे. सब से अधिक दुखी थे योगेश साहब, जो दीनानाथजी के परममित्र थे.

दीनानाथजी के छोटे भाई ने फोन पर यह दुखद समाचार अपने भतीजे को दिया. फिर मृतशरीर को बर्फ पर रखने की तैयारी शुरू कर दी. वे जानते थे कि उन के भतीजे सुकांत को तुरंत चल पड़ने पर भी आने में 2 दिन लगने ही थे.

हवाईअड्डे पर हाथ में एक छोटी अटैची थामे सुकांत इधरउधर देख रहा था कि शायद उस के घर का कोई लेने आया होगा, लेकिन किसी को न पा कर वह टैक्सी ले कर चल पड़ा. घर के सामने काफी लोग जमा थे. कुछ उसे पहचानते थे, कुछ नहीं. आज 7 वर्षों के बाद वह आया था. अंदर पहुंच कर नम आंखों से उस ने चाचा के पांव छुए.

‘‘बहू और बिटिया को नहीं लाए बेटा?’’ चाचा ने पूछा.

‘‘जी, नहीं. इतनी जल्दी सब का आना कठिन था,’’ सुकांत ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

आंखों से पल्लू लगाए रोने का अभिनय सा करती चाची ने आगे आ कर सुकांत को गले लगाना चाहा, किंतु वह उन के पांव छू कर पीछे हट गया.

यही सच है : आखिर क्या थी वह त्रासदी?

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