प्यार का सफल प्रायश्चित्त – भाग 1

ऐसा क्यों होता है जिसे कई बार देखा हो, देख कर भी न देखा हो. आतेजाते नजर पड़ जाती हो लेकिन उसे ले कर कोई विचार, कोईर् खयाल न उठा हो कभी. ऐसा होता वर्षों बीत चुके हों. फिर किसी एक दिन बिना किसी खास बात या घटना के अचानक से उस का ध्यान आने लगता है. मन सोचने लगता है उस के विषय में. वह पहले जैसी अब भी है, कोई विशेषता नहीं. फिर भी उस के खयाल आते चले जाते हैं और वह अच्छी लगने लगती है अकारण ही, हो सकता है पहले उस के मन में कुछ हो या न भी हो, वहम हो मेरा कोरा. अभी भी उस का मन वैसा ही हो जैसा पहले मेरा था. उस को ले कर सबकुछ कोरा.

लेकिन, मु झे यह क्या होने लगा? क्या सोचने लगा मन उस के बारे में? क्यों उस का चेहरा आंखों के सामने  झूलने लगा हर वक्त? यह क्या होने लगा है उसे ले कर, नींद भी उड़ने लगी है. मैं नाम भी नहीं जानता. जानना चाहा भी नहीं कभी. लेकिन आजकल तो हाल ऐसा हो गया है कि बुद्धि भ्रष्ट सी हो गई है. आवारा मन भटकने लगा है उस के लिए. अब तो प्रकृति से मांगने लगा हूं कि मिल जाए वह तो सब मिल गया मु झे. एक  झलक पाने को मन मचलता रहता है. कहने की हिम्मत नहीं पड़ती.

अब सोचता हूं तो बहुतकुछ असमानताएं नजर आती हैं, उस में और मु झ में. उम्र, जाति, धर्म और भी न जाने क्याक्या? लेकिन ये सब क्यों होने लगा, यह सम झ नहीं पा रहा हूं. खुद में एक लाचारी सी है. मन की निरंतर बढ़ती हुईर् चाहत. क्या करूं अपनी इस बेवकूफी का? अपने पर गुस्सा भी आता है दया भी. जितना सोचता हूं कि न सोचूं, उतना ही सोचता जाता हूं और पता भी नहीं चलता कब रात गुजर गई सोचतेसोचते. क्या इसे प्यार कहेंगे?

कितना अजीब है यह सबकुछ. पता चलने पर क्या सोचेंगे लोग. वैसे पता चलने नहीं दूंगा किसी को मरते दम तक. उस से कहने की तो हिम्मत ही नहीं है. मान लो, कह भी दिया तो क्या होगा? कहीं गलत सम झ बैठी. कहीं हल्ला कर दिया इस बात का, मेरा प्रेम तो छिछोरा बन कर रह जाएगा. अब दिखती है तो देखता हूं मैं और चाहता हूं कि देखे वह मु झे. लेकिन सामने पड़ते ही न जाने कौन सी  िझ झक, कौन सी मर्यादा रोक लेती है? देख नहीं पाता, देखना चाहता हूं जीभर के. वह देखती है लेकिन नजर टकराने जैसा. जैसे आमनेसामने से गुजरते हैं. अजनबी या पहचाने चेहरे. बस, इस से ज्यादा कुछ नहीं. छोटा शहर, छोटा सा महल्ला, क्या करूं?

खत भी कैसे लिखूं कि उसे पता हो कि मैं ने लिखा है, लेकिन पता न चले किसी और को. पता चले और तमाशा खड़ा हो तो कह सकूं कि मैं ने नहीं लिखा. फिर पत्र उसी तक पहुंचे तो भी ठीक, घर में किसी के हाथ लगा तो उस की मुश्किल. शक के दायरे में तो आ ही जाऊंगा मैं. वैसे, यदि उस की हां हो तो फिर कोई डर नहीं मु झे. फिर चाहे जमाने को पता लग जाए. बस, उस के दिल में हो कुछ मेरे लिए.

आजकल तो मोबाइल का जमाना है, लेकिन मोबाइल तो पत्रों से भी ज्यादा विस्फोटक हैं. फिर, मु झे नंबर भी पता नहीं. पता लगाने की कोशिश कर सकता हूं. लेकिन मैं ने उस के हाथ में कभी मोबाइल देखा ही नहीं. कोशिश की तो थी उस का नंबर पता लगाने की. किसी भी नंबर से कर सकता था फोन. लेकिन सफल नहीं हुआ. मान लो, किसी दिन सफल हो भी जाऊं तो क्या होगा? क्या कहेगी, क्या सम झेगी वह? मानेगी या मना कर देगी. मु झे ऐसा करना चाहिए या नहीं. बहुत बड़ा सामाजिक, आर्थिक भेद है. क्या करूं मैं? यह सब हो कैसे गया?

क्या यह प्यार है या कुछ और. या मेरी बढ़ती उम्र की कोई अतृप्त लालसा. यही सोच कर हैरान, परेशान हूं कि ऐसा क्यों हो रहा है मेरे साथ. न मेरे सपनों की राजकुमारी से मेल खाती है वह, न कोई विशेषताएं हैं मु झे खींचने लायक उस में. फिर मैं किस  झं झट में अपनेआप फंसता जा रहा हूं. क्या यह मन का भटकना है, क्या कोई बुरा समय शुरू हो गया है मेरा. क्या सच में प्यार हो गया है मु झे. मैं दिनोंदिन पागल और बेचैन हो रहा हूं उस के लिए, मेरे न चाहने पर भी.

मैं क्या करूं, यह कोई फिल्म या कहानी नहीं है. यह जीवन है. एक मध्यवर्गीय महल्ला है जहां ऐसा सोचना भी ठीक नहीं. फिर इसे परिणित करना बहुत मुश्किल है और मान लो कि ऐसा हो भी जाए जैसा चाहता हूं मैं, तब क्या होगा, लड़की का भविष्य, मेरा वर्तमान, कहां जाएंगे भाग कर?

पुलिस, कोर्टकचहरी, मीडियाबाजी सबकुछ होगा. फिर अपने मातापिता के साथ आतीजाती दिखती लड़की से बात करना भी संभव नहीं है. लेकिन अचानक से यह सब क्यों होने लगा मन में. उस का खयाल, उस का चेहरा घूमता रहता है और दिनरात बेकरारी बढ़ती ही जा रही है निरंतर. यह गलत है, मैं जानता हूं, लेकिन यह बेईमान मन सुने, तब न. अब, बस, घुटते रहना है और किसी एक दिन ऐसी गलती भी होनी है मु झ से. जिस का क्या परिणाम होगा, मु झे पता नहीं या पता है, इसलिए हिम्मत नहीं जुटा पाता. लेकिन मन कर के रहेगा मनमानी और होगा कोई तमाशा.

मैं रोक रहा हूं खुद को लेकिन पता नहीं कब तक? मैं तो यही सोच कर परेशान हूं कि यह सब क्यों हो रहा है मेरे साथ. क्या कहूंगा मैं उस से. मान लो, मौका मिला भी और कहा, ‘तुम से प्यार करता हूं,’ आगे शादी की बात पर क्या कहूंगा? वह नहीं कहेगी तुम तो शादीशुदा हो? 2 बच्चों के बाप? शर्म नहीं आती तुम्हें. बात सही है. मैं हूं शादीशुदा. तो क्या मैं बोर हो चुका हूं अपनी पत्नी से? नहीं, ऐसा नहीं है, मैं चाहता हूं उसे. और बच्चों से कौन बाप बोर होता है? तो क्या मु झे नएपन की तलाश है. क्या मैं ऐयाशी की तरफ बढ़ रहा हूं. नहीं, वह तो कहीं भी कर सकता हूं.

यही लड़की क्यों पसंद और प्रिय है मु झे. क्या कह सकता हूं? क्या करूं मनचले मन ने जीना हराम कर रखा है. क्यों यह लड़की मेरी जिंदगी में घुसती चली जा रही है, मेरे मनमस्तिष्क में समाती ही जा रही है. ऐसा भी नहीं कि मैं छोड़ दूं उस की खातिर अपना परिवार. फिर किस हक से मैं उसे चाहता हूं पाना. सम झ के बाहर है बात. किस अधिकार से कहूं उस से. क्या वह हां कह सकती है. नहीं, बिलकुल नहीं. अगर कह दिया, तो होगा क्या आगे? शादी और प्रेम के भंवर में फंस जाऊंगा मैं. बदनामी, अपमान अलग. यह कैसी मुसीबत मोल ले ली मैं ने. सब इस मन का कियाधरा है. धिक्कार है ऐसे मन में. मैं अपने को विवश और दुविधा में क्यों पा रहा हूं?

क्या करूं, सोचसोच कर परेशान हूं. ठीक तो यही होगा कि मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खुश रहूं. उन्हीं में मन लगाऊं. लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है. अब मेरी हालत ऐसी हो गईर् है कि मैं उस साधारण सी दिखने वाली 25 वर्ष की लड़की को 45 की उम्र में देखे बिना चैन नहीं पा रहा हूं. दिल बच्चों की तरह मचल रहा है. उस के घर से निकलने, छत पर टहलने वापस आने के समय पर मैं ध्यान दे रहा हूं ताकि मैं उसे देख सकूं. देख ही तो सकता हूं और कुछ तो मेरे वश में है नहीं.

मैं घर की छत पर हूं. मेरे घर से लगा हुआ उस का घर है. वह अपनी छत पर है. मैं उस की तरफ देख रहा हूं. बीचबीच में उस की नजर भी मु झ पर पड़ रही है. लेकिन उस की नजर मेरी नजर से जुदा है. उस की नजर पड़ने पर मैं अपनी नजरें हटा नहीं रहा हूं, बल्कि पूरी बेशर्मी से उसे देखे जा रहा हूं. उसे शायद आश्चर्य हो रहा होगा मु झ पर. जिस आदमी ने कभी नहीं देखा उस की तरफ तब भी जब वह अविवाहित था और अब ऐसे देख रहा है.

उस ने नजरें हटा लीं. वह छत से उतर कर नीचे चली गई. थोड़ी देर बाद मैं भी. अब मेरा क्या काम छत पर. उस के कालेज जाने के समय पर मैं भी निकल पड़ता उस के पीछे. वह कालेज चली जाती. मैं सीधा निकल जाता. जब वह कालेज से लौटती तो मैं भी सारे कामधाम छोड़ कर उस के पीछे चल देता. वह अपने घर और मैं मजबूरी में अपने घर. जी तो यही चाहता कि मैं उस के साथ उस के घर चला जाऊं. अपने घर बुलाना, थोड़ा नहीं, बहुत मुश्किल है. काश, शादी के पहले यह सब कोशिश की होती, तो बात बन जाती. इतने पीछेपीछे चलने पर उस का ध्यान मेरी ओर खिंचना स्वाभाविक था. यह कोई एकदो दिन की बात नहीं थी कि वह इसे इत्तफाक मान लेती. अब वह भी मेरी तरफ गौर से देखने लगी. शायद उसे मु झ पर शक हो चला हो तो या उसे महसूस हुआ हो कि मैं उसे चाहने लगा हूं. हो सकता है उसे मु झ में बदनीयती नजर आने लगी हो कह नहीं सकता. मेरी पत्नी को जरूर मेरे इस टाइमबेटाइम घर से आनेजाने पर शक हुआ. तभी तो उस ने टोका. लेकिन मैं ने उसे टाल दिया. छत पर जाता, तो पत्नी भी छत पर आने लगी. मेरे कार्य में व्यवधान पड़ने लगा. लेकिन मैं ऐसा जाहिर कर रहा था मानो मु झे पेट की शिकायत हो, या खुली हवा में सांस लेना, डाक्टर के अनुसार, जरूरी था मेरे लिए.’’

पत्नी ने पूछा भी,‘‘ तुम्हें कुछ हुआ है, कोई बीमारी है, डाक्टर से मिले?’’

मेरा जवाब था, ‘‘हां, खुली हवा में टहलने के लिए, पैदल चलने के लिए कहा डाक्टर ने,’’ अब कैसे बताऊं कि जो दिल में बस चुकी है वह पैदल ही कालेज आतीजाती है. मु झे उम्मीद तब जगी जब वह मेरे घर कुछ काम से आई. आती तो वह पहले भी थी लेकिन उस वक्त मैं ने कभी ध्यान नहीं दिया. पड़ोसी थी, सो, मेरी पत्नी से परिचय था उस का. उस के परिवार का. आनाजाना लगा रहता था. लेकिन अब वह आई तो मु झे लगा कि वह मेरे लिए आई है और आती रहेगी मेरे लिए. वह मु झ से नमस्ते अंकल कहती. पहले कोई फर्क नहीं पड़ता था. लेकिन अब कहती तो दिल पर तीर चलने लगते.

मैं अब पहले से भी ज्यादा सजसंवर कर रहता. एक भी बाल सफेद नहीं दिखने देता था. दाढ़ी रोज बनाता था. अच्छे कपड़े पहनने लगा था. पहनता तो पहले भी था लेकिन अब अपने चेहरे, बाल, कपड़ों का ज्यादा ध्यान रखने लगा था. मेरा इस तरह उस के पीछपीछे आना, उसे एकटक ताकना, शायद उसे आभास हो गया था कि मेरे दिल में उस के लिए कुछ है. कुछ नहीं, बल्कि बहुतकुछ है.

उस में भी मु झे काफी परिवर्तन दिखाई देने लगे थे. उस की वेशभूषा, पहनावा, करीने से संवारे गए बाल. जो पहले कभी नहीं था. वह अब होने लगा था. उस का इतराना, बल खा कर चलना, पीछे मुड़ कर देखना, मुसकराना, नजर मिलते ही गालों पर लाली दौड़ जाना, उस के देखने में मु झे साफ फर्क नजर आने लगा था. यह मेरा भ्रम नहीं था.

उसे आभास हो चुका था कि मैं उस पर दिलोजान से फिदा हूं. लेकिन वह मु झ पर क्यों मेहरबान हो रही थी, मेरी सम झ में नहीं आ रहा था. उम्र का असर था. लग रहा होगा उसे, चाहता है कोई. चाहत कब देखती है उम्रबंधन? ये तो समाज के बनाए रिवाज हैं. जो न मु झे मंजूर हैं और न शायद उसे. आग बराबर लगी हुई थी दोनों तरफ. बहुत दिन इसी सोच में बीत गए कि वह कोई बात करे ताकि आगे की शुरुआत हो सके. लेकिन मैं भूल गया था कि शुरुआत पुरुष को ही करनी होती है.

मु झे उस के हावभाव से सम झ लेना चाहिए था. यदि मैं ने देर की, तो शायद बात हाथ से निकल जाए. वैसे भी, बहुत देर हो चुकी थी. इस से पहले कि और देर हो जाए, मु झे कह देना चाहिए उस से. लेकिन मैं क्या कहूं? कैसे कहूं? मेरे कहने पर यदि उस ने अनुकूल उत्तर न दिया. उलटा कुछ कह दिया, तो फिर कैसे रह पाऊंगा पड़ोसी बन कर? क्या इज्जत रह जाएगी मेरी महल्ले में? लेकिन चाहत है तो कहना होगा. अब बिना कहे काम नहीं चल सकता. मेरी नजर उस से टकराती तो मैं मुसकरा देता. जवाब में वह भी मुसकरा देती. अब बनी बात. लाइन क्लीयर है. अब कह सकता हूं मैं अपने दिल की बात. वह कालेज जा रही थी और मैं उस के पीछे थोड़े अंतर से चल रहा था. उस ने अपनी गति धीमी कर दी. मैं भी अपनी गति से चलता रहा. थोड़ी देर में बगल में था मैं उस की. अब हम साथसाथ चल रहे थे.

जीवनसाथी – भाग 1: उस नौजवान ने कैसे जीता दिल

दीपक को सरकारी अफसर की कुरसी पर देख कर आशा हैरान रह गई. वह जाति से दलित था और उन के यहां काम करने वाली नौकरानी का बेटा. आशा की दादी को दीपक एक आंख नहीं भाता था. उसे देखते ही उन का धर्म भ्रष्ट हो जाता था.

आज दीपक ने आशा से ऐसी बात कह दी कि…  उन दिनों मैं नौकरी के लिए दौड़धूप कर रही थी. इसी सिलसिले में कचहरी में मुझे एक अफसर से मिलना था. मैं जब उन के कमरे में गई तो सामने कुरसी पर एक गोरेचिट्टे, हैंडसम आदमी को बैठे हुए पाया. मैं ने उन्हें नमस्कार किया और अपने कागज उन की मेज पर रख दिए.

मैंने देखा, उन की नजर मुझ पर ही टिकी थी, जैसे मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हों. गौर से देखने पर खुद मुझे भी उन का चेहरा कुछ जानापहचाना सा लगा, जैसे हम बहुत समय तक एकसाथ रहे हों, परंतु मुझे कुछ भी याद नहीं आ  रहा था. ‘‘आप… आप आशाजी हैं न?’’ उन्होंने हैरानी और खुशी भरी आवाज  में पूछा. ‘‘हां,’’ मुझे अब कुछकुछ याद आने लगा था, ‘‘और… तुम शायद दीपक हो,’’ मेरे मुंह से अचानक निकल गया था.

मैं हैरानी से उसे देख रही थी. गुजरे वक्त की कई बातें मुझे याद आने  लगी थीं. तभी दीपक किसी से मिलने बाहर चला गया और मैं सोच में डूब गई. दीपक हमारी नौकरानी का लड़का था, जो कई सालों तक हमारे साथ रहा था. मैं अपने दिमाग पर जोर दे कर याद करने लगी.

उस दिन दीपक पहली बार हमारे घर आया था. सर्दियों के दिन थे. उस दिन दोपहर को मैं, मेरा भाई मनोज, मां और दादीजी बाहर बैठे धूप का मजा ले रहे थे, तभी एक अधेड़ औरत अपने 7-8 साल के लड़के के साथ हमारे घर आई. उस ने हाथ जोड़ते हुए मां से कहा, ‘‘मुझे साहब ने भेजा है.’’ ‘‘किसलिए…?’’ मां के साथ हम सब की सवालिया नजरें उस की ओर उठ गई थीं. ‘‘बीबीजी, मुझे अपने घर में नौकरानी रख लो. मैं बहुत गरीब हूं,’’ उस ने गुजारिश की. सचमुच हमें एक नौकरानी की जरूरत थी, इसलिए पिताजी ने उसे घर भेजा था.

सांवले से रंग की वह औरत ईमानदार और मेहनती लग रही थी. मां और दादीजी ने उस का अच्छी तरह जायजा लिया.  फिर दादीजी ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘पार्वती,’’ उस ने जवाब दिया. ‘‘जात क्या है?’’ ‘‘दलित.’’ यह सुन कर दादीजी ने नाकभौं सिकोड़ ली थी और मां से कहने लगी थीं, ‘‘इनकार कर दे बहू… और बहुत मिल जाएंगी…’’ यह सुनते ही पार्वती मां के चरणों में गिर कर गिड़गिड़ाने लगी थी, ‘‘बीबीजी, मुझ पर दया करो. मैं कहां दरदर ठोकरें खाती फिरूंगी.

जब से दीपक के बापू इस दुनिया से गए हैं, तब से ये बुरे दिन देखने पड़ रहे हैं.  ‘‘मैं आप के घर में पूरी मेहनत से काम करूंगी और कभी भी आप को शिकायत का मौका नहीं दूंगी. मेरे इस बच्चे पर तरस खाओ, हम भूखे मर जाएंगे…’’ मां को पार्वती पर दया आ गई थी.

उसे घर में नौकरानी रख लिया गया  और रहने के लिए पीछे वाला कमरा दे दिया गया. उसी दिन से पार्वती ने घर का काम अपने हाथों में संभाल लिया था. परंतु दादीजी जातपांत के मामलों में बहुत सख्त थीं और उसी तरह की सीख दे कर उन्होंने मां को भी अपने जैसा बना लिया था, इसलिए पार्वती सिर्फ निचली मंजिल पर ही काम करती थी.

दादीजी ऊपर की दोनों मंजिल पर उसे फटकने तक नहीं देती थीं. अगर कभी गलती से वहां उस का पैर पड़ जाता तो फर्श को दोबारा पानी से साफ करतीं और कमरे में इत्र वगैरह छिड़कतीं. पार्वती से शरीर छू जाने पर दादीजी दोबारा नहातीं. जब पार्वती जूठे बरतन धो कर रखती तो उन्हें दोबारा साफ पानी से धो कर रसोई में रखतीं.

दादीजी ने मुझे और मनोज को भी अपने सख्त कायदेकानूनों की कैद में जकड़ रखा था. दीपक को तो हमारे घर के भीतर आने की सख्त मनाही थी, परंतु हमें भी उन के कमरे की ओर नहीं जाने दिया जाता था, इसलिए दीपक वहां अकेला, गुमसुम सा बैठा रहता और बेचारगी से हमारी ओर ताकता रहता. हम भी उसे नफरत भरी नजरों से देखते.

3-4 दिन के बाद मनोज ने मुझे बताया था, ‘‘आशा, यह पढ़ता भी है…’’ ‘‘किस क्लास में?’’ मैं ने पूछा. ‘‘दूसरी में… इस की मां आज इसे हमारे स्कूल में दाखिल करा आई है…’’ मैं हैरान रह गई थी. मैं भी दूसरी क्लास में ही पढ़ती थी. दीपक मुझ से तकरीबन एक साल बड़ा था. अब मनोज मुझे बारबार चिढ़ाता और छेड़ता रहता, ‘‘आशा, अब मेरे साथ स्कूल न जाया करो. वह तेरे साथ पढ़ता है, उसी के साथ चली जाया करो. मैं अपने दोस्तों के संग जाया करूंगा.’’

जब मैं कभीकभी उस की इस बात पर रोने लग जाती तो वह कहता, ‘‘अरी आशा, मेरी प्यारी बहन, मैं तो मजाक कर रहा था.’’ दीपक गोलमटोल चेहरे वाला खूबसूरत लड़का था. अगर उसे मनोज की तरह अच्छे कपड़े पहनने को मिलते तो लोग उसे नौकरानी का नहीं, किसी बड़े अफसर का लड़का समझते. पढ़ने में भी वह बहुत अच्छा था, क्लास में सब से पहले सवाल हल कर के मास्टरजी को दिखाता था. हम दीपक से दोस्ती करना चाहते थे, परंतु कोई तरीका नहीं सूझ रहा था.

एक दिन जब मैं और मनोज आंगन में गेंद खेल रहे थे तो मैं ने जानबूझ कर गेंद को दीपक के कमरे की ओर उछाल दिया. दीपक ने कमरे के अंदर से गेंद को ला कर मुझे लौटा दिया. मैं ने मुसकरा कर उस का शुक्रिया अदा किया. उस के बाद यह रोज का ही काम हो गया.

हम आंगन में जब गेंद खेलते, तो उसे उठा कर दीपक के कमरे की ओर फेंक देते और छिपछिप कर उस के कमरे के भीतर देखने की कोशिश करते. कुछ दिनों के बाद दीपक भी हमारा साथी बन गया. स्कूल में भी हम इकट्ठे ही रहते थे.

Father’s Day Special: जिंदगी जीने का हक- भाग 1

प्रणव तो प्रिया को पसंद था ही लेकिन उस से भी ज्यादा उसे अपनी ससुराल पसंद आई थी. हालांकि संयुक्त परिवार था पर परिवार के नाम पर एक विधुर ससुर और 2 हमउम्र जेठानियां थीं. बड़ी जेठानी जूही तो उस की ममेरी बहन थी और उसी की शादी में प्रणव के साथ उस की नोकझोक हुई थी. प्रणव ने चलते हुए कहा था, ‘‘2-3 साल सब्र से इंतजार करना.’’

‘‘किस का? आप का?’’

‘‘जी नहीं, जूही भाभी का. घर की बड़ी तो वही हैं, सो वही शादी का प्रस्ताव ले कर आएंगी,’’ प्रणव मुसकराया, ‘‘अगर उन्होंने ठीक समझा तो.’’

‘‘यह बात तो है,’’ प्रिया ने गंभीरता से कहा, ‘‘जूही दीदी, मुझे बहुत प्यार करती हैं और मेरे लिए तो सबकुछ ही ठीक चाहेंगी.’’

प्रणव ने कहना तो चाहा कि प्यार तो वह अब हम से भी बहुत करेंगी और हमारे लिए किसे ठीक समझती हैं यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन चुप रहा. क्या मालूम बचपन से बगैर औरत के घर में रहने की आदत है, भाभी के साथ तालमेल बैठेगा भी या नहीं.

अभिनव के लिए लड़की देखने से पहले ही केशव ने कहा था, ‘‘इतने बरस तक यह मकान एक रैन बसेरा था लेकिन अभिनव की शादी के बाद यह घर बनेगा और इस में हम सब को सलीके से रहना होगा, ढंग के कपड़े पहन कर. मैं भी लुंगीबनियान में नहीं घूमूंगा और अभिनव, प्रभव, प्रणव, तुम सब भी चड्डी के बजाय स्लीपिंग सूट या कुरतेपाजामे खरीदो.’’

‘‘जी, पापा,’’ सब ने कह तो दिया था लेकिन मन ही मन डर भी रहे थे कि पापा का एक भरेपूरे घर का सपना वह पूरा कर सकेंगे कि नहीं.

केशव मात्र 30 वर्ष के थे जब उन की पत्नी क्रमश: 6 से 2 वर्ष की आयु के 3 बेटों को छोड़ कर चल बसी थी. सब के बहुत कहने के बावजूद उन्होंने दूसरी शादी के लिए दृढ़ता से मना कर दिया था.

वह चार्टर्ड अकाउंटेंट थे. उन्होंने घर में ही आफिस खोल लिया ताकि हरदम बच्चों के साथ रहें और नौकरों पर नजर रख सकें. बच्चों को कभी उन्होंने अकेलापन महसूस नहीं होने दिया. आवश्यक काम वह उन के सोने के बाद देर रात को निबटाया करते थे. उन की मेहनत और तपस्या रंग लाई. बच्चे भी बड़े सुशील और मेधावी निकले और उन की प्रैक्टिस भी बढ़ती रही. सब से अच्छा यह हुआ कि तीनों बच्चों ने पापा की तरह सीए बनने का फैसला किया. अभिनव के फाइनल परीक्षा पास करते ही केशव ने ‘केशव नारायण एंड संस’ के नाम से शहर के व्यावसायिक क्षेत्र में आफिस खोल लिया. अभिनव के लिए रिश्ते आने लगे थे. केशव की एक ही शर्त थी कि उन्हें नौकरीपेशा नहीं पढ़ीलिखी मगर घर संभालने वाली बहू चाहिए और वह भी संयुक्त परिवार की लड़की, जिसे देवरों और ससुर से घबराहट न हो.

जूही के आते ही मानो घर में बहार आ गई. सभी बहुत खुश और संतुष्ट नजर आते थे लेकिन केशव अब प्रभव की शादी के लिए बहुत जल्दी मचा रहे थे. प्रभव ने कहा भी कि उसे इत्मीनान से परीक्षा दे लेने दें और वैसे भी जल्दी क्या है, घर में भाभी तो आ ही गई हैं.

‘‘तभी तो जल्दी है, जूही सारा दिन घर में अकेली रहती है. लड़की हमें तलाश करनी है और तैयारी भी हमें ही करनी है. तुम इत्मीनान से अपनी परीक्षा की तैयारी करते रहो. शादी परीक्षा के बाद करेंगे. पास तो तुम हो ही जाओगे.’’

अपने पास होने में तो प्रभव को कोई शक था ही नहीं सो वह बगैर हीलहुज्जत किए सपना से शादी के लिए तैयार हो गया. लेकिन हनीमून से लौटते ही यह सुन कर वह सकते में आ गया कि पापा प्रणव की शादी की बात कर रहे हैं.

‘‘अभी इसे फाइनल की पढ़ाई इत्मीनान से करने दीजिए, पापा. शादीब्याह की चर्चा से इस का ध्यान मत बटाइए,’’ प्रभव ने कहा, ‘‘भाभी की कंपनी के लिए सपना आ ही गई है तो इस की शादी की क्या जल्दी है?’’

‘‘यही तो जल्दी है कि अब इस की कोई कंपनी नहीं रही घर में,’’ केशव ने कहा.

‘‘क्या बात कर रहे हैं पापा?’’ प्रभव हंसा, ‘‘जब देखिए तब मैरी के लिटिल लैंब की तरह भाभी से चिपका रहता है और अब तो सपना भी आ गई है बैंड वैगन में शामिल होने को.’’

सपना हंसने लगी.

‘‘लेकिन देवरजी, भाभी के पीछे क्यों लगे रहते हैं यह तो पूछिए उन से.’’

‘‘जूही मुझे बता चुकी है सपना, प्रणव को इस की ममेरी बहन प्रिया पसंद है, सो मैं ने इस से कह दिया है कि अपने ननिहाल जा कर बात करे,’’ कह कर केशव चले गए.

‘‘जब बापबेटा राजी तो तुम क्या करोगे प्रभव पाजी?’’ अभिनव हंसा, ‘‘काम तो इस ने पापा के साथ ही करना है. पहली बार में पास न भी हुआ तो चलेगा लेकिन जूही, तुम्हारे मामाजी तैयार हो जाएंगे अधकचरी पढ़ाई वाले लड़के को लड़की देने को?’’

‘‘आप ने स्वयं तो कहा है कि देवरजी को काम तो पापा के साथ ही करना है सो यही बात मामाजी को समझा देंगे. प्रिया का दिल पढ़ाई में तो लगता नहीं है सो करनी तो उस की शादी ही है इसलिए जितनी जल्दी हो जाए उतना ही अच्छा है मामाजी के लिए.’’

जल्दी ही प्रिया और प्रणव की शादी भी हो गई. कुछ लोगों ने कहा कि केशव जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए और कुछ लोगों की यह शंका जाहिर करने पर कि बच्चों के तो अपनेअपने घरसंसार बस गए, केशव के लिए अब किस के पास समय होगा और वह अकेले पड़ जाएंगे, अभिनव बोला, ‘‘ऐसा हम कभी होने नहीं देंगे और होने का सवाल भी नहीं उठता क्योंकि रोज सुबह नाश्ता कर के सब इकट्ठे ही आफिस के लिए निकलते हैं और रात को इकट्ठे आ कर खाना खाते हैं, उस के बाद पापा तो टहलने जाते हैं और हम लोग टीवी देखते हैं, कभीकभी पापा भी हमारे साथ बैठ जाते हैं. रविवार को सब देर से सो कर उठते हैं, इकट्ठे नाश्ता करते हैं…’’

शेष चिह्न: भाग 1 – कैसा था निधि का ससुराल

निधि की शादी तय हो गई थी पर उस को ऐसा लग रहा था मानो मरघट पर जाना है…लाश के साथ नहीं, खुद लाश बन कर. उस का और मेरा परिचय एक प्राइवेट स्कूल में हुआ था जिस में मैं अंगरेजी की अध्यापिका थी और वह साइंस की अध्यापिका हो कर आई थी.

उस का अप्रतिम रूप, कमल पंखड़ी सा गुलाबी रंग, पतला छरहरा बदन, सौम्य नाकनक्श थे पर घर की गरीबी के कारण विवाह न हो पा रहा था.

निधि का छोटा सा कच्चा पुश्तैनी मकान था. परिवार में 4 बहनों पर एकमात्र छोटा भाई अविनाश था. बस, सस्ते कपड़ों को ओढ़तेपहनते, गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह खिंच रही थी.

बड़ी बहन आरती के ग्रेजुएट होते ही एक क्लर्क से बात पक्की कर दी गई तो पिता ने कुछ जी.पी.एफ. से रुपए निकाल कर विवाह की रस्में पूरी कीं. किसी प्रकार आरती घर से विदा हो गई. सब ने चैन की सांस ली. कुछ महीने आराम से निकल गए.

आरती को दान- दहेज के नाम पर साधारण सामान ही दे पाए थे. न टेलीविजन न अन्य सामान, न सोना न चांदी. ससुराल में उस पर जुल्मों के पहाड़ टूटने लगे पर वह सब सहती रही.

फिर एक दिन उस ने अपनी कोख से बेटे के बजाय बेटी जनी तो उस पर जुल्म और बढ़ते ही गए. और एक रात अत्याचारों से घबरा कर वह पड़ोसियों की मदद से रोतीकलपती अपने साथ एक नन्ही सी जान को ले कर पिता की देहरी पर लौट आई. उस का यह हाल देख कर पूरे परिवार की चीत्कार पड़ोस तक जा पहुंची. फिर क्याकुछ नहीं भुगता पूरे घर ने. आरती ने तो कसम खा ली थी कि वह जीवन भर वहां नहीं जाएगी जहां ऐसे नराधम रहते हैं.

इस तरह मय ब्याज के बेटी वापस आ गई. अत्याचारों की गाथा, चोटों के निशान देख कर फिर उसी घर में बहन को भेजने का सब से ज्यादा विरोध निधि ने ही किया. 3-4 वर्ष के भीतर  ही तलाक हो गया तो मातापिता की छाती पर फिर से 4 बेटियों का भार बढ़ गया.

मुसीबत जैसे चारों ओर से काले बादलों की तरह घिर आई थी. उस पर महंगाई की मार ने सब कुछ अस्तव्यस्त कर दिया. जो सब की कमाई के पैसे मिलते वह गरम तवे पर पानी की बूंद से छन्न हो जाते. तीजत्योहार सूखेसूखे बीतते. अच्छा खाना उन्हें तब ही नसीब होता जब पासपड़ोस में शादी- विवाह होते. अच्छे सूटसाड़ी पहनने को उन का मन ललक उठता, पर सब लड़कियां मन मार कर रह जातीं.

निधि तो बेहद क्षुब्ध हो उठती. जहां उस के विवाह की बात होती, उस का रूप देख कर लड़के मुग्ध हो जाते  पर दानदहेज के लोभी उस के गुणशील को अनदेखा कर मुंह मोड़ लेते.

निधि मुझ से कहती, ‘‘सच कहती हूं मीनू, लगता है कहीं से इतना पैसा पा जाऊं कि अपने घर की दशा सुधार दूं. इस के लिए यदि कोई रईस बूढ़ा भी मिलेगा तो मैं शादी के लिए तैयार हो जाऊंगी. बहुत दुख, अभाव झेले हैं मेरे पूरे परिवार ने.’’

‘‘तू पागल हो गई है क्या? अपना पद्मिनी सा रूप देखा है आईने में? मेरे सामने ऐसी बात मत करना वरना दोस्ती छोड़ दूंगी. परिवार के लिए बूढ़े से ब्याह करेगी? क्या तू ने ही पूरे घर का ठेका लिया है? और भी कोई सोचता है ऐसा क्या?’’

मेरी आंखें नम हो गईं तो देखा वह भी अपनी पलकें पोंछ रही थी.

‘‘सच मीनू, तू ने गरीबी की परछाईं नहीं देखी पर हम बचपन से ही इसे भोग रहे हैं. अरे, अपनों के लिए इनसान बड़े से बड़ा त्याग करता है. मैं मर जाऊं तो मेरी आत्मा धन्य हो जाएगी. बीमार अम्मां व बाबूजी कैसे जी पाएंगे अपनी प्यारी बेटियों को दुखी देख कर. पता है, मैं पूरे 28 वर्ष की हो गई हूं, नीतिप्रीति भी विवाह की आयु तक पहुंच गई हैं. मुझे कई लड़के देख चुके हैं. लड़की पसंद, शिक्षा पसंद, नहीं पसंद है तो कम दहेज. यही तो हम सब के साथ होगा. धन के आगे हमारे रूपगुण सब फीके पड़ गए हैं.’’

उस की बातों पर मैं हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘अरे, तू तो किसी घर की राजरानी बनेगी. देख लेना तेरा दूल्हा सिरआंखों पर बैठाएगा तुझे. धनदौलत पर लोटेगी तू्.’’

‘‘रहने दे, ऐसे ऊंचे सपने मत दिखा, जो आगे चल कर मेरी छाती में टीस दें. हां, तुझे अवश्य ऐसा ही वरघर मिलेगा. अकेली बेटी, 2 बड़े भाई, सब ऊंचे पदों पर.’’

‘‘कहां राजा भोज कहां गंगू तेली? बड़े परिवार की समस्या पर ही तो सोचती हूं ऐसा, अपनी कुरबानी देने की.’’

फिर आएदिन मैं यही सुनती थी कि निधि को देखने वाले आए और गए. धन के अभाव में सब मुंह चुरा गए. इतनी तगड़ी मांगें कि घर भर के सिर फिर जाते. यहां तो शादी का खर्च उठाना मुश्किल था. उस पर लाखों की मांग.

एक दिन गरमी की दोपहर में आ कर निधि ने विस्फोट किया, ‘‘मीनू, तुझे याद है एक बार मैं ने तुझ से कहा था कि अगर कोई मालदार धनी बूढ़ा वर ही मिल जाएगा तो मैं उस से शादी करने को तैयार हो जाऊंगी. लगता है वही हो रहा है.’’

मैं ने घबरा कर अपनी छाती थाम ली फिर गुस्से से भर कर बोली, ‘‘तो क्या किसी बूढ़े खूसट का संदेशा आया है और तू तैयार हो गई है?’’ इतना कह कर तब मैं ने उस के दोनों कंधे झकझोर दिए थे.

वह बच्चों सी हंसी हंस दी. फिर पसीना पोंछती हुई बोली, ‘‘तू तो ऐसी घबरा रही है जैसे मेरे बजाय तेरी शादी होने जा रही है. देख, मैं बूढ़े खूसट की फोटो लाई हूं. उस की उम्र 40 के आसपास है और वह दुहेजा है. 4 साल पहले पत्नी मर गई थी.’’

उस ने फोटो मेरे हाथ पर रख दिया. ‘‘अरे वाह, यह तो बूढ़ा नहीं जवान, सुंदर है. तू मजाक कर रही है मुझ से?’’

‘‘नहीं रे, मजाक नहीं कर रही… दुहेजा है.’’

‘‘कहीं दहेज के चक्कर में पहली को मार तो नहीं डाला. क्या चक्कर है?’’ मैं बोली.

‘‘यह मेरी मौसी की ननद का देवर है,’’ निधि ने बताया.

‘‘सेल्स टेक्स कमिश्नर है. तीसरी बार बेटे को जन्म देते समय पत्नी की मौत हो गई थी.’’

‘‘तो क्या 2 संतान और हैं?’’

‘‘हां, 1 बेटी 10 साल की, दूसरी 8 साल की.’’

‘‘तो तुझे सौतेली मां का दर्जा देने आया है?’’

‘‘यह तो है पर पत्नी की मृत्यु के 4 साल बाद बड़ी मुश्किल से दूसरी शादी को तैयार हुआ है. घर पर बूढ़ी मां हैं. एक बड़ी बहन है जो कहीं दूर ब्याही गई है, बढ़ती बच्चियों को कौन संभाले. वह ठहरे नौकरीपेशा वाले. समय खराब है. इस से उन्हें तैयार होना पड़ा.’’

‘‘तो तू जाते ही मां बनने को तैयार हो गई, मदर इंडिया.’’

‘‘हां रे. अम्मांबाबूजी तो तैयार नहीं थे. मौसी प्रस्ताव ले कर आई थीं. मुझ से पूछा तो मैं क्या करती. जन्म भर अम्मांबाबूजी की छाती पर मूंग तो न दलती. दीदी व उन की बेटी बोझ बन कर ही तो रह रही हैं. फिर 2 बहनें और भी शूल सी गड़ती होंगी उन की आंखों में. कब तक बैठाए रहेंगे बेटियों को छाती पर?

‘‘मैं अगर इस रिश्ते को हां कर दूंगी तो सब संभल जाएगा. धन की उन के यहां कमी नहीं है, लखनऊ में अपनी कोठी है. ढेरों आम व कटहल के बगीचे हैं. नौकरचाकर सब हैं.

‘‘मैं सब को ऊपर उठा दूंगी, मीनू,’’ निधि ने जैसे अपने दर्द को पीते हुए कहा, ‘‘मेरे मातापिता की कुछ उम्र बच जाएगी नहीं तो उन के बाद हम सब कहां जाएंगे. बाबूजी 2 वर्ष बाद ही तो रिटायर हो रहे हैं, फिर पेंशन से क्या होगा इतने बड़े परिवार का? बता तो तू?’’

मैं ने निधि को खींच कर छाती से लगा लिया. लगा, एक इतनी खूबसूरत हस्ती जानबूझ कर अपने को परिवार के लिए कुरबान कर रही है. मेरे साथ वह भी फूटफूट कर रो पड़ी.

निधि शाम को आने का मुझ से वचन ले कर वापस लौट गई. फिर शाम को भारी मन लिए मैं उस के घर पहुंची. उस की मौसी आ चुकी थीं और वर के रूप में भूपेंद्र बैठक में आराम कर रहे थे. निधि को अभी देखा नहीं था. मैं मौसी के पास बैठ कर वर के घर की धनदौलत का गुणगान सुनती रही.

‘‘बेटी, तुम निधि की सहेली हो न,’’ मौसी ने पूछा, ‘‘वह खुश तो है इस शादी से, तुम से कुछ बात हुई?’’

‘‘मौसी? यह आप स्वयं निधि से पूछ लो. पास ही तो बैठी है वह.’’

‘‘वह तो कुछ बोलती ही नहीं है, चुप बैठी है.’’

‘‘इसी में उस की भलाई है,’’ मैं जैसे बगावत पर उतर आई थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

प्यार के राही-भाग 1 : हवस भरे रिश्ते

उस दिन गजाला और मासूम राही की शादी बड़ी धूमधाम से हो रही थी. सभी लोग निकाह के वक्त का इंतजार कर रहे थे. मासूम राही दोस्तों के बीच सेहरा बांधे गपें मार रहे थे, तभी मौलवी साहब आए और निकाह की तैयारी होने लगी.

मौलवी साहब बोलते गए और मासूम राही निकाह कबूल करते गए. सारी रस्में खत्म होने के बाद सभी लोग मजे ले कर खाना खाने लगे.

अगली रात गजाला और मासूम राही अपने सुहागरात के कमरे में एकदूसरे के आगोश में खोए हुए थे और गरम तूफान की आग में जल रहे थे. कुछ मिनटों के बाद वह आग ठंडी हुई, तो वे एकदूसरे से अलग हुए.

गजाला की आंखें एकाएक फड़फड़ाने लगीं. वह सोचने लगी, ‘आज अपने प्यार को यह अंजाम देने के लिए हमें क्या नहीं करना पड़ा,’ फिर वह बिस्तर पर बिछे छोटेछोटे फूलों को सरसरी निगाहों से देखने लगी और अपनी प्यारभरी यादों में डूब गई. एकएक सीन उस के दिमाग में किसी फिल्म की तरह घूमने लगा और उस की आंखों में आंसू उमड़ आए.

मैं पटना में रह रही थी. मेरे पिता शौकत राही की 6 संतानें थीं, 4 बहनें और 2 भाई. मैं सब से बड़ी थी. हमारे अब्बा जान के पास काफी जमीनजायदाद थी. इसी वजह से हम सभी सुखचैन से जिंदगी गुजार रहे थे.

हमारे अब्बाजान के बड़े भाई जशीम चाचा के पास भी जमीनजायदाद थी, लेकिन उन्हें दिमागी चैन नहीं था, क्योंकि उन के कोई औलाद नहीं थी, इसलिए जशीम चाचा बारबार चाची डौली को किसी अनाथ बच्चे को गोद लेने के लिए कहा करते थे, लेकिन चाची हर बार टाल जातीं.

जब चाचा ने ज्यादा जिद की, तो चाची बोलीं, ‘‘देखिएजी, आप जिद कर रहे हैं, तो गोद लड़का ही लेंगे.’’

इस पर चाचा कहते, ‘‘नहीं, लड़की ही गोद लेंगे. आज के जमाने में लड़का और लड़की में फर्क ही क्या है?’’

तब चाची झल्ला कर बोलीं, ‘‘मैं समझती हूं कि जो हमारे बुढ़ापे में हमारी लंबीचौड़ी जायदाद को संभाल सके और हम दोनों को भी चैन की दो वक्त की रोटी दे सके, उसे ही गोद लेना चाहिए.’’

चाचा बेहद नरम दिल से बोले, ‘‘तुम्हारी बात तो ठीक है, लेकिन हम ऐसी बेटी गोद लेना चाहते हैं, जो हम दोनों की खिदमत कर सके. हम उस की शादी कर के दूल्हे को घरजमाई बना लेंगे. तब हम दोनों को दोहरा फायदा हो जाएगा. इस तरह हमें बेटाबेटी दोनों मिल जाएंगे.’’

इस पर चाची बोलीं, ‘‘जो करना है सो कीजिए, लेकिन मुझे तो बेटा ही चाहिए.’’

दूसरे दिन चाचा ने अपने नजदीकी दोस्त रमाशंकर को बुलाया और 10,000 रुपए दे कर कहा, ‘‘हम बच्चा गोद लेना चाहते हैं. तुम कोई लड़की ला कर हमें दो. हम तुम्हारे बहुत एहसानमंद रहेंगे. ले आने पर 40,000 रुपए और देंगे.’’

एक हफ्ते बाद रमाशंकर ने तकरीबन 9 साल का एक मासूम सा लड़का ला कर चाचा को देते हुए कहा, ‘‘लीजिए भाई जशीम राही, मैं ने अपना वादा पूरा किया. आप मेरा इनाम हवाले करें.’’

‘‘लेकिन यार, यह तो लड़का है. मैं ने तो किसी लड़की की गोद लेने की बात तुम से कही थी,’’ चाचा ने मजबूरी जाहिर करते हुए कहा.

‘‘यही लो. अब तक तो आप बिना औलाद के जी रहे थे, अब लड़का मिला है तो कह रहे हैं कि लड़की चाहिए. यह बेचारा कुदरत का मारा है. दानेदाने का मुहताज है. घर में इस के रहने से आप का दिल भी लगा रहेगा. इस मासूम को इतनी दूर से आप के पास ले आया हूं.’’

फिर कुछ सोच कर वे आगे बोले, ‘‘इस का नाम राही है. गांव में इस के मांबाप मजदूरी करते थे. इस के 4 भाईबहन हैं. गरीबी के चलते कई बार इस मासूम को भूखे पेट ही सोना पड़ता था. बाप शराबी है. एक दिन वह शराब के पैसे न दे सका तो इस बेचारे को ही शराब की दुकान में गिरवी रख दिया. वहीं से इसे छुड़ा कर लाया हूं.’’

चाचा ने रमाशंकर की मजबूरी समझी. बोले, ‘‘ठीक है, यह लो पैसे. आखिर डौली की ही इच्छा पूरी हुई.’’

मासूम को देख कर चाची बहुत खुश हुईं. उसे गोद में उठा कर वे बेतहाशा चूमने लगीं.

मासूम स्कूल जाने लगा. मैं तब

8 साल की थी. हम दोनों एक ही दर्जे में साथसाथ पढ़ने लगे. हमारे चाचा और हमारे अब्बा के मकान आमनेसामने थे, इसलिए हम दोनों अकसर एकदूसरे से मिलते रहते थे. दोनों साथसाथ खेलते और साथसाथ खाते 10वीं जमात पास कर गए. हम दोनों फुलवारी की तनहाइयों में घंटों बातचीत किया करते थे. बातबात में जब मासूम ने अपनी बीती कहानी मुझे सुनाई तो उस से मेरी हमदर्दी और बढ़ गई. मैं अकसर खानेपीने की चीजें ला कर मासूम को दिया करती. हम दोनों में लगाव बढ़ता गया.

मासूम राही मन लगा कर पढ़ता और चाचा का हाथ बंटाता. उस के बरताव, काम और पढ़ाई से चाचाचाची बहुत खुश थे. वे उसे अपने बेटे की तरह मानते और सारे जहां की खुशियां उस के कदमों में डाल कर उसे प्यार करते.

मासूम राही भी चाचाचाची को अम्मां और अब्बा कह कर पुकारता था. मैं सुबह उठ कर घर के कामों से निबटने के बाद उस के साथ कालेज जाया करती थी. शाम ढलने से पहले हर रोज हम फुलवारी में घूमने जाया करते थे.

वक्त गुजरता गया. हम दोनों ने बचपन की केंचुली उतार कर जवानी की दहलीज पर कदम रखा. दोनों जवां दिलों में एकदूसरे के लिए प्यारमुहब्बत का दरिया बहने लगा.

हम दोनों एकदूसरे के करीब आते गए, लेकिन अब बचपन की तरह खुलेआम नहीं, बल्कि चोरीछिपे एकदूसरे से मिलते रहे. हर प्यार करने वाले की तरह हमारा और मासूम राही का भी चोरीछिपे मिलना ज्यादा दिनों तक समाज से छिपा नहीं रह सका. फौरन ही महल्ले वालों को हमारी मुहब्बत की भनक लग गई. वे दबी जबान से हम दोनों की चर्चा करने लगे.

यह बात चाचा और चाची को पता लगी, तो उन्होंने मासूम को अपने दरबान और नौकरों से बुरी तरह से पिटवाया और बुराभला कहा. इधर मेरी भी हालत बदतर कर दी गई. हमारी अम्मी ने मुझे रस्सी से बांध दिया और डंडे से इतना पीटा कि मेरी पीठ से खून निकलने लगा. कई जख्म भी उभर आए थे.

मैं बेतहाशा चिल्ला रही थी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. वे लगातार मेरे सिर पर वार करने लगीं, जिस से मैं बेहोश हो गई.

जब होश आया, तो मैं अस्पताल में थी. सिर, पीठ, हाथ और पैर में पट्टियां बंधी थीं. अब्बाजान पास ही में कुरसी पर बैठे हुए थे.

जब मैं ने आंखें खोलीं, तो वे बोले, ‘‘बेटी, यह सब छोड़ दो, नहीं तो हम से बुरा कोई नहीं होगा. मासूम से तो मैं निबट लूंगा. जिस के बारे में कुछ भी सहीसही मालूम नहीं है, उस के साथ इश्क लड़ाने चली है. अगर आज के बाद तुम घर से निकली, तो तुम्हें मैं जान से मार डालूंगा.’’

जब मैं एक महीने के बाद ठीक हो कर अस्पताल से घर आई, तो मुझे पंख कटे पक्षी की तरह घर में कैद कर दिया गया. मैं मन मसोस कर रह गई.

उधर मासूम राही हमारी याद में तड़प रहा था. उस पर भी चाचा के गुंडे नजर रखे रहते थे. मासूम से नहीं मिल पाने के चलते मैं बेचैन सी रहने लगी. उन्हीं दिनों पता लगा कि मासूम राही पर भी चाचा और चाची ने इतनी सख्त पाबंदी लगा दी थी कि वह चाह कर भी मुझ से नहीं मिल पा रहा था.

जब मैं खुद को नहीं रोक सकी, तो उस से रात में मिलने का फैसला किया. मैं आधी रात को मासूम से मिलने के लिए दबे पैर चाचा के घर में घुस गई. मासूम चाचा के कमरे में सोया हुआ था.

जैसे ही मैं उस के कमरे से गुजरी, वैसे ही अचानक आहट पा कर चाची उठीं. उन्होंने ‘चोरचोर’ चिल्लाते हुए चाचा को जगाया और तुरंत बंदूक ला कर देते हुए बोलीं, ‘‘गजाला आई है. आज जान से मार दीजिए.’’

चाचा ‘चोरचोर’ चिल्लाते हुए हमारे पीछे भागे. मैं सिर पर पैर रख कर गली की ओर भागी. चाचा ने मुझ पर

3 गोलियां चलाईं. गहरा अंधेरा होने के चलते उन का निशाना ठीक नहीं बैठा. इस गली से होते हुए मैं अपने कमरे में जा कर लेट गई.

आधी रात को गोलियों की आवाज सुन कर महल्ले में अफरातफरी हो गई. मेरे अब्बाजान और महल्ले वाले दौड़दौड़े चाचा के घर पहुंचे और गोली चलाने की वजह पूछी. चाचा गहरे अंधेरे में मुझे ठीक से पहचान नहीं सके थे. फिर भी उन्हें पूरा यकीन था कि वह गजाला ही थी, इसलिए उन्होंने अब्बाजान को अलग ले जा कर कहा, ‘‘भाई, तुम्हारी इज्जत हमारी इज्जत है. गजाला आई थी.’’

अभी चाचा अब्बाजान को समझा ही रहे थे कि चाची सब के सामने बोल पड़ीं. ‘‘शौकत राही, समझा ले अपनी बेटी को. वह जवानी के जोश में आधी रात को मेरे घर में चोरों की तरह घुस आई. आज तो वह बच कर भाग गई, लेकिन आज के बाद अगर उस ने ऐसी हरकत की तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगी.’’

अब्बाजान ने गुस्से में तमतमाते हुए कहा, ‘‘आप यह कैसे कह सकती हैं कि वह गजाला ही थी? आप ने इतने अंधेरे में उसे पहचान लिया? हमारी बेटी पर इलजाम मत लगाइए. वह कोई चोरउचक्का होगा.’’

इस पर चाची ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘अगर यकीन नहीं आता तो घर जा कर देखो, वह इस समय घर में मौजूद

नहीं होगी. वह कहीं गली में जा कर छिपी होगी.’’

Father’s Day Special- मुट्ठीभर स्वाभिमान: भाग 1

15 वर्ष हो चुके थे उसे विदेश में रहते. इसलिए इन खोखली औपचारिकताओं से उसे सख्त परहेज था. चाचा से मालूम हुआ कि अंतिम संस्कार के लिए रुपयों का प्रबंध करना है, दीनानाथजी की जेब से कुल 270 रुपए मिले हैं और अलमारी में ताला बंद है, जिसे खोलने का हक केवल सुकांत को है.

पड़ोस के घर से चाय बन कर आ गई थी, किंतु सुकांत ने पीने से मना कर दिया. अपने बाबूजी के मृतशरीर के पास खामोश बैठा उन्हें देखता रहा. उन के ढके चेहरे को खोलने का उस में साहस नहीं हो रहा था. जिस जीवंत पुरुष को सदा हंसतेहंसाते ही देखा हो, उस का भावहीन, स्पंदनहीन चेहरा देखने की कल्पना मर्मांतक थी. सुकांत ने अपने बटुए से 200 डौलर निकाल कर चाचा के हाथ में रखते हुए कहा, ‘‘इन्हें आप बैंक से रुपयों में भुना कर अंतिम संस्कार के सामान का इंतजाम कर लीजिए.’’

‘‘तुम नहीं चलोगे सामान लेने?’’

‘‘आप ही ले आइए, चाचा,’’ सिर झुकाए धीमे स्वर में बोला सुकांत.

‘‘ठीक है,’’ कह कर चाचा पड़ोस के व्यक्तियों को साथ ले कर चले गए.

घर में घुसने के बाद से ले कर अब तक पलपल सुकांत को मां का चेहरा हर ओर नजर आ रहा था. अपने बचपन को यहीं छोड़ कर वह जवानी की जिस अंधीदौड़ में शामिल हो विदेश जा बसा था, वह उसे बहुत महंगी पड़ी. लेकिन कभीकभी अपने ही लिए फैसलों को बदलना कितना कठिन हो जाता है.

पास ही बैठी चाची बीचबीच में रो पड़ती थीं. किंतु सुकांत की आंखों में आंसू नहीं थे. वह एक सकते की सी हालत में था. 2 वर्षों पूर्व जब मां का देहांत हुआ था तो वह आ भी न पाया था. अंतिम बार मां का मुख न देख पाने की कसक अभी भी उस के हृदय में बाकी थी. उस समय वह ट्रेनिंग के सिलसिले में जरमनी गया हुआ था. पत्नी भी घूमने के लिए साथ ही चली गई थी. दीनानाथजी फोन पर फोन करते रहे. घंटी बजती रहती पर कौन था जो उठाता. खत और तार भी अनुत्तरित ही रहे.

पत्नी के शव को बर्फ की सिल्लियों पर रखे 2 दिनों तक दीनानाथजी प्रतीक्षा करते रहे कि शायद कहीं से सुकांत का कोई संदेश मिले. फिर निराश, निरुपाय दीनानाथजी ने अकेले ही पत्नी का दाहसंस्कार किया और खामोशी की एक चादर सी ओढ़ ली.

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जरमनी से वापस आ कर जब सुकांत को अपने बाबूजी का पत्र मिला तो वह दुख के आवेग में मानो पागल हो उठा कि यह क्या हो गया, कैसे हो गया. उस के दिमाग की नसें मानो झनझना उठीं. मां के प्रति बेटा होने का अपना फर्ज भी वह पूरा न कर पाया. उस का हताश मन रो उठा. किंतु अब भारत जाने का कोई अर्थ नहीं बनता था. सो, एक मित्र को उस के घर पर फोन कर के सुकांत ने उस से आग्रह किया कि वह वापसी में बाबूजी को अपने साथ ले आए. न चाहते हुए भी दीनानाथजी चले गए.

बेटे का आग्रह ठुकरा न सके. पत्नी के इस आकस्मिक निधन पर अपनेआप को बहुत असहाय सा पा रहे थे. बेटे के पास पहुंच उस की बांहों में मुंह छिपा कर रो लेने का मन था उन का. बेटे के सिवा और कौन बांट सकता था उन के इस दुख को?

चले तो गए, किंतु वहां अधिक दिन रह न सके. बुढ़ापे की कुछ अपनी समस्याएं होती हैं, जिस तरह बच्चों की होती हैं. पहले तो हमेशा पत्नी साथ होती थी, जो उन की हर जरूरत का ध्यान रखती थी. किंतु अब कौन रखता? सुबह 4 बजे जब आंख खुलती और चाय की तलब होती तो चुपचाप मुंह ढांप कर सोए रहते.

पत्नी साथ आती थी तो बिना आहट किए दबे पांव जा कर रसोई से चाय बना कर ले आती थी. किंतु अब जब एक बार उन्होंने खुद सुबह चाय बनाने की कोशिश की थी तो बरतनों की खटपट से बेटाबहू दोनों जाग कर उठ आए थे और दीनानाथजी संकुचित हो कर अपने कमरे में लौट गए थे. फिर दोपहर होते न होते बड़े तरीके से बहू ने उन्हें समझा भी दिया, ‘बाबूजी, मैं उठ कर चाय बना दिया करूंगी.’

और उस के बाद दीनानाथजी ने दोबारा रसोई में पांव नहीं रखा. बहू कितनी भी देर से सो कर क्यों न उठे, वे अपने कमरे में ही चाय का इंतजार करते रहते थे.

सुकांत अपने काम में अत्यधिक व्यस्त रहता था. घर में दीनानाथजी बहू के साथ अकेले ही होते थे. उन की इच्छा होती कि बेटी समान बहू उन के  पास बैठ कर दो बातें करे क्योंकि पत्नी की मृत्यु का घाव अभी हरा था और उसे मरहम चाहिए था, किंतु ऐसा न हो पाता. 2-4 मिनट उन के पास बैठ कर ही बहू किसी न किसी बहाने से उठ जाती और दीनानाथजी अपनेआप को अखबार व किताबों में डुबो लेते. वे परिमार्जित रुचियों के व्यक्ति थे. बेटे ने भी उन से विरासत में शालीन संस्कार ही पाए थे. सो, किताबों से कितनी ही अलमारियां भरी पड़ी थीं.

अपने दफ्तर की ओर से सुकांत को फिर 1 महीने के लिए जरमनी जाना था और सदा की तरह इस बार भी उस की पत्नी शांता साथ जाना चाहती थी. वह सुकांत के बिना 1 महीना रहने को तैयार न थी. रात की निस्तब्धता में दीनानाथजी के कानों में बहू एवं सुकांत के बीच चल रही तकरार के कुछ शब्द पड़े, ‘बाबूजी को इस अवस्था में यहां अकेले छोड़ना उचित है क्या?’ सुकांत का स्वर था.

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बंद कमरे में हुई बाबू दीनानाथ की मृत्यु रिश्तेदारों व महल्ले वालों को आश्चर्य व सदमे की हालत में छोड़ गई थी. स्वभाव से ही हंसमुख व्यक्ति थे दीनानाथ. रोज सुबहसुबह ही घर के सामने से निकलते हर जानपहचान वाले का हालचाल पूछना व एकाध को घर ले आ कर पत्नी को चाय के लिए आवाज देना उन की दिनचर्या में शामिल था. पैसे से संपन्न भी थे. किंतु 2 वर्ष पूर्व पत्नी के निधन के बाद वे एकदम खामोश हो गए थे. महल्ले वाले उन का आदर करते थे. सो, कोई न कोई हालचाल पूछने आताजाता रहता. किंतु सभी महसूस करते थे कि बाबू दीनानाथ ने अपनेआप को मानो अपने अंदर ही कैद कर लिया था. शायद पत्नी की असमय मृत्यु के दुख से सदमे में थे. 70 वर्ष की आयु में अपने जीवनसाथी से बिछुड़ना वेदनामय तो होता ही है, स्मृतियों की आंधी भी मन को मथती रहती है. पीड़ा के दंश सदा चुभते रहते हैं.

जब तक पत्नी जिंदा थी, बेटे के बुलाने पर वे अमेरिका भी जाते थे, किंतु वापस लौटते तो बुझेबुझे से होते थे. जिस मायानगरी की चमकदमक औरों के लिए जादू थी, वह उन्हें कभी रास न आई. वापस अपने देश पहुंच कर ही वे चैन की सांस लेते थे. अपने छोटे से शांत घर में पहुंच कर निश्ंिचत हो जाते. किंतु अब यों उन का आकस्मिक निधन, वह भी इस तरह अकेले बंद कमरे में, सभी अपनेअपने ढंग से सोच रहे थे. सब से अधिक दुखी थे योगेश साहब, जो दीनानाथजी के परममित्र थे.

दीनानाथजी के छोटे भाई ने फोन पर यह दुखद समाचार अपने भतीजे को दिया. फिर मृतशरीर को बर्फ पर रखने की तैयारी शुरू कर दी. वे जानते थे कि उन के भतीजे सुकांत को तुरंत चल पड़ने पर भी आने में 2 दिन लगने ही थे.

हवाईअड्डे पर हाथ में एक छोटी अटैची थामे सुकांत इधरउधर देख रहा था कि शायद उस के घर का कोई लेने आया होगा, लेकिन किसी को न पा कर वह टैक्सी ले कर चल पड़ा. घर के सामने काफी लोग जमा थे. कुछ उसे पहचानते थे, कुछ नहीं. आज 7 वर्षों के बाद वह आया था. अंदर पहुंच कर नम आंखों से उस ने चाचा के पांव छुए.

‘‘बहू और बिटिया को नहीं लाए बेटा?’’ चाचा ने पूछा.

‘‘जी, नहीं. इतनी जल्दी सब का आना कठिन था,’’ सुकांत ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

आंखों से पल्लू लगाए रोने का अभिनय सा करती चाची ने आगे आ कर सुकांत को गले लगाना चाहा, किंतु वह उन के पांव छू कर पीछे हट गया.

यही सच है : आखिर क्या थी वह त्रासदी?

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