Story in Hindi
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सोहा चली गई और मुझे जैसे जलते अंगारों पर छोड़ गई. न मैं रो रही थी न बहुत गमजदा थी. बस, एक गुस्सा था, यकीन टूटने की तकलीफ थी. 2-3 दिन मैं बड़ी खामोशी व होशियारी से सारा खेल देखती रही. मुझे सोहा की बात पर यकीन आने लगा. चौथे दिन रेहान ने बताया कि वे 2 दिनों के लिए औफिस के काम से बाहर जा रहे हैं. उन के जाने के बाद आबी खामोश सी थी.
वह ज्यादातर अपने ही कमरे में बंद रही. दूसरे दिन आबी कालेज, बच्चे स्कूल चले गए. मैं ने रेहान के औफिस के सीनियर कलीग रहीम साहब को फोन किया. वे मेरे ससुर के रिश्ते के भाई थे. शादी के बाद 2-3 बार मिलने आए थे. बहुत ही नेक इंसान हैं. मैं ने कहा, ‘आप से कुछ काम है, जरा घर आ जाइए.’ एक घंटे बाद वे मेरे सामने बैठे थे.
मैं ने सारे लिहाज छोड़ कर कहा, ‘चाचा, मैं रेहान को ले कर परेशान हूं. मुझे लगता है रेहान की कहीं और इन्वौल्वमैंट है. आप साथ रहते हैं, आप को कुछ पता होगा?’ रहीम साहब कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले, ‘बेटी, मैं खुद असमंजस में था कि तुम्हें बताऊं या नहीं. अच्छा हुआ, तुम ने ही पूछ लिया. एक बड़ी खूबसूरत, नाजुक सी लड़की रेहान से मिलने औफिस आती है.
फिर दोनों साथ चले जाते हैं. कई बार उन दोनों को रैस्टोरैंट और सिनेमाहौल में देखा है. मैं ने बहुत सोचा रेहान को टोक दूं पर अब वह मुझ से पहले जैसे संबंध नहीं रखता, इसलिए मैं खामोश रहा.’ मैं ने रहीम साहब से कहा, ‘आप मुझ से मिले हैं, यह बात रेहान को न बताना.’ वे लौट गए. अब शक यकीन में बदल गया.
रेहान के लौटने पर मैं ने उन से कुछ नहीं कहा. मैं बहुत सोचसमझ कर कोई कदम उठाना चाहती थी. एक तरफ खाई थी तो दूसरी तरफ कुआं. मैं ने अपने व्यवहार में कोई फर्क नहीं आने दिया बल्कि पहले से ज्यादा अच्छे खाने बना कर खिलाती, खूब खयाल रखती. उस दिन छुट्टी थी, सभी घर पर थे.
शाम को मैं अपनी दोस्त की शादी की एनिवर्सरी का कह कर घर से निकल गई और कह दिया खाना खा कर लेट आऊंगी. वह मुझे छुड़वा देगी. वह हमारी कालोनी में ही रहती है.
मैं कुछ देर अपनी सहेली के पास बैठ कर वापसी के लिए निकल गई. अंधेरा फैल रहा था. निकलने से पहले मैं ड्राइंगरूम व बैडरूम की खिड़कियां थोड़ी खुली छोड़ आई थी. दबेपांव मैं गार्डन में दाखिल हुई. धीमेधीमे चल कर ड्राइंगरूम की खिड़की के पास गई. दोनों बच्चे जोरशोर से गेम खेल रहे थे. बैडरूम की तरफ गई, अंदर झांका, आबी बैड से टेक लगाए बैठी थी, रेहान उस की गोद में सिर रखे लेटे थे. वह उन के बालों से खेल रही थी और मीठी आवाज में कह रही थी, ‘रेहान, अब इस तरह रहना मुश्किल है. हम कब तक छिपछिप कर मिलते रहेंगे. अब तुम्हें फाइनल डिसीजन लेना होगा.’
रेहान ने उसे दिलासा दिया, ‘मैं खुद यही सोच रहा हूं. मैं तुम से दूर नहीं रह सकता. एकएक पल भारी है. मैं जल्द ही कुछ करता हूं.’
मुझे लगा जैसे पिघला हुआ सीसा किसी ने मेरे कानों में उड़ेल दिया है. इतने सालों की मोहब्बत, खिदमत, वफादारी सब बेकार गई. मैं रेहान के 2 बच्चों की मां थी. आबी मेरी जान से प्यारी बहन थी. रिश्तों ने यह कैसा फरेब किया था? सब पर हवस ने कालिख मल दी थी. कुछ देर मैं बाहर ही टहलती रही, खुद को समझाती रही. सबकुछ खो देने का एहसास जानलेवा था.
मैं ने घंटी बजाई. रेहान ने दरवाजा खोला. मुझे देख कर हड़बड़ा गए, ‘अरे, तुम तो देर से आने वाली थीं न.’ मैं ने उन की आंखों में देखते हुए कहा, ‘सिर में तेज दर्द हो रहा था, इसलिए जल्दी आ गई.’ आबी भी परेशान हो गई. मैं ने कुछ जाहिर नहीं किया. एक कप दूध पी कर लेट गई.
दिन गुजर रहे थे. मैं ने खामोशी ओढ़ ली. फिर एक दिन रात के खाने के बाद जब सब टीवी देख रहे थे, मैं ने टीवी बंद कर दिया और रेहान से कहा, ‘रेहान, तुम ने रिश्तों को शर्मसार किया है. मैं ने कभी सोचा भी न था आप मेरी बेटी जैसी बहन के इश्क में पागल हो जाएंगे. एक पल को आप को अपने बच्चे, अपने खानदान का खयाल नहीं आया. आप को यह तो मालूम होगा कि बीवी के जिंदा रहते हुए उस की बहन से निकाह हराम है. आप आबिया से शादी कैसे कर सकते हैं?’
दोनों बदहवास से मुंह खोले मुझे देख रहे थे. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं इस तरह एकदम सीधा वार करूंगी.
‘बोलिए, आप का निकाह आबिया से कैसे जायज होगा?’
आबिया ने जवाब दिया, ‘जब रेहान आप को तलाक दे देंगे तो निकाह जायज होगा?’
मेरी मांजाई कितने आराम से मुझे मेरी बरबादी की खबर दे रही थी. मैं ने उसे कोई जवाब नहीं दिया. रेहान से मैं ने कहा, ‘आप मुझे तलाक नहीं देंगे.’ रेहान परेशान से लहजे में बोले, ‘शाफी, मैं तुम्हें तलाक नहीं देना चाहता पर तलाक के बिना शादी हो ही नहीं सकती. मैं मजबूर हूं. तलाक के बाद भी मैं तुम्हारा पूरा खयाल रखूंगा. तुम अलग ऊपर गेस्टरूम में रहना, खर्चा पूरा मिलेगा. तुम फिक्र न करो.’
मैं ने तीखे लहजे में कहा, ‘रेहान, मुझे तुम्हारी हमदर्दी की जरूरत नहीं है. तुम को तलाक देने की भी जरूरत नहीं है. मैं कोर्ट में खुला (जब औरत खुद शौहर से अलग होना चाहती है और खर्चा व मेहर मांगने का हक नहीं रहता) की अर्जी दे चुकी हूं. आप के औफिस लैटर आ चुका होगा. 2 दिनों बाद पहली पेशी है. आप को कोर्ट चलना होगा.’
आबी और रेहान के चेहरे सफेद पड़ गए. उन लोगों ने सोचा भी नहीं होगा कि मैं इतना बड़ा कदम इतनी जल्दी उठा लूंगी. मैं ने बच्चों की तरफ देखा. दोनों कुछ परेशान से थे. मैं वहां से उठ कर ऊपर आ गई. घर में सन्नाटा पसर गया.
कुछ महीने बाद उसे पुत्र जन्म का व निमी की मृत्यु का समाचार एकसाथ मिला. उस की समझ में नहीं आया कि वह रोए या हंसे. 2 दिन की खता ने जिंदगी भर की सजा दे डाली थी उसे. उसे लगा उस की जिंदगी में कभी न छंटने वाला अंधेरा छा गया. क्या करे और क्या नहीं. लगभग डेढ़दो महीने तक उस ने अपनी ससुराल से कोई संपर्क नहीं साधा. फिर एक दिन उस के ससुर का फोन उस की मां के लिए आया कि वे आ कर अपनी अमानत को ले जाएं. नन्हे से बच्चे को वहां संभालने वाला कोई नहीं है. बेटी की मौत के गम में निमी की मां तो बिस्तर से भी नहीं उठ पा रही हैं.
निमी के पापा भी अपनी गलतियों व अपनी जिद्द के आगे थक गए थे. उन की बातों से पश्चात्ताप साफ झलकता था. उस का दिल किया कि वह दोनों दोस्तों का गुस्सा निमी के पापा पर उतार दे. अपने बच्चों की जिंदगी बरबाद कर के आखिर क्या मिला उन्हें? वह चिल्लाचिल्ला कर पूछना चाहता था, उन मातापिता से कि क्यों बांध देते हो अपने बच्चों को जबरदस्ती के रिश्तों में… हर निर्णय लेने की छूट देते हो उन को, छोटी से छोटी बात में उन की पसंद पूछते हो और जब जिंदगी भर का निर्णय लेने का समय आता है तो अपनी जिद्द से उन की जिंदगी को कभी न भरने वाला नासूर बना देते हो. उस का मन अपने दिवंगत पिता को कभी इस बात के लिए क्षमा नहीं कर पाया.
नन्हा शनी उन के घर आ गया. दादी और बूआ की देखरेख में वह बड़ा होने लगा. पर शनी को मां के साथसाथ पिता का भी प्यार नहीं मिला. देवेश का चेहरा उसे देखते ही गुस्से में तन जाता. लाख समझाता खुद को कि जो कुछ हुआ उस में इस नन्हे का क्या दोष. लेकिन चाह कर भी उस के साथ सहज नहीं हो पाता. नन्हा प्यार और नफरत बहुत जल्दी समझ जाता है. वह भी देवेश से दूरी ही बना कर रखता. दादी व बूआ से ही चिपका रहता.
जो घर देवेश के हंसीठहाकों से गूंजता रहता था, उसी घर में 4 जनों के होते हुए भी मुर्दनी छाई रहती. उन की बेनूर जिंदगी में अगर थोड़ीबहुत तरंग उठती भी तो रागिनी की वजह से. देवेश ने खुद को काम में डुबो दिया. पढ़नेलिखने के शौकीन देवेश की लाइब्रेरी कई महान लेखकों की दुर्लभ कृतियों से अटी पड़ी थी. वह जहां भी जाता किताबें खरीद लाता था. औफिस से आ कर वह अपनी लाइब्रेरी में बैठ जाता और देर रात तक अंगरेजी पढ़ता रहता.
रागिनी अंगरेजी से एमए कर रही थी. उसी साल शानिका ने उस की कक्षा में प्रवेश लिया था. रागिनी और शानिका की दोस्ती जल्दी ही गहरी हो गई. सीधीसाधी, भोलीभाली शानिका रागिनी को बहुत अच्छी लगती थी.
एक दिन उस ने अपनी कुछ सहेलियों को घर लंच पर बुलाया था. काफी समय बाद लड़कियों की चुहलबाजी से सूना घर गुलजार हो गया था. व्यवसाई परिवार होने के कारण उन का घर बड़ा, खूबसूरत व हर तरह से सुविधासंपन्न था. उस की सहेलियां उस का घर देख कर
खुश हो रही थीं. रागिनी भी खुश हो कर उन्हें 1-1 कमरा दिखा रही थी. सब देखतेदेखते वे देवेश की लाइब्रेरी में पहुंच गईं. पढ़ने की शौकीन शानिका इतने सारे महान लेखकों की किताबें देख कर बावरी सी हो गई.
‘‘यह लाइब्रेरी किस की है रागिनी? तुम्हारे घर कौन है पढ़ने का शौकीन?’’ वह शेल्फ पर रखी किताबों पर नजर दौड़ाती हुई बोली.
‘‘मेरे भैया. जहां भी जाते हैं बस किबातें खरीद लाते हैं.’’
‘‘अच्छा, तेरे भैया के पास तो बहुत अच्छीअच्छी किताबें हैं. इन में से कुछ किताबें ऐसे हैं जिन्हें मैं पढ़ना चाहती हूं, पर मिल नहीं रही थीं. मैं ले लूं? पढ़ कर वापस कर दूंगी.’’
‘‘अरे नहींनहीं,’’ रागिनी बोली, ‘‘बाप रे, भैया की किताबों को छुओ भी तो उन्हें पता चल जाता है. उन से पूछे बिना उन की किताबें नहीं ले सकते. भैया लंच पर आने वाले हैं. उन से पूछ कर ले लेना.’’
‘‘ठीक है,’’ शानिका खुश हो कर बोली.
लंच टाइम में देवेश घर आ कर सीधे अपने कमरे में चला गया. मां ने लंच लगा दिया. रागिनी की सभी सहेलियां डाइनिंग टेबल पर आ गईं.
‘‘रागिनी जा देवेश को भी बुला ला खाने के लिए,’’ मां बोलीं.
रागिनी देवेश को बुलाने कमरे में चली गई, ‘‘भैया खाना खा लो चल कर.’’
‘‘तुम लोग खाओ… मुझे यहीं दे दो,’’ देवेश बोला.
‘‘क्या भैया आप भी…क्या सोचेंगी मेरी सहेलियां…आप कोई छोटे बच्चे हो, जो शरमा कर अंदर छिप रहे हो,’’ कह रागिनी उसे हाथ से खींच कर बाहर ले आई. वह अनिच्छा से आ कर डाइनिंग टेबल पर आ कर बैठ गया. रागिनी ने सब से उस का परिचय कराया.
जब शानिका से परिचय कराया तो सब पर सरसरी नजर व औपचारिक परिचय करती देवेश की निगाहें अनायास ही शानिका पर अटक गईं.
लंबी, छरहरी, गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें, कंधों पर लहराते मुलायम घने बाल सब उस के कमनीय चेहरे को और भी कमनीय बना रहे थे. उस के अनुपम सौंदर्य के साथसाथ उस के चेहरे की सादगी ने भी देवेश को एक बार दोबारा उस के चेहरे पर भरपूर नजर डालने के लिए मजबूर कर दिया. उस की निगाहों की कशिश रागिनी से छिपी न रह सकी.
सभी खाना खाने लगे. सभी लड़कियां आपस में चुहलबाजी कर रही थीं. कुछ छिटपुट बातें देवेश से भी कर रहीं थीं. पर शानिका बिना कुछ अधिक बोले सब की बातों पर मुसकरा रही थी. देवेश के कान और निगाहें अनायास ही उस की उपस्थिति को तोल रही थीं.
अभी सब ने खाना खत्म ही किया था कि सोया हुआ शनी उठ कर कमरे से बाहर आ गया. इतने सारे लोगों को देख वह सहम कर दादी की गोद में दुबक गया. उस प्यारे से बच्चे को देख कर सभी लड़कियां उस की तरफ आकर्षित हो गईं. उसे अपने पास बुलाने के लिए तरहतरह के प्रलोभन देने लगीं. लेकिन शनी किसी के पास जाने के लिए तैयार नहीं हुआ. बस टुकुरटुकुर सब को देखता रहा.
‘‘मेरे पास आओ,’’ शानिका प्यार से उसे छूते हुए बोली, ‘‘तुम्हें अच्छी कहानी सुनाऊंगी.’’
‘‘कौन सी वाली,’’ किसी की बात का जवाब न देने वाला शनी एकाएक शानिका से पूछ बैठा तो सब चौंक कर हंसने लगे.
‘‘जो वाली तुम कहोगे…पहले मेरे पास आओ,’’ वह उस का हाथ धीरे से अपनी तरफ खींचती हुई बोली तो शनी दादी की गोद से उतर कर उस की गोदी में बैठ गया.
‘‘अच्छा, पहले अपना नाम बताओ,’’ कह शानिका उस के घुंघराले बालों पर उंगलियां फेरते हुए बोली.
‘‘शनी,’’ और वह धीरेधीरे शानिका से बातें करने लगा.
‘‘अब क्या करें? इन पर तो कोई असर नहीं हो रहा,’’ लालिमा बोली.
‘‘अब तो हमें रुधिर से संपर्क करना ही पड़ेगा. वह ही बता सकता है आगे क्या करना है, ‘‘सिंदूरी ने कहा.
‘‘शायद रुधिर लैंडलाइन फोन बंद न कर पाया हो और शांतिलालजी का फोन आने पर रामू अंकल ने रुधिर की उपस्थिति के बारे में बता दिया हो,’’ लालिमा ने आशंका व्यक्त की.
‘‘हां, हो सकता है. अगर ऐसा है तो हमें रुधिर से संपर्क स्थापित करना चाहिए,’’ सिंदूरी बोली.
‘‘ठीक है मैं रुधिर का मोबाइल लगाता हूं,’’ रक्ताभ रुधिर को फोन डायल करते हुए बोला, ‘‘अरे, इस का फोन तो स्विच औफ है.’’
‘‘मतलब, रुधिर को इस बारे में कुछ नहीं मालूम. हमें उसे बताना चाहिए,’’ सिंदूरी बोली.
‘‘मगर बताएं कैसे?’’ रक्ताभ बोला.
‘‘चलो, अभी तुम्हारी बाइक से चलते हैं,’’ सिंदूरी बोली.
‘‘नहीं, अभी नहीं जा सकते क्योंकि वह इलाका सुनसान है और अकसर वहां लूटडकैती की वारदातें होती रहती हैं,’’ रक्ताभ ने बताया.
‘‘फिर क्या करें?’’ सिंदूरी नर्वस होती हुई बोली.
‘‘देखो, कल संडे है. मैं 9 साढ़े 9 बजे जा कर उस से मिल लूंगा. वहीं पर अगली रूपरेखा बना लेंगे,’’ रक्ताभ बोला.
‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’ लालिमा ने समर्थन किया.
‘‘हैलो लालिमा. तुरंत सिंदूरी को कौन्फ्रैंस कौल पर लो,’’ सुबह साढ़े 9 बजे रक्ताभ की घबराई हुई आवाज में फोन आया.
‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ लालिमा सिंदूरी को कौन्फ्रैंस कौल पर लेती हुए बोली. ‘‘यह लो रक्ताभ, सिंदूरी भी आ गई.’’
‘‘क्या हुआ रक्ताभ? तुम्हारी आवाज घबराई हुई सी क्यों हैं?’’ सिंदूरी फोन पर जौइन करते हुए बोली.
‘‘अरे, मैं अभी रुधिर के फार्महाउस गया था. वहां पर सीन बहुत चौंकाने वाला था? रुधिर ने सुसाइड कर लिया है,’’ रक्ताभ घबराता हुआ बोला.
‘‘क्या? कैसे??’’ दोनों ने एकसाथ घबराई आवाज में पूछा.
‘‘ उस के एक हाथ में रिवौल्वर है और छाती पर गोली लगी है. शायद रिवौल्वर से खुद को बिस्तर पर लेटेलेटे गोली मार ली है,’’ रक्ताभ की आवाज अभी भी लड़खड़ा रही थी.
रुधिर की मौत की खबर सुन कर लालिमा और सिंदूरी दोनों रोने लगीं. रक्ताभ की आंखें भी भर आईं.
‘‘देखो, संभालो अपनेआप को. रुधिर के पापा को जब यह बात मालूम पड़ेगी तो वे पुलिस में अवश्य जाएंगे. तब आज नहीं तो कल, पुलिस हम तक पहुंचेगी जरूर. हमें अपने बचाव के लिए कुछ करना चाहिए,’’ रक्ताभ ने भर्राई आवाज में कहा.
‘‘क्या करें?’’ लालिमा ने पूछा.
‘‘तुम लोग पार्क में आओ. वहीं बैठ कर सोचते हैं कि हमें आगे क्या करना है. हम पर किडनैप करने का आरोप लगा तो हमारा कैरियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा. हम पर किडनैपर होने का ठप्पा लग जाएगा वह अलग,’’ रक्ताभ बोला.
‘‘ठीक है, एक घंटे बाद पार्क में मिलते हैं,’’ सिंदूरी रोते हुए बोली.
लगभग एक घंटे बाद तीनों पार्क में इकट्ठे हुए. सिंदूरी बहुत गंभीर व उदास लग रही थी. लालिमा की आंखों में भी रोने के कारण लाल डोरे पड़े हुए थे.
‘‘कैसे हुआ रक्ताभ?’’ सिंदूरी ने पूछा.
‘‘पता नहीं,’’ रक्ताभ ने जवाब दिया.
‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि फोन आने पर रामू अंकल ने रुधिर के पापा को रुधिर के वहां होने की खबर दे दी हो और राज खुलने के डर से घरवालों की नजरों में गिरने से बचने के लिए फार्महाउस पर रखी हुई रिवौल्वर से खुद को शूट कर लिया हो,’’ रक्ताभ चिंतित होते हुए बोला.
‘‘एक बार पुलिस के हत्थे चढ़ना मतलब आगे की जिंदगी को परेशानियों में डालना,’’ लालिमा भी उसी तरह चिंतित होते हुए बोली.
‘‘अब क्या करें?’’ सिंदूरी ने पूछा.
‘‘मेरे विचार से हमें आगे हो कर पुलिस को सूचना देनी चाहिए. इस से पुलिस हमारी बात सुनेगी भी और विश्वास करेगी भी. हमारी बातों की सचाई जानने के लिए वह सिम बेचने वाले शौपकीपर के पास भी जा सकती है जो हमारी बा?तों को सच साबित करेगा. बाद में तो हमारी बात कोई ठीक से सुनेगा भी नहीं,’’ रक्ताभ ने कहा.
‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’ लालिमा ने भी समर्थन किया.
‘‘जैसा तुम को उचित लगे,’’ सिंदूरी घबराए हुए निराश स्वर में बोली.
‘‘रुधिर के पिताजी के जाने के बाद अंदर चलेंगे ताकि हम अपनी बात अच्छे से रख सकें,’’ रक्ताभ ने सु?ाया.
‘‘हां, यह ठीक रहेगा. अभी उन्हें अपने बेटे की मौत का गम और गुस्सा दोनों होगा. पता नहीं हमारे साथ क्या कर बैठें,’’ लालिमा बोली.
‘‘ठीक है, हम उन के जाने के बाद अंदर चलेंगे,’’ रक्ताभ ने समर्थन किया. लगभग 15 मिनट के बाद रुधिर के पिताजी बाहर आ गए.
‘‘सर, हम एक घटना की सूचना देने आए हैं,’’ रक्ताभ, लालिमा और सिंदूरी थाना इंचार्ज के सामने खड़े हो कर कह रहे थे.
‘‘पहले आराम से बैठो. घबराओ मत और बताओ किस घटना की सूचना देना चाहते हो,’’ थाना इंचार्ज ने तीनों को बैठने का इशारा करते हुए कहा.
‘‘सर, हमारे मित्र रुधिर ने आत्महत्या कर ली है,’’ रक्ताभ ने साहस बटोर कर कहा.
‘‘क्या कहा रुधिर? सेठ शांतिलाल का बेटा?’’ थाना इंचार्ज ने प्रश्न किया.
‘‘जी हां, वही,’’ सिंदूरी ने कहा.
‘‘परंतु सेठ शांतिलाल ने तो रिपोर्ट लिखवाई है कि उन का बेटा रुधिर आज सुबह से उन की रिवौल्वर के साथ गायब है,’’ थाना इंचार्ज ने कहा.
‘‘नहीं सर, आज सुबह से नहीं, रुधिर तो कल से ही गायब है,’’ कहते हुए रक्ताभ ने रुधिर के अपहरण की पूरी कहानी बयान कर दी.
‘‘ओह, तो ऐसा है,’’ थाना इंचार्ज ने कहा. ‘‘तुम्हारे अलावा इस योजना के बारे में और कौनकौन जानता था.’’
‘‘कोई भी नहीं. अगर फार्महाउस जाने के बाद रुधिर ने रामू अंकल को यह बात बताई हो, तो पता नहीं,’’ रक्ताभ बोला.
‘‘एक बात और सम?ा में नहीं आई. तुम्हारे हिसाब से अपहरण कल सुबह ही हो गया था. और तुम ने इस विषय में शांतिलाल को फोन भी कर दिया था. लेकिन उस ने तुम्हारे फोन को तवज्जुह नहीं दी?’’ पुलिस अफसर ने रक्ताभ से पूछा.
‘‘यस सर,’’ रक्ताभ ने सहमति दी.
‘‘इस का मतलब तो एक ही निकलता है कि जिस समय तुम ने फोन किया उस समय तक रुधिर वापस घर पहुंच चुका था. तुम्हारा प्लान फेल हो चुका था. शायद इसी शर्मिंदगी में रुधिर ने सुबह वापस फार्महाउस जा कर आत्महत्या कर ली,’’ पुलिस अफसर ने अनुमान लगाया.
‘‘हो सकता है. परंतु रुधिर को कम से कम हमें सूचित तो करना चाहिए था,’’ रक्ताभ कुछ सहमते हुए बोला.
‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मुझे पूरा विश्वास है रुधिर के साथ कुछ गलत जरूर हुआ है.’’ सिंदूरी रुधिर पर विश्वास जताते हुए बोली.
राजीव का ससुराल में अकसर आना होता रहता था. अपनी निश्छल प्रकृति के कारण तान्या राजीव के घर आने पर उस का यथोचित स्वागतसत्कार करती. जीजासलहज का रिश्ता होने के कारण उन से खूब बातचीत भी करती थी. लेकिन धीरेधीरे तान्या ने महसूस किया कि राजीव जरूरत से ज्यादा उस के नजदीक आने की कोशिश कर रहा है.
उस के सहज, निश्छल व्यवहार को वह कुछ और ही समझ रहा है. पहले तो उस ने संकेतों से उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन जब उस की बदतमीजियां मर्यादा की देहरी पार करने लगी तो उस ने एक दिन दिनकर को हिम्मत कर के सबकुछ बता दिया.
दिनकर यह सुन कर आपे से बाहर हो गया. वह राजीव को उसी समय फोन पर ही खरीखोटी सुनाने वाला था लेकिन तान्या ने उसे उस समय रोक दिया.
वह बोली,”दिनकर, यह उचित समय नहीं है. अभी हमारे पास अपनी बात को सही साबित करने का कोई प्रमाण भी नहीं है. मांजी इसे एक सिरे से नकार कर मुझे ही झूठा बना देंगी. तुम्हें मुझ पर विश्वास है, यही मेरे लिए बहुत है. मुझ पर भरोसा रखो, मैं सब ठीक कर दूंगी.”
दिनकर गुस्से में मुठ्ठियां भींच कर तकिए पर अपना गुस्सा निकालते हुए बोला, “मैं जीजाजी को छोङूंगा नहीं, उन्हें सबक सिखा कर रहूंगा.”
कुछ दिनों बाद राजीव फिर उस के घर आया और उस रात वहीं रूक गया. संयोग से दिन कर को उसी दिन बिजनैस के काम से शहर से बाहर जाना पड़ गया. राजीव के घर में मौजूद होने की वजह से उसे तान्या को छोड़ कर बाहर जाना कतई अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन बिजनैस की मजबूरियों की वजह से उसे जाना ही पड़ा. पर जातेजाते वह तान्या से बोला,”तुम अपना ध्यान रखना और कोई भी परेशानी वाली बात हो तो मुझे तुरंत बताना.”
“आप निश्चिंत रहिए. आप का प्यार और सपोर्ट मेरे लिए बहुत है.”
रात को डिनर करने के बाद सब लोग अपनेअपने कमरों में चले गए. तान्या भी अपने कमरे का दरवाजा बंद कर बिस्तर पर चली गई. दिनकर के बिना खाली बिस्तर उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था, खासकर रात में उस से अलग रहना उसे बहुत खलता था. जब दिनकर सोते समय उस के बालों में उंगलियां फिराता, तो उस की दिनभर की सारी थकान छूमंतर हो जाती. उस की यादों में खोईखोई कब आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला.
अचानक उसे दरवाजे पर खटखट की आवाज सुनाई पड़ी. पहले तो उसे लगा कि यह उस का वहम है पर जब खटखट की आवाज कई बार उस के कानों में पड़ी तो उसे थोड़ा डर लगने लगा कि इतनी रात को उस के कमरे का दरवाजा कौन खटखटा सकता है? कहीं राजीव तो नहीं. फिर यह सोच कर कि हो सकता है कि मांबाबूजी में से किसी की तबियत खराब हो गई होगी, उस ने दरवाजा खोल दिया तो देखा सामने राजीव खड़ा मुसकरा रहा है.
“अरे जीजाजी, आप इतनी रात को इस वक्त यहां? क्या बात है?”
“तान्या, मैं बहुत दिनों से तुम से एक बात कहना चाहता हूं.”
कुदरतन स्त्री सुलभ गुणों के कारण राजीव का हावभाव उस के दिल को कुछ गलत होने की चेतावनी दे रहा था. उस की बातें उसे इस आधी रात के अंधेरे में एक अज्ञात भय का बोध भी करा रही थी. लेकिन तभी उसे अपनी मां की दी हुई वह सीख याद आ गई कि हमें कभी भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए बल्कि पूरी ताकत से कठिन से कठिन परिस्थितियों का पुरजोर मुकाबला करते हुए हौसले को कम नहीं होने देना चाहिए.”
उस ने हिम्मत कर के राजीव से पूछा, “बताइए क्या बात है?”
“तान्या, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. आई लव यू. आई कैन डू एनीथिंग फौर यू…”
“यह आप क्या अनापशनाप बके जा रहे हैं? अपने कमरे में जाइए.”
“तान्या, आज चाहे जो कुछ भी हो जाए, मैं तुम्हे अपना बना कर ही रहूंगा,” इतना कहते हुए वह तान्या का हाथ पकड़ कर उसे बैडरूम में अंदर ले जाने लगा कि तान्या ने एक जोरदार थप्पड़ राजीव के मुंह पर मारा और चिल्ला पड़ी,”मिस्टर राजीव, आई एम ए गुड गर्ल बट नौट ए म्यूट ऐंड डंब गर्ल. शर्म नहीं आती, आप को ऐसी हरकत करते हुए?”
तान्या के इस चंडी रूप की कल्पना राजीव ने सपने में भी नहीं किया था. वह यह देख कर सहम उठा, पर स्थिति को संभालने की गरज से वह ढिठाई से बोला,”बी कूल तान्या. मैं तो बस मजाक कर रहा था.”
“जीजाजी, लड़कियां कोई मजाक की चीज नहीं होती हैं कि अपना टाइमपास करने के लिए उन से मन बहला लिया. आप के लिए बेशक यह एक मजाक होगा पर मेरे लिए यह इतनी छोटी बात नहीं है. मैं अभी मांपापा को बुलाती हूं.”
फिर अपनी पूरी ताकत लगा कर उस ने अपने सासससुर को आवाज लगाई, मांपापा…इधर आइए…”
रात में उस की पुकार पूरे घर में गूंज पङी. उस की चीख सुन कर उस के सासससुर फौरन वहां आ गए.
गहरी रात के समय अपने कमरे के दरवाजे पर डरीसहमी अपनी बहू तान्या और वहीं पास में नजरें चुराते अपने दामाद राजीव को देख कर वे दोनों भौंचक्के रह गए.
कुछ अनहोनी घटने की बात तो उन दोनों को समझ में आ रही थी लेकिन वास्तव में क्या हुआ यह अभी भी पहेली बनी हुई थी.
तभी राजीव बेशर्मी से बोला, “मां, तान्या ने मुझे अपने कमरे में बुलाया था.”
“नहीं मां, यह झूठ है. मैं तो अपने कमरे में सो रही थी कि अचानक कुंडी खड़कने पर दरवाजा खोला तो जीजाजी सामने खड़े थे और मुझे बैडरूम में जबरन अंदर ले जा रहे थे.”
“नहीं मां, यह झूठी है, इस ने ही…”
अभी वह अपना वाक्य भी पूरा नहीं कर पाया था कि अकसर खामोश रहने वाले तान्या के ससुर प्रवीणजी की आवाज गूंज उठी,”राजीव, अब खामोश हो जाओ, तुम ने क्या हम लोगों को मूर्ख समझ रखा है? माना हम तुम्हारे एहसानों के नीचे दबे हैं, लेकिन तुम्हारी नसनस से वाकिफ हैं. तुम ने आज जैसी हरकत किया है, उस के लिए मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा. तुम ने मेरी बहू पर बुरी नजर डाली और अब उलटा उसी पर लांछन लगा रहे हो…” इतना कह कर तान्या के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले,”बेटा, तुम्हारा बाप अभी जिंदा है. मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा. मैं अभी पुलिस को बुला कर इस को जेल भिजवाता हूं.”
अपने पिता समान ससुर का स्नेहिल स्पर्श पा कर तान्या उन से लिपट कर रो पड़ी जैसे उस के अपने बाबूजी उसे फिर से मिल गए हों. फिर थोड़ा संयत हो कर बोली, “पापा, आप का आर्शीवाद और विश्वास मेरे लिए सब कुछ है लेकिन पुलिस को मत बुलाइए. जीजाजी को सुधरने का एक मौका हमें देना चाहिए और फिर दीदी और बच्चों के बारे में सोचिए, इन के जेल जाने पर उन्हें कितना बुरा लगेगा.”
दिनकर के पिता प्रवीणजी कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले,”बेटा, तुम्हारे मातापिता ने तुम्हारा नाम तान्या कुछ सोचसमझ कर ही रखा होगा. ये तुम जैसी बेटियां ही हैं, जो अपना मानसम्मान कायम रखते हुए भी परिवार को सदा जोड़े रखती हैं. जब तक तुम्हारी जैसी बहूबेटियां हमारे समाज में हैं, हमारी संस्कृति जीवित रहेगी.”
फिर अपनी पत्नी से बोले,”शांता, देखिए ऐसी होती हैं हमारे देश की गुड गर्ल. जो न अपना सम्मान खोए न घर की बात को देहरी से बाहर जाने दे.”
शांताजी के अंदर भी आज पहली बार तान्या के लिए कुछ गौरव महसूस हो रहा था. पति से मुखातिब होते हुए दामाद राजीव के विरूद्ध वे पहली बार बोलीं,”आप ठीक कहते हैं. घर की इज्जत बहूबेटियों से ही होती है. पता नहीं एक स्त्री होने के बावजूद मेरी आंखें यह सब क्यों नहीं देख पाईं…” फिर तान्या से बोलीं,”बेटा, मुझे माफ कर देना.”
“राजीव, तुम अब यहां से चले जाओ. मैं तुम्हारा पाईपाई चुका दूंगा पर अपने घर की इज्जत पर कभी हलकी सी भी आंच नहीं आने दूंगा. तान्या हमारी बहू ही नहीं, हमारी बेटी भी है और सब से बढ़ कर इस घर का सम्मान है,” प्रवीणजी बोल पङे.
सासससुर का स्नेहिल आर्शीवाद पा कर आज तान्या को उस का ससुराल उसे सचमुच अपना घर लग रहा था बिलकुल अपना जिस के द्वार पर एक सुहानी भोर मीठी दस्तक दे रही थी.
रमाकांत की सारी बात सुन डाक्टर सतीश धवन कुछ पलों के लिए सोच में पड़ गया और फिर बोला, ‘‘शारदा भाभी कहां तक पढ़ी हैं?’’
‘‘जहां तक मैं जानता हूं 12वीं से ज्यादा नहीं,’’ रमाकांत ने कहा.
‘‘आजकल डीएनए वाली
बात तो हरकोई जानता है. जगहजगह आईवीएफ के बोर्ड लगे हैं. सैरोगेट मदर का भी नाम उछलता रहता है,’’ डाक्टर सतीश ने गंभीरता से कहा.
‘‘जब आप के घर के अंदर व्हाट्सएप जैसा शुरू हो तो आप उन चीजों के बारे में भी आसानी से जान जाते हैं जोकि देखने में आप से बहुत दूर होता है और फिर वह पंडित रामकुमार तिवारी भी तो है जो लैब का कार्ड ले गया.’’ रमाकांत ने कहा तो वह व्हाट्सएप और पंडितों के जरिए मिला ज्ञान है. तब समस्या कोई बड़ी नहीं, तुम कल ही शारदा और खुशबू को ले कर वहां आ जाना. बाकी मैं देख लूंगा. सतीश ने कहा.
अगले दिन रमाकांत ने शारदा को खुद तैयार होने
और खुशबू को भी तैयार करने
को कहा.
‘‘कहां चलना है?’’ शारदा
ने पूछा.
इस पर रमाकांत ने फुसफुसाती हुई आवाज में कहा, ‘‘डाक्टर सतीश के कहां.’’
‘‘किसलिए?’’ शारदा ने पूछा.
‘‘तुम खुशबू को ले कर जो डीएनए टैस्ट करवाने की बात कर रही थी न, उसी के सिलसिले में,’’ रकामांत ने कहा.
रमाकांत के शब्द सुन कर शारदा एकाएक सकते में आ गईं. बोलीं, ‘‘इतनी अचानक ये सब? तुम ने मु झे इस के बारे में पहले कुछ बताया भी नहीं?’’
‘‘मैं ने कल ही डाक्टर सतीश से इस बारे में बात की थी. मैं तुम को बतलाना भूल गया था. डाक्टर सतीश हम तीनों के शरीर में से कुछ चीजों के नमूने ले कर बाहर किसी ऐसे शहर भेजेगा जहां किसी प्रयोगशाला में डीएनए टैस्ट की व्यवस्था होगी. रिपोर्ट के आने में 8-10 दिन का वक्त लगेगा.’’
कशमकश में नजर आ रही शारदा खामोश रहीं. जब सच का सामना करने की स्थिति पास आ कर खड़ी हो गई तो शारदा के अंदर एक दूसरी ही तरह का द्वंद्व शुरू हो गया था.
खुशबू और शारदा को साथ ले कर रमाकांत सुबह 11 बजे डाक्टर सतीश धवन के क्लीनिक पहुंच गए. डाक्टर धवन की लैब उस के क्लीनिक के ही एक हिस्से में थी.
डीएनए टैस्ट के नाम पर एक ड्रामा ही तो करना था, सब से पहले डाक्टर सतीश रमाकांत को साथ ले कर लैब के अंदर गया. लैब के अंदर डाक्टर सतीश ने रमाकांत के साथ बैठ आराम के साथ 5-7 मिनट तक गपशप की और फिर दिखावे के लिए उस ने रमाकांत के अंगूठे और कलाई पर पट्टी चिपका उन्हें लैब से बाहर भेज दिया.
लैब से बाहर आ कर रमाकांत ने तनाव में दिख रही शारदा को अंदर भेज दिया. ये सब देख मासूम खुशबू काफी डरी नजर आ रही थी. वह कुछ भी सम झने में असमर्थ थी.
सारे ड्रामे को असली रूप देने के लिए डाक्टर सतीश ने शारदा के साथ सबकुछ असली ही किया. शरीर के 1-2 हिस्सों में से खून ले कर उसे कांच की टैस्ट प्लूबों में डाला.
डाक्टर सतीश कोई भी ऐसा काम करना नहीं चाहता था जिस से शारदा के मन में जरा सा भी कोई शक पैदा हो.
वास्तविकता यह थी कि शारदा के खून के नमूनों की न तो सतीश खुद ही कोई जांच करने वाला था और न ही कहीं भेजने वाला था. खुशबू को ले कर शारदा के मन में बने संशय और दुविधा को दूर करने के लिए उस को यह विश्वास दिलाना जरूरी था कि खुशबू को ले कर वास्तव में ही कोई डीएनए टैस्ट होने वाला है.
शारदा के बाद डाक्टर सतीश डरी, घबराई खुशबू को लैब के अंदर ले गया.
शक की गुंजाइश कोई न रहे इस बात का खयाल कर के न चाहते हुए भी डाक्टर सतीश को उस के हाथ की एक उंगली में सूई चुभो कर खून निकालना पड़ा.
जब शारदा और खुशबू को ले कर रमाकांत डाक्टर सतीश से वापस आने लगे तो डाक्टर सतीश ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘मैं जो कुछ भी कर रहा हूं वह मेरे पेशे के साथ सरासर बेईमानी है.’’
‘‘किसी अच्छे काम के लिए की जाने वाली बेईमानी, बेईमानी नहीं होती,’’ रमाकांत ने जवाब में कहा.
शारदा जैसी औरतों के जटिल मनोविज्ञान को सम झना वास्तव में ही बड़ा कठिन होता है.
डाक्टर सतीश धवन के यहां से आने के बाद रमाकांत ने शारदा में फिर एक परिवर्तन देखा. उन्होंने देखा कि पिछले कुछ दिनों से खुशबू के प्रति बेरुखी दिखा रही शारदा एक बार फिर से उस के लिए प्रेम दिखाने लगी है. खुशबू के प्रति उस का लगाव पहले से अधिक बढ़ गया था.
यह देख रमाकांत भी हैरान थे. रमाकांत यह भी महसूस कर रहे थे कि डाक्टर सतीश के वहां से आने के बाद शारदा पहले से भी अधिक बेचैन और कशमकश में है.
वैसे शारदा को इस बात का कोई इल्म नहीं था कि खुशबू के डीएनए टैस्ट के नाम पर डाक्टर सतीश ने जो कुछ भी किया वह केवल एक नौटंकी था. शारदा के मन से खुशबू को ले कर जो सुविधा और वहम था उसे निकालने के लिए डीएनए टैस्ट की झूठमूठ की रिपोर्ट डाक्टर सतीश ने ही तैयार करनी थी.
शारदा इतनी पढ़ीलिखी नहीं थी कि इस झूठ को असानी से पकड़ पाती. डीएनए की बात करने वाली शारदा उस की एबीसी भी नहीं जानती थी. वैसे रमाकांत को यह भी विश्वास था कि डीएनए वाली बात का जिक्र शारदा किसी दूसरे से नहीं करेगी. जब उस ने पंडित रामकुमार तिवारी को डीएनए टैस्ट दूसरी लैब से कराने की बात कही तो वे बेचैन हो उठे थे. कल आऊंगा कह कर चलते बने थे पर आए नहीं.
8-10 दिन बीत गए. इस बीच एक बार भी शारदा ने डीएनए टैस्ट की रिपोर्ट का जिक्र रमाकांत से नहीं किया. ऐसा लगता जैसे उस की रिपोर्ट में कोई दिलचस्पी ही नहीं रही.
रमाकांत के लिए ये सब आश्चर्य के साथसाथ उल झन से भी भरा था.
इन 8-10 दिन में शारदा खुशबू के पहले से भी अधिक करीब नजर आने लगी थीं. कई
बार ऐसा भी लगता था कि जैसे शारदा अपनेआप से लड़ रही हों.
8-10 दिन के बाद रमाकांत ने डाक्टर सतीश से बात करने के बाद स्वयं ही शारदा से कहा, ‘‘डाक्टर सतीश का टैलीफोन आया था. उस का कहना था कि डीएनए टैस्ट की रिपोर्ट आ गई है.’’
रमाकांत की बात को सुन शारदा एकदम भावहीन और ठंडी रहीं. कुछ नहीं कहा.
यह देख रमाकांत ने कहा, ‘‘मैं शाम को घर आते हुए डाक्टर सतीश के क्लीनिक से रिपोर्ट लेता आऊंगा.’’
रमाकांत की इस बात पर भी शारदा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
शाम को रमाकांत डाक्टर सतीश के यहां से एक बंद लिफाफा ले आए. लिफाफे के अंदर खुशबू की तथाकथित डीएनए रिपोर्ट थी. रिपोर्ट में क्या है, रमाकांत को मालूम था. डाक्टर सतीश ने उस की मनमाफिक रिपोर्ट ही बनाई थी.
बंद लिफाफा शारदा के सामने करते हुए रमाकांत ने कहा, ‘‘इस रिपोर्ट का संबंध हम लोगों के निजी जीवन से है, इसलिए डाक्टर सतीश ने इसे पढ़ना ठीक नहीं सम झा. इस से पहले कि मैं लिफाफा खोल इस रिपोर्ट को पढ़ूं तुम्हारे मन का शक सही भी हो सकता है और गलत भी. तुम्हें हर स्थिति का सामना शांत रह कर करना होगा.’’
अंतर्द्वंद्व में फंसी शारदा ने कुछ पल खामोश नजरों से रमाकांत और हाथ में पकड़े लिफाफे को देखा. फिर उन्होंने जो किया वह अप्रत्याशित था.
शारदा ने रमाकांत के हाथ से लिफाफे को बिजली की सी तेजी से छीना और फिर उस के टुकड़ेटुकड़े कर दिए. इस के साथ ही ऐसा लगा जैसा वे अपनी कशमकश और अंतर्द्वंद्व से एक फटके में बाहर आ गई हो. पंडित रामकुमार तिवारी उस दिन से कभी नहीं आए.
नींद से उठे, डरे बच्चों के रोने का शोर, आदमियों का टौर्च ले कर भागदौड़ का कोलाहल…ऐसे में तरुण के कमरे का दरवाजा खुलना ही था. उस के पीछेपीछे सजीसजाई विराज भी चली आई हौल में. चैन की सांस ली मैं ने. बाकी सभी भयभीत थे लुट जाने के भय से. सब की आंखों से नींद गायब थी. इस बीच, मसजिद से सुबह की आजान की आवाज आते ही मैं मन ही मन बुदबुदाई, ‘हो गई सुहागरात.’
लेकिन कब तक? वह तो सावित्री थी जिस ने सूर्य को अस्त नहीं होने दिया था. सुबह से ही मेहमानों की विदाई शुरू हो गई थी. छुट्टियां किस के पास थीं? मुझे भी लौटना था तरुण के साथ. मगर मेरे गले में बड़े प्यार से विराज को भी टांग दिया गया.
जाने किस घड़ी में बेटियों से कहा था कि चाची ले कर आऊंगी. विराज को देख कर मुझे अपना सिर पीट लेने का मन होता. मगर उस ने रिद्धि व सिद्धि का तो जाते ही मन जीत लिया.
10 दिनों बाद विराज का भाई उसे लेने आ गया और मैं फिर तरुण की परी बन गई. गिनगिन कर बदले लिए मैं ने तरुण से. अब मुझे उस से सबकुछ वैसा ही चाहिए था जैसे वह विराज के लिए करता था…प्यार, व्यवहार, संभाल, परवा सब.
चूक यहीं हुई कि मैं अपनी तुलना विराज से करते हुए सोच ही नहीं पाई कि तरुण भी मेरी तुलना विराज से कर रहा होगा.
वक्त भाग रहा था. मैं मुठ्ठी में पकड़ नहीं पा रही थी. ऐसा लगा जैसे हर कोई मेरे ही खिलाफ षड्यंत्र रच रहा है. तरुण ने भी बताया ही नहीं कि विराज ट्रांसफर के लिए ऐप्लीकेशन दे चुकी है. इधर राजीव का एग्रीमैंट पूरा हो चुका था. उन्होंने आते ही तरुण को व्यस्त तो कर ही दिया, साथ ही शहर की पौश कालोनी में फ्लैट का इंतजाम कर दिया यह कहते हुए, ‘‘शादीशुदा है अब, यहां बहू के साथ जमेगा नहीं.’’
मैं चुप रह गई मगर तरुण ने अब भी मुंह मारना छोड़ा नहीं था. तरुण मेरी मुट्ठी में है, यह एहसास विराज को कराने का कोई मौका मैं छोड़ती नहीं थी. जब भी विराज से मिलना होता, वह मुझे पहले से ज्यादा भद्दी, मोटी और सांवली नजर आती. संतुष्ट हो कर मैं घर लौट कर अपने बनावशृंगार पर और ज्यादा ध्यान देती.
फिर मैं ने नोट किया, तरुण का रुख उस के बजाय मेरे प्रति ज्यादा नरम और प्यारभरा होता, फिर भी विराज सहजभाव से नौकरी, ट्यूशन के साथसाथ तरुण की सुविधा का पूरा खयाल रखती. न तरुण से कोई शिकायत, न मांगी कोई सुविधा या भेंट.
‘परी थोड़ी है जो छू लो तो पिघल जाए,’ तरुण ने भावों में बह कर एक बार कहा था तो मैं सचमुच अपने को परी ही समझ बैठी थी. तब तक तरुण की थीसिस पूरी हो चुकी थी मगर अभी डिसकशन बाकी था.
और फिर वह दिन आ ही गया. तरुण को डौक्टरेट की डिगरी के ही साथ आटोनौमस कालेज में असिस्टैंट प्रोफैसर पद पर नियुक्ति भी मिल गई. धीरेधीरे उस का मेरे पास आना कम हो रहा था, फिर भी मैं कभी अकेली, कभी बेटियों के साथ उस के घर जा ही धमकती. विराज अकसर शाम को भी सूती साड़ी में बगैर मेकअप के मिडिल स्कूल के बच्चों को पढ़ाती मिलती.
ऐसे में हमारी आवभगत तरुण को ही करनी पड़ती. वह एकएक चीज का वर्णन चाव से करता…विराज ने गैलरी में ही बोनसाई पौधों के संग गुलाब के गमले सजाए हैं, साथ ही गमले में हरीमिर्च, हरा धनिया भी उगाया है. विराज…विराज… विराज…विराज…विराज ने मेरा ये स्वेटर क्रोशिए से बनाया है. विराज ने घर को घर बना दिया है. विराज के हाथ की मखाने की खीर, विराज के गाए गीत… विराज के हाथ, पैर, चेहरा, आंखे…
मैं गौर से देखने लगती तरुण को, मगर वह सकपकाने की जगह ढिठाई से मुसकराता रहता और मैं अपमान की ज्वाला में जल उठती. मेरे मन में बदले की आग सुलगने लगी.
मैं विराज से अकेले में मिलने का प्रयास करती और अकसर बड़े सहजसरल भाव से तरुण का जिक्र ही करती. तरुण ने मेरा कितना ध्यान रखा, तरुण ने यह कहा वह किया, तरुण की पसंदनापसंद. तरुण की आदतों और मजाकों का वर्णन करने के साथसाथ कभीकभी कोई ऐसा जिक्र भी कर देती थी कि विराज का मुंह रोने जैसा हो जाता और मैं भोलेपन से कहती, ‘देवर है वह मेरा, हिंदी की मास्टरनी हो तुम, देवर का मतलब नहीं समझतीं?’
विराज सब समझ कर भी पूर्ण समर्पण भाव से तरुण और अपनी शादी को संभाल रही थी. मेरे सीने पर सांप लोट गया जब मालूम पड़ा कि विराज उम्मीद से है, और सब से चुभने वाली बात यह कि यह खबर मुझे राजीव ने दी.
‘‘आप को कैसे मालूम?’’ मैं भड़क गई.
‘‘तरुण ने बताया.’’
‘‘मुझे नहीं बता सकता था? मैं इतनी दुश्मन हो गई?’’
विराज, राजीव से सगे जेठ का रिश्ता निभाती है. राजीव की मौजूदगी में कभी अपने सिर से पल्लू नीचे नहीं गिरने देती है, जोर से बोलना हंसना तो दूर, चलती ही इतने कायदे से है…धीमेधीमे, मुझे नहीं लगता कि राजीव से इस बारे में उस की कभी कोई बात भी हुई होगी.
लेकिन आज राजीव ने जिस ढंग से विराज के बारे में बात की , स्पष्टतया उन के अंदाज में विराज के लिए स्नेह के साथसाथ सम्मान भी था.
चर्चा की केंद्रबिंदु अब विराज थी. तरुण ने विराज को डिलीवरी के लिए घर भेजने के बजाय अपनी मां एवं नानी को ही बुला लिया था. वे लोग विराज को हथेलियों पर रख रही थीं. मेरी हालत सचमुच विचित्र हो गई थी. राजीव अब भी किताबों में ही आंखें गड़ाए रहते हैं.
और विराज ने बेटे को जन्म दिया. तरुण पिता बन गया. विराज मां बन गई पर मैं बड़ी मां नहीं बन पाई. तरुण की मां ने बच्चे को मेरी गोद में देते हुए एकएक शब्द पर जोर दिया था, ‘लल्ला, ये आ गईं तुम्हारी ताईजी, आशीष देने.’
बच्चे के नामकरण की रस्म में भी मुझे जाना पड़ा. तरुण की बहनें, बूआओं सहित काफी मेहमानों को निमंत्रित किया गया. कार्यक्रम काफी बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया था. इस पीढ़ी का पहला बेटा जो पैदा हुआ है. राजीव अपने पुराने नातेरिश्ते से बंधे फंक्शन में बराबरी से दिलचस्पी ले रहे थे. तरुण विराज और बच्चे के साथ बैठ चुका तो औरतों में नाम रखने की होड़ मच गई. बहनें अपने चुने नाम रखवाने पर अड़ी थीं तो बूआएं अपने नामों पर.
बड़ा खुशनुमा माहौल था. तभी मेरी निगाहें विराज से मिलीं. उन आंखों में जीत की ताब थी. सह न सकी मैं. बोल पड़ी, ‘‘नाम रखने का पहला हक उसी का होता है जिस का बच्चा हो. देखो, लल्ला की शक्ल हूबहू राजीव से मिल रही है. वे ही रखेंगे नाम.’’
सन्नाटा छा गया. औरतों की उंगलियां होंठों पर आ गईं. विराज की प्रतिक्रिया जान न सकी मैं. वह तो सलमासितारे जड़ी सिंदूरी साड़ी का लंबा घूंघट लिए गोद में शिशु संभाले सिर झुकाए बैठी थी.
मैं ने चारोें ओर दृष्टि दौड़ाई, शायद राजीव यूनिवर्सिटी के लिए निकल चुके थे. मेरा वार खाली गया. तरुण ने तुरंत बड़ी सादगी से मेरी बात को नकार दिया, ‘‘भाभी, आप इस फैक्ट से वाकिफ नहीं हैं शायद. बच्चे की शक्ल तय करने में मां के विचार, सोच का 90 प्रतिशत हाथ होता है और मैं जानता हूं कि विराज जब से शादी हो कर आई, सिर्फ आप के ही सान्निध्य में रही है, 24 घंटे आप ही तो रहीं उस के दिलोदिमाग में.
इस लिहाज से बच्चे की शक्ल तो आप से मिलनी चाहिए थी. परिवार के अलावा किसी और पर या राजीव सर पर शक्लसूरत जाने का तो सवाल ही नहीं उठता. यह तो आप भी जानती हैं कि विराज ने आज तक किसी दूसरे की ओर देखा तक नहीं है. वह ठहरी एक सीधीसादी घरेलू औरत.’’
औरत…लगा तरुण ने मेरे पंख ही काट दिए और मैं धड़ाम से जमीन पर गिर गई हूं. मुझे बातबात पर परी का दरजा देने वाले ने मुझे अपनी औकात दिखा दी. मुझे अपने कंधों में पहली बार भयंकर दर्द महसूस होने लगा, जिन्हें तरुण ने सीढ़ी बनाया था, उन कंधों पर आज न तरुण की बांहें थीं और न ही पंख.
इधर मेरे घर न पहुंचने पर मांपापादादी परेशान हो उठे. पापा को इस बात की चिंता सताने लगी कि कहीं मेरे साथ कुछ गलत तो नहीं हुआ या मुझे कुछ हो तो नहीं गया. मोहन से पूछने पर उस ने कहा कि उसे नहीं पता सुमन कहां है और वह तो सुमन से कई दिनों से मिला भी नहीं है. मेरी सारी सहेलियों से भी पूछा जा कर, लेकिन सब का यही कहना था कि सुमन यहां नहीं आई है. किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि दोपहर की निकली रात के 10 बजे तक मैं कहां रह गई.
थकहार कर पापा पुलिस के पास जा ही रहे थे कि दरवाजे पर फटेहाल में मुझे देख सब की चीख निकल पड़ी. कुछ पूछते उस से पहले ही मैं बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ी. सब समझ चुके थे कि उन की बेटी के साथ कुछ गलत हुआ है, पर किस ने किया नहीं पता. होश आने पर जब मैं ने बताया कि मोहन ने मेरा बलात्कार किया तो सब सकते में आ गए क्योंकि वे सब मोहन को मेरा रक्षक समझते थे जो भक्षक निकला.
गुस्से के मारे पापा की आंखों से अंगारे बरस रहे थे.
मां की आंखों से तो आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. दादी भी माथा पीटते हुए बस रोए जा रही थीं. पापा पुलिस में मोहन के खिलाफ केस करने जा ही रहे थे कि दादी ने उन का हाथ पकड़ लिया और बोलीं कि इस से उन की बेटी की भी बदनामी होगी. फिर कौन करेगा सुमन से शादी? क्या उम्र भर बेटी को बैठा कर रख पाएंगे वे?
दादी के कहने पर पापा के कदम भले ही रुक गए पर उन का गुस्सा शांत नहीं हुआ. दुनिया का कोई भी बाप अपनी बेटी को दर्द से कराहते नहीं देख सकता और फिर पापा की तो मुझ में जान बसती थी. मुझे चोट लग जाती कभी तो पापा के मुंह से आह निकल पड़ती थी. पापा का तो मन कर रहा था गुंडे हायर कर उस मोहन की 1-1 हड्डी तुड़वा दें, जीवनभर के लिए उसे लंगड़ा बन दें.
इस हादसे ने मुझे डिप्रैशन में ला दिया. मेरा पढ़ाईलिखाई से मन हट गया. मेरा जो सपना था आईएएस बनने का वह भी कहीं खो गया.
मेरे साथसाथ घर के बाकी लोग भी तनाव के सैलाब में डूबने लगे. मेरी हालत देख पापा मुझे समझाने की कोशिश करते कि सबकुछ भूल कर मैं अपने सपने के बारे में सोचूं. लेकिन अब मेरा कोई सपना नहीं था. यहां तक कि किताबों से भी मुझे चिड़ होने लगी थी. इसी बीच दादी भी गुजर गईं तो मैं और टूट गई. मैं दादी के बहुत करीब थी. उन का जाना मेरे लिए दूसरा सदमा था. जीवन एकदम खालीखाली सा लगने लगा. दुनिया बेरंग लगने लगी मुझे. मन करता मर जाऊं या कहीं भाग जाऊं, इतनी दूर कि कोई मुझे ढूंढ़ न पाए. घर में हरदम चहकते रहने वाली मैं मुरझा सी गई थी. वही दृश्य मेरी आंखों के सामने नाचने लगता और मैं बिलख कर रो पड़ती. मुझे तो अपने शरीर से भी नफरत होने लगी थी. लगता कि अपने शरीर को ही नोच डालूं या तेल छिड़क कर इस में आग लगा दूं.
मेरी हालत देख पापा मुझे उस माहौल से दूर ले आए. उन्होंने अपना तबादला दिल्ली करवा लिया और एक कालेज में मेरा एडमिशन करवा दिया ताकि पढ़नेलिखने में मेरा मन लगा रहे. लेकिन मुझ से ठीक से पढ़ाईलिखाई नहीं हो पा रही थी.
वही बातें, वही दृश्य मेरी आंखों के सामने नाचने लगता और मैं फूटफूट कर रोने लगती. मेरी हालत देख कर पापा मुझे साइकेट्रिस्ट के पास ले गए. इलाज से फर्क पड़ा भी, लेकिन अब मैं आईएएस नहीं बनना चाहती थी, कुछ भी नहीं बनना चाहती थी. लेकिन क्या करना चाहती थी यह भी पता नहीं था. ग्रैजुएशन के बाद पापा के जोर देने पर एमबीए में एडमिशन ले लिया क्योंकि अगर मैं बिजी न रहती तो शायद खुद को खत्म कर लेती और मेरे बाद मेरे मांपापा का क्या होगा, यह सोच कर मैं खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करती. एमबीए के बाद दिल्ली की ही एक कंपनी में मेरी जौब लग गई. वहीं मेरी मुलाकात देवेन से हुई थी.
देवेन फ्लूट बहुत बढि़या बजाते थे. जब भी वह फ्लूट बजाते मैं उन की ओर खिंची चली आती थी. वे बातें भी बहुत बढि़या करते थे. उन का सौम्य, मितभाषी स्वभाव मेरे लिए रामबाण का काम करने लगा. उन के साथ रहते मैं नैगेटिव से पौजिटिव की ओर जाने लगी. मुझे अब दुनिया की हर चीज अच्छी लगने लगी. हमारी दोस्ती इतनी गहरी हो चुकी थी कि हम साथ औफिस जानेआने लगे थे. हमारी दोस्ती कब प्यार में बदल गई हमें पता ही नहीं चला.
एक रोज भी एकदूसरे को न देखना हमें बेचैन कर जाता था. फिर भी हम एकदूसरे से अपने मन की बात कहने से झिझक रहे थे.
याद है मुझे. वह 14 फरवरी का दिन था. देवेन ने मुझे कौफीहाउस में मिलने बुलाया था. लेकिन नहीं पता था कि उस ने मेरे लिए सरप्राइज पार्टी रखी है. सब के सामने घुटने के बल बैठ कर गुलाब दे कर उस ने मुझे प्रपोज करते हुए कहा था, ‘विल यू मैरी मी?’ और मैं ने हंसते हुए ‘हां’ बोल कर वह गुलाब स्वीकार कर लिया था. वहां बैठे सारे लोग तालियां बजाने लगे तो मैं शर्म के मारे लाल हो गई.
मेरी तरह देवेन भी अपने मांपापा के एकलौती संतान थे और उन के लिए भी अपने बेटे की खुशी से बढ़ कर और कुछ नहीं था. लेकिन मैं ने सोच लिया था कि मैं देवेन को किसी अंधेरे में नहीं रखूंगी. उसे अपने काले अतीत के बारे में सबकुछ सचसच बता दूंगी. लेकिन मां ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया. मैं ने कहा भी कि देवेन वैसे बिलकुल नहीं हैं. बहुत ही खुले विचारों वाले इंसान हैं. वे तो खुद बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने के पक्षधर हैं.
उस पर मां बोली थीं कि हां, वे मानती हैं कि देवेन में एक अच्छे पति बनने के सारे गुण हैं और वे इंसान भी सुलझे हुए हैं, लेकिन एक पति चाहे कितना भी अच्छा और सुलझा हुआ इंसान क्यों न हो, पर वह यह बात कतई बरदाश्त नहीं कर सकता कि उस की पत्नी का बलात्कार हो चुका है. किसी और ने उस के शरीर को छुआ है.
अगर मुझे देवेन के साथ एक अच्छी जिंदगी गुजारनी है तो मुझे अपने काले अतीत को हमेशा के लिए दफन करना ही होगा. मुझे अपनी दोस्त रचना की याद आ गई और लगा शायद, मां सही कह रही हैं.
देवेन के फ्लूट की आवाज ने मेरा ध्यान भंग किया तो मैं अपने अतीत से बाहर निकल आई. देवेन ने इशारों से कहा कि मैं भी उन के साथ आ कर खेलूं. न चाहते हुए भी मैं उन के खेल में शामिल हो गई. बच्चे काफी थक चुके थे. आते ही सो गए. मैं देवेन के सीने पर सिर रख यहांवहां की बातें करने लगी और वे उसी तरह मेरे बालों को सहलाते रहे. फिर पता नहीं कब मेरी आंखें लग गईं. सुबह जब देवेन ने बैड टी ले कर मुझे जगाया, तो मेरी नींद खुली. सुबह की चाय देवेन ही बनाते हैं. बच्चों को स्कूल भेज कर हम भी अपनेअपने औफिस के लिए निकल गए. इसी तरह हसतेमुसकराते हमारे जीवन के और कई साल निकल गए. अब तो बच्चे भी बड़े हो चुके थे. अतुल्य इस बार बोर्ड परीक्षा में बैठने वाला था और मिक्की 9वीं कक्षा पास कर 10वीं कक्षा में जाने वाली थी.
बच्चों के एग्जाम के बाद हमने दार्जिलिंग घूमने का प्रोग्राम बनाया और सोचा उधर से आते समय मांपापा से भी मिल लूंगी. पहले वे खुद हम से मिलने आ जाते थे या हम ही उन से मिल आते थे, मगर बच्चों की पढ़ाई, छुट्टी की कमी के कारण जल्दीजल्दी जाना नहीं हो पाता है अब. फोन पर ही बातें हो पाती हैं हमारी. मांपापा दोनों बीपी शुगर के पेशैंट हैं तो ज्यादा ट्रेवलिंग नहीं हो पाती उन से.
मुझे तो छुट्टी की कोई समस्या नहीं है, मगर देवेन की छुट्टी पास होगी या नहीं, इस बात की शंका थी. बच्चे कितने खुश हैं दार्जिलिंग घूमने को ले कर. लेकिन कहीं छुट्टी न मिलने से मजा किरकिरा न हो जाए. बच्चों का तो मूड ही औफ हो जाएगा.
मैं अपनी ही सोच में डूबी थी कि देवेन ने हिलाते हुए कहा, ‘‘छुट्टी सैंक्शन हो गई, चलने की तैयारी कर लो अब.’’
सुन कर मैं खुशी से झूम उठी कि मांपापा से कितने दिनों बाद मिलना होगा. रिटायरमैंट के बाद मांपापा फिर से गोरखपुर शिफ्ट हो गए थे क्योंकि वहां भी घर जगह-जमीन है.
मर्द गलती कर माफी मांगने को अपना हक समझता है, लेकिन औरत की एक गलती पर सजा देने को आतुर रहता है. मर्द पराई औरतों को घूर सकता है, सिगरेटशराब पी सकता है, शराब के नशे में पत्नी को पीट सकता है, बातबात पर उस के मायके वालों को कोस सकता है, लेकिन अगर यही सब एक औरत करे तो वह बदचलन, बदमाश और न जाने क्याक्या बन जाती है.
कहने को तो जमाना बदल रहा है, लोगों की सोच बदल रही है, पर कहीं न कहीं आज भी औरतें मर्दों की पांव की जूती ही समझी जाती हैं. उन की जगह पति के पैरों में होती है. लेकिन मैं जानती हूं, मेरे देवेन ऐसे नहीं हैं बल्कि उन का तो कहना है कि पति और पत्नी दोनों गाड़ी के 2 पहिए की तरह होते हैं, एकदम बराबर. लेकिन अगर मैं कहूं कि उस महिला की तरह कभी मेरा भी बलात्कार हुआ था, तो क्या देवेन इस बात को हलके से ले सकेंगे? कहने को भले ही कह दिया कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन पड़ता है. हर मर्द को पड़ता है.
जब एक धोबी के कहने पर मर्यादापुरुषोत्तम राम ने ही अपनी पत्नी सीता को घर से निकाल दिया था वह भी तब जब वह उन के बच्चे की मां बनने वाली थीं तो फिर देवेन पर मैं कैसे भरोसा कर लूं कि वे मुझे माफ कर देंगे? नहीं, मुझ में इतनी ताकत नहीं और इसलिए मैं ने अपना काला अतीत हमेशा के लिए अपने अंदर ही दफन कर लिया. भरेपूरे परिवार में मैं एकलौती बेटी थी. मैं घर में सब की प्यारी थी. दादी का प्यार, मां का दुलार और पापा का प्यार हमेशा मुझ पर बरसता रहता. लेकिन इस प्यार का मैं ने कभी नाजायज फायदा नहीं उठाया. पढ़ने में मैं हमेशा होशियार रही थी.
स्कूल में मेरे अच्छे नंबर आते थे. लेकिन औरों की तरह कभी मुझे डाक्टरइंजीनियर बनने का शौक नहीं रहा. मैं तो आईएएस बनना चाहती थी. जब भी किसी लड़की के बारे में पढ़ती या सुनती कि वह आईएएस बन गई, तो सोचती मैं भी आईएएस बनूंगी एक दिन.
दिनरात मेरी आंखों में बस एक ही सपना पलता कि मुझे आईएएस बनना है. पापा से बोल भी दिया था कि 12वीं कक्षा के बाद मैं यहां गोरखपुर में नहीं पढ़ूंगी. मुझे अपनी आगे की पढ़ाई दिल्ली जा कर करनी है. उस पर पापा ने कहा था कि जहां मेरा मन करे जा कर पढ़ाई कर सकती हूं, पर मेहनत करनी पड़ेगी क्योंकि आईएएस बनना कोई बच्चों का खेल नहीं है. उस पर मैं ने कहा था कि हां पता है मुझे और मैं खूब मेहनत करूंगी.
एक दिन जब मैं ने यह बात अपने दोस्त मोहन का बताया, जो की मेरे साथ मेरे ही क्लास में पड़ता था, तो उस का चेहरा उतर आया. कहने लगा कि वह मेरे जैसा पढ़ने में होशियार नहीं है. लेकिन उस का भी मन करता है दिल्ली जा कर पढ़ाई करने का. पढ़ाई क्या करनी थी, उसे तो बस मस्ती करने दिल्ली जाना था और यह बात उस के बाबूजी भी अच्छे से समझ रहे थे. तभी तो कहा था कि पैसे की बरबादी नहीं करनी है उन्हें. अभी 2-2 बेटियां ब्याहने को हैं और जब पता है कि लड़का पढ़ने वाला ही नहीं है, फिर गोबर में घी डालने का क्या फायदा.
उस की बात पर मुझे हंसी आ गई थी. सो छेड़ते हुए कह दिया, ‘‘हां, सही तो कह रहे हैं चाचाजी. गोबर में घी डालने का क्या फायदा. गोबर कहीं का. इस से तो अच्छा तू अपने बाबूजी का चूडि़यों का बिजनैस संभाल ले. पढ़ने से भी बच जाएगा और डांट भी नहीं पड़ेगी तुझे,’’ बोल कर मैं खिलखिला कर हंस पड़ी थी. लेकिन मुझे नहीं पता था कि मेरी बातें उसे इतनी बुरी लग जाएंगी कि वह मेरे साथ स्कूल जाना ही छोड़ देगा.
मोहन का और मेरा घर आसपास ही थे. उस की मां और मेरी मां की आपस में खूब बनती थी. हम दोनों साथ ही स्कूल आयाजाया करते थे. मोहन के साथ स्कूल जाने से मां के मन को एक तसल्ली रहती कि साथ में कोई है, रक्षक के तौर पर. लेकिन उस दिन की बात को ले कर मोहन मुझ से गुस्सा था. मुझे भी लगा, मैं ने गलत बोल दिया, ऐसे नहीं बोलना चाहिए था मुझे.
मैं उस से माफी मांगने उस के घर गई तो उस के सामने ही उस के मांबाबूजी उसे ताना मारते हुए कहने लगे कि एक सुमन को देखो, पढ़ने में कितनी होशियार है और एक तुम. किसी काम के नहीं हो.
मुझे बुरा भी लगा कि बेचारा, बेकार में डांट खा रहा है. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि इस बार अगर वह 12वीं कक्षा में पास नहीं हुआ, तो उसे चूडि़यों की दुकान पर बैठा देंगे. और हुआ भी वही. मोहन 12वीं कक्षा में फेल हो गया और वहीं मैं 96% अंक ला कर पूरे स्कूल में टौपर बन गई.
मेरे इतने अच्छे अंकों से पास होने पर मोहन मुझ से इतना जलभुन गया कि उस ने मुझ से बात करना ही छोड़ दिया. लेकिन इस में मेरी क्या गलती थी. फिर भी मैं उसे धैर्य बंधाती कि कोई बात नहीं, मेहनत करो, इस बार पास हो जाओगे.
मेरा दिल्ली के एक अच्छे कालेज में एडमिशन हो गया था और 2 दिन बाद ही मुझे दिल्ली के लिए निकलना था. इसलिए सोचा बाजार से थोड़ीबहुत खरीदारी कर लेती हूं. पीछे से किसी का स्पर्श पा कर चौंकी तो मोहन खड़ा था. वह मुझे देख कर मुसकराया तो मैं भी हंस पड़ी.
राहत की सांस ली कि अब यह मुझ से गुस्सा नहीं है. दोस्त रूठा रहे, अच्छा लगता है क्या?
‘‘क्या बात है बहुत खरीदारी हो रही है. वैसे क्याक्या खरीदा?’’
मेरे बैग के अंदर झांकते हुए उस ने पूछा, तो मैं ने कहा कि कुछ खास नहीं, बस जरूरी सामान है. वह कहने लगा कि अब तो मैं चली ही जाऊंगी इसलिए उस के साथ चाटपकौड़ी खाने चलूं. चाटपकौड़ी के नाम से ही मेरे मुंह में पानी आ गया और फिर मोहन जैसे दोस्त को मैं खोना नहीं चाहती थी. इसलिए बिना मांपापा को बताए उस के साथ चल पड़ी. एक हाथ से बैग थामे और दूसरा हाथ उस के कंधे पर रख मैं बस बोलती जा रही थी कि दिल्ली के अच्छे कालेज में मेरा एडमिशन हो गया और 2 दिन बाद जाना है. लेकिन मेरी बात पर वह बस हांहूं किए जा रहा था. उस ने जब अपनी बाइक चाटपकौड़ी की दुकान पर न रोक कर कहीं और मोड दी, तो थोड़ा अजीब लगा. टोका भी कि कहां ले जा रहे हो मुझे? तब हंसते हुए बोला कि क्या मुझे उस पर भरोसा नहीं है.
‘‘ऐसी बात नहीं है मोहन… वह मांपापा चिंता करेंगे न,’’ मैं ने कहा.
वह कहने लगा कि वह मुझे एक अच्छी जगह ले जा रहा है. लेकिन मुझे नहीं पता था कि मुझे ले कर उस की नीयत में खोट आ चुका है. वह हीनभावना से इतना ग्रस्त हो चुका था कि उस ने मुझे बरबाद करने की सोच ली थी. वह मुझे शहर से दूर एक खंडहरनुमा घर में ले गया और बोला कि इस घर से बाहर का नजारा बहुत ही सुंदर दिखता है. मैं ने कहा कि मुझे डर लग रहा है मोहन, चलो यहां से. लेकिन वह कहने लगा कि जब वह साथ है, तो डर कैसा.
जैसे ही हम खंडहर के अंदर गए और जब तक मैं कुछ समझ पाती उस ने मेरा मुंह दबा दिया और मेरे साथ यह कह कर वह मेरा बलात्कार करता रहा कि बहुत घमंड है न तुझे अपनी पढ़ाई पर. बड़ा आईएएस बनना चाहती हो तो देखते हैं कैसे बनती हो आईएएस. कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं छोड़ूंगा तुझे. वह मेरे शरीर को नोचता रहा और मैं दर्द से कराहती रही. मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस मोहन को मैं ने अपना भाई माना वह मेरे साथ ऐसा कर सकता है. उस ने मेरी दोस्ती का ही नहीं बल्कि मेरे विश्वास का भी गला घोंट दिया था. मेरा बलात्कार करने के बाद वह मुझे वहीं छोड़ कर भाग गया. मेरा सारा सामान मेरे सपनों की तरह बिखर चुका था. मैं उठ भी नहीं पा रही थी. किसी तरह खुद को घसीटते हुए कपड़ों को अपनी तरफ खींचा और अपने बदन को ढकने लगी.
‘‘मेरे पिता मेरी मां को बहुत प्यार करते थे. मां की अचानक मौत से वे इतने दुखी हुए कि उन्होंने खूब शराब पीनी शुरू कर दी. मैं बड़ी होने लगी थी, मुझ में अच्छेबुरे की समझ भी आने लगी थी.
‘‘पिता ने एक के बाद एक 4 शादियां कर डालीं. पहली 2 बीवियों को वे अपने दोस्तों को सौंपते रहे, जिस से तंग आ कर उन्होंने नदी में डूब कर जिंदगी खत्म कर ली.
‘‘तीसरी से शादी रचा कर उस के साथ भी वही बुरा काम वे करते रहे. उस ने बहुत समझाया, पर पिता नहीं माने. ‘‘एक दिन उस ने भी अपने मायके में जा कर खुदकुशी कर ली.
‘‘मेरे पिता पर उन की खुदकुशी करने का कोई असर नहीं पड़ा. पैसे के बल पर उन के खिलाफ कोई केस नहीं बन पाया.
‘‘चौथी औरत इतनी खूबसूरत थी कि अपने प्रेमभाव से मेरे पिता को वश में करते हुए उन की बुरी आदतें कई महीने तक छुड़ा दीं. तब मैं 15 साल की उम्र पार कर चुकी थी.
‘‘चौथी मां भी मुझे अपनी सगी बेटी की तरह प्यार करती थी. 3 साल तक वह मुझे पालती रही, लेकिन उसे कोई ऐसी खतरनाक बीमारी लगी कि मर गई.
‘‘मेरे जल्लाद पिता फिर से शराब पीने लगे, बाजारू औरतों को घर में बुला कर ऐयाशी करने लगे. मैं अकसर देखती, तो आंखें बंद कर लेती.
‘‘उन के दोस्त भी अकसर घर पर आ कर शराब पीते और औरतों से ऐश करते. उन की गिद्ध जैसी नजरें मुझे भी देखतीं, मानो मौका पाते ही वे मुझे भी नहीं छोड़ेंगे.
‘‘मैं उन से दूर रहती थी. उन से बचने के लिए अकसर रात को अपनी सहेलियों के यहां सो जाती थी.
‘‘एक दिन मेरे पिता नशे में चूर किसी नाचगाने वाली के यहां से लौटे थे. उन की निगाह मुझ पर पड़ी. मैं मैक्सी पहने सो रही थी. शायद मेरा कपड़ा कुछ ज्यादा ही ऊपर तक खिसक गया था.
‘‘नशे में चूर वे अपने खून की ममता भूल गए और मेरे पलंग पर आ बैठे. छेड़ते हुए मेरे जिस्म को सहलाने लगे.
‘‘मेरी नींद खुली, तो वे बोले, ‘लेटी रहो. बिलकुल अपनी मां की सूरत पाई है तुम ने, कोई फर्क नहीं. उस की याद आ गई, तो तुम्हें गौर से देखने लगा.’
‘‘उस के बाद मैं ने बहुत हाथपैर पटके, पर वे नहीं माने. उन्होंने मुझे अपनी हवस का शिकार बना डाला. मैं बहुत रोई, लेकिन उन पर कोई असर नहीं पड़ा.
‘‘उस दिन के बाद से वे अकसर मेरे साथ वही कुकर्म करते रहे. मैं उन के खिलाफ किस से क्या फरियाद करती. 2 बार खुदकुशी करने की कोशिश की, पर बचा ली गई.’’
इतना कह कर रेशमा रोने लगी. विजय चाहता था कि उस के रो लेने से उस का मन शांत हो जाएगा. सालों की आग जो दिल में छिपाए उसे तपा रही थी, आंसू बन कर निकल जाएगी.
‘‘मेरी शादी आप के यहां इसलिए खूब दहेज दे कर कर दी गई, जिस से सब का मुंह बंद रहेगा. मुझे शादी के चौथे दिन बाद उस पिता ने बुलवा लिया. उस का पाप मेरी कोख में पलने लगा था. अगर उजागर हो जाता, तो उस की बदनामी होती. मेरा पेट गिरवा दिया गया.
डेढ़ महीने बाद ठीक हुई, तो मुझ फिर यहां पटका गया, ताकि जिंदगीभर उस कलंक को छिपा कर रखूं. ‘‘मैं नहीं चाहती कि मेरे इस पाप की छाया आप जैसे अच्छे इनसान पर पड़े. आप मुझे दासी समझ कर यहां पड़ी रहने दीजिए.
‘‘अगर आप ने मुझे घर से निकाल दिया, तो मेरे पिता आप को और आप के घर वालों पर मुकदमा चला कर परेशान कर डालेंगे. आप चुपचाप दूसरी शादी कर लें, मेरे पिता आप लोगों के खिलाफ कुछ नहीं कर पाएंगे. जब मैं चुप रहूंगी, तो कोई कोर्ट मेरे पिता की आवाज नहीं सुनेगा,’’
इतना कह कर रेशमा विजय के पैरों पर गिर पड़ी. ‘‘तुम ने अपनी आपबीती बता कर अपने मन को हलका कर लिया. समझ लो कि तुम्हारे साथ अनजाने में जो हुआ, वह एक डरावना सपना था.
‘‘मैं तुम्हारे दर्द को महसूस करता हूं. उठो, रेशमा उठो, तुम ने कोई पाप नहीं किया. तुम्हारी जगह मेरे दिल में है. तुम्हारी चुनरी का दाग मिट गया. ‘‘आज से तुम्हारी जिंदगी का नया सवेरा शुरू हुआ, जो अंत तक सुखी रखेगा,’’ कहते हुए विजय ने उसे उठाया, उस की आंखें पोंछीं और सीने से लगा लिया.
रेशमा भी विजय का प्यार पा कर निहाल हो गई.