पीछा करता डर : पीठ में छुरा भाग – 1

नंदन माथुर और भानु प्रकाश दोनों बड़े बिजनेसमैन थे. साथ खानेपीने और ऐश करने वाले. भानु विदेश गया तो एक जैसे 2 मोबाइल ले आया. एक अपने लिए दूसरा दोस्त के लिए. लेकिन नंदन ने उस का तोहफा नहीं लिया. फिर भानु ने उसी मोबाइल को हथियार बना कर नंदन को ऐसा नाच नचाया कि…

उस रात सर्दी कुछ ज्यादा ही थी. लेकिन आम लोगों के लिए, अमीरों के लिए नहीं. अमीरों की वह ऐशगाह भी शीतलहर से महरूम थी, जिस का रूम नंबर 207 शराब और शबाब की मिलीजुली गंध से महक रहा था.

इस कमरे में नंदन माथुर ठहरे थे. पेशे से एक्सपोर्टर. लाखों में खेलने वाले इज्जतदार इंसान.

रात के पौने 9 बजे थे. कैनवास शूज से गैलरी के मखमली कालीन को रौंदता हुआ एक व्यक्ति रूम नंबर 207 के सामने पहुंचा. आत्मविश्वास से भरपूर वह व्यक्ति कीमती सूट पहने था. उस ने पहले ब्रासप्लेट पर लिखे नंबर पर नजर डाली और फिर विचित्र सा मुंह बनाते हुए डोरबेल का बटन दबा दिया.

दरवाजा खुलने में 5 मिनट लगे. कमरे के अंदर लैंप शेड की हलकी सी रोशनी थी, जिस में दरवाजे से अंदर का पूरा दृश्य देख पाना संभव नहीं था1 अलबत्ता कमरे के बाहर गैलरी में पर्याप्त प्रकाश था.

नंदन माथुर सर्दी के बावजूद मात्र बनियान व लुंगी पहने थे. उन के बाल भीगे थे और ऐसा लगता था, जैसे बाथरूम से निकल कर आ रहे हों. दरवाजे पर खड़े व्यक्ति को देख नंदन का समूचा बदन कंपकंपा कर रह गया. उन्होंने घबराए स्वर में कहा, ‘‘भानु तुम! इस वक्त…’’

‘‘ऐसे आश्चर्य से क्या देख रहे हो? मैं भूत थोड़े ही हूं,’’ सूटवाला कमरे में प्रवेश कते हुए बोला, ‘‘मैं भी इसी होटल में ठहरा हूं. कमरा नंबर 211 में. अकेला बोर हो रहा था, सो चला आया.’’

‘‘वो तो ठीक है, लेकिन…’’ नंदन माथुर दरवाजा खुला छोड़ कर भानु के पीछेपीछे चलते हुए बोले.

‘‘लेकिन वेकिन बाद में करना, पहले दरवाजा बंद कर के कपड़े पहन लो. सर्दी बहुत तेज है. सर्दी में पैसे और बदन की गरमी भी काम नहीं करती दोस्त,’’ भानु कुर्सी पर बैठते हुए व्यंग्य से बोला, ‘‘इतनी ठंड में नहा रहे थे. लगता है, पैसे की गरमी कुछ ज्यादा ही है तुम्हे.’’

नंदन की टांगे थरथरा रही थीं. कुर्सी पर पड़ा तौलिया उठा कर गीले बाल पोंछते हुए उन्होंने सशंकित स्वर में पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहां ठहरा हूं.’’

‘‘चाहने वाले कयामत की नजर रखते है दोस्त,’’ भानु ने उठ कर दरवाजे की ओर बढ़ते हुए व्यंग्य किया, ‘‘आया हूं, तो थोड़ी देर बैठूंगा भी. तुम कपड़े पहन लो. फिर आराम से सवाल करना.’’

भानु ने दरवाजा बंद किया, तो नंदन माथुर का दिल धकधक करने लगा. नंदन चाहते थे कि भानु किसी भी तरह चला जाए, जबकि भानु जाने के मूड में कतई नहीं था. मजबूरी में नंदन ने गर्म शाल लपेटा और भानु के सामने आ बैठे. उन के चेहरे पर अभी भी हवाइयां उड़ रही थीं. बैठते ही उन्होंने लड़खड़ाती आवाज में पूछा, ‘‘तुम्हें पता कैसे चला, मैं यहां ठहरा हूं?’’

‘‘इत्तफाक ही समझो,’’ भानु ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘वरना तुम ने किलेबंदी तो बड़ी मजबूत की थी, अशरफ खान साहब उर्फ नंदन माथुर’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब कुछ नहीं यार! मैं ने पार्किंग में तुम्हारी गाड़ी खड़ी देखी तो समझा, तुम ठहरे होगे. रिसेप्शन से पता किया तो रजिस्टर में तुम्हारा नाम नहीं था. मैं ने सोचा 2 बजे तक तो तुम औफिस में थे. उस के बाद ही आए होगे. यहां 4-5 बजे पहुंचे होगे.

मैं ने रिसेप्शनिस्ट से 4 बजे के बाद आने वाले कस्टमर्स के बारे में पता किया तो पता चला, केवल एक मुस्लिम दंपत्ति आए हैं, जो कमरा नंबर 207 में ठहरे हैं. मैं सोच कर तो यही आया था कि इस कमरे में अशरफ खान और नाजिया खान मिलेंगे, लेकिन दरवाजा खुला तो नजर आए तुम… तुमने और भाभी ने धर्म परिवर्तन कब किया नंदन?’’

नंदन माथुर का चेहरा सफेद पड़ गया. जवाब देते नहीं बना. उन्हें चुप देख भानु इधरउधर ताकझांक करते हुए मुसकरा कर बोला, ‘‘लेकिन भाभी हैं कहां? कहीं बाथरूम में तो नहीं हैं? बाथरूम में हों तो बाहर बुला लो. ठंड बहुत है, कुल्फी बन जाएंगी.’’

‘‘फिलहाल तुम जाओ भानु. प्लीज डोंट डिस्टर्ब मी. हम सुबह बात करेंगे.’’ नंदन माथुर ने कहा तो भानु पैर पर पैर रख कर कुरसी पर आराम से बैठते हुए बोला, ‘‘मैं जानता हूं नंदन. बाथरूम में भाभी नहीं, बल्कि वो है, जिस के लिए तुम ने अपनी पहचान तक बदल डाली. फिर भी इतने रूखेपन से मुझे जाने को कह रहे हो. यह जानते हुए भी कि मैं बाहर गया तो तुम्हारा राज भी बाहर चला जाएगा.’’

‘‘तुम क्या चाहते हो?’’ नंदन ने आवाज थोड़ी तीखी करने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा.

भानु मुस्कराते हुए बोला, ‘‘इस राज को शराब के गिलास में डुबो कर गले से नीचे उतार लेना चाहता हूं… तुम्हारी इज्जत की खातिर. तुम्हारे परिवार की खातिर. बस इस से ज्यादा कुछ नहीं चाहता मैं.’’

‘‘यह मेरा व्यक्तिगत मामला है. मैं तुम्हें धक्के दे कर भी बाहर निकाल सकता हूं.’’ नंदन ने गुस्से में खड़े होते हुए कहा, तो भानु उसे बैठने का इशारा करते हुए धीरे से बोला, ‘‘धीर गंभीर व्यक्ति को गुस्सा नहीं करना चाहिए. जरा सोचो, तुम ने मुझे धक्के दे कर निकाला तो मैं चीखूंगा.

‘‘चीखूंगा तो वेटर आएंगे. मैंनेजर आएगा. कस्टमर आएंगे. जब उन्हें पता चलेगा कि मैं तुम्हारे कमरे में जबरन घुसा था तो वे पुलिस को बुलाएंगे.

‘‘पुलिस मुझ से पूछताछ करेगी. जाहिर है, मैं अपने बचाव के लिए नंदन माथुर उर्फ अशरफ खान की पूरी कहानी बता दूंगा. पुलिस से बात पत्रकारों तक पहुंचेगी और फिर अखबारों के जरीए यह खबर सुबह तुम से पहले तुम्हारे घर पहुंच जाएगी. खबर होगी एक्सपोर्टर नंदन माथुर होटल में अय्याशी करते मिला. मेरा ख्याल है, तुम ऐसा कतई नहीं चाहोगे.’’

पलभर में ही नंदन की सारी अकड़ ढीली पड़ गई. उन्होंने बैठते हुए थकी सी आवाज में पूछा, ‘‘क्या चाहते हो तुम?’’

‘‘सिर्फ दो पैग ह्विस्की पीनी है, तुम्हारे और उस के साथ.’’

‘‘ह्विस्की नहीं है मेरे पास.’’ नंदन ने रूखे स्वर में कहा, तो भानु इधरउधर तांकझांक करते हुए बोला, ‘‘क्यों झूठ बोलते हो यार. पूरा कमरा तो महक रहा है.’’

तेजतर्रार तिजोरी : रघुवीर ने अपनी बेटी का नाम तिजोरी क्यों रखा – भाग 1

बचपन में उस गेहुंए रंग की देहाती बाला का नाम तिजोरी रख दिया गया था. समय के साथसाथ वह निखरती चली गई और अब वह 16 सावन देखते हुए इंटर पास करने के बाद अपने पिता रघुवीर यादव का कामकाज देखती है. उस का तिजोरी नाम इसलिए रख दिया गया था कि उस के खेतिहर किसान पिता रघुवीर यादव ने चोरीडकैती के डर से उस के जन्म होने वाले दिन ही लोहे की मजबूत तिजोरी खरीद कर अपने घर के बीच वाले कमरे की मोटी दीवार में इतनी सफाई से चिनवाई थी कि दीवार देख कर कोई समझ नहीं सकता था कि उस दीवार में तिजोरी भी हो सकती है.

अनाज उपजाने के साथसाथ रघुवीर यादव की मंडी में आढ़त भी थी और छोटे  किसानों की फसलों को कम दामों में खरीद कर ऊंचे दामों पर बेचने का हुनर उन्हें मालूम था. उन का बेटा महेश, तिजोरी से 3 साल छोटा था. पढ़ाई से ज्यादा महेश का मन गुल्लीडंडा और कंचे खेलने में लगता था. पेड़ों पर चढ़ कर आम तोड़ने में भी उसे मजा आता था. इस के उलट तिजोरी को तीसरी जमात में ही 20 तक के सारे पहाड़े याद हो गए थे. 12वीं जमात तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि उस ने गणित में 100 में से 99 नंबर न पाए हों और सभी विद्यार्थियों को पछाड़ कर वह फर्स्ट डिवीजन न आई हो.

यही वजह थी कि दिनभर की सारी कमाई का हिसाब रघुवीर यादव ने 10वीं पास करते ही तिजोरी को सौंप दिया था. तिजोरी को उस लोहे की तिजोरी के

तीनों खानों की खबर थी कि कहां क्या रखा है.

रकम बढ़ी, तो रघुवीर यादव ने जेवरों को गिरवी रखने का काम भी शुरू कर दिया था और इस का लेखाजोखा भी तिजोरी के पास था.

12वीं जमात के बाद उस गांव में डिगरी कालेज खुलने की बात तो कई बार उठी, पर अभी तक खुल नहीं पाया था और इस के चलते तिजोरी की आगे की पढ़ाई न हो सकी.

घर के काम में मां का हाथ बंटाने के साथ खेतखलिहान और हाट बाजार का जिम्मा भी तिजोरी के पास था. पहले तो वह अकेली ही पूरे गांव में अपने काम से घूमती रहती थी, फिर जब महेश  बड़ा हुआ तो उस को साथ ले कर  अपने खेतों में गुल्लीडंडा खेलने या महेश के संगीसाथियों के साथ खेलने निकल जाती.

तिजोरी की हरकतें देख कर कोई अनजान आदमी सोच भी नहीं सकता था कि वह 5 फुट, 2 इंच की लड़की 12वीं जमात पास कर चुकी है.

उन्हीं दिनों गांव में नए पावर हाउस बनाने और ऊंचे खंभे गाड़ कर उन पर बिजली के तार कसने का काम करने के लिए कौंट्रैक्टर सुनील के साथ शहर से कुछ अनुभवी व हलकेफुलके तकनीकी काम जानने वाले मजदूरों ने उस गांव में डेरा डाला.

वे सभी हाईस्कूल या इंटर तो पास थे ही और बिजली महकमे द्वारा ट्रेंड भी थे, पर नौकरी पक्की नहीं थी. एक दिन तिजोरी महेश के साथ गेहूं की कट चुकी फसल को बोरियों में भरवा कर खेत के पास ही बने अपने पक्के गोदाम में रखवाने घर से निकल कर जा रही थी, तो रास्ते में पड़ने वाले आम के पेड़ के पास रुक गई.

2 मोटीमोटी चोटियां और लंबी सी 2 जेब वाली फ्रौक पहने तिजोरी ने पहले तो 3-4 बार उछल कर सड़क की तरफ वाली पेड़ की झुकी डालियों से आम तोड़ने की कोशिश की और जब उसे लगा कि उस की पहुंच आमों तक नहीं हो पा रही है, तो उस ने महेश को पेड़ पर चढ़ा दिया.

ऊपर से जब महेश ने आम तोड़तोड़ कर नीचे फेंकने शुरू किए तो हर फेंके हुए आम को तिजोरी ने ऐसे कैच किया मानो कोई क्रिकेट का मैच चल रहा हो और उस से कहीं कोई कैच न छूट जाए.

बिजली के खंभों और तारों को एक ट्रैक्टरट्रौली में लदवा कर उस पेड़ के पास से गुजरते हुए असिस्टैंट श्रीकांत और दूसरे मजदूरों के साथसाथ जब कौंट्रैक्टर सुनील की नजर तिजोरी पर पड़ी, तो उस ने ट्रैक्टर को वहीं रुकवा दिया और गौर से उस के गंवारू पहनावे को देख कर बोला, ‘‘ऐ छोकरी, आज जितने आम तोड़ने हैं तोड़ ले, कल तो यहां पर इस पेड़ को काट कर खंभा गाड़ दिया जाएगा.’’

महेश को पेड़ से उतरने का इशारा करते हुए तिजोरी एकदम से सुनील की तरफ घूमी और बोली, ‘‘मेरा नाम छोकरी नहीं तिजोरी है, तिजोरी समझे. और बिजली के खंभे गाड़ने आए हो, तो सड़क के किनारे गाड़ोगे या किसी के खेत में घुस जाओगे.’’

‘‘अब यह पेड़ बीच में आ रहा है, तो इसे तो रास्ते से हटाना होगा न,’’ सुनील ने समझाना चाहा, तो तिजोरी बोली, ‘‘तुम गौर से देखो, तो पेड़ सड़क से 5 मीटर दूर है… हां, आमों से लदी 5-7 डालियां जरूर सड़क के पास तक आ रही हैं तो तुम पूरा पेड़ कैसे काट दोगे. मैं तो ऐसा नहीं होने दूंगी.’’

इतना कहते हुए तिजोरी ने आखिरी कैच करे कच्चे आम को भी अपने फ्रौक की जेब में ठूंसा और महेश के साथ अपने खेत की तरफ दौड़ पड़ी.

तिजोरी के जाते ही श्रीकांत बोला, ‘‘सुनील सर, वह छोकरी कह तो सही रही थी और मैं समझता हूं कि इस आम के पेड़ का मोटा तना 5 मीटर दूर ही होगा और हमारे खंभे गाड़ने में आड़े नहीं आएगा.’’

सुनील तिजोरी को दूर तक जाते हुए देखता रहा, फिर वह दोबारा ट्रैक्टर पर चढ़ कर उसी दिशा में बढ़ गया, जिधर तिजोरी गई थी और जहां बिजली महकमे ने अपना स्टोर बना रखा था.

एक बड़े गोदाम की ऊंची दीवार से सटी खाली पड़ी सरकारी जमीन पर कांटे वाले तारों से एक खुली जगह को चौकोर घेर कर खुले में टैंपरेरी स्टोर बना लिया गया था.

बिजली के खंभे, गोलाई में लिपटे मोटे एलुमिनियम तार के बड़े गुच्छे, लोहे के एंगल व चीनी मिट्टी के बने कटावदार हैंगर वगैरह सामान का वहां स्टौक किया जा रहा था. पास में ही इस गांव से दूसरे गांव को जाने वाली मेन सड़क थी.

खेतों के बीच से होती हुई पीछे के गांव से आने वाले हाई टैंशन 440 वोल्ट की बिजली को पहले तो गांव में सप्लाई के लायक बनाने के लिए वहीं पास में बड़ा ट्रांसफार्मर लगा कर पावर हाउस बनाना था और उस पावर हाउस से बिजली के खंभे की मदद से उस गांव के बचे हुए बहुत सारे घरों तक बिजली पहुंचानी थी.

रघुवीर यादव के खेतों की सीमा भी स्टोर के पास आ कर मिलती थी. तिजोरी महेश के साथ जब मेन रास्ता छोड़ कर मेंड़ों पर चलती हुई अपने खेतों में पहुंची, तो मजदूर गेहूं की फसल काट कर गट्ठर बनाबना कर वहां पहुंचा रहे थे, जहां बालियों से दाने अलग और भूसा अलग किया जा रहा था.

तिजोरी को देख कर कुछ अधेड़ मजदूर चिल्लाए, ‘वह देखो मालकिन आ गईं.’

महेश के साथ कच्चे आमों की खटास का मजा लेती हुई तिजोरी एक मजदूर के पास आ कर रुक गई. वह बोली. ‘‘काका, यह तुम्हारे साथ मुस्टंडा सा लड़का कौन है? इसे मैं आज पहली बार देख रही हूं.’’

‘‘बिटिया, आज से मेरी जगह यही काम करेगा. यह मेरे ही गांव का है शंभू. मेरा भतीजा लगता है. जवान है और तेजी से काम कर लेगा. मुझे एक हफ्ते के लिए अपनी पत्नी को ले कर ससुराल जाना है. फसल काटने का समय है. ऐसे में एकएक दिन की अहमियत मैं समझता हूं.’’

शंभू लगातार उसे अजीब सी निगाहों से घूरे जा रहा था. तिजोरी को उस का यों घूरना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. वह बोली, ‘‘ठीक है काका, तुम जाओ, लेकिन अपने भतीजे को भी साथ ले जाओ. मुझे जरूरत पड़ेगी तो दूसरा इंतजाम कर लूंगी.’’

इतना कह कर दूसरे मजदूरों को तेज हाथ चलाने का निर्देश देते हुए तिजोरी आगे बढ़ गई. अगले खेत के गेहूं गट्ठर, बाली से दाना व भूसा निकलने वाली मशीन तक पहुंच चुके थे. काका उसी समय शंभू को ले कर चले गए. वे जानते थे कि तिजोरी बिटिया की इच्छा के बिना यहां कोई मजदूरी नहीं कर सकता.

शंभू काका के साथ वापस जाते हुए पीछे मुड़मुड़ कर दूर जाती तिजोरी को देखता रहा, पर वह अपनी ही धुन में कच्चे आमों का स्वाद लेती हुई अगले खेतों की तरफ बढ़ती जा रही थी.

तिजोरी ने चारों खेतों और एक खेत के कोने में चलती मशीन को देख कर समझ लिया कि काम ठीक से चल रहा है, लेकिन अभी खेतों को बिलकुल साफ होने और गेहूं व भूसे की बोरियों को ढंग से गोदाम पहुंचा कर रखने में कम से कम 2 से 3 दिन और लगेंगे.

निश्चिंत हो कर तिजोरी महेश से बोली, ‘‘तू यहीं रुक. मैं गोदाम से पानी पी कर आती हूं और लौटते में गुल्लीडंडा भी लेती आऊंगी. तू तब तक उस

खाली खेत में छोटा गड्ढा खोद कर गुच्ची बना कर रख, मैं अभी आई,’’ कहते हुए तिजोरी अपने खेतों के बीच होते हुए उस कोने में पहुंच गई, जहां एक पक्का गोदाम बना था. सवेरे साढ़े 10 बज चुके थे.

अपनी फ्रौक की जेब से चाभी का गुच्छा निकाल कर तिजोरी ने गोदाम के शटर के दोनों ओर लगे ताले खोल कर शटर उठाना शुरू ही किया था कि उस की नजर गोदाम की दीवार से सटा कर कांटेदार तारों से घेर कर बनाए हुए बिजली महकमे के उस स्टोर पर पड़ी, जहां श्रीकांत स्टौक चैक कर रहा था और कौंट्रैक्टर सुनील अपने जरूरी रजिस्टर के पन्ने पलट रहा था.

आधा शटर ऊपर उठा कर तिजोरी रुक गई, फिर गोदाम की शटर वाली दीवार के कोने पर जा कर उस ने उस खुले स्टोर में झांका.

श्रीकांत की नजर जब तिजोरी पर पड़ी,तो उस ने अपने बौस को इशारा किया. चूंकि सुनील की पीठ तिजोरी की तरफ थी, इसलिए इशारा पा कर वह पलटा और उसे देख कर दंग रह गया.

अपने रजिस्टर वहीं रख कर और श्रीकांत को स्टौक चैक करते रहने की कह कर सुनील तिजोरी के करीब आया और एक अजीब सी उमंग में भर कर बोला, ‘‘तुम यहां…?’’

‘‘हां, यह जिस दीवार से सटा कर तुम ने अपना स्टोर बनाया है, यह गोदाम मेरे पिताजी का है और इस के आसपास के चारों खेत भी हमारे ही हैं.’’

‘‘पर, तुम यहां क्या करने आई हो?’’

‘‘मैं तो गोदाम से अपना गुल्लीडंडा निकालने आई थी, फिर प्यास भी लग रही थी तो सोचा कि पानी भी पी आऊं.’’

‘‘तो तुम्हारे गोदाम में प्यास बुझाने का भी इंतजाम है?’’ कहने के साथसाथ सुनील उस की देह को घूरने लगा.

तिजोरी बोली, ‘‘लगता है, शादी नहीं हुई अभी तक. जिस प्यास को तुम बुझाना चाह रहे हो उस के लिए तुम्हें कोई दूसरा दरवाजा खटखटाना पड़ेगा.’’

सुनील तिजोरी के शब्द सुन कर चौंक गया. गांव की यह गंवार सी दिखने वाली लड़की को एक पल भी नहीं लगा उस का इरादा समझने में.

सुनील ने तो सुन रखा था कि गांव की भोलीभाली लड़कियों को तो अपने प्रेमजाल में फंसा लेना बहुत आसान  होता है.

खुल गई आंखें : रवि के सामने आई कैसी हकीकत- भाग 1

दफ्तर से अपने बड़े सरकारी बंगले पर जाते हुए उस दिन अचानक एक ट्रक ने रवि की कार को जोरदार टक्कर मार दी थी. कार का अगला हिस्सा बुरी तरह से टूटफूट गया था.

खून से लथपथ रवि कार के अंदर ही फंसा रह गया था. वह काफी समय तक बेहोशी की हालत में कार के अंदर ही रहा, पर उस की जान बचाने वाला कोई भी नहीं था.

हां, उस के आसपास तमाशबीनों की भीड़ जरूर लग गई थी. सभी एकदूसरे का मुंह ताक रहे थे, पर किसी में उसे अस्पताल ले जाने या पुलिस को बुलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

भला हो रवि के दफ्तर के चपरासी रामदीन का, जो भीड़ को देख कर उसे चीरता हुआ रवि के पास तक पहुंच गया था. बाद में उसी ने पास के एसटीडी बूथ से 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को बुला लिया था.

जब तक पुलिस रवि को ले कर पास के नर्सिंगहोम में पहुंची तब तक उस के शरीर से काफी खून बह चुका था. रामदीन काफी समय तक अस्पताल में ही रहा था. उस ने फोन कर के दफ्तर से सुपरिंटैंडैंट राकेश को भी बुला लिया था जो वहीं पास में रहते थे.

रवि के एक रिश्तेदार भी सूचना पा कर अस्पताल पहुंच गए थे. गांव दूर होने व बूढ़े मांबाप की हालत को ध्यान में रखते हुए किसी ने उस के घर सूचना भेजना उचित नहीं समझा था. वैसे भी उस के गांव में संचार का कोई खास साधन नहीं था. इमर्जैंसी में तार भेजने के अलावा और कोई चारा नहीं होता था.

रवि की पत्नी गुंजा अपने सासससुर व देवर रघु के साथ गांव में ही रहती थी. वह 2 साल पहले ही गौना करा कर अपनी ससुराल आई थी. रवि के साथ उस की शादी बचपन में तभी हो गई थी, जब वे दोनों 10 साल की उम्र भी पार नहीं कर पाए थे.

गांव में रहने के चलते गुंजा की पढ़ाई 8वीं जमात के बाद ही छूट गई थी पर रवि 5वीं जमात पास कर के अपने चाचा के पास शहर में ही पढ़ने आ गया था. उस ने अच्छीखासी पढ़ाई कर ली थी. शहर में पढ़ाई करने के चलते उस का मन चंचल हो गया था. वैसे भी वह गुंजा से हर मामले में बेहतर था.

शादी के समय तो रवि को कोई समझ नहीं थी, पर जब गौने के बाद विदा हो कर गुंजा उस के घर आई थी और पहली बार जवान और भरपूर नजरों से उस ने उसे देखा था तभी से उस का मन उस से उचट गया था.

गुंजा कामकाज में भी उतनी माहिर नहीं थी जितनी रवि ने अपनी पत्नी से उम्मीद की थी. यहां तक कि सुहागरात के दिन भी वह गुंजा से दूर ही रहा था.

गुंजा गांव की पलीबढ़ी लड़की थी. शक्लसूरत और पढ़ाईलिखाई में कम होने के बावजूद मांबाप से उसे अच्छे संस्कार मिले थे. उस ने रवि की अनदेखी के बावजूद उस के बूढ़े मांबाप और रवि के छोटे भाई रघु का साथ कभी नहीं छोड़ा.

मांबाप के लाख कहने के बावजूद रवि जब उसे अपने साथ शहर ले जाने को राजी नहीं हुआ तब भी उस ने उस से कोई खास जिद नहीं की, न ही अकेले शहर जाने का उस ने कोई विरोध किया.

शहर में आ कर रवि अपने दफ्तर और रोजमर्रा के कामों में ऐसा बिजी हुआ कि गांव जाना ही भूल गया. उसे अपने मांबाप से भी कुछ खास लगाव नहीं रह गया था क्योंकि वह अपनी बेढंगी शादी के लिए काफी हद तक उन्हीं को कुसूरवार मानता था.

तनख्वाह मिलने पर घर पर पैसा भेजने के अलावा रवि कभीकभार चिट्ठी लिख कर मांबाप व भाई का हालचाल जरूर पूछ लेता था, पर इस से ज्यादा वह अपने घर वालों के लिए कुछ भी नहीं कर पाता था.

3-4 दिन आईसीयू में रहने के बाद अब रवि को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया था. दफ्तर के अनेक साथी तन, मन और धन से उस की सेवा में लगे हुए थे. बड़े साहब भी लगातार उस की सेहत पर नजर रखे हुए थे.

नर्सिंगहोम में जहां सीनियर सर्जन डाक्टर अशोक लाल उस के इलाज पर ध्यान दे रहे थे, वहीं वह वहां की सब से काबिल नर्स सुधा चौहान की चौबीसों घंटे की निगरानी में था.

सुधा चौहान जितना नर्सिंगहोम के कामों में माहिर थी, उतना ही सरल उस का स्वभाव भी था. शक्लसूरत से भी वह किसी फिल्मी नर्स से कम नहीं थी. उस की रातदिन की सेवा और बेहतर इलाज के चलते रवि को जल्दी ही होश आ गया था.

उस समय सुधा ही उस के पास थी. उसे बेचैन देख कर सुधा ने सहारा दिया और उस के सिरहाने तकिया रख दिया. अगले ही पल नर्स सुधा ने शीशी से एक चम्मच दवा निकाल कर आहिस्ता से उस के मुंह में डाल दी

रवि कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहता था, पर पूरे चेहरे पर पट्टी बंधी होने के चलते वह कुछ भी कह पाने में नाकाम था. सुधा ने हलकी मुसकान के साथ उसे इशारेइशारे में चुप रहने को कहा.

सुधा की निजी जिंदगी भी बहुत खुशहाल नहीं थी. उस का पति मनीष इस दुनिया में नहीं था. उस की रिया नाम की 5 साल की एक बेटी थी जो उस के साथ ही रहती थी.

बेरुखी : पति को क्यों दिया ऐश्वर्या ने धोखा – भाग 1

नरेश की लाश 2 दिनों बाद एक कुएं से बरामद हुई थी. दुर्गंध फैली थी, तब लोगों को पता चला था कि कुएं में लाश पड़ी है. उस के बाद पुलिस को सूचना दी गई थी. नरेश की पत्नी ऐश्वर्या ने उस की गुमशुदगी दर्ज करा रखी थी. नरेश शहर का जानामाना व्यवसायी था. पिता की मौत के बाद सारा कारोबार वही संभाल रहा था, जिस की वजह से वह काफी व्यस्त रहता था. वह सुबह घर से निकलता था तो रात 10 बजे से पहले लौट नहीं पाता था.

नरेश की पत्नी ऐश्वर्या को परिवार वालों ने स्वीकार नहीं किया था, इसलिए वह उसे ले कर शहर के सब से महंगे इलाके में फ्लैट ले कर अलग रह रहा था. ऐश्वर्या बेहद खूबसूरत थी. शादी के अभी एक साल ही बीते थे कि यह हादसा हो गया था. लाश बरामद होने के बाद पुलिस ऐश्वर्या से पूछताछ करने पहुंची तो पहला सवाल यही किया, ‘‘आप को किसी पर शक है?’’

‘‘नहीं.’’ सुबकते हुए ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘याद कीजिए, आप के पति का कभी किसी से लेनदेन को ले कर विवाद तो नहीं हुआ था, जिस का उन्होंने आप से जिक्र किया हो?’’

‘‘वह व्यवसाय की बातें घर पर बिलकुल नहीं करते थे.’’

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में ऐश्वर्या ने जो बताया था, उस के अनुसार, नरेश का बनारसी साडि़यों का काफी बड़ा कारोबार था. काम की अधिकता की वजह से उन का लोगों से मिलनाजुलना कम ही हो पाता था. क्योंकि उन के पास समय ही नहीं होता था. इस फ्लैट में आए उन्हें ज्यादा दिन नहीं हुए थे. गार्ड के अनुसार, वह ठीकठाक आदमी था. नरेश के बारे में गार्ड इस से ज्यादा कुछ नहीं बता सका था. नरेश बड़ा कारोबारी था, इसलिए शहर के व्यापारी उस के कातिलों को पकड़ने के लिए पुलिस पर काफी दबाव बनाए हुए थे. बारबार आंदोलन की धमकी दे रहे थे. कातिलों तक पहुंचने के लिए पुलिस पूरा जोर लगाए हुए थी. नरेश की किसी व्यापारी से दुश्मनी तो नहीं थी, इस के लिए उस के कर्मचारियों से पूछताछ की गई. उन सब का कहना था कि रुपयोंपैसों के लिए उन्होंने अपने मालिक को कभी किसी से लड़तेझगड़ते नहीं देखा था. पुलिस के लिए हैरानी वाली बात यह थी कि घर वाले कुछ बोलने को तैयार नहीं थे. इस की वजह शायद नरेश से घर वालों की नाराजगी थी.

पुलिस ने नाराजगी की वजह पूछी तो लोगों ने बताया कि नरेश ने प्रेम विवाह किया था, इसलिए घर वाले नाराज थे. पुलिस को लगा कि इतनी सी बात के लिए कोई अपने खून का कत्ल नहीं कर सकता. इस के अलावा नरेश ऐसी बिरादरी से थे, जो शुद्ध व्यवसायी होती है. ऐसे लोगों के बारे में कत्ल की बात सोचना भी ठीक नहीं था.

पुलिस ने नरेश के सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की. उन में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला. घूमफिर कर शक की सुई ऐश्वर्या पर आ टिकी. इस प्रेम विवाह से नरेश के घर का कोई भी सदस्य खुश नहीं था. इस के बावजूद नरेश भाइयों के साथ ही व्यवसाय कर रहा था. सभी पहले की ही तरह मिलजुल कर व्यवसाय करते थे. नरेश अपनी मां से मिलने घर भी जाया करता था.

फ्लैटों में रहने वालों को वैसे भी एकदूसरे के बारे में कम ही पता होता है. अगर इलाका पौश हो तो ऐसे मामले में लोग चुप्पी साधे रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं. फ्लैट बने ऐसे होते हैं कि अंदर क्या हो रहा है, बगल वाले को भी पता नहीं चलता. लेदे कर एक गार्ड ही बचता था, जिसे पता होता था कि इमारत में कौन कब आताजाता है. इसलिए पुलिस गार्ड के पास पहुंची.

मामले की जांच कर रहे इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा, ‘‘तुम हर आनेजाने वाले का रिकौर्ड रखते हो?’’

‘‘नहीं साहब, यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. आने वाले से सिर्फ पूछ लेते हैं कि किस से मिलना है?’’ गार्ड ने सहज भाव से कहा.

‘‘पूछने के बाद उसे जाने देते हो?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा.

‘‘नहीं, पहले उस फ्लैट वाले से फोन पर पूछते हैं, जिस में उसे जाना होता है. उधर से भेजने के लिए कहा जाता है, तभी अंदर जाने देते हैं.’’

‘‘क्या, ऐश्वर्या मैडम से भी कोई मिलने आता था?’’

‘‘साहब, यहां कोई न कोई किसी न किसी से मिलने आता ही रहता है. मैं किसकिस के बारे में बता सकता हूं.’’

‘‘अगर एक से ज्यादा बार कोई मिलने आया हो, तब तो पहचान सकते हो?’’

‘‘क्यों नहीं साहब,’’ गार्ड ने कहा.

इस के बाद इंसपेक्टर शर्मा ऐश्वर्या के फ्लैट पर पुन: लौट आए. उस से एक बार फिर पूछा, ‘‘मैडम, फिर याद कीजिए, कोई तो होगा, जिस से आप के पति की दुश्मनी रही होगी?’’

‘‘एक ही बात आप लोग कितनी बार पूछेंगे. मैं ने बताया तो कि मुझे कुछ नहीं पता.’’ ऐश्वर्या थोड़ा झल्ला कर बोली. इंसपेक्टर शर्मा ने इधरउधर देखते हुए पूछा, ‘‘आप यहां अकेली ही रहती हैं?’’

‘‘क्यों?’’ ऐश्वर्या ने थोड़ा विचलित हो कर पूछा.

‘‘मेरे कहने का मतलब यह है कि संकट की इस घड़ी में कोई तो आप का करीबी होना चाहिए.’’

‘‘मेरी अम्मी आई हैं.’’

‘‘अम्मी?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, मैं उन्हें अम्मी ही कहती हूं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

इस बीच इंसपेक्टर शर्मा उस के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को पढ़ते रहे. उन्होंने अगला सवाल किया, ‘‘क्या मैं उन से मिल सकता हूं?’’

‘‘इस समय वह घर में नहीं हैं.’’

‘‘कहां गई हैं?’’

‘‘बाजार से कुछ जरूरी सामान लेने गई हैं.’’

‘‘कब तक लौटेंगी?’’

‘‘डेढ़-दो घंटे लग सकते हैं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, मैं फिर आऊंगा तो उन से मिल लूंगा. आप जांच में सहयोग करती रहें, निश्चय ही एक न एक दिन कातिल पकड़ा जाएगा.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने उठते हुए कहा. जैसे ही वह दरवाजे पर पहुंचे, अंदर से किसी महिला के खांसने की आवाज आई. उन्होंने पलट कर कहा, ‘‘आप तो कह रही थीं कि अंदर कोई नहीं है, फिर यह खांसा कौन?’’

‘‘मैं ने कब कहा कि अंदर कोई नहीं है. मेरी सास भी आई हुई हैं.’’ ऐश्वर्या ने कहा.

कुछ कहे बगैर इंसपेक्टर शर्मा बाहर आ गए. जीना उतरते हुए वह यही सोच रहे थे कि पिछली बार जब वह यहां आए थे, तब नरेश के घर वालों ने कहा था कि नरेश से सिवाय व्यवसाय के उन का कोई और संबंध नहीं है. फिर जख्म पर मरहम लगाने उस की मां यहां कैसे आ गई?

इंसपेक्टर शर्मा थाने आ कर इसी मामले पर गहराई से विचार करने लगे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐश्वर्या ने अपनी मां को अम्मी क्यों कहा? कहीं वह मुसलिम तो नहीं है? अब इस का पता कैसे चले? क्यों न नरेश के घर वालों से पूछा जाए? हो सकता है, इसी वजह से नरेश के घर वाले ऐश्वर्या को नापसंद करते रहे हों?

इस बारे में घर वालों से पूछने का निर्णय ले कर वह अन्य काम में लग गए. अगले दिन सुबहसुबह ही ऐश्वर्या का फोन आया. वह थोड़ी घबराई हुई थी. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, जल्दी आइए. मैं आप को एक जरूरी बात बताना चाहती हूं.’’

इंसपेक्टर शर्मा तुरंत ऐश्वर्या के घर पहुंच गए. उन्हें कागज का टुकड़ा देते हुए उस ने कहा, ‘‘यह देखिए, इस में क्या लिखा है?’’

इंसपेक्टर शर्मा ने उसे खोल कर देखा. उस में लिखा था, ‘10 लाख रुपए 26 फरवरी तक पहुंचा देना, वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहना.’

‘‘यह आप को कहां मिला?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने पूछा.

‘‘गद्दे के नीचे रखा था.’’

प्यार का सफल प्रायश्चित्त

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Father’s Day Special – पछतावा: क्या बेटे ने लिया बाप से बदला?

दीनानाथ नगरनिगम में चपरासी था. वह स्वभाव से गुस्सैल था. दफ्तर में वह सब से झगड़ा करता रहता था. उस की इस आदत से सभी दफ्तर वाले परेशान थे, मगर यह सोच कर सहन कर जाते थे कि गरीब है, नौकरी से हटा दिया गया, तो उस का परिवार मुश्किल में आ जाएगा.

दीनानाथ काम पर भी कई बार शराब पी कर आ जाता था. उस के इस रवैए से भी लोग परेशान रहते थे. उस के परिवार में पत्नी शांति और 7 साल का बेटा रजनीश थे. शांति अपने नाम के मुताबिक शांत रहती थी. कई बार उसे दीनानाथ गालियां देता था, उस के साथ मारपीट करता था, मगर वह सबकुछ सहन कर लेती थी.

दीनानाथ का बेटा रजनीश तीसरी जमात में पढ़ता था. वह पढ़ने में होशियार था, मगर अपने एकलौते बेटे के साथ भी पिता का रवैया ठीक नहीं था. उस का गुस्सा जबतब बेटे पर उतरता रहता था.

‘‘रजनीश, क्या कर रहा है? इधर आ,’’ दीनानाथ चिल्लाया.

‘‘मैं पढ़ रहा हूं बापू,’’ रजनीश ने जवाब दिया.

‘‘तेरा बाप भी कभी पढ़ा है, जो तू पढ़ेगा. जल्दी से इधर आ.’’

‘‘जी, बापू, आया. हां, बापू बोलो, क्या काम है?’’

‘‘ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ.’’

‘‘आप का दफ्तर जाने का समय हो रहा है, जाओगे नहीं बापू?’’

‘‘तुझ से पूछ कर जाऊंगा क्या?’’ इतना कह कर दीनानाथ ने रजनीश के चांटा जड़ दिया.

रजनीश रोता हुआ 20 रुपए ले कर सोडा लेने चला गया.

दीनानाथ सोडा ले कर शराब पीने बैठ गया.

‘‘अरे रजनीश, इधर आ.’’

‘‘अब क्या बापू?’’

‘‘अबे आएगा, तब बताऊंगा न?’’

‘‘हां बापू.’’

‘‘जल्दी से मां को बोल कि एक प्याज काट कर देगी.’’

‘‘मां मंदिर गई हैं… बापू.’’

‘‘तो तू ही काट ला.’’

रजनीश प्याज काट कर लाया. प्याज काटते समय उस की आंखों में आंसू आ गए, पर पिता के डर से वह मना भी नहीं कर पाया.

दीनानाथ प्याज चबाता हुआ साथ में शराब के घूंट लगाने लगा.

शाम के 4 बज रहे थे. दीनानाथ की शाम की शिफ्ट में ड्यूटी थी. वह लड़खड़ाता हुआ दफ्तर चला गया.

यह रोज की बात थी. दीनानाथ अपने बेटे के साथ बुरा बरताव करता था. वह बातबात पर रजनीश को बाजार भेजता था. डांटना तो आम बात थी. शांति अगर कुछ कहती थी, तो वह उस के साथ भी गालीगलौज करता था.

बेटे रजनीश के मन में पिता का खौफ भीतर तक था. कई बार वह रात में नींद में भी चीखता था, ‘बापू मुझे मत मारो.’

‘‘मां, बापू से कह कर अंगरेजी की कौपी मंगवा दो न,’’ एक दिन रजनीश अपनी मां से बोला.

‘‘तू खुद क्यों नहीं कहता बेटा?’’ मां बोलीं.

‘‘मां, मुझे बापू से डर लगता है. कौपी मांगने पर वे पिटाई करेंगे,’’ रजनीश सहमते हुए बोला.

‘‘अच्छा बेटा, मैं बात करती हूं,’’ मां ने कहा.

‘‘सुनो, रजनीश के लिए कल अंगरेजी की कौपी ले आना.’’

‘‘तेरे बाप ने पैसे दिए हैं, जो कौपी लाऊं? अपने लाड़ले को इधर भेज.’’

रजनीश डरताडरता पिता के पास गया. दीनानाथ ने रजनीश का कान पकड़ा और थप्पड़ लगाते हुए चिल्लाया, ‘‘क्यों, तेरी मां कमाती है, जो कौपी लाऊं? पैसे पेड़ पर नहीं उगते. जब तू खुद कमाएगा न, तब पता चलेगा कि कौपी कैसे आती है? चल, ये ले

20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ…’’

‘‘बापू, आज आप शराब बिना सोडे के पी लो, इन रुपयों से मेरी कौपी आ जाएगी…’’

‘‘बाप को नसीहत देता है. तेरी कौपी नहीं आई तो चल जाएगा, लेकिन मेरी खुराक नहीं आई, तो कमाएगा कौन? अगर मैं कमाऊंगा नहीं, तो फिर तेरी कौपी नहीं आएगी…’’ दीनानाथ गंदी हंसी हंसा और बेटे को धक्का देते हुए बोला, ‘‘अबे, मेरा मुंह क्या देखता है. जा, सोडा ले कर आ.’’

दीनानाथ की यह रोज की आदत थी. कभी वह बेटे को कौपीकिताब के लिए सताता, तो कभी वह उस से बाजार के काम करवाता. बेटा पढ़ने बैठता, तो उसे तंग करता. घर का माहौल ऐसा ही था.

इस बीच रात में शांति अपने बेटे रजनीश को आंचल में छिपा लेती और खुद भी रोती.

दीनानाथ ने बेटे को कभी वह प्यार नहीं दिया, जिस का वह हकदार था. बेटा हमेशा डराडरा सा रहता था. ऐसे माहौल में भी वह पढ़ता और अपनी जमात में हमेशा अव्वल आता.

मां रजनीश से कहती, ‘‘बेटा, तेरे बापू तो ऐसे ही हैं. तुझे अपने दम पर ही कुछ बन कर दिखाना होगा.’’

मां कभीकभार पैसे बचा कर रखती और बेटे की जरूरत पूरी करती. बाप दीनानाथ के खौफ से बेटे रजनीश के बाल मन पर ऐसा डर बैठा कि वह सहमासहमा ही रहता. समय बीतता गया. अब रजनीश

21 साल का हो गया था. उस ने बैंक का इम्तिहान दिया. नतीजा आया, तो वह फिर अव्वल रहा. इंटरव्यू के बाद उसे जयपुर में पोस्टिंग मिल गई. उधर दीनानाथ की झगड़ा करने की आदत से नगरनिगम दफ्तर से उसे निकाल दिया गया था.

घर में खुशी का माहौल था. बेटे ने मां के पैर छुए और उन से आशीर्वाद लिया. पिता घर के किसी कोने में बैठा रो रहा था. उस के मन में एक तरफ नौकरी छूटने का दुख था, तो दूसरी ओर यह चिंता सताने लगी थी कि बेटा अब उस से बदला लेगा, क्योंकि उस ने उसे कोई सुख नहीं दिया था.

मां रजनीश से बोलीं, ‘‘बेटा, अब हम दोनों जयपुर रहेंगे. तेरे बापू के साथ नहीं रहेंगे. तेरे बापू ने तुझे और मुझे जानवर से ज्यादा कुछ नहीं समझा…

‘‘अब तू अपने पैरों पर खड़ा हो गया है. तेरी जिंदगी में तेरे बापू का अब मैं साया भी नहीं पड़ने दूंगी.’’

रजनीश कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘नहीं मां, मैं बापू से बदला नहीं लूंगा. उन्होंने जो मेरे साथ बरताव किया, वैसा बरताव मैं नहीं करूंगा. मैं अपने बेटे को ऐसी तालीम नहीं देना चाहता, जो मेरे पिता ने मुझे दी.’’

रजनीश उठा और बापू के पैर छू कर बोला, ‘‘बापू, मैं अफसर बन गया हूं, मुझे आशीर्वाद दें. आप की नौकरी छूट गई तो कोई बात नहीं, मैं अब अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं. चलो, आप अब जयपुर में मेरे साथ रहो, हम मिल कर रहेंगे.‘‘

यह सुन कर दीनानाथ की आंखों में आंसू आ गए. वह बोला, ‘‘बेटा, मैं ने तुझे बहुत सताया है, लेकिन तू ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. मुझे तुझ पर गर्व है.’’

दीनानाथ को अपने किए पर खूब पछतावा हो रहा था. रजनीश ने बापू की आंखों से आंसू पोंछे, तो दीनानाथ ने उसे गले लगा लिया.

Father’s Day Special – विटामिन-पी: संजना ने कैसे किया अस्वस्थ ससुरजी को ठीक

संजनाटेबल पर खाना लगा रही थी. आज विशेष व्यंजन बनाए गए थे, ननदरानी मिथिलेश जो आई थी.

‘‘पापा, ले आओ अपनी कटोरी, खाना लग रहा है,’’ मिथिलेश ने अरुणजी से कहा.

‘‘दीदी, पापा अब कटोरी नहीं, कटोरा खाते हैं. खाने से पहले कटोरा भर कर सलाद और खाने के बाद कटोरा भर फ्रूट्स,’’ संजना मुसकराती हुई बोली.

‘‘अरे, यह चमत्कार कैसे हुआ? पापा की उस कटोरी में खूब सारे टैबलेट्स, विटामिन, प्रोटीन, आयरन, कैल्सियम होता था… कहां, कैसे, गायब हो गए?’’ मिथिलेश ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘बेटा यह चमत्कार संजना बिटिया का है,’’ कहते हुए वे पिछले दिनों में खो गए…

नईनवेली संजना ब्याह कर आई, ऐसे घर में जहां कोई स्त्री न थी. सासूमां का देहांत हो चुका था और ननद का ब्याह. घर में पति और ससुरजी, बस 2 ही प्राणी थे. ससुरजी वैसे ही कम बोलते थे और रिटायरमैंट के बाद तो बस अपनी किताबों में ही सिमट कर रह गए थे.

संजना देखती कि वे रोज खाना खाने से पहले दोनों समय एक कटोरी में खूब सारे टैबलेट्स निकाल लाते. पहले उन्हें खाते फिर अनमने से एकाध रोटी खा कर उठ जाते. रात को भी स्लीपिंग पिल्स खा कर सोते. एक दिन उस ने ससुरजी से पूछ ही लिया, ‘‘पापाजी, आप ये इतने सारे टेबलेट्स क्यों खाते हैं.’’

‘‘बेटा, अब तो जीवन इन पर ही निर्भर है, शरीर में शक्ति और रात की नींद इन के बिना अब संभव नहीं.’’

‘‘उफ पापाजी, आप ने खुद को इन का आदी बना लिया है. कल से आप मेरे हिसाब से चलेंगे. आप को प्रोटीन, विटामिन, आयरन, कैल्सियम सब मिलेगा और रात को नींद भी जम कर आएगी.’’

अगले दिन सुबह अरुणजी अखबार देख रहे थे तभी संजना ने आ कर कहा, ‘‘चलिए पापाजी, थोड़ी देर गार्डन में घूमते हैं, वहां से आ कर चाय पीएंगे.’’

संजना के कहने पर अरुणजी को उस के साथ जाना पड़ा. वहां संजना ने उन्हें हलकाफुलका व्यायाम भी करवाया और साथ ही लाफ थेरैपी दे कर खूब हंसाया.

‘‘यह लीजिए पापाजी, आप का कैल्सियम, चाय इस के बाद मिलेगी,’’ संजना ने दूध का गिलास उन्हें पकड़ाया.

नाश्ते में स्प्राउट्स दे कर कहा, ‘‘यह लीजिए भरपूर प्रोटींस. खाइए पापाजी.’’

लंच के समय अरुणजी दवाइयां निकालने लगे, तो संजना ने हाथ रोक लिया और कहा, ‘‘पापाजी, यह सलाद खाइए, इस में टमाटर, चुकंदर है, आप का आयरन और कैल्सियम. खाना खाने के बाद फू्रट्स खाइए.’’

अरुणजी उस की प्यार भरी मनुहार को टाल नहीं पाए. रात को भोजन भी उन्होंने संजना के हिसाब से ही किया. रात को संजना उन्हें फिर गार्डन में टहलाने ले गई.

‘‘चलिए पापा, अब सो जाइए.’’

अरुणजी की नजरें अपनी स्लीपिंग पिल्स की शीशी तलाशने लगीं.

‘‘लेटिए पापाजी, मैं आप के सिर की मालिश कर देती हूं,’’ कह कर उस ने अरुणजी को बिस्तर पर लिटा दिया और तेल लगा कर हलकेहलके हाथों सिर का मसाज करने लगी. कुछ ही देर में अरुणजी की नींद लग गई.

‘‘संजना, बेटी कल रात तो बहुत ही अच्छी नींद आई.’’

‘‘हां पापाजी, अब रोज ही आप को ऐसी नींद आएगी. अब आप कोई टैबलेट नहीं खाएंगे.’’

‘‘अब क्यों खाऊंगा. अब तो मुझे रामबाण औषधि मिल गई है,’’ अरुणजी गार्डन जाने के लिए तैयार होते हुए बोले.

‘‘थैंक्यू भाभी,’’ अचानक मिथिलेश की आवाज ने अरुणजी की तंद्रा भंग की.

‘‘हां बेटा, थैंक्स तो कहना ही चाहिए संजना बेटी को. इस ने मेरी सारी टैबलेट्स छुड़वा दीं. अब तो बस मैं एक ही टैबलेट खाता हूं,’’ अरुणजी बोले.

‘‘कौन सी?’’ संजना ने चौंक कर पूछा.

‘‘विटामिन-पी यानी भरपूर प्यार और परवाह.’’

Father’s Day Special – हमारी अमृता : क्या मंदबुृद्धि अमृता को मिला पिता का प्यार ?

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