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Hindi Kahani: कीचड़ में कमल – धंधेवाली नीलम की बहादुरी

Hindi Kahani: नीलम आज भी उसी सुनसान जगह पर उसी बिजली के खंभे के नीचे खड़ी थी, जहां वह अकसर ग्राहकों की राह देखती थी.

रात के तकरीबन 12 बज रहे थे और वह पिछले एक घंटे से यहां खड़ी थी. ऐसा कम ही होता था कि वह यहां आती और उसे कोई ग्राहक नहीं मिलता था.

शायद उस के ग्राहकों को भी यह बात मालूम हो गई थी कि वह यहीं मिलेगी. जिस ग्राहक को उस की जरूरत होती, वह उसे यहीं से उठा लेता था.

नीलम के ग्राहकों में सब तरह के लोग थे, कार वाले भी और बिना कार वाले भी. जिन के पास अपनी कोई गाड़ी नहीं होती थी, उन के लिए नीलम खुद गाड़ी का इंतजाम करती थी.

ऐसे ग्राहकों के लिए वह अजीत नाम के अपने एक जानपहचान वाले टैक्सी ड्राइवर की मदद लेती थी, जो उस के एक फोन पर उस की बताई गई जगह पर पहुंच जाता था.

नीलम खूबसूरत चेहरे और भरेभरे बदन की 26 साला लड़की थी. वह पिछले 5 साल से इस धंधे में लगी हुई थी. शुरूशुरू में उसे यह धंधा रास नहीं आया था, पर धीरेधीरे वह इस में रमती चली गई थी.

नीलम ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर एक नजर डाली, फिर अपने चारों ओर देखा. कहीं कोई हलचल नहीं थी. उसे लगा कि शायद आज उसे निराश लौटना पड़ेगा कि तभी दूर उसे किसी गाड़ी की हैडलाइट की रोशनी दिखाई पड़ी.

गाड़ी नीलम के पास आ कर रुकी और उस का पिछला दरवाजा खुला. अगले ही पल कोई भारी चीज उस से बाहर सड़क पर फेंकी गई और फिर कार तेजी से आगे बढ़ गई.

बिजली के खंभे में लगे बल्ब की रोशनी में जब नीलम की नजर उस चीज पर पड़ी, तो उस की आंखें हैरानी से फटती चली गईं.

यह किसी नौजवान लड़के का बुरी तरह जख्मी शरीर था. पलभर के लिए नीलम को लगा कि वह नौजवान मर चुका है. उस का बदन कांपने लगा. पहले तो वह हैरानी से अपनी जगह पर खड़ी रही, फिर न जाने क्यों वह आगे बढ़ी और पास जा कर गौर से उस नौजवान चेहरे को देखने लगी.

ऐसा करने पर नीलम को मालूम हुआ कि वह नौजवान मरा नहीं, बल्कि बेहोश है. पर वह जिस तरह से जख्मी था, अगर वहीं छोड़ दिया जाता, तो जरूर मर जाता.

नीलम काफी देर तक उस के चेहरे को देखती रही. पलभर को उस के मन में आया कि वह उसे वहीं छोड़ कर अपने घर लौट जाए, पर अगले ही पल उसे अपनी यह सोच गलत लगी.

एक इनसान को यों सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया जाए, यह बात उसे कतई मंजूर नहीं हुई.

नीलम ने मन ही मन कुछ सोचा, फिर उठ खड़ी हुई. उस ने अपने कंधे

पर लटकते हुए बैग से अपना मोबाइल फोन निकाला और अजीत का नंबर लगाने लगी.

नंबर मिलते ही नीलम ने अजीत को तुरंत वहां पहुंचने को कहा, फिर वह उस का इंतजार करने लगी.

अभी मुश्किल से 15 मिनट भी नहीं हुए थे कि अजीत अपनी टैक्सी ले कर वहां पहुंच गया. उस ने टैक्सी नीलम के पास रोकी, फिर बोला, ‘‘तुम्हारा ग्राहक नजर नहीं आ रहा?’’

‘‘आज मैं ने तुम्हें अपने ग्राहक के लिए नहीं बुलाया है.’’

‘‘फिर?’’

‘‘तुम टैक्सी से तो उतरो, बताती हूं.’’

अजीत टैक्सी से नीचे उतर कर बोला, ‘‘हां, अब कहो.’’

बदले में नीलम ने सड़क पर बेहोश पड़े नौजवान की ओर इशारा किया. अजीत ने उस तरफ देखा, फिर जोरों से चौंका.

वह उस नौजवान के करीब आया और उसे ध्यान से देखा, फिर नीलम से बोला, ‘‘यह मर गया क्या?’’

‘‘अब तक तो नहीं, पर अगर इसे यों ही छोड़ दिया गया, तो यह जरूर मर जाएगा.’’

‘‘फिर?’’

‘‘तुम मेरी मदद करो, ताकि इसे अस्पताल पहुंचाया जा सके.’’

‘‘पागल हो गई हो तुम?’’ अजीत हैरान नजरों से नीलम को देखता हुआ बोला, ‘‘अगर यह अस्पताल में जा कर मर गया, तो अस्पताल वाले हम से हजार सवाल करेंगे और हम मुफ्त के झमेले में फंस जाएंगे, इसलिए इसे यहीं छोड़ कर यहां से खिसक ले…’’

‘‘इसे यहीं छोड़ दूं मरने के लिए?’’ नीलम उसे घूरती हुई बोली, ‘‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती,’’ इतना कहने के बाद नीलम झक कर उस नौजवान को उठाने की कोशिश करने लगी.

‘‘तू नहीं मानने वाली…’’ अजीत हथियार डालने वाले अंदाज में बोला, ‘‘चल हट, मैं इसे उठाता हूं.’’

अजीत ने झक कर उस बेहोश नौजवान को उठाया और उसे टैक्सी की पिछली सीट पर लिटा दिया.

इस के बाद वह टैक्सी से बाहर आ कर नीलम से बोला, ‘‘नीलम, अगर तू इसे अस्पताल ले कर जाएगी, तो अस्पताल वाले तुझ से कई तरह के सवाल करेंगे.’’

‘‘अस्पताल वाले मुझ से कोई सवाल नहीं पूछेंगे.’’

‘‘क्यों?’’ अजीत चौंकते हुए उस से पूछ बैठा.

‘‘क्योंकि हम इसे उस अस्पताल में ले जाएंगे, जहां हम जैसी लड़कियों को कभीकभार इमर्जैंसी में जाना पड़ता है.’’

‘‘मैं सम?ा नहीं.’’

‘‘न चाहते हुए भी हम जैसी औरतें कभीकभार पेट से हो जाती हैं और तब हमें इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए इस अस्पताल में जाना पड़ता है, जहां के डाक्टर हमारा पेट गिरा कर हमें इस से छुटकारा दिलाते हैं.’’

‘‘ओह…’’ अजीत बोला, ‘‘पर नीलम, तू यह झमेला अपने सिर ले ही क्यों रही है? तू बेकार में अपना समय खराब कर रही है.’’

‘‘अब तू अपना मुंह बंद कर और चुपचाप वह कर जो मैं तुम से करने को कह रही हूं. चिंता मत कर, तुझे पूरा किराया मिलेगा.’’

‘‘जैसी तेरी मरजी…’’ अजीत बोला, ‘‘अगर तुम्हें अपना समय खराब करने का इतना ही शौक चर्राया है, तो मैं क्या कर सकता हूं?’’ कहते हुए उस ने ड्राइविंग सीट संभाल ली.

नीलम के बैठते ही अजीत ने टैक्सी आगे बढ़ा दी थी.

पहले तो अस्पताल वालों को नीलम को उस बेहोश नौजवान के साथ आया देख कर हैरानी हुई थी, फिर उस के कहने पर वे उस नौजवान के इलाज में लग गए.

वह नौजवान 3 दिनों तक अस्पताल में बेहोश पड़ा रहा. चौथे दिन शाम को उसे होश आया. इस बीच नीलम लगातार उस की सेवा करती रही.

वह नौजवान कुछ देर तक आसपास के माहौल को देखता रहा, फिर अपने पास बैठी नीलम से धीरे से बोला, ‘‘मैं कहां हूं?’’

‘‘आप इस समय एक अस्पताल में हैं… 4 दिन पहले आप को कुछ लोगों ने बुरी तरह जख्मी कर के बेहोशी की हालत में सड़क पर फेंक दिया था, जहां से उठा कर मैं आप को इस अस्पताल में ले आई थी,’’ नीलम बोली.

‘‘मैं 4 दिनों से बेहोश था?’’ वह नौजवान हैरानी से बोला.

‘‘जी हां…’’ तभी उस कमरे में आते हुए डाक्टर ने कहा, ‘‘खैर मनाइए इन का, जो आप को यहां ले आईं, वरना शायद आप अब तक जिंदा न होते.’’

उस नौजवान ने नीलम को गौर से देखा. डाक्टर चैकअप करने लगा और जब वह इस से निबट चुका, तो वह नौजवान बोला, ‘‘डाक्टर साहब, मुझे अस्पताल से कब तक छुट्टी मिल जाएगी?’’

‘‘अब आप बिलकुल ठीक हैं. कल तक आप को अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी,’’ इतना कहने के बाद डाक्टर कमरे से बाहर चला गया.

वह नौजवान पलभर तक दरवाजे की ओर देखता रहा, फिर उस ने नीलम की ओर देखा.

तभी नीलम उठी, फिर उस ने एक गिलास उस नौजवान की ओर बढ़ाया.

‘‘इस में क्या है?’’ वह नौजवान गिलास थामते हुए बोला.

‘‘फल का जूस है. इस से आप को ताकत मिलेगी.’’

‘‘क्या मैं आप का नाम जान सकता हूं?’’ वह नौजवान गिलास अपने होंठों की ओर ले जाते हुए बोला.

‘‘मेरा नाम नीलम है, पर लोग मुझे ‘नीलू’ कहते हैं.’’

‘‘वे प्यार से आप को ऐसा कहते होंगे?’’

‘‘प्यार?’’ नीलम बोली, ‘‘एक जिस्म बेचने वाली से भला कौन प्यार करेगा?’’

होंठों की ओर जाता हाथ अचानक रुक गया. उस ने गिलास सामने रखी टेबल पर रख दिया.

‘‘आप ने गिलास टेबल पर क्यों

रख दिया?’’

‘‘तुम ने जो कहा, वह सच है?’’

‘‘बिलकुल सच है,’’ नीलम बोली, ‘‘और शायद इसी सच ने आप को जूस न पीने पर मजबूर किया है.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है,’’ वह नौजवान बोला, ‘‘सब की अपनीअपनी मजबूरियां होती हैं, तुम्हारी भी होगी, पर मैं इतना जरूर पूछना चाहूंगा कि तुम यह धंधा क्यों करती हो?’’

‘‘अपना पेट पालने के लिए.’’

‘‘पेट कोई और काम कर के भी तो पाला जा सकता है?’’

‘‘मैं ने बहुत कोशिश की थी, पर कामयाब नहीं हुई. मैं जहां भी काम मांगने जाती, लोग मेरी काबिलीयत नहीं, मेरा खूबसूरत जिस्म देखते. वे काम तो देने को तैयार होते, पर मेरे जिस्म की कीमत पर. मैं बहुत भटकी और एक दिन मेरे सामने ऐसी बड़ी समस्या आई कि मु?ो बिकना पड़ा.’’

‘‘क्या हुआ था उस दिन?’’

‘‘मेरी बीमार मां की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई थी और उन के इलाज के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे. मजबूरन मुझे बिकना पड़ा,’’

‘‘ओह…’’ उस नौजवान के मुंह से एक आह निकल गई.

‘‘शायद औरों की तरह मेरा सच

जान कर आप को भी मुझे से नफरत हो गई है.’’

‘‘हरगिज नहीं…’’ उस नौजवान ने कहा, ‘‘बल्कि तुम तो मेरे लिए हमेशा यादगार रहोगी. तुम ने उस समय मेरी मदद कर मुझे मौत के मुंह से निकाला, जब मेरे कुछ दुश्मनों ने मु?ो बुरी तरह घायल कर बेहोशी की हालत में सड़क पर मरने के लिए फेंक दिया था.’’

‘‘साहब, आप शायद पहले शख्स हैं, जो मेरी हकीकत जानने के बाद भी मेरे बारे में ऐसा सोचते हैं.’’

‘‘अगर ऐसी बात है, तो तुम मेरी दोस्त बन जाओ.’’

‘‘दोस्ती का मतलब समझाते हैं आप?’’ नीलम गौर से उस नौजवान को देखते हुए बोली.

‘‘दोस्ती का मतलब है अपने दोस्त का साथ देना. अगर उस पर कोई परेशानी आए, तो उसे हर कीमत पर इस से उबारना,’’ कहते हुए उस नौजवान ने नीलम की ओर अपना हाथ बढ़ाया.

नीलम ने उस का हाथ थाम लिया. उस के ऐसा करते ही वह बोला, ‘‘मेरा नाम आदित्य है और मैं एक सफल कारोबारी हूं. कभी भी, कैसी भी जरूरत पड़े, एक फोन करना, तुम मुझे अपने पास पाओगी.’’

नीलम भरी आंखों से अपने नए दोस्त को देखती रही. Hindi Kahani

Hindi Family Story: सूद माफ – कर्ज में डूबा दीनू

Hindi Family Story: जैसे ही सोमवती ने दीनू की चोटों पर सिंकाई करने के लिए गरम फाहा रखा, तो वह दर्द से कराह उठा. कुछ बदमाशों ने उसे लाठियों से पीट कर अधमरा कर दिया था.

दीनू से इतना ही कुसूर हुआ था कि कुछ साल पहले उस ने गांव के महाजन से खेती के लिए कुछ पैसा कर्ज लिया था, लेकिन तय समय बीत जाने के बाद भी कर्ज नहीं उतार सका था.

नतीजतन, धीरेधीरे कर्ज पर सूद की रकम मूल रकम से कई गुना ज्यादा हो गई, जो दीनू की जान के लिए बवाल बन गई.

आज दीनू ने महाजन से सूद की रकम चुकाने का वादा था, लेकिन किसी वजह से वह अपना वादा पूरा न कर सका, इसलिए महाजन ने अपने लठैतों को भेज कर उस की पिटाई कराई थी.

दीनू की पत्नी सोमवती की जवानी उफनती नदी की तरह चढ़ी है. उस की गठीली देह पर जवान मर्दों के साथसाथ बड़ेबूढ़ोें की नजर भी ठहर जाती है.सोमवती का ब्याह दीनू के साथ 5 साल पहले हुआ था, लेकिन उस के अभी तक कोई बच्चा नहीं था.

उसे यह टीस हमेशा सालती रहती थी.महाजन के गुरगे जबतब आते और दीनू पर लाठियां बरसा जाते. यह चिंता सोमवती को अंदर से खाए जा रही थी. वह इस परेशानी से नजात पाना चाहती थी, लेकिन उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था.

एक दिन महाजन का मुनीम दीनू के प्रति हमदर्दी का मरहम लगाने उस वक्त सोमवती के पास आया, जब दीनू बैलों का चारा लाने गांव के हाट गया था.मुनीम बोला, ‘‘अकसर महाजन के गुरगे दीनू को बेरहमी से पीट जाते हैं.

तुम लोग उफ तक नहीं कर पाते.‘‘अगर मेरी बात मानो, तो इस से बचने का एक उपाय है… वह यह कि कोई महाजन के पास जा कर उस से सूद माफ करने के लिए कहे.

‘‘मेरा तजरबा कहता है कि वह तुम्हारी गरीबी पर तरस खा कर दीनू पर कर्ज का सारा सूद माफ कर देगा. इस से असल भुगतान करने में आसानी हो जाएगी.’’

‘‘मेरा पति इस बारे में कई बार महाजन के पास जा कर गुहार लगा चुका है, मगर महाजन को हमारी गरीबी पर कभी रहम नहीं आया,’’ सोमवती ने अपनी परेशानी बताई.मुनीम बोला, ‘‘महाजन में एक खूबी है कि वह खूबसूरत औरतों की बहुत कद्र करता है.

दीनू के बजाय महाजन पर तुम्हारी गुहार ज्यादा असरदार साबित हो सकती है.‘‘खूबसूरत व गठीले बदन वाली औरतें महाजन की कमजोरी भी हैं.

गांव की कई खूबसूरत औरतें महाजन की इसी कमजोरी का फायदा उठा कर अपने पति के कर्ज को माफ करा चुकी हैं.

‘‘अगर महाजन तुम्हारी बात मान कर दीनू के सूद को माफ कर दे, तो यकीनन तुम्हें एक बड़ी परेशानी से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा, वरना इस सूद को चुकातेचुकाते तुम लोगों के चेहरों पर झुर्रियां आ जाएंगी, फिर भी महाजन के मकड़जाल से छूट नहीं पाओगे.’’

‘‘सुना है कि सूद माफ कराने के बदले में औरतों को कुछ समय के लिए महाजन के पास ठहरना पड़ता है?’’ सोमवती ने मुनीम से पूछा.‘‘इस मुसीबत से छुटकारे के बदले अगर कुछ देर का जिस्मानी सुख महाजन को देना पड़ जाए, तो इस में हर्ज क्या है,’’

मुनीम ने सलाह दी.सोमवती के चेहरे पर गुस्से का भाव देख कर मुनीम वहां से खिसक लिया.दूसरे दिन शाम को सोमवती महाजन की हवेली के दरवाजे पर थी. मुनीम ने दरवाजा खोला. सोमवती को देख कर उस का चेहरा खुशी से खिल पड़ा.

मुनीम सोमवती को कमरे में बैठा कर महाजन के पास आ गया.‘‘साहब, दीनू किसान की पत्नी सोमवती आ गई है,’’ मुनीम ने सूचना दी.महाजन बोला, ‘‘उसे मेरे बैडरूम में भेज दो.’’मुनीम ने महाजन के आदेश का पालन करते हुए सोमवती को बैडरूम में पहुंचा दिया.

सोमवती को पहली बार मखमली मुलायम गद्दे पर बैठने को मिला था. वह सहमी सी महाजन के आने का इंतजार करने लगी.अचानक बैडरूम का दरवाजा खुला, महाजन को आता देख सोमवती के दिल की धड़कनें तेज चलने लगीं

.महाजन की प्यासी निगाहों ने सोमवती की देह का बारीकी से मुआयना किया. सोमवती सिमट कर तेजी से चलने वाली सांसों को काबू में करने की कोशिश करने लगी.

सोमवती की गठीली देह की चमक ने महाजन की आंखें चौंधिया दीं और चेहरे पर चमकीली मुसकान जगमगा गई.महाजन ने गहरी नजर से सोमवती की आंखों के पार झांका.

उन आंखों की पुतलियों में खुला न्योता था.महाजन और करीब आया, तो सोमवती सहमते हुए एक तरफ सिमट गई. अगले ही पल सोमवती की देह महाजन की बांहों में थी.

देह की गरमी पिघली, तो सोमवती ने सवाल उछाला, ‘‘अब तो मेरे पति के कर्ज का सारा सूद माफ हो जाएगा?’’‘‘हां… आज तुम्हारे पति के कर्ज का सारा सूद माफ हो गया है, लेकिन मूल रकम अभी बाकी है.

इसी तरह एक बार और यहां आ कर मूल रकम भी माफ करवा लेना,’’ महाजन होंठों पर मुसकराहट बिखेरता हुआ बोला.सोमवती महाजन के कानों में फुसफुसाते हुए बोली, ‘‘मेरे पति को इस बात की जरा भी भनक न मिले कि मैं यहां आई थी.’’

सोमवती ने महाजन को डरीडरी नजरों से देखा.‘‘निश्चिंत हो कर जाओ. तुम यहां आई थीं, इस बात की भनक हवाओं को भी नहीं मिलेगी,’’ महाजन ने उसे भरोसा दिलाया.

‘‘तुम्हें पता नहीं, दीवारों के भी कान होते हैं और उन से छन कर अफवाहें बाहर निकलने लगती हैं, जो मेरी इज्जत पर बुरा असर डाल सकती हैं,’’

सोमवती ने महाजन को चेताया.महाजन बोला, ‘‘शायद तुम्हारा इशारा मुनीम की तरफ है. मुनीम को चुप रहने की मैं अलग से तनख्वाह देता हूं.

लिहाजा, तुम उस की तरफ से जरा भी चिंता मत करो,’’ महाजन ने सोमवती को यकीन दिलाया.‘‘हां, और ये 2 सौ रुपए रख लो. कभी काम आएंगे. दीनू को मत बताना.’’सोमवती ने एक अरसे बाद 2 सौ रुपए देखे थे. उस ने वे रुपए अपने ब्लाउज में ठूंस लिए. Hindi Family Story

Hindi Kahani: लेनदेन – अफसर की नौकरी

Hindi Kahani: उन दिनों मैं इंटैलिजैंस डिपार्टमैंट में था. मेरी गिनती उन चुनिंदा अफसरों में होती थी, जिन की सभी इज्जत करते थे. इज्जत यों ही नहीं मिलती, उसे हासिल करने के लिए कठोर मेहनत और लगन की जरूरत होती है. इंटैलिजैंस डिपार्टमैंट में काम करना आसान नहीं होता. हर जुर्म को शुरू से आखिर तक देखना और उसे समझना होता है.

उन्हीं दिनों मैं जुर्म दूर करने पर एक किताब लिख रहा था. मसलन, जुर्म क्यों होते हैं? कैसे मिटाए जा सकते हैं?

इस सिलसिले में मैं कई जेलों और थानों में गया, मुलजिमों से मिला और उन के इंटरव्यू कर के जो तजरबा हासिल किया, उन्हें आज भी भुलाना नामुमकिन है.वह मेरा पहला तजरबा था.

एक 16-17 साल के लड़के को थाने में लाया गया था. एक दुकान से डबलरोटी चुराना उस का जुर्म था.मैं ने उस से कुछ सवाल किए थे, जो जवाब मिले, वे इस तरह थे:

‘‘तुम ने डबलरोटी क्यों चुराई?’’‘‘मां 2 दिन से भूखी थी.’’‘‘जानते हो कि ऐसा करना जुर्म है? तुम्हें इस चोरी की सजा मिलेगी.’’‘‘जानता हूं साहब, लेकिन मेरी मजबूरी थी.

मैं मां को भूखी मरते नहीं देख सकता.’’‘‘मान लो कि तुम आज नहीं पकड़े जाते, तो कल क्या करते? फिर से चोरी?’’‘‘हम कल में नहीं जीते. हमारा सिर्फ आज होता है साहब.’’

‘‘चोरी करते हुए पकड़े जाने का डर नहीं लगता? आखिर इस में क्या खुशी मिलती है?’’

‘‘यह मत पूछो. किसी दिन पर्स हाथ लग जाए और उस में 10-20 हजार रुपए हों, तो उस दिन सारे शहर में मुझ से बड़ा कोई और रईस नहीं होता.

‘‘उस दिन मैं अंगरेजी शराब पीता हूं. दोस्तों के साथ फिल्म देखता हूं और अच्छे होटल में खाना खाता हूं.’’‘‘तुम्हें पकड़े जाने का कोई अफसोस नहीं है?’’

‘‘नहीं…’’दूसरा तजरबा. मैं एक ऐसे शख्स से मिला था, जिन का पेशा विदेशों से ड्रग्स मंगवा कर उन्हें अपने देश में बेचना, हत्या करवाना, जबरन पैसा वसूलना, मजदूर यूनियनों को चलाना था.

अपने मातहतों के बीच वे मसीहा थे. सारा इलाका उन्हें भरपूर इज्जत देता था.‘‘आप अपराध जगत में कैसे आए?’’ मेरा पहला सवाल था.

‘‘यहां कोई अपनी मरजी से नहीं आता. जब आप का सभ्य समाज किसी को जरूरत से ज्यादा सताता है, तो वह परेशान हो कर अपराध की दुनिया में चला आता है.

‘‘आप लोग फिर उसे गुंडामवाली कहते हैं. आज जो काम आप की सरकार नहीं कर पा रही, मैं करता हूं. मैं गरीबों के पेट भरता हूं. बस्ती में जब सवेरा होता है, तो हर मां उठ कर अपने बच्चे के लिए यही कहती है कि वह बड़ा हो कर मु?ा जैसा बने.’’

‘‘तुम खुद तो कानून की नजरों में अपराधी हो ही, तो क्यों मासूम बच्चों को भी अपराध की अंधेरी दुनिया में धकेल रहे हो?’’‘‘मैं उन्हें कामधंधा देता हूं. बहुत बड़ी पगार देता हूं. खुशियां देता हूं. तो फिर क्या बुराई है इस में?’’

उस ने एक सवाल मुझे पर ही जड़ दिया था. वह एक शातिर अपराधी था. उसे सुधार पाना नामुमकिन था.अगले 2 अपराधियों में एक नेता था, तो दूसरा समाजसेवी. उन्हें देखते ही मुझे बचपन के दिन याद आ गए थे.

बचपन से होश संभालने तक मैं ने कई बहुरुपियों को देखा था. बहुरुपिए बाजार में, जुलूस में या किसी शादी के मौके पर सारे महल्ले में तरहतरह के स्वांग बना कर घूमा करते थे.

मुझे एक जोकर बने बहुरुपिए की हरकतें बड़ी अच्छी लगती थीं. अपने करतब दिखा कर बहुरुपिए हर घर से पैसे इकट्ठा करते और चले जाते थे. बहुरुपिया बनना उन की मजबूरी हुआ करती थी.

आज वही बहुरुपिए नेता और समाजसेवी बने सारे देश में फैल गए हैं. भेड़ की खाल में छिपे हुए भेडि़ए हैं.नेताजी की ओर देखते हुए मैं ने पूछा था, ‘‘आप पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.

आप क्या कहते हैं?’’उस ने कहा था, ‘‘भ्रष्टाचार मत कहें. इस का नाम लेनदेन है. दुनिया इसी से चलती है. दुनिया के किसी कोने में सिर्फ लेनलेन या देनदेन नहीं चलता. मैं ने जनता के लिए बहुतकुछ किया और बदले में कुछ लिया, तो इस में भ्रष्टाचार कहां से घुस गया?

‘‘सोचो, सरकार आखिर आप को सहूलियतें देती है, तो टैक्स भी लेती है. बैंक कर्ज देते हैं, तो ब्याज भी तो लेते हैं. एक अदना सा बाबू अगर किसी का काम कर के उस से कुछ ले लेता है, तो आप लोगों को भ्रष्टाचार की बू क्यों आने लगती है?

‘‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस के उन शब्दों को याद करो, ‘तुम मु?ो खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा…’ उन्होंने भी तो लेनदेन की बात कही थी. क्या वे भ्रष्टाचारी थे?’’मैं हैरान था. उस नेता की बातों से दिमाग झन्ना गया था.

जो किसी से दब जाए, वह नेता नहीं होता और कामयाब नेता वही होता है, जो एक की चार सुना डाले.नेताजी इतने पर चुप नहीं रहे. वे आगे बोले, ‘‘आप लोग सिर्फ हमारी पार्टी के पीछे पड़े रहते हैं और उस पार्टी को पनाह देते हैं, जो भ्रष्टाचार की जननी है.

उस ने सारे नेता ही भ्रष्ट पैदा किए हैं. मेरा बस चले, तो मैं उस पार्टी की मान्यता ही रद्द करवा दूं. न रहेगा बांस, न रहेगा भ्रष्टाचार.’’नेताजी के मुंह से यह नया मुहावरा सुन कर मैं हंस पड़ा.नेताजी गुस्से से लालपीला होते हुए बोले, ‘‘हंसो मत अफसर. अगर मेरी पार्टी सत्ता में आ गई, तो मैं भारतीय अपराध संहिता से भ्रष्टाचार शब्द ही निकलवा दूंगा.

संशोधित शब्द होगा, लेनदेन. और यह अपराध नहीं होगा.’’नेता मोटी चमड़ी के होते हैं, इसलिए मु?ो ही चुप होना पड़ा.समाजसेवी बड़े विनम्र थे. वे भूरे रंग का कुरता और चूड़ीदार पाजामा पहने थे. एक काला ?ोला उन की बगल में था.

‘‘आप समाजसेवा के नाम पर चंदा लेते हैं, पर चैक से नहीं. किसी रसीद से भी नहीं. आप ने बड़ा आसान सा तरीका अपनाया है गबन करने का?’’ मैं ने उन से पूछ लिया.समाजसेवी भड़क गए, ‘‘सच को ?ाठ बनाना कोई आप लोगों से सीखे.

आप लोग जिस के पीछे पड़ जाते हैं, उस के बाल में से खाल निकालने की कोशिश करते हैं. हम लोग छोटा चंदा लेने वाले लोग हैं. बड़ा चंदा नहीं लेते. बड़ा चंदा घोटालों और घोटालेबाजों का होता है.’’

वे कुछ रुके और अपनी सांसों को दोबारा बटोरते हुए बोले, ‘‘भला 5 या 10 रुपए के लिए चैक लिखे जाते हैं? हम अपने हाथ में कुछ नहीं लेते. लोग दानपेटी में दान डाल जाते हैं.

हम तो खुद ही कहते हैं कि सरकार नोट छोटे कर डाले, भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा.‘‘अब बताइए कि सरकारें तो कुछ करती नहीं, हम से उम्मीद करती हैं कि हम छोटेछोटे रुपयों का भी हिसाब रखें,’’ बड़ी मुश्किल से उन के मन की भड़ास खत्म हुई थी.

इसी तरह के और भी कई सारे अपराधियों के इंटरव्यू करने के बाद मैं किसी नतीजे की तलाश में था.मैं कुरसी पर बैठा गहरी सोच में डूबा हुआ था कि अर्दली आया.

बिना पूछे उस ने मेरी दराज खोल कर नोटों की एक गड्डी उस में डाली और यह कहते हुए चला गया कि ठेकेदार बाबूलाल का हिसाब चुकता हो गया है. सब ने बांट लिया और आप का हिस्सा रख दिया. आप कल चैक पर दस्तखत कर देना. Hindi Kahani

Hindi Family Story: मां के आशीर्वाद से – क्या कैप्टन को मिल पाई जीत

Hindi Family Story: मां,  तुम्हारे आशीर्वाद से मैं लड़ाई के मोरचे पर पहुंच गया हूं. आते समय तुम्हारी कही आखिरी बात मुझे याद है.मां, यकीन मानना कि कैप्टन रंजीत की पीठ पर कभी गोली नहीं लगेगी. आखिरी सांस तक वह दुश्मनों से लड़ता रहेगा.

तुम्हारा बेटा, तुम्हारे सिखाए रास्ते पर चलता रहेगा. राजी को कहना कि मोह छोड़ दे. अपने लिए तो सभी जीते हैं, पर दूसरों के लिए जीने का मजा ही और है. उस जैसी हजारों सुहागनों के सुहाग मेरे संग मोरचे पर डटे हुए हैं.

मां, एक मोरचा यह युद्धभूमि है, दूसरा मोरचा तुम्हारे यहां है, सिविल में. तुम और राजी उस मोरचे पर लड़ने वालों के लिए काम करोगी, तो हमारे हाथ मजबूत होंगे. देशवासियों का जोश, हमारा जोश है.अच्छा, मां. आदेश आ गया है.

मुझे अपने कुछ जवानों के साथ दुश्मन के ठिकाने पर हमला करना है. तुम्हारा आशीर्वाद मेरे साथ है. पर वादा करो मां, अगर मैं वीरगति पा गया, तो तुम रोओगी नहीं और न ही राजी को रोने दोगी.अच्छा मां, अलविदा, जयहिंद.‘‘कैप्टन रंजीत…’’ ये एड्युडेंट थे.

‘‘यस सर.’’‘‘जाने से पहले कर्नल साहब से मिल लेना. उन के पास आप के लिए आखिरी आदेश बाकी है.’’कैप्टन रंजीत ने ‘हां’ में सिर हिलाया और कर्नल साहब के बंकर की ओर बढ़ गया.‘‘क्या मैं भीतर आ सकता हूं सर?’’‘‘यस, कैप्टन रंजीत.’’

कैप्टन रंजीत बंकर के भीतर चला जाता है और सैनिक ढंग से सैल्यूट करता है.कर्नल साहब ने अपने सामने मैप बिछाए हुए हैं और उस जगह को चैकआउट किए हुए हैं, जिस जगह पर हमला करना है.‘‘कैप्टन रंजीत, तुम मेरी रैजीमैंट के सब से अच्छे अफसरों में से एक हो…’’

कर्नल साहब ने कहना शुरू किया, ‘‘जिस अहम ठिकाने पर तुम्हें हमला करना है, वह ऊंचाई पर है. उस के नीचे से वह सड़क जा रही है, जहां से फर्स्ट लाइट में हमारी पूरी रैजीमैंट ने एडवांस करना है. जिस पर से हमें सुबह गुजर कर जाना है.

‘‘यहां से तुम अटैक नहीं कर सकते. मेन रोड होने के चलते दुश्मन का पूरा ध्यान इसी ओर है. इधर से जाने से तुम्हारी पूरी गतिविधियों को नोट किया जा सकता है.

‘‘दूसरा रास्ता है 35 फुट चौड़ा और 20 फुट गहरा वह बरसाती नाला, जो इस ठिकाने से पीछे हो कर जाता है. रास्ता बहुत बीहड़ है. कांटेदार झाडि़यों से अटा पड़ा है, पर तुम्हें इसी रास्ते को अपनाना है.‘‘एड्युडेंट ने आज उस जगह की रैकी (जासूसी) कर के यह आई स्कैच (दुश्मन के इलाके में घुस कर खास जगह का नक्शा) तैयार किया है.

इसे रख लो, तुम्हारे काम आएगा. तुम्हारे साथ 12 जवान हैं और उन में से 2 ऐसे हैं, जिन्होंने आज की रैकी में हिस्सा लिया था…’’कर्नल साहब बोलतेबोलते एकाएक रुक गए. लगा, जैसे वे एकदम पत्थर की तरह कठोर हो गए हैं.

फिर वे बोले, ‘‘कैप्टन रंजीत, मेरे लिए फर्स्ट लाइट में रैजीमैंट को एडवांस करवाना बहुत जरूरी है. यह तुम्हें याद रखना होगा. मुझे गम नहीं होगा, अगर इस ठिकाने को हासिल करने के लिए तुम्हारे सभी जवान वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं…’’

‘‘यस सर, मैं समझाता हूं सर.’’‘‘ठीक है …मैं वायरलैस पर तुम्हारे आखिरी संदेश का इंतजार करूंगा.’’‘‘यस सर.’’कैप्टन रंजीत सैल्यूट कर के बंकर से बाहर आ गया. बाहर सूबेदार राजू उस का इंतजार कर रहा है.‘‘सर, सभी जवान चलने के लिए तैयार हैं.’’

‘‘चलिए.’’कैप्टन रंजीत और सूबेदार राजू जवानों की ओर बढ़ जाते हैं. अपने अफसरों को आते देख सभी जवान लाइन से खड़े हो जाते हैं. एक बार सभी के चेहरों को गौर से देखने के बाद कैप्टन रंजीत ने कहा, ‘‘एड्युडेंट साहब के साथ आज कौन से 2 जवान रैकी पर गए थे?’’

‘‘मैं नायक मुहम्मद अली… सर.’’‘‘और मैं सिपाही सुजान सिंह… सर.’’‘‘आप दोनों हमें यह बताएं कि रास्ते में जो नाला पड़ता है, वह तैर कर पार किया जा सकता है या नहीं?’’

‘‘सर, इस संबंध में मेरा एक सु?ाव है,’’ नायक मुहम्मद अली ने कहा.‘‘कहो…’’‘‘आई स्कैच के मुताबिक, जहां से नाले को पार करने के लिए एड्युडेंट साहब ने मार्क किया है, वहां आरपार 2 बड़ेबड़े पेड़ हैं.

अगर मेरी कमर से रस्सा बांध दिया जाएगा, तो मैं तैर कर पार जा सकूंगा. दोनों ओर से रस्सा बांध कर मंकी रोप को तैयार किया जा सकेगा.’’‘‘शाबाश नायक अली. तुम्हारी स्विमिंग चैंपियनशिप किस दिन काम आएगी…’’

कैप्टन रंजीत ने कहना शुरू किया, ‘‘मेरे बहादुर जवानो, चलने से पहले जो आखिरी बात मैं आप लोगों से कहना चाहता हूं, वह बहुत खास है. हो सकता है कि इस हमले में दुश्मन के ठिकाने को लेने के लिए हम सब को अपनी जान देनी पड़े.’’

‘‘कहो, नायक अली…’’‘‘मैं दुश्मन को बता दूंगा कि मैं भी पक्का हिंदुस्तानी हूं.’’‘‘और सिपाही ठाकरे?’’‘‘इतिहास गवाह है कि लड़ाई के मैदान में मराठों ने कभी पीठ नहीं दिखाई.’’‘‘और लांस नायक पिल्लै?’’‘‘मैं भी बता दूंगा कि मद्रासी डरपोक नहीं होते.’’

‘‘और सिपाही सुजान सिंह?’’‘‘आज सुजान सिंह अपने दुश्मन पर कहर बन के गिरेगा.’’‘‘शाबाश… आज मेरे साथ पूरा हिंदुस्तान है. जिस देश में आप जैसे बहादुर जवान हैं, उस का कोई बाल बांका नहीं कर सकता…’’

कैप्टन रंजीत ने कहा, ‘‘हम सब नाला पार करने तक इकट्ठे जाएंगे. उस के बाद 2 पार्टियां बनेंगी. 6 जवान मेरे साथ रह कर आगे बढ़ेंगे और 6 जवान सूबेदार राजू के साथ.‘‘और एक बात का ध्यान रहे, सभी जवान मेरे हुक्म के बिना कोई कार्यवाही नहीं करेंगे.

नाला पार करने के बाद आगे के आदेश मिलेंगे… सभी जवान अपनेअपने हथियारों का अच्छी तरह निरीक्षण कर लें. संगीनें चढ़ा लें.’’चलते समय कैप्टन रंजीत ने अपने छोटे से वायरलैस सैट को चैक किया और सभी अपने मकसद की ओर बढ़ने लगे.

मंकी रोप से एकएक कर सभी ने चुपचाप भयानक बरसाती नाला पार कर लिया.कैप्टन रंजीत ने घड़ी की ओर देखा. रात के 3 बजे थे. उन के पास एक घंटा बाकी था.

कर्नल साहब को प्रोसीड सिगनल देने के बाद कैप्टन रंजीत ने जवानों को लाइन फोरमेशन में चलने का संकेत किया. सभी जवान सम?ा गए कि कैप्टन साहब का फैसला उचित ही है कि 2 पार्टियों में बंटने के बजाय इकट्ठा लाइन फोरमेशन में चलना चाहिए, क्योंकि ऊंचाई पर जा कर जगह छोटी हो गई थी.

दुश्मन को दोनों ओर से घेरने का कोई मतलब नहीं था, वह खुद ही तीनों ओर से घिर जाएगा.रास्ता बहुत ही बीहड़ था. कांटेदार झाडि़यों के बीच से गुजरते कैप्टन रंजीत और उस के जवानों के शरीर घायल होते जा रहे थे, परंतु फिर भी वे अपने टारगेट की ओर बढ़ते जा रहे थे… चुपचाप. सुबह 4 बजे के करीब वे अपने टारगेट से केवल 50 गज दूर रह गए.

तभी कैप्टन रंजीत ने अपने जवानों को ठहरने का आदेश दिया और वे खुद थोड़ा पीछे हट कर वायरलैस सैट से उलझ गए. उन की आवाज बहुत ही धीमी थी.‘‘हैलो टाइगर… हैलो टाइगर… ओवर.’’‘‘यस टाइगर स्पीकिंग… ओवर.’’‘‘सर, हम टारगेट से केवल 50 गज पीछे हैं.

लगता है, दुश्मन को अभी तक हमारे आने का पता नहीं है. मैं फायर करने जा रहा हूं सर. मुझे यकीन है कि हम उन पर जल्दी ही काबू पा लेंगे.’’‘‘ओके प्रोसीड. यहां से ठीक आधा घंटे बाद रैजीमैंट मूव करेगी. उस से पहले ही… ओवर.’’‘‘राइट सर… ओवर.

’’कैप्टन रंजीत ने सैट बंद कर दिया और सभी जवानों को और फैल जाने का संकेत किया, जिस से दुश्मन के भागने के एकमात्र रास्ते को पूरी तरह रोका जा सके, क्योंकि वह जानता है आगे 2 सौ फुट नीचे सड़क है.

दुश्मन अगर उस ओर भागता है, तो यह आत्महत्या करने के समान होगा और पीछे वे बैठे हैं.उस ने जवानों को संकेत द्वारा सम?ा दिया कि जैसे ही उस की कारबाइन मशीन से गोलियां निकलें, वे फायर शुरू कर दें.

थोड़ी देर बाद कैप्टन रंजीत की कारबाइन आग उगल रही थी. साथ ही, उन के साथी जवानों की राइफलें भी गूंज उठीं. एकाएक हुए हमले से दुश्मन हड़बड़ा गया. वह पीछे की ओर भागा.

तब कैप्टन रंजीत और उन के साथियों ने उन को संगीनों पर ले लिया.‘चार्ज…’ ‘घोंप…’ ‘निकाल’ की आवाजों के साथ ही ‘भारत माता की जय’ के नारों से पूरा आसमान गूंज उठा.

कैप्टन रंजीत के साथी शहीद होते चले गए. खुद भी दुश्मन की एक गोली से जख्मी हो गए. उन्होंने अपने कर्नल साहब को आखिरी संदेश दिया, ‘‘सर…सर, मां के आशीर्वाद से हम जीत गए हैं.

मेरे एकएक वीर जवान ने दुश्मनों पर कहर ढाया है, फिर वे शहीद हुए. पर…पर, सर, मैं अभी भी देख रहा हूं, 2 दुश्मन मेरी ओर बढ़ रहे हैं. जख्मी होने पर भी मैं उन के लिए काफी हूं.

‘‘सर, आप बेधड़क हो कर रैजीमैंट को मूव करें. अच्छा …अलविदा, सर. जयहिंद.’’‘जयहिंद कैप्टन…’कैप्टन रंजीत को लगा कर्नल साहब का गला भर आया है. उस ने सैट बंद किया और एक कंटीली झाड़ी की आड़ में मोरचा संभाल लिया. दुश्मन ने भी उसे देख लिया था. दोनों ओर से तड़ातड़ गोलियां चलीं और फिर चारों ओर शांति छा गई. Hindi Family Story

Hindi Family Story: सिरमौर – एक दलित की पुकार

Hindi Family Story: ‘‘अरे भगेलुआ, कहां हो? जरा झोंपड़ी से बाहर तो निकलो. देखो, तुम्हारे दरवाजे पर बाबू सूबेदार सिंह खड़े हैं. तुम्हारी मेहरी इस पंचायत की मुखिया क्या बन गई है, तुम लोगों के मिलने और बात करने का सलीका ही बदल गया है,’’ लहलादपुर ग्राम पंचायत के मुखिया रह चुके बाबू सूबेदार सिंह के साथ खड़े उन के मुंशी सुरेंद्र लाल ने दलित मुखिया रमरतिया देवी के पति भगेलुआ को हड़काया.

मुंशी सुरेंद्र लाल की आवाज सुन कर भगेलुआ अपनी झोंपड़ी से बाहर निकला. सामने बाबू सूबेदार सिंह को खड़ा देख कर वह अचानक हकबका गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि उन का किस तरह से स्वागत करे, लेकिन दूसरे ही पल उस का मन नफरत से भर उठा.

जब पेट में लगी भूख की आग को शांत करने के लिए भगेलुआ बाबू सूबेदार सिंह के यहां काम मांगने जाता था, तो घंटों खड़े रहने के बाद उन से मुलाकात होती थी.

काम मिल जाता था, तो कई दिनों तक बेगारी करनी पड़ती थी. तब कहीं जा कर उसे मजदूरी मिलती थी.

कभीकभी माली तंगी की वजह से वह बाबू सूबेदार सिंह से कर्ज भी लेता था. कर्ज के लिए बाबू साहब से कहीं ज्यादा उसे मुंशी सुरेंद्र लाल की तेल मालिश करनी पड़ती थी.

10 रुपए सैकड़ा के हिसाब से सूद व सलामी काट कर मुंशी महज 80 रुपए उस के हाथ में देता था.

अपनी ओर भगेलुआ को टुकुरटुकुर ताकते देख कर बाबू सूबेदार सिंह ने उसे टोका, ‘‘इतनी जल्दी अपने बाबू साहब को भुला दिया क्या? अब तो पहचानने में भी देर कर रहा है.’’

‘‘मालिक, हम आप को कैसे भुला सकते हैं? आप ही तो हमारे पुरखों के अन्नदाता हैं. इस दलित के दरवाजे पर आने की तकलीफ क्यों की. भगेलुआ की जरूरत थी, तो किसी से खबर भिजवा दी होती, हम आप की हवेली पर पहुंच जाते.

‘‘हमारे लिए तो आप ही मुखिया हैं. लेकिन पता नहीं ससुरी इस सरकार को क्या सू?ा कि इस पंचायत को हरिजन महिला कोटे में डाल दिया.

‘‘और गजब तो तब हुआ, जब यहां की जनता की चाहत ने रमरतिया को मुखिया बना दिया,’’ भगेलुआ के मन में जो आया, वह एक ही सांस में बक गया.

‘‘जमाना बदल गया है भगेलुआ,’’ बाबू सूबेदार सिंह ने लंबी सांस खींचते हुए कहा.

‘‘जमाना बदल गया तो क्या हुआ मालिक, हम तो नहीं बदले हैं. हम तो आज भी आप के हरवाहे हैं. लेकिन ट्रैक्टर आ जाने से हमारे जैसे लोगों की रोजीरोटी छिन गई है.

‘‘खैर, जाने दीजिए. यह बताइए कि इतने दिनों बाद भगेलुआ की याद कैसे आ गई?’’

‘‘इधर से गुजर रहा था तो सोचा कि तुम से थोड़ा मिलता चलूं,’’ बाबू सूबेदार सिंह ने मन को मारते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं मालिक, यह तो आप ही का घर है. हम तो आज भी खुद को आप की प्रजा सम?ाते हैं. अगर कोई भूलचूक हो गई हो, तो माफ करना,’’ दोनों हाथ जोड़ कर भगेलुआ ने बाबू सूबेदार सिंह से कहा और दूसरे ही पल अपनी पत्नी रमरतिया को आवाज लगाई, ‘‘कहां हो रमरतिया, जल्दी ?ोंपड़ी से बाहर निकलो. आज हमारे दरवाजे पर बाबू सूबेदार साहब आए हैं.’’

‘‘आ रही हूं,’’ झोंपड़ी से निकलती रमरतिया की नजर जैसे ही सामने खड़े मुंशी सुरेंद्र लाल व बाबू सूबेदार सिंह पर पड़ी, उस ने अपना पल्ला माथे से थोड़ा सा नीचे सरका लिया और बोल पड़ी, ‘‘पांव लागूं महाराज. आइए, कुरसी पर बैठ जाइए.’’

झोंपड़ी के सामने रखी कुरसी झड़पोंछ कर रमरतिया भीतर चली गई.

जब रमरतिया को मुखिया का पद मिला था, तभी वह बाबू साहब से मुखिया का चार्ज लेने के लिए गई थी. ठीक 2 साल के बाद उस की यह उन से दूसरी मुलाकात थी.

वैसे तो रमरतिया और पूरे दलित तबके का बाबू साहब की हवेली से पुराना संबंध था. कहीं काम मिले न मिले, वहां तो कुछ न कुछ काम मिल ही जाता था. लेकिन रमरतिया के मुखिया बनने के बाद अब कहीं दूसरे के यहां काम करने की नौबत ही नहीं आई.

पंचायत की योजनाओं से ही उसे फुरसत नहीं मिलती थी. कोई न कोई समस्या ले कर उस को घेरे रहता था. लाल कार्ड, पीला कार्ड, जाति, आय, आवासीय प्रमाणपत्र, बुढ़ापा पैंशन, विधवा पेंशन, पारिवारिक कामों के अलावा मनरेगा के काम भी रमरतिया को ही देखने पड़ते थे.

वहीं जब बाबू सूबेदार सिंह मुखिया थे, तब दलितों, पिछड़ों को सीधे उन से मिल लेने की हिम्मत नहीं होती थी. वे उन के दरवाजे पर घंटों खड़े रहते थे. जब कोई बिचौलिया आता, तो उन का काम करवाता, नहीं तो वे कईकई दिनों तक सिर्फ चक्कर लगाया करते थे.

लेकिन रमरतिया के मुखिया बनते ही पंचायत की सभी जातियों का मानसम्मान बराबर हो गया था. सब का काम बिना मुश्किल के होता था.

रमरतिया जिला परिषद की बैठक में भी जाती, तो वहां सीधे कलक्टर साहब, ब्लौक प्रमुख, बीडीओ से अपनी पंचायत की समस्याओं पर बात करती. इंदिरा आवास, आंगनबाड़ी, पोषाहार, स्कूलों के मिड डे मील वगैरह के मामलों में वह अफसरों का ध्यान खींचती थी. जबकि बाबू साहब के समय में पता ही नहीं चलता था कि गांव वालों के लिए कौनकौन सी योजनाएं आई हैं.

मुखिया, पंचायत सेवक, प्रखंड विकास पदाधिकारी की मिलीभगत से सभी योजनाएं कागजों में सिमट कर रह जाती थीं.

योजनाओं की रकम अफसर डकार जाते थे. पूरे जिले के सभी महकमों में काफी भ्रष्टाचार था. दबंगों के डर से लोग डरेसहमे रहते थे. अगर कोई शिकायत करता भी था, तो दबंगों की शह पर बिचौलिए ही उस की जम कर पिटाई कर देते थे.

ऐसी बात नहीं थी कि रमरतिया के मुखिया बन जाने के बाद से भ्रष्टाचार खत्म हो गया था. फर्क यही था कि योजनाएं अब अमल में लाई जा रही थीं. घूस लेने के बाद बाबू व अफसर लोगों का काम करते थे. यही वजह थी कि हर गांव में नया प्राइमरी स्कूल, उपस्वास्थ्य केंद्र, राशन की दुकान, आंगनबाड़ी केंद्र वगैरह खुल गए थे.

औरतों और किसानों को माली तौर पर मजबूत बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह भी बनाए गए थे. मछली पालन, बकरी पालन, सूअर पालन, भेड़ पालन, मुरगी पालन, डेरी फार्म वगैरह खुल गए थे.

इन सब कामों को करने का सेहरा मुखिया रमरतिया के सिर पर बंधता था. जब रमरतिया को सूचना मिलती थी कि फलां गांव के किसी किसान की हालत अच्छी नहीं है. वह माली तंगी और बीमारी से जू?ा रहा है, तो वह तुरंत सारे काम छोड़ कर वहां पहुंच कर उस की समस्या दूर करती थी.

बाबू सूबेदार सिंह और मुंशी सुरेंद्र लाल को कुरसी पर बैठे हुए कुछ ही समय बीता होगा कि रमरतिया से मिलने के लिए गांव वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी.

?ोंपड़ी के आगे एक मेजकुरसी लगी हुई थी, जहां रमरतिया की 14 साला बेटी भगजोगनी कुरसी पर बैठी हुई थी. वह गांव वालों की अर्जी को ले कर सहेजती हुई मेज के ऊपर रखती जाती. वह मैट्रिक के इम्तिहान देने के बाद खाली समय में अपनी मां के कामों में हाथ बंटाती थी. भगजोगनी से एक साल छोटा भाई दीपू 9वीं जमात में पढ़ता था.

इसी बीच रमरतिया एक थाली में बिसकुट और चाय से भरे 2 गिलास ले कर बाबू साहब के सामने आई. साथ ही, उस ने थाली को बाबू साहब के सामने रखी मेज पर रख दिया.

थाली देखते ही वे दोनों एकसाथ यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि बिना नहाए वे एक दाना भी मुंह में डालना हराम सम?ाते हैं. उन के पीछेपीछे भगेलुआ भी कुछ दूर तक छोड़ने के लिए गया.

रमरतिया की बढ़ती लोकप्रियता से बाबू सूबेदार सिंह की छाती पर सांप लोट रहा था. उस की ?ोंपड़ी के सामने उमड़ी गांव वालों की भीड़ ने उन का चैन छीन लिया था.

गांवों में बोरिंग करने पर सरकार ने रोक लगा दी थी, ताकि धरती के नीचे पानी का लैवल और नीचे न जा सके. तब रमरतिया ने गांव के पास से गुजरने वाली गंडक नहर में सरकारी मोटर पंप का इंतजाम करवाया. पंप से ले कर खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए नालियां बनवाईं. साथ ही, ऊंचे उठे हुए खेतों में सिंचाई का पानी पहुंचाने के लिए हजारों मीटर लंबे प्लास्टिक, कपड़े वगैरह के पाइप का जुगाड़ करवाया.

इतना ही नहीं, गंडक नहर से खेतों की नालियों को जोड़ा गया. सिंचाई की अच्छी व्यवस्था होने से लहलादपुर ग्राम पंचायत की फसलें लहलहा उठीं.

प्रखंड स्तरीय बैठक में बीडीओ और मुखिया प्रमुख ने रमरतिया की इस कोशिश की जोरदार ढंग से तारीफ की. दूसरी पंचायतों में भी यह सुविधा बहाल की गई, ताकि सभी किसान खुशहाल हो सकें.

रमरतिया धीरेधीरे इतनी लोकप्रिय हो गई कि गांवों में होने वाले शादीब्याह में उसे लोग बुलाना नहीं भूलते थे. बाबू सूबेदार सिंह जिस समारोह में पहुंचते, वहां पहले से बैठी हुई रमरतिया मिल जाती. उस की मौजूदगी से उन्हें ऐसा लगता कि जैसे उन के सामने दुम हिलाने वाले लोग आज खुद सिरमौर बन गए हैं.

राज्य सरकार ने मुखिया के जरीए सभी पंचायतों में टीचरों की बहाली का ऐलान किया था. इस ऐलान के बाद से गांवों के बेरोजगारों में नौकरी के लिए होड़ मच गई थी.

सभी के परिवार वाले पंचायत के मुखिया से अपनेअपने बेटेबेटी की नौकरी लगाने की सिफारिश में जुट गए थे. बाबू सूबेदार सिंह भी इसी सिलसिले में भगेलुआ के यहां पहुंचे थे, लेकिन भीड़ को देख कर वे कुछ बोल नहीं सके थे.

अब पीछेपीछे चल रहे भगेलुआ से उन्होंने कहा, ‘‘सुना है कि मेरी हवेली के पीछे वाले स्कूल में टीचर की बहाली है. मैं अपने बेटे प्रीतम सिंह को वहां रखवाना चाहता हूं.’’

भगेलुआ के चेहरे का रंग उड़ गया. वह कुछ बोल नहीं सका, क्योंकि उस स्कूल के लिए 25 बेरोजगारों की अर्जी पहले ही पड़ चुकी थी. ऊपर से बाबू साहब अपने लड़के को अलग से थोप रहे थे.

भगेलुआ को गुमसुम देख कर बाबू साहब ने उसे टोका, ‘‘रंग क्यों उड़ गया भगेलुआ? कुछ तो बोलो?’’

‘‘नहीं मालिक, रंग क्यों उड़ेगा. इस के बारे में रमरतिया से पूछना होगा.’’

‘‘अरे, रमरतिया तेरी पत्नी है. तेरी बात नहीं मानेगी, तो फिर किस की

बात मानेगी. एक लाख रुपए ले लो और चुपचाप प्रीतम सिंह की बहाली करा दो. कोई कानोंकान इस बात को नहीं जान सकेगा,’’ सूबेदार सिंह ने रुपए की गरमी का एहसास भगेलुआ को कराना चाहा.

‘‘नहीं… नहीं… आप से हम रुपयापैसा नहीं लेंगे.’’

‘‘तो ठीक है, तुम ही बताओ कि क्या लोगे? उसे हम पूरा करेंगे. बेटे की जिंदगी का सवाल है. आजकल ढूंढ़ने से भगवान तो मिल जाएंगे, पर सरकारी नौकरी नहीं.’’

‘‘मालिक, अगर कुछ देना ही है, तो तार गाछ वाली जमीन दे दीजिए. वह हमारे पुरखों की जमीन है. आप की मेहरबानी हो, तो उस जमीन पर हम घर बनाएंगे,’’ भगेलुआ ने हिम्मत जुटा कर अपने मन की बात रख दी.

‘‘क्या बात करते हो भगेलुआ, वह बैनामा जमीन है, वह भी बिलकुल मेन रोड के किनारे. उस की कीमत आज के भाव से 10 लाख रुपए से ज्यादा है. मैं उसे कैसे दे सकता हूं.

‘‘उस जमीन को मैं ने तेरे बाप से 3 हजार रुपए में खरीदा था. तुम इस तरह की सौदेबाजी पर उतर आओगे, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था.

‘‘मैं तो रमरतिया की ईमानदारी का किस्सा सुन कर आ गया था. लेकिन यहां आने पर हकीकत कुछ और ही दिखाई पड़ रही है. भोलीभाली जनता का हक मार कर तुम लोग जल्दी अमीर बनने की जुगत में हो. इस की शिकायत मैं डीसी साहब से करूंगा. तुम लोगों का कच्चा चिट्ठा खोल के रख दूंगा,’’ बाबू सूबेदार सिंह गुस्से में फट पड़े.

‘‘नाराज हो गए मालिक. सच तो आखिर सच ही होता है. थोड़ी देर पहले आप ही ने तो कहा था कि जमाना बदल गया है. इस का मतलब हुआ कि पहले से शोषित, पीडि़त जनता अब जागरूक हो गई है. उसे अपने हक की जानकारी हो गई है.

‘‘आज की जनता किसी तरह का ठोस कदम उठाने से पहले सोचती है. मेरे बाप ने अपना परिवार पालने के लिए खानदानी जमीन को बेच दिया था. आप ने बैनामा सिर्फ मेरे बाप से कराया है, जबकि वे 4 भाई हैं. 3 छोटे भाइयों से बैनामा कराना अभी बाकी है.

‘‘उस खेत पर उन का भी हक है. आप किसी वकील से पूछ सकते हैं कि दादा के मरने के बाद उन के 4 बेटों का हिस्सा उस जमीन में होगा या नहीं…’’

‘‘चुप रहो भगेलुआ, बहुत हो गया…’’ बाबू सूबेदार सिंह के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई, तो गुस्से

में वे बोल पड़े, ‘‘मेरी जमीन पर तेरे चाचा लोग दावा ठोंकेंगे. एकएक को देख लूंगा.

‘‘चाहे दीवानी लड़ो या फौजदारी, जीत सिर्फ मेरी होगी, मेरी. तुम्हारा यह छल और बल बाबू सूबेदार सिंह के सामने चलने वाला नहीं है.’’

‘‘छल और बल. हमारे पास कहां से आ गया मालिक. यह हथियार तो आप की हवेली का है. दलितों, पीडि़तों को तो इंसाफ पर भरोसा है. हम अपने हक के लिए लड़ना जानते हैं. नाइंसाफी और जोरजुल्म जब छप्पर पर चढ़ कर बोलने लगता है, तो हम गरीबों का एकमात्र लाठी इंकलाब बनता है.

‘‘इस भरम में नहीं रहना कि जीत केवल हवेली की होगी. जो ?ाक कर चलना जानते हैं, वे सिर उठा कर दूसरों का सिर कलम करना भी जानते हैं…

यह हम ने आप जैसों से ही सीखा है,’’ भगेलुआ बोला.

‘‘चलिए मुंशीजी, चलिए. भगेलुआ पगला गया है…’’ हाथी के पैर के नीचे कुचले हुए सांप की तरह रेंगते हुए बाबू सूबेदार सिंह वहां से भागे.

भगेलुआ के चेहरे पर कुटिल मुसकान तैर गई थी. जिंदगी के जंगेमैदान में हमेशा मुंह की खाने वाला भगेलुआ आज जीत जो गया था. Hindi Family Story

Hindi Story: सही राह – कालू की दादागीरी

Hindi Story: मोहल्ले के लोग कालू उस्ताद के नाम से कांपते थे. कालू का जब मन होता था, वह किसी की दुकान से कुछ भी उठा लेता था. दुकानदारों के मन में डर था. कौन जाए कालू उस्ताद से भिड़ने, कहीं कुछ चला दे तो जान चुकानी पड़ेगी. इसलिए कोई उस का विरोध नहीं करता था.

लेकिन ऐसा कितने दिनों तक चलता. एक दिन कालू एक सब्जी वाले से जबरदस्ती पैसे हड़प रहा था. सब्जी वाला आनाकानी कर रहा था. इस से कालू चिढ़ गया और उस की पिटाई करने लगा.

‘‘मुझ से उलझता है. ठहर, तुझे अभी ठीक करता हूं,’’ कह कर वह उस पर पिल पड़ा.

मगर, तभी किसी के मजबूत हाथों ने उसे रोक लिया.

कालू ने मुड़ कर देखा, सामने मेजर अंकल थे. उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों पीट रहे हो बेचारे को?’’

मेजर अंकल हालांकि उम्र में 50 से ज्यादा ही थे, लेकिन अब भी वे काफी ताकतवर थे. उन की आवाज में रोब था.

कालू के हाथ थम गए. वह वहां से जाने को हुआ. मेजर अंकल बोलने लगे, ‘‘कमजोरों को मारने में कोई महानता नहीं है. हिम्मत है, तो देश के दुश्मनों से लड़ो…’’

आसपास के लोगों का जमाव बढ़ने लगा. सभी को हैरानी हो रही थी कि आखिर मेजर अंकल क्यों कालू जैसे खतरनाक आदमी से उलझ गए. कालू उस समय तो आंखें तरेरते हुए वहां से चला गया. लोगों ने मेजर अंकल को समझाया कि वे सावधान रहें, कहीं कालू उन से बदला लेने न आ जाए.

उस रात कालू ठीक से सो न पाया. रहरह कर उस के कानों में मेजर अंकल के शब्द गूंज रहे थे. वह सुबह ही उठा और उन के घर की ओर चल पड़ा.

मेजर अंकल उस समय बगीचे की सफाई कर रहे थे. उन को इस शहर में आए अभी महीनाभर ही हुआ था. वे अकेले ही रहते थे.

पहले तो वे कालू को देख कर चौंके, फिर सामान्य हो कर पूछा, ‘‘क्या मुझे मारने आए हो?’’

कालू बुत बना खड़ा रहा. नजरें नीचे करते हुए वह बोला, ‘‘नहीं, कुछ बातें करनी हैं.’’

कालू को खुद हैरानी हो रही थी कि वह मेजर अंकल के सामने बदल कैसे गया. दोनों में बातचीत होने लगी.

‘‘घर के लोग कहां रहते हैं?’’

कालू के इस सवाल को सुनते ही मेजर अंकल फफक पड़े. वे बोले कि उन का बेटा सीमा पर हुई गोलाबारी में शहीद हो गया और सालभर पहले एक कार हादसे में घर के बाकी सदस्य मारे गए. पर उन्हें अपने बेटे की मौत पर कभी अफसोस नहीं हुआ, बल्कि उस पर गर्व है.

मेजर अंकल ने जब उसे फौजियों के बारे में बताया, तो कालू की जिज्ञासा बढ़ गई. उस ने मेजर अंकल से पूछा, ‘‘क्या मैं भी फौज में भरती हो सकता हूं?

‘‘हांहां, तुम बहादुर तो हो ही. दुश्मनों से लड़ने के लिए तुम जैसों की ही जरूरत है,’’ मेजर अंकल बोले.

कालू का सपना जल्द ही पूरा हो गया. सेना में उस का चयन हो गया.

उस की ट्रेनिंग कई जगहों पर हुई और सभी में उस का प्रदर्शन अच्छा रहा. पहले तो वह मेजर अंकल को हर हफ्ते चिट्ठी लिखता था, लेकिन बाद में यह सिलसिला भी खत्म हो गया. सालभर से वह अपने महल्ले में नहीं आया था.

सीमा पर घुसपैठियों के अचानक हमले से देश पर मुसीबत आ पड़ी. ऐसे में कई जांबाज फौजियों का चयन हुआ, जो कि घुसपैठियों को मार गिराएं. उन में कालू को भी शामिल किया गया.

सीमा पर खराब मौसम के चलते भारतीय जवानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था, पर उन के हौसले बुलंद थे. कालू के दल ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर एक चौकी पर अपना कब्जा जमा लिया. पर रात के अंधेरे में दुश्मनों ने उन पर फिर हमला किया.

उस के बाद से इस दल के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. टीवी, रेडियो, समाचारपत्रों वगैरह में अकसर कालू और उस के साथियों की तसवीरें छपतीं कि ये लोग लापता हो गए हैं और शायद दुश्मनों की गिरफ्त में हैं.

महल्ले वालों ने जब कालू की तसवीरें देखीं, तो वे उसे पहचान गए.

‘‘अरे, ये तो अपना कालू है,’’ उस का पुराना दोस्त असलम बोला.

‘‘हां, पता नहीं बेचारा किस हाल में होगा?’’ बूढ़ी दादी सिर पर हाथ रखते हुए बोलीं. मेजर अंकल भी कालू के लिए परेशान थे.

जब हफ्तेभर तक उन लोगों की कोई खबर नहीं मिली, तो उन्हें मरा मान लिया गया. महल्ले वालों को बहुत दुख हुआ.

10वें दिन एक पहाड़ी चौकी पर एक फौजी बेहोशी की हालत में पाया गया. भारतीय जवान उसे पहचान गए, वह कालू ही था. उसे तुरंत अस्पताल भेजा गया.

कालू जैसे ही होश में आया, उस ने अफसरों को बताया कि वह इतने दिनों तक दुश्मनों की गिरफ्त में रहा. उस के अन्य साथी तो बच नहीं पाए, पर वह कैसे भी कर, उन के कब्जे से बच निकला और यहां तक आ गया.

कालू ने दुश्मनों के हमले की कई जानकारियां भी दीं. इस से भारतीय सेना सतर्क हो गई और उन्होंने घुसपैठियों की साजिश को नाकाम कर दिया.

कालू के जिंदा होने की सूचना अगले दिन अखबारों, टीवी में छा गई. कालू के चलते ही सेना ने कई खास ठिकानों पर फिर से अपना कब्जा कर लिया.

कालू जब पूरी तरह से ठीक हुआ, तो वह अपने महल्ले में सब से मिलने आया. पूरा महल्ला फूलमाला लिए उस के स्वागत को तैयार था.

पर कालू की नजरें मेजर अंकल को खोज रही थीं. जब वे उस से मिलने आए, तो वह उन के पैरों पर गिर पड़ा. वह बोला, ‘‘अगर उस दिन आप ने मुझे सही राह न दिखाई होती, तो अब तक मैं भटकता ही रहता. अब मैं अपने साथियों को भी देशसेवा के लिए प्रेरित करूंगा.’’ मेजर अंकल की आंखें नम हो गईं. उन्होंने उसे गले से लगा लिया. Hindi Story

Best Hindi Kahani: दागी कंगन – कालगर्ल मुन्नी की दास्तान

Best Hindi Kahani: ‘‘मुन्नी, तुम यहां पर कैसे?’’ ये शब्द कान में पड़ते ही मुन्नी ने अपनी गहरी काजल भरी निगाहों से उस शख्स को गौर से देखा और अचानक ही उस के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘निहाल भैया…’’

वह शख्स हामी भरते हुए बोला, ‘‘हां, मैं निहाल.’’

‘‘लेकिन भैया, आप यहां कैसे?’’

‘‘यही सवाल तो मैं तुम से पूछ रहा हूं कि मुन्नी तुम यहां कैसे?’’

अपनी आंखों में आए आंसुओं के सैलाब को रोकते हुए मुन्नी, जिस का असली नाम मेनका था, बोली, ‘‘जाने दीजिए भैया, क्या करेंगे आप जान कर. चलिए, मैं आप को किसी और लड़की से मिलवा देती हूं. मुझ से तो आप के लिए यह काम नहीं होगा.’’

‘‘नहीं मुन्नी, मैं हकीकत जाने बगैर यहां से नहीं जाऊंगा. आखिर तुम यहां आई कैसे? तुम्हें मालूम है कि तुम्हारा भाई राकेश और तुम्हारे मम्मीपापा कितने दुखी हैं?

‘‘वे सब तुम्हें ढूंढ़ढूंढ़ कर हार गए हैं. पुलिस में रिपोर्ट की, जगहजगह के अखबारों में तुम्हारी गुमशुदगी के बारे में खबर दी, लेकिन तुम्हारा कुछ पता ही नहीं चला.

‘‘और आज… जब इतने बरसों बाद तुम मिली, तो इन हालात में… एक कालगर्ल के रूप में.

‘‘मुन्नी, सचसच बताओ, तुम यहां कैसे पहुंची. हमें तो लगा कि तुम प्रकाश, वह तुम्हारा प्रेमी, के साथ भाग गई?थी.

‘‘कितनी पूछताछ की राकेश ने उस से तुम्हारे लिए, लेकिन वह तो कुछ दिनों के लिए खुद ही नदारद था.’’

‘‘आप ठीक कहते हैं निहाल भैया, लेकिन अब सच जान कर भी क्या फायदा सब मेरी ही तो गलती है, सो सजा भुगत रही हूं.’’

‘‘नहीं मुन्नी, ऐसा मत कहो. तुम मुझे सच बताओ.’’

मुन्नी कहने लगी, ‘‘भैया, आप ने जो सुना था, सच ही था. मैं और प्रकाश एकदूसरे को प्यार करते थे. वह मेरे कालेज का दोस्त था. आप को याद होगा कि हम दोनों कालेज से एक फील्ड ट्रिप के लिए शहर से बाहर गए थे. वहीं पर हमारे मन में प्यार के अंकुर फूटे और धीरेधीरे हमारा प्यार परवान चढ़ गया था.

‘‘कालेज की पढ़ाई पूरी होतेहोते हमा घर में मेरी सगाई की बातें चलने लगी थीं. मैं ने पापामम्मी को जैसे ही प्रकाश के बारे में बताया, वे आगबबूला हो उठे. मुझे लगा कि कहीं वे लोग मेरी शादी जबरदस्ती किसी और से न करा दें. सो, मैं ने सारी बात प्रकाश को बताई.

‘‘प्रकाश ने मुझे भरोसा दिलाया और कहा, ‘मेनका, ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं किसी भी कीमत पर तुम्हें अपने से अलग नहीं होने दूंगा. बस, तुम मुझ पर?भरोसा रखो.’

‘‘मुझे उस पर पूरा भरोसा था. अब मैं घर में होने वाली हर बात उसे बताने लगी थी. और जैसे ही मुझे लगा कि पापामम्मी मेरी मरजी के खिलाफ शादी तय करने जा रहे हैं, मैं ने प्रकाश को सब बता दिया.

‘‘उसी शाम वह मुझ से मिला. मैं खूब रोई और बोली, ‘मुझे कहीं भगाकर ले चलो प्रकाश, वरना मैं किसी और की हो जाऊंगी और हम हमेशा के लए बिछड़ जाएंगे.’

‘‘प्रकाश ने कहा, ‘मैं अपने घर में बात करता हूं मेनका, तुम बिलकुल चिंता मत करो.’

‘‘अगले ही दिन प्रकाश मेरे लिए अपनी मम्मी के दिए कंगन ले कर आया और बड़े ही अपनेपन से बोला, ‘मेनका, यह मां का आशीर्वाद है हमारे लिए. वे तो तुम्हें बहू बनाने के लिए राजी हैं, पर पिताजी नहीं मान रहे?हैं. सो, हम दोनों घर से भाग जाते?हैं.’

‘‘मैं ने पूछा, ‘लेकिन, हम भाग कर जाएंगे कहां?’

‘‘वह बोला, ‘वैसे तो हमारे पास कोई ठिकाना नहीं है, लेकिन वाराणसी में मेरा एक दोस्त रहता है. मैं ने उस से बात की है. वह वहां नौकरी करता है. हम उसी के पास चलेंगे. वह अपनी ही कंपनी में मेरे लिए नौकरी का इंतजाम भी कर देगा.’

‘‘प्रकाश ने यह भी समझाया, ‘हम वहां रजिस्टर्ड शादी कर लेंगे और फिर अपने घर का इंतजाम भी वहीं कर लेंगे. शायद कुछ समय में हमारे मम्मीपापा भी इस शादी को रजामंदी दे दें.’

‘‘मुझे उस की बातों में सचाई नजर आई और मैं ने उस के साथ भाग जाने का फैसला कर लिया.

‘‘अगले ही दिन मैं घर से कुछ कपड़े व रुपए ले कर रेलवे स्टेशन पहुंच गई.

‘‘हम दोनों प्रकाश के दोस्त के घर पहुंचे और वहां 2 दिन में ही प्रकाश ने नौकरी शुरू कर दी.

‘‘5 दिन बाद उस का दोस्त मुझ से बोला, ‘भाभी, प्रकाश ने आप को बाहर कहीं बुलाया है. आप तैयार हो जाइए. मैं आप को वहां ले चलता हूं.’

‘‘एक बार तो मुझे लगा कि प्रकाश ने मुझे क्यों नहीं बताया, पर अगले ही पल मैं उस के दोस्त के साथ चली गई. मैं जहां पहुंची, वहां प्रकाश पहले से ही मौजूद था.

‘‘उस ने मुझे एक आंटी से मिलवाया और बोला, ‘जिस कंपनी में मैं काम करता हूं, ये उस की मालकिन हैं.’

‘‘वे आंटी भी मुझ से बड़े प्यार से मिलीं. कुछ देर बाद प्रकाश बोला, ‘मेनका, मैं कुछ देर के लिए बाहर हो कर आता हूं, तब तक तुम यहीं रहो.’

‘‘एक बार को मुझे घबराहट हुई, पर आंटी की प्यार भरी छुअन में मुझे मां का रूप नजर आया, सो मैं वहां रुक गई. उस के बाद मेरी जिंदगी में जैसे तूफान आ गया. मुझे एक ही रात में समझ आ गया कि प्रकाश मुझे थोड़े से रुपयों के लालच में उन आंटी के हाथों बेच गया था.

‘‘अब हर रात अलगअलग तरह के ग्राहक आने लगे. मैं ने आंटी के खूब हाथपैर जोड़े और रोरो कर कहा, ‘आंटी प्लीज मुझे जाने दीजिए, मैं भले घर की लड़की हूं. मेरे मम्मीपापा, भाई क्या सोचेंगे मेरे बारे में.’

‘‘लेकिन, आंटी ने मेरी एक न सुनी. पहले 2 लड़कों ने मेरा बलात्कार किया और मुझे कई दिन तक भूखा रखा गया. जब मैं मानी, तब खाना दिया गया और इलाज भी कराया गया. सब लड़कियों ने कहा कि इन की बात मान जाओ, क्योंकि बाहर तो अब कोई अपनाएगा ही नहीं. मैं रोज सजधज कर तैयार होने लगी.

‘‘लेकिन, मुझे बारबार अपने किए पर पछतावा होता. एक बार वहां से भागने की कोशिश भी की, पर पकड़ी गई. उस रात आंटी ने मेरी खूब पिटाई की और उन के दलाल भूखे भेडि़यों की तरह मेरे ऊपर टूट पड़े.

‘‘वहां की एक लड़की प्रिया ने मुझे समझाया, ‘मेनका, अब तुम्हारे पास इस नरक से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं?है. तुम्हारे साथ कितनी बार तो आंटी के आदमियों ने गैंगरेप किया, तुम्हें क्या हासिल हुआ? इस से तो ग्राहकों की भूख मिटाओगी, कम से कम पैसे तो मिलेंगे. समझौता करने में ही समझदारी है.’

‘‘उस समय मुझे प्रिया की बात ठीक ही लगी और मैं ने अपनेआप को आंटी को सौंप दिया. आंटी बहुत खुश हुईं और मुझे प्यार से रखने लगीं. बस, तब से मेरी ग्राहक को पटाने की ट्रेनिंग शुरू हुई.

‘मुझे दूसरी औरतों के साथ रात के समय सजधज कर भेज दिया जाता. सड़क के किनारे खड़ी हो कर दूसरी लड़कियां अपनी अदाओं से आतेजाते मर्दों को रिझातीं. मैं उन्हें देख कर दंग रह जाती. हर कोई मोटा मुरगा फंसाने की फिराक में रहती.’’

मेनका की बात सुन कर निहाल ने थोड़ा गुस्से में पूछा, ‘‘तुम जब बाहर निकली, तो रात के समय वहां से भाग क्यों नहीं गई?’’

‘‘कैसी बातें करते हैं भैया आप. इतना आसान होता, तो क्या मैं इस धंधे में टिकी रहती? आंटी के दलाल पूरी चौकसी रखते हैं हम पर.’’ मेनका की कहानी सुन कर निहाल की आंखों से आंसू बह निकले.

मेनका आगे बताने लगी, ‘‘दूसरी लड़कियों के साथ मैं भी धीरेधीरे ग्राहक पटाने की ट्रेनिंग ले चुकी थी. शुरू में तो ग्राहक पटाना भी बहुत बुरा लगता था. रात के समय सड़क पर घटिया हरकतें कर अपने अंग दिखा कर उन्हें पटाना पड़ता था.

‘‘उस पर भी लड़कियों में आपस में होड़ मची रहती थी. मैं किसी ग्राहक को जैसेतैसे पटाती, तो रास्ते से ही दूसरी लड़कियां कम पैसों में उसे खींच ले जातीं.

‘‘भैया, मैं नई थी. मुझ से ग्राहक पटते ही नहींथे, तो आंटी बहुत नाराज होतीं. सड़क पर ग्राहक ढूंढ़ने के लिए खड़ी होती, तो लोगों की लालची मुसकान देख कर मेरा दिल दहल जाता. जब कोई पास आ कर बात करता, तो डर के मारे दिल की धड़कनें बढ़ जातीं. कोईकोई तो मेरे पूरे बदन को छू कर भी देखता.

‘‘बस, इतना ही  और उस के लिए तुम्हारी देह का सौदा हर रात होता है,’’ निहाल ने कहा. उस की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे, जिन्हें रोकने की वह नाकाम कोशिश कर रहा था.

‘‘बहुत बुरा हाल था भैया. एक बार एक आदमी बहुत नशे में था. मुझे उस के मुंह से आती शराब की बदबू बरदाश्त नहीं हुई और मैं ने उस से अपना मुंह फेर लिया. वह मुझे गाली देते हुए बोला, ‘तू खुद क्या दूध की धुली है?’

‘‘और उस ने मुझे पूरे बदन पर सारी रात दांतों से काट डाला. मैं बहुत रोई, चीखीचिल्लाई, पर कोई मेरी मदद को न आया.

‘‘अगले दिन आंटी ने चमड़ी उधेड़ दी और बोली, ‘हर ग्राहक को नाराज कर देती है. तेरे प्रेमी को ऐसा क्या दिखा था तुझ में क्या सुख देती तू उस को इसीलिए शायद यहां सड़ने को पटक गया तुझे.’

‘‘यह सब सुन कर मुझे बहुत बुरा लगा. मैं ने सोच लिया कि अब काम करूंगी, तो ठीक से.’’

‘‘फिर तुम वाराणसी से मुंबई कैसे पहुंच गई मुन्नी?’’ निहाल ने पूछा.

‘‘वाराणसी छोटा सा शहर है. लोग पैसा कम देते हैं. ऊपर से कई तरह की छूत की बीमारियां हमें दे जाते हैं. जो पैसे मिलते, वे बीमारियों पर ही खर्च हो जाते.

‘‘एक बार मुंबई की कुछ लड़कियां हमें ट्रेनिंग देने आईं, तो मैं ने उन से कहा कि मुझे भी मुंबई ले चलिए. कम से कम बड़े शहर के लोग रकम तो अच्छी देंगे. मैं थोड़ी पढ़ीलिखी हूं और अंगरेजी भी बोलती हूं, इसलिए उन्हें मैं मुंबई के लायक लगी. सो, मुझे यहां भेज दिया. बस, तब से मैं ने इसे अपने कारोबार की तरह अपना लिया.

‘‘कई बार रेड पड़ी. थाने भी गई. शुरू में डरती थी, लेकिन अब मन को मजबूत कर लिया. अब कोई डर नहीं. जब तक जिंदगी है, इसी नरक में जीती रहूंगी. अब तो ग्राहक भी सोशल मीडिया और ह्वाट्सऐप पर मिल जाते हैं. कोडवर्ड होता है, जिस से हमारे दलाल बात करते हैं,’’ और वह ठहाका लगा कर हंस पड़ी. निहाल मेनका के चेहरे पर ढिठाई की हंसी पढ़ चुका था, फिर भी उस ने पूछा, ‘‘निकलना चाहती हो इस नरक से?’’

वह बोली, ‘‘कौन निकालेगा भैया… आप और उस के बाद कहां जाऊंगी? अपने मम्मीपापा के घर या आप के घर? कौन अपनाएगा मुझे?

‘‘निहाल भैया, अब तो मेरी अर्थी इन गंदी गलियों से ही उठेगी,’’ वह बोली और फिर जोर से ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

‘‘भैया, मेरी तो सारी बातें पूछ लीं, पर आप ने अपनी नहीं बताई कि आज आप यहां कैसे? आप की शादी हुई या नहीं? आप तो बहुत नेक इनसान हुआ करते थे, फिर यहां कैसे?’’ मेनका ने पूछा.

‘‘पूछो मत मुन्नी, मेरी पत्नी किसी और के साथ संबंध रखती है. मुझे तो जैसे नकार ही दिया है. 2 बच्चे भी हैं. मन तो उन के साथ लगा लेता हूं, पर तुम से कैसे कहूं? तन की भूख मिटाने यहां चला आता हूं कभीकभी.

‘‘मुझे नहीं मालूम था कि आज इस जगह तुम से मिलना होगा. सच पूछो तो समझ नहीं आ रहा है कि आज मैं तुम्हें गलत समझूं या सही.

‘‘तुम जैसी न जाने कितनी लड़कियां हम मर्दों को सुख देती हैं और हमारे घर टूटने से बचाती हैं. हम मर्द तो एक रात का सुख ले कर खुश हो जाते हैं. पर हमारे चलते मजबूरी की मारी लड़कियां अपनी जिंदगी को इस नरक में जीने के लिए मजबूर होती हैं और इन बंद गलियों में कीड़ेमकौड़े की जिंदगी जीती?हैं.

‘‘मुझे माफ करो मुन्नी, यह लो तुम्हारी एक रात की कीमत,’’ इतना कह कर निहाल ने मुन्नी की तरफ पैसे बढ़ा दिए.

मेनका ने कहा, ‘‘भैया, मेरा दर्द बांटने के लिए शुक्रिया, पर किसी को घर में न बताना कि मैं यहां हूं. मेरे मम्मीपापा और भाई मुझे गुमशुदा ही समझ कर जीते रहें तो अच्छा, वरना वे तो जीतेजी मर जाएंगे. और इस रात की कोई कीमत नहीं लूंगी आप से.

‘‘आज आप ने मेरा दर्द बांटा है, किसी दिन शायद मैं आप का दर्द बांट सकूं. अपनी बहन समझ कर आना चाहें तो फिर आ जाइए कभी.’’ सुबह होने को थी. निहाल चुपचाप वहां से उठ कर अपने घर आ गया. Best Hindi Kahani

Story In Hindi: यादगार इनाम – विकास ने कैसे की अनजान औरत की मदद

Story In Hindi: रेलवे स्टेशन पर काफी गहमागहमी थी. दीपक अपनी मोटरसाइकिल की बुकिंग के लिए लोकल रेलवे स्टेशन गया था. वह लाल रंग की टीशर्ट पहने हुए था. स्टेशन के लाउडस्पीकर पर एक गाड़ी के आने का ऐलान हो रहा था. बुकिंग क्लर्क उसे रुकने के लिए कह कर माल उतरवाने के लिए प्लेटफार्म पर चला गया.

दीपक के पास कुछ काम तो था नहीं, इसलिए वह प्लेटफार्म पर आ कर ताकझांक करने लगा. तभी वहां से एक खूबसूरत औरत गुजरी. शायद वह किसी को ढूंढ़ रही थी. उस ने एक बार दीपक की तरफ देखा और आगे निकल गई.

रेलवे स्टेशन पर भीड़ कम होने लगी थी. थोड़ी ही देर में वही औरत दीपक की तरफ देखती हुई वापस जा रही थी. अचानक ही वह पलटी और उस ने उदास लहजे में दीपक से पूछा, ‘‘क्या यहां कुली नहीं मिलेगा?’’

दीपक को बड़ा धक्का लगा. कहीं वह उसे लाल टीशर्ट के चलते कुली तो नहीं समझ रही थी.

दीपक ने अनमने मन से कहा, ‘‘होगा जरूर. क्यों, मिला नहीं?’’

‘‘नहीं,’’ उस औरत ने उसे बड़ी उम्मीद भरी निगाहों से देख कर कहा.

‘‘ऐसा कीजिए, रेलवे स्टेशन के बाहर कई रिकशे वाले हैं. रिकशा तो आप करेंगी ही. रिकशे वाले से कहिएगा, वह कुली का भी काम कर देगा,’’ दीपक ने सुझाव दिया.

वह औरत बोली, ‘‘रिकशे वाला तो तैयार है, लेकिन वह कहता है कि रेलवे स्टेशन पर नहीं जा सकता. कुली आफत मचा देंगे. हां, गेट के बाहर आ कर वह सब करने को तैयार है.’’

‘‘यह तो सच है,’’ दीपक ने कहा.

वह औरत अपने गांव से तकरीबन 35-35 किलो गेहूं व चावल के 2 बोरे  लाई थी.

दीपक ने पूछा, ‘‘आप के साथ कोई नहीं है?’’

‘‘11 साल का एक बच्चा है,’’ उस ने कहा.

तभी वहां एक नौजवान कुली आ गया. दीपक ने उस से पूछा, ‘‘ये 2 बोरे गेट के बाहर तक पहुंचा दोगे?’’

‘‘सौ रुपए लगेंगे,’’ उस कुली ने अकड़ कर कहा. वह औरत मन मसोस कर रह गई.

‘‘कुछ रेट तो होता है कि ऐसे ही जो दिल में आए वही बोल देते हो?’’ दीपक ने पूछा.

‘‘रेट तो यही है,’’ कह कर वह कुली चलता बना.

‘चलो, आज इन की मदद कर के कुछ अच्छा काम किया जाए,’ दीपक ने मन ही मन सोचा.

दीपक ने उस औरत से पूछा, ‘‘आप का सामान गेट के बाहर चला जाए, तो फिर आप का काम बन जाएगा न?’’

उस ने ‘हां’ में सिर हिलाया.

दीपक ने फिर पूछा, ‘‘सामान कहां है?’’

‘‘वहां,’’ उस ने इशारा किया.

वहां एक छोटा बच्चा बोरों की रखवाली कर रहा था. दीपक ने उस औरत से पूछा, ‘‘आप एक काम कर सकती हैं?’’

‘‘क्या?’’ उस ने पूछा.

दीपक ने कहा, ‘‘आप को एक तरफ से बोरा पकड़ना होगा.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं…’’ इतना कह कर उस की आंखों में चमक आ गई.

दीपक ने औरत की मदद से 2 बारी में वे दोनों बोरे बाहर रखवा दिए. उस की लाल झकाझक टीशर्ट ऊपर सरक गई थी. हाथ गंदे हो गए थे. गरमी के दिन थे, तो थोड़ी पसीना भी आ गया था. बाल उलटेपुलटे हो गए थे.

दीपक जल्दी से वहां से निबटना चाहता था कि कोई परिचित न मिल जाए और सवालों की ?ाड़ी न लगा दे.

तभी वह औरत दीपक के पास आई, लेकिन दीपक ने उस की तरफ नहीं देखा.

वह बोली, ‘‘शुक्रिया. आप बहुत अच्छे आदमी हैं. आप जैसे लोग कम होते हैं,’’ इतना कह कर वह चली गई.

उस औरत के ये शब्द दीपक के कानों से होते हुए सारी बाधाओं को पार कर सीधे उस के मन में जा कर घुल गए. उस ने मुड़ कर उस औरत को देखने की कोशिश की, लेकिन वह चली गई थी.

दीपक को एक छोटे से काम का उसे कितना बड़ा और यादगार इनाम मिला था. Story In Hindi

Best Hindi Kahani: भटकती जवानी – कविता का अकेलापन

Best Hindi Kahani: कविता को लगा कि जैसे उस के दाएं हाथ पर कुछ रेंगने लगा है. इस के पहले भी उस के बगल में बैठे दर्शक का पैर 2 बार उस के बाएं घुटने से छू गया था. उस समय तो वह इस ओर कोई ध्यान दिए बिना बड़े ध्यान से परदे पर फिल्म देखती रही, लेकिन अब उसे समझाते देर नहीं लगी कि यह बारबार का छू जाना अचानक नहीं है.

सीट पर बैठा दर्शक शायद कविता की शह पाते ही जोश से भर उठा. उस ने अंधेरे में कविता की ओर देखा, फिर उस की ओर झाकते हुए अपना बायां हाथ उठा कर उस के कंधे पर टिका दिया.

कविता एक अजीब सी सिहरन से भर उठी, जैसे उस पर नशा चढ़ने लगा हो.

कविता शादीशुदा थी. अमीर बाप की बेटी होने के बावजूद उस की शादी के पहले की जिंदगी कीचड़ में खिले कमल की तरह साफसुथरी थी. मांबाप, भाईबहन, यहां तक कि उस की भाभियां भी बड़े मौडर्न खयालों की थीं और क्लब वगैरह में जाती थीं, लेकिन कविता को यह सब कभी अच्छा नहीं लगा.

कविता घर से बहुत कम निकलती थी. पढ़ाई में ज्यादा दिलचस्पी होने की वजह से उस का स्कूलकालेज जाना एक मजबूरी थी.

यूनिवर्सिटी का माहौल उसे कभी रास नहीं आया, इसलिए और आगे पढ़ने की इच्छा होते हुए भी उस ने बीए करने के बाद कालेज छोड़ दिया और सारा दिन घर पर ही रहने लगी. कुछ दिन बाद मांबाप ने उस की शादी कर दी थी.

सालभर तक कविता की शादीशुदा जिंदगी बहुत ही अच्छी बीती, लेकिन उस के बाद उस में बदलाव आना शुरू होने लगा.

कविता खुद भी अपने अंदर होने वाले इस बदलाव से परेशान थी. कहां तो वह स्कूलकालेज के दोस्तोंसहेलियों से भी बहुत कम बोलती थी, कहां अब शादी के बाद अचानक उस की कामना इतनी प्रबल हो उठी कि हर समय उस का सारा बदन टीसता रहता था.

कुछ दिन तक तो कविता काफी कोशिशों के बाद अपने पर काबू किए रही, लेकिन आखिरकार वह बेबस हो गई. तब उस ने खुद ही आगे बढ़ कर पड़ोस के एक नौजवान से जानपहचान बढ़ा ली.

कविता ने सोचा था कि उस का पड़ोसी उस की इच्छा समझ जाएगा, लेकिन वह इस मामले में एकदम अनाड़ी था. जब कविता की बरदाश्त के बाहर होने लगा, तो टूट कर उस ने ही एक दिन पति की गैरमौजूदगी में पड़ोसी को घर बुला कर अपनी देह परोस दी.

उस दिन कविता को एक अजीब सा सुख मिला था. इतना सुख, जितना उसे सुहागरात में अपने पति से भी नहीं मिल पाया था.

इस सुख को बारबार भोगने की ललक में कविता अकसर उस नौजवान से मिलने लगी. लेकिन उस के मन की प्यास खत्म होने के बजाय बढ़ती ही जा रही थी. जल्दी ही वह किसी दूसरे मर्द की बांहों में बंधने के लिए बेचैन हो उठी.

इस के बाद तो जैसे यही सिलसिला बन गया. कविता अकसर किसी नौजवान से संबंध बनाती. कुछ दिन उस का संगसाथ उसे बड़ा अच्छा लगता, लेकिन जल्दी ही उकता कर वह कोई नया साथी बनाने के लिए छटपटाने लगती.

एक दिन कविता के पति विवेक को इस सब की जानकारी मिली, तो उसे यकीन ही नहीं हुआ. लेकिन महल्ले के आतेजाते नौजवानों की मजाक भरी नजरें जब बारबार छेदने लगीं, तो उसे बरदाश्त के बाहर हो गया.

एक दिन तिलमिला कर उस ने कविता से इस बारे में पूछा, तो वह रोने लगी. लेकिन उस ने कुछ भी नहीं छिपाया और अपने मन की सारी बात पति को बता दी.

यह सुन कर पति विवेक को गहरा धक्का तो लगा, लेकिन साथ ही उसे यह भी भरोसा था कि कविता धंधे वाली नहीं है.

विवेक ने सब्र से काम लिया. कविता को प्यार से समझबुझ कर वह सही रास्ते पर लाने की कोशिश करने लगा.

कविता ने भी विवेक से वादा किया कि अब वह कभी किसी से नहीं मिलेगी, लेकिन वह तो जैसे आदत से मजबूर थी और अपने तन की भूख मिटाने के लिए वह फिर दूसरे मर्दों की बांहों में खेलने लगती थी.

एक दिन विवेक ने उस से साफसाफ कह दिया, ‘‘अब या तो तुम अपने लफंगे साथियों से संबंध तोड़ लो या मुझे छोड़ दो…’’

कविता को फैसला करने में ज्यादा देर नहीं लगी. उस ने विवेक को ही छोड़ देना बेहतर समझा. वह उसी दिन अपना सामान ले कर उस घर से चली गई और अलग रहने लगी.

कविता ने ढेर सारे दोस्त बना लिए थे. अब जब जिस के साथ मन होता, वह अपनी जिस्मानी प्यास बुझ लेती थी.

उस दिन सिनेमाघर में फिल्म देखते समय बगल वाली सीट पर बैठे दर्शक की हरकतों ने कविता को बुरी तरह से जोश में ला दिया था. आखिरकार उस से रहा नहीं गया, तो वह कसमसाने लगी.

अचानक बिजली चली गई. कविता ने फुसफुसा कर कहा, ‘‘कहीं और चलें क्या?’’

‘‘बताओ कहां चलेंगे?’’ बगल की सीट पर बैठे दर्शक ने घुप अंधेरे का फायदा उठाया और झक कर अचानक कविता के जलते होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

कविता के जिस्म पर हाथ फेरते हुए उस दर्शक ने पूछा, ‘‘कहां चलोगी? अपने घर या मेरे?’’

‘‘जहां चाहो?’’ वह फुसफुसाते हुए बोली.

इस बीच दोनों की सांसों की धड़कनें तेज हो गई थीं, इसलिए फिल्म देखना उन्हें गवारा नहीं लगा. दोनों उस अंधेरे में ही एकदूसरे का हाथ थामे सिनेमाघर से बाहर निकल आए.

उस समय सारे शहर की बिजली चली गई थी. कविता एक रिकशा कर के अपने घर की ओर चल पड़ी और बगल में बैठा उस का अनजान साथी रास्तेभर अंधेरे में उस के जिस्म से छेड़छाड़ कर रहा था.

घर पहुंच कर कविता ने ताला खोल कर जैसे ही अंदर कदम रखा, वैसे ही बिजली आ गई, तो वह एकदम चौंक पड़ी, क्योंकि सिनेमाघर से आया शख्स कोई और नहीं, बल्कि उस का अपना पति विवेक था.

विवेक के साथ रहते समय हरदम किसी पराए मर्द की बांहों में बंधने के लिए तड़पती रहने वाली कविता को उस समय वह भी गैरमर्द जैसा ही लगा.

वह उस से लिपट कर फुसफुसा उठी, ‘‘तुम एकाएक शांत कैसे हो गए जी? तुम्हारे लिए तो मैं ने फिल्म छोड़ दी… आओ, अब जो बाकी काम करना है, उसे भी कर लो…’’

कविता की बात सुन कर विवेक को ऐसा लगा, जैसे वह अपनी ही नजरों में गिर गया हो और अब उसे वहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था. Best Hindi Kahani

Hindi Funny Story: शोरूम का उद्घाटन

Hindi Funny Story: प्यारेलालजी मेरे बड़े अच्छे दोस्त हैं. उन की एक नई जूते की दुकान का आज सुबह उद्घाटन है. पूरे शहर में ‘प्यारे बूट हाउस’ के एक दर्जन से ज्यादा शोरूम हैं. प्यारेलालजी ने जूतेचप्पलों में जो तरक्की की, वह शायद देश की नामी कंपनियों ने भी नहीं की होगी.

प्यारेलालजी के शोरूम में बड़ेबड़े कवि, मंत्री, विधायक, सांसद आने में गर्व महसूस करते हैं, लेकिन उन्होंने एक आम आदमी की पसंद का भी ध्यान रखा है, जैसे रबड़ की चप्पलें भी वहां मिल जाती हैं.

प्यारेलालजी किसी जमाने में बहुत अमीर नहीं थे, लेकिन अपने गरीब बापू की गरीबी पर मन ही मन दुखी
रहते थे.

आज तो नए शोरूम का उद्घाटन करने के लिए उन्होंने एक फिल्मी हीरोइन को बुलवाया था, जो आड़ीतिरछी हो कर हाथों में सैंडल लिए खड़ी थी. उस को देखने के लिए हजारों लोग जमा हो गए थे. उस ने जब हवा में चुंबन फेंके, तो हजारों ने धड़ाधड़ हवाई चप्पलें खरीद लीं.

मैं भी वहां मौजूद था, लेकिन मु झ पर उस ने एक नजर भी नहीं डाली और हम दिल में अपने आ रहे बुढ़ापे को कोसते रहे.

पूरे कार्यक्रम को होतेसमेटते हुए दोपहर बीत गई. हम प्यारेलालजी के साथ बैठे थे. वे कुछ ठंडागरम कहने गए, तो हम प्यारेलालजी की पुरानी यादों में खो गए.

अपने बापू की गरीबी से प्यारेलालजी बड़े दुखी थे. बापू मजदूरी करते थे. पैरों में कांटे गड़ते, धूप लगती, पत्थर चुभते, लेकिन कभी उफ नहीं की थी.

प्यारेलालजी के बापू का एक ही मकसद था कि उन का प्यारे पढ़ जाए, बढ़ जाए, जबकि प्यारेलाल की एक ही इच्छा थी, ‘पढ़लिख कर क्यों जिंदगी बरबाद करूं? ऐसा धंधा शुरू करूं, जिस से जिंदगी मजे से कटे.’

इस बीच प्यारेलालजी आ चुके थे. मु झे कहीं खोया देख वे कह उठे, ‘‘क्यों रे गप्पू, क्या सोच रहा है?’’

‘‘यार, तेरी जिंदगी के ऊंचे हो चुके ग्राफ के बारे में सोच रहा था.’’

‘‘ऐसा मैं ने क्या कर दिया?’’

‘‘आज से 30 साल पहले तेरे पास कुछ नहीं था, पर आज सबकुछ है. दुकानें, शोरूम, हीरोइन…’’

‘‘लेकिन बापू नहीं हैं,’’ उस ने दुखी लहजे में कहा.

‘‘वह तो सच है, पर आज आप हीरोइन के साथ बढि़या लग रहे थे,’’ मैं ने चुटकी ली.

‘‘पूरे 10 लाख रुपए लिए उस ने एक घंटे के लिए.’’

‘‘10 लाख…’’ मैं ने तकरीबन चीखते हुए पूछा.

‘‘हां यार, वसूल भी हो गए.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘पूरे 2 लाख रुपए की चप्पलें बिक गईं और 8 लाख रुपए का फोकट में इश्तिहार भी हो गया,’’ प्यारेलालजी ने बाजार को पकड़ते हुए कहा.

‘‘प्यारे, ये जूतेचप्पल का आइडिया बापू को तू ने कैसे दिया? आखिर इस के पीछे का राज क्या था? थोड़ा बता तो?’’

प्यारेलालजी ने आंख मारी, फिर कहने लगा, ‘‘कहीं तू नई दुकान तो नहीं खोल लेगा…’’

‘‘बिलकुल नहीं, लेकिन तू बता तो.’’

प्यारेलालजी ने दाएंबाएं देखा और कहना शुरू किया, ‘‘तू तो जानता था कि मैं बापू की गरीबी से परेशान था. मैं ने सोचा कि क्यों न ऐसा काम करूं, जिस से मैं अमीर भी हो जाऊं और पैसा भी न लगे.’’

‘‘तो फिर क्या हुआ?’’

‘‘होना क्या था. एक दिन दिमाग में एक आइडिया आया. एक जगह शादी हो रही थी, मैं वहां से एक दर्जन जूतेचप्पल चुरा लाया.’’

‘‘चोरी की…’’

‘‘तू सुन तो…’’

‘‘वहां लोगों ने खूब गालियां दीं. मेरा मन उदास हो गया.’’

‘‘फिर…’’

‘‘फिर क्या, मैं ने दूसरी जगह शादी का घर खोजा. वहां पर खाना खाने के पहले उतारे गए जूतेचप्पलों में से हर जोड़ी का एकएक जूताचप्पल ले आया.

‘‘जब खाने के बाद लोग बाहर निकले, तो उन्हें वह रिश्तेदारों की शरारत लगी. लिहाजा, वे एकएक जूतेचप्पल को वहीं छोड़ कर चले गए. मैं उन्हें भी उठा लाया. खालिस मुनाफा था…’’

‘‘फिर क्या किया?’’

‘‘मेरा हौसला बढ़ गया. मैं ने मंदिरमसजिदों, पार्टियों, शादियों वगैरह में जाना शुरू कर दिया और मौका देख कर हर जोड़ी का एकएक जूता या चप्पल उठा कर गायब हो जाता था.

‘‘जूतेचप्पल वाले आखिर में मेरे लिए दूसरा जूता या चप्पल और छोड़ जाते थे.

देखते ही देखते घर में जूतेचप्पलों का ढेर लग गया था. उन्हें साफ और पौलिश कर के सस्ते जूतेचप्पलों की दुकान की तर्ज पर मैं ने घर से ही जूतेचप्पल बेचने शुरू कर दिए.’’

‘‘फिर…’’

‘‘मेरी सब से ज्यादा मदद की मंत्रियों और कवियों ने.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि उन कवियों और नेताओं की मीटिंग में सब से ज्यादा जूतेचप्पल फेंके जाते थे, जो अपने काम में आने लगे. इस के अलावा बाबाओं ने भी बहुत सहयोग दिया.’’

‘‘क्या मतलब…?’’

‘‘उन की सभा के बाहर स्वयंसेवक बन कर जूतेचप्पल चुरा लो या फिर वहां भगदड़ मचने पर कईकई दर्जन जूतेचप्पल मुफ्त में मिल जाते हैं.

‘‘दोस्त, बस इन्हीं जूतेचप्पलों की बदौलत मैं ने जूतेचप्पल बेचने का धंधा शुरू किया.

‘‘हमारे पूरे इलाके में डेढ़ सौ प्रतिनिधि हैं, जो जूतेचप्पल इकट्ठा करने का काम करते हैं. एक दर्जन कारीगर जूतेचप्पल ठीक करने का काम करते हैं और आज पूरे शहर में कोई हम से होड़ नहीं कर सकता है,’’ प्यारेलालजी ने अकड़ से कहा.

‘‘बिलकुल नहीं यार, लेकिन अगले शोरूम के उद्घाटन में तुम जिस खास शख्स को बुलाओ, उस का एक फोटो मेरे साथ जरूर खिंचवा देना.’’

‘‘जरूर, पर एक वादे के साथ.’’

‘‘कैसा वादा?’’

‘‘यह अंदर की बात किसी से न कहना. अपने तक ही रखना, वरना कहीं जनता, मंत्री, श्रद्धालु और नमाजी जूते पहनना ही न छोड़ दें. मेरा धंधा चौपट हो जाएगा.’’

‘‘वचन देता हूं कि मैं यह बात किसी से नहीं कहूंगा,’’ यह कह कर मैं घर लौट आया.

चूंकि मैं ने यह वादा किसी से न कहने का किया था, लिख कर बताने का नहीं. सो, मैं ने यह बात आप को लिख कर बता दी. Hindi Funny Story

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