फर्क कथनी और करनी का : सुच्चामल फैला रहा था रायता

सुच्चामल हमारी कालोनी के दूसरे ब्लौक में रहते थे. हर रोज मौर्निंग वाक पर उन से मुलाकात होती थी. कई लोगों की मंडली बन गई थी. सुबह कई मुद्दों पर बातें होती थीं, लेकिन बातों के सरताज सुच्चामल ही होते थे. देशदुनिया का ऐसा कोई मुद्दा नहीं होता था जिस पर वे बात न कर सकें. उस पर किसी दूसरे की सहमतिअसहमति के कोई माने नहीं होते थे, क्योंकि वे अपनी बात ले कर अड़ जाते थे. उन की खुशी के लिए बाकी चुप हो जाते थे. बड़ी बात यह थी कि वे, सेहत के मामले में हमेशा फिक्रमंद रहते थे. एकदम सादे खानपान की वकालत करते थे. मोटापे से बचने के कई उपाय बताते थे. दूसरों को डाइट चार्ट समझा देते थे. इतना ही नहीं, अगले दिन चार्ट लिखित में पकड़ा देते थे. फिर रोज पूछना शुरू करते थे कि चार्ट के अनुसार खानपान शुरू किया कि नहीं. हालांकि वे खुद भी थोड़ा थुलथुल थे लेकिन वे तर्क देते थे कि यह मोटापा खानपान से नहीं, बल्कि उन के शरीर की बनावट ही ऐसी है.

एक दिन सुबह मुझे काम से कहीं जाना पड़ा. वापस आया, तो रास्ते में सुच्चामल मिल गए. मैं ने स्कूटर रोक दिया. उन के हाथ में लहराती प्लास्टिक की पारदर्शी थैली को देख कर मैं चौंका, चौंकाने का दायरा तब और बढ़ गया जब उस में ब्रैड व बड़े साइज में मक्खन के पैकेट पर मेरी नजर गई. मैं सोच में पड़ गया, क्योंकि सुच्चामल की बातें मुझे अच्छे से याद थीं. उन के मुताबिक वे खुद भी फैटी चीजों से हमेशा दूर रहते थे और अपने बच्चों को भी दूर रखते थे. इतना ही नहीं, पौलिथीन के प्रचलन पर कुछ रोज पहले ही उन की मेरे साथ हुई लंबीचौड़ी बहस भी मुझे याद थी.

वे पारखी इंसान थे. मेरे चेहरे के भावों को उन्होंने पलक झपकते ही जैसे परख लिया और हंसते हुए पिन्नी की तरफ इशारा कर के बोले, ‘‘क्या बताऊं भाईसाहब, बच्चे भी कभीकभी मेरी मानने से इनकार कर देते हैं. कई दिनों से पीछे पड़े हैं कि ब्रैडबटर ही खाना है. इसलिए आज ले जा रहा हूं. पिता हूं, बच्चों का मन रखना भी पड़ता है.’’

‘‘अच्छा किया आप ने, आखिर बच्चों का भी तो मन है,’’ मैं ने मुसकरा कर कहा.

‘‘नहीं बृजमोहन, आप को पता है मैं खिलाफ हूं इस के. अधिक वसा वाला खानपान कभीकभी मेरे हिसाब से तो बहुत गलत है. आखिर बढ़ते मोटापे से बचना चाहिए. वह तो श्रीमतीजी भी मुझे ताना देने लगी थीं कि आखिर बच्चों को कभी तो यह सब खाने दीजिए, तब जा कर लाया हूं.’’ थोड़ा रुक कर वे फिर बोले, ‘‘एक और बात.’’

‘‘क्या?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा, तो वे नाखुशी वाले अंदाज में बोले, ‘‘मुझे तो चिकनाईयुक्त चीजें हाथ में ले कर भी लगता है कि जैसे फैट बढ़ रहा है, चिकनाई तो दिल की भी दुश्मन होती है भाईसाहब.’’

‘‘आइए आप को घर तक छोड़ दूं,’’ मैं ने उन्हें अपने स्कूटर पर बैठने का इशारा किया, तो उन्होंने सख्त लहजे में इनकार कर दिया, ‘‘नहीं जी, मैं पैदल चला जाऊंगा, इस से फैट घटेगा.’’

आगे कुछ कहना बेकार था क्योंकि मैं जानता था कि वे मानेंगे ही नहीं. लिहाजा, मैं अपने रास्ते चला गया.

2 दिन सुच्चामल मौर्निंग वौक पर नहीं आए. एक दिन उन के पड़ोसी का फोन आया. उस ने बताया कि सुच्चामल को हार्टअटैक आया है. एक दिन अस्पताल में रह कर घर आए हैं. अब मामला ऐसा था कि टैलीफोन पर बात करने से बात नहीं बनने वाली थी. घर जाने के लिए मुझे उन की अनुमति की जरूरत नहीं थी. यह बात इसलिए क्योंकि वे कभी भी किसी को घर पर नहीं बुलाते थे बल्कि हमारे घर आ कर मेरी पत्नी और बच्चों को भी सादे खानपान की नसीहतें दे जाते थे.

मैं दोपहर के वक्त उन के घर पहुंच गया. घंटी बजाई तो उन की पत्नी ने दरवाजा खोला. मैं ने अपना परिचय दिया तो वे तपाक से बोलीं, ‘‘अच्छाअच्छा, आइए भाईसाहब. आप का एक बार जिक्र किया था इन्होंने. पौलिथीन इस्तेमाल करने वाले बृजमोहन हैं न आप?’’

‘‘ज…ज…जी भाभीजी.’’ मैं थोड़ा झेंप सा गया और समझ भी गया कि अपने घर में उन्होंने खूब हवा बांध रखी है हमारी. सुच्चामल के बारे में पूछा, तो वे मुझे अंदर ले गईं. सुच्चामल ड्राइंगरूम के कोने में एक दीवान पर पसरे थे. मैं ने नमस्कार किया, तो उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकान आई. चेहरे के भावों से लगा कि उन्हें मेरा आना अच्छा नहीं लगा था. हालचाल पूछा, ‘‘बहुत अफसोस हुआ सुन कर. आप तो इतना सादा खानपान रखते हैं, फिर भी यह सब कैसे हो गया?’’

‘‘चिकनाई की वजह से.’’ जवाब सुच्चामल के स्थान पर उन की पत्नी ने थोड़ा चिढ़ कर दिया, तो मुझे बिजली सा झटका लगा, ‘‘क्या?’’

‘‘कैसे रोकूं अब इन्हें भाईसाहब. ऐसा तो कोई दिन ही नहीं जाता जब चिकना न बनता हो. कड़ाही में रिफाइंड परमानैंट रहता है. कोई कमी न हो, इसलिए कनस्तर भी एडवांस में रखते हैं.’’ उन की बातों पर एकाएक मुझे विश्वास नहीं हुआ.

‘‘लेकिन भाभीजी, ये तो कहते हैं कि चिकने से दूर रहता हूं?’’

‘‘रहने दीजिए भाईसाहब. बस, हम ही जानते हैं. किचेन में दालों के अलावा आप को सब से ज्यादा डब्बे तलनेभूनने की चीजों से भरे मिलेंगे. बेसन का 10 किलो का पैकेट 15 दिन भी नहीं चलता. बच्चे खाएं या न खाएं, इन को जरूर चाहिए. बारिश की छोड़िए, आसमान में थोड़े बादल देखते ही पकौड़े बनाने का फरमान देते हैं.’’

यह सब सुन कर मैं हैरान था. सुच्चामल का चेहरा देखने लायक था. मन तो किया कि उन की हर रोज होने वाली बड़ीबड़ी बातों की पोल खोल दूं, लेकिन मौका ऐसा नहीं था. सुच्चामल हमेशा के लिए नाराज भी हो सकते थे. यह राज भी समझ आया कि सुच्चामल अपने घर हमें शायद पोल खुलने के डर से क्यों नहीं बुलाना चाहते थे. इस बीच, डाक्टर चैकअप के लिए वहां आया. डाक्टर ने सुच्चामल से उन का खानपान पूछा, तो वह चुप रहे. लेकिन पत्नी ने जो डाइट चार्ट बताया वह कम नहीं था. सुच्चामल सुबह मौर्निंग वाक से आ कर दबा कर नाश्ता करते थे.

हर शाम चाय के साथ भी उन्हें समोसे चाहिए होते थे. समोसे लेने कोई जाता नहीं था, बल्कि दुकानदार ठीक साढ़े 5 बजे अपने लड़के से 4 समोसे पैक करा कर भिजवा देता था. सुच्चामल महीने में उस का हिसाब करते थे. रात में भरपूर खाना खाते थे. खाने के बाद मीठे में आइसक्रीम खाते थे. आइसक्रीम के कई फ्लेवर वे फ्रिजर में रखते थे. मैं चलने को हुआ, तो मैं ने नजदीक जा कर समझाया, ‘‘चलता हूं सुच्चामल, अपना ध्यान रखना.’’

‘‘ठीक है.’’

‘‘चिकने से परहेज कर के सादा खानपान ही कीजिए.’’

‘‘मैं तो सादा ही…’’ उन्होंने सफाई देनी चाही, लेकिन मैं ने बीच में ही उन्हें टोक दिया, ‘‘रहने दीजिए, तारीफ सुन चुका हूं. डाक्टर साहब को भी भाभीजी ने आप की सेहत का सारा राज बता दिया है.’’ मेरी इस सलाह पर वे मुझे पुराने प्राइमरी स्कूल के उस बच्चे की तरह देख रहे थे जिस की मास्टरजी ने सब से ज्यादा धुनाई की हो. अगले दिन मौर्निंग वाक पर गया, तो हमारी मंडली के लोगों को मैं ने सुच्चामल की तबीयत के बारे में बताया, तो वे सब हैरान रह गए.

‘‘कैसे हुआ यह सब?’’ एक ने पूछा, तो मैं ने बताया, ‘‘अजी खानपान की वजह से.’’

एक सज्जन चौंक कर बोले, ‘‘क्या…? इतना सादा खानपान करते थे, ऐसा तो नहीं होना चाहिए.’’

‘‘अजी काहे का सादा.’’ मेरे अंदर का तूफान रुक न सका और सब को हकीकत बता दी. मेरी तरह वे भी सुन कर हैरान थे. सुच्चामल छिपे रुस्तम थे. कुछ दिनों बाद सुच्चामल मौर्निंग वाक पर आए, लेकिन उन्होंने खानपान को ले कर कोई बात नहीं की. 1-2 दिन वे बोझिल और शांत रहे. अचानक उन का आना बंद हो गया.

एक दिन पता चला कि वे दूसरे पार्क में टहल कर लोगों को अपनी सेहत का वही ज्ञान बांट रहे हैं जो कभी हमें दिया करते थे. हम समझ गए कि सुच्चामल जैसे लोग ज्ञान की गंगा बहाने के रास्ते बना ही लेते हैं. यह भी समझ आ गया कि कथनी और करनी में कितना फर्क होता है. सुच्चामल से कभीकभी मुलाकात हो जाती है, लेकिन वे अब सेहत के मामले पर नहीं बोलते.

मायके जाने की धमकी : मिर्जा को आया गुस्सा

उस दिन मिर्जा इस तरह से फुफकारते हुए चले आ रहे थे, जैसे जलेबी का खमीर उबाल खा रहा हो. बाल ऐसे बिखरे हुए थे, जैसे तूफान आने के बाद पेड़ गिरे होते हैं. जुमे का दिन और… दिन के 11 बजे मिर्जा मैलेकुचैले कपड़ों में? देखते ही मुझ पर तो जैसे आसमान की बिजली गिर पड़ी.

मैं ने अपनेआप को बड़ी मुश्किल से काबू में किया और मन ही मन कहा. ‘जलते जलाल तू, कुदरत कमाल तू, आई बला को टाल तू,’ फिर झपट कर मिर्जा का हाथ थामा और कहा, ‘‘मिर्जा, यह तुम ही हो…’’

ऐसा सुनना था कि मिर्जा गरजते हुए बोले, ‘‘तो क्या तुझे मोनिका लेवेंस्की दिखाई दे रही है?’’

मैं ने मौके की नजाकत को समझा और कहा, ‘‘यार, मैं ने तो यों ही कहा था. पहले अंदर आओ.’’

उन्हें सोफे पर बैठाते हुए मैं बोला, ‘‘देख मिर्जा, मैं तेरा लंगोटिया यार हूं. मुझे बता कि आज तू ने जुमे की तैयारी क्यों नहीं की? जुमे के दिन 11 बजे तक तो तुम दूल्हे की तरह सजसंवर कर जामा मसजिद में इमाम साहब के सामने खड़े हो कर अजान पढ़ा करते थे. लेकिन आज यहां पर, वह भी इस हालत में… कहीं भाभी ने…’’

मैं बात पूरी उगल भी न पाया था कि मिर्जा गरजते हुए बोले, ‘‘अगर तू वाकई मेरा सच्चा यार है, तो बता कि शादी पर औरत ही क्यों ब्याह कर लाई जाती है? मर्द को ब्याह कर ससुराल क्यों नहीं ले जाया जाता?’’

यह सुनते ही मेरा दिमाग घूम गया. मैं ने हंस कर कहा, ‘‘यार मिर्जा, तू यह बता कि पान की लत तो खैर तुम्हें विरासत में ही मिली है, अब कहीं भांग वगैरह तो नहीं लेनी शुरू कर दी?’’

मिर्जा तमतमा उठे और बोले, ‘‘एक मुसलमान पर इस तरह की तुहमत लगाते हो. क्या तू ने मुझे काफिर समझा है? मैं पक्का मुसलमान हूं और सात वक्त की नमाज पढ़ता हूं.’’

अब तो मेरा वहम यकीन में बदल चुका था. शायद खुदा ने दो वक्त अलग से मिर्जा को दिए हैं. तभी मिर्जा बोले, ‘‘मैं इशराक व तहज्जुद 12 महीने की पढ़ता हूं.’’ इस के बाद मिर्जा खड़े होते हुए बोले, ‘‘तू भी मेरा दुख बांटने वाला वह सच्चा यार नहीं रहा.’’

मिर्जा की आवाज भर्रा गई थी और गला रुंध गया था. मैं ने सोफे पर बैठाते हुए मिर्जा को समझाया, ‘‘तुम गलत समझ रहे हो. मुझे आज भी तुम से उतनी ही हमदर्दी है, जितनी कभी कुंआरेपन में भी नहीं रही होगी.’’

‘‘तो क्या औरतों के मायके जाने की धमकी जायज है?’’ मिर्जा बोले. मेरी समझ में अब सारा माजरा आ रहा था कि आज जरूर इन की बेगम ने मायके जाने की धमकी दी है और यह जोरू का परमानैंट गुलाम मिर्जा उसे बरदाश्त नहीं कर पा रहा है.

मैं ने कहा, ‘‘जायज तो नहीं है, पर मर्दों से लड़ने के वास्ते फर्स्ट क्वालिटी का हथियार तो यही है न?’’ इतना सुनते ही मिर्जा एकदम आपे से बाहर हो गए और बोले, ‘‘तो क्या दूसरा हथियार भी होता है?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां मिर्जा, तुम तो खुशनसीब हो, जो भाभी ने अपना दूसरा हथियार यानी बेलन तुम्हें नहीं दिखाया.’’

मिर्जा गुस्से में भड़क कर चिल्लाए, ‘‘अरे बेवकूफ, मत पूछ कि आज तो उस ने अमेरिका इराक युद्ध की तरह अपने बड़े हथियार का भी इस्तेमाल कर लिया. यह तो अच्छा हुआ कि मैं किवाड़ के पास खड़ा था, फुरती से उस की आड़ ले ली, नहीं तो जुमे की नमाज के साथ आज तो अपनी भी नमाजे जनाजा अदा की जाती.’’

मैं ने मिर्जा से कहा, ‘‘चलो, अच्छा हुआ, लेकिन अभी तक तुम्हारी दूल्हा ब्याह कर ले जाने वाली बात समझ में नहीं आई.’’

यह सुन कर मिर्जा कुछ संजीदा हो कर बोले, ‘‘देख, ध्यान से सुन. घर में तकरार होने पर बीवी हमेशा मायके जाने की धमकी देती है और यह धमकी अच्छेअच्छे मर्द को मेमने की तरह मिमियाने को मजबूर कर देती है.

‘‘अगर दूल्हा ब्याह कर ससुराल ले जाया जाता, तो बेलन वगैरह का खतरा होने पर मायके जाने की धमकी को काम में ला सकता था और मर्द सीना तान कर ससुराल में शान से राज करता.’’

मैं ने मिर्जा की बात पर दिखावटी हमदर्दी दिखाते हुए कहा, ‘‘देखो, जैसे एक जीभ बत्तीस दांतों से घिरी हो कर काबू में नहीं रह सकती, उसी तरह औरत ससुराल में अकेली सभी पर भारी पड़ती है. ‘‘अगर तुम्हारे चालू फार्मूले पर समाज चलता, तो बच्चू मिर्जा, खोपड़ी का नटबोल्ट कस कर समझ ले कि अगर दूल्हा ससुराल में रहता, तो पता है क्या होता? होता यह कि पत्नी बेलन से तुम्हारा सिर तोड़ती.

‘‘अगर जीजा साले की बहन को घूर कर भी धमकाता, तो वे उसे लठिया देते. सासससुर के उपदेश अलग से दिमाग चाट कर रख देते.‘‘सालियां अमरबेल की तरह तुम्हारे जेबरूपी पेड़ को परजीवी बन कर सुखा देतीं. सालों के बच्चों को जिद करने पर न जाने महीने में कितनी बार फिल्म दिखाने ले जाना पड़ता और तब भी वे घर आ कर कहते, ‘पापापापा, फूफाजी ने फिल्म तो दिखाई, पर हमें वहां चाट नहीं खिलाई.’

‘‘इस तरह तुम्हें बेकार में ही कंजूस मक्खीचूस की उपाधि मिल जाती. भले ही तुम ने चाट पर मक्खियों का परमानैंट कब्जा होने के चलते न खिलाई हो, पर इसे कोई नहीं मानता.

‘‘अगर चाट खिलाने से बच्चे बीमार पड़ जाते, तो सास ऐसे लताड़ती जैसे कि पता नहीं क्या खिला लाया. बड़ी मनौतियां मान कर 2 पोते हुए, इन्हें तो मार कर ही इस का कलेजा ठंडा होगा.

‘‘इसलिए मिर्जा, जो कायदेकानून हमारे बड़ों ने बनाए हैं, वे जरूर सोचसमझ कर ही बनाए हैं, इसलिए तू अपना दिल छोटा न कर और भाभी को अपने मन की भड़ास निकाल लेने दिया कर… समझे हजरत मिर्जा?’’

अब मिर्जा धीरेधीरे मुसकराए और बोले, ‘‘यार, वाकई आज तो तू ने कमाल कर दिया. इतने काम की बात मेरे दिमाग में आज तक क्यों नहीं आई? मैं ने इतनी उम्र यों ही गंवाई.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, अब जा कर घर में जुमे की नमाज अदा कर. और हां, दुआ में मुझे मत भूल जाना और भाभी की अच्छी सेहत की दुआ जरूर मांगना.’’ यह सुन कर मिर्जा झेंपते हुए अपने घर की तरफ चल दिए.

नो प्रौब्लम : रितिका के साथ राघव ने क्या किया..

‘‘प्लीज राघव, मैं अब सोने जा रही हूं. बाहर काफी ठंड है. बाद में बात करते हैं,’’ रितिका ने राघव को समझाया.

सचमुच रितिका को ठंड लग गई थी. पूरा दिन औफिस में खटने के बाद कमरे में मोबाइल पर बात करना तक संभव नहीं था. कारण, वह पीजी में रहती थी. एक कमरा 3 युवतियां शेयर करती थीं. वह तो पीजी की मालकिन अच्छी थीं जो ज्यादा परेशान नहीं करती थीं वरना रितिका इस से पहले 3 पीजी बदल चुकी थी.

राघव को उस की परेशानी का भान था पर फिर भी वह उसे बिलकुल नहीं समझता था. रितिका ने राघव को कई बार दबे स्वर में विवाह के लिए कहना शुरू कर दिया था परंतु वह बड़ी सफाई से बात घुमा देता था.

रितिका डेढ़ साल पहले करनाल से दिल्ली नौकरी करने आई थी. रहने के लिए रितिका ने एक पीजी फाइनल किया. जहां उस की रूममेट रिंपी थी जो पंजाब से थी. कमरा भी ठीक था. नई नौकरी में रितिका ने खूब मेहनत की.

रितिका तो दिन भर औफिस में रहती थी, पर रिंपी के पास कोई काम नहीं था. सो वह दिन भर पीजी में ही रहती थी. कभीकभी बाहर जाती तो देर रात ही वापस आती. ऐसे में रितिका चुपके से उस के लिए दरवाजा खोल देती.

धीरेधीरे दोनों की दोस्ती गहरी होती जा रही थी. अब रिंपी ने अपने दोस्तों से रितिका को भी मिलवाना शुरू कर दिया था. राघव से भी रिंपी के जरिए ही मुलाकात हुई. तीनों शौपिंग करते, लेटनाइट डिनर और डिस्क में जाते.

पीजी मालकिन ने अचानक दोनों युवतियों को लेटनाइट आते देख लिया. उस ने कुछ कहा तो रितिका ने पीजी मालकिन से झगड़ा कर दिया. उस दिन उस ने शराब पी रखी थी.

फिर क्या था, रितिका को पीजी छोड़ना पड़ा. उस के बाद रितिका ने 2 पीजी और बदले. रिंपी भी पंजाब वापस चली गई थी. उस के मातापिता ने उस का रिश्ता पक्का कर दिया था.

आज शाम को रितिका को राघव के साथ बाहर जाना था. राघव ने फोन पर कई बार उस से कहा था कि अपनी फ्रैंड्स को भी साथ में लाए.

फ्री की शराब और डिनर के लिए शाइना तैयार हो गई. शाइना को देख कर राघव बहुत खुश हुआ. बेहद खूबसूरत शाइना को देख कर राघव रितिका को बिलकुल भूल ही गया.

कार का दरवाजा भी शाइना के लिए राघव ने ही खोला. डिनर और शराब भी शाइना की पसंद की हीमंगवाई गई, लेकिन इस से रितिका को अपना तिरस्कार लगा और रितिका की आंखों में आंसू आ गए.

पीजी आ कर रितिका पूरी रात रोती रही. अगले दिन इतवार था. राघव ने रितिका को एक फोन भी नहींकिया. तभी रात को शाइना रितिका के पास आ कर कहने लगी, ‘‘प्लीज रितिका, तुम अपने बौयफ्रैंड को समझा लो. देखो, कितनी मिस्ड कौल पड़ी हैं. मैं अपनी लाइफ में तुम्हारे स्टुपिड राघव की वजह से कोई प्रौब्लम नहीं चाहती. मेरा बंदा वैसे ही बहुत पजैसिव है मेरे लिए.’’

रितिका को बहुत बुरा लग रहा था. उस ने शाइना को सुझाव दिया कि वह राघव को ब्लौक कर दे. अब राघव ने रितिका को फोन किया. पहले तो उस ने फोन नहीं उठाया, फिर राघव का मैसेज पढ़ा, ‘‘डार्लिंग, तैयार हो जाओ. मैं तुम्हें अपने मम्मीपापा से मिलवाना चाहता हूं.’’

बस, रितिका तुरंत पिघल गई. उस ने पीजी में सभी लड़कियों को सुनासुना कर आगे का मैसेज पढ़ा.

‘‘मैं तुम्हें जैलेस यानी जलाना चाहता था. तुम्हें छोड़ कर मैं किसी लड़की की तरफ नजर भी नहीं डालता. आई लव यू सो मच.’’

रितिका ने गुलाबी रंग का सूट और हलकी ज्वैलरी पहनी. हलके मेकअप में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी. उसे देखते ही राघव बौखला गया, ‘‘यह क्या है. ये सब पहन कर चलोगी मेरे साथ. जाओ, चेंज कर के आओ.’’

‘‘पर तुम अपने पेरैंट्स से मिलवाने वाले थे न,’’ रितिका हैरानी से बोली.

‘‘ओह हां, मेरी मां मौडर्न हैं. आज अचानक मम्मीपापा किसी रिश्तेदार को देखने अस्पताल गए हैं,’’ राघवको गुस्सा आ रहा था.

रितिका ने ड्रैस चेंज कर ली. राघव ने बहलाफुसला कर रितिका को समझा दिया था. फिर एक दिन रितिका के पापा ने उसे फोन कर के बताया कि उन्होंने रितिका के लिए लड़का पसंद कर लिया है.

उस ने राघव को फौरन अपने मम्मीपापा से मिलवाने को कहा. राघव ने उसे फिर से फुसला कर चुप कराना चाहा, ‘‘मेरे मम्मीपापा यूरोप गए हैं. 2 महीने बाद ही लौटेंगे.’’

‘‘ठीक है, तो मेरे पापा से मिल लो,’’ इस पर राघव बिना कोई जवाब दिए रितिका को कल मिलने की बात कह कर चला गया.

रितिका बेहद परेशान थी. राघव के साथ वह सारी हदें पार कर चुकी थी. पीजी में रहना तो उस की मजबूरी थी. राघव ने एक छोटे से फ्लैट का इंतजाम किया हुआ था. वहीं रितिका और राघव अपना समय बिताते थे.

उस ने रिंपी को फोन किया. राघव के बरताव के बारे में सबकुछ बताया. रिंपी भी दोस्त न हो कर ऐसे बात कर रही थी मानो अजनबी हो, ‘‘देखो रितिका, मुझे नहीं पता तुम क्या कह रही हो. राघव तो शादीशुदा है. वह तुम से कैसे शादी कर सकता है.’’

‘‘तुम ने मुझे ऐसे लड़के के साथ क्यों फंसाया,’’ रितिका ने रोना शुरू कर दिया था.

‘‘उस के पैसे से तुम घूमीफिरी, ऐश किया और इलजाम मुझ पर. मुझे आगे से फोन मत करना,’’ रिंपी ने टका सा जवाब दे कर फोन काट दिया, ‘‘और हां, पापा की मरजी से शादी कर लो. अरेंज मैरिज सब से अच्छी होती है. पापा भी खुश और तुम भी खुश. नो प्रौब्लम एट औल.’’

रितिका भी दोचार दिन रोनेधोने के बाद संभल गई. फोन कर के मम्मीपापा को पूछने लगी कि घर कब आना है. इस जमाने में दिल्ली जैसे महानगर में भी पापा की मरजी से शादी करने वाली लड़की पा कर मातापिता निहाल हो गए थे. रितिका ने भी अपनी प्रौब्लम सुलझा ली थी.

रहिमन दाढ़ी राखिए : आम आदमी का गणित

मैं जवानी के दिनों में कंजूस नस्ल का आदमी था, इसलिए आदतन हमेशा बचत की तरकीबों के बारे में ही सोचता रहता था. एक दिन जब मैं अपने पड़ोसी वर्माजी से अखबार मांग कर पढ़ रहा था, तो अखबार में छपी एक खबर देख कर मुझे झटका सा लगा. सूचना इस तरह से थी, ‘एक आदमी अपनी पूरी जिंदगी में दाढ़ी बनाने पर तकरीबन एक लाख रुपए और एक साल बरबाद कर देता है’. खबर पढ़ते ही मैं अपने दूसरे पड़ोसी शर्माजी के घर भागा.

उन से कैलकुलेटर ले कर अपनी दाढ़ी बनाने पर खर्च किए गए पैसों का हिसाब लगाने लगा. हिसाब लगाने के बाद मुझे थोड़ी राहत मिली कि मैं ने दाढ़ी बनाने पर ज्यादा खर्च नहीं किया है, क्योंकि मैं हमेशा अपनी दाढ़ी दूसरों के घर बनाना पसंद करता हूं. लेकिन, जज्बाती आदमी होने की वजह से मुझे अफसोस भी हुआ कि मेरी दाढ़ी के चक्कर में मेरा न सही, पर दूसरों का ही खर्च तो हुआ.

यह बात मेरे दिल में कील की तरह चुभ गई. इसलिए मैं ने उसी दिन तय कर लिया कि आज से दाढ़ी नहीं बनाऊंगा. इरादे पर अमल करते हुए 2 महीने बीत गए. मेरी दाढ़ी अच्छीखासी बढ़ गई थी. मैं चेहरे से आतंकवादी नजर आने लगा. इस का फायदा उठा कर मेरे एक दुश्मन पड़ोसी ने थाने में मेरी शिकायत कर दी कि मेरा चेहरा ‘इंडियाज मोस्ट वांटेड’ में दिखाए गए एक दुर्दांत अपराधी से मिलता है. बस, पुलिस को और क्या चाहिए. पहुंच गई मेरे दरवाजे पर. पुलिस मुझे पकड़ कर ले जाने लगी.

किसी तरह एक हजार रुपए दे कर इस मुसीबत से पीछा छुड़ाया, लेकिन फिर भी मैं अपने इरादे पर डटा रहा. अचानक एक दिन मेरी मुलाकात पुरानी प्रेमिका रितु से हो गई, जो कुकिंग कोर्स करने के लिए अमेरिका गई हुई थी. वह तो मुझे देखते ही डर गई. उसे लगा कि मैं ने उस की जुदाई में ही देवदास की तरह दाढ़ी बढ़ा ली है. रितु अचानक चिल्लाते हुए बोली, ‘‘अगर इसी तरह मजनूछाप चेहरा बनाए रहे, तो मुझ से शादी करना तो दूर, तुम सगाई भी नहीं कर पाओगे.’’ दाढ़ी बनाने के लिए 2 रुपए का सिक्का मेरे हाथ में थमा कर वह पैर पटकती हुई चली गई. लेकिन, मैं भी धुन का पक्का था. मैं ने भी सोच लिया था कि चाहे जो हो जाए, मैं अपने इरादे पर डटा रहूंगा, इसलिए मैं ने रितु का दिल तोड़ दिया. अब लोगों में मेरी अलग ही पहचान बन चुकी थी. मैं संन्यासी निरोधानंद के नाम से जाना जाने लगा था.

बढ़ी हुई दाढ़ी मेरे लिए वरदान साबित हुई. जैसा कि अपने देश में होता है, अचानक मेरे चमत्कार के चर्चे दूरदूर तक फैलने लगे. औरत, मर्द, बच्चे और बूढ़े मेरे पैर छू कर आशीर्वाद लेने लगे. इस से मैं खुशी से फूला न समाता था. लोग मेरी बातें सुनने के लिए बेचैन रहते थे. कोई मुझ से अपनी दिमागी तकलीफ का हल पूछता, तो कोई दूसरी तकलीफों से नजात पाने के बारे में पूछता. कोई अपने गुजरे समय के बारे में पूछता, तो कोई आने वाली जिंदगी के बारे में पूछता. ज्यादातर लोग तो इस लोक से ज्यादा परलोक के बारे में पूछते. मैं सभी को अपने जवाब से खुश कर के भेजता.

पहली बार मेरा संन्यासियों की ऐश्वर्य भरी जिंदगी से परिचय हुआ था. कल तक जो लड़कियां मुझे देखते ही मुंह बिदका कर भाग जाती थीं, अब वे मेरे पैर छू कर हंसते हुए अपना कोमल हाथ मेरे हाथ में दे कर अपनी तकदीर के बारे में जानना चाहती थीं. मैं उन की तकदीर बतातेबताते अपनी तकदीर पर फख्र कर उठता था. कभीकभी तो मुझे अपनेआप पर गुस्सा भी आता था कि मैं और पहले संन्यासी क्यों नहीं बना. अब तो यह हाल है कि मेरे महल्ले में कोई भी जलसा, मीटिंग या फिर किसी तरह का फंक्शन हो, मेरे बिना अधूरा समझा जाता है. किस लड़के या लड़की का रिजल्ट कैसा होगा? किस के घर लड़का होगा या लड़की होगी? किस की नौकरी लगेगी या नहीं? किस की शादी कब होगी? सभी का हिसाब मेरे पास है. अब तो कोई भी चढ़ावा चढ़ा कर अपनी तकदीर जान सकता था.

इस साल के चुनाव में तो गजब हो गया. मेरे इलाके के सांसद के पास मेरी जानकारी पहुंच गई. सुबह से ही वह मेरे आश्रम में पहुंच गए और सकुचाते हुए बोले, ‘‘देखिए स्वामीजी, अब आप के ऊपर ही मेरा सबकुछ टिका है. अगर आप चाहें, तो मुझे इस बार भी जनता की सेवा करने का मौका दिला सकते हैं. इस के बदले में आप को मुंहमांगा चढ़ावा मिलेगा.’’ मैं उन का दुख देख कर पिघल गया और उन्हें एक यज्ञ करने की नेक सलाह दे डाली. यज्ञ खत्म होतेहोते वह जीत भी गए. अब वह मुझे छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं. अब मैं उन का पारिवारिक सदस्य हूं व राजनीतिक सलाहकार भी.

पिछले दिनों उन के लड़के ने एक राह चलती लड़की के साथ बलात्कार कर दिया. लेकिन मेरी पहुंच की वजह से कोई उन का और उन के लड़के का बाल भी बांका न कर सका. अब धीरेधीरे मेरी पहुंच विदेशों में भी होने लगी है. माफिया वालों से तो मेरा संपर्क पहले से ही था. फिल्म वाले भी अब अपनी फिल्मों के मुहूर्त पर मुझे बुलाने लगे हैं. वहां जाने का मैं महज 5 लाख रुपए लेता हूं.

बहुत सारी हीरोइनें भी मेरी चेलियां बन गई हैं. कौन सी फिल्म पिटेगी या चलेगी, यह मेरे दिए गए ज्योतिष काल की तारीख पर फिल्म को रिलीज करने पर निर्भर करता है. मैं तकरीबन पूरी दुनिया घूम चुका हूं. देशविदेश में मेरे चेले बढ़ते जा रहे हैं. मेरे एयरकंडीशंड आश्रम की लंबाईचौड़ाई तकरीबन 3 एकड़ में है. फिलहाल तो मेरे पास 15 विदेशी गाडि़यां हैं. देश के सभी महानगरों में मेरी कोठियां भी हैं. मेरी जिंदगी बहुत ही अच्छे ढंग से गुजर रही है. अब तो बस एक ही तमन्ना है कि किसी तरह अमेरिका का राष्ट्रपति भी मेरा चेला बन जाए.

एहसास सच्ची मुहब्बत का

कल विवेक ने मुझे प्रपोज किया. मन ही मन मैं भी उसे पसंद करती थी. वह देखने में हैंडसम है, पढ़ालिखा है और एक अच्छी कंपनी में नौकरी करता है. उस के अंदर वे सारे गुण हैं, जो एक कामयाब इनसान में होने चाहिए.

तकरीबन 3 साल पहले ही मुझे यह अंदाजा हो गया था कि विवेक मुझे पसंद करता है और मुझ से बहुत प्यार करता है, लेकिन कहने से डरता है. फिर मैं भी तो यही चाहती थी कि विवेक पहले मुझ से अपने दिल की बात कहे, तब मैं कुछ कहूंगी. पर क्या पता था कि इंतजार की ये घडि़यां 3 साल लंबी हो जाएंगी और कल विवेक ने साफ लफ्जों में कह दिया, ‘अंजलि, मैं पिछले 3 साल से तुम्हें पसंद करता हूं, पर पता नहीं क्यों मैं तुम से कुछ कह नहीं पाता हूं. लेकिन अब मेरा सब्र जवाब दे गया है. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं और अब बहुत जल्द तुम से शादी करना चाहता हूं.

‘मुझे यह तो मालूम है अंजलि कि तुम्हारे दिल के किसी कोने में मेरे लिए मुहब्बत है, लेकिन फिर भी मैं एक बार तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’

विवेक इतना कह कर मेरे जवाब का इंतजार करने लगा. लेकिन मुझे खामोश देख कर कहने लगा, ‘ठीक है अंजलि, मैं तुम्हें 2 दिन का वक्त देता हूं. तुम सोचसमझ कर बोलना.’

मेरा दिल सोच के गहरे समंदर में डूबने लगा. मैं जब 8 साल की थी तो मेरी मम्मी चल बसी थीं और फिर

2 साल के बाद पापा भी हमें अकेला छोड़ गए थे. मुझे से बड़े मेरे भैया थे और मुझ से छोटी एक बहन थी, जिस का नाम नेहा था.

मम्मीपापा के चले जाने के बाद हम तीनों भाईबहन की देखभाल मेरी बूआ ने की थी. वे बहुत गरीब थीं उन का भी एक बेटा और एक बेटी थीं.

नेहा मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से कमजोर थी. उस के इलाज और मेरी पढ़ाई में भैया ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. मेरी पढ़ाई पूरी होने के बाद भैया ने मेरे लिए रिश्ता ढूंढ़ना शुरू कर दिया था, लेकिन मैं आगे भी पढ़ना चाहती थी, इसलिए शादी से इनकार कर दिया.

भैया ने मेरी बात मान ली, क्योंकि हमारे घर में एक औरत की जरूरत थी. इसलिए भैया ने अपनी शादी रचा ली. मेरी भाभी भी मेरी बैस्ट फ्रैंड की तरह थी. फिर वह दिन भी आ गया, जब मैं बूआ बन गई. एक नन्ही सी गुडि़या भी हमारे घर आ गई. मेरे भैया मेरे किसी भी ख्वाहिश को मेरी जबान पर आते ही पूरा कर देते थे.

हमारा परिवार बहुत खुशहाल था कि एक दिन कुदरत ने हम से हमारी दुनिया ही छीन ली. भैयाभाभी और नन्ही सी गुडि़या एक कार हादसे में मारे गए. हमें अब संभालने वाला कोई नहीं था. नेहा तो कुछ समझ नहीं पाई, बस सबकुछ देखती रही.

भैया जब तक जिंदा थे, तब तक मैं यह भी नहीं जानती थी कि भैया की तनख्वाह कितनी है, पर उन की मौत के बाद धीरेधीरे उन के सारे जमा पैसों का पता चलता गया. उन्होंने हम दोनों बहनों के नाम पर भारी रकम जमा की थी और भाभी और अपने नाम पर जो इंश्योरैंस कराया था, वह अलग. इन पैसों के बारे में कुछ रिश्तेदारों को भनक लगी, तो कुछ लोगों ने हम दोनों बहनों की देखरेख का जिम्मा उठाना चाहा. पर मैं उन लोगों की गिद्ध जैसी नजरों को पहचान गई और इनकार कर दिया.

लेकिन विवेक ने आखिर अब इतनी जल्दबाजी क्यों की? अभी तो इस हादसे को 2 महीना ही हुआ है. क्या विवेक भी उन में से एक है? क्या उसे भी मेरे पैसों से मुहब्बत है? यही सोचसोच कर मेरा दिल एकदम से बेचैन था. मैं रातभर ठीक से सो भी नहीं पाई.

फिर 2 दिन के बाद जब विवेक ने मुझे फोन किया और मेरा जवाब जानना चाहा तो मैं ने यही कहा कि अगर मैं शादी कर लूंगी तो नेहा अकेली हो जाएगी.

‘‘पगली क्या हम नेहा को उसी घर में अकेले छोड़ देंगे? उसे भी तुम्हारे साथ अपने घर ले आएंगे.’’

इस बात से मेरा दिल और भी दहशत में डूब गया. नेहा के नाम पर भी इतना पैसा और जायदाद है, तो क्या नेहा पर विवेक की नजर है? मुझे तो हमेशा से पैसे के लालची लोगों से नफरत है. अब विवेक के चेहरे पर भी उन्हीं लोगों का चेहरा नजर आता है.

मैं रातभर इसी सोच में डूबी रही. कब आंख लगी, पता ही नहीं चला. मेरी आंख तब खुली, जब बूआ ने आ कर आवाज दी कि अंजलि उठो. विवेक आया है. मैं जल्दी से उठी और फ्रैश हो कर नीचे आ गई.

‘‘अंजलि, क्या बात है. आज 4 दिन हो गए हैं और तुम ने कोई जवाब नहीं दिया मेरी बातों का?’’

‘‘विवेक, आखिर तुम्हें जवाब की इतनी जल्दी क्या पड़ गई है, अभी तो हमारे घर में इतना बड़ा हादसा हुआ है.’’

‘‘अंजलि, यही तो वजह है कि तुम अब अकेली हो गई हो और मैं जल्द से जल्द तुम्हारा सहारा बनना चाहता हूं. मैं तुम्हें इस घर में अकेले नहीं छोड़ना चाहता हूं.’’

‘‘विवेक, मैं ने अपनी जिंदगी के लिए कुछ फैसले लिए हैं और उन के बारे में तुम्हें बताना चाहती हूं.

‘‘हां हां, जरूर बताओ,’’ विवेक ने कहा.

‘‘मैं तुम से शादी करने के लिए राजी हूं. मेरी बूआ ने हम दोनों की हमेशा देखभाल की. मम्मीपापा के जाने के बाद उन्होंने कभी भी उन की कमी महसूस नहीं होने दी.

‘‘मैं चाहती हूं कि मैं अपनी आधी जायदाद उन के नाम कर दूं, ताकि उन के बच्चों का भविष्य सुधर जाए.

‘‘विवेक, मेरा सहारा तो तुम हो, लेकिन नेहा तो मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से कमजोर है और उस के इलाज में भारी रकम खर्च होती है.

‘‘मुझे अब पैसों की क्या जरूरत है. विवेक कहो, मेरा फैसला ठीक है या गलत है?’’

विवेक कुछ देर चुप था, बस अंजलि को देख रहा था.

अंजलि को लग रहा था कि उस का यह फैसला सुनने के बाद अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.

‘‘अंजलि, मैं ने तुम्हें जो समझ कर प्यार किया, तुम वह नहीं हो,’’ विवेक बोला.

‘‘मैं समझी नहीं विवेक, तुम क्या समझते हो मुझे और मैं क्या हूं?’’

‘‘मैं तो सिर्फ इतना समझता था कि तुम एक खूबसूरत लड़की हो, मैं ने सिर्फ आज तक तुम्हारे चेहरे की खूबसूरती को देखा था, लेकिन आज तुम्हारे मन की खूबसूरती को देख रहा हूं.

‘‘एक लाचार बहन पर अपना सबकुछ कुरबान कर देना और एक गरीब बूआ के बच्चों के अच्छे भविष्य के बारे में सोचना…

‘‘आज पहली बार मुझे तुम से मुहब्बत करने पर गर्व हो रहा है अंजलि, जहां आज इस पापी दुनिया में लोग दूसरों का हक छीन कर खाते हैं, वहीं इसी दुनिया में तुम्हारे जैसे लोग भी मौजूद हैं, जो दूसरों के लिए अपना सबकुछ कुरबान कर देते हैं.

‘‘मुझे तुम्हारा फैसला मंजूर है, बस तुम तैयार रहो. मैं जल्दी ही डोली ले कर तुम्हारे घर आ रहा हूं.’’

अंजली विवेक की बात सुन कर मुसकरा दी. उसे आज ऐसा महसूस हुआ, जैसे सालों से दिल में गड़ा हुआ कांटा निकल गया हो.

आज उसे विवेक की सच्ची मुहब्बत का एहसास हो गया था. ऐसा लग रहा था कि उसे नई जिंदगी मिल गई. मैं भी तो विवेक को नहीं जानती थी कि उस के मन में भी इतना अच्छा इनसान छिपा था और मैं भी कितनी पागल थी कि उस पर शक कर रही थी.

मैं ने खिड़की का परदा हटाया. देखा, एक नई सुबह मेरा इंतजार कर रही थी जिस में सचाई थी, मुहब्बत थी और सबकुछ था, जो मुझे जीने के लिए चाहिए था.

लेखिका- तबस्सुम बानो

सोचा न था: अमन के साथ क्या हुआ था

सोचा न था इंजीनियरिंग करने के बावजूद अमन इतना ज्यादा लापरवाह था कि लगीलगाई नौकरी छोड़ आता था. इस बात से उस के पिता रामचरण इस कदर परेशान हुए कि उन्हें लकवा मार गया. अमन को मजबूरन ड्राइवर बनना पड़ा. तभी उस की मुलाकात एक रूसी लड़की सोफिया से हुई, जो उस के करीब आती चली गई.

दफ्तर से घर आते ही रामचरण चारपाई पर लेट गया और अपनी पत्नी शांति को आवाज लगाते हुए बोला, ‘‘एक गिलास पानी पिला दे. बड़ी थकान हो रही है.’’

‘‘यह लो…’’ पानी का गिलास रामचरण के सामने बढ़ाते हुए शांति बोली, ‘‘क्या हुआ? आज घर जल्दी कैसे आ गए?’’

‘‘हां, वह जरा तबीयत ठीक नहीं लग रही थी, तो…’’ बोलतेबोलते रामचरण जोर से खांसने लगा, तो शांति ने पानी का गिलास उस के मुंह में ही लगा दिया.

‘‘आह…’’ कर के रामचरण ने फिर चारपाई पर लेटते हुए पूछा, ‘‘अमन कहां है? अभी तक घर नहीं आया क्या?’’

‘‘घर पर ही है. सोया हुआ है,’’ पानी का जूठा गिलास पास पड़े स्टूल पर रखते हुए बड़े उदास मन से शांति बोली, ‘‘पता नहीं, क्या लिखा है इस लड़के के भविष्य में? जहां पर भी नौकरी करता है, 2-4 महीने से ज्यादा टिक ही नहीं पाता.’’

‘‘तो क्या यह नौकरी भी छूट गई उस की?’’ चिंता के मारे रामचरण को फिर जोर से खांसी उठ गई, तो शांति पानी लेने भागी.

‘‘नहीं चाहिए,’’ अपने हाथ के इशारे से रामचरण ने पानी लेने से मना करते हुए कहा, ‘‘थोड़ा जहर दे दे, ताकि चैन से मर पाऊं मैं. अरे, जिंदगी तो हमारी खराब हो गई है, जो हम ने ऐसे कपूत को जन्म दिया. इस से तो अच्छा होता कि वह पैदा होते ही मर…’’ रामचरण बोलने ही जा रहा था कि शांति ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया कि वह ऐसी बातें अपने मुंह से न निकाले.

‘‘अरे, तो और क्या कहूं मैं… बोल न? 30 की उम्र पार कर चुका है, पर अब तक इस की शादी नहीं हुई है. कोई ढंग की नौकरी नहीं करता. ऐसे लड़के को कौन अपनी बेटी देगा? इस लड़के का खुद का ही ठौरठिकाना नहीं है?’’

‘‘अच्छा, तुम ज्यादा परेशान मत हो. करेगा कुछ न कुछ,’’ शांति ने उसे ढाढ़स बंधाया. पर फिक्र तो अब उसे भी होने लगी थी कि अमन की उम्र के लड़कों की शादी हो चुकी है, वे अपने घरपरिवार संभालने लगे हैं और यह लड़का अब भी ऐसे ही निठल्ला पड़ा है. कहीं नौकरी लगती भी है, तो उसे भी लात मार आता है. आखिर यह चाहता क्या है?

‘‘कुछ बोलो, समझओ, तो अपने मांबाप पर ही चढ़ बैठता है. पूरे घर में क्लेश मचा देता है और खुद बाहर निकल जाता है. इस नवाबजादे की ऐश तो देखो, बढि़याबढि़या स्वादिष्ठ खाना और फैंसी कपड़े ही चाहिए, मगर करना कुछ नहीं है.’’

रोज की तरह आज भी अमन रात के तकरीबन 12 बजे घर आया और खाना खा कर मोबाइल ले कर बैठ गया, तो रामचरण गुस्से से तमतमा उठा, क्योंकि उसे पता था कि वह कहीं किसी अड्डे पर बैठ कर अपने आवारा दोस्तों के साथ ताश और जुआ खेल रहा होगा. जब भूख और नींद ने आ घेरा तो इसे घर की याद आ गई होगी और मुंह उठा कर यहां चला आया. लेकिन यह कोई धर्मशाला या होटल नहीं है कि जिसे जब मन करे मुंह उठा कर चला आए.

रामचरण गुस्से में बकबक किए जा रहा था और अमन उस की बातों को अनसुना कर मोबाइल पर लगा पड़ा था.

बेटे की इस हरकत पर रामचरण गुस्से से उबल पड़ा और अमन के हाथ से फोन छीनते हुए गरजते हुए बोला, ‘‘सम?ाता क्या है तू अपनेआप को? कहीं का नवाब है क्या या इस घर में कोई खजाना गड़ा है, जो तू नहीं भी कमाएगा तो जिंदगी आराम से चल जाएगी? आखिर कब तक मैं तुझे कमाकमा कर खिलाता रहूंगा?’’

रामचरण की बातों को समझने के बजाय अमन उस पर ही चिल्लाते हुए कहने लगा कि उन्हें ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है. वह अपना देख लेगा.

‘‘हां, तो निकल जा इस घर से,’’ रामचरण भी गरजा, ‘‘इस घर में तुझ जैसे निठल्ले के लिए अब कोई जगह नहीं है. बाहर जा कर खाक छानेगा न, तब अक्ल ठिकाने आएगी,’’ बोलतेबोलते रामचरण जोर से हांफने लगा.

शांति जब तक रामचरण के लिए पानी ले कर आती, तब तक वह वहीं जमीन पर नीचे गिर पड़ा. पति को जमीन पर छटपटाते देख कर शांति बिलख कर रोने लगी.

पिता को इस हालत में देख अमन भी परेशान हो उठा कि अचानक से इन्हें क्या हो गया. एंबुलैंस को फोन लगाया, तो फोन नहीं उठाया गया.

तब अमन ने अपने एक दोस्त दीपक को फोन किया और वह जल्द ही अपनी गाड़ी ले कर पहुंच गया. आननफानन में ही रामचरण को अस्पताल में भरती कराया गया, तब जा कर उस की जान बच पाई. पर उसे लकवा मार गया और उस ने हमेशा के लिए खटिया पकड़ ली.

घर में एक रामचरण ही कमाने वाला था, लेकिन अब वही बिछावन पर पड़ गया, तो घर कैसे चलेगा? घर में शादी लायक जवान बेटी है, सब कैसे होगा? इस सोच में शांति घुली जा

रही थी. इधर पिता की बिगड़ती हालत देख कर अब अमन को लगा कि बाहर जा कर कुछ कमानाधमाना पड़ेगा, इसलिए वह अपनी इंजीनियरिंग की डिगरी ले कर फिर नौकरी की तलाश में निकल पड़ा. मगर लाख हाथपैर मारने के बाद भी उसे कहीं नौकरी नहीं मिली.

मिलती भी कैसे, जब अमन ने खुद लगीलगाई नौकरी को लात मार दी थी, लेकिन अब उसे अपनी गलती का  एहसास होने लगा था. भले ही नौकरी उस की पसंद की नहीं थी, मगर हर महीने तनख्वाह तो मिलती थी, जिस से वह दोस्तों के साथ मजे करता था, अपनी पसंद के कपड़े पहनता था. मगर अब तो एकएक पाई के लिए वह तरस रहा था.

शांति भी अमन को कहां से पैसे देती, जब उस का खुद ही घर चलाना मुश्किल हो रहा था. पास रखे पैसों से किसी तरह घर चल रहा था और रामचरण की दवादारू हो पा रही थी, पर यह पैसा भी कब तक चलेगा, कहा नहीं जा सकता.

अमन के पास अब एक ही रास्ता बचा था कि वह अपने दोस्त दीपक से कुछ मदद मांगे. जब उस ने अपनी परेशानी दीपक को बताई, तो दीपक कहने लगा कि वह उसे ड्राइवर की नौकरी पर लगा सकता है.

‘‘ड्राइवर की नौकरी… पर यार, मैं तो इंजीनियर…’’ अमन को लगा कि क्या इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर के वह ड्राइवर की नौकरी करेगा?

‘‘हां, तो क्या हो गया. काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, काम काम होता है और अभी तो तुझे काम की बहुत जरूरत है, क्योंकि तेरे पिता बीमार हैं. कोई कमाने वाला नहीं है तेरे घर में. तो सोच ले कि क्या करना है तुझे.. और वैसे भी, अब तेरी उम्र नहीं रही कि कोई तुझे नौकरी दे, तो क्या इंजीनियरिंग की डिगरी  ले कर चाटेगा?’’ दीपक ने अमन को साफसाफ समझ दिया.

दीपक कोई बहुत पढ़ालिखा नहीं था. 12वीं पास था, वह लेकिन समझदार था. वह जानता था कि जीने के लिए पैसा कमाना जरूरी है.

दीपक का यहीं दिल्ली में अपना गैराज था, जहां नईपुरानी गाडि़यों की मरम्मत होती थी. उस की कई लोगों से अच्छी जानपहचान बन चुकी थी. अब मरता क्या न करता. हार कर अमन ने ड्राइवर की नौकरी पकड़ ली. मगर वहां भी वह गाड़ी के मालिक की बेटी पर ही डोरे डालने लगा, तो मालिक ने उसे नौकरी से निकाल दिया.

इसी तरह 1-2 जगहों पर उस ने ऐसी ही हरकत की और अपनी नौकरी से हाथ धो बैठा.

इस बार दीपक ने अमन को एक विधायक के यहां ड्राइवर की नौकरी पर लगवा दिया, जो उन की 23 साल की बेटी आयशा को कालेज से ला और पहुंचा सके.

लेकिन अमन ने अपने मन में कुछ और ही सोच रखा था. वह चाहता था कि विधायक साहब की बेटी को अपने प्रेमजाल में फंसा कर उस से शादी कर के पूरी जिंदगी उन के पैसों पर ऐश करेगा. फिर उसे कहीं नौकरी करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.

अमन आयशा को रिझाने के लिए रोज तरहतरह की हरकतें करता. समय से पहले उसे कालेज लेने पहुंच जाता. रोज धुले और चमकदार कपड़े पहनता. अपने हाथ में वह सलमान खान की तरह ब्रेसलेट पहनता, परफ्यूम लगाता, आंखों पर धूप के काले चश्मे चढ़ा लेता और फिर गाड़ी चलाते हुए रोमांटिक गाने लगा कर पूरे रास्ते आयशा को घूरता रहता था.

मगर आयशा उस पर ध्यान ही नहीं देती थी. वह अपने काम से काम रखती थी. वह बहुत ही सम?ादार लड़की थी, इसलिए अमन की बेवकूफियों को नजरअंदाज कर दिया करती थी और अमन को लगता था कि वह भी उसे पसंद करती है, इसलिए कुछ बोलती नहीं है.

लेकिन जब एक दिन अमन को अचानक से यह कह कर नौकरी से निकाल दिया गया कि अब उन्हें उस की जरूरत नहीं है, तो वह ठगा सा रह गया. लड़की तो गई ही हाथ से, नौकरी भी चली गई उस की. मुंगेरीलाल के हसीन सपने, सपने ही रह गए और वह फिर कोई दूसरी नौकरी की तलाश में जुट गया, क्योंकि घर के खर्च, रामचरण की दवाओं का खर्चा, सब तो अमन के जिम्मे ही था.

अमन ने फिर दीपक के सामने अपनी परेशानी रखी, तो इस बार दीपक ने उसे दूरिज्म टैक्सी में लगवा दिया.

एक दिन अमन की टैक्सी में एक रशियन लड़की सोफिया आ कर बैठी और बोली कि वह यहां इंडिया घूमने आई है, तो क्या वह उसे घुमाएगा? अमन ने हां बोल दी.

सोफिया अमन के साथ दिल्ली में कई जगहों पर घंटों घूमती रही और फिर शाम को एक होटल

के बाहर रुक कर अमन को भाड़े के पैसे देते हुए मुसकरा कर बोली कि वह कल भी उसे यहां से पिकअप कर ले. अमन को तो ग्राहक से मतलब था. वह कौन है, कहां से आई है, उस से उसे क्या लेनादेना, इसलिए दूसरे दिन भी वह अपनी टैक्सी उसी होटल के सामने ले आया, जहां सोफिया पहले से ही उस का इंतजार कर रही थी.

इसी तरह यह रोज का सिलसिला बन गया. सोफिया उसी होटल के सामने उस का इंतजार करती और अमन तय समय पर उसे लेने वहां पहुंच जाया करता था.

एक दिन सोफिया ने अमन को अपने परिवार के बारे में सबकुछ बताया कि उस के परिवार में उस के मम्मीपापा और एक छोटा भाई है, जो यूरोप में रहते हैं. वहां उस के पापा डाक्टर हैं और उस की मम्मी एक एनजीओ चलाती हैं. उस ने यह भी बताया कि उसे बचपन से ही इंडिया और यहां के लोग बहुत पसंद हैं. वह अपने मम्मीपापा के साथ अकसर इंडिया आती रहती थी.

‘‘अमन, अब तुम बताओ, तुम्हारे परिवार में कौनकौन हैं? और तुम्हारे फादर, मतलब तुम्हारे ‘पिटाजी’ क्या काम करते हैं? तुम लोग अपने फादर को ‘पिटाजी’ ही बुलाते हो न?’’

सोफिया की बात पर अमन को जोर की हंसी आ गई.

‘‘अरे, तुम हंस क्यों रहे हो? मैं ने कुछ ‘गलट’ कहा क्या?’’

‘नहीं, कुछ गलत नहीं कहा आप ने. लेकिन ‘पिटाजी’ कहा न, उस पर मुझे हंसी आ गई,’’ बोल कर अमन फिर हंसने लगा, तो सोफिया भी हंस पड़ी और बोली, ‘‘तुम मुझे हिंदी बोलना सिखा दोगे क्या?’’

अमन ने हां कहते हुए जैसे ही गाड़ी घुमाई, तो सोफिया उस के ऊपर गिरतेगिरते बची.

‘‘ओह, आप को लगी तो नहीं?’’ अमन ने पूछा.

‘‘लगी है, यहां पर,’’ अपने दिल पर हाथ रख कर सोफिया मुसकरा पड़ी, तो अमन भी मुसकरा उठा.

अब सोफिया अकसर फोन पर अमन से प्यार भरी बातें करती और कहती कि उस के सपने में अकसर वही दिखता है, तो इस का यह मतलब हुआ कि वह अमन से प्यार करने लगी है.

इस बात पर अमन कुछ कहता तो नहीं था, पर उसे भी सोफिया अच्छी लगने लगी थी, इसलिए वह अब बिना बुलाए भी सोफिया को लेने उस के होटल पहुंच जाता था.

अमन जबतब अपने घर से अपनी मां के हाथ का बना खाना सोफिया के लिए ले आता था, जिसे खा कर सोफिया काफी खुश होती थी. सोफिया भी कई बार उसे टीशर्ट, जूते वगैरह गिफ्ट कर चुकी थी.

बेटे को अच्छे से कमातेधमाते देख कर रामचरण खुश तो होता, पर सोचता कि काश, वह कोई अच्छी नौकरी कर रहा होता, क्योंकि उस ने बड़े अरमानों से बेटे को इंजीनियरिंग की तालीम दिलवाई थी और सोचा था कि अमन भी एक दिन उस का नाम रोशन करेगा. खैर, अब जो है उसी में खुश रहना पड़ेगा. यह सोच कर रामचरण बिस्तर पर पड़ापड़ा राहत की सांस लेता था.

रामचरण एक सरकारी बैंक में टैंपरेरी मैसेंजर का काम करता था, जहां उसे बंधीबंधाई और वह भी बहुत कम तनख्वाह मिलती थी, जिस से ही पूरे घर का खर्चा चलता था. उन्होंने सोचा था कि बेटा अच्छा कमाने लगेगा, तो उस के भी दिन फिरेंगे. मगर यहां तो बेचारे की उसी नौकरी पर आफत आ पड़ी थी. पता नहीं, अब दोबारा से नौकरी कर भी पाएगा या नहीं.

बैंक मैनेजर साहब भले इनसान थे, जिन्होंने रामचरण की काफी मदद की थी. बैंक के बाकी सब स्टाफ ने भी चंदा कर के उस की पैसों से मदद की थी. तभी तो उतने दिन उस का घर और डाक्टर और दवा का खर्चा चल पाया, वरना तो क्या होता नहीं पता.

अमन और सोफिया के बीच अब केवल ड्राइवर और ग्राहक तक ही रिश्ता नहीं रह गया था, बल्कि दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ चुके थे.

इसी तरह 6 महीने बीत गए. अब अमन को सोफिया पर और सोफिया को अमन पर भरोसा होने लगा था. वे एकदूसरे से बेझिझक अपनी बात शेयर करते और साथ में समय गुजारते थे.

एक दिन सोफिया ने अमन को होटल बुला कर उसे एक बैग देते हुए कहा कि यह बैग उसे इस पते पर पहुंचाना है.

अमन ने उस से पूछा भी नहीं कि उस बैग में है क्या. उस ने उस बैग को उसी पते पर पहुंचा दिया और यह सिलसिला चल पड़ा.

अब अकसर सोफिया अमन को दूसरेतीसरे पते पर बैग पहुंचाने के लिए कहती और इस के लिए वह उसे डबलट्रिपल पैसे भी देती थी.

एक दिन फिर सोफिया ने अमन को अर्जेंट बुलाया और एक काला बैग पकड़ाते हुए कहा कि यह बैग उसे अभी इसी समय इस पते पर पहुंचाना है.

‘‘मगर, इस में है क्या और इतना अर्जेंट क्यों पहुंचाना है? कल नहीं पहुंचा सकते क्या? आज मुझे अपने पापा को डाक्टर के पास ले कर जाना है.’’

सोफिया बोली, ‘‘नहीं, यह बैग अभी इसी समय इस पते पर पहुंचाना होगा और इस के लिए मैं तुम्हें 5,000 रुपए दूंगी.’’

‘‘पैसे की बात नहीं है. मुझे आज पापा को डाक्टर के पास लेना जाना बहुत जरूरी है, इसलिए कह रहा हूं,’’ अमन ने अपनी परेशानी फिर दोहराई, मगर इस बार सोफिया झल्लाते हुए बोली, ‘‘नहीं. अर्जेंट है तो अर्जेंट है.’’

आज सोफिया के चेहरे पर वह मासूमियत नहीं दिख रही थी, बल्कि घबराहट दिख रही थी, एक डर दिख रहा था.

अमन को अब सोफिया पर कुछ शक होने लगा कि ऐसा क्या है इस बैग में, जो उसे अभी ही पहुंचाना है? आज तक वह बैग लेने वाले आदमी का चेहरा नहीं देख पाया था, क्योंकि उस के चेहरे पर मास्क लगा होता था.

खैर, अमन ने अपना माथा झटका और बैग ले कर होटल से निकल गया, क्योंकि उसे भी पैसों की जरूरत थी और फिर सोफिया को वह नाराज नहीं करना चाहता था.

अभी अमन की टैक्सी थोड़ी आगे बढ़ी ही थी कि तेज आवाज में पुलिस की गाड़ी सायरन बजाते हुए उसे रुकने को बोली.

‘‘जी… इंस्पैक्टर साहब…’’ गाड़ी रोक कर अमन ने घबराते हुए पूछा.

‘‘नीचे उतरो और गाड़ी की डिक्की खोलो,’’ एक पुलिस वाले ने डंडा घुमाते हुए कहा.

‘‘पर इंस्पैक्टर साहब, गाड़ी में कुछ भी नहीं है,’’ अमन ने सफाई दी.

‘‘अभी पता चल जाएगा. इस बैग में क्या है? खोलो इसे…’’ पुलिस इंस्पैक्टर ने अपने सिपाही को और्डर दिया, तो उस ने बैग खोला, जिसे देख कर अमन के पसीने छूट गए, क्योंकि उस बैग में कोई मामूली सामान या कपड़े वगैरह नहीं थे, बल्कि ड्रग्स थी.

पुलिस को पक्की जानकारी मिली थी कि इसी टैक्सी से ड्रग्स की तस्करी हो रही है. घबराहट में अमन ने सोफिया को फोन लगाया, मगर उस का फोन स्विच औफ आ रहा था. दोबारा उसे फोन मिलाने ही लगा कि पुलिस ने उस के हाथ से फोन छीन लिया और पकड़ कर उसे पुलिस की गाड़ी में धकेल दिया.

स्पैशल टास्क फोर्स ने अमन से पूछताछ शुरू कर दी कि उस के इस धंधे में और कौनकौन लोग शामिल हैं, मगर हर बार वह एक ही बात दोहराता कि उसे कुछ नहीं पता.

अमन के फोन से सोफिया का नंबर मिला और जब उन्होंने पूछा कि यह लड़की कौन है और उस से उस का क्या रिश्ता है, तो अमन कहने लगा कि सोफिया ही उसे बैग अलगअलग पतों पर पहुंचाने को बोलती थी और वह पहुंचा दिया करता था. इस से ज्यादा उसे कुछ नहीं पता है.

स्पैशल टास्क फोर्स को यह तो समझ में आ गया कि इस का मास्टरमाइंड कोई और ही है और अमन केवल एक मुहरा है.

अमन से तो सोफिया यही बोल कर बैग पहुंचाने को कहती थी कि इस बैग में खानेपीने का सामान है. लेकिन उस में ड्रग्स हो सकती है, यह तो वह सपने में भी नहीं सोच सकता था. काश, वह एक बार बैग खोल कर देख लेता, तो आज इतनी बड़ी मुसीबत में न फंसता.

ड्रग्स सप्लाई कोई मामूली बात नहीं, बल्कि यह एक अपराध है और ऐसे केस में लोगों को 10 से

20 साल तक की सजा हो सकती है. लेकिन, उस ने सपने में भी सोचा न था कि एक दिन जिंदगी उसे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा देगी. वह तो पैसे कमा कर अपने मांबाप की मदद करना चाहता था. सोच रहा था कि पैसे जमा कर के वह अपनी बहन की शादी करेगा, फिर अपना घर बसाएगा. मगर यहां तो सब गलत हो गया.

उधर अमन के मांबाप को जब पता चला कि उन के बेटे को ड्रग्स सप्लाई के केस में गिरफ्तार कर लिया गया है, तो अमन की मां तो खड़ेखड़े ही बेहोश हो कर गिर पड़ी और रामचरण के प्राण पखेरू उड़ गए. क्या मिला उन्हें जिंदगी में… न अच्छे बेटे का सुख और न समाज में इज्जत.

मगर दीपक जानता था कि अमन लाख बुरा सही, मगर वह इतना घटिया काम कभी नहीं कर सकता. वह उसे बचपन से जानता है. उस ने गाड़ी के मालिक को भी यकीन दिलाया कि अमन ऐसा कर ही नहीं सकता,, बल्कि उसे फंसाया है किसी ने.

पुलिस की मार से तो बड़े से बड़ा अपराधी अपना गुनाह कबूल कर लेता है, मगर इतनी मार खाने के बाद भी अमन एक ही बात दोहरा रहा था कि उसे कुछ नहीं पता. पुलिस की शक की सूई अब सोफिया पर जा अटकी, तो तुरंत उस ने होटल का दरवाजा खटखटाया. लेकिन पता चला कि सोफिया अभी कुछ देर पहले ही चैकआउट कर के जा चुकी है.

अभी सोफिया हवाईजहाज पर बैठने ही वाली थी कि स्पैशल टास्क फोर्स ने उसे धर दबोचा. अब सोफिया के पास कोई चारा नहीं था सबकुछ बताने के सिवा. उस ने जो बताया, वह सुन कर अमन के पैरों के नीचे से भी जमीन खिसक गई, क्योंकि सोफिया ने उसे अपने और अपने परिवार के बारे में सब ?ाठ बताया था. उस के मांबाप कई साल पहले एक हादसे में गुजर चुके थे.

सोफिया के पास रहनेखाने को कुछ नहीं बचा, तो किसी तरह वह इंडिया आ गई और यहां एक डांस बार में काम कर के अपना गुजारा चलाने लगी. मगर असली धंधा उस का ड्रग्स सप्लाई करना था.

सोफिया दिल्ली के अलगअलग हुक्का बार और क्लब में ड्रग्स सप्लाई करती थी और उस के लिए वह अमन जैसे मजबूर, सीधेसाधे लड़के को फंसा कर उस के साथ प्यार का नाटक करती थी, ताकि उस का काम आसानी से होता रहे. लेकिन इस बार वह पकड़ी गई.

पता चला कि सोफिया के साथ और 4 लोग ड्रग्स तस्करी के धंधे से जुड़े हुए थे और स्पैशल टास्क फोर्स अब उन की तलाश में जुटी है. पुलिस ने सोफिया के पास से साढ़े 6 लाख रुपए नकद भी बरामद किए.

अमन को पुलिस ने चेतावनी दे कर छोड़ दिया, क्योंकि उस की कोई गलती नहीं थी. उसे फंसाया गया था. मगर अपनी जिंदगी में उस ने जोकुछ भी खोया, क्या अब वह उसे वापस कभी मिल सकता है? शायद नहीं, क्योंकि चिडि़या खेत जो चुग चुकी थी.

निम्मो: क्या मनोज को मिला उसका प्यार

बिशना ठाकुर के पास बहुत से मवेशी थे. उन की रखवाली बीरू करता था. वह तब बच्चा ही था. उस की मां ‘बडे़ घर’ यानी बिशना ठाकुर की हवेली में काम करती थीं. बीरू हमेशा घास पर सुस्त पड़ा आकाश में मंडराते कौओं को गिनता रहता था.

खेत जोतने के बाद खाना खाने के लिए मनोज घर नहीं जा पाता था कि कहीं मौका पा कर बैल सारी खेती साफ न कर डालें. अगर वे ठाकुर के खेतों में घुस जाते तो डांटफटकार सुननी पड़ती थी, इसीलिए मनोज की मां जब खेतों की रखवाली करने जाने लगतीं, तो रास्ते में उसे भात दे जाती थीं. उधर बीरू के लिए भी बड़े प्यार से कटोरदान में खाना आता था. वे दोनों साथ बैठ कर खाते थे. उसे उस कटोरदान का बड़ा घमंड था.

बीरू के लिए खाना बड़े घर की नौकरानी निम्मो लाती थी. उस घर में वह कहां से और कैसे आई, यह कोई नहीं जानता था. मनोज को यकीन था कि उसे तनख्वाह नहीं मिलती थी, बल्कि सिर्फ खाना और कपड़ा मिलता था. वह तब छोटी ही थी. उस की उम्र 13 या 14 साल रही होगी. तब मनोज 15 या 16 बरस का था.

निम्मो सांवली थी, पर थी खूबसूरत. उस की देह सुडौल और गठी हुई थी. मनोज को देखते ही निम्मो पता नहीं क्यों नाकभौं सिकोड़ लेती थी. मनोज के भात के साथ सब्जी नहीं होती थी. अचार भी बेस्वाद सा ही होता था. शायद वह इसीलिए चिढ़ती थी या फिर इसलिए कि मनोज ठाकुर के खेतों में बैल चराता था. लेकिन निम्मो उसे बहुत अच्छी लगती थी.

मनोज ने तो कई बार उस से बात करने की कोशिश की, लेकिन बदले में उसे सिर्फ झिड़कियां ही सुनने को मिलीं. बीरू को सिर्फ खाने से मतलब होता था. वह कभी निम्मो की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता था.

एक दिन निम्मो ने बीरू के हिस्से में से थोड़ा सा अचार मनोज को भी दे दिया. अचार बहुत जायकेदार था. यह बात उस ने निम्मो से भी कही. उस के बाद वह हमेशा मनोज के लिए भी अचार के 1-2 टुकड़े ले आती थी. कई बार उस ने मनोज को थोड़ी सब्जी भी दी. अब वह झिड़कती तो नहीं थी, लेकिन बातें अभी भी नहीं हो पाती थीं.

निम्मो मनोज को अब बहुत ही प्यारी लगने लगी थी. उस ने कई बार उस के पास बैठ कर बातें करने की कोशिश की, पर वह ऐसे दूर भगा देती, मानो वह अछूत हो. दरअसल, मनोज उसे ही अछूत समझता था.

एक दिन बीरू खाना खा रहा था. निम्मो ने घास काटी और गट्ठर बांधा. फिर कटोरदान धो कर घर जाने की तैयारी करने लगी. वह चाहती थी कि मनोज घास का गट्ठर उस के सिर पर रखवा दे. वह बोली, ‘‘यह बीरू से तो उठेगा नहीं.’’

मनोज ने गट्ठर उस के सिर पर रखवा दिया. तब उसे पता चला कि वह बहुत ही हलका था. उसे उठाने के लिए किसी की मदद की जरूरत नहीं थी.

वे दोनों आमनेसामने खड़े थे. सिर पर गट्ठर रखवाते हुए मनोज के हाथ निम्मो की छातियों से टकरा गए. उसे झुरझुरी सी महसूस हुई. सारा शरीर गरम हो गया और दिल जैसे आसमान में उड़ने लगा.

निम्मो मुंह फेर कर ऐसे भागी, जैसे वह बहुत जल्दी में हो. मनोज उसे देखता ही रह गया. बीरू तब भी आसमान में मंडराते हुए कौए गिन रहा था.

इस घटना के बाद मनोज निम्मो को और भी ज्यादा चाहने लगा. जायकेदार अचार में से एक हिस्सा उसे मिलता रहता था. अब तो सब्जी भी रोजाना मिलने लगी. बीरू इस बात से चिढ़ता था, लेकिन छोटा होने की वजह से एतराज नहीं कर पाता था.

निम्मो ने अब रोजाना घास ले जाना शुरू कर दिया. उस का गट्ठर हर रोज भारी होता जा रहा था. मनोज निम्मो के जिस्म के सुडौल हिस्सों की बनावट पहचानने लगा था.

इस बीच मनोज निम्मो को पागलपन की हद तक चाहने लगा था. बिशना ठाकुर को मदद की जरूरत होती तो वह खुशी से चला जाता, ताकि निम्मो के साथ काम कर सके. वह घास के गट्ठर उठाने में हमेशा उस की मदद करता.

इस दौरान निम्मो से मनोज की बात नहीं हो पाई, क्योंकि खेतों में काम करने वाली औरतें उसे नफरत भरी निगाहों से देखती थीं. मनोज यह सब ताड़ जाता और लोगों की मौजूदगी में निम्मो भी ऐसा दिखावा करती, जैसे उस से बहुत नफरत करती हो. तब वह परेशान हो जाता. समझ नहीं पाता कि क्या करे.

फसल कटने के बाद निम्मो से मुलाकात नहीं हो पाई थी. मनोज बेचैनी से इंतजार करने लगा कि कब सर्दियां आएं और उसे पशुओं की रखवाली का मौका मिले.

उन्हीं दिनों बिशना ठाकुर की पत्नी बीमार हो गईं, इसलिए निम्मो के लिए घर के तमाम काम बढ़ गए. उस ने घास काटना बंद कर दिया. एक दिन वह बीरू को खाना पहुंचाने आई, तो उस के साथ एक और लड़की भी थी.

उस दिन निम्मो ने घास काटी और मनोज ने हमेशा की तरह गट्ठर उठाने में उस की मदद की. वह बोली, ‘‘आज से मेरी जगह यह लड़की खाना लाया करेगी.’’

मनोज के घर की माली हालत अच्छी नहीं थी. पिताजी अब भी कर्ज में डूबे हुए थे. सारी कमाई तो ब्याज में चली जाती थी. जरूरी कामों के लिए फिर कर्ज लेना पड़ता था. जिंदगी में बड़ी कड़वाहट आ चुकी थी.

उन्हीं दिनों गांव के कुछ लड़के कोलकाता चले गए थे. वे छुट्टी ले कर घर आते तो सारे गांव में उन का रोब पड़ता था. आखिरकार एक दिन मनोज भी अपने ही गांव के एक लड़के तिलक के साथ कोलकाता चला गया. वहां जा कर वह एक कारखाने में मजदूरी करने लगा.

मनोज के दोस्त छुट्टियों में घर जाते, लेकिन वह नहीं जाता था मानो इस काम के लिए उस के पास पैसे ही न हों. पिताजी चिट्ठियों में पैसों के लिए तकाजा करते, तो वह उन को मनीऔर्डर भेज दिया करता.

तकरीबन 3 साल बाद कारखाने की नौकरी छोड़ कर मनोज ने पान और सिगरेटबीड़ी की छोटी सी दुकान खोल ली. देखते ही देखते अच्छी आमदनी होने लगी. वह हर महीने अपने पिताजी को मनीऔर्डर भेजता रहता था. इस दौरान निम्मो के बारे में उसे कोई खबर नहीं मिली. वह अब उस से मिलने के लिए बेताब रहने लगा था.

इसी तड़प ने मनोज को गांव जाने के लिए मजबूर कर दिया. वहां पहुंचते ही उस ने सब से पहले निम्मो का पता लगाया. मालूम हुआ कि बिशना ठाकुर की बीवी को मरे 2 साल हो चुके हैं और उस घर में अब निम्मो का रोब चलता है. खेतों में काम करना तो दूर, वह उन दिनों घर से बहुत ही कम बाहर निकलती थी. अब वह कपड़े भी शानदार पहनती थी. नौकरचाकर उस से कांपते थे.

पिताजी के मना करने पर भी मनोज बिशना ठाकुर से मिलने बड़े घर गया. वहां पर न तो निम्मो दिखाई पड़ी और न ही उस के बारे में किसी से पूछा ही. बीरू ने भी कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. मनोज ने इधरउधर की कुछ बातें पूछीं, पर वह टाल गया.

मनोज बहुत बेचैन रहा. बड़े तालाब के किनारे सब्जियों का खेत था. एक दिन वहां से गुजरते वक्त मनोज ने देखा कि निम्मो कोई सब्जी तोड़ रही है. उस की जवानी और गदराए बदन को देख कर वह सिहर उठा. एकटक उस की तरफ देखता रहा. समझ में नहीं आ रहा था कि उस से क्या कहे. आखिर में हिम्मत कर के उसे अपने पास बुला ही लिया.

निम्मो ने मुड़ कर मनोज की तरफ देखा, लेकिन उस के चेहरे पर जरा भी परेशानी नहीं थी.

‘‘निम्मो, मैं कोलकाता से कुछ दिनों के लिए आया हूं. मैं ने ठाकुर का सारा कर्ज चुका दिया है,’’ मनोज ने मुसकराते हुए कहा.

निम्मो खामोश ही रही. मनोज की बात को जैसे उस ने सुना ही न हो.

अचानक मनोज पूछ बैठा, ‘‘क्या हम… शादी कर सकते हैं?’’

‘‘नहीं…’’ वह उसे घूरते हुए बोली.

‘‘क्यों?’’

निम्मो ने तपाक से जवाब दिया, ‘‘मैं तुम्हें नहीं चाहती. अगर तुम ने ठाकुर का कर्ज चुका दिया है, तो कौन सा एहसान किया है… वैसे, कोलकाता में मजदूरी ही तो करते हो…’’

‘‘नहीं निम्मो,’’ मनोज ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘पिछले साल मैं ने पानसिगरेट की दुकान खोल ली थी. अब मैं काफी पैसे कमा लेता हूं.’’

मनोज ने अपने उजले कपड़ों और घड़ी की ओर निगाह डालते हुए अकड़ कर कहा, ‘‘तुम्हें पहले वाले और अब के मनोज में कोई फर्क नजर नहीं आ रहा? मैं तुम्हें पलकों पर बिठाऊंगा.’’

‘‘बसबस… अब ज्यादा शेखी बघारने की जरूरत नहीं,’’ निम्मो ने नफरतभरी नजरों से मनोज की ओर देखा, ‘‘पान की दुकान खोल लेने से कोई धन्ना सेठ तो नहीं बन गए. मैं भी अब पहले वाली निम्मो नहीं रही… ठाकुर की हवेली की मालकिन हूं.

‘‘फेरे नहीं लिए तो क्या हुआ… ठाकुर तो अब दिनरात मेरे तलवे चाटता है. जहांजहां तक उस का दबदबा है, वहांवहां पर अब मेरी हुकूमत चलती है.

‘‘जितना तुम महीने में कमाते हो, उतना तो मैं बिंदी, पाउडर और क्रीम पर ही खर्च कर देती हूं,’’ निम्मो ने होंठों को सिकोड़ते हुए ताना कसा, ‘‘अरे कंगले, यहां मैं लाखों की मालकिन हूं… नौकरचाकर मुझे ‘सेठानी’ कहते हैं. मुझ से ब्याह करने के सपने अब भूल कर भी मत देखना… अपनी औकात मत भूल,’’ निम्मो गुस्से से पैर पटकते हुए हवेली की ओर चली गई.

मनोज डबडबाई आंखों से उसे जाते हुए देखता रहा. घर लौटते समय इस मतलबी दुनिया की सचाई उस की आंखों के आगे घूमने लगी, ‘इस दुनिया में पैसा ही सबकुछ है. पैसे के बिना आदमी की औकात दो कौड़ी की भी नहीं होती.’

गांव अब मनोज को काटने को दौड़ रहा था. वह मायूस रहने लगा. मां के आंसुओं की परवाह किए बगैर वह इस वादे के साथ कोलकाता लौट गया कि उसे अब उसे ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना है.

अब मनोज सुबह 8 बजे से ले कर रात 10-11 बजे तक दुकान खुली रखता, खूब मेहनत करता. नजदीक ही एक सिनेमाहाल बन जाने की वजह से वह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा. एक छोकरा भी मदद के लिए रख लिया. लेकिन गांव से सैकड़ों मील दूर कोलकाता में रहते हुए भी वह निम्मो को भुला नहीं पाया.

तकरीबन ढाई साल बाद मनोज फिर गांव गया. वह निम्मो से मिलने के लिए बेचैन था. शाम को उस के पैर बड़े घर की ओर बढ़ चले थे. थोड़ा आगे जाने पर उसे अपना पुराना दोस्त चमन मिल गया.

बातों ही बातों में मनोज ने चमन से निम्मो के बारे में पूछा, तो उस ने एक जोरदार ठहाका लगाया, ‘‘अरे, उस की मत पूछ… खुद को मालकिन और सेठानी समझने लगी थी, पर ठाकुर के मरते ही वह अपनी औकात पर आ गई…’’

‘‘क्या ठाकुर चल बसे…?’’ मनोज ने चौंक कर पूछा.

‘‘अरे, तुम्हें मालूम नहीं,’’ चमन हैरानी से बोला, ‘‘3-4 महीने पहले ही तो उन की मौत हुई थी. जैसे ही ठाकुर ने आंखें मूंदी, उन के बेटों ने उस बेहया को जूते मारमार कर हवेली से बाहर निकाल दिया.’’

‘‘तो निम्मो अब कहां रहती है?’’ मनोज ने जल्दी से पूछा.

‘‘अरे भैया, रहना कहां है… अपने सूबेदार जैमल सिंह दयालु आदमी हैं. उन्होंने उसे एक छोटी सी कोठरी रहने को दे रखी है. उन्हीं के खेतों में मजदूरी करती है और घर में सूबेदारनी की सेवाटहल करती रहती है… बड़ी चली थी मालकिन बनने…’’ कह कर चमन खिलखिलाता हुआ आगे बढ़ गया.

मनोज चंद पलों के लिए तो हक्काबक्का वहीं खड़ा रहा. अंधेरा घिर आया था. वह थके कदमों से घर की ओर चल पड़ा. खाना भी उस ने बेमन से खाया. रात को एक पल के लिए भी उसे नींद नहीं आई. सुबह जल्दी से नहाधो कर वह सूबेदार जैमल सिंह के घर की ओर चल पड़ा. बाहर का दरवाजा भीतर से बंद था. खटखटाने के थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला.

अचानक निम्मो को बेचारगी की हालत में देख मनोज हैरान रह गया. वह एकदम सूख कर कांटा हो गई थी. चेहरे पर जैसे कालिख पोत दी गई थी.

मनोज कुछ कह पाता, इस से पहले ही वह धीरे से बोली, ‘‘तुम… कोलकाता से कब आए?’’

‘‘सूबेदारजी घर पर हैं?’’ मनोज ने धीरे से पूछा.

‘‘नहीं… घर में इस वक्त मैं अकेली ही हूं… सभी लोग पास के गांव में एक ब्याह में गए हैं.’’

‘‘चलो, यह भी अच्छा हुआ निम्मो, मैं सिर्फ तुम से ही मिलने आया हूं… अंदर आने को नहीं कहोगी?’’

‘‘मुझे से मिलने…? खैर, आओ,’’ कह कर निम्मो अंदर की ओर मुड़ गई.

मनोज उस के पीछेपीछे आंगन में जा कर चारपाई पर बैठ गया. निम्मो जमीन पर बिछी बोरी पर बैठ गई.

‘‘निम्मो, मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है… और, वैसे भी हमें यहां अकेले… यानी मैं और तुम… लोग बेकार में बातें बनाएंगे…’’

‘‘मैं बहुत बदनाम हो चुकी हूं… मैं… बस एक जिंदा लाश बन कर रह गई हूं,’’ डबडबाई आंखों से वह बोली, ‘‘खैर, यह बताओ, मुझ से क्या काम है?’’

‘‘ढाई साल पहले मैं ने तुम्हारे सामने शादी की बात रखी थी, मगर तब की बात और थी. मुझे चमन ने सबकुछ बता दिया है. जो हुआ उसे भूल जाओ… मैं आज भी तुम्हारे लिए तड़प रहा हूं… मुझे तुम्हारी जरूरत है निम्मो, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘क्या…? सबकुछ जानने के बाद भी…?’’ निम्मो ने मनोज को घूरते हुए कहा, ‘‘तुम सचमुच पागल हो. यहां गांव के लोग मुझे धंधेवाली, रखैल… और न जाने क्याक्या कहते रहते हैं… और तुम मुझ से ब्याह करोगे? यह दुनिया बहुत जालिम है. फिर मैं ने तो हमेशा तुम्हारी बेइज्जती ही की है… तुम्हें दुत्कारा है…’’

‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहता. मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरे घर वाले, जातिबिरादरी और गांव वाले मुझे ऐसा कदम उठाने की कभी भी इजाजत नहीं देंगे… लेकिन मैं हर हालत में तुम से ही ब्याह करूंगा.’’

मनोज पलभर रुक कर आगे बोला, ‘‘मैं मांबाप से कोलकाता जल्दी लौटने का कोई बहाना बना लूंगा… तुम आज से ठीक 3 दिन बाद… यानी इतवार की सुबह मुझे स्टेशन पर मिलना. गाड़ी

7 बजे यहां पहुंचती है… सोमवार की सुबहसुबह हम कोलकाता पहुंच जाएंगे, जहां हम ब्याह करेंगे और अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे… अब इनकार मत करना.’’

‘‘यकीन रखो, मैं जरूर आऊंगी. तुम स्टेशन पर मेरा इंतजार करना,’’ निम्मो ने हौले से कहा.

इतवार की सुबह 6 बजे ही मनोज रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया था. अभी चारों ओर अंधेरा ही था. वह बेसब्री से निम्मो का इंतजार करने लगा.

धीरेधीरे अंधेरा छंटने लगा था. लेकिन मनोज दुख, चिंता और नाकामियों के अंधेरे में घिरता चला जा रहा था. घड़ी में समय देखा. 7 बजने में 10 मिनट बाकी थे. उस की उम्मीदों पर काली छाया फैलने लगी थी कि अचानक निम्मो को आते हुए देख कर वह उस की ओर दौड़ा.

निम्मो के पास पहुंच कर मनोज ने हांफते हुए कहा, ‘‘निम्मो, गाड़ी आने ही वाली है… मैं टिकट ले कर आता हूं. हमें होशियार रहना होगा… कहीं कोई जानपहचान वाला न मिल जाए… बेकार में मुसीबत खड़ी हो जाएगी.

‘‘मैं तुम्हें इशारा करूंगा. तुम जनाना डब्बे में चढ़ जाना. अगले स्टेशन पर मैं तुम्हें अपने डब्बे में ले आऊंगा.’’

‘‘ठीक है,’’ निम्मो ने इधरउधर देखते हुए डरी हुई आवाज में कहा.

मनोज फौरन टिकट ले कर प्लेटफार्म पर आ खड़ा हुआ. जल्दी ही गाड़ी आ गई. वह निम्मो के करीब पहुंच गया और इशारे से उसे जनाना डब्बे में चढ़ा कर दरवाजे पर ही खड़ा हो गया. तभी गार्ड ने सीटी बजाई और हरी झंडी दिखाई.

धीरेधीरे गाड़ी सरकने लगी. मनोज खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया. सुबह की ठंडी हवा के झोंकों के संग मनोज को यों महसूस हुआ, जैसे वह किसी उड़नखटोले पर सवार हो कर ऊंचे, नीले आसमान में घने बादलों में तैरता हुआ उड़ा चला जा रहा है. उस उड़नखटोले में वह अकेला नहीं था, उस की निम्मो भी उस के साथ थी.

नई शुरुआत: सुमन क्यों जलने लगी थी बॉयफ्रेंड राजीव से

सुमन और राजीव दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों बीएससी फाइनल में होने के बावजूद अलगअलग सैक्शन में पढ़ रहे थे. उन दोनों की पहली मुलाकात एक लाइब्रेरी में हुई थी. राजीव ने अपनी तरफ से नोट्स देने में सुमन की पूरी मदद की थी. यह बात सुमन को छू गई थी. राजीव वैसे भी लड़कियों से दूर ही रहता था. स्वभाव से शर्मीले राजीव को सुमन का सलीके से रहना पसंद आ गया था.

‘‘राजीव सुनो, क्या तुम मुझे एक कप चाय पिला सकते हो? मेरा सिरदर्द से फटा जा रहा है,’’ असल में सिर दर्द का तो बहाना था, सुमन राजीव के साथ कुछ देर रहना चाहती थी.

‘‘वैसे, मैं चाय नहीं पीता, लेकिन चलो तुम्हारे साथ पी लूंगा,’’ राजीव कहते हुए थोड़ा झेंप सा गया, तो सुमन मुसकरा दी. कालेज की कैंटीन की बैंच पर बैठ कर राजीव ने 2 कप चाय और्डर कर दी. सुमन बातचीत का सिलसिला शुरू करने की कोशिश करने लगी, ‘‘तुम्हारे, मेरा मतलब है कि आप के घर में और कौनकौन है?’’

‘‘जी, मेरा एक बड़ा भाई है और मांबाबूजी,’’ राजीव ने नजरें झुका कर जवाब दिया.

‘यह लड़का कहीं पिछले जन्म में लड़की तो नहीं था?’ राजीव की झिझक और शराफत देख कर सुमन सोचने लगी.

‘‘जी, आप ने मुझ से कुछ कहा?’’ राजीव ने सवाल किया, तो वह कुछ अचकचा सी गई.

‘‘बिलकुल नहीं जनाब, आप से नहीं कहूंगी तो क्या इस कैंटीन की छत से कहूंगी?’’ सुमन बोली.

इतने में बैरा चाय ले आया. राजीव ने कालेज के दूसरे लड़कों की तरह न तो बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया और न ही कोई ऐसीवैसी हरकत करने की कोशिश की.

‘‘चलो चलें, पीरियड का समय हो गया है शायद,’’ अपनी चाय खत्म करते हुए राजीव बोला, तो मजबूरी में सुमन को भी अपनी चाय जल्दीजल्दी पीनी पड़ी.

इस मीटिंग के बाद न राजीव ने कोई दिलचस्पी दिखाई और न ही सुमन को राजीव से बात करने का मौका मिला.

‘‘तू ने तीर तो बिलकुल सही निशाने पर लगाया है राजीव. सुमन की एक झलक पाने के लिए लड़के लाइन लगाए खड़े रहते हैं, पर उस ने केवल तुझे घास डाली है,’’ राजीव की क्लास के दोस्त उसे छेड़ते.

‘‘तुम जैसा समझ रहे हो, वैसा कुछ नहीं है. उस ने मुझ से नोट्स मांगे थे और मैं ने दे दिए. बस, इस से ज्यादा कुछ भी नहीं,’’ राजीव झल्ला कर कहता.

‘‘तुम ने न जाने उस लल्लू कबूतर में ऐसा क्या देखा है जानेमन? एक नजर हम पर भी डाल दो. न जाने कब से लाइन लगा कर खड़े हैं तुम्हारे दीदार के लिए,’’ राजीव के साथ सुमन को देख कर दूसरे लड़कों के सीने पर भी सांप लोट जाता.

‘‘राजीव, चलो न कहीं घूम आते हैं. वैसे भी आज गुप्ता सर का पीरियड नहीं होने वाला है, क्योंकि वे आउट औफ स्टेशन हैं,’’ एक दिन सुमन ने राजीव को अपने पास बुला कर कहा.

‘‘पीरियड खाली है तो चलो लाइब्रेरी में चलते हैं, वहीं बैठ कर कुछ समय का सही इस्तेमाल करते हैं,’’ राजीव ने घमूने जाने के अरमान पर पानी फेरते हुए कहा, तो सुमन ने इसे अपनी हेठी समझ और पैर पटकते हुए राजीव को अकेला छोड़ कर चली गई.

सुमन को राजीव द्वारा इस तरह साफ इनकार करना बिलकुल पसंद नहीं आया. अपने साथ हुई इस बेइज्जती का बदला लेने के लिए वह तड़प उठी.

बहुत जल्दी ही सुमन को राजीव से अपनी बेइज्जती का बदला लेने का मौका भी मिल गया. एक दिन जब राजीव लाइब्रेरी से निकल कर अपनी क्लास की तरफ जा रहा था, तभी उस का ध्यान कहीं और होने के चलते वह एक लड़की नीलम से टकरा गया.

अचानक लगी इस टक्कर से नीलम खुद को संभाल न पाई और जमीन पर गिर गई. हालांकि उन दोनों ने ‘आई एम सौरी’ कह कर इस घटना को तूल नहीं दिया, पर सुमन ने बात का बतंगड़ बना कर हंगामा मचा दिया.

देखते ही देखते लड़कों की भीड़ वहां जमा हो गई और उन्होंने राजीव का कौलर पकड़ कर उसे नीलम से माफी मांगने के लिए मजबूर कर दिया.

राजीव को अपराधी की तरह खड़ा देख कर लड़कियों को बहुत मजा आ रहा था. बेचारा राजीव क्या करता, उसे कान पकड़ कर न केवल

माफी मांगनी पड़ी, बल्कि इतने सारे छात्रों के सामने जलील भी होना पड़ा.

सुमन को यह सब देख कर बहुत अच्छा लग रहा था, क्योंकि उस ने अपनी बेइज्जती का बदला जो राजीव से ले लिया था.

इस घटना को कई दिन बीत गए. राजीव हमेशा अपने काम से काम रखता था. यही बात सुमन को चुभ जाती थी और उसे रिएक्ट करने के लिए मजबूर कर देती थी.

दरअसल, सुमन यह चाहती थी कि राजीव उस के आसपास मंडराए और उस की जीहुजूरी करे. उसे ऐसा ही बौयफ्रैंड चाहिए था, जो उस के नखरे सह सके.

कुछ ही दिनों में छात्र संघ के चुनाव होने जा रहे थे. राजीव के दोस्त चाहते थे कि वह छात्र संघ अध्यक्ष का चुनाव लड़े. राजीव ऐसा नहीं चाहता था, पर दोस्तों के दबाव में उसे राजी होना ही पड़ा. उस का मुकाबला मोहित से था.

मोहित दबंग किस्म का हुल्लड़बाज लड़का था, जो किसी भी तरह अध्यक्ष पद पर काबिज होना चाहता था. लड़कों को अपने पक्ष में करने के लिए उस ने पैसा पानी की तरह बहाना शुरू कर दिया था, जबकि राजीव के पास लगाने के लिए ज्यादा पैसा नहीं था.

सुमन भी बढ़चढ़ कर मोहित के पक्ष में वोटिंग कराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही थी. राजीव को दब्बू, नकारा और कबूतर साबित करने के लिए उस ने झूठीसच्ची कहानियां भी छात्रों को सुनाईं, ताकि वह हार जाए और एक बार फिर उस के कलेजे को ठंडक पहुंचे.

चुनाव नतीजे आए, तो सब ने दांतों तले उंगली दबा ली. राजीव जीत गया था. सुमन के सारे अरमान हवा हो गए. जीत की खुशी में दोस्तों ने राजीव को अपने कंधे पर उठा लिया और गुलाल उड़ाते हुए कालेज का चक्कर लगाने लगे.

‘‘जीत मुबारक हो राजीव. मुझे पता था कि तुम ही यह चुनाव जीतोगे,’’ सुमन ने रस्मीतौर पर राजीव को बधाई देते हुए कहा, तो उस ने हाथ जोड़ दिए.

राजीव के रवैए से सुमन समझ गई कि वह उस की असलियत को जान चुका है, इसलिए उस ने अब राजीव के बारे में सोचना बंद कर दिया था. उसे अब राजीव से कोई मतलब नहीं रह गया था.

इधर सुमन के घर वाले भी अब उस का रिश्ता पक्का करना चाहते थे. उन्होंने कई लड़के सुमन को दिखाए भी, पर उन में से कोई भी उसे नहीं जंच रहा था. उधर राजीव अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर के अच्छी नौकरी पर लग चुका था. एक तरह से सुमन उसे भुला ही चुकी थी.

‘‘सुमन, जल्दी से तैयार हो जाओ. लड़के वाले तुम्हें देखने आ रहे हैं. उन के आने का समय हो गया है,’’ एक शाम जब सुमन दोपहर में सो कर उठी, तो उस की मम्मी ने आ कर बताया.

सुमन अब एक तरह से लड़कों के आ कर देखे जाने से उकता चुकी थी. उसे अब इन बातों में इंटरैस्ट कम होता जा रहा था.

‘‘कौन है वह? और क्या करता है?’’ खुद को आईने में देखते हुए सुमन ने अपनी मां से पूछा, तो उन्होंने बताया कि लड़का अच्छी पोस्ट पर है और अच्छे खानदान से है.

खैर, सुमन को तो यह सब झेलने की आदत हो चुकी थी. बाहर कार का हौर्न बजा तो घर वाले सतर्क हो गए. सुमन ने भी एक बार अपने मेकअप और ड्रैस को अच्छे से देख कर सही कर लिया.

अब सुमन को चाय की ट्रे ले कर ड्राइंगरूम में जाना था. जैसे ही वह ट्रे ले कर वहां पहुंची, उस की नजर उसे देखने आए लड़के पर गई. उसे देखते ही वह बुरी तरह से चौंक गई और चाय की ट्रे उस के हाथ से गिरतेगिरते बची.

‘‘राजीव. तुम…?’’ दोनों शब्द उस के होंठों में फंस कर रह गए थे.

राजीव ने अपनी आदत के मुताबिक खड़े हो कर पहले हाथ जोड़े और फिर उसे हैलो कहा. उस का अंदाज बिलकुल नपातुला था.

बातों ही बातों में सुमन को पता चला कि राजीव एक अच्छी फर्म में मैनेजर हो चुका है और अच्छीखासी तनख्वाह पा रहा है.

‘‘सुमनजी, क्या आप को लगता है कि मैं आप का लाइफ पार्टनर बनने के काबिल हूं? अगर आप का दिल इस बात की गवाही देता हो तो ही आप हां करना, वरना साफ इनकार कर देना.’’

एकांत में जब राजीव ने सुमन से बड़े ही अदब के साथ पूछा, तो सुमन जैसे शर्म के मारे जमीन में गड़े जा रही थी. उसे लगा, जैसे राजीव ने उस से अपनी सारी बेइज्जती का बदला इस एक सवाल से ले लिया हो.

‘‘यह सवाल तो मुझे आप से करना चाहिए था. मेरी इतनी गलतियों को माफ करने के बाद भी अगर आप मुझे अपनाने के बारे में सोच रहे हैं, तो यह आप की महानता है. मैं आप की गुनाहगार हूं, आप जो चाहे सजा मुझे दे सकते हैं,’’ सुमन के चेहरे पर शर्मिंदगी के भाव साफ नजर आ रहे थे.

‘‘अरे, आप तो रोने लगीं. माफी चाहता हूं कि मेरी वजह से आप का दिल दुखा. शादीब्याह कोई गुड्डेगुडि़या का खेल नहीं होता. मैं नहीं चाहता कि पुरानी यादें हमारी नई जिंदगी की शुरुआत में रोड़ा अटकाएं, इसलिए जो भी फैसला करो, सोचसमझ कर ही करना,’’ कह कर राजीव जाने को तैयार हुआ, तो सुमन उस के पैरों में गिर पड़ी.

‘‘यह आपआप क्या लगा रखी है राजीव? तुम्हारी बीवी बन कर मैं अपने सारे पापों का पछतावा करना चाहती हूं. क्या तुम मुझे यह मौका दोगे?’’

‘‘सोचेंगे…’’ उस समय बस इतना ही कह कर राजीव वापस ड्राइंगरूम में चला गया और अपनी मां के कान में कुछ फुसफुसा दिया.

‘‘भई, मेरे बेटे और हमें तो लड़की पसंद है. अगर सुमन को कोई एतराज न हो, तो आप दोनों की शादी तय कर दीजिए,’’ राजीव की मम्मी के कहे ये शब्द सुमन के कानों में मिश्री की तरह घुलते जा रहे थे. उस के मन की घबराहट अब धीरेधीरे खत्म होती जा रही थी.

प्याज के आंसू: क्यों पत्नी ने बर्बाद कर दिया पति का जीवन

आज घर का माहौल बहुत गमगीन था. भैया का सामान ट्रक से उतारा जा रहा था और हमारे पुराने घर में इस सामान के लिए  जैसेतैसे जगह बनाई जा रही थी. मेरे भतीजे और ममेरे, फुफेरे भाई सभी सजल नेत्रों के साथ सामान उतार रहे थे. वे किस तरह सहेज और संभाल कर सामान उतार रहे थे उसे देख कर मन भीग सा गया. काश, भाभी भी जीवन को इसी तरह सहेज कर चलतीं तो दरके मन के साथ भैया को आज यह दिन तो नहीं देखना पड़ता.

मन बरबस ही आज से 12 साल पहले  के माहौल में चला गया जब भैया मात्र 20 वर्ष की आयु में सरकारी नौकरी प्राप्त करने में सफल रहे थे. घर में मम्मीपापा ही क्या हम सब भाईबहन भी बेहद खुश थे. भैया दिल्ली में सेना मुख्यालय में निजी सहायक के पद पर चयनित हुए थे. 2 साल की कड़ी मेहनत के बाद उन के जीवन में खुशी का यह क्षण आया था.

मम्मी और पापा यह सोच कर अत्यंत  भावुक हो गए थे कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में बेटा कहां रहेगा, उस के खानेपीने का ध्यान कौन रखेगा, लेकिन भैया बहुत उत्साहित थे. एक युवा मन में नौकरी पाने के बाद जो उमंग और उत्साह होता है वह सब भैया में मौजूद था.

भैया अपना सूटकेस ले कर एक अनजान शहर में जा चुके थे. दिल्ली जैसे महानगर में रहने की समस्या, खानेपीने की समस्या और आफिस आनेजाने की समस्या से भी भैया का सामना हुआ और उन्होंने इस का न केवल डट कर मुकाबला किया बल्कि इस पर विजय भी पाई.

बड़े शहर में जितने जन उतने सपने. हर इनसान एक जीताजागता सपना होता है और अपने सपने से संघर्ष करता हुआ नजर आता है. भैया भी इस भीड़ में शामिल हो गए थे और अपने सपनों को साकार करने में जुट गए.

भैया ने पढ़ाई से नाता जोड़े रखा और तमाम तरह की तकलीफों से अकेले जूझते हुए उन्होंने अपना ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया और अपनेआप को सिविल सेवा के लिए तैयार करने में जुट गए लेकिन वह इस में सफल नहीं हो सके.

भैया को जब भी अवकाश मिलता था वह घर आ जाते थे और हम सब मिल कर बहुत खुश होते थे. धीरेधीरे 5 वर्ष निकल गए. इन 5 सालों में बहुत कुछ बदल गया था. पापा अपनी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. मैं खुद इंजीनियरिंग करने के बाद एक अदद नौकरी की तलाश में भटक रहा था. उधर भैया भी अपना जीवन स्तर उठाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. हम सब बहुत ही खुश थे और जिंदगी ठीकठाक चल रही थी.

भैया के सरकारी नौकरी में होने की वजह से उन के लिए जगहजगह से शादी के रिश्ते आने लगे थे. भैया बेहद स्मार्ट एवं सुडौल शरीर के मालिक थे. उन्हें ऐसी लड़की चाहिए थी जो पढ़ीलिखी, सुंदर व तेज दिमाग वाली हो ताकि दिल्ली जैसे शहर की सचाइयों के साथ जी सके और साथ ही भैया को अपनी परिपक्वता से कुछ सुकून के पल दे सके क्योंकि वह अब तक संघर्ष कर के बुरी तरह थक चुके थे और प्यार की, अपनत्व भरे सहयोग की शीतल छांव में थोड़ा विश्राम करना चाहते थे.

भैया की यह तलाश इंदौर जा कर समाप्त हुई. शादी बहुत ही धूमधाम से हुई. शादी में दोनों परिवारों ने दिल खोल कर खर्च किया था. शादी संपन्न होने के बाद सभी अपनीअपनी घरगृहस्थी में रम गए. भैयाभाभी बहुत खुश थे. दोनों ने मिल कर कहीं बाहर घूमने का कार्यक्रम बनाया और वे लोग हनीमून मनाने के लिए शिमला गए.

मम्मीपापा  भी अपने को थोड़ा हलका महसूस कर रहे थे क्योंकि पापा ने अपनी एक जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभा दी थी. भैया अपनी नौकरी और पत्नी में लीन हो  गए. कभीकभी मम्मी शिकायत भरे लहजे में कह भी देती थीं कि शादी के बाद तू बदल गया है, लेकिन ऐसा शायद नहीं था.

भैया ने भाभी को भी आगे पढ़ने व अपना एक मुकाम हासिल करने के लिए प्रेरित किया लेकिन अपने अंतर्मुखी स्वभाव के चलते वह वैसा न कर सकीं जैसा भैया चाहते थे. वह अपने को पति तक ही सीमित रखती थीं और  घर में किसी से ज्यादा बात नहीं करती थीं. यहां तक कि मम्मी और पापा से भी वह बात करना पसंद नहीं करती थीं.

भैया सदैव भाभी को खुश रखने का प्रयास करते थे. उन्हें न केवल सारी सुख- सुविधा देने का प्रयास करते बल्कि भाभी की हर इच्छा को पूरी करना अपना कर्तव्य समझते थे. अपने प्रति भैया का यह लगाव भाभी ने उन की कमजोरी समझ लिया और फिर पूरे षड्यंत्र के तहत वह सब किया जो आज की आम बात हो गई है.

भैया के घर आने पर वह किसी को कुछ नहीं समझती थीं लेकिन हम लोग भैया के डर से चुप रहते थे और सोचते थे कि थोड़े दिनों के लिए ये आए हैं जैसे रहते हैं रहने दिया जाए क्योंकि दोनों अपनी जिंदगी से खुश थे और उन की खुशी में ही हम सब की खुशी थी.

भाभी हमेशा अपने मायके वालों को ही सबकुछ समझती रहीं और उन के अंदर कभी इस परिवार के प्रति समर्पण व त्याग की भावना नहीं जागी जिस में वह शादी कर के आई थीं. शायद उन की शिक्षा ही ऐसी थी कि उन का दिमाग सदैव इसी बात में लगा रहता था कि किस प्रकार भैया को घर की तरफ से विमुख रखा जाए.

भैया का वैचारिक स्तर काफी ऊंचा व सुलझा हुआ था. भैया और मम्मी की वैचारिक बहस में कभीकभी मतभेद हो जाया करता था और इस वैचारिक मतभेद का भाभी व उन के मायके वालों ने बड़ा गलत फायदा उठाया. भाभी  को कभी भी हमारे परिवार के सदस्यों का सम्मान करने की शिक्षा नहीं दी गई. भैया भी भाभी पर ही विश्वास करते थे लेकिन भाभी लगातार इसी विश्वास का फायदा उठाने में लगी थीं और अपने घर वालों के साथ मिल कर भैया को उन के परिवार से दूर रखने का घिनौना प्रयास ही करती रहीं.

भाभी के मम्मीपापा व अन्य रिश्तेदार उन का लगातार दिमाग खराब कर रहे थे. वे इन बातों को समझ नहीं पा रही थीं कि ऐसा कर के अपनी ही घरगृहस्थी में सेंध लगा रही हैं. भैया को उन के परिवार से दूर रखने की जो कुत्सित मुहिम चलाई जा रही थी उस का पता उन को अपने ही ससुराल के एक अन्य सदस्य से लग गया और भैया ने अपने ससुराल वालों के यहां आनाजाना व उन्हें महत्त्व देना बंद कर दिया, लेकिन तब तक भाभी का दिमाग इतना खराब कर दिया गया था कि वह इस से उबर नहीं पा रही थीं और उन्हें वही सही लगता था जो उन के मायके वाले कहते थे. और आखिर तक इस मकड़जाल से वह कभी नहीं निकल पाईं. भाभी का दिमाग इतना खराब कर दिया गया कि वह भैया पर शक करने लगीं. भैया की हर गतिविधि को शक के घेरे में रख कर देखने लगीं और उन का दिमाग एक कूड़ेदान की तरह हो गया था जिस में कितनी भी अच्छी बातों को डाला जाए वह सड़  ही जाती है.

भैया ने भाभी को प्यार से कई बार समझाने का प्रयत्न किया और कहा कि अपना दिमाग ठीक रखो. भाभी के शंकालु स्वभाव के कारण भैया की परेशानी बढ़ गई और वह चिड़चिड़े हो गए. जब भाभी प्यार से नहीं मानती थीं तो धीरेधीरे उन के बीच झगड़ा होने लगा और उन का घरेलू जीवन एकदम नीरस हो गया. दोनों अकेले रहते थे लेकिन खुश नहीं थे.  भैया, भाभी को अपने  हिसाब से  रहने को कहते थे परंतु भाभी का अहंम बहुत ही चरम पर था. उन्होंने भैया की कोई बात न मानने की जैसे कसम ही खा ली थी.

भैया को अपने सपने टूटते से लगे और धीरेधीरे यह बात घर के बड़ेबुजुर्गों तक भी पहुंच गई. भैया को यह जान कर भी बहुत दुख हुआ था कि भाभी के मायके वाले भी उन्हें समझाने को तैयार नहीं थे और लगातार षड्यंत्र रच रहे थे.

भैया और भाभी के बीच का तनाव इतना ज्यादा बढ़ गया कि उसे देख कर दोनों परिवार के सदस्य परेशान हो गए. भाभी चोरीछिपे अपने मायके फोन कर के उलटासीधा बताने लगीं जिस ने जलती आग में घी का काम किया. समस्या के प्रति भाभी के मायके वाले कभी गंभीर नहीं रहे और उन्होंने कभी आमनेसामने खुल कर बात नहीं की और फिर वही हुआ जिस का सब को डर था.

एक रात भाभी दिल्ली जैसे शहर से अकेली भैया को बिना बताए ही अपने मायके पहुंच गईं. उन के घर के लोग पहले से ही भरे बैठे थे, उन्होंने भैया को सबक सिखाने की ठान ली.

उधर भाभी के इस तरह से अचानक चले जाने से भैया बहुत परेशान हुए और जगहजगह उन्हें ढूंढ़ते रहे. भाभी के मायके फोन कर के पूछने पर भी उन लोगों ने भैया को नहीं बताया कि भाभी उन के पास पहुंच गई हैं. अंतत: भाभी की गुमशुदगी की रिपोर्ट उन्होंने थाने में दर्ज करवा दी. इसी के बाद भैया के ससुराल के लोग उन्हें बरबाद करने की सोचने लगे.

भैया पर क्या बीत रही है जब इस का पता घर के लोगों को चला तो कुनबे के बड़ेबूढ़ों को ले कर पापा, भाभी को लेने उन के घर गए लेकिन उन्होंने शायद फैसला कर लिया था कि लड़की को नहीं भेजना है. वहां सभी बड़ों का अपमान होता रहा और भाभी परदे के पीछे से यह सब देखती रहीं. क्या मेरे घर के बुजुर्ग उन के कुछ नहीं लगते थे, शायद नहीं, तभी तो वह हमारे परिवार की बुजुर्गियत को शर्मसार होते चुपचाप देखती रही थीं.

इधर भैया यह सोच कर बहुत ही परेशान थे कि जिस औरत के साथ वह पिछले 5 सालों से रह रहे थे और जिस पर वह अपनों से ज्यादा भरोसा करते थे वही औरत उन के साथ इतना बड़ा  विश्वास- घात कैसे कर सकती है, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उस औरत की संवेदनशीलता मर चुकी थी.

भैया ने कई बार भाभी से फोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन उन के घर वालों ने भैया को अपनी ही पत्नी से बात नहीं करने दी. इस से बड़ा दुख तो इस बात का है कि भाभी ने कभी एक बार भी अपनी तरफ से भैया से बात नहीं की. भैया एक बार खुद भाभी को लेने पहुंचे तो ससुराल वालों ने सभी परंपराओं व मान्यताओं को ताक पर रख कर उन को बेइज्जत कर के घर से निकाल दिया और यह सब होते हुए भाभी चुपचाप देखती रहीं. इतना सब हो गया कि आपस का प्यार व विश्वास तारतार हो गया. रहीसही कसर भाभी की उस हरकत ने पूरी कर दी जिसे आज औरत अपना सब से बड़ा हथियार मानती है और वह है भारतीय कानून की धारा 498.

भाभी ने भैया पर कई बेबुनियाद आरोप लगाए, उन्हें चरित्रहीन साबित करने की कोशिश की, उन पर मारपीट करने, दहेज के लिए प्रताडि़त करने का आरोप लगाया और ऐसे आरोप भैया के लिए मौत के समान थे. वह अपने पर लगाए गए आरोपों से टूट गए. भाभी ने मम्मी व मुझ पर भी आरोप लगाए, मेरी बड़ी बहन पर भी आरोप लगाए जबकि हम सब उन से करीब 1,500 किलोमीटर दूर रहते हैं. लेकिन यह एक परंपरा चल निकली है कि दहेज के  घेरे में सभी को रखा जाए और परेशान किया जाए, भले ही सचाई से इस का कोई लेनादेना नहीं. पुलिस भी कानून के आगे बेबस है.

भैया के लिए इन आरोपों का आघात किसी वज्रपात से कम न था. उन का सारा जीवन तबाह हो गया. इस घटना के बाद हंसतेमुसकराते भैया गम के गहरे सागर में चले गए थे जहां से उबरना उन के लिए शायद अब कभी संभव नहीं होगा. और हम लोग उन्हें धीरेधीरे खत्म होते देखने के लिए विवश थे.

भैया के लिए यह असहनीय बात थी कि वह एक ऐसी औरत के साथ पूरे मन से रह रहे थे जो पूरे मन के साथ उन के साथ नहीं रह रही थी. वह दोहरे चरित्र की साक्षी थीं. उन के दिलोदिमाग में भैया के लिए कितना जहर भरा था यह उन के द्वारा लिखे गए शिकायती पत्रों से पता चलता है जोकि उन्होंने थाने में व भैया के आफिस में लिखे और जिस के कारण भैया की सरकारी नौकरी चली गई.

उस दिन तो भैया पूरी तरह से ही टूट गए जिस दिन इंदौर की पुलिस ने मां व दीदी को थाने में आने के लिए कहा. भाभी को इस बात का एहसास ही नहीं था कि वह क्या कर रही हैं. किसी की मांबहन को पुलिस से बेइज्जत कराने का क्या मतलब होता है? यह शायद उन्हें मालूम नहीं था, और फिर क्या मेरी मां तथा दीदी उन की कुछ नहीं लगती थीं, शायद नहीं.

आज भैया बीमार हैं और बहुत ही थकेथके से लगते हैं. वे अकेले में बहुत रोते हैं और शायद उन का पुरुष मन उन्हें सब के सामने रोने नहीं देता इसलिए वे रसोई में प्याज काटने चले जाते हैं ताकि उन की आंखों के पानी को प्याज की तिक्तता समझा जाए लेकिन मैं इतना नादान नहीं था.

मैं जब भी भैया को देखता यही सोचता कि इस देश का कानून क्यों एक औरत को इतनी निरंकुश होने की इजाजत देता है कि वह अपने अहं को शांत करने के लिए सबकुछ बरबाद कर दे, किसी के भी आत्मसम्मान के साथ मनमाना खेल, खेल सके.

पूरे घटनाक्रम में भाभी पूरी तरह से स्वयं षड्यंत्र का शिकार नजर आ रही थीं.

भारत में औरत को त्याग, बलिदान व  तपस्या की मूर्ति कहा जाता है लेकिन भाभी तो छोड़ गई थीं भैया को तिलतिल कर मरने के लिए. मुझे तो इस बात का भी आश्चर्य है कि वह इतना सब होते हुए प्रत्यक्ष देखने के बाद इस संसार में कैसे चैन से रह सकेंगी, कैसे वह अपनेआप से नजरें मिला सकेंगी और इस दंश से अपनेआप को कैसे मुक्त कर सकेंगी कि वह एक घर से भागी हुई तथा एक जिंदादिल इनसान और उस की रोजीरोटी की हत्यारिन हैं.

ट्रक वाला मुझ से बाकी पैसे देने को कह रहा था और मेरी तंद्रा टूट गई. मैं वर्तमान में आ गया था. भैया का सामान उतारा जा चुका था और भैया के स्वर्णिम कैरियर का दुखद अंत हो चुका था.

लेखक- छबी पराते

शॉर्टकट: नसरीन ने सफलता पाने के लिए कौन-सा रास्ता अपनाया?

उफ फिर एक नया ग्रुप. लगता है सारी दुनिया सिर्फ व्हाट्सऐप में ही सिमट गई है. कालेज जाने से पहले अपने मोबाइल में व्हाट्सऐप मैसेज चैक करते समय नसरीन ने खुद को एक नए व्हाट्सऐप ग्रुप सितारे जमीं पर से जुड़ा पाया.

यह व्हाट्सऐप का शौक भी धीरेधीरे लत बनता जा रहा है. न देखो तो कई महत्त्वपूर्ण सूचनाओं और जानकारी से वंचित रह जाते हैं और देखने बैठ जाओ तो वक्त कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता. किसीकिसी ग्रुप में तो एक ही दिन में सैकड़ों मैसेज आ जाते हैं. बेचारा मोबाइल हैंग हो जाता है. आधे से ज्यादा तो मुफ्त का ज्ञान बांटने वाले कौपीपेस्ट ही होते हैं और बचे हुए आधों में भी ज्यादातर तो गुडमौर्निंग, गुड ईवनिंग या गुड नाइट जैसे बेमतलब के होते. लेदे कर कोई एकाध मैसेज ही दिन भर में काम का होता है. बच्चे का नैपी जैसे हो गया है मोबाइल. चाहे कुछ हो या न हो बारबार चैक करने की आदत सी हो गई है. नसरीन सोचतेसोचते सरसरी निगाहों से सारे मैसेज देख रही थी. कुछ पढ़ती और फिर डिलीट कर देती. कालेज जाने से पहले रात भर के आए सभी मैसेज चैक करना उस की आदत में शुमार है.

देखें तो क्या है इस नए ग्रुप में? ऐडमिन कौन है? कौनकौन जुड़ा है इस में? क्या कोई ऐसा भी है जिसे मैं जानती हूं? नसरीन ने नए ग्रुप के गु्रप इन्फो पर टैब किया. इस ग्रुप में फिलहाल 107 लोग जुड़े थे. स्क्रोल करतेकरते उस की उंगलियां एक नाम पर जा कर ठहर गईं. राजन? ग्रुप ऐडमिन को पहचानते ही नसरीन उछल पड़ी.

अरे, ये तो फेस औफ द ईयर कौंटैस्ट के आयोजक हैं. इस का मतलब मेरा प्रोफाइल फर्स्ट लैवल पर सलैक्ट हो गया है. नसरीन के अरमानों को छोटेछोटे पंख उग आए.

नसरीन जयपुर में रहने वाले मध्यवर्गीय मुसलिम परिवार की साधारण युवती है. मगर उस की महत्त्वाकांक्षा उसे असाधारण बनाती है. 5 फुट 5 इंच लंबी, आकर्षक नैननक्श और छरहरी काया की मालकिन नसरीन के सपने बहुत ऊंचे हैं और अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह किसी भी हद तक जाने का जनून रखती है. जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने वाली नसरीन को समाज के रूढिवादी रवैए ने बागी बना दिया. उस का सपना मौडल बनने का है. मगर सब से बड़ी बाधा उस का खुद का परिवार बना हुआ है. उस के भाई को उस का फैशनेबल कपड़े पहनना फूटी आंख नहीं सुहाता और मां भी जितनी जल्दी हो सके अपने भाई के बेटे से उस का निकाह कराना चाहतीं. मगर इस सब से बेखबर नसरीन अपनी ही दुनिया में खोई रहती है. उस की जिंदगी में फिलहाल शादी और बच्चों के लिए कोई जगह नहीं है. उस की हमउम्र सहेलियां उस से ईर्ष्या करती हैं. मगर मन ही मन उस की तरह जीना भी चाहती हैं.

महल्ले के बड़ेबुजुर्गों और मौलाना साहब तक उस के अब्बा हुजूर को हिदायत दे चुके हैं कि बेटी को हिजाब में रखें और कुरान की तालीम दें, क्योंकि उसे देख कर समाज की बाकी लड़कियां भी बिगड़ रही हैं. लेकिन अब्बा को जमाने से ज्यादा अपनी बेटी की खुशी प्यारी थी, इसलिए उन्होंने उसे सब की निगाहों से दूर फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने दिल्ली भेज दिया.

एक दिन कालेज के नोटिस बोर्ड पर राजन की कंपनी द्वारा आयोजित फेस औफ द ईयर कौंटैस्ट का विज्ञापन देखा, तो उसे आशा की एक किरण नजर आई. हालांकि दिल्ली में आए दिन इस तरह के आयोजन होते रहते हैं, मगर राजन की कंपनी द्वारा चुने गए मौडल देश भर में अलग पहचान रखते हैं. विज्ञप्ति के अनुसार विभिन्न चरणों से होते हुए प्रतियोगिता का फाइनल राउंड मुंबई में होना था तथा विजेता मौडल को क्व10 लाख नकद इनाम राशि के साथसाथ 1 साल का मौडलिंग कौंट्रैक्ट साइन करना था. यह जानते हुए भी कि फिल्मों की तरह इस क्षेत्र में भी गौड फादर का होना जरूरी है, नसरीन ने इस प्रतियोगिता के लिए अपनी ऐंट्री भेज दी. उस का सोचना था कि वह यह कौंटैस्ट जीत गई तो आगे का रास्ता खुल जाएगा.

राजन फैशन जगत में जाना माना नाम है. उस की रंगीनमिजाजी के किस्से अकसर सुनाई देते हैं. फिर भी उस के लिए मौडलिंग करना किसी भी नवोदित का सपना होता है. आज खुद इस ग्रुप में राजन के साथ जुड़ कर नसरीन को यों लगा मानो उस की लौटरी लग गई. आज आसमान मुट्ठी में कैद हुआ सा लग रहा था. उसे अचानक नीरस और उबाऊ व्हाट्सऐप अच्छा लगने लगा.

‘सब कुछ सिस्टेमैटिक तरीके से करना होगा.’ सोचते हुए मिशन की प्लानिंग के हिसाब से सब से पहले नसरीन ने व्हाट्सऐप प्रोफाइल की डीपी पर लगी अपनी पुरानी तसवीर हटा कर सैक्सी तसवीर लगाई. फिर राजन को पर्सनल चैट बौक्स में मैसेज भेज कर थैंक्स कहा. राजन ने जवाब में दोनों हाथ नमस्कार की मुद्रा में जुड़े हुए 2 स्माइली प्रतीक भेजे. यह नसरीन की राजन के साथ पहली चैट थी.

एक दिन नसरीन ने अपने कुछ फोटो राजन के इनबौक्स में भेजे तथा तुरंत ही सौरी का मैसेज भेजते हुए लिखा, ‘‘माफ कीजिएगा, गलती से सैंड हो गए.’’

‘‘इट्स ओके. बट यू आर लुकिंग वैरी सैक्सी,’’ राजन ने लिखा.

‘‘सर, मैं इस वक्त दुनिया की सब से खुशहाल लड़की हूं, क्योंकि मैं आप जैसे किंग मेकर से सीधे रूबरू हूं.’’

‘‘मैं तो एक अदना सा कला का सेवक हूं.’’

‘‘हीरा अपना मोल खुद नहीं आंक सकता.’’

‘‘आप नाहक मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा रही हैं.’’

‘‘जो सच है वही कह रही हूं…’’

राजन ने 2 हाथ जुड़े हुए धन्यवाद की मुद्रा में भेजे.

‘‘ओके सर बाय. कल मिलते हैं,’’ और 2 स्माइली के साथ नसरीन ने चैट बंद कर दी.

2 दिन बाद प्रतियोगिता का पहला राउंड था. नसरीन ने राजन को लिखा, ‘‘सर, यह मेरा पहला चांस है, क्या हमारा साथ बना रहेगा?’’

‘‘यह तो वक्त तय करेगा या फिर खुद तुम,’’ कह कर राजन ने जैसे उसे एक हिंट दिया.

नसरीन उस का इशारा कुछकुछ समझ गई. फिर ‘मैं यह कौंटैस्ट हर कीमत पर जीतना चाहूंगी,’ लिख कर नसरीन ने उसे हरी झंडी दे दी.

पहले राउंड में देश भर से चुनी गईं 60 मौडलों में से दूसरे राउंड के लिए  20 युवतियों का चयन किया गया. नसरीन भी उन में से एक थी. राजन ने उसे बधाई देने के लिए अपने कैबिन में बुलाया. आज उस की राजन से प्रत्यक्ष मुलाकात हुई. राजन जितना फोटो में दिखाई देता था उस से कहीं ज्यादा आकर्षक और हैंडसम था. अपने कैबिन में उस ने नसरीन के गाल थपथपाते हुए कहा, ‘‘बेबी, हाऊ आर यू फीलिंग नाऊ?’’

‘‘यह राउंड क्वालिफाई करने के बाद या फिर आप से मिलने के बाद?’’ नसरीन ने शरारत से पूछा.

‘‘स्मार्ट गर्ल.’’

‘‘अब आगे क्या होगा?’’

‘‘कहा तो है कि यह तुम पर डिपैंड करता है,’’ राजन ने उस की खुली पीठ को हलके से छूते हुए कहा.

‘‘वह तो है, मगर अब कंपीटिशन और भी टफ होने वाला है,’’ नसरीन ने राजन की हरकत का कोई विरोध न करते हुए कहा.

‘‘बेबी, तुम एक काम करो, नैक्स्ट राउंड में अभी 10 दिन का टाइम है. तुम रोनित शेट्टी से पर्सनैलिटी ग्रूमिंग की क्लासेज ले लो. मैं उसे फोन कर देता हूं,’’ राजन ने उस के चेहरे पर आई लटों को हटाते हुए कहा.

‘‘सो नाइस औफ यू… थैंक्स,’’ कह नसरीन ने उस के हाथ से रोनित का कार्ड ले लिया.

10 दिन बाद प्रतियोगिता के सैकंड राउंड में नसरीन सहित 10 मौडलों का चयन किया गया. अब आखिरी राउंड में विजेता का चयन किया जाना था. प्रतियोगिता का फाइनल मुंबई में होना था. निर्णायक मंडल में राजन सहित एक प्रसिद्ध टीवी ऐक्ट्रैस और एक प्रसिद्ध पुरुष मौडल था.

नसरीन भी सभी प्रतिभागियों के साथ मुंबई पहुंच गई. प्रतिभागियों के रुकने की अलग व्यवस्था की गई थी और बाकी टीम की अलग. राजन ने नसरीन को मैसेज कर के अपने रूम में बुलाया.

‘‘तो बेबी, क्या सोचा तुम ने?’’

‘‘इस में सोचना क्या? यह तो एक डील है… तुम मुझे खुश कर दो, मैं तुम्हें कर दूंगी,’’ नसरीन ने बेबाकी से कहा.

‘‘तो ठीक है, रात को डील पर मुहर लगा देते हैं.’’

‘‘आज नहीं कल रिजल्ट के बाद.’’

‘‘मुझ पर भरोसा नहीं?’’

‘‘भरोसा तो है, मगर मेरे पास भी तो सैलिब्रेट करने का कोई बहाना होना चाहिए न?’’ नसरीन ने उसे अपने से अलग करते हुए कहा.

‘‘ऐज यू विश… औल द बैस्ट,’’ कहते हुए राजन ने उसे बिदा किया.

अगले दिन विभिन्न चरणों की औपचारिकता से गुजरते हुए अंतिम निर्णय के आधार पर नसरीन को फेस औफ द ईयर चुना गया. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पिछले वर्ष की विजेता ने अपना क्राउन उसे पहनाया तो नसरीन की आंखें खुशी के मारे छलक उठीं. उस ने राजन की तरफ कृतज्ञता से देखा तो राजन ने एक आंख दबा कर उसे उस का वादा याद दिलाया. नसरीन मुसकरा दी.

आज की रात अपनी देह का मखमली कालीन बिछा कर नसरीन ने अपनी मंजिल को पाने के लिए शौर्टकट की पहली सीढ़ी पर पांव रखा. एक गरम कतरा उस की पलकों की कोर को नम करता हुए धीरे से तकिए में समा गया.

खिताब जीतने के बाद पहली बार नसरीन अपने शहर आई. पर रेलवे स्टेशन पर कट्टर समाज के लोगों ने उस के भाई की अगुआई में उसे काले झंडे दिखाए, मुर्दाबाद के नारे लगाए और उसे ट्रेन से उतरने नहीं दिया. भीड़ में सब से पीछे खड़े उस के अब्बा उसे डबडबाई आंखों से निहार रहे थे. नसरीन उन्हें देख कर सिर्फ हाथ ही हिला सकी और ट्रेन चल पड़ी. इस विरोध के बाद उस ने फिर कभी जयपुर का रुख नहीं किया.

देखते ही देखते विज्ञापन की दुनिया में नसरीन छा गई. लेकिन शौर्टकट सीढि़यां चढ़तेचढ़ते काफी ऊपर आ गई नसरीन के लिए मंजिल अभी भी दूर थी. उस की ख्वाहिश इंटरनैशनल लैवल तक जाने की थी और सिर्फ राजन के पंखों के सहारे इतनी ऊंची उड़ान भरना संभव नहीं था. उसे अब और भी सशक्त पंखों की तलाश थी, जो उस की उड़ान को 7वें आसमान तक ले जा सके.

एक दिन उसे पता चला कि फैशन जगत के बेताज बादशाह समीर खान को अपने इंटरनैशनल प्रोजैक्ट के लिए फ्रैश चेहरा चाहिए. उस ने समीर खान से अपौइंटमैंट लिया और उस के औफिस पहुंच गई. इधरउधर की बातों के बाद सीधे मुद्दे पर आते हुए समीर ने कहा, ‘‘देखो बेबी, यह एक बीच सूट है और बीच सूट कैसा होता है, आई होप तुम जानती होंगी.’’

‘‘यू डौंट वरी. जैसा आप चाहोगे हो जाएगा,’’ नसरीन ने उसे आश्वस्त किया.

‘‘ठीक है, नैक्स्ट वीक औडिशन है, लेकिन उस से पहले हम देखना चाहेंगे कि यह जिस्म बीच सूट लायक है भी या नहीं,’’ समीर ने कहा.

नसरीन उस का इशारा समझ रही थी. अत: उस ने कहा, ‘‘पहले औडिशन ले कर ट्रेलर देख लीजिए. कोई संभावना दिखे तो पूरी पिक्चर भी देख लेना.’’

‘‘वाह, ब्यूटी विद ब्रेन,’’ कहते हुए समीर ने उस के गाल थपथपाए.

नसरीन का चयन इस प्रोजैक्ट के लिए हो गया. 1 महीने बाद उसे समीर की टीम के साथ सूट के लिए विदेश जाना था. अब राजन से उस का संपर्क कुछ कम होने लगा था.

आज राजन ने उसे डिनर के लिए इनवाइट किया था. नसरीन जानती थी कि वह रात की गई सुबह ही वापस आएगी. कुछ भी हो, मगर राजन के लिए उस के दिल में एक सौफ्ट कौर्नर था.

‘‘समीर के साथ जा रही हो?’’

‘‘हूं.’’

‘‘मुझे भूल जाओगी?’’

‘‘यह मैं ने कब कहा?’’

‘‘तुम उसे जानती ही कितना हो… एक नंबर का लड़कीखोर है.’’

‘‘तुम्हें भी कहां जानती थी?’’

‘‘शायद तुम्हें उड़ने के लिए अब आकाश छोटा पड़ने लगा?’’

‘‘तुम्हें कहीं मुझ से प्यार तो नहीं होने लगा?’’ नसरीन ने माहौल को हलकाफुलका करने के लिए हंसते हुए कहा.

‘‘अगर मैं हां कहूं तो?’’ राजन ने उस की आंखों में झांका.

‘‘तुम ऐसा नहीं कहोगे.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि फैशन की इस दुनिया में प्यार नहीं होता. वैसे भी तुम्हारी कंपनी फेस औफ द ईयर कौंटैस्ट फिर से आयोजित करने वाली है. फिर एक नया चेहरा चुना जाएगा, जो तुम्हारी कंपनी और तुम्हारे बिस्तर की शोभा बढ़ाएगा. फिर से तुम साल भर के लिए बिजी हो जाओगे. मैं ने पिछले वर्ष की मौडल के चेहरे पर एक पीड़ा देखी थी जब वह मुझे क्राउन पहना रही थी. वह पीड़ा मैं अपनी आंखों में नहीं आने देना चाहती,’’ नसरीन ने बहुत ही साफगोई से कहा.

राजन उसे अवाक देख रहा था. उस ने अपनी जिंदगी में आज तक इतनी पारदर्शी सोच वाली लड़की नहीं देखी थी.

नसरीन ने आगे कहा, ‘‘मेरी मंजिल अभी बहुत दूर है राजन. तुम जैसे न जाने कितने छोटेछोटे पड़ाव आएंगे. मैं वहां कुछ देर सुस्ता तो सकती हूं, मगर रुक नहीं सकती.’’

रात को सैलिब्रेट करने का राजन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. उस ने नसरीन से कहा, ‘‘चलो, तुम्हें गाड़ी तक छोड़ दूं.’’

‘‘ओके, बाय बेबी… 2 दिन बाद मेरी फ्लाइट है. देखते हैं अगला पड़ाव कहां होता है,’’ कहते हुए नसरीन ने आत्मविश्वास के साथ गाड़ी स्टार्ट कर दी.

राजन उसे आंखों से ओझल होने तकदेखता रहा.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें