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बयार बदलाव की- भाग 1 : नीला की खुशियों को किसकी नजर लग गई थी

रमन लिफ्ट से बाहर निकला, पार्किंग से गाड़ी निकाली और घर की तरफ चल दिया. वह इस समय काफी उल?ान में था. रात को 8 बजने वाले थे. वह साढ़े 8 बजे तक औफिस से घर पहुंच जाता था. घर पर नीला उस का बेसब्री से इंतजार कर रही होगी. पर उस का इस समय घर जाने का बिलकुल भी मन नहीं हो रहा था. कुछ सोच कर उस ने आगे से यूटर्न लिया और कार दूसरी सड़क पर डाल दी. थोड़ी देर बाद उस ने एक खुली जगह पर कार खड़ी की और पैदल ही समुद्र की तरफ चल दिया.

यह समुद्र का थोड़ा सूना सा किनारा था. किनारा बड़े बड़े पत्थरों से अटा पड़ा था. वह एक पत्थर पर बैठ गया और हिलोरें मारते समुद्र को एकटक निहारने लगा. समुद्र की लहरें किनारे तक आतीं और जो कुछ अपने साथ बहा कर लातीं वह सब किनारे पर पटक कर वापस लौट जातीं. वह बहुत देर तक उन मचलती लहरों को देखता रहा.

देखतेदेखते वह अपने ही खयालों में डूबने लगा. वह दुखी हो, ऐसा नहीं था. पर बहुत ही पसोपेश में था. उस के पिता का फोन आया आज औफिस में. उस के मातापिता अगले हफ्ते एक महीने के लिए उस के पास आने वाले थे. मातापिता के आने की उसे खुशी थी. वह हृदय से चाहता था कि उस के मातापिता उस के पास आएं. पर अपने विवाह के एक साल पूरा होने के बावजूद वह एक बार भी उन्हें अपने पास आने के लिए नहीं कह पाया. कारण कुछ खास भी नहीं था. न उस के मातापिता अशिक्षित या गंवार थे. न उस की पत्नी नीला कर्कश या तेज स्वभाव की थी. फिर भी वह सम?ा नहीं पा रहा था कि उस के मातापिता आधुनिकता के रंग में रंगी उस की पत्नी को किस तरह से लेंगे. यह बात सिर्फ नीला की ही नहीं, बल्कि उस की पूरी पीढ़ी की है. नीला दिल्ली में विवाह से पहले नौकरी करती थी. विवाह के बाद नौकरी छोड़ कर उस के साथ मुंबई आ गईर् थी. यहां वह दूसरी नौकरी के लिए कोशिश कर रही थी.

नीला हर तरह से अच्छी लड़की थी. कोमल स्वभाव, अच्छे विचारों व प्यार करने वाली लड़की थी. उस के मातापिता के आने से वह खुश ही होगी. लेकिन उस के संस्कारी मातापिता, खासकर उस की मम्मी, नीला की आदतों, उस के रहनसहन के तरीकों को किस तरह से लेंगे, वह सम?ा नहीं पा रहा था.

विवाह के बाद वह चंडीगढ़ अपने मातापिता के पास थोड़ेथोड़े दिनों के लिए 2 बार ही गया था. मम्मी और नीला की अधिकतर बातें फोन से ही होती थीं. मम्मी उस के स्वभाव की बहुत तारीफ करती थीं. नीला भी अपनी सास का बहुत आदर करती थी और उन को पसंद करती थी. पर यह एक महीने का सान्निध्य कहीं उन के बीच की आत्मीयता को खत्म न कर दे, वह इसी उधेड़बुन में था.

नीला देर से सो कर उठती थी. उस के औफिस जाने तक भी कभी वह उठ जाती, कभी सोई रहती थी. नाश्ते में वह सिर्फ दूध व कौर्नफ्लैक्स लेता था. इसलिए वह खुद ही खा कर नीला को दरवाजा बंद करने को कह कर औफिस चला जाता था. उसे मालूम था, नीला की नौकरी लगते ही उस की दिनचर्या बदल जाएगी. फिर उसे जल्दी उठना ही पड़ेगा. अभी शादी को समय ही कितना हुआ है. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. वह सारे दिन फ्लैट में अकेली रहती है. सुबह से उठ कर क्या करेगी.

खाना बनाना भी उसे बहुत ज्यादा नहीं आता था, मतलब का ही आता था. हालांकि एक साल में वह काफी कुछ सीख गई थी पर अभी तक उन का खाना अकसर बाहर ही होता था. मम्मीपापा के आने से काम भी बढ़ेगा. नीला इतना काम कहां संभाल पाएगी और मम्मी से अपने घर का पूरा काम संभालने की उम्मीद करना गलत था. वे नीला की सहायता करें, यह तो ठीक लगता है पर… फिर कपड़े तो नीला उस के मातापिता के सामने कितने भी शालीन पहनने की कोशिश करे, उस के बावजूद उस के मातापिता को उस का पहनावा नागवार गुजर सकता है.

मम्मी की पीढ़ी ने अपने पति की बहुत देखभाल की है. हाथ में सबकुछ उपलब्ध कराया है. औफिस जाते पति की हर जरूरत के लिए उस के पीछेपीछे घूमती पत्नी की पीढ़ी वाली उस की मम्मी क्या आज की पत्नी का तौरतरीका बरदाश्त कर पाएंगी, वह सम?ा नहीं पा रहा था. नीला से अगर थोड़े दिन अपना रवैया बदलने को कहता है तो नीला उस के मातापिता के बारे में क्या सोचेगी. उन दोनों के रिश्ते औपचारिक हो जाएंगे. यह रिश्ता एकदो दिन का तो है नहीं. उस के मातापिता तो अब उस के पास आतेजाते रहेंगे.

यही सब सोच कर वह अजीब सी उधेड़बुन में था. अंधकार घना हो गया था. समुद्र की लहरें किनारे पर सिर पटकपटक कर उसे उस के विचारों से बाहर लाने का असफल प्रयास कर रही थीं. उस ने घड़ी पर नजर डाली. 10 बजने वाले थे. तभी मोबाइल बज उठा. नीला थी.

‘‘हैलो, कहां हो? अभी औफिस से नहीं निकले क्या? कितनी बार फोन किया, उठा क्यों नहीं रहे थे, ड्राइव कर रहे हो क्या?’’ नीला चिंतित स्वर में कई सवाल कर बैठी. ‘‘हां, ड्राइव कर रहा था. बस, पहुंच ही रहा हूं,’’ उस ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और उठ कर कार की तरफ चला गया.

घर पहुंच कर भी वह गुमसुम ही रहा. नीला आदत के अनुसार चुहलबाजी कर रही थी. अपनी भोलीभाली बातों से उसे रि?ाने का प्रयास कर रही थी. पर उस की चुप्पी टूट ही नहीं रही थी. ‘‘क्या बात है रमन, आज कुछ अपसैट हो. सब ठीक तो है न?’’ वह उस के घने बालों में उंगलियां फेरती हुई उस की बगल में बैठ गई. उस ने नीला की तरफ देखा. नीला मीठे स्वभाव की सरल लड़की थी. इसलिए वह उसे बहुत प्यार करता था. उस की आदतों की कोई कमी उसे नहीं अखरती थी. फिर वह देखता कि नीला ही नहीं, उस के हमउम्र दोस्तों की बीवियां भी लगभग नीला जैसी ही हैं. यह पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से बिलकुल भिन्न है.

वह प्यार से नीला को बांहों में कसता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कोई खास बात नहीं, बल्कि एक अच्छी बात है, चंडीगढ़ से मम्मीपापा आ रहे हैं एक महीने के लिए हमारे पास.’’

सुन कर नीला खुशी से उछल पड़ी, ‘‘अरे वाह, यह तो बहुत अच्छी खबर है. एक महीने के लिए मैं भी अकेले रहने की बोरियत से बच जाऊंगी. मम्मीपापा के साथ बहुत मजा आएगा. कब आ  रहे हैं?’’‘‘अगले हफ्ते की फ्लाइट है.’’

‘‘तो इतनी देर बाद क्यों बता रहे हो? आज तो देर हो गई. कल जल्दी आना, बहुत सारी चीजें खरीदनी हैं.’’ ‘‘हां, हां, तुम लिस्ट तैयार रखना. मैं जल्दी आ जाऊंगा. फिर चलेंगे.’’ मम्मीपापा के आने के नाम से नीला खुश व उत्साहित थी. उसे तो मम्मीपापा के साथ चंडीगढ़ वाली मस्ती करनी थी. इस से अधिक वह कुछ नहीं सोच पा रही थी. रमन उस के उत्साह को मुसकराते हुए देख रहा था.

चंडीगढ़ में तो सबकुछ हाथ में मिलता है. मम्मी की तैयारियां पहले से ही अपने बच्चों के लिए इतनी संपूर्ण रहती हैं कि उन्हें बीच में परेशान नहीं होना पड़ता. खानेपीने की चीजों से फ्रिज भर देती हैं. इस के अलावा काम करने वाले भी घर के पुराने नौकर हैं, तो नीला को चम्मच हिलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती है और न उस से थोड़े दिनों के लिए कोई ऐसी उम्मीद रखता है. उस ने खुद कुछ किया तो किया, नहीं किया तो नहीं किया. अपने प्यारे स्वभाव के कारण वह मम्मीपापा की इतनी लाड़ली है कि वे उसे पलकों पर बिठा कर रखते हैं.

नीला अपनी रौ में ढेर सारी प्लानिंग कर रही थी. रमन कुछ कह कर या उसे कुछ सम?ा कर उस की खुशी में विघ्न नहीं डालना चाहता था. इसलिए उस ने मन ही मन सोचा, जो होगा देखा जाएगा. ‘‘अब बातें ही करती रहोगी या कुछ खाने को भी दोगी. कुछ बनाया भी है या बाहर से और्डर करूं?’’ वह हंसता हुआ नीला को छेड़ता हुआ बोला.

‘‘आज तो मैं ने पास्ता बनाया है.’’ ‘‘पास्ता बनाया है? अरे, कुछ रोटीसब्जी बना देतीं. यह सब रोजरोज मु?ा से नहीं खाया जाता.’’ ‘‘पर मु?ा से रोटी अच्छी नहीं बनती है,’’ नीला मायूसी से बोली. ‘‘कोई बात नहीं,’’ वह उस के गालों को प्यार से सहलाता हुआ बोला, ‘‘अभी बाहर से और्डर कर देता हूं. मम्मी आएंगी तो इस बार तुम रोटी बनाना जरूर सीख लेना.’’

‘‘ठीक है, सीख लूंगी.’’ एक हफ्ते बाद उस के मातापिता आ गए. उन की दिल्ली से फ्लाइट थी. फ्लाइट शाम की थी. वह औफिस से जल्दी नहीं निकल पाया. नीला ही उन्हें एयरपोर्ट लेने चली गई. उस ने औफिस से मम्मीपापा से फोन पर बात कर ली. उस के मातापिता पहली बार उस के पास आए थे, इसलिए वह बहुत संतुष्टि का अनुभव कर रहा था.

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अब आओ न मीता- भाग 4: क्या सागर का प्यार अपना पाई वह

फैक्टरी की गोल्डन जुबली थी उस दिन. सुबह से ही कड़ाके की सर्दी थी. 6 बजने को थे. मीता जल्दीजल्दी तैयार हो कर फैक्टरी की ओर चल दी. घर से निकलते ही थोड़ी दूर पर सागर उसी ओर आता दिखाई दिया.

‘अरे आप तो तैयार भी हो गईं…मैं आप ही को देखने आ रहा था.’

‘तुम तैयार नहीं हुए?’

‘धोबी को प्रेस के लिए कपड़े दिए हैं. बस, ला कर तैयार होना बाकी है. चलिए, आप को स्पेशल कौफी पिलाता हूं, फिर हम चलते हैं.’

दोनों सागर के घर आ गए. मीता ने कहा, ‘मैं जब तक कौफी बनाती हूं, तुम कपड़े ले आओ.’’

बसंती रंग की साड़ी में मीता की सादगी भरी सुंदरता को एकटक देखता रह गया सागर.

‘एक बात कहूं आप से?’

मीता ने हामी भरते हुए गरदन हिलाई…

‘बड़ा बदकिस्मत रहा आप का पति जो आप के साथ न रह पाया. पर बड़ा खुशनसीब भी रहा जिस ने आप का प्यार भी पाया और फिर आप को भी.’

‘और तुम, सागर?’

‘मुझ से तो आप को मिलना ही था.’

एक ठंडी सांस ली मीता ने.

उस दिन सागर के घर पर ही इतनी देर हो गई कि उन्हें फैक्टरी के फंक्शन में जाने का प्रोग्राम टालना पड़ा था. उफ, यह मुलाकात कितने सारे सवाल छोड़ गई थी.

दूसरे दिन सागर जब मीता से मिला तो एक नई मीता उस के सामने थी…सागर को देखते ही अपने बदन के हर कोने पर सागर का स्पर्श महसूस होने लगा उसे. भीतर ही भीतर सिहर उठी वह. आंखें खोलने का मन नहीं हो रहा था उस का, क्योंकि बीती रात का अध्याय जो समाया था उस में. इतने करीब आ कर, इतने करीब से छू कर जो शांति और सुकून सागर से मिला था वह शब्दों से परे था…ज्ंिदगी ने सूद सहित जो कुछ लौटाया वह अनमोल था मीता के लिए. सागर ने बांहें फैलाईं और मीता उन में जा समाई… दोनों ही मौन थे…लेकिन उन के भीतर कुछ भी मौन न था…जैसे रात की खामोशी में झील का सफर…कश्ती अपनी धीमीधीमी रफ्तार में है और चांदनी रात का नशा खुमारी में बदलता जाता है.

शाम का अंधेरा घिरने लगा था. जंगल, गांव, पेड़ और सड़क सब पीछे छूटते जा रहे थे. टे्रन अपनी गति में थी. अधिकांश यात्री बर्थ खोल कर सोने की तैयारी में थे. मीता ने भी बैग से कंबल निकाल कर उस की तहें खोलीं. एअर पिलो निकाल कर हवा भरी और आराम से लेट गई. अभी तो सारी रात का सफर है. सुबह 10 बजे के आसपास घर पहुंचेगी.

कंबल को कस कर लपेटे वह फिर पिछली बातों में खोई हुई थी. मन की अंधेरी सुरंग पर तो बरसों से ताला पड़ा था. पहले वह मानती थी कि यह जंग लगा ताला न कभी खुलेगा, न उसे कभी चाबी की जरूरत पड़ेगी. लेकिन ऐसा हुआ कि न सिर्फ ताला टूटा बल्कि बरसों बाद मन की अंधेरी सुरंग में ठंडी हवा का झोंका बन कर कोई आया और सबकुछ बदल गया.

सफर में एकएक पल मीता की आंखों से गुजर रहा था.

जिंदगी के पाताल में कहां क्या दबा है, क्या छुपा है, कब कौन उभर कर ऊपर आ जाएगा, कौन नीचे तल में जा कर खो जाएगा, पता नहीं. विश्वास नहीं होता इस अनहोनी पर, जो सपनों में भी हजारों किलोमीटर दूर था वह कभी इतना पास भी हो सकता है कि हम उसे छू सकें…और यदि न छू पाएं तो बेचैन हो जाएं. जिंदगी की अपनी गति है गाड़ी की तरह. कहीं रोशनी, कहीं अंधेरा, कहीं जंगल, कहीं खालीपन.

यहां आशा दी के पास आना था. होली भी आने वाली है. बच्चों के एग्जाम भी थे और इस बीच किराए का मकान भी शिफ्ट किया था. उसे सेट करना था. सागर 3-4 दिन से अस्पताल में दाखिल था.

पीलिया का अंदेशा था. वह सागर को भी संभाले हुए थी. एक ट्रिप सामान मेटाडोर में भेज कर दूसरी ट्रिप की तैयारी कर सामान पैक कर के रख दिया. सोचा, सामान लोड करवा कर अस्पताल जाएगी, सागर को देख कर खाना पहुंचा देगी फिर लौट कर सामान सेट होता रहेगा. लेकिन तभी सागर खुद वहां आ पहुंचा.

‘अरे, तुम यहां. मैं तो यहां से फ्री हो कर तुम्हारे ही पास आ रही थी. लेकिन तुम आए कैसे? क्या डिस्चार्ज हो गए?’

‘डिस्चार्ज नहीं हुआ पर जबरदस्ती आ गया हूं डिस्चार्ज हो कर.’

‘क्यों, जबरदस्ती क्यों?’

‘आप अकेली जो थीं. इतना सारा काम था और आप के साथ तो कोई नहीं है मदद के लिए…’

‘खानाबदोश ज्ंिदगी ने आदी बना दिया है, सागर. ये काम तो ज्ंिदगी भर के हैं, क्योंकि कोई भी मकान मालिक एक या डेढ़ साल से ज्यादा रहने ही नहीं देता है.’

‘नहीं, ज्ंिदगी भर नहीं. अब आप को एक ही मकान में रहना होगा. बहुत हो गया यह बंजारा जीवन.’

‘हां, सोच तो रही हूं… फ्लैट बुक कर लूंगी, साल के भीतर कहीं न कहीं.’

सागर खाली मकान में चुपचाप दीवार से टिका हुआ था. मीता को उस ने अपने पास बुलाया. मीता उस के करीब जा खड़ी हुई.

सागर पर एक अजीब सा जुनून सवार था. उस ने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि इस घर से आप यों न जाएं, क्योंकि इस से हमारी बहुत सी यादें जुड़ी हैं.’

‘तो कैसे जाऊं, तुम्हीं बता दो.’

‘ऐेसे,’ सागर ने अपना पीछे वाला हाथ आगे किया और हाथ में रखे स्ंिदूर से मीता की मांग भर दी.

अचानक इस स्थिति के लिए तैयार न थी मीता. सागर की भावनाएं वह जानती थी…स्ंिदूर की लालिमा उस के लिए कालिख साबित हुई थी और अब सागर…उफ. निढाल हो गई वह. सागर ने संभाल लिया उसे. मीता की थरथराती और भरी आंखें छलकना चाह रही थीं.

ट्रेन की रफ्तार कम होने लगी थी. अतीत और भविष्य का अनोखा संगम है यह सफर. सागर और राजन. एक भविष्य एक अतीत. कल सागर से मिलूंगी

तो पूछूंगी, क्यों न मिल गए थे 14 साल पहले. मिल जाते तो 14 सालों

का बनवास तो न मिलता. ज्ंिदगी की बदरंग दीवारें अनारकली की तरह तो न चिनतीं मुझे.

मुसकरा उठी मीता. सागर से माफी मांग लूंगी दिल तोड़ कर जो आई थी उस का. सागर की याद आई तो उस की बोलती सी गहरी आंखें सामने आ गईं. 5 दिनों में 5 युगों का दर्द बसा होगा उन आंखों में.

टे्रन रुकी तो चायकौफी वालों की रेलपेल शुरू हो गई. मीता ने चाय पी और फिर कंबल ओढ़ कर लेट गई इस सपने के साथ कि सुबह 10 बजे जब टे्रन प्लेटफार्म पर रुकेगी…तो सागर उस के सामने होगा. नीलेश और यश उसे सरप्राइज देने आसपास कहीं छिपे होंगे.

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. सुबह भी हुई, मीता की आंखें भी खुलीं, उस ने प्लेटफार्म पर कदम भी रखा, पर वहां न सागर, न नीलेश और न यश. थोड़ी देर उस ने इंतजार भी किया, लेकिन दूरदूर तक किसी का कोई पता न था. रोंआसी और निराश मीता ने अपना सामान उठाया और बाहर निकल कर आटो पकड़ा. क्या ज्ंिदगी ने फिर मजाक के लिए चुन लिया है उसे?

पूरे शहर में होली का हुड़दंग था. इन रंगों का वह क्या करे जब इंद्रधनुष के सारे रंग न जाने कहां गुम हो गए थे.

बहुत भीड़ थी रास्ते में. घर के सामने आटो रुका तो घर पर ताला लगा था. वह परेशान हो गई. अचानक घर के ऊपर नजर गई तो वहां ‘टुलेट’ का बोर्ड लगा था. उसी आटो वाले को सागर के घर का पता बता कर वापस बैठी मीता. अनेक आशंकाओं से घिरा मन रोनेरोने को हो गया.

सागर के घर के आगे बड़ी चहलपहल थी. टैंट लगा था. सजावट, वह भी फूलों की झालर और लाइटिंग से…गार्डन के सारे पेड़ों पर बल्बों की झालरें

लगी थीं…

खाने और मिठाइयों की सुगंध चारों ओर बिखरी थी. आटो के रुकते ही लगभग दौड़ती बदहवास मीता भीतर की ओर दौड़ी. भीतर पहुंचने से पहले ही जड़ हो कर वह जहां थी वहीं खड़ी रह गई.

दरवाजे पर आरती का थाल लिए सागर की मां और सुहाग जोड़ा, मंगलसूत्र और लाल चूडि़यों से भरा थाल पकड़े सागर की छोटी बहन खड़ी थी. नीचे की सीढ़ी पर हाथ जोड़ कर स्वागत करता सागर का छोटा भाई मुसकरा रहा था.

मीता ने देखा झकाझक सफेद कुरतापाजामा पहने, लाल टीका लगाए सागर उसी सोफे पर बैठा यश को तैयार कर रहा था जहां उस शाम दोनों की जिंदगी ने रुख बदला था.

रोहित मस्ती में झूमता मीता की ओर आने लगा…

सागर ने मीता को देखते ही आवाज लगाई, ‘‘नीलेश बेटे.’’

‘‘जी, पापा.’’

‘‘जाओ, आटो से मम्मी का सामान उतारो और आटो वाले को पैसे भी दे दो.’’

‘‘जी, पापा.’’

नीलेश बाहर आने लगा तो सागर ने फिर आवाज दी, ‘‘और सुनो, आटो वाले को मिठाई जरूर देना…’’

‘‘जी, पापा.’’

मीता बुत बनी सागर को एकटक देख रही थी. सागर की गहरी आंखें कह रही थीं…इंजीनियर जरूर आधा हूं लेकिन घर पूरा बनाना जानता हूं. है न? अब आओ न मीता…

अब आओ न मीता- भाग 3: क्या सागर का प्यार अपना पाई वह

दिनोंदिन घर का सूनापन भरने लगा था. मीता ने इस बदलाव पर आशा दी को पत्र लिखा. तुरंत उन का जवाब आया, ‘शायद कुदरत अपनी गलती पर पछता रही हो…मीता, जो होगा, अच्छा होगा.’

सागर के रूप में उसे अपना एक हमदर्द मिला तो जीवन जीना सहज होने लगा, फिर भी हर वक्त एक आशंका और डर छाया रहता…सब कुछ वक्त के हवाले कर के आंखें मूंद ली थीं मीता ने.

‘‘आंटी, आप का पर्स नीचे गिरा है बहुत देर से,’’ आवाज से स्मृतियों की यात्रा में पड़ाव आ गया. सामने की सीट पर बैठी एक युवती मीता को जगा रही थी. उसे लगा मीता सो रही है. मीता ने पर्स उठाया और उसे थैंक्यू बोला.

कितनी अजीब होती हैं सफर की स्थितियां. या तो हम अतीत में होते हैं या भविष्य में. गाड़ी के  पहिए आगे बढ़ते और यादें पीछे लौटती हैं. पीछे छूटे लोगों की गंध और चेहरे साथ चलते महसूस होते हैं.

चलते वक्त आशा दी की आंखें रोरो कर लाल हो गई थीं. फिर किसी तरह स्वयं को संयत कर बोली थीं, ‘आज पहली बार लग रहा है मीता कि मैं अपनी बहन नहीं, बेटी को बिदा कर रही हूं. अब जब आएगी तो अपने परिवार के संग आएगी…तेरा सुख देखने को आंखें तरस गईं, मीता. सागर तो फरिश्ता बन कर आया है मेरे लिए वरना राजन ने तो…’

‘छोड़ो न आशा दी… मत याद करो वह सब. मत दिल दुखाओ.’ मीता रो उठी. दोनों बहनें एकदूसरे के गले लग कर बहुत देर तक रोती रहीं.

‘आशा दी, आप एक बार आ कर सागर से मिलो तो. अब कुछ पा कर भी खो देने का डर बारबार मन में समा जाता है. अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं रहा अब.’

‘पगली, ज्ंिदगी में सच्ची चाहत सब को नसीब नहीं होती. चाहत की, चाहने वाले की कद्र करनी चाहिए. उम्र के फासले को भूल जा, क्योंकि  प्यार उम्र को नहीं दिल को जानता है…सच के सामने सिर झुका दे मेरी बहन…नीलेश और यश के लिए भी सागर से बेहतर और कोई नहीं हो सकता.’

सागर को डाक्टर के पास चेकअप के लिए ले जाना था. मीता फैक्टरी से सीधी सागर के घर चली आई. आज फिर घर में अंधेरा था…भीतर वाले कमरे में सागर सोफे पर लेटे थे. टेप रिकार्डर आन था

‘तुझ बिन जोगन मेरी रातें,

तुझ बिन मेरे दिन बंजारे…’

अंधेरे में गूंजता अकेलापन मीता की बरदाश्त से बाहर था. लाइट आन की तो सागर की पलकों की कोरें गीली थीं. मीता को देखा तो उठ कर बैठ गए.

‘यह गाना क्यों सुन रहे हो?’

‘हमेशा यही तो सुनता रहा हूं.’

‘जो चीज रुलाए उसे दूर कर देना चाहिए कि उसे और गले लगा कर रोना चाहिए?’

‘लेकिन जो चीज आंसू के साथ शांति भी दे उस के लिए क्या करे कोई?’

‘क्या मतलब?’

‘अच्छा छोडि़ए, डाक्टर के यहां चलना है न? मैं तैयार होता हूं…’

‘नहीं, पहले बात पूरी कीजिए.’

‘पिछले 3 सालों से…’ सागर की गहरी आंखें मीता पर टिकी थीं.

‘आगे बोलिए.’

‘मुझे आप के आकर्षण ने बांध रखा है… मैं ने पागलों की तरह आप के बारे में सोचा है. आप के अतीत को जान कर, आप के संघर्ष, आप के ज्ंिदगी जीने के अंदाज को मन ही मन सराहा है. पिछले 3 सालों का हर पल आप के पास आने की ख्वाहिश में बीता है…ये गीत मेरे दर्द का हिस्सा हैं…’

‘यह जानते हुए भी कि मैं उम्र में आप से बड़ी, 2 बच्चों की मां और एक शादीशुदा औरत हूं. मेरी शादी सफल नहीं हो पाई. मैं ने अकेले ही अपने बच्चों के भविष्य को संभाला है और किसी सहारे की दूरदूर तक गुंजाइश नहीं मेरे जीवन में. अपने बच्चों की नजरों में मैं अपना सम्मान नहीं खोना चाहती. हमारे बीच जो कुछ भी है, वह जो कुछ भी हो पर प्यार नहीं हो सकता.’

‘मैं ने कब कहा कि आप की चाहत चाहिए मुझे…प्यार का बदला प्यार ही हो यह जरूरी नहीं…यश, नीलेश और आप का साथ जो मुझे अपनी बीमारी के दौरान मिला, उस ने मेरा जीवन बदल दिया है. आप मेरे करीब, मेरे सामने हों. मैं जी लूंगा इसी सहारे से.’

‘मेरे साथ आप का कोई भविष्य नहीं. आप की ज्ंिदगी में अच्छी से अच्छी लड़कियां आ सकती हैं. अपना घर बसाइए…मेरी ज्ंिदगी जैसे चल रही है चलने दीजिए, सागर. ओह, सौरी.’

‘नहीं, सौरी नहीं. आप ने मेरा नाम लिया. इस के लिए शुक्रिया.’

फिर सागर तैयार होने भीतर चला गया और मीता वहीं सोफे पर बैठी कुछ सोचती रही.

सागर को सिविल इंजीनियर बनाना चाहते थे उस के डाक्टर पापा. असमय ही सिर से पिता का साया क्या उठा सागर रातोंरात बड़प्पन की चादर ओढ़ घर का बड़ा और जिम्मेदार सदस्य हो गया. 2-3 साल तक इंजीनियरिंग की डिगरी का इंतजार, फिर नौकरी की तलाश करना उस के लिए नामुमकिन था, इसलिए अपनी मंजिल को गुमनामी में धकेल कर सब से पहले फाइनल में पढ़ रही छोटी बहन सोनल के हाथ पीले किए उस ने…पापा के अधूरे कामों को पूरा करने का बीड़ा उठाया था सागर ने. सारी जमीनजायदाद का हिसाब कर के सारा पैसा बैंक में जमा कर रोहित का मेडिकल में एडमीशन करा कर वह यहां आ गया. मां को सारा उत्तरदायित्व सौंप कर वह निश्ंिचत था. अपने लिए कुछ सोचना उस की फितरत में न था. बहन अपने घर में खुश थी राहुल का कैरियर बनना निश्चित था. मां को आर्थिक सुरक्षा दे वह अकेला हो कर ज्ंिदगी जीने लगा.

बिल्ंिडग, पुल और सड़क बनाने वाली आंखें यहां शर्ट बनते देखने लगी थीं. मशीनों के शोर में वह सबकुछ भूल जाना चाहता था. कपड़ों की कतरनों में उसे अपने ध्वस्त सपनों के अक्स नजर आते. किनारे पर आ कर जहाज डूबा था उस का… बड़ा जानलेवा दर्द होता है किनारे पर डूबने का…

फिर यहां मीता को देखा. उस की समझौते भरी ज्ंिदगी का हश्र देखा तो ठगा सा रह गया वह. एक अकेली औरत का साहस देख कर कायल हो गया उस का मन. उस की प्रतिभा, शिक्षा और संस्कार का एहसास हर मिलने वाले को पहली नजर में ही हो जाता. दूसरों के मन को समझने वाली पारखी नजर मीता की विशेषता थी, न होती तो सागर के भीतर बसा खालीपन वह कैसे महसूस कर पाती भला

मीता अपनी सीमा जानती थी. उस ने सबकुछ वक्त और हालात पर छोड़ दिया था. लेकिन मीता जानने लगी थी, सागर वह नहीं है जो नजर आता है, कई बार उस की गहरी आंखें कुछ सोचने पर विवश कर देतीं मीता को. मीता झटक देती जल्दी से अपना सिर…नहीं, उसे यह सब सोचने का हक नहीं. पर सिर झटकने से क्या सबकुछ छिटक जाता है. इनसान अकेलापन तो बरदाश्त कर लेता है लेकिन भीड़ के बीच अकेलापन बहुत भारी होता है.

पहले कम से कम उस का जीवन एक ढर्रे पर तो था. अपने बारे में उस ने सोचना ही बंद कर दिया था. लेकिन सागर का साथ पा कर कमजोर होने लगी थी वह. दूसरी ओर एक जिम्मेदार मां है वह…यह भी नहीं भूलती थी. अनिश्चय के झूले में झूल रही थी मीता. भावनाओं का चक्रवात उसे निगलने को आतुर था.

कांटे गुलाब के – भाग 3 : अमरेश और मिताली की प्रेम कहानी

स्वाति की शादी के बाद मोबाइल ठीक करा लिया तो अमरेश का फोन आ गया, ‘‘2 दिनों से परेशान हूं. तुम्हारा मोबाइल स्विचऔफ बता रहा था. बात क्या है?’’

उस ने मुंबई आने की बात अमरेश से छिपा ली. उस से कहा कि एक सहेली की शादी में दिल्ली आई हूं.

2 दिनों बाद लौट जाऊंगी.

अमरेश से हमेशा जिस तरह बात करती थी, उसी तरह से बात की. उसे यह संदेह नहीं होने दिया कि उसे उस की बेवफाई का पता चल गया है. अमरेश ने उस के साथ बेवफाई क्यों की? दुबई में नौकरी करने को बता कर दूसरी शादी कर मुंबई में क्यों रह रहा था? आखिर उस की क्या गलती थी? ये सारी बातें जानने के लिए उसे सारिका से मिलना जरूरी था.

स्वाति ससुराल चली गई थी. उस की मां से बहाना बना कर और सुमित को उन के हवाले कर चौधरी साहब की बिल्डिंग पर दोपहर में गई. उसे अनुमान था कि उस समय अमरेश घर पर नहीं रहता होगा. गार्ड से बात करने पर इस बात की पुष्टि भी हो गई. अमरेश उस समय औफिस में रहता था. गार्ड को उस ने अपना परिचय जर्नलिस्ट के रूप में दिया. कहा, ‘‘अमरेश सर ने सारिका का इंटरव्यू लेने के लिए बुलाया था.’’

गार्ड ने इंटरकौम द्वारा सारिका से बात की. उस की भी बात करवाई. उस के बाद उसे अंदर जाने की इजाजत मिल गई. अंदर गई तो सारिका ने उस का स्वागत किया. अपना परिचय देते हुए उसे सोफे पर बैठाया. बगैर समय गंवाए उस ने कहा, ‘‘अमरेश सर का कहना है कि उन की जिंदगी में यदि आप नहीं आतीं तो वे ऊंचाई के मुकाम पर नहीं पहुंच पाते. बताइए कि अमरेश सर से आप की शादी कब और कैसे हुई?’’

नौकर कोल्डड्रिंक ले आया. कोल्डड्रिंक पीते हुए जैसेजैसे बातों का सिलसिला आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे अमरेश से शादी करने की जानकारी सारिका देती गई. सारिका अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. मुंबई में ही उस ने ग्रेजुएशन की थी. पिता उस की शादी ऐसे लड़के से करना चाहते थे जो अमीर खानदान से हो और घरजमाई बन कर उन का बिजनैस संभाल सके.

सारिका सांवली थी. नाकनक्श भी अच्छे नहीं थे. कद भी छोटा था. शायद इसीलिए अमीर खानदान का कोई युवक चौधरी साहब का घरजमाई बनने के लिए तैयार नहीं था. गरीब युवकों में से कई सारिका से शादी करना चाहते थे, मगर चौधरी गरीब को पसंद नहीं करते थे. सारिका के ग्रेजुएशन करने के बाद चौधरी साहब ने उस की पढ़ाई छुड़वा दी थी और उस के लिए वर की तलाश शुरू कर दी थी. 3 साल बीत जाने के बाद भी मनपसंद वर नहीं मिला. उस के बाद सारिका की जिंदगी में अचानक अमरेश आ गया. हुआ यों कि सारिका मातापिता के साथ एक रिश्तेदार की शादी में 3 साल पहले कोलकाता गईर् थी. समारोह में अमरेश से उस की मुलाकात हुई थी.

अमरेश जिस कंपनी में काम करता था, उस के मैनेजिंग डायरैक्टर की बेटी की शादी थी. सारे स्टाफ को बुलाया गया था. पार्टी में अमरेश सारिका के आगेपीछे घूमने लगा तो मौका देख कर सारिका ने उस से पूछा, ‘आप मेरे आगेपीछे क्यों घूम रहे हैं, मुझ से चाहते क्या हैं?’

अमरेश ने बगैर किसी संकोच के कह दिया, ‘पहली नजर में ही मुझे आप से प्यार हो गया है. आप से शादी करना चाहता हूं.’

सारिका को अमरेश बड़ा दिलचस्प लगा. उस का व्यक्तित्व उस के दिल को छू गया. मुसकरा कर बोली, ‘आप ने मुझ में ऐसा क्या देखा कि मेरे दीवाने हो गए?’

‘आप बहुत सुंदर हैं. आप की सुंदरता मेरे दिल में उतर गई है. जब तक आप से शादी नहीं होगी, मुझे चैन नहीं मिलेगा.’

‘मैं गोरी नहीं, सांवली हूं, फिर सुंदर कैसे हो सकती हूं. आप झूठ बोल रहे हैं?’

‘मैं सच कह रहा हूं. सांवली होते हुए भी आप इतनी सुंदर हैं कि गोरी से गोरी लड़की भी सुंदरता में आप के सामने घुटने टेक देगी.’

अमरेश से सारिका प्रभावित हो गई. उस से उस की सारी जानकारी लेने के बाद उसे अपना परिचय दिया. फिर कहा, ‘घर जा कर मम्मीपापा से बात करूंगी. पापा तो नहीं चाहेंगे कि किसी गरीब लड़के से मेरी शादी हो. मैं आप से शादी करने की पूरी कोशिश करूंगी. दरअसल, मुझे भी आप से पहली नजर में ही प्यार हो गया है.’

अमरेश ने सारिका को बताया था कि वह कुंआरा है. दुनिया में उस का कोई नहीं है. वह छोटा था, तभी उस के मातापिता का देहांत हो गया था. मामा ने परवरिश की, उन्होंने ही पढ़ायालिखाया. मामा का अचानक देहांत हो गया तो उन के बेटों ने उसे घर से निकाल दिया. ऐसे में उस के एक दोस्त प्रभात ने उसे सहारा दिया. उस की बदौलत ही उसे नौकरी मिली. वह उस के साथ गोल पार्क में रहता है. उस का परिवार गांव में रहता है.

घर जा कर सारिका ने मम्मीपापा को अमरेश के बारे में बताया तो दोनों ने शादी से साफ मना कर दिया. सारिका अमरेश से हर हाल में विवाह करना चाहती थी. इसलिए उस ने घर में बवाल कर दिया. आत्महत्या करने की धमकी दी तो चौधरी साहब को उस की बात मान लेनी पड़ी. कोलकाता जा कर अमरेश से मिलने के 10 दिनों बाद चौधरी साहब ने सारिका की शादी अमरेश से कर दी. अमरेश अच्छा पति साबित हुआ. सारिका को कभी किसी तरह का कष्ट नहीं दिया. चौधरी साहब का बिजनैस भी संभाल लिया. वर्तमान में सारिका

2 महीने से प्रेग्नैंट थी. अमरेश की सचाई जान कर मिताली के दिमाग में जैसे हथौड़े चलने लगे थे. मन में आया कि इसी पल सबकुछ सारिका को बता दे. धोखेबाज अमरेश की कलई खोल कर रख दे. पर ऐसा न कर सकी. जबान तालू से चिपक गई थी. लगा, जैसे ही सारिका को अमरेश की सचाई बताऊंगी उस की जिंदगी में बहार के बाद पतझड़ वाली स्थिति आ जाएगी. न जाने क्यों वह उसे दुख नहीं देना चाहती थी.

वहां रुकना उस के लिए ठीक नहीं था. ‘‘जल्दी ही इंटरव्यू प्रकाशित होगा,’’ कह कर चली आई. तत्काल कोई फैसला लेना आसान नहीं था. अपने साथसाथ सुमित की जिंदगी का भी सवाल था. इसलिए चुपचाप कोलकाता लौट आई. वह प्रभात को जानती थी. वह अमरेश का दोस्त था. अमरेश के साथ उस के घर 3-4 बार जा चुकी थी. अमरेश की उपस्थिति में वह भी कई एक बार घर आ चुका था. कोलकाता में जिस कंपनी में अमरेश जौब करता था, प्रभात भी उसी कंपनी में था.

अमरेश से शादी किए हुए एक वर्ष हुआ था तब की बात है, एक दिन बातोंबातों में प्रभात ने बताया था, ‘अमरेश आप को बहुत प्यार करता है. इसीलिए उस ने आप से शादी की, नहीं तो वह अपनी ख्वाहिश पूरी करता.’

‘कैसी ख्वाहिश?’ उत्सुकतावश पूछ लिया था मैं ने.

‘वह ऐशोआराम की जिंदगी चाहता था. बेहिसाब धनदौलत का मालिक बनना चाहता था. इस के लिए वह कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार था. मौका नहीं मिला तो 20 हजार रुपए महीने की नौकरी कर आप से शादी कर ली.

‘आप से शादी करने के बाद भी उस ने हिम्मत नहीं हारी है. वह हर हाल में अथाह दौलत का मालिक बनना चाहता है. इसलिए अब भी मौके की तलाश कर रहा है. जिस दिन मौका उस के हाथ आएगा, अंजाम की परवा किए बिना अवसर को हथिया लेगा.’

प्रभात ने जिस अवसर की बात की थी, उस समय समझ नहीं पाई थी. अब सबकुछ समझ गई थी. वह किसी अमीर लड़की से शादी कर अपनी ख्वाहिश पूरी करना चाहता था. मामला शायद ऐसा था, कोलकाता की पार्टी में अमरेश को किसी सोर्स से सारिका की जानकारी मिली होगी. उस के बाद अपनी मंजिल पाने के लिए चिकनीचुपड़ी बातों से सारिका का दिल जीत कर उस से शादी की और मिताली से दुबई जाने की बात कह कर वह सारिका के साथ रहने लगा था.

इस में कोई शक नहीं था कि उस के प्रति अमरेश का प्यार मात्र छलावा था. मिताली दोराहे पर थी. फैसला लेना आसान नहीं था. तलाक लेने की स्थिति में उस की जिंदगी में तो बदलाव आता ही, सुमित की जिंदगी भी एकदम से बदल जाती. वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे, क्या न करे. इसी उधेड़बुन में कई दिन गुजर गए. इस बीच फोन पर अमरेश से बिलकुल सामान्य तरीके से बात की. उसे किसी तरह का संदेह नहीं होने दिया. 10 दिनों बाद की बात है. एक दिन शाम के 6 बजे सुमित को पढ़ा रही थी कि डोरबैल बज उठी. जा कर दरवाजा खोला, तो अमरेश था. वह जब भी आता था बगैर सूचना दिए ही आता था. 10-15 दिनों के लिए मुंबई से बाहर जाने के लिए उसे सारिका से कुछ अच्छा बहाना भी तो बनाना पड़ता होगा. सटीक बहाने के लिए उसे समय की प्रतीक्षा करनी होती होगी. इसीलिए आने की पूर्व सूचना नहीं दे पाता होगा.

अमरेश को किसी तरह का शक न हो, इसलिए सदैव की तरह वह उस से लिपट गई और उस का स्वागत किया. फिर उसे अंदर ले गई. आवाज सुन कर सुमित भी दौड़ कर आ गया. अमरेश के चेहरे पर सदैव की तरह खुशनुमा भाव था. जरा भी नहीं लगा कि वह दोहरी जिंदगी जी रहा है. हर बार की तरह इस बार भी उस ने मिताली पर अपना प्यार बरसाने में कोई कमी नहीं की. उस के मन में कई बार आया कि उस की बेवफाई का राज खोल दे. कह दे कि प्यार का नाटक बंद कर दो. पर कह नहीं  सकी. 10 दिनों बाद वह चला गया. प्रति महीना 50 हजार रुपए तो भेजता ही था. इस बार जाते समय उस ने 5 लाख रुपए यह कह कर दिए कि अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना और सुमित की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देना.

सदा अन्याय का मुकाबला करो, अपने हक के लिए सदा लड़ो, समाज में पनपती बुराइयों पर अंकुश लगाओ. यह सब स्कूल और कालेज में पढ़ाया गया था. मिताली ने सीखा भी था. पर जिंदगी की पाठशाला में तो कुछ और ही देखने को मिल रहा था. अमरेश के प्रति जबान खोलती तो कई जिंदगियां बरबाद हो जातीं.  मातापिता का कोई सहारा न था क्योंकि उन्होंने एक तरह से साफ कह दिया, अपनी जिंदगी खुद भुगतो.

इसलिए अमरेश के जाने के बाद उस ने फैसला किया कि जब तक उस का अभिनय सफलतापूर्वक चलता रहेगा, तब तक चुपचाप सहती रहेगी, ठीक उसी तरह जिस तरह उस की जैसी हजारों महिलाएं चुपचाप सहती रहती हैं. क्या उस का फैसला सही था? अगर वह हल्ला मचाती तो सारिका भी टूटती, सुमित भी टूटता, अमरेश भी बेकार होता और वह खुद अदालतों के चक्करों में पिस जाती. सारिका या वह कौन असली पत्नी है, कानूनी है, यह तो अभी नहीं पता, पर इस बोझ को ले कर चलना ही ठीक है.

 

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