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Hindi Family Story: बहुत हुआ अब और नहीं

Hindi Family Story: जब पुलिस की जीप एक ढाबे के आगे आ कर रुकी, तो अब्दुल रहीम चौंक गया. पिछले 20-22 सालों से वह इस ढाबे को चला रहा था, पर पुलिस कभी नहीं आई थी. सो, डर से वह सहम गया. उसे और हैरानी हुई, जब जीप से एक बड़ी पुलिस अफसर उतरीं.

‘शायद कहीं का रास्ता पूछ रही होंगी,’ यह सोचते हुए अब्दुल रहीम अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो गया कि साथ आए थानेदार ने पूछा, ‘‘अब्दुल रहीम आप का ही नाम है? हमारी साहब को आप से कुछ पूछताछ करनी है. वे किसी एकांत जगह बैठना चाहती हैं.’’

अब्दुल रहीम उन्हें ले कर ढाबे के कमरे की तरफ बढ़ गया. पुलिस अफसर की मंदमंद मुसकान ने उस की झिझक और डर दूर कर दिया था.

‘‘आइए मैडम, आप यहां बैठें. क्या मैं आप के लिए चाय मंगवाऊं?

‘‘मैडम, क्या आप नई सिटी एसपी कल्पना तो नहीं हैं? मैं ने अखबार में आप की तसवीर देखी थी…’’ अब्दुल रहीम ने उन्हें बिठाते हुए पूछा.

‘‘हां,’’ छोटा सा जवाब दे कर वे आसपास का मुआयना कर रही थीं.

एक लंबी चुप्पी के बाद कल्पना ने अब्दुल रहीम से पूछा, ‘‘क्या आप को ठीक 10 साल पहले की वह होली याद है, जब एक 15 साला लड़की का बलात्कार आप के इस ढाबे के ठीक पीछे वाली दीवार के पास किया गया था? उसे चादर आप ने ही ओढ़ाई थी और गोद में उठा उस के घर पहुंचाया था?’’

अब चौंकने की बारी अब्दुल रहीम की थी. पसीने की एक लड़ी कनपटी से बहते हुए पीठ तक जा पहुंची. थोड़ी देर तक सिर झकाए मानो विचारों में गुम रहने के बाद उस ने सिर ऊपर उठाया. उस की पलकें भीगी हुई थीं.

अब्दुल रहीम देर तक आसमान में घूरता रहा. मन सालों पहले पहुंच गया. होली की वह मनहूस दोपहर थी, सड़क पर रंग खेलने वाले कम हो चले थे. इक्कादुक्का मोटरसाइकिल पर लड़के शोर मचाते हुए आतेजाते दिख रहे थे.

अब्दुल रहीम ने उस दिन भी ढाबा खोल रखा था. वैसे, ग्राहक न के बराबर आए थे. होली का दिन जो था. दोपहर होती देख अब्दुल रहीम ने भी ढाबा बंद कर घर जाने की सोची कि पिछवाड़े से आती आवाजों ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया. 4
लड़के नशे में चूर थे, पर… पर, यह क्या… वे एक लड़की को दबोचे हुए थे. छोटी बच्ची थी, शायद 14-15 साल की.

अब्दुल रहीम उन चारों लड़कों को पहचानता था. सब निठल्ले और आवारा थे. एक पिछड़े वर्ग के नेता के साथ लगे थे और इसलिए उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था. वे यहीं आसपास के थे. चारों छोटेमोटे जुर्म कर अंदरबाहर होते रहते थे.

रहीम जोरशोर से चिल्लाया, पर लड़कों ने उस की कोई परवाह नहीं की, बल्कि एक लड़के ने ईंट का एक टुकड़ा ऐसा चलाया कि सीधे उस के सिर पर आ कर लगा और वह बेहोश हो गया.

आंखें खुलीं तो अंधेरा हो चुका था. अचानक उसे बच्ची का ध्यान आया. उन लड़कों ने तो उस का ऐसा हाल किया था कि शायद गिद्ध भी शर्मिंदा हो जाएं. बच्ची शायद मर चुकी थी.

अब्दुल रहीम दौड़ कर मेज पर ढका एक कपड़ा खींच लाया और उसे उस में लपेटा. पानी के छींटें मारमार कर कोशिश करने लगा कि शायद कहीं जिंदा हो.

चेहरा साफ होते ही वह पहचान गया कि यह लड़की गली के आखिरी छोर पर रहती थी. उसे नाम तो मालूम नहीं था, पर घर का अंदाजा था. रोज ही तो वह अपनी सहेलियों के संग उस के ढाबे के सामने से स्कूल जाती थी.

बच्ची की लाश को कपड़े में लपेटे अब्दुल रहीम उस के घर की तरफ बढ़ चला. रात गहरा गई थी. लोग होली खेल कर अपनेअपने घरों में घुस गए थे, पर वहां बच्ची के घर के आगे भीड़ जैसी दिख रही थी. शायद लोग खोज रहे होंगे कि उन की बेटी किधर गई.

अब्दुल रहीम के लिए एकएक कदम चलना भारी हो गया. वह दरवाजे तक पहुंचा कि उस से पहले लोग दौड़ते हुए उस की तरफ आ गए. कांपते हाथों से उस ने लाश को एक जोड़ी हाथों में थमाया और वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा. वहां चीखपुकार मच गई.

‘मैं ने देखा है, किस ने किया है. मैं गवाही दूंगा कि कौन थे वे लोग…’ रहीम कहता रहा, पर किसी ने भी उसे नहीं सुना.

मेज पर हुई थपकी की आवाज से अब्दुल रहीम यादों से बाहर आया.

‘‘देखिए, उस केस को दाखिल करने का आर्डर आया है,’’ कल्पना ने बताया.

‘‘पर, इस बात को तो सालों बीत गए हैं मैडम. रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई थी. उस बच्ची के मातापिता शायद उस के गम को बरदाश्त नहीं कर पाए थे और उन्होंने शहर छोड़ दिया था,’’ अब्दुल रहीम ने हैरानी से कहा.

‘‘मुझे बताया गया है कि आप उस वारदात के चश्मदीद गवाह थे. उस वक्त आप उन बलात्कारियों की पहचान करने के लिए तैयार भी थे,’’ कल्पना की इस बात को सुन कर अब्दुल रहीम उलझन में पड़ गया.

‘‘अगर आप उन्हें सजा दिलाना नहीं चाहते हैं, तो कोई कुछ नहीं कर सकता है. बस, उस बच्ची के साथ जो दरिंदगी हुई, उस से सिर्फ वह ही नहीं तबाह हुई, बल्कि उस के मातापिता की भी जिंदगी बदतर हो गई,’’ सिटी एसपी कल्पना ने समझाते हुए कहा.

‘‘2 चाय ले कर आना,’’ अब्दुल रहीम ने आवाज लगाई, ‘‘जीप में बैठे लोगों को भी चाय पिलाना.’’

चाय आ गई. अब्दुल रहीम पूरे वक्त सिर झकाए चिंता में चाय सुड़कता रहा.

‘‘आप तो ऐसे परेशान हो रहे हैं, जैसे आप ने ही गुनाह किया हो. मेरा इरादा आप को तंग करने का बिलकुल नहीं था. बस, उस परिवार के लिए इंसाफ की उम्मीद है.’’

अब्दुल रहीम ने कहा, ‘‘हां मैडम, मैं ने अपनी आंखों से देखा था उस दिन. पर मैं उस बच्ची को बचा नहीं सका. इस का मलाल मुझे आज तक है. इस के लिए मैं खुद को भी गुनाहगार समझाता हूं.

‘‘कई दिनों तक तो मैं अपने आपे में भी नहीं था. एक महीने बाद मैं फिर गया था उस के घर, पर ताला लटका हुआ था और पड़ोसियों को भी कुछ नहीं पता था.

‘‘जानती हैं मैडम, उस वक्त के अखबारों में इस खबर ने कोई जगह नहीं पाई थी. दलितों की बेटियों का तो अकसर उस तरह बलात्कार होता था, पर यह घर थोड़ा ठीकठाक था, क्योंकि लड़की के पिता सरकारी नौकरी में थे. और गुनाहगार हमेशा आजाद घूमते रहे.

‘‘मैं ने भी इस डर से किसी को यह बात बताई भी नहीं. इसी शहर में होंगे सब. उस वक्त सब 20 से 25 साल के थे. मुझे सब के बाप के नामपते मालूम हैं. मैं आप को उन सब के बारे में बताने के लिए तैयार हूं,’’अब्दुल रहीम को लगा कि चश्मे के पीछे कल्पना मैडम की आंखें भी नम हो गई थीं.

‘‘उस वक्त भले ही गुनाहगार बच गए होंगे. लड़की के मातापिता ने बदनामी से बचने के लिए मामला दर्ज ही नहीं किया, पर आने वाले दिनों में उन चारों पापियों की करतूत फोटो समेत हर अखबार की सुर्खी बनने वाली है.

‘‘आप तैयार रहें, एक लंबी कानूनी जंग में आप एक अहम किरदार रहेंगे,’’ कहते हुए कल्पना मैडम उठ खड़ी हुईं और काउंटर पर चाय के पैसे रखते हुए जीप में बैठ कर चली गईं.

‘‘आज पहली बार किसी पुलिस वाले को चाय के पैसे देते देखा है,’’ छोटू टेबल साफ करते हुए कह रहा था और अब्दुल रहीम को लग रहा था कि सालों से सीने पर रखा बोझ कुछ हलका हो गया था.

इस मुलाकात के बाद वक्त बहुत तेजी से बीता. वे चारों लड़के, जो अब अधेड़ हो चले थे, उन के खिलाफ शिकायत दर्ज हो गई. अब्दुल रहीम ने भी अपना बयान रेकौर्ड करा दिया. मीडिया वाले इस खबर के पीछे पड़ गए थे. पर उन के हाथ कुछ खास खबर लग नहीं पाई थी.

अब्दुल रहीम को भी कई धमकी भरे फोन आने लगे थे. सो, उन्हें पूरी तरह पुलिस सिक्योरिटी में रखा जा रहा था. सब से बढ़ कर कल्पना मैडम खुद इस केस में दिलचस्पी ले रही थीं और हर पेशी के वक्त मौजूद रहती थीं.

कुछ उत्साही पत्रकारों ने उस परिवार के पड़ोसियों को खोज निकाला था, जिन्होंने बताया था कि होली के कुछ दिन बाद ही वे लोग चुपचाप बिना किसी से मिले कहीं चले गए थे, पर बात किसी से नहीं हो पाई थी.

कोर्ट की तारीखें जल्दीजल्दी पड़ रही थीं, जैसे कोर्ट भी इस मामले को जल्दी अंजाम तक पहुंचाना चाहता था. ऐसी ही एक पेशी में अब्दुल रहीम ने सालभर बाद बच्ची के पिता को देखा था. मिलते ही दोनों की आंखें नम हो गईं.

उस दिन कोर्ट खचाखच भरा हुआ था. बलात्कारियों का वकील खूब तैयारी के साथ आया हुआ मालूम दे रहा था. उस की दलीलों के आगे केस अपना रुख मोड़ने लगा था. सभी कानून की खामियों के सामने बेबस से दिखने लगे थे.

उस दिन कोर्ट खचाखच भरा हुआ था. बलात्कारियों का वकील खूब तैयारी के साथ आया हुआ मालूम दे रहा था. उस की दलीलों के आगे केस अपना रुख मोड़ने लगा था. सभी कानून की खामियों के सामने बेबस से दिखने लगे थे.

‘‘जनाब, सिर्फ एक अब्दुल रहीम की गवाही को ही कैसे सच माना जाए? मानता हूं कि बलात्कार हुआ होगा, पर क्या यह जरूरी है कि चारों ये ही थे? हो सकता है कि अब्दुल रहीम अपनी कोई पुरानी दुश्मनी का बदला ले रहे हों? क्या पता इन्होंने ही बलात्कार किया हो और फिर लाश पहुंचा दी हो?’’ धूर्त वकील ने ऐसा पासा फेंका कि मामला ही बदल गया.

लंच की छुट्टी हो गई थी. उस के बाद फैसला आने की उम्मीद थी. चारों आरोपी मूंछों पर ताव देते हुए अपने वकील को गले लगा कर जश्न सा मना रहे थे.

लंच की छुट्टी के बाद जज साहब कुछ पहले ही आ कर सीट पर बैठ गए थे. उन के सख्त होते जा रहे हावभाव से माहौल भारी बनता जा रहा था.

‘‘क्या आप के पास कोई और गवाह है, जो इन चारों की पहचान कर सके,’’ जज साहब ने वकील से पूछा, तो वह बेचारा बगलें झांकने लगा.

पीछे से कुछ लोग ‘हायहाय’ का नारा लगाने लगे. चारों आरोपियों के चेहरे दमकने लगे थे. तभी एक आवाज आई, ‘‘हां, मैं हूं. चश्मदीद ही नहीं भुक्तभोगी भी. मुझे अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए.’’

सब की नजरें आवाज की दिशा की ओर हो गईं. जज साहब के ‘इजाजत है’ बोलने के साथ ही लोगों ने देखा कि उन की शहर की एसपी कल्पना कठघरे की ओर जा रही हैं. पूरे माहौल में सनसनी मच गई.

‘‘हां, मैं ही हूं वह लड़की, जिसे 10 साल पहले होली की दोपहर में इन चारों ने बड़ी ही बेरहमी से कुचला था, इस ने…

‘‘जी हां, इसी ने मुझे मेरे घर के आगे से उठा लिया था, जब मैं गेट के आगे कुत्ते को रोटी देने निकली थी. मेरे मुंह को इस ने अपनी हथेलियों से दबा दिया था और कार में डाल दिया था.

‘‘भीतर पहले से ये तीनों बैठे हुए थे. इन्होंने पास के एक ढाबे के पीछे वाली दीवार की तरफ कार रोक कर मुझे घसीटते हुए उतारा था.

‘‘इस ने मेरे दोनों हाथ पकड़े थे और इस ने मेरी जांघें. कपड़े इस ने फाड़े थे. सब से पहले इस ने मेरा बलात्कार किया था… फिर इस ने… मुझे सब के चेहरे याद हैं.’’

सिटी एसपी कल्पना बोले जा रही थीं. अपनी उंगलियों से इशारा करते हुए उन की करतूतों को उजागर करती जा रही थीं.

कल्पना के पिता ने उठ कर 10 साल पुराने हुए मैडिकल जांच के कागजात कोर्ट को सौंपे, जिस में बलात्कार की पुष्टि थी. रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कल्पना को जान से मारने की कोशिश की गई थी.

कल्पना अभी कठघरे में ही थीं कि एक आरोपी की पत्नी अपनी बेटी को ले कर आई और सीधे अपने पति के मुंह पर तमाचा जड़ दिया.

दूसरे आरोपी की पत्नी उठ कर बाहर चली गई. वहीं एक आरोपी की बहन अपनी जगह खड़ी हो कर चिल्लाने लगी, ‘‘शर्म है… लानत है, एक भाई होते हुए तुम ने ऐसा कैसे किया था?’’

‘‘जज साहब, मैं बिलकुल मरने की हालत में ही थी. होली की उसी रात मेरे पापा मुझे तुरंत अस्पताल ले कर गए थे, जहां मैं जिंदगी और मौत के बीच कई दिनों तक झलती रही थी. मुझे दौरे आते थे. इन पापियों का चेहरा मुझे हर वक्त डराता रहता था.’’

अब केस आईने की तरह साफ था. अब्दुल रहीम की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे. कल्पना उन के पास जा कर उन के कदमों में गिर पड़ी.

‘‘अगर आप न होते, तो शायद मैं जिंदा न रहती.’’

मीडिया वाले कल्पना से मिलने को उतावले थे. वे मुसकराते हुए उन की तरफ बढ़ गई.

‘‘अब्दुल रहीम ने जब आप को कपड़े में लपेटा था, तब मरा हुआ ही समझा था. मेज के उस कपड़े से पुलिस की वरदी तक के अपने सफर के बारे में कुछ बताएं?’’ एक पत्रकार ने पूछा, जो शायद सभी का सवाल था.

‘‘उस वारदात के बाद मेरे मातापिता बेहद दुखी थे और शर्मिंदा भी थे. शहर में वे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे थे. मेरे पिताजी ने अपना तबादला इलाहाबाद करवा लिया था.

‘‘सालों तक मैं घर से बाहर जाने से डरती रही थी. आगे की पढ़ाई मैं ने प्राइवेट की. मैं अपने मातापिता को हर दिन थोड़ाथोड़ा मरते देख रही थी.

‘‘उस दिन मैं ने सोचा था कि बहुत हुआ अब और नहीं. मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए परीक्षा की तैयारी करने लगी. आरक्षण के कारण मुझे फायदा हुआ और मनचाही नौकरी मिल गई. मैं ने अपनी इच्छा से इस राज्य को चुना. फिर मौका मिला इस शहर में आने का.

‘‘बहुतकुछ हमारा यहीं रह गया था. शहर को हमारा कर्ज चुकाना था. हमारी इज्जत लौटानी थी.’’

‘‘आप दूसरी लड़कियों और उन के मातापिता को क्या संदेश देना चाहेंगी?’’ किसी ने सवाल किया.

‘‘इस सोच को बदलने की सख्त जरूरत है कि बलात्कार की शिकार लड़की और उस के परिवार वाले शर्मिंदा हों. गुनाहगार चोर होता है, न कि जिस का सामान चोरी जाता है वह.

‘‘हां, जब तक बलात्कारियों को सजा नहीं होगी, तब तक उन के हौसले बुलंद रहेंगे. मेरे मातापिता ने गलती की थी, जो कुसूरवार को सजा दिलाने की जगह खुद सजा भुगतते रहे.’’

कल्पना बोल रही थीं, तभी उन की मां ने एक पुड़िया अबीर निकाला और उसे आसमान में उड़ा दिया. सालों पहले एक होली ने उन की जिंदगी को बेरंग कर दिया था, उसे फिर से जीने की इच्छा मानो जाग गई थी. Hindi Family Story

Story In Hindi: छुट्टी – फौजियों का अनकहा दर्द

Story In Hindi: दूरदूर तक जहां तक नजर जा सकती थी, पहाड़ों पर बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी. प्रेमी जोड़ों के लिए यह एक शानदार जगह हो सकती थी, पर सरहद पर इन पहाडि़यों की शांति के पीछे जानलेवा अशांति छिपी हुई थी.

पिछले कई महीनों से कोई भी दिन ऐसा नहीं बीता था, जब तोपों के धमाकों और गोलियों की तड़तड़ाहट ने यहां की शांति भंग न की हो.

‘‘साहबजी, आप कौफी पीजिए. ठंड दूर हो जाएगी,’’ हवलदार बलवंत सिंह ने गरम कौफी का बड़ा सा मग मेजर जतिन खन्ना की ओर बढ़ाते हुए कहा.

‘‘ओए बलवंत, लड़ तो हम दिनरात रहे हैं, मगर क्यों? यह तो शायद ऊपर वाला ही जाने. अब तू कहता है, तो ठंड से भी लड़ लेते हैं,’’ मेजर जतिन खन्ना ने हंसते हुए मग थाम लिया.

कौफी का एक लंबा घूंट भरते हुए वे बोले, ‘‘वाह, मजा आ गया. अगर ऐसी कौफी हर घंटे मिल जाया करे, तो वक्त बिताना मुश्किल न होगा.’’

‘‘साहबजी, आप की मुश्किल तो हल हो जाएगी, लेकिन मेरी मुश्किल कब हल होगी?’’ बलवंत सिंह ने भी कौफी का लंबा घूंट भरते हुए कहा.

‘‘कैसी मुश्किल?’’ मेजर जतिन खन्ना ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘साहबजी, अगले हफ्ते मेरी बीवी का आपरेशन है. मेरी छुट्टियों का क्या हुआ?’’ बलवंत सिंह ने पूछा.

‘‘सरहद पर इतना तनाव चल रहा है. हम लोगों के कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है. ऐसे में छुट्टी मिलना थोड़ा मुश्किल है, पर मैं कोशिश कर रहा हूं,’’ मेजर जतिन खन्ना ने समझाया.

‘‘लेकिन सर, क्या देशभक्ति का सारा ठेका हम फौजियों ने ही ले रखा है?’’ कहते हुए बलवंत सिंह ने मेजर जतिन खन्ना के चेहरे की ओर देखा.

‘‘क्या मतलब…?’’ मेजर जतिन खन्ना ने पूछा.

‘‘यहां जान हथेली पर ले कर डटे रहें हम, वहां देश में हमारी कोई कद्र नहीं. सालभर गांव न जाओ, तो दबंग फसल काट ले जाते हैं. रिश्तेदार जमीन हथिया लेते हैं. ट्रेन में टीटी भी पैसे लिए बिना हमें सीट नहीं देता. पुलिस वाले भी मौका पड़ने पर फौजियों से वसूली करने से नहीं चूकते,’’ बलवंत सिंह के सीने का दर्द बाहर उभर आया.

‘‘सारे जुल्म सह कर भी हम देश पर अपनी जान न्योछावर करने के लिए तैयार हैं, मगर कम से कम हमें इनसान तो समझ जाए.

‘‘घर में कोई त्योहार हो, तो छुट्टी नहीं मिलेगी. कोई रिश्तेदार मरने वाला हो, तो छुट्टी नहीं मिलेगी. जमीनजायदाद का मुकदमा हो, तो छुट्टी नहीं मिलेगी. अब बीवी का आपरेशन है, तो भी छुट्टी नहीं मिलेगी. लानत है ऐसी नौकरी पर, जहां कोई इज्जत न हो.’’

‘‘ओए बलवंत, आज क्या हो गया है तुझे कैसी बहकीबहकी बातें कर रहा है? अरे, हम फौजियों की पूरी देश इज्जत करता है. हमें सिरआंखों पर बिठाया जाता है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने आगे बढ़ कर बलवंत सिंह के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘हां, इज्जत मिलती है, लेकिन मर जाने के बाद. हमें सिरआंखों पर बिठाया जाता है, मगर शहीद हो जाने के बाद. जिंदा रहते हमें बस और ट्रेन में जगह नहीं मिलेगी, हमारे बच्चे एकएक पैसे को तरसेंगे, मगर मरते ही हमारी लाश को हवाईजहाज पर लाद कर ले जाया जाएगा. परिवार के दुख को लाखों रुपए की सौगात से खरीद लिया जाएगा. जिस के घर में कभी कोई झांकने भी न आया हो, उसे सलामी देने हुक्मरानों की लाइन लग जाएगी.

‘‘हमारी जिंदगी से तो हमारी मौत लाख गुना अच्छी है. जी करता है कि उसे आज ही गले लगा लूं, कम से कम परिवार वालों को तो सुख मिल सकेगा,’’ कहते हुए बलवंत सिंह का चेहरा तमतमा उठा.

‘‘ओए बलवंत…’’

‘‘ओए मेजर…’’ इतना कह कर बलवंत सिंह चीते की फुरती से मेजर जतिन खन्ना के ऊपर झपट पड़ा और उन्हें दबोचे हुए चट्टान के नीचे आ गिरा. इस से पहले कि वे कुछ समझ पाते, बलवंत सिंह के कंधे पर टंगी स्टेनगन आग उगलने लगी.

गोलियों की ‘तड़…तड़…तड़…’ की आवाज के साथ तेज चीखें गूंजीं और चंद पलों बाद सबकुछ शांत हो गया.

‘‘ओए बलवंत मेरे यार, तू ठीक तो है न?’’ मेजर जतिन खन्ना ने अपने को संभालते हुए पूछा.

‘‘हां, साहबजी, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ बलवंत सिंह हलका सा हंसा, फिर बोला, ‘‘मगर, ये पाकिस्तानी कभी ठीक नहीं होंगे. इन की समझ में क्यों नहीं आता कि जब तक एक भी हिंदुस्तानी फौजी जिंदा है, तब तक वे हमारी चौकी को हाथ भी नहीं लगा सकते,’’ इतना कह कर बलवंत सिंह ने चट्टान के पीछे से झांका. थोड़ी दूरी पर ही 3 पाकिस्तानी सैनिकों की लाशें पड़ी थीं. छिपतेछिपाते वे कब यहां आ गए थे, पता ही नहीं चला था. उन में से एक ने अपनी एके 47 से मेजर जतिन खन्ना के सीने को निशाना लगाया ही था कि उस पर बलवंत सिंह की नजर पड़ गई और वह बिजली की रफ्तार से मेजर साहब को ले कर जमीन पर आ गिरा.

‘‘बलवंत, तेरी बांह से खून बह रहा है,’’ गोलियों की आवाज सुन कर खंदक से निकल आए फौजी निहाल सिंह ने कहा. उस के पीछेपीछे उस चौकी की सिक्योरिटी के लिए तैनात कई और जवान दौडे़ चले आए थे.

‘‘कुछ नहीं, मामूली सी खरोंच है. पाकिस्तानियों की गोली जरा सा छूते हुए निकल गई थी,’’ कह कर बलवंत सिंह मुसकराया.

‘‘बलवंत, तू ने मेरी खातिर अपनी जान दांव पर लगा दी. बता, तू ने ऐसा क्यों किया?’’ कह कर मेजर जतिन खन्ना ने आगे बढ़ कर बलवंत सिंह को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘क्योंकि देशभक्ति का ठेका हम फौजियों ने ले रखा है,’’ कह कर बलवंत सिंह फिर मुसकराया.

‘‘तू कैसा इनसान है. अभी तो तू सौ बुराइयां गिना रहा था और अब देशभक्ति का राग अलाप रहा है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने दर्दभरी आवाज में कहा.

‘‘साहबजी, हम फौजी हैं. लड़ना हमारा काम है. हम लड़ेंगे. अपने ऊपर होने वाले जुल्म के खिलाफ लड़ेंगे, मगर जब देश की बात आएगी, तो सबकुछ भूल कर देश के लिए लड़तेलड़ते जान न्योछावर कर देंगे. कुरबानी देने का पहला हक हमारा है. उसे हम से कोई नहीं छीन सकता,’’ कहतेकहते बलवंत सिंह तड़प कर जोर से उछला.

उस के बाद एक तेज धमाका हुआ और फिर सबकुछ शांत हो गया. बलवंत सिंह की जब आंखें खुलीं, तो वह अस्पताल में था. मेजर जतिन खन्ना उस के सामने ही थे.

‘‘सरजी, मैं यहां कैसे आ गया?’’ बलवंत सिंह के होंठ हिले.

‘‘अपने ठेके के चलते…’’ मेजर जतिन खन्ना ने आगे बढ़ कर बलवंत सिंह के सिर पर हाथ फेरा, फिर बोले, ‘‘तू ने कमाल कर दिया. दुश्मन के 3 सैनिक एक तरफ से आए थे, जिन्हें तू ने मार गिराया था. बाकी के सैनिक दूसरी तरफ से आए थे. उन्होंने हमारे ऊपर हथगोला फेंका था, जिसे तू ने उछल कर हवा में ही थाम कर उन की ओर वापस उछाल दिया था. वे सारे के सारे मारे गए और हमारी चौकी बिना किसी नुकसान के बच गई.’’

‘‘तेरे जैसे बहादुरों पर देश को नाज है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने बलवंत सिंह का कंधा थपथपाया, फिर बोले, ‘‘तू भी बिलकुल ठीक है. डाक्टर बता रहे थे कि मामूली जख्म है. एकदो दिन में यहां से छुट्टी मिल जाएगी.

‘‘छुट्टी…’’ बलवंत सिंह के होंठ धीरे से हिले.

‘‘हां, वह भी मंजूर हो गई?है. यहां से तू सीधे घर जा सकता है,’’ मेजर जतिन खन्ना ने बताया, फिर चौंकते हुए बोले, ‘‘एक बात बताना तो मैं भूल ही गया था.’’

‘‘क्या…?’’ बलवंत सिंह ने पूछा.

‘‘तुझे हैलीकौफ्टर से यहां तक लाया गया था.’’

‘‘पर अब हवाईजहाज से घर नहीं भेजेंगे?’’ कह कर बलवंत सिंह मुसकराया.

‘‘कभी नहीं…’’ मेजर जतिन खन्ना भी मुसकराए, फिर बोले, ‘‘ब्रिगेडियर साहब ने सरकार से तुझे इनाम देने की सिफारिश की है.’’

‘‘साहबजी, एक बात बोलूं?’’

‘‘बोलो…’’

‘‘इनाम दिलवाइए या न दिलवाइए, मगर सरकार से इतनी सिफारिश जरूर करा दीजिए कि हम फौजियों की जमीनजायदाद के मुकदमों का फैसला करने के लिए अलग से अदालतें बना दी जाएं, जहां फटाफट इंसाफ हो, वरना हजारों किलोमीटर दूर से हम पैरवी नहीं कर पाते.

‘‘सरहद पर हम भले ही न हारें, मगर अपनों से लड़ाई में जरूर हार जाते हैं,’’ बलवंत सिंह ने उम्मीद भरी आवाज में कहा.

मेजर जतिन खन्ना की निगाहें कहीं आसमान में खो गईं. बलवंत सिंह ने जोकुछ भी कहा था, वह सच था, मगर जो वह कह रहा है, क्या वह कभी मुमकिन हो सकेगा? Story In Hindi

Hindi Kahani: चीरहरण – क्या नीतू बचा पाई अपनी इज्जत?

Hindi Kahani: रात का दूसरा पहर. दरवाजे पर आहट सुनाई पड़ी. कोई दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहा था. आहट सुन कर नीतू की नींद उचट गई. वह सोचने लगी कि कहीं कोई जानवर तो नहीं, जो रात को अपने शिकार की तलाश में भटकता हुआ यहां तक आ पहुंचा हो?

तभी उसे दरवाजे के बाहर आदमी की छाया सी मालूम हुई. उस के हाथ दरवाजे पर चढ़ी सांकल को खोलने की कोशिश कर रहे थे.

यह देख नीतू डर कर सहम गई. उस के पास लेटी उस की छोटी बहन लच्छो अभी भी गहरी नींद में सो रही थी. उस ने उसे जगाया नहीं और खुद ही हिम्मत बटोर कर दरवाजे तक जा पहुंची.

सांकल खोलने के साथ ही वह चीख पड़ी, ‘‘मलखान तुम… इतनी रात को तुम मेरे दरवाजे पर क्या कर रहे हो?’’

नीतू को समझते देर नहीं लगी कि इतनी रात को मलखान के आने की क्या वजह हो सकती है. वह कुछ और कहती, इस से पहले मलखान ने अपने हाथों से उस का मुंह दबोच लिया.

‘‘आवाज मत निकालना, वरना यहीं ढेर कर दूंगा,’’ कह कर मलखान पूरी ताकत लगा कर नीतू को बाहर तक घसीट लाया.

आंगन के बाहर अनाज की एक छोटी सी कोठरी थी, जिस में भूसा भरा हुआ था. मलखान ने जबरदस्ती नीतू को भूसे के ढेर में पटक दिया. उस की चौड़ी छाती के बीच दुबलीपतली नीतू दब कर रह गई. मलखान उस पर सवार था.

‘‘पहले ही मान जाती, तो इतनी जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती,’’ मलखान ने अपना कच्छा और लुंगी पहनते हुए कहा.

लच्छो, जो नीतू से 2 साल छोटी थी, उस ने करवट ली, तो नीतू को अपनी जगह न पा कर उठ बैठी. दरवाजा भी खुला पड़ा था. उसे कुछ अनजाना डर सा लगा.

मलखान पहले लच्छो के बदन से खेलने के चक्कर में था. 2 दिन पहले लच्छो ने उस के मुंह पर थूक दिया था, जब उस ने जामुन के पेड़ के नीचे उसे दबोचने की कोशिश की थी.

वह नीतू से ज्यादा ताकतवर और निडर थी. पर उस ने घुमा कर एक ऐसी लात मलखान की टांगों के बीच मारी कि वह ‘मर गया’ कह कर चीख पड़ा था.

अचानक हुए इस हमले से मलखान बौखला गया था. वह सोच भी नहीं पाया था कि लच्छो इस तरह का हमला अचानक कर देगी. उस की मर्दानगी तब धरी की धरी रह गई थी. एक तरह से लच्छो ने उसे चुनौती दे डाली थी.

लच्छो उठी और दालान में पड़े एक डंडे को उठा लिया. वह धीरेधीरे आगे बढ़ने लगी. उस का शक सही निकला कि दीदी किसी मुसीबत में फंस गई हैं.

मलखान उस समय अंधेरे में भागने की कोशिश कर रहा था कि अचानक लच्छो ने घुमा कर डंडा उस के सिर पर जड़ दिया.

डंडा पड़ते ही वह भागने लगा और भागतेभागते बोला, ‘‘सुबह देख लूंगा.’’

‘‘क्या हुआ दीदी, तुम ने मुझे उठाया क्यों नहीं? कम से कम तुम मुझे आवाज ही लगा देतीं,’’ लच्छो रोते हुए बोली.

‘‘2 रोज पहले ही मैं ने इस की हजामत बना डाली थी, जब इस ने मुझ से छेड़छाड़ की थी.’’

‘‘क्या…?’’ यह सुन कर नीतू तो चौंक गई.

‘‘हां दीदी, कई दिनों से वह मेरे पीछे पड़ा हुआ था. उस दिन भी वह मुझ से छेड़छाड़ करने लगा. उस दिन तो मैं ने उसे छोड़ दिया था, वरना उसी दिन उसे सबक सिखा देती,’’ लच्छो ने नीतू को सहारा दे कर उठाया और कमरे में ले गई.

दोनों बहनें एकसाथ रह कर प्राइमरी स्कूल के बच्चों को पढ़ाया करती थीं. कुछ साल पहले उन के पिता की मौत दिल का दौरा पड़ने से हो गई थी. वह बैंक में मुलाजिम थे.

पिता की मौत के बाद उन की मां श्यामरथी देवी को वह नौकरी मिल गई थी. चूंकि बैंक गांव से काफी दूर शहर में था, इसलिए दोनों बेटियों को गांव में अकेले ही रहना पड़ रहा था. मां कभीकभार छुट्टी के दिनों में गांव आ जाया करती थीं.

मलखान की नाक कट गई थी. एक को तो वह अपनी हवस का शिकार बना ही चुका था, पर दूसरी से बदला लेने के लिए तड़प रहा था.

एक दिन शाम के 7 बज रहे थे. दोनों बहनें खाना बनाने की तैयारी में थीं. मलखान ने अपने कुछ दोस्तों को जमा किया और लच्छो के घर पर धावा बोल दिया.

‘‘बाहर निकल, अब देख मेरा रुतबा. गांव में तेरी कैसी बेइज्जती करता हूं,’’ मलखान अपने साथियों के साथ लच्छो के घर में घुसता हुआ बोला.

घर के अंदर मौजूद दोनों बहनें कुछ समझ पातीं, इस से पहले ही मलखान के साथियों ने लच्छो को पकड़ लिया और घसीटते हुए बाहर तक ले आए.

गांव की इज्जत गांव वालों के सामने नंगी होने लगी. मलखान गांव वालों के बीच चिल्लाचिल्ला कर कह रहा था, ‘‘ये दोनों बहनें जिस्मफरोशी करती हैं. इन की वजह से ही गांव की इज्जत मिट्टी में मिल गई है. हम लच्छो का मुंह काला कर के, इस का सिर मुंड़ा कर इसे गांव में घुमाएंगे.’’

दोनों बहनों का बचपन गांव वालों के बीच बीता था. गांव वालों के बीच पलबढ़ कर वे बड़ी हुई थीं. उन्हीं लोगों ने उन का तमाशा बना दिया था.

योजना के मुताबिक, गांव का हज्जाम भी समय पर हाजिर हो गया.

नीतू को अपनी छोटी बहन के बचाव का तरीका समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे इन जालिमों के चंगुल से उसे बचाया जाए? वह सोच रही थी कि किसी तरह लच्छो की इज्जत बचानी है, यह सोच कर नीतू घर से निकल पड़ी.

नीतू भीड़ को चीरते हुए अपनी बहन के पास जा कर खड़ी हो गई.

भीड़ में से आवाज उठी, ‘‘इस का भी सिर मुंड़वा दो.’’

नीतू पहले तो गांव वालों के बीच खूब रोईगिड़गिड़ाई. उस ने अपनेआप को बेकुसूर साबित करने के दावे पेश किए, पर किसी ने उस की एक न सुनी. बड़ेबूढ़े भी चुप्पी साध गए.

नीतू अपने घर से एक तेज खंजर उठा लाई थी. बात बिगड़ती देख उस ने वह खंजर तेजी से अपने पेट में घुसेड़ लिया.

देखते ही देखते खून का फव्वारा फूट पड़ा. वह चीख कर कहे जा रही थी, ‘‘हम दोनों बहनें बेकुसूर हैं. मलखान ने ही एक दिन मेरी इज्जत लूट ली थी.’’

इसी बीच पुलिस की जीप वहां से गुजरी और वहां हो रहे तमाशे को देख कर रुक गई.

नीतू ने मरने से पहले सारी बातें इंस्पैक्टर को बता दीं. कुसूरवार लोग पकड़े गए. पर नामर्द गांव वालों ने गांव की इज्जत को अपने ही सामने लुटते देखा. यह कलियुग का चीरहरण था. Hindi Kahani

Hindi Funny Story: क्या हाल है लतखोरीलाल

Hindi Funny Story, लेखक – राजेंद्र कुमार सिंह

आज की राजनीति में लतखोरों और चोरों की कमी नहीं है. जो जहां पर है, जिस को जहां मौका मिला, चौकाछक्का मार कर विकास का चक्का जाम कर हराम के माल पर कमाल करते हुए नमकहराम खुद आराम कर रहा है. जो भविष्य में बनता यही जी का जंजाल है. जनता देख रही जो नेता भलाई करने का संकल्प ले कर मैदान में उतरा, वही विकास के पर कतर मलाई चांप रहा है, मजे से नोट छाप रहा है. इस आड़ में कामयाबी का झठा झंडा गाड़ कर कहता है कि जनता जाए भाड़ में. विकास की चादर समेट बढि़या कमीशन लपेट कर अपना पेट भर निडर हो कर चल रहा है.

सार्वजनिक संपत्ति पर अपने अधिकार से कटौती कर बपौती समझ कर यूज कर रहा है. आज जनता को सजग होते ही इन की करतूतों को देख कहर बन कर टूट रही है. जो सार्वजनिक संपत्ति को अपना समझने की भूल कर रहे थे, उन की कलई खुल रही है. जनता के गुस्से से उन का जोश बेहोश हो कर धराशायी हो गया.

वह कितना बेकल, बेहाल व लाचार है. चल रहा कभी पातपात, तो कभी भाग रहा इस डाल तो उस डाल है. इसी तरह के सांपसीढ़ी के खेल में देश का खस्ताहाल है. पूरे देश में एक अलग स्लोगन चल रहा है. जनता जो सोई थी, अपनी हसरतें जो डुबोई थी, अब वह मचल रही है, रोड पर निकल उछल रही है.

आज लोकतंत्र बिलकुल तंगतंग हो गया है. दूसरे शब्दों में लोकतंग या प्रजातंग कह सकते हैं. सुकून और शांति सत्ता की होड़ में जो पहले से आसन पर बैठ झठा आश्वासन परोस रहा है. सूचना तंत्र इन की साजिश के झंसे में आ गया है. वह भी खापी कर दंड मार रहा है. बोझ से दबा बैठा है. कुछ अजीब तरह की हरकत करते हुए कुंठित हो कर बीचबीच में ऐसा कानून या विधेयक लाता है, मुंह की खाता है. जनता जाग गई लेते हुई अंगड़ाई. अगले अंजाम को तमाम करने के लिए क्वालिफाई कर रही है.

और इसी तरह के जुनून में हमारे महल्ले के उभरते नेता सुखीराम ने भी इस जंग में कूद कर अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. मौका देख कर चौका मारने में कमाल का महारत हासिल है. जब जान गया कि ऐसेऐसे मौके पर कुछ भेटने वाला है, तो समेटने के लिए निकल पड़ता है. उन के साथ में एक टोली होती है जो अगले की बोली पर ताला लगा देने के लिए जानी जाती है.

यही वजह है कि वे समयसमय पर लतियाए जाते हैं. कभी खूब पिटाते हैं. उस में सब से ज्यादा प्रसाद सुखीराम ही पाते हैं. लोगबाग अब असली नाम के जगह नेता लतखोरीलाल कहते हैं. ये जब जब पिटा कर आए, पड़ोसी होने के नाते पूछ लिया, ‘‘क्या हाल है लतखोरीलाल भाई?’’

क्योंकि ये पक्ष हो या विपक्ष तहसनहस कराने, मामला को बिगाड़ने के लिए मशहूर हैं. हालांकि, हवा का रुख देख कर चलते हैं, इसलिए जबजब सत्ता बदलती है, ये भी बदल जाते हैं. खरीदफरोख्त में मोलतोल करने में इन का जवाब नहीं, महारत हासिल है. सामान तो इनसान भी खरीदते हैं, नेता खरीदने में इन का क्या कहना.

देश की संपत्ति को ये बपौती समझकर आमजन की सुविधाओं में कटौती कर पनौती लगाने के लिए भी जाने जाते हैं, इसलिए जनमानस जैसे ही सड़कों पर उतरा, शायद इन पर मंडराना शुरू हो गया खतरा. अभी जंग जारी है. नया मुद्दा अभी कुछ ज्यादा उछल रहा है किसी आयोग को ले कर. जनता भी पड़ गई है इन के पीछे हाथ धो कर. Hindi Funny Story

Story In Hindi: शैतान मंदिर का – क्या हुआ था वीरमती के साथ?

Story In Hindi: ‘‘मेरा मन तो मंदिर जाने को बिलकुल भी नहीं कर रहा है,’’ मंदिर की पहली सीढ़ी के पास भोलू का हाथ पकड़ते हुए वीरमती ने कहा.

‘‘चाहता तो मैं भी यही हूं वीरमती, पर तुम सब्र रखो और एक बार मंदिर जा कर लौट आओ. मैं यहां खड़ा रह कर तुम्हारा इंतजार करूंगा,’’ वीरमती के गले में अपनी बांहें डाल कर भोलू ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘पुरानी कहानियों और किताबों में कहीं भी नहीं पढ़ा कि कोई देवता पति से पहले नई ब्याहता से सुहागरात मनाता है,’’ अपने भोलू की आंखों में   झांकते हुए वीरमती ने उदासी से कहा.

‘‘हां, पर मंदिर में ऐसा सच में थोड़े ही होगा. यह तो रस्म मात्र है. तुम जानती हो कि मैं डांभरी देवता में यकीन नहीं करता, लेकिन रिवाज है. अब तुम जाओ,’’ भोलू ने हौसला देते हुए कहा.

2 गांवों डांभरी और टिक्करी के बीच एकांत में और पेड़ों से घिरी एक समतल जगह पर डांभरी देवता का मंदिर बना था. मंदिर से थोड़ी दूर गढ़ की तरह भंडारगृह था. यहां सन्नाटे और डर का माहौल ही रहता था.

दोनों गांव के लोग देवता की खुशी में खुश रहते थे और उसे तरहतरह के उपहार देते थे. मांसभात का चढ़ावा तो वहां चढ़ता ही रहता था.

गुर दितू के जरीए देवता गांव वालों की सुखसमृद्धि की सूचना देता था. जो शख्स देवता पर शक करता था, उसे देवता गुर में प्रवेश कर कठोर सजा देता था.

गुर दितू का दोनों गांवों में खूब आदरसत्कार था. उस का कहा तो पत्थर की लकीर होता था.

डांभरी देवता पर भरोसा नहीं था तो केवल भोलू को, जबकि वीरमती को उस पर यकीन था, पर गुर दितू में देवता का प्रवेश करना उसे कतई सच नहीं लगता था.

दोनों गांवों में जब भी किसी लड़के की शादी होती थी, तो नई ब्याही दुलहन को सुहागरात से पहले देवता के मंदिर में पूजाअर्चना करने के साथ देवता से सुहागरात मनाने का निवेदन करना होता था और मंदिर में रखे तख्तपोश पर सो कर ही लौटना होता था.

यों तो छोटी जाति के लोगों का मंदिर में घुसना मना था, लेकिन उन की नई दुलहन मंदिर में आ सकती थी.

गांव के राघव ने अपनी दुलहन को मंदिर में नहीं भेजा था. नतीजतन, उस की दुलहन 7वें दिन मरी पाई गई थी और वह पागल हो गया था.

भोलू और वीरमती को उन के मांबाप और गांव वालों ने बहुत सम  झाबु  झाकर ही भेजा था. मंदिर को जाती पहली सीढ़ी से आगे नई दुलहन के पति समेत किसी को भी जाने की इजाजत नहीं थी.

भोलू पहली सीढ़ी के पास जलाभुना सा खड़ा हो गया था. वीरमती मुड़मुड़ कर बहुत प्यार से उसे देखती एकएक सीढ़ी चढ़ती जाती थी. भोलू का दिल धड़क जाता था. उसे वीरमती का जाना भीतर ही भीतर कचोट रहा था.

वीरमती नंगे पैर बरामदे तक पहुंच गई थी. उस ने उस डरावनी जगह पर चारों ओर नजर दौड़ाई, फिर नीचे खड़े भोलू को देखने लगी.

भोलू ने उसे नीचे से हाथ हिला कर इशारा किया, तो वह मुसकरा उठी.

वीरमती हिम्मत के साथ मंदिर की ओर बढ़ गई. दरवाजे के पास रुक कर उस ने भीतर   झांका. पहले तो उसे काफी अंधेरा जान पड़ा, पर कुछ देर बाद उतना अंधेरा नहीं लगा और डांभरी देवता की सफेद पिंडी उसे साफसाफ दिखाई देने लगी.

वीरमती ने देवता की पिंडी पर हार पहनाया और धूप जला कर धूपदान में रखी. फिर पिंडी के सामने हाथ जोड़ कर और आंखें बंद करते हुए धीमी आवाज में बोली, ‘‘हे देवता, आप अच्छे गुणों के स्वामी हैं. आप मेरे मातापिता भी हैं, पर आप के साथ होने वाली सुहागरात के बारे में सोचना भी मेरे लिए पाप है…

‘‘हे देवता, इस तरह की प्रथा को हटाओ. ऐसा नहीं होना चाहिए.’’

इसके बाद वीरमती तख्तपोश की ओर मुड़ी, तो उसे एक सरसराहट सी सुनाई दी.

वीरमती ने चौकन्ना हो कर इधरउधर देखा, पर कुछ दिखाई न दिया. फिर भी उस की धड़कनें कुछ बढ़ सी गई थीं, जिसे वह सन्नाटे और डरावने माहौल में महसूस करने लगी थी.

कुछ देर खड़े रहने पर वीरमती ने उस सरसराहट को मन का वहम सम  झा और तख्तपोश पर सोने के लिए जाने लगी कि अचानक एक बड़े डीलडौल वाला नंगा आदमी उस पर   झपट पड़ा. उस आदमी के चेहरे पर डरावना मुखौटा लगा था. उस के लंबे बाल उसे और भी भयानक बना रहे थे.

इस के पहले कि वीरमती की चीख निकलती, उस डरावने आदमी का एक हाथ वीरमती के मुंह पर चिपक गया, ताकि वह चीख न सके.

उस डरावने आदमी का दूसरा हाथ उस के कमरबंद खोलने को रेंगने लगा. उस आदमी की सांसें मुखौटे के पीछे से पूरे सन्नाटे में गूंजने लगीं.

वीरमती उस शख्स की मंसा समझ चुकी थी कि यह देवता नहीं, बल्कि कोई शैतान है. उसे भोलू का ध्यान आया और पूरी हिम्मत बटोर कर उस ने अपने दाएं हाथ से वह मुखौटा हटाया और बाएं हाथ से अपने बालों के जूड़े में छिपाया चाकू निकाल लिया.

नंगे आदमी का चेहरा देख कर वीरमती का शक यकीन में बदल गया कि वह गुर दितू था.

वीरमती जोर से चिल्लाई, ‘‘पापी, ले दरिंदगी की सजा,’’ और उस ने   झट से गुर दितू की नाक काट दी.

भयंकर दर्द से बेहाल गुर दितू जोर से चिंघाड़ा. उस की चिंघाड़ दूर तक गूंज गई. दर्द से तड़पता हुआ अब तो वह हिंसक बाघ बन गया.

एक आदमी की चिंघाड़ सुन कर किसी अनहोनी के डर से भोलू पूरी ताकत लगा कर सीढि़यों पर चढ़ चला. पहली ही सीढ़ी से ऊपर न चढ़ने का नियम भंग होने की उसे कतई चिंता न थी.

इधर खून से लथपथ गुर दितू ने वीरमती को उठने न दिया. वह एक हाथ से उस का गला दबाने लगा, पर वीरमती का चाकू ‘खचाक’ से उस की कलाई पर चला और बंधन छूट गया.

भोलू हांफता हुआ मंदिर में पहुंच गया. कुछ देर तो उसे चूडि़यों की खनक के सिवा कुछ दिखाई नहीं दिया, पर फिर सबकुछ साफ नजर आने लगा.

भीतर का सीन देख कर वह सम  झ गया और उस का खून खौल उठा. सकपका कर डरते हुए गुर दितू उठने लगा, पर वीरमती ने बालों से पकड़ कर उसे   झक  झोरना शुरू कर दिया.

भोलू ने आव देखा न ताव देवता की पिंडी के पास पड़ी तलवार उठा ली. वह गुर्राते हुए बोला, ‘‘ठहर जा शैतान, मैं आज तु  झे जिंदा नहीं छोड़ूंगा. तेरा यह खेल अब हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा.’’

वीरमती द्वारा बालों से पकड़े नंगे गुर दितू को भोलू की जोर की लात पड़ी और वह दरवाजे पर गिर पड़ा.

भोलू ने तलवार सीधे उस की गरदन पर दे मारी, लेकिन वीरमती के रोकने से तलवार उस का कान काटती हुई दरवाजे में धंस गई.

‘‘इस शैतान को मार कर अपने सिर हत्या का जुर्म न लें. इस की करतूतों की सजा इसे गांव वाले और पुलिस देगी,’’ वीरमती ने प्यार से समझाते हुए कहा.

गुस्से से तड़पता भोलू न चाहते हुए भी मान गया. वे दोनों गुर दितू को बालों से घसीटते हुए मंदिर से बाहर ले चले, तो उन्होंने देखा कि गांव वालों का जमघट चढ़ाई चढ़ते हुए बड़ी तेजी से मंदिर की ओर ही आ रहा है.

अब गुर दितू गिड़गिड़ाते हुए उन से माफी मांगने लगा. वह अपने नंगे बदन को हाथों से ढकता और दर्द से कराहता भी जाता था. उस के कटे नाककान से खून निकलना बंद नहीं हो रहा था.

गुर दितू को नंगा देख कर कई औरतें चेहरा घुमा कर हंसने लगी थीं, जबकि वह सिर   झुकाए उकड़ू बैठ गया था.

एक औरत ने गुर दितू की ओर अपना दुपट्टा फेंका, जिसे उस ने   झट से लपक कर कमर पर लपेट लिया था.

इसी दौरान एक औरत ने अपनी चप्पल निकाल कर गुर दितू के सिर पर मारनी शुरू कर दी थी. जब वह थक गई, तो रोतेरोते उस ने गुर दितू द्वारा उस से किए कुकर्म की बात सभी को बता दी.

उस औरत ने यह भी बताया कि वीरमती को चाकू रखने की सलाह उसी ने दी थी. अनहोनी के डर से गांव वालों को भी वही साथ लाई थी.

डांभरी और टिक्करी गांव के लोग बहुत दुखी हुए. तभी सब से पीछे खड़ी 11 दिन पहले ब्याही रघु पंडित की बहू भी जोरजोर से रो पड़ी.

वह रोतेरोते बोली, ‘‘मंदिर में बेहोश होने पर भी इस दुराचारी ने मेरे साथ कुकर्म किया था.’’

उस के पति ने दिलासा दे कर उसे चुप कराया और नफरत से गुर दितू की ओर थूक दिया.

अब सब गांव वाले देवता के नाम पर हो रहे पाखंड को पूरी तरह जान गए थे. वे अपनी नासम  झी और अनपढ़ता पर बहुत दुखी थे.

इस दौरान 5-6 नौजवानों ने औरतों के दुपट्टों से गुर दितू को बांध लिया था.

सभी गांव वालों ने एकमत हो कर गुर दितू और डांभरी देवता के चारों कारदारों को पुलिस के हवाले करने और उन का सामाजिक बहिष्कार करने का फैसला ले लिया.

दोनों गांवों के सरपंचों ने भंडारगृह का सारा अनाज गरीबों में बांटने और मंदिर के साथ भंडारगृह को भी हमेशा के लिए ताला लगाने का फैसला सुना दिया. अब वे सब गुर दितू को पकड़ कर गांव की ओर ले जाने लगे थे.

सालों से गांव का यह धूर्त पुजारी ऊंचनीच की बात कर के गांव वालों की औरतों को लूट रहा था. कुछ के तो उस से बच्चे भी हुए थे, गोरेचिट्टे.

मांएं यही सोच कर खुश रहती थीं कि पंडित की संतान हैं, तो उस के अगले जन्म तो सुधरेंगे. कई औरतें तो बाद में भी पुजारी की सेवा करने आती रहतीं और यही कहतीं कि देवता उन पर खुश हैं. Story In Hindi

Hindi Kahani: बदमाश हिरनी

Hindi Kahani: लाला जनार्दन मोटरसाइकिल से उधार देने और वसूली करने गांवगांव जाया करता था. एक दिन की बात है. दोपहर की उमस भरी गरमी से छुटकारा पाने के लिए जनार्दन ने अपनी मोटरसाइकिल एक खेत के किनारे खड़ी कर दी और वह कुछ गुनगुनाते हुए गन्ने के झुरमुट के बीच से चला जा रहा था.

अचानक जनार्दन ने देखा कि कुएं के पास एक लड़की बैलों की जोड़ी को हांक रही थी.

जनार्दन कुछ पल के लिए सांस रोके उस लड़की को देखता रहा. सिर पर पल्लू डाले हुए वह नईनई ब्याही लड़की जवान और खूबसूरत लग रही थी.

उसे इस तरह अपनी ओर निहारता देख वह लड़की एकाएक हंस पड़ी और बोली, ‘‘प्यास लगी है, तो पानी पी लो.’’

जनार्दन ने चुल्लू में पानी भर कर होंठों से लगाया, जिस से उस का गला तो तर हो गया, पर मन प्यासा रह गया.

लड़की ने दोबारा कुएं से पानी निकाल कर उस की ओर बढ़ा कर कहा, ‘‘और पी लो.’’

जनार्दन बोल उठा, ‘‘पिला दो.’’

उस लड़की ने लोटे से पानी पिलाना शुरू किया. पानी की फुहार से जनार्दन का तनमन जैसे भीग गया था.

वह ठिठका सा खड़ा था कि लड़की बोली, ‘‘रोटी खा लो.’’

जनार्दन के पास रोटी नहीं थी. उस की बीवी तो शहर में परिवार के साथ रहती थी. भरी दोपहर में जैसे उस की बरसों की सोई प्यास जाग उठी. इस के बावजूद वह चुपचाप वहां से लौटने को हुआ.

उस लड़की से रहा न गया. वह बोली, ‘‘यहीं रोटी खा लो…’’

जनार्दन पलभर के लिए रुका. उस ने गौर से देखा कि उस लड़की का टीका चमक रहा था. सूरज की सुनहरी किरणें उस के चंपा जैसे चेहरे को चूम रही थीं.

जनार्दन को झिझकते देख कर वह लड़की फिर बोली, ‘‘गरमी की वजह से मैं ने रोटी खाई नहीं है, तुम खा लो.’’

जनार्दन ने देखा कि वह लड़की महुआ की गंध की तरह मस्त नजर आ रही थी, मानो उस से मनुहार कर रही हो.

जनार्दन ने अपनी कमर में बंधी थैली को टटोला कि कहीं गिर तो नहीं गई है. आज ही तो उसे गिरवी में 2 कंगन मिले थे. उन्हें संभाल कर वह वहीं बैठ गया.

तभी जनार्दन को लड़की के बदन से दूध की सोंधी गंध महसूस हुई. लड़की का पसीने से भीगा आंचल उस के बदन से चिपका था. जनार्दन से दो कौर रोटी भी नहीं तोड़ी जा रही थी.

लड़की जान गई कि झिझक का मारा जनार्दन रोटी नहीं खा पा रहा है, इसलिए उस ने एक लोटा गन्ने का रस उसे पीने को दिया. इसी बीच सूरज डूब गया.

वह भारी मन से उठा. उस का हाथ कमर में बंधी पोटली पर गया. 2 कंगन अभी भी सहीसलामत थे.

जनार्दन की तिजोरी में न जाने कितने गहने पड़े सड़ रहे थे. वह कुछ पल सोच कर बोला, ‘‘इधर आ.’’

वह लड़की जनार्दन के सामने आ कर खड़ी हो गई.

जनार्दन ने कंगन निकाल कर उस की कलाइयों में पहना दिए.

वह लड़की नानुकर करती रही, पर जनार्दन ने उसे मना ही लिया.

जब जनार्दन जाने लगा, तो वह मतवाली लड़की कंगन पहने हाथों को हिला कर उसे विदा कर रही थी. जनार्दन ने उस पर भरपूर नजर डाली और बोला, ‘‘बदमाश हिरनी…’’ Hindi Kahani

Story In Hindi: सतरंगी आसमान

Story In Hindi: अपनी सुहागरात पर साकेत काया के उभारों के बीच उगे बाल देख कर हैरान रह गया और उस का मूड खराब हो गया. इस के बाद साकेत और काया के बीच दूरियां बढ़ गईं. फिर काया की जिंदगी में सुशांतो आया जो उम्र में उस से कम था. आगे क्या हुआ?

सुबह के 7 बज गए थे. साकेत और काया की सुहागरात बीत चुकी थी. साकेत की आंखें खुलीं, तो उस के मन में एक उदासी थी. आमतौर पर लोग सुहागरात बीतने के अगले दिन बहुत खुश नजर आते हैं, पर साकेत का मूड पूरी तरह से उखड़ा हुआ था.

साकेत ने अनमने मन से बिस्तर छोड़ा और बाथरूम में घुस गया. फ्रैश हो कर बाहर आया तो देखा कि उस की पत्नी काया सकुचाई सी ड्रैसिंग टेबल के सामने खड़ी हो कर अपनी बिंदी सही कर रही थी.

साकेत ने काया पर एक उचटी हुई सी नजर डाली और डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ गया, जहां पर साकेत की मां नाश्ता लगा कर उस का इंतजार कर रही थीं.

साकेत ने जल्दीजल्दी नाश्ता किया और बाहर की ओर जाने लगा. मां के पूछने पर साकेत ने बताया कि उसे थोड़ा काम है, इसलिए बाहर जाना पड़ेगा.

साकेत तेजी से गाड़ी ड्राइव कर रहा था. पिछली रात को साकेत और काया की सुहागरात पर साकेत को कुछ ऐसा अनुभव हुआ था, जिस की कल्पना उस ने कभी नहीं की थी.

शादी के बाद पतिपत्नी एकदूसरे में पूरी तरह डूब जाना चाहते हैं, हर अंग को देख और जान लेना चाहते हैं और साकेत भी ऐसे मर्दों में से ही था. उस की आंखें काया की खूबसूरती को पूरी तरह से देख लेना चाहती थीं, पर काया अपने अंगों को बारबार सिकोड़ लेती थी और कमरे की लाइट बंद करने को कह रही थी.

पर साकेत तो टूट कर प्यार करना चाहता था और काया के सभी अंगों को चूम कर अपना प्यार जाहिर करना चाहता था, पर काया लगातार असहज हो रही थी और अपने दोनों हाथों से अपने उभारों को ढक ले रही थी, पर साकेत कुदरत की बनाई हुई इस खूबसूरत चीज के बीच डूब जाना चाहता था.

इसी सब में साकेत ने काया के दोनों हाथों को अपने हाथों के जोर से फैला दिया और काया के उभारों के बीच अपना चेहरा सटा दिया.

साकेत ने अपनी आंखों में काया के रूप को कैद करना शुरू कर दिया था और यही वह समय था, जब साकेत ने देखा कि काया के दोनों उभारों के बीच कुछ रोएं हैं और कुछ कालापन सा है, जो आमतौर पर सभी औरतों में नहीं होता.

पर चूंकि साकेत उस समय जिस्मानी रिश्ता बनाने के लिए उतावला हुआ जा रहा था, इसलिए उस ने कुछ नहीं पूछा, पर जब वह शांत हुआ, तब साकेत का सब से पहला सवाल यही था, ‘‘तुम्हारे उभारों के बीच रोएं और कालेपन का अजीब सा निशान कैसा है? ऐसा जो लगातार शेव करने के बाद आता है…’’

कुछ देर तक तो काया अनसुना कर के लेटी रही, पर जब साकेत बारबार वही सवाल दोहराता रहा, तो काया ने शरमाते हुए साकेत को बताया कि उस के उभारों के बीचोंबीच बाल हैं. उस ने काफी समय पहले यह समस्या अपनी मां से भी शेयर की थी, पर मां ने उसे चुप कराते हुए छोटे गले वाले सूट पहनने को कहा और सम झाया कि धीरेधीरे ये बाल अपनेआप गायब हो जाएंगे.

पर साकेत यह सब सुनना नहीं चाहता था. वह तो काया पर ही धोखाधड़ी का इलजाम लगाने लगा, ‘‘तो मु झे यह बात शादी से पहले क्यों नहीं बताई? मेरे साथ धोखा हुआ है.’’

काया और साकेत के बीच बातचीत में भी अब कड़वाहट घुलने लगी थी, पर काया, जो किशोरावस्था से ही उभारों के बीच बाल होने की समस्या से जूझती आ रही थी, अपने पति के ऐसे रिऐक्शन के लिए मानसिक रूप से पहले से ही तैयार थी.

28 साल की काया पेशे से एक एमबीबीएस डाक्टर थी. उस ने शांत स्वर में साकेत को सम झाया कि शरीर में कई जगह अनचाहे बाल होते हैं. कुछ लोगों में सीने के बीच रोएं होते हैं, तो कुछ में ये बड़े हो कर बाल का रूप धारण कर लेते हैं, जिन से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता, लेकिन आजकल हेयर रिमूवर, वैक्सिंग और लेजर तकनीक द्वारा शरीर के किसी भी हिस्से के अनचाहे बाल हटाए जा सकते हैं और वह भी ऐसा ही कोई साधन अपना लेगी.

साकेत ने काया की बात सुनी तो जरूर थी, पर छाती के बीच बाल वाली काया अब उस की आदर्श पत्नी नहीं रह गई थी.

साकेत और काया को 2 दिन बाद हनीमून के लिए मौरीशस जाना था, पर साकेत ने प्लान कैंसिल कर दिया था. मां ने वजह पूछी, तो साकेत ने काम ज्यादा होने और तबीयत सही न होने का बहाना बना दिया था.

काया ने बहुत सोचा और अपनी छुट्टियां रद्द कर दीं और अगले दिन से ही वह अस्पताल जाने लगी.

काया लखनऊ शहर के दीनदयाल उपाध्याय मैमोरियल अस्पताल में डाक्टर थी और वहां उस की इमेज बहुत अच्छी थी.

आज काया अस्पताल काम पर आई, तो उस ने दिनभर खूब मन से काम किया और रोज से ज्यादा समय दिया. शाम को 7 बजे वह घर चली गई.

रात को बिस्तर पर साकेत मुंह घुमा कर लेटा रहा. काया ने माहौल को नौर्मल करने के लिए उस से बात करना चाहा, पर साकेत शांत ही रहा.

काया ने धीरेधीरे साकेत के शरीर को सहलाना और चूमना शुरू किया. साकेत ने भी काया के शरीर को चूमा, पर ठीक तभी उस की नजर काया के उभारों के बीच के बालों पर पड़ गई और उस का मूड औफ हो गया.

काया के लिए छाती के बीच बालों का होना अब तक एक नौर्मल बात हो चुकी थी, पर साकेत के लिए तो यह एक बदसूरती की निशानी थी और इसीलिए उस ने काया से तलाक ले लेने की बात तक कह दी.

साकेत की यह बात सुन कर काया सन्न रह गई. वह कुछ न बोल सकी. अलबत्ता उस की आंखें जरूर डबडबा आई थीं.

काया के पिता तो उस के बचपन में ही गुजर गए थे. उन की जगह उस की मां ने नौकरी की और काया को पालपोस कर डाक्टर बनाया और उस के बाद कितने अरमानों से उस की शादी कराई थी और आज शादी के कुछ ही दिनों के बाद काया का पति उसे तलाक देने को कह रहा है. क्या गुजरेगी उस की मां पर…

अगली सुबह जब काया अस्पताल जाने के रास्ते में थी कि तभी उस के साथी डाक्टर वासुदेव आनंद का फोन आया, जो काया को जल्दी से अस्पताल आने के लिए कह रहे थे, क्योंकि 2 डाक्टर छुट्टी पर थे और अस्पताल में एक इमर्जैंसी केस आ गया था.

काया जल्दी से अस्पताल पहुंची तो उसे बताया गया कि 24 साल के एक नौजवान की नाक से बहुत खून निकल रहा है. फिलहाल डाक्टर वासुदेव आनंद ने प्राथमिक उपचार दे दिया है, बाकी की जांच और ट्रीटमैंट काया को करना होगा.

वह 24 साल का नौजवान बिस्तर पर लेटा हुआ था और उस के बगल में तकरीबन 50 साल का कोई शख्स खड़ा हुआ था.

काया ने नर्स को मरीज के कुछ जरूरी सैंपल लेने को कहा और मरीज से बातचीत करने लगी. इस बीच डाक्टर वासुदेव आनंद अपने राउंड पर चले गए थे.

काया ने नोटिस किया था कि उस नौजवान का शरीर देखने में काफी मजबूत लग रहा था.

‘‘आप इन के पिता हैं? जरूर इन की किसी से कोई लड़ाई हुई होगी,’’ काया ने उस पास खड़े आदमी की ओर देखते हुए पूछा, तो ट्रैक सूट पहने हुए उस आदमी ने बताया कि वह इस नौजवान का बौक्सिंग कोच है और सुशांतो नाम के इस लड़के को चोट भी मैच प्रैक्टिस के दौरान लगी थी.

इस बीच नर्स खून का सैंपल लेने आ गई थी. उस के सूई इंजैक्ट करते ही सुशांतो ने बड़ी जोर से मुंह बनाया मानो उसे बहुत दर्द हो रहा हो. उस की इस नाटकीयता पर काया मुसकराए बिना न रह सकी.

‘‘बौक्सिंग करते हो और एक छोटी सी सूई से डरते हो,’’ काया ने कहा.

‘‘अरे मैडम, पंच झेलना आसान है. पंच से डर भी नहीं लगता, मगर यह सूई उस से ज्यादा डराती है,’’ पहली बार सुशांतो कुछ बोला था.

सुशांतो की आवाज काफी भारी और रोबदार थी. काया ने एक बार फिर से सुशांतो के चेहरे की ओर देखा. कितना शांत चेहरा था सुशांतो का, मगर इस चोट ने फिलहाल किस तरह उस के चेहरे को बिगाड़ कर रख दिया था. बातचीत रोक कर काया बाकी की जांच करने लगी थी.

काया ने सुशांतो के कोच को बताया कि उसे सुशांतो को तकरीबन 48 घंटे के लिए अस्पताल में छोड़ना होगा और इस के बाद ही वह पूरी तरह से ठीक हो पाएगा. सुशांतो के कोच पूरी तरह आश्वस्त हो गए थे.

शाम को काया घर वापस आई तो उसे कमरे में बैठे साकेत के उतरे और खिसियाहट भरे चेहरे का सामना करना पड़ा. घर आते ही वही सब परेशानियां और शिकायतें.

अस्पताल में तो इतनी समस्याएं, बीमारियों से लड़ते मरीज और परेशानी झेलते उन के परिजन फिर भी सभी के मन में एक उम्मीद होती है कि एक दिन वे अपने मरीज को ठीक होता देखेंगे और उसे अपने घर ले जा सकेंगे, पर काया की जिंदगी में तो कुछ ऐसी समस्या आ चुकी थी, जिस का इलाज तो फिलहाल काया को भी समझ नहीं आ रहा था.

काया ने 1-2 बार साकेत से बोलने की कोशिश की, पर वह काया से बात नहीं करना चाहता था.

बिस्तर पर भी साकेत करवट ले कर ही लेटा रहा. ने काया के उभारों के बीच बालों की बात को उस के साथ हुआ धोखा सम झ लिया था और उभारों के बीच बालों की मौजूदगी उसे प्यार के समंदर में उतरने से पहले ही पस्त कर दे रही थी.

अगले दिन जब काया अस्पताल में सुशांतो के पास पहुची तो सुशांतो बिस्तर पर लेटा हुआ मोबाइल चला रहा था.

‘‘तुम लोग मोबाइल में कितना लगे रहते हो न…’’ काया ने मुसकराते हुए कहा, तो सुशांतो ने बड़े स्टाइल से झट से मोबाइल को तकिए के नीचे छिपा लिया.

काया और सुशांतो के बीच बातचीत बढ़ने लगी थी. सुशांतो उत्तर प्रदेश के तराई इलाके का रहने वाला था. उस के पिता एक प्राइवेट जौब करते थे. उस के घर में एक छोटी बहन भी थी.

पिता चाहते थे कि सुशांतो कोई नौकरी कर ले जिस से घर का खर्चा चले, पर सुशांतो तो फिटनैस फ्रीक था. उस की लगन देखते हुए उस के कालेज के स्पोर्ट्स टीचर ने उसे लखनऊ जा कर बौक्सिंग में कैरियर बनाने को कहा और तभी से वह लखनऊ में केडी सिंह बाबू स्टेडियम में बौक्सिग सीख रहा था.

‘‘आप के आते ही यह कमरा फूलों की खुशबू से भर जाता है डाक्टर मैडम. यह किस परफ्यूम की खुशबू है?’’ बड़े ही अलग अंदाज में सुशांतो ने यह सवाल पूछा, तो काया को थोड़ा अजीब लगा.

काया ने सुशांतो के चेहरे को देखा तो उस के चेहरे पर एक मासूम भोलापन था.

‘‘मेरा मतलब है कि आप का आना मु झे बहुत अच्छा लगता है और सच कहूं, तो आप भी मु झे बहुत अच्छी लगती हैं,’’ एक सांस में कह गया था सुशांतो.

काया बोली, ‘‘एक शादीशुदा डाक्टर से ऐसी बातें करना अच्छी बात नहीं,’’ कहते हुए वह कमरे से बाहर निकल गई और लौबी में रखे एक्वेरियम के पास आ कर खड़ी हो गई. वह रंगबिरंगी मछलियों को देखने लगी.

सभी मछलियां पानी में तैरती हुईं बिना किसी तनाव के औक्सीजन के बुलबुलों से अठखेलियां कर रही थीं. काया ने एक लंबी सांस छोड़ी और अपने केबिन की ओर बढ़ गई.

सुशांतो को आज डिस्चार्ज होना था. उस के कोच उसे लेने आ गए थे.

‘‘अब तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी. चोट पूरी तरह से ठीक है और अगर समस्या हो तो डायरैक्ट मु झ से बात कर सकते हो,’’ काया ने अपना मोबाइल नंबर देते हुए हुए कहा था.

काया घर आई तो उस की सास ने उसे बताया कि साकत को औफिस के काम से 3-4 दिन के लिए बैंगलुरु जाना पड़ गया.

‘‘अचानक… साकेत कम से कम एक मैसेज तो कर सकता था…’’ काया बुदबुदा उठी.

फिर काया बिस्तर पर लेट गई. उस के जेहन में एक्वेरियम वाली मछलियां घूम रही थीं. तैरती हुईं, आजाद, औक्सीजन के बुलबुलों से अठखेलियां करती हुईं.

अगले दिन ‘डाक्टर्स डे’ था. काया के मोबाइल पर कुछ मैसेज आए थे. काया ने देखा कि ये मैसेज उसे सुशांतो ने किए थे, जिन में उस ने ‘डाक्टर्स डे’ विश करते हुए डाक्टरों की तारीफ के बारे में बहुतकुछ लिखा था… ‘और एक औरत का डाक्टर होना और भी माने रखता है, क्योंकि वह घर और बाहर दोनों जगह के मरीजों को अच्छी तरह से डील करना जानती है…’

काया प्रशांतो का मैसेज पढ़े जा रही थी, जिस में आगे लिखा हुआ था, ‘मेरे बौक्सिंग स्किल से खुश हो कर मेरे कोच आज मु झे नई बाइक दिला रहे हैं. अगर आज आप इस मरीज के लिए थोड़ा समय निकाल सको, तो इस मरीज की तबीयत और भी अच्छी हो जाएगी…’

काया ने मैसेज पढ़ कर खुशी महसूस की और उस का रिप्लाई कर दिया, ‘ओके, आज शाम को 5 बजे मिलते हैं.’

शाम को पौने 5 बजे ही सुशांतो का फोन आ गया. वह बाहर काया का इंतजार कर रहा था.

लाल और काले रंग की स्पोर्ट्स बाइक की सीट पर शान से बैठा हुआ प्रशांतो बहुत हैंडसम दिख रहा था. काया बाइक की सीट पर बैठ गई.

प्रशांतो ने बाइक को थोड़ा आगे बढ़ाया और फिर बाइक की रफ्तार बढ़ा दी. काया के रेशमी बाल हवा में लहराने लगे थे और सड़क पर प्रशांतो सब को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ता जा रहा था.

अचानक से जब भी प्रशांतो को ब्रेक लेना पड़ता, तो काया के उभार प्रशांतो की पीठ से टकरा जा रहे थे. प्रशांतो को भी इस बात का अहसास हो रहा था और शायद इसीलिए अब वह बारबार ब्रेक लगाने लगा था.

कुछ देर बाद प्रशांतो ने ‘विबग्योर म्यूजिकल फाउंटेन’ के पास बाइक रोक दी, जहां रंगबिंरगा पानी संगीत की लय के साथ झूम रहा था. गीत के बोल थे, ‘तेरे हाथ में मेरा हाथ हो, सारी जन्नतें मेरे साथ हों…’

गीत ने रोमांटिक माहौल बना दिया था. प्रशांतो ने काया के नरम हाथों को अपने हाथों में ले लिया और
सहलाने लगा.

काया ने भी कोई विरोध नहीं किया. उस के अंदर की डाक्टर इस समय दरकिनार हो गई थी और उस के अंदर की औरत की इच्छाएं बलवती हो रही थीं. दोनों कुछ देर हाथ में हाथ डाले बैठे रहे, पर अचानक आए फोन ने दोनों की इस प्रेम तंद्रा को भंग किया.

काया झट से खड़ी हो गई. उधर से साकेत की आवाज थी, ‘तुम ने अपने शरीर की इस बीमारी को मु झ से छिपाया और मु झ से शादी कर के मु झे धोखा दिया. मैं तुम्हारे साथ और नहीं रह सकता. मुझे तुम से तलाक चाहिए,’ इस के बाद साकेत ने फोन काट दिया था.

साकेत की कड़वी बातें सुन कर काया काफी दुखी हो गई. उसे इस समय किसी साथी की तलाश महसूस हो रही थी. उसे न जाने क्या महसूस हुआ कि वह अपनी उम्र से छोटे प्रशांतो के सीने से लग गई.

एक डाक्टर और मरीज का रिश्ता अचानक सतरंगी हो चला था. आसपास के लोग अजीब नजरों से प्रशांतो और काया को देख रहे थे, पर उन दोनों को अब किसी की परवाह नहीं थी.

काया को घर जा कर नींद नहीं आई. वह एक दोराहे पर खड़ी थी. एक तरफ उस का पति था जो उस से नफरत करता था, दूसरी तरफ प्यार से लबरेज प्रशांतो था… पर क्या उस से कम उम्र का प्रशांतो अल्हड़ या फिर मौकापरस्त तो नहीं था? काया रातभर सोचती रही थी और सुबह होतेहोते वह किसी नतीजे पर भी पहुंच गई थी.

अगली सुबह अस्पताल से ही काया ने प्रशांतो को मैसेज किया, ‘आज मेरा बर्थडे है. मु झे विश नहीं करोगे?’

यह मैसेज पढ़ते ही प्रशांतो खुशी से झूम उठा और ताबड़तोड़ बधाई संदेश और शेरोशायरी भेजने लगा.
‘इन सब की जरूरत नहीं है, शाम को मिल कर केक काटते हैं,’ काया ने मैसेज किया.

प्रशांतो ने ‘थम्सअप’ का इमोजी देते हुए ‘ओके’ का मैसेज भेज दिया.

शाम को प्रशांतो बाइक ले कर पहले से ही खड़ा था. बाइक पर बैठते ही काया ने प्रशांतो को बाइक होटल ‘गोमती राइम्स’ की तरफ मोड़ने को कहा.

गूगल मैप पर लोकेशन देखने के बाद प्रशांतो ने बाइक को उसी दिशा में मोड़ दिया.

तकरीबन 20 मिनट के बाद वे दोनों होटल ‘गोमती राइम्स’ के अंदर थे, जहां पर काया ने खुद ही केक वगैरह का इंतजाम पहले से करा रखा था. यह एक खूबसूरत सा कमरा था, जो हनीमून कपल्स के लिए रिजर्व रखा जाता है.

उन दोनों ने केक काटा और प्रशांतो ने कुछ लाइनें भी बोलीं, जिन्हें वह पहले से लिख कर लाया था, ‘‘काया, तुम से मिलने के बाद तन्हाइयां मु झे भाती हैं, हर तरफ तुम्हारी परछाइयां नजर आती हैं. तुम दुनिया में सब से खूबसूरत हो, तुम्हारे आगे परियां भी कमतर नजर आती हैं.’’

कविता की लाइनें खत्म होते ही काया रोमांचित हो गई थी और प्रशांतो के गले लग गई और उस के मजबूत बदन को सहलाने लगी.

प्रशांतो की नसों में बहता खून लावा बनने लगा था और उस की सांसें भी तेज चलने लगी थीं. प्रशांतो के होंठ आगे बढ़े और काया के होंठों से टकरा गए. वे दोनों एकदूसरे की सांसों की खुशबू महसूस करने लगे थे.

काया ने पूरी तरह से खुद को प्रशांतो के हवाले कर दिया था. काया के बदन से कपड़े अलग हो चुके थे. प्रशांतो के हाथ कभी काया के उभारों को सहलाते तो कभी उन के बीच उगे रेशमी बालों को. कभीकभार प्रशांतो उन बालों को चूम भी लेता था.

काया ने अधखुली मदहोश आंखों से देखा कि प्रशांतो की नजरें उस के उभारों के बालों पर बारबार जा रही थीं, पर उन नजरों उदासी नहीं थी, बल्कि प्यार झलक रहा था.

कमरा दहक चला था. दोनों ने अपनीअपनी मंजिल पा ली थी.

‘‘मेरे इन बालों से तुम्हे नफरत नहीं हुई?’’ धीरे से काया ने पूछा.

‘‘जहां असली प्यार होता है, वहां नफरत के लिए कोई जगह नही होती. और फिर ये बाल तो तुम्हारे रूप की रेशमी परछाइयां हैं. इन्हें तो और प्यार करने की जरूरत है. इन्हें कभी मत हटाना,’’ प्रशांतो ने बालों को सहलाते हुए कहा.

‘‘शादी करोगे एक तलाकशुदा से?’’ काया ने पूछा.

‘‘मेरे जैसे आदमी को एक डाक्टर से अच्छी पत्नी कहां मिलेगी…’’ प्रशांतो ने कहा.

उस दिन के बाद होटल ‘गोमती राइम्स’ का यह कमरा कई बार उन दोनों के प्यार का गवाह बना.

काया ने अपने उभारों के बालों को किसी भी तरीके से रिमूव करना छोड़ दिया था, क्योंकि प्रशांतो को वह सब पसंद थी. किसी भी हार्मोनल गड़बड़ी के चलते आए जिस्मानी बदलाव को वह कमी नहीं मानता था.

उस दिन काया घर पर थोड़ी देर से पहुंची, तो साकेत घर पर नहीं था. काया ने अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया था और मैसेज कर के साकेत को बता दिया कि अब वह उस की नफरत और नही सहेगी, क्योंकि वह उसे तलाक देने के लिए तैयार है.

काया ने अपने मैसेज में लिखा, ‘मैं किसी और रूप में किसी और के साथ अपनी नई जिंदगी की तरफ कदम बढ़ाने जा रही हूं. किसी ऐसे के साथ जो मेरे इन बालों की रेशमी परछाइयों को प्यार करेगा, नफरत नहीं.’

इस के बाद काया ने मैसेज भेज दिया था. काया बाहर खड़े प्रशांतो की बाइक पर आ कर बैठ गई. वे दोनों
अपने अरमानों एक नए आसमान की तरफ बढ़े चले जा रहे थे, एक सतरंगी आसमान की तरफ. Story In Hindi

Hindi News Story: दिल्ली की मेयर और जोहरान ममदानी

Hindi News Story: दिल्ली में गुलाबी ठंड शुरू हो चुकी थी, पर अभी भी दीवाली के बाद की घुटनभरी प्रदूषित हवा का गुबार दिल्ली का पीछा नहीं छोड़ रहा था. ऊपर से लालकिला बम धमाके ने दिल्ली और पूरे देश को दहला दिया था. उधर, जेएनयू छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी के मुकाबले वामपंथी गुट ने चारों सीटें जीत ली थीं. दिल्ली नगरनिगम के उपचुनाव भी खामोशी से आगे बढ़ रहे थे.

अनामिका अपने कमरे की बालकनी में अखबार पढ़ रही थी. कल रात से विजय भी उसी के साथ था. कल की रात उन दोनों ने बड़ी मस्ती के साथ बिस्तर पर गुजारी थी.

विजय अभी भी सो रहा था. अनामिका सोच रही थी कि दिल्ली की इस बदहाली को क्या दिल्ली का मेयर सुधार सकता है? फिर उसे लगा कि वह आईएएस बन सकती है और मौका मिला तो उसे दिल्ली की मेयर की सीट पर भी अपनी नजर रखनी होगी.

यह सोच कर अनामिका जोश में आ गई और सीधा कमरे में गई. उस ने अपनी एक चुन्नी को माइक की तरह पकड़ा और आईने के सामने चिल्लाने लगी, ‘‘अगर मुझे दिल्ली का मेयर बनने का मौका मिला, तो मैं यहां सुधार के तमाम काम करा दूंगी. आप मुझे एक मौका दें…’’

‘‘यह सुबहसुबह क्या नौटंकी है? क्यों मेरी नींद खराब कर रही हो?’’ विजय ने आंख मसलते हुए पूछा.

‘‘तुम यहां सो रहे हो और दिल्ली को उस की नई मेयर मिल गई है,’’ अनामिका ने हंसते हुए कहा. ‘‘अब यह क्या नया शिगूफा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘यार, मैं सोच रही हूं कि पार्षद का चुनाव लड़ कर दिल्ली की मेयर बन जाऊं,’’ अनामिका बोली.

‘‘मतलब, तुम राजनीति के दलदल में कदम रखना चाहती हो?’’ विजय अब भी हैरान था.

‘‘तो क्या हुआ… मैं पढ़ीलिखी हूं, तर्क के साथ बात करने की तमीज है मुझ में, तो मैं क्यों नहीं दिल्ली की मेयर बन सकती?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘शायद तुम भूल गई हो कि चाहे चुनाव पंच का हो या सांसद का, भारत में आज भी वोट जाति और धर्म के नाम पर दिए जाते हैं,’’ विजय बिस्तर छोड़ कर बोला.

‘‘मतलब?’’ अनामिका हैरान हो कर बोली.

‘‘अरे यार, क्या तुम नहीं जानती अपनी जाति के बारे में… मुझ जैसे कुछ लोग तुम्हें जरूर वोट दे देंगे, पर दूसरे लोगों को जाति और धर्म के प्रपंच से कैसे बाहर निकाल पाओगी?

तुम्हारे बिहार के ही विधानसभा चुनाव देख लो. वहां भी धर्म और जाति का बोलबाला रहा. उम्मीदवार की जाति देख कर टिकट दिए गए,’’ विजय ने कहा.

‘‘पर यार, ऐसे तो अच्छे लोग राजनीति में कभी आ ही नहीं पाएंगे,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर पहले तुम यह तो बताओ कि तुम पर सुबहसुबह दिल्ली की मेयर बनने का भूत कैसे चढ़ गया?’’ विजय ने पूछा.

‘‘जोहरान ममदानी ने मेरा जोश बढ़ाया है. जब से वे न्यूयौर्क के मेयर बने हैं, मुझे भी लगता है कि दिल्ली की मेयर मैं बन जाऊं,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘ओह, तो यह मामला है. न्यूयौर्क से चली हवा दिल्ली तक आ गई है,’’ विजय बोला.

‘‘अरे भई, खरबूजे को देख कर ही तो खरबूजा रंग बदलता है. फिर जोहरान ममदानी में क्या कमी है… बंदा डंके की चोट पर मेयर बना और आते ही उस ने अपने तेवर दिखा दिए हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम जोहरान ममदानी के बारे में जानती ही क्या हो? कौन है वह बंदा जो तुम इतना जोश में आ गई हो?’’ विजय ने चिढ़ते हुए पूछा.

‘‘जोहरान ममदानी के बारे में मैं ने खबरों में काफी खंगाला है. वे एक शिया मुसलिम युगांडाई स्कौलर महमूद ममदानी और भारत की मशहूर फिल्मकार मीरा नायर के बेटे हैं. वैसे, महमूद ममदानी के पूर्वज भी भारतीय हैं. मीरा नायर भारत में एक हिंदू परिवार से हैं.

‘‘तुम ने मीरा नायर की बनाई गई कुछ चुनिंदा फिल्मों के बारे में तो सुना ही होगा, जैसे ‘सलाम बौम्बे’, ‘मानसून वैडिंग’, ‘द नेमसेक’, कामसूत्र-द टेल औफ लव और ‘मिसिसिपी मसाला’. ‘मानसून वैडिंग’ तो मेरी पसंदीदा फिल्मों में आती है,’’ अनामिका बोली.

‘‘और क्या जानती हो तुम जोहरान ममदानी के बारे में? सिर्फ मां के नाम पर तो कोई बड़ा नेता नहीं बन जाता है न…’’ विजय बोला.

‘‘तुम ने सही कहा. चलो, अब तुम्हें मैं जोहरान ममदानी के बारे में थोड़ा तफसील से बताती हूं. उन का जन्म 18 अक्तूबर, 1991 को युगांडा देश के कंपाला इलाके में हुआ था. उन का बचपन युगांडा, दक्षिण अफ्रीका और न्यूयौर्क में बीता.

‘‘अमेरिका में उन्होंने साल 2014 में बौडौइन कालेज से अफ्रीकाना स्टडीज में डिगरी हासिल करने से पहले बैंक स्ट्रीट स्कूल फौर चिल्ड्रन और ब्रोंक्स हाईस्कूल औफ साइंस में पढ़ाई की थी.

‘‘साल 2017 में जोहरान ममदानी राजनीतिक और सामाजिक संगठन ‘डैमोक्रैटिक सोशलिस्ट्स औफ अमेरिका’ में शामिल हो गए थे. उन्होंने साल 2020 में न्यूयौर्क राज्य विधानसभा के लिए चुनाव जीता था, जहां उन्होंने क्वींस के 36वें जिले की नुमाइंदगी की थी.

‘‘फिर वे साल 2022 और साल 2024 के चुनावों में निर्विरोध चुने गए थे. अपने कार्यकाल के दौरान ममदानी ने 20 विधेयकों का समर्थन किया था, जिन में से 3 कानून बन गए थे.

‘‘इतना ही नहीं, जोहरान ममदानी पर अपनी मां मीरा नायर के कला व्यवसाय का भी काफी असर रहा है. वे एक हिपहौप कलाकार भी रह चुके हैं, जो ‘यंग कार्डेमम’ या ‘मिस्टर कार्डेमम’ के नाम से जाने जाते हैं.

‘‘जोहरान ममदानी ने साल 2018 में अमेरिकी नागरिक के रूप में नागरिकता हासिल की थी और इसी साल उन्होंने सीरियाईअमेरिकी कलाकार रमा दुवाजी से शादी की है,’’ अनामिका ने बताया.

थोड़ा रुक कर अनामिका ने आगे बताया, ‘‘34 साल के जोहरान ममदानी ने अपने जबरदस्त अभियान के दम पर यह जीत हासिल की है. वे जब क्वींस से असैंबली मैंबर थे, तब उन्होंने अपने शहर के टैक्सी ड्राइवरों के लिए भूख हड़ताल की थी.

‘‘साल 2021 में 30 साल के ममदानी सिटी हाल पार्क में खड़े हुए और उन्होंने घोषणा की कि वे न्यूयौर्क शहर के टैक्सी ड्राइवरों को कर्ज से राहत दिलाने के लिए शहर के अफसरों पर दबाव डालने के लिए उपवास करेंगे.

‘‘उस समय, उन्हें पद संभाले हुए एक साल से भी कम समय हुआ था. यह हड़ताल टैक्सी मैडेलियन लोन से होने वाले भारी कर्ज के जवाब में की गई थी, जिस ने कई ड्राइवरों को मालीतौर पर बरबाद कर दिया था और कुछ को तो खुदकुशी करने पर भी मजबूर कर दिया था.’’

‘‘तुम्हें पता है न कि जोहरान ममदानी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में क्या कहा था?’’ विजय ने अनामिका से पूछा.

‘‘क्या उन्होंने कुछ गलत कहा था?’’ अनामिका बोली, ‘‘हां, चुनाव जीतने ने बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के बारे में अपने विचार रखते हुए कहा था कि आप के सामने खड़े हो कर मैं जवाहरलाल नेहरू के शब्दों के बारे में सोचता हूं कि एक ऐसा क्षण आता है, जब हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाते हैं. जब एक युग का अंत होता है और लंबे समय से दमित राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है. आज रात हम ने पुराने से नए युग में कदम रख लिया है.’’

यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘पर जोहरान ममदानी ने न्यूयौर्क शहर के मेयर पद के अपने प्रचार अभियान के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ले कर विवादास्पद बयान दिया था.

‘‘एक मेयर फोरम के दौरान उन्होंने कहा था कि मोदी को उसी तरह देखा जाना चाहिए, जैसे लोग इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को देखते हैं.
‘‘जब उन से यह सवाल पूछा गया कि अगर नरेंद्र मोदी न्यूयौर्क आएं, तो क्या वे उन से मुलाकात करेंगे, तो उन्होंने कहा था कि यह व्यक्ति (नरेंद्र मोदी) एक युद्ध अपराधी है.

‘‘जोहरान ममदानी ने यह भी कहा था कि उन के पिता का परिवार भारत के गुजरात राज्य से है. यह वही राज्य है जहां 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान तकरीबन 1,000 मुसलमानों की मौत हुई थी.

‘‘उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय मोदी की सरकार ने इन घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए. नरेंद्र मोदी ने गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा को इस हद तक बढ़ावा दिया कि आज कई लोग मानते हैं कि वहां अब मुसलमान बचे ही नहीं हैं.’’

‘‘पर किसी नेता को दूसरे नेता के बारे में अपने विचार रखने का हक है…’’ अनामिका बोली,’’ उन्होंने तो डोनाल्ड ट्रंप पर भी निशाना साधा था. उन्होंने कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप को अगर कोई हराने का तरीका दिखा सकता है, तो वह शहर ही है, जिस ने उन्हें जन्म दिया है.

‘‘अगर किसी तानाशाह को डराने का कोई तरीका है, तो वह उन हालात को खत्म करना है, जिन्होंने उसे सत्ता हासिल करने में मदद की. ममदानी ने ट्रंप पर अमेरिका को धोखा देने का आरोप लगाया.

‘‘और तुम यह क्यों नहीं समझ रहे हो कि न्यूयौर्क और न्यूजर्सी वे शहर हैं, जहां भारतीय अच्छीखासी तादाद में रहते हैं. अमेरिका में सब से ज्यादा भारतीय न्यूयौर्क में ही रहते हैं. तुम्हें नहीं लगता कि न्यूयौर्क और न्यूजर्सी जैसे शहरों में हारना डोनाल्ड ट्रंप के लिए सीधा मैसेज है.

‘‘भारतीयों का वोट उन्हें पाना है, तो भारत के प्रति सौफ्ट रहना होगा. ट्रंप अगर यह सोच रहे हैं कि भारत के खिलाफ कड़ा रुख अपना कर वे चुनाव जीत लेंगे, तो यह नहीं हो सकता.’’

‘‘मुझे तो यह दूर के ढोल सुहावने जैसे लगने वाली बात लगती है. डोनाल्ड ट्रंप बहुत ही माहिर खिलाड़ी हैं.
वे जोहरान ममदानी को इतनी आसानी से राजनीति नहीं करने देंगे,’’ विजय बोला.

‘‘तुम जोहरान ममदानी के नाम पर इतना उखड़ क्यों रहे हो? बात मेरे मेयर बनने के सपने को ले कर शुरू हुई थी. वैसे भी जब तक हम सपने नहीं देखेंगे, तब तक उन्हें पूरा करने की ताकत कैसे आएगी?

‘‘माना कि भारत में धर्म और जातिवाद के नाम पर सियासत की जाती है और नेता चुने जाते हैं, पर अभी भी इतना अंधेरा नहीं हुआ है, जितना तुम सोच रहे हो. मैं मेयर बनूं या न बनूं, पर मुझे यह तो समझ आया है कि सियासत की राह कभी भी आसान नहीं होगी.’’

‘‘अनामिका, मेरा वह मतलब नहीं था. तुम बहुत होशियार हो, पढ़ीलिखी हो और तुम में जनता के दुखदर्द को समझ सकने की काबीलियत है, पर यह काम तो तुम आईएएस बन कर भी कर सकती हो,’’ विजय ने कहा.

‘‘तुम्हारी बात में दम है. पर मुझे मौका मिला तो मैं दिल्ली की मेयर जरूर बनूंगी. फिर देखना कैसे मैं दिल्ली का सुधार करती हूं,’’ अनामिका ने हंसते हुए कहा.

‘‘ठीक है, पर अब जरा हम फ्रैश हो कर कौफी पीने चलें, क्योंकि इस गरमागरम बहस के बाद मुझे कौफी पीने की तलब लग गई है,’’ विजय बोला.

‘‘नेकी और पूछपूछ… जल्दी चलो और मुझे भी मस्त सी कौफी पिलवाओ,’’ अनामिका ने विजय के गले में अपनी बांहें डालते हुए कहा और उसे प्यार से चूम लिया. Hindi News Story

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