तांत्रिक की हैवानियत के शिकार दो मासूम

देश की राजधानी दिल्ली के जामियानगर में स्थित है जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी. उर्दू में जामिया का मतलब है यूनिवर्सिटी और मिलिया का मतलब है मिल्लत यानी समूह. ब्रिटिश शासन में स्थापित इस यूनिवर्सिटी को एक साल पहले भारत की बेस्ट यूनिवर्सिटी सर्वे में 8वां स्थान हासिल हुआ था.

इस यूनिवर्सिटी में देश के अलगअलग हिस्सों से छात्र तालीम हासिल करने आते हैं. युवा सद्दाम और बाबर उर्फ हैदर ने भी एक साल पहले यहां पढ़ने के लिए दाखिला लिया था. दोनों ही पढ़ने में होशियार थे.

सद्दाम और बाबर उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ के थाना मुंडाली के गांव जिसौरा के रहने वाले थे. उन के गांव के कुछ और लड़के यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे, इस लिहाज से उन्हें वहां दाखिला ले कर रहने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी. 19 साल के बाबर और 18 साल के सद्दाम के पिता मोहम्मद मुन्नर और कलवा गांव के आर्थिक रूप से समृद्ध किसानों में थे.

वे चाहते थे कि बच्चे तालीम से ऊंचा दर्जा हासिल करें. बाबर डौक्टर बनना चाहता था और सद्दाम इंजीनियर. साप्ताहिक अवकाश पर सद्दाम और बाबर अपने घर आ जाया करते थे. 8 अप्रैल, 2017 को दोनों गांव आए थे. अगले दिन रविवार था. छुट्टी का पूरा दिन घर में बिता कर 10 तारीख की दोपहर करीब 3 बजे दोनों घर से दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे.

दोनों के ही परिवारों में अच्छे संबंध थे. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि वे दोनों दिल्ली एक साथ गए थे, बल्कि हर बार वे इसी तरह आतेजाते थे. हर बार दोनों दिल्ली पहुंच कर घर वालों को फोन कर के कमरे पर पहुंचने की बात बता देते थे.

लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हुआ तो दोनों के ही घर वालों को चिंता हुई. यह चिंता इस बात से और भी बढ़ गई थी कि दोनों के मोबाइल स्विच्ड औफ बता रहे थे. हौस्टल में उन के साथ रहने वाले लड़कों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि दोनों वहां पहुंचे ही नहीं हैं.

बाबर और सद्दाम को ज्यादा से ज्यादा 3 घंटे में अपने कमरे पर पहुंच जाना चाहिए था. देर रात तक दोनों कमरे पर नहीं पहुंचे तो आखिर कहां लापता हो गए. जब सद्दाम और बाबर के बारे में कुछ नहीं पता चला तो रात में ही उन के घर वाले दिल्ली पहुंच गए.

रास्ते में भी वे पूछताछ करते रहे कि कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हुई थी. लेकिन ऐसा कुछ पता नहीं चला. थकहार कर वे लौट गए. नातेरिश्तेदारों से भी पता किया गया, लेकिन कुछ पता नहीं चला. अगले दिन भी किसी की चिंता कम नहीं हुई, क्योंकि दोनों के मोबाइल अभी तक बंद थे.

सभी को रहरह कर अनहोनी की आशंका सता रही थी. कोई नहीं जानता था कि आखिर दोनों के साथ हुआ क्या है? दिन के 11 बज रहे थे, बाबर के पिता मुन्नर के पास फोन आया. मोबाइल स्क्रीन पर नंबर बाबर का ही दिखाई दिया था, इसलिए उन्होंने तुरंत फोन रिसीव किया, ‘‘हैलो बेटा, कहां हो तुम?’’

उन्हें झटका तब लगा, जब दूसरी ओर से बाबर के बजाय किसी अन्य की गुर्राहट भरी आवाज उभरी, ‘‘ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है मियां, बाबर हमारे कब्जे में है.’’

गुर्राहट भरी आवाज सुन कर मुन्नर के पैरों तले से जमीन खिसक गई. डरते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘तुम कौन बोल रहे हो भाई?’’

‘‘यह जान कर तुम क्या करोगे? बस इतना समझ लो कि हम अच्छे लोग नहीं हैं. तुम्हारा बेटा हमारे कब्जे में हैं. उसे सकुशल वापस पाना चाहते हो तो फटाफट 80 लाख रुपयों का इंतजाम कर लो. अगर ऐसा नहीं किया तो अंजाम भुगतने को तैयार रहो.’’

‘‘लेकिन…’’ मुन्नर ने कुछ कहना चाहा तो फोन करने वाले ने सख्त लहजे में कहा, ‘‘हमें ज्यादा सवाल सुनने की आदत नहीं है. रकम भी हम ने सोचसमझ कर मांगी है. अब यह तुम्हें तय करना है कि बेटा चाहिए या दौलत?’’

इस के बाद एक लंबी सांस ले कर फोन करने वाले ने आगे कहा, ‘‘और हां, किसी तरह की चालाकी करने की कोशिश मत करना, वरना बेटा नहीं, उस के शरीर के टुकड़े मिलेंगे. तुम रकम का इंतजाम करो, हम तुम्हें दोबारा फोन करेंगे.’’

इतना कह कर उस ने फोन काट दिया. फोन करने वाला कौन था? यह तो वह नहीं जानते थे, लेकिन उस की बातों में ऐसी धमक थी, जिस ने मुन्नर को अंदर तक दहला कर रख दिया था. वह समझ गए कि सद्दाम और बाबर का फिरौती के लिए किसी ने अपहरण कर लिया है.

मुन्नर सद्दाम के पिता से मिलने उन के घर पहुंचे तो वह सिर थामे बैठे थे. क्योंकि तब तक उन के पास भी 80 लाख रुपए की फिरौती के लिए उन के बेटे के ही मोबाइल से फोन आ चुका था. घर वालों ने मोबाइल नंबरों पर पलट कर फोन करने की कोशिश की, लेकिन वे स्विच्ड औफ हो चुके थे. घर वालों ने देर किए बगैर इस की सूचना पुलिस को देना उचित समझा.

बाबर और सद्दाम के पिता कुछ लोगों को साथ ले कर एसपी (देहात) श्रवण कुमार सिंह से जा कर मिले और उन्हें घटना के बारे में बताया. श्रवण कुमार सिंह के आदेश पर थाना मुंडाली में अज्ञात लोगों के खिलाफ दोनों छात्रों सद्दाम और बाबर के अपहरण का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. मामला गंभीर था, इसलिए पुलिस तुरंत काररवाई में लग गई. थानाप्रभारी अजब सिंह ने तुरंत इस मामले की जांच शुरू कर दी.

एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ ने श्रवण कुमार सिंह के निर्देशन और सीओ विनोद सिरोही के नेतृत्व में पुलिस टीमें गठित कर अपहरण के खुलासे के लिए लगा दीं. विनोद सिरोही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले भी तैनात रहे हैं, इसलिए अपराध और अपराधियों पर उन की गहरी पकड़ थी. अगले दिन एक पुलिस टीम दिल्ली रवाना हुई, जहां दोनों छात्रों के साथियों अब्दुल कादिर और मेहरात से पूछताछ की गई.

लेकिन उन से कोई सुराग नहीं मिला. इस बीच पुलिस ने दोनों छात्रों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स और अंतिम लोकेशन हासिल कर ली थी. मोबाइल नंबरों के रिकौर्ड के अनुसार, सद्दाम और बाबर की लापता होने वाले दिन की अंतिम लोकेशन नोएडा शहर की पाई गई थी. फिरौती के लिए जो फोन किए गए थे, वे नोएडा से ही किए गए थे.

अपहर्त्ताओं तक पहुंचने के लिए पुलिस के पास मोबाइल ही एकमात्र जरिया था. अपहर्त्ता काफी चालाक थे. वे बात करने के लिए सद्दाम और बाबर के ही मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे थे. पुलिस टीमें संदिग्ध स्थानों के लिए रवाना हो गई थीं.

12 अप्रैल की सुबह अपहर्त्ता ने मुन्नर को एक बार फिर फोन किया. इस बार फोन किसी अन्य नंबर से किया गया था. उस ने सीधे मतलब की बात कही, ‘‘रकम तैयार रखना, डील होते ही तुम्हारे बच्चों को छोड़ दिया जाएगा.’’

‘‘हम तैयार हैं, बताओ रकम कहां पहुंचानी है?’’

‘‘इस बारे में हम तुम्हें दोपहर को फोन कर के बताएंगे.’’ कह कर अपहर्त्ता ने फोन काट दिया.

यह नंबर भी पुलिस को दे दिया गया था. 4 दिन बीत चुके थे, लेकिन पुलिस को कोई सफलता नहीं मिली. अपहर्त्ता फोन कर के तुरंत मोबाइल फोन बंद कर देते थे, इसलिए पुलिस को उन की सटीक लोकेशन नहीं मिल पा रही थी. लेकिन यह जरूर पता चल गया था कि मोबाइल फोन से जो फोन किए जा रहे हैं, वे नोएडा के सैक्टर-63 से किए जा रहे हैं.

पुलिस ने बाबर के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स खंगाली तो उस में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उस की लापता होने से पहले बातें हुई थीं. उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर नोएडा के छिजारसी गांव के रहने वाले मौलाना अयूब का निकला. उस के बारे में पता किया गया तो पता चला कि वह एक मदरसे में बच्चों को दीनी तालीम दिया करता था, साथ ही वह तंत्रमंत्र भी करता था.

अयूब उसी जिसौरा गांव का रहने वाला था, जहां के बाबर और सद्दाम रहने वाले थे. कुछ सालों पहले अयूब नोएडा जा कर बस गया था. उस के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर चैक की गई तो पता चला कि उस का संपर्क हैदर नामक एक युवक से था.

इस के बाद पुलिस ने हैदर के बारे में पता किया तो पता चला कि वह भी जिसौरा गांव का ही रहने वाला था. वह गाजियाबाद में टैंपो चलाता था. खास बात यह थी कि अयूब और हैदर की लोकेशन सद्दाम और बाबर के लापता होने वाली शाम को एक साथ थी.

इन सभी तथ्यों के हाथ में आने से पुलिस समझ गई कि दोनों छात्रों के लापता होने के तार अयूब और हैदर से जुड़े हुए हैं. युवकों के बारे में पता न चलने से गांव के लोगों में नाराजगी बढ़ रही थी. इस बात की जानकारी होने पर सीओ विनोद सिरोही ने गांव जा कर लोगों की नाराजगी को शांत कर के उन्हें पुलिस की काररवाई से अवगत कराया.

15 अप्रैल को एक पुलिस टीम अयूब की तलाश में निकल पड़ी. छिजारसी गांव नोएडा के सैक्टर-63 में ही आता था. पुलिस टीम ने नोएडा पुलिस की मदद से उसे हिरासत में ले लिया. पहले तो उस ने धर्म का डर दिखा कर पुलिस को धमकाने की कोशिश की, लेकिन सबूतों के आगे उस ने हथियार डाल दिए.

पुलिस दोनों लड़कों को सकुशल बरामद करना चाहती थी. जब अयूब से उन के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘साहब, वे दोनों अब नहीं हैं.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मुझे माफ कर दीजिए साहब, मैं ने और हैदर ने उन की हत्या कर के शव फेंक दिए हैं.’’

अयूब की हैवानियत भरी बातें सुन कर पुलिस सकते में आ गई. पुलिस ने लाशों के बारे में पूछा तो उस ने बताया, ‘‘हम ने दोनों लाशें ले जा कर गाजियाबाद जिले की डासना-मसूरी नहर में फेंक दी थीं.’’

पुलिस अयूब को ले कर तुरंत वहां पहुंची, जहां उन्होंने लाशें फेंकी थीं. उस की निशानदेही पर पुलिस ने झाडि़यों में अटकी सद्दाम और बाबर की लाशें बरामद कर लीं. उन के घर वालों को इस बात की सूचना दी गई तो उन के यहां कोहराम मच गया. मौके पर पहुंच कर उन्होंने लाशों की शिनाख्त कर दी.

पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. हत्या की बात से जिसौरा गांव में तनाव फैल गया, जिस की वजह से गांव में पुलिस बल तैनात करना पड़ा. पुलिस ने दूसरे आरोपी हैदर की तलाश शुरू की, लेकिन वह हाथ नहीं आया.

पुलिस ने अयूब से विस्तार से पूछताछ की तो दोनों लड़कों की हत्या की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह चौंकाने वाली थी. धर्म की आड़ में कमाई के लिए ढोंग रचने वाले अयूब के चेहरे से तो नकाब उतरा ही, साथ ही हैदर की भी हकीकत खुल गई.

हैदर ने अपनी प्रेमिका से बाबर को दूर करने के लिए मौत की ऐसी खौफनाक साजिश रची, जिस में अयूब भी शामिल हो गया था. तंत्रमंत्र पर बाबर का नासमझी भरा अंधविश्वास उसे मौत की चौखट तक ले गया. उसी के साथ निर्दोष सद्दाम भी मारा गया. इस तरह नासमझी में 2 घरों के चिराग बुझ गए.

दरअसल, टैंपो चालक हैदर का गांव की ही एक लड़की से प्रेमप्रसंग चल रहा था. दोनों का प्यार परवान चढ़ रहा था कि उसी बीच हैदर को पता चला कि उस की प्रेमिका का बाबर से भी चक्कर चल रहा है. इस से उस का दिमाग घूम गया. उस ने अपने स्तर से इस बारे में पता किया तो बात सच निकली.

हैदर को यह बात काफी नागवार गुजरी. उस ने अपनी प्रेमिका को भी समझाया और बाबर को भी. उस का सोचना था कि दोनों अब कभी बात नहीं करेंगे, लेकिन उस की यह खुशफहमी जल्द ही खत्म हो गई, जब उसे पता चला कि उस की बातों का दोनों पर कोई असर नहीं हुआ है. हैदर लड़की पर अपना हक समझने लगा था. उसे यह कतई मंजूर नहीं था कि वह किसी और से बातें करे, इसलिए एक दिन उस ने बाबर को समझाते हुए कहा, ‘‘बाबर, मैं नहीं चाहता कि तुम मेरी होने वाली बीवी से बात करो.’’

‘‘तुम क्या उस से निकाह करने वाले हो?’’

‘‘हां.’’

‘‘तो फिर मुझे रोकने से अच्छा है कि उसे समझाओ. अब मुझ से कोई बात करेगा तो मैं भला कैसे मना कर सकता हूं.’’

‘‘जो भी हो, मैं तुम्हें समझा रहा हूं. अगर तुम नहीं माने तो अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’ हैदर ने धमकी भरे लहजे में कहा तो दोनों में बहस हो गई.

दूसरी ओर हैदर ने प्रेमिका से बात की तो वह मुकर गई. हैदर उस पर भरोसा करता था. उस का अहित करने की वह सोच भी नहीं सकता था. वक्त के साथ हैदर के दिमाग में यह बात घर कर गई कि हो न हो, उस की प्रेमिका को बाबर ही अपने जाल में फंसा रहा हो. उसे इस बात का भी डर सता रहा था कि अगर उस ने कुछ नहीं किया तो उसे एक दिन प्रेमिका से हाथ धोना पड़ेगा.

ठंडे दिमाग से सोचा जाए तो किसी भी मसले का हल निकल आता है, लेकिन हैदर ऐसी फितरत का इंसान नहीं था. कई दिनों की दिमागी उधेड़बुन के बाद उस ने बाबर को ही रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

बाबर की बातें तांत्रिक अयूब से भी हुआ करती थीं. इस बात की जानकारी हैदर को थी. अयूब से उस के भी अच्छे रिश्ते थे. उस की प्रेमिका की बातें कई बार अयूब ने ही उसे बताई थीं, इसलिए हैदर ने अयूब के जरिए ही बाबर को रास्ते से हटाने की सोची.

मौलाना अयूब लोगों को इंसानियत का पाठ पढ़ाने का ढोंग करता था, धर्म की आड़ में तंत्रमंत्र के बल पर सभी समस्याओं से छुटकारा दिलाने का दावा करता था. अंधविश्वासियों की चूंकि समाज में कोई कमी नहीं है, इसलिए उस का यह धंधा ठीकठाक चल रहा था. एक दिन हैदर अयूब के पास पहुंचा. अयूब ने आने की वजह पूछी तो उस ने कहा, ‘‘अयूब भाई, मैं एक काम में आप की मदद चाहता हूं.’’

‘‘कैसी मदद?’’

‘‘एक लड़के को रास्ते से हटाना है. इस काम में तुम मेरी बेहतर मदद कर सकते हो.’’

‘‘कैसी बात कर रहे हो हैदर मियां?’’ हैदर की बात सुन कर अयूब एकदम से चौंका तो हैदर ने हंसते हुए कहा, ‘‘इस में इतना चौंकने की क्या बात है? कब तक तुम लोगों के लिए ताबीज बना कर हजार, 5 सौ रुपए कमाते रहोगे. मैं तुम्हें 10 लाख रुपए के साथ एक प्लौट भी दिला दूंगा. मैं जानता हूं कि तुम किराए पर रहते हो. ऐसे में तो तुम अपना घर बनाने से रहे. सोच लो, मौका बारबार नहीं आता.’’

हैदर की इस बात पर अयूब सोच में डूब गया. उस का दिया लालच वाकई मोटा था. थोड़ी ही देर में अयूब धर्म और इंसानियत को भूल गया. उस ने साथ देने का वादा किया तो हैदर ने उसे बाबर का नाम बता दिया.

‘‘तुम उसे क्यों मारना चाहते हो?’’

‘‘वह मेरी प्रेमिका को हथियाने की कोशिश कर रहा है, इसलिए उस का मरना जरूरी है.’’

इस के बाद हैदर और अयूब ने बाबर की हत्या कर उस के घर वालों से फिरौती वसूलने की योजना बनाई. इसी योजना के तहत अयूब ने 9 अप्रैल की शाम बाबर को फोन किया, ‘‘बाबर, मेरे पास एक ऐसी आयतों की ताबीज है, जिस लड़की का भी नाम ले कर पहनोगे, वह हमेशा के लिए तुम्हारी दीवानी हो जाएगी.’’

‘‘सच?’’

‘‘हां, अगर तुम्हें वह ताबीज चाहिए तो मैं तुम्हें वह ताबीज दे सकता हूं. लेकिन एक शर्त होगी.’’

‘‘क्या?’’ बाबर ने उत्सुकता से पूछा तो उस ने राजदाराना अंदाज में कहा, ‘‘इस के बारे में तुम किसी से जिक्र नहीं करोगे. एक बात और, उसे मेरे पास आ कर ही लेना होगा.’’

‘‘ठीक है, मैं गांव आया हूं. मुझे कल जामिया जाना है. तुम्हारे पास से होता हुआ चला जाऊंगा.’’

बाबर आने के लिए तैयार हुआ तो अयूब ने यह बात हैदर को बता दी. अगले दिन शाम के वक्त बाबर अपने साथी सद्दाम के साथ छिजारसी पहुंचा. हैदर वहां पहले से ही मौजूद था. हैदर को देख कर हालांकि बाबर को झटका लगा, लेकिन उस ने उस के साथ दोस्ताना व्यवहार करते हुए कहा, ‘‘हैदर, तुम यहां..?’’

‘‘मैं अयूब भाई से यूं ही मिलने चला आया था.’’ हैदर ने कहा.

बाबर उम्र के लिहाज से इतना समझदार नहीं था कि उन की चाल को समझ पाता. सद्दाम सिर्फ दोस्ती की वजह से उस के साथ आया था. कुछ देर की बातचीत के बाद अयूब ने बाबर और सद्दाम को कोल्डड्रिंक पीने के लिए दी. कोल्डड्रिंक पी कर दोनों बेहोश हो गए. अयूब ने उस में पहले से ही नशीली दवा मिला रखी थी.

बाबर और सद्दाम के बेहोश होते ही हैदर और अयूब ने मिल कर उन की गला दबा कर हत्या कर दी. तब तक रात हो चुकी थी. उन के मोबाइल उन्होंने स्विच औफ कर दिए. इस के बाद दोनों की लाशों को चादरों में बांध कर टैंपो में रखा और गाजियाबाद के मसूरी की ओर चल पड़े.

रास्ते में कई जगह उन्हें पीसीआर वैन और पुलिस की गाडि़यां मिलीं, लेकिन संयोग से टैंपो को किसी ने चैक नहीं किया. मसूरी नहर की पटरी पर सुनसान जगह देख कर हैदर ने टैंपो रोका. इस के बाद दोनों ने मिल कर लाशों को नहर में फेंक दिया. लेकिन जल्दबाजी में लाशें झाडि़यों में अटक गई थीं, जबकि उन्होंने सोचा था कि लाशें नहर में बह गई होंगी. अंधेरा होने की वजह से वे देख नहीं सके थे.

लाशों को ठिकाने लगा कर दोनों छिजारसी चले गए. अगले दिन अयूब ने आवाज बदल कर बारीबारी से बाबर और सद्दाम के घर वालों को फिरौती के लिए फोन कर के मोबाइल बंद कर दिए. हैदर को लगा कि बारबार उन के नंबर इस्तेमाल करना ठीक नहीं है, इसलिए वह फर्जी पते पर नया सिमकार्ड खरीद लाया, जिस से बाद में दोनों लड़कों के घर वालों को फोन किए जाते रहे.

हैदर और अयूब को पूरी उम्मीद थी कि अपने बेटों के बदले घर वाले फिरौती जरूर देंगे, जिस से उन की किस्मत बदल जाएगी. लेकिन उन की सारी चालाकी धरी की धरी रह गई थी.

विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने अयूब को अदालत में मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश कर के जेल भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद बाबर और सद्दाम के शवों को घर वालों के हवाले कर दिया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, दोनों की मौत गला दबाने से हुई थी. गमगीन माहौल में दोनों लड़कों के शवों को पुलिस की मौजूदगी में दफना दिया गया.

20 अप्रैल को पुलिस ने फरार चल रहे हैदर को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी अपना गुनाह कबूल कर लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे भी अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. हैदर ने जो कदम उठाया, वह कोई नासमझी नहीं, बल्कि जानबूझ कर उठाया गया सरासर गलत कदम था. 2 युवाओं की जान ले कर वह खुद भी नहीं बच सका.

वहीं धर्म का पाठ पढ़ाने वाले अयूब ने भी लालच में आ कर गलत राह पकड़ ली. जबकि उस ने हैदर को समझा कर सही राह दिखाई होती तो शायद यह नौबत न आती. लालच में आ कर वह खुद भी 2 हत्याओं का गुनहगार बन गया. कथा लिखे जाने तक दोनों आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस उन के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर रही थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बाबाओं के वेश में ठग

पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, नागौर व पाली जिलों में भगवा कपड़े पहने बाबा दानदक्षिणा लेते दिख जाएंगे. पश्चिमी जिलों के हजारों गांवढाणियों में अकसर ऊपर वाले या दुखदर्द दूर करने के नाम पर ये भगवाधारी ठगी करते फिरते हैं.

4-5 के समूह में ये बाबा गांवकसबों में घूम कर लोगों के हाथ देख कर उन की किस्मत चमकाने के नाम पर मनका या अंगूठी देते हैं और बदले में 2-3 हजार रुपए तक ऐंठ लेते हैं. गांवदेहात के लोग इन बाबाओं की मीठीमीठी बातों में आ कर ठगे जा रहे हैं.

अचलवंशी कालोनी, जैसलमेर में रहने वाले दिनेश के पास नवरात्र में 4-5 बाबा पहुंचे. उन बाबाओं ने दुकानदार दिनेश को चारों तरफ से घेर लिया. एक बाबा दिनेश का हाथ पकड़ कर देखने लगा. उस बाबा ने हाथ की लकीरों को पढ़ते हुए कहा, ‘‘बच्चा, किस्मत वाला है तू. मगर कुछ पूजापाठ करनी होगी. पूजापाठ कराने से धंधे में जो फायदा नहीं हो रहा, वह बाधा दूर हो जाएगी. तुम देखना कि पूजापाठ के बाद किस्मत बदल जाएगी.’’

बाबा एक सांस में यह सब कह गया. दिनेश कुछ बोलता, उस से पहले ही दूसरे बाबा ने फोटो का अलबम आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बेटा, ये फोटो देख. ये पुलिस सुपरिंटैंडैंट और कलक्टर हैं. ये हमारे चेले हैं. अब तो तुम मान ही गए होगे कि हम ऐरेगैरे भिखारी नहीं हैं.’’

दिनेश ने अलबम देखा, तो उस की आंखें फटी रह गईं. उन फोटो में वे बाबा पुलिस अफसरों, नेताओं व दूसरे बड़े सरकारी अफसरों के साथ खड़े थे. बाबा उन्हें अपना चेला बता रहे थे.

दिनेश का धंधा चल नहीं रहा था. इस वजह से वह ठग बाबाओं की बातों में आ गया.

उन बाबाओं ने 25 सौ रुपए नकद, 5 किलो देशी घी, 10 किलो शक्कर, 5 किलो तेल, 5 किलो नारियल और अगरबत्ती, धूप, कपूर, सिंदूर, मौली व चांदी के 5 सिक्के पूजा के नाम पर लिए और तकरीबन 8 हजार रुपए का चूना लगा कर चलते बने.

दिनेश अब पछता रहा है कि उस ने क्यों उन ठग बाबाओं पर भरोसा किया. छोटी सी दुकान से महीनेभर में जो मुनाफा होता था, वह बाबा ले गए. अब दिनेश औरों से कह रहा है कि वे बाबाओं के चंगुल में न फंसें.

दिनेश की तरह महेंद्र भी बाबाओं की ठगी के शिकार हो चुके हैं. वे पोखरण में अपनी पत्नी सुनीता के साथ रहते हैं. उन की शादी को 10 साल हो चुके हैं, मगर उन्हें अब तक औलाद का सुख नहीं मिला है. दोनों ने खूब मंदिरों के चक्कर काटे और तांत्रिकओझाओं की शरण में गए, मगर कहीं से उन्हें औलाद का सुख नहीं मिला.

ऐसे में एक दिन जब बाबा उन के पास पहुंचे और महेंद्र से कहा कि उन की किस्मत में औलाद का सुख तो है, मगर कुछ पूर्वजों की आत्माएं इस में रोड़ा अटका रही हैं. उन आत्माओं की शांति के लिए पूजा करनी होगी.

महेंद्र अपने जानने वालों और आसपड़ोस के लोगों के तानों से परेशान थे. बाबाओं ने मोबाइल फोन में बड़े अफसरों व मंत्रियों के साथ अपने फोटो दिखाए, तो महेंद्र को लगा कि जब इतने बड़े अफसर इन बाबाओं के चेले हैं, तो जरूर ये बाबा पहुंचे हुए हैं.

महेंद्र बाबा से बोला, ‘‘मैं मंदिरों के चक्कर में लाखों रुपए उड़ा चुका हूं. आप लोगों पर मुझे भरोसा है. मुझे पूजापाठ के लिए कितना खर्च करना होगा?’’

तब एक बाबा ने कहा, ‘‘आप हमें 11 हजार रुपए दे दें. इन रुपयों से हम पूजापाठ का सामान खरीद कर पूजा कर देंगे. अगली बार जब हम आएंगे, तो तुम औलाद होने की खुशी में हमें 51 हजार रुपए दोगे. यह हमारा वादा है.’’

बस, उस बाबा की बातों में आ कर महेंद्र 11 हजार रुपए गंवा बैठे. ऐसे बाबाओं की ठगी के हजारों किस्से हर रोज होते हैं. बाड़मेर जिले की पचपदरा थाना पुलिस ने ऐसे ही 6 ठग बाबाओं को 18-19 सितंबर, 2017 को पचपदरा कसबे से अपनी गिरफ्त में लिया. किसी ने फोन कर के थाने में सूचना दी थी कि बाबाओं ने लोगों को ठगने का धंधा चला रखा है. ये लोग पीडि़तों को झूठे आश्वासन दे कर उन से जबरदस्ती रुपए ऐंठ रहे हैं.

पचपदरा थानाधिकारी देवेंद्र कविया ने पुलिस टीम के साथ दबिश दे कर 6 बाबाओं को पकड़ लिया. उन ठग बाबाओं को थाने ला कर पूछताछ की गई. जो बात सामने आई, उसे सुन कर हर कोई हैरान रह गया.

दरअसल, वे लोग नागा बाबा के वेश में दिनभर लोगों को नौकरी दिलाने, घरों में सुखशांति, औलाद का सुख हासिल करने के साथ ही कई तरह के झांसे दे कर नगीने, अंगूठी व मनका वगैरह बेच कर ठगी करते थे. कई लोगों के हाथ देख कर उन्हें किस्मत बताते थे. दिन में लोगों से ठगी कर के जो रकम ऐंठते थे, रात में उसे शराब पार्टी, नाचगाने में उड़ाते थे.

पचपदरा पुलिस ने जिन 6 ठग बाबाओं को गिरफ्तार किया, वे सभी सीकरीगोविंदगढ़ के रहने वाले सिख परिवार से थे.

पूछताछ में ठग बाबाओं ने पुलिस को बताया कि सीकरीगोविंदगढ़ के तकरीबन ढाई सौ परिवार इसी तरह साधुसंत बन कर ठगी का काम करते हैं. अलगअलग जगहों पर घूम कर ये बड़े अफसरों को धार्मिक बातों में उलझा कर उन के साथ फोटो खिंचवाते हैं और फिर वे इन फोटो को दिखा कर गांव वालों को बताते हैं कि ये सब उन के भक्त हैं और इस तरह भोलेभाले लोगों को ठग कर रुपए ऐंठ लेते थे. शाम को वे शराब पार्टियां करते थे.

पुलिस ने उन बाबाओं के कब्जे से मोबाइल फोन बरामद किए, जिन में कई बेहूदा नाचगाने और शराब पार्टी के फोटो थे. साथ ही, कई अश्लील क्लिपें भी बरामद हुईं.

इन बाबाओं ने खुद को गुजरात में जूना अखाड़े का साधु बताया. थानाधिकारी देवेंद्र कविया ने कवाना मठ के महंत परशुरामगिरी महाराज, जो जूना अखाड़ा में पदाधिकारी भी हैं, को थाने बुलवा कर इन गिरफ्तार बाबाओं के बारे में पूछा, तो इन बाबाओं के फर्जीवाड़े की पोल खुल गई.

इस के बाद बाबाओं ने मुकरते हुए कहा कि वे तो उदासीन अखाड़े से हैं. इस पर महंत परशुरामगिरी ने बाबाओं से उदासीन अखाड़े के बारे में पूछताछ की, तो वे जवाब न दे सके. इस के बाद पुलिस ने इन्हें हिरासत में ले लिया.

ये ठग बाबा पूरे राजस्थान में घूमते थे और लोगों को झांसे में ले कर शिकार बनाते थे. महंगी गाडि़यों और शानदार महंगे कपड़ों में इन बाबाओं के फोटो देख कर पुलिस भी हैरान रह गई.

ये सब बाबा इतने अमीर हैं. इन के घर पक्के हैं. इन के पास गाडि़यां भी हैं. इन को बगैर कोई काम किए लोगों के अंधविश्वास के चलते लाखों रुपए की महीने में कमाई हो जाती थी.

पचपदरा थानाधिकारी देवेंद्र कविया ने इन ठग बाबाओं के बारे में कहा, ‘‘इन के बरताव से पता चला कि ये फर्जी पाखंडी संत हैं. ऐसे लोगों से बच कर रहना चाहिए.’’

बच्चे हों या औरतें बलात्कार क्यों

8 सितंबर, 2017 की सुबह भोंडसी, गुड़गांव में श्याम कुंज इलाके की गली नंबर 2 में रहने वाले वरुण ठाकुर अपने बच्चों प्रद्युम्न और विधि को सुबह के 7 बज कर 50 मिनट पर रयान इंटरनैशनल स्कूल के गेट पर छोड़ गए थे. प्रद्युम्न दूसरी क्लास में पढ़ता था, जबकि विधि 5वीं क्लास में.

8 बजे स्कूल का एक माली दौड़ कर प्रद्युम्न की टीचर अंजू डुडेजा के पास गया और उन का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बोला, ‘‘देखो,?टौयलेट में क्या हो गया है…’’

अंजू डुडेजा जब वहां पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि टौयलेट के बाहर गैलरी की दीवार के पास प्रद्युम्न का स्कूल बैग पड़ा था और टौयलेट के भीतर वह लहूलुहान हालत में.

8 बज कर 10 मिनट पर?स्कूल मैनेजमैंट ने प्रद्युम्न के पिता को उस की तबीयत खराब होने की सूचना दी. इसी बीच प्रद्युम्न को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक उस की मौत हो चुकी थी.

इस हत्याकांड में बस कंडक्टर को जिम्मेदार ठहराया गया. उस ने बच्चे के साथ यौन शोषण करने की कोशिश की थी या किसी और को बचाने के लिए बस कंडक्टर को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, ऐसे सवालों के जवाब तो समय आने पर ही पता चलेंगे, लेकिन सब से अहम बात यह है कि एक परिवार ने अपने मासूम बच्चे को खो दिया, वह भी इस तरह से कि जीतेजी तो उन के दिलोदिमाग से प्रद्युम्न की यादें नहीं जा पाएंगी.

प्रद्युम्न के पिता ने इस हत्याकांड की तह तक पहुंचने के लिए कानून का सहारा लिया और सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए खुद सभी प्राइवेट स्कूलों में सिक्योरिटी की जांच करने का फैसला लिया. लेकिन सवाल उठता?है कि ऐसी नौबत ही क्यों आती है कि कोई बालिग आदमी किसी बच्चे को अपनी हवस का शिकार बनाता है, क्योंकि इस वारदात के तुरंत बाद दिल्ली के एक निजी स्कूल में 5 साल की एक बच्ची के साथ रेप की वारदात सामने आई थी.

गुड़गांव के ही एक पड़ोसी जिले फरीदाबाद में भी ऐसा ही शर्मनाक वाकिआ हो गया था. नैशनल हाईवे के पास सीकरी गांव के सरकारी स्कूल में 7वीं क्लास में पढ़ने वाले एक बच्चे को 24 अगस्त, 2017 को सीकरी गांव का रहने वाला 19 साला सूरज अपने साथ स्कूल के पीछे उगी झाडि़यों में ले गया था. वह उस के साथ गलत काम करना चाहता था. बच्चे ने विरोध किया, तो सूरज ने उस का गला दबाया और जबरदस्ती की. बाद में पहचान मिटाने के लिए पत्थर से वार कर के बच्चे का चेहरा कुचल दिया.

हाल ही में मुंबई में अपने सौतेले पिता द्वारा कथित तौर पर बलात्कार किए जाने के बाद पेट से हुई 12 साल की एक लड़की ने एक सरकारी अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया. आरोपी को इसी साल जुलाई महीने में गिरफ्तार किया गया था.

पुलिस ने बताया कि लड़की के पेट से होने के बारे में बहुत देर से, तकरीबन 7 महीने बाद पता चला था. लड़की ने अपनी मां को बताया था कि उस के सौतेले पिता ने उस के साथ कथित तौर पर कई बार बलात्कार किया था.

बड़े दुख की बात है कि भारत में साल 2010 से साल 2015 तक यानी 5 साल में ही बच्चों के बलात्कार के मामलों में 151 फीसदी की शर्मनाक बढ़ोतरी हुई थी. नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2010 में दर्ज 5,484 मामलों से बढ़ कर यह तादाद साल 2014 में 13,366 हो गई थी.

इस के अलावा बाल यौन शोषण संरक्षण अधिनियम (पोक्सो ऐक्ट) के तहत देशभर में ऐसे 8,904 मामले दर्ज किए गए.

साल 2013 की बात है. छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिले में कन्या छात्रावास में प्राइमरी क्लास की 9 आदिवासी छात्राओं के साथ यौन शोषण का एक मामला सामने आया था. इस वारदात की जानकारी मिलते ही पुलिस ने छात्रावास के चौकीदार दीनाराम और शिक्षाकर्मी मन्नूराम गोटर को गिरफ्तार कर लिया था.

तब छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व सांसद रमेश बैस ने सवाल उठाया था कि बराबरी या बड़े लोगों के साथ बलात्कार समझ में आता है, लेकिन बच्चों के साथ ऐसा अपराध क्यों होता?है?

औरतें और बच्चे शिकार

सच तो यह है कि औरतों और बच्चों से बलात्कार करने का इतिहास बहुत पुराना है. जब कभी राजामहाराजा किसी पड़ोसी देश को लड़ाई में जीतते थे, तो हारे हुए राजा की जनता में से औरतों के साथ अपने सैनिकों को बलात्कार करने की छूट दे देते थे. वे सैनिक बच्चियों और औरतों में कोई फर्क नहीं करते थे. जो औरतें अपनी इज्जत बचाना चाहती थीं, उन्हें खुदकुशी करना सब से आसान रास्ता लगता था.

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे में भी न जाने कितनी औरतों और बच्चियों ने अपनी इज्जत गंवाई थी. वैसे, जब हवस हावी होती है, तो फिर छोटे लड़के भी बलात्कारी के शिकार बन जाते हैं.

भारत में जिन राज्यों में सेना की चलती है, वहां की लोकल औरतों की सब से बड़ी समस्या यह रहती है कि उन की व उन के बच्चों की इज्जत सुरक्षित नहीं है. जम्मू व कश्मीर में बहुत से सैनिकों पर बलात्कार करने के आरोप लगते रहे हैं.

फिलीपींस देश के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते ने तो एक चौंकाने वाला बयान दे डाला था. जब वे दक्षिणी फिलीपींस में मार्शल ला लगाने के 3 दिन बाद सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए वहां पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि सैनिकों को 3 औरतों के साथ बलात्कार करने की इजाजत है.

ऐसी क्या वजह?है कि कोई राष्ट्रपति अपने ही देश की औरतों के साथ बलात्कार करने की इजाजत देता है? क्या कोई सैनिक जब उन के आदेश को मानेगा, तो वह सामने औरत है या बच्ची, इस बात का ध्यान रखेगा?

चलो, एक बालिग लड़की या औरत के साथ जबरदस्ती करने की बात समझ में आती?है, हालांकि यह भी गलत?है, लेकिन किसी बच्ची को लहूलुहान करने में किसी मर्द को कौन सा सुख हासिल होता है?

जब कोई मर्द किसी औरत या बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाता है, तब उस की सोच क्या रहती?है? भारत की बात करें, तो यहां ऐसा मर्दवादी समाज है, जहां मर्दों को अपना हुक्म चलाने की आदत होती है. वे चाहते हैं कि औरतें उन के पैरों की जूती बन कर रहें. जब कोई बाहरी औरत उन की बात नहीं मानती है, तो वे उस की इज्जत से खेल कर उस के अहम को चोट पहुंचाते?हैं. जब औरत हाथ नहीं आती, तो बच्ची ही सही.

क्या आप ने कभी सोचा है कि जितनी भी गालियां बनी हैं, उन में औरतों के नाजुक अंगों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है? इस में भी मर्दवादी सोच ही पहले नंबर पर रहती है. कुछ लोगों के दिमाग में 24 घंटे हवस सवार रहती है. वे जब अपनी जिस्मानी जरूरत घर में बीवी से पूरी नहीं कर पाते?हैं, तो आसपड़ोस में झांकते हैं. जब कभी कोई बड़ी औरत फंस जाए तो ठीक, नहीं तो कम उम्र की बच्ची को भी नहीं छोड़ते हैं. फिर उन के लिए यह बात कोई माने नहीं रखती है कि मजा मिला या नहीं.

जब किसी बड़े संस्थान या मैट्रो शहर में ऐसे बलात्कार होते हैं, तो अपराध सामने आ जाते हैं, लेकिन छोटे इलाकों में तो पता भी नहीं चल पाता है. समाज का डर दिखा कर घर वाले ही पीडि़त को चुप करा देते हैं, जिस से बलात्कारी के हौसले बढ़ जाते हैं. लेकिन बलात्कारी खासकर छोटे बच्चों को शिकार बनाने वाले समाज में

खुले घूमने नहीं चाहिए? क्योंकि वे अपनी घिनौनी हरकत से पीडि़त बच्चे के दिलोदिमाग पर ऐसी काली छाप छोड़ देते हैं, जो उस के भविष्य पर बुरा असर डालती है.

ऐसा पीडि़त बच्चा बड़ा हो कर अपराधी बन सकता है. यह सभ्य समाज के लिए कतई सही नहीं. लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि बलात्कारी आतंकवादियों के ‘स्लीपर सैल’ की तरह समाज में ऐसे घुलेमिले होते?हैं कि जब तक वे पकड़ में न आएं, तब तक उन की पहचान करना मुश्किल होता है. इस के लिए कानून से ज्यादा लोगों की जागरूकता काम आती है.

सैक्स ऐजुकेशन जरूरी

बच्चों के हकों के प्रति लोगों को जागरूक करने वाले और नोबल अवार्ड विजेता कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि बच्चे सैक्स हिंसा का शिकार न बनें, इस के लिए पूरे समाज को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा. साथ ही, स्कूलों में सैक्स ऐजुकेशन से बच्चों को इस जानकारी से रूबरू कराना चाहिए.

कैलाश सत्यार्थी की सब से बड़ी चिंता यह है कि बच्चों को उन के?घरों व स्कूलों में मर्यादा, इज्जत, परंपरा वगैरह की दुहाई दे कर इस तरह के बोल्ड मामलों पर बोलने ही नहीं दिया जाता है. अगर वे कुछ पूछना चाहते हैं, तो उन्हें ‘गंदी बात’ कह कर वहीं रोक दिया जाता है.

अगर कोई बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है, तो उस के जिस्मानी घाव तो वक्त के साथ फिर भी भर जाते?हैं, पर मन पर लगी चोट उम्रभर दर्द देती है.

हिंदी फिल्म ‘हाईवे’ की हीरोइन आलिया भट्ट के साथ बचपन में उन्हीं के परिवार के एक सदस्य ने यौन शोषण किया था, जिस की तकलीफ से वे पूरी फिल्म में जूझती दिखाई देती हैं.

जहां तक इस समस्या से जुड़े कानून की बात?है, तो हमारे यहां बाल यौन शोषण को ले कर पोक्सो जैसे कानून हैं तो, पर उन का भी ठीक ढंग से पालन नहीं किया जाता है.

पिछले साल इस कानून के तहत तकरीबन 15 हजार केस दर्ज हुए थे, जिन में से महज 4 फीसदी मामलों में सजा हो पाई. 6 फीसदी आरोपी बरी हो गए और बाकी 90 फीसदी मामले अदालत में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. ऐसी ही लचर चाल रही, तो उन का फैसला आने में कई साल लग जाएंगे.

बच्चों को करें होशियार

सच तो यह है कि जब कोई छोटा बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है, तो उस में इतनी समझ नहीं होती कि उस के साथ हो क्या रहा है. अपराधी उन की इसी बालबुद्धि का फायदा उठाते हैं. लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि बच्चों को उन की सिक्योरिटी के मद्देनजर जानकारी न दी जाए. कभीकभी कुछ टिप्स ऐसे होते हैं, जो मौके पर काम कर जाते हैं या फिर बच्चे को उस के साथ कोई अनहोनी होने का डर हो तो वह वक्त रहते किसी अपने को बता सकता है. कुछ जरूरी बातें इस तरह हैं.

* मातापिता बच्चे को अपना दोस्त समझें, ताकि वह अपने मन की बात खुल कर कह सके.

* हालांकि बहुत बार जानकार आदमी भी बच्चे के साथ यौन शोषण कर सकता है, लेकिन फिर भी बच्चों को किसी के गलत तरीके से उन के बदन के खास हिस्सों को छूने के प्रति आगाह कर देना चाहिए.

* अगर बच्चा डराडरा सा रहता है या चुप रहता है, तो खुल कर इस की वजह पूछें. आप की बात नहीं सुनता है, तो किसी काउंसलर की मदद भी ली जा सकती है.

* स्कूल में टीचर का भी फर्ज बनता है कि वह अपने हर स्टूडैंट पर कड़ी नजर रखे. कुछ भी गलत होने की खबर लगे, तो फौरन मांबाप को इस की जानकारी दी जाए.

* अगर बच्चे के साथ कुछ गलत हो भी रहा है, तो वह शर्मिंदगी महसूस न करे, बल्कि अपने मातापिता को जानकारी दे.

गे क्लब की आड़ में ब्लैकमेलिंग का खेल

पुलिस हिरासत में बैठे उन चारों नौजवानों के चेहरों पर बेबसी के भाव झलक रहे थे. बेबसी इसलिए भी क्योंकि खुद को पाकसाफ बताने के लिए उन के पास कोई सुबूत नहीं था. उन्हें चौंकाने वाले गुनाह में गिरफ्तार किया गया था. वे समलैंगिक लोगों को गुपचुप अपना शिकार बनाते थे. इस के लिए वे अपना जाल बिछाते थे कि अपने जैसे जिस्म की चाह रखने वाले खुद ही उस में फंस जाते थे. जो एक बार उन के जाल में फंसता था, फिर उन की इजाजत के बिना निकल नहीं पाता था. ब्लैकमेलिंग उन का प्रमुख हथियार होता था. शिकार होने वाले अपने समलैंगिक होने पर पछताते थे. उन्हें लगता था कि उन की प्रवृत्ति ऐसी नहीं होती, तो ऐसा अपराध उन के साथ घटित न हुआ होता.

यों बिछाते थे अपना जाल उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की पुलिस ने 22 नवंबर 2016 को जिन 4 युवकों को गिरफ्तार किया उन में सुमित, सोनू, नितिन व देवेंद्र शामिल थे. इन में सोनू व नितिन एक ही गांव के थे जबकि सुमित और देवेंद्र अलगअलग गांवों के रहने वाले थे. सुमित व सोनू बीए सैकंड ईयर के छात्र थे जबकि उस के साथी देवेंद्र 12वीं कक्षा का व नितिन 8वीं कक्षा का. चारों के बीच गहरी दोस्ती थी.

सुमित अकसर सोशल नैटवर्किंग साइट फेसबुक पर ऐक्टिव रहता था. शातिर दिमाग सुमित शौर्टकट से पैसे कमाने की चाहत रखता था. उस ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर गे युवकों को फंसाने की योजना बनाई. इस के बाद गिरोह का सरगना सुमित फेसबुक पर हीरो की भूमिका में होता था. उस ने गलत नाम से अकाउंट बनाया हुआ था. जिस पर उस ने खुद को गे बताया हुआ था. फेसबुक पर वह बौडीबिल्डर की आकर्षक तसवीरें डालता था. लोग उस की तारीफ करते थे. गे युवक उसे देखते ही आकर्षित हो जाते थे. उन के साथ आसानी से फ्रैंडशिप भी हो जाती थी. उस के सोशल साइट्स के गे क्लब में हर उम्रवर्ग के लोग शामिल थे. वह दावा करता था कि क्लब के लोगों की हकीकत कोई दूसरा नहीं जान पाएगा. उन की पहचान को गुप्त रखा जाएगा. समलैंगिक लोग अपने अनुभव भी उस से शेयर करते थे. कोई अपने दबे हुए अरमान बताता था, कोई जिस्मानी भूख की चाहत बयां करता था. ऐसे ही लोगों में से सुमित अपने शिकार का चुनाव करता था. पहले वह चैटिंग से, फिर मोबाइल से खुल कर बातचीत करता था. समलैंगिक से उस की दबी हुई जिस्मानी ख्वाहिशों को जान कर उन्हें पूरा करने का अपनेपन से भरोसा देता था.

जब सुमित उन के विश्वास को जीत लेता था तब शिकार को अपनी बताई जगह पर जिस्मानी खेल खेलने के लिए बुलाता था. इस के लिए वह सड़क किनारे सुनसान इलाके और खेतों को चुनता था. सुमित के साथी उस के इशारे पर वहां पहले से ही छिप जाते थे. सुमित परपुरुष की चाहत वालों की ख्वाहिश पूरी करता और उस के साथी चुपके से मोबाइल के जरिए एमएमएस बना लेते. काम खत्म होने पर उस के साथी बाहर निकल आते और शिकार होने वाला समलैंगिक पुलिस के पास जाना तो दूर, अपने साथ हुई घटना का किसी से जिक्र तक नहीं करता था.

जिन समलैंगिकों को शिकार बनाया जाता, सुमित और उस के साथी उन का पीछा नहीं छोड़ते थे. कुछ दिनों बाद वे उस के मोबाइल पर एमएमएस क्लिप भेजते और पैसे की मांग करने लगते. पैसे न देने पर वे उसे इंटरनैट पर अपलोड करने के साथ ही समाज में बदनाम करने की धमकी देते. किसी के रोनेगिड़गिड़ाने का उन लोगों पर कोई असर नहीं होता था. इच्छानुसार वसूली का यह खेल महीनों जारी रहता. ऐसे लोगों को मनचाही जगह बुला कर वे उन से कुकर्म भी करते. सुमित ऐंड कंपनी ने एकएक कर के करीब एक दर्जन लोगों को अपना शिकार बनाया. लेकिन कभी पकड़े नहीं गए. इस से उन के हौसलों में अतिरिक्त इजाफा हो गया और वे आएदिन शिकार करने लगे. उन का हर शिकार छटपटा कर रह जाता और अपने समलैगिक रिश्तों पर आंसू बहाता था. समाज में बदनामी के डर से किसी ने कभी उन के खिलाफ शिकायत ही नहीं की.

गिरोह का शिकार मेरठ का एक व्यापारी युवक अनमोल (परिवर्तित नाम) भी हुआ. सुमित का फेसबुक प्रोफाइल देख कर अनमोल ने उसे फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी. दोनों के बीच जल्द ही दोस्ती हो गई. बातोंबातों में शातिर सुमित ने उस की आर्थिक हैसियत का पता लगा लिया. सुमित ने वादा किया कि वह मौका मिलते ही उस के अरमानों को पूरा करेगा. दोनों के बीच विश्वास का रिश्ता कायम हुआ, तो अनमोल सुमित की बताई सुनसान जगह पर मिलने के लिए पहुंच गया. सुमित ने पहले उस के साथ कुकर्म किया, फिर दोस्तों के साथ उस की स्कूटी, मोबाइल व सोने की चेन लूट कर उसे भगा दिया. साथ ही, उस ने धमकी दी कि यदि किसी से इस बात का जिक्र किया, तो वह समाज में उसे बदनाम कर देगा.

काफी सोचविचार के बाद अनमोल ने 16 अक्तूबर को थाना कंकरखेड़ा में सुमित व उस के साथियों के खिलाफ लूट का मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस भी इस तरह के अपराध से सकते में आ गई. एसएसपी जे रविंद्र गौड़ के निर्देशन में सीओ बी एस वीर कुमार व क्राइम ब्रांच को गिरोह की धरपकड़ के लिए लगा दिया गया. पुलिस ने मुख्य आरोपी सुमित का नंबर सर्विंलास पर लगा दिया. उस पर होने वाली बातचीत से यह साफ हो गया कि सुमित गिरोह चला रहा था. इस के बाद ही सुमित व उस के साथियों को पुलिस ने गिरफ्त में ले लिया. पुलिस ने स्कूटी, मोबाइल व अन्य सामान आरोपियों की निशानदेही से बरामद कर लिया.

समलैंगिकता विवादित रही है. विवाद कानून की चौखट से ले कर सड़कों पर तक है. इस का एक पहलू यह है कि समलैंगिकता अपराधों को भी जन्म देती है. समाज के बीच दोहरी जिंदगी जीने वाले समलैंगिंक वास्तव में मानसिक दबाव में जी रहे होते हैं.

मां की दी कुरबानी

24 अगस्त, 2015. शाजापुर शहर में डोल ग्यारस की धूम मची थी. गलीमहल्लों में ढोलढमक्का व अखाड़ों के साथ डोल निकाले जा रहे थे, वहीं दूसरी ओर मुसलिम समुदाय ईद की तैयारी में मसरूफ था.

25 अगस्त, 2015 की ईद थी. सो, हंसीखुशी से यह त्योहार मनाए जाने की तैयारी में जुटा यह समुदाय खरीदफरोख्त में मशगूल था.

कुरबानी के लिए बकरों को फूलमालाओं से सजा कर सड़कों पर घुमाया जा रहा था. बाजार में खुशनुमा माहौल था. कपड़े और मिठाइयों की दुकानों पर खरीदारों की भीड़ लगी हुई थी.

शाजापुर के एक महल्ले पटेलवाड़ी के बाशिंदे इरशाद खां ने इस खुशनुमा माहौल में एक ऐसी दिल दहलाने वाली वारदात को अंजाम दे दिया कि सुनने वालों की रूह कांप गई.

इरशाद खां ने अपने पड़ोसी आजाद की बकरी को गुस्से में आ कर छुरे से मार डाला. शायद वह बकरी इरशाद के घर में घुस गई थी और उस ने कुछ नुकसान कर दिया होगा, तभी इरशाद खां ने यह कांड कर दिया.

अपनी बकरी के मारे जाने की खबर लगते ही आजाद आपे से बाहर हो गया और उन दोनों के बीच तकरार शुरू हो गई. नौबत तूतूमैंमैं के बाद हाथापाई पर आ गई.

इरशाद खां की 65 साला मां रईसा बी भी यह माजरा देख रही थीं. इरशाद खां द्वारा बकरी मार दिए जाने के बाद वे मन ही मन डर गई थीं. कोई अनहोनी घटना न घट जाए, इस के मद्देनजर वे अपने बेटे पर ही बरस पड़ीं. वे चिल्लाचिल्ला कर इरशाद खां को गालियां देने लगीं.

यह बात शाम की थी. हंगामा बढ़ता जा रहा था. इरशाद खां के सिर पर जुनून सवार होता जा रहा था. मां का चिल्लाना और गालियां बकना उसे नागवार लगा. पहले तो वह खामोश खड़ाखड़ा सुनता रहा, फिर अचानक उस का जुनून जब हद से ज्यादा बढ़ गया, तो वह दौड़ कर घर में गया और वही छुरा उठा लाया, जिस से उस ने बकरी को मार डाला था.

लोग कुछ समझ पाते, इस के पहले इरशाद खां ने आव देखा न ताव और अपनी मां की गरदन पर ऐसा वार किया कि उन की सांस की नली कट गई. खून की फुहार छूटने लगी और वे कटे पेड़ की तरह जमीन पर गिर पड़ीं. उन का शरीर छटपटाने लगा.

इस खौफनाक मंजर को देख कर लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. रईसा बी का शरीर कुछ देर छटपटाने के बाद शांत हो गया. मामले की नजाकत देखते हुए इरशाद खां वहां से भाग खड़ा हुआ.

रईसा बी के बड़े बेटे रईस को जब इस दिल दहलाने वाली वारदात का पता चला, तो वह भागाभागा घर आया. तब तक उस की मां मर चुकी थीं.

बेटे रईस ने इस वारदात की रिपोर्ट कोतवाली शाजापुर पहुंच कर दर्ज कराई. पुलिस ने वारदात की जगह पर पहुंच कर कार्यवाही शुरू की. हत्या के मकसद से इस्तेमाल में लाए गए छुरे की जब्ती कर के पंचनामा बनाया गया. मौके पर मौजूद गवाहों के बयान लिए गए. इस के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए डा. भीमराव अंबेडकर जिला अस्पताल भेजा गया.

इरशाद खां वहां से फरार तो हो गया था, लेकिन कुछ ही समय बाद पुलिस ने उसे दबोच कर अपनी गिरफ्त में ले लिया.

शाजापुर जिला कोर्ट में यह मामला 2 साल तक चला. जज राजेंद्र प्रसाद शर्मा ने मामले की हर पहलू से जांच करते हुए अभियोजन पक्ष की दलीलों से सहमत होते हुए इरशाद खां को मां की गरदन काट कर हत्या करने के जुर्म में कुसूरवार पाया.

8 सितंबर, 2017 को जज ने फैसला देते हुए उसे ताउम्र कैद की सजा सुनाई. यह सजा भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत सुनाई गई.

साथ ही, कुसूरवार पर 2 हजार रुपए का जुर्माना किया गया. जुर्माना अदा न करने पर 2 साल की अलग से कैद की सजा सुनाई गई.

ईद के मौके पर एक बेटे ने बकरे की जगह अपनी मां की कुरबानी दे कर रोंगटे खड़े कर देने वाले कांड को अंजाम दिया.

वही मां, जिस ने उसे 9 महीने पेट में रखा. पालपोस कर उस की हर मांग पूरी करते हुए बड़ा किया. लेकिन शाजापुर में एक बेटे की इस दरिंदगी ने मां की मम?ता को तारतार कर दिया.

गुस्से में उठाया गया यह कदम उस परिवार पर भारी पड़ गया. मां जान से हाथ धो बैठी, जबकि उस के कत्ल के इलजाम में बेटा जेल चला गया.

गुनाह जो छिप न सका

16 फरवरी, 2017 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के गांव सिरकोई भूड़ निवासी अरविंद  गांव की ही रहने वाली शीतल के घर पहुंचा. प्रौपर्टी डीलर अरविंद शीतल को मुंहबोली बहन मानता था. शीतल एक बुटीक में काम करती थी.

अरविंद ने शीतल के घर जा कर उस की मां अनीता देवी से कहा कि गजरौला में उस की मौसेरी बहन की शादी है, इसलिए वह शीतल को उस के साथ भेज दें. अनीता अरविंद को घर के सदस्य की तरह मानती थी और उस पर विश्वास करती थी, इसलिए उस ने शीतल को उस के साथ गजरौला भेज दिया.

अगले दिन यानी 17 फरवरी, 2017 को अरविंद गजरौला से लौट कर घर आ गया, पर उस के साथ शीतल नहीं आई. अनीता ने अरविंद से शीतल के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘आंटी, शीतल मेरे साथ गई जरूर थी, पर रास्ते में मुझ से 1500 रुपए ले कर लौट आई थी.’’

इस के बाद अरविंद ने शीतल के घर वालों को विश्वास में ले कर कहा, ‘‘देखो, मुझे यह बात कहनी तो नहीं चाहिए, जो आप को बुरी लगे. पर मैं बताना चाहता हूं कि आजकल शीतल पर महेंद्र कुछ ज्यादा ही मेहरबान है. उन दोनों के बीच कुछ चल रहा है. मुझे लगता है कि शीतल महेंद्र के साथ ही गई है.’’

शीतल की मां अनीता तुरंत महेंद्र के घर पहुंच गई. उस ने पूछा कि महेंद्र कहां है तो उस के घर वालों ने बताया कि उस का कल से ही कुछ पता नहीं है. जब भी उसे फोन किया जाता है, उस के फोन की घंटी तो बजती है, लेकिन वह फोन उठाता नहीं है. यही बात अनीता ने भी बताई कि शीतल के फोन की घंटी तो बज रही है, पर वह फोन उठा नहीं रही है.

महेंद्र और शीतल के घर वालों ने यही समझा कि दोनों को अभी दुनियादारी की समझ नहीं है, जल्दी ही वापस आ जाएंगे. लेकिन जब 2 दिन बाद भी दोनों घर नहीं आए तो शीतल और महेंद्र के घर वालों ने मझोला थाने में उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थाना मझोला पुलिस ने भी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया.

crime

सोचा कि प्रेमप्रसंग का मामला है, इसलिए दोनों के घर वालों से कह दिया कि वे अपनीअपनी रिश्तेदारियों में उन्हें खोजें. जब मिल जाएं तो थाने आ कर खबर कर दें.

जब कहीं से भी शीतल और महेंद्र के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो दोनों के घर वालों ने मुरादाबाद के एसएसपी मनोज तिवारी, जिलाधिकारी सुहैर बिन सगीर, डीआईजी ओमकार सिंह से गुहार लगाई. इस पर भी उन की शिकायत पर कोई कारवाई नहीं हुई.

मजबूरन शीतल के घर वालों ने महिला थाने और एएसपी औफिस के बाहर जाम लगा दिया. महिला थाना और एएसपी औफिस आसपास ही स्थित हैं. एएसपी यशवीर सिंह ने शीतल के घर वालों को समझाबुझा कर भरोसा दिया कि पुलिस जल्द ही शीतल का पता लगाएगी. इस आश्वासन के बाद जाम खुल गया.

28 फरवरी, 2017 को संभल जिले के थाना असमोली के गांव घूंघरपुर का चेतन सिंह सुबह अपने आम के बाग में गया तो उस ने देखा कि कुछ कुत्ते किसी लाश को खा रहे हैं.

चेतन सिंह ने तुरंत इस की सूचना थाना असमोली पुलिस को फोन द्वारा दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी ब्रजेश यादव फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वह शव किसी महिला का था. घुटने के नीचे का हिस्सा छोड़ कर पूरी लाश कुत्ते खा गए थे. कपड़ों से पुलिस ने अनुमान लगाया कि लाश महिला की है. पास ही एक गड्ढा था, जिस से अंदाजा लगाया कि लाश इसी गड्डे में दफनाई गई थी.

एसआई मेघराज सिंह ने मौके की जरूरी काररवाई पूरी कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने उस का डीएनए कराने के लिए सैंपल सुरक्षित कर लिया.

अगले दिन किसी युवती की सड़ीगली लाश मिलने की खबर अखबार में छपी. अनीता के कई रिश्तेदार संभल में रहते थे. उन्हें पता था कि अनीता की बेटी शीतल कई दिनों से लापता है. अखबार में अज्ञात युवती की लाश मिलने की खबर पढ़ कर एक रिश्तेदार ने शीतल के घर वालों को फोन कर दिया.

यह जानकारी मिलने के बाद शीतल के पिता जसपाल सिंह पत्नी अनीता को ले कर थाना असमोली पहुंच गए. पुलिस ने जब बरामद कपड़े आदि उन्हें दिखाए तो दोनों ही फूटफूट कर रोने लगे. वे कपड़े उन की बेटी शीतल के थे. कपड़ों की शिनाख्त से स्पष्ट हो गया कि चेतन सिंह के बाग में जो लाश मिली थी, वह जसपाल की बेटी शीतल की थी.

19 मार्च, 2017 को जिला अमरोहा के थाना सैद नगली के गांव ढक्का निवासी शराफत हुसैन के आम के बाग में भी जमीन में गड़ी एक लाश को कुत्ते नोचनोच कर खा रहे थे. शराफत हुसैन ने थाना सैद नगली पुलिस को यह बात बताई तो थोड़ी देर में पुलिस मौके पर पहुंच गई.

पुलिस ने गड्ढा खोद कर जब लाश बाहर निकाली तो वह किसी पुरुष की थी, पर उस का सिर गायब था. घटनास्थल की तलाशी में वहां से थोड़ी दूरी पर एक मानव सिर मिल गया.

जल्दी ही इस लाश के मिलने की खबर पूरे जिले में फैल गई. थाना मझोला में शीतल और महेंद्र की गुमशुदगी दर्ज थी. शीतल की लाश संभल के थाना असमोली में मिल चुकी थी, जबकि महेंद्र के बारे में अभी तक कुछ नहीं पता चला था.

इसलिए मुरादाबाद के थाना मझोला की पुलिस 20 मार्च, 2017 को महेंद्र के 3 भाइयों कमल, सतपाल और अशोक को साथ ले कर थाना सैद नगली पहुंची. तीनों भाइयों ने उस शव की शिनाख्त अपने भाई महेंद्र के शव के रूप में कर दी. पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम करवा कर शव महेंद्र के भाइयों को सौंप दिया.

crime

20मार्च, 2017 को महेंद्र का शव मुरादाबाद आया तो लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. सैकड़ों लोग शव को ले कर सम्राटनगर गेट के पास साईं अस्पताल के सामने दिल्ली रोड पर पहुंच गए. राष्ट्रीय राजमार्ग पर महेंद्र की लाश रख कर जाम लगा दिया. गांगन तिराहे से ले कर स्टेशन रोड, हरिद्वार रोड पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया. जाम की सूचना मिलते ही थाना मझोला पुलिस के साथ एएसपी डा. यशवीर सिंह भी पहुंच गए.

भीड़ आक्रोशित थी. वह हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग कर रही थी. माहौल को देखते हुए मुरादाबाद के अन्य थानों की पुलिस बुला ली गई. पुलिस के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी पहुंच गए. उन्होंने भीड़ को आश्वासन दिया कि अभियुक्तों को 5 दिनों के अंदर गिरफ्तार कर लिया जाएगा. इस आश्वासन के बाद शाम 4 बजे से लगा जाम रात 8 बजे खुला.

जाम स्थल पर ही महेंद्र की अर्थी तैयार की गई और उसे लोको शेड शमशान घाट ले जा कर अंतिम संस्कार कर दिया गया. शीतल की मां अनीता ने बताया था कि 16 फरवरी को अरविंद शीतल को बुला कर ले गया था. उस के बाद वह लौट कर नहीं आई थी और अब तो अरविंद भी अपने घर से गायब था. महेंद्र के घर वालों ने भी प्रौपर्टी डीलर अरविंद पर शक जाहिर किया था.

पुलिस ने अरविंद के घर दबिश दी, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पुलिस ने उस के घर वालों पर दबाव बनाया. इस का नतीजा यह निकला कि अरविंद ने 23 मार्च, 2017 को मुरादाबाद की सीजेएम कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से पुलिस ने उसे 2 दिनों के रिमांड पर ले कर पूछताछ की.

पूछताछ में अरविंद ने स्वीकार कर लिया कि शीतल और महेंद्र की हत्या उसी ने कराई थी. इस के बाद उस ने दोनों हत्याओं की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

अरविंद की बहन दुर्गेश का गांव में ही बुटीक था. शीतल उसी के बुटीक पर काम करती थी. चूंकि वह उस की बहन की सहेली थी, इसलिए अरविंद उसे मुंहबोली बहन मानता था. दुर्गेश का शीतल के यहां आनाजाना था. उसी बीच सिरकोई भूड़ निवासी महेंद्र के अवैध संबंध दुर्गेश से हो गए. महेंद्र प्रौपर्टी डीलर का काम करता था.

घर वालों ने दुर्गेश को बहुत समझाया कि वह महेंद्र से संबंध न रखे, क्योंकि वह उन की बिरादरी का नहीं है. घर वालों के समझाने से दुर्गेश मान गई. इस के बाद घर वालों ने दुर्गेश की आननफानन में शादी कर दी. कुछ दिनों ससुराल में रह कर दुर्गेश मायके आ कर रहने लगी.

जब दुर्गेश के पति को पता चला कि उस की पत्नी के महेंद्र से संबंध थे तो उस ने दुर्गेश को तलाक दे दिया. इसी वजह से अरविंद महेंद्र से रंजिश रखने लगा.

पति से तलाक होने के बाद दुर्गेश का महेंद्र से मिलनाजुलना फिर से शुरू हो गया. घर वालों के समझाने के बाद भी दुर्गेश ने उस से मिलना बंद नहीं किया. इस की वजह से उन की बदनामी हो रही थी. एक दिन अरविंद ने गुस्से में दुर्गेश को गला घोंट कर मार डाला और लाश को सिरकोई भूड़ के पास रेलवे लाइन पर डाल आया.

ट्रेनों के गुजरने से दुर्गेश की लाश कट गई. रेलवे पुलिस और थाना मझोला पुलिस ने इसे आत्महत्या मान कर जांच आगे नहीं बढ़ाई. बहन को ठिकाने लगाने के बाद अरविंद ने ठान लिया कि वह महेंद्र को भी नहीं छोड़ेगा. वह महेंद्र को ठिकाने लगाने की योजना बनाने लगा.

कुछ दिनों पहले की बात है. शीतल का मोहल्ले के ही रवि से प्रेमसंबंध था. उस के घर वालों ने एक दिन उसे रवि के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. घर वालों ने रवि को थाना मझोला पुलिस के हवाले कर दिया. पुलिस ने जब शीतल से पूछताछ की तो घर वालों के दबाव में उस ने रवि के खिलाफ बयान दे दिया. पुलिस ने रवि को जेल भेज दिया. रवि अभी भी मुरादाबाद जेल में बंद है.

बाद में शीतल को अफसोस हुआ कि उसे घर वालों के दबाव में रवि के खिलाफ बयान नहीं देना चाहिए था, क्योंकि वह सचमुच उसे चाहती थी. वह अकसर अपने प्रेमी रवि से मिलने जेल जाती रहती थी. उस ने रवि को भरोसा दिया था कि वह उसे जल्दी ही छुड़ा लेगी.

शीतल किसी भी तरह रवि की जमानत कराना चाहती थी, पर इस के लिए उसे रुपयों की जरूरत थी. चूंकि अरविंद शीतल को बहन मानता था और शीतल भी उस पर भरोसा करती थी, इसलिए एक दिन उस ने अरविंद को कहा कि उस के बयान से रवि जेल चला गया है. पर अब वह उसे हर हालत में जेल से बाहर निकलवाना चाहती हूं.

अरविंद यह सुन कर बहुत खुश हुआ, क्योंकि जिस बात की वह योजना बना रहा था, वह शीतल की मदद से आसानी से पूरा हो सकती थी. उस ने कहा, ‘‘शीतल, तुम मेरी बहन हो. क्या मैं तुम्हारे इतने भी काम नहीं आ सकता. पर शीतल मेरा एक छोटा सा काम है, तुम उसे करा दो.’’

crime

‘‘बोलो, क्या करना है?’’ शीतल ने कहा.

‘‘देखो, आजकल महेंद्र से तुम्हारी कुछ ज्यादा ही बन रही है. तुम्हें तो पता है कि दुर्गेश की आत्महत्या के बाद से मैं महेंद्र से बात नहीं करता. हम दोनों प्रौपर्टी डीलिंग का काम करते हैं. कांशीरामनगर के पास एक बड़े प्लौट का सौदा मैं ने कर लिया है. महेंद्र उस में टांग अड़ा रहा है. वह पार्टी को मेरे बारे में उलटासीधा बता कर गुमराह कर रहा है. तुम्हें कुछ नहीं करना. बस तुम पार्टी के पास महेंद्र को ले आना. वहां पर आमनेसामने पार्टी से बात हो जाएगी. इस काम के लिए तुम्हें 50 हजार रुपए और एक प्लौट मिल जाएगा.’’ अरविंद ने कहा.

‘‘इतना सा काम है, यह तो मैं चुटकी बजा कर करा दूंगी.’’ शीतल ने कहा.

16 फरवरी, 2017 की शाम घूमने के बहाने वह महेंद्र को ले गई. दिल्ली रोड स्थित गांगन नदी के तिराहे से सैद नगली के लिए औटो बुक कर के वहां पहुंच गई. वहां अरविंद, सुपारीकिलर गुलाम, अरविंद का भाई राजू और मामा कल्लू मिल गए. सब ने मिल कर पहले शीतल की हत्या की, क्योंकि वह पूरे मामले की राजदार थी. इस के बाद उन्होंने महेंद्र को भी मौत के घाट उतार दिया.

इन लोगों ने महेंद्र की लाश सैद नगली के गांव ढक्का की एक बाग में गड्ढा खोद दबा दिया तो वहां से 2 किलोमीटर दूर संभल के थाना असमोली के गांव घूंघरपुर के एक बाग में शीतल को दफना दिया.

पुलिस ने अरविंद की निशानदेही पर मोबाइल फोन और हत्या में प्रयुक्त फरसा सोनकपुर के जंगल से बरामद कर लिया था. विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने अरविंद को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक अन्य अभियुक्त पुलिस के हाथ नहीं लगे थे. पुलिस सरगरमी से उन की तलाश कर रही थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

किरण की कहानी : प्यार दे या मार दे

रखने को तो घर वालों ने उस का नाम किरण रख दिया था, लेकिन मिडिल स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही उस की समझ में आ गया था कि उस की जिंदगी में उम्मीद की कोई किरण नहीं है. इस की वजह यह थी कि प्रकृति ने उस के साथ घोर अन्याय किया, जो उसे एक आंख से दिव्यांग बनाया था.

किरण न बहुत ज्यादा खूबसूरत थी और न ही किसी रईस घराने से ताल्लुक रखती थी. एक मामूली खातेपीते परिवार की यह साधारण सी युवती न तो अपनी उम्र की लड़कियों की तरह रोमांटिक सपने बुनती थी और न ही ज्यादा सजनेसंवरने की कोशिश करती थी. घर में पसरे अभाव भी उसे दिखाई देते थे तो खुद को ले कर पिता का चिंतित चेहरा भी उस की परेशानी का सबब बना रहता था.

उस के पिता डालचंद कौरव अब से कई साल पहले नरसिंहपुर जिले की तहसील गाडरवारा के गांव सूरजा से भोपाल आ कर बस गए थे. उन का मकसद बच्चों की बेहतर परवरिश और शहर में मेहनत कर के ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना था, जिस से घरपरिवार का जीवनस्तर सुधरे और धीरेधीरे ही सही, बच्चों का भविष्य बन सके. इस के लिए वह खूब मेहनत करते थे. लेकिन आमदनी अगर चवन्नी होती थी तो पता चलता था कि महंगाई की वजह से खर्चा एक रुपए का है.

वह भोपाल में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे, जहां से मिलने वाले वेतन से खींचतान कर किसी तरह खर्च चल जाता था. 3 बेटियों के पिता डालचंद बड़ी बेटी की शादी ठीकठाक और खातेपीते परिवार में कर चुके थे. उस के बाद किरण को ले कर उन की चिंता स्वाभाविक थी, क्योंकि आजकल हर कोई उस लड़की से शादी करने से कतराता है, जिस के शरीर में कोई कमी हो.

सयानी होती किरण की भी समझ में यह बात आ गई थी कि एक आंख कमजोर होने की वजह से सपनों का कोई राजकुमार उसे ब्याहने नहीं आएगा. शादी होगी भी तो वह बेमेल ही होगी, इसलिए उस ने काफी सोचविचार के बाद तय कर लिया कि जो भी होगा, देखा जाएगा. हालफिलहाल तो पढ़ाई और कैरियर पर ध्यान दिया जाए. अपने एकलौते भाई राजू को वह बहुत चाहती थी, जो बाहर की भागादौड़ी के सारे काम तेजी और संयम से निपटाता था. यही नहीं, वह पढ़ाई में भी ठीकठाक था.

छोटी बहन आरती भोपाल के प्रतिष्ठित सैम कालेज में पढ़ रही थी. किरण भी वहीं से बीकौम की पढ़ाई कर रही थी. वह स्वाभिमानी भी थी और समझदार भी, लिहाजा उस ने मीनाल रेजीडेंसी स्थित एजिस नाम के कालसैंटर में पार्टटाइम नौकरी कर ली थी. वहां से मिलने वाली तनख्वाह से वह अपनी पढ़ाई का और अन्य खर्च उठा लेती थी.

21 अक्तूबर, 2016 को किरण अपने घर ई-34 सिद्धार्थ लेकसिटी, आनंदनगर से रोज की तरह कालेज जाने को तैयार हुई तो घर का माहौल रोज की तरह ही था. चायनाश्ते का दौर खत्म हो चुका था और सभी अपनेअपने औफिस, स्कूल और कालेज जाने के लिए तैयार हो रहे थे.

किरण भी तैयार थी. वह कालेज के लिए घर से निकलने लगी तो चाचा संबल कौरव से खर्चे के लिए कुछ पैसे मांगे. उन्होंने उसे 20 रुपए दे दिए. किरण का भाई राजू भी तैयार था, इसलिए किरण उस के साथ चली गई. ऐसा लगभग रोज ही होता था कि जब किरण जाने लगती थी तो राजू उस के साथ हो लेता था और उसे सैम कालेज के गेट पर छोड़ देता था. उस दिन भी उस ने किरण को कालेज के गेट पर छोड़ा तो वह चुपचाप अंदर दाखिल हो गई. उन दिनों सैम कालेज में निर्माण कार्य चल रहा था.

राजू को कतई अहसास नहीं था कि बहन के दिलोदिमाग में एक ऐसा तूफान उमड़ रहा है, जो उस की जिंदगी लील लेगा. वह दीदी को बाय कह कर वापस चला गया तो किरण सीधे कालेज की निर्माणाधीन बिल्डिंग ब्लौक की छत पर जा पहुंची और चौथी मंजिल पर जा कर खड़ी हो गई. उस के दिल में उमड़ता तूफान अब शबाब पर था, जिस का मुकाबला करने की हिम्मत अब उस में नहीं रह गई थी. लिहाजा वह चौथी मंजिल से सीधे नीचे कूद गई.

इस के बाद सैम कालेज में हल्ला मच गया. इतनी ऊंचाई से नीचे कूदने के बाद किरण के जिंदा बचने का कोई सवाल ही नहीं था. जरा सी देर में छात्रों की भीड़ इकट्ठा हो गई. इस बात की खबर कालेज प्रबंधन तक भी पहुंच गई. फलस्वरूप उसे तुरंत नजदीकी नर्मदा अस्पताल पहुंचाया गया. अस्पताल से पुलिस को खबर कर दी गई. किरण को देखने के बाद डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

कालेज प्रबंधन ने किरण की बहन आरती को इस हादसे की सूचना दी तो उस ने घर वालों को बताया. घर वाले भागेभागे नर्मदा अस्पताल पहुंचे, लेकिन तब तक किरण दुनिया को अलविदा कह चुकी थी. उस के पास से कोई सुसाइड नोट भी नहीं मिला था, जबकि आमतौर पर ऐसा नहीं होता कि कोई पढ़ीलिखी समझदार युवती खुदकुशी करे और सुसाइड नोट न छोड़े. पर इस मामले में ऐसा ही हुआ था. कौरव परिवार में रोनाधोना मच गया था. किरण के सहपाठी भी दुखी थे कि आखिर जिंदादिल किरण ने ऐसा आत्मघाती कदम क्यों उठाया.

पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाते हुए छानबीन और पूछताछ शुरू की. जिस खुदकुशी को गुत्थी समझा जा रहा था, वह चंद घंटों में सुलझ गई, जो प्यार में धोखा खाई हीनभावना से ग्रस्त एक लड़की की दर्दभरी छोटी सी कहानी निकली.

किरण ने सुसाइड नोट छोड़ने की जरूरत शायद इसलिए नहीं समझी थी, क्योंकि उसे जो कहना था, उसे वह अपने फेसबुक एकाउंट में लिख चुकी थी. किरण के घर और कालेज वाले यह जान कर हैरान हो उठे थे कि किरण किसी से प्यार करती थी और वह भी इतना अधिक कि अपने प्रेमी की बेरुखी से घबरा गई थी और उसे कई दिनों से मनाने की कोशिश कर रही थी.

सैम कालेज से बीई कर रहा रोहित किरण का बौयफ्रैंड था, जो बीते कुछ दिनों से उसे भाव नहीं दे रहा था. रोहित की दोस्ती और प्यार ने किरण के मन में जीने की उम्मीद जगा दी थी, उस की नींद में कई रोमांटिक ख्वाब पिरो दिए थे. इस से उसे लगने लगा था कि अभी भी दुनिया में ऐसे तमाम लड़के हैं, जो प्यार के सही मतलब समझते हैं. जातिपांत, ऊंचनीच और शारीरिक कमियों पर ध्यान नहीं देते. उन के लिए सूरत से ज्यादा सीरत अहम होती है.

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था, पर कुछ दिनों से रोहित का मूड उखड़ाउखड़ा रहता था. वह किरण से बात भी नहीं कर रहा था. उस का यह रवैया किरण की समझ में नहीं आ रहा था. अगर रोहित उसे वजह बताता तो तय था कि वह किसी न किसी तरह उसे मना लेती, कोई गलतफहमी होती तो वह उसे दूर कर देती. लेकिन रोहित की इस बेरुखी से किरण को अपने ख्वाब उजड़ते नजर आए और वह खुद को ठगा सा महसूस करने लगी.

जब प्रेमी बात ही नहीं कर रहा था तो वह क्या करती  लिहाजा किरण ने फेसबुक पर कशिश कौरव नाम से बनाए अपने एकाउंट पर मन की व्यथा साझा करनी शुरू कर दी. अपने पोस्टों में उस ने बौयफ्रैंड के छोड़े जाने यानी ब्रेकअप की बात कही और भावुकता में अपने सुसाइड की बात भी कह डाली थी. शायद ही नहीं, निश्चित रूप से वह अपने प्रेमी को अपने दिल का दर्द बताना चाह रही थी, जो उस की सांसों में बस चुका था.

एक जगह उस ने शायराना अंदाज में लिखा था, ‘ऐ इश्क तुझे खुदा की कसम या तो मुझे मेरा प्यार दे या फिर मुझे मार दे.’

प्यार नहीं मिला तो किरण ने खुद के लिए मौत चुनने की नादानी कर डाली, वह भी इस तरह कि कोई रोहित पर सीधे अंगुली न उठा सके. लेकिन फेसबुक एकाउंट में अपने प्यार और प्रेमी की बेरुखी की चर्चा कर के उस ने उसे शक के दायरे में तो ला ही दिया था. दूसरे दिन पुलिस ने साईंखेड़ा स्थित रोहित के घर में दबिश दी, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. जाहिर है, किरण की खुदकुशी के बाद वह गिरफ्तारी के डर से फरार हो गया था.

पुलिस ने कालेज में पूछताछ की तो एक बात यह भी सामने आई कि रोहित और किरण में दोस्ती तो थी, पर प्यार जैसी कोई बात उन के बीच नहीं थी. किरण की कुछ सहेलियों ने दबी जुबान से स्वीकार किया था कि वह रोहित से एकतरफा प्यार करती थी. इस का मतलब तो यही हुआ कि किरण दोस्ती को प्यार मानते हुए जबरदस्ती रोहित के गले पड़ना चाहती थी. इस बात का खुलासा अब रोहित ही कर सकता है, जो कथा लिखे जाने तक पुलिस की पकड़ में नहीं आया था.

किरण भावुक थी और रोहित को ले कर शायद वह जरूरत से ज्यादा जज्बाती हो गई थी. इस की एक वजह उस की आंख की विकृति से उपजी हीनभावना भी हो सकती है. रोहित से दोस्ती के बाद निस्संदेह उस की यह सोच और भी गहरा गई होगी. फेसबुक पर उस ने तरहतरह से रोहित को मनाने की कोशिश की थी, लेकिन असफल रही थी.

जब उसे लगा कि यार और प्यार नहीं तो जिंदगी क्यों, जो अब किसी के काम की नहीं. यही सोच कर उस ने यह खतरनाक फैसला ले डाला होगा.

कौरव परिवार ने इस गम में दिवाली नहीं मनाई. उन्हें अपनी लाडली किरण की मौत के बारे में यकीन ही नहीं हो रहा है. उन्हें लगता ही नहीं कि अब वह इस दुनिया में नहीं है. डालचंद के चेहरे पर विषाद है, पर इसलिए नहीं कि किरण ने उन की चिंता हमेशा के लिए दूर कर दी है, बल्कि इसलिए कि उन की बेटी ने जल्दबाजी में आत्मघाती फैसला ले लिया और खुद ही हमेशा के लिए उन से दूर चली गई.

रोहित का कुछ खास बिगड़ेगा, ऐसा नहीं लग रहा. क्योंकि उस ने अगर किरण से कुछ वादे किए भी होंगे तो उन के प्रमाण नहीं हैं और न ही किरण ने उसे सीधे तौर पर अपनी खुदकुशी का जिम्मेदार ठहराया है.

संभव है कि वह दोस्ती को प्यार समझते हुए मन ही मन रोहित को चाहने लगी हो और ठुकराए जाने पर व्यथित हो कर टूट गई हो. लेकिन वह हौसला और सब्र रख कर जिंदा रहती तो शायद बात बन जाती.

प्यार के लिए दबंगई कहां तक जायज

उत्तर प्रदेश के महानगर मुरादाबाद के लाइनपार इलाके के रहने वाले महावीर सिंह सैनी के परिवार में उस की पत्नी शारदा के अलावा एक बेटा अंकित और 3 बेटियां थीं. 2 बेटियों की शादी हो चुकी थी. तीसरे नंबर की बेटी पूनम 9वीं कक्षा में पढ़ रही थी. महावीर राजमिस्त्री था. रोजाना की तरह 10 दिसंबर, 2016 को भी वह अपने काम पर चला गया था. बेटा अंकित ट्यूशन पढ़ने गया था. घर पर शारदा और उस की बेटी पूनम ही थी. सुबह करीब 10 बजे जब शारदा नहाने के लिए बाथरूम में गई तब पूनम घर के काम निपटा रही थी. शारदा को बाथरूम में घुसे 5-10 मिनट ही हुए थे कि उस ने चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुनीं. चीख उस की बेटी पूनम की थी.

चीख सुन कर शारदा घबरा गई. उस ने बड़ी फुरती से कपड़े पहने और बाथरूम से बाहर निकली तो देखा पूनम आग की लपटों से घिरी थी. उस के शरीर पर आग लगी थी. शोर मचाते हुए वह पूनम के कपड़ों की आग बुझाने में लग गई. उस की आवाज सुन कर पड़ोसी भी वहां आ गए. किसी तरह उन्होंने बुझाई. तब तक पूनम काफी झुलस चुकी थी और बेहोश थी. आननफानन में लोग उसे राजकीय जिला चिकित्सालय ले गए. बेटी के शरीर के कपड़ों में लगी आग बुझाने की कोशिश में शारदा के हाथ भी झुलस गए थे.

अस्पताल से इस मामले की सूचना पुलिस को दे दी गई. कुछ ही देर में थाना मझोला के थानाप्रभारी नवरत्न गौतम पुलिस टीम के साथ अस्पताल पहुंच गए. खबर मिलने पर पूनम के पिता महावीर भी अस्पताल आ गए. डाक्टरों के इलाज के बाद पूनम होश में आ गई थी. पूनम के बयान लेने जरूरी थे. इसलिए पुलिस ने इलाके के मजिस्ट्रैट को सूचना दे कर अस्पताल बुलवा लिया.

पुलिस और मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में पूनम ने बताया कि शिवदत्त ने उस के ऊपर केरोसिन डाल कर आग लगाई थी. उस के साथ उस के पिता महीलाल भी थे. शिवदत्त पूनम के घर के पास चामुंडा वाली गली में रहता था. पता चला कि वह पूनम से एकतरफा प्यार करता था.

थानाप्रभारी नवरत्न गौतम ने यह जानकारी उच्चाधिकारियों को भी दे दी. मामला मुरादाबाद शहर का ही था इसलिए तत्कालीन एसएसपी दिनेशचंद्र दूबे और एएसपी डा. यशवीर सिंह जिला अस्पताल पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने पूनम का इलाज कर रहे डाक्टरों से बात की.

तब तक पूनम की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ने लगी थी. डाक्टरों ने उसे किसी दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दी. पूनम के घर वालों ने उसे दिल्ली ले जाने को कहा तो जिला अस्पताल से पूनम को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के लिए रैफर कर दिया गया.

महावीर की तहरीर पर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली. चूंकि पूनम ने शिवदत्त और उस के पिता पर आरोप लगाया था, इसलिए पुलिस ने शिवदत्त के घर दबिश दी पर उस के घर कोई नहीं मिला. पुलिस संभावित जगहों पर उन्हें तलाश करने लगी, पर दोनों बापबेटों में से कोई भी पुलिस के हत्थे नहीं लगा.

उधर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भरती पूरम की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. उस की हालत बिगड़ती जा रही थी. बर्न विभाग के डाक्टरों की टीम पूनम को बचाने में लगी हुई थी पर उन्हें सफलता नहीं मिल सकी. आखिर 10 दिसंबर की रात को ही पूनम ने दम तोड़ दिया.

अगले दिन जवान बेटी की हृदयविदारक मौत की खबर जब उस के मोहल्ले वालों को मिली तो पूरे मोहल्ले में जैसे मातम छा गया. आरोपी को अभी तक गिरफ्तार न किए जाने से लोग आक्रोशित थे. कहीं लोगों का गुस्सा भड़क न जाए इसलिए उस इलाके में भारी तादाद में पुलिस तैनात कर दी गई.

रविवार होने की वजह से पूनम की लाश का पोस्टमार्टम सोमवार 12 दिसंबर को हुआ. दोपहर बाद उस की लाश दिल्ली से मुरादाबाद लाई गई. पुलिस मोहल्ले के गणमान्य लोगों से बात कर के माहौल को सामान्य बनाए रही. अंतिम संस्कार के समय भी भारी मात्रा में पुलिस थी.

उधर पुलिस की कई टीमें आरोपियों को तलाशने में जुटी हुई थीं. जांच टीमों पर एसएसपी का भारी दबाव था. आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई. 12 दिसंबर को पुलिस ने शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया. उस के गिरफ्तार होने के बाद लोगों का गुस्सा शांत हुआ.

थाने ला कर एसएसपी और एएसपी के सामने थानाप्रभारी नवरत्न गौतम ने अभियुक्त से पूछताछ की तो पहले तो वह पुलिस को बेवकूफ बनाने की कोशिश करता रहा पर उस का यह झूठ ज्यादा देर तक पुलिस के सामने नहीं टिक सका. उस ने पूनम को जलाने का अपराध स्वीकार कर उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

जिला मुरादाबाद के लाइनपार इलाके में मंडी समिति गेट के सामने की बस्ती में रहने वाला महावीर सिंह अपने राजगीर के काम से परिवार का पालनपोषण कर रहा था. इसी की कमाई से वह 2 बेटियों की शादी कर चुका था. पूनम 9वीं की पढ़ाई के साथ महिलाओं के कपड़े सिलती थी. घर के पास ही उस ने बुटीक खोल रखा था.

उस के घर के पास ही महीलाल का मकान था. महीलाल का बेटा शिवदत्त बदमाश प्रवृत्ति का था. उस की दोस्ती मंडी समिति के पास स्थित बिजलीघर में तैनात कर्मचारियों के साथ थी. उन्हीं की वजह से उसे ट्रांसफार्मर रखने के लिए बनाए जाने वाले चबूतरों का ठेका मिल जाता था.

चूंकि शिवदत्त का पड़ोसी महावीर राजमिस्त्री था, इसलिए उसी के द्वारा वह चबूतरे बनवा देता था. इस से कुछ पैसे शिवदत्त को बच जाते थे. काम की वजह से शिवदत्त का महावीर के घर आनाजाना शुरू हो गया था.

महावीर की छोटी बेटी पूनम पर शिवदत्त की नजर पहले से ही थी. जब भी वह घर से निकलती तो वह उसे ताड़ता रहता था. पर पूनम ने उसे लिफ्ट नहीं दी. जब शिवदत्त का पूनम के घर आनाजाना शुरू हो गया तो उस ने पूनम के नजदीक पहुंचने की कोशिश की.

जब वह पूनम को ज्यादा ही परेशान करने लगा तो एक दिन पूनम ने इस की शिकायत अपनी मां से कर दी. इस के बाद शारदा ने यह बात पति को बताई तो महावीर ने शिवदत्त के पिता महीलाल से शिकायत करने के साथ शिवदत्त से बातचीत बंद कर दी. इस के अलावा उस ने अपने घर आने को भी उसे साफ मना कर दिया.

शिवदत्त दबंग था. महावीर द्वारा उस के पिता से शिकायत करने की बात उसे बहुत बुरी लगी. वह पूरी तरह से दादागिरी पर उतर आया और अब पूनम को खुले रूप से धमकी देने लगा कि वह उस से शादी करे नहीं तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. महावीर ने फिर से महीलाल से शिकायत की. इस बार महीलाल ने अपने बेटे शिवदत्त का ही पक्ष लिया.

महावीर कोई लड़ाईझगड़ा नहीं करना चाहता था. बात बढ़ाने के बजाय वह चुप हो कर बैठ गया. महावीर के रिश्तेदारों और मोहल्ले के कुछ लोगों ने उस से थाने में शिकायत करने का सुझाव दिया पर बेटी की बदनामी को देखते हुए वह थाने नहीं गया.

महावीर के चुप होने के बाद शिवदत्त का हौसला और बढ़ गया. वह पूनम को और ज्यादा तंग करने लगा. इतना ही नहीं, वह कई बार पूनम के घर तमंचा ले कर भी पहुंचा.

हर बार वह उस से शादी करने की धमकी देता. घटना से एक दिन पहले भी वह पूनम के घर गया. तमंचा निकाल कर उस ने धमकी दी कि वह शादी के लिए अभी भी मान जाए वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहे.

10 दिसंबर को शिवदत्त फिर से पूनम के घर जा धमका. उस दिन वह अपने साथ एक केन में केरोसिन भी ले गया था. पूनम उस समय घर में झाड़ू लगा रही थी, तभी उस ने उस पर केरोसिन उड़ेल कर आग लगा दी और वहां से भाग गया.

शिवदत्त से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

तत्कालीन एसएसपी दिनेशचंद्र दूबे का कहना था कि इस मामले में शिवदत्त के अलावा और कोई दोषी पाया गया तो उस के खिलाफ भी कानूनी काररवाई की जाएगी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बेबी को पति नहीं प्रेमी पसंद है

14 नवंबर, 2016 की शाम उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के थाना नैनी के मोहल्ला करबला का रहने वाला मोहम्मद हुसैन रोज की अपेक्षा आज कुछ जल्दी ही घर आ गया था. हाथमुंह धोने के बाद वह चाय पी कर टीवी देखते हुए 2 साल की बेटी शैजल के साथ खेलने लगा तो पत्नी बेबी ने पास आ कर कहा, ‘‘लगता है, अब आप को कहीं नहीं जाना?’’

‘‘क्यों, कोई काम है क्या?’’

‘‘हां, अगर आप को कहीं नहीं जाना तो चल कर मेरे मोबाइल का चार्जर खरीदवा लाओ. कितने दिनों से खराब पड़ा है. दूसरे का चार्जर मांग कर कब तक काम चलेगा.’’

हुसैन बेबी की बात को टाल नहीं सका और फौरन तैयार हो गया. बेबी को भी साथ जाना था, इसलिए वह भी फटाफट तैयार हो गई. बेटी को उस ने सास के हवाले किया और पति के साथ बाजार के लिए चल पड़ी.

मोबाइल शौप उन के घर से महज 2 सौ मीटर की दूरी पर थी. जैसे ही दोनों दुकान के सामने पहुंचे, एक मोटरसाइकिल उन के सामने आ कर रुकी. मोटरसाइकिल सवार हेलमेट लगाए था, इसलिए कोई उसे पहचान नहीं सका. पतिपत्नी कुछ समझ पाते, उस के पहले ही उस ने कमर में खोंसा तमंचा निकाला और हुसैन के सीने पर रख कर गोली दाग दी.

गोली लगते ही हुसैन जमीन पर गिर पड़ा. शाम का समय था इसलिए बाजार में काफी भीड़भाड़ थी. पहले तो लोगों की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ. लेकिन जैसे ही लोगों को सच्चाई का पता चला, बाजार में अफरातफरी मच गई. धड़ाधड़ दुकानों के शटर गिरने लगे. इस अफरातफरी का फायदा उठा कर बदमाश भाग गया. कोई भी उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सका.

हुसैन का घर घटनास्थल के नजदीक ही था, इसलिए उसे गोली मारे जाने की सूचना जल्दी ही उस के घर तक पहुंच गई. खून से लथपथ जमीन पर पड़ा हुसैन तड़प रहा था. बेबी उस का सिर गोद में लिए रो रही थी.

सूचना मिलते ही आननफानन में हुसैन के घर वाले और पड़ोसी आ गए थे. घटना की सूचना पा कर थाना नैनी की पुलिस भी आ गई थी. चूंकि हुसैन की सांसें चल रही थीं, इसलिए पुलिस और घर वाले उसे उठा कर पास के एक नर्सिंगहोम में ले गए. उस की हालत काफी नाजुक थी, इसलिए नर्सिंगहोम के डाक्टरों ने उसे स्वरूपरानी नेहरू जिला चिकित्सालय ले जाने की सलाह दी. लेकिन हुसैन की हालत प्रति पल बिगड़ती ही जा रही थी.

पुलिस हुसैन को ले कर जिला अस्पताल ले गई लेकिन वहां पहुंचतेपहुंचते उस की मौत हो चुकी थी. वहां के डाक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया. हुसैन की मौत की जानकारी होते ही उस के घर में कोहराम मच गया. मां और पत्नी का रोरो कर बुरा हाल था. इस हत्या की सूचना पा कर एसपी (गंगापार) ए.के. राय, सीओ करछना बृजनंदन एवं नैनी समेत कई थानों की पुलिस आ गई थी.

हुसैन के बड़े भाई नफीस की तहरीर पर थाना नैनी पुलिस ने हुसैन की बीवी बेबी और उस के प्रेमी सल्लन मौलाना के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर बेबी को तुरंत हिरासत में ले लिया था.

अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद हुसैन का शव उस के घर वालों को सौंप दिया गया था. उस के अंतिम संस्कार के बाद बेबी से पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह खुद को निर्दोष बताती रही, लेकिन जब पुलिस ने मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए सवालों की झड़ी लगाई तो वह असलियत छिपा नहीं सकी. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने पति की हत्या उस के दोस्त सल्लन मौलाना से कराई थी. इस के बाद पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर 16 नवंबर को छिवकी जंक्शन से सल्लन को भी गिरफ्तार कर लिया था.

थाना नैनी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अवधेश प्रताप सिंह और अन्य पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में मृतक हुसैन की पत्नी बेबी बेगम और दोस्ती में दगा देने वाले सल्लन ने हुसैन की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

इलाहाबाद में यमुनापार स्थित थाना नैनी के मुरादपुर करबला निवासी मोहम्मद हुसैन का निकाह सन 2013 में कोरांव गांव की रहने वाली बेबी के साथ हुआ था. हुसैन औटो चलाता था. वह इतना कमा लेता था कि परिवार हंसीखुशी से रह रहा था. शादी के करीब साल भर बाद ही वह बेटी शैजल का बाप बन गया तो उस का परिवार भरापूरा हो गया.

हुसैन की दोस्ती मोहल्ला लोकपुर के रहने वाले सल्लन से थी, जो थाना नैनी का हिस्ट्रीशीटर था. मुरादपुर अरैल में उस की तूती बोलती थी. वह मौलाना के नाम से मशहूर था. सल्लन मोहम्मद हुसैन के घर भी आताजाता था. इसी आनेजाने में कब सल्लन और हुसैन की पत्नी बेबी की आंखें चार हो गईं, हुसैन को पता नहीं चला. क्योंकि वह तो अपने दोस्त सल्लन पर आंखें मूंद कर विश्वास करता था.

आंखें चार होने के बाद सल्लन अपने दोस्त हुसैन की अनुपस्थिति में भी उस के घर आनेजाने लगा. जैसे ही हुसैन औटो ले कर घर से निकलता, बेबी सल्लन को फोन कर के घर बुला लेती. इस के बाद दोनों ऐश करते. ऐसी बातें छिपी तो रहती नहीं, सल्लन और बेबी के संबंधों की जानकारी पहले मोहल्ले वालों को, उस के बाद हुसैन तथा उस के घर वालों को हो गई.

लेकिन सल्लन के डर से कोई सीधे उस से कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. लेकिन जब मोहल्ले वाले हुसैन और उस के घर वालों पर तंज कसने लगे तो घर वालों ने हुसैन पर सल्लन से दोस्ती खत्म कर के उस के घर आनेजाने पर पाबंदी लगाने को कहा. उन का कहना था कि अगर इसी तरह चलता रहा तो बेबी नाक कटवा सकती है.

उस समय तो हुसैन कुछ नहीं बोला, लेकिन पत्नी की बेवफाई पर वह तड़प कर रह गया. दोस्त सल्लन की करतूत सुन कर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. इतना सब जानने के बाद भी उस ने सल्लन से कुछ नहीं कहा. इसलिए उस की और सल्लन की दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा. अलबत्ता हुसैन ने बेबी पर जरूर शिकंजा कसा. उस ने उसे समझाया कि वह जो कर रही है, वह ठीक नहीं है.

बेबी ने हुसैन को सफाई दी कि लोग उसे बिनावजह बदनाम कर रहे हैं. कभीकभार सल्लन उसे पूछने घर आ जाता है तो क्या वह उसे घर से भगा दे. बेबी ने सफाई भले दे दी, लेकिन वह समझ गई कि पति को उस के और सल्लन के संबंधों का पता चल गया है. यही नहीं, उसे यह भी पता चल गया था कि इस की शिकायत हुसैन के भाई हसीन ने की थी. इसलिए उस ने सल्लन से उसे सबक सिखाने के लिए कह दिया ताकि दोनों आराम से मौजमस्ती कर सकें.

हसीन ने जो किया था, वह सल्लन को बुरा तो बहुत लगा लेकिन न जाने क्यों वह शांत रहा. शायद ऐसा उस ने हुसैन की वजह से किया था. उस के बाद उस ने हुसैन के घर भी आनाजाना कम कर दिया था. लेकिन मौका मिलते ही बेबी से मिलने जरूर आ जाता था. इसी का नतीजा यह निकला कि एक दिन हुसैन दोपहर में घर आ गया और उस ने बेबी व सल्लन को रंगेहाथों पकड़ लिया.

सल्लन तो सिर झुका कर चला गया, लेकिन बेबी कहां जाती. पत्नी की कारगुजारी आंखों से देख कर हुसैन का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. क्योंकि उस पर भरोसा कर के उस ने घर वालों तक की बात नहीं मानी थी. उस गुस्से में हुसैन ने बेबी की जम कर पिटाई कर दी. इस के बाद बेबी ने कान पकड़ कर माफी मांगी कि अब वह इस तरह की गलती दोबारा नहीं करेगी.

हुसैन ने पत्नी को माफ तो कर दिया, लेकिन अब उसे न तो पत्नी पर भरोसा रहा और न दोस्त सल्लन पर. इसलिए वह दोनों पर नजर रखने लगा. बेबी ने पति से माफी जरूर मांग ली थी, लेकिन अपनी हरकतों से बाज नहीं आई.

चोरीछिपे वह सल्लन से फोन पर बातें करती रहती. इस का नतीजा यह निकला कि सन 2016 के जुलाई महीने के अंतिम सप्ताह में वह सल्लन के साथ भाग गई. इस से मोहल्ले और रिश्तेदारी में काफी बदनामी हुई. इस के बाद दोनों के घर वालों के बड़ेबुजुर्गों के हस्तक्षेप के बाद हुसैन और उस के घर वाले बेबी को अपने घर ले आए.

दरअसल, बेबी के मायके वालों को उस की यह हरकत काफी बुरी लगी थी. वे नहीं चाहते थे कि बेबी अपना अच्छाखासा बसाबसाया घर बरबाद कर के एक गुंडे के साथ रहे. क्योंकि इस से उन की भी बदनामी हई थी. सब के दबाव में हुसैन बेबी को घर तो ले आया था लेकिन घर आने के बाद उस ने उस की जम कर धुनाई की थी.

महीने, 2 महीने तक तो सब ठीक रहा, लेकिन इस के बाद बेबी फिर पहले की तरह फोन पर अपने यार सल्लन से बातें करने लगी. शायद उसी के कहने पर सल्लन ने हुसैन के छोटे भाई पर गोली चलाई थी, जिस में वह बालबाल बच गया था. हसीन ने इस वारदात की रिपोर्ट दर्ज करानी चाही तो इस बार भी बड़ेबुजुर्गों ने बीच में पड़ कर दोनों पक्षों का थाने में समझौता करा दिया.

बेबी से सल्लन की जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही थी. यही हाल सल्लन का भी था. दोनों ही एकदूसरे के बिना रहने को तैयार नहीं थे. लेकिन बेबी ऐसा नाटक कर रही थी, जैसे हुसैन ही अब उस का सब कुछ है.

पत्नी में आए बदलाव से हुसैन पिछली बातें भूल कर उसे माफ कर चुका था. हुसैन की यह अच्छी सोच थी, जबकि बेबी कुछ और ही सोच रही थी. अब वह पति को राह का कांटा समझने लगी थी, जिसे वह जल्द से जल्द निकालने पर विचार कर रही थी. क्योंकि अब वह पूरी तरह सल्लन की होना चाहती थी.

मन में यह विचार आते ही एक दिन उस ने प्रेमी से बातें करतेकरते रोते हुए कहा, ‘‘सल्लन, अब मुझ से तुम्हारी जुदाई बरदाश्त नहीं होती. हुसैन मुझे छूता है तो लगता है कि मेरे शरीर पर कीड़े रेंग रहे हैं. अब तुम मुझे हुसैन से मुक्त कराओ या मुझे मार दो. ये दोहरी जिंदगी जीतेजीते मैं खुद तंग आ गई हूं.’’

बेबी की बातें सुन कर सल्लन तड़प उठा. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें मरने की क्या जरूरत है. मरेंगे तुम्हारे दुश्मन. बेबी, जो हाल तुम्हारा है, वही मेरा भी है. तुम कह रही हो तो मैं जल्दी ही प्यार की राह में रोड़ा बन रहे हुसैन को ठिकाने लगाए देता हूं.’’

इस के बाद बेबी और सल्लन ने मोबाइल फोन पर ही हुसैन को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. उसी योजना के अनुसार, 14 नवंबर, 2016 की शाम बेबी हुसैन को चार्जर खरीदवाने के बहाने लोकपुर मोहल्ला स्थित मोबाइल शौप पर ले आई, जहां पहले से घात लगाए बैठे सल्लन मौलाना ने गोली मार कर हुसैन की हत्या कर दी.

सल्लन की निशानदेही पर थाना नैनी पुलिस ने 315 बोर का देसी पिस्तौल और एक जिंदा कारतूस बरामद कर लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने सल्लन और बेबी को इलाहाबाद अदालत में पेश किया था, जहां से दोनों को जिला कारागार, नैनी भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की जमानत नहीं हुई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मजा, जो बन गया सजा

न्यू आगरा के रहने वाले रामप्रसाद ने मंजू की शादी कर के यही सोचा था कि वह बेटी से मुक्ति पा गए हैं. लेकिन मंजू को न पति अच्छा लगा था, न उस के घर वाले. यही वजह थी कि एक बेटी पैदा होने के बाद भी वह ससुराल में मन नहीं लगा पाई और एक दिन बेटी को ले कर बाप के घर आ गई.

बेटी ससुराल वालों से लड़ाईझगड़ा कर के हमेशा के लिए मायके आ गई है, यह बात न तो रामप्रसाद को अच्छी लगी थी और न उन की पत्नी को. उन्होंने मंजू को ऊंचनीच समझा कर ससुराल भेजना चाहा तो उस ने साफ कह दिया कि उन्हें उस की चिंता करने की जरूरत नहीं है, वह कहीं नौकरी कर के अपना और बेटी का गुजारा कर लेगी.

मंजू ने यह बात कही ही नहीं, बल्कि कोशिश कर के नौकरी कर भी ली. उसे एक कंपनी में चपरासी की नौकरी मिल गई थी. इस के बाद वह निश्चिंत हो गई, क्योंकि उसे वहां से गुजारे लायक वेतन मिल जाता था. रहने के लिए पिता का घर था ही.

मंजू अपनी नौकरी पर औटो से आतीजाती थी. इसी आनेजाने में कभी मंजू की मुलाकात औटोचालक करन शर्मा से हुई तो दोनों में जल्दी ही जानपहचान हो गई.

करन अकसर मंजू को अपने औटो से लाने ले जाने लगा तो धीरेधीरे उन की यह जानपहचान दोस्ती में बदल गई. उस के बाद दोनों में प्यार हो गया. प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन यहां परेशानी यह थी कि दोनों ही शादीशुदा नहीं, बच्चे वाले थे.

मंजू तो खैर पति को छोड़ कर आ गई थी, लेकिन करन शर्मा तो पत्नी और बच्चों के साथ रह रहा था. इस के बावजूद वह मजा लेने के चक्कर में मंजू से प्यार कर बैठा.

करीब 7 साल पहले करन की शादी भावना से हुई थी. उस के 2 बच्चे थे  बेटा ललित और बेटी आयुषि. भावना अपने इस छोटे से परिवार में खुश थी. प्यार करने वाला पति था तो सुंदर से 2 बच्चे. इन्हीं सब की देखभाल में उस का समय बीत जाता था.

society

लेकिन अचानक मंजू ने उस के प्यार में सेंध लगा दी थी. मंजू के ही चक्कर में पड़ कर करन देर से घर आने लगा. वह भावना को घर का खर्च भी कम देने लगा. इस की वजह यह थी कि अब वह अपनी कमाई का एक हिस्सा मंजू पर खर्च करने लगा था.

कुछ दिनों तक तो भावना की समझ में ही नहीं आया कि पति में यह बदलाव कैसे आ गया? लेकिन जब उस ने देखा कि करन देर रात तक न जाने किस से फोन पर बातें करता रहता है तो उसे संदेह हुआ. उस ने पूछा भी कि इतनी रात तक वह किस से बातें करता रहता है? करन ने लापरवाही से कह दिया कि उस का एक दोस्त है, उसी से वह बातें करता है.

आखिर बहाना कब तक चलता. भावना को लगा कि पति झूठ बोल रहा है तो उसे डर लगा कि पति कहीं किसी गलत रास्ते पर तो नहीं जा रहा है. भावना का डर गलत भी नहीं था.

उधर मंजू के दबाव में करन ने उस से नोटरी के यहां शादी कर ली थी. शादी के बाद मंजू मायके में नहीं रहना चाहती थी, इसलिए करन ने थाना सिकंदरा की राधागली में किराए पर एक कमरा ले लिया और उसी में दोनों पतिपत्नी के रूप में रहने लगे. मंजू की बेटी इच्छा भी उसी के साथ रह रही थी.

मंजू को लगता था कि वह करन को अपने प्यार की डोर में इस तरह से बांध लेगी कि वह अपनी ब्याहता पत्नी को भूल जाएगा. जबकि वास्तविकता यह थी कि करन 2 नावों की सवारी कर रहा था. वह मंजू से इस तरह मिल रहा था कि भावना को पता न चले, क्योंकि वह जानता था कि अगर उसे पता चल गया तो घर में तूफान आ जाएगा.

यही वजह थी कि करन रात में मंजू के यहां जाता तो कोई न कोई बहाना बना कर जाता था. लेकिन पति के बदले हावभाव से परेशान हो कर भावना ने उस की शिकायत ससुर से कर दी. राधेश्याम ने बेटे को डांटफटकार कर तरीके से रहने को कहा. भावना ने भी धमकी दी कि अगर वह ढंग से नहीं रहा तो वह बच्चों को छोड़ कर मायके चली जाएगी.

पत्नी की इस धमकी से करन डर गया, क्योंकि अगर पत्नी घर छोड़ कर चली जाती तो वह बच्चों को कैसे संभालता? आखिर पत्नी की धमकी के आगे करन ने सरेंडर कर दिया और मंजू से मिलनाजुलना कम कर दिया. उस के इस व्यवहार से मंजू को लगा कि वह परेशानी में फंस गई है, क्योंकि करन से शादी करने के बाद वह नौकरी भी छोड़ चुकी थी. अब वह पूरी तरह से करन पर ही निर्भर थी. मकान के किराए के अलावा घर के खर्चे की भी चिंता थी.

एक दिन ऐसा भी आया, जब करन का मोबाइल फोन बंद हो गया. मंजू परेशान हो उठी. करन के बिना वह कैसे रह सकती थी? वह मायके भी नहीं जा सकती थी. करन के घर का पता भी उस के पास नहीं था. आखिर औटो वालों की मदद से उस ने करन को खोज निकाला.

मंजू करन के घर पहुंच गई. उस ने करन से साथ चलने को कहा तो भावना भड़क उठी. मंजू को भलाबुरा कहते हुए भावना ने कहा कि करन उसे छोड़ कर कैसे जा सकता है. उस ने उस से ब्याह किया है. उस से उस के 2 बच्चे हैं.

society

मंजू और भावना में लड़ाई होने लगी. शोर सुन कर मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. किसी ने थाना पुलिस को फोन कर दिया. सूचना पा कर थाना सिकंदरा के थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय करन के घर पहुंच गए. वह करन, मंजू और भावना को थाने ले आए.

तीनों की बातें सुन कर ब्रजेश पांडेय की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? एक आदमी ने मौजमस्ती के लिए 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दिया था. करन को न मंजू छोड़ रही थी और न भावना. छोड़ती भी कैसे, दोनों का भविष्य अब उसी पर टिका था. इस परेशानी को ध्यान में रख कर थानाप्रभारी ब्रजेश पांडेय ने कहा कि करन एक महीने मंजू के साथ रहेगा और एक महीने भावना के साथ. जब तक वह जिस के साथ रहेगा, उस की कमाई पर उसी का हक होगा.

मंजू को यह समझौता कतई मंजूर नहीं था, क्योंकि उस का रिश्ता तो रेत की दीवार की तरह था, जो कभी भी ढह सकती थी. लेकिन भावना इस समझौते पर राजी थी. मंजू ने इस समझौते का विरोध करते हुए कहा कि एक दिन करन उस के साथ रहेगा और एक दिन भावना के साथ.

हालांकि इस समझौते का कोई कानूनी मूल्य नहीं था, फिर भी ब्रजेश पांडेय ने एक कागज पर लिखवा कर दोनों औरतों और करन के दस्तखत करवा लिए. इस समझौते से जहां मंजू ने राहत की सांस ली, वहीं भावना को मजबूरी में सौतन के लिए अपने पति का बंटवारा करना पड़ा.

society

करन ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा भी होगा, इसलिए अब वह परेशान था. उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन उस ने जो गलती की थी, अब उस का खामियाजा तो उसे भोगना ही था.

थानाप्रभारी ने जो समझौता कराया था, करन के घर वालों ने उस का सख्ती से विरोध किया. जब इस समझौते की खबर अखबारों में छपी तो सभी हैरान थे कि एक पुलिस अधिकारी ने ऐसा समझौता कैसे करा दिया? बात उच्चाधिकारियों तक पहुंची तो कोई बवाल होता, उस के पहले ही इंसपेक्टर ब्रजेश पांडेय का तबादला कर दिया गया.

कुछ भी हो, मंजू को लग रहा है कि उस की अपनी गृहस्थी बस गई है. करन अब एक दिन उस के साथ रहता है तो अगले दिन भावना के साथ. उस दिन वह जो कमाता है, उसे देता है जिस के साथ रहता है. लेकिन करन का लगाव भावना और अपने बच्चों के प्रति अधिक था, इसलिए अब वह मंजू पर उतना ध्यान नहीं देता, जितना देना चाहिए. इस से आए दिन उस का मंजू से झगड़ा होता रहता है.

करन ने जो गलती की है, अब वह उस का खामियाजा भोग रहा है. उसे भी कहां सुख मिल रहा है. कभी वह मंजू की ओर भागता है तो कभी भावना की ओर. परेशानी की बात तो यह है कि अभी इस समझौते को हुए ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, खींचतान शुरू हो गई है. आगे क्या होगा, कौन जानता है.

आखिर एक आदमी की गलती से 2 औरतों और 3 बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है. उस का भी क्या होगा, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा है. यह समझौता भी कितने दिनों तक चलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें