Hindi News Story: दिल्ली की मेयर और जोहरान ममदानी

Hindi News Story: दिल्ली में गुलाबी ठंड शुरू हो चुकी थी, पर अभी भी दीवाली के बाद की घुटनभरी प्रदूषित हवा का गुबार दिल्ली का पीछा नहीं छोड़ रहा था. ऊपर से लालकिला बम धमाके ने दिल्ली और पूरे देश को दहला दिया था. उधर, जेएनयू छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी के मुकाबले वामपंथी गुट ने चारों सीटें जीत ली थीं. दिल्ली नगरनिगम के उपचुनाव भी खामोशी से आगे बढ़ रहे थे.

अनामिका अपने कमरे की बालकनी में अखबार पढ़ रही थी. कल रात से विजय भी उसी के साथ था. कल की रात उन दोनों ने बड़ी मस्ती के साथ बिस्तर पर गुजारी थी.

विजय अभी भी सो रहा था. अनामिका सोच रही थी कि दिल्ली की इस बदहाली को क्या दिल्ली का मेयर सुधार सकता है? फिर उसे लगा कि वह आईएएस बन सकती है और मौका मिला तो उसे दिल्ली की मेयर की सीट पर भी अपनी नजर रखनी होगी.

यह सोच कर अनामिका जोश में आ गई और सीधा कमरे में गई. उस ने अपनी एक चुन्नी को माइक की तरह पकड़ा और आईने के सामने चिल्लाने लगी, ‘‘अगर मुझे दिल्ली का मेयर बनने का मौका मिला, तो मैं यहां सुधार के तमाम काम करा दूंगी. आप मुझे एक मौका दें…’’

‘‘यह सुबहसुबह क्या नौटंकी है? क्यों मेरी नींद खराब कर रही हो?’’ विजय ने आंख मसलते हुए पूछा.

‘‘तुम यहां सो रहे हो और दिल्ली को उस की नई मेयर मिल गई है,’’ अनामिका ने हंसते हुए कहा. ‘‘अब यह क्या नया शिगूफा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘यार, मैं सोच रही हूं कि पार्षद का चुनाव लड़ कर दिल्ली की मेयर बन जाऊं,’’ अनामिका बोली.

‘‘मतलब, तुम राजनीति के दलदल में कदम रखना चाहती हो?’’ विजय अब भी हैरान था.

‘‘तो क्या हुआ… मैं पढ़ीलिखी हूं, तर्क के साथ बात करने की तमीज है मुझ में, तो मैं क्यों नहीं दिल्ली की मेयर बन सकती?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘शायद तुम भूल गई हो कि चाहे चुनाव पंच का हो या सांसद का, भारत में आज भी वोट जाति और धर्म के नाम पर दिए जाते हैं,’’ विजय बिस्तर छोड़ कर बोला.

‘‘मतलब?’’ अनामिका हैरान हो कर बोली.

‘‘अरे यार, क्या तुम नहीं जानती अपनी जाति के बारे में… मुझ जैसे कुछ लोग तुम्हें जरूर वोट दे देंगे, पर दूसरे लोगों को जाति और धर्म के प्रपंच से कैसे बाहर निकाल पाओगी?

तुम्हारे बिहार के ही विधानसभा चुनाव देख लो. वहां भी धर्म और जाति का बोलबाला रहा. उम्मीदवार की जाति देख कर टिकट दिए गए,’’ विजय ने कहा.

‘‘पर यार, ऐसे तो अच्छे लोग राजनीति में कभी आ ही नहीं पाएंगे,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर पहले तुम यह तो बताओ कि तुम पर सुबहसुबह दिल्ली की मेयर बनने का भूत कैसे चढ़ गया?’’ विजय ने पूछा.

‘‘जोहरान ममदानी ने मेरा जोश बढ़ाया है. जब से वे न्यूयौर्क के मेयर बने हैं, मुझे भी लगता है कि दिल्ली की मेयर मैं बन जाऊं,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘ओह, तो यह मामला है. न्यूयौर्क से चली हवा दिल्ली तक आ गई है,’’ विजय बोला.

‘‘अरे भई, खरबूजे को देख कर ही तो खरबूजा रंग बदलता है. फिर जोहरान ममदानी में क्या कमी है… बंदा डंके की चोट पर मेयर बना और आते ही उस ने अपने तेवर दिखा दिए हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम जोहरान ममदानी के बारे में जानती ही क्या हो? कौन है वह बंदा जो तुम इतना जोश में आ गई हो?’’ विजय ने चिढ़ते हुए पूछा.

‘‘जोहरान ममदानी के बारे में मैं ने खबरों में काफी खंगाला है. वे एक शिया मुसलिम युगांडाई स्कौलर महमूद ममदानी और भारत की मशहूर फिल्मकार मीरा नायर के बेटे हैं. वैसे, महमूद ममदानी के पूर्वज भी भारतीय हैं. मीरा नायर भारत में एक हिंदू परिवार से हैं.

‘‘तुम ने मीरा नायर की बनाई गई कुछ चुनिंदा फिल्मों के बारे में तो सुना ही होगा, जैसे ‘सलाम बौम्बे’, ‘मानसून वैडिंग’, ‘द नेमसेक’, कामसूत्र-द टेल औफ लव और ‘मिसिसिपी मसाला’. ‘मानसून वैडिंग’ तो मेरी पसंदीदा फिल्मों में आती है,’’ अनामिका बोली.

‘‘और क्या जानती हो तुम जोहरान ममदानी के बारे में? सिर्फ मां के नाम पर तो कोई बड़ा नेता नहीं बन जाता है न…’’ विजय बोला.

‘‘तुम ने सही कहा. चलो, अब तुम्हें मैं जोहरान ममदानी के बारे में थोड़ा तफसील से बताती हूं. उन का जन्म 18 अक्तूबर, 1991 को युगांडा देश के कंपाला इलाके में हुआ था. उन का बचपन युगांडा, दक्षिण अफ्रीका और न्यूयौर्क में बीता.

‘‘अमेरिका में उन्होंने साल 2014 में बौडौइन कालेज से अफ्रीकाना स्टडीज में डिगरी हासिल करने से पहले बैंक स्ट्रीट स्कूल फौर चिल्ड्रन और ब्रोंक्स हाईस्कूल औफ साइंस में पढ़ाई की थी.

‘‘साल 2017 में जोहरान ममदानी राजनीतिक और सामाजिक संगठन ‘डैमोक्रैटिक सोशलिस्ट्स औफ अमेरिका’ में शामिल हो गए थे. उन्होंने साल 2020 में न्यूयौर्क राज्य विधानसभा के लिए चुनाव जीता था, जहां उन्होंने क्वींस के 36वें जिले की नुमाइंदगी की थी.

‘‘फिर वे साल 2022 और साल 2024 के चुनावों में निर्विरोध चुने गए थे. अपने कार्यकाल के दौरान ममदानी ने 20 विधेयकों का समर्थन किया था, जिन में से 3 कानून बन गए थे.

‘‘इतना ही नहीं, जोहरान ममदानी पर अपनी मां मीरा नायर के कला व्यवसाय का भी काफी असर रहा है. वे एक हिपहौप कलाकार भी रह चुके हैं, जो ‘यंग कार्डेमम’ या ‘मिस्टर कार्डेमम’ के नाम से जाने जाते हैं.

‘‘जोहरान ममदानी ने साल 2018 में अमेरिकी नागरिक के रूप में नागरिकता हासिल की थी और इसी साल उन्होंने सीरियाईअमेरिकी कलाकार रमा दुवाजी से शादी की है,’’ अनामिका ने बताया.

थोड़ा रुक कर अनामिका ने आगे बताया, ‘‘34 साल के जोहरान ममदानी ने अपने जबरदस्त अभियान के दम पर यह जीत हासिल की है. वे जब क्वींस से असैंबली मैंबर थे, तब उन्होंने अपने शहर के टैक्सी ड्राइवरों के लिए भूख हड़ताल की थी.

‘‘साल 2021 में 30 साल के ममदानी सिटी हाल पार्क में खड़े हुए और उन्होंने घोषणा की कि वे न्यूयौर्क शहर के टैक्सी ड्राइवरों को कर्ज से राहत दिलाने के लिए शहर के अफसरों पर दबाव डालने के लिए उपवास करेंगे.

‘‘उस समय, उन्हें पद संभाले हुए एक साल से भी कम समय हुआ था. यह हड़ताल टैक्सी मैडेलियन लोन से होने वाले भारी कर्ज के जवाब में की गई थी, जिस ने कई ड्राइवरों को मालीतौर पर बरबाद कर दिया था और कुछ को तो खुदकुशी करने पर भी मजबूर कर दिया था.’’

‘‘तुम्हें पता है न कि जोहरान ममदानी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में क्या कहा था?’’ विजय ने अनामिका से पूछा.

‘‘क्या उन्होंने कुछ गलत कहा था?’’ अनामिका बोली, ‘‘हां, चुनाव जीतने ने बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के बारे में अपने विचार रखते हुए कहा था कि आप के सामने खड़े हो कर मैं जवाहरलाल नेहरू के शब्दों के बारे में सोचता हूं कि एक ऐसा क्षण आता है, जब हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाते हैं. जब एक युग का अंत होता है और लंबे समय से दमित राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है. आज रात हम ने पुराने से नए युग में कदम रख लिया है.’’

यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘पर जोहरान ममदानी ने न्यूयौर्क शहर के मेयर पद के अपने प्रचार अभियान के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ले कर विवादास्पद बयान दिया था.

‘‘एक मेयर फोरम के दौरान उन्होंने कहा था कि मोदी को उसी तरह देखा जाना चाहिए, जैसे लोग इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को देखते हैं.
‘‘जब उन से यह सवाल पूछा गया कि अगर नरेंद्र मोदी न्यूयौर्क आएं, तो क्या वे उन से मुलाकात करेंगे, तो उन्होंने कहा था कि यह व्यक्ति (नरेंद्र मोदी) एक युद्ध अपराधी है.

‘‘जोहरान ममदानी ने यह भी कहा था कि उन के पिता का परिवार भारत के गुजरात राज्य से है. यह वही राज्य है जहां 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान तकरीबन 1,000 मुसलमानों की मौत हुई थी.

‘‘उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय मोदी की सरकार ने इन घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए. नरेंद्र मोदी ने गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा को इस हद तक बढ़ावा दिया कि आज कई लोग मानते हैं कि वहां अब मुसलमान बचे ही नहीं हैं.’’

‘‘पर किसी नेता को दूसरे नेता के बारे में अपने विचार रखने का हक है…’’ अनामिका बोली,’’ उन्होंने तो डोनाल्ड ट्रंप पर भी निशाना साधा था. उन्होंने कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप को अगर कोई हराने का तरीका दिखा सकता है, तो वह शहर ही है, जिस ने उन्हें जन्म दिया है.

‘‘अगर किसी तानाशाह को डराने का कोई तरीका है, तो वह उन हालात को खत्म करना है, जिन्होंने उसे सत्ता हासिल करने में मदद की. ममदानी ने ट्रंप पर अमेरिका को धोखा देने का आरोप लगाया.

‘‘और तुम यह क्यों नहीं समझ रहे हो कि न्यूयौर्क और न्यूजर्सी वे शहर हैं, जहां भारतीय अच्छीखासी तादाद में रहते हैं. अमेरिका में सब से ज्यादा भारतीय न्यूयौर्क में ही रहते हैं. तुम्हें नहीं लगता कि न्यूयौर्क और न्यूजर्सी जैसे शहरों में हारना डोनाल्ड ट्रंप के लिए सीधा मैसेज है.

‘‘भारतीयों का वोट उन्हें पाना है, तो भारत के प्रति सौफ्ट रहना होगा. ट्रंप अगर यह सोच रहे हैं कि भारत के खिलाफ कड़ा रुख अपना कर वे चुनाव जीत लेंगे, तो यह नहीं हो सकता.’’

‘‘मुझे तो यह दूर के ढोल सुहावने जैसे लगने वाली बात लगती है. डोनाल्ड ट्रंप बहुत ही माहिर खिलाड़ी हैं.
वे जोहरान ममदानी को इतनी आसानी से राजनीति नहीं करने देंगे,’’ विजय बोला.

‘‘तुम जोहरान ममदानी के नाम पर इतना उखड़ क्यों रहे हो? बात मेरे मेयर बनने के सपने को ले कर शुरू हुई थी. वैसे भी जब तक हम सपने नहीं देखेंगे, तब तक उन्हें पूरा करने की ताकत कैसे आएगी?

‘‘माना कि भारत में धर्म और जातिवाद के नाम पर सियासत की जाती है और नेता चुने जाते हैं, पर अभी भी इतना अंधेरा नहीं हुआ है, जितना तुम सोच रहे हो. मैं मेयर बनूं या न बनूं, पर मुझे यह तो समझ आया है कि सियासत की राह कभी भी आसान नहीं होगी.’’

‘‘अनामिका, मेरा वह मतलब नहीं था. तुम बहुत होशियार हो, पढ़ीलिखी हो और तुम में जनता के दुखदर्द को समझ सकने की काबीलियत है, पर यह काम तो तुम आईएएस बन कर भी कर सकती हो,’’ विजय ने कहा.

‘‘तुम्हारी बात में दम है. पर मुझे मौका मिला तो मैं दिल्ली की मेयर जरूर बनूंगी. फिर देखना कैसे मैं दिल्ली का सुधार करती हूं,’’ अनामिका ने हंसते हुए कहा.

‘‘ठीक है, पर अब जरा हम फ्रैश हो कर कौफी पीने चलें, क्योंकि इस गरमागरम बहस के बाद मुझे कौफी पीने की तलब लग गई है,’’ विजय बोला.

‘‘नेकी और पूछपूछ… जल्दी चलो और मुझे भी मस्त सी कौफी पिलवाओ,’’ अनामिका ने विजय के गले में अपनी बांहें डालते हुए कहा और उसे प्यार से चूम लिया. Hindi News Story

Story In Hindi: कोचिंग के पैसे

Story In Hindi: ‘‘तो आप और पैसे नहीं देंगे?’’ अशोक ने पूछा.

‘‘अरे, कहां से ला कर दूं तुम्हें. ये 10,000 रुपए कम हैं क्या… अब तुम अपने खर्च बढ़ा लो, तो मैं क्या कर सकता हूं. और अब हम से नहीं होगा,’’ अशोक के पिताजी ने कहा.

‘‘दे दीजिए न. अब बाहर रहता है, तो खर्चे तो होंगे ही,’’ अशोक की मां मन्नू देवी जब अपने पति बजरंगी बाबू से बोलीं, तो वे मानो गरजने लगे, ‘‘अभी खेती के पीछे इतने खर्चे तुम लोगों को नहीं दिख रहे क्या…

‘‘पहले ही कम बारिश के चलते खेती के पटवन के पीछे डीजल खरीदने में ही हालत खराब थी. भाड़े पर ट्रैक्टर लिया, तो खेत की जुताई हुई.

‘‘फिर बीज और खाद के पीछे अच्छीखासी रकम खर्च हो गई. अभी फसल थोड़ी ठीक लग रही, तो कीड़ों का प्रकोप शुरू हो गया है. उस के लिए भी दवाओं का छिड़काव करना होगा.

‘‘वासंती फसल में जो थोड़ीबहुत रकम आई थी, वह सब इन सब के पीछे स्वाहा हुई जा रही है. भंडार में देख लो जा कर. मुश्किल से 4-6 बोरा अनाज होगा. और शारदीय फसल तैयार होने में 2-4 महीने तो लग ही जाएंगे. यह खेती न हुई, खर्चों का घर हो गया. और इस को शहर की हवा लग रही है…’’

‘‘अभी पढ़ रहा है, तो खर्चे होंगे ही…’’ मन्नू देवी ने भी जवाब दिया, ‘‘यह खर्चा कहां गलत हो रहा है. कल को इस की नौकरी लगी, तो भरभर थैली रुपए बटोरते रहिएगा.’’

‘‘भरभर थैली… इतना आसान है नौकरी, जो मिल जाएगी. देख तो रहा हूं औरों को, पढ़लिख कर मारेमारे फिर रहे हैं,’’ बनारसी बाबू बोले.

‘‘अशुभ क्यों बोलते हैं जी. जो सब के साथ हुआ, वह कोई जरूरी थोड़े ही है कि हमारे साथ भी हो. शुभशुभ बोलो जी,’’ मन्नू देवी ने कहा.

‘‘सही बोल रहा हूं. और जो इस की नौकरी लगी, तो क्या सब हमारी ही जेब में रख जाएगा… इसी गांव में नौकरी करने वालों को भी देख रहा हूं कि वे क्या करते हैं…’’ बनारसी बाबू गुस्से में बोले.

‘‘फिरफिर वही बात. अरे, हम अपना फर्ज निभा दें, यही बहुत है. अभी हमारा जांगर चलता है, फिर बेटों से आस क्या रखना,’’ मन्नू देवी ने कहा.

अंदर कमरे में अपना बैग ठीक करता हुआ अशोक भनभना रहा था, ‘‘जब खर्चा नहीं दे सकते, तो बाहर शहर में पढ़ाने का शौक ही नहीं रखना था. अब वहां खर्चे हैं, तो हैं. उसे वह कैसे रोक सकता है. कुछ तो शहर का स्टैंडर्ड रखना ही होता है. अभी से उधर ध्यान नहीं दिया, तो आगे का भगवान ही मालिक है.’’

‘‘थोड़ा सम झा करो बाबू मेरे,’’ मां मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘बाप हैं तुम्हारे, कोई दुश्मन नहीं हैं. थोड़ा तुम भी सम झा करो कि वे ठीक कह रहे हैं कि नहीं. हर बाप का शौक होता है कि उस का बेटा खूब पढ़ेलिखे. इस में गलत क्या है?’’

‘‘तो मैं भी गलत कहां हूं मां. वहां शहर में जैसेतैसे तो नहीं रहा जा सकता न… सुमिरन साव के बेटे रतन को देख लो. ठाट से रहता है वहां. उस के जैसा खर्च करना तो मैं सोच भी नहीं सकता. फिर भी ढंग से रहना तो पड़ेगा ही. कोचिंग और पढ़ाई के अलावा खानेपीने, कौपीकिताब, टैंपोभाड़ा के खर्चे को कौन रोक सकता है…’’

अशोक अभी भी तैश में था, ‘‘वहां लड़के ही नहीं, लड़कियां भी साथ पढ़ती हैं. उन के साथ फटेपुराने कपड़े पहन कर तो नहीं रहा जा सकता न. अभी पूजा का मौसम है. मु झे भी नए कपड़े खरीदने ही होंगे. मैं खुद सस्ते में काम चलाता हूं. मगर तुम लोगों को लगता है कि मैं वहां ऐयाशी करता हूं.’’

‘‘ये कौन कह रहा है रे. 10,000 में आजकल क्या होता है…’’ मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘मैं अपने राजा बेटा को नहीं जानती क्या कि कितने कम खर्च में वह काम चलाता है.’’

‘‘साफसाफ कह देता हूं कि इस बार जो नए कपड़े नहीं खरीद पाया, तो छठ और दीवाली पर नहीं आऊंगा,’’ अशोक ने कहा.

मन्नू देवी के तो हाथपैर फूल गए. बाप रे, दीवाली और छठ जैसे पर्व में यह नहीं आया, तो किस के बूते वह इसे पार घाट लगाएगी. घर की साफसफाई से ले कर, छठ त्योहार का सारा इंतजाम तक यही दौड़दौड़ कर पूरा करता है. 2 साल पहले एक बार नहीं था, तो उन्हें कितनी परेशानी हुई थी.

इस के बाबूजी को तो जैसे कोई मतलब ही नहीं कि घर की साफसफाई कैसे होगी, और कि क्याक्या सामान चाहिए. उस के दोनों बच्चे अरुण और नन्ही इतने छोटे हैं कि उन्हें बाहर भेजने में डर लगता है. खेत से पूजा के लिए गन्ना लाने से ले कर, पूजा के लिए मौसमी फलों तक के इंतजाम अशोक कितनी तेजी से कर जाता है.

छठपूजा के समय तो मन्नू देवी घर में तकरीबन 2 दिनों तक पूजा के पकवान, ठेंकुआ वगैरह बनाने में बिजी हो जाती हैं कि बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिलता. ऐसे में निर्जला उपवास किए बाहर निकलने की ताकत भी कहां रह जाती है.

घर से घाट और घाट से घर दौरा को सिर पर रख कर 3 किलोमीटर दूर नदी तक आनाजाना मामूली बात है क्या. वहां भी इतनी भीड़ और गहमागहमी रहती है. मन्नू देवी यह रिस्क तो नहीं ही ले सकतीं. ऐसे में अशोक नहीं आया, तो उन का मरण हो जाएगा.

बजरंगी बाबू खेतों की ओर जा रहे थे. मन्नू देवी दोबारा पति के पास आ कर निहोरा करने लगीं, तो वे चिल्ला कर बोले, ‘‘मेरे पास अभी नकद कुछ नहीं है. उस को कहो कि एक मन अनाज निकाल कर बेच आए और पैसा ले जाए.’’

अब यहां कौन सा तराजूबटखरा रखा था, जो कोई एक मन अनाज तुलवाता. मन्नू देवी आननफानन बगल में रह रहे भगलू राम को बुला लाईं. उस के सिर पर एक बोरा अनाज रखवाया और अशोक को आवाज देने लगीं, ‘‘अशोक, जरा इधर आना. यह अनाज ले कर सुमिरन साव के आढ़त पर तुलवा कर पैसे ले आना.

बाकी बचा अनाज यहीं रखवा देना.’’

अशोक सारी बातें सुन चुका था, इसलिए बैग में कपड़े रखना छोड़ बाहर निकल आया.

‘‘बाबूजी ने एक मन अनाज बेचने को कहा है… मन्नू देवी बोलीं, ‘‘बाकी अनाज इसी भगलू के सिर पर रख कर वापस ले आना.’’

बाजार में आढ़त पर बोरे का मुंह खुलवा कर गेहूं के दानों को देख कर सुमरिन साव मुंह बनाते हुए बोले, ‘‘घटिया माल है. इस को तो 15 रुपए किलो की दर से ही लेना होगा.’’

‘‘अरे, अभी तो यह 20 रुपए किलो की दर से चल रहा है,’’ अशोक ने हैरत से कहा.

‘‘इस सरकार ने फ्री राशन बांट कर सारा धंधा मंदा कर दिया है,’’ सुमिरन साव अपने चिड़चिड़े अंदाज में बोला, ‘‘हम भी कौन सा खैरात खाने वाले हैं.’’

‘‘खैरात खाने की तुम्हें क्या जरूरत. ऐसे ही नहीं तुम ने बिल्डिंगें और गोदाम बना लिया है…’’ अशोक बुदबुदाया, यही अनाज शहरों में आटे के रूप में 40 रुपए किलो की दर से उसे खरीदना होता है. लेकिन गांव में कोई ढंग का खरीदार भी तो नहीं. 40 किलो अनाज के 600 रुपए अशोक के हाथ में आए, तो वह भुनभुनाया, ‘‘इन 600 रुपए में क्या होगा. एक जींस पैंट ही 1,000 रुपए में आती है. उस पर 3-4 टीशर्ट लेनी हैं, वे भी 1,000 रुपए की पड़ जाएंगी. एक नए डिजाइन का जूता भी लेना है.

‘‘इस के अलावा बाकी के खर्चे अपनी जगह. सैलून में हेयर कटिंग, 3-4 तरह के इत्र, शैंपू, साबुनतेल वगैरह के भी तो खर्चे हैं.’’

अभी तो अशोक ने अपने खर्चे में कौपीकलम और किताब को जोड़ा ही नहीं. 1-1 गाइड ही 500 में आती है. उस ने एक स्टडी लाइब्रेरी में एडमिशन ले रखा है, जिस का मासिक किराया ही 1,000 है. फिर लौज के कमरे का 4,500 का किराया है. ढाबे पर जो वह नियमित दोनों टाइम भोजन करता है, उसे 3,000 महीना देना होता है.

कोचिंग आनेजाने के लिए जो टैंपो का भाड़ा है, उस में भी 1,000 रुपए निकल जाते हैं. इतना तब है, जब वह कितनी कंजूसी के साथ काम चलाता है. और बाप है कि 10,000 से एक रुपया ज्यादा देने को तैयार नहीं है.

अशोक ने तत्काल सारे गेहूं तुलवा दिए. कोई 100 किलो थे. सुमिरन साव ने उसे 1,500 सौ पकड़ा दिए.

घर वापस आ कर अशोक ने देखा, मां काम पर लगी थीं. भगलू अभी भी वहीं खड़ा था. उसे 20 रुपए उस के मेहनताने के देने थे.

अचानक अशोक ने भगलू से कहा, ‘‘एक बोरा अनाज और निकालो और मेरे साथ चलो.’’

सुमिरन साव के यहां वह अनाज तुलवा कर उस ने पैसे लिए. अब उस के पास 3,000 रुपए थे.

बाबूजी ने अशोक को मासिक खर्च के 10,000 पहले ही दे दिए थे. अब ये 3,000 और हैं. उस ने विचार किया कि इतने पैसे से उस का ऐक्स्ट्रा काम चल जाएगा.

अशोक भगलू को 50 का नोट थमाते हुए बोला, ‘‘मां और बाबूजी को मत बताना कि हम ने एक बोरा अनाज और निकाला है. वे यहां कौन गिनती करने आएंगे कि कितने बोरा अनाज निकला है. इतना अनाज तो यहां चूहे और कीड़े खा जाते हैं.’’

भगलू कुछ समझा, कुछ नहीं समझा. उसे जल्दीजल्दी ताड़ीखाने जो जाना था. उस के हाथ में 50 का एक करारा नोट फड़फड़ा रहा था. Story In Hindi

Best Hindi Story: ब्रा

Best Hindi Story: ‘‘उफ, इन औनलाइन शौपिंग वालों ने तो हमारा सारा कामधंधा ही चौपट कर दिया है,’’ सिलाई मशीन के पायदान पर पैर रखे हुए नौरीन अपनेआप से बुदबुदाते हुए बोल रही थी.

नौरीन की परेशानी की वजह यह थी कि अब उस के पास लोग कपड़े सिलवाने कम आते थे. हर हाथ में मोबाइल है. बस, मोबाइल उठाया और अपनी पसंद के कपड़े औनलाइन मंगवा लिए.

भारत और नेपाल की सीमा पर बसा हुआ यह कसबा रौनक से भरा रहता था. सीमा पर बसे होने के चलते चहलपहल बराबर बनी रहती थी. इस कसबे में जरूरत की सारी चीजें बड़ी आसानी से मिला करती थीं.

इस कसबे के जहीन बाग नामक महल्ले में नौरीन और उस की छोटी बहन रोशनआरा रहती थीं. नौरीन 22 साल की हो गई थी और सिलाई का काम कर के घर का खर्चा चलाती थी. कई बार तो उस ने सोचा कि सिलाई का काम बंद कर के कोई परचून की दुकान ही खोल ली जाए, कम से कम बोहनी तो हो जाया करेगी.

सिलाई के काम में तो कभीकभार कोई ग्राहक आता ही नहीं और घर से सिलाई का काम करने वाली नौरीन के पास कपड़े सिलवाने के ग्राहक के रूप में रजिया, फातिमा, सुनीता जैसे आसपास के दूसरे लोग ही आते थे. इन में से बहुत सी औरतें तो इतनी शर्मीली होती थीं कि कुरती का नाप देने में भी शर्म करती थीं.

इस बात पर नौरीन मुसकराते हुए कहती, ‘‘घबराओ मत भाभी, घर में कोई मर्द नहीं है और न ही कोई कैमरा लगा हुआ है, आराम से नाप दो.’’

नौरीन ने 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, क्योंकि घर का खर्चा चलाने के लिए उस का कमाना जरूरी था, इसलिए उस ने सिलाई के काम में अपनी अम्मी का हाथ बंटाना शुरू कर दिया. पहले तो अम्मी के पास खूब काम आता था. सलवारसूट, ब्लाउज के अलावा छोटे बच्चों की कमीजें तक सिलती थीं अम्मी.

कितनी लगन से नौरीन ने सिलाई का काम सीखा और जब अम्मी कमर दर्द से दोहरी हो जातीं, तो नौरीन उन्हें आराम करने को कहती और खुद मशीन के पायदान पर पैर जमा कर बैठ जाती और हलकेहलके पैर चला कर सिलाई करती.

उम्र के 22वें साल में नौरीन के कुंआरे और गोरे चेहरे पर चमक आने लगी. तभी उस की जिंदगी में अहमद की मुहब्बत ने दस्तक दी.

अहमद 25 साल का एक नौजवान था, जो लखीमपुर शहर का रहने वाला था और डिलीवरी बौय का काम करता था. काम के सिलसिले में नौरीन से निगाहें मिलीं और दोनों कब इश्क में गिरफ्तार हो गए, पता ही नहीं चला.

हालांकि, नौरीन की अम्मी को भी इन दोनों के फलतेफूलते इश्क का अहसास हो गया था, पर उन्होंने कभी कोई रोकटोक नहीं लगाई.

‘‘नौरीन के अब्बू नहीं रहे, भला इस उम्र में मैं कहां लड़का ढूंढ़ने जाऊंगी… अच्छा है बच्चे अपने मन से ही अपना साथी चुन लें तो…’’ अपनेआप से अकसर कह उठती थीं नौरीन की अम्मी.

दिन का 10 बजने को थे. नौरीन के मोबाइल पर अहमद का फोन आया, ‘शहर जा रहा हूं. मेरा दोस्त राज जिस होटल में काम करता है, वहां पर बड़े लोगों का सैमिनार है. हम दोनों चलते हैं. मुझे शहर में कुछ देर का काम है, फिर हम दोनों सैमिनार में बैठेंगे, खापी कर शाम तक वापस आ जाएंगे,’ अहमद ने एक सांस में यह बात कह दी थी.

मौसम भी सुहावना था और अहमद के साथ घूमने जाने की बात सुन कर नौरीन का मन भी मचल उठा था.
नौरीन ने अम्मी को बता दिया था कि वह अहमद के साथ शहर तक जा रही है, शाम तक वापस आ जाएगी.

अम्मी ने नौरीन के अहमद के साथ जाने पर कोई एतराज नहीं जताया और कहा, ‘‘अपना ध्यान रखना और शाम को जल्दी वापस आना.’’

अहमद और नौरीन बाइक पर बैठ कर शहर की ओर जाने लगे. शहर यहां से 30 किलोमीटर दूर था, पर नौरीन सोच रही थी कि काश शहर कभी न आए, बस वह यों ही अहमद के पीछे बैठ कर सफर करती रहे.

‘ग्रैंड रौयल्स’ नाम के एक होटल में वे दोनों पहुंच गए थे. अहमद ने अपने दोस्त राज से मुलाकात की और फिर वे तीनों उस हाल में गए, जहां पर सैमिनार चल रहा था. अहमद और नौरीन एकसाथ बैठ गए थे.

मंच पर 35 साल की एक खूबसूरत सी महिला ने बोलना शुरू किया, ‘‘हमारे इस सैमिनार का विषय कुछ हट कर है. दरअसल, यह कार्यक्रम महिलाओं की ‘ब्रा’ पर है. शहर में तो महिलाएं जागरूक हैं, पर हमारा अभियान गांव और कसबों की महिलाओं के बीच जागरूकता फैलाने का है, जो शर्म के चलते या तो ब्रा नहीं खरीदती हैं या फिर गलत ढंग की ब्रा पहनती हैं, जिस के चलते उन्हें पीठ दर्द तक का सामना करना पड़ता है…’’

नौरीन यह सब सुन कर पहले तो शरमाने लगी, पर जब उस महिला ने आगे काम की बातें बतानी शुरू कीं, तो उसे अच्छा लगने लगा.

‘‘हमें कसबों और गांवों की महिलाओं के मन से ब्रा के लिए छिपी शर्म निकालनी होगी. अरे भई, ब्रा महज कुछ कपड़ों का जोड़ ही तो है, जिसे हम अपने शरीर को सपोर्ट देने के लिए कुरती या ब्लाउज के अंदर पहनते हैं. अब भला इसे छिपा कर सुखाना या फिर इस की स्ट्रिप को दिख जाने से रोकना, इस में भला झिझकने की क्या बात है?’’ वह महिला बड़े अच्छे ढंग से समझा रही थी.

नौरीन गौर किया कि पीछे के बैनर पर उन की संस्था का नाम ‘नारी मन’ लिखे होने के साथ एक संदेश भी लिखा हुआ था, ‘हमारी ब्रा, हमारा शरीर, एक अभियान है. कब बदलेगा समाज, सवाल अनजान है’.

नौरीन ने बैनर पर लिखा हुआ मैडम की संस्था का मोबाइल नंबर नोट कर लिया और अहमद और नौरीन चाय और नाश्ता करने के बाद वापस कसबे की ओर चल दिए.

शाम को जब नौरीन घर पहुंची, तो उस ने अपनी अम्मी से उन की पुरानी संदूकची खोलने को कहा, तो अम्मी जरा चौंकीं, ‘‘अब भला तुझे उस संदूकची से क्या काम पड़ गया?’’

बदले में नौरीन ने मुसकराते हुए उस संदूकची को बिस्तर के नीचे से घसीटते हुए बाहर निकाला और खोलने लगी. उस संदूकची में अम्मी की उन की जवानी के दिनों की सैटिन की ब्रा लपेट कर रखी हुई थी.

नौरीन ने उस ब्रा को खोला और उलटपलट कर देखने लगी. उसे ऐसा करते देख कर अम्मी शर्म से गड़ गईं, ‘‘अरे मुई, यह तुझे क्या हो गया?’’ अम्मी अब भी शर्म से लाल थीं.

अम्मी को पुरानी बात याद आई, जब यह ब्रा नौरीन के अब्बू बाजार से खरीद कर लाए थे और कई बार अकेले में इसे पहन कर दिखाने के लिए कहा था, मगर उस जमाने में संयुक्त परिवार में रहने वाली अम्मी के लिए ऐसी डिजाइनर और सुर्ख लाल रंग की ब्रा को पहनने के बाद धोने और सुखाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था, इसलिए नौरीन की अम्मी कभी भी यह ब्रा पहन नहीं सकीं और कपड़ों के बीच लपेट कर इस संदूकची में रख दिया था.

नौरीन ने अम्मी की लाल ब्रा पकड़ कर हवा में लटका दी और उसे चारों तरफ से देखने लगी. उस की यह हरकत अब अम्मी को नागवार गुजर रही थी. उन्होंने अब नौरीन को डांटना चाहा, पर नौरीन बोल पड़ी, ‘‘अम्मी, मैं सोच रही हूं कि क्यों न हम ब्रा सिलने का ही काम शुरू कर दें…’’

नौरीन की यह बात सुन कर अम्मी ने अपना माथा पीट लिया, पर नौरीन ने उन्हें समझाया कि हमारे कसबे में रेडीमेड कपड़ों सभी दुकानों पर मर्द बैठे हैं. ज्यादातर महिलाएं उन से ब्रा खरीदते समय इतनी संकोच से भरी रहती हैं कि वे खरीदते समय ब्रा का साइज और क्वालिटी देखती तक नहीं और गलत साइज की ब्रा पहनते रहने से उन के शरीर का आकार खराब हो जाता है और कई बार वे पीठ दर्द से भी परेशान रहती हैं.

इस के बाद नौरीन बोली, ‘‘अम्मी, क्या हम घर पर इसी सिलाई मशीन से रेडीमेड जैसी दिखने वाली ब्रा सिल सकती हैं?’’

नौरीन ने पूछा तो अम्मी ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘अगर घर पर कुछ जरूरी सामान जैसे इलास्टिक, हुक और प्लाटिक के कुंडे वगैरह खरीद लिए जाएं, तो घर पर रेडीमेड जैसी ब्रा बनाई जा सकती हैं, क्योंकि कुछ कपड़ों की खास तरह की कटिंग को जब सफाई से सिला जाता है, तो ब्रा तैयार हो जाती है और इस में और ज्यादा खूबसूरती लाने के लिए इस के कपड़े पर फूलबूटे और चिकन की कढ़ाई तक की जा सकती है.’’

अम्मी को भी नौरीन की बातें अब जंच तो रही थीं, पर उन के मन में शक था कि ये ब्रा उन से औरतें खरीदेंगी भी या नहीं?

‘‘अरे अम्मी, क्यों नहीं खरीदेंगी? जब उन को अच्छे कपड़े की ब्रा हमारे पास ही मिलेगी, जिसे वे कमरे में आराम से पहन कर आगेपीछे से चैक कर लेंगी और अपने बदन पर आराम महसूस करेंगी, तो भला कौन नहीं खरीदना चाहेगा…’’ नौरीन ने उम्मीदभरी बातों से अम्मी का मन मोह लिया था.

नौरीन ने अब उस ‘नारी मन’ संस्था की आंचल मैडम को फोन लगाया और अपने और अपने कसबे के बारे में सबकुछ बताते हुए उन्हें ब्रा के बिजनैस के बारे में बताया.

नौरीन का आइडिया सुन कर आंचल मैडम बहुत खुश हुईं और उन्होंने नौरीन को खूब सराहा और ब्रा सिलने के सामान से ले कर हरमुमकिन मदद देने का वादा किया.

नौरीन ने अपने पते पर ब्रा सिलने का कुछ सामान मंगवा लिया था. बस, अब चुनौती थी कि इन सब सामान को साथ ले कर बढि़या और आरामदायक ब्रा कैसे बनाई जाए. सो, इस के लिए नौरीन ने सिलाईकढ़ाई विशेषांक की पुरानी पत्रिकाएं पढ़ीं, कुछ मदद इंटरनैट से ली और बाकी का काम नौरीन की अम्मी ने आसान कर दिया.

दिनरात की मेहनत के बाद कुछ ब्रा झने कपड़े की तो कुछ कौटन की तैयार हो गई थीं. अब बारी थी कस्टमर ढूंढ़ने की, तो इस के लिए नौरीन ने एक तार पर ब्रा को लटका दिया और बड़े अक्षरों में लिख दिया, ‘यहां महिलाओं की पसंद के अनुसार हर साइज की ब्रा बनाई जाती हैं’.

जब भी कसबे की औरतें अपने सूट वगैरह का नाप देने आतीं, तो उन की नजर इस वाक्य पर जरूर पड़ती.

‘‘तो क्या आप ब्रा भी सिलती हैं?’’ एक दिन फरजाना ने हिम्मत कर के पूछ ही लिया.

फरजाना 40 साल की मोटी औरत थी और अभी तक की जिंदगी में मारे शर्म के वह सही ब्रा का चुनाव नहीं कर पाई थी, इसलिए उस का शरीर हमेशा ढलकाढलका रहता था.

नौरीन फरजाना अंदर कमरे में ले गई और एक आदमकद शीशे के सामने खड़ा कर दिया और ढेर सारी ब्रा उस के सामने रख दीं.

‘‘हमारे यहां आप बेखटक अपनी पसंद की ब्रा पहन कर ट्राई करो और पसंद आए तभी खरीदो,’’ नौरीन ने कहा और कमरे से बाहर चली गई.

फरजाना को यह अहसास पहली बार मिल रहा था. कितना हलकापन सा महसूस हो रहा था उसे जब उस ने अपने पसंदीदा गुलाबी रंग की ब्रा को अपने तन पर कसा और हुक लगाने के बाद चारों तरफ से अपने मोटे शरीर को निहारा. आज पहली बार उस की पीठ और कंधों को आराम मिल रहा था. उस ने शीशे में पहली बार अपना यह रूप देखा और शरमा गई. कितनी खूबसूरत लग रही थी वह इस गुलाबी ब्रा में.

फरजाना के द्वारा नौरीन के काम की तारीफ सुन कर और भी औरतें नौरीन के पास पहुंचीं और धीरेधीरे ब्रा बेचने का काम तेजी से चल निकला. अब तो जो औरत सिलाई करवाने आती कम से कम 2-3 ब्रा तो जरूर ही खरीदती.

नौरीन और उस की अम्मी बराबर सिलाई करती रहतीं, पर फिर भी नौरीन को इतना काम और उस से होने वाली आमदनी भी 3 लोगों का परिवार चलाने के लिए काफी नहीं लग रही थी.

इस के लिए नौरीन ने अहमद की मदद ली और कुछ छोटेछोटे परचे छपवाए और कसबे में या लखीमपुर शहर में जहां भी अहमद डिलीवरी करने जाता, तो ये परचे भी डिलीवरी करते समय ग्राहक को पकड़ा देता और मुसकरा कर कहता, ‘‘जी हमारे घर की औरतों ने काम शुरू किया है. एक बार सेवा का मौका जरूर दें.’’

यह कदम तो काफी आशावादी था, पर नौरीन को इस का फायदा तब दिखा, जब उस की दुकान में औरतों की तादाद में इजाफा दिखा.

अब तो अम्मी सिलाई मशीन पर बैठी रहतीं और नौरीन बराबर औरतों के ब्रा का नाप लेती रहतीं. यहां पर औरतों को बड़ा फायदा यह मिल रहा था कि वे अपने पसंद की ब्रा सिलवा सकती थीं. मसलन कपड़े और रंग का चुनाव, सीने पर आने वाले कप का चुनाव और स्ट्रिप की मोटाई और पतलापन… ये सब वे अपनी पसंद के मुताबिक बनवा सकती थीं.

अब तो नौरीन ने अपनी दुकान का नाम भी रख दिया था और यह नाम था ‘34 बी’.

यह एक ब्रा के साइज का नंबर होता है, इसलिए पहलेपहल तो नौरीन के काम का मजाक बना. अम्मी ने भी नौरीन से कहा कि वह कम से कम नाम तो कुछ ढंग का रख ले, महल्ले वाले क्या कहेंगे?

पर नौरीन ने अपनी बात रखते हुए कहा, ‘‘यह नाम मुझे महिलाओं की सोच बदलने में मदद करेगा. ब्रा पहनना या ब्रा का दिख जाना कोई गलत बात तो नहीं, जो इसे छिपाया जाए.’’

नौरीन ने अपना काम फैलाने और जागरूकता जगाने के लिए कसबे के ‘कन्या पाठशाला’ की प्रिंसिपल के साथ मिल कर लड़कियों और टीचरों के साथ एक गोष्ठी का आयोजन किया और लड़कियों को सही साइज की ब्रा पहनने के लिए बढ़ावा दिया.

बुटीक नंबर ‘34 बी’ का नाम अब कसबे और कसबे के बाहर भी फैल रहा था.

अम्मी ने एक बार फिर से नौरीन से बुटीक का नाम बदलने के लिए भी कहा पर नौरीन नहीं मानी. ‘34 बी’ नाम रखना तो एक बहाना है, असली मकसद तो औरतों की झिझक को बाहर भगाना है.

नौरीन और अम्मी के इस बुटीक की धूम चारों ओर छा चुकी थी. इसी बीच नौरीन के पास आंचल मैडम का फोन आया कि नौरीन और उस की अम्मी को उन की संस्था ने महिलाओं की शर्म और झिझक खत्म करने का अभियान चलाने के लिए सम्मानित करने का निश्चय किया है और इस महीने की 10 तारीख को उन दोनों लोगों को लखीमपुर में ‘इंदिरा आडिटोरियम’ में पहुंचना है, जहां पर उन्हें सम्मानित किया जाएगा.

नौरीन के लिए तो यह अनुभव नया था ही, पर इस से भी ज्यादा खुशी उस की अम्मी को मिल रही थी.

उन्होंने एक ऐसे समय को जिया था, जब किसी के लिए ब्रा बोलना या ब्रा को खुले में सुखाना बड़ी शर्म की बात मानी जाती थी और आज उन की बेटी की छोटी सी कोशिश ने खुद उके लिए तो रोजगार ढूंढ़ा ही है, साथ ही साथ बहुत सारी महिलाओं की झिझक खत्म करने में मदद की है और इस बात के लिए उन्हें सम्मानित किया जा रहा है.

आडिटोरियम में तालियों की गूंज थी. अहमद ने भी आज काम से छुट्टी ले ली, ताकि वह नौरीन को सम्मानित होते हुए देख सके. नौरीन की छोटी बहन रोशनआरा को भी अहमद साथ ले आया था.

नौरीन का नाम पुकारा गया और उसे सम्मानित किया गया. उसे माइक पर कुछ बोलने को कहा गया. नौरीन ने एक कविता सुनाई :

‘‘ये स्तन नहीं, ये संकल्प हैं.

ये बोझ नहीं, ये अधिकार हैं.

ये ब्रा खुद अपनी भाषा हैं,

जहां औरत खुद अपनी परिभाषा है.

छिपाने की नहीं, अब दिखाने की बारी है.

ये ब्रा नहीं हमारी इंकलाबी सवारी हैं.’’

तालियां लगातार बज रही थीं. नौरीन का एक छोटा सा कदम कसबे की औरतों और पूरी नारी जाति के लिए एक बड़ी छलांग थी. Best Hindi Story

Hindi Romantic Story: एक औरत का प्रेम मुकाम

Hindi Romantic Story: ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ उस घर के अहाते से रोज ऐसी ही मारपीट की आवाज सुनाई पड़ती थी. वह नया किराएदार था. शुरू में पड़ोसियों ने किसी के घरेलू मामले से दूर रहना ही बेहतर समझा. यही सोच कर कि किराएदार शराबी होगा. शाम को शराब पी कर आता होगा और अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता होगा. लेकिन जब रोजरोज ऐसा होने लगा, तो पड़ोसियों का सब्र जवाब देने लगा.

दुनिया की रीत है कि अपने आंगन में क्या हो रहा है, इस को कोई नहीं देखता, लेकिन दूसरे के घर में एक बरतन भी खड़क जाए, तो सब के कान खड़े हो जाते हैं.

मामले को जानने के लिए किसी पड़ोसी ने दीवार के ऊपर से झांक कर देखा, तो किसी ने छत पर खड़े हो कर. मामले को जान कर कोई हंसा, तो कोई अचंभे से मुंह खोल कर रह गया. चटकारों का बाजार गरम हो गया.

पर यह मामला तो बिलकुल उलटा था. यह आदमी नहीं, बल्कि औरत थी, जो हर शाम को अपने आदमी की कुटाई करती थी. इस में अचंभे की बात यह भी थी कि आदमी इस कुटाई का कोई विरोध नहीं करता था.

वह सिर झुका कर अपनी पत्नी की ज्यादती को ऐसे सहन करता था, जैसे उस की पत्नी को उसे इस तरह पीटने का ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ हो, जैसे किसी लेखक और प्रकाशक का किसी किताब पर होता है.

पड़ोसियों को बैठेठाले हंसनेहंसाने, चटकारे लेने और मनोरंजन का काम कम से कम कुछ दिनों के लिए मुफ्त में ही मिल गया था. आज तक उन्होंने पतियों के द्वारा पत्नियों की पिटाई होने के किस्से बहुत सुने और देखे थे, लेकिन पत्नी के द्वारा पति की पिटाई होते वे पहली बार देख रहे थे. वह भी एकाध दिन नहीं, रोजाना शाम को तय समय पर और पिटाई के बाद निपट निल बटा सन्नाटा, जैसे कुछ हुआ ही न हो.

ये पति पत्नी कोई और नहीं, सुधाकर और सविता थे. सुधाकर अपने मातापिता की एकलौती औलाद था. वह हरियाणा के यमुनानगर की थापर पेपर मिल में अपने पिता की सिफारिश पर लैब असिस्टैंट की नौकरी पा गया था.

उस की तनख्वाह कम थी, लेकिन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में नौकरी पक्की थी, इसलिए उस की एमए पास पढ़ीलिखी लड़की सविता से शादी हो गई थी.

सविता देखने में सुंदर, सुशील और मासूम दिखाई पड़ती थी, लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि असल में वह ऐसी थी नहीं. सासबहू के झगड़े वैसे तो आम बात है, लेकिन सविता ने तो जैसे ससुराल में आते ही इस जंग का आगाज कर दिया हो.

सुधाकर ने हरमुमकिन तरीके से सविता को समझाने की कोशिश की, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. वह यह समझाने में नाकाम रहा कि सविता आखिर उस की मां से लड़ती ही क्यों है. वह कोई न कोई बहाना ढूंढ़ कर उस की मां से भिड़ जाती थी, फिर तो दोनों तरफ से जबानी जंग शुरू हो जाती थी.

सुधाकर समझ नहीं पाया कि आखिर सविता चाहती क्या है? वह मां को समझाता तो तड़ाक से जवाब मिलता, ‘‘औरत के गुलाम, पिट्ठू. शर्म नहीं आती तुझे. अपनी औरत को तो समझाने से गया, मुझ बुढि़या को समझाने चला है, नालायक, कलयुगी.’’

यह सुन कर सुधाकर सहम जाता. अपनी औरत को समझाता, तो वह उसे उलटे हाथों लेती, ‘‘जाओ, मां के पेटीकोट में जा कर छिप जाओ. वहां से बाहर निकले ही क्यों थे? पूरी जिंदगी वहीं रहते.’’

सुधाकर मां और पत्नी के बीच चक्की के 2 पाटों के बीच जैसा पिसता. घर की इस कलह के बीच सुधाकर
2 बच्चों का पिता बन गया, एक बेटी और एक बेटा.

लेकिन जब घर में कलह की हद हो गई तो एक दिन उस के पिता ने समझाया, ‘‘सुधाकर, तेरी मां और बहू की खटपट से मैं तंग आ गया हूं. तू तो ड्यूटी पर चला जाता है, लेकिन मेरा जीना मुहाल हो जाता है. तू हमें कहीं किराए पर कमरा ले कर दे दे, जिस से यह बुढ़ापा चैन से कटे.’’

यह सुन कर सुधाकर सोच में पड़ गया. वह बोला, ‘‘पिताजी, आप ये कैसी बातें कर रहे हो? यह मकान दादाजी और आप के खूनपसीने की कमाई का पुश्तैनी मकान है. आप किराए के मकान में जा कर क्यों रहोगे? किराए पर रहने की जरूरत पड़ेगी तो हम जा कर रहेंगे.’’

‘‘बेटा, तू कुछ भी कर… अब इन सासबहू का एकसाथ रहना मुश्किल है.’’

सुधाकर को पता नहीं था कि बापबेटे की बात को सविता ने कान लगा कर सुन लिया है. जैसे ही वह अपने कमरे में पहुंचा, सविता ने उसे आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘क्या कह रहा था बुड्ढा?’’

‘‘सविता, जबान संभाल कर. गुस्से और नफरत में तहजीब नहीं खोते.’’

‘‘ऐसी तहजीब रखो अपने पास, मेरी जूती पर. बुड्ढे को बुड्ढा नहीं कहूंगी, तो क्या जवान कहूंगी. गोद में ले कर खिला लो, दूध पीता बच्चा है तुम्हारा बाप.’’

‘‘सविता, तुम हदें पार कर रही हो.’’

‘‘मैं तो हदें पार कर ही रही हूं. तुम ध्यान से सुन लो… अब इस घर में या तो तुम्हारे मांबाप रहेंगे या फिर हम रहेंगे. और यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

अगले दिन से ही सविता ने जिन्ना की तरह घर को दो फाड़ करने का डायरैक्ट ऐक्शन शुरू कर दिया. सुधाकर घर की कलह से कांग्रेस के नेताओं की तरह घबरा गया. उस ने घर में किसी अनहोनी के डर से किराए का मकान तलाशना शुरू कर दिया.

मौडल टाउन में सुधाकर को एक ऐसा मकान किराए पर मिल गया, जिस का अहाता खास बड़ा था और जिस का मकान मालिक दूर जींद जिले में रहता था.

किराए के मकान में आ कर सुधाकर को लगा कि सविता के बरताव में बदलाव आ जाएगा, लेकिन जल्दी ही उसे एहसास हो गया कि सविता में रंचमात्र भी फर्क नहीं आया है. अब उस का सारा गुस्सा उस की तरफ डायवर्ट हो गया है. अब सविता का सारा गुस्सा उसे अपने ऊपर झेलना पड़ता.

सविता की नाराजगी अब यह थी कि सुधाकर अपने मांबाप के पास क्यों जाता है. वह सुधाकर के घर आते ही उस पर फट पड़ती थी. अब तो वह गालीगलौज से पेश आती थी और मारपीट पर भी उतर आती थी.

‘‘हरामखोर, यहां आता ही क्यों है? उन्हीं बुड्ढेबुढि़या की गोद में जा कर मर, जिन के बिना तुझ से रहा नहीं जाता. मुझ से शादी ही क्यों की थी, जब तुझे उन के साथ ही रहना था?’’

सुधाकर को समझमें नहीं आता था कि आखिर सविता को हो क्या गया है? कुछ भी हो पुश्तैनी घर में उस ने उस से कभी ‘तूतड़ाक’ से बात नहीं की थी और न ही अपने प्रति उसने आज तक इतनी नफरत देखी थी. आखिर यह नफरत उस के मन में आई कैसे?

सुधाकर कोई तमाशा नहीं खड़ा करना चाहता था. उस ने यह मकान ही किराए के लिए इसलिए पसंद किया था कि इस में मकान मालिक नहीं रहता था. ऐसे मकान मिलने बड़ी मुश्किल होते हैं. अगर उस ने तमाशा खड़ा किया और पड़ोसियों ने मकान मालिक से शिकायत कर दी, तो फिर ऐसा किराए का मकान मिलना मुश्किल हो जाएगा, इसलिए न चाह कर भी सुधाकर उस के जुल्म को सहता गया. मार खा कर भी वह चुप रहता, क्योंकि एक उम्मीद बाकी थी.

अपनी भड़ास उतारने के बाद सविता आश्चर्यजनक रूप से सामान्य हो जाती थी. सविता का यह राज भी आज तक उसे समझमें नहीं आया था. सविता का गुस्सा और नाराजगी उस के लिए पहेली बने हुए थे.

एक दिन सविता की कालेज के समय की सहेली सुदीक्षा उसे ‘सरप्राइज’ करने के लिए बिना सूचना दिए उस से मिलने के लिए उस का घर तलाशती हुई तकरीबन उसी समय उस के घर पर पहुंची, जब सुधाकर के घर वापस आने का समय था.

अभी सुदीक्षा दरवाजे पर पहुंची ही थी कि उसे घर के अंदर से ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ और गालीगलौच की आवाज सुनाई दी. ऐसे में वह घर के अंदर कैसे जाए? वह उलटे पांव वापस लौटी. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि सविता अपने पति के साथ ऐसा भी कर सकती है. रातभर वह सविता के बारे में सोचती रही.

सुदीक्षा सविता को कालेज के दिनों से जानती थी और उस की नजर में उस की प्यारी सहेली सविता बिलकुल भी ऐसी नहीं थी. वह जितना उस के बारे में सोचती, उस का कौतूहल उतना ही बढ़ता जाता.

अगले दिन सुदीक्षा सविता से ऐसे समय मिलने पहुंची, जब उस का पति औफिस में और बेटी स्कूल गई हुई थी. बेटा तो सविता का अभी छोटा ही था.

सुदीक्षा को देखते ही सविता खुश हो गई. उस ने उसे गले लगा लिया. फिर दोनों बैठ कर बतियाने लगीं.

चाय पीते हुए चालाकी से बातों ही बातों में सुदीक्षा ने कल वाली बात छेड़ दी. पहले तो सविता बचती रही, फिर लंबी सांस खींच कर बोली, ‘सुदीक्षा, अब तुझसे क्या बताऊं और क्या छिपाऊं? तू तो मेरी कालेज लाइफ के बारे में सबकुछ जानती ही है.’’

‘‘हां, वह तो मैं अच्छे से जानती हूं. वरुण से तेरे लव अफेयर के बारे में भी,’’ सुदीक्षा ने चुटकी लेते हुए कहा.

‘‘तुझेतो पता ही है सुदीक्षा. मैं वरुण से कितना प्यार करती थी. हम दोनों ने साथ जीनेमरने की कसमें तक खा रखी थीं.’’

‘‘हांहां, मैं सब जानती हूं.’’

‘‘लेकिन सुदीक्षा, मैं उस समय ठहरी एक संस्कारी लड़की. मैं चाहती और जैसा वरुण चाहता भी था कि दूसरी बिगड़ी हुई लड़कियों की तरह खूब मौजमस्ती करती और गुलछर्रे उड़ा सकती थी. बहुत सी बिगड़ी लड़कियां तो अपने यारों के साथ कालेज के खाली पड़े क्लासरूम या फिर किसी कोने में ही…

‘‘उन दिनों सीसीटीवी कैमरे का चलन तो था ही नहीं. कुछ लड़कियां तो रोज ही किसी न किसी के साथ, लेकिन मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया.’’

‘‘सही कह रही हो.’’

‘‘लेकिन मेरे मांबाप ने सबकुछ जानते हुए भी सुधाकर से मेरी शादी कर दी और मैं कोई विद्रोह न कर सकी. सारी कसमें धरी की धरी रह गईं. मैं तो वरुण की नजरों में बेवफा हो गई और सुधाकर को कभी मन से अपना न सकी. यह अपराधबोध मुझेदिनरात सताता है.’’

कुछ देर सुदीक्षा माथा पकड़ कर बैठी रही, फिर कुछ सोच कर बोली, ‘‘मेरी प्यारी लैला, क्या इस अपराधबोध और वरुण के प्यार को जिंदगीभर बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह सीने से चिपटाए रखेगी?

ये लैला बनने के दिन नहीं, यह मौडर्न जमाना है… जरा कुछ सोच.’’

‘‘सुदीक्षा, तुम कुछ भी कहो. मुझेहमेशा लगता है कि मैं ने वरुण के साथ बहुत गलत किया. मैं इस के लिए खुद को कुसूरवार मानती हूं और गुस्से से भर उठती हूं. अपने बस में नहीं रहती. पहले यह गुस्सा अपने सासससुर पर निकालती थी और अब वह गुस्सा सुधाकर पर निकालती हूं. उस का चेहरा देख कर ही मैं तमतमा उठती हूं.’’

‘‘लेकिन सुधाकर तो बहुत अच्छे हैं, उन पर गुस्सा क्यों करती है?’’

‘‘सुदीक्षा, देख तू भी एक औरत है. एक औरत ही दूसरी औरत के दिल की बात को समझसकती है कोई मर्द नहीं. एक औरत का दिल जिस पर आता है, वह कभी उसे भुला नहीं सकती.

‘‘वरुण की कमी शादी के बाद मुझेबहुत खलने लगी. आज भी वह मेरे रोमरोम में बसा हुआ है. सुधाकर हीरे का भी क्यों न बन जाए, वह वरुण की जगह नहीं ले सकता.’’

‘‘अरे सविता, तू तो इस जमाने की हीर बन रही है, बुलाऊं क्या तेरे रांझवरुण को यहीं पर,’’ सुदीक्षा ने हंसते हुए उस के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘चल पगली कहीं की. वह तो बेचारा मेरी याद में न जाने कहां तड़प रहा होगा. काश, वह एक बार आ जाता तो मैं उस के पैरों में गिर कर उस से माफी मांग लेती.’’

‘‘अच्छा चल, वरुण की बात बाद में करेंगे, यह बता इस सब में सुधाकर की क्या गलती है?’’

‘‘सुधाकर की इस में यह गलती है कि वह इस दुनिया में जनमा ही क्यों? न वह इस दुनिया में होता और न मेरी उस से शादी होती. फिर शायद मैं वरुण की ही होती.’’

सुदीक्षा यह सुन कर अपना सिर पकड़कर बैठ गई, फिर हंसते हुए और अफसोस जताते हुए बोली, ‘‘सविता, हम औरतें इसी कारण से इस दुनिया में लांछित हैं. यह दुनिया एक औरत के प्रेम मुकाम को नहीं समझपाती. तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारी शादी वरुण से कर दी होती तो यह सबकुछ न होता, जो तुम्हारे घर में हो रहा है.

‘‘लेकिन मर्द औरतों की भावनाओं को नहीं समझपाते. वे बेदर्द हो कर हमारी भावनाओं को कुचलते हैं और हम पर राज करने की कोशिश में लगे रहते हैं, इसलिए बहुत सी औरतों को विद्रोह भी करना पड़ता है. लेकिन कई बार हम भी मर्दों को नहीं समझपाती हैं.’’

‘‘मतलब?’’ सविता ने पूछा.

‘‘जिस वरुण के लिए सविता तू मरी जा रही है और अपने परिवार मैं तू ने उस के लिए इतनी उथलपुथल मचा रखी है, उस की करतूतों को सुन कर तेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी.’’

‘‘यह क्या कह रही है सुदीक्षा. मेरा वरुण ऐसा कुछ नहीं कर सकता, जो मैं न सुन पाऊं. दुनिया में उस से अच्छा आदमी हो ही नहीं सकता.’’

‘‘तेरा सोचना कुछ भी गलत नहीं है. सब लैलाओं को अपना मजनूं ऐसा ही लगता है. ले अब सुन अपने रांझवरुण की करतूत. तेरी शादी के कुछ महीने बाद ही वह अपने पड़ोस की शादीशुदा भाभी को भगा ले गया, फिर वह कई दिन जेल में रहा.’’

‘‘नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता,’’ सविता ने अपने कानों पर हाथ धरते हुए कहा.

‘‘अब अनजान मत कर. अपने रोमियो की हकीकत सुन. बहुत बन ली तू जुलियट, अपने परिवार में टैंशन कर के. पता है आजकल वह एक नहीं 2-2 बिगड़ी लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है और तू कहती है वह कुंआरा ही तेरी याद में तड़प रहा होगा. यह मर्द जात है कहीं भी मुंह मार देती है, बस मौका मिला चाहिए.’’

‘‘तू झठ बोल रही है,’’ सविता ने कहा.

‘‘मैं झठ बोल रही हूं, तो ले यह देख, मैं सुबूत साथ लाई हूं.’’

जब सुदीक्षा ने अपने मोबाइल में वरुण और उस की प्रेमिकाओं के फोटो और उस की जेल जाने की तसवीरें दिखाईं, तो सविता का प्रेम भूत एक झटके में उतर गया. उसे तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, लेकिन वह हकीकत को भी तो झठला नहीं सकती थी.

प्रेम भूत उतरते ही सविता को सुधाकर वरुण से लाख अच्छा लगने लगा था.

‘‘सुदीक्षा, तू ने तो सच में मेरी आंखें खोल दीं. मैं वरुण के प्रेम में डूब कर अपना घर तबाह कर रही थी.’’

‘‘मैं तो तुझसे केवल वैसे ही मिलने आई थी, लेकिन तेरे हालात ने मुझेतेरे सामने हकीकत लाने को मजबूर कर दिया. वरुण की करतूतों के बारे में तो मुझेबहुत पहले ही पता चल गया था, लेकिन मुझेयह नहीं पता था कि तू उस के प्रेम की यादों को अभी तक सीने से चिपकाए बैठी है.’’

कुछ देर और रुकने के बाद सुदीक्षा वहां से चली गई. अगली बार जब सुदीक्षा उस से मिलने आई, तो उस ने सविता को पुश्तैनी मकान में अपने सासससुर के साथ सुख से रहते पाया. यह देख कर उस के चेहरे पर भी मुसकान खिल गई. Hindi Romantic Story

Hindi Story: फरेब – कौन किस से कर रहा था दगाबाजी?

Hindi Story: ‘‘आज फिर मालकिन रात को देर से आएंगी क्या साहब?’’ कमला ने डिनर के बाद बरतन उठा कर सिंक में रखते हुए बाईं आंख दबा कर होंठ का कोना दांत से काटते हुए मुसकरा कर पूछा.

कमला की इस अदा पर जितेंद्र कुरसी से उठा और उसे पीछे से बांहों में भरते हुए धीरे से उस के कान में बोला, ‘‘हां जानेमन. उस के बैंक में क्लोजिंग चल रही है, तो कुछ दिन देर रात तक ही लौटेगी. बहुत हिसाबकिताब करना होता है न बैंक वालों को. और मैनेजर पर सब से ज्यादा जिम्मेदारी होती है.’’

‘‘अच्छा है साहब, फिर हम भी कुछ हिसाबकिताब कर लेंगे. वैसे, आप हिसाब बहुत अच्छा करते हैं साहब. बस, किसी दिन मेमसाहब पूरी रात बाहर रहें तो मैं आप से ब्याज भी वसूल कर लूं,’’ कमला ने जितेंद्र की ओर घूमते हुए कहा और उस के ऐसा करने से जितेंद्र के होंठ कमला के होंठों के सामने आ गए, जिन्हें कमला ने थोड़ा सा और आगे हो कर अपने होंठों से चिपका लिया.

जितेंद्र की सांसें तेज होने लगी थीं. वह अब कमला से पूरी तरह चिपकने लगा था कि तभी कमला एक झटके से घूम कर जितेंद्र से अलग हो गई और बोली, ‘‘छोडि़ए साहब, देखते नहीं कितना काम पड़ा है. और फिर मुझे घर जा कर अपने मरद को भी हिसाब देना होता है. आप के साथ हिसाब करने लगी तो फिर मेरे मरद के हिसाब में कमी हो जाएगी और वह मुझ पर शक करेगा.

‘‘वैसे भी पिछली बार जब मैं आप के साथ चिपक कर गई थी तो वह सवाल कर रहा था कि यह जमीन में इतनी नमी क्यों है. वह तो मैं ने किसी तरह उसे यह कह कर संभाल लिया कि बहुत दिन से कुछ हुआ नहीं तो आज तुम्हारे हाथ लगाने से ज्यादा ही जोश आ गया है और वह मान गया, नहीं तो मेरा भेद खुल ही जाना था उस दिन.’’

जितेंद्र जो अब पूरी तरह मूड में आ चुका था, कमला को ऐसे दूर जाते देख कर झटका खा गया. वह अब किसी भी हालत में कमला का साथ चाहता था, तो वह आगे बढ़ कर फिर से कमला को बांहों में भरते हुए बोला, ‘‘अरे कमला, क्या तुम्हें मेरा प्यार कम लगता है? किसी को कुछ नहीं पता चलेगा, बस तुम मुझ से दूर मत जाओ. कमला, मैं सच में तुम्हें चाहता हूं. तुम्हारा साथ मुझे बहुत अच्छा लगता है.

‘‘तुम जैसे मुझे प्यार करती हो न, ऐसा तो कभी तुम्हारी मेमसाहब भी नहीं करतीं. सच कहूं तो निर्मला को प्यार करना आता ही नहीं है,’’ जितेंद्र ने कमला को बांहों में भर कर उस के होंठों की तरफ होंठ ले जाते हुए कहा.

‘‘नहीं साहब, आप झूठ बोलते हैं. आप को मुझ से कोई प्यारव्यार नहीं है, आप तो बस अपनी जरूरत पूरी करते हो. मैं ही आप से प्रेम करने लगी थी साहब, लेकिन मैं अब समझ गई हूं कि आप बस मेरे साथ फरेब करते हो.

‘‘आप को मेरे जिस्म से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. आप का प्रेम बस इतना सा ही है. अभी मैं आप के साथ बिस्तर पर चली जाऊंगी आप का काम हो जाएगा और आप मुझे भूल जाओगे बस,’’ कमला फिर अपनेआप को छुड़ाते हुए बोली.

‘‘नहींनहीं, ऐसा नहीं है कमला. मैं तुम से सच में प्यार करता हूं. अच्छा बताओ, मेरा प्यार सच्चा है, इसे साबित करने के लिए मैं तुम्हें क्या दूं?’’ जितेंद्र ने अब कमला को बांहों में उठा लिया था. हवस का जोश अब जितेंद्र के संभालने से बाहर हो रहा था.

जितेंद्र ने कमला को बिस्तर पर बिठाया और उस के सामने खड़े हो कर अपनी शर्ट के बटन खोलते हुए बोला, ‘‘बताओ न, क्या चाहिए तुम्हें?’’

‘‘साहब, आप सच कह रहे हैं. सच में आप मुझे प्यार करते हैं,’’ कमला ने बिस्तर पर लेट कर अपने पैर से जितेंद्र के सीने के बालों को सहला कर होंठ काटते हुए पूछा.

‘‘हां सच कमला, तुम एक बार मांग कर तो देखो, जो कहोगी, मैं तुम्हें दे दूंगा,’’ जितेंद्र ने आगे बढ़ते हुए कहा. उस की आवाज हवस में बहक रही थी. कमला अपनी अदाओं से उस के जिस्म की आग को और बल दे रही थी.

‘‘क्या आप को नहीं लगता कि ऐसे छिपछिप कर मिलने से हमारे प्यार की अच्छे से भरपाई भी नहीं हो पाती और हमारे पकड़े जाने का डर रहता है सो अलग.

‘‘अब मान लो कि अभी हम प्यार शुरू ही कर रहे हैं और आप की पत्नी आ जाए तब? या फिर मेरा मरद ही मुझे ढूंढ़ता हुआ आ जाए तब? क्या ऐसे अच्छे से प्यार हो सकता है?’’ कमला ने एकएक शब्द सोच कर बोला.

‘‘नहीं हो सकता कमला, तभी तो कह रहा हूं कि आओ हम जल्दी से प्यार कर लें, उस के बाद तुम आराम से काम खत्म कर के अपने घर चली जाना,’’ जितेंद्र ने कमला के ऊपर झुकते हुए कहा.

‘‘कुछ ऐसा नहीं हो सकता साहब कि हम लोग जब मन करे प्यार करें और हमें रोकनेटोकने वाला कोई न हो?’’ कमला ने जितेंद्र के गले में बांहें डाल कर उस की आंखों में देखते हुए बहुत मीठे शब्दों में कहा.

‘‘कैसे हो सकता है बताओ कमला? बताओ, मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करने को तैयार हूं,’’ जितेंद्र ने अपनी उंगलियां कमला के ब्लाउज के बटनों में उलझाते हुए पूछा.

‘‘आप अपना ‘बोरीवली’ वाला वन रूम सैट मेरे नाम कर दो साहब. फिर जब आप का मन करे दिन या रात

कभी भी हम उस फ्लैट में आराम से प्यार करेंगे. वहां कोई हमें डिस्टर्ब नहीं करेगा साहब.’’

‘‘लेकिन, तुम्हारा मरद?’’ जितेंद्र ने कमला का कंधा सहलाते हुए कहा.

‘‘उस की फिक्र आप न करो साहब ऐसे तो वह 12-12 घंटे गार्ड की नौकरी करता है, कभी दिन, तो कभी रात. हमारे पास बहुत समय होगा अकेले में मिलने का, जब वह काम पर होगा.

‘‘और फिर मैं उसे बताऊंगी ही नहीं कि फ्लैट आप ने मेरे नाम पर किया है. मैं उस से कहूंगी कि मालिक ने तरस खा कर यह फ्लैट हमें रहने के लिए दिया है, इसलिए साहब जब चाहे यहां आ सकते हैं बस,’’ कमला ने जितेंद्र की पीठ पर हाथ चलाते हुए कहा.

‘‘लेकिन कमला, उस के लिए फ्लैट तुम्हारे नाम करने की क्या जरूरत है? उस में तो तुम ऐसे भी जा कर रह सकती हो?’’ जितेंद्र ने एक सवाल पूछा कि तभी कमला ने आगे बढ़ कर उस के होंठों को अपने होंठों में दबा कर एक लंबा सा चुम्मा किया और बोली, ‘‘तुम सोचते बहुत हो साहब, अभी तो कह रहे थे कि अपना प्यार साबित करने के लिए कुछ भी कर सकते हो और अब कुछ पेपर पर तनिक सा पैन घिसने में तुम्हारे पैन की स्याही खत्म होने लगी. फिर

तुम हमारे प्यार की कहानी कैसे लिखोगे साहब?’’

कमला ने जितेंद्र की आंखों में मुसकराते हुए देखा और अपने हाथ उस की पैंट की ओर बढ़ा दिए.

कमला की इस हरकत पर जितेंद्र के मुंह से हलकी ‘आह’ निकल गई और मस्ती से उस की आंखें बंद होने लगीं.

‘‘आप का पैन तो एकदम तैयार है साहब, तनिक इन पेपरों पर चला कर देखिए तो क्या यह हमारे प्रेम की कहानी लिख पाएगा…’’ कमला ने तकिए के नीचे से कुछ पेपर निकाल कर जितेंद्र के सामने रखे और उस के हाथ में एक कलम दे कर बोली, ‘‘यहां दस्तखत कीजिए साहब.’’

ऐसा कहने के साथ ही कमला के हाथ जितेंद्र की पैंट में हरकत करने लगे, उस से जितेंद्र की आंखें बंद हो गईं और वह बोला, ‘‘लेकिन, कमला…’’

‘‘ओहो… आप कितना सोचते हो साहब. बस जरा सा पैन ही तो चलाना है, फिर जी भर कर हम अपने प्यार की कहानी लिखेंगे. आप सोचिए मत. बस, दस्तखत कीजिए, तब तक मैं चैक करती हूं कि क्या आप की कलम मेरे प्रेम की किताब पर कोई कहानी लिख भी पाएगी या फिर…?’’ कह कर कमला ने अपने होंठ ‘उधर’ बढ़ा दिए.

अब जितेंद्र आगे कुछ नहीं कह पाया और उस ने कांपती उंगलियों से उन पेपरों पर दस्तखत कर दिए.

दस्तखत होने के बाद कमला को जैसे जितेंद्र के अंदर उमड़ रहे तूफान को शांत करने की बहुत जल्दी थी. उस ने अपनी हरकतों को और बढ़ा दिया और 3-4 मिनट में ही जितेंद्र निढाल हो कर बिस्तर पर लुढ़क गया.

कमला ने उठ कर अपना मुंह साफ किया और अपने कपड़े ठीक करते हुए गेट बंद कर के फ्लैट से बाहर निकल आई.

‘‘हो गया न काम?’’ नीचे आते ही चौकीदार की वरदी पहने खंभे की आड़ में खड़े एक आदमी ने उस से पूछा.

जवाब में कमला ने मुसकराते हुए पेपर उस के हाथ में रख दिए.

‘‘वाह मेरी जान, खूब फरेब में फंसाया तुम ने इस रईस को,’’ वह चौकीदार कमला को गले लगाते हुए खुश हो कर बोला.

‘‘फरेब तो इस ने किया था मेरे साथ, मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि अपने मरद के अलावा किसी को हाथ भी लगाने दूंगी, लेकिन उस दिन पार्टी के बाद इस कमीने ने मुझे जूस में न जाने क्या मिला कर पिलाया कि मैं इस की बांहों में गिर पड़ी और उस मदहोशी की हालत में इस की किसी भी हरकत का विरोध न कर सकी.

‘‘बस, आज मैं ने भी वही किया. और यह भी मदहोशी में मेरी किसी भी मांग का विरोध नहीं कर पाया. लेकिन इस ने जो काम मुझे ड्रग्स दे कर किया था. वह मैं ने केवल अपने हुस्न और अदाओं से कर दिया.

‘‘अच्छा, अब चलो यहां से. किसी ने देख लिया, तो गजब हो जाएगा. बस, कल सुबह ही ये पेपर ले कर वकील के पास चले जाना. एक बार 40 लाख

का वह फ्लैट अपने नाम हो जाए, फिर इसे लात मार कर भगा दूंगी,’’ कमला ने हंसते हुए कहा और दोनों वहां से चले गए.

‘‘कमला, तुम पिछले 5-6 दिन से काम पर क्यों नहीं आई? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न? तुम मेरा फोन भी नहीं उठा रही हूं और न ही तुम्हारा पति

फोन उठा रहा है. क्या हुआ? कोई बात है तो मुझे बताओ?’’ जितेंद्र ने सुबहसुबह फ्लैट पर पहुंच कर कमला से सवाल किया.

‘‘कुछ नहीं हुआ साहब, मेरे मरद ने अब मुझे लोगों के घरों में जा कर काम करने से मना किया है, तो आप दूसरी बाई ढूंढ़ लो. मैं अब काम नहीं करूंगी. अब मेरा मरद कमाएगा और मैं बैठ कर खाऊंगी बस,’’ कमला ने बहुत ही रूखे स्वर में जवाब दिया.

‘‘कैसी बात करती हो कमला? मैं किसी के घर काम की नहीं कह रहा हूं, लेकिन हमारे अपने घर…? क्या तुम्हारा प्यार खत्म हो गया, जो तुम मुझ से मिलने भी नहीं आईं और जैसी कि हमारी बात हुई थी कि इस फ्लैट में मैं और तुम साथ रहेंगे और प्यार करेंगे. क्या तुम वह भी भूल गईं?’’ जितेंद्र ने सवाल किया.

‘‘कौन सा प्यार साहब? वह तो बस एक सौदा था, उस में कुछ मैं ने अपना लुटाया और कुछ आप ने अपना. सौदा पूरा हुआ, साहब सब व्यापार खत्म,’’ कमला ने उसी रूखेपन से कहा.

‘‘तो क्या तुम्हारा प्यार सच में बस एक फरेब था कमला? क्या तुम ने मेरा मकान हड़पने के लिए मुझ से प्रेम का नाटक किया था?’’ जितेंद्र ने गुस्से से भर कर पूछा.

‘‘हाहाहा… फरेब… हां साहब, फरेब ही था वह. फरेब जो आप ने मेरे साथ किया था मेरे जूस में ड्रग्स मिला कर. फरेब जो आप ने अपनी पत्नी के साथ किया था पत्नी होते हुए भी मेरे साथ संबंध बना कर.

‘‘फरेब, जो आप ने अपने खुद के साथ किया था हवस में अंधे हो कर, यह मकान मेरे नाम कर के. अब

आप यहां से चले जाइए साहब, कहीं ऐसा न हो कि मैं आप की पत्नी को आप के फरेब के बारे में बता दूं और आप उन्हें भी खो दो. अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है साहब, रोक दो इस फरेब को और बचा लो अपने असली घर को टूटने से.

‘‘मुझे भी अपना घर बचाने दो साहब. मेरा मरद बस आता ही होगा और मैं नहीं चाहती कि वह फिर मेरी गीली होती हुई देखे आंखें,’’ कमला ने कहा और जितेंद्र के मुंह पर फ्लैट का दरवाजा बंद कर दिया.

जितेंद्र खड़ाखड़ा सोच रहा था कि फरेब किस ने किया? फरेबी कौन है? Hindi Story

Hindi Romantic Story: बेईमान बनाया प्रेम ने – क्या हुआ था पुष्पक के साथ

Hindi Romantic Story: अगर पत्नी पसंद न हो तो आज के जमाने में उस से छुटकारा पाना आसान नहीं है. क्योंकि दुनिया इतनी तरक्की कर चुकी है कि आज पत्नी को आसानी से तलाक भी नहीं दिया जा सकता. अगर आप सोच रहे हैं कि हत्या कर के छुटाकारा पाया जा सकता है तो हत्या करना तो आसान है, लेकिन लाश को ठिकाने लगाना आसान नहीं है. इस के बावजूद दुनिया में ऐसे मर्दों की कमी नहीं है, जो पत्नी को मार कर उस की लाश को आसानी से ठिकाने लगा देते हैं. ऐसे भी लोग हैं जो जरूरत पड़ने पर तलाक दे कर भी पत्नी से छुटकारा पा लेते हैं. लेकिन यह सब वही लोग करते हैं, जो हिम्मत वाले होते हैं. हिम्मत वाला तो पुष्पक भी था, लेकिन उस के लिए समस्या यह थी कि पारिवारिक और भावनात्मक लगाव की वजह से वह पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता था. पुष्पक सरकारी बैंक में कैशियर था. उस ने स्वाति के साथ वैवाहिक जीवन के 10 साल गुजारे थे. अगर मालिनी उस की धड़कनों में न समा गई होती तो शायद बाकी का जीवन भी वह स्वाति के ही साथ बिता देता.

उसे स्वाति से कोई शिकायत भी नहीं थी. उस ने उस के साथ दांपत्य के जो 10 साल बिताए थे, उन्हें भुलाना भी उस के लिए आसान नहीं था. लेकिन इधर स्वाति में कई ऐसी खामियां नजर आने लगी थीं, जिन से पुष्पक बेचैन रहने लगा था. जब किसी मर्द को पत्नी में खामियां नजर आने लगती हैं तो वह उस से छुटकारा पाने की तरकीबें सोचने लगता है. इस के बाद उसे दूसरी औरतों में खूबियां ही खूबियां नजर आने लगती हैं. पुष्पक भी अब इस स्थिति में पहुंच गया था. उसे जो वेतन मिलता था, उस में वह स्वाति के साथ आराम से जीवन बिता रहा था, लेकिन जब से मालिनी उस के जीवन में आई, तब से उस के खर्च अनायास बढ़ गए थे. इसी वजह से वह पैसों के लिए परेशान रहने लगा था. उसे मिलने वाले वेतन से 2 औरतों के खर्च पूरे नहीं हो सकते थे. यही वजह थी कि वह दोनों में से किसी एक से छुटकारा पाना चाहता था. जब उस ने मालिनी से छुटकारा पाने के बारे में सोचा तो उसे लगा कि वह उसे जीवन के एक नए आनंद से परिचय करा कर यह सिद्ध कर रही है. जबकि स्वाति में वह बात नहीं है, वह हमेशा ऐसा बर्ताव करती है जैसे वह बहुत बड़े अभाव में जी रही है. लेकिन उसे वह वादा याद आ गया, जो उस ने उस के बाप से किया था कि वह जीवन की अंतिम सांसों तक उसे जान से भी ज्यादा प्यार करता रहेगा.

पुष्पक इस बारे में जितना सोचता रहा, उतना ही उलझता गया. अंत में वह इस निर्णय पर पहुंचा कि वह मालिनी से नहीं, स्वाति से छुटकारा पाएगा. वह उसे न तो मारेगा, न ही तलाक देगा. वह उसे छोड़ कर मालिनी के साथ कहीं भाग जाएगा.

यह एक ऐसा उपाय था, जिसे अपना कर वह आराम से मालिनी के साथ सुख से रह सकता था. इस उपाय में उसे स्वाति की हत्या करने के बजाय अपनी हत्या करनी थी. सच में नहीं, बल्कि इस तरह कि उसे मरा हुआ मान लिया जाए. इस के बाद वह मालिनी के साथ कहीं सुख से रह सकता था. उस ने मालिनी को अपनी परेशानी बता कर विश्वास में लिया. इस के बाद दोनों इस बात पर विचार करने लगे कि वह किस तरह आत्महत्या का नाटक करे कि उस की साजिश सफल रहे. अंत में तय हुआ कि वह समुद्र तट पर जा कर खुद को लहरों के हवाले कर देगा. तट की ओर आने वाली समुद्री लहरें उस की जैकेट को किनारे ले आएंगी. जब उस जैकेट की तलाशी ली जाएगी तो उस में मिलने वाले पहचानपत्र से पता चलेगा कि पुष्पक मर चुका है.

उसे पता था कि समुद्र में डूब कर मरने वालों की लाशें जल्दी नहीं मिलतीं, क्योंकि बहुत कम लाशें ही बाहर आ पाती हैं. ज्यादातर लाशों को समुद्री जीव चट कर जाते हैं. जब उस की लाश नहीं मिलेगी तो यह सोच कर मामला रफादफा कर दिया जाएगा कि वह मर चुका है. इस के बाद देश के किसी महानगर में पहचान छिपा कर वह आराम से मालिनी के साथ बाकी का जीवन गुजारेगा.

लेकिन इस के लिए काफी रुपयों की जरूरत थी. उस के हाथों में रुपए तो बहुत होते थे, लेकिन उस के अपने नहीं. इस की वजह यह थी कि वह बैंक में कैशियर था. लेकिन उस ने आत्महत्या क्यों की, यह दिखाने के लिए उसे खुद को लोगों की नजरों में कंगाल दिखाना जरूरी था. योजना बना कर उस ने यह काम शुरू भी कर दिया. कुछ ही दिनों में उस के साथियों को पता चला गया कि वह एकदम कंगाल हो चुका है. बैंक कर्मचारी को जितने कर्ज मिल सकते थे, उस ने सारे के सारे ले लिए थे. उन कर्जों की किस्तें जमा करने से उस का वेतन काफी कम हो गया था. वह साथियों से अकसर तंगी का रोना रोता रहता था. इस हालत से गुजरने वाला कोई भी आदमी कभी भी आत्महत्या कर सकता था.

पुष्पक का दिल और दिमाग अपनी इस योजना को ले कर पूरी तरह संतुष्ट था. चिंता थी तो बस यह कि उस के बाद स्वाति कैसे जीवन बिताएगी? वह जिस मकान में रहता था, उसे उस ने भले ही बैंक से कर्ज ले कर बनवाया था. लेकिन उस के रहने की कोई चिंता नहीं थी. शादी के 10 सालों बाद भी स्वाति को कोई बच्चा नहीं हुआ था. अभी वह जवान थी, इसलिए किसी से भी विवाह कर के आगे की जिंदगी सुख और शांति से बिता सकती थी. यह सोच कर वह उस की ओर से संतुष्ट हो गया था.

बैंक से वह मोटी रकम उड़ा सकता था, क्योंकि वह बैंक का हैड कैशियर था. सारे कैशियर बैंक में आई रकम उसी के पास जमा कराते थे. वही उसे गिन कर तिजोरी में रखता था. उसे इसी रकम को हथियाना था. उस रकम में कमी का पता अगले दिन बैंक खुलने पर चलता. इस बीच उस के पास इतना समय रहता कि वह देश के किसी दूसरे महानगर में जा कर आसानी से छिप सके. लेकिन बैंक की रकम में हेरफेर करने में परेशानी यह थी कि ज्यादातर रकम छोटे नोटों में होती थी. वह छोटे नोटों को साथ ले जाने की गलती नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने सोचा कि जिस दिन उसे रकम का हेरफेर करना होगा, उस दिन वह बड़े नोट किसी को नहीं देगा. इस के बाद वह उतने ही बड़े नोट साथ ले जाएगा, जितने जेबों और बैग में आसानी से जा सके. पुष्पक का सोचना था कि अगर वह 20 लाख रुपए भी ले कर निकल गया तो उन्हीं से कोई छोटामोटा कारोबार कर के मालिनी के साथ नया जीवन शुरू करेगा. 20 लाख की रकम इस महंगाई के दौर में कोई ज्यादा बड़ी रकम तो नहीं है, लेकिन वह मेहनत से काम कर के इस रकम को कई गुना बढ़ा सकता है. जिस दिन उस ने पैसे ले कर भागने की तैयारी की थी, उस दिन रास्ते में एक हैरान करने वाली घटना घट गई. जिस बस से वह बैंक जा रहा था, उस का कंडक्टर एक सवारी से लड़ रहा था. सवारी का कहना था कि उस के पास पैसे नहीं हैं, एक लौटरी का टिकट है. अगर वह उसे खरीद ले तो उस के पास पैसे आ जाएंगे, तब वह टिकट ले लेगा. लेकिन कंडक्टर मना कर रहा था.

पुष्पक ने झगड़ा खत्म करने के लिए वह टिकट 50 रुपए में खरीद लिया. उस टिकट को उस ने जैकेट की जेब में रख लिया. आत्महत्या के नाटक को अंजाम तक पहुंचाने के बाद वह फोर्ट पहुंचा और वहां से कुछ जरूरी चीजें खरीद कर एक रेस्टोरैंट में बैठ गया. चाय पीते हुए वह अपनी योजना पर मुसकरा रहा था. तभी अचानक उसे एक बात याद आई. उस ने आत्महत्या का नाटक करने के लिए अपनी जो जैकेट लहरों के हवाले की थी, उस में रखे सारे रुपए तो निकाल लिए थे, लेकिन लौटरी का वह टिकट उसी में रह गया था. उसे बहुत दुख हुआ. घड़ी पर नजर डाली तो उस समय रात के 10 बज रहे थे. अब उसे तुरंत स्टेशन के लिए निकलना था. उस ने सोचा, जरूरी नहीं कि उस टिकट में इनाम निकल ही आए इसलिए उस के बारे में सोच कर उसे परेशान नहीं होना चाहिए. ट्रेन में बैठने के बाद पुष्पक मालिनी की बड़ीबड़ी कालीकाली आंखों की मस्ती में डूब कर अपने भाग्य पर इतरा रहा था. उस के सारे काम बिना व्यवधान के पूरे हो गए थे, इसलिए वह काफी खुश था.

फर्स्ट क्लास के उस कूपे में 2 ही बर्थ थीं, इसलिए उन के अलावा वहां कोई और नहीं था. उस ने मालिनी को पूरी बात बताई तो वह एक लंबी सांस ले कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘जो भी हुआ, ठीक हुआ. अब हमें पीछे की नहीं, आगे की जिंदगी के बारे में सोचना चाहिए.’’

पुष्पक ने ठंडी आह भरी और मुसकरा कर रह गया. ट्रेन तेज गति से महाराष्ट्र के पठारी इलाके से गुजर रही थी. सुबह होतेहोते वह महाराष्ट्र की सीमा पार कर चुकी थी. उस रात पुष्पक पल भर नहीं सोया था, उस ने मालिनी से बातचीत भी नहीं की थी. दोनों अपनीअपनी सोचों में डूबे थे. भूत और भविष्य, दोनों के अंदेशे उन्हें विचलित कर रहे थे. दूर क्षितिज पर लाललाल सूरज दिखाई देने लगा था. नींद के बोझ से पलकें बोझिल होने लगी थीं. तभी मालिनी अपनी सीट से उठी और उस के सीने पर सिर रख कर उसी की बगल में बैठ गई. पुष्पक ने आंखें खोल कर देखा तो ट्रेन शोलापुर स्टेशन पर खड़ी थी. मालिनी को उस हालत में देख कर उस के होंठों पर मुसकराहट तैर गई. हैदराबाद के होटल के एक कमरे में वे पतिपत्नी की हैसियत से ठहरे थे. वहां उन का यह दूसरा दिन था. पुष्पक जानना चाहता था कि मुंबई से उस के भागने के बाद क्या स्थिति है. वह लैपटौप खोल कर मुंबई से निकलने वाले अखबारों को देखने लगा.

‘‘कोई खास खबर?’’ मालिनी ने पूछा.

‘‘अभी देखता हूं.’’ पुष्पक ने हंस कर कहा.

मालिनी भी लैपटौप पर झुक गई. दोनों अपने भागने से जुड़ी खबर खोज रहे थे. अचानक एक जगह पुष्पक की नजरें जम कर रह गईं. उस से सटी बैठी मालिनी को लगा कि पुष्पक का शरीर अकड़ सा गया है. उस ने हैरानी से पूछा, ‘‘क्या बात है डियर?’’

पुष्पक ने गूंगों की तरह अंगुली से लैपटौप की स्क्रीन पर एक खबर की ओर इशारा किया. समाचार पढ़ कर मालिनी भी जड़ हो गई. वह होठों ही होठों में बड़बड़ाई, ‘‘समय और संयोग. संयोग से कोई नहीं जीत सका.’’

‘‘हां संयोग ही है,’’ वह मुंह सिकोड़ कर बोला, ‘‘जो हुआ, अच्छा ही हुआ. मेरी जैकेट पुलिस के हाथ लगी, जिस पुलिस वाले को मेरी जैकेट मिली, वह ईमानदार था, वरना मेरी आत्महत्या का मामला ही गड़बड़ा जाता. चलो मेरी आत्महत्या वाली बात सच हो गई.’’

इतना कह कर पुष्पक ने एक ठंडी आह भरी और खामोश हो गया.

मालिनी खबर पढ़ने लगी, ‘आर्थिक परेशानियों से तंग आ कर आत्महत्या करने वाले बैंक कैशियर का दुर्भाग्य.’ इस हैडिंग के नीचे पुष्पक की आर्थिक परेशानी का हवाला देते हुए आत्महत्या और बैंक के कैश से 20 लाख की रकम कम होने की बात लिखते हुए लिखा था—‘इंसान परिस्थिति से परेशान हो कर हौसला हार जाता है और मौत को गले लगा लेता है. लेकिन वह नहीं जानता कि प्रकृति उस के लिए और भी तमाम दरवाजे खोल देती है. पुष्पक ने 20 लाख बैंक से चुराए और रात को जुए में लगा दिए कि सुबह पैसे मिलेंगे तो वह उस में से बैंक में जमा कर देगा. लेकिन वह सारे रुपए हार गया. इस के बाद उस के पास आत्महत्या करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा, जबकि उस के जैकेट की जेब में एक लौटरी का टिकट था, जिस का आज ही परिणाम आया है. उसे 2 करोड़ रुपए का पहला इनाम मिला है. सच है, समय और संयोग को किसी ने नहीं देखा है.’ Hindi Romantic Story

Best Hindi Kahani: ठगी का नया तरीका – औलाद की चाहत

Best Hindi Kahani: नुसरत को जब कोई औलाद नहीं हुई, तो ससुराल वालों ने अपने एकलौते बेटे मसनून का दूसरा निकाह करने का मन बनाया. आपस में सलाह करने के बाद वे काजी मोहसिन के पास राय लेने उन के घर पहुंचे.

काजी मोहसिन के सामने उन्होंने अपनी बात रखी. पूरी बात सुनने के बाद काजी मोहसिन चुप रहे, फिर कुछ सोच कर उन्होंने मसनून के अब्बा खादिम मियां से कहा, ‘‘जनाब ऐसा है कि आजकल कानून बदल गया है. बीवी की रजामंदी और अदालत से मंजूरी ले कर निकाह कराओगे तो कोई कानूनी अड़चन नहीं आएगी, वरना…’’ कह कर वे खामोश हो गए.

‘‘फिर आप इस का कोई दूसरा हल निकालिए…’’ खादिम मियां ने काजी मोहसिन से कहा, ‘‘हमें आप पर पूरा भरोसा है. आप बहुतकुछ जानते हैं. तावीजगंडे हों या मजारों की मन्नत, हम सबकुछ करने को तैयार हैं. पैसा कितना भी लगे, हम खर्च करने को तैयार हैं. हमें खानदान को रोशन करने के लिए एक चिराग चाहिए,’’ खादिम मियां ने बात पूरी की.

‘‘बात तो आप ठीक कह रहे हैं. मु झे एक हफ्ते का वक्त दीजिए, इस के बाद ही मैं आप को कोई मशवरा दे सकता हूं. वैसे, मैं किसी को उलटीसीधी सलाह नहीं देता,’’ काजी मोहसिन ने जवाब दिया.

तकरीबन एक हफ्ता गुजर जाने के बाद एक दिन काजी मोहसिन खादिम मियां की दुकान के सामने से गुजर रहे थे, तभी खादिम मियां ने आवाज दे कर उन्हें बुलाया.

सलामदुआ के बाद खादिम मियां ने पूछा, ‘‘मेरी बात का क्या हुआ जनाब?’’

‘‘जी, मैं भी चाह रहा था कि इस बारे में आप से खुल कर बात करूं, पर मसरूफियत की वजह से समय ही नहीं मिला. मैं रात को खाना खा कर आप के पास आता हूं.

‘‘ठीक रहेगा न? वहीं बैठ कर इतमीनान से बात करेंगे,’’ काजी मोहसिन ने खादिम मियां से कहा.

‘‘आप ऐसा करें कि रात का खाना मेरे घर पर ही खाएं. आप अकेले जो ठहरे…’’ खादिम मियां बोले.

‘‘जी,’’ कह कर काजी साहब दुकान से उठ कर मदरसे चले गए.

मदरसे से लौट कर काजी मोहसिन ने अपने एक दोस्त काजी बाबुल को फोन लगा कर कहा, ‘‘बाबुल मियां, यहां के एक कबाड़ी परिवार से मेरी बात हुई है. उन की बहू को औलाद नहीं हो रही है. पैसे वाले लोग हैं. अगर हम चाहें तो सोनाचांदी और नकदी हड़प सकते हैं. वे गंडेतावीज, मजारों पर भरोसा करते हैं. अच्छा माल बन सकता है. हमारी सारी गरीबी दूर हो सकती है.’’

‘ठीक है, मैं अभी आप के पास आ रहा हूं. तुम तैयार रहना,’ काजी बाबुल ने कहा.

थोड़ी देर बाद ही काजी बाबुल काजी मोहसिन के घर पहुंच गया. दोनों के बीच खादिम मियां के बारे में खुल कर बात हुई.

शाम की नमाज से फारिग हो कर वे खादिम मियां के घर जा पहुंचे. उन के बीच बातचीत हुई और फिर फैसला लिया गया कि इसी हफ्ते इस काम पर अमल करना है.

काजी बाबुल ने खादिम मियां से कहा, ‘‘अगर आप को औलाद चाहिए, तो हमारी हर बात माननी पड़ेगी. जैसा हम कहेंगे, वैसा करना होगा.’’

खादिम मियां ने सिर हिला कर इस की मंजूरी दे दी.

‘‘आप हरे रंग के कपड़े की 4 नई थैलियां बनवा लें. उन में सोना, चांदी, तांबा, लोहा रख कर उन के मुंह सिल कर घर के एक खाली कमरे में रख दें. वहां चिल्ला बांध कर उन को फूलों से ढक दें. फिर ढाई दिनों तक उसी जगह रह कर मंत्र पढ़ें. इस के बाद मजार पर 2 घंटे चारों थैलियां रख कर वापस ले आएं, जो आप 9 महीने तक अपने घर में रखे रहेंगे. फिर आप उन्हें खोल कर इस्तेमाल में ले सकते हैं.’’

‘‘आप चाहें तो काजी मोहसिन से मदद ले सकते हैं, पर इस बात की किसी को कानोंकान खबर न हो.’’

खादिम मियां ने आननफानन हामी भर दी.

काजी बाबुल वहां से जाने लगे कि तभी खादिम मियां ने अगले जुमे को घर आ कर यह काम करनेकी गुजारिश की.

इधर काजी मोहसिन को बुला कर खादिम मियां ने जाप करने की तैयारी शुरू कर दी. एक छोटा कमरा खाली करा कर सफाई की गई. फिर किवाड़ से अच्छा लोहा और तांबा निकाल कर रखा गया.

रात को काजी मोहसिन ने घर आ कर एक थैली में लोहा, एक थैली में तांबा, एक थैली में सोने और चौथी थैली में चांदी के जेवर रख कर लोबान की धूनी दे कर कुछ देर तक जोरजोर से कुछ मंत्र पढ़ कर फूंके और थैली के मुंह सिलने लगे.

इसी बीच काजी मोहसिन ने बड़ी होशियारी से सोने और चांदी की थैलियों में पहचान के लिए अलग से दूसरे रंग की छाप लगा दी.

एक संदूक में चारों थैलियां रख कर बड़े से ताले में बंद कर चाबी खादिम मियां को दे दी.

काजी बाबुल के कहे मुताबिक ही काजी मोहसिन ने पूरी कार्यवाही को अंजाम दे कर उन से विदा ली और अपने घर आ गए.

जुमे की रात को काजी मोहसिन, काजी बाबुल, खादिम मियां और उन की बहू बैठे थे. कुछ फासले पर रखे संदूक पर फूल डाल कर और लोबान जला कर काजी बाबुल मंत्र बुदबुदाने लगे.

यह काम एक घंटे तक चला. फिर उन्होंने संदूक में से थैलियां निकालीं और बहू की गोद में रख कर मंत्र बुदबुदाए. लोबान की खुशबू से पूरा कमरा धुएं से भर गया था. यह सब आधा घंटे तक चला.

यह सिलसिला 2 दिनों तक शाम की नमाज के बाद डेढ़ घंटा चलता रहा.

तीसरे दिन वे सब सुबह की नमाज के बाद दूर जंगल में बने मजार पर पहुंचे. साथ में वह संदूक भी था, जिस में थैलियां रखी थीं.

काजी मोहसिन ने मजार के खादिम को पहले से सबकुछ बता रखा था.

वहां पहुंचने के बाद वे संदूक रख कर खड़े हो गए. मजार के खादिम ने संदूक खोल कर रखने को कहा और बोला, ‘‘हां जनाब, आप लोग गुसलखाने से फारिग हो कर आ जाएं.’’

वे सभी मजार पर खुला संदूक छोड़ कर कुछ दूरी पर बने गुसलखाने की तरफ चले गए.

इसी बीच मजार के खादिम ने काजी मोहसिन के बताए मुताबिक सोने व चांदी की निशान लगी थैलियां निकाल कर ठीक वैसी ही दूसरी थैलियां वहां रख दीं. उस ने असली थैलियां मजार के अंदर छिपा दीं और बाहर आ कर खड़ा हो गया.

उन सभी के गुसलखाने से फारिग होने के बाद मजार पर मंत्र बुदबुदाने का सिलसिला चला. फिर वे संदूक में थैलियां और फूल रख कर घर वापस आ गए.

बाबुल काजी ने समझाते हुए कहा, ‘‘औलाद मिल जाने पर संदूक खोल कर सोनेचांदी वाली थैलियां अलग रख लें, बाकी 2 थैलियों को पानी में बहा दें.

‘‘मैं 2 महीने बाद आऊंगा, तब तक बहू के पैर भारी हो जाएंगे. इन्हें आराम करने दें. संदूक पर फूल डालते रहें,’’ कह कर वे चले गए.

तकरीबन 3 महीने बीत गए, पर न तो काजी बाबुल और काजी मोहसिन लौटे, न बहू के पैर भारी हुए.

खादिम मियां को कुछ शक हुआ. उन्होंने संदूक खोल कर देखा तो पता चला कि सोनेचांदी वाली थैलियों में कंकड़पत्थर भरे थे. वे सम झ गए कि उन के साथ धोखा हुआ है.

गुपचुप तरीके से खोजबीन की गई, पर दूरदूर तक उन दोनों काजियों का कुछ भी पता नहीं चला. Best Hindi Kahani

Hindi Kahani: ब्लैकमेलर – शिखा की सास ने बच्चे की मोह में क्या किया

Hindi Kahani: बैडरूम की दीवार पर मर्फी रेडियो के पोस्टर बौय का फोटो आज भी मिलता है. जितना खूबसूरत बच्चा उतनी ही खूबसूरत अदा से मुसकराते हुए होंठों पर उंगली रखे पोज में रंगीन फोटो. यह फोटो शिखा के बैडरूम में पिछले 4 सालों से लगा था. सास ने कहा था कि सुंदर बच्चे का फोटो देखने से बच्चा भी सुंदर होगा. बच्चे की राह देखतेदेखते पिछले साल उस की सास चल बसीं.

खानापीना खत्म कर शिखा नाइट लाइट की मध्यम रोशनी में मर्फी बौय को देखे जा रही थी. तभी पति अमर ने कमरे में प्रवेश करते ही कहा, ‘‘मैं ने डाक्टर से अपौइंटमैंट ले ली है. अब हमें चल कर टैस्ट करा लेना चाहिए. देखें डाक्टर क्या कहता है.’’

‘‘हां, पर यह पहले होता तो अम्मांजी की इच्छा पूरी होने की उम्मीद तो जरूर रहती.’’

‘‘आज से पहले डाक्टर ने कभी दोनों को टैस्ट करने के लिए नहीं कहा था… तुम्हारी सहेली जो डाक्टर है, उस ने भी कहा था कि कभीकभी प्रैगनैंसी में देर हो जाती है. वैसे हम ने भी

1 साल तक परहेज बरता था.’’

अमर ने ग्रैजुएशन के बाद एक प्राइवेट कंपनी में स्पोर्ट्स कोटे से नौकरी जौइन कर ली थी. वह स्टेट लैवल बौक्सिंग चैंपियन था. अच्छीखासी पर्सनैलिटी थी अमर की. औफिस में उस के दोस्त उस से कहते भी थे, ‘‘अरे यार बौक्सिंग रिंग में तो तुम चैंपियन हो. अब अपनी गृहस्थी जमाओ… कम से कम अपने जैसा बलवान, हृष्टपुष्ट एक फ्यूचर चैंपियन तो पैदा करो.’’

‘‘वह भी हो जाएगा… जल्दी क्या है?’’ अमर कहता.

अब शादी के 5 साल बाद शिखा और अमर दोनों ने डाक्टर से इस विषय पर सलाह लेने की जरूरत महसूस की. डाक्टर ने दोनों के कुछ टैस्ट किए और फिर 2 दिनों के बाद जब वे मिलने गए तो डाक्टर बोला, ‘‘आप की रिपोर्ट्स तैयार हैं. शिखा की रिपोर्ट्स नौर्मल हैं. उन में मां बनने के सभी लक्षण हैं, पर…’’

‘‘पर क्या डाक्टर?’’ शिखा ने बीच में डाक्टर की बात काट कर पूछा.

‘‘आई एम सौरी, बट मुझे कहना ही होगा कि अमर पिता बनने के योग्य नहीं हैं.’’

कुछ पल डाक्टर के कैबिन में सन्नाटा रहा. फिर शिखा ने कहा, ‘‘पर डाक्टर आजकल मैडिकल साइंस इतनी तरक्की कर चुकी है… कोई मैडिसिन या उपाय तो होगा?’’

‘‘हां है क्यों नहीं… आईवीएफ तकनीक

से आप मां बन सकती हैं आजकल यह बहुत

ही आसान हो गया है. किसी सक्षम पुरुष के शुक्राणु का इस्तेमाल कर आप बच्चे को जन्म दे सकती हैं.’’

‘‘डाक्टर, इस के अलावा और कोई उपाय नहीं है?’’

‘‘सौरी, इस के अलावा एक ही उपाय बचता है कि आप किसी बच्चे को गोद ले लें. आप लोग ठीक से विचार कर के बता दें… मैं थोड़ी देर में आता हूं. अगर आप कुछ और समय चाहते हैं, तो आप अपनी सुविधा से अपना फैसला ले सकते हैं.’’

शिखा और अमर दोनों ने कुछ देर तक डाक्टर के क्लीनिक में बैठेबैठे विचार किया कि अब और देर करने से कोई लाभ नहीं होगा और बच्चा आईवीएफ तकनीक से ही होगा. शिखा ने मन में सोचा कि इस से उसे मातृत्व का अनुभव भी होगा. फिर दोनों ने डाक्टर को अपना फैसला बताया.

डाक्टर बोला, ‘‘वैरी गुड. आप के कुछ और टैस्ट होंगे. मेरे क्लीनिक में कुछ डोनर्स के सैंपल्स हैं. देख कर 1-2 दिन में आप को खबर दूंगा. कोई बड़ा प्रोसैस नहीं है. जल्द ही आप का काम हो जाएगा.’’

1 सप्ताह के अंदर ही शिखा आईवीएफ तकनीक की देन से गर्भवती हुई. डाक्टर ने शिखा को नियमित चैकअप कराते रहने को कहा.

कुछ दिनों के बाद जब अमर ने बड़ी शान से औफिस में दोस्तों से कहा कि वह पिता

बनने वाला है, तो एक दोस्त ने कहा, ‘‘आखिर हमारे चैंपियन ने बाजी मार ली. अब तुम्हें हम लोगों का मुंह मीठा कराना होगा.’’

दोस्तों के कहने पर औफिस की कैंटीन में ही उन्हें मिठाई खिलाई. दोस्तों ने उस से कहा, ‘‘इस छोटीमोटी पार्टी से तुम बचने वाले नहीं हो. हम लोगों को सपरिवार पार्टी देनी होगी.’’

‘‘ठीक है, वह भी होगी.’’

करीब 4 महीने बाद डाक्टर ने शिखा से कहा, ‘‘आप के बच्चे की ग्रोथ बिलकुल ठीक है. अब आप निश्चिंत रहें. आप का बच्चा स्वस्थ और हृष्टपुष्ट होगा.’’

इस खुशी में उस दिन रात अमर ने अपने घर पर दोस्तों को सपरिवार आमंत्रित किया. शिखा भी घर पर पार्टी की तैयारी में लगी थी. उसी समय कौल बैल बजी. उस ने दरवाजा खोला तो एक आदमी बाहर खड़ा था. वह बोला, ‘‘नमस्ते मैडम.’’

‘‘मैं ने आप को पहचाना नहीं, पर लगता है पहले कहीं देखा है… अच्छा बोलिए क्या काम है? अभी साहब घर पर नहीं हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं है, मुझे सिर्फ आप ही से काम है.’’

‘‘मुझ से? मुझ से भला क्या काम हो सकता है आप को?’’

‘‘मैडम, आप के पेट में जो बच्चा है वह मेरा है.’’

‘‘क्या बकवास कर रहे हो? गैट लौस्ट,’’ बोल कर शिखा दरवाजा बंद करने लगी.

उस आदमी ने हाथ से दरवाजा पकड़ कर कहा, ‘‘अब मेरी बात ध्यान से सुनिए वरना बाद में शर्मिंदगी होगी और पछताना पड़ेगा. अमर बहुत शान से पार्टी दे रहा है बाप बनने की खुशी में. मैं पार्टी के बीच में ही आ कर सब को बताऊंगा कि यह बच्चा अमर का नहीं, मेरा है. उस की सारी मर्दानगी की हवा निकाल दूंगा मैं.’’

शिखा और अमर दोनों ने आईवीएफ की बात छिपा रखी थी और अभी तक सभी से बता रखा था कि यह बच्चा उन का अपना है. वह डर गई और फिर बोली, ‘‘आखिर तुम क्या चाहते हो? हमें परेशान कर के तुम्हें क्या मिलेगा?’’

‘‘मुझे और कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ

क्व2 लाख दे दीजिए. मैं अपनी जबान बंद रखूंगा.’’

‘‘इतनी बड़ी रकम हम लोग तुम्हें नहीं दे सकते हैं.’’

‘‘देखिए, पैसे तो आप को देने ही होंगे, हंस कर या रो कर… आज नहीं तो कल… अब आप बताएं मैं रात में पार्टी में आऊं या नहीं.’’

शिखा कुछ देर सोचने लगी, फिर बोली, ‘‘अभी मेरे पास मुश्किल से क्व2 हजार हैं. उन्हें आप को दे रही हूं.’’

‘‘ठीक है, आप अभी वही दे दीजिए. बाकी आप एकमुश्त देंगी… मुझे डिलिवरी के पहले पूरी रकम मिल जानी चाहिए.’’

शिखा ने उस आदमी को क्व2 हजार देते हुए कहा, ‘‘अभी इन्हें रखो. बाकी के लिए मैं अमर से बात करती हूं.’’

‘‘ठीक है, मैं 2 दिन बाद फिर आऊंगा.’’

उस रात पार्टी के बाद शिखा ने अमर को ब्लैकमेलर वाली बात बताई तो अमर बोला,

‘‘क्व2 लाख हमारे लिए बहुत बड़ी रकम होती है. कहां से लाऊंगा… उस के लिए मुझे कर्ज लेना होगा… पर यह तो ब्लैकमेलिंग हुई… उसे हमारा पता किस ने दिया होगा?’’

‘‘मुझे लगता है उस आदमी को कभी मैं ने डाक्टर के क्लीनिक में देखा है.’’

‘‘डाक्टर ऐसा नहीं कर सकता है, फिर भी एक बार मैं उस से बात करता हूं.’’

दूसरे दिन अमर डाक्टर के पास पहुंचा तो डाक्टर ने कहा, ‘‘हम लोग ऐसी सूचनाएं गुप्त रखते हैं. इसीलिए हम 3 शपथ पत्र तैयार करते हैं- पहला आईवीएफ के लिए आप दोनों की सहमति का, दूसरा यह कि आप लोग कभी डोनर के बारे में जानकारी नहीं लेंगे और अगर किसी तरह से आप को यह मालूम भी हो जाए तो आप इसे किसी को नहीं बताएंगे और साथ ही आप के बच्चे का डोनर की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा.’’

‘‘हां, हमें याद है पर, तीसरा शपथपत्र कौन सा है?’’

‘‘तीसरा हम डोनर से लेते हैं कि वह अपना अंश स्वेच्छा से दे रहा है और उसे यह जानने का हक नहीं होगा कि उस का अंश किसे दिया गया. अगर किसी तरह उसे पता चल भी जाए तो वह इसे किसी को नहीं बताएगा और होने वाले बच्चे पर उस का कोई अधिकार नहीं होगा.’’

‘‘पर शिखा ने कहा है कि उस आदमी को शायद पहले आप के क्लीनिक में देखा है. कहीं आप का ही कोई स्टाफ तो उस से मिला नहीं है?’’

‘‘हम पूरी सावधानी बरतते हैं, पर स्वार्थवश इस के लीक होने की संभावना हो सकती है,’’ डाक्टर बोला.

‘‘हम से गलती सिर्फ इतनी हुई है कि हम ने किसी से इस तकनीक की बात न कह कर इसे अपना बच्चा बताया है,’’ अमर बोला.

‘‘खैर, आप आगे भी यह बता सकते हैं.’’

‘‘नहीं डाक्टर, इट्स टू लेट… वह ब्लैकमेल कर रहा है… लगता है हमें पैसे देने ही होंगे.’’

डाक्टर कुछ देर सोचने के बाद बोला, ‘‘आप उसे एक पैसा भी नहीं देंगे. आप लोग खासकर शिखाजी को थोड़ी होशियारी से काम लेना होगा और जरा साहस भी दिखाना होगा.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘देखिए 2 रास्ते हैं- या तो अबौर्शन

करवा लें या…’’

‘‘प्लीज डाक्टर अबौर्शन की बात न कीजिए… शिखा टूट जाएगी.’’

‘‘मैं भी यही चाहता हूं… शिखाजी से कहें कि जब वह आदमी पैसों के लिए आए तो बिलकुल न डरें, बल्कि बोल्ड हो कर उसे फेस करें.’’

‘‘वह किस तरह?’’

‘‘अगली बार जब वह आए तो शिखाजी को बोलना होगा कि हां, मुझे अब पता चल गया है कि मेरा रेप तुम ने ही किया था और उसी के चलते मैं प्रैगनैंट हूं. अब मैं पुलिस को सूचित करने जा रही हूं. यह बात उसे धमकाते हुए बोल्डली कहनी होगी.’’

2 दिन बाद वह आदमी बाकी के रुपए लेने आने वाला था. शिखा ने उस दिन अमर को छुट्टी लेने को कहा, क्योंकि उसे डर था कहीं वह आदमी उस पर हमला न कर बैठे.

ठीक 2 दिन बाद ब्लैकमेलर जब पैसे मांगने आया तो शिखा ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘मैं ने भी पता किया है, मेरे गर्भ में तुम्हारा ही अंश है… उस दिन जो तुम ने मेरा बलात्कार किया था उसी का नतीजा है यह. बलात्कार के दिन तुम ने नकाब से चेहरा ढक रखा था, मैं पहचान नहीं सकी थी, पर आज तुम स्वयं चल कर मेरे सामने आए हो, इस से अच्छी बात और क्या हो सकती है. मैं ने उस दिन रुपए देने से पहले सैल फोन से तुम्हारा फोटो भी खींच रखा है. अब आसानी से पुलिस तुम्हें पकड़ सकती है.’’

पासा पलटते देख वह आदमी गिड़गिड़ाने लगा और बोला, ‘‘मैडम, आप ऐसा न

करें, मैं जेल चला जाऊंगा, मैं भी बालबच्चेदार आदमी हूं.’’

‘‘फिर तुम मेहनत कर क्यों नहीं कमाते हो… चलो मेरे क्व2 हजार वापस करो.’’

वह आदमी अपनी जेब से क्व5 सौ का एक नोट शिखा को देते हुए बोला, ‘‘मैडम, अभी मेरे पास इतने ही हैं… इन्हें रख लो. बाकी मैं जल्द ही लौटा दूंगा.’’

शिखा ने नोट उसे लौटाते हुए कहा, ‘‘इस से अपने बच्चों के लिए खिलौने और मिठाई मेरी तरफ से दे देना. बेहतर होगा कि तुम आगे से इस तरह के गलत काम न करने का वादा करो.’’

नोट वापस ले कर ब्लैकमेलर वहां से तुरंत खिसक लिया.

उस के जाने के बाद शिखा ने पति से पूछा, ‘‘क्या तुम ने सचमुच पुलिस को फोन किया है?’’

‘‘नहीं, एक झूठ रेप का तुम ने कहा और दूसरा झूठ मैं ने कहा… चलो बला टल गई,’’ और फिर दोनों जोर से हंस पड़े. Hindi Kahani

Story In Hindi: एक हंसमुख लड़की – क्या था कजरी के दुख का कारण

Story In Hindi: उस की उम्र थी, यही कोई 18-19 बरस. बड़ीबड़ी आंखें, घने बाल, सफेद मोतियों की लड़ी से दांत. जब हंसती थी, तो लगता था मानो बिजली चमक गई हो. गलीमहल्ले के मनचलों पर तो उस की हंसी कहर बरसाती थी.

मुझे आज भी याद है, एक बार पड़ोस के चित्तू बाबू का लड़का काफी बीमार हो गया था. उस के परिवार के लोग बहुत परेशान थे, लेकिन कजरी बड़े इतमीनान से हंसते हुए कह रही थी, ‘‘ऐ बाबू, भैया ठीक हो जाएंगे, तुम फिक्र न करो,’’ और फिर ढेरों लतीफे सुनाने लगी. यहां तक कि बीमार लड़का भी कजरी के लतीफे सुनसुन कर हंसने लगा था.

मैं तकरीबन 10 साल बाद उस शहर, उस महल्ले में जा रहा था, जहां कजरी अपने बापू के साथ अकेली रहते हुए भी महल्लेभर के सुखदुख में शरीक होती थी.

एक बार जब मुझे एक कुत्ते ने काट लिया था, तो मैं बहुत परेशान हो गया कि अब तो 14 बड़ीबड़ी सूइयां लगवानी पड़ेंगी, लेकिन कजरी ने हंसतेहंसते कहा, ‘‘पड़ोसी बाबू, काहे को चिंता करते हो, कुत्ते ने ही तो काटा है, किसी सांप ने तो नहीं. सब ठीक हो जाएगा.’’

मैं भी कजरी की बात मान कर टीके लगवाने के पचड़े में पड़ने के बजाय घर में ही मामूली इलाज करवाता रहा. यह कजरी के बोल का फल था या कुछ और. खैर, मैं बहुत जल्दी ठीक हो गया.

वही सांवलीसलोनी कजरी मुझे फिर से मिलने वाली थी, यही सोचसोच कर मैं खुश हुआ जा रहा था, लेकिन मैं इस बात को ले कर परेशान भी था कि कहीं कजरी अपनी ससुराल न चली गई हो. 10 साल का अरसा कम नहीं होता.

अचानक ही एक कुली ने पूछा, ‘‘बाबूजी, सामान ले चलूं?’’

मैं चौंका, लेकिन तभी मुझे भान हुआ कि गाड़ी तो पहले से ही प्लेटफार्म पर आ कर खड़ी हो चुकी है और स्टेशन आ चुका है.

‘‘हांहां, ले चलो. कितने पैसे लोगे?’’ मैं ने पूछा.

‘‘100 रुपए लगेंगे,’’ कुली बोला.

‘‘अच्छा, ठीक है. चलो.’’

स्टेशन से बाहर आ कर मैं ने सोचा कि पहले कुछ नाश्ता कर लिया जाए, लेकिन फिर यह सोच कर कि अब तो कजरी के हाथ का बना नाश्ता ही करूंगा. मैं ने रिकशे वाले को आवाज दी, ‘‘सुमेरपुर चलोगे?’’

‘‘30 रुपए लगेंगे,’’ रिकशे वाले ने कहा और मेरा बैग व अटैची उठा कर रिकशे में रख लिया.

रिकशा चल पड़ा और मैं फिर गुजरे दिनों की दुनिया में खो गया.

एक दिन सुबहसुबह ही कजरी मेरे पास आई थी और हंसते हुए बोली थी, ‘‘पड़ोसी बाबू, आज मेरा दिल डूबा जा रहा है…’’ फिर खुद ही खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली, ‘‘बाबू, मैं तो मजाक कर रही थी.’’

तभी अचानक कजरी के बापू के रोने की आवाज ने हम दोनों को चौंका दिया. दोनों ही लपके. कजरी के बापू के इर्दगिर्द भीड़ जमा थी और बीच में पड़ी थी, कजरी की मां की लाश.

मैं तो दंग रह गया. कजरी न रोई, न ही गुमसुम हुई. उस की मां की लाश को देख कर मैं उदासी में डूबा वापस अपने कमरे में आ गया.

शाम को कजरी मेरे सामने थी, वही हंसता हुआ चेहरा लिए. कह रही थी, ‘‘ऐ बाबू, मां मरी थोड़े ही है, वह तो सो रही है…’’ और फिर हंसते हुए वह बोली, ‘‘बाबू एक दिन तुम्हें भी और हमें भी तो इसी तरह सोना है.’’

फिर वह रुकी नहीं, तुरंत ही चली गई. मैं हैरानी से उसे जाते हुए देखता रहा.

रिकशे वाले को मैं ने रोक कर अपना कमरा खोला, सामान रखा और फिर उसे पैसे दिए. सोचा, इतने सालों के बाद कजरी से मिलने क्या खाली हाथ जाऊंगा. मैं पास की हलवाई की दुकान पर मिठाई लेने पहुंचा. एक किलो लड्डू लिए और पैसे दे कर मैं अपने घर जाने के बजाय सीधा कजरी के ही घर जा पहुंचा.

दरवाजा खटखटाया, तो एक अधेड़ आदमी ने दरवाजा खोला और बोला, ‘‘कहिए, कहां से आए हैं? किस से मिलना है? आइए, अंदर आइए.’’

मैं भी उस के पीछेपीछे चला गया. वह अंदर जा कर एक तरफ पड़ी चारपाई पर बैठ गया. फिर चारपाई पर बैठते

हुए मैं ने अधेड़ से पूछा, ‘‘भैया, त्रिलोचन बाबू दिखाई नहीं दे रहे… कहीं गए हैं क्या?’’

यह सुनते ही वह आदमी उदास हो गया. फिर धीरे से वह अधेड़ बोला, ‘‘मामा को मरे तो 4 बरस हो गए भैया. आप कौन हो? कहां से आए हो?’’

‘‘और कजरी…?’’ उस के सवाल का जवाब दिए बिना ही मैं ने पूछा.

‘‘कहीं गई होगी, शाम को आ जाएगी,’’ कहते हुए वह उठा और बोला, ‘‘बाबूजी, आप बैठो, मैं चाय बना कर लाता हूं.’’

‘‘अरे नहींनहीं, इस की कोई जरूरत नहीं है. लो, यह मिठाई रख लो… और हां, कजरी आए तो कह देना कि सामने वाले मकान में रहने वाला बाबू आया है,’’ कहते हुए मैं उठ खड़ा हुआ.

रातभर के सफर की वजह से मेरा बदन भारी हो रहा था. लिहाजा, कमरे में आ कर सब से पहले मैं नहाया और चारपाई पर लेट कर सोचने लगा कि

अब कैसी लगती होगी कजरी? यही सोचतेसोचते मैं सो गया.

शाम के वक्त मुझे ऐसा लगा, मानो कोई कह रहा हो, ‘‘पड़ोसी बाबू, पड़ोसी बाबू… उठो.’’

मैं ने लेटेलेटे ही सोचा कि यह कजरी ही होगी. आंखें खोलीं और देखा तो सचमुच कजरी ही थी. पर उसे देखते ही मैं हैरान रह गया कि क्या यह वही सुंदर लंबे बालों और पतले होंठों वाली कजरी है या कोई और?

वह बोली, ‘‘ऐ पड़ोसी बाबू, का सोचते हो? मैं कजरी ही हूं.’’

‘‘कजरी, आओ… बैठो, मैं तो सोच रहा था कि तुम इतनी दुबलीपतली कैसे हो गई?’’

जवाब में कजरी के होंठों पर फीकी मुसकान देख मैं चुप हो गया.

कुछ देर बाद भी जब वह कुछ न बोली, तो मैं ने कहा, ‘‘कजरी, बापू नहीं रहे, सुन कर बड़ा दुख हुआ. तुम बताओ, आजकल क्या कर रही हो? तुम्हारी शादी हो गई या नहीं?’’

जवाब में वह थोड़ी देर चुप रही, फिर बोली, ‘‘बाबू, जो इस दुनिया में आया है, उसे तो जाना ही है. बापू चले गए, अब मैं भी चली जाऊंगी.’’

‘‘अरे नहीं पगली, मैं ने यह तो नहीं कहा. खैर, मैं समझता हूं तुम्हें दुख हुआ होगा. अच्छा, यह बताओ कि कहां

गई थीं सुबह से? कहीं काम करती

हो क्या?’’

वह जोर से हंसी. पर, पीले पड़ गए दांतों को देख कर अब मुझे कजरी

की हंसी रास नहीं आई. फिर भी मैं शांत बना रहा.

हंसतेहंसते ही वह बोली, ‘‘बाबू, तुम थक गए होगे. मैं अभी तुम्हारे लिए खाना ले कर आती हूं,’’ और मेरे कुछ कहने से पहले ही वह बाहर जा चुकी थी.

उस के बाहर जाते ही मैं सोचने लगा कि कजरी कुछ छिपा रही है. उस की हंसी में अब पहले वाली बात नहीं है. तभी मुझे खयाल आया कि जब मैं ने उस से शादी की बात की थी, तो वह टाल

गई थी. अब आएगी तो सब से पहले यही पूछूंगा.

तकरीबन आधे घंटे बाद साड़ी के आंचल में छिपा कर कजरी मेरे लिए खाना ले कर आ गई. खाना पलंग पर रख कर वह नीचे बैठ गई और बोली, ‘‘खाना खाओ बाबूजी.’’

‘‘नहीं कजरी, पहले तू यह बता

कि तेरी शादी कहां हुई है? किस से

हुई है और कब हुई? तभी मैं खाना खाऊंगा…’’

‘‘खा लो न, बाबूजी…,’’ हंसते हुए वह बोली, ‘‘अभी बता दूंगी.’’

कजरी की मोहक अदा देख कर मैं और कुछ न बोल सका.

खाना खाने के बाद मैं चारपाई

पर लेट गया और बोला, ‘‘हां, अब बता.’’

कजरी हंसी और बोली, ‘‘बाबूजी, आप जानना चाहते हो न कि मेरा मर्द कौन है? मेरी ससुराल कहां है?’’

‘‘हां, हां, यही.’’

‘‘बाबूजी, वह जो सामने महल्ला है न… उस महल्ले का हर मर्द मेरा शौहर है, हर घर मेरी ससुराल है. बचपन में

मैं लोगों को खुश रखती थी न,

इसीलिए अब मुझे मर्दों को खुश रखना पड़ता है. ..

‘‘अच्छा बाबूजी, किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे बुला लेना,’’ और फिर हंसते हुए वह बाहर निकल गई.

मेरे ऊपर तो मानो आसमान ही टूट पड़ा, होंठ सिल गए, ऐसा लगा कि कोई तूफान आया और मुझे उड़ा ले गया. पर कजरी मेरे कई सवालों का जवाब दिए बिना जा चुकी थी.

सुबह यह खबर सुन कर कि कजरी ने कुएं में कूद कर जान दे दी, मैं मानो जमीन में गड़ गया. सोचने लगा कि अब कभी नहीं सुनाई देगी कजरी की मासूम हंसी, क्योंकि अब वह इस दुनिया से बहुत दूर जा चुकी है. Story In Hindi

Hindi Romantic Story: सपना – क्या पूरे हुए विकास के सपने

Hindi Romantic Story: ट्रेन धीरेधीरे प्लेटफार्म पर पहुंच रही थी. वह एसी कोच में अपने छोटे से सूटकेस के साथ गैलरी में खड़ी ट्रेन के रुकने का इंतजार कर रही थी. जैसे ही गाड़ी ठहरी, वह झटके से नीचे उतरी.

गोरा रंग, चेहरे पर बिखरी कालीकाली जुल्फें मानो कोई छोटी सी बदली चांद को ढकने की कोशिश कर रही हो.

स्टेशन से बाहर निकली तो सवारियों की तलाश में आटोरिकशा वालों की भीड़ जमा थी. शहर में अनजान सी लग रही अकेली जवान लड़की को देख कर 10-12 आटोरिकशा वालों ने उसे घेर लिया और अपनेअपने लहजे से पूछने लगे, ‘बहनजी, कहां चलोगी…’, ‘मैडम, किधर को जाना है…’

वह खामोशी से खड़ी रही. सिर्फ कहीं न जाने का गरदन हिला कर इशारा करती रही. कुछ ही देर में भीड़ छंट सी गई.

उस ने अपनी सुराहीदार गरदन को इधरउधर घुमा कर देखा. थोड़ी ही दूरी पर एक आटोरिकशा वाला एक किताब ले कर ड्राइवर सीट पर पढ़ता हुआ दिखाई दिया. वह छोटेछोटे कदमों से उस की ओर बढ़ी.

‘‘लोक सेवा आयोग चलोगे…?’’ उस ने पूछा.

‘‘जी… जी… जरूर…’’ उस ड्राइवर ने अपनी किताब बंद करते हुए जवाब दिया.

‘‘क्या लोगे… मतलब, किराया कितना लगेगा…?’’ उस ने सूटकेस आटोरिकशा में रखते हुए पूछा.

‘‘80 रुपए…’’ उस ने बताया.

वह झट से आटोरिकशा में बैठ गई और बोली, ‘‘जल्दी चलो…’’

आटोरिकशा शहर की भीड़ से बाहर निकला ही था कि ड्राइवर ने पूछा, ‘‘आरएएस का इंटरव्यू देने के लिए आई हैं शायद आप?’’

‘‘जी…’’ उस ने छोटा सा जवाब दिया, फिर अगले ही पल उस ने पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे मालूम कि मैं इंटरव्यू देने आई हूं?’’

‘‘जी, आप पहले तो लोक सेवा आयोग जा रही हैं. दूसरे, इन दिनों इंटरव्यू चल रहे हैं… और…’’

‘‘और क्या?’’ उस ने पूछा.

वह नौजवान ड्राइवर बोला, ‘‘आप का पहनावा बता रहा है कि आप किसी बड़े पद के लिए ही इंटरव्यू देने आई हैं. काश, आज मैं भी…’’

‘‘काश, आज मैं भी… क्या तुम भी…?’’ उस ने थोड़ा हैरानी से पूछा.

‘‘जी मैडम, मैं ने भी मेन ऐग्जाम दिया था… सिर्फ 2 नंबरों से रह गया,’’ उस ने उदास मन से आटोरिकशा को लोक सेवा आयोग की तरफ घुमाते हुए कहा.

‘‘आप तो बड़े होशियार हो… मैं पहली ही नजर में पहचान गई थी कि आटोरिकशा में किताब ले कर पढ़ने वाला कोई साधारण ड्राइवर नहीं हो सकता… फिर तुम्हारा लहजा भी आम ड्राइवरों जैसा नहीं है…’’ अपने पर्स से 100 रुपए का नोट निकालते हुए उस ने कहा.

आटोरिकशा लोक सेवा आयोग के मेन गेट के सामने खड़ा था.

‘‘यह लीजिए…’’ लड़की ने पैसे देते हुए कहा.

‘‘मैडम, बैस्ट औफ लक,’’ 20 रुपए लौटाते हुए उस ड्राइवर ने कहा.

‘‘थैंक्स… तुम मैडम मत कहो मुझे… मेरा नाम सपना है. और हां… मुझे शाम को वापस स्टेशन छोड़ने के लिए आ सकते हो क्या? आनेजाने का भाड़ा दे दूंगी तुम्हें,’’ सपना ने चेहरे से बालों को हटाते हुए कहा.

‘‘ठीक है सपनाजी, आप को मैं यहीं मिल जाऊंगा. वैसे, लोग मुझे विकास कहते हैं…’’ आटोरिकशा वाले ने जवाब दिया.

‘‘ओके…’’ इतना कह कर सपना चल दी.

शाम को ठीक 5 बजे विकास अपना आटोरिकशा ले कर लोक सेवा आयोग के सामने अपनी अजनबी सवारी को लेने पहुंच गया.

कुछ लड़केलड़कियां बाहर निकल रहे थे. किसी का चेहरा उतरा हुआ था, तो किसी का फूलों की माफिक खिला हुआ था. विकास की निगाहें मेन गेट पर लगी थीं.

‘‘आ गए… तुम,’’ पीछे की तरफ से आवाज आई.

विकास एक झटके से पलटा और बोला, ‘‘आप… मैं तो कब से मेन गेट की तरफ देख रहा था…’’

‘‘अरे, मैं पीछे वाले गेट से निकल आई.’’

‘‘कैसा हुआ आप का इंटरव्यू?’’

‘‘बहुत ही बढि़या. मुझे पूरा भरोसा है कि मेरा सिलैक्शन हो जाएगा…’’ सपना ने आटोरिकशा में बैठते हुए कहा.

सपना ने अपना मोबाइल खोला और बोली, ‘‘अरे, यह क्या हुआ अब…

‘‘क्या हुआ सपनाजी?’’

‘‘जोधपुर वाली मेरी ट्रेन तकरीबन

5 घंटे लेट है…’’

विकास मुसकराते हुए बोला, ‘‘सपनाजी, चिंता मत करो. आप मेरे

घर ठहर जाना. मेरा भी घर जाने का समय हो गया… और फिर रात को मुझे  आटोरिकशा चलाने के लिए स्टेशन ही आना है.’’

‘‘अरे नहीं, आप को बेवजह तकलीफ होगी…’’

‘‘कैसी तकलीफ…? इस बहाने भविष्य के एक प्रशासनिक अधिकारी की सेवा करने का हमें भी मौका मिल जाएगा,’’ विकास ने हंसते हुए कहा.

सपना के पास अब मना करने का कोई ठोस बहाना नहीं रह गया था.

‘‘मां, देखो कौन आया है हमारी झोंपड़ी में…’’ विकास ने सपना को मिलवाते हुए कहा.

बूढ़ी मां ने पहले तो पहचानने की कोशिश की, पर अगले ही पल वह बोली, ‘‘बेटी, मैं ने तुम्हें नहीं पहचाना?’’

‘‘अरे, पहचानोगी भी नहीं… ये सपनाजी हैं…’’ विकास ने सारी कहानी बता दी.

3-4 घंटे में ही सपना विकास के परिवार से घुलमिल गई. विकास गरीब जरूर था, लेकिन होशियार बहुत था.

सपना को स्टेशन ले जाने के लिए विकास घर से बाहर आने लगा, तो सपना ने उस से कहा, ‘‘मुझ से एक

वादा करो…’’

‘‘कैसा वादा?’’ विकास एक पल के लिए ठहर सा गया.

‘‘यही कि तुम फिर से इम्तिहान

की तैयारी करोगे और तुम्हें भी

कामयाब होना है,’’ सपना ने हिम्मत देते हुए कहा.

‘‘ठीक है, मैं पूरी कोशिश करूंगा.’’

‘‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती,’’ सपना ने हंसते हुए जवाब दिया.

स्टेशन पर सपना को छोड़ने के बाद विकास में भी फिर से तैयारी करने की इच्छा जाग गई. अब वह आईईएस की तैयारियों में जीजान से जुट गया.

तकरीबन एक महीने बाद आरएएस का नतीजा आया. सपना पास ही नहीं हुई थी, बल्कि टौप 10 में आई थी.

‘‘सपनाजी… बधाई…’’ विकास ने फोन मिलाते ही कहा.

‘थैंक्स… यह सब मां की दुआओं और तुम्हारी शुभकामनाओं का नतीजा है,’ सपना ने चहकते हुए कहा.

तकरीबन 2 साल तक उन दोनों के बीच फोन पर बातचीत होती रही. सपना एसडीएम बन चुकी थी. अब विकास की जिंदगी में बहुत बड़ा दिन आया. उस का आईईएस में चयन हो गया.

‘‘हैलो विकास, मैं तुम से एक

चीज मांगूं….’’

‘‘सपना, मुझ गरीब के पास तुम्हारे लायक देने के लिए कुछ नहीं है… और अभी मेरी ट्रेनिंग भी शुरू नहीं हुई है.’’

‘‘क्या एक आईईएस किसी आरएएस लड़की से शादी कर सकता है?’’ सपना ने अजीब सा सवाल किया.

‘‘क्यों नहीं… अगर दोनों में प्यार हो तो…’’ विकास ने कहा.

‘‘तो क्या तुम मुझ से शादी करोगे?’’ सपना ने साफसाफ पूछा.

कुछ पलों के लिए विकास चुप रहा.

‘‘बोलो विकास, क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करते?’’ सपना ने धीरे से पूछा.

‘‘जी… करता हूं,’’ विकास हकलाते हुए बोला. दरअसल, विकास का दूसरा सपना भी सच हो गया. कभी उस का पहला सपना प्रशासनिक अधिकारी बनना था और दूसरा सपना था सपना को पाना. Hindi Romantic Story

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