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ई. एम. आई

प्यार की तलाश- भाग 2 : अतीत के पन्नों में खोई क्या थी नीतू की प्रेम कहानी?

दूसरे दिन सुनयना वापस जा रही थी. भाभी ने आ कर मुझे उसे घर तक छोड़ने को कहा. मैं जान रहा था, यह मेरे और सुनयना को ले कर घर वालों के मन में जो खिचड़ी पक रही है, उसी साजिश का हिस्सा है पर अंदर ही अंदर मैं खुश भी था… मैं मन ही मन सोच रहा था, ’आज रास्ते में सुनयना के सामने सारी बातें स्पष्ट कर दूंगा.’

सुनयना मेरे पीछे चिपक कर बैठी हुई थी. मैं आदतन सामान्य गति से मोटरसाइकिल चला रहा था. वह अपनी हरकतों से मुझे बारबार छेड़ने का प्रयास कर रही थी. मैं चाह कर भी उसे टोक नहीं पा रहा था. वह बीचबीच में ‘नदिया के पार’ फिल्म का गाना गुनगुनाने लगती और रास्तेभर तरहतरह की बातों से मुझे उकसाने का प्रयास करती रही. पर मैं थोड़ाबहुत जवाब देने के अलावा बस, कभीकभार मुसकरा देता.

जब हम शहर की भीड़भाड़ से बाहर, खुली सड़क पर निकले तो दृश्य भी ‘नदिया के पार’ फिल्म के जैसा ही था, बस अंतर इतना था कि मेरे पास ‘बैलगाड़ी’ की जगह मोटरसाइकिल थी. सड़क के दोनों किनारे कतार में खड़े बड़ेबड़े पेड़ थे. सामने दोनों तरफ खेतों में लहलहाती फसलें और वनों से आच्छादित पहाडि़यों की शृंखलाएं नजर आ रही थीं.

बड़ा ही मनोरम दृश्य था. मेरा मन अनायास ही उमंग से भर उठा. लगा जैसे सुनयना का साथ दे कर मैं भी कोई गीत गुनगुनाऊं. पर अचानक नीतू का खयाल आते ही मैं फिर से गंभीर हो उठा. मैं ने मन ही मन सोचा कि मुझे नीतू के बारे में सुनयना को स्पष्ट बता देना चाहिए. पर पता नहीं क्यों मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा. बहुत कोशिश के बाद, किसी तरह खुद को संयत करते हुए मैं ने कहा, ‘‘सुनयनाजी, मैं आप से एक बात कहना चाहता हूं.’’

‘‘जी…’’ शायद सुनयना ठीक से सुन नहीं पाई थी.

मैं ने मोटरसाइकिल की गति, धीमी करने के बाद, फिर से कहा, ‘‘मैं आप से एक बात कहना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कोई सीरियस बात है?’’ सुनयना कुछ इस तरह मजाकभरे लहजे में बोली, जैसे मेरे जज्बातों से वह अच्छी तरह वाकिफ हो.

मगर मैं जो कहने जा रहा था, शायद उस से उस का दिल टूट जाने वाला था. सो मैं ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘मैं आप को जो बताने जा रहा हूं, मैं ने आज तक किसी से नहीं कहा है. दरअसल, मैं एक लड़की से प्यार करता हूं. उस लड़की का नाम नीतू है. वह मेरे साथ पढ़ती थी. हम दोनों एकदूसरे को बहुत चाहते हैं और मैं उसी से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘आप कहीं मजाक, तो नहीं कर रहे…’’ सुनयना को मेरी बातों पर यकीन नहीं हुआ.

‘‘यह मजाक नहीं, सच है,’’ मैं ने फिर गंभीर हो कर कहा, ‘‘मैं यह बात बहुत पहले सब को बता देना चाहता था पर कभी हिम्मत नहीं कर पाया. दरअसल, मैं इस बात से डर जाता था कि कहीं घर वाले यह न समझ लें कि मैं पढ़नेलिखने की उम्र में भटक गया हूं. पर अब मेरे सामने कोई मजबूरी नहीं है. मैं अपने पैरों पर खड़ा हो चुका हूं.‘‘

‘‘शशिजी, आप सचमुच बहुत भोले हैं,’’ इस बार सुनयना के लहजे में भी गंभीरता थी, वह मुसकराने का प्रयास करती हुई बोली, ‘‘एक तरफ आप प्यार की बातें करते हैं और दूसरी तरफ रिऐक्शन के बारे में भी सोचते हैं. ये बात आप को बहुत पहले सब को बता देनी चाहिए थी. मुझे पूरी उम्मीद है कि आप की पसंद सब को पसंद आएगी. फिर बात जब शादी की हो तो मेरे विचार से अपने दिल की ही बात सुननी चाहिए. चूंकि यह पल दो पल का खेल नहीं, जिंदगीभर का सवाल होता है.’’ सुनयना सहजता से बोल गई. ऐसा लग रहा था, जैसे मेरे मन की बात जान कर उसे कोई खास फर्क न पड़ा हो.

इस तरह उस के सहयोगात्मक भाव से मेरे दिल का बोझ जो एक तरह से उस को ले कर था, उतरता चला गया.

सुनयना को घर छोड़ कर लौटते वक्त मेरे मन में हलकापन था. लेकिन अंदर कहीं एक खामोशी भी छाई हुई थी. पता नहीं क्यों? सुनयना की आंखों से जो दर्द, विदा लेते वक्त झलका था, मुझे बारबार अंदर ही अंदर कचोट रहा था.

रात को खाना खा कर मैं जल्दी ही बिस्तर पर लेट गया क्योंकि सुबह किसी भी हालत में मुझे नीतू के  पास जाना था. लेकिन नींद आ ही नहीं रही थी. बस करवटें बदलता रहा. मन में तरहतरह के विचार आजा रहे थे. इसी उधेड़बुन में कब नींद आ गई, पता ही न चला.

सुबह घर के सामने स्थित पीपल के पेड़ से आ रही चिडि़यों की चहचहाट से मेरी नींद खुली. चादर हटा कर देखा, प्र्रभात की लाली खिड़की में लगे कांच से छन कर कमरे के अंदर आ रही है. आज शायद मैं देर से सोने के बावजूद जल्दी उठ गया था क्योंकि देर होने पर मां जगाने जरूर आती थीं. मैं उठ कर चेहरे पर पानी छिड़क कर, कुल्ला कर के अपने कमरे से निकला.

बैठक में मेज पर अखबार पड़ा हुआ था. आदतन अखबार ले कर कुरसी पर बैठ गया और हमेशा की तरह खबरों की हैडलाइन पढ़ते हुए अखबार के पन्ने पलटने लगा. तभी अचानक मेरी नजर अखबार में छपी एक खबर पर अटक गई. मोटेमोटे अक्षरों में लिखा था, ‘थाना परिसर में प्रेमीप्रेमिका परिणयसूत्र में बंधे.’ हैडलाइन पढ़ कर मेरा दिल धक से रह गया, ‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता,‘ मैं ने सोचा.

खबर कोई अनोखी या विचित्र थी, ऐसी बात न थी, लेकिन जो तसवीर छपी थी मैं ने एक दीर्घ श्वास ले कर पढ़ना शुरू किया. वह नीतू ही थी. खबर में उस के घर का पताठिकाना स्पष्ट रूप से लिखा था. यहां तक कि वह लड़का भी उस के मामा  के महल्ले का ही था. दोनों के बीच 2 साल से प्रेम चल रहा था. घर वालों के विरोध के चलते दोनों भाग कर थाने आ गए थे.

खबर पढ़ कर मैं सन्न रह गया. मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि नीतू ऐसा कर सकती है. मैं ने मन ही मन अपनेआप से ही प्रश्न किया, ‘अगर इस लड़के के साथ, यह उस का प्रेम है तो 4-5 साल पहले मेरे साथ जो हुआ था, वह क्या था? क्या 4-5 साल का अंतराल किसी के दिल से किसी की याद, किसी का प्यार भुला सकता है? मैं उसे हर दिन, हर पल याद करता रहा, उस की तसवीर अपने सीने से लगाए रहा और उस ने मेरे बारे में तनिक भी न सोचा. क्या प्यार के मामले में भी किसी का स्वभाव ऐसा हो सकता है कि उस पर विश्वास करने वाला अंत में बेवकूफ बन कर रह जाए? मैं ने तो अब तक सुना था, प्यार का दूसरा नाम, इंतजार भी होता है पर उस ने मेरा इंतजार नहीं किया.’

 

बंधन टूट गए

बंधन टूट गए : भाग 3

पर कालिंदी उस की बात ही नहीं मान रही थी, मानो वह अपने बाड़े से निकलना ही नहीं चाह रही हो. सुहानी देवी कुछ देर तक यह सब देखती रही, पर जब उस से नहीं रहा गया तो खुद उस नौजवान के पास गई और बोली, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है और इसे क्यों घसीट रहे हो?’’ ‘‘मालकिन, मेरा नाम बातुल है. मालिक ने मुझे जानवरों की साफसफाई के लिए रखा है.’’ ‘‘यह क्या कर रहे हो?’’ उस नौजवान ने बड़े अदब से जवाब दिया, ‘‘दरअसल, कालिंदी ने इस रस्सी को अपने गले में उलझा लिया है. हम इसे बाहर ला कर इस के बंधन को सुलझाना चाहते हैं, पर यह है कि अपने फंदे में ही फंसी रहना चाह रही है. यह खुद भी परेशान है, पर फिर भी निकलना नहीं चाहती.’’ बातुल की बातें सुहानी देवी के कानों से टकराईं और सीधा उस के मन में उतरती चली गईं. ‘‘ठीक है, ठीक है… पर यह नाम बड़ा अजीब सा है, बातुल…’’ बोलते हुए हंस पड़ी थी सुहानी. बातुल ने बताया कि उसे बचपन से ही बहुत बोलने की आदत है,

इसलिए गांव में सब उसे ‘बातुल’ कह कर ही बुलाते हैं. बातोंबातों में बातुल ने यह भी बताया कि गांव वापस आने से पहले वह शहर में भी काम कर चुका है. बातुल के मुंह से शहर का नाम सुन कर सुहानी देवी के मन में जैसे कुछ जाग उठा था. बातुल के रूप में ठकुराइन को बात करने वाला कोई मिल गया था. ठाकुर भवानी सिंह के जाने के बाद सुहानी देवी अपनी सास से कुछ बहाना कर के हवेली की छत पर चली जाती और बातुल को काम करते देखती रहती और फिर खुद ही बातुल से कुछ न कुछ काम बताती. आज ठाकुर साहब सुबहसुबह ही शहर चले गए और बातुल को शाम के लिए मछली लाने को बोल गए. दोपहर में बातुल अपने कंधे पर मछली पकड़ने वाला जाल ले कर आता दिखा. उस में कई सारी मछलियां फंसी हुई थीं और तड़प रही थीं. बातुल ने जाल जमीन पर पटक दिया और सभी मछलियों को निकाल कर पास ही बने एक कच्चे गड्ढे में डाल दिया और उस में ऊपर तक पानी भर दिया, ताकि वे सब शाम तक जिंदा रहें और ठाकुर साहब के आने पर उन्हें पकाया जा सके.

सुहानी देवी ने देखा कि जो मछलियां अब तक पानी के बिना तड़प रही थीं, वे पानी पाते ही कितनी तेज तैर रही थीं मानो उन्होंने जिंदगी ही पा ली हो. सुहानी देवी अभी मछलियों को देख ही रही थी कि तेज बारिश शुरू हो गई. सुहानी देवी ने आवाज लगा कर बातुल को हवेली के अंदर आने को कहा और खुद बारिश का मजा लेने लगी. बारिश मूसलाधार हो रही थी. चारों तरफ पानी भर गया था और उस मछली वाले गड्ढे और बाहर आंगन में पानी का लैवल बराबर हो जाने के चलते गड्ढे की मछलियां जलधारा के साथ बाहर बह चली थी. यह सीन देख कर सुहानी देवी भूल गई थी कि वह एक ठकुराइन है. वह खुश हो कर ताली बजाने लगी और बातुल के कंधे पर हाथ रख दिया. एक ठकुराइन के छुए जाने के चलते एकसाथ कई सवाल बातुल की आंखों में तैर गए थे और उस की नसों में दौड़ते खून की तेजी में उतारचढ़ाव आने लगा था. बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी.

सुहानी देवी का मन किया कि वह बाहर आंगन में जा कर भीगे, अपने सारे गहने उतार कर नहाए, पर ठकुराइन की मर्यादा ने उसे रोके रखा था. ठाकुर शहर से वापस नहीं लौटेंगे, क्योंकि बारिश तेज है और बातुल को भी इसी वजह से आज हवेली में ही रुकना होगा. सास सो गई थीं. बातुल खाना खा कर हवेली के नीचे वाले हिस्से में सोने चला गया था. सुहानी देवी ने सोने से पहले अपने कमरे का दरवाजा जानबूझ कर क्यों खुला छोड़ दिया था, इस का जवाब खुद उस के पास भी नहीं था. उसी दरवाजे से दबे पैर कोई आया और सीधा सुहानी देवी से लिपट गया. वह भी किसी लता की तरह लिपट गई और फुसफुसाते हुए बोली, ‘‘कौन हो तुम?’’ ‘‘हां, जैसे तुम जानती नहीं…’’ उस की यह बात सुन कर सुहानी देवी ने बातुल का सिर अपने सीने के बीचोंबीच भींच लिया और दोनों सैक्स का मजा लेने लगे. एक बार, 2 बार… 3 बार… न जाने कितनी बार हवेली के उस कमरे में ज्वालामुखी का उबाल आया था. आज वहां ऊंचनीच और जातिधर्म की दीवार गिर गई थी. सुहानी देवी को बातुल से प्यार हो गया था. उस दिन के बाद से तो न जाने कितनी बार बातुल और सुहानी देवी ने अपने इस प्यार को भोगा था. अगले दिन सुहानी देवी फिर से भारी गहनों और कपड़ों में लदी हुई थी. बातुल आया, तो उस के एक हाथ में सांप की केंचुली थी.

‘‘यह क्या है?’’ सुहानी ने पूछा. ‘‘केंचुली है ठकुराइन… जब यह पुरानी हो जाती है, तो सांप इस में एक बंधन महसूस करता है और ठीक समय पर वह पुरानी केंचुली को उतार फेंक छुटकारे का अहसास करता है.’’ सुहानी देवी बातुल की बातों को सुन रही थी. उस के दिमाग में बंधन, मुक्ति जैसे शब्द लगातार गूंज रहे थे. 2 दिन बाद ठाकुर भवानी सिंह शहर से लौटे थे. वे सुहानी देवी के लिए सच्चे मोतियों का एक हार लाए थे. उन्होंने वह हार सुहानी देवी के गले में डाल दिया, पर उस के चेहरे को देखा तक नहीं. ठाकुर भवानी सिंह अपने चमचों के बीच बैठ कर रैडलाइट एरिया की बातें करते रहते. इस बार उन के मुंह से कुछ औरतों के नाम भी निकल रहे थे. एक अनजाने सौतिया डाह में जल उठी थी सुहानी देवी. ‘‘अगर गंदे एरिया में जा कर रासरंग ही करना था ठाकुर को तो फिर मुझ से ब्याह ही क्यों रचाया? मैं परंपरा निभाने और दिखावे के लिए मात्र एक गुडि़या की तरह हूं,’’ गुस्से की ज्वाला धधक उठी थी सुहानी देवी के मन में.

ठाकुर भवानी सिंह का शहर जा कर रैडलाइट एरिया में मजे करना बदस्तूर जारी रहा, पर अब सुहानी देवी को भी इस बात की कोई चिंता नहीं थी. उसे तो बातुल के रूप में एक प्यार करने वाला मिल गया था, जिस से वह अपने मन का हर दर्द कह सकती थी और उस की बांहों में अपने अंदर की औरत को महसूस कर सकती थी. पर, आज पूरे 3 दिन बीत गए थे, बातुल हवेली की दहलीज पर सलाम बजाने भी नहीं आया था. ‘कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया बातुल के साथ?’ सुहानी देवी का बेचैन मन बारबार हवेली के दरवाजे की तरफ देख रहा था. रात हो चली थी.

ठाकुर को तो आज आना नहीं था. बातुल से बात करने का मन कर रहा था, उस की खैरियत की भी चिंता हो रही थी. लिहाजा, सास के सो जाने के बाद सुहानी देवी पिछले दरवाजे से बाहर निकली और सीधा बातुल के घर के बाहर जा पहुंची. दरवाजा अंदर से बंद था, पर भीतर से बातुल की आवाज बाहर तक आ रही थी. सुहानी देवी ने दरवाजे की झिर्री से आंख सटा दी. अंदर का सीन देख कर वह दंग रह गई थी. बातुल किसी दूसरी औरत से मजे ले रहा था. ‘‘ठकुराइन ने मुझे बहुत मजा दिया, बहुत मस्त थी उस की जवानी… ठाकुर की रैडलाइट एरिया में मुंह मारने की आदत का मैं ने खूब फायदा उठाया…’’ ‘‘इस का मतलब… तुम नमकहराम हो. जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया,’’ बातुल की बांहों में लेटी औरत ने कहा. ‘‘नहीं, मैं एक व्यापारी हूं… जिसे जो चाहिए था, मैं ने उसे वह दिया और फिर ठाकुर भी तो शहर में जा कर मुंह मारता है, तो मैं नमकहराम कैसे?’’

 

बंधन टूट गए : भाग 1

यह जोड़ी बहुत ही बेमेल थी. 50 साल के ठाकुर भवानी सिंह तो 25 साल की ठकुराइन सुहानी देवी. बेमेल भले ही हो, पर लोगों की नजरों में तो यही जोड़ी सब से बेजोड़ थी, क्योंकि ठाकुर भवानी सिंह 50 साल के हो कर भी दमखम के मामले में किसी जवान लड़के को मात देते थे और ठकुराइन सुहानी देवी का रूप अपनी हद पर था. ठाकुर भवानी सिंह की पहली पत्नी 5 साल पहले ही चल बसी थीं. उन के पहली पत्नी से कोई औलाद नहीं थी. रिश्तेदारों के कहने पर उन्होंने दूसरी शादी के लिए हां कर दी थी और अपने मुकाबले थोड़े कम पैसे वाले ठाकुरों के यहां से सुहानी देवी को ब्याह लाए थे.

भवानी सिंह सुहानी देवी के सामने बड़े ही गर्व से अपनी ठकुराई का बखान करते और अपने खानदान की तलवार दिखाते थे. शान के साथ अपनी खानदानी बातें बताते और हर रीतिरिवाज का बखान करते थे. हर महीने सुहानी देवी के लिए 4-5 जोड़े कपड़े और गहने लाना तो ठाकुर भवानी सिंह के लिए आम बात थी. उन का मानना था कि गहनेकपड़े औरतों के लिए ठीक उसी तरह जरूरी हैं, जैसे मर्दों के लिए शराब और मांस. उन्हें इस के लालच में फंसाओ और खुद चाहे जो भी करो. औरतें घर की चारदीवारों में नियमों, परंपराओ में फंसी रह कर भी अपनेआप को धन्यभागी समझती रहेंगी. जब सुहानी देवी नईनई ब्याह कर आई थी, तो उस की सास उसे बताती थीं कि तुम ठकुराइन हो…

फलां काम तुम्हें इस तरह से करना है और फलां काम कुछ इस तरह से… हम ठकुराइनों के खांसने और छींकने में भी एक शालीनता और एक अदा होती है और अगर घर में कोई शोक हो तो भी हमें चीखचीख कर नहीं रोना… रोने के लिए एक अलग जाति की औरतें होती हैं, जो इन्हीं मौकों पर बुलाई जाती हैं. न जाने और क्याक्या बताया गया था सुहानी देवी को, पर उसे इन सब बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. ठकुराइन होने का भार उस के लिए कुछ ज्यादा ही था. एक बार जब जेठ की दोपहरी में गरमी से परेशान हो कर सुहानी देवी ने अपने बदन के गहने उतार दिए और एक हलके कपड़े वाली साड़ी पहन ली, तो उस की सास ने कितना डांटा था उसे, ‘‘ये भारी कपड़ेलत्ते तो हम ठकुराइनों की शान हैं. इन्हें जीतेजी अपने बदन से अलग नहीं करते… दोष होता है.’’

सुहानी देवी अब इन भारी गहनों और कपड़ों को हमेशा ही ढोती रहती, पर ये भारीभारी गहने और सोने के तार वाली साडि़यों से भी ज्यादा कीमती कुछ और भी था, जिसे सुहानी ढूंढ़ रही थी. अभी तो सुहानी देवी का जवान दिल प्यार चाहता था… घंटों अपने पति के बाहुपाश में लिपटने की चाहत थी उस की. उस का मन अभी आकाश में बिना किसी बंधन के उड़ना चाहता था. ठाकुर भवानी सिंह कभीकभी तो पूरी रात घर से बाहर रहते, तो कभीकभार देर रात ही आते और आते ही औंधे मुंह बिस्तर पर गिर जाते. पूरे महीने में 4-5 ही ऐसे दिन होते, जब वे घर में रुकते, नहीं तो उन की हर रात बाहर ही गुजरती थी. कभीकभार दबी जबान से सुहानी देवी ने पूछने की कोशिश भी की, तो ठाकुर साहब ने खुद के ठाकुर होने का दावा कर के बात आईगई कर दी. ठाकुर भवानी सिंह सुहानी देवी को बिस्तर पर प्यार करना भी जानते थे, पर उन के लिए सिर्फ अपनी संतुष्टि ही माने रखती थी. सुहानी देवी को मजा मिला या नहीं,

इस बात से उन को कोई मतलब नहीं होता था. वे तो बिस्तर पर भी ठाकुर ही बने रहते थे. सुहानी देवी अपने पति से बात करना चाहती थी और आने वाले भविष्य को ले कर कुछ योजनाएं भी बनाना चाहती थी, पर कड़क स्वभाव वाले ठाकुर के साथ ऐसा हो नहीं पाता था. यों तो हवेली में नौकरचाकर भी थे, पर वे सब सुहानी देवी की सास की चमचागीरी और तीमारदारी में ही लगे रहते थे. सुहानी देवी किसी से बात करने को भी तरसती थी. एक रात को जब ठाकुर भवानी सिंह वापस लौटे तो काफी नशे में थे और मूड भी अच्छा लग रहा था, तो सुहानी देवी ने उन से पूछ ही लिया, ‘‘अच्छा, यह तो बताइए कि रोज इतनी रात तक आप बाहर रहते हो… आखिर आप जाते कहां हो?’’ सुहानी देवी की बात सुन कर ठाकुर मुसकराने लगे और बोले, ‘‘देखो सुहानी, हमारे बापदादा की किसी जमाने में तूती बोलती थी और हमारी हवेली पर औरतों का नाच होता था, हमारे बापदादा जिस औरत पर उंगली रखते वही औरत उन के बिस्तर पर बिछ जाती थी,

पर अब हमारी ठकुराई तो रही नहीं, हम बस नाम के ठाकुर हैं, पर हमारे शौक तो वही पुराने हैं,’’ ठाकुर भवानी सिंह ने पानी का एक बड़ा घूंट भरा और फिर से बोलना शुरू कर दिया, ‘‘हम अपने उसी शौक को पूरा करने के लिए शहर में जाते हैं.’’ ‘‘तो क्या आप औरतों का नाच देखने जाते हैं?’’ सुहानी देवी ने पूछा. ‘‘नहीं रे पगली, शहर में रैडलाइट एरिया नाम की एक जगह है, जहां पर पैसे दे कर औरतों के साथ मजे किए जाते हैं. हम वहीं पर मन बहलाने के लिए जाते हैं,’’ आखिरी शब्द कहतेकहते ठाकुर साहब पर नींद हावी हो गई थी और वे सोने लगे, पर सुहानी देवी की आंखों से तो नींद कोसों दूर जा चुकी थी. ‘‘तो इस का मतलब है कि ठाकुर की नजर में मेरी कोई अहमियत नहीं है… मैं बस उन की झूठी परंपराओं और सड़ेगले रीतिरिवाजों को निभाने के लिए यहां लाई गई हूं…’’ सुहानी देवी अपनेआप से ही कई सवाल करने लगी थी. वह सारी रात करवट बदलती रही थी. अगले दिन सुहानी देवी का सिर भारी सा था और मन भी उचटा सा लग रहा था. वह अपनी छत के कोने पर खड़ी दूर तक निहारने लगी थी कि उस की नजर घर के आंगन में खड़े एक नौजवान पर पड़ी, जिस की उम्र 22-23 साल की रही होगी. वह नौजवान ठाकुर साहब की पसंदीदा गाय कालिंदी को पकड़ कर खींच रहा था,

करमवती- भाग 3 : राजपाल प्लंबर कहा गिरा था

उस ने ओपन यूनिवर्सिटी से 2 साल में बीऐड भी कर लिया. जिस दिन उस का बीऐड का नतीजा आया, उस दिन मैं ने खुशी से महल्ले में मिठाई बांटी. उस की कामयाबी मेरी कामयाबी थी. ‘‘करमवती के स्कूल की प्रबंधन समिति ने उस से पहले ही बोल दिया था कि अगर उस ने बीऐड कर लिया, तो वे उस की नियुक्ति प्रवक्ता के पद पर कर देंगे और इंटर की क्लास पढ़ाने के लिए दे देंगे.

उस का यह सपना भी पूरा हो गया. उसी दिन हम ने अपने मकान की बुनियाद रख दी और कुछ महीने बाद उस में शिफ्ट हो गए.’’ ‘‘बड़े कमाल की कहानी है राजपाल तुम्हारी. शराब पीते रहते तो कहीं गटर में होते या फिर किसी हादसे का शिकार हो जाते. करमवती ने तुम्हें दोनों ही चीजों से बचा लिया.’’ ‘‘बाबूजी, अभी मैं ने आप को नाली में पड़े होने से ले कर अब तक 13 साल की कहानी सुनाई है. अभी और भी साल बाकी हैं. कहो तो वह भी सुना दूं.’’ मैं ने कहा, ‘‘जरूर सुनाओ. ऐसी कामयाबी की कहानी कौन नहीं सुनना चाहेगा.’’ ‘‘बाबूजी, करमवती ने निश्चय किया कि वह सरकारी नौकरी करेगी.

2 साल उस ने कड़ी मेहनत की. किताब बाद में लाती, चट पहले कर जाती. फिर पता क्या हुआ बाबूजी?’’ ‘‘क्या हुआ राजपाल? बताओ.’’ ‘‘पिछले महीने उसे सरकारी नौकरी का नियुक्तिपत्र मिला. धामपुर के बालिका कालेज में वह प्रवक्ता हो गई. बाबूजी, 30,000 की पगार से 70,000 की पगार पर,’’ यह कहतेकहते राजपाल भावुक हो गया. उस के औजार रुक गए. वह अपने आंसू पोंछने लगा, ‘‘पता है बाबूजी, अब वह क्या कहती है?’’ राजपाल की बात सुन कर अब मैं असमंजस में पड़ गया. किसी फिल्मी कहानी की तरह मैं उस की कहानी सुन रहा था.

मुझे लगा कि किसी फिल्मी कहानी की तरह करमवती कामयाबी के शिखर पर चढ़ कर राजपाल को अपने लायक न समझ कर उसे छोड़ने की बात करने लगी होगी. मैं अब राजपाल के मुंह से बद से बदतर बात सुनने को तैयार था. करमवती मुझे कहानी की खलनायिका नजर आने लगी. मेरी पूरी हमदर्दी राजपाल के साथ थी. मुझे लगा कि उस के आंसू खुशी के नहीं दुख के थे. मैं ने पूछा, ‘‘क्या कहती है अब करमवती? क्या तुम अब उस के लायक नहीं रहे?’’ ‘‘नहीं बाबूजी, आप यहां गलत सोच रहे हैं.’’ फिर उस ने बड़े गर्व से आगे की कहानी सुनाई, ‘‘अब करमवती कहती है कि मुझे अब इन औजारों का थैला उठाने की जरूरत नहीं है. वह कहती है कि वह जल्दी ही मुझे प्लंबरी के सामान की बड़ी सी दुकान खुलवाएगी. उस दुकान से भी बड़ी, जिस दुकान के लालाजी ने आप को मेरे पास भेजा था.

‘‘वह कहती है कि यह तो अभी हमारी नई जिंदगी की शुरुआत?है, आगेआगे देखो क्या होता?है.’’ राजपाल का काम लगभग खत्म होने को था, तभी उस के घर से फोन आया. उस ने बताया कि उस का काम खत्म होने ही वाला है. जब राजपाल का काम खत्म हो गया, तो मैं ने उस का हिसाब कर दिया. तभी घर के सामने एक कार आ कर रुकी. ड्राइविंग सीट पर कोई औरत बैठी थी और पिछली सीट पर 2 बड़े बच्चे. मुझे लगा कि कोई मेहमान आया है. तभी पिछली सीट से बड़ा लड़का नीचे उतरा. उस ने मुझे नमस्ते की और राजपाल का औजारों का थैला हाथ से पकड़ते हुए कहा, ‘‘लाओ पापा, यह मुझे दो.’’ मुझे समझते देर न लगी कि कार किस की है. तभी राजपाल बोला,

‘‘बाबूजी, यही है मेरी करमवती. और ये हैं हमारे बच्चे.’’ करमवती ने कार से उतर कर मुझे नमस्ते की. उस की आंखों में अथाह आत्मविश्वास था. ‘‘करमवती, ये वही बाबूजी हैं, जिन्होंने मुझे नाली में से खींचा था.’’ ‘‘मैं उस बात के लिए आज भी बाबूजी की एहसानमंद हूं,’’ करमवती ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुका कर कहा. ‘‘अच्छा बाबूजी नमस्ते,’’ राजपाल ने कार की अगली सीट पर बैठते हुए कहा. ‘‘नमस्ते,’’ मैं ने कहा. उस के बाद करमवती ने कार आगे बढ़ा दी. मैं हैरानी से उस कार को तब तक आगे बढ़ते देखता रहा, जब तक वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हो गई. मैं सोच रहा था, ‘समझदारी और हौसला हो, तो आदमी आसमान छू सकता है. करमवती कामयाबी की मिसाल है.’

करमवती- भाग 2 : राजपाल प्लंबर कहा गिरा था

‘‘मेरी घरवाली करमवती ने जैसेतैसे हाथ जोड़ कर मकान मालिक को मनाया. वह इस शर्त पर राजी हुआ कि अगर उस दिन के बाद मैं शराब पी कर आया, तो वह किसी सूरत में फिर अपने मकान में नहीं रखेगा.’’ ‘‘लेकिन, तुम शराब पीने से बाज तो नहीं आए होगे राजपाल?’’ मैं ने ताना कसा. ‘‘बाबूजी, मैं शर्मिंदा तो बहुत था, लेकिन आप को क्या बताऊं, हम शराबियों को शराब पीने की ऐसी आदत पड़ जाती है कि कितना भी चाहें पीए बिना रहा नहीं जाता. हम मजदूरों की क्या इज्जत और क्या बेइज्जती. लेकिन बाबूजी, करमवती को यह सब बरदाश्त न हुआ…’’

राजपाल काम करता गया और कहानी को आगे बढ़ाता गया. ‘‘अगले दिन मेरी हिम्मत काम पर जाने की नहीं हो रही थी, लेकिन करमवती ने मेरा हौसला बढ़ाया. उस ने एक हाथ में बच्चे को गोद में लिया और दूसरे हाथ में मेरे औजारों का थैला उठाया और कहा, ‘चलो.’ ‘‘मैं उसे ऐसा करते देख हैरान था. मैं ने उस से औजारों वाला थैला ले लिया. लेकिन उस ने काम पर मुझे अकेले न जाने दिया. मेरे लाख मना करने के बावजूद वह मेरे साथ चल दी. ‘‘काम में उस ने मेरी मदद की और शाम को काम निबटा कर मेरे साथ ही घर वापस आई. शराबी दोस्तों से मिलने के उस ने रास्ते बंद कर दिए. ‘‘वह अब रोज मेरे साथ काम पर जाने लगी. काम में वह मेरी पूरी मदद करती. अब मेरा 8 घंटे का काम 5-6 घंटे में निबटने लगा. इस से मैं ने अपना काम और बढ़ा लिया, जिस से मेरी आमदनी बढ़ने लगी. ‘

‘आप को तो मालूम होगा ही बाबूजी कि हम मजदूर तबके के लोग शाम को मजदूरी करने के बाद थकान मिटाने के बहाने शराब पीने बैठ जाते हैं और फिर पीने की कोई हद नहीं होती. दिनभर की कमाई मिनटों में स्वाहा हो जाती है. ‘‘कभीकभी तो इस चक्कर में एक पैसा भी घर नहीं पहुंचता, बल्कि कई बार तो उधारी और चढ़ जाती है. लेकिन करमवती के साथ होने से ये सब चीजें बंद हो गईं. ‘‘शराब पीने की फुजुलखर्ची घटी तो बचत अपनेआप बढ़ गई. बचत किसे खुशी नहीं देती. मैं मजदूरी का पैसा करमवती को देता. वह घर चलाती और बचत का पैसा अपने खाते में जमा कर आती. घर में अच्छा खाना, पहनना होने लगा. मेरे शराबी दोस्त मुझे ताना मारते ‘जोरू का गुलाम’, पर मैं एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देता.’’ ‘‘अच्छा, फिर तो करमवती ने तुम्हारी जिंदगी बदल दी, लेकिन आज तुम करमवती को ले कर नहीं आए?’’ मैं ने पूछा. ‘‘बाबूजी, आगे तो सुनिए. अभी तो मेरी कहानी शुरू हुई है. करमवती भी आएगी, जरूर आएगी.’’ राजपाल ने अपनी कहानी फिर आगे बढ़ा दी.

‘‘बाबूजी, करमवती से जब मेरी शादी हुई, तब वह 8वीं पास थी. वह और पढ़ना चाहती थी, लेकिन उस के गरीब मांबाप ने उस की पढ़ाई रोक कर घर के कामकाज में झोंक दिया और फिर उसे मेरे पल्ले बांध दिया. ‘‘फिर वह और 3 साल मेरे साथ ऐसे ही घिसटती रही. तब उस के मन में आगे पढ़ने का विचार आया. उस ने 10वीं का प्राइवेट फार्म भरा और वह अच्छे नंबरों से पास हो गई. हमारा बच्चा भी अब 3 साल का हो गया था और हमारी शादी को 5 साल. ‘‘अब तक मेरी समझ में यह आ गया था कि शराब कितनी बुरी चीज होती?है. हम मजदूरों के लिए तो यह किसी जहर से कम नहीं. ‘‘गरीब मजदूर सोचता है कि वह शराब पी कर अपने दुख मिटा रहा होता है, लेकिन सच तो यह है बाबूजी, शराब पी कर वह अपने दुख बढ़ा रहा होता है. वह शराब पी कर तबाह होता है और गरीबी के नरक में सड़ता है. करमवती की वजह से मैं उस नरक में सड़ने से बच गया.’’ ‘‘राजपाल, तुम्हारी कहानी रोचक है. आगे बताओ, फिर तुम्हारी जिंदगी में क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘बाबूजी, करमवती को अब यकीन हो चला था कि अब मैं शराब नहीं पीऊंगा, तो उस ने मेरे साथ जाना छोड़ छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. इस से हमारी आमदनी और भी बढ़ गई. अब हम ने 2 कमरों का मकान किराए पर ले लिया. एक कमरे में करमवती ट्यूशन पढ़ाती और दूसरे कमरे में हम रहते. ‘‘लेकिन बाबूजी, करमवती का पढ़ाई का शौक अभी छूटा नहीं था. 2 साल में उस ने 12वीं भी पास कर ली. अब उस के पास इतने ट्यूशन हो गए कि घर का खर्चा ट्यूशन की आमदनी से आराम से चलने लगा. मेरी कमाई बैंक में जमा होने लगी. ‘‘ट्यूशन के बच्चों के सामने मुझे बीड़ी पीना अच्छा नहीं लगता था, तो मैं ने वह भी छोड़ दी. चाय की लत भी बहुत बुरी थी. मैं ने ठान लिया और फिर चाय पीना भी छोड़ दिया.’’ ‘‘वाह राजपाल. इतना सुधार, ऐसा निश्चय.’’ ‘‘बाबूजी, बस उस करमवती की करामात है.’’ ‘‘तो अब तो ट्यूशन वगैरह काफी अच्छी चल रही होगी और तुम्हारी बचत भी अच्छी हो रही होगी?’’ राजपाल फिर अपनी जिंदगी की कहानी सुनाने लगा और मैं भी बड़ी दिलचस्पी के साथ मगन हो कर उस की कहानी सुनने लगा. ‘‘फिर करमवती ने पहले बेटे के जन्म के 5 साल बाद एक बेटी को जन्म दिया और फिर नसबंदी करा ली. उस ने कहा,

‘छोटा परिवार, सुखी परिवार. हम इन 2 बच्चों की परवरिश ठीक से करेंगे. और बच्चों की जरूरत नहीं.’ ‘‘बाबूजी, आप भी सुन कर हैरान होंगे, करमवती ने 3 साल में बीए भी कर लिया और वह एक प्राइवेट स्कूल में मास्टरनी हो गई. बाबूजी, पूछो मत. जिस दिन करमवती स्कूल में मास्टरनी हुई, उस दिन मैं खुशी से रो पड़ा था. लोग उस दिन से मुझे ‘मास्टरनी का हसबैंड’ कहने लगे. ‘‘गरीब आदमी की आमदनी में दो पैसे बढ़ जाएं, तो उस से बड़ा सेठ कौन. यहां तो लोग अब इज्जत से भी पेश आने लगे थे.’’ ‘‘अरे वाह, ‘मास्टरनी के हसबैंड’ तुम्हारी करमवती ने तो कमाल ही कर दिया. उस के साथ तुम भी पढ़ लेते,’’ मैं ने कहा. ‘‘बाबूजी, करमवती यहीं नहीं रुकी. उस ने एमए भी पास किया और फिर तो वह इंटर कालेज में पढ़ाने लगी. अब हमारी इतनी बचत हो चुकी थी कि हम ने महल्ले में ही 100 गज का प्लौट खरीद लिया. हमारे बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे. ‘‘बच्चों को बनठन कर स्कूल जाते देखता, तो मेरा कलेजा खुशी से चौगुना हो जाता. मैं और मेहनत करता. करमवती मेरी मेहनत को सलाम करती, मेरा हौसला बढ़ाती. ‘‘लेकिन बाबूजी, करमवती तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी.

 

साथी साथ निभाना – भाग 1 : संजीव ने ऐसा क्या किया कि नेहा की सोच बदल गई

उस शाम नेहा की जेठानी सपना ने अपने पति राजीव के साथ जबरदस्त झगड़ा किया. उन के बीच गालीगलौज भी हुई.

‘‘तुम सविता के साथ अपने संबंध फौरन तोड़ लो, नहीं तो मैं अपनी जान दे दूंगी या तुम्हारा खून कर दूंगी,’’ सपना की इस धमकी को घर के सभी सदस्यों ने बारबार सुना.

नेहा को इस घर में दुलहन बन कर आए अभी 3 महीने ही हुए थे. ऐसे हंगामों से घबरा कर वह कांपने लगी.

उस के पति संजीव और सासससुर ने राजीव व सपना का झगड़ा खत्म कराने का बहुत प्रयास किया, पर वे असफल रहे.

‘‘मुझे इस गलत इंसान के साथ बांधने के तुम सभी दोषी हो,’’ सपना ने उन तीनों को भी झगड़े में लपेटा, ‘‘जब इन की जिंदगी में वह चुड़ैल मौजूद थी, तो मुझे ब्याह कर क्यों लाए? क्यों अंधेरे में रखा मुझे और मेरे घर वालों को? अपनी मौत के लिए मैं तुम सब को भी जिम्मेदार ठहराऊंगी, यह कान खोल कर सुन लो.’’

सपना के इस आखिरी वाक्य ने नेहा के पैरों तले जमीन खिसका दी. संजीव के कमरे में आते ही वह उस से लिपट कर रोने लगी और फिर बोली, ‘‘मुझे यहां बहुत डर लगने लगा है. प्लीज मुझे कुछ समय के लिए अपने मम्मीपापा के पास जाने दो.’’

‘‘भाभी इस वक्त बहुत नाराज हैं. तुम चली जाओगी तो पूरे घर में अफरातफरी मच जाएगी. अभी तुम्हारा मायके जाना ठीक नहीं रहेगा,’’ संजीव ने उसे प्यार से समझाया.

‘‘मैं यहां रही, तो मेरी तबीयत बहुत बिगड़ जाएगी.’’

‘‘जब तुम से कोई कुछ कह नहीं रहा है, तो तुम क्यों डरती हो?’’ संजीव नाराज हो उठा.

नेहा कोई जवाब न दे कर फिर रोने लगी.

उस के रोतेबिलखते चेहरे को देख कर संजीव परेशान हो गया. हार कर वह कुछ दिनों के लिए नेहा को मायके छोड़ आने को राजी हो गया.

उसी रात सपना ने अपने ससुर की नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की.

उसे ऐसा करते राजीव ने देख लिया. उस ने फौरन नमकपानी का घोल पिला कर सपना को उलटियां कराईं. उस की जान का खतरा तो टल गया, पर घर के सभी सदस्यों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं.

डरीसहमी नेहा ने तो संजीव के साथ मायके जाने का इंतजार भी नहीं किया. उस ने अपने पिता को फोन पर सारा मामला बताया, तो वे सुबहसुबह खुद ही उसे लेने आ पहुंचे.

नेहा के मायके जाने की बात के लिए अपने मातापिता से इजाजत लेना संजीव के लिए बड़ा मुश्किल काम साबित हुआ.

‘‘इस वक्त उस की जरूरत यहां है. तब तू उसे मायके क्यों भेज रहा है?’’ अपने पिता के इस सवाल का संजीव के पास कोई ठीक जवाब नहीं था.

‘‘मैं उसे 2-3 दिन में वापस ले आऊंगा. अभी उसे जाने दें,’’ संजीव की इस मांग को उस के मातापिता ने बड़ी मुश्किल से स्वीकार किया.

नेहा को विदा करते वक्त संजीव तनाव में था. लेकिन उस की भावनाओं की फिक्र न नेहा ने की, न ही उस के पिता ने. नेहा के पिता तो  गुस्से में थे. किसी से भी ठीक तरह से बोले बिना वे अपनी बेटी को ले कर चले गए.

उन के मनोभावों का पता संजीव को 3 दिन बाद चला जब वह नेहा को वापस  लाने के लिए अपनी ससुराल पहुंचा.

नेहा की मां नीरजा ने संजीव से कहा, ‘‘हम ने बहुत लाड़प्यार से पाला था अपनी नेहा को. इसलिए तुम्हारे घर के खराब माहौल ने उसे डरा दिया.’’

नेहा के पिता राजेंद्र तो एकदम गुस्से से फट पड़े, ‘‘अरे, मारपीट, गालीगलौज करना सभ्य आदमियों की निशानी नहीं. तुम्हारे घर में न आपसी प्रेम है, न इज्जत. मेरी गुडि़या तो डर के कारण मर जाएगी वहां.’’

 

साथी साथ निभाना – भाग 2 : संजीव ने ऐसा क्या किया कि नेहा की सोच बदल गई

‘‘पापा, नेहा को मेरे घर के सभी लोग बहुत प्यार करते हैं. उसे डरनेघबराने की कोई जरूरत नहीं है,’’ संजीव ने दबे स्वर में अपनी बात कही.

‘‘यह कैसा प्यार है तुम्हारी भाभी का, जो कल को तुम्हारे व मेरी बेटी के हाथों में हथकडि़यां पहनवा देगा?’’

‘‘पापा, गुस्से में इंसान बहुत कुछ कह जाता है. सपना भाभी को भी नेहा बहुत पसंद है. वे इस का बुरा कभी नहीं चाहेंगी.’’

‘‘देखो संजीव, जो इंसान आत्महत्या करने की नासमझी कर सकता है, उस से संतुलित व्यवहार की हम कैसे उम्मीद करें?’’

‘‘पापा, हम सब मिल कर भैयाभाभी को प्यार से समझाएंगे. हमारे प्रयासों से समस्या जल्दी हल हो जाएगी.’’

‘‘मुझे ऐसा नहीं लगता. मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी की खुशियां तुम्हारे भैयाभाभी के कभी समझदार बनने की उम्मीद पर आश्रित रहें.’’

‘‘फिर आप ही बताएं कि आप सब क्या चाहते हैं?’’ संजीव ने पूछा.

‘‘इस समस्या का समाधान यही है कि तुम और नेहा अलग रहने लगो. भावी मुसीबतों से बचने का और कोई रास्ता नहीं है,’’ राजेंद्रजी ने गंभीर लहजे में अपनी राय दी.

‘‘मुझे पता था कि देरसवेर आप यह रास्ता मुझे जरूर सुझाएंगे. लेकिन मेरी एक बात आप सब ध्यान से सुन लें, मैं संयुक्त परिवार में रहना चाहता हूं और रहूंगा. नेहा को उसी घर में  लौटना होगा,’’ संजीव का चेहरा कठोर हो गया.

‘‘मुझे सचमुच वहां बहुत डर लगता है,’’ नेहा ने सहमे हुए अपने मन की बात कही, ‘‘न ठीक से नींद आती है, न कुछ खाया जाता है? मैं वहां लौटना नहीं चाहती हूं.’’

‘‘नेहा, तुम्हें जीवन भर मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चलना चाहिए. अपने मातापिता की बातों में आने के बजाय मेरी इच्छाओं और भावनाओं को ध्यान में रख कर काम करो. मुझे ही नहीं, पूरे घर को तुम्हारी इस वक्त बहुत जरूरत है. प्लीज मेरे साथ चलो,’’ संजीव भावुक हो उठा.

अपनी आदत के अनुरूप नेहा कुछ कहनेसुनने के बजाय रोने लगी. नीरजा उसे चुप कराने लगीं. राजेंद्रजी सिर झुका कर खामोश बैठ गए. संजीव को वहां अपना हमदर्द या शुभचिंतक कोई नहीं लगा.

कुछ देर बाद नेहा अपनी मां के साथ अंदर वाले कमरे में चली गई. संजीव के साथ राजेंद्रजी की ज्यादा बातें नहीं हो सकीं.

‘‘तुम मेरे प्रस्ताव पर ठंडे दिमाग से सोचविचार करना, संजीव. अभी नेहा की

बिगड़ी हालत तुम से छिपी नहीं है. उसे यहां कुछ दिन और रहने दो,’’ राजेंद्रजी की इस पेशकश को सुन संजीव अपने घर अकेला ही लौट गया.

नेहा को वापस न लाने के कारण संजीव को अपने मातापिता से भी जलीकटी बातें सुनने को मिलीं.

गुस्से से भरे संजीव के पिता ने अपने समधी से फोन पर बात की. वे उन्हें खरीखोटी सुनाने से नहीं चूके.

‘‘भाईसाहब, हम पर गुस्सा होने के बजाय अपने घर का माहौल सुधारिए,’’ राजेंद्रजी ने तीखे स्वर में प्रतिक्रिया व्यक्त की, ‘‘नेहा को आदत नहीं है गलत माहौल में रहने की. हम ने कभी सोचा भी न था कि वह ससुराल में इतनी ज्यादा डरीसहमी और दुखी रहेगी.’’

‘‘राजेंद्रजी, समस्याएं हर घर में आतीजाती रहती हैं. मेरी समझ से आप नेहा को हमारे इस कठिनाई के समय में अपने घर पर रख कर भारी भूल कर रहे हैं.’’

‘‘इस वक्त उसे यहां रखना हमारी मजबूरी है, भाईसाहब. जब आप के घर की समस्या सुलझ जाएगी, तो मैं खुद उसे छोड़ जाऊंगा.’’

‘‘देखिए, लड़की के मातापिता उस के ससुराल के मसलों में अपनी टांग अड़ाएं, मैं इसे गलत मानता हूं.’’

‘‘भाईसाहब, बेटी के सुखदुख को नजरअंदाज करना भी उस के मातापिता के लिए संभव नहीं होता.’’

इस बात पर संजीव के पिता ने झटके से फोन काट दिया. उन्हें अपने समधी का व्यवहार मूर्खतापूर्ण और गलत लगा. अपना गुस्सा कम करने को वे कुछ देर के लिए बाहर घूमने चले गए.

सपना ने नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की है, यह बात किसी तरह उस के मायके वालों को भी मालूम पड़ गई.

उस के दोनों बड़े भाई राजीव से झगड़ने का मूड बना कर मिलने आए. उन के दबाव के साथसाथ राजीव पर अपने घर वालों का दबाव अलग से पड़ ही रहा था. सभी उस पर सविता से संबंध समाप्त कर लेने के लिए जोर डाल रहे थे.

सविता उस के साथ काम करने वाली शादीशुदा महिला थी. उस का पति सऊदी अरब में नौकरी करता था. अपने पति की अनुपस्थिति में उस ने राजीव को अपने प्रेमजाल में उलझा रखा था.

सब लोगों के दबाव से बचने के लिए राजीव ने झूठ का सहारा लिया. उस ने सविता को अपनी प्रेमिका नहीं, बल्कि सिर्फ अच्छी दोस्त बताया.

‘‘सपना का दिमाग खराब हो गया है. सविता को ले कर इस का शक बेबुनियाद है. मैं किसी भी औरत से हंसबोल लूं तो यह किलस जाती है. इस ने तो आत्महत्या करने का नाटक भर किया है, लेकिन मैं किसी दिन तंग आ कर जरूर रेलगाड़ी के नीचे कट मरूंगा.’’

उन सब के बीच कहासुनी बहुत हुई, मगर समस्या का कोई पुख्ता हल नहीं निकल सका.

संजीव की नाराजगी के चलते नेहा ही उसे रोज फोन करती. बातें करते हुए उसे अपने पति की आवाज में खिंचाव और तनाव साफ महसूस होता.

वह इस कारण वापस ससुराल लौट भी जाती, पर राजेंद्र और नीरजा ने उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं दी.

‘‘वहां के संयुक्त परिवार में तुम कभी पनप नहीं पाओगी, नेहा,’’ राजेंद्रजी ने उसे समझाया, ‘‘अपने भैयाभाभी के झगड़ों व तुम्हारे यहां रहने से परेशान हो कर संजीव जरूर अलग रहने का फैसला कर लेगा. तेरे पास पैसा अपनी गृहस्थी अलग बसा लेने के बाद ही जुड़ सकेगा, बेटी.’’

नीरजा ने भी अपनी आपबीती सुना कर नेहा को समझाया कि इस वक्त उस का ससुराल में न लौटना ही उस के भावी हित में है.

एक रात फोन पर बातें करते हुए संजीव ने कुछ उत्तेजित लहजे में नेहा से कहा, ‘‘कल सुबह 11 बजे तुम मुझे नेहरू पार्क के पास मिलो. हम दोनों सविता से मिलने चलेंगे.’’

‘‘हम उस औरत से मिलने जाएंगे, पर क्यों?’’ नेहा चौंकी.

‘‘देखो, राजीव भैया पर उस से अलग होने की बात का मुझे कोई खास असर नहीं दिख रहा है. मेरी समझ से कल रविवार को तुम और मैं सविता की खबर ले कर आते हैं. उसे डराधमका कर, समाज में बेइज्जती का डर दिखा कर, उस के पति को उस की चरित्रहीनता की जानकारी देने का भय दिखा कर हम जरूर उसे भैया से दूर करने में सफल रहेंगे,’’ संजीव की बातों से नेहा का दिल जोर से धड़कने लगा.

 

मुंहबोली बहनें

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