बूआ की ऐसी हालत देख कर नव्या को लगा कि दाल में कुछ काला है. जब दवा देने पर भी फर्क नहीं पड़ा तो अब नव्या की भी चिंता बढ़ गई.
‘‘चलिए बूआ, मैं आप को डाक्टर को दिखा लाती हूं. यहां पास में ही सरकारी अस्पताल है, कोई न कोई डाक्टर तो मिल ही जाएगा.’’
‘‘पड़ोस में से किसी को बुला ला, इतनी रात गए हम अकेली कैसे जाएंगी?’’
‘‘बूआ, आप चिंता छोडि़ए, मैं सब संभाल लूंगी,’’ नव्या ने बूआ को सहारा देने के लिए उन का हाथ पकड़ना चाहा, तो निकिता ने झटके से उसे अपने से दूर कर दिया.
‘‘आप… आप भी सच में हद करती हैं. मैं गाड़ी निकालती हूं, आप ताला लगा कर बाहर आइए. रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया,’’ भुनभुनाते हुए नव्या बाहर निकल गई.
‘‘पर, गाड़ी को तू धक्का मार कर अस्पताल तक ले जाएगी क्या?’’
‘‘नहीं बूआ चला कर,’’ नव्या को ड्राइविंग सीट पर बैठे देख निकिता बूआ ऐसे हैरान हुईं जैसे उन्होंने किसी दूसरे ग्रह के प्राणी को ड्राइविंग करते देख लिया हो.
अस्पताल में नाइट ड्यूटी पर तैनात स्टाफ को सोते देख नव्या ऐसे भड़की कि रिसैप्शनिस्ट से ले कर नर्स तक सब हरकत में आ गए. उन्होंने ड्यूटी डाक्टर को उठाया.
इस छोटे से शहर का सरकारी अस्पताल भी ठीकठाक था. डाक्टर ने जरूरी टैस्ट के बाद सोनोग्राफी की.
‘‘इन्हें अपैंडिक्स का दर्द है. मैं यह दर्द रोकने के लिए एक इंजैक्शन लगा देती हूं,’’ डाक्टर बोलीं.
नव्या को लगा, अब बूआ अपनी तबीयत के चलते 2 दिन अपने सारे नियमकानून ताक पर रख देंगी, पर उस के अंदाजे के उलट सुबह उठते ही वे वही रोबीली बूआ थीं.
उन्होंने उठते ही अपनी बेटी को फोन लगाया और उसे सारे हालात के बारे में बताया.
‘‘पूजा, तेरे पापा तो टूर पर गए हैं, पर तू अभी कोई बस पकड़ कर यहां आ जा.’’
‘‘मां, मैं अकेली कैसे आऊंगी? यहां से बसस्टैंड तक जाना, बस में बैठना…’’ बूआ चुप थीं, क्योंकि वे जानती थीं कि बस से यहां अकेले आना तो दूर उन्होंने तो बेटी को अपनी गली से भी कभी अकेले नहीं निकलने दिया. हमेशा उसे छुईमुई बना कर रखा. पर अब क्या हो सकता था. एक दिन में तो कुछ भी बदला नहीं जा सकता.
कल से आज तक का सारा घटनाक्रम बूआ के जेहन में चलने लगा. न चाहते हुए भी वे अपनी बेटी की तुलना नव्या से करने लगीं. कितना दंभ था उन्हें अपने दिल्ली जैसे शहर में रहने का. अपने स्टाइलिश कपड़ों का, नएनए होटलों में घूमने का, बच्चों के हाईफाई स्कूलों का. इन के बूते पर वे अपने भाईभाभी को नीचे दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं.
इतने में नव्या चाय और बिसकुट लिए उन के सामने खड़ी मुसकरा रही थी. उस ने सबकुछ सुन लिया था. अब चौंकने की बारी नव्या की थी. निकिता बूआ ने उसे अपने गले से लगा लिया.
‘‘मेरी बहादुर बच्ची, तू ने मेरी आंखें खोल दीं. जिस तरह से तू ने कल रात को मुसीबत में मुझे संभाला, तेरी उम्र का कोई लड़का भी क्या संभाल पाता. मुझे तुझ पर गर्व है.’’
‘‘कहां तो मैं तेरा खयाल रखने आई थी, उलटा तुझे एक दिन में परेशान कर डाला. मुझे माफ कर दे,’’ कहते हुए निकिता बूआ रोंआसी हो गईं.
तीसरे दिन नव्या के मम्मीपापा के आते ही निकिता बूआ उस की तारीफों के पुल बांधने लगीं, ‘‘भाभी, आप ने बहुत अच्छी परवरिश की है नव्या की. इन 3 दिनों में उस ने मुझे अच्छे से सिखा दिया कि ‘वे 3 दिन’ औरत के लिए सजा नहीं, उस की सहने की ताकत को मापने का पैमाना है.
‘‘नव्या ने मुझे जिंदगी का वह गूढ़ मंत्र भी दे दिया, जो मैं इतने सालों में भी नहीं सीख पाई. इनसान बड़े शहरों में रहने से, सुखसुविधाएं अपना लेने से मौडर्न नहीं बनता, बल्कि वह मौडर्न बनता है अपनी नई सोच से.
‘‘मैं भी घर पहुंचते ही अपनी बेटी को ड्राइविंग स्कूल में भेज दूंगी और सोच रही हूं मौका मिलते ही महीनेभर उसे आप के पास भेज दूं. कुछ दिन नव्या के पास रहेगी, तो वह भी थोड़ी स्मार्ट बनेगी.
‘‘लगता है कि मेरे कठोर अनुशासन ने उसे दब्बू बना दिया है,’’ कहते हुए बूआ ने नव्या को गले लगा लिया.
‘‘मैं अपनी सोच पर बहुत शर्मिंदा हूं भाभी. किसी ने सही कहा है कि हमारे समाज में औरत ही औरत की दुश्मन है.’’
मम्मी अपनी ननद के मुंह से ये सब बातें सुन कर चकित सी नव्या की तरफ देखने लगीं, तो उन्होंने पाया कि उन की दबंग बेटी अपना कौलर ऊंचा किए मुसकरा रही थी. वह मैचो गर्ल थी न, पापा की.



