Hindi Family Story: मां के आशीर्वाद से – क्या कैप्टन को मिल पाई जीत

Hindi Family Story: मां,  तुम्हारे आशीर्वाद से मैं लड़ाई के मोरचे पर पहुंच गया हूं. आते समय तुम्हारी कही आखिरी बात मुझे याद है.मां, यकीन मानना कि कैप्टन रंजीत की पीठ पर कभी गोली नहीं लगेगी. आखिरी सांस तक वह दुश्मनों से लड़ता रहेगा.

तुम्हारा बेटा, तुम्हारे सिखाए रास्ते पर चलता रहेगा. राजी को कहना कि मोह छोड़ दे. अपने लिए तो सभी जीते हैं, पर दूसरों के लिए जीने का मजा ही और है. उस जैसी हजारों सुहागनों के सुहाग मेरे संग मोरचे पर डटे हुए हैं.

मां, एक मोरचा यह युद्धभूमि है, दूसरा मोरचा तुम्हारे यहां है, सिविल में. तुम और राजी उस मोरचे पर लड़ने वालों के लिए काम करोगी, तो हमारे हाथ मजबूत होंगे. देशवासियों का जोश, हमारा जोश है.अच्छा, मां. आदेश आ गया है.

मुझे अपने कुछ जवानों के साथ दुश्मन के ठिकाने पर हमला करना है. तुम्हारा आशीर्वाद मेरे साथ है. पर वादा करो मां, अगर मैं वीरगति पा गया, तो तुम रोओगी नहीं और न ही राजी को रोने दोगी.अच्छा मां, अलविदा, जयहिंद.‘‘कैप्टन रंजीत…’’ ये एड्युडेंट थे.

‘‘यस सर.’’‘‘जाने से पहले कर्नल साहब से मिल लेना. उन के पास आप के लिए आखिरी आदेश बाकी है.’’कैप्टन रंजीत ने ‘हां’ में सिर हिलाया और कर्नल साहब के बंकर की ओर बढ़ गया.‘‘क्या मैं भीतर आ सकता हूं सर?’’‘‘यस, कैप्टन रंजीत.’’

कैप्टन रंजीत बंकर के भीतर चला जाता है और सैनिक ढंग से सैल्यूट करता है.कर्नल साहब ने अपने सामने मैप बिछाए हुए हैं और उस जगह को चैकआउट किए हुए हैं, जिस जगह पर हमला करना है.‘‘कैप्टन रंजीत, तुम मेरी रैजीमैंट के सब से अच्छे अफसरों में से एक हो…’’

कर्नल साहब ने कहना शुरू किया, ‘‘जिस अहम ठिकाने पर तुम्हें हमला करना है, वह ऊंचाई पर है. उस के नीचे से वह सड़क जा रही है, जहां से फर्स्ट लाइट में हमारी पूरी रैजीमैंट ने एडवांस करना है. जिस पर से हमें सुबह गुजर कर जाना है.

‘‘यहां से तुम अटैक नहीं कर सकते. मेन रोड होने के चलते दुश्मन का पूरा ध्यान इसी ओर है. इधर से जाने से तुम्हारी पूरी गतिविधियों को नोट किया जा सकता है.

‘‘दूसरा रास्ता है 35 फुट चौड़ा और 20 फुट गहरा वह बरसाती नाला, जो इस ठिकाने से पीछे हो कर जाता है. रास्ता बहुत बीहड़ है. कांटेदार झाडि़यों से अटा पड़ा है, पर तुम्हें इसी रास्ते को अपनाना है.‘‘एड्युडेंट ने आज उस जगह की रैकी (जासूसी) कर के यह आई स्कैच (दुश्मन के इलाके में घुस कर खास जगह का नक्शा) तैयार किया है.

इसे रख लो, तुम्हारे काम आएगा. तुम्हारे साथ 12 जवान हैं और उन में से 2 ऐसे हैं, जिन्होंने आज की रैकी में हिस्सा लिया था…’’कर्नल साहब बोलतेबोलते एकाएक रुक गए. लगा, जैसे वे एकदम पत्थर की तरह कठोर हो गए हैं.

फिर वे बोले, ‘‘कैप्टन रंजीत, मेरे लिए फर्स्ट लाइट में रैजीमैंट को एडवांस करवाना बहुत जरूरी है. यह तुम्हें याद रखना होगा. मुझे गम नहीं होगा, अगर इस ठिकाने को हासिल करने के लिए तुम्हारे सभी जवान वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं…’’

‘‘यस सर, मैं समझाता हूं सर.’’‘‘ठीक है …मैं वायरलैस पर तुम्हारे आखिरी संदेश का इंतजार करूंगा.’’‘‘यस सर.’’कैप्टन रंजीत सैल्यूट कर के बंकर से बाहर आ गया. बाहर सूबेदार राजू उस का इंतजार कर रहा है.‘‘सर, सभी जवान चलने के लिए तैयार हैं.’’

‘‘चलिए.’’कैप्टन रंजीत और सूबेदार राजू जवानों की ओर बढ़ जाते हैं. अपने अफसरों को आते देख सभी जवान लाइन से खड़े हो जाते हैं. एक बार सभी के चेहरों को गौर से देखने के बाद कैप्टन रंजीत ने कहा, ‘‘एड्युडेंट साहब के साथ आज कौन से 2 जवान रैकी पर गए थे?’’

‘‘मैं नायक मुहम्मद अली… सर.’’‘‘और मैं सिपाही सुजान सिंह… सर.’’‘‘आप दोनों हमें यह बताएं कि रास्ते में जो नाला पड़ता है, वह तैर कर पार किया जा सकता है या नहीं?’’

‘‘सर, इस संबंध में मेरा एक सु?ाव है,’’ नायक मुहम्मद अली ने कहा.‘‘कहो…’’‘‘आई स्कैच के मुताबिक, जहां से नाले को पार करने के लिए एड्युडेंट साहब ने मार्क किया है, वहां आरपार 2 बड़ेबड़े पेड़ हैं.

अगर मेरी कमर से रस्सा बांध दिया जाएगा, तो मैं तैर कर पार जा सकूंगा. दोनों ओर से रस्सा बांध कर मंकी रोप को तैयार किया जा सकेगा.’’‘‘शाबाश नायक अली. तुम्हारी स्विमिंग चैंपियनशिप किस दिन काम आएगी…’’

कैप्टन रंजीत ने कहना शुरू किया, ‘‘मेरे बहादुर जवानो, चलने से पहले जो आखिरी बात मैं आप लोगों से कहना चाहता हूं, वह बहुत खास है. हो सकता है कि इस हमले में दुश्मन के ठिकाने को लेने के लिए हम सब को अपनी जान देनी पड़े.’’

‘‘कहो, नायक अली…’’‘‘मैं दुश्मन को बता दूंगा कि मैं भी पक्का हिंदुस्तानी हूं.’’‘‘और सिपाही ठाकरे?’’‘‘इतिहास गवाह है कि लड़ाई के मैदान में मराठों ने कभी पीठ नहीं दिखाई.’’‘‘और लांस नायक पिल्लै?’’‘‘मैं भी बता दूंगा कि मद्रासी डरपोक नहीं होते.’’

‘‘और सिपाही सुजान सिंह?’’‘‘आज सुजान सिंह अपने दुश्मन पर कहर बन के गिरेगा.’’‘‘शाबाश… आज मेरे साथ पूरा हिंदुस्तान है. जिस देश में आप जैसे बहादुर जवान हैं, उस का कोई बाल बांका नहीं कर सकता…’’

कैप्टन रंजीत ने कहा, ‘‘हम सब नाला पार करने तक इकट्ठे जाएंगे. उस के बाद 2 पार्टियां बनेंगी. 6 जवान मेरे साथ रह कर आगे बढ़ेंगे और 6 जवान सूबेदार राजू के साथ.‘‘और एक बात का ध्यान रहे, सभी जवान मेरे हुक्म के बिना कोई कार्यवाही नहीं करेंगे.

नाला पार करने के बाद आगे के आदेश मिलेंगे… सभी जवान अपनेअपने हथियारों का अच्छी तरह निरीक्षण कर लें. संगीनें चढ़ा लें.’’चलते समय कैप्टन रंजीत ने अपने छोटे से वायरलैस सैट को चैक किया और सभी अपने मकसद की ओर बढ़ने लगे.

मंकी रोप से एकएक कर सभी ने चुपचाप भयानक बरसाती नाला पार कर लिया.कैप्टन रंजीत ने घड़ी की ओर देखा. रात के 3 बजे थे. उन के पास एक घंटा बाकी था.

कर्नल साहब को प्रोसीड सिगनल देने के बाद कैप्टन रंजीत ने जवानों को लाइन फोरमेशन में चलने का संकेत किया. सभी जवान सम?ा गए कि कैप्टन साहब का फैसला उचित ही है कि 2 पार्टियों में बंटने के बजाय इकट्ठा लाइन फोरमेशन में चलना चाहिए, क्योंकि ऊंचाई पर जा कर जगह छोटी हो गई थी.

दुश्मन को दोनों ओर से घेरने का कोई मतलब नहीं था, वह खुद ही तीनों ओर से घिर जाएगा.रास्ता बहुत ही बीहड़ था. कांटेदार झाडि़यों के बीच से गुजरते कैप्टन रंजीत और उस के जवानों के शरीर घायल होते जा रहे थे, परंतु फिर भी वे अपने टारगेट की ओर बढ़ते जा रहे थे… चुपचाप. सुबह 4 बजे के करीब वे अपने टारगेट से केवल 50 गज दूर रह गए.

तभी कैप्टन रंजीत ने अपने जवानों को ठहरने का आदेश दिया और वे खुद थोड़ा पीछे हट कर वायरलैस सैट से उलझ गए. उन की आवाज बहुत ही धीमी थी.‘‘हैलो टाइगर… हैलो टाइगर… ओवर.’’‘‘यस टाइगर स्पीकिंग… ओवर.’’‘‘सर, हम टारगेट से केवल 50 गज पीछे हैं.

लगता है, दुश्मन को अभी तक हमारे आने का पता नहीं है. मैं फायर करने जा रहा हूं सर. मुझे यकीन है कि हम उन पर जल्दी ही काबू पा लेंगे.’’‘‘ओके प्रोसीड. यहां से ठीक आधा घंटे बाद रैजीमैंट मूव करेगी. उस से पहले ही… ओवर.’’‘‘राइट सर… ओवर.

’’कैप्टन रंजीत ने सैट बंद कर दिया और सभी जवानों को और फैल जाने का संकेत किया, जिस से दुश्मन के भागने के एकमात्र रास्ते को पूरी तरह रोका जा सके, क्योंकि वह जानता है आगे 2 सौ फुट नीचे सड़क है.

दुश्मन अगर उस ओर भागता है, तो यह आत्महत्या करने के समान होगा और पीछे वे बैठे हैं.उस ने जवानों को संकेत द्वारा सम?ा दिया कि जैसे ही उस की कारबाइन मशीन से गोलियां निकलें, वे फायर शुरू कर दें.

थोड़ी देर बाद कैप्टन रंजीत की कारबाइन आग उगल रही थी. साथ ही, उन के साथी जवानों की राइफलें भी गूंज उठीं. एकाएक हुए हमले से दुश्मन हड़बड़ा गया. वह पीछे की ओर भागा.

तब कैप्टन रंजीत और उन के साथियों ने उन को संगीनों पर ले लिया.‘चार्ज…’ ‘घोंप…’ ‘निकाल’ की आवाजों के साथ ही ‘भारत माता की जय’ के नारों से पूरा आसमान गूंज उठा.

कैप्टन रंजीत के साथी शहीद होते चले गए. खुद भी दुश्मन की एक गोली से जख्मी हो गए. उन्होंने अपने कर्नल साहब को आखिरी संदेश दिया, ‘‘सर…सर, मां के आशीर्वाद से हम जीत गए हैं.

मेरे एकएक वीर जवान ने दुश्मनों पर कहर ढाया है, फिर वे शहीद हुए. पर…पर, सर, मैं अभी भी देख रहा हूं, 2 दुश्मन मेरी ओर बढ़ रहे हैं. जख्मी होने पर भी मैं उन के लिए काफी हूं.

‘‘सर, आप बेधड़क हो कर रैजीमैंट को मूव करें. अच्छा …अलविदा, सर. जयहिंद.’’‘जयहिंद कैप्टन…’कैप्टन रंजीत को लगा कर्नल साहब का गला भर आया है. उस ने सैट बंद किया और एक कंटीली झाड़ी की आड़ में मोरचा संभाल लिया. दुश्मन ने भी उसे देख लिया था. दोनों ओर से तड़ातड़ गोलियां चलीं और फिर चारों ओर शांति छा गई. Hindi Family Story

Hindi Family Story: सिरमौर – एक दलित की पुकार

Hindi Family Story: ‘‘अरे भगेलुआ, कहां हो? जरा झोंपड़ी से बाहर तो निकलो. देखो, तुम्हारे दरवाजे पर बाबू सूबेदार सिंह खड़े हैं. तुम्हारी मेहरी इस पंचायत की मुखिया क्या बन गई है, तुम लोगों के मिलने और बात करने का सलीका ही बदल गया है,’’ लहलादपुर ग्राम पंचायत के मुखिया रह चुके बाबू सूबेदार सिंह के साथ खड़े उन के मुंशी सुरेंद्र लाल ने दलित मुखिया रमरतिया देवी के पति भगेलुआ को हड़काया.

मुंशी सुरेंद्र लाल की आवाज सुन कर भगेलुआ अपनी झोंपड़ी से बाहर निकला. सामने बाबू सूबेदार सिंह को खड़ा देख कर वह अचानक हकबका गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि उन का किस तरह से स्वागत करे, लेकिन दूसरे ही पल उस का मन नफरत से भर उठा.

जब पेट में लगी भूख की आग को शांत करने के लिए भगेलुआ बाबू सूबेदार सिंह के यहां काम मांगने जाता था, तो घंटों खड़े रहने के बाद उन से मुलाकात होती थी.

काम मिल जाता था, तो कई दिनों तक बेगारी करनी पड़ती थी. तब कहीं जा कर उसे मजदूरी मिलती थी.

कभीकभी माली तंगी की वजह से वह बाबू सूबेदार सिंह से कर्ज भी लेता था. कर्ज के लिए बाबू साहब से कहीं ज्यादा उसे मुंशी सुरेंद्र लाल की तेल मालिश करनी पड़ती थी.

10 रुपए सैकड़ा के हिसाब से सूद व सलामी काट कर मुंशी महज 80 रुपए उस के हाथ में देता था.

अपनी ओर भगेलुआ को टुकुरटुकुर ताकते देख कर बाबू सूबेदार सिंह ने उसे टोका, ‘‘इतनी जल्दी अपने बाबू साहब को भुला दिया क्या? अब तो पहचानने में भी देर कर रहा है.’’

‘‘मालिक, हम आप को कैसे भुला सकते हैं? आप ही तो हमारे पुरखों के अन्नदाता हैं. इस दलित के दरवाजे पर आने की तकलीफ क्यों की. भगेलुआ की जरूरत थी, तो किसी से खबर भिजवा दी होती, हम आप की हवेली पर पहुंच जाते.

‘‘हमारे लिए तो आप ही मुखिया हैं. लेकिन पता नहीं ससुरी इस सरकार को क्या सू?ा कि इस पंचायत को हरिजन महिला कोटे में डाल दिया.

‘‘और गजब तो तब हुआ, जब यहां की जनता की चाहत ने रमरतिया को मुखिया बना दिया,’’ भगेलुआ के मन में जो आया, वह एक ही सांस में बक गया.

‘‘जमाना बदल गया है भगेलुआ,’’ बाबू सूबेदार सिंह ने लंबी सांस खींचते हुए कहा.

‘‘जमाना बदल गया तो क्या हुआ मालिक, हम तो नहीं बदले हैं. हम तो आज भी आप के हरवाहे हैं. लेकिन ट्रैक्टर आ जाने से हमारे जैसे लोगों की रोजीरोटी छिन गई है.

‘‘खैर, जाने दीजिए. यह बताइए कि इतने दिनों बाद भगेलुआ की याद कैसे आ गई?’’

‘‘इधर से गुजर रहा था तो सोचा कि तुम से थोड़ा मिलता चलूं,’’ बाबू सूबेदार सिंह ने मन को मारते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं मालिक, यह तो आप ही का घर है. हम तो आज भी खुद को आप की प्रजा सम?ाते हैं. अगर कोई भूलचूक हो गई हो, तो माफ करना,’’ दोनों हाथ जोड़ कर भगेलुआ ने बाबू सूबेदार सिंह से कहा और दूसरे ही पल अपनी पत्नी रमरतिया को आवाज लगाई, ‘‘कहां हो रमरतिया, जल्दी ?ोंपड़ी से बाहर निकलो. आज हमारे दरवाजे पर बाबू सूबेदार साहब आए हैं.’’

‘‘आ रही हूं,’’ झोंपड़ी से निकलती रमरतिया की नजर जैसे ही सामने खड़े मुंशी सुरेंद्र लाल व बाबू सूबेदार सिंह पर पड़ी, उस ने अपना पल्ला माथे से थोड़ा सा नीचे सरका लिया और बोल पड़ी, ‘‘पांव लागूं महाराज. आइए, कुरसी पर बैठ जाइए.’’

झोंपड़ी के सामने रखी कुरसी झड़पोंछ कर रमरतिया भीतर चली गई.

जब रमरतिया को मुखिया का पद मिला था, तभी वह बाबू साहब से मुखिया का चार्ज लेने के लिए गई थी. ठीक 2 साल के बाद उस की यह उन से दूसरी मुलाकात थी.

वैसे तो रमरतिया और पूरे दलित तबके का बाबू साहब की हवेली से पुराना संबंध था. कहीं काम मिले न मिले, वहां तो कुछ न कुछ काम मिल ही जाता था. लेकिन रमरतिया के मुखिया बनने के बाद अब कहीं दूसरे के यहां काम करने की नौबत ही नहीं आई.

पंचायत की योजनाओं से ही उसे फुरसत नहीं मिलती थी. कोई न कोई समस्या ले कर उस को घेरे रहता था. लाल कार्ड, पीला कार्ड, जाति, आय, आवासीय प्रमाणपत्र, बुढ़ापा पैंशन, विधवा पेंशन, पारिवारिक कामों के अलावा मनरेगा के काम भी रमरतिया को ही देखने पड़ते थे.

वहीं जब बाबू सूबेदार सिंह मुखिया थे, तब दलितों, पिछड़ों को सीधे उन से मिल लेने की हिम्मत नहीं होती थी. वे उन के दरवाजे पर घंटों खड़े रहते थे. जब कोई बिचौलिया आता, तो उन का काम करवाता, नहीं तो वे कईकई दिनों तक सिर्फ चक्कर लगाया करते थे.

लेकिन रमरतिया के मुखिया बनते ही पंचायत की सभी जातियों का मानसम्मान बराबर हो गया था. सब का काम बिना मुश्किल के होता था.

रमरतिया जिला परिषद की बैठक में भी जाती, तो वहां सीधे कलक्टर साहब, ब्लौक प्रमुख, बीडीओ से अपनी पंचायत की समस्याओं पर बात करती. इंदिरा आवास, आंगनबाड़ी, पोषाहार, स्कूलों के मिड डे मील वगैरह के मामलों में वह अफसरों का ध्यान खींचती थी. जबकि बाबू साहब के समय में पता ही नहीं चलता था कि गांव वालों के लिए कौनकौन सी योजनाएं आई हैं.

मुखिया, पंचायत सेवक, प्रखंड विकास पदाधिकारी की मिलीभगत से सभी योजनाएं कागजों में सिमट कर रह जाती थीं.

योजनाओं की रकम अफसर डकार जाते थे. पूरे जिले के सभी महकमों में काफी भ्रष्टाचार था. दबंगों के डर से लोग डरेसहमे रहते थे. अगर कोई शिकायत करता भी था, तो दबंगों की शह पर बिचौलिए ही उस की जम कर पिटाई कर देते थे.

ऐसी बात नहीं थी कि रमरतिया के मुखिया बन जाने के बाद से भ्रष्टाचार खत्म हो गया था. फर्क यही था कि योजनाएं अब अमल में लाई जा रही थीं. घूस लेने के बाद बाबू व अफसर लोगों का काम करते थे. यही वजह थी कि हर गांव में नया प्राइमरी स्कूल, उपस्वास्थ्य केंद्र, राशन की दुकान, आंगनबाड़ी केंद्र वगैरह खुल गए थे.

औरतों और किसानों को माली तौर पर मजबूत बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह भी बनाए गए थे. मछली पालन, बकरी पालन, सूअर पालन, भेड़ पालन, मुरगी पालन, डेरी फार्म वगैरह खुल गए थे.

इन सब कामों को करने का सेहरा मुखिया रमरतिया के सिर पर बंधता था. जब रमरतिया को सूचना मिलती थी कि फलां गांव के किसी किसान की हालत अच्छी नहीं है. वह माली तंगी और बीमारी से जू?ा रहा है, तो वह तुरंत सारे काम छोड़ कर वहां पहुंच कर उस की समस्या दूर करती थी.

बाबू सूबेदार सिंह और मुंशी सुरेंद्र लाल को कुरसी पर बैठे हुए कुछ ही समय बीता होगा कि रमरतिया से मिलने के लिए गांव वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी.

?ोंपड़ी के आगे एक मेजकुरसी लगी हुई थी, जहां रमरतिया की 14 साला बेटी भगजोगनी कुरसी पर बैठी हुई थी. वह गांव वालों की अर्जी को ले कर सहेजती हुई मेज के ऊपर रखती जाती. वह मैट्रिक के इम्तिहान देने के बाद खाली समय में अपनी मां के कामों में हाथ बंटाती थी. भगजोगनी से एक साल छोटा भाई दीपू 9वीं जमात में पढ़ता था.

इसी बीच रमरतिया एक थाली में बिसकुट और चाय से भरे 2 गिलास ले कर बाबू साहब के सामने आई. साथ ही, उस ने थाली को बाबू साहब के सामने रखी मेज पर रख दिया.

थाली देखते ही वे दोनों एकसाथ यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि बिना नहाए वे एक दाना भी मुंह में डालना हराम सम?ाते हैं. उन के पीछेपीछे भगेलुआ भी कुछ दूर तक छोड़ने के लिए गया.

रमरतिया की बढ़ती लोकप्रियता से बाबू सूबेदार सिंह की छाती पर सांप लोट रहा था. उस की ?ोंपड़ी के सामने उमड़ी गांव वालों की भीड़ ने उन का चैन छीन लिया था.

गांवों में बोरिंग करने पर सरकार ने रोक लगा दी थी, ताकि धरती के नीचे पानी का लैवल और नीचे न जा सके. तब रमरतिया ने गांव के पास से गुजरने वाली गंडक नहर में सरकारी मोटर पंप का इंतजाम करवाया. पंप से ले कर खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए नालियां बनवाईं. साथ ही, ऊंचे उठे हुए खेतों में सिंचाई का पानी पहुंचाने के लिए हजारों मीटर लंबे प्लास्टिक, कपड़े वगैरह के पाइप का जुगाड़ करवाया.

इतना ही नहीं, गंडक नहर से खेतों की नालियों को जोड़ा गया. सिंचाई की अच्छी व्यवस्था होने से लहलादपुर ग्राम पंचायत की फसलें लहलहा उठीं.

प्रखंड स्तरीय बैठक में बीडीओ और मुखिया प्रमुख ने रमरतिया की इस कोशिश की जोरदार ढंग से तारीफ की. दूसरी पंचायतों में भी यह सुविधा बहाल की गई, ताकि सभी किसान खुशहाल हो सकें.

रमरतिया धीरेधीरे इतनी लोकप्रिय हो गई कि गांवों में होने वाले शादीब्याह में उसे लोग बुलाना नहीं भूलते थे. बाबू सूबेदार सिंह जिस समारोह में पहुंचते, वहां पहले से बैठी हुई रमरतिया मिल जाती. उस की मौजूदगी से उन्हें ऐसा लगता कि जैसे उन के सामने दुम हिलाने वाले लोग आज खुद सिरमौर बन गए हैं.

राज्य सरकार ने मुखिया के जरीए सभी पंचायतों में टीचरों की बहाली का ऐलान किया था. इस ऐलान के बाद से गांवों के बेरोजगारों में नौकरी के लिए होड़ मच गई थी.

सभी के परिवार वाले पंचायत के मुखिया से अपनेअपने बेटेबेटी की नौकरी लगाने की सिफारिश में जुट गए थे. बाबू सूबेदार सिंह भी इसी सिलसिले में भगेलुआ के यहां पहुंचे थे, लेकिन भीड़ को देख कर वे कुछ बोल नहीं सके थे.

अब पीछेपीछे चल रहे भगेलुआ से उन्होंने कहा, ‘‘सुना है कि मेरी हवेली के पीछे वाले स्कूल में टीचर की बहाली है. मैं अपने बेटे प्रीतम सिंह को वहां रखवाना चाहता हूं.’’

भगेलुआ के चेहरे का रंग उड़ गया. वह कुछ बोल नहीं सका, क्योंकि उस स्कूल के लिए 25 बेरोजगारों की अर्जी पहले ही पड़ चुकी थी. ऊपर से बाबू साहब अपने लड़के को अलग से थोप रहे थे.

भगेलुआ को गुमसुम देख कर बाबू साहब ने उसे टोका, ‘‘रंग क्यों उड़ गया भगेलुआ? कुछ तो बोलो?’’

‘‘नहीं मालिक, रंग क्यों उड़ेगा. इस के बारे में रमरतिया से पूछना होगा.’’

‘‘अरे, रमरतिया तेरी पत्नी है. तेरी बात नहीं मानेगी, तो फिर किस की

बात मानेगी. एक लाख रुपए ले लो और चुपचाप प्रीतम सिंह की बहाली करा दो. कोई कानोंकान इस बात को नहीं जान सकेगा,’’ सूबेदार सिंह ने रुपए की गरमी का एहसास भगेलुआ को कराना चाहा.

‘‘नहीं… नहीं… आप से हम रुपयापैसा नहीं लेंगे.’’

‘‘तो ठीक है, तुम ही बताओ कि क्या लोगे? उसे हम पूरा करेंगे. बेटे की जिंदगी का सवाल है. आजकल ढूंढ़ने से भगवान तो मिल जाएंगे, पर सरकारी नौकरी नहीं.’’

‘‘मालिक, अगर कुछ देना ही है, तो तार गाछ वाली जमीन दे दीजिए. वह हमारे पुरखों की जमीन है. आप की मेहरबानी हो, तो उस जमीन पर हम घर बनाएंगे,’’ भगेलुआ ने हिम्मत जुटा कर अपने मन की बात रख दी.

‘‘क्या बात करते हो भगेलुआ, वह बैनामा जमीन है, वह भी बिलकुल मेन रोड के किनारे. उस की कीमत आज के भाव से 10 लाख रुपए से ज्यादा है. मैं उसे कैसे दे सकता हूं.

‘‘उस जमीन को मैं ने तेरे बाप से 3 हजार रुपए में खरीदा था. तुम इस तरह की सौदेबाजी पर उतर आओगे, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था.

‘‘मैं तो रमरतिया की ईमानदारी का किस्सा सुन कर आ गया था. लेकिन यहां आने पर हकीकत कुछ और ही दिखाई पड़ रही है. भोलीभाली जनता का हक मार कर तुम लोग जल्दी अमीर बनने की जुगत में हो. इस की शिकायत मैं डीसी साहब से करूंगा. तुम लोगों का कच्चा चिट्ठा खोल के रख दूंगा,’’ बाबू सूबेदार सिंह गुस्से में फट पड़े.

‘‘नाराज हो गए मालिक. सच तो आखिर सच ही होता है. थोड़ी देर पहले आप ही ने तो कहा था कि जमाना बदल गया है. इस का मतलब हुआ कि पहले से शोषित, पीडि़त जनता अब जागरूक हो गई है. उसे अपने हक की जानकारी हो गई है.

‘‘आज की जनता किसी तरह का ठोस कदम उठाने से पहले सोचती है. मेरे बाप ने अपना परिवार पालने के लिए खानदानी जमीन को बेच दिया था. आप ने बैनामा सिर्फ मेरे बाप से कराया है, जबकि वे 4 भाई हैं. 3 छोटे भाइयों से बैनामा कराना अभी बाकी है.

‘‘उस खेत पर उन का भी हक है. आप किसी वकील से पूछ सकते हैं कि दादा के मरने के बाद उन के 4 बेटों का हिस्सा उस जमीन में होगा या नहीं…’’

‘‘चुप रहो भगेलुआ, बहुत हो गया…’’ बाबू सूबेदार सिंह के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई, तो गुस्से

में वे बोल पड़े, ‘‘मेरी जमीन पर तेरे चाचा लोग दावा ठोंकेंगे. एकएक को देख लूंगा.

‘‘चाहे दीवानी लड़ो या फौजदारी, जीत सिर्फ मेरी होगी, मेरी. तुम्हारा यह छल और बल बाबू सूबेदार सिंह के सामने चलने वाला नहीं है.’’

‘‘छल और बल. हमारे पास कहां से आ गया मालिक. यह हथियार तो आप की हवेली का है. दलितों, पीडि़तों को तो इंसाफ पर भरोसा है. हम अपने हक के लिए लड़ना जानते हैं. नाइंसाफी और जोरजुल्म जब छप्पर पर चढ़ कर बोलने लगता है, तो हम गरीबों का एकमात्र लाठी इंकलाब बनता है.

‘‘इस भरम में नहीं रहना कि जीत केवल हवेली की होगी. जो ?ाक कर चलना जानते हैं, वे सिर उठा कर दूसरों का सिर कलम करना भी जानते हैं…

यह हम ने आप जैसों से ही सीखा है,’’ भगेलुआ बोला.

‘‘चलिए मुंशीजी, चलिए. भगेलुआ पगला गया है…’’ हाथी के पैर के नीचे कुचले हुए सांप की तरह रेंगते हुए बाबू सूबेदार सिंह वहां से भागे.

भगेलुआ के चेहरे पर कुटिल मुसकान तैर गई थी. जिंदगी के जंगेमैदान में हमेशा मुंह की खाने वाला भगेलुआ आज जीत जो गया था. Hindi Family Story

Hindi Story: सही राह – कालू की दादागीरी

Hindi Story: मोहल्ले के लोग कालू उस्ताद के नाम से कांपते थे. कालू का जब मन होता था, वह किसी की दुकान से कुछ भी उठा लेता था. दुकानदारों के मन में डर था. कौन जाए कालू उस्ताद से भिड़ने, कहीं कुछ चला दे तो जान चुकानी पड़ेगी. इसलिए कोई उस का विरोध नहीं करता था.

लेकिन ऐसा कितने दिनों तक चलता. एक दिन कालू एक सब्जी वाले से जबरदस्ती पैसे हड़प रहा था. सब्जी वाला आनाकानी कर रहा था. इस से कालू चिढ़ गया और उस की पिटाई करने लगा.

‘‘मुझ से उलझता है. ठहर, तुझे अभी ठीक करता हूं,’’ कह कर वह उस पर पिल पड़ा.

मगर, तभी किसी के मजबूत हाथों ने उसे रोक लिया.

कालू ने मुड़ कर देखा, सामने मेजर अंकल थे. उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों पीट रहे हो बेचारे को?’’

मेजर अंकल हालांकि उम्र में 50 से ज्यादा ही थे, लेकिन अब भी वे काफी ताकतवर थे. उन की आवाज में रोब था.

कालू के हाथ थम गए. वह वहां से जाने को हुआ. मेजर अंकल बोलने लगे, ‘‘कमजोरों को मारने में कोई महानता नहीं है. हिम्मत है, तो देश के दुश्मनों से लड़ो…’’

आसपास के लोगों का जमाव बढ़ने लगा. सभी को हैरानी हो रही थी कि आखिर मेजर अंकल क्यों कालू जैसे खतरनाक आदमी से उलझ गए. कालू उस समय तो आंखें तरेरते हुए वहां से चला गया. लोगों ने मेजर अंकल को समझाया कि वे सावधान रहें, कहीं कालू उन से बदला लेने न आ जाए.

उस रात कालू ठीक से सो न पाया. रहरह कर उस के कानों में मेजर अंकल के शब्द गूंज रहे थे. वह सुबह ही उठा और उन के घर की ओर चल पड़ा.

मेजर अंकल उस समय बगीचे की सफाई कर रहे थे. उन को इस शहर में आए अभी महीनाभर ही हुआ था. वे अकेले ही रहते थे.

पहले तो वे कालू को देख कर चौंके, फिर सामान्य हो कर पूछा, ‘‘क्या मुझे मारने आए हो?’’

कालू बुत बना खड़ा रहा. नजरें नीचे करते हुए वह बोला, ‘‘नहीं, कुछ बातें करनी हैं.’’

कालू को खुद हैरानी हो रही थी कि वह मेजर अंकल के सामने बदल कैसे गया. दोनों में बातचीत होने लगी.

‘‘घर के लोग कहां रहते हैं?’’

कालू के इस सवाल को सुनते ही मेजर अंकल फफक पड़े. वे बोले कि उन का बेटा सीमा पर हुई गोलाबारी में शहीद हो गया और सालभर पहले एक कार हादसे में घर के बाकी सदस्य मारे गए. पर उन्हें अपने बेटे की मौत पर कभी अफसोस नहीं हुआ, बल्कि उस पर गर्व है.

मेजर अंकल ने जब उसे फौजियों के बारे में बताया, तो कालू की जिज्ञासा बढ़ गई. उस ने मेजर अंकल से पूछा, ‘‘क्या मैं भी फौज में भरती हो सकता हूं?

‘‘हांहां, तुम बहादुर तो हो ही. दुश्मनों से लड़ने के लिए तुम जैसों की ही जरूरत है,’’ मेजर अंकल बोले.

कालू का सपना जल्द ही पूरा हो गया. सेना में उस का चयन हो गया.

उस की ट्रेनिंग कई जगहों पर हुई और सभी में उस का प्रदर्शन अच्छा रहा. पहले तो वह मेजर अंकल को हर हफ्ते चिट्ठी लिखता था, लेकिन बाद में यह सिलसिला भी खत्म हो गया. सालभर से वह अपने महल्ले में नहीं आया था.

सीमा पर घुसपैठियों के अचानक हमले से देश पर मुसीबत आ पड़ी. ऐसे में कई जांबाज फौजियों का चयन हुआ, जो कि घुसपैठियों को मार गिराएं. उन में कालू को भी शामिल किया गया.

सीमा पर खराब मौसम के चलते भारतीय जवानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था, पर उन के हौसले बुलंद थे. कालू के दल ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर एक चौकी पर अपना कब्जा जमा लिया. पर रात के अंधेरे में दुश्मनों ने उन पर फिर हमला किया.

उस के बाद से इस दल के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. टीवी, रेडियो, समाचारपत्रों वगैरह में अकसर कालू और उस के साथियों की तसवीरें छपतीं कि ये लोग लापता हो गए हैं और शायद दुश्मनों की गिरफ्त में हैं.

महल्ले वालों ने जब कालू की तसवीरें देखीं, तो वे उसे पहचान गए.

‘‘अरे, ये तो अपना कालू है,’’ उस का पुराना दोस्त असलम बोला.

‘‘हां, पता नहीं बेचारा किस हाल में होगा?’’ बूढ़ी दादी सिर पर हाथ रखते हुए बोलीं. मेजर अंकल भी कालू के लिए परेशान थे.

जब हफ्तेभर तक उन लोगों की कोई खबर नहीं मिली, तो उन्हें मरा मान लिया गया. महल्ले वालों को बहुत दुख हुआ.

10वें दिन एक पहाड़ी चौकी पर एक फौजी बेहोशी की हालत में पाया गया. भारतीय जवान उसे पहचान गए, वह कालू ही था. उसे तुरंत अस्पताल भेजा गया.

कालू जैसे ही होश में आया, उस ने अफसरों को बताया कि वह इतने दिनों तक दुश्मनों की गिरफ्त में रहा. उस के अन्य साथी तो बच नहीं पाए, पर वह कैसे भी कर, उन के कब्जे से बच निकला और यहां तक आ गया.

कालू ने दुश्मनों के हमले की कई जानकारियां भी दीं. इस से भारतीय सेना सतर्क हो गई और उन्होंने घुसपैठियों की साजिश को नाकाम कर दिया.

कालू के जिंदा होने की सूचना अगले दिन अखबारों, टीवी में छा गई. कालू के चलते ही सेना ने कई खास ठिकानों पर फिर से अपना कब्जा कर लिया.

कालू जब पूरी तरह से ठीक हुआ, तो वह अपने महल्ले में सब से मिलने आया. पूरा महल्ला फूलमाला लिए उस के स्वागत को तैयार था.

पर कालू की नजरें मेजर अंकल को खोज रही थीं. जब वे उस से मिलने आए, तो वह उन के पैरों पर गिर पड़ा. वह बोला, ‘‘अगर उस दिन आप ने मुझे सही राह न दिखाई होती, तो अब तक मैं भटकता ही रहता. अब मैं अपने साथियों को भी देशसेवा के लिए प्रेरित करूंगा.’’ मेजर अंकल की आंखें नम हो गईं. उन्होंने उसे गले से लगा लिया. Hindi Story

Best Hindi Kahani: दागी कंगन – कालगर्ल मुन्नी की दास्तान

Best Hindi Kahani: ‘‘मुन्नी, तुम यहां पर कैसे?’’ ये शब्द कान में पड़ते ही मुन्नी ने अपनी गहरी काजल भरी निगाहों से उस शख्स को गौर से देखा और अचानक ही उस के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘निहाल भैया…’’

वह शख्स हामी भरते हुए बोला, ‘‘हां, मैं निहाल.’’

‘‘लेकिन भैया, आप यहां कैसे?’’

‘‘यही सवाल तो मैं तुम से पूछ रहा हूं कि मुन्नी तुम यहां कैसे?’’

अपनी आंखों में आए आंसुओं के सैलाब को रोकते हुए मुन्नी, जिस का असली नाम मेनका था, बोली, ‘‘जाने दीजिए भैया, क्या करेंगे आप जान कर. चलिए, मैं आप को किसी और लड़की से मिलवा देती हूं. मुझ से तो आप के लिए यह काम नहीं होगा.’’

‘‘नहीं मुन्नी, मैं हकीकत जाने बगैर यहां से नहीं जाऊंगा. आखिर तुम यहां आई कैसे? तुम्हें मालूम है कि तुम्हारा भाई राकेश और तुम्हारे मम्मीपापा कितने दुखी हैं?

‘‘वे सब तुम्हें ढूंढ़ढूंढ़ कर हार गए हैं. पुलिस में रिपोर्ट की, जगहजगह के अखबारों में तुम्हारी गुमशुदगी के बारे में खबर दी, लेकिन तुम्हारा कुछ पता ही नहीं चला.

‘‘और आज… जब इतने बरसों बाद तुम मिली, तो इन हालात में… एक कालगर्ल के रूप में.

‘‘मुन्नी, सचसच बताओ, तुम यहां कैसे पहुंची. हमें तो लगा कि तुम प्रकाश, वह तुम्हारा प्रेमी, के साथ भाग गई?थी.

‘‘कितनी पूछताछ की राकेश ने उस से तुम्हारे लिए, लेकिन वह तो कुछ दिनों के लिए खुद ही नदारद था.’’

‘‘आप ठीक कहते हैं निहाल भैया, लेकिन अब सच जान कर भी क्या फायदा सब मेरी ही तो गलती है, सो सजा भुगत रही हूं.’’

‘‘नहीं मुन्नी, ऐसा मत कहो. तुम मुझे सच बताओ.’’

मुन्नी कहने लगी, ‘‘भैया, आप ने जो सुना था, सच ही था. मैं और प्रकाश एकदूसरे को प्यार करते थे. वह मेरे कालेज का दोस्त था. आप को याद होगा कि हम दोनों कालेज से एक फील्ड ट्रिप के लिए शहर से बाहर गए थे. वहीं पर हमारे मन में प्यार के अंकुर फूटे और धीरेधीरे हमारा प्यार परवान चढ़ गया था.

‘‘कालेज की पढ़ाई पूरी होतेहोते हमा घर में मेरी सगाई की बातें चलने लगी थीं. मैं ने पापामम्मी को जैसे ही प्रकाश के बारे में बताया, वे आगबबूला हो उठे. मुझे लगा कि कहीं वे लोग मेरी शादी जबरदस्ती किसी और से न करा दें. सो, मैं ने सारी बात प्रकाश को बताई.

‘‘प्रकाश ने मुझे भरोसा दिलाया और कहा, ‘मेनका, ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं किसी भी कीमत पर तुम्हें अपने से अलग नहीं होने दूंगा. बस, तुम मुझ पर?भरोसा रखो.’

‘‘मुझे उस पर पूरा भरोसा था. अब मैं घर में होने वाली हर बात उसे बताने लगी थी. और जैसे ही मुझे लगा कि पापामम्मी मेरी मरजी के खिलाफ शादी तय करने जा रहे हैं, मैं ने प्रकाश को सब बता दिया.

‘‘उसी शाम वह मुझ से मिला. मैं खूब रोई और बोली, ‘मुझे कहीं भगाकर ले चलो प्रकाश, वरना मैं किसी और की हो जाऊंगी और हम हमेशा के लए बिछड़ जाएंगे.’

‘‘प्रकाश ने कहा, ‘मैं अपने घर में बात करता हूं मेनका, तुम बिलकुल चिंता मत करो.’

‘‘अगले ही दिन प्रकाश मेरे लिए अपनी मम्मी के दिए कंगन ले कर आया और बड़े ही अपनेपन से बोला, ‘मेनका, यह मां का आशीर्वाद है हमारे लिए. वे तो तुम्हें बहू बनाने के लिए राजी हैं, पर पिताजी नहीं मान रहे?हैं. सो, हम दोनों घर से भाग जाते?हैं.’

‘‘मैं ने पूछा, ‘लेकिन, हम भाग कर जाएंगे कहां?’

‘‘वह बोला, ‘वैसे तो हमारे पास कोई ठिकाना नहीं है, लेकिन वाराणसी में मेरा एक दोस्त रहता है. मैं ने उस से बात की है. वह वहां नौकरी करता है. हम उसी के पास चलेंगे. वह अपनी ही कंपनी में मेरे लिए नौकरी का इंतजाम भी कर देगा.’

‘‘प्रकाश ने यह भी समझाया, ‘हम वहां रजिस्टर्ड शादी कर लेंगे और फिर अपने घर का इंतजाम भी वहीं कर लेंगे. शायद कुछ समय में हमारे मम्मीपापा भी इस शादी को रजामंदी दे दें.’

‘‘मुझे उस की बातों में सचाई नजर आई और मैं ने उस के साथ भाग जाने का फैसला कर लिया.

‘‘अगले ही दिन मैं घर से कुछ कपड़े व रुपए ले कर रेलवे स्टेशन पहुंच गई.

‘‘हम दोनों प्रकाश के दोस्त के घर पहुंचे और वहां 2 दिन में ही प्रकाश ने नौकरी शुरू कर दी.

‘‘5 दिन बाद उस का दोस्त मुझ से बोला, ‘भाभी, प्रकाश ने आप को बाहर कहीं बुलाया है. आप तैयार हो जाइए. मैं आप को वहां ले चलता हूं.’

‘‘एक बार तो मुझे लगा कि प्रकाश ने मुझे क्यों नहीं बताया, पर अगले ही पल मैं उस के दोस्त के साथ चली गई. मैं जहां पहुंची, वहां प्रकाश पहले से ही मौजूद था.

‘‘उस ने मुझे एक आंटी से मिलवाया और बोला, ‘जिस कंपनी में मैं काम करता हूं, ये उस की मालकिन हैं.’

‘‘वे आंटी भी मुझ से बड़े प्यार से मिलीं. कुछ देर बाद प्रकाश बोला, ‘मेनका, मैं कुछ देर के लिए बाहर हो कर आता हूं, तब तक तुम यहीं रहो.’

‘‘एक बार को मुझे घबराहट हुई, पर आंटी की प्यार भरी छुअन में मुझे मां का रूप नजर आया, सो मैं वहां रुक गई. उस के बाद मेरी जिंदगी में जैसे तूफान आ गया. मुझे एक ही रात में समझ आ गया कि प्रकाश मुझे थोड़े से रुपयों के लालच में उन आंटी के हाथों बेच गया था.

‘‘अब हर रात अलगअलग तरह के ग्राहक आने लगे. मैं ने आंटी के खूब हाथपैर जोड़े और रोरो कर कहा, ‘आंटी प्लीज मुझे जाने दीजिए, मैं भले घर की लड़की हूं. मेरे मम्मीपापा, भाई क्या सोचेंगे मेरे बारे में.’

‘‘लेकिन, आंटी ने मेरी एक न सुनी. पहले 2 लड़कों ने मेरा बलात्कार किया और मुझे कई दिन तक भूखा रखा गया. जब मैं मानी, तब खाना दिया गया और इलाज भी कराया गया. सब लड़कियों ने कहा कि इन की बात मान जाओ, क्योंकि बाहर तो अब कोई अपनाएगा ही नहीं. मैं रोज सजधज कर तैयार होने लगी.

‘‘लेकिन, मुझे बारबार अपने किए पर पछतावा होता. एक बार वहां से भागने की कोशिश भी की, पर पकड़ी गई. उस रात आंटी ने मेरी खूब पिटाई की और उन के दलाल भूखे भेडि़यों की तरह मेरे ऊपर टूट पड़े.

‘‘वहां की एक लड़की प्रिया ने मुझे समझाया, ‘मेनका, अब तुम्हारे पास इस नरक से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं?है. तुम्हारे साथ कितनी बार तो आंटी के आदमियों ने गैंगरेप किया, तुम्हें क्या हासिल हुआ? इस से तो ग्राहकों की भूख मिटाओगी, कम से कम पैसे तो मिलेंगे. समझौता करने में ही समझदारी है.’

‘‘उस समय मुझे प्रिया की बात ठीक ही लगी और मैं ने अपनेआप को आंटी को सौंप दिया. आंटी बहुत खुश हुईं और मुझे प्यार से रखने लगीं. बस, तब से मेरी ग्राहक को पटाने की ट्रेनिंग शुरू हुई.

‘मुझे दूसरी औरतों के साथ रात के समय सजधज कर भेज दिया जाता. सड़क के किनारे खड़ी हो कर दूसरी लड़कियां अपनी अदाओं से आतेजाते मर्दों को रिझातीं. मैं उन्हें देख कर दंग रह जाती. हर कोई मोटा मुरगा फंसाने की फिराक में रहती.’’

मेनका की बात सुन कर निहाल ने थोड़ा गुस्से में पूछा, ‘‘तुम जब बाहर निकली, तो रात के समय वहां से भाग क्यों नहीं गई?’’

‘‘कैसी बातें करते हैं भैया आप. इतना आसान होता, तो क्या मैं इस धंधे में टिकी रहती? आंटी के दलाल पूरी चौकसी रखते हैं हम पर.’’ मेनका की कहानी सुन कर निहाल की आंखों से आंसू बह निकले.

मेनका आगे बताने लगी, ‘‘दूसरी लड़कियों के साथ मैं भी धीरेधीरे ग्राहक पटाने की ट्रेनिंग ले चुकी थी. शुरू में तो ग्राहक पटाना भी बहुत बुरा लगता था. रात के समय सड़क पर घटिया हरकतें कर अपने अंग दिखा कर उन्हें पटाना पड़ता था.

‘‘उस पर भी लड़कियों में आपस में होड़ मची रहती थी. मैं किसी ग्राहक को जैसेतैसे पटाती, तो रास्ते से ही दूसरी लड़कियां कम पैसों में उसे खींच ले जातीं.

‘‘भैया, मैं नई थी. मुझ से ग्राहक पटते ही नहींथे, तो आंटी बहुत नाराज होतीं. सड़क पर ग्राहक ढूंढ़ने के लिए खड़ी होती, तो लोगों की लालची मुसकान देख कर मेरा दिल दहल जाता. जब कोई पास आ कर बात करता, तो डर के मारे दिल की धड़कनें बढ़ जातीं. कोईकोई तो मेरे पूरे बदन को छू कर भी देखता.

‘‘बस, इतना ही  और उस के लिए तुम्हारी देह का सौदा हर रात होता है,’’ निहाल ने कहा. उस की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे, जिन्हें रोकने की वह नाकाम कोशिश कर रहा था.

‘‘बहुत बुरा हाल था भैया. एक बार एक आदमी बहुत नशे में था. मुझे उस के मुंह से आती शराब की बदबू बरदाश्त नहीं हुई और मैं ने उस से अपना मुंह फेर लिया. वह मुझे गाली देते हुए बोला, ‘तू खुद क्या दूध की धुली है?’

‘‘और उस ने मुझे पूरे बदन पर सारी रात दांतों से काट डाला. मैं बहुत रोई, चीखीचिल्लाई, पर कोई मेरी मदद को न आया.

‘‘अगले दिन आंटी ने चमड़ी उधेड़ दी और बोली, ‘हर ग्राहक को नाराज कर देती है. तेरे प्रेमी को ऐसा क्या दिखा था तुझ में क्या सुख देती तू उस को इसीलिए शायद यहां सड़ने को पटक गया तुझे.’

‘‘यह सब सुन कर मुझे बहुत बुरा लगा. मैं ने सोच लिया कि अब काम करूंगी, तो ठीक से.’’

‘‘फिर तुम वाराणसी से मुंबई कैसे पहुंच गई मुन्नी?’’ निहाल ने पूछा.

‘‘वाराणसी छोटा सा शहर है. लोग पैसा कम देते हैं. ऊपर से कई तरह की छूत की बीमारियां हमें दे जाते हैं. जो पैसे मिलते, वे बीमारियों पर ही खर्च हो जाते.

‘‘एक बार मुंबई की कुछ लड़कियां हमें ट्रेनिंग देने आईं, तो मैं ने उन से कहा कि मुझे भी मुंबई ले चलिए. कम से कम बड़े शहर के लोग रकम तो अच्छी देंगे. मैं थोड़ी पढ़ीलिखी हूं और अंगरेजी भी बोलती हूं, इसलिए उन्हें मैं मुंबई के लायक लगी. सो, मुझे यहां भेज दिया. बस, तब से मैं ने इसे अपने कारोबार की तरह अपना लिया.

‘‘कई बार रेड पड़ी. थाने भी गई. शुरू में डरती थी, लेकिन अब मन को मजबूत कर लिया. अब कोई डर नहीं. जब तक जिंदगी है, इसी नरक में जीती रहूंगी. अब तो ग्राहक भी सोशल मीडिया और ह्वाट्सऐप पर मिल जाते हैं. कोडवर्ड होता है, जिस से हमारे दलाल बात करते हैं,’’ और वह ठहाका लगा कर हंस पड़ी. निहाल मेनका के चेहरे पर ढिठाई की हंसी पढ़ चुका था, फिर भी उस ने पूछा, ‘‘निकलना चाहती हो इस नरक से?’’

वह बोली, ‘‘कौन निकालेगा भैया… आप और उस के बाद कहां जाऊंगी? अपने मम्मीपापा के घर या आप के घर? कौन अपनाएगा मुझे?

‘‘निहाल भैया, अब तो मेरी अर्थी इन गंदी गलियों से ही उठेगी,’’ वह बोली और फिर जोर से ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

‘‘भैया, मेरी तो सारी बातें पूछ लीं, पर आप ने अपनी नहीं बताई कि आज आप यहां कैसे? आप की शादी हुई या नहीं? आप तो बहुत नेक इनसान हुआ करते थे, फिर यहां कैसे?’’ मेनका ने पूछा.

‘‘पूछो मत मुन्नी, मेरी पत्नी किसी और के साथ संबंध रखती है. मुझे तो जैसे नकार ही दिया है. 2 बच्चे भी हैं. मन तो उन के साथ लगा लेता हूं, पर तुम से कैसे कहूं? तन की भूख मिटाने यहां चला आता हूं कभीकभी.

‘‘मुझे नहीं मालूम था कि आज इस जगह तुम से मिलना होगा. सच पूछो तो समझ नहीं आ रहा है कि आज मैं तुम्हें गलत समझूं या सही.

‘‘तुम जैसी न जाने कितनी लड़कियां हम मर्दों को सुख देती हैं और हमारे घर टूटने से बचाती हैं. हम मर्द तो एक रात का सुख ले कर खुश हो जाते हैं. पर हमारे चलते मजबूरी की मारी लड़कियां अपनी जिंदगी को इस नरक में जीने के लिए मजबूर होती हैं और इन बंद गलियों में कीड़ेमकौड़े की जिंदगी जीती?हैं.

‘‘मुझे माफ करो मुन्नी, यह लो तुम्हारी एक रात की कीमत,’’ इतना कह कर निहाल ने मुन्नी की तरफ पैसे बढ़ा दिए.

मेनका ने कहा, ‘‘भैया, मेरा दर्द बांटने के लिए शुक्रिया, पर किसी को घर में न बताना कि मैं यहां हूं. मेरे मम्मीपापा और भाई मुझे गुमशुदा ही समझ कर जीते रहें तो अच्छा, वरना वे तो जीतेजी मर जाएंगे. और इस रात की कोई कीमत नहीं लूंगी आप से.

‘‘आज आप ने मेरा दर्द बांटा है, किसी दिन शायद मैं आप का दर्द बांट सकूं. अपनी बहन समझ कर आना चाहें तो फिर आ जाइए कभी.’’ सुबह होने को थी. निहाल चुपचाप वहां से उठ कर अपने घर आ गया. Best Hindi Kahani

Story In Hindi: यादगार इनाम – विकास ने कैसे की अनजान औरत की मदद

Story In Hindi: रेलवे स्टेशन पर काफी गहमागहमी थी. दीपक अपनी मोटरसाइकिल की बुकिंग के लिए लोकल रेलवे स्टेशन गया था. वह लाल रंग की टीशर्ट पहने हुए था. स्टेशन के लाउडस्पीकर पर एक गाड़ी के आने का ऐलान हो रहा था. बुकिंग क्लर्क उसे रुकने के लिए कह कर माल उतरवाने के लिए प्लेटफार्म पर चला गया.

दीपक के पास कुछ काम तो था नहीं, इसलिए वह प्लेटफार्म पर आ कर ताकझांक करने लगा. तभी वहां से एक खूबसूरत औरत गुजरी. शायद वह किसी को ढूंढ़ रही थी. उस ने एक बार दीपक की तरफ देखा और आगे निकल गई.

रेलवे स्टेशन पर भीड़ कम होने लगी थी. थोड़ी ही देर में वही औरत दीपक की तरफ देखती हुई वापस जा रही थी. अचानक ही वह पलटी और उस ने उदास लहजे में दीपक से पूछा, ‘‘क्या यहां कुली नहीं मिलेगा?’’

दीपक को बड़ा धक्का लगा. कहीं वह उसे लाल टीशर्ट के चलते कुली तो नहीं समझ रही थी.

दीपक ने अनमने मन से कहा, ‘‘होगा जरूर. क्यों, मिला नहीं?’’

‘‘नहीं,’’ उस औरत ने उसे बड़ी उम्मीद भरी निगाहों से देख कर कहा.

‘‘ऐसा कीजिए, रेलवे स्टेशन के बाहर कई रिकशे वाले हैं. रिकशा तो आप करेंगी ही. रिकशे वाले से कहिएगा, वह कुली का भी काम कर देगा,’’ दीपक ने सुझाव दिया.

वह औरत बोली, ‘‘रिकशे वाला तो तैयार है, लेकिन वह कहता है कि रेलवे स्टेशन पर नहीं जा सकता. कुली आफत मचा देंगे. हां, गेट के बाहर आ कर वह सब करने को तैयार है.’’

‘‘यह तो सच है,’’ दीपक ने कहा.

वह औरत अपने गांव से तकरीबन 35-35 किलो गेहूं व चावल के 2 बोरे  लाई थी.

दीपक ने पूछा, ‘‘आप के साथ कोई नहीं है?’’

‘‘11 साल का एक बच्चा है,’’ उस ने कहा.

तभी वहां एक नौजवान कुली आ गया. दीपक ने उस से पूछा, ‘‘ये 2 बोरे गेट के बाहर तक पहुंचा दोगे?’’

‘‘सौ रुपए लगेंगे,’’ उस कुली ने अकड़ कर कहा. वह औरत मन मसोस कर रह गई.

‘‘कुछ रेट तो होता है कि ऐसे ही जो दिल में आए वही बोल देते हो?’’ दीपक ने पूछा.

‘‘रेट तो यही है,’’ कह कर वह कुली चलता बना.

‘चलो, आज इन की मदद कर के कुछ अच्छा काम किया जाए,’ दीपक ने मन ही मन सोचा.

दीपक ने उस औरत से पूछा, ‘‘आप का सामान गेट के बाहर चला जाए, तो फिर आप का काम बन जाएगा न?’’

उस ने ‘हां’ में सिर हिलाया.

दीपक ने फिर पूछा, ‘‘सामान कहां है?’’

‘‘वहां,’’ उस ने इशारा किया.

वहां एक छोटा बच्चा बोरों की रखवाली कर रहा था. दीपक ने उस औरत से पूछा, ‘‘आप एक काम कर सकती हैं?’’

‘‘क्या?’’ उस ने पूछा.

दीपक ने कहा, ‘‘आप को एक तरफ से बोरा पकड़ना होगा.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं…’’ इतना कह कर उस की आंखों में चमक आ गई.

दीपक ने औरत की मदद से 2 बारी में वे दोनों बोरे बाहर रखवा दिए. उस की लाल झकाझक टीशर्ट ऊपर सरक गई थी. हाथ गंदे हो गए थे. गरमी के दिन थे, तो थोड़ी पसीना भी आ गया था. बाल उलटेपुलटे हो गए थे.

दीपक जल्दी से वहां से निबटना चाहता था कि कोई परिचित न मिल जाए और सवालों की ?ाड़ी न लगा दे.

तभी वह औरत दीपक के पास आई, लेकिन दीपक ने उस की तरफ नहीं देखा.

वह बोली, ‘‘शुक्रिया. आप बहुत अच्छे आदमी हैं. आप जैसे लोग कम होते हैं,’’ इतना कह कर वह चली गई.

उस औरत के ये शब्द दीपक के कानों से होते हुए सारी बाधाओं को पार कर सीधे उस के मन में जा कर घुल गए. उस ने मुड़ कर उस औरत को देखने की कोशिश की, लेकिन वह चली गई थी.

दीपक को एक छोटे से काम का उसे कितना बड़ा और यादगार इनाम मिला था. Story In Hindi

Best Hindi Kahani: भटकती जवानी – कविता का अकेलापन

Best Hindi Kahani: कविता को लगा कि जैसे उस के दाएं हाथ पर कुछ रेंगने लगा है. इस के पहले भी उस के बगल में बैठे दर्शक का पैर 2 बार उस के बाएं घुटने से छू गया था. उस समय तो वह इस ओर कोई ध्यान दिए बिना बड़े ध्यान से परदे पर फिल्म देखती रही, लेकिन अब उसे समझाते देर नहीं लगी कि यह बारबार का छू जाना अचानक नहीं है.

सीट पर बैठा दर्शक शायद कविता की शह पाते ही जोश से भर उठा. उस ने अंधेरे में कविता की ओर देखा, फिर उस की ओर झाकते हुए अपना बायां हाथ उठा कर उस के कंधे पर टिका दिया.

कविता एक अजीब सी सिहरन से भर उठी, जैसे उस पर नशा चढ़ने लगा हो.

कविता शादीशुदा थी. अमीर बाप की बेटी होने के बावजूद उस की शादी के पहले की जिंदगी कीचड़ में खिले कमल की तरह साफसुथरी थी. मांबाप, भाईबहन, यहां तक कि उस की भाभियां भी बड़े मौडर्न खयालों की थीं और क्लब वगैरह में जाती थीं, लेकिन कविता को यह सब कभी अच्छा नहीं लगा.

कविता घर से बहुत कम निकलती थी. पढ़ाई में ज्यादा दिलचस्पी होने की वजह से उस का स्कूलकालेज जाना एक मजबूरी थी.

यूनिवर्सिटी का माहौल उसे कभी रास नहीं आया, इसलिए और आगे पढ़ने की इच्छा होते हुए भी उस ने बीए करने के बाद कालेज छोड़ दिया और सारा दिन घर पर ही रहने लगी. कुछ दिन बाद मांबाप ने उस की शादी कर दी थी.

सालभर तक कविता की शादीशुदा जिंदगी बहुत ही अच्छी बीती, लेकिन उस के बाद उस में बदलाव आना शुरू होने लगा.

कविता खुद भी अपने अंदर होने वाले इस बदलाव से परेशान थी. कहां तो वह स्कूलकालेज के दोस्तोंसहेलियों से भी बहुत कम बोलती थी, कहां अब शादी के बाद अचानक उस की कामना इतनी प्रबल हो उठी कि हर समय उस का सारा बदन टीसता रहता था.

कुछ दिन तक तो कविता काफी कोशिशों के बाद अपने पर काबू किए रही, लेकिन आखिरकार वह बेबस हो गई. तब उस ने खुद ही आगे बढ़ कर पड़ोस के एक नौजवान से जानपहचान बढ़ा ली.

कविता ने सोचा था कि उस का पड़ोसी उस की इच्छा समझ जाएगा, लेकिन वह इस मामले में एकदम अनाड़ी था. जब कविता की बरदाश्त के बाहर होने लगा, तो टूट कर उस ने ही एक दिन पति की गैरमौजूदगी में पड़ोसी को घर बुला कर अपनी देह परोस दी.

उस दिन कविता को एक अजीब सा सुख मिला था. इतना सुख, जितना उसे सुहागरात में अपने पति से भी नहीं मिल पाया था.

इस सुख को बारबार भोगने की ललक में कविता अकसर उस नौजवान से मिलने लगी. लेकिन उस के मन की प्यास खत्म होने के बजाय बढ़ती ही जा रही थी. जल्दी ही वह किसी दूसरे मर्द की बांहों में बंधने के लिए बेचैन हो उठी.

इस के बाद तो जैसे यही सिलसिला बन गया. कविता अकसर किसी नौजवान से संबंध बनाती. कुछ दिन उस का संगसाथ उसे बड़ा अच्छा लगता, लेकिन जल्दी ही उकता कर वह कोई नया साथी बनाने के लिए छटपटाने लगती.

एक दिन कविता के पति विवेक को इस सब की जानकारी मिली, तो उसे यकीन ही नहीं हुआ. लेकिन महल्ले के आतेजाते नौजवानों की मजाक भरी नजरें जब बारबार छेदने लगीं, तो उसे बरदाश्त के बाहर हो गया.

एक दिन तिलमिला कर उस ने कविता से इस बारे में पूछा, तो वह रोने लगी. लेकिन उस ने कुछ भी नहीं छिपाया और अपने मन की सारी बात पति को बता दी.

यह सुन कर पति विवेक को गहरा धक्का तो लगा, लेकिन साथ ही उसे यह भी भरोसा था कि कविता धंधे वाली नहीं है.

विवेक ने सब्र से काम लिया. कविता को प्यार से समझबुझ कर वह सही रास्ते पर लाने की कोशिश करने लगा.

कविता ने भी विवेक से वादा किया कि अब वह कभी किसी से नहीं मिलेगी, लेकिन वह तो जैसे आदत से मजबूर थी और अपने तन की भूख मिटाने के लिए वह फिर दूसरे मर्दों की बांहों में खेलने लगती थी.

एक दिन विवेक ने उस से साफसाफ कह दिया, ‘‘अब या तो तुम अपने लफंगे साथियों से संबंध तोड़ लो या मुझे छोड़ दो…’’

कविता को फैसला करने में ज्यादा देर नहीं लगी. उस ने विवेक को ही छोड़ देना बेहतर समझा. वह उसी दिन अपना सामान ले कर उस घर से चली गई और अलग रहने लगी.

कविता ने ढेर सारे दोस्त बना लिए थे. अब जब जिस के साथ मन होता, वह अपनी जिस्मानी प्यास बुझ लेती थी.

उस दिन सिनेमाघर में फिल्म देखते समय बगल वाली सीट पर बैठे दर्शक की हरकतों ने कविता को बुरी तरह से जोश में ला दिया था. आखिरकार उस से रहा नहीं गया, तो वह कसमसाने लगी.

अचानक बिजली चली गई. कविता ने फुसफुसा कर कहा, ‘‘कहीं और चलें क्या?’’

‘‘बताओ कहां चलेंगे?’’ बगल की सीट पर बैठे दर्शक ने घुप अंधेरे का फायदा उठाया और झक कर अचानक कविता के जलते होंठों पर अपने होंठ रख दिए.

कविता के जिस्म पर हाथ फेरते हुए उस दर्शक ने पूछा, ‘‘कहां चलोगी? अपने घर या मेरे?’’

‘‘जहां चाहो?’’ वह फुसफुसाते हुए बोली.

इस बीच दोनों की सांसों की धड़कनें तेज हो गई थीं, इसलिए फिल्म देखना उन्हें गवारा नहीं लगा. दोनों उस अंधेरे में ही एकदूसरे का हाथ थामे सिनेमाघर से बाहर निकल आए.

उस समय सारे शहर की बिजली चली गई थी. कविता एक रिकशा कर के अपने घर की ओर चल पड़ी और बगल में बैठा उस का अनजान साथी रास्तेभर अंधेरे में उस के जिस्म से छेड़छाड़ कर रहा था.

घर पहुंच कर कविता ने ताला खोल कर जैसे ही अंदर कदम रखा, वैसे ही बिजली आ गई, तो वह एकदम चौंक पड़ी, क्योंकि सिनेमाघर से आया शख्स कोई और नहीं, बल्कि उस का अपना पति विवेक था.

विवेक के साथ रहते समय हरदम किसी पराए मर्द की बांहों में बंधने के लिए तड़पती रहने वाली कविता को उस समय वह भी गैरमर्द जैसा ही लगा.

वह उस से लिपट कर फुसफुसा उठी, ‘‘तुम एकाएक शांत कैसे हो गए जी? तुम्हारे लिए तो मैं ने फिल्म छोड़ दी… आओ, अब जो बाकी काम करना है, उसे भी कर लो…’’

कविता की बात सुन कर विवेक को ऐसा लगा, जैसे वह अपनी ही नजरों में गिर गया हो और अब उसे वहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था. Best Hindi Kahani

Hindi Funny Story: शोरूम का उद्घाटन

Hindi Funny Story: प्यारेलालजी मेरे बड़े अच्छे दोस्त हैं. उन की एक नई जूते की दुकान का आज सुबह उद्घाटन है. पूरे शहर में ‘प्यारे बूट हाउस’ के एक दर्जन से ज्यादा शोरूम हैं. प्यारेलालजी ने जूतेचप्पलों में जो तरक्की की, वह शायद देश की नामी कंपनियों ने भी नहीं की होगी.

प्यारेलालजी के शोरूम में बड़ेबड़े कवि, मंत्री, विधायक, सांसद आने में गर्व महसूस करते हैं, लेकिन उन्होंने एक आम आदमी की पसंद का भी ध्यान रखा है, जैसे रबड़ की चप्पलें भी वहां मिल जाती हैं.

प्यारेलालजी किसी जमाने में बहुत अमीर नहीं थे, लेकिन अपने गरीब बापू की गरीबी पर मन ही मन दुखी
रहते थे.

आज तो नए शोरूम का उद्घाटन करने के लिए उन्होंने एक फिल्मी हीरोइन को बुलवाया था, जो आड़ीतिरछी हो कर हाथों में सैंडल लिए खड़ी थी. उस को देखने के लिए हजारों लोग जमा हो गए थे. उस ने जब हवा में चुंबन फेंके, तो हजारों ने धड़ाधड़ हवाई चप्पलें खरीद लीं.

मैं भी वहां मौजूद था, लेकिन मु झ पर उस ने एक नजर भी नहीं डाली और हम दिल में अपने आ रहे बुढ़ापे को कोसते रहे.

पूरे कार्यक्रम को होतेसमेटते हुए दोपहर बीत गई. हम प्यारेलालजी के साथ बैठे थे. वे कुछ ठंडागरम कहने गए, तो हम प्यारेलालजी की पुरानी यादों में खो गए.

अपने बापू की गरीबी से प्यारेलालजी बड़े दुखी थे. बापू मजदूरी करते थे. पैरों में कांटे गड़ते, धूप लगती, पत्थर चुभते, लेकिन कभी उफ नहीं की थी.

प्यारेलालजी के बापू का एक ही मकसद था कि उन का प्यारे पढ़ जाए, बढ़ जाए, जबकि प्यारेलाल की एक ही इच्छा थी, ‘पढ़लिख कर क्यों जिंदगी बरबाद करूं? ऐसा धंधा शुरू करूं, जिस से जिंदगी मजे से कटे.’

इस बीच प्यारेलालजी आ चुके थे. मु झे कहीं खोया देख वे कह उठे, ‘‘क्यों रे गप्पू, क्या सोच रहा है?’’

‘‘यार, तेरी जिंदगी के ऊंचे हो चुके ग्राफ के बारे में सोच रहा था.’’

‘‘ऐसा मैं ने क्या कर दिया?’’

‘‘आज से 30 साल पहले तेरे पास कुछ नहीं था, पर आज सबकुछ है. दुकानें, शोरूम, हीरोइन…’’

‘‘लेकिन बापू नहीं हैं,’’ उस ने दुखी लहजे में कहा.

‘‘वह तो सच है, पर आज आप हीरोइन के साथ बढि़या लग रहे थे,’’ मैं ने चुटकी ली.

‘‘पूरे 10 लाख रुपए लिए उस ने एक घंटे के लिए.’’

‘‘10 लाख…’’ मैं ने तकरीबन चीखते हुए पूछा.

‘‘हां यार, वसूल भी हो गए.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘पूरे 2 लाख रुपए की चप्पलें बिक गईं और 8 लाख रुपए का फोकट में इश्तिहार भी हो गया,’’ प्यारेलालजी ने बाजार को पकड़ते हुए कहा.

‘‘प्यारे, ये जूतेचप्पल का आइडिया बापू को तू ने कैसे दिया? आखिर इस के पीछे का राज क्या था? थोड़ा बता तो?’’

प्यारेलालजी ने आंख मारी, फिर कहने लगा, ‘‘कहीं तू नई दुकान तो नहीं खोल लेगा…’’

‘‘बिलकुल नहीं, लेकिन तू बता तो.’’

प्यारेलालजी ने दाएंबाएं देखा और कहना शुरू किया, ‘‘तू तो जानता था कि मैं बापू की गरीबी से परेशान था. मैं ने सोचा कि क्यों न ऐसा काम करूं, जिस से मैं अमीर भी हो जाऊं और पैसा भी न लगे.’’

‘‘तो फिर क्या हुआ?’’

‘‘होना क्या था. एक दिन दिमाग में एक आइडिया आया. एक जगह शादी हो रही थी, मैं वहां से एक दर्जन जूतेचप्पल चुरा लाया.’’

‘‘चोरी की…’’

‘‘तू सुन तो…’’

‘‘वहां लोगों ने खूब गालियां दीं. मेरा मन उदास हो गया.’’

‘‘फिर…’’

‘‘फिर क्या, मैं ने दूसरी जगह शादी का घर खोजा. वहां पर खाना खाने के पहले उतारे गए जूतेचप्पलों में से हर जोड़ी का एकएक जूताचप्पल ले आया.

‘‘जब खाने के बाद लोग बाहर निकले, तो उन्हें वह रिश्तेदारों की शरारत लगी. लिहाजा, वे एकएक जूतेचप्पल को वहीं छोड़ कर चले गए. मैं उन्हें भी उठा लाया. खालिस मुनाफा था…’’

‘‘फिर क्या किया?’’

‘‘मेरा हौसला बढ़ गया. मैं ने मंदिरमसजिदों, पार्टियों, शादियों वगैरह में जाना शुरू कर दिया और मौका देख कर हर जोड़ी का एकएक जूता या चप्पल उठा कर गायब हो जाता था.

‘‘जूतेचप्पल वाले आखिर में मेरे लिए दूसरा जूता या चप्पल और छोड़ जाते थे.

देखते ही देखते घर में जूतेचप्पलों का ढेर लग गया था. उन्हें साफ और पौलिश कर के सस्ते जूतेचप्पलों की दुकान की तर्ज पर मैं ने घर से ही जूतेचप्पल बेचने शुरू कर दिए.’’

‘‘फिर…’’

‘‘मेरी सब से ज्यादा मदद की मंत्रियों और कवियों ने.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि उन कवियों और नेताओं की मीटिंग में सब से ज्यादा जूतेचप्पल फेंके जाते थे, जो अपने काम में आने लगे. इस के अलावा बाबाओं ने भी बहुत सहयोग दिया.’’

‘‘क्या मतलब…?’’

‘‘उन की सभा के बाहर स्वयंसेवक बन कर जूतेचप्पल चुरा लो या फिर वहां भगदड़ मचने पर कईकई दर्जन जूतेचप्पल मुफ्त में मिल जाते हैं.

‘‘दोस्त, बस इन्हीं जूतेचप्पलों की बदौलत मैं ने जूतेचप्पल बेचने का धंधा शुरू किया.

‘‘हमारे पूरे इलाके में डेढ़ सौ प्रतिनिधि हैं, जो जूतेचप्पल इकट्ठा करने का काम करते हैं. एक दर्जन कारीगर जूतेचप्पल ठीक करने का काम करते हैं और आज पूरे शहर में कोई हम से होड़ नहीं कर सकता है,’’ प्यारेलालजी ने अकड़ से कहा.

‘‘बिलकुल नहीं यार, लेकिन अगले शोरूम के उद्घाटन में तुम जिस खास शख्स को बुलाओ, उस का एक फोटो मेरे साथ जरूर खिंचवा देना.’’

‘‘जरूर, पर एक वादे के साथ.’’

‘‘कैसा वादा?’’

‘‘यह अंदर की बात किसी से न कहना. अपने तक ही रखना, वरना कहीं जनता, मंत्री, श्रद्धालु और नमाजी जूते पहनना ही न छोड़ दें. मेरा धंधा चौपट हो जाएगा.’’

‘‘वचन देता हूं कि मैं यह बात किसी से नहीं कहूंगा,’’ यह कह कर मैं घर लौट आया.

चूंकि मैं ने यह वादा किसी से न कहने का किया था, लिख कर बताने का नहीं. सो, मैं ने यह बात आप को लिख कर बता दी. Hindi Funny Story

Hindi Family Story: पोस्टमार्टम – जल्लाद डाक्टर

Hindi Family Story: डाक्टर निकुंज अपनी कुरसी पर बैठे थे. वे एक विदेशी पत्रिका देखने में मग्न थे. तभी ‘चीरघर’ का जमादार काशीराम ‘नमस्ते साहब’ कह कर उन के पास आ खड़ा हुआ.

डाक्टर साहब ने सिर हिला कर उसके नमस्ते का जवाब दिया और बगैर नजर उठाए ही पूछा, ‘‘कोई तगड़ा पैसे वाला मरा है काशी?’’

काशीराम पान मसाले की पीक को गटकते हुए बोला, ‘‘कहां साहब, लगता है कि आज का दिन तो कल से भी ज्यादा खराब जाएगा.’’

‘‘तो फिर?’’ डाक्टर ने तीखी नजरों से काशीराम को देखा.

‘‘वही साहब, कल वाली लाशें… बुड्ढा मगज खाए जा रहा है मेरा.’’

‘‘कुछ ढीली की मुट्ठी उस ने?’’

‘‘साहब, वह वाकई बहुत गरीब है. आदमी बहुत लाचारी में खुदकुशी करता है. उस ने फूल सी बेटियों को जहर देने से पहले अपने दिल को कितना मजबूत किया होगा.’’

‘‘बड़ी सिफारिश कर रहा है उस की. कहीं अकेलेअकेले तो जेब नहीं गरम कर ली?’’

‘‘अपनी कसम साहब, जो मैं ने उस की एक बीड़ी भी पी हो. उलटे जब से अखबार से उस का सारा हाल जाना है, हर पल ‘हाय’ लगने का डर लगता है.’’

होंठों पर मतलबी मुसकान ला कर डाक्टर साहब बोले, ‘‘कैसा सिर चढ़ कर बोल रहा है जाति प्रेम.’’

‘‘जाति? नहीं साहब, वे तो ऊंची जाति के लोग हैं.’’

‘‘दुनिया में सिर्फ 2 ही जातियां होती हैं बेवकूफ, अमीर और गरीब. इसीलिए तुम्हारा दिल पिघल रहा है… लेकिन, मैं तुम्हारी भी सिफारिश नहीं मानूंगा.

‘‘मैं ने आज तक ‘सुविधा शुल्क’ वसूल किए बिना कोई भी पोस्टमार्टम नहीं किया और न ही आज करूंगा, चाहे मुरदा हफ्तेभर वैसे ही पड़ा रहे.’’

‘‘देखता हूं साहब, फिर बात कर के… बुड्ढा बाहर ही खड़ा है.’’

काशीराम बाहर निकल आया. बरामदे के गमले से सट कर खड़े धरम सिंह ने उस की ओर आशाभरी नजरों से देखा, तो वह न में सिर हिलाता हुआ बोला, ‘‘डाक्टर नहीं मानता ठाकुर. कहता है, बिना पैसा लिए उस ने कभी पोस्टमार्टम नहीं किया, न आगे करेगा.’’

‘‘अगर ‘पैसे’ की कसम ही खाए हैं, तो भैया बात कर के देखो, सौ 2 सौ…’’

‘‘सौ 2 सौ… क्या बात करते हो ठाकुर? 5 सौ रुपए का रोज धुआं उड़ाता है. हजार तो कम से कम लेता है… तुम्हारी तो 3 लाशें हैं.’’

धरम सिंह आह भर कर बोला, ‘‘ठीक है, तुम एक बार पूछ कर आओ कि कितना लेगा. खड़ी फसल बेच दूंगा आढ़ती को. मर नहीं जाऊंगा.

‘‘अरे, सरकार ने जमींदारी छीन ली तब नहीं मरा, फिर सीलिंग लगा दी तब नहीं मरा, जमुना मैया घरखेत लील गईं तब नहीं मरा, बुढ़ापे में दिल के टुकड़े चले गए तब भी मौत नहीं आई, तो अब फसल जाने से क्या मौत आ जाएगी?’’

‘‘मेरी चलती तो तुम पर एक रुपया न लगने देता. पर मजबूर हूं… क्योंकि आज के साहबों में दिल नहीं…’’

‘‘नहीं भाई, मैं तुम्हें कहां दोष दे रहा हूं, तुम जा कर पूछ तो आओ.’’

काशीराम चुपचाप डाक्टर के कमरे में घुस गया.

डाक्टर ने उसे देख कर पूछा, ‘‘बुड्ढा कितने पर राजी हुआ?’’

‘‘हजार से ज्यादा नहीं निकाला जा सकेगा साहब… वह भी खड़ी फसल औनेपौने में बेचेगा, तब जा कर पैसे का जुगाड़ होगा.’’

‘‘ठीक है, भागते भूत की लंगोटी भली… तुम्हारा कमीशन अलग होगा.’’

‘‘आप ही रखना साहब. उस का पैसा मु?ो तो हजम नहीं होगा.’’

‘‘बेवकूफ कहीं का, नहीं होगा… यह तो दुनिया का नियम है कि एक मरता है, तो दूसरा अपनी जेब भरता है… जाओ, जा कर देखो, शायद कोई पैसे वाला पोस्टमार्टम के लिए आया हो.’’

काशीराम से एक हजार की बात सुन कर धरम सिंह थके कदमों से अपने आढ़ती के यहां चल पड़ा.

कुछ देर बाद डाक्टर निकुंज के कमरे के बाहर एक बड़ीबड़ी मूंछों वाला आदमी आया और उस ने अंदर आने की इजाजत मांगी.

डाक्टर साहब से अंदर आने का संकेत पाते ही वह अंदर घुस गया.

‘‘बैठिए,’’ डाक्टर साहब ने उस के हावभाव को देखते हुए सामने की कुरसी की ओर इशारा किया.

वह आदमी कुरसी पर बैठ गया, पर कुछ बोल न सका. डाक्टर साहब ने उसे पहले तो नजरभर टटोला, फिर कहा, ‘‘कहिए…’’

‘‘साहब, पोस्टमार्टम के लिए अभी एक लाश आएगी.’’

‘‘आप… किस पक्ष से हैं?’’

‘‘बचाव पक्ष से.’’

‘‘क्या चाहते हैं?’’

‘‘राइफल की गोली बंदूक के छर्रों में बदल जाए.’’

‘‘जानते हैं आप कि यह कितना खतरनाक काम है?’’

‘‘खतरनाक काम की ही तो कीमत है,’’ उस आदमी ने जेब से 10 हजार की 2 गड्डियां निकालीं.

‘‘नहीं, 50 से कम नहीं.’’

‘‘तब लाश पर एक ही फायर दिखना चाहिए, जबकि घुटने, हाथ और छाती पर कुल 3 घाव हैं.’’

‘‘ठीक है. काम हो जाएगा.’’

उस आदमी ने 40 हजार रुपए गिन कर डाक्टर को दे दिए और मूंछों पर ताव देता हुआ बाहर निकल गया.

पोस्टमार्टम करते समय डाक्टर निकुंज और काशीराम की जेबों में जो गरमी थी, उस की वजह से उन दोनों के हाथ बड़ी तेजी से चले, इसलिए चारों पोस्टमार्टम एक घंटे में ही निबट गए.

डाक्टर साहब बाकी बचे कामों को अपने जूनियर को सौंप कर अपनी गाड़ी की ओर चल दिए, क्योंकि आज उन के हाथ में बीवीबच्चों की फरमाइशें पूरी करने के लिए मुफ्त में मिला पैसा था.

बीवी के लिए स्लिपर, बेटी के लिए मोतियों का हार, बेटे के लिए कैमरा खरीद कर जब डाक्टर निकुंज अपने घर पहुंचे, तो वहां माली के अलावा कोई और न था.

माली ने बताया कि मेमसाहब आज देर से लौटेंगी और जिम्मी बाबा व बिन्नी बेटी अभी कालेज से नहीं आए.

डाक्टर निकुंज ने घड़ी देखी. दोनों के कालेज छूटे डेढ़ घंटा हो चुका था. कुछ देर सोचने के बाद डाक्टर ने माली से गाड़ी में रखे उपहारों को निकाल लाने के लिए कहा.

अचानक उन्हें एक विचार सूझ कि क्यों न जिन के उपहार हैं, उन के कमरे में रख दिए जाएं. उन की आंखों में शरारती बच्चों जैसी चमक उभरी और वे बड़ा वाला पैकेट उठा कर पत्नी की कपड़ों वाली अलमारी खोल बैठे.

पैकेट भीतर रख कर वे अभी अलमारी बंद कर ही रहे थे कि किसी कपड़े से फिसल कर एक परचा उन के पैरों के पास आ कर गिरा. उन्होंने वह  परचा उठा लिया. परचे पर लिखा था:

‘नंदिताजी,

‘कई घंटों से आप का फोन नंबर मिला रहा हूं, मिल ही नहीं रहा. हार कर एक पालतू आप के पास भेज रहा हूं. खबर यह है कि जिस के बारे में मैं ने आप को पहले भी बताया था, वे आज इसी शहर में रात में रुकने वाले हैं. एमएलए का टिकट उन्हीं के हाथों में है. बाकी आप खुद सम?ादार हैं.

‘श्यामलाल.’

‘‘तो अब नेतागीरी चमकाने के लिए इस दलाल की उंगलियों पर नाचा जा रहा है,’’ डाक्टर निकुंज निचला होंठ चबाते हुए बड़बड़ाए, फिर कदम घसीटते हुए बेटी के कमरे में घुस गए.

थोड़ी सी उलटपुलट के बाद ही उन के हाथ में छिपा कर रखा गया एक फोटो अलबम आ गया.

अलबम का पहला पन्ना देखते ही डाक्टर निकुंज के हाथ, जो सड़ीगली लाशों की चीरफाड़ करने में भी नहीं कांपते थे, अचानक ऐसे थक गए कि अलबम छूट कर जमीन पर जा गिरा.

अभी बेटे के कारनामों की जानकारी बाकी थी, इसलिए वे जिम्मी के कमरे में जा घुसे.

बेटे की रंगीनमिजाजी के बारे में तो वे कुछकुछ जानते थे. उन का लाड़ला नशीली चीजों का आदी हो चुका था.

अगले कई दिनों तक उस बंगले में घरेलू ?ागड़े होते रहे. आखिर में डाक्टर निकुंज की हार हुई. बीवीबच्चों ने साफ शब्दों में कह दिया कि उन लोगों को अपना भलाबुरा सोचने का हक है और इस में उन्हें किसी की दखलअंदाजी पसंद नहीं है.

अकेले पड़ चुके डाक्टर निकुंज एक दिन जिंदगी से इतने निराश हो गए कि खुदकुशी करने पर उतर आए. पर ठीक समय पर उन्हें याद आ गई वह शपथ, जो उन्होंने डाक्टरी की उपाधि लेने के समय ली थी.

उन्होंने दोनों हाथों से मुंह छिपा लिया और फूटफूट कर रो पड़े. जब मन आंसुओं से धुल कर साफ हो गया, तब उन्होंने कागजकलम उठाई और लिखने लगे:

‘अभी तक मैं इस दुनिया की बेवकूफ भरी दौड़ में अंधों की तरह दौड़ता रहा, पर अब जिंदगी की सभी सचाइयां मेरे आगे खुल चुकी हैं.

‘नंदिता, तुम सुंदर शरीर की सीढ़ी के सहारे यकीनन सत्ता की सीढि़यां चढ़ जाओगी. बिन्नी, तुम भी आखिर अपनी मां की बेटी हो न. तुम भी इसी राह पर चल कर नाम कमा सकती हो.

‘जिम्मी बेटे, जिस की मांबहनें इतनी कमाऊ हों, वह चाहे हशीश के नशे में डूब कर मर जाए, चाहे ब्राउन शुगर के नशे में. ‘तुम तीनों अब मेरी ओर से आजाद हो. तुम जो चाहो करना, केवल मेरे सामने मत पड़ना, क्योंकि मैं खुदकुशी भले न कर सका, पर तुम लोगों का खून जरूर कर दूंगा.’

कागज मेज पर छोड़ कर डाक्टर निकुंज पैदल ही बाहर निकल गए. Hindi Family Story

Story In Hindi: सीवर का ढक्कन – जब बन गया नरक रास्ता

Story In Hindi: आज तीसरे दिन कर्फ्यू में 4 घंटे की छूट दी गई थी. इंस्पैक्टर राकेश अपनी पुलिस टीम के साथ हालात पर काबू पाने के लिए गश्त पर निकले हुए थे. रास्ते में आम लोगों से ज्यादा रैपिड ऐक्शन फोर्स के जवान नजर आ रहे थे. सड़कों के किनारे लगे अधजले, अधफटे बैनरपोस्टर दंगों की निशानदेही कर रहे थे.

अपनी गाड़ी से आगे बढ़ते हुए इंस्पैक्टर राकेश ने देखा कि एक सीवर का ढक्कन ऊपरनीचे हो रहा था. उन्होंने फौरन गाड़ी रुकवाई.

सीवर के करीब पहुंचने पर मालूम हुआ कि अंदर से कोई सीवर के ढक्कन को खोलने की कोशिश कर रहा था. इंस्पैक्टर राकेश ने जवानों से ढक्कन हटाने को कहा.

सीवर का ढक्कन खुलने के बाद जब पुलिस का एक सिपाही अंदर झांका तो दंग रह गया. वहां 2 नौजवान गंदे पानी में उकड़ू बैठे हुए थे. उन के कपड़े कीचड़ में सने हुए थे. उन के चेहरे पर मौत का खौफ साफ नजर आ रहा था.

ढक्कन खुलते ही वे दोनों नौजवान हाथ जोड़ कर रोने लगे. उन के गले से ठीक ढंग से आवाज भी नही निकल पा रही थी. उन में से एक ने किसी तरह हिम्मत कर के कहा, “सर… हमें बाहर निकालें…”

बहरहाल, कीचड़ से लथपथ और बदबू में सने हुए उन दोनों लड़कों को बाहर निकाला गया. इस बीच एंबुलैंस भी वहां आ चुकी थी.

बाहर निकलने के बाद वे दोनों लड़के गहरीगहरी सांसें लेने लगे. दोनों के पैरों को कीड़ेमकोड़ों ने काट खाया था, जिन से अभी भी खून बह रहा था. उन के शरीर के कई हिस्सों पर जोंक चिपकी हुई खून पी रही थीं और तिलचट्टे व कीड़े रेंग रहे थे. उन्हें झाड़ने या हटाने की भी ताकत उन में नहीं बची थी.

उन दोनों को जल्दीजल्दी एंबुलैंस में लिटाया गया. एंबुलैंस चलने के पहले ही एक नौजवान बोल पड़ा, “अंदर 2 जने और हैं सर…”

पुलिस टीम को यह समझते देर नहीं लगी कि सीवर में 2 और लोग फंसे हुए हैं. पुलिस का एक जवान सीवर में झांकते हुए बोला, “सर, अंदर 2 डैड बौडी नजर आ रही हैं.”

इंस्पैक्टर राकेश के मुंह से अचानक निकला, “उफ…”

बड़ी मशक्कत से उन दोनों लाशों को बाहर निकाला गया, जो पानी में फूल कर सड़ने लगी थीं. बदबू के मारे नाक में दम हो गया था.

अगले दिन जिंदा बचे उन दोनों लड़कों के बयान से मालूम हुआ कि उन में से एक का नाम महेश और दूसरे का नाम मकबूल है. मरने वाले माजिद और मनोहर थे.

उन में से एक ने बताया, “हम लोग नेताजी का भाषण सुनने आए थे. अभी भाषण शुरू भी नहीं हुआ था कि सभा स्थल के बाहर कहीं से धमाके की आवाज सुनाई पड़ी. पलक झपकते ही अफवाहों का बाजार गरम हो गया और लोगों में भगदड़ मच गई. ‘आतंकवादी हमला’ का शोर सुन कर हम लोग भी भागने लगे.

“लोग अपनी जान बचाने के लिए जिधर सुझाई दे रहा था, उधर भागे जा रहे थे. उसी भगदड़ में कुछ लोग मौके का फायदा उठा कर लूटपाट करने में मसरूफ हो गए.

“हालात की गंभीरता को देखते हुए घंटेभर में कर्फ्यू का ऐलान होने लगा.
पुलिस की गाड़ियों के सायरन चीखने लगे. साथ छूटने के डर से हम चारों ने एकदूसरे का हाथ पकड़ रखा था.

“घरों और दुकानों के दरवाजे बंद हो चुके थे. कहां जाएं, किस के घर में घुसें… कौन इस आफत में हमें पनाह देगा, यह समझ में नही आ रहा था.

“यह सोचते हुए हम चारों दोस्त भागे जा रहे थे कि तभी पीछे गली से गुजर रही पुलिस की गाड़ी से फायरिंग की आवाज आई. ऐसा लगा जैसे वह फायरिंग हम लोगों पर की गई थी.

“हम लोग हांफ भी रहे थे और कांप भी रहे थे. दौड़ने के चक्कर में हम में से किसी एक का पैर सीवर के अधखुले ढक्कन से टकराया. वह लड़खड़ा कर गिरने लगा. हाथ पकड़े होने के चलते हम चारों ही एकसाथ गिर पड़े.

“हम लोगों को तत्काल छिपने के लिए सीवर ही महफूज जगह लगा. इस तरह एक के बाद एक हम चारों लोग सीवर में उतरते चले गए और उस का ढक्कन किसी तरह से बंद कर लिया… और फिर…” इतना कह कर वह लड़का रोने लगा.

देखते ही देखते वही सीवर 2 नौजवानों की कब्रगाह जो बन गया था. Story In Hindi

Funny Story In Hindi: झूठे इश्तिहार वाली नौटंकी

Funny Story In Hindi: आज सुबहसुबह जब पूरब दिशा से सूरज उगा और लोग अपने डब्बों जैसे छोटे घरों से निकल कर बाहर आने लगे, तो सब की नजर पूरे शहर में लगे एक नए इश्तिहार पर पड़ी.

उस इश्तिहार में 3 तरह के लोगों की तसवीरें थीं. पहले वे कुछ लोग, जिन को सब पहचानते थे. उस से छोटी तसवीरों वाले दूसरी तरह के वे लोग थे, जिन की शक्लें केवल इधरउधर की जानकारी रखने वाले लोग पहचानते थे. सब से छोटी तीसरी तरह की तसवीरें उन लोगों की थीं, जिन को उन के परिवार के बाहर

2-4 लोग ही पहचानते थे. इन्हीं तीसरी तरह के लोगों ने आपस में चंदा इकट्ठा कर के इश्तिहार लगवाने के लिए पैसे जुटाए थे. ‘बाप बड़ा न भईया, सब से बड़ा रुपईया’ वाली कहावत में ऊपर वाले से भी ज्यादा गहरा विश्वास रखने वाले लोग इस ‘महंगे इश्तिहार और सस्ते विज्ञापन’ पर बिना वजह पैसा खर्च नहीं करते हैं.

इन में से जिन सब से छोटी तसवीरों वालों को मैं पहचानता हूं, इन के बारे में एक बात कमाल की है. इन के धंधे गोरे हैं या काले, यह तो किसी को ठीक से नहीं पता, लेकिन इन के धंधे करामाती जरूर हैं. इन सब की दिखने वाली आमदनी अठन्नी और दिखने वाला खर्चा रुपईया है.

छोटी तसवीरों वाले लोग अपने से बड़े साइज की तसवीरों वाले लोगों के भरोसे बैठे हैं और मझोले साइज की तसवीरों वाले लोग बड़ी तसवीरों वालों की मेहरबानी पर जिंदा हैं.

छोटी तसवीरों वाले लोगों के लिए बड़ी तसवीरों वाले लोग ऊपर वालों से कम नहीं हैं. इन ऊपर वालों के चलते ही इन का लोक सुरक्षित है, परलोक की चिंता करता ही कौन है?

ये सब से छोटी तसवीरों वाले लोग गारंटी से मूर्ख होते हैं. इन को चापलूसी के अलावा जिंदगी जीने का और कोई रास्ता आता भी नहीं है.

ये लोग दो टके के फायदे के चक्कर में रोज घपला करते हैं. छोटी तसवीरों वालों का रिस्क ज्यादा होता है. फायदा होने पर फायदा कम और नुकसान होने पर इन की बलि ही सब से पहले चढ़ती है. कोई भी गलती हो जाए, छोटी तसवीरों वाले बेचारे लोग अपनेअपने ऊपर वालों द्वारा बुरी तरह से रगड़े जाते हैं.

इश्तिहारों में तसवीर जितनी छोटी होगी, तसवीर को पोस्टरों से गायब करना उतना ही आसान होगा. हवा बदलते ही तसवीर जितनी छोटी होगी, वे लोग पोस्टर से उतनी जल्दी उड़ भी जाते हैं.

ये छोटी तसवीरों वाले लोग बेचारे तो हैं, लेकिन शरीफ कतई नहीं हैं. तिकड़मी हैं, तभी तो इश्तिहार लगवाते फिरते हैं. इन थर्ड कैटेगरी लोगों का आमतौर पर कोई एक फिक्स ऊपर वाला होता नहीं है. बदलते मौसम के हिसाब से इन के ऊपर वाले भी बदलते रहते हैं.

उस इश्तिहार में सचाई का रंग छोड़ कर बाकी सारे रंगों का बड़े करीने से इस्तेमाल किया गया था. इस इश्तिहार में ऐसेऐसे दावे किए गए हैं, जो बातें केवल दूसरों को मूर्ख समझने वाले मूर्ख ही कह सकते हैं. इश्तिहार में वादे ऐसेऐसे, जिन को ऊपर वाला भी चाहे तो इतने कम समय में पूरा नहीं कर पाएगा.

शब्द, शब्द हैं साहब, इन से कुछ भी कह दो. शब्दों में कहां इतनी ताकत कि झूठों को झूठ कहने से रोक लें. शब्द कब झूठों की कलम या जबान से बाहर आने से इनकार कर पाते हैं. शब्द अगर चाहें भी तो समझने वालों को अपनी सुविधा से मतलब निकालने से रोक नहीं पाएंगे.

इन इश्तिहारों का फायदा सिर्फ और सिर्फ उन लोगों को होगा, जिन की तसवीरें इन में छपी हैं. झूठे इश्तिहार को सच मानने वालों का फायदा इश्तिहार लगवाने वाले उठाएंगे. झूठ को सच मानने वाले पहले से मूर्ख हों या न हों, अब मूर्ख कहलाएंगे. Funny Story In Hindi

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