मुलाकात : विनीत और सुधा का ब्याह

विनीत प्लेटफार्म पर बेतहाशा भागता जा रहा था, क्योंकि ट्रेन चल पड़ी थी. अगर यह गाड़ी छूट जाती तो पूरे 6 घंटे बाद ही उसे दूसरी गाड़ी मिलती. यही सोच कर उस ने आखिरी डब्बा पकड़ना चाहा.

अगर वह लड़की उस पल विनीत का हाथ न पकड़ती, तो शायद वह गाड़ी के नीचे ही आ जाता.

उस लड़की का नाम सुधा था. उस ने कहा, ‘‘अगर आप का हाथ छूट जाता तो क्या होता?’’

विनीत कुछ नहीं बोला, बस एहसान जताती निगाहों से उसे देखता रहा.

‘‘अरे, आप तो हांफ रहे हैं… चलिए, मेरी सीट पर बैठ जाइए,’’ कहते हुए सुधा चल पड़ी.

विनीत सुधा के पीछेपीछे चल पड़ा. वह अपनी मंडली में आते हुए बोली, ‘‘वनी, हटना. इन्हें बिठाना है.’’

एक अनजान नौजवान को सुधा के साथ देख कर वनी सवालिया निगाहों से उसे घूरते हुए थोड़ा खिसक गई.

सुधा ने पानी का गिलास विनीत की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लीजिए, गला तर कर लीजिए,’’ फिर उस ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ‘‘वनी, ये साहब भागतेभागते डब्बा पकड़ रहे थे. अगर मैं सहारा…’’

‘‘तो बेचारे चारों खाने चित हो जाते,’’ हंसते हुए सुधा की सहेली वनी ने बात पूरी की, ‘‘अरे सुधा, तू भी बैठ जा हमारे पास.’’

सुधा विनीत के पास बैठ गई.

ट्रेन तेज रफ्तार से भागती जा रही थी. थोड़ी देर चुप्पी छाई रही, फिर विनीत ने पूछा, ‘‘आप कहां तक जाएंगी?’’

‘‘चंडीगढ़,’’ सुधा ने कहा.

‘‘मुझे भी तो वहीं जाना है. वहां किस जगह?’’

‘‘कालेज की ओर से खेलों में हिस्सा लेने जाना है,’’ वनी ने कहा.

‘‘मैं भी तो वहां बैडमिंटन खेलने जा रहा हूं,’’ विनीत ने मुसकराते हुए कहा.

विनीत के सजीलेपन से सुधा बहुत खुश हुई. रास्ते में जहां भी ट्रेन रुकती, चायनाश्ता लेने विनीत ही उतरता था. पूरे 7 घंटे बाद सभी चंडीगढ़ जा पहुंचे.

सुधा और वनी की हौकी की टीम जीत चुकी थी. इधर विनीत का खेल भी बहुत अच्छा रहा.

इन 2-3 दिनों में सुधा और विनीत बहुत करीब आ चुके थे. एक दिन खेल खेलने के बाद शाम को दोनों घूमने निकल पड़े. आसमान पर कालेकाले बादल तैर रहे थे. ठंडी हवा चल रही थी. वे एक पार्क में आ बैठे. रंगबिरंगे फूलों के बीच फुहारे बड़े सुंदर लग रहे थे. विनीत आइसक्रीम ले आया.

सुधा ने कहा, ‘‘इस को लाने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘देखती नहीं, अभी कितनी गरमी पड़ रही है.’’

फिर वह आइसक्रीम का मजा लेते हुए बोला, ‘‘सुधा, 2-3 दिन पता ही नहीं चले कि कैसे कट गए.’’

‘‘हां,’’ सुधा ने धीरे से कहा.

‘‘घर जा कर कहीं तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगी?’’

‘‘नहीं, अब मैं भला तुम्हें कैसे भुला सकती हूं. तुम तो मेरी धड़कन बन चुके हो,’’ विनीत के पास सिमटते हुए सुधा ने जवाब दिया.

‘‘तो मैं समझूं कि मैं तुम्हें प्यार कर सकता हूं?’’

सुधा शरमा गई. जिंदगी में पहली बार उसे किसी से प्यार हुआ था.

अचानक रिमझिम पानी बरसने लगा. विनीत बोला, ‘‘आओ सुधा, चलें. लगता है, तेज बारिश होगी.’’

सुधा उठने लगी तो जोर की बिजली कड़की. सुधा डर कर विनीत से लिपट गई, तो विनीत ने भी उसे बांहों में जकड़ लिया.

पार्क खाली होने लगा था. थोड़ी देर रुकने के लिए वे दोनों वहीं पास की खाली कोठरी में चले गए.

अब जोरों से बारिश होने लगी. उन्हें उम्मीद थी कि बिन मौसम की बरसात है, इसलिए जल्दी ही बादल छंट जाएंगे, लेकिन उन का सोचना गलत था.

रात बहुत हो चुकी थी. बारिश थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. भीगने की वजह से सुधा ठंड से कांप रही थी.

विनीत ने सुधा का हाथ अपने हाथ में ले लिया. इतना भीगने पर भी सुधा के जिस्म से आग बरस रही थी.

विनीत सुधा को अपने आगोश में लेने लगा, तो वह बोली, ‘‘नहीं, अभी नहीं विनीत.’’

‘‘लेकिन, इस मौसम ने मुझे पागल बना दिया है. मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह पाऊंगा,’’ विनीत हवस की आग में जल रहा था.

सुधा का तेजी से दिल धड़क उठा. उस के जिस्म में तूफान उमड़ रहा था. वह भी जैसे सोचनेसमझने की ताकत खो चुकी थी. उस ने खुद को विनीत के हवाले कर दिया.

काफी देर बाद जब बारिश रुकी, तो वे किसी तरह होस्टल में पहुंचे और चुपचाप अपनेअपने कमरे में जा कर दुबक गए.

घर आ कर सुधा को लगा कि वह बहुत बड़ा जुर्म कर के आई है. कहीं विनीत बेवफा निकला, तो क्या होगा. नहीं, उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था. लेकिन अब सोचने से क्या फायदा था. तीर कमान से निकल चुका था.

सुधा अंदर ही अंदर घुटने लगी. अगर कुछ हो गया तो वह अपने पिताजी को क्या बताएगी, जिन्होंने उसे इतनी आजादी दे रखी थी. वह क्यों इस चक्रव्यूह में फंस गई?

तकरीबन एक महीने बाद डाकिया एक लिफाफा दे गया. जब उसे खोला तो सुधा खुशी से झूम उठी. उस में लिखा था, ‘सुधा, अगले महीने मेरे बाबूजी तुम्हारे यहां रिश्ता तय करने आ रहे हैं. दूसरी खुशखबरी है कि मुझे नौकरी भी मिल गई है. तुम्हारा, विनीत.’

जब विनीत के पिता सुधा को देख कर लौटे, तो उन का चेहरा गुस्से से लालपीला हो रहा था. आते ही वे बोले, ‘‘एक बात कान खोल कर सुन लो. तुम्हारी शादी उस बदनाम लड़की से कभी नहीं हो सकती.’’

‘‘लेकिन क्या हुआ? कुछ बताइए न. पिताजी, मुझे पूरी उम्मीद है कि सुधा ऐसी नहीं हो सकती,’’ विनीत जल्दी से बोला.

‘‘मैं कहता हूं, उस लड़की को भूल जाओ. वह तो अच्छा हुआ कि मेरा पुराना दोस्त डाक्टर मदन मिल गया. अगर वह समय पर नहीं बताता, तो

हम अपनी बिरादरी में नाक कटा बैठते. जानते हो, वह लड़की मां बनने वाली है.’’

‘‘लेकिन पिताजी, आप मेरी बात सुन लीजिए,’’ गुजारिश करते हुए विनीत ने कहा.

‘‘नहीं बेटा, मेरे जीतेजी यह रिश्ता नहीं हो सकता,’’ नफरत से उन्होंने मुंह फेर लिया.

‘‘नहीं पिताजी, मेरे जुर्म की सजा आप सुधा को मत दीजिए. गलती मेरी ही है. उस की होने वाली औलाद का पिता मैं ही हूं.’’

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’ फिर थोड़ी देर रुक कर वह मुसकराते हुए बोले, ‘‘बेटा, मुझे खुशी है कि इतना सब होते हुए भी तुम ने उस लड़की को अपनाने की बात की है.’’

विनीत के चेहरे पर मुसकान तैर गई. कुछ दिनों बाद विनीत और सुधा का ब्याह हो गया.

वह अनजान लड़की: स्टेशन पर दिनेश के साथ क्या हुआ

दिनेश नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ‘राजधानी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन के इंतजार में कुरसी पर बैठा था, तभी जींसटौप, सैंडल पहने और मौडल सी दिखने वाली खूबसूरत सी लड़की दनदनाती हुई आई और उस के दोनों हाथ पकड़ कर ‘जीजूजीजू…’ कहते हुए उस के बगल की कुरसी पर बैठ गई.

वह लड़की लगातार बोले जा रही थी, ‘‘पूरे 2 साल बाद आप मिल रहे हैं. इस बीच आप ने अपनी हैल्थ को काफी मेंटेन कर लिया है. सुषमा दीदी कैसी हैं? प्रेम और बिपाशा की क्या खबर है?’’

दिनेश हैरान था, फिर भी इतनी खूबसूरत लड़की से बात करने का लालच वह छोड़ नहीं पा रहा था. वह भी उस की हां में हां मिलाने लगा. सच कहें, तो उसे भी उस लड़की से बात करने में मजा आने लगा था.

तकरीबन 45 मिनट तक वह लड़की दिनेश से बात करती रही. बीचबीच में वह एकाध शब्द बोल लेता था.

उस लड़की ने पूछा, ‘‘जीजू, आप कहां जा रहे हैं?’’

दिनेश ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, ‘‘मैं पटना जा रहा हूं.’’

फिर वह लड़की बोली, ‘‘जीजू, मुझे मुंबई की ट्रेन पकड़नी है. क्या आप मुझे ट्रेन में बिठाने में मदद कर देंगे? प्लीज…’’

दिनेश ने घड़ी देखी. उस की ट्रेन आने में तकरीबन एक घंटे की देरी थी. उस ने लड़की से पूछा, ‘‘तुम्हारी ट्रेन कितने बजे की है?’’

उस ने कहा, ‘‘बस, 10 मिनट में आने वाली है.’’

कुछ देर बाद ही उस लड़की की ट्रेन आ गई. दिनेश ने उस का बैग संभाल लिया और एसी बोगी में उसे बर्थ पर बिठा कर उस का सामान रख दिया.

कुछ पल के बाद लड़की के चेहरे पर बेफिक्री का भाव आया. उस ने दिनेश के दोनों हाथ पकड़ लिए, फिर बोली, ‘‘सर, मैं आप की मदद के लिए सचमुच दिल से आभारी हूं. मेरा नाम प्रिया है. मैं मुंबई में रहती हूं. मैं एक मौडल हूं. ‘‘दरअसल, मैं एक जरूरी काम के सिलसिले में दिल्ली आई थी. आज होटल से निकलते वक्त ही कुछ गुंडेमवाली किस्म के लोग मेरी टैक्सी का पीछा कर रहे थे. उस के बाद वे मेरे पीछेपीछे प्लेटफार्म पर भी घुस आए. फिर आप से मुलाकात हुई और वे गुंडे तितरबितर हो कर लौट गए.

‘‘मैं आप की मदद के लिए सचमुच एहसानमंद हूं. यह रहा मेरा विजिटिंग कार्ड. कभी मुंबई आना हुआ, तो आप मुझे काल कर लेना.’’

दिनेश ने उठतेउठते पूछ ही लिया, ‘माफ कीजिएगा प्रियाजी, मैं भी एक मर्द ही हूं. मुझ पर आप ने कैसे भरोसा कर लिया?’’

प्रिया ने बड़ी शोख अदा से मुसकराते हुए कहा, ‘‘सर, मैं एक राज की बात बताती हूं, लड़कियां किसी जैंटलमैन को पहचानने में कभी भूल नहीं करतीं.’’

प्रिया की यह बात सुन कर दिनेश ने एक लंबी राहत भरी सांस ली, उसे ‘हैप्पी जर्नी’ कहा और ट्रेन से उतर गया.

एक मुलाकात : क्या हालात के साथ समझौते का नाम ही जिंदगी है

नेहा ने होटल की बालकनी में कुरसी पर बैठ अभी चाय का पहला घूंट भरा ही था कि उस की आंखें खुली की खुली रह गईं. बगल वाले कमरे की बालकनी में एक पुरुष रेलिंग पकडे़ हुए खड़ा था जो पीछे से देखने में बिलकुल अनुराग जैसा लग रहा था. वही 5 फुट 8 इंच लंबाई, छरहरा गठा बदन.

नेहा सोचने लगी, ‘अनुराग कैसे हो सकता है. उस का यहां क्या काम होगा?’ विचारों के इस झंझावात को झटक कर नेहा शांत सड़क के उस पार झील में तैरती नावों को देखने लगी. दूसरे पल नेहा ने देखा कि झील की ओर देखना बंद कर वह व्यक्ति पलटा और कमरे में जाने के लिए जैसे ही मुड़ा कि नेहा को देख कर ठिठक गया और अब गौर से उसे देखने लगा.

‘‘अरे, अनुराग, तुम यहां कैसे?’’ नेहा के मुंह से अचानक ही बोल फूट पड़े और आंखें अनुराग पर जमी रहीं. अनुराग भी भौचक था, उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उस की नेहा इतने सालों बाद उसे इस तरह मिलेगी. वह भी उस शहर में जहां उन के जीवन में प्रथम प्रेम का अंकुर फूटा था.

दोनों अपनीअपनी बालकनी में खड़े अपलक एकदूसरे को देखते रहे. आंखों में आश्चर्य, दिल में अचानक मिलने का आनंद और खुशी, उस पर नैनीताल की ठंडी और मस्त हवा दोनों को ही अजीब सी चेतनता व स्फूर्ति से सराबोर कर रही थी.

अनुराग ने नेहा के प्रश्न का उत्तर मुसकराते हुए दिया, ‘‘अरे, यही बात तो मैं तुम से पूछ रहा हूं कि तुम 30 साल बाद अचानक नैनीताल में कैसे दिख रही हो?’’

उस समय दोनों एकदूसरे से मिल कर 30 साल के लंबे अंतराल को कुछ पल में ही पाट लेना चाहते थे. अत: अनुराग अपने कमरे के पीछे से ही नेहा के कमरे में चले आए. अनुराग को इस तरह अपने पास आता देख नेहा के दिल में खुशी की लहरें उठने लगीं. लंबेलंबे कदमों से चलते हुए नेहा अनुराग को बड़े सम्मान के साथ अपनी बालकनी में ले आई.

‘‘नेहा, इतने सालों बाद भी तुम वैसी ही सुंदर लग रही हो,’’ अनुराग उस के चेहरे को गौर से देखते हुए बोले, ‘‘सच, तुम बिलकुल भी नहीं बदली हो. हां, चेहरे पर थोड़ी परिपक्वता जरूर आ गई है और कुछ बाल सफेद हो गए हैं, बस.’’

‘‘अनुराग, मेरे पति आकाश भी यही कहते हैं. सुनो, तुम भी तो वैसे ही स्मार्ट और डायनैमिक लग रहे हो. लगता है, कोई बड़े अफसर बन गए हो.’’

‘‘नेहा, तुम ने ठीक ही पहचाना. मैं लखनऊ में डी.आई.जी. के पद पर कार्यरत हूं. हलद्वानी किसी काम से आया था तो सोचा नैनीताल घूम लूं, पर यह बताओ कि तुम्हारा नैनीताल कैसे आना हुआ?’’

‘‘मैं यहां एक डिगरी कालिज में प्रैक्टिकल परीक्षा लेने आई हूं. वैसे मैं बरेली में हूं और वहां के एक डिगरी कालिज में रसायन शास्त्र की प्रोफेसर हूं. पति साथ नहीं आए तो मुझे अकेले आना पड़ा. अभी तक तो मेरा रुकने का इरादा नहीं था पर अब तुम मिले हो तो अपना कार्यक्रम तो बदलना ही पडे़गा. वैसे अनुराग, तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?’’

अनुराग ने हंसते हुए कहा, ‘‘नेहा, जिंदगी में सब कार्यक्रम धरे के धरे रह जाते हैं, वक्त जो चाहता है वही होता है. हम दोनों ने उस समय अपने जीवन के कितने कार्र्यक्रम बनाए थे पर आज देखो, एक भी हकीकत में नहीं बदल सका… नेहा, मैं आज तक यह समझ नहीं सका कि तुम्हारे पापा अचानक तुम्हारी पढ़ाई बीच में ही छुड़वा कर बरेली क्यों ले गए? तुम ने बी.एससी. फाइनल भी यहां से नहीं किया?’’

नेहा कुछ गंभीर हो कर बोली, ‘‘अनुराग, मेरे पापा उस उम्र में  ही मुझ से जीवन का लक्ष्य निर्धारित करवाना चाहते थे. वह नहीं चाहते थे कि पढ़ाई की उम्र में मैं प्रेम के चक्कर में पड़ूं और शादी कर के बच्चे पालने की मशीन बन जाऊं. बस, इसी कारण पापा मुझे बरेली ले गए और एम.एससी. करवाया, पीएच.डी. करवाई फिर शादी की. मेरे पति बरेली कालिज में ही गणित के विभागाध्यक्ष हैं.’’

‘‘नेहा, कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’

‘‘2 बेटे हैं. बड़ा बेटा इंगलैंड में डाक्टर है और वहीं अपने परिवार के साथ रहता है. दूसरा अमेरिका में इंजीनियर है. अब तो हम दोनों पतिपत्नी अकेले ही रहते हैं, पढ़ते हैं, पढ़ाते है.’’

‘‘अनुराग, अब तक मैं अपने बारे में ही बताए जा रही हूं, तुम भी अपने बारे में कुछ बताओ.’’

‘‘नेहा, तुम्हारी तरह ही मेरा भी पारिवारिक जीवन है. मेरे भी 2 बच्चे हैं. एक लड़का आई.ए.एस. अधिकारी है और दूसरा दिल्ली में एम्स में डाक्टर है. अब तो मैं और मेरी पत्नी अंशिका ही घर में रहते हैं.’’

इतना कह कर अनुराग गौर से नेहा को देखने लगा.

‘‘ऐसे क्या देख रहे हो अनुराग?’’ नेहा बोली, ‘‘अब सबकुछ समय की धारा के साथ बह गया है. जो प्रेम सत्य था, वही मन की कोठरी में संजो कर रखा है और उस पर ताला लगा लिया है.’’

‘‘नेहा…सच, तुम से अलग हो कर वर्षों तक मेरे अंतर्मन में उथलपुथल होती रही थी लेकिन धीरेधीरे मैं ने प्रेम को समझा जो ज्ञान है, निरपेक्ष है और स्वयं में निर्भर नहीं है.’’

‘‘अनुराग, तुम ठीक कह रहे हो,’’ नेहा बोली, ‘‘कभी भी सच्चे प्रेम में कोई लोभ, मोह और प्रतिदान नहीं होता है. यही कारण है कि हमारा सच्चा प्रेम मरा नहीं. आज भी हम एकदूसरे को चाहते हैं लेकिन देह के आकर्षण से मुक्त हो कर.’’

अनुराग कमरे में घुसते बादलों को पहले तो देखता रहा फिर उन्हें अपनी मुट्ठी में बंद करने लगा. यह देख नेहा हंस पड़ी और बोली, ‘‘यह क्या कर रहे हो बच्चों की तरह?’’

‘‘नेहा, तुम्हारी हंसी में आज भी वह खनक बरकरार है जो मुझे कभी जीने की पे्ररणा देती थी और जिस के बलबूते पर मैं आज तक हर मुश्किल जीतता रहा हूं.’’

नेहा थोड़ी देर तक शांत रही, फिर बेबाकी से बोल पड़ी, ‘‘अनुराग, इतनी तारीफ ठीक नहीं और वह भी पराई स्त्री की. चलो, कुछ और बात करो.’’

‘‘नेहा, एक कप चाय और पियोगी.’’

‘‘हां, चल जाएगी.’’

अनुराग ने कमरे से फोन किया तो कुछ ही देर में चाय आ गई. चाय के साथ खाने के लिए नेहा ने अपने साथ लाई हुई मठरियां निकालीं और दोनों खाने लगे. कुछ देर बाद बातों का सिलसिला बंद करते हुए अनुराग बोले, ‘‘अच्छा, चलो अब फ्लैट पर चलें.’’

नेहा तैयार हो कर जैसे ही बाहर निकली, कमरे में ताला लगाते हुए अनुराग उस की ओर अपलक देखने लगा. नेहा ने टोका, ‘‘अनुराग, गलत बात…मुझे घूर कर देखने की जरूरत नहीं है, फटाफट ताला लगाइए और चलिए.’’

उस ने ताला लगाया और फ्लैट की ओर चल दिया.

बातें करतेकरते दोनों तल्लीताल पार कर फ्लैट पर आ गए और उस ओर बढ़ गए जिधर झील के किनारे रेलिंग बनी हुई थी. दोनों रेलिंग के पास खड़े हो कर झील को देखते रहे.

कतार में तैर रही बतखों की ओर इशारा करते हुए अनुराग ने कहा, ‘‘देखो…देखो, नेहा, तुम ने भी कभी इसी तरह तैरते हुए बतखों को दाना डाला था जैसे ये लड़कियां डाल रही हैं और तब ठीक ऐसे ही तुम्हारे पास भी बतखें आ रही थीं, लेकिन तुम ने शायद उन को पकड़ने की कोशिश की थी…’’

‘‘हां अनुराग, ज्यों ही मैं बतख पकड़ने के लिए झुकी थी कि अचानक झील में गिर गई और तुम ने अपनी जान की परवा न कर मुझे बचा लिया था. तुम बहुत बहादुर हो अनुराग. तुम ने मुझे नया जीवन दिया और मैं तुम्हें बिना बताए ही नैनीताल छोड़ कर चली गई, इस का मुझे आज तक दुख है.’’

‘‘चलो, तुम्हें सबकुछ याद तो है,’’ अनुराग बोला, ‘‘इतने वर्षों से मैं तो यही सोच रहा था कि तुम ने जीवन की किताब से मेरा पन्ना ही फाड़ दिया है.’’

‘‘अनुराग, मेरे जीवन की हर सांस में तुम्हारी खुशबू है. कैसे भूल सकती हूं तुम्हें? हां, कर्तव्य कर्म के घेरे में जीवन इतना बंध जाता है कि चाहते हुए भी अतीत को किसी खिड़की से नहीं झांका जा सकता,’’  एक लंबी सांस लेते हुए नेहा बोली.

‘‘खैर, छोड़ो पुरानी बातों को, जख्म कुरेदने से रिसते ही रहते हैं और मैं ने  जख्मों पर वक्त का मरहम लगा लिया है,’’ अनुराग की गंभीर बातें सुन कर नेहा भी गंभीर हो गई.

‘यह अनुराग कुछ भी भूला नहीं है,’ नेहा मन में सोचने लगी, पुरुष हो कर भी इतना भावुक है. मुझे इसे समझाना पड़ेगा, इस के मन में बंधी गांठों को खोलना पडे़गा.’

नेहा पत्थर की बैंच पर बैठी कुछ समय के लिए शांत, मौन, बुत सी हो गई तो अनुराग ने छेड़ते हुए कहा, ‘‘क्या मेरी बातें बुरी लगीं? तुम तो बेहद गंभीर हो गईं. मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था नेहा. सौरी.’’

‘‘अनुराग, यौवनावस्था एक चंचल, तेज गति से बहने वाली नदी की तरह होती है. इस दौर में लड़केलड़कियों में गलतसही की परख कम होती है. अत: प्रेम के पागलपन में अंधे हो कर कई बार दोनों ऐसे गलत कदम उठा लेते हैं जिन्हें हमारा समाज अनुचित मानता है. और यह तो तुम जानते ही हो कि हम भी पढ़ाईलिखाई छोड़ कर

हर शनिवाररविवार खूब घूमतेफिरते थे. नैनीताल का वह कौन सा स्थान है जहां हम नहीं घूमे थे. यही नहीं जिस उद्देश्य के लिए हम मातापिता से दूर थे, वह भी भूल गए थे. यदि हम अलग न हुए होते तो यह सच है कि न तुम कुछ बन पाते और न मैं कुछ बन पाती,’’ कहते हुए नेहा के चेहरे पर अनुभवों के चिह्न अंकित हो गए.

‘‘हां, नेहा तुम बिलकुल ठीक कह रही हो. यदि कच्ची उम्र में हम ने शादी कर ली होती तो तुम बच्चे पालती रहतीं और मैं कहीं क्लर्क बन गया होता,’’ कह कर अनुराग उठ खड़ा हुआ.

नेहा भी उठ गई और दोनों फ्लैट से सड़क की ओर आ गए जो तल्लीताल की ओर जाती है. चारों ओर पहाडि़यां ही पहाडि़यां और बीच में झील किसी सजी हुई थाल सी लग रही थी.

नेहा और अनुराग के बीच कुछ पल के लिए बातों का सिलसिला थम गया था. दोनों चुपचाप चलते रहे. खामोशी को तोड़ते हुए अनुराग बोला, ‘‘अरे, नेहा, मैं तो यह पूछना भूल ही गया कि खाना तुम किस होटल में खाओगी?’’

‘‘भूल गए, मैं हमेशा एंबेसी होटल में ही खाती थी,’’ नेहा बोली.

अपनेअपने परिवार की बातें करते हुए दोनों चल रहे थे. जब दोनों होटल के सामने पहुंचे तो अनुराग नेहा का हाथ पकड़ कर सीढि़यां चढ़ने लगा.

‘‘यह क्या कर रहे हो, अनुराग. मैं स्वयं ही सीढि़यां चढ़ जाऊंगी. प्लीज, मेरा हाथ छोड़ दो, यह सब अब अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘सौरी,’’ कह कर अनुराग ने हाथ छोड़ दिया.

दोनों एक मेज पर आमनेसामने बैठ गए तो बैरा पानी के गिलास और मीनू रख गया.

खाने का आर्डर अनुराग ने ही दिया. खाना देख कर नेहा मुसकरा पड़ी और बोली, ‘‘अरे, तुम्हें तो याद है कि मैं क्या पसंद करती हूं, वही सब मंगाया है जो हम 25 साल पहले इसी तरह इसी होटल में बैठ कर खाते थे,’’ हंसती हुई नेहा बोली, ‘‘और इसी होटल में हमारा प्रेम पकड़ा गया था. खाना खाते समय ही पापा ने हमें देख लिया था. हो सकता है आज भी न जाने किस विद्यार्थी की आंखें हम लोगों को देख रही हों. तभी तो तुम्हारा हाथ पकड़ना मुझे अच्छा नहीं लगा. देखो, मैं एक प्रोफेसर हूं, मुझे अपना एक आदर्श रूप विद्यार्थियों के सामने पेश करना पड़ता है क्योंकि बातें अफवाहों का रूप ले लेती हैं और जीवन भर की सचरित्रता की तसवीर भद्दी हो जाती है.’’

मुसकरा कर अनुराग बोला, ‘‘तुम ठीक कहती हो नेहा, छोटीछोटी बातों का ध्यान रखना जरूरी है.’’

‘‘हां, अनुराग, हम जीवन में सुख तभी प्राप्त कर सकते हैं जब सच्चे प्यार, त्याग और विश्वास को आंचल में समेटे रखें, छोटीछोटी बातों पर सावधानी बरतें. अब देखो न, मेरे पति मुझे अपने से भी ज्यादा प्यार करते हैं क्योंकि मेरा अतीत और वर्तमान दोनों उन के सामने खुली किताब है. मैं ने शाम को ही आकाश को फोन पर सबकुछ बता दिया और वह निश्ंिचत हो गए वरना बहुत घबरा रहे थे.’’

बातों के साथसाथ खाने का सिलसिला खत्म हुआ तो अनुराग बैरे को बिल दे कर बाहर आ गए.

अनुराग और नेहा चुपचाप होटल की ओर चल रहे थे, लेकिन नेहा के दिमाग में उस समय भी कई सुंदर विचार फुदक रहे थे.  वह चौंकी तब जब अनुराग ने कहा, ‘‘अरे, होटल आ गया नेहा, तुम आगे कहां जा रही हो?’’

‘‘ओह, वैरी सौरी. मैं तो आगे ही बढ़ गई थी.’’

‘‘कुछ न कुछ सोच रही होगी शायद…’’

‘‘हां, एक नई कहानी का प्लाट दिमाग में घूम रहा था. दूसरे, नैनीताल की रात कितनी सुंदर होती है यह भी सोच रही थी.’’

‘‘अच्छा है, तुम अपने को व्यस्त रखती हो. साहित्य सृजन रचनात्मक क्रिया है, इस में सार्थकता और उद्देश्य के साथसाथ लक्ष्य भी होता है…’’ होटल की सीढि़यां चढ़ते हुए अनुराग बोला. बात को बीच में ही काटते हुए नेहा बोली, ‘‘यह सब लिखने की प्रेरणा आकाश देते हैं.’’

नेहा अपने कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर जाने लगी तो अनुराग ने पूछा, ‘‘क्या अभी से सो जाओगी? अभी तो 11 बजे हैं?’’

‘‘नहीं अनुराग, कल के लिए कुछ पढ़ना है. वैसे भी आज बातें बहुत कर लीं. अच्छी रही हम लोगों की मुलाकात, ओ. के. गुड नाइट, अनुराग.’’ और एक मीठी मुलाकात की महक बसाए दोनों अपनेअपने कमरों में चले गए.

नेहा अपने कमरे में पढ़ने में लीन हो गई लेकिन अनुराग एक बेचैनी सी महसूस कर रहा था कि वह जिस नेहा को एक असहाय, कमजोर नारी समझ रहा था वह आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की जीतीजागती प्रतिरूप है. एक वह है जो अपनी पत्नी में हमेशा नेहा का रूप देखने का प्रयास करता रहा. सदैव उद्वेलित, अव्यवस्थित रहा. काश, वह भी समझ लेता कि परिस्थितियों के साथ समझौते का नाम ही जीवन है. नेहा ने ठीक ही कहा था, ‘अनुराग, हमें किसी भी भावना का, किसी भी विचार का दमन नहीं करना चाहिए, वरन कुछ परिस्थितियों को अपने अनुकूल और कुछ स्वयं को उन के अनुकूल करना चाहिए तभी हमारे साथ रहने वाले सभी सुखी रहते हैं.’

Holi 2024 सतरंगी रंग: कैसा था पायल का जीवन- भाग 1

पायल ने उस दिन सुबह से ही घर में हंगामा खड़ा कर रखा था. वह तेजतेज चिल्ला कर बोले जा रही थी, ‘‘भाई को बचपन से इंगलिश के प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया है. चलो, मु झे हिंदी मीडियम में पढ़ाया तो कोई बात नहीं, लेकिन अब मैं जो करना चाहती हूं, सब कान खोल कर सुन लो, वह मैं कर के ही रहूंगी.’’

‘‘मगर, तू ठहरी लड़की. तु झे यहीं रह कर जो करना है कर, वह ठहरा लड़का,’’ दादी की यह बात सुन कर पायल उन्हें चुप कराते हुए बोली, ‘‘दादी, आप तो चुप ही रहिए. जमाना कहां से कहां चला गया और आप की घिसीपिटी सोच अभी तक नहीं बदली.’’

पायल एकबारगी दादी को इतना सब बोल तो गई, पर अचानक उसे लगा कि उस ने दादी को कुछ ज्यादा ही बोल दिया है, इसलिए वह मन में पछतावा करते हुए दादी के गले में हाथ डाल कर बोली, ‘‘अरे मेरी प्यारी दादी, सौरी,’’ फिर उस ने अपने दोनों कान पकड़ लिए थे.

दादी के गाल सहलाते हुए पायल बोली, ‘‘जमाना बहुत बदल गया है दादी. अब लड़कियां वे सब काम कर रही हैं, जो पहले सिर्फ लड़के करते थे. दादी, आज हम सब को भी अपनी सोच बदलने की जरूरत है.’’

गांव में कहीं भी कोई भी रूढि़वादी बातें करता, तो पायल उस से उल झ जाती. कई बार तो घर में ही किसी न किसी से किसी न किसी बात पर उस की कहासुनी हो जाती.

इस के बाद पायल अपने होस्टल चली गई. वहां वह अपनी 12वीं जमात की तैयारी में जुटी हुई थी. कुछ महीने बाद ही उस के इम्तिहान शुरू होने वाले थे. उस दिन वह बैठीबैठी सोच रही थी, ‘मैं अपनी जिद पर इतनी दूर पढ़ने आई हूं. मम्मीपापा ने मु झ पर भरोसा कर के ही परदेश में पढ़ने भेजा है. मु झे कुछ तो ऐसा कर के दिखाना चाहिए, जिस से मेरे मम्मीपापा का सिर गर्व से ऊंचा हो सके,’ अभी वह यह सब सोच ही रही थी कि उस के घर से फोन आ गया. उस ने  झट से मोबाइल उठाया और बोल उठी, ‘‘मैं अभी आप सब को याद ही कर रही थी.’’

पर यह क्या, उधर से तो कोई और ही बोल रहा था. किसी अनजान शख्स की आवाज सुन कर पायल घबरा गई.

‘‘अरे, आप कौन बोल रहे हैं?’’ उस के इतना पूछने पर उधर से आवाज आई, ‘हम तुम्हारे पड़ोसी मदन चाचा बोल रहे हैं. तुम्हारी मम्मी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई है, तुम तुरंत यहां आ जाओ.’

पायल घबराते हुए मदन चाचा से पूछ बैठी, ‘‘आखिर हुआ क्या है मेरी मां को?’’

जवाब में मदन चाचा ने बस इतना ही कहा, ‘अरे बिटिया, तुम बस जल्दी से घर आ जाओ.’

पायल फिर कुछ परेशान सा होते हुए बोली, ‘‘चाचा, मेरी पापा से बात तो कराओ.’’

इस पर मदन चाचा ने कहा, ‘पापा अभी यहां नहीं हैं. वे डाक्टर साहब को लेने गए हैं.’

मोबाइल फोन अपनी जेब में रखते हुए पायल ने जल्दी से बैग में 3-4 जोड़ी कपड़े डाले और फटाफट चल पड़ी रेलवे स्टेशन की ओर. उस के मन में तरहतरह की बातें आ रही थीं. रास्ते में वह थोड़ीथोड़ी देर में अपने पापा व चाचा के मोबाइल पर काल करती रही, पर कोई भी उस की काल नहीं उठा रहा था. इस से उस के मन की बेचैनी और भी बढ़ती जा रही थी.

घर के दरवाजे पर काफी भीड़ देख कर पायल की बेचैनी और भी बढ़ गई. वह आपे से बाहर हो गई. उस के कदमों की रफ्तार और भी तेज हो गई. वह एक ही सांस में अपने घर तक पहुंच गई.

पायल ने देखा कि उस की मां को जमीन पर लिटा कर रखा गया था. उन के चारों ओर गांव की कई औरतें बैठी हुई थीं.

इतना देखते ही वह दहाड़ें मारमार कर रोने लगी. वह अपनी दादी से चिपक कर फूटफूट कर रो पड़ी. वह उन से पूछती जाती, ‘‘मां को क्या हो गया… मेरी मां कहां चली गईं मु झे छोड़ कर.’’

पायल दादी के सामने सवालों की  झड़ी लगाती चली जा रही थी, पर दादी के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था.

रूपा चाची ने पायल को चुप कराते हुए कहा, ‘‘चुप हो जा पायल बेटी,’ और फिर वे खुद भी फूटफूट कर रोने लगीं.

रूपा चाची रोतेरोते ही बोलीं, ‘‘अचानक ही सबकुछ हो गया. पता ही नहीं चला कि क्या हुआ था दीदी को. डाक्टर ने आ कर देखा तो बताया कि इन की तो सांस ही बंद हो चुकी है.’’

उस समय पायल को रहरह कर अपनी मां की सभी बातें याद आ रही थीं और रोना भी आ रहा था.

वहां मौजूद सभी औरतें आपस में बातें कर रही थीं कि पायल की मां बहुत ही सौभाग्यशाली थीं, जो वे सुहागिन हो कर अपने पति के कंधे पर सवार हो कर जाएंगी.

ये सब बातें पायल भी सुन रही थी. वह मन ही मन सोचने लगी, ‘इन औरतों को भी कुछ न कुछ बकवास करने को चाहिए. मेरी मां चली गईं और इन सब को उन के सौभाग्य की बातें सू झ रही हैं.’

थोड़ी ही देर में पायल की मां को नहलाधुला कर उन का खूब साजशृंगार किया गया और फिर उन्हें श्मशान घाट ले जाया गया.

मां की मौत के कुछ दिनों बाद से ही पायल के रिश्तेदारों ने उस की दादी से कहना शुरू कर दिया कि अभी सुकेश की उम्र ही क्या है? अभी तो 45 भी पार नहीं किया है उस ने और यह सब हो गया. वह अकेले बेचारा कैसे गुजारेगा अपनी इतनी लंबी जिंदगी? अब उस की दूसरी शादी कर देनी चाहिए.

पायल की दादी को भी लगने लगा था कि सभी ठीक ही तो कह रहे हैं. पायल से भी अपने पापा की उदासी देखी नहीं जा रही थी.

पायल कुछ दिन घर में रह कर होस्टल वापस चली गई. वहां जा कर वह इम्तिहानों की तैयारी में जुट गई.

कुछ महीने बाद ही दादी ने एक बड़ी उम्र की लड़की देख कर पायल के पापा की शादी तय कर दी. शादी की सूचना पायल को भी भेज दी गई.

पायल को जब यह खबर मिली तो वह खुश हुई और सोचने लगी कि मां के जाने के बाद पापा सचमुच अकेले हो गए थे. अब दूसरी शादी हो जाने से उन का अकेलापन दूर हो जाएगा.

पायल इम्तिहान दे कर शादी के समय घर आ गई. उस के पापा की शादी सारे रस्मोरिवाज के साथ बड़ी धूमधाम से हुई. घर में नई दुलहन का स्वागत भी बड़े जोरशोर से हुआ. पायल खुश थी, क्योंकि वह नए खयालों वाली लड़की थी. उसे घिसेपिटे रीतिरिवाज और रूढि़यों से चिढ़ थी.

कुछ समय बाद पायल फिर से अपने होस्टल वापस चली गई और वहां जा कर अपनी पढ़ाई में मसरूफ हो गई.

पर यह क्या, अभी कुछ महीने ही बीते होंगे कि अचानक एक दिन पायल के पास घर से फोन आ गया. पता चला कि उस के चाचाजी सख्त बीमार हैं. उसे जल्द घर आने को कहा गया.

चाचाजी की बीमारी की खबर सुनते ही पायल के दिमाग में तरहतरह के खयाल आने लगे. वह सोचने लगी, ‘अब चाचाजी को क्या हुआ? अभी तो मैं उन्हें अच्छाखासा छोड़ कर आई थी.’

पायल मन में उल झन लिए होस्टल से निकल कर रेलवे स्टेशन पहुंची, फिर बस पकड़ कर अपने गांव पहुंची. आज फिर उस ने दूर से दरवाजे पर भीड़ लगी देखी, तो किसी अनहोनी के डर से?घबरा गई. जब वह घर के नजदीक पहुंची तो उस ने देखा कि उस के मदन चाचा की लाश जमीन पर रखी थी और उस की चाची दहाड़ें मारमार कर रो रही थीं.

बेवफाई: नैना को कैसे हुआ अपनी गलती का अहसास

नैना रसोईघर में रात का खाना पकाने की तैयारी कर रही थी. उस के मोबाइल फोन पर काल आ रहा था. रिंगटोन नहीं बजे, इसलिए उस ने मोबाइल फोन को साइलैंट मोड पर रखा था. वह नहीं चाहती थी कि उस के पति मुकेश को काल करने वाले के बारे में पता चले.

नैना ने मोबाइल फोन उठा कर देखा तो पाया कि उस का आशिक दीपक काल कर रहा था. हालांकि वह अभी उसे कुछ दिन तक काल करने से मना कर चुकी थी, फिर भी उस का बारबार काल आ रहा था. वह मुकेश के डर से कई दिनों से उस का काल नहीं रिसीव कर पा रही थी.

मुकेश कई सालों से गुजरात में प्राइवेट नौकरी कर रहा था. वह 3 महीने पहले घर वापस आ चुका था. कोरोना के वायरस से जितना लोगों को नुकसान नहीं हो रहा था, उस से ज्यादा नैना के लिए उस के पति की घर वापसी से आफत आई हुई थी. वह अपने आशिक दीपक से बात नहीं कर पा रही थी.

जब मुकेश कमाने के लिए गुजरात चला गया था, तो वह लंबे समय तक घर नहीं आ पाया था. वह पैसा मोबाइल से ही ट्रांसफर कर देता था. ऐसे में उसे अकेले ही घर में अकेले जिंदगी गुजारनी पड़ रही थी.

घर में नैना की एकमात्र सास थीं, जो काफी बूढ़ी हो चुकी थीं. वे अकसर बीमार रहती थीं. घर में 2 छोटेछोटे बच्चे होने के चलते उसे ही बाजार से सब्जी और घर के लिए जरूरी सामान लाना पड़ रहा था.

उस दिन दीपक शहर से पढ़ाई कर अपने बाइक से गांव की ओर लौट रहा था, तो नैना पैदल ही भारी थैले उठा कर पास के बाजार से वापस आ रही थी. तभी दीपक की नजर नैना पर पड़ी थी. वह पहले से नैना को जानता था, लेकिन उस से कभी भी बात करने का मौका नहीं मिला था.

नैना को देखते ही दीपक पहचान गया था, इसलिए वह बड़े प्यार से बोला था, ‘भाभीजी, आइए बैठ जाइए. अभी आटोरिकशा नहीं मिल पाएगा. वैसे, आप मुकेश भाई साहब की घरवाली हो न?’

‘हां…’ नैना सिर्फ इतना ही बोल पाई थी. वह दीपक के बारे में नहीं जानती थी, लेकिन उसे अंदाजा था कि इस रास्ते पर जाने वाला कोई न कोई उस के गांव का ही होगा, क्योंकि यह रास्ता सिर्फ उस के गांव की ओर जाता था.

‘बैठिए, आप को घर तक छोड़ देता हूं,’ दीपक उसे ऊपर से नीचे तक देख कर बोला था. दीपक की उस के ब्लाउज से झांकते उभारों पर नजर पड़ी, तो उस का जोश बढ़ने लगा था. वह उसे एकटक देखने लगा था.

दीपक ने थैले को पीछे बाइक पर बांध दिया था, इसलिए सीट पर थोड़ी सी जगह बच पाई थी. यही वजह थी कि नैना को दीपक से चिपक कर बैठना पड़ा था, इसलिए दीपक को उस के उभारों का दबाव महसूस हो रहा था.

वैसे, नैना को भी अच्छा लग रहा था कि इतनी दूर भारी थैले के साथ पैदल चलने से वह बच गई थी.

बाइक से उतारने के बाद दीपक ने नैना का मोबाइल नंबर मांग लिया था. वह न चाहते हुए भी अपना मोबाइल नंबर देने से इनकार नहीं कर सकी थी.

दीपक ने 1-2 बार हालचाल के बहाने नैना से बातचीत शुरू की और कुछ दिन में ही हंसीमजाक पर भी उतर आया था. धीरेधीरे मोबाइल फोन से बातचीत होने के चलते उन दोनों में खुल कर बातें होने लगी थीं.

थोड़े दिनों के बाद उन दोनों के बीच बातचीत इतनी हद तक बढ़ गई थी कि जब नैना की सास गहरी नींद में सो जाती थीं, तो वह दीपक को चुपके से बुला कर कई बार मजे ले चुकी थी. अब वह दीपक के बगैर नहीं रह पा रही थी.

लेकिन कोरोना काल के दौरान नैना का पति मुकेश काम छोड़ कर घर वापस आ गया था. तब से वह नौकरी पर लौटने का नाम ही नहीं ले रहा था, जबकि दीपक नैना से नहीं मिलने के चलते काफी बेताब था और कई बार फोन कर चुका था.

अभी नैना रसोईघर में खाना बनाने की तैयारी कर रही थी और मुकेश अपने कमरे में टैलीविजन पर पुराना क्रिकेट मैच शो देखने में बिजी था, इसलिए उसे दीपक का काल उठाने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई थी. वह मोबाइल कानों से लगा कर धीरे से बोली, ‘‘हैलो…’’

दूसरी तरफ से दीपक बोला, ‘नैना डार्लिंग, क्या हालचाल है?’

‘‘सब ठीकठाक है. तुम अपना हाल बताओ…’’

‘तुम मुझ से बात भी नहीं कर रही हो. जब से तुम्हारा पति आया है, तुम एक बार भी नहीं मिली हो. कब तक तुम्हारा पति घर पर कुंडली मार कर बैठा रहेगा?

‘मैं तुम से मिलने के लिए बेचैन हो रहा हूं. अब मेरा मन नहीं मान रहा है. मैं तुम्हारे सुंदर हुस्न का दीदार करना चाहता हूं. तुम मिलने का कोई इंतजाम करो, वरना मैं तुम्हारे घर पहुंच जाऊंगा.’

‘‘ऐसा बिलकुल भी मत करना, वरना हम दोनों कहीं के नहीं रहेंगे. मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं 1-2 दिन के लिए अपने पति को कहीं भेजने का उपाय सोचती हूं, फिर तुम्हें बुला लूंगी. तब सारे अरमान पूरे कर लेना,’’ नैना ने इतना कह कर फोन काट दिया.

नैना का शातिर दिमाग काम नहीं कर पा रहा था कि आखिर वह अपने पति को कहां भेजे? उसे कोई तरकीब नजर नहीं आ रही थी.

आज जब नैना बिस्तर पर सोने गई, तो मुकेश से बोली, ‘‘आप कब तक घर में बैठे रहेंगे? कोरोना महामारी धीरेधीरे कम हो रही है. अब कमाने के लिए बाहर जाइए. आखिर घर का खर्चा कैसे चलेगा?

‘‘आप तकरीबन 3 महीने से घर बैठे हुए हैं. घर के सारे रुपए और सामान खत्म हो गया है. ऐसे बैठे रहेंगे, तो भोजन का इंतजाम कहां से होगा?’’

मुकेश तुनक कर बोला, ‘‘देखो, मैं ने बहुत दिनों तक बाहर नौकरी कर ली. अब मैं सोचता हूं कि क्यों न घर पर ही कोई धंधा कर लूं. इस से तुम्हारे और बच्चों के साथ रहने का भरपूर मौका भी मिलेगा. बाहर प्राइवेट नौकरी करने में कितनी परेशानी है, यह मैं ही जानता हूं.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन घर पर कौन सा धंधा करने वाले हो? धंधा करने के लिए मोटी रकम की जरूरत होती है. बिना पैसे के तो धंधा हो नहीं सकता है. क्या उस धंधे से हम लोगों का गुजारा हो जाएगा? यह सब विचार कर लेना भी जरूरी है.’’

‘‘हां, वह सब तो ठीक है, उसी पर तो मैं सोचविचार कर रहा हूं,’’ मुकेश ने चिंता जाहिर करते हुए जवाब दिया.

‘‘और दूसरी बात यह है कि आप बाहर रहते हो, तो मैं अपनी बिरादरी की औरतों में गर्व से कहती हूं कि मेरा आदमी बाहर नौकरी करता है. आप जब घर में रहने लगोगे, तो दूसरे पतियों की तरह घर की मुरगी दाल बराबर हो जाओगे.

‘‘आप की गांव में इज्जत कम हो जाएगी और यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा,’’ कहते हुए नैना मुकेश के सीने से चिपक गई.

मुकेश नैना को अपनी बांहों में कसते हुए सोचने लगा कि यह सही कह रही है. वह अपना धंधा करने के लिए सोच तो जरूर रहा था, लेकिन अभी तय नहीं कर पा रहा था कि किस धंधे को किया जाए? कोई भी धंधा करने में काफी रुपए की जरूरत होती है और उस के पास जमापूंजी भी नहीं थी.

इसी बीच नैना नकली गुस्सा जाहिर करते हुए बोली, ‘‘आप को जो करना है, वही कीजिए,’’ फिर उस ने मुंह फेरा और चादर ओढ़ कर सो गई.

अगले दिन मुकेश बाहर से घूमघाम कर आया, तो उस ने नैना को बताया, ‘‘मैं दोबारा गुजरात जा रहा हूं. आज मैं ने अपने फैक्टरी मालिक से बात की थी. वह मुझे काम देने को तैयार हो गया है. वह कह रहा था कि काम शुरू हो गया है.

‘‘सभी कामगारों को फोन कर के बुलाया जा रहा है. इतना ही नहीं, मेरा मालिक मुझे कुछ पैसे बढ़ा कर भी देने के लिए राजी हो गया है.’’

‘‘यह तो अच्छी बात है… लेकिन जाना कब है?’’

‘‘मुझे आज ही निकलना पड़ेगा, वरना फिर ट्रेन 2 दिन बाद ही मिलेगी…’’

यह सब सुन कर नैना मन ही मन बहुत खुश हुई. अब वह अपने पति को गुजरात भेजने की तैयारी करने लगी. वह खुशीखुशी रसोईघर में जा कर रास्ते के लिए भोजन तैयार कर देना चाहती थी.

जब नैना रसोईघर की तरफ जाने के लिए मुड़ी, तो मुकेश ने प्यार से उस की कलाई पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया और मनुहार करते हुए बोला, ‘‘छोड़ो खानापीना. वह तो रास्ते में मिल ही जाएगा, लेकिन तुम्हारा साथ तो नहीं मिलेगा न, इसलिए जाने से पहले मैं कुछ घंटे तुम्हारे साथ बिता लेना चाहता हूं…’’

यह कहते हुए मुकेश ने नैना को बिस्तर पर लिटा दिया. वह भी उस के आगोश में समा गई. आज उसे अपने पति पर काफी प्यार आ रहा था. वह अंदर से बहुत खुश थी. खुशी से उस की आंखों से आंसू छलक पड़े.

मुकेश उस के आंसुओं को पोंछते हुए बोला, ‘‘तुम तो अभी से ही दुखी होने लगी. कहो तो मैं नहीं जाता हूं…’’

नैना ने अपने हाथों को मुकेश के होंठों पर रख दिया और प्यार से बोली, ‘‘आप भले ही मुझ से दूर जा रहे हो, लेकिन आप का दिल मेरे पास रहेगा…’’ फिर वे दोनों एकदूसरे से कस कर लिपट गए.

नैना के दिमाग में अपने आशिक दीपक की मर्दानगी का खेल भी चल रहा था.

दर्द का एहसास : क्या हुआ मृणाल की बेवफाई का अंजाम

‘‘हैलो, एम आई टौकिंग टु मिस्टर मृणाल?’’ एक मीठी सी आवाज ने मृणाल के कानों में जैसे रस घोल दिया.

‘‘यस स्पीकिंग,’’ मृणाल ने भी उतनी ही विनम्रता से जवाब दिया.

‘‘सर, दिस इज निशा फ्रौम होटल सन स्टार… वी फाउंड वालेट हैविंग सम मनी, एटीएम कार्ड ऐंड अदर इंपौर्टैंट कार्ड्स विद योर आईडैंटिटी इन अवर कौन्फ्रैंस हौल. यू आर रिक्वैस्टेड टु कलैक्ट इट फ्रौम रिसैप्शन, थैंक यू.’’

सुनते ही मृणाल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह कल अपनी कंपनी की तरफ से एक सेमिनार अटैंड करने इस होटल में गया था. आज सुबह से ही अपने पर्स को ढूंढ़ढूंढ़ कर परेशान हो चुका था. निशा की इस कौल ने उस के चेहरे पर सुकून भरी मुसकान ला दी.

‘‘थैंक यू सो मच निशाजी…’’ मृणाल ने कहा, मगर शायद निशा ने सुना नहीं, क्योंकि फोन कट चुका था. लंच टाइम में मृणाल होटल सन स्टार के सामने था. रिसैप्शन पर बैठी खूबसूरत लड़की को देखते ही उस के चेहरे पर एक बार फिर मुसकान आ गई.

‘‘ऐक्सक्यूज मी, माइसैल्फ मृणाल… आप शायद निशाजी हैं…’’ मृणाल ने कहा तो निशा ने आंखें उठा कर देखा.

‘‘ओ या…’’ कहते हुए निशा ने काउंटर के नीचे से मृणाल का पर्स निकाल कर उस का फोटो देखा. तसल्ली करने के बाद मुसकराते हुए उसे सौंप दिया.

‘‘थैंक्स अगेन निशाजी… इफ यू डोंटमाइंड, कैन वी हैव ए कप औफ कौफी प्लीज…’’ मृणाल निशा का यह एहसान उतारना चाह रहा था.

‘‘सौरी, इट्स ड्यूटी टाइम… कैच यू लेटर,’’ कहते हुए निशा ने जैसे मृणाल को भविष्य की संभावना का हिंट दे दिया.

‘‘ऐज यू विश. बाय द वे, क्या मुझे आप का कौंटैक्ट नंबर मिलेगा? ताकि मैं आप को कौफी के लिए इन्वाइट कर सकूं?’’ मृणाल ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा तो निशा ने अपना विजिटिंग कार्ड उस की तरफ बढ़ा दिया. मृणाल ने थैंक्स कहते हुए निशा से हाथ मिलाया और कार्ड को पर्स में डालते हुए होटल से बाहर आ गया.

‘‘कोई मिल गया… मेरा दिल गया… क्या बताऊं यारो… मैं तो हिल गया…’’ गुनगुनाते हुए मृणाल ने घर में प्रवेश किया तो उषा को बड़ा आश्चर्य हुआ. रहा नहीं गया तो आखिर पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, बड़ा रोमांटिक गीत गुनगुना रहे हैं? ऐसा कौन मिल गया?’’

‘‘लो, अब गुनगुनाना भी गुनाह हो गया?’’ मृणाल ने खीजते हुए कहा.

‘‘गुनगुनाना नहीं, बल्कि आप से तो आजकल कुछ भी पूछना गुनाह हो गया,’’ उषा ने भी झल्ला कर कहा.

‘‘जब तक घर से बाहर रहते हैं, चेहरा 1000 वाट के बल्ब सा चमकता रहता है, घर में घुसते ही पता नहीं क्यों फ्यूज उड़ जाता है,’’ मन ही मन बड़बड़ाते हुए उषा चाय बनाने चल दी.

चाय पी कर मृणाल ने निशा का कार्ड जेब से निकाल कर उस का नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया. फिर उसे व्हाट्सऐप पर एक मैसेज भेजा, ‘हाय दिस इज मृणाल…

हम सुबह मिले थे… आई होप कि आगे भी मिलते रहेंगे…’

रातभर इंतजार करने के बाद अगली सुबह रिप्लाई में गुड मौर्निंग के साथ निशा की एक स्माइली देख कर मृणाल खुश हो गया.

औफिस में फ्री होते ही मृणाल ने निशा को फोन लगाया. थोड़ी देर हलकीफुलकी औपचारिक बातें करने के बाद उस ने फोन रख दिया. मगर यह कहने से नहीं चूका कि फुरसत हो तो कौल कर लेना.

शाम होतेहोते निशा का फोन आ ही गया. मृणाल ने मुसकराते हुए कौल रिसीव की, ‘‘कहिए हुजूर कैसे मिजाज हैं जनाब के?’’ मृणाल की आवाज में रोमांस घुला था.

निशा ने भी बातों ही बातों में अपनी अदाओं के जलवे बिखेरे जिन में एक बार फिर मृणाल खो गया. लगभग 10 दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा. दोनों एकदूसरे से अब एक हद तक खुल चुके थे.

आज मृणाल ने हिम्मत कर के निशा के सामने एक बार फिर कौफी पीने का प्रस्ताव रखा जिसे निशा ने स्वीकार लिया. हालांकि मन ही मन वह खुद भी उस का सान्निध्य चाहने लगी थी. अब तो हर 3-4 दिन में कभी निशा मृणाल के औफिस में तो कभी मृणाल निशा के होटल में नजर आने लगा था.

2 महीने हो चले थे. निशा मृणाल की बोरिंग जिंदगी में एक ताजा हवा के झौंके की तरह आई और देखते ही देखते अपनी खुशबू से उस के सारे वजूद को अपनी गिरफ्त में ले लिया. मृणाल हर वक्त महकामहका सा घूमने लगा. पहले तो सप्ताह या 10 दिन में वह अपनी शारीरिक जरूरतों के लिए उषा के नखरे भी उठाया करता था, मगर जब से निशा उस की जिंदगी में आई है उसे उषा से वितृष्णा सी होने लगी थी. वह खयालों में ही निशा के साथ अपनी जरूरतें पूरी करने लगा था. बस उस दिन का इंतजार कर रहा था जब ये खयाल हकीकत में ढलेंगे.

दिनभर पसीने से लथपथ, मुड़ेतुड़े कपड़ों और बिखरे बालों में दिखाई देती उषा उसे अपने मखमल से सपनों में टाट के पैबंद सी लगने लगी. उषा भी उस के उपेक्षापूर्ण रवैए से तमतमाई सी रहने लगी. कुल मिला कर घर में हर वक्त शीतयुद्ध से हालात रहने लगे. उषा और मृणाल एक बिस्तर पर सोते हुए भी अपने बीच मीलों का फासला महसूस करने लगे थे. मृणाल का तो घर में जैसे दम ही घुटने लगा था.

अब मृणाल और निशा को डेटिंग करते हुए लगभग 3 महीने हो चले थे. आजकल मृणाल कभीकभी उस के मैसेज बौक्स में रोमांटिक शायरीचुटकुले आदि भी भेजने लगा था. जवाब में निशा भी कुछ इसी तरह के मैसेज भेज देती थी, जिन्हें पढ़ कर मृणाल अकेले में मुसकराता रहता. कहते हैं कि इश्क और मुश्क यानी प्यार और खुशबू छिपाए नहीं छिपते. उषा को भी मृणाल का यह बदला रूप देख कर उस पर कुछकुछ शक सा होने लगा था. एक दिन जब मृणाल बाथरूम में था, उषा ने उस का मोबाइल चैक किया तो निशा के मैसेज पढ़ कर दंग रह गई.

गुस्से में तमतमाई उषा ने फौरन उसे आड़े हाथों लेने की सोची, मगर फिर कुछ दिन और इंतजार करने और पुख्ता जानकारी जुटाने का खयाल कर के अपना इरादा बदल दिया और फोन वापस रख कर सामान्य बने रहने का दिखावा करने लगी जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

एक दिन मृणाल के औफिस की सालाना गैटटुगैदर पार्टी में उस की सहकर्मी रजनी ने उषा से कहा, ‘‘क्या बात है उषा आजकल पति को ज्यादा ही छूट दे रखी है क्या? हर वक्त आसमान में उड़ेउड़े से रहते हैं.’’

‘‘क्या बात हुई? मुझे कुछ भी आइडिया नहीं है… तुम बताओ न आखिर क्या चल रहा है यहां?’’ उषा ने रजनी को कुरेदने की कोशिश की.

‘‘कुछ ज्यादा तो पता नहीं, मगर लंच टाइम में अकसर किसी का फोन आते ही मृणाल औफिस से बाहर चला जाता है. एक दिन मैं ने देखा था… वह एक खूबसूरत लड़की थी,’’ रजनी ने उषा के मन में जलते शोलों को हवा दी.

उषा का मन फिर पार्टी से उचट गया. घर पहुंचते ही उषा ने मृणाल से सीधा सवाल किया, ‘‘रजनी किसी लड़की के बारे में बता रही थी… कौन है वह?’’

‘‘है मेरी एक दोस्त… क्यों, तुम्हें कोई परेशानी है क्या?’’ मृणाल ने प्रश्न के बदले प्रश्न उछाला.

‘‘मुझे भला क्या परेशानी होगी? जिस का पति बाहर गुलछर्रे उड़ाए, उस पत्नी के लिए तो यह बड़े गर्व की बात होगी न…’’ उषा ने मृणाल पर ताना कसा.

‘‘कभी तुम ने अपनेआप को शीशे में देखा है? अरे अच्छेभले आदमी का मूड खराब करने के लिए तुम्हारा हुलिया काफी है. अब अगर मैं निशा के साथ थोड़ा हंसबोल लेता हूं तो तुम्हारे हिस्से का क्या जाता है?’’ मृणाल अब आपे से बाहर हो चुका था.

‘‘मेरे हिस्से में था ही क्या जो जाएगा… जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो किसी और को क्या दोष दिया जाए…’’ उषा ने बात आगे बढ़ाना उचित नहीं समझा और कमरे की लाइट बंद कर के सो गई.

इस शनिवार को निशा का जन्मदिन था. मृणाल ने उस से खास अपने लिए 2-3 घंटे का टाइम मांगा था जिसे निशा ने इठलाते हुए मान लिया था. सुबह 11 बजे होटल सन स्टार में ही उन का मिलना तय हुआ. उत्साह और उत्तेजना से भरा मृणाल निर्धारित समय से पहले ही होटल पहुंच गया था. निशा उसे एक वीआईपी रूम में ले कर गई. बुके के साथ मृणाल ने उसे ‘हैप्पी बर्थडे’ विश किया और एक हलका सा चुंबन उस के गालों पर जड़ दिया. मृणाल के लिए यह पहला अवसर था जब उस ने निशा को टच किया था. निशा ने कोई विरोध नहीं किया तो मृणाल की हिम्मत कुछ और बढ़ी. उस ने निशा को बांहों के घेरे में कस कर होंठों को चूम लिया. निशा भी शायद आज पूरी तरह समर्पण के मूड में थी. थोड़ी ही देर में दोनों पूरी तरह एकदूसरे में समा गए.

होटल के इंटरकौम पर रिंग आई तो दोनों सपनों की दुनिया से बाहर आए. यह रूम शाम को किसी के लिए बुक था, इसलिए अब उन्हें जाना होगा. हालांकि मृणाल निशा की जुल्फों की कैद से आजाद नहीं होना चाह रहा था, क्योंकि आज जो आनंद उस ने निशा के समागम से पाया था वह शायद उसे अपने 10 साल के शादीशुदा जीवन में कभी नहीं मिला था. जातेजाते उस ने निशा की उंगली में अपने प्यार की निशानीस्वरूप एक गोल्ड रिंग पहनाई. एक बार फिर उसे किस किया और पूरी तरह संतुष्ट हो दोनों रूम से बाहर निकल आए.

अब तो दिनरात कौल, मैसेज, व्हाट्ऐप, चैटिंग… यही सब चलने लगा. बेकरारी हद से ज्यादा बढ़ जाती थी तो दोनों बाहर भी मिल लेते थे. इतने पर भी चैन न मिले तो महीने में 1-2 बार होटल सन स्टार के किसी खाली कमरे का उपयोग भी कर लेते थे.

निशा के लिए मृणाल की दीवानगी बढ़ती ही जा रही थी. हर महीने उस की सैलरी का एक बड़ा हिस्सा निशा पर खर्च होने लगा था. नतीजतन घर में हर वक्त आर्थिक तंगी रहने लगी. उषा ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, समाज में रहने के कायदे भी बताए, मगर मृणाल तो जैसे निशा के लिए हर रस्मरिवाज तोड़ने पर आमादा था. ज्यादा विरोध करने पर कहीं बात तलाक तक न पहुंच जाए, यही सोच कर पति पर पूरी तरह से आश्रित उषा ने इसे अपनी नियति मान कर सबकुछ वक्त पर छोड़ दिया और मृणाल की हरकतों पर चुप्पी साध ली.

सालभर होने को आया. मृणाल अपनी दोस्ती की सालगिरह मनाने की प्लानिंग करने लगा. मगर इन दिनों न जाने क्यों मृणाल को महसूस होने लगा था कि निशा का ध्यान उस की तरफ से कुछ हटने सा लगा है. आजकल उस के व्यवहार में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही थी. कई बार तो वह उस का फोन भी काट देती. अकसर उस का फोन बिजी भी रहने लगा है. उस ने निशा से इस बारे में बात करने की सोची, मगर निशा ने अभी जरा बिजी हूं, कह कर उस का मिलने का प्रस्ताव टाल दिया तो मृणाल को कुछ शक हुआ.

एक दिन वह उसे बिना बताए उस के होटल पहुंच गया. निशा रिसैप्शन पर नहीं थी. वेटर से पूछने पर पता चला कि मैडम अपने किसी मेहमान के साथ डाइनिंगहौल में हैं. मृणाल उधर चल दिया. उस ने जो देखा वह उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसकाने के लिए काफी था. निशा वहां सोफे पर अपने किसी पुरुष मित्र के कंधे पर सिर टिकाए बैठी थी. उस की पीठ हौल के दरवाजे की तरफ होने के कारण वह मृणाल को देख नहीं पाई.

मृणाल चुपचाप आ कर रिसैप्शन पर बने विजिटर सोफे पर बैठ कर निशा का इंतजार करने लगा. लगभग आधे घंटे बाद निशा अपने दोस्त का हाथ थामे नीचे आई तो मृणाल को यों अचानक सामने देख कर सकपका गई. फिर अपने दोस्त को विदा कर के मृणाल के पास आई.

‘‘मैं ये सब क्या देख रहा हूं?’’ मृणाल ने अपने गुस्से को पीने की भरपूर कोशिश की.

‘‘क्या हुआ? ऐसा कौन सा तुम ने दुनिया का 8वां आश्चर्य देख लिया जो इतना उबल रहे हो?’’ निशा ने लापरवाही से अपने बाल झटकते हुए कहा.

‘‘देखो निशा, मुझे यह पसंद नहीं… बाय द वे, कौन था यह लड़का? उस ने तुम्हारा हाथ क्यों थाम रखा था?’’ मृणाल अब अपने गुस्से को काबू नहीं रख पा रहा था.

‘‘यह मेरा दोस्त है और हाथ थामने से क्या मतलब है तुम्हारा? मैं क्या तुम्हारी निजी प्रौपर्टी हूं जो मुझ पर अपना अधिकार जता रहे हो?’’ अब निशा का भी पारा चढ़ने लगा था.

‘‘मगर तुम तो मुझे प्यार करती हो न? तुम्हीं ने तो कहा था कि मैं तुम्हारा पहला प्यार हूं…’’ मृणाल का गुस्सा अब निराशा में बदलने लगा था.

‘‘हां कहा था… मगर यह किस किताब में लिखा है कि प्यार दूसरी या तीसरी बार नहीं किया जा सकता? देखो मृणाल, यह मेरा निजी मामला है, तुम इस में दखल न ही दो तो बेहतर है. तुम मेरे अच्छे दोस्त हो और वही बने रहो तो तुम्हारा स्वागत है मेरी दुनिया में अन्यथा तुम कहीं भी जाने के लिए आजाद हो,’’ निशा ने उसे टका सा जवाब दे कर उस की बोलती बंद कर दी.

‘‘लेकिन वह हमारा रिश्ता… वे ढेरों बातें… वह मिलनाजुलना… ये तुम्हारे हाथ में मेरी अंगूठी… ये सब क्या इतनी आसानी से एक ही झटके में खत्म कर दोगी तुम? तुम्हारा जमीर तुम्हें धिक्कारेगा नहीं?’’ मृणाल अब भी हकीकत को स्वीकार नहीं कर पा रहा था.

‘‘क्यों, जमीर क्या सिर्फ मुझे ही धिक्कारेगा? जब तुम उषा को छोड़ कर मेरे पास आए थे तब क्या तुम्हारे जमीर ने तुम्हें धिक्कारा था? वाह, तुम करो तो प्यार… मैं करूं तो बेवफाई… अजीब दोहरे मानदंड हैं तुम्हारे… क्या अपनी खुशी ढूंढ़ने का अधिकार सिर्फ तुम पुरुषों के ही पास है? हम महिलाओं को अपने हिस्से की खुशी पाने का कोई हक नहीं?’’ निशा ने मृणाल को जैसे उस की औकात दिखा दी.

आज उसे उषा के दिल के दर्द का एहसास हो रहा था. वह महसूस कर पा रहा था उस की पीड़ा को. क्योंकि आज वह खुद भी दर्द के उसी काफिले से गुजर रहा था. मृणाल भारी कदमों से उठ कर घर की तरफ चल दिया जहां उषा गुस्से में ही सही, शायद अब भी उस के लौटने का इंतजार कर रही थी.

सुदामा: आखिर क्यों हुआ अनुराधा को अपने फैसले पर पछतावा?

अनुराधा पूरे सप्ताह काफी व्यस्त रही और अब उसे कुछ राहत मिली थी. लेकिन अब उस के दिमाग में अजीबोगरीब खयालों की हलचल मची हुई थी. वह इस दिमागी हलचल से छुटकारा पाना चाहती थी. उस की इसी कोशिश के दौरान उस का बेटा सुदेश आ धमका और बोला, ‘‘मम्मी, कल मुझे स्कूल की ट्रिप में जाना है. जाऊं न?’’

‘‘उहूं ऽऽ,’’ उस ने जरा नाराजगी से जवाब दिया, लेकिन सुदेश चुप नहीं हुआ. वह मम्मी से बोला, ‘‘मम्मी, बोलो न, मैं जाऊं ट्रिप में? मेरी कक्षा के सारे सहपाठी जाने वाले हैं और मैं अब कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूं. अब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ रहा हूं.’’

उस की बड़ीबड़ी आंखें उस के जवाब की प्रतीक्षा करने लगीं. वह बोली, ‘‘हां, अब मेरा बेटा बहुत बड़ा हो गया है और सातवीं कक्षा में पढ़ रहा है,’’ कह कर अनु ने उस के गाल पर हलकी सी चुटकी काटी.

सुदेश को अब अपेक्षित उत्तर मिल गया था और उसी खुशी मे वह बाहर की ओर भागा. ठीक उसी समय उस के दाएं गाल पर गड्ढा दे कर वह अपनी यादों में खोने लगी.

अनु को याद आई सुदेश के पिता संकेत से पहली मुलाकात. जब दोनों की जानपहचान हुई थी, तब संकेत के गाल पर गड्ढा देख कर वह रोमांचित हुई थी. एक बार संकेत ने उस से पूछा था, ‘‘तुम इतनी खूबसूरत हो, गुलाब की कली की तरह खिली हुई और गोरे रंग की हो, फिर मुझ जैसे सांवले को तुम ने कैसे पसंद किया?’’

इस पर अनु नटखट स्वर में हंसतेहंसते उस के दाएं गाल के गड्ढे को छूती हुई बोली थी, ‘‘इस गड्ढे ने मुझे पागल बना दिया है.’’

यह सुनते ही संकेत ने उसे बांहों में भर लिया था. यही थी उन के प्रेम की शुरूआत. दोनों के मातापिता इस शादी के लिए राजी हो गए थे. दोनों ग्रेजुएट थे. वह एक बड़ी फर्म में अकाउंटैंट के पद पर काम कर रहा था. उस फर्म की एक ब्रांच पुणे में भी थी.

दोपहर को अनु घर में अकेली थी. सुदेश 3 दिन के ट्रिप पर बाहर गया हुआ था और इधर क्रिसमस की छुट्टियां थीं. हमेशा घर के ज्यादा काम करने वाली अनु ने अब थोड़ा विश्राम करना चाहा था. अब वह 35 पार कर चुकी थी और पहले जैसी सुडौल नहीं रही थी. थोड़ी सी मोटी लगने लगी थी. लेकिन संकेत के लिए दिल बिलकुल जवान था. वह उस के प्यार में अब भी पागल थी. लेकिन अब उस के प्यार में वह सुगंध महसूस नहीं होती थी.

जब भी वह अकेली होती. उस के मन में तरहतरह के विचार आने लगते. उसे अकसर ऐसा महसूस होता था कि संकेत अब उस से कुछ छिपाने लगा है और वह नजरें मिला कर नहीं बल्कि नजरें चुरा कर बात करता है. पहले हम कितने खुले दिल से बातचीत करते थे, एकदूसरे के प्यार में खो जाते थे. मैं ने उस के पहले प्यार को अब भी अपने दिल के कोने में संभाल कर रखा है. क्या मैं उसे इतनी आसानी से भुला सकती हूं? मेरा दिल संकेत की याद में हमेशा पुणे तक दौड़ कर जाता है लेकिन वह…

उस का दिल बेचैन हो गया और उसे लगा कि अब संकेत को चीख कर बताना चाहिए कि मेरा मन तुम्हारी याद में बेचैन है. अब तुम जरा भी देर न करो और दौड़ कर मेरे पास आओ. मेरा बदन तुम्हारी बांहों में सिमट जाने के लिए तड़प रहा है. कम से कम हमारे लाड़ले के लिए तो आओ, जरा भी देर न करो.

बच्चा छोटा था तब सासूमां साथ में रहती थीं. अनजाने में ही सासूमां की याद में उस की आंखें डबडबा आईं. उसे याद आया जब सुरेश सिर्फ 2 साल का था. घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए उसे नौकरी तो करनी ही थी. ऐसे में संकेत का पुणे तबादला हो गया था.

वे मुंबई जैसे शहर में नए फ्लैट की किस्तें चुकातेचुकाते परेशान थे, लेकिन क्या किया जा सकता था. बच्चे को घर में छोड़ कर औफि जाना उसे बहुत अखरता था, लेकिन सासूमां उसे समझाती थीं, ‘बेटी, परेशान मत हो. ये दिन भी निकल जाएंगे. और बच्चे की तुम जरा भी चिंता मत करो, मैं हूं न उस की देखभाल के लिए. और पुणे भी इतना दूर थोड़े ही है. कभी तुम बच्चे को ले कर वहां चली जाना, कभी वह आ जाएगा.’

सासूमां की यह योजना अनु को बहुत भा गई थी और यह बात उस ने तुरंत संकेत को बता दी थी. फिर कभी वह पुणे जाती तो कभी संकेत मुंबई चला आता. इस तरह यह आवाजाही का सिलसिला चलता रहा. इस दौड़धूप में भी उन्हें मजा आ रहा था.

कुछ दिनों बाद बच्चे का स्कूल जाना शुरू हो गया, तो उस की पढ़ाई में हरज न हो यह सोच कर दोनों की सहमति से उसे पुणे जाना बंद करना पड़ा. संकेत अपनी सुविधा से आता था. इसी बीच उस की सासूमां चल बसीं. उन की तेरही तक संकेत मुंबई  में रहा. तब उस ने अनु को समणया था, ‘अनु, मुझे लगता है तुम बच्चे को ले कर पुणे आ जाओ. वह वहां की स्कूल में पढ़ेगा और तुम भी वहां दूसरी नौकरी के लिए कोशिश कर सकोगी.’

इस प्रस्ताव पर अनु ने गंभीरता से नहीं सोचा था क्योंकि फ्लैट की कई किस्तें अभी चुकानी थीं. उस ने सिर्फ यह किया कि वह अपने बेटे सुरेश को ले कर अपनी सुविधानुसार पुणे चली जाती थी. संकेत दिल खोल कर उस का स्वागत करता था. बच्चे को तो हर पल दुलारता रहता था.

बच्चे की याद में तो उस ने कई रातें जाग कर काटी थीं. वह बेचैनी से करवट बदलबदल कर बच्चे से मिलने के लिए तड़पता था1 उस ने ये सब बातें साफसाफ बता दी थीं, लेकिन अनु ने उसे समणया था, ‘एक बार हमारी किस्तें अदा हो जाएं तो हम इस झंझट से छूट जाएंगे. तुम्हारे अकेलेपन को देख कर मेरा दिल भी रोता है. मेरे साथ तो सुरेश है, रिश्तेदार भी हैं. यहां तुम्हारा तो कोई नहीं. तुम्हें औफिस का काम भी घर ला कर करना पड़ता है, यह जान कर मुझे बहुत दुख होता है. मन तो यही करता है कि तुम जाग कर काम करते हो, तो तुम्हें गरमागरम चाय का कप ला कर दूं, तुम्हारे आसपास मंडराऊं, जिस से तुम्हारी थकावट दूर हो जाए.’

यह सुन कर संकेत का सीना गर्व से फूल जाता था और वह कहता था, ‘तुम मेरे पास नहीं हो फिर भी यादों में तो तुम हमेशा मेरे साथ ही रहती हो.’

अब फ्लैट की सारी किस्तों की अदायगी हो चुकी थी और फ्लैट का मालिकाना हक भी उन्हें मिल चुका था. सुदेश अब सातवीं कक्षा में पढ़ रहा था. उस ने फैसला कर लिया कि अब वह कुछ दिनों के लिए ही सही पुणे में जा कर रहेगी. सरकारी नौकरी के कारण उसे छुट्टी की समस्या तो थी नहीं.

उस ने संकेत को फोन किया दफ्तर के फोन पर, ‘‘हां, मैं बोल रही हूं.’’

‘‘हां, कौन?’’ उधर से पूछा गया.

‘‘ऐसे अनजान बन कर क्यों पूछ रहे हो, क्या तुम ने मेरी आवाज नहीं पहचानी?’’ वह थोड़ा चिड़चिड़ा कर बोली.

‘‘हां तो तुम बोल रही हो, अच्दी हो न? और सुदेश की पढ़ाई कैसे चल रही है?’’ उस के स्वर में जरा शर्मिंदगी महसूस हो रही थी.

‘‘मैं ने फोन इसलिए किया कि सुदेश 3 दिनों के लिए बाहर गया हुआ है और मैं भी छुट्टी ले रही हूं. अकेलपन से अब बहुत ऊब गई हूं, इसलिए कल सुबह 10 बजे तक तुम्हारे पास पहुंच रही हूं. क्या तुम मुझे लेने आओगे स्टेशन पर?’’

‘‘तुम्हें इतनी जल्दी क्यों है? शाम तक आओगी तो ठीक रहेगा, क्योंकि फिर मुझे छुट्टी लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

संकेत का रूखापन अनु को समझने में देर नहीं लगी. एक समय उस से मिलने के लिए तड़पने वाला संकेत आज उसे टालने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उस के प्यार को दिल में संजोने का पूरा प्रयास भी कर रहा था. दरअसल, अब वह दोहरी मानसिकता से गुजर रहा था.

काफी साल अकेले रहने के कारण इस बीच एक 17-18 साल की लड़की से उसे प्यार हो गया था. वह एक बाल विधवा रिश्तेदार थी. वह उस के यहां काम करती थी. वह काफी समझदार, खूबसूरत और सातवीं कक्षा तक पढ़ीलिखी थी. संकेत के सारे काम वह दिल लगा कर किया करती थी और घर की देखभाल भलीभांति करती थी.

कुछ दिनों बाद संकेत के अनुरोध पर चपरासी चाचा की सहमति से वह उसी घर में रहने लगी थी. फिर जबजब अनु वहां जाती तो उसे अपना पूरा सामान समेट कर चाचा के यहां जा कर रहना पड़ता था. यह सिलसिला कई सालों तक चलता रहा.

अभी अनु के आने की खबर मिलते ही वह परेशान हो गया था और अनु से बात करते वक्त उस की जुबान सूखने लगी थी. अब उसे तुरंत घर जा कर पारू को वहां से हटाना जरूरी था. उसे पारू पर दया आती, क्योंकि जबजब ऐसा होता वह काफी समझदारी से काम लेती. उसे अपने मालिक और मालकिन की परवाह थी, क्योंकि उसे उन का ही आसरा था1 कम उम्र में ही उस ने पूरी गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया था.

शाम को अनु संकेत के साथ घर पहुंची तो रसोईघर से जायकेदार भोजन की खुशबू आ रही थी. इस खुशबू से उस की भूख बढ़ गई और उस ने हंसतेहंसते पूछा, ‘‘वाह, इतना अच्छा खाना बनाना तुम ने कब सीखा?’’

वह भी हंसतेहंसते बोला, ‘‘अपनी नौकरानी अभीअभी खाना बना कर गई है.’’

दूसरे दिन सुबहसुबह पारू आई और दोनों के सामने गरमागरम चाय के 2 कप रखे. चाय की खुशबू से वह तृप्त हो गई. थोड़ी देर बाद वह घर के चारों ओर फैले छोटे से बाग में टहलने लगी. घास का स्पर्श पा कर वह विभोर हो उठी. पेड़पौधों की सोंधी महक ने उस का मन मोह लिया.

अचानक उस का ध्यान एक 6-7 साल के बच्चे की ओर गया. वह वहां अकेला ही लट्टू घुमाने के खेल में खोया हुआ था. धीरेधीरे वह उस की ओर बढ़ी तो वह भागने की कोशिश करने लगा. अनु ने उस की छोटी सी कलाई पकड़ ली और बोली, ‘‘मैं कुछ नहीं करूंगी. ये बताओ तुम्हारा नाम क्या है?’’

वह घबरा गया तो कुछ नहीं बोला और सिर्फ देखता ही रह गया. उस के फूले हुए गाल और बड़ीबड़ी आंखें देख कर अनु को बहुत अच्छा लगा. वह हंस दी तो नादान बालक भी हंसा. उस की हंसी के साथ उस के दाएं गाल का गड्ढा भी मानो उस की ओर देख कर हंसने लगा.

यह देख कर उस का दिल दहल गया क्योंकि वह बच्चा बिलकुल संकेत की तरह दिख रहा था. ऐसा लगा कि संकेत का मिनी संस्करण उस के समाने खड़ा हो गया हो. वह दहलीज पर बैठ गई. उसे लगा कि अब आसमान टूट कर उसी पर गिरेगा और वह खत्म हो जाएगी. एक अनजाने डर से उस का दिल धड़कने लगा. उस का गला सूख गया और सुबह की ठंडीठंडी बयार में भी वह पसीने से तर हो गई. उस की इस स्थिति को वह नन्हा बच्चा समझ नहीं पाया.

‘‘क्या, अब मैं जाऊं?’’ उस ने पूछा.

इस पर अनु ने ठंडे दिल से पूछा, ‘‘तुम कहां रहते हो?’’

वह बोला, ‘‘मैं तो यहीं रहता हूं, लेकिन कल शाम को मैं और मेरी मां चाचा के घर चले गए. सुबह मैं मां के साथ आया तो मां बोलीं, बाहर बगीचे में ही खेलना, घर में मत आना.’’

बोझिल मन से उस ने उस मासूम बच्चे को पास ले कर उस के दाएं गाल के गड्ढे को हलके से चूमा. अब उसे मालूम हुआ कि पारू उस की खातिरदारी इतनी मगन हो कर क्यों करती है, उस की पसंद के व्यंजन क्यों बनाती है.

उसे संकेत के अनुरोध और विनती याद आने लगी, ‘‘हम सब एकसाथ रहेंगे. तुम्हारी और सुरेश की मुझे बहुत याद आती है.’’

लगता है मुझे उस समय उस की बात मान लेनी चाहिए थी. लेकिन मैं ने ऐसा क्या किया? मेरी गलती क्या है? मैं ने भी खुद के लिए नहीं बल्कि अपने परिवार के लिए नौकरी की. वह पुरुष है, इसलिए उस ने ऐसा बरताव किया. उस की जगह अगर मैं होती और ऐसा करती तो? क्या समाज व मेरा पति मुझे माफ कर देता? यहां कुदरत का कानून तो सब के लिए एक जैसा ही है. स्त्रीपुरुष दोनों में सैक्स की भावना एक जैसी होती है, तो उस पर काबू पाने की जिम्मेदारी सिर्फ स्त्री पर ही क्यों?

कहा जाता है कि आज की स्त्री बंधनों से मुक्त है, तो फिर वह बंधनों का पालन क्यों करती है? हम स्त्रियों को बचपन से ही माताएं सिखाती हैं इज्जत सब से बड़ी दौलत होती है, लेकिन उस दौलत को संभालने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ स्त्रियों की है?

यह सब सोचते हुए उस के आंसू वह निकले तो उस ने अपने आंचल से पोंछ डाले. उसे रोता देख कर वह बच्चा फिर डर कर भागने की कोशिश करने लगा, तो अनु जरा संभल गई. उस ने उस मासूम बच्चे को अपने पास बिठा लिया और कांपते स्वर में बोली, ‘‘बेटा, तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, लेकिन तुम ने अब तक अपना नाम नहीं बताया? अब बताओ क्या नाम है तुम्हारा?’’

अब वह बच्चा निडर बन गया था, क्योंकि उसे अब थोड़ा धीरज जो मिल गया था. वह मीठीमीठी मुसकान बिखेरते हुए बोला, ‘‘सुदाम.’’ और फिर बगीचे में लट्टू से खेलने लगा.

अम्मी कहां : कहां खो गई थीं मोहिन की अम्मी

‘‘अम्मीजान, आप यहीं खड़ी रहना, मैं टिकट ले कर अभी आता हूं,’’ कह कर मोहिन खान अपनी मां को रेलवे प्लेटफार्म की तरफ जाने वाली सीढ़ी के पास छोड़ कर टिकट लेने चला गया.

टिकट खिड़की पर लाइन लंबी थी, जो बस स्टौप तक पहुंच गई. उसे इतनी भीड़ होने का अंदाजा न था. उस ने सोचा, ‘टिकट ही तो लेनी है. उस में कौन सी बड़ी बात है.’

पर जब वह टिकट लेने पहुंचा, तो सब ने उसे ‘लाइन से आओ’ कह कर पीछे भेज दिया. वह सब से पीछे जा कर खड़ा हो गया और लाइन आगे बढ़ने का इंतजार करता रहा. पर कहां? लाइन वहीं की वहीं, धीरेधीरे चींटी की तरह आगे बढ़ रही थी.

मोहिन खान को अपनी मां को ले कर भिंडी बाजार जाना था. कल उस के भतीजे का पहला जन्मदिन था. चूंकि उस की मां की उम्र हो चुकी थी. उस ने सोचा कि आज मां को वहां छोड़ कर कल शाम अपनी बीवी और बच्चे को साथ ले जाएगा, इसलिए मां को भाई के घर छोड़ कर उसे किसी भी हाल में वापस लौटना था, क्योंकि नौकरों के भरोसे वह दुकान छोड़ नहीं सकता था, इसलिए उसे जल्दी थी.

वहां उस की अम्मी इंतजार कर के थक गईं. मन ही मन कुढ़ते हुए वे सोचने लगीं कि पता नहीं कहां चला गया. कह कर गया था कि टिकट लाने जा रहा हूं, पर इतनी देर हो गई और अब तक नहीं लौटा.

उन्होंने गुस्से में आव देखा न ताव धीरेधीरे सीढ़ी चढ़ कर 2 नंबर के प्लेटफार्म पर आ गईं. यह सोच कर कि उन का बेटा पीछेपीछे आ जाएगा. जो ट्रेन आई, वे उस में चढ़ गईं.

उन्हें अपनी सहेली की बेटी सुलताना मिली. उसे भी भिंडी बाजार जाना था. वे कई सालों बाद उस से मिलीं, तो बतियाने लगीं. इधर मोहिन खान टिकट ले कर सीढि़यों के पास पहुंचा. वहां अपनी अम्मी को न देख कर वह घबरा गया. उस ने टिकटघर के आसपास का सारा इलाका छान मारा, पर उसे उस की अम्मी कहीं नहीं नजर आईं.

शाम ढल चुकी थी. अंधेरा भी हो गया. सड़कें, दुकान, मकान, होटल यहां तक कि टिकटघर के साथ प्लेटफार्म भी बिजली की रोशनी से जगमगाने लगे थे.

उस ने सभी प्लेटफार्म देख लिए, पर अम्मी का कहीं पता नहीं चला. पूछताछ करे भी तो किस से? उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे.

मोहिन खान ने बारीबारी से सब को फोन कर के पूछ लिया, पर कहीं से भी उस की अम्मी के पहुंचने की खबर नहीं मिली. अब तो वह और भी डर गया. उस के परिवार वाले भी परेशान थे. भिंडी बाजार में फोन करने पर उस के भाईजान और भाभीजान दोनों परेशान हो गए. कुर्ला से भायखाला का आधे घंटे का सफर है, फिर वे कहां रह गईं.

भिवंडी में मझले भाई असलम को पता चला, तो वह भी परेशान हो गया. गोवंडी में मोहिन खान की आपा को जब यह बात पता चली, तो वे बहुत गुस्से में बिफर कर फोन पर ही चिल्लाईं, ‘कितने लापरवाह हो तुम लोग? अभी कल ही तो छोड़ आई थी मैं उन्हें, कहीं कोई झगड़ा तो नहीं कर लिया किसी ने?’ कह कर गुस्से से फोन रख दिया.

मझला भाई भी अपने परिवार के साथ अम्मी को ढूंढ़ता हुआ पहुंच गया. फिर सब ने मिल कर अंदाजा लगाया कि कहीं वे वापस मोहिन खान के घर तो नहीं चली गईं?

यह सोच कर मझले भाई ने उसे फोन लगा कर कहा, ‘‘देखो मोहिन, तुम घबराना मत. तुम एक काम करो, एक बार घर जा कर देख लो. कहीं वे वापस न चली गई हों. अगर वे घर पर न हों, तो भी फिक्र मत करो. तुम दुकान बंद कर के बीवीबच्चों के साथ यहां चले आओ. हम सब मिल कर ढूंढ़ते हैं.’’

‘‘अच्छा भाईजान,’’ कह कर मोहिन खान सीधा घर गया. वहां अम्मी को न पा कर दोनों मियांबीवी कुछ देर बाद भिंडी बाजार पहुंच जाते हैं.

सब कितने खुश थे कि कल असलम के बच्चे का पहला जन्मदिन मनाया जाने वाला था. सब सोच रहे थे कि बड़े धूमधाम से जन्मदिन मनाएंगे कि अचानक यह खबर मिली. जहां कल के जश्न की तैयारियां होनी थीं, आज वहां एक अजीब सी खामोशी छाई थी.

जैसेजैसे रात होती गई, सब की फिक्र भी बढ़ती जा रही थी. सब के चेहरे मायूस थे. फिर सब ने तय किया कि अगर कल शाम तक कोई खबर नहीं मिली या अम्मी नहीं लौटीं, तो पुलिस में शिकायत दर्ज करेंगे. रात के साढ़े 11 बजे थे. सब थक चुके थे, पर किसी को भी न भूख थी, न आंखों में नींद.

अचानक दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खुलते ही सामने अम्मी को एक अजनबी के साथ देख कर सब को हैरानी हुई. सब के चेहरे खुशी से चमक उठे.

अम्मी ने उस अजनबी को भीतर बुलाया और सोफे पर बैठाया. बहू से कहा, ‘‘शबनम, जरा पानी तो लाना.’’

‘‘जी अम्मीजान,’’ कह कर वह रसोईघर में गई और एक ट्रे में एक जग पानी भर कर और कुछ खाली गिलास भी ले आई.

तब तक अम्मी भी बैठ चुकी थीं. उन को पानी पिला कर वह जाने लगी, तो अम्मी ने कहा, ‘‘बहू, ये हमारे मेहमान हैं, आज रात यहीं रुकेंगे. इन के खानेपीने का इंतजाम करो.’’

‘‘जी अम्मीजान,’’ कह कर वह वापस रसोईघर में चली गई.

अब अम्मी बेटों और दामाद की ओर मुड़ कर बोलीं, ‘‘यह मेरी सहेली का बेटा है, जो मुझे छोड़ने आया है. हुआ यों कि मैं मोहिन खान के इंतजार में खड़ीखड़ी थक कर यह सोच कर धीरेधीरे चल पड़ी कि मेरे पीछे चला आएगा, पर वह नजर ही नहीं आया…

‘‘मैं यह सोच कर गाड़ी में भी चढ़ गई कि वह पीछे ही होगा, पर इस का तो पता ही नहीं था.

‘‘फिर मुझे मेरी सहेली की बेटी सुलताना मिली. उस से पता चला कि उस की मां की तबीयत आजकल खराब चल रही है, इसलिए मैं उसे देखने चली गई थी. वह भिंडी बाजार में ही रहती है.’’

यह सुन कर सब खामोश हो गए. कुछ ही देर में शबनम ने आ कर अम्मी के कान में कहा, ‘‘अम्मीजान, खाना लग चुका है.’’

‘‘चलो, खाना लग चुका है,’’ अम्मी ने कहा.

बाद में अम्मी अपनी सहेली के बेटे अजीज को मेहमानों के कमरे में पहुंचा कर खुद भी आराम करने अपने कमरे में चली गईं. बाकी सब भी सोने के लिए जाने की तैयारी में थे कि ऐसे में असलम के मोबाइल फोन की घंटी बजी. सामने से पूछा गया… ‘अम्मी कहां…’

इस से पहले कि उस की बात पूरी होती, असलम ने कहा, ‘‘अम्मी यहां…’’ और इस से आगे वह खुशी के मारे कुछ भी नहीं कह पाया.

बुरी संगत : निवेदिता कैसे फंस गई थी जाल में

आज निवेदिता को यह बात समझ में आ गई कि दोस्ती हमेशा अच्छे लोगों से ही करनी चाहिए. आज अपने एक दोस्त के चलते वह मारीमारी फिर रही है. पुलिस उस के पीछे पड़ी है और कभी भी पकड़े जाने का डर है. एक बार पुलिस के हत्थे चढ़ जाने के बाद फिर कितनी परेशानी होगी, यह सोच कर उस का दिल बैठा जा रहा है.

जाधव की तसवीर उस ने आज अखबार में देखी. मोटेमोटे शब्दों में डाक्टर को ब्लैकमेल करने की खबर छपी थी.

जाधव ने डाक्टर बत्रा से एक करोड़ रुपए की रकम मांगी थी. रकम न देने पर उस ने डाक्टर के उस वीडियो को वायरल करने की धमकी दी थी, जिसमें उस की प्रेमिका के साथ उस के रोमांटिक पल गुप्त तरीके से फिल्माए गए थे. सब से बड़ी बात यह थी कि यह फिल्म खुद निवेदिता ने बनाई थी.

एक दिन डाक्टर बत्रा ने किसी बात पर निवेदिता को बुरी तरह डांटा था और उस की नजर में उसे बगैर किसी गलती के डांटा गया था. निवेदिता ने उस समय डाक्टर को कुछ नहीं कहा था, पर उसी समय उस ने फैसला कर लिया था कि वह डाक्टर को आगे से कभी ऐसा करने का मौका नहीं देगी.

निवेदिता को पता था कि डाक्टर बत्रा से मिलने एक औरत आती है. डाक्टर उस के साथ घंटों एकांत में बिताता है. उस के आने पर कई बार वह मरीजों को काफी देर तक इंतजार करवाता है.

नर्स होने के नाते निवेदिता का डाक्टर के केबिन तक प्रवेश था और कई बार उस ने डाक्टर को उस औरत के साथ ऐसी हालत में देखा था, जिस से जाहिर था कि उन दोनों के बीच कुछ है.

डाक्टर बत्रा की डांट से आहत निवेदिता ने उसे सबक सिखाने के लिए अपने मोबाइल फोन से डाक्टर बत्रा की उस औरत के साथ का वीडियो बना लिया था. चूंकि वह काफी दिनों से डाक्टर के क्लिनिक में काम करती थी, इसलिए उस के लिए यह काम मुश्किल न था. उस ने एक खिड़की से दोनों के प्यार के पलों का वीडियो बना लिया था.

डाक्टर बत्रा मस्ती के सागर में गोते लगा रहा था और उसे इस बात की भनक भी न लगी. निवेदिता ने सोच रखा था कि अगली बार अगर डाक्टर उसे कुछ कहेगा तो वह वीडियो क्लिप दिखला कर उसे धमकाएगी.

पर बाद में न कभी डाक्टर बत्रा ने ऐसा कुछ उस के साथ किया और न ही उसे डाक्टर को धमकी देने की जरूरत पड़ी. बात आईगई हो गई, बल्कि वह तो इस बात को भूल सी गई थी. लेकिन जिस क्लिप को उस ने डाक्टर को फंसाने के लिए बनाया था, उस में डाक्टर तो फंसा ही, वह खुद भी फंस गई.

हुआ यों कि निवेदिता का एक जानने वाला जाधव उस के पास अकसर आताजाता रहता था. वह घर पर ही आसपास के लोगों का हलकाफुलका इलाज किया करती थी. छोटोमोटी बीमारियों में जाधव उसी से दवा लिया करता था. धीरेधीरे दोनों की जानपहचान बढ़ गई थी.

जाधव के बारे में निवेदिता जानती थी कि वह गुंडा किस्म का आदमी है, चोरीचकारी भी करता है, पर उस से उस का रिश्ता ठीक ही था. उस के साथ उस का बरताव कभी ऐसा नहीं था, जिस से उसे एतराज होता. वह आता, इलाज करवाता और चला जाता. लेकिन थोड़ी नजदीकियां तो बढ़ ही गई थीं.

एक दिन निवेदिता किसी मरीज को देख रही थी, तभी जाधव आया था. उसे किसी के लिए दवा चाहिए थी.

निवेदिता दूसरे मरीज से बात कर रही थी, तभी जाधव उस के मोबाइल फोन से खेलने लगा. इसी बीच डाक्टर बत्रा की क्लिप पर उस की नजर पड़ गई और उस ने उस क्लिप को अपने मोबाइल फोन में ट्रांसफर कर लिया.

आज अखबार से निवेदिता को मालूम हुआ कि उस क्लिप को दिखला कर जाधव डाक्टर बत्रा से पहले भी एक बार 30 लाख रुपए और एक बार 70 लाख रुपए ले चुका था. डाक्टर ने अपनी इज्जत बचाने की खातिर भारीभरकम रकम उसे दे दी थी. इतनी बड़ी रकम पा कर जाधव का लालच बढ़ता चला गया और इस बार उस ने एक करोड़ रुपए की मांग की और डाक्टर ने इस बार पुलिस की शरण ली.

पुलिस ने टैलीफोन की बातचीत के आधार पर जाधव को पकड़ लिया था और जाधव ने अपने मोबाइल फोन में क्लिप पाने की बात बताई थी.

पुलिस निवेदिता की तलाश में थी. आज नौकरी देने वाले अपने ही डाक्टर को नुकसान पहुंचाने के इरादे और बुरी संगत के फेर में उसे मारामारा फिरना पड़ रहा है.

उड़ान : क्या कांता ने की गिरिराज से शादी

‘‘मैं ने कह दिया न कि मैं तुम्हारे उस गिरिराज से शादी नहीं करूंगी. सब कहते हैं कि वह दिखने में मुझ से छोटा लगता है. फिर वह करता भी क्या है… लोगों की गाड़ियों की साफसफाई ही न?’’ कांता ने दोटूक शब्दों में कह दिया.

‘‘उस से नहीं करेगी, तो क्या किसी नवाब से शादी करेगी? अरी, तू बिरादरी में हमारी नाक कटाने पर क्यों तुली है. तू सोचती है कि तेरे कहने से हम तय की हुई शादी तोड़ देंगे? इस भुलावे में मत रहना.

‘‘मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं शादियां सगाइयां वगैरह जोड़तीतोड़ती रहूं. अभी तो मेरे पास शादी के लिए दोदो लड़कियां और बैठी हैं,’’ पत्नी देवकी को बोलते देख कर पति मुरारी भी पास आ गया था.

कांता के छोटे भाईबहन, जो बाप की रेहड़ी के पास खड़े हो कर सुबहसुबह कुछ पैसा कमाने के जुगाड़ में प्रैस कर रहे थे, भी वहां आ गए थे.

मुरारी ने बेटी कांता को सुनाते हुए अपनी पत्नी देवकी से कहा, ‘‘कह दे अपनी छोरी से, इतना हल्ला न मचाए. ब्यूटीपार्लर में काम क्या करने लगी है, अपनेआप को हेमामालिनी समझने लगी है. ज्यादा बोलेगी, तो घर से बाहर कर दूंगा. ज्यादा चबरचबर करना मुझे अच्छा नहीं लगता है.’’

मां के सामने तो कांता शायद थोड़ी देर बाद चुप भी हो जाती, पर उन दोनों की तकरार में बाप के आते ही वह गुस्से में आ गई और बोली, ‘‘अच्छा बापू, यह तुम कह रहे हो. शाम को शराब पी कर जो तमाशा तुम करते हो, वह याद नहीं है तुम्हें?

‘‘अभी कल शाम को ही तो तुम ने मुझ से शराब के लिए 20 रुपए लिए थे. तुम्हें तो अपनी शराब से ही फुरसत नहीं है. मैं अपना कमाती हूं. मुझे तो यहां पर रहते हुए भी शर्म आती है. कुछ ज्यादा पैसा मिलने लगे, तो मैं खुद ही यहां से कहीं दूर चली जाऊंगी.’’

जब से कांता ब्यूटीपार्लर में नौकरी करने जाने लगी थी, तब से उस के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.

वैसे, गलीगली में खुल गए ब्यूटीपार्लर इन्हीं झुग्गीझोंपड़ियों की लड़कियों के बल पर ही चल रहे हैं. इन से जितना मरजी काम ले लो. ये खुश भी रहती हैं और ग्राहक की जीहुजूरी भी खूब कर लेती हैं.

कांता ब्यूटीपार्लर में पिछले 6 महीने से काम कर रही है. शुरूशुरू में वहां की मालकिन अलका मैडम ने उस से बस मसाज वगैरह का काम ही कराया था, पर अब तो वह भौंहों की कटाईछंटाई और बाल भी काट लेती है.

कांता बातूनी है और टैलीविजन पर आने वाले गानों के साथ सारासारा दिन गुनगुनाती रहती है. जब से उस की नौकरी लगी है, तब से छुट्टी वाले दिन भी वह छुट्टी नहीं करती है. जिस दिन दूसरी लड़कियां नहीं आतीं, उस दिन भी अकेली कांता के दम पर ब्यूटीपार्लर खुला रहता है.

अलका मैडम कांता से बहुत खुश हैं और वह उन की इतनी भरोसेमंद हो गई है कि वे अपना कैश बौक्स भी उसे सौंप जाती हैं.

पर आज सुबह से ही कांता का मूड खराब था. चहकने से सुबह की शुरुआत करने वाली कांता आज गुमसुम थी. ब्यूटीपार्लर पहुंच कर न तो उस ने अपने नए तरीके से बाल बनाए थे, न ही अलका मैडम से कहा था, ‘मैडम, जब तक कोई ग्राहक नहीं आता, तब तक मैं आप के बालों में मेहंदी लगा दूं या फेसियल कर दूं…’

कांता की चुप्पी को तोड़ने के लिए अलका मैडम ने ही पूछ लिया, ‘‘क्या हुआ कांता?’’

1-2 बार पूछने पर कांता ने सारी रामकहानी अलका मैडम को सुना दी और लगी रोने. रोतेरोते उस ने कहा, ‘‘मैडम, आप मुझे अपने घर में क्यों नहीं रख लेतीं? बदले में मुझ से अपने घर का कुछ भी काम करा लेना. घर वालों को कुछ तो मजा चखा दूं. मैं अपने साथ जोरजबरदस्ती बरदाश्त नहीं करूंगी.’’

‘‘ठीक है, पर मुझे सोचने के लिए थोड़ा सा समय तो दे. और सुन, यह मत भूलना कि मांबाप बच्चों का बुरा नहीं चाहते हैं. उन के नजरिए को भी समझने की कोशिश कर. दूसरों के कहने पर क्यों जाती है. क्या तू ने अपना मंगेतर देखा है?’’ अलका मैडम ने पूछा.

‘‘हां देखा था, अपनी सगाई वाले दिन. लेकिन मुझे उस का चेहरा जरा भी याद नहीं है.’’

अभी वे दोनों बातें कर ही रही थीं कि साफसफाई करने वाली शीला ने कहा, ‘‘बाहर कोई लड़का कांता को पूछ रहा है.

‘‘लड़का…’’ कांता चौंकी, ‘‘कहीं गिरिराज तो नहीं?’’

‘‘मैं किसी गिरिराज को नहीं पहचानती,’’ शीला ने जवाब दिया.

‘‘जो भी है, उस से कह दो कि यह औरतों का ब्यूटीपार्लर है, मैं लड़कों के बाल नहीं काटती,’’ कांता बोली.

‘‘अरे, इतनी देर में उस से मिल क्यों नहीं लेती?’’ अलका मैडम ने कहा.

कांता बाहर आई, तो उस ने देखा कि सीढि़यों पर एक खूबसूरत सा नौजवान चश्मा लगाए, जींसजैकेट पहने खड़ा था.

‘कौन है यह? शायद किसी ग्राहक के लिए मुझे लेने या समय तय करने के लिए आया हो,’ कांता ने सोचा और बोली, ‘‘आप को जोकुछ पूछना है, अंदर आ कर मैडम से पूछ लो.’’

‘‘मैं तो आप ही के पास आया हूं,’’ वह नौजवान मुसकराते हुए बोला, ‘‘कहीं बैठाओगी नहीं?’’

‘‘मैं तुम… आप को पहचानती नहीं,’’ कांता ने सकपकाते हुए कहा.

‘‘मैं गिरिराज हूं.’’

‘‘हाय…’’ कांता झेंपी, ‘‘तुम… मेरा मतलब आप यहां?’’ थोड़ी देर तक तो उस से कुछ बोला नहीं गया. पहले वह जमीन की तरफ देखती रही, फिर आंख उठा कर उस ने उस नौजवान की तरफ देखा, तो वह भी एकटक उस की ही तरफ देख रहा था.

कांता फिर झेंप गई. बातूनी होने पर भी उस से बोल नहीं फूट रहे थे, तभी बाहर का हालचाल जानने के लिए अलका मैडम भी बाहर निकलीं.

कांता की पीठ अलका मैडम की तरफ थी और वह उन के रास्ते में खड़ी थी. रास्ता रुका देख कर गिरिराज ने कांता की बांह पकड़ कर एक तरफ खींचते हुए कहा, ‘‘देखो, ये मैडम जाना चाहती हैं. तुम एक तरफ हट जाओ.’’

गिरिराज के हाथ की छुअन के रोमांच पर कांता मन ही मन खुश होते हुए भी ऊपर से गुस्सा कर बोली, ‘‘तुम मुझे हाथ लगाने वाले कौन होते हो?’’

इसी बीच अलका मैडम वापस अंदर चली गईं.

‘‘अरे, अभी तक नहीं पहचाना? मैं गिरिराज हूं, तुम्हारा गिरिराज. मां और बाबूजी कल तुम्हारे यहां शादी की तारीख तय करने के लिए गए थे.

‘‘मैं ने उन से कह दिया था कि मुझ से बिना पूछे कोई तारीख पक्की मत कर आना. सोचा था कि तुम से मिल कर ही तारीख तय करूंगा.

‘‘इसी बहाने एकदो बार मिल तो लेंगे. चलो, छुट्टी ले लो. चाहे तो शाहरुख खान की नई फिल्म देख लेंगे या फिर किसी रैस्टोरैंट में पिज्जा खिला लाऊं?’’ गिरिराज ने अपनी बात रखी.

कांता के मन में लड्डू फूट रहे थे. अच्छा हुआ कि वह सुबह गुस्से में अलका मैडम के घर रहने नहीं पहुंच गई.

‘‘मैं घर पर तो बता कर के नहीं आई हूं,’’ कांता ने नरम होते हुए कहा.

‘‘तो क्या हुआ? चोरीछिपे मिलने  का मजा ही कुछ और है. और फिर मेरे साथ चलने में तुम्हें कैसी हिचक? देखती नहीं, सब फिल्मों में हीरोहीरोइन मांबाप को बिना बताए ही घूमते हैं, गाते हैं, नाचते हैं,’’ गिरिराज बोला.

कांता ने इतरा कर बालों को पीछे फेंका और तिरछी नजर से उसे देखते हुए बोली, ‘‘मैं जरा बालों को ठीक कर आऊं, तब तक तुम अलका मैडम से जाने की इजाजत ले लो,’’ फिर जातेजाते वह रुकते हुए बोली, ‘‘तुम… आप कुछ ठंडागरम लेंगे?’’

‘‘वैसे तो जब से आया हूं, तुम्हारे रूप को पी ही रहा हूं, फिर भी तुम जो पिला दोगी, पी लूंगा. पीने के लिए ही तो आया हूं.’’

कांता के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. नशे की सी हालत में वह लड़खड़ा कर गिरने ही वाली थी कि गिरिराज ने उसे लपक कर अपनी बांहों में समेट लिया.

उधर ब्यूटीपार्लर के टैलीविजन पर एक प्यार भरा गीत आ रहा था, ‘मुझ को अपने गले लगा लो ऐ मेरे हमराही…’ और इधर गिरिराज कांता को संभालते हुए मानो गा रहा था, ‘आ, गले लग जा…’

जैसे ही वे दोनों अंदर पहुंचे, सबकुछ समझते हुए अलका मैडम ने उन के बोलने से पहले ही कहा, ‘‘हांहां जाओ, मौज करो. पर मुझे अपनी शादी में बुलाना मत भूलना.’’

‘‘मैडम, क्यों इतनी जल्दी आप हमें शादी की चक्की में पीस देना चाहती हैं. हमें कुछ दिन और मौजमजा कर लेने दीजिए, तब तक छुट्टी मनाने के लिए आप की इजाजत की जरूरत पड़ती रहेगी,’’ गिरिराज ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं.’’

‘‘शुक्रिया मैडम.’’

कांता देख रही थी कि वह जिसे छोटा सा समझ रही थी, वह तो पुराना अमिताभ बच्चन निकला. क्या बढि़या अंदाज में मैडम से बात कर रहा था.

कांता सोच रही थी, ‘मां जो तारीख कहेंगी, उसी तारीख के लिए मैं हामी भर दूंगी. तब तक मेरा हीरो इधर आता ही रहेगा.’

गिरिराज कांता को देख रहा था और कांता गिरिराज को. हालांकि उन्होंने बाहर जाने के लिए सीढ़ियों से पैर नीचे रखे थे, मगर उन्हें लग रहा था कि वे दोनों उड़ रहे हैं.

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