तुम प्रेमी क्यों नहीं : क्या खरी उतरी नीरू

शेखर के लिए मन लगा कर चाय बनाई थी, पर बाहर जाने की हड़बड़ी दिखाते हुए एकदम झपट कर उस ने प्याला उठा लिया और एक ही घूंट में पी गया. घर से बाहर जाते वक्त लड़ा भी तो नहीं जाता. वह तो दिनभर बाहर रहेगा और मैं पछताती रहूंगी. ऐसे समय में उसे घूरने के सिवा कुछ कर ही नहीं पाती.

मैं सोचती, ‘कितना अजीब है यह शेखर भी. किसी मशीन की तरह नीरस और बेजान. उस के होंठों पर कहकहे देखने के लिए तो आदमी तरस ही जाए. उस का हर काम बटन दबाने की तरह होता है.’ कई बार तो मारे गुस्से के आंखें भर आतीं. कभीकभी तो सिसक भी पड़ती, पर कहती उस से कुछ भी नहीं.

शादी को अभी 3 साल ही तो गुजरे थे. एक गुड्डी हो गई थी. सुंदर तो मैं पहले ही थी. हां, कुछ दुबली सी थी. मां बनने के बाद वह कसर भी पूरी सी हो गई. आईने में जब भी अपने को देखती हूं तो सोचती हूं कि शेखर अंदर से अवश्य मुरदा है, वरना मुझे देख कर जरा सी भी प्रशंसा न करे, असंभव है. कालिज में तो मेरे लिए नारा ही था, ‘एक अनार सौ बीमार.’

दूसरी ओर पड़ोस में ही किशोर बाबू की लड़की थी नीरू. बस, सामान्य सी कदकाठी की थी. सुंदरता के किसी भी मापदंड पर खरी नहीं उतरती थी. परंतु वह जिस से प्यार करती थी वह उस की एकएक अदा पर ऐसी तारीफों के पुल बांधता कि वह आत्मविभोर हो जाती. दिनरात नीरू के होंठों पर मुसकान थिरकती रहती. कभीकभी उस की बहनें ही उस से जल उठतीं.

नीरू मुझ से कहती, ‘‘क्या करूं, दीदी. वह मुझ से खूब प्यार भरी बातें करता है. हर समय मेरी प्रशंसा करता रहता है. मैं मुसकराऊं कैसे नहीं. कल मैं उस के लिए गाजर का हलवा बना कर ले गई तो उस ने इतनी तारीफ की कि मेरी सारी मेहनत सफल हो गई.’’

वास्तव में नीरू की बात गलत न थी. अब कोई मेहनत कर के आग की आंच में पसीनेपसीने हो कर खाना बनाए और खाने वाला ऐसे खाए जैसे कोई गुनाह कर रहा हो तब बनाने वाले पर क्या गुजरती है, यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है.

जाने शेखर ही ऐसा क्यों है. कभीकभी सोचती हूं, उस की अपनी परेशानियां होंगी, जिन में वह उलझा रहता होगा. दफ्तर की ही क्या कम भागदौड़ है. बिक्री अधिकारी है. आज यहां है तो कल वहां है. आज इस समस्या से उलझ रहा है तो कल किसी दूसरी परेशानी में फंसा है. परंतु फिर यह तर्क भी बेकार लगता है. सोचती हूं, ‘एक शेखर ही तो बिक्री अधिकारी नहीं है, हजारों होंगे. क्या सभी अपनी पत्नियों से ऐसा ही व्यवहार करते होंगे?’

वैसे आर्थिक रूप से शेखर बहुत सुरक्षित है. उस का वेतन हमारी गृहस्थी के लिए बहुत अधिक ही है. वह एक भरेपूरे घर का ऐसा मालिक भी नहीं है कि रोज नईनई उलझनों से पाला पड़े. परिवार में पतिपत्नी के अलावा एक गुड्डी ही तो है. सबकुछ तो है शेखर के पास. बस, केवल नहीं हैं तो उस के होंठों में शब्द और एक प्रेमी अथवा पति का उदार मन. इस के साथ नीरू तो दो पल भी न रहे.

मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी शेखर ने मुंह पर मेरे व्यवहार या सुंदरता की तारीफ की हो. मुझ पर कभी मुग्ध हो कर स्वयं को सराहा हो.

अब उस दिन की ही बात लो. नीरू ने गहरे पीले रंग की साड़ी पहन ली थी, जोकि उस के काले रंग पर बिलकुल ही बेमेल लग रही थी. परंतु रवि जाने किस मिट्टी का बना था कि वह नीरू की प्रशंसा में शेर पर शेर सुनाता रहा.

नीरू को तो जैसे खुशी के पंख लग गए थे. वह आते ही मेरी गोद में गिर पड़ी थी. मैं ने घबरा कर पूछा, ‘‘क्या हुआ नीरू, कोई बात हुई?’’

‘‘बात क्या होगी,’’ नीरू ने मेरी बांह में चिकोटी काट कर कहा, ‘‘आज क्या मैं सच में पीली साड़ी में कहर बरपा रही थी. कहो तो.’’

मैं क्या उत्तर देती. पीली साड़ी में वह कुछ खास अच्छी न लग रही थी, पर उसे खुश करने की गरज से कहा, ‘‘हां, सचमुच तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो.’’

‘‘बिलकुल ठीक,’’ नीरू चहक उठी, ‘‘रवि भी ऐसा ही कहता था. बस, वह मुझे देखते ही कवि बन जाता है.’’

मुझे याद है, एक बार पायल पहनने का फैशन चल पड़ा था. ऐसे में मुझे भी शौक चढ़ा कि मैं भी पायल पहन लूं. मेरे पैर पायलों में बंध कर निहायत सुंदर हो उठे थे. जिस ने भी उन दिनों मेरे पैर देखे, बहुत तारीफ की. पर चाहे मैं पैर पटक कर चलूं या साड़ी उठा कर चलूं, पायलों का सुंदर जोड़ा चमकचमक कर भी शेखर को अपनी ओर न खींच पाया था. एक दिन तो मैं ने खीझ कर कहा, ‘‘कमाल है, पूरी कालोनी में मेरी पायलों की चर्चा हो रही है, पर तुम्हें ये अभी तक दिखाई ही नहीं दीं.’’?

‘‘ऐं,’’ शेखर ने चौंक कर कहा, ‘‘यह वही पायलों का सेट है न, जो पिछले महीने खरीदा था. बिलकुल चांदी की लग रही हैं.’’

अब कैसे कहती कि चांदी या पायलों को नहीं, शेखर साहब, मेरे पैरों के बारे में कुछ कहिए. असल बात तो पैरों की तारीफ की है, पर कह न पाई थी.

यह भी तो तभी की बात है. नीरू ने भी मेरी पसंद की पायलें खरीदी थीं. उन्हें पहन कर वह रवि के पास गई थी. बस, जरा सी ही तो उन की झंकार होती थी, मगर बड़ी दूर से ही वे रवि के कानों में बजने लगी थीं. रवि ने मुग्ध भाव से उस के पैरों की ओर देखते हुए कहा था, ‘‘तुम्हारे पैर कितने सुंदर हैं, नीरू.’’

कितनी छोटीछोटी बातों की समझ थी रवि में. सुनसुन कर अचरज होता था. अगर नीरू ने उस से शादी कर ली तो दोनों की जिंदगी कितनी प्रेममय हो जाएगी.

मैं नीरू को सलाह देती, ‘‘नीरू, रवि से शादी क्यों नहीं कर लेती?’’

पर नीरू को मेरी यह सलाह नहीं भाती. मुसकरा कर कहती, ‘‘रवि अभी प्रेमी ही बना रहना चाहता है, जब तक कि उस के मन की कविता खत्म न हो जाए.’’

‘‘कविता?’’ मैं चौंक कर रह जाती. रवि का मन कविता से भरा है, तभी उस से इतनी तारीफ हो पाती है. कितना आकुल रहता है वह नीरू के लिए. शेखर के मन में कविता ही नहीं बची है, वह तो पत्थर है, एकदम पत्थर. सामान्य दिनों को अगर मैं नजरअंदाज भी कर दूं तो भी बीमारी आदि होने पर तो उसे मेरा खयाल करना ही चाहिए. इधर बीमार पड़ी, उधर डाक्टर को फोन कर दिया. फिर दवाइयां आईं और मैं दूसरे दिन से ही फिर रसोई के कामों में जुट गई.

मुझे याद है, एक बार मैं फ्लू की चपेट में आ गई थी. शेखर ने बिना देर किए दवा मंगा दी थी, पर मैं जानबूझ कर अपने को बीमार दिखा कर बिस्तर पर ही पड़ी रही थी. शेखर ने तुरंत मायके से मेरी छोटी बहन सुलू को बुला लिया था. मैं चाहती थी कि शेखर नीरू के रवि की तरह ही मेरी तीमारदारी करे, मेरे स्वास्थ्य के बारे में बारबार पूछे, मनाए, हंसाए, मगर ऐसा कुछ न हुआ. बीमारी आई और भाग गई.

इतना ही नहीं, शेखर स्वयं बीमार पड़ता तो इस बात की मुझ से कभी अपेक्षा नहीं करता कि मैं उस की सेवाटहल में लगी रहूं. मैं जानबूझ कर उस के पास बैठ भी जाऊं तो मुझे जबरन उठा कर किसी काम में लगवा देता या अपने दफ्तरी हिसाब के जोड़तोड़ में लग जाता. ऐसी स्थिति में मैं गुस्से से उबल पड़ती. अगर कभी रवि बीमार होता तो उस की डाक्टर सिर्फ नीरू होती.

‘‘मैं रवि को पा कर कभी निराश नहीं होऊंगी, दीदी,’’ नीरू अकसर कहती, ‘‘उसे हमेशा मेरी चिंता सताती रहती है. मैं अगर चाहूं तो भी लापरवाह नहीं हो सकती. पहले ही वह टोक देगा. कभीकभी उस की याददाश्त पर मैं दंग हो जाती हूं. लगता है, जैसे वह डायरी या कैलेंडर हो.’’

याददाश्त के मामले में भी शेखर बिलकुल कोरा है. अगर कहीं जाने का कार्यक्रम बने तो वह अधिकतर भूल ही जाता है. सोचती हूं कि किसी दिन वह कहीं मुझे ही न भूल जाए.

एक दिन मैं ने शादी वाली साड़ी पहनी थी. शेखर ने देखा और एक हलकी सी मिठास से वह घुल भी गया, पर वह बात नहीं आई जो नीरू के रवि में पैदा होती. मुझे इतना गुस्सा आया कि मुंह फुला कर बैठ गई. घंटों उस से कुछ न बोली. शेखर को किसी भी चीज की जरूरत पड़ी तो गुड्डी के हाथों भिजवा दी. शेखर ने रूठ कर कहा, ‘‘अगर गुड्डी न होती तो आप हमें ये चीजें किस तरह से देतीं?’’

‘‘डाक से भेज देती,’’ मैं ने ताव खा कर कहा. शेखर हंसने लगा, ‘‘इतनी सी बात पर इतना गुस्सा. हमें पता होता कि बीवियों की हर बात की प्रशंसा करनी पड़ती है तो शादी से पहले हम कुछ ऐसीवैसी किताबें जरूर पढ़ लेते.’’

मैं ने भन्ना कर शेखर को देखा और बिलकुल रोनेरोने को हो आई, ‘‘प्रेमी होना हर किसी के बस की बात नहीं होती. तुम कभी प्रेमी न बन पाओगे. रवि को तो तुम ने देखा होगा?’’

‘‘कौन रवि?’’ शेखर चौंका, ‘‘कहीं वह नीरू का प्रेमी तो नहीं?’’

‘‘जी हां, वही,’’ मैं ने नमकमिर्च लगाते हुए कहा, ‘‘नीरू की एकएक बात की तारीफ हजार शब्दों में करता है. तुम्हारी तरह हर समय चुप्पी साधे नहीं रहता. बातचीत में भी इतनी कंजूसी अच्छी नहीं होती.’’

‘‘अरे, तो मैं क्या करूं. बिना प्रेम का पाठ पढ़े ही ब्याह के खूंटे से बांध दिए गए. वैसे एक बात है, प्रेमी बनना बड़ा आसान काम है समझीं, मगर पति बनना बहुत मुश्किल है.

‘‘जाने कितनी योग्यताएं चाहिए पति बनने के लिए. पहले तो उत्तम वेतन वाली नौकरी जिस से लड़की का गुजारा भलीभांति हो सके. सिर पर अपनी छत है या नहीं, घर कैसा है, उस के घर के लोग कैसे हैं, घर में कितने लोग हैं. लड़के में कोई बुराई तो नहीं, उस के अच्छे चालचलन के लिए पासपड़ोसियों का प्रमाणपत्र आदि चाहिए और जब पूरी तरह पति बन जाओ तो अपनी सुंदर पत्नी की बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न करो. अपनेआप को ही लो. तुम्हें सोना, सजनासंवरना, गपें मारना, फिल्में देखना आदि यही सब तो आता था. नकचढ़ी भी कितनी थीं तुम. हमारे घर की सीमित सुविधाओं में तुम्हारा दम घुटता था.’’

अब शेखर बिलकुल गंभीर हो गया था, ‘‘तुम जानती ही हो कैसे मैं ने धीरेधीरे तुम्हें बिलकुल बदल दिया. व्यर्थ गपें मारना, फिल्में देखना सब तुम ने बंद कर दिया. फिर तुम ने मुझे भी तो बदला है,’’ शेखर ने रुक कर पूछा, ‘‘अब कहो, तुम्हें शेखर की भूमिका पसंद है या रवि की?’’

‘‘रवि की,’’ मैं दृढ़ता से बोली, ‘‘प्रेम ही जिंदगी है, यह तुम क्यों भूल जाते हो?’’

‘‘क्यों, मैं क्या तुम से प्रेम नहीं करता. हर तरह से तुम्हारा खयाल रखता हूं. जो बना कर देती हो, खा लेता हूं. दफ्तर से छुट्टी मिलते ही फालतू गपशप में उलझने के बजाय सीधा घर आता हूं. तुम्हें जरा सी छींक भी आए तो फौरन डाक्टर हाजिर कर देता हूं. क्या यह प्रेम नहीं है?’’

‘‘यह प्रेम है या कद्दू की सब्जी?’’ मैं बिलकुल झल्ला गई, ‘‘तुम्हें प्रेम करना रवि से सीखना पड़ेगा. दिनरात नीरू से जाने क्याक्या बातें करता रहता है. उस की तो बातें ही खत्म नहीं होतीं. नीरू कुछ भी ओढ़ेपहने, खाएपकाए रवि उस की प्रशंसा करते नहीं थकता. नीरू तो उसे पा कर किसी और चीज की तमन्ना ही नहीं रखती.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है. तब तुम ने नीरू से कभी यह क्यों नहीं कहा कि वह रवि से शादी कर ले.’’

‘‘कहा तो है…’’

‘‘फिर वह विवाह उस से क्यों नहीं करता?’’

‘‘रवि का कहना है कि जब तक उस के अंदर की कविता शेष न हो जाए तब तक वह विवाह नहीं करना चाहता. विवाह से प्रेम खत्म हो जाता है.’’

‘‘सब बकवास है,’’ शेखर उत्तेजित हो कर बोला, ‘‘आदमी की कविता भी कभी मरती है? जिस व्यक्ति ने सभ्यता को विनाशकारी अणुबम दिया, उस के अंदर की भी कविता खत्म नहीं हुई थी. ऐसा होता तो वह कभी अपने अपराधबोध के कारण आत्महत्या नहीं करता, समझीं. असल में रवि कभी भी नीरू से शादी नहीं करेगा. यह सब उस का एक खेल है, धोखा है.’’

‘‘क्यों?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

‘‘असल में बात तो प्रेमी और पति बनने के अंतर की है, यह रवि का चौथा प्रेम है. इस से पहले भी उस ने 3 लड़कियों से प्रेम किया था.

‘‘जब पति बनने का अवसर आया, वह भाग निकला. प्रेमी बनना बड़ा आसान है. कुछ हुस्नइश्क के शेर रट लो. कुछ विशेष आदतें पाल लो…और सब से बड़ी बात अपने सामने बैठी महिला की जी भर कर तारीफ करो. बस, आप सफल प्रेमी बन गए.

‘‘जब भी शादी की बात आएगी, देखना कैसे दुम दबा कर भाग निकलेगा.

‘‘तुम देखती चलो, आगेआगे होता है क्या? अब भी तुम्हें शिकायत है कि मैं रवि जैसा प्रेमी क्यों नहीं हूं? और अगर है तो ठीक है, कल से मैं भी कवितागजल की पुस्तकें ला कर तैयारी करूंगा. कल से मेरी नौकरी बंद. गुड्डी की देखभाल बंद, तुम्हारे शिकवेशिकायतें सुनना बंद, बाजारघर का काम बंद. बस, दिनरात तुम्हारे हुस्न की तारीफ करता रहूंगा.’’

शेखर के भोलेपन पर मेरी हंसी छूट गई. अब मैं कहती भी क्या क्योंकि यथार्थ की जमीन पर आ कर मेरे पैर जो टिक गए थे.

झांसी की रानी : जब मां ने दिखाई अपनी ताकत

‘‘पापा, आप हमेशा झांसी की रानी की तसवीर के साथ दादी का फोटो क्यों रखते हैं?’’ नवेली ने अपने पापा सुप्रतीक से पूछा था.

‘‘तुम्हारी दादी ने भी झांसी की रानी की तरह अपने हकों के लिए तलवार उठाई थी, इसलिए…’’ सुप्रतीक ने कहा.

सुप्रतीक का ध्यान मां के फोटो पर ही रहा. चौड़ा सूना माथा, होंठों पर मुसकराहट और भरी हुई पनियल आंखें. मां की आंखों को उस ने हमेशा ऐसे ही डबडबाई हुई ही देखा था. ताउम्र, जो होंठों की मुसकान से हमेशा बेमेल लगती थी.

एक बार सुप्रतीक ने देखा था मां की चमकती हुई काजल भरी आंखों को, तब वह 10 साल का रहा होगा. उस दिन वह जब स्कूल से लौटा, तो देखा कि मां अपनी नर्स वाली ड्र्रैस की जगह चमकती हुई लाल साड़ी पहने हुए थीं और उन के माथे पर थी लाल गोल बिंदी. मां को निहारने में उस ने ध्यान ही नहीं दिया कि कोईआया हुआ है.

‘सुप्रतीक देखो ये तुम्हारे पापा,’ मां ने कहा था.

‘पापा, मेरे पापा,’ कह कर सुप्रतीक ने उन की ओर देखा था. इतने स्मार्ट, सूटबूट पहने हुए उस के पापा. एक पल को उसे अपने सारे दोस्तों के पापा याद आ गए, जिन्हें देख वह कितना तरसा करता था.

‘मेरे पापा तो उन सब से कहीं ज्यादा स्मार्ट दिख रहे हैं…’ कुछ और सोच पाता कि पापा ने उसे बांहों में भींच लिया.

‘ओह, पापा की खुशबू ऐसी होती है…’

सुप्रतीक ने दीवार पर टंगे मांपापा के फोटो की तरफ देखा, जैसे बिना बिंदी मां का चेहरा कुछ और ही दिखता है, वैसे ही शायद मूंछें उगा कर पापा का चेहरा भी बदल गया है. मां जहां फोटो की तुलना में दुबली लगती थीं, वहीं पापा सेहतमंद दिख रहे थे.

सुप्रतीक देख रहा था मां की चंचलता, चपलता और वह खिलखिलाहट. हमेशा शांत सी रहने वाली मां का यह रूप देख कर वह खुश हो गया था.

कुछ पल को पापा की मौजूदगी भूल कर वह मां को देखने लगा. मां खाना लगाने लगीं. उन्होंने दरी बिछा कर 3 प्लेटें लगाईं.

‘सुधा, बेटे का क्या नाम रखा है?’ पापा ने पूछा था.

‘सुप्रतीक,’ मां ने मुसकराते हुए कहा.

‘यानी अपने नाम ‘सु’ से मिला कर रखा है. मेरे नाम से कुछ नहीं जोड़ा?’ पापा हंसते हुए कह रहे थे.

‘हुं, सुधा और घनश्याम को मिला कर भला क्या नाम बनता?’ सुप्रतीक सोचने लगा.

‘आप यहां होते, तो हम मिल कर नाम सोचते घनश्याम,’ मां ने खाना लगाते हुए कहा था.

‘घनश्याम हा…हा…हा… कितने दिनों के बाद यह नाम सुना. वहां सब मुझे सैम के नाम से जानते हैं. अरे, तुम ने अरवी के पत्ते की सब्जी बनाई है. सालों हो गए हैं बिना खाए,’ पापा ने कहा था.

सुप्रतीक ने देखा कि मां के होंठ ‘सैमसैम’ बुदबुदा रहे थे, मानो वे इस नाम की रिहर्सल कर रही हों.

सुप्रतीक ने अब तक पापा को फोटो में ही देखा था. मां दिखाती थीं. 2-4 पुराने फोटो. वे बतातीं कि उस के पापा विदेश में रहते हैं. लेकिन कभी पापा की चिट्ठी नहीं आई और न ही वे खुद. फोन तो तब होते ही नहीं थे. मां को उस ने हमेशा बहुत मेहनत करते देखा था. एक अस्पताल में वे नर्स थीं, घरबाहर के सभी काम वे ही करती थीं.

जिस दिन मां की रात की ड्यूटी नहीं होती थी, वह देखता कि मां देर रात तक खिड़की के पास खड़ी आसमान को देखती रहती थीं. सुप्रतीक को लगता कि मां शायद रोती भी रहती थीं.

उस दिन खना खाने के बाद देर तक वे तीनों बातें करते रहे थे. सुप्रतीक ने उस पल में मानो जमाने की खुशियां हासिल कर ली थीं. सुबह उठा, तो देखा कि पापा नहीं थे.

‘मां, पापा किधर हैं?’ सुप्रतीक ने हैरानी से पूछा था.

‘तुम्हारे पापा रात में ही होटल चले गए, जहां वे ठहरे हैं.’

मां का चेहरा उतरा हुआ लग रहा था. माथे की लकीरें गहरी दिख रही थीं. आंखों में काजल की जगह फिर पानी था. थोड़ी देर में फिर पापा आ गए, वैसे ही खुशबू से सराबोर और फ्रैश. आते ही उन्होंने सुप्रतीक को सीने से लगा लिया. आज उस ने भी कस कर भींच लिया था उन्हें, कहीं फिर न चले जाएं.

‘पापा, अब आप भी हमारे साथ रहिएगा,’ सुप्रतीक ने कहा था.

‘मैं तुम्हें अपने साथ अमेरिका ले जाऊंगा. हवाईजहाज से. वहीं अच्छे स्कूल में पढ़ाऊंगा. बड़ा आदमी बनाऊंगा…’ पापा बोल रहे थे.

सुप्रतीक उस सुख के बारे में सोचसोच कर खुश हुआ जा रहा था.

‘पर, तुम्हारी मम्मी नहीं जा पाएंगी, वे यहीं रहेंगी. तुम्हारी एक मां वहां पहले से हैं, नैंसी… वे होटल में तुम्हारा इंतजार कर रही हैं,’ पापा को ऐसा बोलते सुन सुप्रतीक जल्दी से हट कर सुधा से सट कर खड़ा हो गया था.

‘मैं कल से ही तुम्हारे आने की वजह समझने की कोशिश कर रही थी. एक पल को मैं सच भी समझने लगी थी कि तुम सुबह के भूले शाम को घर लौटे हो. जब तुम्हारी पत्नी है, तो बच्चे भी होंगे. फिर क्यों मेरे बच्चे को ले जाने की बात कर रहे हो?’ सुधा अब चिल्लाने लगी थी, ‘एक दिन अचानक तुम मुझे छोड़ कर चले गए थे, तब मैं पेट से थी. तुम्हें मालूम था न?

‘एक सुबह अचानक तुम ने मुझ से कहा था कि तुम शाम को अमेरिका जा रहे हो, तुम्हें पढ़ाई करनी है. शादी हुए बमुश्किल कुछ महीने हुए थे. तुम्हारी दहेज की मांग जुटाने में मेरे पिताजी रास्ते पर आ गए थे. लेकिन अमेरिका जाने के बाद तुम ने कभी मुझे चिट्ठी नहीं लिखी.

‘मैं कितना भटकी, कहांकहां नहीं गई कि तुम्हारे बारे में जान सकूं. तुम्हारे परिवार वालों ने मुझे ही गुनाहगार ठहराया. अब क्यों लौटे हो?’ मां अब हांफ रही थीं.

सुप्रतीक ने देखा कि पापा घुटनों के बल बैठ कर सिर झुकाए बोलने लगे थे, ‘सुधा, मैं तुम्हारा गुनाहगार हो सकता हूं. सच बात यह है कि मुझे अमेरिका जाने के लिए बहुत सारे रुपयों की जरूरत थी और इसी की खातिर मैं ने शादी की. तुम मुझे जरा भी पसंद नहीं थीं. उस शादी को मैं ने कभी दिल से स्वीकार ही नहीं किया.

‘बाद में मैं ने नैंसी से शादी की और अब तो मैं वहीं का नागरिक हो गया हूं. लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद हम मांबाप नहीं बन सके. यह तो मेरा ही खून है. मुझे मेरा बेटा दे दो सुधा…’

अचानक काफी बेचैन लगने लगे थे पापा.

‘देख रहा हूं कि तुम इसे क्या सुख दे रही हो… सीधेसीधे मेरा बेटा मेरे हवाले करो, वरना मुझे उंगली टेढ़ी करनी भी आती है.’

सुप्रतीक देख रहा था उन के बदलते तेवर और गुस्से को. वह सुधा से और चिपट गया. तभी उस के पापा पूरी ताकत से उसे सुधा से अलग कर खींचने लगे. उस की पकड़ ढीली पड़ गई और उस के पापा उसे खींच कर घर से बाहर ले जाने लगे कि अचानक मां रसोई वाली बड़ी सी छुरी हाथ में लिए दौड़ती हुई आईं और पागलों की तरह पापा पर वार करने लगीं.

पापा के हाथ से खून की धार निकलने लगी, पर उन्होंने अभी भी सुप्रतीक का हाथ नहीं छोड़ा था.

चीखपुकार सुन कर अड़ोसपड़ोस से लोग जुटने लगे थे. किसी ने इस आदमी को देखा नहीं था. लोग गोलबंद होने लगे, पापा की पकड़ जैसे ही ढीली हुई, सुप्रतीक दौड़ कर सुधा से लिपट गया.

लाल साड़ी में मां वाकई झांसी की रानी ही लग रही थीं. लाललाल आंखें, गुस्से से फुफकारती सी, बिखरे बाल और मुट्ठी में चाकू. सुप्रतीक ने देखा कि सड़क के उस पार रुकी टैक्सी में एक गोरी सी औरत उस के पापा को सहारा देते हुए बिठा रही थी.

‘‘नवेली, तुम्हारी दादी बहुत बहादुर और हिम्मत वाली थीं,’’ सुप्रतीक ने अपनी बेटी से कहा. सुप्रतीक की निगाहें फिर से मां के फोटो पर टिक गई थीं.

घर वापसी : लड़कियों का बेरहम दलाल

नैशनल हाईवे 33 पटना को रांची से जोड़ता है. रांची से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर बसा एक गांव है सिकदिरी. इसी गांव में फूलन रहता था. उस के परिवार में पत्नी छमिया के अलावा 3 बच्चे थे. बड़ा लड़का पूरन और उस के बाद 2 बेटियां रीमा और सीमा.

फूलन के कुछ खेत थे. खेतों से तो परिवार का गुजारा मुश्किल था, इसलिए वह कुछ पैसा मजदूरी से कमा लेता था. कुछ कमाई उस की पत्नी छमिया की भी थी. वह भी कभी दूसरों के खेतों में मजदूरी करती, तो कभी अमीर लोगों के यहां बरतन मांजने का काम करती थी.

फूलन के तीनों बच्चे गांव के स्कूल में पढ़ते थे. बड़े बेटे पूरन का मन पढ़ने में नहीं लगता था. वह मिडिल पास कर के दिल्ली चला गया था. पड़ोसी गांव का एक आदमी उसे नौकरी का लालच दे कर अपने साथ ले गया था.

पूरन वहां छोटामोटा पार्टटाइम काम करता था. कभी स्कूटर मेकैनिक के साथ हैल्पर, तो कभी ट्रक ड्राइवर के साथ  क्लीनर का काम, पर इस काम में पूरन का मन लग गया था. ट्रक के साथ नएनए शहर घूमने को जो मिलता था.

इस बीच एक बार पूरन गांव भी आया था और घर में कुछ पैसे और एक मोबाइल फोन भी दे गया था.

ट्रक ड्राइवर अपना दिल बहलाने के लिए कभीकभी रंगरलियां भी मनाते थे, तो एकाध बार पूरन को भी मौका मिल जाता था. इस तरह धीरेधीरे वह बुरी संगत में फंस गया था.

इधर गांव में रीमा स्कूल में पढ़ रही थी. अपनी क्लास में अच्छे नंबर लाती थी. वह अब 10वीं जमात में पहुंच गई थी. उस की छोटी बहन सीमा भी उसी स्कूल में 7वीं जमात में थी.

इधर सिकदिरी और आसपास  के गांवों से कुछ नाबालिग लड़कियां गायब होने लगी थीं. गांव के ही कुछ मर्द और औरतें ऐसी लड़कियों को नौकरी का लालच दे कर दिल्ली, चंडीगढ़ वगैरह शहरों में ले जाते थे.

शुरू में तो लड़कियों के मातापिता को कुछ रुपए एडवांस में पकड़ा देते थे, पर बाद में कुछ महीने मनीऔर्डर भी आता था, पर उस के बाद उन का कुछ अतापता नहीं रहता था.

इधर शहर ला कर इन लड़कियों से बहुत कम पैसे में घर की नौकरानी बना कर उन का शोषण होता था. उन को ठीक से खानापीना, कपड़ेलत्ते भी नहीं मिलते थे. कुछ लड़कियों को जबरन देह धंधे में भेज दिया जाता था.

इन लोगों का एक बड़ा रैकेट था.  पूरन भी इस रैकेट में शामिल हो गया था.

एक दिन अचानक गांव से एक लड़की गायब हो गई, पर इस बार उस के मातापिता को कोई रकम नहीं मिली और न ही किसी ने कहा कि उसे नौकरी के लिए शहर ले जाया गया है.

इस घटना के कुछ दिन बाद पूरन के पिता फूलन को फोन आया कि गायब हुई वह लड़की दिल्ली में देखी गई है.

2 दिन बाद फूलन को फिर फोन आया. उस ने कहा कि तुम्हारा बेटा पूरन आजकल लड़कियों का दलाल बन गया है. उसे इस धंधे से जल्दी ही निकालो, नहीं तो बड़ी मुसीबत में फंसेगा.

यह सुन कर फूलन का सारा परिवार सकते में आ गया था. बड़ी बेटी रीमा

ने सोचा कि इस उम्र में पिताजी से कुछ नहीं हो सकता, उसे खुद ही कुछ उपाय सोचना होगा.

रीमा ने अपने मातापिता को समझाया कि वह दिल्ली जा कर भाई को वापस लाने की पूरी कोशिश करेगी.

चंद दिनों के अंदर रीमा रांची से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली पहुंच गई थी. वह वहां अपने इलाके के एक नेता से मिली और सारी बात बताई.

नेताजी को पूरन की जानकारी उन के ड्राइवर ने दे रखी थी.

वह ड्राइवर एक दिन नेताजी के किसी दोस्त को होटल छोड़ने गया था, तो वहां पूरन को किसी लड़की के साथ देखा था.

ड्राइवर भी पड़ोस के गांव से था, इसलिए वह पूरन को जानता था.

ड्राइवर ने रीमा से कहा, ‘‘मैं ने ही तुम्हारे घर पर फोन किया था. तुम घबराओ नहीं. तुम्हारा भाई जल्दी ही मिल जाएगा.

‘‘मैं कुछ होटलों और ऐसी जगहों को जानता हूं, जहां इस तरह के लोग मिलते हैं. मैं जैसा कहता हूं, वैसा करो.’’

रीमा बोली, ‘‘ठीक है, मैं वैसा ही करूंगी. पर मुझे करना क्या होगा?’’

‘‘वह मैं समय आने पर बता दूंगा. तुम साहब को बोलो कि यहां का एक एसपी भी हमारे गांव का है. जरूरत पड़ने पर वह तुम्हारी मदद करे.

‘‘वैसे, मैं पूरी कोशिश करूंगा कि पुलिस की नजर में आने के पहले ही तुम अपने भाई को इस गंदे धंधे से निकाल कर अपने गांव चली जाओ.’’

इधर ड्राइवर ने भी काफी मशक्कत के बाद पूरन का ठिकाना ढूंढ़ लिया

था. वह पूरन से बोला, ‘‘एक नईनवेली लड़की आई है. लगता है, वह तुम्हारे काम आएगी.’’

पूरन ने कहा, ‘‘तुम मुझे उस लड़की से मिलाओ.’’

ड्राइवर ने शाम को पूरन को एक जगह मिलने को कहा, इधर ड्राइवर रीमा को बुरका पहना कर शाम को उसी जगह ले गया.

चूंकि रीमा बुरके में थी, इसलिए पूरन उसे पहचान न सका था. ड्राइवर वहां से हट कर दूर से ही सारा नजारा देख रहा था.

पूरन ने रीमा से पूछा, ‘‘तो तुम मुसलिम हो?’’

‘‘हां, तो क्या मैं तुम्हारे काम की नहीं?’’ रीमा ने पूछा.

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मेरे काम में कोई जातपांत, धर्म नहीं पूछता. पर तुम अपना चेहरा तो दिखाओ. इस से मुझे तुम्हारी उम्र और खूबसूरती का भी अंदाजा लग जाएगा.’’

‘‘ठीक है, लो देखो,’’ कह कर रीमा ने चेहरे से नकाब हटाया. उसे देखते ही पूरन के होश उड़ गए.

रीमा ने भाई पूरन से कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती, लड़कियों की दलाली करते हो. वे भी तो किसी की बहन होगी…’’

रीमा ने कहा, ‘‘तुम्हें पता है कि अगले हफ्ते ‘सरहुल’ का त्योहार है. पहले तुम इस त्योहार को दोस्तों के साथ खूब मौजमस्ती से मनाते थे. इस बार तुम्हारी घर वापसी पर हम सब मिल कर ‘सरहुल’ का त्योहार मनाएंगे.’’

तब तक ड्राइवर भी पास आ गया था. रीमा ने जब अपने गांव से लापता लड़की के बारे में पूछा, तो उस ने कहा कि उस में उस का कोई हाथ नहीं है. लेकिन वह लड़की एक घर में नौकरानी का काम कर रही है.

ड्राइवर और पूरन के साथ जा कर रीमा ने उस लड़की को भी बचाया.

रीमा अपने भाई पूरन को ले कर गांव आ गई. सब ने उसे समझाया कि सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहा जाता.

पूरन को अपनी गलती पर पछतावा था. उस की घर वापसी पर पूरे परिवार ने गांव वालों के साथ मिल कर ‘सरहुल’ का त्योहार धूमधाम से मनाया.

अब पूरन गांव में ही रह कर परिवार के साथ मेहनतमजदूरी कर के रोजीरोटी कमा रहा था.

विजयी मुसकराहट : सूरज की सबसे बड़ी कमी क्या थी

21 साल का सूरज लखनऊ से तकरीबन डेढ़ सौ किलोमीटर दूर कुसुमापुर नामक गांव का रहने वाला था और लखनऊ के डीएवी कालेज से एम कौम की पढ़ाई कर चुका था. अब वह बैंक में नौकरी करना चाहता था, इसलिए तैयारी के लिए उस ने एक कोचिंग सैंटर में दाखिला ले रखा था.

सूरज की सब से बड़ी कमी यह थी कि वह लड़कियों का दीवाना था. सब की नजरें बचा कर वह अपने कोचिंग सैंटर की लड़कियों को आगेपीछे खूब ताड़ता था और मौका मिलने पर उन्हें कुहनी मारने से भी बाज नहीं आता था.

लखनऊ के चिडि़याघर के पास नरही नामक इलाके में सूरज कोचिंग क्लास करने जाता था. आज शाम को जब वह कोचिंग सैंटर से बाहर निकला, तो उस के मोबाइल पर घर से मां का फोन आ गया.

सूरज ने जल्दी से फोन रिसीव किया, तो मां ने खुशखबरी देते हुए बताया, ‘‘तेरे बड़े भाई विजय की शादी तय हो गई है और लड़की वाले जल्द से जल्द शादी करना चाहते हैं, इसलिए तू जल्दी से गांव वापस आ जा, ताकि शादी के कामों में हाथ बंटा सके.’’

अपने बड़े भाई की शादी की बात सुन कर सूरज बड़ा खुश हुआ और कोचिंग सैंटर के सर को अपने घर जाने के बारे में जानकारी दे कर अपने कमरे पर आया और गांव चलने की तैयारी करने लगा.

गांव पहुंच कर अपनी जमात के पुराने यारदोस्तों से मिलते हुए सूरज घर पहुंचा, तो अपने बड़े भाई विजय से गले मिल कर बधाई दी और मां से अपनी होने वाली भाभी के बारे में पूछताछ करने लगा.

मां ने सूरज को बताया, ‘‘हमारे गांव से

30 किलोमीटर की दूरी पर सुजानपुर गांव की लड़की से विजय का ब्याह तय हुआ है,’’ और यह कहते हुए मां ने होने वाली भाभी की तसवीर सूरज के सामने कर दी.

तसवीर देख कर सूरज चौंक सा गया था. उस ने तसवीर अपने हाथ में ले ली और फिर नजरें गड़ा कर देखने लगा.

‘‘अरे, लगता है कि तु   झे होने वाली भाभी बड़ी पसंद आ गई है, जो तेरी नजरें घूरे ही जा रही हैं फोटो को,’’ मां ने कहा.

सूरज की आंखें सोचने वाले अंदाज में सिकुड़ गई थीं और सांसें तेज चलने लगी थीं. उसे याद आ रहा था कि एक बार जब वह अपनी रिश्तेदारी में सुजानपुर गया था, तो वहां पर पड़ोस में शिल्पा नाम की एक लड़की थी, जिस की उम्र तब 13 साल के आसपास की रही होगी और जिसे देख कर सूरज की लार टपकने लगी थी. मौका पा कर सूरज ने उस लड़की का रेप कर दिया था, फिर लड़की के मुंह खोलने पर उसे मार डालने की धमकी भी दे डाली थी.

लड़की कम उम्र की थी. डर और लोकलाज के चलते उस ने कोई होहल्ला भी नहीं किया था और इस घटना के कई साल बीत जाने के बाद वही लड़की उस के अपने घर में ही उस के बड़े भाई की पत्नी बन कर आ रही थी.

यह सब सोच कर पहले तो सूरज थोड़ा घबराया, फिर वह मुसकरा उठा. उस के गंदे दिमाग ने यह सोच लिया था कि अगर रेप करने के बाद भी वह लड़की खामोश रही, तो अब

जब वह भाभी बन कर आएगी, तब तो उसे

कोई खतरा नहीं है, बल्कि मजे ही मजे हैं. जब चाहेगा, भाभी के साथ छेड़छाड़ कर सकेगा और मस्ती मारेगा.

तमाम धूमधाम और खुशियों के बीच विजय की शादी शिल्पा से हो गई और वह महज

19 साल की लड़की को अपनी दुलहन बना कर ले आया था.

इतनी खूबसूरत और कमसिन लड़की पा कर विजय बड़ा खुश था, तभी तो सुहागरात पर गिफ्ट करने के लिए उस ने एक मोबाइल फोन खरीद लिया था, जिसे वह आज रात में ही अपनी नईनवेली पत्नी शिल्पा को गिफ्ट करने वाला था.

सूरज मन ही मन मुसकरा रहा था कि उस का बड़ा भाई जिस के साथ सुहागरात मनाने के लिए इतना खुश है, असल में उस लड़की के रूप का स्वाद तो वह पहले ही चख चुका है.

अभी घर में मेहमान रुके हुए थे, इसलिए सूरज को अपनी भाभी से अकेले में बात करने का मौका नहीं मिल पा रहा था. हालांकि, उस की मंशा यही थी कि वह उस लड़की से एक बार फिर मजा ले सके, जिस का उस ने रेप किया था.

गाहेबगाहे शिल्पा के कमरे की तरफ भी सूरज चक्कर लगाता, पर उसे निराशा ही हाथ लगती, क्योंकि शिल्पा भाभी कभी अकेले नहीं होती.

‘‘अरे, आओ विजय. बाहर से ही क्यों लौटे जा रहे हो?’’ कमरे से अचानक विजय ने पुकारा, तो सूरज को लगा जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. वह सहज होने का नाटक करते हुए कमरे में घुसा और सामने बैठी शिल्पा पर भरपूर नजर डाली.

‘13 साल की उम्र में कच्ची कली थी, पर अब तो यह खिल कर और भी खूबसूरत हो गई है,’ सूरज मन ही मन सोच रहा था.

शिल्पा उठ कर चाय बनाने चली गई, तो सूरज और विजय आपस में बातें करने लगे.

कुछ दिनों के बाद एक रात जब विजय अपनी पत्नी शिल्पा के साथ बिस्तर पर था, तब शिल्पा ने नाज दिखाते हुए विजय से कहा, ‘‘सुनो, अगर आप नाराज न हों, तो मैं आप से कुछ कहना चाहती हूं.’’

विजय, जो अभी तक शिल्पा की नंगी पीठ को सहला रहा था, रुक गया और उस के होंठों को चूम कर बोला, ‘‘तुम्हारी किसी बात से मैं नाराज क्यों होऊंगा भला? बताओ, क्या कहना चाहती हो?’’ विजय ने कहा.

शिल्पा ने बताया, ‘‘मु   झे सूरज की नजरें कुछ ठीक नहीं लगती हैं. वह मु   झे अकेले में छेड़ने की कोशिश करता है. अगर यकीन न हो, तो मैं सुबूत भी पेश कर सकती हूं.’’

शिल्पा की यह बात सुन कर विजय चौंका तो जरूर, पर कुछ नहीं बोला. उसे अपने भाई पर भरोसा तो था, पर शिल्पा की बात भी उसे सही लग रही थी. शिल्पा ने उसे सुबूत देने का वादा किया.

पिछले 1-2 दिन से शिल्पा जब भी सूरज के पास से गुजरती, तो जानबू   झ कर अपने शरीर को उस के शरीर से छुआ देती, जिस से वह सिहर उठता. कभीकभी तो वह हवस वाली नजरों से उसे घूरती, जिस से सूरज को लगने लगा था कि हो न हो, शिल्पा के मन में अब भी उस के लिए कुछ चाह बाकी है.

‘‘अब और मत तड़पाओ शिल्पा. हमतुम इस देवरभाभी के नाते में बंध गए हैं, तो कम से कम मु   झे वे सालों पहले वाली यादें ताजा तो कर लेने दो,’’ सूरज ने कहा, तो शिल्पा थोड़ी देर चुप रही, पर जब सूरज ने बारबार उस से एक बार अकेले में मिलने की जिद की, तो शिल्पा ने उसे अपने कमरे के बगल वाले कमरे में रात में मिलने के लिए बुला लिया.

रात के इंतजार में सूरज ने किसी तरह तो दिन काटा और जैसे ही रात के साढ़े 11 बजे और सूरज को लगने लगा कि घर के सभी लोग सो गए हैं, तो वह शिल्पा के कमरे के बगल वाले कमरे में पहुंच गया. कमरे की लाइट बिना जलाए उस ने मोबाइल की टौर्च जलाई, तो उस का मन तब रोमांचित हो उठा, जब उस ने देखा कि सामने शिल्पा बैठी हुई है.

जल्दी से सूरज ने शिल्पा को अपनी बांहों में भर लिया, पर अचानक ही शिल्पा के तेवर ही बदल

गए और उस ने एक जोरदार तमाचा सूरज के गाल पर दे मारा.

सूरज कुछ सम   झ पाता, इस से पहले ही शिल्पा ने विजय को फोन कर के वहां बुला लिया. वहां का नजारा देख विजय को माजरा सम   झते देर न लगी. विजय ने भी गुस्से में 2-4 तमाचे सूरज को रसीद कर दिए. शिल्पा ने शोर मचाना शुरू कर दिया. उस के सासससुर भी कमरे में पहुंच गए और पूरा मामला जानना चाहा.

शिल्पा ने रोरो कर और तेज आवाज में बताया कि सूरज उस पर बुरी नजर रखता है और आज जब वह बाथरूम जाने को उठी, तब सूरज उसे जबरदस्ती पकड़ कर इस कमरे में ले आया और उस का रेप करने की कोशिश की.

इतना ही नहीं, शिल्पा ने सूरज पर उस के गहने चोरी करने का इलजाम भी लगा दिया और सुबूत के तौर पर सूरज का बैग चैक करने को कहा.

शिल्पा ये सारी बातें चीखचीख कर कह रही थी, जिस से पड़ोसी भी वहां जमा हो गए थे.

सूरज के बैग से गहने भी बरामद कर लिए गए थे. गांव के किसी जिम्मेदार आदमी ने फोन कर के पुलिस को बुला लिया था. घर वाले तो मामला रफादफा करना चाहते थे, पर शिल्पा के आंसू और दुख देख कर पुलिस ने भी कार्यवाही करनी शुरू कर दी और सूरज को चोरी और रेप करने की कोशिश में गिरफ्तार कर लिया.

सूरज को जेल जाता देख उस के मांबाप तो परेशान थे, पर शिल्पा के चेहरे पर एक मुसकान गहराती जा रही थी.

विजय और शिल्पा अपनी शादीशुदा जिंदगी मजे से जीने लगे थे, पर शिल्पा के सासससुर अपने छोटे बेटे के जेल जाने से दुखी थे. इस दुख को कम करने के लिए वे किसी बाबा की शरण में चले गए थे, पर भला कोई बाबा किसी के दुख को कम कर सकते तो दुनिया में कोई गम ही नहीं बचता.

एक महीने के लिए शिल्पा के सासससुर अपने गुरु के आश्रम में गए हुए थे, जहां वह बाबा जम कर इन लोगों से पैसों की उगाही कर रहा था.

शिल्पा अब अपने घर में आजाद थी. वह खूब सिंगार करती और रात को विजय के साथ बिस्तर पर जम कर रोमांस करती.

शिल्पा ने अपने देवर के खिलाफ जो आवाज उठाई थी, उस से वह आसपड़ोस की लड़कियों की रोल मौडल बन गई थी.

इधर कुछ दिनों से विजय परेशान दिख रहा था. शिल्पा ने वजह पूछी, तो विजय ने बताया, ‘‘मैं अपने छोटे भाई के जेल जाने से दुखी हूं. गलती तो उस ने की है, पर सजा भी तो काफी मिल गई है. तुम कहो तो उसे जमानत दे कर रिहा करा लाऊं?’’

शिल्पा ने विजय का मन रखने के लिए उसे सूरज को छुड़ा लाने की इजाजत दे दी.

विजय खुश हो गया और आननफानन में जरूरी कागजात तैयार करा कर सूरज को रिहा करा लाया.

सूरज अब शिल्पा से न तो बात करता था और न ही आंख मिलाता था, बल्कि वह उस के प्रति बदले की भावना से भरा हुआ था, पर शिल्पा उस की इस मंशा से पूरी तरह सजग थी और वह भी उस से दूरी बना कर ही रखती थी.

सूरज अब लखनऊ वापस जाना चाहता था, पर इस बीच उस की नजरें शिल्पा से मिलने आने वाली 20 साल की लड़की किशोरी से टकरा गईं. किशोरी उसे देख कर मुसकराती और लटके   झटके दिखाती थी.

किशोरी से यों न्योता मिला, तो सूरज के मन को थोड़ा अच्छा लगने लगा और उस ने कुछ और दिन गांव में रहने का फैसला कर लिया.

किशोरी दलित लड़की थी. उस की एक बड़ी बहन ने खुदकुशी कर ली थी, क्योंकि गांव के एक दबंग ठाकुर के बेटे ने उस का रेप किया था.

अपने परिवार पर जुल्म देखने की आदी हो चुकी किशोरी अब गांव छोड़ कर जाना चाहती थी, इसलिए उस के मन में यह बात दबी हुई थी कि उस की शादी किसी शहर के लड़के से ही हो.

किशोरी और सूरज का मिलनाज़ुलना शुरू हो गया था. हालांकि, किशोरी सूरज के जेल जाने की बात अच्छी तरह जानती थी, पर फिर भी सूरज का शहरी स्टाइल उसे सुहाता था और वह सूरज से ब्याह भी करना चाहती थी.

आज सूरज और किशोरी गांव से बाहर एक खेत के एकांत में मिले. सूरज ने किशोरी को अपनी बांहों में भर लिया और उस के सीने के उभारों पर अपने हाथ से दबाव बढ़ाने लगा.

सूरज की इस हरकत पर किशोरी चौंकी और उस ने  सूरज को धक्का दे दिया. सूरज को उस की यह हरकत नागवार गुजरी, पर फिर भी उस ने अपनेआप को शांत रखते हुए इस बरताव की वजह पूछी, तो किशोरी ने अदा दिखाते हुए सूरज से मजाक में उस के और शिल्पा के नाजायज संबंध होने की बात कही.

यह बात सुनते ही सूरज का चेहरा तमतमा गया और वह शिल्पा के लिए गंदीगंदी गालियां निकालने लगा.

एक लड़की के लिए गालियां सुन कर किशोरी को भी बुरा लगा, तो उस ने सूरज से ऐसा करने को मना किया. इस बात पर सूरज और भी तमतमा गया और उस ने 4-5    झापड़ किशोरी के गाल पर रसीद कर दिए.

अभी सूरज किशोरी को और मारता, उस से पहले किशोरी किसी तरह जान बचा कर वहां से भाग खड़ी हुई. अभी वह भागते हुए ही जा रही थी कि उसे घर के बाहर शिल्पा मिल गई.

किशोरी ने शिल्पा से सारा हाल कह सुनाया. इस के बाद शिल्पा ने उसे हिम्मत बंधाते हुए कहा, ‘‘अब जैसा मैं कहती हूं, वैसा करो.’’

शिल्पा ने किशोरी से पुलिस के पास चल कर सूरज के खिलाफ गवाही देने को कहा, तो किशोरी पुलिस के नाम से डर गई, जिस पर शिल्पा ने उसे सम   झाते हुए कहा, ‘‘जब तक हम लड़कियां और औरतें अपने खिलाफ होने वाली नाइंसाफी को सहती रहेंगी, तब तक ये भेडि़ए हमें नोंचते रहेंगे.’’

इस के बाद शिल्पा ने किशोरी को उस की बहन पर हुए जोरजुल्म के बारे में बताते हुए कहा, ‘‘आज तुम्हारी बहन जिंदा होती, अगर उस का रेप नहीं हुआ होता. हम सब कब तक जुल्म सहेंगे… हो सकता है कि कल तुम्हारे साथ भी रेप हो और तुम भी खुदकुशी कर लो.’’

शिल्पा की ऐसी बातें और तेवर देख किशोरी के अंदर भी हिम्मत आ गई और उस ने शिल्पा को हर तरह से मदद देने का निश्चय कर लिया.

इस के बाद शिल्पा ने पुलिस को फोन किया और सूरज पर किशोरी का रेप करने की कोशिश में नाकाम रहने के बाद जान से मारने की कोशिश करने का आरोप लगाते हुए किशोरी को पुलिस के सामने खड़ा किया और उस के शरीर पर आई हुई चोटों के निशान भी दिखाए, जिस से सूरज की हरकत की तसदीक तो हुई ही, साथ ही सूरज का क्रिमिनल रिकौर्ड भी उसे कुसूरवार करार देने में मददगार साबित हुआ.

इतना ही नहीं, शिल्पा ने पुलिस में अपने परिवार के खिलाफ दहेज के नाम पर सताने का आरोप लगाते हुए एफआईआर लिखवाई, जिस में शिल्पा ने यह भी बताया कि उस के सासससुर उस पर जुल्म तो करते ही हैं, साथ ही किसी बाबा के फेर में पड़ कर उस का सारा दहेज का पैसा उन्होंने हड़प लिया है और वे लोग उस से अपने मायके से और भी पैसे लाने की मांग करते रहते हैं.

पुलिस ने तुरंत संज्ञान लेते हुए दहेज के नाम पर सताने के आरोप में शिल्पा के सासससुर और उस के पति को भी जेल में डाल दिया.

13 साल की उम्र में अपने गांव में आए हुए एक अपरिचित लड़के द्वारा रेप किए जाने की घिनौनी वारदात के बाद भी शिल्पा टूटी नहीं, बल्कि एक सोचीसम   झी साजिश के साथ उस ने विजय को अपने जाल में फंसाया, ताकि वह उस से ब्याह कर के अपना बदला पूरा कर सके.

शिल्पा ने सूरज को एक बार नहीं, बल्कि बारबार जेल भिजवा कर अपना बदला पूरा किया.

सभी कुसूरवार जेल में थे और अब शिल्पा इस पूरे मकान और जायदाद की अकेली मालकिन थी. अब वह गांवगांव जा कर लड़कियों को किसी से न डरने और नाइंसाफी न सहने के लिए सीख देती थी.

आज शिल्पा ने अपनेआप को आदमकद आईने में देखा. सामने एक रेप पीडि़त लड़की तो थी, जिस ने बचपन में ही जोरजुल्म सहा था, पर अब वह अबला नहीं थी और न ही उस के मन में कोई पछतावा था, क्योंकि पछतावा तो बुरे काम को अंजाम देने वाले को होना चाहिए… इसीलिए शिल्पा के चेहरे पर एक मुसकान थी, विजयी मुसकान.

आखिर दोषी कौन है: क्या हुआ था रश्मि के साथ

जिसतरह दीए के साथ बाती का गहरा नाता होता है, अपनी आखिरी सांस तक वह दीए को नहीं छोड़ती, उसी के साथ ही जीती है और उस की बांहों में ही अपना दम तोड़ देती है, कुछ इसी तरह का प्यार करती थी रश्मि अपने प्रेमी आदित्य से. साथ जीनेमरने के वादे करने वाले आदित्य और रश्मि प्यार की राह पर एकदूसरे का हाथ पकड़े बहुत दूर निकल आए थे. एकदूसरे को देखे बिना कभी भी उन का दिन पूरा नहीं होता था. दोनों के परिवार भी इस रिश्ते को बहुत पसंद करते थे. दोनों के असीम प्यार को मिलाने के लिए दोनों परिवारों ने जोरशोर से तैयारियां शुरू कर दी थीं.

आदित्य की मां अनीता ही ने रश्मि के लिए उस की पसंद के कपड़े, गहने सबकुछ तैयार करवा लिया था. इकलौता ही बेटा तो था आदित्य उन का. अपने सूने आंगन में एक बेटी के कदमों को लाने की उन्हें बड़ी जल्दी थी. अपनी मंजिल को पूरा होता देख आदित्य और रश्मि की खुशी का ठिकाना न था. रश्मि के परिवार में भी जोरशोर से विवाह की तैयारियां चल रही थीं.

विवाह का मुहूर्त 1 माह बाद का निकला था. सभी को जल्दी थी, किंतु उस से पहले का कोई मुहूर्त था ही नहीं. अब सभी उस तारीख का इंतजार कर रहे थे. 1-1 कर के दिन बड़ी मुश्किल से कट रहे थे. सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. वह कहते हैं न कि समय से पहले और हिस्से से ज्यादा किसी को नहीं मिलता. कुछ ऐसा ही आदित्य और रश्मि के साथ भी हुआ.

आज करवाचौथ है. रश्मि बहुत ही उत्साह में थी. आदित्य से भले ही अब तक उस का विवाह न हुआ हो पर मन ही मन वह उसे पति तो मान ही चुकी थी. यही सब सोच कर उस ने भी आज करवाचौथ का व्रत रख लिया.

सुबहसुबह आदित्य के फोन की घंटी बजी. आदित्य गहरी नींद में सो रहा था. जैसे ही देखा रश्मि का फोन है, ‘अरे इतनी सुबह रश्मि का फोन? क्यों किया होगा,’ सोचते हुए उस ने

फोन उठाया.

रश्मि ने कहा, ‘‘आदित्य, आज शाम का कोई प्रोग्राम नहीं बनाना. मैं ने आज करवाचौथ का व्रत रखा है, निर्जला तुम्हारे लिए. रात को

चांद देख कर तुम्हारे हाथों से पानी पी कर ही उपवास तोड़ूंगी. शाम को तुम मेरे लिए बिलकुल फ्री रखना.’’

‘‘अरे रश्मि यह उपवास छोड़ो यार, कहां भूखी रहोगी दिन भर.’’

‘‘नहीं आदित्य, यह व्रत तो मुझे रखना ही है. सिर्फ आज ही नहीं, हर वर्ष तुम्हारे लिए, तुम्हारी लंबी उम्र के लिए.’’

‘‘ठीक है रश्मि, तुम से कभी मैं जीत सका हूं क्या? मैं शाम को अपनेआप को तुम्हारे हवाले कर दूंगा, अब खुश?’’

‘‘आदित्य शाम को 7 बजे तक तुम मुझे लेने आ जाना, शाम को पूजा मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे घर पर ही करूंगी.’’

‘‘ठीक है रश्मि, जो आज्ञा.’’

रश्मि शाम का इंतजार कर रही थी. हाथों में मेहंदी, सोलहशृंगार, लाल जोड़े में सजीधजी रश्मि बहुत ही सुंदर लग रही थी. ऐसा लग रहा था मानो आज ही उस का विवाह हो.

दुलहन की तरह सजीधजी रश्मि को देख कर अनीता भी फूली नहीं समा रही थीं. चांद का इंतजार सभी कर रहे थे. रश्मि को जोर की भूख लगी थी.

रश्मि बारबार आदित्य से कह रही थी, ‘‘आदि जाओ न बाहर चांद को ढूंढ़ो, कहां छिप कर बैठा है?’’

आदित्य ने कहा, ‘‘कहां जाऊं रश्मि, मुझे तो चांद मेरी आंखों के सामने ही दिखाई दे रहा है. इस चांद के सामने उस चांद को देखने कौन जाएगा.’’

‘‘जाओ न आदि, भूख लग रही है.’’

कुछ ही समय में चांद भी निकल आया. पूजा कर के छलनी से चांद के साथ आदित्य

को निहारते हुए रश्मि ने धीरे से कहा, ‘‘आई

लव यू आदित्य.’’

आदित्य ने भी वही 3 शब्द कहते हुए अपने हाथों से उसे पानी पिलाया और मिठाई खिला कर उस का व्रत खुलवाया. रश्मि को ये क्षण ऐसे मनमोहक लग रहे थे मानो जिंदगी की सारी खुशियां सिमट कर इन पलों में समा गई हों.

रश्मि की झल सी गहरी आंखों में आदित्य को प्यार ही प्यार नजर आ रहा था. वह उस गहराई में डूबता ही चला जा रहा था.

तभी पीछे से अनीता की आवाज आई, ‘‘आदि चलो रश्मि को खाना खिलाना है या नहीं?’’

‘‘हांहां मां आते हैं.’’

दोनों डाइनिंगरूम में चले गए और फिर सब ने साथ खाना खाया. परिवार के सदस्यों के साथ बातें करते हुए रात के 12 बज गए. रश्मि का घर आदित्य के घर से बहुत दूर था. आदित्य रश्मि को छोड़ने कार से निकला.

दोनों बातें करते हुए एकदूसरे में खोए चले जा रहे थे. रात काफी हो गई थी. हर तरफ अंधेरा पसरा था. रास्ता भी सुनसान था. कहीं कोई हलचल नहीं थी. आदित्य की कार मंजिल की तरफ बढ़ रही थी कि तभी अचानक कार झटके मारने लगी और बंद हो गई.

‘‘रश्मि घबरा गई, क्या हुआ आदित्य?’’

‘‘मालूम नहीं रश्मि, अचानक क्या हो

गया. आज के पहले कभी कार इस तरह रुकी नहीं थी.’’

आदित्य ने अंदर बैठेबैठे 2-3 बार कार स्टार्ट करने की कोशिश की, किंतु वह सफल नहीं हो पाया.

‘‘रश्मि रुको, मैं बाहर बोनट खोल कर देखता हूं. क्या हो गया है, वरना फोन कर के घर से किसी को बुलाना पड़ेगा. तुम अंदर, बैठो,’’ कहते हुए आदित्य बाहर निकल गया.

तब तक अचानक मौसम का अंदाज भी बदल गया. हवा के साथ हलकीहलकी बारिश शुरू हो गई. इस बिन मौसम की बारिश से घबरा कर रश्मि भी कार से बाहर निकल आई और अपने मोबाइल से लाइट दिखाने लगी.

तभी रश्मि ने कहा, ‘‘आदि, मुझे डर लग रहा है, जल्दी से घर पर फोन कर देते हैं पापा

आ जाएंगे.’’

‘‘हां रश्मि, यह कार अपने से तो ठीक होने से रही.’’

तभी अचानक तेजी से एक कार उन के पास आ कर रुकी. उस में नशे में धुत्त 4 लड़के बैठे थे. कार से बाहर निकल कर एक लड़के ने पूछा, ‘‘क्या हुआ भाई? कोई मदद चाहिए क्या?’’

आदित्य ने कहा, ‘‘जी नहीं थैंक यू.’’

तभी एक लड़के ने आदित्य को जोर से धक्का दिया. आदित्य को बिलकुल

आइडिया नहीं था. अत: वह उस धक्के से कुछ दूर तक लड़खड़ाने के बाद संभलने लगा. तब तक दूसरे दोनों लड़कों ने रश्मि को कार में खींच लिया. तीसरा भी जल्दी से बैठ गया और चौथा ड्राइवर सीट पर पहले से ही बैठा था. उस ने तेजी से कार को भगाना शुरू कर दिया.

रश्मि चिल्लाती रही, आदित्य कार के पीछे भाग रहा था. पीछे के कांच से रश्मि की काली परछाईं कुछ क्षणों तक तड़पते हुए आदित्य को दिखाई देती रही और फिर गायब हो गई. कार दूर तक सुनसान रास्ते पर दौड़ती हुई दिखाई देती रही. आदित्य कुछ भी न कर पाया. उस की आंखों के सामने ही उस की रश्मि का हरण हो गया. एक नहीं यहां तो 4-4 रावण थे.

आदित्य ने तुरंत पुलिस को फोन लगा कर बताया. पुलिस हरकत में आए तब तक वह हैवान रश्मि को कहीं बहुत दूर ले जा चुके थे.

दोनों परिवारों में इस खबर ने तूफान ला दिया. सब चिंता में थे, सदमे में थे. घर में आंसू और सन्नाटे के सिवा कुछ भी नहीं था. दोनों परिवार इस दुख की घड़ी में साथ थे. पुलिस अपना काम कर रही थी.

2-3 घंटों के बाद उन लड़कों ने रश्मि को सड़क के किनारे झडि़यों में फेंक दिया.

उन्होंने रश्मि को धमकी देते हुए कहा, ‘‘जान प्यारी हो तो चुपचाप ही रहना वरना हम ने तुम्हारे पति का फोटो भी ले लिया है. हम उसे नहीं छोड़ेंगे, समझ.’’

रश्मि बेहोशी की हालत में सड़क के

किनारे झडि़यों में पड़ी हुई थी. सुबह मौर्निंग वाक करने आए पतिपत्नी को झडि़यों में लड़की पड़ी दिखाई दी.

तभी उस महिला ने अपने पति से कहा, ‘‘अरे यह तो कोई दुलहन लग रही है, पर इस तरह झडि़यों में… जल्दी से पुलिस को फोन करो. इस की हालत देख कर लग रहा है मामला कुछ और ही है.’’

उस के पति ने पुलिस को फोन किया. वह महिला रश्मि को होश में लाने की कोशिश कर रही थी. तब तक पुलिस भी आ गई. रश्मि को तुरंत अस्पताल ले जाया गया.

पुलिस ने आदित्य को फोन कर के बताया, ‘‘आदित्य, एक लड़की सड़क के

किनारे झडि़यों में पड़ी मिली है. उस की हालत गंभीर है. उसे हम ने अस्पताल में भरती करा दिया है. किसी बुजुर्ग दंपती को वह बेहोशी की हालत में मिली थी. उन्होंने ही हमें खबर दी है. आप आ कर देख लीजिए, लगता है यह वही है, जिस के लिए आप ने शिकायत दर्ज करवाई थी.’’

आदित्य और रश्मि के परिवार तुरंत अस्पताल पहुंच गए. रश्मि की हालत बहुत ही खराब थी. जीवन और मौत के बीच संघर्ष करती रश्मि इस वक्त बिलकुल असहाय लग रही थी. वह इस समय होश में भी नहीं थी. उस के चेहरे पर लालनीले निशान दिख रहे थे. बाकी शरीर चादर से ढका था. रश्मि की ऐसी हालत देख कर परिवार वालों की तो क्या डाक्टर और नर्स की आंखों में भी आंसू छलक आए.

आदित्य अपनी मां के कंधे पर सिर रख कर आंसू बहा रहा था. वह बहुत देर तक रश्मि की ऐसी हालत देख न पाया और वहां से बाहर निकल गया.

रश्मि को जब होश आया, दोनों परिवार

वहां मौजूद थे. उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई, लेकिन जिस की चाहत थी, वही उसे दिखाई नहीं दिया. उस की आंखों से आंसू बिना रुके बहते जा रहे थे.

उस के मुंह से एक ही शब्द निकल रहा था, ‘‘आदि बचाओ मुझे…’’

कुछ समय के लिए वह होश में आती, फिर उस की आंखें बंद हो जातीं. दूसरे दिन सुबह उसे पूरी तरह से होश आया. अपनी मम्मी के गले लग कर वह बुरी तरह रो रही थी. उसे सांत्वना किस तरह से दें, कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था. सब की आंखों में सिर्फ आंसू थे. मुंह में मानो जबान नहीं है.

आखिरकार रश्मि ने चुप्पी तोड़ते हुए अपनी मम्मी से पूछा, ‘‘मम्मी आदित्य कहां है?’’

‘‘बेटा अभी तो यहीं था, शायद डाक्टर से बात करने गया होगा.’’

अनीता ने तुरंत आदित्य को फोन लगाया, ‘‘आदि कहां हो तुम? जल्दी आओ रश्मि को होश आ गया है. वह तुम्हें ही बुला रही है.’’

‘‘मां मैं उसे इस तरह तड़पता नहीं देख सकता… मैं उस का सामना नहीं कर पाऊंगा.’’

‘‘कैसी बात कर रहे हो आदित्य तुम? जल्दी से यहां आ जाओ.’’

आदित्य के मन में एक अलग ही तूफान उठा हुआ था. बलात्कार की शिकार हुई रश्मि को स्वीकार करने में अब वह हिचकिचा रहा था. इस तूफान में फंसा आदित्य अपनी मां की बात मान कर रश्मि के सामने आखिरकार आ ही गया.

रश्मि आदित्य से ऐसे लिपट गई जैसे किसी वृक्ष से बेल लिपट जाती है और उसे

छोड़ती ही नहीं. रश्मि बिना कुछ कहे रोती ही जा रही थी.

तब आदित्य ने कहा, ‘‘आई एम सौरी रश्मि, मैं तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाया,’’ इतना कहते हुए आंखों में आंसू लिए वह तुरंत कमरे से बाहर निकल गया. रश्मि अभी भी बांहें फैलाए उसे जाते देख रही थी.

अनीता को आदित्य का ऐसा व्यवहार देख कर बिलकुल अच्छा नहीं लगा. वे तुरंत रश्मि के पास आईं और उसे सीने से लगाते हुए कहने लगीं, ‘‘रश्मि बेटा सब ठीक हो जाएगा. तुम अपने आप को संभालो, हिम्मत रखो बेटा. यह बुरा वक्त था हम दोनों परिवारों के लिए… अब जितनी जल्दी हो सके, हमें इस से बाहर निकलना होगा. आदित्य अपनेआप को दोषी मान रहा है कि वह तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाया. इसलिए तुम से नजरें चुरा रहा है.’’

अगले 2 दिनों तक भी आदित्य अस्पताल नहीं आया. अनीता रोज 3-4 घंटे

रश्मि के पास आ कर रुकती थीं.

तीसरे दिन रश्मि ने पूछ ही लिया, ‘‘मां, आदित्य मुझ से मिलने क्यों नहीं आ रहा? क्या वह मुझ से नाराज है?’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं, वह भी बहुत दुखी है. खुद से नाराज है. तुम्हारा सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. मैं आज ही उसे भेजती हूं.’’

‘‘नहीं मां, जब उस की इच्छा होगी तब वह खुद आएगा. आप उस से जबरदस्ती बिलकुल

मत करना.’’

‘‘ठीक है बेटा.’’

अनीता जब घर पहुंचीं तब मन में ठान चुकी थीं कि आदित्य के मन में क्या चल रहा है, आज वे जान कर ही रहेंगी.

शाम को वे आदित्य के पास जा कर बैठीं और बड़े ही प्यार से कहा, ‘‘आदि बेटा

तुम रश्मि से मिलने आखिर क्यों नहीं जा रहे हो? आज उसे तुम्हारी बहुत जरूरत है. मैं जानती हूं तुम दुखी हो, किंतु तुम्हारा इस तरह का व्यवहार रश्मि को तोड़ देगा. जाओ जा कर उस के पास बैठो, उस से बातें करो. उसे यह विश्वास दिलाओ कि तुम उस के साथ हो.

अपने कंधे का सहारा दे कर उस के बहते आंसुओं को तुम्हें ही पोंछना होगा आदित्य. जब भी कुछ आहट होती है, उस की आंखों में केवल यह उम्मीद होती है कि दरवाजे से तुम ही अंदर आओगे. उस की आंखें हर समय केवल और केवल तुम्हें ही ढूंढ़ती रहती हैं, लेकिन हर बार उस की उम्मीद टूट जाती है, जो उस की सूनी आंखों से पानी बन कर बहने लगती है. उठो आदित्य जाओ… उस के परिवार में भी सभी को लग रहा होगा कि आदित्य आखिर क्यों नहीं आ रहा. मैं कब तक बात को संभालूंगी बेटा.’’

इतना सब सुनने के उपरांत भी आदित्य जाने के लिए तैयार नहीं हुआ. अनीता का प्यार गुस्से में बदल रहा था. वे समझ रही थीं कि आदित्य जाना नहीं चाहता.

अनीता ने गुस्से में पूछा, ‘‘आदित्य, तुम्हारे दिल में क्या चल रहा है, साफसाफ बताओ. क्या तुम अपने पांव पीछे खींच रहे हो?’’

‘‘मां आप क्या चाहती हैं? बलात्कार हुआ है उस के साथ. क्या मैं उस के साथ विवाह कर लूं? समाज, दोस्त सब मेरा मजाक उड़ाएंगे. मुझे कैसीकैसी नजरों से देखेंगे. यदि उस के साथ घर से बाहर जाऊंगा तो कैसी नजरों से उसे देखेंगे? कैसेकैसे तंज कसेंगे? ये सब सोच कर ही मैं कांप जाता हूं. मैं इस का सामना नहीं कर

सकता मां.’’

‘‘अच्छा आदित्य तो यह खिचड़ी पक रही है, तुम्हारे अंदर. मैं तो सच में यह सोच रही थी कि तुम उस की रक्षा नहीं कर पाए, इसलिए दुखी हो, शर्मिंदा हो, इसलिए उस के पास नहीं जा रहे हो. तुम्हारे ऐसे विचार सुन कर मुझे तुम्हारी मानसिकता पर तरस आ रहा है. मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी. तुम ने आज मेरा सिर नीचे झका दिया है. इतने वर्षों से प्यार के वादे करने वाले, जन्मों तक साथ रहने के सपने देखने वाले, एक तूफान के आ जाने से साथी को बीच भंवर में डूबने के लिए छोड़ जाते हैं क्या? मैं ने तो रश्मि को इस घर की बेटी मान लिया है. जो भी हुआ, आखिर उस में दोषी कौन है? क्या गलती रश्मि की है?’’

‘‘मां मुझे भी बहुत दुख है पर मैं क्या करूं. मैं अपने मन को कैसे समझऊं?’’

‘‘आदि जो भी हुआ है, तुम्हें उस का सामना करना चाहिए. यों पीठ दिखाने से कुछ नहीं होगा. जो मुझे नहीं बोलना चाहिए, वह भी मैं तुम से पूछती हूं कि आज यदि ऐसा कुछ मेरे साथ हो जाए तो क्या तुम मुझे भी छोड़ दोगे?’’

‘‘मां यह क्या बोल रही हैं आप?’’

‘‘तुम्हें सुनना होगा आदित्य, समाज तो तब भी कुछ न कुछ कहेगा. मुझे कैसीकैसी नजरों से देखेगा. तुम्हारे साथ बाहर कहीं जाऊंगी तो तंज कसेगा. बोलो आदित्य बोलो… यदि तुम्हारी

बहन होती और उस के साथ ऐसा करती तो

क्या तुम उसे भी छोड़ देते? पूरा जीवन उसे अकेले रहने देते? क्या उस के विवाह की कोशिश नहीं करते? नहीं आदित्य, तब तुम कोई ऐसा लड़का अवश्य ढूंढ़ते जो उसे ये सब जान कर भी अपना लेता. तुम खुद ऐसा लड़का क्यों नहीं बन सकते आदित्य?’’

अपनी मां के इस तरह के तेवर देख कर आदित्य घबरा गया. वह कुछ

बोलता उस के पहले ही अनीता ने कहा, ‘‘तुम जैसे कुछ मर्द ही ऐसी घटनाओं को अंजाम देते

हैं और जीवनभर उस की सजा भोगनी पड़ती है स्त्री को. आदित्य तुम यह रिश्ता तोड़ना चाहते हो, तो तोड़ दो. मैं उस के लिए तुम से भी अच्छा लड़का ढूंढ़ूंगी जो उसे इसी रूप में स्वीकार करे और उतनी ही इज्जत और प्यार दे जितना उस

का हक है. इस के बाद कभी भी मुझे मां कहने की कोशिश भी मत करना,’’ कहते हुए अनीता

रो पड़ीं.

अनीता का हर शब्द आदित्य के सीने को छलनी कर गया. उसे उन का हर शब्द चुभ रहा था.

दूसरे दिन अनीता जब अस्पताल पहुंची तो वहां का दृश्य देख कर वे दंग रह गईं. आदित्य रश्मि के सिरहाने बैठे उस की आंखों से लगातार बहते आंसुओं को अपने हाथों से पोंछ रहा था. साथ ही वह कह रहा था, ‘‘रश्मि मुझे माफ कर दो. मैं तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाया.’’

रश्मि के माथे का चुंबन लेने के लिए जैसे ही वह झका उस की आंखों के आंसू

रश्मि के आंसुओं से जा मिले. यह संगम था आंसुओं के साथसाथ उन दोनों के मिलन का, आदित्य के पश्चात्ताप का, रश्मि की उम्मीदों का और अनीता के प्यार और विश्वास का.

अनीता उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थीं. उन्होंने जैसे ही अपने कदम वापस जाने के लिए उठाए, उस के कानों में आवाज आई, ‘‘आदि मैं

3 दिनों से दरवाजे पर टकटकी लगा कर तुम्हारा इंतजार कर रही थी. मैं जानती हूं कि मैं तुम्हारे लायक नहीं रही. सिर्फ एक बार तुम से मिल कर, तुम्हारी बांहों में सो जाना चाहती थी. आज तुम ने मेरी वह इच्छा पूरी कर दी,’’ कहते हुए वह आदित्य की बांहों से लिपट गई.

‘‘यह क्या कह रही हो रश्मि? मैं तो

तुम्हें एक बार नहीं हजारों बार पूरी जिंदगी

अपने सीने से लगा कर अपनी बांहों में रखना चाहता हूं.’’

तब तक रश्मि की मम्मी भी आ कर अनीता के साथ खड़े हो कर दुनिया का यह सब से सुंदर अलौकिक नजारा देख रही थीं. उन दोनों ने एकदूसरे को गले मिल कर बधाई दी.

तब तक आदित्य ने रश्मि को अपनी गोद में उठा लिया और कहा, ‘‘चलो रश्मि घर चलते हैं.’’

रश्मि अपना सारा दुखदर्द भूल कर

आदित्य को निहारे जा रही थी. इस समय उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो धरती पर ही उसे स्वर्ग मिल गया हो.

कठपुतली: निखिल से क्यों टूटने लगा मीता का मोह

जैसे ही मीता के विवाह की बात निखिल से चली वह लजाई सी मुसकरा उठी. निखिल उस के पिताजी के दोस्त का इकलौता बेटा था. दोनों ही बचपन से एकदूसरे को जानते थे. घरपरिवार सब तो देखाभाला था, सो जैसे ही निखिल ने इस रिश्ते के लिए रजामंदी दी, दोनों को सगाई की रस्म के साथ एक रिश्ते में बांध दिया गया.

मीता एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करती थी और निखिल अपने पिताजी के व्यापार को आगे बढ़ा रहा था.

2 महीने बाद दोनों परिणयसूत्र में बंध कर पतिपत्नी बन गए. निखिल के घर में खुशियों का सावन बरस रहा था और मीता उस की फुहारों में भीग रही थी.

वैसे तो वे भलीभांति एकदूसरे के व्यवहार से परिचित थे, कोई मुश्किल नहीं थी, फिर भी विवाह सिर्फ 2 जिस्मों का ही नहीं 2 मनों का मिलन भी तो होता है.

विवाह को 1 महीना पूरा हुआ. उन का हनीमून भी पूरा हुआ. अब निखिल ने फिर काम पर जाना शुरू कर दिया. मीता की भी छुट्टियां समाप्त हो गईं.

‘‘निखिल पूरा 1 महीना हो गया दफ्तर से छुट्टी किए. आज जाना है पर तुम्हें छोड़ कर जाने को मन नहीं कर रहा,’’ मीता ने बिस्तर पर लेटे अंगड़ाई लेते हुए कहा.

‘‘हां, दिल तो मेरा भी नहीं, पर मजबूरी है. काम तो करना है न,’’ निखिल ने जवाब दिया. तो मीता मुसकरा दी.

अब रोज यही रूटीन रहता. दोनों सुबह उठते, नहाधो कर साथ नाश्ता कर अपनेअपने दफ्तर रवाना हो जाते. शाम को मीता थकीमांदी लौट कर निखिल का इंतजार करती रहती कि कब निखिल दफ्तर से आए और कब दो मीठे बोल उस के मुंह से सुनने को मिलें.

एक दिन वह निखिल से पूछ ही बैठी, ‘‘निखिल, मैं देख रही हूं जब से हमारी शादी हुई है तुम्हारे पास मेरे लिए वक्त ही नहीं.’’

‘‘मीता शादी करनी थी हो गई… अब काम भी तो करना है.’’

निखिल का जवाब सुन मीता मुसकरा दी और फिर मन ही मन सोचने लगी कि निखिल कितना जिम्मेदार है. वह अपने वैवाहिक जीवन से बहुत खुश थी. वही करती जो निखिल कहता, वैसे ही रहती जैसे निखिल चाहता. और तो और खाना भी निखिल की पसंदनापसंद पूछ कर ही बनाती. उस का स्वयं का तो कोई रूटीन, कोई इच्छा रही ही नहीं. लेकिन वह खुद को निखिल को समर्पित कर खुश थी. इसलिए उस ने निखिल से कभी इन बातों की शिकायत नहीं की. वह तो उस के प्यार में एक अनजानी डोर से बंध कर उस की तरफ खिंची जा रही थी. सो उसे भलाबुरा कुछ महसूस ही नहीं हो रहा था.

वह कहते हैं न कि सावन के अंधे को सब हरा ही हरा दिखाई देता है. बस वैसा ही हाल था निखिल के प्रेम में डूबी मीता का. निखिल रात को देर से आता. तब तक वह आधी नींद पूरी भी कर चुकी होती.

एक बार मीता को जम्हाइयां लेते देख निखिल बोला, ‘‘क्यों जागती हो मेरे लिए रात को? मैं बाहर ही खा लिया करूंगा.’’

‘‘कैसी बात करते हो निखिल… तुम मेरे पति हो, तुम्हारे लिए न जागूं तो फिर कैसा जीवन? वैसे भी हमें कहां एकदूसरे के साथ बैठने के लिए वक्त मिलता है.’’ मीता ने कहा.

विवाह को 2 वर्ष बीत गए, किंतु इन 2 वर्षों में दोनों रात और दिन की तरह हो गए. एक आता तो दूसरा जाता.

एक दिन निखिल ने कहा, ‘‘मीता तुम नौकरी क्यों नहीं छोड़ देतीं… हमें कोई पैसों की कमी तो नहीं. यदि तुम घर पर रहो तो शायद हम एकदूसरे के साथ कुछ वक्त बिता सकें.’’

जैसे ही मीता ने अपनी दफ्तर की कुलीग नेहा को इस बारे में बताया, वह कहने लगी, ‘‘मीता, नौकरी मत छोड़ो. सारा दिन घर बैठ कर क्या करोगी?’’

मगर मीता कहां किसी की सुनने वाली थी, उसे तो जो निखिल बोले बस वही ठीक लगता था. सो आव देखा न ताव इस्तीफा लिख कर अपनी बौस के पास ले गई. वे भी एक महिला थीं, सो पूछने लगीं, ‘‘मीता, नौकरी क्यों छोड़ रही हो?’’

‘‘मैम, वैवाहिक जीवन में पतिपत्नी को मिल कर चलना होता है, निखिल तो अपना कारोबार दिन दूना रात चौगुना बढ़ा रहा है, यदि पतिपत्नी के पास एकदूसरे के लिए समय ही नहीं तो फिर कैसी गृहस्थी? फिर निखिल तो अपना कारोबार बंद करने से रहा. सो मैं ही नौकरी छोड़ दूं तो शायद हमें एकदूसरे के लिए कुछ समय मिले.’’

बौस को लगा जैसे मीता नौकरी छोड़ कर गलती कर रही है, किंतु वे दोनों के प्यार में दीवार नहीं बनाना चाहती थीं, सो उस ने मीता का इस्तीफा स्वीकार कर लिया.

अब मीता घर में रहने लगी. जैसे आसपास की अन्य महिलाएं घर की साफसफाई, साजसज्जा, खाना बनाना आदि में वक्त व्यतीत करतीं वैसे ही वह भी अपना सारा दिन घर के कामों में बिताने लगी. कभी निखिल अपने बाहर के कामों की जिम्मेदारी उसे सौंप देता तो वह कर आती, सोचती उस का थोड़ा काम हलका होगा तो दोनों को आपस में बतियाने के लिए वक्त मिलेगा.

उस की दफ्तर की सहेलियां कभीकभी फोन पर पूछतीं, ‘‘मीता, घर पर रह कर कैसा लग रहा है?’’

‘‘बहुत अच्छा, सब से अलग,’’ वह जवाब में कहती.

दीवानी जो ठहरी अपने निखिल की. दिन बीते, महीने बीते और पूरा साल बीत गया. मीता तो अपने निखिल की मीरा बन गई समझो. निखिल के इंतजार में खाने की मेज पर ही बैठ कर ऊंघना, आधी रात जाग कर खाना परोसना तो समझो उस के जीवन का हिस्सा हो गया था.

अब वह चाहती थी कि परिवार में 2 से बढ़ कर 3 सदस्य हो जाएं, एक बच्चा हो जाए तो वह मातृत्व का सुख ले सके. वैसे तो वह संयुक्त परिवार में थी, निखिल के मातापिता भी साथ में ही रहते थे, किंतु निखिल के पिता को तो स्वयं कारोबार से फुरसत नहीं मिलती और उस की मां अलगअलग गु्रप में अपने घूमनेफिरने में व्यस्त रहतीं.

‘‘निखिल कितना अच्छा हो हमारा भी एक बच्चा हो. आप सब तो पूरा दिन मुझे अकेले छोड़ कर बाहर चले जाते हो… मुझे भी तो मन लगाने के लिए कोई चाहिए न,’’ एक दिन मीता ने निखिल के करीब आते हुए कहा.

जैसे ही निखिल ने यह सुना वह उस के छिटकते हुए कहने लगा, ‘‘मीता, अभी मुझे अपने कारोबार को और बढ़ाना है. बच्चा हो गया तो जिम्मेदारियां बढ़ जाएंगी और फिर अभी हमारी उम्र ही क्या है.’’

मीता ने उसे बहुत समझाया कि वह बच्चे के लिए हां कह दे, किंतु निखिल बड़ी सफाई से टाल गया, बोला, ‘‘क्यों मेरा हनीमून पीरियड खत्म कर देना चाहती हो?’’

उस की बात सुन मीता एक बार फिर मुसकरा दी. बोली, ‘‘निखिल तुम बहुत चालाक हो.’’

मगर मीता अकेले घर में कैसे वक्त बिताए हर इंसान की अपनी दुनिया होती है. वह भी अपनी दुनिया बसाना चाहती थी, किंतु निखिल की न सुन कर चुप हो गई और निखिल अपनी दुनिया में मस्त.

एक दिन मीता बोली, ‘‘निखिल, मैं सोचती थी कि मैं नौकरी छोड़ दूंगी तो हमें एकसाथ समय बिताने को मिलेगा, किंतु तुम तो हर समय घर पर भी अपना लैपटौप ले कर बैठे रहते हो या फिर फोन पर बातों में लगे रहते हो.’’

उस की यह बात सुन निखिल बिफर गया. गुस्से में बोला, ‘‘तो क्या घर बैठ कर तुम्हारे पल्लू से बंधा रहूं? मैं मर्द हूं. अपनेआप को काम में व्यस्त रखना चाहता हूं, तो तुम्हें तकलीफ क्यों होती है?’’

मीता निखिल की यह बात सुन अंदर तक हिल गई. मन ही मन सोचने लगी कि इस में मर्द और औरत वाली बात कहां से आ गई.

हां, जब कभी निखिल को कारोबार संबंधी कागजों पर मीता के दस्तखत चाहिए होते तो वह बड़ी मुसकराहट बिखेर कर उस के सामने कागज फैला देता और कहता, ‘‘मालकिन, अपनी कलम चला दीजिए जरा.’’

कभी वह रसोई में आटा गूंधती बाहर आती तो कभी अपनी पसंदीदा किताब पढ़ती बीच में छोड़ती और मुसकरा कर दस्तखत कर देती.

मीता का निखिल के प्रति खिंचाव अभी भी बरकरार था. सो आज अकेले में मुसकुराने लगी और सोचा कि ठीक ही तो कहा निखिल ने. घर के लिए ही तो काम करता है सारा दिन वह, मैं ही फालतू उलझ बैठी उस से.

शाम को जब वह आया तो वह पूरी मुसकराहट के साथ उस के स्वागत में खड़ी थी, लेकिन निखिल का रुख कुछ बदला हुआ था. मीता उस के चेहरे के भाव पढ़ कर समझ गई कि निखिल उस से सुबह की बात को ले कर अभी तक नाराज है. सो उस ने उसे खूब मनाया. कहा, ‘‘निखिल, क्या बच्चों की तरह नाराज हो गए? हम दोनों जीवनपथ के हमराही हैं, मिल कर साथसाथ चलना है.’’

लेकिन निखिल के चेहरे पर से गुस्से की रेखाएं हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं. क्या करती बेचारी मीता. आंखें भर आईं तो चादर ओढ़ कर सो गई.

निखिल अगली सुबह भी उसे से नहीं बोला. घर से बिना कुछ खाए निकल गया.

आज पहली बार मीता का दिल बहुत दुखी हुआ. वह सोचने लगी कि आखिर ऐसा भी क्या कह दिया था उस ने कि निखिल 3 दिन तक उस बात को खींच रहा है.

अब वह घर में निखिल से जब भी कुछ कहना चाहती उस का पौरुषत्व जाग उठता. एक दिन तो गुस्से में उस के मुंह से निकल ही गया, ‘‘क्यों टोकाटाकी करती रहती हो दिनरात?

तुम्हारे पास तो कुछ काम है नहीं…ये जो रुपए मैं कमा कर लाता हूं, जिन के बलबूते पर तुम नौकरों से काम करवाती हो, वो ऐसे ही नहीं आ जाते. दिमाग खपाना पड़ता है उन के लिए.’’

आज तो निखिल ने सीधे मीता के अहम पर चोट की थी. वह अपने आंसुओं को पोंछते हुए बिस्तर पर धम्म से जा पड़ी. सारी रात उसे नींद नहीं आई. करवटें बदलती रही. उसे लगा शायद निखिल ने गुस्से में आ कर कटु शब्द बोल दिए होंगे और शायद रात को उसे मना लेगा. लेकिन इस रात की तो जैसे सुबह ही नहीं हुई. जहां वह करवटें बदलती रही वहीं निखिल खर्राटे भर कर सोता रहा.

अब तो यह खिटपिट उन के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गई थी. इसलिए उस ने निखिल से कई बातों पर बहस करना ही बंद कर दिया था. कई बार तो वह उस के सामने मौन व्रत ही धारण कर लेती.

सिनेमाहाल में नई फिल्म लगी थी. मीता बोली, ‘‘निखिल, मैं टिकट बुक करा देती हूं. चलो न फिल्म देख कर आते हैं.’’

‘‘तुम किसी और के साथ देख आओ मीता, मेरे पास बहुत काम है,’’ कह निखिल करवट बदल कर सो गया.

मीता ने उसे झंझोड़ कर बोला, ‘‘किस के साथ देख आऊं मैं फिल्म? कौन है मेरा तुम्हारे सिवा?’’

निखिल चिढ़ कर बोला, ‘‘जाओ न क्यों मेरे पीछे पड़ गई. बिल्डिंग में बहुत औरतें हैं. किसी के भी साथ चली जाओ वरना कोई किट्टी जौइन कर लो… मैं ने तुम्हें कितनी बार बताया कि मुझे हिंदी फिल्में पसंद नहीं.’’

मीता उस की बात सुन एक शब्द न बोली और अपनी पनीली आंखों को पोंछ मुंह ढक कर सो गई.

आज मीता को अपने विवाह के शुरुआती महीनों की रातें याद हो आईं. कितनी असहज सी होती थी वह जब नया विवाह होते ही निखिल रात को उसे पोर्न फिल्में दिखाता था. वह निखिल का मन रखने को फिल्म तो देख लेती थी पर उसे उन फिल्मों से बहुत घिन आती थी.

कई बार थके होने का बहाना बना कर सोने की कोशिश भी करती, लेकिन निखिल अकसर उस पर दबाव बनाते हुए कहा करता कि इफ यू टेक इंट्रैस्ट यू विल ऐंजौय देम. वह अकसर जब फिल्म लगाता वह नानुकर करती पर निखिल किसी न किसी तरह उसे फिल्म देखने को राजी कर ही लेता. उस की खुशी में ही अपनी खुशी समझती.

कई बार तो वह सैक्स के दौरान भी वही चाहता जो पोर्न स्टार्स किया करतीं. मीता को लगता क्या यही विवाह है और यही प्यार का तरीका भी? उस ने तो कभी सोचा भी न था कि विवाहोपरांत का प्यार दिली प्यार से इतना अलग होगा, लेकिन वह इन 2 बरसों में पूरी तरह से निखिल के मन के सांचे में ढल तो गई थी, लेकिन इस सब के बावजूद निखिल क्यों उखड़ाउखड़ा रहता है.

मीता को मन ही मन दुख होने लगा था कि जिस निखिल के प्यार में वह पगलाई सी रहती है, उसे मीता की जरा भी फिक्र नहीं शायद… माना कि पैसा जरूरी है पर पैसा सब कुछ तो नहीं होता. कल तक हंसमुख स्वभाव वाले निखिल के बरताव में इतना फर्क कैसे आ गया, वह समझ ही न पाई.

निखिल अपने लैपटौप पर काम करता तो मीता उस पर ध्यान देने लगी. उस ने थोड़ा से देखा तो पाया कि वह तो अपने कालेज के सहपाठियों से चैट करता.

एक दिन उस से रहा न गया तो बोल पड़ी, ‘‘निखिल, मैं ने तुम्हारा साथ पाने के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ दी, पर तुम्हें मेरे लिए फुरसत नहीं और पुराने दोस्तों से चैट के लिए फुरसत है.’’

निखिल तो जैसे गुस्से में आगबबूला हो उठा. चीख कर बोला, ‘‘जाओ फिर से कर लो नौकरी… कम से कम हर वक्त की बकबक से पीछा तो छूटेगा.’’

यह सुन मीता बोली, ‘‘तुम ने ही कहा था न मुझे नौकरी छोड़ने के लिए ताकि हम दोनों साथ में ज्यादा वक्त बिता सकें, लेकिन तुम्हें तो शायद मेरा साथ पसंद ही नहीं… पत्नी जो ठहरी… और जब मुझे नौकरी छोड़े 2 वर्ष बीत गए तो तुम कह रहे हो मैं फिर शुरू कर दूं ताकि तुम आजाद रहो.’’

मीता निखिल के बरताव से टूट सी गई थी. सारा दिन इसी उधेड़बुन में लगी रही कि उस की गलती क्या है? आज तक उस ने वही किया जो निखिल ने चाहा. फिर भी निखिल उसे क्यों ठुकरा देता है?

अब मीता अकसर निखिल के लैपटौप पर नजर रखती. कई बार चोरीछिपे उस का लैपटौप भी देखती. धीरेधीरे उस ने समझ लिया कि वह स्वयं ही निखिल के बंधन में जबरदस्ती बंधी है, निखिल तो किसी तरह का बंधन चाहता ही नहीं.

एक पुरुष को जीवन में सिर्फ 3 चीजों की ही तो जरूरत होती है- अच्छा खाना, अच्छा पैसा और सैक्स, जिन में खाना तो वह बना ही देती है वरना बड़ेबड़े रैस्टोरैंट तो हैं ही जिन में वह अपने क्लाइंट्स के साथ अकसर जाता है. दूसरी चीज है पैसा जो वह स्वयं कमा ही रहा है और पैसे के लिए तो उलटा मीता ही निखिल पर निर्भर है. तीसरी चीज है सैक्स. वैसे तो मीता उस के लिए जब चाहे हाजिर है, आखिर उसे तो पत्नी फर्ज निभाना है. फिर भी निखिल को कहां जरूरत है मीता की.

कितनी साइट्स हैं जहां न जाने कितनी तरह के वीडियो हैं, जिन में उन छरहरी पोर्न स्टार्स को देख कर कोई भी उत्तेजित हो जाए. उस के पास तो मन बहलाने के पर्याप्त साधन हैं ही. कहने को विवाह का बंधन प्रेम की डोर से बंधा है, लेकिन हकीकत तो यह है कि यह जरूरत की डोर है, जो इस रिश्ते को बांधे रखती है या फिर बच्चे जो स्वत: ही इस रिश्ते में प्यार पैदा कर देते हैं जिन के लिए निखिल राजी नहीं.

उदास सी खिड़की के साथ बने प्लैटफौर्म पर बैठी थी कि तभी घंटी बजी. उस ने झट से अपने बालों को आईने में देख कर ठीक किया. फिर खुद को सहज करते हुए दरवाजा खोला. सामने वाले फ्लैट की पड़ोसिन अमिता दरवाजे पर थी. बोली, ‘‘मेरे बच्चे का पहला जन्मदिन है, आप सभी जरूर आएं,’’ और निमंत्रणपत्र

थमा गई.

अगले दिन मीता अकेली ही जन्मदिन की पार्टी में पहुंच गई. वहां बच्चों के लिए पपेट शो वाला आया था. बच्चे उस का शो देख कर तालियां बजाबजा कर खुश हो रहे थे.

पपेट शो वाला अपनी उंगलियों में बंधे धागे उंगलियों से घुमाघुमा कर लपेटखोल रहा था जिस कारण धागों में कभी खिंचाव पैदा होता तो कभी ढील और उस के इशारों पर नाचती कठपुतली, न होंठ हिलाती न ही अपने मन की करती, बस जैसे उस का मदारी नचाता, नाचती.

आज मीता को अपने हर सवाल का जवाब मिल गया था. वह निखिल के लिए एक कठपुतली ही तो थी. अब तक दोनों के बीच जो आकर्षण और खिंचाव महसूस करती रही, वह उस अदृश्य डोर के कारण ही तो था, जिस से वह निखिल के साथ 7 फेरों की रस्म निभा बंध गई थी और उस डोरी में खिंचाव निखिल की पसंदनापसंद का ही तो था. वह नादान उसे प्यार का आकर्षण बल समझ रही थी. विवाहोपरांत वह निखिल के इशारों पर नाच ही तो रही थी. निखिल ने तो कभी उस के मन की सुध ली ही नहीं.

मीता ने गर्दन हिलाई मानो कह रही हो अब समझी निखिल, अगले दिन उस ने पुराने दफ्तर में फोन पर अपनी बौस से बात की.

बौस ने कहा, ‘‘ठीक मीता, तुम फिर से दफ्तर आना शुरू कर सकती हो.’’

मीता अपनी राह पर अकेली चल पड़ी.

जरा अच्छा नहीं लगता : पप्पू के बापू की कसक

लड़कपन से ही मैं कुछ ज्यादा लापरवाह रहा हूं, इसीलिए मेरी किताब की जगह किताब नहीं मिलती थी और न कपड़ों की जगह कपड़े ही. आते ही इधरउधर फेंक देता और ढूंढ़ते वक्त शामत आती मां की.

मां रोज कहती, ‘‘पप्पू के बापू, इस के दहेज में चाहे अठन्नी भी न मिले, मगर बहू ऐसी ला देना, जो इसे मेमना बना कर खाट से बांध दे.’’

पिताजी हंस कर कहते, ‘‘क्यों परेशान होती हो पप्पू की मां, अभी बच्चा ही तो है.’’

बाद में मैं बड़ा भी हो गया, मगर मेरी आदतें वही ‘पप्पू’ वाली ही रहीं, तो पिताजी के कान खड़े हुए. लोग वर ढूंढ़ने के लिए खाक छाना करते हैं, लेकिन उन्होंने मेरे लिए बीवी खोजने में 4 जोड़ी जूतियां घिस डालीं.

एक दिन उन्होंने खूंटी पर पगड़ी टांगते हुए कहा था, ‘‘लो पप्पू की मां, तुम्हारी मुराद पूरी हुई.’’

‘‘छोरी कैसी है पप्पू के बापू?’’

‘‘है तो थोड़ी काली, लेकिन रंग तो 2 ही होते हैं. अच्छी सेहतमंद भी है, पर सफाई से उसे बहुत प्यार है… और हर सलीका जानती है. इसी बात पर रीझ कर मैं ‘हां’ कह आया. तुम भी देखोगी तो निहाल हो जाओगी,’’ बापू बागबाग हुए जा रहे थे.

उस लड़की का खयाल कर के ही मेरे होश उड़ गए. लेकिन शादी का जो चाव होता है, उसी पागलनपन में घोड़ी पर चढ़ बैठा. भांवरे शुरू हुए ही थे कि गड्डमड्ड हुई. दुलहन ने मुझे कुहनी मार कर कहा, ‘‘सीधे बैठो जी, यों झुक कर बैठना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

इस बात पर बापू ने मां की तरफ देख कर मूंछों पर ताव दिया था और मां ने इस तरह हंस कर सिर हिलाया था मानो कह रही हो कि मान गए जी, आप की पसंद को. पप्पू के लिए ऐसी ही बहू चाहिए थी. मैं तो खुश था कि चलो, अब मां की हर तकलीफ यह संभाल लेगी.

घर आते ही मांबाप के पैर छूते समय रामकटोरी ने समझाया था, ‘‘देखो जी, हम पैर छूने जाएंगे. इस का सही तरीका यह है कि पहले दोनों हाथ जोड़ कर हमें प्रणाम करना है. उस के बाद उन के पैरों में झुकना है. फिर उलटे पांव लौटना है, उन की तरफ पीठ नहीं करनी है.’’

इस बात को समझाने के लिए वह बापू के पैर छूने गई थी और वापसी में उस ने फर्श पर पड़े मर्तबान के टुकड़ेटुकड़े कर दिए थे.

मैं सोच रहा था कि अभी मां चिल्लाएंगी, ‘बहू अंधी हो क्या, जो कुछ नहीं दिखाई देता.’

मगर मांबाप तो पैर छूने के इस सलीके पर इतने खुश थे कि उन्हें मर्तबान का जरा भी अफसोस न हुआ. मां ने मेरे सारे काम रामकटोरी को सौंप दिए.

मैं जितना लापरवाह था, रामकटोरी उतनी ही सलीकापसंद. ‘जरा अच्छा नहीं लगता,’ कह कर वह मेरे जूतों को पलंग के नीचे इतनी दूर पहुंचा देती कि सुबह सूट व टाई पहनने के बाद जूते निकालने के लिए मुझे फर्श पर लेटना पड़ता.

मैं जांघिए को सूखने के लिए बाहर डाल जाता, पर वह शाम तक उसे स्टोर में पड़े संदूक के भीतर रख देती. वजह, ऐसी चीजों का बाहर दिखना अच्छा नहीं लगता.

रामकटोरी सुबहसवेरे उठ कर झाड़ू जरूर लगाएगी, मगर धूल उड़ कर सोफे, बिस्तर और किताबों पर जम जाती है. वह उन्हें झाड़ती है. तो धूल फर्श पर फिर. वह फिर से झाड़ू लगाएगी और बेशर्म धूल फिर सोफे, बिस्तर और किताबों पर. हार कर मैं कहता हूं, ‘‘रहने दो रामकटोरी, क्यों धूल में लट्ठ भांज रही हो?’’

मगर रामकटोरी झाड़ू लिए जुटी रहेगी, ‘‘रहने दो जी, घर गंदा रहे तो जरा अच्छा नहीं लगता.’’ इसी बीच सारी धूल रामकटोरी पर जम चुकी होती है और मैं हंस कर कहता हूं, ‘‘मगर, इस वक्त आप बहुत अच्छी लग रही हैं.’’

इस बात पर वह बिदक जाती, ‘‘क्यों जी, जब मैं नहा कर निकलती हूं या पाउडर, क्रीम लगाती हूं, तब तो आप कभी नहीं कहते कि अच्छी लग रही हूं. अब गंदी दिख रही हूं तो आप को अच्छी लग रही हूं. आप में धेले की भी अक्ल नहीं है. आप को मैलीकुचैली औरतें ही पसंद…’’ कहतेकहते वह रोने लगती है.

अब मुझे उसी का हथियार प्रयोग करना पड़ता, ‘‘ऐसे मत रोओ, रामकटोरी. इस तरह रोना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

मुझे घर में बनियान पहन कर बैठने की आदत है. वह मास्टरनियों की तरह तुरंत घुड़क देती, ‘‘यह क्या तोंद निकाले बैठे हैं. चलिए, कमीज पहनिए.’’

मैं कहता, ‘‘देखो रामकटोरी, गरमी बहुत…’’ उधर से तुरंत जवाब मिलता, ‘‘मगर, इस तरह नंगे बैठना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

जब कमीज बाजू से उधड़ी होती, तो मैं कई बार टांका लगाने को कहता, मगर वह कानों में तेल दिए बैठी रहती. मुझे उपाय सूझता. कमीज उस के सामने फेंक कर कहता, ‘‘यह फटी कमीज पहनना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

रामकटोरी मेरी भी उस्ताद थी. कमीज मेरे मुंह पर मार कर कहती, ‘‘दर्जी के पास जाइए. बड़े घर की औरतें फटापुराना सीएं, तो जरा अच्छा नहीं लगता.’’

रामकटोरी की रसोई भी देखने वाली होती. सब से नीचे बड़े बरतन, उन से ऊपर छोटे बरतन और फिर सब से छोटे बरतन मीनार की तरह सजा कर रखे होते. सब से नीचे का बरतन चाहिए तो सारे बरतन उतारो. अपनी जरूरत का बरतन निकालने के बाद सारे बरतनों को फिर से उसी तरह सजाओ. गोया सजाना न हुआ, सजा हो गई. मगर वह मेरी कहां सुनती. इसी चक्कर में लगी रहती.

मैं चिल्लाता, ‘‘बाद में सजा लेना, मुझे दफ्तर के लिए देर हो जाएगी.’’

रामकटोरी हंस कर कहती, ‘‘रसोईघर तो औरत का मंदिर होता है, यही गंदा रहे तो जरा अच्छा नहीं लगता.’’ वह अच्छा लगने में ही लगी रहती. यही वजह है थी कि सब्जी वक्त पर नहीं बनती.

मगर रामकटोरी खाने का डब्बा हमेशा 5 खानों वाला देती. इस का भी एक सलीका था. पहले डब्बे में एक साबुत प्याज और 2 मिर्च, दूसरे में अचार, तीसरे में चटनी, चौथे में सब्जी और 5वें में 5 रोटियां.

मैं चाहता कि सूखी रोटियां कागज में लपेट कर मांगूं और बस पकड़ लूं, मगर उस का जवाब होता, ‘‘इतना बड़ा अफसर अखबार में रोटियां लपेट कर ले जाता जरा अच्छा नहीं लगता.’’

घर में सोफे पर बैठते वक्त मैं अधलेटा हो जाता या टांग पर टांग चढ़ा कर बैठ जाता, तो वही घिसापिटा जुमला कान छील देता है.

नहाते वक्त मेरा ध्यान नहाने में कम और गुसलखाने पर ज्यादा होता है. साबुन लगाने के बाद उसे साबुनदानी में रख कर ढक्कन लगा कर दाएं कोने में बने आले में इस तरह रखना पड़ता कि वह नीचे बैठेबैठे उठाया जा सके और गिरे भी नहीं.

नहा चुकने के बाद तंग से गुसलखाने में ही कपड़े पहनो और आते समय बालटी को फर्श पर औंधा रखना होता था. फिर उस पर मग इस तरह रखा जाए कि खुले दरवाजे से वह साफ नजर आता रहे.

इन सलीकों और रामकटोरी की टोकाटाकी से मैं बेहद डरता रहता और हर पल घबराता रहता कि कहीं कोई गलती न हो जाए और उस का घिसापिटा रिकौर्ड न सुनना पड़ जाए. इस के बावजूद यह मंत्र हमारे घर में गूंजता ही रहता.

अब तो बच्चे भी बड़े चालू हो गए हैं. उन्हें डांटता हूं तो तुरंत मां के अंदाज में बोलते हैं, ‘‘चुप पिताजी, जरा धीरे. यों डांटना जरा अच्छा नहीं लगता.’’

तंग आ कर मैं ने एक दिन बापू से कहा, ‘‘इस कटोरी पर आप ही रीझे थे, फिर मेरे पल्ले क्यों बांध दिया इसे?’’ बापू मां की तरफ देख कर हंसे थे, ‘‘भई, यह तुम्हारी मां तो मास्टरनी ही थी, बहू तो हैडमास्टरनी निकली. लेकिन…’’

तभी रामकटोरी आ पहुंची. मैं सोच रहा था कि अपनी तारीफ सुन कर वह फूल कर कुप्पा हो जाएगी. मगर उस ने मुंह फुला कर कहा, ‘‘पिताजी, आप इन से मजाक न करें. आप और जवान बेटे का इस तरह मजाक करना…’’

मैं ने तुरंत जुमला पूरा किया, ‘‘जरा अच्छा नहीं लगता.’’

रामकटोरी ने तुनक कर बापू से कहा, ‘‘देखिए, मेरी नकल उतार रहे हैं. इस तरह चिढ़ाना…’’

इस खाली जगह को बापू ने भरा, ‘‘जरा अच्छा नहीं लगता,’’ और ठहाका लगा दिया.

रामकटोरी हैरान रह गई. उस ने बड़ी उम्मीद से मां की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘देखिए न मांजी, बापबेटा दांत निकाल रहे हैं, इस तरह मजाक उड़ाना…’’

मां ने उस के मुंह से बात छीनते हुए कहा, ‘‘जरा अच्छा नहीं लगता.’’

इस बार ठहाका और भी जोर का लगा और इस में रामकटोरी की आवाज सब से ऊंची थी.

मैं ने खुशी से कहा, ‘‘शुक्र है, तुम भी हंस दी, रोई तो नहीं.’’

रामकटोरी ने कहा, ‘‘सब हंस रहे हों, तो एक औरत का रोना जरा…’’

पुत्तन की प्रेमकथा

पु त्तन कोई भी हो सकता है. आप का पड़ोसी, दीदी का देवर या फिर आप के मामामौसी के बेटे का साला या फिर हमारा पुत्तन. बात नाम को ले कर नहीं है, बात है उस के प्रेम को ले कर, जिस की शुरुआत 15 साल की उम्र से हो जाती है. अपने मांबाप का एकलौता सपूत, सरकारी टीचर का बेटा और पढ़ने में औसत.

अब औसत पढ़ाई करने वाला आप का बालक प्रेम कर बैठे तो यह प्रेम उसे कैसेकैसे दिन दिखा सकता है, यह तो  कहने की जरूरत ही नहीं है. 15 साल

की उम्र से शुरू होने वाला इस का प्रेम 25 साल की उम्र पर आ कर कब थम गया, उसे खुद को भी पता नहीं चला.

10वीं जमात की गरमियों की बात है. पुत्तन स्कूल के बाहर साइकिल की चेन ठीक कर रहा था कि तभी उस की नजर एक लड़की पर पड़ी और बिना कुछ जानेसम   झे पुत्तन तो जैसे इसे ही प्रेम सम   झ बैठा. अब इसे कौन बताए कि भैया पढ़ाई कर वरना पिताजी के कितने बेंत बरसेंगे, यह तो तुम्हें पता ही होगा.

पुत्तन से एक गलती भी हो गई. वह गलती थी प्रेमपत्र लिखने की. प्रेमपत्र लिखा भी गया और एक बच्चे के जरीए उसे मंजिल तक पहुंचाया भी गया, लेकिन लड़की इतनी बेवफा निकली कि वह प्रेमपत्र उस ने सीधे क्लास टीचर को दे दिया. क्लास टीचर ने प्रिंसिपल को और प्रिंसिपल ने सीधे पिताजी तक पहुंचा दिया.

घर आने पर पिताजी की सुताई से अक्ल ठिकाने आनी थी, वह सिर्फ 5 दिन तक आई और फिर छठे दिन पुत्तन अपनी पुरानी प्रेमिका

को भूलते हुए नए प्रेम की तलाश में निकल पड़ा.

नया प्रेम ज्यादा दूर नहीं था. पड़ोस के शर्माजी के यहां उन की भतीजी पढ़ने आई थी. तेजतर्रार और होशियार. काम निकालने की कला में माहिर. पुत्तन के भोंदूपन को देखते ही ताड़ लिया था.

प्रेमभरे शब्दों से जैसे ही उस ने पुत्तन को साइकिल पर स्कूल छोड़ने जाने को कहा, तो जैसे पुत्तन के तो हवा लग गई.

अब तो रोज पुत्तन साइकिल से शर्माजी की भतीजी को स्कूल छोड़ने जाता और ले कर आता. घर के बाहर से लेने की तो उस की हिम्मत कभी नहीं हुई, क्योंकि पिताजी और शर्माजी गहरे दोस्त थे.

पुत्तन का एकतरफा प्रेम परवान चढ़ता चला गया, लेकिन पुत्तन सिर्फ साइकिल से लड़की को छोड़ता और चुपचाप ले कर भी आ जाता. 2 साल निकल गए, पता ही नहीं चला. पुत्तन अब 17 साल का होगा, उस से थोड़ी  बड़ी उस की प्रेमिका 18 साल की.

तभी अचानक एक दिन जोश में आ कर पिताजी खबर लाए, ‘‘कल शर्माजी की भतीजी की सगाई है, हम को वहां चलना है.’’

यह सुन कर पुत्तन को तो जैसे काटो तो खून नहीं. क्या करे और क्या न करे. फिर उसे दोष दे तो कैसे दे? उसे कभी कुछ कहा भी तो नहीं.

खैर, सगाई वाला दिन भी आया. सारे मेहमानों को खाना खिलाना, पानी पिलाना, नाश्ता… सब काम पुत्तन अंदर ही अंदर रोता हुआ कर रहा था.

दूल्हादुलहन के हंसीमजाक के बीच में दुल्हन के मौसाजी पुत्तन को साइड में ले जा कर बोले, ‘‘अब तो जो होना था वह हो गया, अब तो सिर्फ पत्तलें उठाओ.’’

पुत्तन हैरान हो गया. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि पूरी दुनिया को तो पता चला नहीं, इन्हें कैसे पता है?

मौसाजी फिर धमक पड़े और बोल पड़े, ‘‘तुम सोच रहे होगे कि मु   झे

कैसे पता? धूप में बाल थोड़े ही सफेद किए हैं… और हम भी तो लड़की की खूबसूरत मां पर फिदा थे, लेकिन इन का तो खानदान ही ऐसा है. शादी उस की मां से करनी थी, मिल गई मां की चचेरी बहन. मेरे साथ भी नाइंसाफी हो गई भैया.’’

मौसाजी की बात से जैसे पुत्तन के घाव पर मरहम लगा हो और उसे लगा कि उस की तरह और भी लोग हैं.

इस के बाद पहले 4 दिन पुत्तन ने 15 घंटे पढ़ाई की, जो अपनेआप में एक रिकौर्ड था, फिर उस ने खुद का रिकौर्ड खुद ही तोड़ना शुरू कर दिया. अगले हफ्ते के आतेआते वही मटरगश्ती, दोस्तों के साथ साइकिल पर जाना, टैलीविजन देखना शुरू कर दिया.

अब तो जैसे पुत्तन को किसी की परवाह नहीं थी. ग्रैजुएशन की पढ़ाई में

2 बार फेल हो गया. परेशान हो कर पिताजी ने दुबे मास्टर के यहां पढ़ने भेज दिया.

पुत्तन को वाकई नहीं पता था कि यहां उस की जिंदगी का नया चैप्टर शुरू होगा. दुबे मास्टर की एक लड़की थी. उस का नाम था सुमन. पुत्तन की जिंदगी में अब तक आई लड़कियों में सब से अलग.

जब दुबे मास्टर बिजी होते, तो पुत्तन को सुमन ही पढ़ाती थी. पुत्तन को एक बार फिर से प्रेम हो गया, लेकिन इस बार प्रेम एकतरफा न हो कर दोतरफा था. वे जानते थे कि दोनों के घर वाले इस प्रेम को स्वीकार नहीं करेंगे, तो पुत्तन ने किसी तरह से उस लड़की को घर से भागने को राजी कर लिया.

पर जैसा कि आप जानते हो कि पुत्तन एकदम बेरोजगार, खयालीपुलाव नौजवान. उसे तो खुद को ही पता नहीं था कि वह क्या करेगा, तो फिर बेचारी उस लड़की को क्या खिलाता. शाम

तक दोनों के होश ठिकाने आ गए. लड़के के भी और लड़की के भी. लड़की ने फिर कभी न मिलने की कसम खा कर ‘बायबाय’ कर दिया.

पुत्तन 4 दिन तक कमरे में पड़ा रहा. वह तो भला हो किसी को पता नहीं चला, नहीं तो महल्लेपड़ोस में रहना मुश्किल हो जाता.

अब की बार पुत्तन को आटेदाल का भाव पता चल गया. पुत्तन ने तय कर लिया कि अब वह किसी के भी प्रेमजाल में नहीं फंसेगा. हर प्रेमिका बेवफा निकली.

खैर, आगे चल कर पुत्तन ने एक छोटी सी नौकरी ढूंढ़ निकाली. पिताजी के रोजरोज के तानों से तंग आ कर उस ने अपने बेरोजगार मिशन को विराम दिया. पिताजी के द्वारा मिलने वाला

भत्ता तकरीबन खत्म हो चुका था और माताजी की नजर अब पुत्तन का ब्याह करने पर थी.

एक तो सरकारी टीचर का बेटा, वह भी छोटे से मकान के साथ. छोटी सी नौकरी करने वाला. भला किस पिता की हिम्मत होती कि पुत्तन को अपनी लड़की दे. माता पक्ष के किसी रिश्तेदार की सांवलीसलोनी कन्या से उस का ब्याह तय हो गया.

कन्या घर तो आ गई, पर पुत्तन अभी भी अपनी पुरानी प्रेमिकाओं  के दिमाग, खूबसूरती और स्मार्टनैस में खो जाता. उस की गरीबी के बीच उस की प्रेमिकाएं किसी ठंडी हवा के    झोंके से कम नहीं थीं.

एक दिन बीच बाजार में तीनों देवियों के एकसाथ दर्शन हो गए. उस की ये प्रेमिकाएं अब काफी उम्र वाली और मोटी हो गई थीं. उन का ऐसा हाल देख कर उसे बड़ी हैरानी हुई.

पुत्तन का बरताव अपनी पत्नी और बच्चों के साथ काफी तल्ख था, घर आ कर अपनी दुबलीपतली लेकिन विनम्र पत्नी को देख कर उस को अपनी कामयाबी पर गर्व हुआ और उसे लगा जैसे उस ने किला फतेह कर लिया हो. उस की हालत तो घर में उन सभी लोगों से अच्छी है, जो बाहर प्रदर्शन ज्यादा करते हैं. आज पुत्तन को वाकई प्रेम हो गया.

कुंआरी मां : राहिल और सिराज की कहानी

शाम का सुहाना मौसम था. राहिल रोजाना की तरह ट्यूशन पढ़ने जा रही थी कि अचानक एक खूबसूरत नौजवान लड़का तेज रफ्तार में बाइक चलाता हुआ उस के बगल से गुजरा.

राहिल जोर से चिल्लाते हुए बोली, ‘‘पागल हो क्या, जो इतनी तेज गाड़ी चला रहे हो… आतेजाते लोगों का कुछ तो खयाल करो.’’

बाइक सवार कुछ दूर जा कर बाइक रोकते हुए बोला, ‘‘पूरी सड़क पर आप का राज है क्या, जो बीच रोड पर चल रही हो?’’

राहिल ने कहा, ‘‘लगता है कि यह सड़क आप के अब्बा ने बनवाई है, जो आंधी की तरह बाइक चला रहे हो.’’

बाइक सवार बोला, ‘‘सड़क तो मेरे अब्बा ने ही बनवाई है, क्योंकि मैं इस गांव के प्रधान शौकत अली का बेटा सिराज हूं.’’

राहिल भी कहां कम थी, बोली, ‘‘तभी इतना घमंड आप के अंदर भरा है, जो राह चलते लोगों की भी परवाह नहीं है.’’

सिराज ने कहा, ‘‘मैडम, यह घमंड नहीं, बल्कि मेरा बाइक चलाने का शौक है और तेज गाड़ी चलाने का हुनर भी. आज तक कोई नहीं कह सकता कि सिराज से किसी तरह का कोई हादसा हुआ हो.

‘‘वैसे, आप इस गांव में नई लगती हो, जो मुझे इस तरह डांट रही हो, वरना मुझे देख कर लोग सिर्फ मेरी तारीफ ही करते हैं.’’

राहिल बोली, ‘‘बेवकूफ हैं वे लोग, जो एक सिरफिरे की तारीफ करते हैं और इस तरह बाइक चलाने से आनेजाने वालों को ही नहीं, बल्कि खुद को भी नुकसान पहुंचा सकता है.’’

सिराज ने कहा, ‘‘आप मेरी फिक्र न करें, मैं अपने हुनर में माहिर हूं.’’

राहिल भी जवाब देते हुए बोली, ‘‘फिक्र नहीं कर रही हूं, बल्कि मैं आप को चेतावनी दे रही हूं कि अपनी नहीं तो अपने मांबाप की परवाह करो. किसी दिन आप के साथ कोई हादसा हो गया, तो आप के मांबाप पर क्या गुजरेगी… क्या हाल होगा उन का…’’

राहिल के मुंह से यह बात सुन कर सिराज यह सोचने पर मजबूर हो गया कि वाकई उस के अम्मीअब्बा उस से कितना प्यार करते हैं. अगर उसे कुछ हो गया तो वे तो जीतेजी मर जाएंगे.

सिराज ने राहिल से कहा, ‘‘मुझे माफ करना. मैं ने तो कभी यह सोचा ही नहीं था कि मेरी जिंदगी पर मेरे मांबाप का भी हक है. वे मुझे लगी एक मामूली सी खरोंच से परेशान हो उठते हैं. वैसे, आप हैं कौन और यहां कहां रहती हैं?’’

राहिल ने बताया, ‘‘मैं युसूफ पटवारी की बेटी राहिल हूं, जो अभी कुछ महीने पहले ही यहां आ कर बसे हैं.’’

जैसे ही राहिल ने अपना नकाब हटाया, तो सिराज उस के खूबसूरत चेहरे को बस देखता ही रहा. राहिल उसे एक प्यारी सी मुसकान दे कर अपने रास्ते पर चली गई.

सिराज पहले तो उसे ठगा सा देखता रहा, पर फिर थोड़ी देर बाद उस ने बाइक स्टार्ट की और राहिल से बात करने के इरादे से उस के पीछे गया, पर तब तक वह कहीं गायब हो चुकी थी.

सिराज एक हैंडसम और हट्टाकट्टा लड़का था. आज वह राहिल को देख कर उस का दीवाना हो गया था.

उस रात सिराज की आंखों से नींद कोसों दूर थी. उस की आंखों के सामने बस राहिल ही घूम रही थी.

राहिल का सिराज को डांटना उस के दिल पर एक गहरी छाप छोड़ गया था, जबकि आज तक गांव में न जाने कितनी लड़कियां सिराज को पाने के लिए बेताब रहती थीं, पर उस ने आज तक किसी को भाव नहीं दिया था.

अगले दिन सिराज राहिल की एक झलक पाने और उस से अपने दिल की बात कहने के लिए उसी रास्ते पर जा

कर खड़ा हो गया, जहां वह कल उसे मिली थी. काफी इंतजार करने के बाद राहिल अपनेआप को नकाब में ढक कर उस रास्ते से गुजरती हुई नजर आई, तो सिराज भी उस के पीछेपीछे चल दिया.

राहिल सिराज को अपने पीछे आते देख एक सुनसान जगह पर रुकते हुए बोली, ‘‘जनाब, आप मेरा पीछा क्यों कर रहे हैं?’’

सिराज झिझकते हुए बोला, ‘‘आप बहुत खूबसूरत हो. मैं आप से प्यार

करता हूं.’’

राहिल बोली, ‘‘पर, मैं तो आप से प्यार नहीं करती.’’

सिराज ने कहा, ‘‘मैं आप के बिना नहीं रह सकता.’’

राहिल ने जवाब दिया, ‘‘आज तक तो मेरे बिना ही रह रहे थे.’’

सिराज बोला, ‘‘तब मैं ने आप को देखा नहीं था और न ही कभी किसी ने मुझे इस कदर तेज गाड़ी चलाने पर डांट कर समझाया था, जिस में एक मां की ममता भी थी और एक जीवनसाथी की परवाह भी.’’

राहिल ने कहा, ‘‘वह तो मैं ने आप को किसी बड़े हादसे का शिकार होने से बचाने के लिए बोला था.’’

सिराज बोला, ‘‘बस, यही वजह है. उसी समय आप ने मेरे दिल को जीत लिया था और मैं आप का दीवाना बन गया था.’’

राहिल ने साफसाफ कहा, ‘‘पर, मैं आप से प्यार नहीं करती.’’

सिराज ने जिद में आ कर कहा, ‘‘अगर आप मुझ से प्यार नहीं करेंगी, तो मैं अपनी जान दे दूंगा.’’

राहिल ने कहा, ‘‘ऐसी बातें नहीं करते. मुझे थोड़ा समय दो. मैं एकदम से कैसे हां कर सकती हूं…’’

सिराज बोला, ‘‘ठीक है, कल इसी समय या तो तुम मेरे प्यार को कबूल कर लेना, वरना तुम्हारे सामने ही मैं अपनी जान दे दूंगा.’’

राहिल भी मन ही मन सिराज को चाहने लगी थी, पर उस ने यह कभी नहीं सोचा था कि सिराज उसे इस कदर प्यार करने लगा है कि उस के न मिलने पर वह अपनी जान देने पर भी उतारू हो जाएगा.

अगले दिन सिराज समय से पहले ही राहिल के आने के इंतजार में वहीं खड़ा हो गया. उस का एकएक पल कई घंटे की तरह बीत रहा था. वह कभी अपनी घड़ी देखता, तो कभी राहिल के आने की झलक बेताबी से देखता. आज उसे ऐसा लग रहा था, मानो समय कहीं थम गया हो, जैसे घड़ी अपनी जगह पर रुक गई हो.

तभी कुछ देर बाद राहिल आती हुई नजर आई, तो सिराज की जान में जान आ गई, पर अभी भी वह इसी उधेड़बुन में लगा था कि वह उसे हां में जवाब देगी या न में.

राहिल जब सिराज के पास से हो कर गुजरी, तो उस ने अपना नकाब हटाते हुए सिराज को एक मुसकान भरी नजर से देखा और सीधी आगे चल दी.

राहिल का ग्रीन सिगनल पाते ही सिराज खुशी से झूम उठा. वह भी राहिल के पीछेपीछे चल दिया और उस सुनसान जगह पर जा कर दोनों ने एकदूसरे से अपने प्यार का इजहार करते हुए गले से लगा लिया.

अब दोनों को एकदूसरे का फोन नंबर मिल चुका था. दोनों घंटों एकदूसरे से प्यारमुहब्बत की बातें करते और एकदूसरे से शादी करने के सपने संजोते.

दोनों अपनी जिंदगी में खुश थे कि उन के प्यार की कहानी पूरे गांव में फैलने लगी, तो राहिल के अब्बा को भी इस बात का पता चल गया. उन्होंने गुस्से में आ कर राहिल को घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी.

उधर जब सिराज को राहिल कहीं आतेजाते न मिली, तो वह पागलों की तरह उसे ढूंढ़ने लगा और जल्द ही राहिल के घर पहुंच गया.

सिराज ने राहिल के अब्बा को अपने और राहिल के प्यार के बारे में बताया, तो उन्हें गुस्सा आ गया और वे बोले, ‘‘तेरी हिम्मत कैसे हुई कि तू मेरी बेटी से मिलने मेरे ही घर तक आ गया…’’

सिराज ने कहा, ‘‘मैं राहिल से निकाह करना चाहता हूं. हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं.’’

यह सुनते ही राहिल भी अपने अब्बा के सामने आ गई और बोली, ‘‘अब्बा, मैं भी सिराज के बिना नहीं रह सकती और मैं इस से बहुत प्यार करती हूं.’’

राहिल के अब्बा समझ चुके थे कि बेटी पर जोरजबरदस्ती करने से कोई फायदा नहीं है.

राहिल के अब्बा सिराज से बोले, ‘‘बेटा, मुझे तुम दोनों के प्यार से कोई गिलाशिकवा नहीं है. तुम अपने अम्मीअब्बा को यहां भेज दो. अगर वे तुम्हारे लिए राहिल का रिश्ता मांगेंगे, तो मैं तैयार हूं.’’

यह सुनते ही सिराज खुशी से झूम उठा और उन से विदा ले कर अपने घर चला गया.

सिराज ने घर आ कर अम्मीअब्बा से अपने प्यार के बारे में बताया और कहा, ‘‘मैं राहिल से शादी करना चाहता हूं. आप मेरे लिए राहिल का हाथ मांगने उन के घर जाएं.’’

सिराज की बात सुन कर पहले

तो उस के अब्बा ने नानुकर की, पर सिराज की जिद और उस की अम्मी के जोर देने पर उन्हें अपने एकलौते बेटे

की बात माननी पड़ी और वे सिराज के लिए राहिल का हाथ मांगने उस के घर चले गए.

राहिल और सिराज के अब्बा दोनों अपने बच्चों की मुहब्बत के आगे झुक गए और राहिल के अब्बा ने सिराज से शादी करने के लिए एक साल का समय इस शर्त पर मांगा कि राहिल की तब तक पढ़ाई पूरी हो जाएगी और उसे बीच में पढ़ाई छोड़ कर शादी के बंधन में नहीं बंधना पड़ेगा.

सिराज के अब्बा इस बात के लिए भी राजी हो गए और दोनों की शादी की बात पक्की हो गई.

सिराज और राहिल का रिश्ता तय होने के बाद अब वे दोनों खूब घूमते और आपस में बातचीत कर के अपनी शादी के सपने संजोते.

शाम का समय था. सिराज राहिल को घुमाने अपने खेत पर ले गया, जहां उन की फसल लहलहा रही थी. जून का महीना था. आम के पेड़ पर कच्चे आम लगे थे, जिन्हें सिराज ने तोड़ कर राहिल को दिए राहिल खट्टे आम बड़े मजे से खा रही थी. दोनों खेतखलिहान की हवा का मजा ले रहे थे, तभी तेज आंधी आई और बारिश शुरू हो गई.

बारिश से बचने के लिए राहिल और सिराज खेत में बनी कोठरी के अंदर चले गए, जिस में काफी अंधेरा था. राहिल अंधेरा देख कर घबराने लगी कि तभी बिजली की गड़गड़ाहट से वह घबरा कर सिराज से चिपक गई.

राहिल की छुअन पाते ही सिराज के बदन में भी बिजली दौड़ने लगी. उस ने आज तक किसी लड़की के बदन को छुआ तक नहीं था. दोनों ऐसे चिपक गए, जैसे किसी पेड़ से कोई अमरबेल.

सिराज राहिल के उभरे हुए सीने को अपने सीने पर महसूस कर रहा था. उस के बदन में गरमी आने लगी. उस ने अपने गरम होंठ राहिल के कंपकंपाते होंठों पर रख दिए.

राहिल सिराज के होंठों की छुअन पाते ही सिहर उठी कि तभी सिराज राहिल के होंठों को चूमने लगा. फिर उस ने राहिल को जमीन पर लिटा दिया और उस की गरदन पर चुंबनों की बौछार

कर दी.

सिराज की इस हरकत से राहिल कामुक हो उठी. उस ने सिराज को

अपने ऊपर खींचते हुए अपनी बांहों में भर लिया.

सिराज ने मोके की नजाकत को समझते हुए बिना समय गंवाए राहिल के कपड़े उतारने शुरू कर दिए और उस पर हावी हो गया. फिर उन दोनों ने एकदूसरे के बदन की गरमी को शांत कर दिया.

राहिल और सिराज आज दोनों खुश थे. उन्होंने एकदूसरे के बदन से पहली बार एक ऐसा सुख भोगा था, जिस से वे अनजान थे.

बारिश रुक चुकी थी. उन दोनों ने जल्दीजल्दी कपड़े पहने और अपनेअपने अपने घर आ गए.

इस घटना को अभी एक हफ्ता भी नहीं गुजरा था कि एक दिन राहिल को एक दुखभरी घटना सुनने को मिली.

हुआ यों था कि एक दिन सिराज राहिल से मिलने की खुशी में तेज रफ्तार से बाइक चला कर उस के घर आ रहा था कि तभी एक मोड़ पर सामने से अचानक ट्रक आ गया. टक्कर इतनी तेज थी कि सिराज ने वहीं दम तोड़ दिया.

राहिल अभी सिराज के जाने का गम भुला भी नहीं सकी थी कि उसे एक दिन तेज चक्कर आया और वह वहीं गिर पड़ी. घर वालों ने जब उसे डाक्टर को दिखाया तो पता चला कि वह एक महीने के पेट से है.

यह सुन कर राहिल के घर वाले दंग रह गए. उन्होंने इस बदनामी से बचने

के लिए राहिल को बच्चा गिराने की सलाह दी.

राहिल को जब अपने पेट से होने का पता चला और उस के घर वालों ने उसे बच्चा गिराने के लिए कहा, तो राहिल ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया.

राहिल की अम्मी ने उसे बहुत समझाया, ‘‘क्या तुम कुंआरी मां बन कर हमारी इज्जत उछालना चाहती हो? कुछ तो शर्म करो…’’

राहिल बोली, ‘‘मैं ने सिराज से सच्ची मुहब्बत की है. मैं अपने प्यार की निशानी को नहीं खो सकती. दुनिया क्या कहती है, मुझे परवाह नहीं. मैं अपने प्यार की निशानी को इस दुनिया में जरूर लाऊंगी.’’

आखिरकार वह समय भी आ गया, जब राहिल ने अपने प्यार की निशानी सिराज के बेटे को जन्म दिया, जिस से उसे बड़ी खुशी मिली और वह एक कुंआरी मां बन गई.

राहिल ने दुनिया की परवाह न करते हुए अपने प्यार की निशानी को दुनिया

में लाने के लिए कई ताने सहे, कई

लोगों ने उस की बुराई की, उस के मांबाप को भी काफी रुसवाई का सामना करना पड़ा, पर राहिल ने सिराज की इस आखिरी निशानी को दुनिया में लाने के लिए कुंआरी मां बनना पसंद किया. वह जिंदगीभर बिनब्याही मां रही.

एक सवाल : सुमित्रा की कामकाजी जिंदगी

अभी तक मामा अस्पताल से नहीं लौटे थे. मामी बड़ी बेचैनी से बारबार हर आनेजाने वाली गाड़ी के रुकने की आवाज सुन कर दरवाजे की ओर भागतीं और निराश हो कर फिर लौट आतीं.

दीपक ने मामी से कहा, ‘‘मामी, कब तक इंतजार कीजिएगा, पकौड़े बिलकुल ठंडे हो जाएंगे. अब आप भी खाना खा लीजिए. कोई मरीज आ गया होगा.’’

‘‘नहीं, इतनी देर तो वे कभी नहीं लगाते. आज तो कोई बड़ा आपरेशन भी नहीं करना था. पता नहीं, क्यों…’’ इतना कह कर मामी बिस्तर पर लेट कर एक पत्रिका पलटने लगीं.

उधर, सुमित्रा ड्राइंगरूम से मामी के चेहरे को एकटक निहार रही थी. मामी के चेहरे पर डर, चिंता और शक के मिलेजुले भाव उभरे थे. अकसर ऐसी हालत में यह सब देख कर सुमित्रा के चेहरे का रंग उड़ जाता था. शायद मामी की चिंता उस की भी चिंता थी. मामी को खुश देख कर वह भी खुश होती थी.

सुमित्रा ने अपने कामकाज से मामी का मन मोह लिया था. वह मामी को तो एक भी काम नहीं करने देती थी. खुद झपट कर उन का काम करने लग जाती थी. तब मामी दुलार से उसे ऐसे देखतीं, जैसे कह रही हों, ‘तुम मेरी कोख से क्यों नहीं जनमी?’

इतने में मामाजी आ गए. उन के हाथों में ढेर सारी मालाओं को देख कर मामी अचरज से भर उठीं. मामी कुछ पूछें, इस से पहले मालाओं का ढेर टेबल पर रखते हुए मामा ने बताया कि वे अंबेडकर जयंती में गए थे.

सुमित्रा फूलों को बड़े प्रेम से निहार रही थी. उस के पल्ले मामा की बात नहीं पड़ी.

‘‘वह क्या बाई?’’ उस ने पूछा.

‘‘अरे, छोटी जाति वालों ने साहब को बुलाया था. उन्हीं ने इन को माला पहनाई है. वे सब साहब को बहुत मानते हैं. ऊंचनीच, छोटी जाति, बड़ी जाति में हम लोग भेद नहीं करते. समझी?’’ मामी ने चहक कर कहा.

‘‘सच बाई?’’ सुमित्रा के पूछने में अचरज, शक और भरोसा, तीनों का मिलान था.

‘‘हांहां, एकदम सच,’’ मामी ने कहा.

उसी दिन शाम को कुछ लोगों का जुलूस जा रहा था. दूर से कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वे कौन लोग हैं और क्या चिल्ला रहे हैं. मामी को जब कुछ समझ में नहीं आया, तो जुलूस में जा रहे एक लड़के को बुला कर उन्होंने पूछा.

वह ‘जलगार जना, जलगार जना,’ कह कर चला गया. मामी ‘जलगार जना’ का मतलब नहीं समझ पाईं. उन्होंने सुमित्रा से पूछा.

तब पलभर के लिए सुमित्रा सकपका गई. मामी को ताकते हुए दोनों हाथ उस ने इनकार में नचा दिए. शायद मामी की पेशानी पर चिड़चिड़ाहट भरी सिलवटें उभरी देख कर वह सहम गई थी या ‘जलगार जना’ शब्द की पहचान तक से अपने को अलग रखना चाहती थी.

दरअसल, सुमित्रा काम बड़ा अच्छा करती थी. अकसर उस के काम की बड़ाई मामी बड़े साफ दिल से अपनी सखीसहेलियों के बीच करती रहती थीं. इस का नतीजा यह हुआ कि उस से फायदा उठाने के लिए मामी की एक सहेली सीता ने उसे चुपके से फोड़ लेना चाहा.

एक दिन जब मामी के घर से काम निबटा कर सुमित्रा अपने घर जा रही थी, तभी रास्ते में खड़ी सीता उसे अपने घर ले गई. कुछ लगाईबुझाई की और अगले महीने से ज्यादा तनख्वाह पर काम करने के लिए राजी कर लिया जैसा कि अकसर लोग नौकरानी रखने से पहले करते हैं.

सीता एक दिन चुपके से सुमित्रा के पीछेपीछे गई. उसे शक था कि कहीं पूछने पर गलत घर न दिखा दे. गली तक उस के पीछे पैदल चलने के बाद उस ने एक घर में उसे घुसते देखा. वह उसी समय तेज चल कर उस के सामने पहुंची और पूछ बैठी, ‘‘तुम यहां रहती हो?’’

‘हां,’ में जवाब सुन कर सीता वहां से जल्दी हट गई, जैसे अंधे कुएं में गिरतेगिरते बची हो. उस के मन में एक खलबली सी थी, जिसे कहने के लिए वह बेचैन थी.

सीता दूसरे ही दिन मामी के पास आई और बोली, ‘‘देखिए, बुरा मत मानिएगा. आप की नौकरानी एक दिन मेरे घर आई और कहने लगी कि भूखी हूं. उस वक्त तो घर में कुछ था नहीं, इसलिए मैं ने होटल से मिठाई और डोसा मंगवा कर खिला दिया. पर वह तो खा भी नहीं रही थी. कह रही थी कि छोटे भाई के लिए घर ले जाऊंगी. फिर कहने लगी कि मेरा लहंगा फटा है. मुझे तरस आ गया और अपनी एक मैक्सी दे दी.’’

इतना सुनना था कि मामी गुस्से में उबलने लगीं. उन का तमतमाता चेहरा देख कर सीता असली बात तेजी से कह गई, ‘‘अरे, वह एससी कास्ट वाले सफाई का काम करते हैं.

मैं तो उस का घर चुपके से देख आई हूं. फिर, मैं ने चौकीदार को भी भेज कर पता लगवाया. वह भी यही कह रहा था.’’

ये बातें सुनने के बाद भी मामी के चेहरे पर कोई तीखे भाव नहीं दिखे, तो सीता सपाट शब्दों में कहने लगी, ‘‘मैं तो इन लोगों से काम नहीं करा सकती, क्योंकि ये लोग बहुत गंदे होते हैं.’’

तब भी मामी को गुस्सा उस के एससी होने पर नहीं के बराबर और अपनी सहेली पर ज्यादा हो रहा था. वे तो सोच रही थीं, ‘कैसी सहेली है? भला सुमित्रा क्या जाने इस का घर? आज तक उन से तो उस ने कभी मजाक में भी ‘भूख लगी है’ नहीं कहा. इस के घर जा कर क्यों कहेगी? जरूर उस ने काम करने से इनकार कर दिया होगा, तभी यह लगाईबुझाई कर रही है.’

मामी को सहीगलत तो सूझ नहीं रहा था. अलबत्ता, सहेली के सामने वे अपने को बड़ा शर्मिंदा महसूस कर रही थीं. ठीक उसी तरह जब छोटा बच्चा पड़ोस में जा कर ‘भूख लगी है, कुछ खाने को दो,’ कह कर मां को शर्मिंदा करता है.

इस झेंप को ढकने के लिए मामी अपनी सहेली से पूछने लगीं, ‘‘एससी होने का क्या सुबूत है तुम्हारे पास?’’

सीता तपाक से बोली, ‘‘अरे, क्या इस की दादी को नहीं देखा? रोज सिर पर एक टोकरी रख कर निकलती है. रास्तेभर कागज बटोरती, प्लास्टिक का टूटाफूटा सामान कूड़े से ढूंढ़ती इसी रास्ते से जाती है. ये जितनी औरतें सिर पर टोकरी रख कर निकलती हैं, सब छोटी जात हैं.’’

‘‘उसी वक्त एक औरत सिर पर टोकरी रखे सामने से आती दिखाई पड़ी. मामी ने सीता से पूछा, ‘‘क्या यह औरत भी?’’

‘‘हांहां, यह भी. अभी देखिएगा,’’ सीता ने कहा.

तभी वह औरत सड़क के उस पार वाले घर में घुस गई और टोकरी नीचे रख कर घर की मालकिन को बुलाने लगी. पता लगा कि वह तो सब्जी बेचने वाली थी. तब सीता ने कई और दलीलें दीं, पर मामी ने तो यह मान लिया था कि सीता झूठी है.

सुमित्रा को अचानक हटा देने का डर भी मामी के मन में कहीं न कहीं था. एक तो जल्दी नौकरानी मिलती नहीं, दूसरे एससी मान कर हटाना भी तो गलत होगा.

अब सीता की एकएक बात मामी की समझ में आने लगी. अपनी सहेली द्वारा लगाए गए जाति के लांछन की सचाई भी उन्होंने देख ही ली थी. वे मुसकरा रही थीं कि सीता कैसे अपनी ही बात से झूठी साबित हो गई.

दूसरे दिन मामी ने सुमित्रा को डांटा, ‘‘मुझे क्यों नहीं बताया कि सीता ने तुझे मैक्सी दी है?’’

तब सीधीसादी सुमित्रा ने जोकुछ बताया, उस से सबकुछ साफ हो गया. उस ने बताया कि किस तरह सीता उसे घर ले गई. अहाते की सफाई कराई. पौधों की जड़ों में गोबर डलवाया और 3 घंटे की मजदूरी की एवज में उसे पैसे के बदले पुरानी मैक्सी दी और डोसा खिलाया. साथ में मामी को कुछ भी नहीं बताने की हिदायत भी दी.

यह सुन कर मामी चिढ़ कर सीता पर बुदबुदाने लगीं, ‘‘कौन कहता है उसे पागल? वह तो खुद दूसरों को पागल बना दे. वह तो दूसरों की हमदर्दी का नाजायज फायदा उठाती रहती है और इसी ओट में चालें भी चलती रहती है.’’

उस दिन के बाद सीता ने मामी के घर आना बंद कर दिया. मामी ने कई बार देखा कि वह पड़ोस के घरों में आतीजाती थी, पर मामी को इस बात का बिलकुल भी दुख या मलाल नहीं था कि वह उन के घर नहीं आती. उन्हें उस का दूर रहना ही अच्छा लग रहा था.

एक बार सड़क पर दीपक से सीता मिली थी. दीपक के पूछने पर सीता ने कहा था, ‘‘मैं तो तुम्हारी मामी के घर पानी भी नहीं पी सकती.’’

यह बात दीपक ने मामी से नहीं कही थी, क्योंकि उस से मामी के घाव फिर हरे होते. दीपक ऐसा नहीं चाहता था.

उस दिन सुमित्रा बड़ी लगन से मामी के पैर दबा रही थी और वह बड़े दुलार से उस की ओर देख रही थीं. उसे कुछ खोया देख मामी ने पूछा, ‘‘क्या बात है सुमित्रा?’’

वह हंस कर बोली, ‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ बात तो जरूर है. बड़ा सन्नाटा छाया है. बता, क्या बात है?’’

भोलीभाली सुमित्रा दुखभरी आवाज में कहने लगी, ‘‘बाई, उस जमाने में मेरी दादी को बड़े दुख उठाने पड़े थे.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘अब भी मेरी दादी बड़ी जाति वालों से डरती हैं.’’

‘‘यह बड़ी जाति और छोटी जाति क्या होती है?’’ मामी ने डपटा.

सुमित्रा बड़ी सावधान थी. साफसाफ न बता कर इशारों में बता रही थी, जैसे दूध का जला छाछ भी फूंकफूंक कर पीता है. वह बोली, ‘‘गांव में मेरी दादी को एक बार पुलिस वालों ने खूब मारा था.’’

फिर वह थोड़ा ठहर कर बोली, ‘‘शहर में डर नहीं है बाई.’’

मामी समझ नहीं पा रही थीं कि आखिर सुमित्रा कहना क्या चाह रही थी.

मामी को हैरानी में पड़ा देख सुमित्रा बोली, ‘‘गांव में तो दादी की परछाईं से भी लोग दूर भागते थे. यहां तो हम लोग मंदिर भी जाते हैं, कोई नहीं रोकता.’’

मामी ने पूछा, ‘‘तुम्हारी दादी गांव में करती क्या थीं?’’

‘‘सूअर चराती थीं,’’ जल्दी में या असावधानी में सुमित्रा के मुंह से सच निकल गया. फिर सफाई देते हुए वह बोली, ‘‘अब नहीं चराती हैं.’’

मामी तो मानो आसमान से धरती पर गिरी हों. वह अपने पैर उस के हाथों से धीरे से छुड़ा कर बैठ गईं. सीता की जानकारी में थोड़ा सा भी झूठ उन्हें दिखलाई नहीं पड़ रहा था. उन की आंखों के सामने वह सीन भी घूम गया, जब उन्होंने ‘जलगार जना’ का मतलब सुमित्रा से पूछा था, तब उस का चेहरा फक्क पड़ गया था. उन्होंने भी इधर जवान लड़कियों और औरतों को सड़क से कचरा बीनते देखा था, लेकिन उन में से किसी ने कभी आपस में बातचीत नहीं की थी. उन्हें इतमीनान होता चला गया था कि ये एससी होतीं, तो आपस में बोलतीं जरूर, पर नहीं.

आज मामी को याद आ रहा था उन लड़कियों को देख कर सुमित्रा या तो ठिठक कर कठोर चेहरा बना लेती थी या दूसरी तरफ मुंह मोड़ लेती थी. ऐसा वह क्यों करती थी, यह पहेली मामी सुलझा नहीं पा रही थीं.

मामी को यह भी याद आ रहा था कि अंबेडकर जयंती के दूसरे दिन सुमित्रा अपने देर से आने की सफाई देते हुए बोली थी, ‘‘बाई, कल हमारे दादीबाबा 20 कोस गए थे.’’

‘‘भला क्यों?’’

‘‘50-50 रुपए और एक जून का खाना

मिला था,’’ फिर थोड़ा रुक कर वह बोली थी,

‘‘मैं भी जाती तो 50 रुपए पाती, पर आप के डर से नहीं गई.’’

‘‘किसलिए रुपए मिले थे?’’

‘‘पता नहीं,’’ दोनों हाथ बड़ी सरलता व ईमानदारी से चमका कर सुमित्रा ने कहा था. तब मामी आदतन झुंझला गई थीं. आज दीपक को लग रहा है कि जहां दो जून की रोटी के लाले पड़े हों, पीने के लिए पानी न हो, वहां बौराई आबादी यही

तो करती है. उन का सारा समय तो जुगाड़ में बीत जाता है. ऊपर से उन का ठग मुखिया साल में एक बार 50 रुपए व एक वक्त के भोजन के बल पर चुनाव के आसपास नेताओं की सभा की शोभा बढ़ाता है, वोट दिलाता है.

एकाएक मामी को सुमित्रा में अनेक कमियां नजर आने लगी थीं. चूंकि महीना पूरा होने में एक हफ्ता बाकी था, इसलिए मामी ने उसे अचानक हटाने का पाप अपने सिर पर नहीं लिया. महीना पूरा होते ही उन्होंने उसे आगे से काम पर न आने को कह दिया.

उस वक्त यह बात देखने को मिली कि सुमित्रा के निकालते ही पड़ोसी बड़े खुश हो गए थे. बहुत लोग तो मामी को बधाई देने लगे थे मानो मामी ने सच में बड़ी होशियारी का काम किया.

कुछ ही दिनों बाद मामी अंदर ही अंदर अपने से लड़ती हुई बीमार पड़ गईं. एक हफ्ते बुखार में तपती रहीं.

दीपक को पता था कि मामी के मन में कुछ टीस रहा है. पर वे कह नहीं पा रही थीं मानो वे खुद से जूझते हुए पूछ रही थीं, ‘छुआछूत की प्रथा गई कहां है? बस, गंदगी के ऊपर कालीन बिछा दिया गया है. इतनी जवान, गरीब छोकरियां सड़क पर घूमा करती हैं. कोई उन्हें काम पर नहीं रखता. मैं ही कौन भली हूं? भूल से रख लिया, तो सचाई जानते ही निकाल दिया.’

यह सब देखने के बाद दीपक के दिमाग में एक महापुरुष के शब्द घूमने लगे, ‘यदि अछूतों को अछूत इसलिए माना जाता है कि वे जानवरों को मारते हैं, मांस, रक्त, हड्डियां और मैला छूते हैं, तब तो हर नर्स और डाक्टर को भी अछूत माना जाना चाहिए, जो खाने या बलि देने के लिए जानवरों की हत्या करते हैं.’

ये शब्द बारबार घंटे की तरह दीपक के दिमाग में बज रहे थे. तब वह मामी से यह पूछने के लिए बेचैन हो उठा, ‘तो क्या हम सब और मामा अछूत नहीं हुए?’

उधर सुमित्रा यह जान चुकी थी कि ऊंची जाति वाले आसानी से नहीं बदलने वाले. वे उन लोगों को बारबार एहसास दिलाएंगे कि तुम्हारा जन्म नीच कुल में हुआ है, नीचे रहोगे. वक्तजरूरत पर जरूर काम के लिए बुला लेंगे. कुरसी पर बैठा भी देंगे, पर उतरते ही उसे छींटे मार कर धोने से बाज नहीं आएंगे.

दीपक की मामी भी उस मकड़जाल से नहीं निकल पाईं, जो समाज ने उन के चारों ओर बुन रखा था. उन्हें सुमित्रा की जाति से न कोई शिकायत थी, न अलगाव पर पड़ोसियोंरिश्तेदारों का वे क्या करें. सुमित्रा ने उन्हें कब का माफ कर दिया, पर मामी खुद को सालों तक माफ नहीं कर पाईं.

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