Hindi Story: सही फैसला

मिन्नी कम उम्र की एक शहीद की विधवा थी और बच्ची की मां भी. इधर मेहुल भी पत्नी की मौत के बाद अपने बच्चों को अकेले पाल रहा था. फिर होली आई और गलती से मेहुल ने मिन्नी को रंग लगा दिया. आगे क्या हुआ? मिन्नी का पूरा नाम मीनाक्षी था. मेहुल जबजब दिव्या के घर जाता था, मिन्नी दिखाई पड़ जाती थी. उस को शुरूशुरू में मिन्नी को ले कर उत्सुकता थी, लेकिन दिव्या भाभी से मिन्नी की दुखी जिंदगी के बारे में जो कहानी सुनी थी, उस से उस को सारी बातें पता चली थीं. मिन्नी दिव्या के बड़े ताऊ की एकलौती बेटी थी. मांबाप बहुत पहले ही मर गए थे, लिहाजा उस का लालनपालन दिव्या के घर में ही हुआ था. उस के पिता 2 भाई थे. बहुत सारी जमीन थी. घर में मनों अनाज होता था. रुपएपैसे की कोई कमी नहीं थी.
मांबाप के मरने के बाद मिन्नी की पढ़ाईलिखाई उस के चाचाजी ने एक पिता की तरह से ही की थी. उन्होंने मिन्नी को कभी किसी बात की कमी महसूस नहीं होने दी थी.

मिन्नी पढ़नेलिखने में भी होशियार थी. हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती थी. बचपन बीतने के बाद और पढ़ाईलिखाई करने के बाद चाचाजी ने उस की शादी कर दी. शादी के तुरंत बाद ही मिन्नी के पति की मौत हो गई थी. सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए सचिन शहीद हो गया था. पति की मौत के बाद मिन्नी गांव के स्कूल में पढ़ाने लगी थी. वह अपने पैरों पर खड़ी औरत थी. आज के समय की औरत. चुनौतियों से लोहा लेने वाली. पढ़ीलिखी स्वाभिमानी औरत. जबजब मेहुल की नजर मिन्नी पर पड़ती तो वह बस देखता ही रह जाता. मेहुल पास में ही रहता था और दिव्या के घर में उस का आनाजाना था. मिन्नी का गोरा चेहरा, पतली लंबी नाक, भरा हुआ बदन. कोई चाहता भी तो मिन्नी को देख कर नजरअंदाज नहीं कर सकता था, फिर तो मेहुल आदमी था. वह 77 साल का था. उस की पत्नी हेमा जिस की उम्र जब महज 25 साल थी. दूसरे बच्चे को जन्म देते समय चल बसी थी. इस का दुख मेहुल को हमेशा दिल में सालता रहता था.

लेकिन? इधर मिन्नी के में जैसी आवाज ही नहीं थी. सचिन की मौत से उस को सदमा सा लगा था. वह हंसना जैसे भूल गई थी. गोद में एक बच्ची थी. उस का दुख और उस के भविष्य के बारे में सोचती तो दिल में जैसे नश्तर से चुभते थे. मिन्नी की शादी भी 24 साल की उम्र में हो गई थी. शादी के महज सालभर बाद ही सचिन की मौत हो गई थी. मिन्नी की कहानी वह दिव्या भाभी के मुंह से सुन चुका था. बेचारी मिन्नी ने इतनी कम उम्र में विधवा होने का दर्द ?ोला था. एक कली जो ठीक से फूल भी नहीं बन सकी थी, मुर?ाई हुई सी रहने लगी थी. ऐसा जबतब बतियाते हुए दिव्या भाभी की रुलाई फूट पड़ती थी. इस बार दिव्या के पति संतोष उसे लिवाने नहीं आए थे. दुकान के काम से सूरत चले गए थे. होली सिर पर थी. मेहुल का अब इस दुनिया में 2 बच्चों के सिवा कोई नहीं था. घर पर दोनों भाभियों और मां के भरोसे उस ने बच्चों को छोड़ रखा था और दिव्या भाभी को लिवाने बनारस चला आया था.

दिव्या भाभी बतातीं कि दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है. जब मिन्नी के पति की मौत हो गई तो ससुराल वालों ने मिन्नी को बहुत बुराभला कहा. यहां तक कि मनहूस तक कह दिया. उस को घर से निकाल दिया. दिव्या भाभी के मांबाप  और भाई सब लोग समझते रहे. इस में मिन्नी की क्या गलती है भला. लेकिन वे मिन्नी को घर से निकाल कर ही माने. मायके में चाचा चाची और भाई तो हालांकि कुछ कहते, लेकिन भाभियों को वह फूटी आंख नहीं सुहाती थी. यही वजह थी कि मिन्नी घर में सब से किनारे के कमरे में रहती थी. वह मुफ्त में खाना नहीं खाती थी, बदले में घर बरतन कर देती थी, कपड़े धो देती थी, ताकि उस को कोई मुफ्तखोर कहे. लेकिन इतना करने के बाद भी कोई किसी का मुंह थोड़े ही पकड़ सकता है. जिस के जो मन में आता, वही कह देता. मेहुल यह सब सुन कर दुखी हो जाता था. अगले दिन होली थी. मेहुल मन बना कर आया था कि वह इस बार दिव्या के साथ जम कर होली खेलेगा. बैठक में पकवान बन रहे थे. मेहुल बाहर गया तो चौपाल पर महफिल सजी थी. मेहुल भी बैठ गया. खूब भांग पी.

दोपहर हो गई. मेहुल को भूख लग गई थी. वह वापस घर गया तो देखा कि दिव्या अपनी भाभियों के साथ होली खेल रही थीइसी बीच मेहुल ने दिव्या से कहा, ‘‘भाभी कुछ नमकीन ले कर आओ.’’ दिव्या ने नहीं सुना, लेकिन मिन्नी बाहर ही बैठी थी. वह प्लेट में नमकीन लाने चली गई. इधर मेहुल कमरे में जा कर हथेली पर रंग मलने लगा. सामने ही रंगों से भरा हुआ ड्रम रखा था, जिस में घोला हुआ रंग पड़ा था.
इसी बीच मिन्नी कमरे में नमकीन देने मेहुल के पास चली गई. मेहुल को लगा शायद भाभी नमकीन ले कर आई है. मेहुल ने हथेली पर मला हुआ रंग मिन्नी के गालों पर मल दिया. धोखा दिव्या और मिन्नी के कपड़ों से हुआ था. दोनों ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. तब तक दिव्या भी कमरे में गई थी. वह हंसते हुए बोली, ‘‘क्यों देवरजी, खा गए धोखा.’’ मेहुल बोला, ‘‘भाभी, आप दोनों ने एकजैसे कपड़े पहन रखे थे, इसलिए धोखा हो गया.’’

मिन्नी के चेहरे पर मिलेजुले भाव थे. एक तरफ खुश थी कि कई सालों के बाद किसी ने उस पर रंग डाला था और दुखी सामाजिक मर्यादा को ले कर थी कि भला समाज और लोग क्या कहेंगे. दिव्या ने छेड़ा, ‘‘अच्छा बच्चू, भाभी को छोड़ कर भाभी की बहन से होली खेली जा रही है.’’ ‘‘अभी आप की शिकायत दूर किए देता हूंरुकिए,’’ और हाथ में बचा हुआ गुलाल उस ने दिव्या के गालों पर मल दिया. मिन्नी ने भी ड्रम में पड़ा हुआ रंग मेहुल पर पिचकारी से दे मारा. इस तरह भाभी और मिन्नी के साथ वह बहुत देर तक रंग और गुलाल से होली खेलता रहा. शाम के समय लोग अबीर खेल रहे थे. बैठक में सब लोग बैठे हुए थे. मिन्नी ठंडाई ले कर आई. अचानक मेहुल के मुंह से निकला, ‘‘दिव्या भाभी, मैं एक बात कहना चाहता हूं. हेमा के मरने के बाद से मेरी जिंदगी तहसनहस हो गई है. मैं बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं कर पा रहा हूं. घरबाहर दोनों जगह आखिर मैं कैसे संभालूंगा

जब तक मां हैं, चल रहा हैउस के बाद सोचता हूं, तो कलेजा मुंह को आने लगता है. मैं चाहता हूं कि मिन्नी से शादी कर लूं.’’ दिव्या के पिताजी को हैरानी हुई. वे बोले, ‘‘बेटा, मिन्नी हमारी बेटी है. लेकिन तुम्हें मैं अंधेरे में नहीं रखना चाहता. बेटा, मिन्नी विधवा है. उस को एक बेटी है, फिर भी तुम उस से शादी करना चाहते हो…’’ दिव्या बोली, ‘‘पिताजी, कई बार मेरे मन में भी यह खयालआया था, लेकिन देवरजी से कहते डरती थी. पता नहीं वे क्या सोचेंगे. लेकिन आज मैं ने होली खेलते हुए देख लिया कि मेहुल का मन कितना पवित्र है. ‘‘दरअसल, मैं ने और मिन्नी ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. मेहुलजी को धोखा हो गया.  मिन्नी पर रंग डाल दिया था. तब से अपनी गलती का पछतावा करना चाह रहे हैं. ऐसा भला आदमी कहां मिलेगा. इन की भलमनसाहत है कि  मिन्नी से माफी मांगने लगे थे.
‘‘जब से यह घटना हुई है, ये आंख नहीं मिला पा रहे हैं.  खैर इन का रिश्ता बनता है, लेकिन अब ये मिन्नी से शादी करना चाहते हैं.’’

मेहुल बोला, ‘‘हां पिताजी, मिन्नी विधवा हो गई तो इस में भला उस की क्या गलती है. लोगों को उस को भला ताने देना का हक किस ने दे दिया है. यह तो गर्व की बात है कि वह एक शहीद की विधवा है, जिस ने देश के लिए अपनी जान की कुरबानी दी है, लेकिन लोग शहीद की विधवा से कैसा बरताव कर रहे हैं, देख लीजिए. ‘‘क्या किसी विधवा को समाज में जीने का हक नहीं है? क्या किसी विधवा को खुश रहने का हक नहीं है? अगर नहीं है तो मैं परवाह नहीं करता ऐसे समाज की, जिस की जड़ें खोखली हों. ‘‘इस के अलावा 3-3 बच्चों की जिम्मेदारियों के बारे में भी सोचिए. उन की परवरिश करने का भी तो सवाल है. आखिर ये बच्चे कैसे पलेंगे, इस के बारे में भी सोचिए जरा. इन तीनों बच्चों की जिंदगी में खुशियां लौट आएंगी.’’

‘‘ठीक है बेटा, जब तुम ने और दिव्या ने फैसला कर ही लिया है, तो इस से बड़ी खुशी की बात भला और क्या होगी. होली के बाद किसी दिन लगन रखवाता हूं,’’ मिन्नी के पिताजी बोले. आज मिन्नी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे. वह बहुत खुश थी. आज से कोई उस को मनहूस नहीं कहेगा. उस का भी कोई चाहने वाला होगा. उस का भी अब कोई अपना घर होगा. मिन्नी की मांग भरने वाली थी. उस की वीरान जिंदगी में बहार आने वाली थी. एक शहीद पिता की बच्ची को एक नए पिता मिल गए थे. आज आसमान में इंद्रधनुष निकला था. सात रंगों का चमकीला इंद्रधनुष.                  

Filmi Story: परदे की दुनिया-अक्षय है पैसों के पीछे पागल

Filmi Story: फिल्महेरीफेरीमें अक्षय कुमार के किरदार राजू को तिकड़मबाज दिखाया गया था जो किसी भी तरीके से अमीर बनना चाहता है. अब इस फिल्म के डायरैक्टर प्रियदर्शन ने कहा है कि अक्षय कुमार असली जिंदगी में भी राजू जैसा शैतान है, जो पैसों के पीछे पागल है.
एक इंटरव्यू में अक्षय कुमार ने बताया कि पहले फिल्मों में एक्शन सीन करने का ही मौका मिला था, इतना शैतान और पैसों के पीछे पागल राजू के जैसा किरदार कभी नहीं मिला. यही कारण था कि मैं ने राजू को चुना. इस पर डायरैक्टर प्रियदर्शन ने कहा कि अक्षय कुमार असल जिंदगी में भीराजूजैसे ही शैतान हैं और पैसों के पीछे पागल हैं. याद रहे कि तकरीबन 25 साल लंबे गैप के बाद अक्षय कुमार और
डायरैक्टर प्रियदर्शन एकसाथ दर्शकों को हंसाने के लिएभूत बंगलाफिल्म ले कर रहे हैं.

मोनालिसा को धमकी
महाकुंभ में माला बेचने की रील से फेमस हुई नीली आंखों वाली मोनालिसा को अचानक से एक फिल्म मिली और वे लगातार सुर्खियों में बनी रहीं. फिलहाल वे अपनी शादी को ले कर चर्चा में हैं.
दरअसल, मोनालिसा ने कुछ दिन पहले ही फरमान खान के साथ भाग कर शादी की थी. अब दोनों ने कहा है कि उन्हें जान से मारने की धमकी मिल रही है और वे सिक्योरिटी चाहते हैं. दोनों ने सरकार से गुहार लगाई है. मोनालिसा और फरमान दोनों ने मदद की अपील करते हुए कहा, ‘मैं यह वीडियो एक लैटर के साथ सभी को मेल कर रही हूं तो प्लीज हमारी मदद करोहमें खुलेआम जान से मारने और काटने की धमकी दी जा रही है.’

नोरा फतेही के गाने पर बवाल
हिंदी फिल्मों में आइटम डांसर बन कर नोरा फतेही ने खूब नाम कमाया है, पर अब उन के एक गाने पर बवाल हो गया है, इतना ज्यादा कि उसे यूट्यूब से भी हटा दिया गया है. नोरा फतेही और संजय दत्त पर फिल्माया गया गानासरके चुनर तेरी सरकेफिल्मकेडी डेविलका है, पर इस गाने के बोल और डांस को ले कर लोगों ने कड़ा एतराज जताया. इस गाने के बोल को बेहूदा और डबल मीनिंग बताया. साथ ही, गाने की कोरियोग्राफी को भी भड़काऊ करार दिया.                      

Political Kahani: हम रह गए जीरो पड़ोसी बन रहा हीरो

Political Kahani:: मार्च में एकदम से मौसम का मिजाज बदल गया था. अनामिका ने सोचा कि विजय से मिल लेती हूं, पर जब वह उस के घर गई, तो विजय का मूड उखड़ा हुआ था.
‘‘मुंह क्यों लटकाया हुआ है?
सब ठीक है ?’’
अनामिका ने विजयसे पूछा.
‘‘सब मस्त. देख बिन मौसम की बारिश ने ठंडक बढ़ा दी है,’’ विजय बेमन से बोला.
‘‘हम्म, पर तुम्हारे चेहरे पर बारह क्यों बजे हैं?’’ अनामिका ने कहा.
‘‘चल , रणवीर सिंह की नई फिल्म देखने चलते हैं. सिनेमाघर पर फिल्म देखे बहुत दिन हो गए हैं. कौर्नर की सीट लेंगे,’’ विजय यह कह तो रहा था, पर उस का ध्यान कहीं और ही था.
‘‘विजय, सच बताओ कि क्या बात है? तुम्हें तो अभी कोई अवार्ड भी मिला है. तुम ने उस का भी नहीं बताया. मैं ने सोशल मीडिया पर तेरा फोटो देखा था अवार्ड लेते हुए,’’ अनामिका बोली.
‘‘फिल्म देखते हुए हम समोसे खाएंगे. बारिश के मौसम में समोसे खाने का अलग ही मजा है,’’
विजय ने कहा.

‘‘पता है, रसोई गैस कितनी महंगी हो गई है. 15 रुपए का समोसा अब 20 रुपए में मिल रहा है. सिनेमाघर में तो कम से कम 50 रुपए का होगा. और तू मु? अपने अवार्ड की बात क्यों नहीं बता रहा है?’’ अनामिका ने विजय का हाथ पकड़ कर पूछा.
‘‘अरे यार, क्या बताऊंमैं तो बड़ी मुसीबत में फंस गया. चौबे चले छब्बे बनने, दुबे बन कर लौट वाली कहावत  फिट बैठती है,’’ विजय ने धीरे से कहा.
‘‘ पूरी बात बताओ,’’ अनामिका ने विजय के बालों में हाथ फेरते हुए कहा.
‘‘तुम तो जानती हो कि पड़ोस में जो जसवंत अंकल हैं, वे लोकल गुरुद्वारा के मैंबर हैं. इस बार उन्होंनेयुवा शक्ति अवार्डके लिए चुना था. मतलब उन की गुरुद्वारा कमेटी ने. पिछले
रविवार को वहां हुए एक कार्यक्रम में उन लोगों ने मेरा सम्मान किया था. मु? एक शील्ड, सर्टिफिकेट और शौल भी दिया था.’’
‘‘हां, मैं ने तुम्हारे सोशल मीडिया हैंडल पर उस कार्यक्रम से जुड़े फोटो और वीडियो देखें थे. पर यह तो खुशी की बात है. मुंह किस बात पर फूला हुआ है, यह बताओ?’’ अनामिका बोली.
‘‘इस अवार्ड के चक्कर में मैं अब घनचक्कर बन गया हूं. हुआ यों कि मंगलवार को हमारे पड़ोस में रहने वाले अग्रवाल अंकल और मिस्टर जोसेफ का जसवंत अंकल के साथ ?ागड़ा हो गया. शोर सुन कर मैं भी वहां चला गया,’’ विजय ने बताया.
‘‘फिर आगे क्या हुआ?’’ अब अनामिका थोड़ा परेशान हो गई थी.
‘‘सारा ?ागड़ा एक नाली के गंदे पानी को ले कर था. अग्रवाल अंकल और जोसेफ अंकल बोल रहे थे कि जसवंत अंकल की वजह से नाली का पानी भर कर सड़क पर गया है, पर वे बोले कि पीछे वाले करीम भाई की वजह से ऐसा है.

‘‘बस, फिर क्या था, जसवंत अंकल को अकेला देख कर वे दोनों उन से भिड़ गए और धकियाने लगे. जब मैं ने जसवंत अंकल की साइड ली, तो अग्रवाल अंकल बोले, ‘तु? तो अवार्ड दिलाया है , तू तो इस का पक्ष लेगा ही.’ ‘‘इस पर जसवंत अंकल बिफर गए. हट्टेकट्टे तो वे हैं ही, उन्होंने दोनों अंकल को अकेले ही पीट डाला. मैं ने बीचबचाव की कोशिश की, पर तब तक तो मामला बिगड़ चुका था. कुछ लोगों ने उन तीनों को छुड़ाया, पर इस सब में मैं बुरा बन गया. अग्रवाल अंकल और जोसेफ अंकल मु? से बहुत ज्यादा नाराज हैं.
‘‘जोसेफ अंकल ने तो इतना तक कह दिया, ‘जसवंत तो करीम भाई से जलता है, इसलिए उस का नाम लगा रहा है. तू ने भी गलत आदमी का साथ दिया.’
‘‘यार, अनामिका, मैं तो बेवजह फंस गया. अब तो मैं अग्रवाल अंकल और मिस्टर जोसेफ से नजरें भी नहीं मिला पा रहा. उन दोनों के घर के दरवाजे तो मेरे लिए जैसे बंद हो गए हैं,’’ विजय ने अपनी बात रखी.
‘‘ओह, तो यह मामला है. अब आया . पर तू जानता है कि किसी और के साथ भी ऐसा हुआ है…’’ अनामिका बोली.
‘‘किस के साथ?’’ विजय ने हैरानी से पूछा.
‘‘हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ. उन्हें इजराइल ने अपने देश का सर्वोच्च सम्मान दिया और उसी के बाद से इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया. इस सब से दुनियाभर में यह संदेश गया कि भारत इजराइल और अमेरिका के साथ है ओर ईरान हमारा दुश्मन देश है.

‘‘कोढ़ पर खाज तो यह रही कि हमविश्वगुरुकी तरह सुलह कराने के सपने देख रहे थे कि नरेंद्र मोदी अमेरिका और इजराइल से कह कर युद्ध रुकवा देंगे, पर उन की कहीं भी नहीं चलती दिख रही.
‘‘अब खबर आई है कि पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर ऐसा कुछ करिश्मा कर सकते हैं कि यह युद्ध रुक जाए,’’ इतना कह कर जैसे अनामिका ने विजय पर कोई बम फोड़ दिया.
‘‘मु? पूरी बात बता कि सारा माजरा क्या है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘खबरों की मानें तो ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव से उपजी चिंताओं के बीच पाकिस्तान मीडिएटर के रोल में नजर रहा है. वह अमेरिका के संदेश ईरान तक पहुंचा रहा है और तेहरान के जवाब वाशिंगटन को देने का काम कर रहा है.

‘‘इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर से फोन पर बातचीत की. व्हाइट हाउस के मुताबिक, चर्चा का मेन मुद्दा ईरान युद्ध था. हालांकि, इस बातचीत को संवेदनशील बताते हुए बड़े अफसरों ने और ज्यादा बताने से इनकार कर दिया.
‘‘व्हाइट हाउस की प्रैस सचिव कैरोलिन लिविट ने पहले कहा था
कि यह संवेदनशील कूटनीतिक चर्चा है और अमेरिका मीडिया के जरीए कोई बातचीत नहीं करेगा.
‘‘सूत्रों के मुताबिक, आसिम मुनीर
ने डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत की और पाकिस्तान ने खुद को अमेरिकी और ईरान के बड़े अफसरों के बीच बातचीत की संभावित जगह के रूप में पेश किया.
‘‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से बात की. एक्स पोस्ट के जरीए उन्होंने ईद उल फितर और नवरोज की शुभकामनाएं दीं और ईरान के लोगों के साथ अपनी हमदर्दी जताई.
‘‘शहबाज शरीफ ने कहा कि दोनों पक्षों ने खाड़ी क्षेत्र के गंभीर हालात पर चर्चा की और तनाव कम करने, डायलौग और कूटनीति की जरूरत पर सहमति जताई. उन्होंने इसलामी दुनिया में एकता और क्षेत्र में शांति बहाल करने में पाकिस्तान के रोल पर भी जोर दिया.
‘‘इस बीच सोमवार, 23 मार्च को डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि तेहरान के साथ बेहतर और ठोस बातचीत के बाद उन्होंने हमले को 5 दिनों तक टालने की घोषणा की थी. हालांकि, यह साफ नहीं है कि पाकिस्तान का मीडिएटर बनने का डोनाल्ड ट्रंप के फैसले से सीधा संबंध है या नहीं.
‘‘ईरान ने सीधे अमेरिका के साथ बातचीत से इनकार किया है, लेकिन विदेश मंत्रालय ने कहा कि कुछ मित्र देशों के जरूरी संदेश मिले हैं. जानकारों के मुताबिक, यह कूटनीतिक कोशिश अभी शुरुआती चरण में है.’’

‘‘तुम्हें इस से क्या सम? आता है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘यही कि ईरान और अमेरिका के बीच सुलह की कोशिशें तेज हो गई हैं. अमेरिकी समाचार आउटलेट एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के अफसरों की इसी कड़ी में पाकिस्तान में मुलाकात और बातचीत मुमकिन है. पाकिस्तान में अमेरिकी और ईरानी अफसरों के बीच यह बैठक हो सकती है.
‘‘इजराइल के न्यूज चैनल-12 ने इजराइली अफसर के हवाले से बताया कि पाकिस्तान में होने वाली संभावित बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख हो सकते हैं.
‘‘अमेरिका के उपराष्ट्रपति ने सोमवार, 23 मार्च को इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी ईरान से खुली बातचीत करने पर चर्चा की. ‘‘इस से पहले एक रिपोर्ट में यह
भी कहा गया कि तुर्की, मिस्र और पाकिस्तान के प्रतिनिधि व्हाइट हाउस के दूत स्टीव विटकौफ से मुलाकात कर चुके हैं. साथ ही, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से भी अलग से मिले.
‘‘इस से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने के संकेत दे चुके हैं. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ पर ईरान के साथ पौजिटिव बातचीत की बात कही थी. साथ ही, ईरान के पावर प्लांट्स और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले हमलों को 5 दिन के लिए टाल दिया था.
‘‘डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि चर्चाओं का यह दौर पूरे हफ्ते जारी रहेगा. दोनों देशों के बीच गहन चर्चाओं के पौजिटिव रवैए को देखते हुए, मैं ने अमेरिकी रक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि ईरान के पावर प्लांट्स और ऊर्जा ढांचे पर सभी सैनिक हमलों को फिलहाल 5 दिनों के लिए टाल दिया जाए.’’
‘‘तो तुम यह मानती हो कि पाकिस्तान इस युद्ध को रुकवा सकता है, जबकि नरेंद्र मोदी नहीं?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘बात अगर इस खबर की करें, तो क्यों नहीं. सोचो कि इस सब में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर का नाम लिया जा रहा है और अगर पाकिस्तान कामयाब रहता है, तो फिर हमारे पड़ोसी का कद बढ़ना तय है. ‘‘मेरे खयाल से असली कूटनीति यही होती है कि चुपचाप काम को करो, ढिंढ़ोरा मत पीटो. पर हमारे देश मे पिछले कुछ साल से काम कम हो रहे हैं और बातें ज्यादा बनाई जा रही हैं.
‘‘तेल और रसोई गैस की कोई कमी नहीं है, पर जनता जो भुगत रही है वह भी सब के सामने है. गैस सिलैंडर की कालाबाजारी हो रही है. जो चाय कल तक 10 रुपए की एक कप थी, वह आज 15 रुपए हो गई हैऔर भी जाने किस तरह से महंगाई ने देश को कब्जे में ले लिया है.’’
‘‘कह तो तुम सही रही हो.

जैसा हाल मेरे पड़ोसियों ने क्या है, वैसा ही हाल देश चलाने वालों का हो गया है. गलत का साथ देने से पहले कई बार सोचना चाहिए. हर पड़ोसी से बना कर रखनी चाहिए, फिर चाहे वह कोई देश हो या पासपड़ोस,’’ विजय ने कहा. ‘‘अब ज्यादा मुंह मत लटकाओ और स्माइल करो. हमें हर बात से सीख लेनी चाहिए. फिलहाल जनता अगर चुप है, तो इस का मतलब यह नहीं है कि उस में अपना गुस्सा दिखाने की ताकत नहीं है. जैसे तुम ने इस मामले से सबक सीखा है, उसी तरह देश के नेताओं खासकर सत्ता पक्ष को भी सबक सीखना चाहिए वरना 2 बिल्लियों की लड़ाई में बंदर बाजी मार जाता है.
‘‘हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालत फिलहाल तो किसी खिसियानी बिल्ली जैसी है, जो अपनी फर्जी कामयाबी का खंभा नोंच रही है,’’ अनामिका ने दो टूक कहा.         

Hindi Romantic Story: सच्ची परख – शैफाली की कशमकश

Hindi Romantic Story: बिस्तर पर लेटी वह खिड़की से बाहर निहार रही थी. शांत, स्वच्छ, निर्मल आकाश देखना भी कितना सुखद लगता है. घर के बगीचे के विस्तार में फैली हरियाली और हवा के झोंकों से मचलते फूल वगैरा तो पहले भी यहां थे लेकिन तब उस की नजरों को ये नजारे चुभते थे. परंतु आज…?

शेफाली ने एक ठंडी सांस ली, परिस्थितियां इंसान में किस हद तक बदलाव ला देती हैं. अगर ऐसा न होता तो आज तक वह यों घुटती न रहती. बेकार ही उस ने अपने जीवन के 2 वर्ष मृगमरीचिका में भटकते हुए गंवा दिए, निरर्थक बातों के पीछे अपने को छलती रही. काश, उसे पहले एहसास हो जाता तो…

‘‘लीजिए मैडम, आप का जूस,’’ सुदेश की आवाज ने उसे सोच के दायरे से बाहर ला पटका.

‘‘क्यों बेकार आप इतनी मेहनत करते हैं, जूस की क्या जरूरत थी?’’ शेफाली ने संकोच से कहा.

‘‘देखिए जनाब, आप की सेहत के लिए यह बहुत जरूरी है. आप तो बस आराम से आदेश देती रहिए, यह बंदा आप को तरहतरह के पकवान बना कर खिलाता रहेगा. फिर कौन सी बहुत मेहनत करनी पड़ती है, यहां तो सबकुछ डब्बाबंद तैयार मिलता है, विदेश का कम से कम यह लाभ तो है ही,’’ सुदेश ने गिलास थमाते हुए कहा.

‘‘लेकिन आप काम करें, यह मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘शेफाली, थोड़े दिनों की बात है. जहां पेट के टांके कटे, वहीं तुम थोड़ाबहुत चलने लगोगी. अभी तो डाक्टर ने तुम्हें पूरी तरह आराम करने को कहा है. अच्छा, देखो, मैं बाजार से सामान ले कर आता हूं, तब तक तुम थोड़ा सो लो. फिर सोचने मत लग जाना. मैं देख रहा हूं, जब से तुम्हारा औपरेशन हुआ है, तुम हमेशा सोच में डूबी रहने लगी हो. सब ठीक से तो हो गया है, फिर काहे की चिंता. खैर, अब आराम करो.’’

सुदेश ने ठीक ही कहा था. जब से उस के पेट के ट्यूमर का औपरेशन हुआ था तब से वह सोचने लगी थी. असल में तो वह इन 2 वर्षों में सुदेश के प्रति किए गए व्यवहार की ग्लानि थी जो उसे निरंतर मथती रहती थी.

सुदेश के साधारण रूपरंग और प्रभावहीन व्यक्तित्व के कारण शेफाली हमेशा उसे अपमानित करने की कोशिश करती. अपने अथाह रूप और आकर्षण के सामने वह सुदेश को हीन समझती. अपने मातापिता को भी माफ नहीं कर पाई थी. अकसर वह मां को चिट्ठी में लिखती कि उस ने उन्हें वर चुनने का अधिकार दे कर बहुत भारी भूल की थी. ऐसे कुरूप पति को पाने से तो अच्छा था वह स्वयं किसी को ढूंढ़ कर विवाह कर लेती. ऐसा लिखते वक्त उस ने यह कभी नहीं सोचा था कि भारत में बैठे उस के मातापिता पर क्या बीत रही होगी.

शेफाली अपनी मां से तब कितना लड़ी थी, जब उसे पता चला था कि सुदेश ने कनाडा में ही बसने का निश्चय कर लिया है. सुदेश ने वहीं अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और अच्छी नौकरी मिलने के कारण वह अब भारत नहीं आना चाहता था. शेफाली ने स्वयं एमबीबीएस पास कर लिया था और ‘इंटर्नशिप’ कर रही थी. वह चाहती थी कि भारत में ही रह कर अपना क्लीनिक खोले. नए देश में, नए परिवेश में जाने के नाम से ही वह परेशान हो गई थी. बेटी को नाखुश देख मातापिता को लगा कि इस से तो अच्छा है कि सगाई को तोड़ दिया जाए, पर उस ने उन्हें यह कह कर रोक दिया था कि इस से सामाजिक मानमर्यादा का हनन होगा और उस के भाईबहनों के विवाह में अड़चन आ सकती है. सुदेश से पत्रव्यवहार व फोन द्वारा उस की बातचीत होती रहती थी, इसलिए वह नहीं चाहती थी कि ऐसी हालत में रिश्ता तोड़ कर उस का दिल दुखाया जाए. इसी कशमकश में वह विवाह कर के कनाडा आ गई थी.

अचानक टिं्रन…ट्रिंन…की आवाज से शेफाली का ध्यान भंग हुआ, फोन भारत से आया था. मां की आवाज सुन कर वह पुलकित हो उठी

‘‘कैसी हो बेटी, आराम कर रही हो न? देखो, ज्यादा चलनाफिरना नहीं.’’

उन की हिदायतें सुन वह मुसकरा उठी, ‘‘मैं ठीक हूं मां, सारा दिन आराम करती हूं. घर का सारा काम सुदेश ने संभाला हुआ है.’’

‘‘सुदेश ठीक है न बेटी, उस की इज्जत करना, वह अच्छा लड़का है, बूढ़ी आंखें धोखा नहीं खातीं, रूपरंग से क्या होता है,’’ मां ने थोड़ा झिझकते हुए कहा.

‘‘मां, तुम फिक्र मत करो. देर से ही सही, लेकिन मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है,’’ तभी फोन कट गया.

दूर बैठी मां भी शायद जान गई थीं कि वह सुदेश को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती. फिर से एक बार शेफाली के मानसपटल पर बीते दिन घूमने लगे.

मौंट्रीयल के इस खूबसूरत फ्लैट में जब उस ने कदम रखा था तो ढेर सारे फूलों और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उस का स्वागत किया गया था. उन के आने की खुशी में सुदेश के मित्रों ने पूरे फ्लैट को सजा रखा था. ऐसी आवभगत की उसे आशा नहीं थी, इसलिए खुशी हुई थी, लेकिन वह उसे दबा गई थी. आखिर किस काम की थी वह खुशी.

सुदेश एकएक कर अपने साथियों से उसे मिलवाता रहा. उस की खूबसूरती की प्रशंसा में लोगों ने पुल बांध दिए.

‘यार, तुम तो इतनी सुंदर परी को भारत से उड़ा लाए,’ सुदेश के मित्र की बात सुन उसे वह मुहावरा याद आ गया था, ‘हूर के साथ लंगूर’. सुदेश जब भी उस का हाथ पकड़ता, वह झटके से उसे खींच लेती. ऐसा नहीं था कि सुदेश उस के व्यवहार से अनभिज्ञ था, लेकिन उस ने सोचा था कि अपने प्यार से वह शेफाली का मन जीत लेगा.

विवाह के कुछ दिन बाद उस ने कहा था, ‘अभी छुट्टियां बाकी हैं. चलो, तुम्हें पूरे कनाडा की सैर करा दें.’

तब शेफाली ने यह कह कर इनकार कर दिया था कि उस की तबीयत ठीक नहीं है. उस की हरसंभव यही कोशिश रहती कि वह सुदेश से दूरदूर रहे. अपने सौंदर्य के अभिमान में वह यह भूल गई थी कि वह उस का पति है. उस का प्यार, उस का अपनापन और छोटीछोटी बातों का खयाल रखना शेफाली को तब दिखता ही कहां था.

सुदेश के सहयोगियों ने क्लब में पार्टी रखी थी, पर उस ने साथ जाने से इनकार कर दिया था.

‘देखो शेफाली, यह पार्टी उन्होंने हमारे लिए रखी है.’

पति की इस बात पर वह आगबबूला हो उठी थी, ‘मुझ से पूछ कर रखी है क्या? मैं पूछती हूं, तुम्हें मेरे साथ चलते झिझक नहीं होती. कहां तुम कहां मैं?’

तब सुदेश अवाक् रह गया था.

दरवाजा खुलने से एक बार फिर उस की तंद्रा भंग हो गई, ‘‘अरे, इतना सामान लाने की क्या जरूरत थी?’’ शेफाली ने सुदेश को पैकटों से लदे देख पूछा.

‘‘अरे जनाब, ज्यादा कहां है, बस, कुछ फल हैं और डब्बाबंद खाना. जब तक तुम ठीक नहीं हो जातीं, इन्हीं से काम चलाना है,’’ सुदेश ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा, खाना यहीं लगाऊं या बालकनी में बैठना चाहोगी?’’

‘‘नहींनहीं, यहीं ठीक है और देखो, ज्यादा पचड़े में मत पड़ना, वैसे भी ज्यादा भूख नहीं है.’’

‘‘क्यों, भूख क्यों नहीं है? तुम्हें ताकत  चाहिए और इस के लिए खाना बहुत जरूरी है,’’ सुदेश ने अपने हाथों से उसे खाना खिलाते हुए कहा.

शेफाली की आंखें नम हो आईं. ऐसे व्यक्ति से, जिस के अंदर प्यार का सागर लबालब भरा हुआ है, वह आज तक घृणा करती आई, सिर्फ इसलिए कि वह कुरूप है. लेकिन बाहरी सौंदर्य के झूठे सच में वह उस के गुणों को नजरअंदाज करती रही. अंदर से उस का मन कितना निर्मल, कितना स्वच्छ है. वह कितनी मूर्ख थी, तभी तो वैवाहिक जीवन के 2 सुनहरे वर्ष यों ही गंवा दिए. उस का हर पल यही प्रयत्न रहता कि किसी तरह सुदेश को अपमानित करे इसलिए उस की हर बात काटती.

लेकिन अपनी बीमारी के बाद उस ने जाना कि सच्चा प्रेम क्या होता है. शेफाली की इतनी बेरुखी के बाद भी सुदेश कितनी लगन से उस की सेवा कर रहा था.

‘‘अरे भई, खाना ठंडा हो जाएगा. जब देखो तब सोचती ही रहती हो. आखिर बात क्या है, मुझ से कोई गलती हो गई क्या?’’

‘‘यह क्या कह रहे हो?’’ शेफाली ने सफाई से आंखें पोंछते हुए कहा, ‘‘मुझे शर्मिंदा मत करो. अरे हां, मां का फोन आया था,’’ उस ने बात पलटते हुए कहा.

रसोई व्यवस्थित कर सुदेश बोला, ‘‘मैं थोड़ी देर दफ्तर हो कर आता हूं, तब तक तुम सो भी लेना. चाय के समय तक आ जाऊंगा. अरे हां, दफ्तर के साथी तुम्हारा हालचाल पूछने आना चाहते हैं, अगर तुम कहो तो?’’ सुदेश ने झिझकते हुए पूछा तो शेफाली ने मुसकरा कर हामी भर दी.

शेफाली जानती थी सुदेश ने क्यों पूछा था. वह उस के साथ न तो कहीं जाती थी, न ही उस के मित्रों का आना उसे पसंद था, क्योंकि तब उसे सुदेश के साथ बैठना पड़ता था, हंसना पड़ता था और वह यह चाहती नहीं थी. कितनी बार वह सुदेश को जता चुकी थी कि उस की पसंदनापसंद की उसे परवा नहीं है, खासकर उन दोस्तों की, जो हमेशा उस के सामने सुदेश की तारीफों के पुल बांधते रहते हैं, ‘भाभीजी, यह तो बहुत ही हंसमुख और जिंदादिल इंसान है. अपने काम और व्यवहार के कारण सब काप्यारा है, अपना यार.’

शेफाली उस की बदसूरती के सामने जब इन बातों को तोलती तो हमेशा उसे सुदेश का पलड़ा हलका लगता. सुदेश जब भी उसे छूता, उसे लगता, कोई कीड़ा उस के शरीर पर रेंग रहा है और वह दूसरे कमरे में जा कर सो जाती.दरवाजे की घंटी बजी तो वह चौंक उठी. सच ही था, वह ज्यादा ही सोचने लगी थी. सोचा, शायद पोस्टमैन होगा. वह आहिस्ता से उठी और पत्र निकाल लाई. मां ने खत में वही सब बातें लिखी थीं और सुदेश का सम्मान करने की हिदायत दी थी. उस का मन हुआ कि वह अभी मां को जवाब दे दे, पर पेन और कागज दूसरे कमरे में रखे थे और वह थोड़ा चल कर थक गई थी. लेटने ही लगी थी कि सुदेश आ गया.

‘‘सुनो, जरा पेन और पैड दोगे, मां को चिट्ठी लिखनी है,’’ शेफाली ने कहा.

‘‘बाद में, अभी लेटो, तुम्हें उठने की जरूरत ही क्या थी,’’ सुदेश ने बनावटी गुस्से से कहा, ‘‘दवा भी नहीं ली. ठहरो, मैं पानी ले कर आता हूं.’’

‘‘सुनो,’’ शेफाली ने उस की बांह पकड़ ली. सुदेश ने कुछ हैरानी से देखा. शेफाली को समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे अपने किए की माफी मांगे.

व्यक्ति की पहचान उस के गुणों से होती है, उस के व्यवहार से होती है, वही उस के व्यक्तित्व की छाप बनती है. सुदेश की सच्ची परख तो उसे अब हुई थी. आज तक तो वह अपनी खूबसूरती के दंभ में एक ऐसे राजकुमार की तलाश में कल्पनालोक में विचर रही थी जो किस्सेकहानियों में ही होते हैं, पर यथार्थ तो इस से बहुत परे होता है. जहां मनुष्य के गुणों को समाज की नजरें आंकती हैं, उस की आंतरिक सुंदरता ज्यादा माने रखती है. अगर खूबसूरती ही मापदंड होता तो समाज के मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लग जाता.

‘‘शेफाली, तुम कुछ कहना चाहती थीं?’’ सुदेश ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘हां…बस, कुछ खास नहीं,’’ वह चौंकते हुए बोली.

‘‘मैं जानता हूं, मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं. अगर तुम चाहो तो मुझे छोड़ कर जा सकती हो,’’ सुदेश के स्वर में दर्द था.

‘‘बसबस, और कुछ न कहो, मैं पहले ही बहुत शर्मिंदा हूं. हो सके तो मुझे माफ कर दो. मैं ने तुम्हारा बहुत अपमान किया है. फिर भी तुम ने कभी मुझ से कटुता से बात नहीं की. मेरी हर कड़वाहट को सहते रहे और अब भी मेरी इतनी सेवा कर रहे हो, शर्म आती है मुझे अपनेआप पर,’’ शेफाली उस से लिपट कर रो पड़ी.

‘‘कैसी बातें कर रही हो, कौन नहीं जानता कि तुम्हारी खूबसूरती के सामने मैं कितना कुरूप लगता हूं.’’

‘‘खबरदार, जो तुम ने अपनेआप को कुरूप कहा. तुम्हारे जैसा सुंदर मैं ने जिंदगी में नहीं देखा. मेरी आंखों को तुम्हारी सच्ची परख हो गई है.’’

दोनों अपनी दुनिया में खोए थे कि तभी दरवाजे पर थपथपाहट हुई और घंटी भी बजी.

‘‘सुदेश, दरवाजा खोलो,’’ बाहर से शोर सुनाई दिया.

‘‘लगता है, मित्रमंडली आ गई है,’’ सुदेश बोला.

दरवाजा खुलते ही फूलों की महक से सारा कमरा भर गया. सुदेश के मित्र शेफाली को फूलों का एकएक गुच्छा थमाने लगे.

‘‘भाभीजी, आप के ठीक होने के बाद हम एक शानदार पार्टी लेंगे. क्यों, देंगी न?’’ एक मित्र ने पूछा.

‘‘जरूर,’’ शेफाली ने हंसते हुए कहा. उसे लग रहा था कि इन फूलों की तरह उस का जीवन भी महक से भर गया है. हर तरफ खुशबू बिखर गई है. गुच्छों के बीच से उस ने देखा, सुदेश के चेहरे पर एक अनोखी मुसकराहट छाई हुई है. शेफाली ने जब सारी शर्महया छोड़ आगे बढ़ कर उस का चेहरा चूमा तो ‘हे…हे’ का शोर मच गया और सुदेश ने उसे आलिंगनबद्ध कर लिया. Hindi Romantic Story

Hindi Romantic Story: दिल की दहलीज पर

Hindi Romantic Story: ‘‘आहा,चूड़े माशाअल्लाह, क्या जंच रही हो,’’ नवविवाहिता मधुरा की कलाइयों पर सजे चूड़े देख दफ्तर के सहकर्मी, दोस्त आह्लादित थे. मधुरा का चेहरा शर्म से सुर्ख पड़ रहा था. शादी के 15 दिनों में ही उस का रूप सौंदर्य और निखर गया था. गुलाबी रंगत वाले चेहरे पर बड़ीबड़ी कजरारी आंखें और लाल रंगे होंठ…

कुछ गहने अवश्य पहने थे मधुरा ने, लेकिन उस के सौंदर्य को किसी कृत्रिम आवरण की आवश्यकता न थी. नए प्यार का खुमार उस की खूबसूरती को चार चांद लगा चुका था.

‘‘और यार, कैसी चल रही है शादीशुदा जिंदगी कूल या हौट?’’ सहेलियां आंखें मटकामटका कर उसे छेड़ने लगीं. सच में मनचाहा जीवनसाथी पा मानों उसे दुनिया की सारी खुशियां मिल गई थीं. मातापिता के चयन और निर्णय से उस का जीवन खिल उठा था.

‘‘वैसे क्या बढि़या टाइम चुना तुम ने अपनी शादी का. क्रिसमस के समय वैसे भी काम कम रहता है… सभी जैसे त्योहार को पूरी तरह ऐंजौय करने के मूड में होते हैं,’’ सहेलियां बोलीं.

‘‘इसीलिए तो इतनी आसानी से छुट्टी मिल गई 15 दिनों की,’’ मधुरा की हंसी के साथसाथ सभी सहकर्मियों की हंसी के ठहाकों से सारा दफ्तर गुंजायमान हो उठा.

तभी बौस आ गए. उन्हें देख सभी चुप हो अपनीअपनी सीट पर चले गए.

‘‘बधाई हो, मधुरा. वैलकम बैक,’’ कहते हुए उन्होंने मधुरा का दफ्तर में पुन: स्वागत किया.

सभी अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए.

‘‘मधुरा, शादी की छुट्टी से पहले जो तुम ने टर्न की प्रोजैक्ट किया था कैरी ऐंड संस कंपनी के साथ, उस का क्लोजर करना शेष है. तुम्हें तो पता हैं हमारी कंपनी के नियम… जो रिसोर्स कार्य आरंभ करता है वही कार्य को पूरी तरह समाप्त कर वित्तीय विभाग से उस का पूर्ण भुगतान करवा कर, फाइल क्लोज करता है. लेकिन बीच में ही तुम्हारे छुट्टी पर जाने के कारण उन का भुगतान अटका हुआ है. उस काम को जल्दी पूरा कर देना,’’ कह कर बौस ने फोन काट दिया.

मधुरा ने फाइल एक बार फिर से देखी. भुगतान के सिवा और कार्य शेष न था. फाइल पूरी करने हेतु उसे कैरी ऐंड संस कंपनी के प्रबंधक जितेन से एक बार फिर मिलना होगा और फिर वह जितेन के विचारों में खो गई.

शाम को घर लौट कर रात के भोजन की तैयारी कर मधुरा अपने कमरे में हृदय के दफ्तर से लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी. समय काटने के लिए उस ने अपनी डायरी उठा ली. पुराने पन्ने पलटने लगी. पुराने पन्ने उसे स्वत: ही पुरानी यादों में ले गए…

29 जुलाई

आज इंप्लोई मीटिंग में बौस ने मेरे काम की तारीफ की. कितनी खुशी हुई, मेरे परिश्रम का परिणाम दिखने लगा है. नए क्लाइंट कैरी ऐंड संस कंपनी का प्रोजैक्ट भी मुझे मिल गया. इस प्रोजैक्ट को मैं निर्धारित समयसीमा में पूरा कर अपने परफौर्मैंस अप्रेजल में पूरे अंक लाऊंगी.

30 जुलाई

क्या बढि़या दफ्तर है कैरी ऐंड संस कंपनी का. मुझे आज तक अपना दफ्तर कितना एवन लगता था, लेकिन आज उन का दफ्तर देख कर मेरे होश फाख्ता हो गए. इंटीरियर डिजाइनर का काम लाजवाब है. इतने बढि़या दफ्तर में अकसर आनाजाना लगा रहेगा. मजा आ जाएगा.

31 जुलाई

सारे विभाग बहुत अच्छी तरह नियंत्रित हैं और आपस में अच्छा समन्वय स्थापित है. कैरी ऐंड संस कंपनी का आईटी विभाग प्रशंसा के काबिल है. आज अपने काम की शुरुआत की मैं ने. लोगों से मिल ली. किंतु जिन के साथ मिल कर काम करना है यानी जितेन, उन से मिलना रह गया. कल उन से भी मिल लूंगी.

1 अगस्त

मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसे हीरो जैसा बंदा दफ्तर में टकराएगा मुझ से.

उफ, कितना खूबसूरत नौजवान है जितेन. लंबाचौड़ा, सुंदर… लगता है सीधे ‘मिल्स ऐंड बून्स’ के उपन्यासों से बाहर आया है… मेरे सपनों का राजकुमार.

6 अगस्त

आज पूरे हफ्ते भर बाद फिर से जितेन से मुलाकात हुई. वे इतना व्यस्त रहते हैं कि मुलाकात ही नहीं हो पाती. इतने ऊंचे पद पर हैं… अभी तक ठीक से बात भी नहीं हो पाई है. पता नहीं कब हम दोनों को बातचीत करने का मौका मिलेगा. अभी तो मैं जितेन को अपने कार्य के बारे में भी ढंग से नहीं बता पाई हूं.

16 अगस्त

जितना देखती हूं उतना ही दीवानी होती जा रही हूं मैं जितेन की. एक बार मेरी ओर देख भर ले वह… मेरी सांस गले में ही अटक जाती है. लगता है जो बोल रही हूं, जो काम कर रही हूं, सब भूल जाऊंगी. इतना स्वप्निल मैं ने स्वयं को कभी नहीं पाया पहले. यह क्या हो जाता है मुझे जितेन के समक्ष. लेकिन वह है कि मुझे समय

ही नहीं देता. बस 4-5 मिनट कुछ काम के बारे में पूछ कर चला जाता है. कब समझेगा वह मेरे दिल का हाल? क्या मेरी आंखों में कुछ नहीं दिखता उसे?

3 सितंबर

आज घर लौटते समय एफएम, पर ‘सत्ते पे सत्ता’ मूवी का गाना सुना, ‘प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया. कि दिल करे हाय, कोई तो बताए क्या होगा… गाड़ी चलाते समय पूरा गला खोल कर गाना गाने का मजा ही कुछ और है…’ फिर आज तो गाना भी मेरे दिल का हाल बयां कर रहा था. न जाने जितेन के साथ पल दो पल कब मिलेंगे और मैं अपने दिल का हाल कब कह पाऊंगी.

हृदय के कमरे में आने की आहट से मधुरा अतीत की स्मृतियों से वर्तमान में लौट आई.

‘‘कैसा रहा दफ्तर में शादी के बाद पहला दिन?’’ हृदय ने पूछा.

मधुरा को हृदय की यह बात भी बहुत भाती थी कि वह उस की हर गतिविधि, हर भावना, हर बात का खयाल रखता है. दोनों ने बातचीत की, खाना खाया और अगली सुबह के लिए अलार्म लगा कर सो गए.

अगले दिन मधुरा अपने क्लाइंट कैरी ऐंड संस कंपनी पहुंची. आज उस ने फाइल क्लोजर की पूरी तैयारी कर ली थी. फाइनल पेमैंट का चैक देने वह जितेन के कक्ष में पहुंची. उस के हाथों में चूड़े देख जितेन ने उसे बधाई दी, ‘‘मुझे आप की कंपनी से पता चला था कि आप अपनी शादी हेतु छुट्टियों पर गई हैं.’’

कार्य पूरा करने के बाद मधुरा ने अपने दफ्तर लौटने के लिए कैब बुला ली. सारे रास्ते उस के मनमस्तिष्क में जितेन घूमता रहा. किस औपचारिकता से बात कर रहा था आज… उसे याद हो आया वह समय जब जितेन और मधुरा की मित्रता भी हो गई थी और वह ‘सिर्फ अच्छे दोस्त’ की श्रेणी से कुछ आगे भी बढ़ चुके थे.

मधुरा तब कैरी ऐंड संस कंपनी जाने के बहाने खोजती रहती. जितेन भी हर शाम उसे उस के दफ्तर से पिक करता और दोनों कहीं कौफी पीते समय व्यतीत करते. दोनों को ही एकदूसरे का साथ बेहद भाता था. मधुरा के चेहरे की चमक बढ़ती रहती और जितेन कुछ गंभीर स्वभाव का होने के बावजूद उसे देख मुसकराता रहता. जितेन आए दिन मधुरा को तोहफे देता रहता. कभी ‘शैनेल’ का परफ्यूम तो कभी ‘हाई डिजाइन’ का हैंडबैग.

‘‘जितेन, क्यों इतने महंगे तोहफे लाते हो मेरे लिए? मैं हर बार घर और दफ्तर में झूठ बोल कर इन की कीमत नहीं छिपा सकती.’’

‘‘तो सच बता दिया करो न… मैं ने कब रोका है तुम्हें?’’

‘‘तुम तो जानते हो कि हमारी कंपनी में भरती के समय हर मुलाजिम से कौंफिडैंशियलिटी ऐग्रीमैंट भरवाया जाता है. चूंकि तुम एक क्लाइंट हो, मैं तुम्हें न तो डेट कर सकती हूं और न ही तुम से शादी. इतना ही नहीं मैं तुम्हारी कंपनी अगले 2 वर्षों तक भी जौइन नहीं कर सकती हूं… तुम से शादी के बाद मैं नौकरी से त्यागपत्र दे कहीं और नौकरी ढूंढ़ूंगी…’’

‘‘शादी के बाद? हैंग औन,’’ मधुरा की बात को बीच में ही काटते हुए जितेन ने कहा, ‘‘शादी तक कहां पहुंच गईं तुम? हम एक कपल हैं, बस, मैं अभी शादीवादी के बारे में सोच भी नहीं सकता… वैसे भी शादी तो मां अपने सर्कल की किसी लड़की से करवाना चाहेंगी… तुम समझ रही हो न?’’

मधुरा के माथे पर चिंता की लकीरें और चेहरे पर असमंजस के भाव पढ़ कर जितेन ने आगे कहा, ‘‘तुम इस समय का लुत्फ उठाओ न… ये महंगे तोहफे, ये बढि़या रेस्तरां, अथाह शौंपिंग… ये सब तुम्हें खुश करने के लिए ही तो हैं… कूल?’’

उस शाम मधुरा को पता चला कि सामाजिक स्तर का भेदभाव केवल कहानियों में नहीं, अपितु वास्तविक जीवन में भी है. उस ने सोचा न था कि उसे भी इस भेदभाव का सामना करना पड़ेगा. उस के बाद जब कभी जितेन टकराया, बस एक फीकी सी मुसकान मधुरा के पाले में आई. खैर, उस का भी मन नहीं हुआ कि जितेन से बात करे. उस का मन खट्टा हो चुका था.

फिर उस की मम्मी ने उसे रमा आंटी के बेटे से मिलवाया. अच्छा लगा था मधुरा को वह. खास कर उस का नाम-हृदय. शांत, सुशील और विनम्र. घरपरिवार तो देखाभाला था ही, रहता भी इसी शहर में था. चलो, ‘मिल्स ऐंड बून्स’ के हीरो को भी देख लिया और अब वास्तविकता के नायक को भी. पर क्या करें. जीवन तो वास्तविक है. इस में सपनों से अधिक वास्तविकता का पलड़ा भारी रहना स्वाभाविक है.

जब से मधुरा की मुलाकात हृदय से हुई थी तभी से कितने अच्छे और मिठास भरे मैसेज भेजने लगा था वह. हृदय ने उस का मन पिघला दिया था. जल्दी ही हामी भर दी उस ने इस रिश्ते के लिए. उस की मम्मी और आंटी कितनी खुश हुईं. उस का मन भी खुश था. मन की तहों ने जहां एक तरफ जितेन को छाना था वहीं दूसरी तरफ हृदय को भी टटोल कर देखा था. मधुरा जैसी रुचिर, लुभावनी और मेधावी लड़की आगे बढ़ चुकी थी.

हर अनुभव जीवन में कुछ सबक लाता है और कुछ यादें छोड़ जाता है. चलते रहने का नाम ही जीवन है. मधुरा अपने दफ्तर पहुंच चुकी थी. आज वह अपने परफौर्मैंस अप्रेजल में अपने पूरे किए प्रोजैक्ट को भरने वाली थी. Hindi Romantic Story

Best Hindi Kahani: खेल – दिव्या ने मेरे साथ कैसा खेल खेला

Best Hindi Kahani: आज से 6-7 साल पहले जब पहली बार तुम्हारा फोन आया था तब भी मैं नहीं समझ पाया था कि तुम खेल खेलने में इतनी प्रवीण होगी या खेल खेलना तुम्हें बहुत अच्छा लगता होगा. मैं अपनी बात बताऊं तो वौलीबौल छोड़ कर और कोई खेल मुझे कभी नहीं आया. यहां तक कि बचपन में गुल्लीडंडा, आइसपाइस या चोरसिपाही में मैं बहुत फिसड्डी माना जाता था. फिर अन्य खेलों की तो बात ही छोड़ दीजिए कुश्ती, क्रिकेट, हौकी, कूद, अखाड़ा आदि. वौलीबौल भी सिर्फ 3 साल स्कूल के दिनों में छठीं, 7वीं और 8वीं में था, देवीपाटन जूनियर हाईस्कूल में. उन दिनों स्कूल में नईनई अंतर्क्षेत्रीय वौलीबौल प्रतियोगिता का शुभारंभ हुआ था और पता नहीं कैसे मुझे स्कूल की टीम के लिए चुन लिया गया और उस टीम में मैं 3 साल रहा. आगे चल कर पत्रकारिता में खेलों का अपना शौक मैं ने खूब निकाला. मेरा खयाल है कि खेलों पर मैं ने जितने लेख लिखे, उतने किसी और विषय पर नहीं. तकरीबन सारे ही खेलों पर मेरी कलम चली. ऐसी चली कि पाठकों के साथ अखबारों के लोग भी मुझे कोई औलराउंडर खेलविशेषज्ञ समझते थे.

पर तुम तो मुझ से भी बड़ी खेल विशेषज्ञा निकली. तुम्हें रिश्तों का खेल खेलने में महारत हासिल है. 6-7 साल पहले जब पहली बार तुम ने फोन किया था तो मैं किसी कन्या की आवाज सुन कर अतिरिक्त सावधान हो गया था. ‘हैलो सर, मेरा नाम दिव्या है, दिव्या शाह. अहमदाबाद से बोल रही हूं. आप का लिखा हुआ हमेशा पढ़ती रहती हूं.’

‘जी, दिव्याजी, नमस्कार, मुझे बहुत अच्छा लगा आप से बात कर. कहिए मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं.’ जी सर, सेवावेवा कुछ नहीं. मैं आप की फैन हूं. मैं ने फेसबुक से आप का नंबर निकाला. मेरा मन हुआ कि आप से बात की जाए.

‘थैंक्यूजी. आप क्या करती हैं, दिव्याजी?’ ‘सर, मैं कुछ नहीं करती. नौकरी खोज रही हूं. वैसे मैं ने एमए किया है समाजशास्त्र में. मेरी रुचि साहित्य में है.’

‘दिव्याजी, बहुत अच्छा लगा. हम लोग बात करते रहेंगे,’ यह कह कर मैं ने फोन काट दिया. मुझे फोन पर तुम्हारी आवाज की गर्मजोशी, तुम्हारी बात करने की शैली बहुत अच्छी लगी. पर मैं लड़कियों, महिलाओं के मामले में थोड़ा संकोची हूं. डरपोक भी कह सकते हैं. उस का कारण यह है कि मुझे थोड़ा डर भी लगा रहता है कि क्या मालूम कब, कौन मेरी लोकप्रियता से जल कर स्टिंग औपरेशन पर न उतर आए. इसलिए एक सीमा के बाद मैं लड़कियों व महिलाओं से थोड़ी दूरी बना कर चलता हूं.

पर तुम्हारी आवाज की आत्मीयता से मेरे सारे सिद्धांत ढह गए. दूरी बना कर चलने की सोच पर ताला पड़ गया. उस दिन के बाद तुम से अकसर फोन पर बातें होने लगीं. दुनियाजहान की बातें. साहित्य और समाज की बातें. उसी दौरान तुम ने अपने नाना के बारे में बताया था. तुम्हारे नानाजी द्वारका में कोई बहुत बड़े महंत थे. तुम्हारा उन से इमोशनल लगाव था. तुम्हारी बातें मेरे लिए मदहोश होतीं. उम्र में खासा अंतर होने के बावजूद मैं तुम्हारी ओर आकर्षित होने लगा था. यह आत्मिक आकर्षण था. दोस्ती का आकर्षण. तुम्हारी आवाज मेरे कानों में मिस्री सरीखी घुलती. तुम बोलती तो मानो दिल में घंटियां बज रही हैं. तुम्हारी हंसी संगमरमर पर बारिश की बूंदों के माध्यम से बजती जलतरंग सरीखी होती. उस के बाद जब मैं अगली बार अपने गृहनगर गांधीनगर गया तो अहमदाबाद स्टेशन पर मेरीतुम्हारी पहली मुलाकात हुई. स्टेशन के सामने का आटो स्टैंड हमारी पहली मुलाकात का मीटिंग पौइंट बना. उसी के पास स्थित चाय की एक टपरी पर हम ने चाय पी. बहुत रद्दी चाय, पर तुम्हारे साथ की वजह से खुशनुमा लग रही थी. वैसे मैं बहुत थका हुआ था. दिल्ली से अहमदाबाद तक के सफर की थकान थी, पर तुम से मिलने के बाद सारी थकान उतर गई. मैं तरोताजा हो गया. मैं ने जैसा सोचा समझा था तुम बिलकुल वैसी ही थी. एकदम सीधीसादी. प्यारी, गुडि़या सरीखी. जैसे मेरे अपने घर की. एकदम मन के करीब की लड़की. मासूम सा ड्रैस सैंस, उस से भी मासूम हावभाव. किशमिशी रंग का सूट. मैचिंग छोटा सा पर्स. खूबसूरत डिजाइन की चप्पलें. ऊपर से भीने सेंट की फुहार. सचमुच दिलकश. मैं एकटक तुम्हें देखता रह गया. आमनेसामने की मुलाकात में तुम बहुत संकोची और खुद्दार महसूस हुई.

कुछ महीने बाद हुई दूसरी मुलाकात में तुम ने बहुत संकोच से कहा कि सर, मेरे लिए यहीं अहमदाबाद में किसी नौकरी का इंतजाम करवाइए. मैं ने बोल तो जरूर दिया, पर मैं सोचता रहा कि इतनी कम उम्र में तुम्हें नौकरी करने की क्या जरूरत है? तुम्हारी घरेलू स्थिति क्या है? इस तरह कौन मां अपनी कम उम्र की बिटिया को नौकरी करने शहर भेज सकती है? कई सवाल मेरे मन में आते रहे, मैं तुम से उन का जवाब नहीं मांग पाया. सवाल सवाल होते हैं और जवाब जवाब. जब सवाल पसंद आने वाले न हों तो कौन उन का जवाब देना चाहेगा. वैसे मैं ने हाल में तुम से कई सवाल पूछे पर मुझे एक का भी उत्तर नहीं मिला. आज 20 अगस्त को जब मुझे तुम्हारा सारा खेल समझ में आया है तो फिर कटु सवाल कर के क्यों तुम्हें परेशान करूं.

मेरे मन में तुम्हारी छवि आज भी एक जहीन, संवेदनशील, बुद्धिमान लड़की की है. यह छवि तब बनी जब पहली बार तुम से बात हुई थी. फिर हमारे बीच लगातार बातों से इस छवि में इजाफा हुआ. जब हमारी पहली मुलाकात हुई तो यह छवि मजबूत हो गई. हालांकि मैं तुम्हारे लिए चाह कर भी कुछ कर नहीं पाया. कोशिश मैं ने बहुत की पर सफलता नहीं मिली. दूसरी पारी में मैं ने अपनी असफलता को जब सफलता में बदलने का फैसला किया तो मुझे तुम्हारी तरफ से सहयोग नहीं मिला. बस, मैं यही चाहता था कि तुम्हारे प्यार को न समझ पाने की जो गलती मुझ से हुई थी उस का प्रायश्चित्त यही है कि अब मैं तुम्हारी जिंदगी को ढर्रे पर लाऊं. इस में जो तुम्हारा साथ चाहिए वह मुझे प्राप्त नहीं हुआ.

बहरहाल, 25 जुलाई को तुम फिर मेरी जिंदगी में एक नए रूप में आ गई. अचानक, धड़धड़ाते हुए. तेजी से. सुपरसोनिक स्पीड से. यह दूसरी पारी बहुत हंगामाखेज रही. इस ने मेरी दुनिया बदल कर रख दी. मैं ठहरा भावुक इंसान. तुम ने मेरी भावनाओं की नजाकत पकड़ी और मेरे दिल में प्रवेश कर गई. मेरे जीवन में इंद्रधनुष के सभी रंग भरने लगे. मेरे ऊपर तुम्हारा नशा, तुम्हारा जादू छाने लगा. मेरी संवेदनाएं जो कहीं दबी पड़ी थीं उन्हें तुम ने हवा दी और मेरी जिंदगी फूलों सरीखी हो गई. दुनियाजहान के कसमेवादों की एक नई दुनिया खुल गई. हमारेतुम्हारे बीच की भौतिक दूरी का कोई मतलब नहीं रहा. बातों का आकाश मुहब्बत के बादलों से गुलजार होने लगा.

तुम्हारी आवाज बहुत मधुर है और तुम्हें सुर और ताल की समझ भी है. तुम जब कोई गीत, कोई गजल, कोई नगमा, कोई नज्म अपनी प्यारी आवाज में गाती तो मैं सबकुछ भूल जाता. रात और दिन का अंतर मिट गया. रानी, जानू, राजा, सोना, बाबू सरीखे शब्द फुसफुसाहटों की मदमाती जमीन पर कानों में उतर कर मिस्री घोलने लगे. उम्र का बंधन टूट गया. मैं उत्साह के सातवें आसमान पर सवार हो कर तुम्हारी हर बात मानने लगा. तुम जो कहती उसे पूरा करने लगा. मेरी दिनचर्या बदल गई. मैं सपनों के रंगीन संसार में गोते लगाने लगा. क्या कभी सपने भी सच्चे होते हैं? मेरा मानना है कि नहीं. ज्यादा तेजी किसी काम की नहीं होती. 25 जुलाई को शुरू हुई प्रेमकथा 20 अगस्त को अचानक रुक गई. मेरे सपने टूटने लगे. पर मैं ने सहनशीलता का दामन नहीं छोड़ा. मैं गंभीर हो गया था. मैं तो कोई खेल नहीं खेल रहा था. इसलिए मेरा व्यवहार पहले जैसा ही रहा. पर तुम्हारा प्रेम उपेक्षा में बदल गया. कोमल भावनाएं औपचारिक हो गईं. मेरे फोन की तुम उपेक्षा करने लगी. अपना फोन दिनदिन भर, रातभर बंद करने लगी. बातों में भी बोरियत झलकने लगी. तुम्हारा व्यवहार किसी खेल की ओर इशारा करने लगा.

इस उपेक्षा से मेरे अंदर जैसे कोई शीशा सा चटख गया, बिखर गया हो और आवाज भी नहीं हुई हो. मैं टूटे ताड़ सा झुक गया. लगा जैसे शरीर की सारी ताकत निचुड़ गई है. मैं विदेह सा हो गया हूं. डा. सुधाकर मिश्र की एक कविता याद आ गई,

इतना दर्द भरा है दिल में, सागर की सीमा घट जाए. जल का हृदय जलज बन कर जब खुशियों में खिलखिल उठता है. मिलने की अभिलाषा ले कर, भंवरे का दिल हिल उठता है. सागर को छूने शशधर की किरणें, भागभाग आती हैं, झूमझूम कर, चूमचूम कर, पता नहीं क्याक्या गाती हैं. तुम भी एक गीत यदि गा दो, आधी व्यथा मेरी घट जाए. पर तुम्हारे व्यवहार से लगता है कि मेरी व्यथा कटने वाली नहीं है.

अभी जैसा तुम्हारा बरताव है, उस से लगता है कि नहीं कटेगी. यह मेरे लिए पीड़ादायक है कि मेरा सच्चा प्यार खेल का शिकार बन गया है. मैं तुम्हारी मासूमियत को प्यार करता हूं, दिव्या. पर इस प्यार को किसी खेल का शिकार नहीं बनने दे सकता. लिहाजा, मैं वापस अपनी पुरानी दुनिया में लौट रहा हूं. मुझे पता है कि मेरा मन तुम्हारे पास बारबार लौटना चाहेगा. पर मैं अपने दिल को समझा लूंगा. और हां, जिंदगी के किसी मोड़ पर अगर तुम्हें मेरी जरूरत होगी तो मुझे बेझिझक पुकारना, मैं चला आऊंगा. तुम्हारे संपर्क का तकरीबन एक महीना मुझे हमेशा याद रहेगा. अपना खयाल रखना. Best Hindi Kahani

Hindi Love Story: प्यार की खातिर – मोहन और गीता की कहानी

Hindi Love Story: प्यार कभी भी और कहीं भी हो सकता है. प्यार एक ऐसा अहसास है, जो बिन कहे भी सबकुछ कह जाता है. जब किसी को प्यार होता है तो वह यह नहीं सोचता कि इस का अंजाम क्या होगा और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह इनसान किसी के प्यार में इतना खो जाता है कि बस प्यार के अलावा उसे कुछ दिखाई नहीं देता है. तभी तो कहते हैं कि प्यार अंधा होता है. सबकुछ लुटा कर बरबाद हो कर भी नहीं चेतता और गलती पर गलती करता चला जाता है.

मोहन हाईस्कूल में पढ़ने वाला एक 16 साल का लड़का था. वह एक लड़की गीता से बहुत प्यार करने लगा. वह उस के लिए कुछ भी कर सकता था, लेकिन परेशानी की बात यह थी कि वह उसे पा नहीं सकता था, क्योंकि मोहन के पापा गीता के पापा की कंपनी में एक मामूली सी नौकरी करते थे. मोहन बहुत ज्यादा गरीब घर से था, जबकि गीता बहुत ज्यादा अमीर थी. वह सरकारी स्कूल में पढ़ता था और गीता शहर के नामी स्कूल में पढ़ती थी.

लेकिन उन में प्यार होना था और प्यार हो गया. मोहन गीता से कहता, ‘‘तुम मुझ से कभी दूर मत जाना क्योंकि मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह पाऊंगा.’’ ‘‘हां नहीं जाऊंगी, लेकिन मेरे घर वाले कभी हमें एक नहीं होने देंगे,’’ गीता ने कहा.

‘‘क्यों?’’ मोहन ने पूछा. ‘‘क्योंकि तुम सब जानते हो. हमारा समाज हमें कभी एक नहीं होने देगा,’’ गीता बोली.

‘‘हम इस दुनिया, समाज सब को छोड़ कर दूर चले जाएंगे,’’ मोहन ने कहा. ‘‘नहींनहीं, मैं यह कदम नहीं उठा सकती. मैं अपने परिवार को समाज के सामने शर्मिंदा होते नहीं देख सकती,’’ गीता ने अपने मन की बात कही.

‘‘ठीक है, तो तुम मेरा तब तक इंतजार करना, जब तक मैं इस लायक न हो जाऊं और तुम्हारे पापा के सामने जा कर उन से तुम्हारा हाथ मांग सकूं. बोलो मंजूर है?’’ मोहन ने कहा. गीता हंसी और बोली, ‘‘क्या होगा, अगर मैं तुम से शादी कर के एकसाथ न रह सकी? हम चाहें दूर रहें या पास, मेरे दिल में तुम्हारा प्यार कभी कम नहीं होगा. तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगे.’’

यह सुन कर मोहन दिल ही दिल में रो पड़ा और सोच में पड़ गया. ‘‘क्या तुम मुझे छोड़ कर किसी और से शादी कर लोगी? मुझे भूल जाओगी? मुझ से दूर चली जाओगी?’’ मोहन ने पूछा.

‘‘ऐसा तो मैं सोच भी नहीं सकती कि तुम्हें भूल जाऊं. मैं मरते दम तक तुम्हें नहीं भूल पाऊंगी,’’ गीता बोली. ‘‘फिर मेरा दिल दुखाने वाली बात क्यों करती हो? कह दो कि तुम मेरी हो कर ही रहोगी?’’ मोहन ने कहा.

समय अपनी रफ्तार से चल रहा था. मोहन दिनरात मेहनत कर के खुद को गीता के काबिल बनाने में लगा था, ताकि एक दिन उस के पिता के पास जा कर गीता का हाथ मांग सके. इधर गीता यह सोचने लगी, ‘मोहन मेरी अमीरी की खातिर मुझ से दूर जा रहा है. वह मुझे पा नहीं सकता इसलिए दूरी बना रहा है.’

इधर गीता के घर वाले उस के लिए लड़का देखने लगे और उधर मोहन जीजान से पढ़ाई में लगा हुआ था. उसे पता भी नहीं चला और गीता की शादी तय हो गई. जब यह बात मोहन को पता चली तो वह गीता की खुशी की खातिर चुप लगा गया, क्योंकि उस की शादी शहर के बहुत बड़े खानदान में हो रही थी. उस का होने वाला पति एक बड़ी कंपनी का मालिक था.

यह सब जानने और सुनने के बाद मोहन अपने प्यार की खुशी की खातिर उस से दूर जाने की कोशिश करने लगा, लेकिन यह तो नामुमकिन था. वह किसी भी कीमत पर जीतेजी उस से दूर नहीं हो सकता था. सचाई जाने बगैर ही उस ने एक गलत कदम उठाने की सोच ली. गीता अंदर ही अंदर बहुत दुखी थी और परेशान थी क्योंकि वह भी तो मोहन को बहुत प्यार करती थी.

जिस दिन गीता की शादी थी उसी दिन मोहन ने एक सुसाइड नोट लिखा और फांसी लगा ली. ठीक उसी समय गीता ने भी एक सुसाइड नोट लिखा और जब सब लोग बरात का स्वागत करने में लगे थे उस ने खुद को फांसी लगा कर खत्म कर लिया.

प्यार की खातिर 2 परिवार दुख के समंदर में डूब गए. बस उन दोनों की जरा सी गलतफहमी की खातिर. हम मिटा देंगे खुद को प्यार की खातिर जी नहीं पाएंगे पलभर तुम से दूर रह कर. कर के सबकुछ समर्पित प्यार के लिए बिखरते हैं कितना हम टूटटूट कर. विश्वास बहुत बड़ी चीज होती है. हमें अपनों पर और खुद पर भरोसा करना चाहिए, ताकि जो उन दोनों के साथ हुआ वैसा किसी के साथ न हो. अगर प्यार करो तो निभाना भी चाहिए और बात कर के गलतफहमियों को मिटाना भी चाहिए, क्योंकि प्यार वह अहसास है जो हमें जीने की वजह देता है.

अगर इस दुनिया में प्यार नहीं तो कुछ भी नहीं. प्यार अमीरीगरीबी, ऊंचनीच, धर्म, जातपांत कुछ भी नहीं देखता. अगर किसी को एक बार प्यार हो जाए तो वह उस की खुशी की खातिर अपनी जिंदगी की भी परवाह नहीं करता. प्यार तो कभी भी कहीं भी किसी से भी हो सकता है, पर सच्चा प्यार होना और मिलना बहुत मुश्किल होता है. खुद पर और अपने प्यार पर हमेशा भरोसा बनाए रखना चाहिए, क्योंकि इस फरेबी दुनिया में सच्चा प्यार बहुत मुश्किल से मिलता है. Hindi Love Story

Hindi Kahani: दो चुटकी सिंदूर – सविता की क्या थी गलती

Hindi Kahani: ‘‘ऐ सविता, तेरा चक्कर चल रहा है न अमित के साथ?’’ कुहनी मारते हुए सविता की सहेली नीतू ने पूछा. सविता मुसकराते हुए बोली, ‘‘हां, सही है. और एक बात बताऊं… हम जल्दी ही शादी भी करने वाले हैं.’’

‘‘अमित से शादी कर के तो तू महलों की रानी बन जाएगी. अच्छा, वह सब छोड़. देख उधर, तेरा आशिक बैजू कैसे तुझे हसरत भरी नजरों से देख रहा है.’’

नीतू ने तो मजाक किया था, क्योंकि वह जानती थी कि बैजू को देखना तो क्या, सविता उस का नाम भी सुनना तक पसंद नहीं करती.

सविता चिढ़ उठी. वह कहने लगी, ‘‘तू जानती है कि बैजू मुझे जरा भी नहीं भाता. फिर भी तू क्यों मुझे उस के साथ जोड़ती रहती है?’’

‘‘अरे पगली, मैं तो मजाक कर रही थी. और तू है कि… अच्छा, अब से नहीं करूंगी… बस,’’ अपने दोनों कान पकड़ते हुए नीतू बोली.

‘‘पक्का न…’’ अपनी आंखें तरेरते हुए सविता बोली, ‘‘कहां मेरा अमित, इतना पैसे वाला और हैंडसम. और कहां यह निठल्ला बैजू.

‘‘सच कहती हूं नीतू, इसे देख कर मुझे घिन आती है. विमला चाची खटमर कर कमाती रहती हैं और यह कमकोढ़ी बैजू गांव के चौराहे पर बैठ कर पानखैनी चबाता रहता है. बोझ है यह धरती पर.’’

‘‘चुप… चुप… देख, विमला मौसी इधर ही आ रही हैं. अगर उन के कान में अपने बेटे के खिलाफ एक भी बात पड़ गई न, तो समझ ले हमारी खैर नहीं,’’ नीतू बोली.

सविता बोली, ‘‘पता है मुझे. यही वजह है कि यह बैजू निठल्ला रह गया.’’

विमला की जान अपने बेटे बैजू में ही बसती थी. दोनों मांबेटा ही एकदूसरे का सहारा थे. बैजू जब 2 साल का था, तभी उस के पिता चल बसे थे. सिलाईकढ़ाई का काम कर के किसी तरह विमला ने अपने बेटे को पालपोस कर बड़ा किया था.

विमला के लाड़प्यार में बैजू इतना आलसी और निकम्मा बनता जा रहा था कि न तो उस का पढ़ाईलिखाई में मन लगता था और न ही किसी काम में. बस, गांव के लड़कों के साथ बैठकर हंसीमजाक करने में ही उसे मजा आता था.

लेकिन बैजू अपनी मां से प्यार बहुत करता था और यही विमला के लिए काफी था. गांव के लोग बैजू के बारे में कुछ न कुछ बोल ही देते थे, जिसे सुन कर विमला आगबबूला हो जाती थी.

एक दिन विमला की एक पड़ोसन ने सिर्फ इतना ही कहा था, ‘‘अब इस उम्र में अपनी देह कितना खटाएगी विमला, बेटे को बोल कि कुछ कमाएधमाए. कल को उस की शादी होगी, फिर बच्चे भी होंगे, तो क्या जिंदगीभर तू ही उस के परिवार को संभालती रहेगी?

‘‘यह तो सोच कि अगर तेरा बेटा कुछ कमाएगाधमाएगा नहीं, तो कौन देगा उसे अपनी बेटी?’’

विमला कहने लगी, ‘‘मैं हूं अभी अपने बेटे के लिए, तुम्हें ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है… समझी. बड़ी आई मेरे बेटे के बारे में सोचने वाली. देखना, इतनी सुंदर बहू लाऊंगी उस के लिए कि तुम सब जल कर खाक हो जाओगे.’’

सविता के पिता रामकृपाल डाकिया थे. घरघर जा कर चिट्ठियां बांटना उन का काम था, पर वे अपनी दोनों बेटियों को पढ़ालिखा कर काबिल बनाना चाहते थे. उन की दोनों बेटियां थीं भी पढ़ने में होशियार, लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि उन की बड़ी बेटी सविता अमित नाम के एक लड़के से प्यार करती है और वह उस से शादी के सपने भी देखने लगी है.

यह सच था कि सविता अमित से प्यार करती थी, पर अमित उस से नहीं, बल्कि उस के जिस्म से प्यार करता था. वह अकसर यह कह कर सविता के साथ जिस्मानी संबंध बनाने की जिद करता कि जल्द ही वह अपने मांबाप से दोनों की शादी की बात करेगा.

नादान सविता ने उस की बातों में आ कर अपना तन उसे सौंप दिया. जवानी के जोश में आ कर दोनों ने यह नहीं सोचा कि इस का नतीजा कितना बुरा हो सकता है और हुआ भी, जब सविता को पता चला कि वह अमित के बच्चे की मां बनने वाली है.

जब सविता ने यह बात अमित को बताई और शादी करने को कहा, तो वह कहने लगा, ‘‘क्या मैं तुम्हें बेवकूफ दिखता हूं, जो चली आई यह बताने कि तुम्हारे पेट में मेरा बच्चा है? अरे, जब तुम मेरे साथ सो सकती हो, तो न जाने और कितनों के साथ सोती होगी. यह उन्हीं में से एक का बच्चा होगा.’’

सविता के पेट से होने का घर में पता लगते ही कुहराम मच गया. अपनी इज्जत और सविता के भविष्य की खातिर उसे शहर ले जा कर घर वालों ने बच्चा गिरवा दिया और जल्द से जल्द कोई लड़का देख कर उस की शादी करने का विचार कर लिया.

एक अच्छा लड़का मिलते ही घर वालों ने सविता की शादी तय कर दी. लेकिन ऐसी बातें कहीं छिपती हैं भला.

अभी शादी के फेरे होने बाकी थे कि लड़के के पिता ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘बंद करो… अब नहीं होगी यह शादी.’’

शादी में आए मेहमान और गांव के लोग हैरान रह गए. जब सारी बात का खुलासा हुआ, तो सारे गांव वाले सविता पर थूथू कर के वहां से चले गए.

सविता की मां तो गश खा कर गिर पड़ी थीं. रामकृपाल अपना सिर पीटते हुए कहने लगे, ‘‘अब क्या होगा… क्या मुंह दिखाएंगे हम गांव वालों को? कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा इस लड़की ने हमें. बताओ, अब कौन हाथ थामेगा इस का?’’

‘‘मैं थामूंगा सविता का हाथ,’’ अचानक किसी के मुंह से यह सुन कर रामकृपाल  अचकचा कर पीछे मुड़ कर देखा, तो बैजू अपनी मां के साथ खड़ा था.

‘‘बैजू… तुम?’’ रामकृपाल ने बड़ी हैरानी से पूछा.

विमला कहने लगी, ‘‘हां भाई साहब, आप ने सही सुना है. मैं आप की बेटी को अपने घर की बहू बनाना चाहती हूं और वह इसलिए कि मेरा बैजू आप की बेटी से प्यार करता है.’’

रामकृपाल और उन की पत्नी को चुप और सहमा हुआ देख कर विमला आगे कहने लगी, ‘‘न… न आप गांव वालों की चिंता न करो, क्योंकि मेरे लिए मेरे बेटे की खुशी सब से ऊपर है, बाकी लोग क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे, उस से मुझे कोई फर्कनहीं पड़ता है.’’

अब अंधे को क्या चाहिए दो आंखें ही न. उसी मंडप में सविता और बैजू का ब्याह हो गया.

जिस बैजू को देख कर सविता को उबकाई आती थी, उसे देखना तो क्या वह उस का नाम तक सुनना पसंद नहीं करती थी, आज वही बैजू उस की मांग का सिंदूर बन गया. सविता को तो अपनी सुहागरात एक काली रात की तरह दिख रही थी.

‘क्या मुंह दिखाऊंगी मैं अपनी सखियों को, क्या कहूंगी कि जिस बैजू को देखना तक गंवारा नहीं था मुझे, वही आज मेरा पति बन गया. नहीं… नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, इतनी बड़ी नाइंसाफी मेरे साथ नहीं हो सकती,’ सोच कर ही वह बेचैन हो गई.

तभी किसी के आने की आहट से वह उठ खड़ी हुई. अपने सामने जब उस ने बैजू को खड़ा देखा, तो उस का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

बैजू के मुंह पर अपने हाथ की चूडि़यां निकालनिकाल कर फेंकते हुए सविता कहने लगी, ‘‘तुम ने मेरी मजबूरी का फायदा उठाया है. तुम्हें क्या लगता है कि दो चुटकी सिंदूर मेरी मांग में भर देने से तुम मेरे पति बन गए? नहीं, कोई नहीं हो तुम मेरे. नहीं रहूंगी एक पल भी इस घर में तुम्हारे साथ मैं… समझ लो.’’

बैजू चुपचाप सब सुनता रहा. एक तकिया ले कर उसी कमरे के एक कोने में जा कर सो गया.

सविता ने मन ही मन फैसला किया कि सुबह होते ही वह अपने घर चली जाएगी. तभी उसे अपने मातापिता की कही बातें याद आने लगीं, ‘अगर आज बैजू न होता, तो शायद हम मर जाते, क्योंकि तुम ने तो हमें जीने लायक छोड़ा ही नहीं था. हो सके, तो अब हमें बख्श देना बेटी, क्योंकि अभी तुम्हारी छोटी बहन की भी शादी करनी है हमें…’

कहां ठिकाना था अब उस का इस घर के सिवा? कहां जाएगी वह? बस, यह सोच कर सविता ने अपने बढ़ते कदम रोक लिए.

सविता इस घर में पलपल मर रही थी. उसे अपनी ही जिंदगी नरक लगने लगी थी, लेकिन इस सब की जिम्मेदार भी तो वही थी.

कभीकभी सविता को लगता कि बैजू की पत्नी बन कर रहने से तो अच्छा है कि कहीं नदीनाले में डूब कर मर जाए, पर मरना भी तो इतना आसान नहीं होता है. मांबाप, नातेरिश्तेदार यहां तक कि सखीसहेलियां भी छूट गईं उस की. या यों कहें कि जानबूझ कर सब ने उस से नाता तोड़ लिया. बस, जिंदगी कट रही थी उस की.

सविता को उदास और सहमा हुआ देख कर हंसनेमुसकराने वाला बैजू भी उदास हो जाता था. वह सविता को खुश रखना चाहता था, पर उसे देखते ही वह ऐसे चिल्लाने लगती थी, जैसे कोई भूत देख लिया हो. इस घर में रह कर न तो वह एक बहू का फर्ज निभा रही थी और न ही पत्नी धर्म. उस ने शादी के दूसरे दिन ही अपनी मांग का सिंदूर पोंछ लिया था.

शादी हुए कई महीने बीत चुके थे, पर इतने महीनों में न तो सविता के मातापिता ने उस की कोई खैरखबर ली और न ही कभी उस से मिलने आए. क्याक्या सोच रखा था सविता ने अपने भविष्य को ले कर, पर पलभर में सब चकनाचूर हो गया था.

‘शादी के इतने महीनों के बाद भी भले ही सविता ने प्यार से मेरी तरफ एक बार भी न देखा हो, पर पत्नी तो वह मेरी ही है न. और यही बात मेरे लिए काफी है,’ यही सोचसोच कर बैजू खुश हो उठता था.

एक दिन न तो विमला घर पर थी और न ही बैजू. तभी अमित वहां आ धमका. उसे यों अचानक अपने घर आया देख सविता हैरान रह गई. वह गुस्से से तमतमाते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां आने की?’’

अमित कहने लगा, ‘‘अब इतना भी क्या गुस्सा? मैं तो यह देखने आया था कि तुम बैजू के साथ कितनी खुश हो? वैसे, तुम मुझे शाबाशी दे सकती हो. अरे, ऐसे क्या देख रही हो? सच ही तो कह रहा हूं कि आज मेरी वजह से ही तुम यहां इस घर में हो.’’

सविता हैरानी से बोली, ‘‘तुम्हारी वजह से… क्या मतलब?’’

‘‘अरे, मैं ने ही तो लड़के वालों को हमारे संबंधों के बारे में बताया था और यह भी कि तुम मेरे बच्चे की मां भी बनने वाली हो. सही नहीं किया क्या मैं ने?’’ अमित बोला.

सविता यह सुन कर हैरान रह गई. वह बोली, ‘‘तुम ने ऐसा क्यों किया? बोलो न? जानते हो, सिर्फ तुम्हारी वजह से आज मेरी जिंदगी नरक बन चुकी है. क्या बिगाड़ा था मैं ने तुम्हारा?

‘‘बड़ा याद आता है मुझे तेरा यह गोरा बदन,’’ सविता के बदन पर अपना हाथ फेरते हुए अमित कहने लगा, तो वह दूर हट गई.

अमित बोला, ‘‘सुनो, हमारे बीच जैसा पहले चल रहा था, चलने दो.’’

‘‘मतलब,’’ सविता ने पूछा.

‘‘हमारा जिस्मानी संबंध और क्या. मैं जानता हूं कि तुम मुझ से नाराज हो, पर मैं हर लड़की से शादी तो नहीं कर सकता न?’’ अमित बड़ी बेशर्मी से बोला.

‘‘मतलब, तुम्हारा संबंध कइयों के साथ रह चुका है?’’

‘‘छोड़ो वे सब पुरानी बातें. चलो, फिर से हम जिंदगी के मजे लेते हैं. वैसे भी अब तो तुम्हारी शादी हो चुकी है, इसलिए किसी को हम पर शक भी नहीं होगा,’’ कहता हुआ हद पार कर रहा था अमित.

सविता ने अमित के गाल पर एक जोर का तमाचा दे मारा और कहने लगी, ‘‘क्या तुम ने मुझे धंधे वाली समझ रखा है. माना कि मुझ से गलती हो गई तुम्हें पहचानने में, पर मैं ने तुम से प्यार किया था और तुम ने क्या किया?

‘‘अरे, तुम से अच्छा तो बैजू निकला, क्योंकि उस ने मुझे और मेरे परिवार को दुनिया की रुसवाइयों से बचाया. जाओ यहां से, निकल जाओ मेरे घर से, नहीं तो मैं पुलिस को बुलाती हूं,’’ कह कर सविता घर से बाहर जाने लगी कि तभी अमित ने उस का हाथ अपनी तरफ जोर से खींचा.

‘‘तेरी यह मजाल कि तू मुझ पर हाथ उठाए. पुलिस को बुलाएगी… अभी बताता हूं,’’ कह कर उस ने सविता को जमीन पर पटक दिया और खुद उस के ऊपर चढ़ गया.

खुद को लाचार पा कर सविता डर गई. उस ने अमित की पकड़ से खुद को छुड़ाने की पूरी कोशिश की, पर हार गई. मिन्नतें करते हुए वह कहने लगी, ‘‘मुझे छोड़ दो. ऐसा मत करो…’’

पर अमित तो अब हैवानियत पर उतारू हो चुका था. तभी अपनी पीठ पर भारीभरकम मुक्का पड़ने से वह चौंक उठा. पलट कर देखा, तो सामने बैजू खड़ा था.

‘‘तू…’’ बैजू बोला.

अमित हंसते हुए कहने लगा, ‘‘नामर्द कहीं के… चल हट.’’

इतना कह कर वह फिर सविता की तरफ लपका. इस बार बैजू ने उस के मुंह पर एक ऐसा जोर का मुक्का मारा कि उस का होंठ फट गया और खून निकल आया.

अपने बहते खून को देख अमित तमतमा गया और बोला, ‘‘तेरी इतनी मजाल कि तू मुझे मारे,’’ कह कर उस ने अपनी पिस्तौल निकाल ली और तान दी सविता पर.

अमित बोला, ‘‘आज तो इस के साथ मैं ही अपनी रातें रंगीन करूंगा.’’

पिस्तौल देख कर सविता की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

बैजू भी दंग रह गया. वह कुछ देर रुका, फिर फुरती से यह कह कह अमित की तरफ लपका, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत कि तू मेरी पत्नी पर गोली चलाए…’’पर तब तक तो गोली पिस्तौल से निकल चुकी थी, जो बैजू के पेट में जा लगी.

बैजू के घर लड़ाईझगड़ा होते देख कर शायद किसी ने पुलिस को बुला लिया था. अमित वहां से भागता, उस से पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया.खून से लथपथ बैजू को तुरंत गांव वालों ने अस्पताल पहुंचाया. घंटों आपरेशन चला.

डाक्टर ने कहा, ‘‘गोली तो निकाल दी गई है, लेकिन जब तक मरीज को होश नहीं आ जाता, कुछ कहा नहीं जा सकता.’’

विमला का रोरो कर बुरा हाल था. गांव की औरतें उसे हिम्मत दे रही थीं, पर वे यह भी बोलने से नहीं चूक रही थीं कि बैजू की इस हालत की जिम्मेदार सविता है.

‘सच ही तो कह रहे हैं सब. बैजू की इस हालत की जिम्मेदार सिर्फ मैं ही हूं. जिस बैजू से मैं हमेशा नफरत करती रही, आज उसी ने अपनी जान पर खेल कर मेरी जान बचाई,’ अपने मन में ही बातें कर रही थी सविता.

तभी नर्स ने आ कर बताया कि बैजू को होश आ गया है. बैजू के पास जाते देख विमला ने सविता का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी, ‘‘नहीं, तुम अंदर नहीं जाओगी. आज तुम्हारी वजह से ही मेरा बेटा यहां पड़ा है. तू मेरे बेटे के लिए काला साया है. गलती हो गई मुझ से, जो मैं ने तुझे अपने बेटे के लिए चुना…’’

‘‘आप सविता हैं न?’’ तभी नर्स ने आ कर पूछा.डबडबाई आंखों से वह बोली, ‘‘जी, मैं ही हूं.’’

‘‘अंदर जाइए, मरीज आप को पूछ रहे हैं.’’

नर्स के कहने से सविता चली तो गई, पर सास विमला के डर से वह दूर खड़ी बैजू को देखने लगी. उस की ऐसी हालत देख वह रो पड़ी. बैजू की नजरें, जो कब से सविता को ही ढूंढ़ रही थीं, देखते ही इशारों से उसे अपने पास बुलाया और धीरे से बोला, ‘‘कैसी हो सविता?’’

अपने आंसू पोंछते हुए सविता कह लगी, ‘‘क्यों तुम ने मेरी खातिर खुद को जोखिम में डाला बैजू? मर जाने दिया होता मुझे. बोलो न, किस लिए मुझे बचाया?’’ कह कर वह वहां से जाने को पलटी ही थी कि बैजू ने उस का हाथ पकड़ लिया और बड़े गौर से उस की मांग में लगे सिंदूर को देखने लगा.

‘‘हां बैजू, यह सिंदूर मैं ने तुम्हारे ही नाम का लगाया है. आज से मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी हूं,’’ कह कर वह बैजू से लिपट गई. Hindi Kahani

Story In Hindi: सुलेखा की होली – देवर भाभी का अनोखा मजाक

Story In Hindi: सुलेखा की हाल ही में शादी हुई थी. होली के मौके पर वह पहली बार अपनी ससुराल में थी. होली को ले कर उस के मन में बहुत उमंगें थीं. वैसे तो वह गांव की रहने वाली थी, मगर शादी से पहले वह बहुत दिनों तक शहर में भी रह चुकी थी.

होली के दिन सुबह से ही पूरा गांव होली के रंग में डूबा हुआ था. होली के रंग में प्यार का रंग मिला कर सुलेखा भी अपने पति दिनेश के साथ होली खेलने लगी.

दिनेश ने सुलेखा को रंगों से सराबोर कर दिया. नीलेपीले रंगों में लिपीपुती सुलेखा बंदरिया लग रही थी. इस तरह हंसीठिठोली के बीच दोनों ने होली मनाई.

‘‘मैं अपने दोस्तों के साथ होली खेलने जा रहा हूं. अगर मैं उन के साथ नहीं गया, तो वे मुझे जोरू का गुलाम कहेंगे. थोड़ी देर बाद आऊंगा,’’ यह कह कर दिनेश घर से निकल गया.

सुलेखा मुसकराते हुए पति को जाते हुए देखती रही. दरवाजा बंद कर के वह जैसे ही मुड़ी, तभी उस की नजर एक कोने में चुपचाप खड़े अपने देवर महेश पर पड़ी.

‘‘क्यों देवरजी, तुम इतनी दूर क्यों खड़े हो? क्या मुझ से होली खेलने से डरते हो? आओ मेरे पास और खेलो मुझ से होली…’’

‘‘तुम तो पहले से ही रंगों से लिपीपुती हो भाभी. इस पर मेरा रंग कहां चढ़ेगा…’’ महेश शरारत से बोला.

‘‘क्यों नहीं चढ़ेगा. क्या तुम्हारे मन में कोई ‘चोर’ है…’’ सुलेखा मुसकराते हुए बोली.

‘‘नहीं तो…’’ इतना कह कर महेश झेंप गया.

‘‘तो फिर होली खेलो. देवर से होली खेलने के लिए मैं बेकरार हूं…’’ कह कर सुलेखा ने महेश को रंग लगा दिया और फिर खिलखिलाते हुए बोली, ‘‘तुम तो बंदर लग रहे हो देवरजी.’’

महेश ने भी ‘होली है…’ कह कर सुलेखा के गालों पर गुलाल मल दिया.

भाभी से होली खेल कर महेश खुश हो गया. होली की खुशियां लूटने के बाद सुलेखा घर के कामों में जुट गई.

थोड़ी देर बाद ही दिनेश अपने दोस्तों के साथ लौट आया और उन्हें आंगन में बैठा कर सुलेखा से बोला, ‘‘मेरे दोस्त तुम से होली खेलने आए हैं. तुम उन के साथ होली खेल लो.’’

‘‘मैं उन के साथ होली नहीं खेलूंगी.’’

‘‘कैसी बातें करती हो? वे मेरे दोस्त हैं. थोड़ा सा रंग डालेंगे और चले जाएंगे. अगर तुम नहीं जाओगी, तो वे बुरा मान जाएंगे.’’

‘‘अच्छा, ठीक है…’’ सुलेखा उठ कर आंगन में चली आई.

दिनेश के दोस्त नईनवेली खूबसूरत भाभी से होली खेलने के एहसास से ही रोमांचित हो रहे थे.

सुलेखा को देखते ही उन की आंखों में चमक आ गई. वे नशे में तो थे ही, उन्होंने आव देखा न ताव, सुलेखा पर टूट पड़े. कोई उस के गालों पर रंग मलने लगा, तो कोई चोली भिगोने लगा. कोई तो रंग लगाने के बहाने उस का बदन सहलाने लगा.

दिनेश कोने में खड़ा हो कर यह तमाशा देख रहा था. उसे यह सब अच्छा तो नहीं लग रहा था, मगर वह दोस्तों को क्या कह कर मना करता. वह भी तो उन सब की बीवियों के साथ ऐसी ही होली खेल कर आ रहा था.

‘‘हटो, दूर हटो… रंग डालना है, तो दूर से डालो…’’ तभी सुलेखा उन्हें परे करते हुए दहाड़ कर बोली, ‘‘अरे, देवर तो भाई जैसे होते हैं. क्या वे भाभी के साथ इस तरह से होली खेलते हैं? कैसे इनसान हो तुम लोग? क्या तुम्हारे गांव में ऐसी ही होली खेली जाती है? अगर कोई लाजशर्म नहीं है, तो मैं नंगी हो जाती हूं, फिर जितना चाहे, मेरे बदन से होली खेल लेना…’’

सुलेखा के तेवर देख कर सभी पीछे हट गए. किसी अपराधी की तरह उन सब के सिर शर्म से झुक गए. किसी में भी सुलेखा से आंख मिलाने की हिम्मत न थी. उन का सारा नशा काफूर हो चुका था.

थोड़ी देर में सारे दोस्त अपना सा मुंह ले कर चुपचाप चले गए. बीवी के इस रूप को दिनेश हैरानी से देखता रह गया.

 

‘‘यह क्या किया तुम ने…’’ दोस्तों के जाते ही दिनेश बोला.

‘‘मैं ने उन्हें होली का पाठ पढ़ाया और बिलकुल ठीक किया. आप भी अजीब आदमी हैं. दोस्तों की इतनी परवाह है, लेकिन मेरी नहीं…’’ सुलेखा ने कहा.

‘‘ऐसा क्यों कहती हो. मैं तो तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’

‘‘क्या यही है आप का प्यार… कोई आप की आंखों के सामने आप की बीवी के साथ छेड़खानी करे और आप चुपचाप खड़े हो कर तमाशा देखते रहें. कैसे पति हैं आप…

‘‘अब खड़ेखड़े मेरा मुंह क्या देख रहे हैं. जल्दी से 2 बालटी पानी लाइए, मैं नहाऊंगी.’’

दिनेश ने चुपचाप पानी ला कर रख दिया और सुलेखा कपड़े ले कर बाथरूम में घुस गई.

दरवाजा बंद करने से पहले जब सुलेखा ने दिनेश की तरफ मुसकरा कर देखा तो बीवी की इस अदा पर वह ठगा सा रह गया.

‘‘अंगअंग धो लूं जरा मलमल के बाण चलाऊंगी नैनन के… हर अंग का रंग निखार लूं कि सजना है मुझे सजना के लिए…’’ बाथरूम में नहाते हुए सुलेखा मस्ती में गुनगुनाने लगी.

बाहर खड़े दिनेश को अपनी बीवी पर नाज हो रहा था. Story In Hindi

Hindi Story: पहली मुलाकात

Hindi Story:  मैं ने उसे बचपन में देखा था. तभी से उस की तसवीर मेरे जेहन में छप गई थी. फिर लगा कि इस खूबसूरत लड़की से दोबारा मुलाकात होगी भी या नहीं. इस बीच मेरी शादी पक्की हो गई, पर मैं उसे भूल नहीं पाया था

कु मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो जिंदगी को एक कसक दे जाती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी को एक मिठास, जिंदगी को एक खूबसूरत, सुखद, सुनहरे रंग से रंग देती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी के लिए एक सुखद अहसास बन कर रह जाती हैं. कुछ मुलाकातें कभी नहीं भूलने के लिए होती हैं, जैसे उस की और मेरी मुलाकात जिंदगी में एक अजीब सी हलचल, एक चमक तो लाई थी, जिसे हम चाह कर भी यादों से नहीं दूर कर सके, फिर भी किसी से कह नहीं सकते थे, ऐसे भी हालात बन कर रह गए थे. अचानक हमारी मुलाकात फिर से दोबारा होगी, यह सोचा भी नहीं था हम ने. हो सकता है, उस केमन में मिलन दोबारा हो’, ऐसा कुछ रहा हो.

चिलचिलाती, आग उगलती जेठ महीने की दोपहरी हमारे किशोरावस्था से ले कर जवानी की ओर जाते रास्ते के समय हुआ करती थी. गांव में तब बिजली नहीं हुआ करती थी. तब बूढ़े बरगद की छाया में ठंडापन रहा करता था. बड़ेबुजुर्ग कोई चौपड़, कोई ताश खेलते हुए दोपहर वहीं बिताया करते थे.
उस बूढ़े बरगद के बगल में ही हमारा आम का बगीचा था, जो अभी भी है. जेठ महीने की तपिश आग उगलती है यह तो आप सभी जानते हैं. जवानी बड़ी अलबेली होती है, आप यह भी जानते हैं, क्योंकि इस मंजर से सभी गुजरते हैं. किशोरावस्था से जवानी की ओर बढ़ते कदम कब लड़खड़ा जाएं, कोई नहीं जानता. इस उम्र में जो संभल गया, वह पूरे जीवन संभल कर सुखमय जीवन बिताता है और जो लड़खड़ा गया, गिर गया, वह फिर संभल नहीं पाता, अपनी पूरी जिंदगी नरक जैसी बना डालता है.

हमारे ऊपर उन बुजुर्गों का साया था, जिसे मातापिता, दादीदादा कहते हैं. गांव के बड़ेबुजुर्गों का उपदेश भी हम उस बूढ़े बरगद के नीचे ध्यान से सुना करते थे. हम हमेशा पिता से डर कर कभी रास्ते से भटके नहीं थे. तब साइकिल या पैदल चल कर नातेरिश्तेदारों के यहां लोग आयाजाया करते थे. आम, जो आगे पकना शुरू करते थे, वे आधे जेठ से अपने रंग बदलने शुरू कर दिया करते थे. हम अपने हमजोली के साथ सुबहशाम बगीचे में, दोपहर बुजुर्गों के संरक्षण में बूढ़े बरगद के नीचे ही रहते थे. हम एक अनुशासन में रहते थे. वैसे भी स्कूल में जेठ के महीने में एक महीने की छुट्टी रहती थी. स्कूल में मास्टर पिता से भी ज्यादा खयाल रखते थे, खासकर पढ़ने वाले बालकबालिकाओं को, जो उन को सम्मान देते थे, उन का तो वे बहुत ही ध्यान रखते थे.

एक दिन एक अधेड़ महिला, एक पुरुष के साथ आईं, साथ में उन के साथ एक किशोरी थी, जो जवानी की दहलीज पर पांव रखने ही वाली थी, ठीक हमारी ही तरह. वह हम से वही सालछह महीने छोटी रही होगी.
हमारे बगीचे में कर वे लोग सुस्ताने लगे थे. आकर्षण स्वाभाविक था, खासकर उस ओर जिस ओर एक सुंदरता का खजाना लिए, सुंदरता की मूर्ति सी, अल्हड़ रूपवती कन्या सामने हो. मैं भी कुछ कम नहीं था. गबरू जवान, किशोरावस्था से जवानी की दहलीज की ओर बस दो कदम में ही पहुंचने वाला था. शायद कनखियों से निहार रही होती वह बाला भी आकर्षित थी. मानमर्यादा में बंधी, बालिका शर्मीली लगी, जिस के ?ाले बड़े दांतों से थोड़ी सी मुसकराहट से बिजली सी कौंध जाती थी.

उस के दांत मोती की तरह सफेद ऐसे लगते थे जैसे किसी कुशल कारीगर ने उसे उस के मुंह में तराश कर फिट कर दिए हों. उस के होंठों की लालिमा पके हुए कुंदरू की तरह लाल थी. वह शर्मीले स्वभाव की लगती थी. जब वह किसी बात पर शरमाती, तो उस के लाललाल गाल इतने लाल, सुरमई हो जाते थे, जैसे रति के गालों में उस के प्रेमी पति कामदेव ने केसर मल दिया हो. उस के गालों की सुंदरता ऐसी थी, जैसे फगुआ खेलते समय लाल गुलाब उस के गालों में मल दिया गया हो. उस की उठी हुई नाक से मेरी आंखें हटने का नाम नहीं ले रही थीं. मैं भी मर्यादा में रह कर ही उसे देख कर हैरान था कि क्यों उसे देख कर मन ही नहीं भरता है. सहसा उस ने तिरछी नजरों से मु? देखा, हालांकि वह बड़ी चतुराई से सब की नजरें बचा कर मेरी ओर देख रही थी, फिर भी मेरी और उस की आंखें चार हो गई थीं.

अरे वाह, क्या गजब की आंखों में सागर सी गहराई थी. मेरे गोलखा आम की सी फांकें थीं उस की आंखें, गजब का आकर्षण. ऐसा तीर उस की कजरारी, बड़ीबड़ी आंखों से निकला, जो सीधे मेरे दिल के अंदर एक अमिट घाव करता चला गया था. उस के बालों में बंधी चोटी उस के उठे हुए कूल्हों को बारबार सहलाती सी लग रही थी. कोई साज, कोई सिंगार फिर भी गजब का आकर्षण, कुदरती खूबसूरती जो सीधे मेरे दिल में उतरती चली गई थी. उस के अभी हाल के ही उठे लगते कठोर उभार किसी को भी भटका सकते थे. मेरा मन उस से बात करने का होता था. उस के पिता मेरे पिताजी से बात कर रहे थे, पर मैं उस बातचीत को सुनने की कोशिश में नहीं था. मैं तो किसी बहाने, किसी तरह से उस से बात करने के लिए उतावला था.

तभी उस की मां ने मु? से कहा, ‘‘दादू, आम तो तुम्हारे फले हैं, पकते तो अभी नहीं होंगे.’’ मैं ने ?ाटपट कहा, ‘‘आइए, जरा देखते हैं. हमारे दारानगर में शायद पके मीठेमीठे आम मिल जाएं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते जाइएगा आप, अचार रखने के लिए.’’ उस की मां ने कहा, ‘‘नहीं बेटा, हम लोग रामपुर से निमंत्रण कर के आए हैं, थके हुए हैं कौन लाद कर ले जाएगा. हम वैसे भी 3 दिन से ढंग से सो तक नहीं पाए हैं.’’ मैं ने ?ाट से कहा, ‘‘मांजी, आप चलिए . आज हमारे घर में रह कर फिर कल चले जाना. अभी वैसे भी 10 किलोमीटर बाद सड़क मिलेगी आप को.’’ उस की मां ने ?ाटपट मेरे गालों पर प्यार से हाथ फेरा, जैसे मेरी अम्मां फेरा करती थीं. मु? बहुत अच्छा लगा, अपनेपन सा महसूस हुआ.

उस की मां ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘फिर कभी आऊंगी तो जरूर चलूंगी, सालों से तुम्हारी अम्मां से नहीं मिली हूं, जब तुम छोटे से थे, तब से. बहुत दिन हुए घर से निकले हुए, इस के दादादादी परेशान होंगे.
4 दिन बाद फिर मेरे मायके में शादी है, वहां भी जाना जरूरी है. गरमी में ही शादीब्याह में घूम लेते हैं वरना सालभर घर से कहां निकलना होता है.’’ मु? आभास हो रहा था कि ये लोग मेरे अम्माबापू के करीबी हैं. मैं सोच ही रहा था कि उस के पिता ने कहा, ‘‘चली जाओ, बिटिया को भी दिखा दो. इसे तो पके आम बहुत पसंद हैं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते चलेंगे. देखो बेटा, अपने बाप की तरह से नहीं बांध देना, अब बो? लादने का माद्दा नहीं रहा.’’ मैं सोच रहा था शायद उस का नाम लेंगे जिस से नाम जानने का मौका मिलेगा, जो नहीं मिला था. तो क्या हुआ, मेरे मन की मुराद पूरी हो गई थी.


मैं उन को लिवा कर अपने दारानगर नाम वाले आम के पेड़ के पास गया. वहां कुछ अधपके, तोता के काटने से गिरे आम पड़े थे. उसे उस की मां ने आम उठा कर दिया था. उस ने हंसते हुए पूछा था, ‘‘मम्मी, इस आम को दारानगर क्यों कहते हैं?’’ मैं ने हंसते हुए उस को बताया था, क्योंकि उस के बोलते हुए ऐसा लग रहा था जैसे शब्दों में शहद घुला हो. कितनी मीठी, प्यारी जबान है इस की. काश, इस का साथ जीवनभर के लिए हो सकता. यह सोचते हुए मैं ने कहा, ‘‘असल में मेरे दादाजी दारानगर नाम की जगह पर गए थे, जहां से इस आम का फल ले कर आए थे. यहां लगा कर, इस का नाम याद के लिए दारानगर रख दिया था, इसलिए इस का नाम दारानगर पूरा गांव जानता है.’’ वह आम खाते समय बहुत ही अच्छी, सुंदर लग रही थी. मेरा मन करता था कि उस से दोस्ती करूं. कुछ बोलूं, बतियाऊं. मैं अपने संकोची स्वभाव, संस्कारवश कुछ भी नहीं कह पाया था.

मैं ने उन के लिए अच्छेअच्छे आम तोड़ दिए थे. दिल तो कहता था कि समय यहीं ठहर जाए, बस यों ही वह मेरे करीब रहे. समय से मैं क्या सभी हारे हैं, समय ही हमारे बचपन को छीन कर भाग लिया था, अब हम क्याक्या सोचने वाली उम्र में कर, कितनी ऊंचाई पर उड़ने की सोच रहे हैं. अगर अम्मांबापू, दादादादी, गांव के बड़ेबुजुर्ग नहीं होते, तो हम किस दिशा में होते, पता नहीं. तभी उस की अम्मां कर मेरे सिर पर हाथ रख कर बालों को सहलाने लगी थीं. मैं चुपचाप खड़ा था. कहना तो बहुत चाहता था, पर कह नहीं पा रहा था. तभी उस की अम्मां ने प्यार से कहा, ‘‘बेटा, अच्छे से पढ़ाईलिखाई करना, अब हम चलेंगे, नहीं तो घर पहुंचने में रात हो जाएगी.’’ बिना कुछ कहे किसी मशीन सा मैं उन के पीछेपीछे चल दिया था. मैं ने देखा, मेरे बापू उस के बापू के साथ घुलमिल कर बातें कर रहे थे.

उन के पास पहुंच कर उस चंचल, चंद्रमुखी ने अपने बापू से कहा था, ‘‘बापू, अम्मां कहती हैं अब चलेंदेर करेंगे तो रात हो जाएगी.’’ कितनी प्यारी, कोयल सी मीठी बातें जो मेरे दिल में सीधे उतरती चली गई थीं. मैं चुपचाप खड़ा रहा. ऐसा लगता था, काश वह कुछ देर रुक जाती. mवे लोग मेरे बापू के पैर छू कर फिर चल दिए थे. मैं ने बिना पिता की आज्ञा के उन के पैर नहीं छुए थे, जबकि मन श्रद्धा से भरा हुआ था. वे तीनों जा रहे थे. मैं एक अचल मूर्ति बन कर खड़ा उन को जाते देख रहा था. बापू थोड़ी देर में वहां से घर की ओर चले गए थे, यह कहते हुए, ‘‘कुछ देर रुक कर चले आना, रात नहीं करना.’’ मैं उन को देखते हुए वहीं खड़ा था. बहुत दूर जाने के बाद उस लड़की ने मुड़ कर देखा था. उस के चेहरे के भाव क्या थे, दूर हो जाने की वजह से सम? पाना मुश्किल था. हां, उस का मुड़ कर देखना यह तो कह ही रहा था कि उसे भी कुछकुछ हुआ था.

उन के जाने के बाद ऐसा कोई दिन, ऐसी कोई रात नहीं होती थी, जो वह याद नहीं आती थी.
3 साल में मेरी पढ़ाई पूरी हो गई थी. सरकारी नौकरी बापू ने मु? नहीं करने दी. उन का कहना था कि एक लड़का है, हम महीने में मजदूरों को बहुत मजदूरी देते हैं. कहीं नहीं जाना यहीं हमारे पास, हमारे साथ रहना है. मेरी शादी बापू ने पक्की कर दी थी. अम्मांबापू आपस में बतियाते थे. मेरी हिम्मत कहां कि पूछ सकता. हां, खुशी मु? भी थी, फिर भी एक कांटा, एक टीस दिल में चुभ रही थी कि काश, वह मेरी पत्नी होती. समय आया, शादी हुई, फेरे हुए. मैं ने उसे देखा उस ने मु? देखा. हां, कन्यादान देने वाले अंकल ऐसे लग रहे थे, जैसे इन को कहीं देखा था. सुहागरात थी, सेज सजी थी, पर अब की तरह नहीं, वही साधारण नए गद्दारजाई में. वह वहां पहले से मौजूद थी. मैं अंदर गया, कच्चे मकान में लकड़ी के दरवाजे थे, लकड़ी का हटका बंद कर दिया था मैं ने.

दिल धकधक कर रहा था. मैं ने हिम्मत जुटाई, उस के विरोध के बावजूद मैं ने घूंघट हटाया.
मैं अपने सामने उसे देखते ही बल्लियों उछलने लगा था. यह तो शायद वही थी. उस ने धीरे से मुसकरा
कर धीमी, मीठी सी आवाज में कहा, ‘‘क्या हुआ?’’ मैं जैसे सोते से जाग गया, मन की मुराद पा गया था. मैं ने कहा, ‘‘तुम…’’ उस ने कहा, ‘‘हां, मैंआप नहीं चाहते थे क्या? मेरे अम्मांबापू ने शायद आप को उसी दिन पसंद कर लिया था. उन की बात भी हो गई थी. मैं ने भी तो शादी के समय चुपके से देखा, तो…’’
‘‘तो क्या, जरा बताओमैं तो उसी दिन से सोचता था कि तुम ही मेरी पत्नी बनो,’’ मैं ने अपनी बांहों में उसे समेटते हुए कहा था. वह शरमा गई थी. उस ने एक अटल विश्वास के साथ अपनेआप को मेरे हवाले कर दिया था. हम ठीक उसी समय से दो जिस्म एक जान हो गए थे.

हमारे सम? में गया था कि अम्मांबापू जो भी करते हैं, बहुत अच्छा करते हैं. मातापिता सदा अपने बच्चों की खुशी, बच्चों की भलाई करते हैं. अपने बच्चों के लिए ही पूरी जिंदगी लगा देते हैं. वह पहली मुलाकात, जिंदगीभर का साथ बन जाएगी मु? तो उम्मीद नहीं थी. अम्मांबापू ने जो सौगात दी थी, वह शब्दों में नहीं लिखी जा सकती, शब्दों में नहीं कही जा सकती. वह पहली मुलाकात हमारे जीतेजागते, चलतेफिरते, बोलतेडांटते जैसे कोई वरदान थी.             

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