⚲

छोटे शहर की लड़की : जब पूजा ने दी दस्तक- भाग 1

‘‘हां, मैं ठीक हूं,’’ उस के गले से फंसी हुई सी सांस निकली. वह कुरसी से उठ कर खड़ा हो गया और बिना आदत के तन कर बोला, ‘‘तुम आराम से बैठ कर बात करो. मेरे ऊपर क्यों चढ़ी आ रही हो.’’ ‘‘ओह, माफ करना, वीनू, मेरी आदत कुछ खराब है. मैं जब तक किसी से सट कर बात नहीं करती, मुझे बातचीत में अपनापन नहीं लगता. खैर, तुम चिंता मत करो. एक दिन तुम्हें भी मुझ से सट कर बात करने की आदत हो जाएगी,’’ और वह मुसकराते हुए दीप्ति की तरफ देखने लगी. पूजा के चेहरे पर शर्मोहया का कोई नामोनिशान नहीं था. विनोद को वह बड़ी निर्लज्ज लड़की लगी.

‘‘अच्छा, क्या तुम मुझे पढ़ा दिया करोगे. दीप्ति ने मुझे बताया कि तुम पढ़ने में बहुत अच्छे हो,’’ उस ने बात बदली. ‘‘मेरे पास समय नहीं है,’’ उस ने किसी तरह कहा.

‘‘तुम्हें मेरे घर आने की जरूरत नहीं है. मैं स्वयं तुम्हारे पास आ कर पढ़ लिया करूंगी. प्लीज, तुम मेरी थोड़ी सी मदद कर दोगे तो…’’ फिर उस ने बात को अधूरा छोड़ दिया. वह पूजा की बातों का अर्थ नहीं समझ पाया. ‘क्या वह पढ़ने में कमजोर थी. अगर हां, तो अभी तक उसे यह खयाल क्यों नहीं आया. कोई दूसरी बात होगी,‘ उस ने सोचा. उस ने कहीं पढ़ा था कि अगर किसी लड़की का किसी लड़के पर दिल आ जाता है तो वह बहाने बना कर उस लड़के से मिलती है. क्या पूजा भी… उस के दिमाग में एक धमाका सा हुआ. उस का दिल और दिमाग दोनों बौखला गए थे. वह पूजा की किसी बात का ठीक से जवाब नहीं दे पाया, न उस की किसी बात का अर्थ समझ में आया और फिर दोनों लड़कियां उसे विचारों के सागर में डूबता हुआ छोड़ कर चली गईं.

उस दिन भले ही वह पूजा की बातों का अर्थ नहीं समझ पाया था, लेकिन उस की बातों का अर्थ समझने में उसे ज्यादा समय नहीं लगा. अब पूजा नियमित रूप से उस के घर आती. वह समझ गया था कि पूजा के मन में क्या है और वह उस से क्या चाहती है.

आमनेसामने पड़ने और रोजरोज बातें करने से विनोद के मन का संकोच भी बहुत जल्दी खत्म हो गया. वह पूजा से खुल कर बातें करने लगा, लेकिन अभी भी उस की बातें कम ही होती थीं और ऐसा लगता था जैसे पूजा उस के मुंह से बातें उगलवा रही हो.

फिर उन के मन भी मिल गए. पूजा और विनोद के रास्ते अब मिल कर एक हो गए थे. वे लगभग एक ही समय पर घर से कालेज के लिए निकलते और थोड़ा आगे चल कर उन का रास्ता एक हो जाता. कालेज से वापस आते समय वे शहर के बाहर जाने वाली सड़क से हो कर खेतों के बीच से होते हुए अपने घर लौटते. वे शहर के बाहर नई बस्ती में रहते थे, जिस के पीछे दूरदूर तक खेत ही खेत थे. उन दिनों बरसात का मौसम था और खेतों में मकई की फसल लहलहा रही थी. दूरदूर जहां तक दृष्टि जाती, हरियाली का साम्राज्य दिखता. खेतों में मकई के पौधे काफी ऊंचे और बड़े हो गए थे, आदमी के कद को छूते हुए, उन में हरेपीले भुट्टे लग गए थे और उन भुट्टों में दाने भी आ गए थे. पहले भुट्टों में छोटे शिशु की भांति दूध के दांत जैसे दाने आए थे. हाथ से दबाने पर पच्च से उन का दूध बाहर आ जाता था. धीरेधीरे दाने थोड़ा बड़े हो कर कड़े होते गए और उन में पीलापन आता गया. जब भुट्टे पूरी तरह पक गए तो किसी नवयुवती के मोती जैसे चमकते दांतों की तरह चमकीले और सुडौल हो गए.

दिन धुलेधुले से थे और प्रकृति की छटा देख कर ऐसा लगता था जैसे अभीअभी किसी युवती ने अपना घूंघट उठाया हो और उस ने देखने वाले को अपनी सुंदरता से भावविभोर कर दिया हो. इसी तरह सावन के महीने में नवयुवतियां भी किसी के प्रेम रस में विभोर हो कर बारिश की बूंदों में भीगते हुए भुट्टों की तरह हंसतीमुसकराती हैं, खिलखिलाती हैं और अल्हड़ हवाओं के साथ अठखेलियां करती हुई, झूलों में पींगें बढ़ाती हुई अपने प्रेमी का इंतजार करती हैं.

पूजा पर भी सावन की छटा ने अपना रंग बिखेरा था, वह भी बारिश की बूंदों से भीग कर अपने में सिमटी थी. कजरी के गीतों ने उस के मन में भी मधुर संगीत की धुनों के विभिन्न राग छेड़े थे. अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलते हुए, दबे होंठों से गीत गाते हुए उस ने भी अपने प्रिय साजन को बुलाने की टेर लगाई थी. उस की टेर पर उस का साजन तो उस से मिलने नहीं आया था, परंतु वह लोकलाज का भय त्याग कर स्वयं उस से मिलने के लिए उस के घर आ गई थी और आज दोनों साथसाथ घूम रहे थे.

मौसम ने उन दोनों के जीवन में प्यार के बहुत सारे रंग बिखेर दिए थे. दोनों के बीच प्यार की कली पनप गई थी. पूजा पहले से ही विनोद से प्यार करती थी. अब विनोद को भी पूजा के प्यार में रंगने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. पूजा की चंचलता ने विनोद को चंद दिनों में ही उस का दीवाना बना दिया. हालांकि दोनों के स्वभाव में बड़ा अंतर था. पूजा मुखर, वाचाल और चंचल थी तो विनोद मृदुभाषी, संकोची और लड़कियों से डर कर रहने वाला लड़का. पूजा के साथ रहते हुए वह सदा चौकन्ना रहता था कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा. पूजा लड़कों की तरह निर्भीक थी तो विनोद लड़कियों की तरह लज्जाशील. वह एक कैदी की तरह पूजा के पीछेपीछे चलता रहता.

खेतों के बीच से होते हुए वह कच्ची सड़क के किनारे किसी पेड़ की छाया के नीचे थोड़ी देर बैठ कर सुस्ताते, प्यार भरी बातें करते और मकई के खेतों के किनारे से होते हुए एक रखवाले की नजर बचा कर कभी 2 भुट्टे चुपके से तोड़ लेते तो कभी उन से विनययाचना कर के मांग लेते थे. खेतों की रखवाली करने वाली ज्यादातर लड़कियां होती थीं, ऐसी लड़कियां जो दिल की बहुत अच्छी होती थीं और जवानी के सपने देखने की उन की उम्र हो चुकी थी.

उन के मन में प्यार के फूल खिलने लगे थे और वे पूजा और विनोद को देख कर मंदमंद मुसकराती हुईं अपने दुपट्टे का छोर दांतों तले दबा लेती थीं. वे न केवल अपने हाथों से पके भुट्टे तोड़ कर उन्हें देतीं, बल्कि कभीकभी मचान के नीचे जलने वाली आग में उन्हें पका भी देती थीं, तब दोनों मचान के ऊपर बैठ कर मकई के खेतों के ऊपर उड़ने वाले परिंदों को देखा करते थे और बैठे परिंदों को उड़ाने का बचकाना प्रयास करते, जिसे देख कर खेत की रखवाली करने वाली लड़कियां भी खुल कर हंसतीं और उन्हें परिंदों को उड़ाने का तरीका बतातीं. प्यार भरे मौसम का एक साल बीत गया.

उन के इम्तहान खत्म हो गए. अब वह दोनों घरों में कैद हो कर रह गए थे, परंतु पूजा अपने घर में रुकने वाली कहां थी. उस ने दीप्ति से दोस्ती गांठ ली थी और उस से मिलने के बहाने लगभग रोज ही विनोद के घर पर डेरा जमा कर बैठने लगी. विनोद के मातापिता को इस में कोई एतराज नहीं था क्योंकि वह दीप्ति के पास आती थी और उसी के साथ विनोद के कमरे में जाती थी. दीप्ति भी उन के प्यार को समझ गई थी और उसे दोनों के बीच पनपते प्यार से कोई एतराज नहीं था. उसे पूजा बहुत अच्छी लगती थी क्योंकि वह बहुत प्यारीप्यारी बातें करती थी और पूजा दीप्ति को अपनी छोटी बहन की तरह प्यार देती थी.

परीक्षा परिणाम घोषित होते ही विनोद के घर में एक धमाका हो गया. उस के पिताजी ने उसे दिल्ली जाने का फरमान जारी कर दिया. उस के भविष्य का निर्णय करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘विनोद, बीए में तुम्हारे अंक काफी अच्छे हैं और मैं चाहता हूं कि दिल्ली जा कर तुम किसी कालेज में एमए में दाखिला ले लो और वहीं रह कर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करो. तुम्हें आईएएस या आईपीएस बन कर दिखाना है,’’ उस के पिता ने अपना अंतिम निर्णय सुना दिया था. मां ने भी उस के पिता के निर्णय का समर्थन किया, लेकिन पूजा को यह पसंद नहीं आया. ‘‘तुम यहां रह कर भी तो सिविल सर्विसेज की तैयारी कर सकते हो. यहां भी तो अच्छे कालेज हैं, विश्वविद्यालय है,’’ उस ने तुनकते हुए विनोद से कहा.

‘‘देखो पूजा, पहली बात तो यह है कि मैं पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता और फिर दिल्ली में अच्छे कोचिंग संस्थान हैं. वहां ऐसे कालेज हैं जहां विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ही तैयारी करने के लिए पढ़ते हैं. मेरी

भी तमन्ना है कि मैं अपने पिताजी की आकांक्षाओं को पूरा करूं.’’ ‘‘मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी?’’ पूजा ने एक छोटे बच्चे की तरह मचलते हुए कहा.

‘‘रह लोगी, समय सबकुछ सिखा देता है और मैं कोई सदा के लिए थोड़े ही जा रहा हूं. छुट्टियों में तो आता ही रहूंगा.’’ ‘‘मुझे इस बात का डर नहीं है कि तुम सदा के लिए जा रहे हो. मुझे डर इस बात का है कि दिल्ली जबलपुर के मुकाबले एक बड़ा शहर है. वहां ज्यादा खुलापन है. वहां की लड़कियां अधिक आधुनिक हैं और वह लड़कों के साथ बहुत खुल कर मिलतीजुलती हैं. साथसाथ पढ़ते हुए पता नहीं कौन सी परी तुम्हें अपना बना ले,’’ उस के स्वर में उदासी झलक रही थी. ‘‘हर लड़की तुम्हारी तरह तो नहीं होती,’’ उस ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘हां, सच, पर तुम अब इतने भोंदू और संकोची भी नहीं रहे. क्या पता, तुम्हें ही कोई लड़की पसंद आ जाए और तुम उसे अपने जाल में फंसा लो,’’ उस ने आंखों को चौड़ा करते हुए कहा. ‘‘हां, यह बात तो है, भविष्य को किस ने देखा है,’’ उस ने चुटकी ली.

‘‘2 या 3 साल, पता नहीं कितना समय लगे तुम्हें नौकरी मिलने में? तब तक तुम पूरी तरह से बदल तो नहीं जाओगे?’’ उस के स्वर में निराशा का भाव आ गया था. ‘‘तुम अपनेआप पर भरोसा रखो. शायद कुछ भी न बदले,’’ विनोद ने उसे तसल्ली देने का प्रयास किया.

‘‘क्या पता सिविल सेवा की परीक्षा पास करते ही तुम्हारा मन बदल जाए और क्या तुम्हारे मम्मीपापा उस स्थिति में मेरे साथ तुम्हारी शादी के लिए तैयार होंगे?’’ ‘‘यह तो वही बता सकते हैं?’’ उस ने स्पष्ट किया. पूजा का मन डूब गया.

शायद : पैसों के बदले मिला अपमान

Story in Hindi

शायद : पैसों के बदले मिला अपमान-भाग 3

एक दिन अचानक दीनदयाल के मरने का समाचार मिला. कांप कर रह गई सुवीरा उस दिन. अब तक दीनदयाल ही ऐसे थे जो संवेदनात्मक रूप से बेटी से जुड़े थे. मां की मांग का सिंदूर यों धुलपुंछ जाएगा, सुवीरा ने कभी इस की कल्पना भी नहीं की थी. पति चाहे बूढ़ा, लाचार या बेसहारा ही क्यों न हो, उस की छत्रछाया में पत्नी खुद को सुरक्षित महसूस करती है.

अब क्या होगा, कैसे होगा, सोचतेविचारते सुवीरा मायके जाने की तैयारी करने लगी तो पहली बार अंगरक्षक के समान पति और दोनों बेटे भी साथ चलने के लिए तैयार हो उठे. एक मत से सभी ने यही कहा कि वहां जा कर फिर से अपमान की भागी बनोगी. पर सुवीरा खुद को रोक नहीं पाई थी. मोह, ममता, निष्ठा, अपनत्व के सामने सारे बंधन कमजोर पड़ते चले गए थे. ऐसे में सीमा ने ही साथ दिया था.

‘जाने दीजिए आप लोग मां को. ऐसे समय में तो लोग पुरानी दुश्मनी भूल कर भी एक हो जाते हैं. यह भी तो सोचिए, नानाजी मां को कितना चाहते थे. कोई बेटी खुद को रोक कैसे सकती है.’

मातमी माहौल में दुग्धधवल साड़ी में लिपटी अम्मां के बगल में बैठ गई थी सुवीरा. दिल से पुरजोर स्वर उभरा था. सोहन के पास तो इतना पैसा भी नहीं होगा कि बाबूजी की उठावनी का खर्चा भी संभाल सके. भाई से सलाह करने के लिए उठी तो लोगों की भीड़ की परवाह न करते हुए सोहन जोरजोर से चीखने लगा, ‘चलो, जीतेजी न सही, बाप के मरने के बाद तो तुम्हें याद आया कि तुम्हारे रिश्तेदार इस धरती पर मौजूद हैं.’

चाहती तो सुवीरा भी पलट कर इसी तरह उसे अपमानित कर सकती थी. जी में आया भी था कि इन लोगों से पूछे कि चलो मैं न सही पर तुम लोगों ने ही मुझ से कितना रिश्ता निभाया है, पर कहा कुछ नहीं था. बस, खून का घूंट पी कर रह गई थी.

लोगों की भीड़ छंटी तो सोहन की पत्नी से पूछ लिया था सुवीरा ने, ‘बैंक में हड़ताल है और मुझ से इस घर की आर्थिक स्थिति छिपी नहीं है. ऐसे मौकों पर अच्छीखासी रकम की जरूरत होती है. इसीलिए कुछ पैसे लाई थी, रख लो.’

‘क्यों लाई है पैसे?’ मां के मन में पहली बार परिस्थितिजन्य करुणा उभरी थी, पर सोहन का स्वर अब भी बुलंद था.

‘तुम मदद करने नहीं जायदाद बांटने आई हो. जाओ बहना, जाओ. अब तुम्हारा यहां कोई भी नहीं है.’

सोहन की पत्नी ने कई बार पति को शांत करने का असफल प्रयास किया था लेकिन गिरीश अच्छी तरह समझ गए थे कि सोहन ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है. दंभी इनसान हमेशा दूसरे को गलत खुद को सही मानता है.

‘इस बदजबान को हम सुधारेंगे,’ जवानी का खून कहीं अनर्थ न कर डाले, इसीलिए सुवीरा ने रोका था अपने बेटों को.

‘हम कौन होते हैं किसी को सुधारने वाले? स्वभाव तो संस्कारों की देन है.’

लेकिन गिरीश उद्विग्न हो उठे थे, ‘सुवीरा, कब तक आदर्शों की सलीब पर टंगी रहोगी? खुद भी झुकोगी मुझे भी झुकाओगी? जिन लोगों में इनसानियत नहीं उन से रिश्ता निभाना बेवकूफी है. यदि आज के बाद तुम ने इन लोगों से संबंध रखा तो मेरा मरा मुंह देखोगी.’

घर लौट कर गिरीश ने कई बार अपनी दी हुई शपथ का विश्लेषण किया था पर हर बार खुद को सही पाया था. जिन रिश्तों के निभाने से तर्कवितर्क के पैने कंटीले झाड़ की सी चुभन महसूस हो, गहन पीड़ा की अनुभूति हो, उसे तोड़ देना क्या गलत था? कहते समय कब सोचा था उन्होंने कि सुवीरा का पड़ाव इतना निकट था?

बेहोशी की दशा में सन्नाटे को चीरते हुए सुवीरा के होंठों से जब सोहन और अम्मां का नाम छलक कर उन के कानों से टकराया तो उन्हें महसूस हुआ कि इतना सरल नहीं था सब. सिरहाने बैठे विक्रम की हथेलियों को हौले से थाम कर सुवीरा ने अपने शुष्क होंठों से सटाया, फिर चारों ओर देखा. उस की नजरें मुख्यद्वार पर अटक कर रह गईं.

‘‘सुवीरा, विगत को भूल जाओ. मांगो, जो चाहे मांगो. मैं अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखूंगा.’’

‘‘अंतिम समय… इस धरती से विदा लेते समय कांटों की गहरी चुभन झेलते हुए प्राण त्याग कर मुझे कौन सी शांति मिलेगी?’’

‘‘क्यों इतना दुख करती हो? संबंधजन्य दुख ही तो दुख का कारण होते हैं,’’ दीर्घ निश्वास भर कर गिरीश ने पत्नी को सांत्वना दी थी.

‘‘देखना, मेरे मरने के बाद ये लोग समझेंगे कि मेरा निश्छल प्रेम किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता था. मुझे तो सिर्फ प्यार के दो मीठे बोल और वैसी ही आत्मीयता चाहिए थी जैसी अम्मां सोहन को देती थीं.’’

घनघोर अंधेरे में सुवीरा की आवाज डूबती चली गई. शरीर शिथिल पड़ने लगा, आंखों की रंगत फीकी पड़ने लगी. धीरेधीरे उन के चेहरे की तड़प शांत हो गई. स्थिर चिरनिद्रा में सो गई सुवीरा.

पत्नी की शांत निर्जीव देह को सफेद चादर से ढक उन की निर्जीव पलकों को हाथों के दोनों अंगूठों से हौले से बंद करते हुए गिरीश आत्मग्लानि से घिर गए. पश्चात्ताप से टपटप उन की आंखों से बहते आंसू सुवीरा की पेशानी को न जाने कब तक भिगोते रहे.

‘‘अपनी अम्मां और भाई को एक नजर देखने की तुम्हारी अभिलाषा मेरे ही कारण अधूरी रह गई. दोषी हूं तुम्हारा. गुनहगार हूं. मुझे क्षमा कर दो.’’

जैसे ही सुवीरा के मरने का समाचार लोगों तक पहुंचा, भीड़ का रेला उमड़ पड़ा. गिरीश और दोनों बेटों की जानपहचान, मित्रों और परिजनों का दायरा काफी बड़ा था.

तभी लोगों की भीड़ को चीरते हुए सोहन और तारिणी देवी आते दिखाई दिए. बहन की शांत देह को देख सोहन जोरजोर से छाती पीटने लगा. उसे देख तारिणी देवी भी रोने लगीं.

‘‘अपने लिए तो कभी जी ही नहीं. हमेशा दूसरों के लिए ही जीती रही.’’

‘‘हमें अकेला छोड़ गई. कैसे जीएंगे सुवीरा के बिना हम लोग?’’

नानी का रुदन सुन दोनों जवान बेटों का खून भड़क उठा. मरने के बाद मां एकाएक उन के लिए इतनी महान कैसे हो गईं? दंभ और आडंबर की पराकाष्ठा थी यह. यह सब मां के सामने क्यों नहीं कहा? इन्हीं की चिंता में मां ने आयु के सुख के उन क्षणों को भी अखबारी कागज की तरह जला कर राख कर दिया जो उन्हें जीवन के नए मोड़ पर ला कर खड़ा कर सकते थे.

उधर शांत, निर्लिप्त गिरीश कुछ और सोच रहे थे. कमल और बरगद की जिंदगी एक ही तराजू में तौली जाती है. कमल 12 घंटे जीने के बावजूद अपने सौंदर्य का अनश्वर और अक्षय आभास छोड़ जाता है जबकि 300 वर्ष जीने के बाद जब बरगद उखड़ता है तब जड़ भी शेष नहीं रहती.

कई बार सुवीरा के मुंह से गिरीश ने यह कहते सुना था कि प्यार के बिना जीवन व्यर्थ है. लंबी जिंदगी कैदी के पैर में बंधी हुई वह बेड़ी है जिस का वजन शरीर से ज्यादा होता है. बंधनों के भार से शरीर की मुक्ति ज्यादा बड़ा वरदान है.

सुवीरा की देह को मुखाग्नि दी जा रही थी लेकिन गिरीश के सामने एक जीवंत प्रश्न विकराल रूप से आ कर खड़ा हो गया था. कई परिवार बेटे को बेटी से अधिक मान देते हैं. बेटा चाहे निकम्मा, नाकारा, आवारागर्द और ऐयाश क्यों न हो, उसे कुल का दीपक माना जाता है, जबकि बेटी मनप्राण से जुड़ी रहती है अपने जन्मदाताओं के साथ फिर भी उतने मानसम्मान, प्यार और अपनत्व की अधिकारिणी क्यों नहीं बन पाती वह जितना बेटों को बनाया जाता है? यदि इन अवधारणाओं और भ्रांतियों का विश्लेषण किया जाए तो रिश्तों की मधुरता शायद कभी समाप्त नहीं होगी.

ऐसा भी होता है- भाग 2

पर ऐसा अवसर कहां आया. मां तो थानेदार की तरह तैनात रहती हैं. आते ही मोहन की निगाह सब से पहले उन पर पड़ती है. वह उन्हें अपनी बांहों में लेते हैं और उन्हें आश्चर्यचकित करने का पूरा नाटक करते हैं. चुप, मैं ने अपने को समझाया, लगता है तुझे अपनी सास से ईर्ष्या होने लगी है.

‘‘मां, देखो, तुम्हारे लिए क्या लाया हूं,’’ मोहन के मुंह पर उल्लास की चमक थी.

बुरा तो लगा, पर उत्सुकतावश देखने चली आई कि आज बेटा मां के लिए क्या लाया है.

मां ने पैकेट खोलते हुए आश्चर्य से कहा, ‘‘क्या, यह बंगलौरी साड़ी मेरे लिए लाया है?’’

‘‘हां, मां, अच्छी है न?’’

‘‘बहुत सुंदर. मुझे यह रंग बहुत अच्छा लगता है. तुझे तो मेरी पसंद मालूम है. बहुत महंगी होगी. बेकार में इतने पैसे खर्च कर दिए.’’

मां की आंखों में वात्सल्य का सागर था और मेरा दिल बुझ रहा था. मैं ने मुंह मोड़ लिया. कहीं मेरी गीली आंखें कोई देख न ले.

‘‘मां, तुम्हें पसंद आई, तो बस समझो, पूरे पैसे वसूल हो गए. आज दफ्तर में एक बाबू 4 साडि़यां लाया था. वह बंगलौर का है. अभीअभी छुट्टियों से आया था. मैं ने यह तुम्हारे लिए पसंद कर ली.’’

मोहन बहुत खुश हो रहे थे. मेरा दिल जलने लगा.

मां ने साड़ी फैला कर अपने कंधे पर डालते हुए कहा, ‘‘कितना सुंदर बार्डर है. पल्लू भी खूब भारी है. क्यों बहू, देख, कैसी है?’’

आवाज की कंपन पर काबू करते हुए मैं ने कहा, ‘‘बहुत अच्छी साड़ी है, मां. आप इस में खिल जाएंगी,’’ मैं ने मुसकराने की कोशिश की.

‘‘देखूं, तेरे ऊपर कैसी लगेगी?’’

मैं अपने को रोक न सकी. चट से उन के आगे जा कर खड़ी हो गई. उन्होंने साड़ी का पल्लू खोल कर मेरे ऊपर डाल दिया.

‘‘हाय, तू कितनी प्यारी लग रही है.’’

‘‘तू ही रख ले. मैं क्या पहनूंगी.’’

‘‘नहीं मां, ऐसा कैसे हो सकता है. यह साड़ी तो आप के लिए लाए हैं. मेरे लिए फिर आ जाएगी.’’

‘‘फिर क्यों? चल, मैं ने तुझे अपनी तरफ से दी और फिर साड़ी घर में ही तो रहेगी. मेरा मन करेगा तो तुझ से मांग कर पहन लूंगी.’’

मैं ने अधिक जिद नहीं की. मोहन के मुंह पर वही शरारती मुसकराहट थी. मैं जैसे ही साड़ी उठा कर चलने लगी, मोहन ने टोक दिया, ‘‘लो, मां ने साड़ी दी और तुम ने पैर छू कर आशीर्वाद भी नहीं लिया, गंदी लड़की.’’

मेरे उत्साह पर पानी पड़ गया. मन में आया कि साड़ी मां के ऊपर फेंक कर चल दूं. अपने ऊपर नियंत्रण कर के पति की आज्ञा का पालन किया. कभी नहीं पहनूंगी इस साड़ी को, मैं ने मन में निश्चय किया. क्या समझ रखा है अपने को.

रात में पलंग पर लेटे हुए मोहन मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे. मुझे देखते ही बोले, ‘‘साड़ी अच्छी लगी न?’’

‘‘आप को मतलब?’’ मैं ने रूठ कर कहा.

‘‘क्यों, तुम्हारे लिए साड़ी लाया और मुझे कोई मतलब नहीं?’’

‘‘मेरे लिए लाए थे,’’ मैं ने व्यंग्य से कहा, ‘‘मां के लिए लाए थे. मैं कौन होती हूं?’’

ठंडी आह भर कर मोहन ने कहा, ‘‘रूठी रानी पर यह तेवर खिल रहा है. सच तो यह है कि साड़ी मैं तुम्हारे लिए लाया था. सोचा, क्यों न एक तीर से दो शिकार कर लिए जाएं. मुझे मालूम था कि मां तुम्हें दे देंगी. कैसी रही?’’

मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘अगर वह रख लेतीं तो?’’

मोहन के चेहरे की हंसी उड़ गई, ‘‘क्या कह रही हो?’’

मैं ने संभल कर कहा, ‘‘मैं ने कहा, अगर वह रख लेतीं तो अच्छा था.’’

‘‘ओह,’’ मोहन ने हंस कर कहा, ‘‘मैं कुछ और समझा था. अगर रख भी लेतीं तो क्या था? मेरी मां हैं. फिर तुम्हें कभी…’’

फिर मैं नियंत्रण खो बैठी, ‘‘वह ‘फिर कभी’ कभी न आता. दूसरी श्रेणी में आती हूं न.’’

‘‘छोड़ो, किस पचड़े में पड़ गईं. चलो, साड़ी पहन कर दिखाओ. देखूं, मेरा चुनाव कैसा है.’’

जब मैं ने नहीं पहनी तो वह मुझे गुदगुदाने लगे. अंत में मुझे पहननी पड़ी. दर्पण में देखा तो मैं अपने ऊपर ही मुग्ध हो गई, परंतु दिल में कुछ चुभन हो रही थी. यह साड़ी मेरी नहीं है, यह मैं कभी नहीं पहनूंगी.

लगता है कि मां के प्रति मेरी ईर्ष्या कुछ गहरी होती जा रही है. मोहन का उन के प्रति प्यार दर्शाना अब मुझे खलने लगा है. मां के मोहन के लिए चिंता के प्रदर्शन से मुझे जलन होती है. मां जब तक रहेंगी, मोहन का प्यार मेरे लिए अधूरा रहेगा. मुझे एहसास हुआ कि मां मेरे और मोहन के बीच एक दीवार बन कर खड़ी हैं. मोहन के जीवन में अपना सही स्थान मुझे कभी नहीं मिलेगा.

मोहन ने दफ्तर जाते हुए बाहर दरवाजे से आवाज लगाते हुए कहा, ‘‘हां, आज शाम को फिल्म देखने चलेंगे. मैं टिकट लेता हुआ आऊंगा.’’

‘‘अच्छा,’’ मैं ने अंदर से ही उत्तर दिया.

मन खिल उठा. मोहन को फिल्मों का चाव कम था. मेरा मन इस कारण कुछ मरामरा रहता था. हाय, कितना मजा आएगा मोहन के साथ फिल्म देखने में. वातानुकूलित हाल में ठंड से फुरफुरी लग रही होगी. तब मैं मोहन से और सट कर बैठ जाऊंगी. अंधेरे में हम दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़े बैठे होंगे. मैं आनंदविभोर हो गई. कल्पना में खो गई.

पछतावा: थर्ड डिगरी का दर्द- भाग 2

‘बंद करो अपनी बकवास. मयंक तुम्हारे जैसा अपराधी नहीं, बल्कि वह एक सच्चा इनसान है. इस की मैं तहेदिल से कद्र करती हूं. तुम यहां से जाते हो कि पुलिस को बुलाऊं…’

‘ओह, मैं तेरे लिए इतना बेगाना हो गया हूं नैना कि पुलिस को बुलाने की धमकी दे रही हो? खैर, जाता हूं मैं. अगर मेरे प्रति थोड़ी सी भी ममता और प्यार हो, तो कल ओम सिनेमा घर के पास दोपहर के शो के दौरान मिलना…’ इतना बोल कर रतन वहां से चला गया.

‘‘अरे रतन, किन खयालों में डूबे हो?’’ अचानक नेता सुरेश राय लौकअप में बंद रतन को देखते ही बोल पड़े.

मंत्री सुरेश राय को देखते ही रतन अपने खयालों की दुनिया से वापस लौटा और अपने ऊपर होने वाले जोरजुल्म से बचने के लिए गुजारिश करते हुए बोला, ‘‘सर, मुझे किसी तरह इंस्पैक्टर से बचा लीजिए, नहीं तो वह मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा…’’

‘‘अरे रतन, तू बेकुसूर है. मेरे पास तेरी बेगुनाही के पुख्ता सुबूत हैं. एसपी ने इंस्पैक्टर छेत्री को फोन कर तुम्हें छोड़ने के लिए आदेश दे दिया है.’’

ठीक उसी समय इंस्पैक्टर राजन छेत्री आया और लौकअप पर तैनात सिपाही से रतन को छोड़ देने के लिए कहा.

बाहर निकलने के बाद मंत्री ने रतन को अपनी गाड़ी में बिठाया. तब रतन मंत्री के एहसानों के दबाव में बोला, ‘‘सर, मैं आप का यह उपकार जिंदगीभर नहीं भूल पाऊंगा.’’

‘‘अरे, कैसा उपकार? मैं तेरे काम आ गया तो बदले में तू भी तो मेरा काम कर देता है. तेरे जैसे जोशीले नौजवान मुझे बहुत पसंद हैं…’’ गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे हुए मंत्री सुरेश राय ने रतन की पीठ को धीरे से थपथपाया और फिर कहा, ‘‘तुम्हारी मदद से ही तो मैं अपने दुश्मनों के दांत खट्टे करता हूं.’’

उन की गाड़ी बीरपाड़ा शहर से काफी दूर निकल गई थी. अचानक ड्राइवर ने ब्रेक लगाया, दरवाजा खोल कर रतन बाहर निकल गया था. जहां सड़क पर एक बेबस लड़की ‘बचाओ… बचाओ…’ की आवाज लगाते हुए दौड़ रही थी और उस के पीछे 4-5 गुंडे लगे हुए थे.

यह देख कर मंत्रीजी के हाथपैर फूल गए. उन्होंने घबराते हुए रतन को आवाज लगाई, ‘‘अरे रतन, उन के पीछे क्यों भागे जा रहे हो. मेरी जान आफत में डालोगे क्या? ड्राइवर तुम्हें भी कई बार कह चुका हूं कि रात में गाड़ी अनजान जगह पर मत रोको…’

‘‘सौरी सर,’’ ड्राइवर ने माफी मांगी, लेकिन रतन पर मंत्री की बातों का कोई असर नहीं पड़ा.

रतन ने दौड़ रहे एक गुंडे को पकड़ा और उस के पेट में अपनी लात से 2-4 किक जमाई. वह तिलमिला उठा. वार करने की जगह अपनी जान बचा कर चाय बागान में वह भाग गया. रतन दूसरे अपराधियों की ओर बढ़ा, लेकिन वे सब अपने को फंसते देख कर नौ दो ग्यारह हो गए.

सड़क पर दौड़ रही लड़की हांफती हुई धम्म से गिर गई. रतन ने उसे अपने कंधे पर उठाया और गाड़ी की पिछली सीट पर डाल दिया.

‘‘अरे रतन, यह क्या चक्कर है. तुम्हें लड़की की जरूरत थी तो मुझ से बोला होता,’’ मंत्री सुरेश राय ने उस से अपना गुस्सा इजहार किया.

‘‘सर, गलत काम जरूर करता हूं, लेकिन शराब और शबाब से दूर रहता हूं. अनजान जगह पर किसी बेबस लड़की की जान बचाना कोई अपराध तो नहीं है. इनसानियत के नाते मैं ने अपना कर्तव्य निभाया है.’’

‘‘देखो, फालतू बातों के लिए मेरे पास समय नहीं है. हक और धर्म की बातें हम अपने भाषणों में करते हैं, अपनी जिंदगी में नहीं. अब इस लड़की को कहां छोड़ोगे?’’

‘‘इसे सिलीगुड़ी के किसी अस्पताल में ले जाएंगे सर,’’ विधान मार्ग पर बने सुभाषचंद्र नर्सिंग होम में उस अनजान लड़की को इलाज के लिए भरती करा दिया गया. साथ ही, इस की सूचना स्थानीय पुलिस को भी दी गई.

जब लड़की पर रतन की नजर गई, उस का कलेजा धकधक करने लगा. वह तो नैना थापा है, उसे देखने के बाद वह पत्थर की तरह वहीं खड़ा रह गया. कभी खून से लथपथ उस के सलवारसूट को देख रहा था तो कभी उस के मुरझाए चेहरे को. उसे सामूहिक हवस का शिकार बनाया था. दूसरे ही पल रतन के मन ने कहा, ‘यह लड़की तो मुझ से नफरत करती है. कहीं होश में आने के बाद कोई नई मुसीबत न खड़ी कर दे. अब यहां से निकलने में ही भलाई है.’

‘‘रतन, इस लड़की के पीछे तो तू ने अपना सारा काम चौपट कर दिया. पहले इसे उन बदमाशों से बचाया, उस के बाद अस्पताल में भरती कराया और अब इस के चेहरे पर टकटकी लगाए खड़ा है. आखिर क्या बात है?’’ नर्सिंग होम में देर होने पर नेता सुरेश राय ने रतन को टोका. ‘‘नहीं, नहीं सर,’’ वह हड़बड़ा कर बोल उठा और उन के साथ बाहर निकल गया. साथ ही जातेजाते रतन सोचने लगा, ‘इस लड़की का क्या भरोसा, कब क्या आरोप लगा दे, इस से दूर रहने में ही भलाई है.’

जब नैना को होश आया तो एक बार रतन का चेहरा उस के दिमाग में नाच उठा. टाइगर हिल में दी गई उस की चेतावनी उस के मन को झकझोरने लगी. उसे अपनेआप पर पछतावा होने लगा, क्यों उस ने आंख मूंद कर मयंक पर भरोसा किया. जिस ने उस की इज्जत लूट ली. उस के साथियों ने उस का सबकुछ छीन लिया.

नैना की आंखें भर आईं. उस को अंदर ही अंदर घुटन महसूस होने लगी. वह सोचने लगी कि उस से शैतान और इनसान को पहचाने में कैसे भूल हो गई?

अचानक नैना के सामने रतन और मयंक की तसवीरें उभर आईं. दोनों ही अपराधी थे. मयंक कई मासूम लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद उन की हत्या कर देता था, तो रतन कई बार बम धमाके कर चुका था. एक हैवान था, तो दूसरा शैतान. दोनों जनता के दुश्मन थे.

अस्पताल से घर आने के बाद भी नैना को चैन नहीं मिला. लोकलाज के डर से उस ने कालेज जाना बंद कर दिया था. दिनरात उस के घर में जमघट लगाने वाली सहेलियां, अब उस से बात करने में भी कतराती थीं. हमदर्दी जताने के बजाय तरहतरह के ताने देती थीं.

एक दिन नैना के घर रतन पहुंच गया. उस समय नैना की आंखों में आंसू थे. नैना की हालत देख कर रतन भी रोना आ गया.

रतन ने अपनी डबडबाई आंखों को रूमाल से पोंछा और फिर उस से बोला, ‘‘नैना प्लीज… मत रोओ, चाहे मयंक को सजा हो भी गई तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा…’’

वारिस : सुरजीत के घर में कौन थी वह औरत-भाग 1

होश संभालने के साथ ही नरेंद्र उस औरत को अपने घर में देखता आ रहा था. वह कौन थी, उसे नहीं पता था.

बचपन में जब भी वह किसी से उस औरत के बारे में पूछता था तो वह उस को डांट कर चुप करा देता था.

घर के बाईं ओर जहां गायभैंस बांधे जाते थे उस के करीब ही एक छोटी सी कोठरी बनी हुई थी और वह औरत उसी कोठरी में सोती थी.

मां का व्यवहार उस औरत के प्रति अच्छा नहीं था जबकि उस का बाप  बलवंत और बूआ सिमरन उस औरत के साथ कुछ हमदर्दी से पेश आते थे.

नरेंद्र की मां बलजीत का सलूक तो उस औरत के साथ इतना खराब था कि वह सारा दिन उस से जानवरों की तरह काम लेती थी और फिर उस के सामने बचाखुचा और बासी खाना डाल देती थी. कई बार तो लोगों का जूठन भी उस के सामने डालने में बलवंत परहेज नहीं करती थी. लेकिन जैसा भी, जो भी मिलता था वह औरत चुपचाप खा लेती थी.

होश संभालने के बाद नरेंद्र ने घर में रह रही उस औरत को ले कर एक और भी अजीब चीज महसूस की थी. वह हमेशा नरेंद्र की तरफ दुलार और हसरत भरी नजरों से देखती थी. वह उसे छूना और सहलाना चाहती थी. पर घर के किसी सदस्य के होने पर उस औरत की नरेंद्र के करीब आने की हिम्मत नहीं होती थी. लेकिन जब कभी नरेंद्र उस के सामने अकेले पड़ जाता और आसपास कोई दूसरा नहीं होता तो वह उस को सीने से लगा लेती और पागलों की तरह चूमती.

ऐसा करते हुए उस की आंखों में आंसुओं के साथसाथ एक ऐसा दर्द भी होता था जिस को शब्दों में जाहिर करना मुश्किल था.

‘कुदेसन’ शब्द को नरेंद्र ने पहली बार तब सुना था जब उस की उम्र 14-15 साल की थी.

गांव के कुछ दूसरे लड़कों के साथ नरेंद्र जिस सरकारी स्कूल में पढ़ने जाता था वह गांव से कम से कम 2 किलोमीटर की दूरी पर था.

नरेंद्र के साथ गांव के 7-8 लड़कों का समूह एकसाथ स्कूल के लिए जाता था और रास्ते में अगर कोई झगड़ा न हुआ तो एकसाथ ही वे स्कूल से वापस भी आते थे.

सुबह स्कूल जाने से पहले सारे लड़के गांव की चौपाल पर जमा होते थे. एकसाथ मस्ती करते हुए स्कूल जाने में रास्ते की दूरी का पता ही नहीं चलता था और जब कभी समूह का कोई लड़का वक्त पर चौपाल नहीं पहुंचता था तो उस की खोजखबर लेने के लिए किसी लड़के को उस के घर दौड़ाया जाता था. हमारे साथ स्कूल जाने वाले लड़कों में एक सुरजीत भी था जिस के साथ नरेंद्र की खूब पटती थी. दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे. नरेंद्र कई बार सुरजीत के घर भी जा चुका था.

एक दिन जब स्कूल जाते समय  सुरजीत गांव की चौपाल पर नहीं पहुंचा तो उस की खोजखबर लेने के लिए नरेंद्र उस के घर पहुंच गया.

पहले तो घर में दाखिल हो कर नरेंद्र ने देखा कि सुरजीत को बुखार है. वह वापस मुड़ा तो उस की नजर सुरजीत के घर में एक औरत पर पड़ी जो उस के लिए अनजान थी.

वह जवान औरत गांव में रहने वाली औरतों से एकदम अलग थी, बिलकुल उसी तरह जैसे उस के अपने घर में रह रही औरत उसे नजर आती थी. चूंकि नरेंद्र को स्कूल जाने की जल्दी थी इसलिए उस ने इस बारे में सुरजीत से कोई बात नहीं की.

2 दिन बाद सुरजीत स्कूल जाने वाले लड़कों में फिर से शामिल हो गया तो छुट्टी के बाद गांव वापस लौटते हुए नरेंद्र ने उस से उस अजनबी औरत के बारे में पूछा था. इस पर सुरजीत ने कहा, ‘बापू ने ‘कुदेसन’ रख ली है.’

‘‘कुदेसन, वह क्या होती है?’’ नरेंद्र ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैं नहीं जानता. लेकिन ‘कुदेसन’ के कारण मां और बापू में रोज झगड़ा होने लगा है. मां कुदेसन को घर में एक मिनट भी रखने को तैयार नहीं, लेकिन बापू कहता है कि भले ही लाशें बिछ जाएं, कुदेसन यहीं रहेगी,’’ सुरजीत ने बताया.

‘‘मगर तेरा बापू इस कुदेसन को लाया कहां से है?’’

‘‘क्या पता, तुम को तो मालूम ही है कि मेरा बापू ड्राइवर है. कंपनी का ट्रक ले कर दूरदूर के शहरों तक जाता है. कहीं से खरीद लाया होगा,’’ सुरजीत ने कहा.

सुरजीत की इस बात से नरेंद्र को और ज्यादा हैरानी हुई थी. उस ने जानवरों की खरीदफरोख्त की बात तो सुनी थी मगर इनसानों को भी खरीदा या बेचा जा सकता है यह बात वह पहली बार सुरजीत के मुख से सुन रहा था.

‘कुदेसन’ शब्द एक सवाल बन कर नरेंद्र के जेहन में लगातार चक्कर काटने लगा था. उस को इतना तो एहसास था कि ‘कुदेसन’ शब्द में कुछ बुरा और गलत था. किंतु वह बुरा और गलत क्या था? यह उस को नहीं पता था.

‘कुदेसन’ शब्द को ले कर घर में किसी से कोई सवाल करने की हिम्मत उस में नहीं थी. बाहर किस से पूछे यह नरेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था.

असमंजस की उस स्थिति में अचानक ही नरेंद्र के दिमाग में अमली चाचा का नाम कौंधा था.

अमली चाचा का असली नाम गुरबख्श था. अफीम के नशे का आदी (अमली) होने के कारण ही गुरबख्श का नाम अमली चाचा पड़ गया था. गांव के बच्चे तो बच्चे जवान और बड़ेबूढे़ तक गुरबख्श को अमली चाचा कह कर बुलाते थे. दूसरे शब्दों में, गुरबख्श सारे गांव का चाचा था.

गांव की चौपाल के पास ही अमली चाचा पीपल के नीचे जूतों को गांठने की दुकानदारी सजा कर बैठता था. वह अकेला था, क्योंकि उस की शादी नहीं हुई थी. एकएक कर के उस के अपने सारे मर गए थे. आगेपीछे कोई रोने वाला नहीं था अमली चाचा के. गांव के हर शख्स से अमली चाचा का मजाक चलता था.

बड़े तो बड़े, नरेंद्र की उम्र के लड़कों के साथ भी उस का हंसीमजाक चलता था. आतेजाते लड़के अमली चाचा से छेड़खानी करते थे और वह इस का बुरा नहीं मानता था. हां, कभीकभी छेड़खानी करने वाले लड़कों को भद्दीभद्दी गालियां जरूर दे देता था.

शरारती लड़के तो अमली चाचा की गालियां सुनने के लिए ही उस को छेड़ते थे.

लिली: उस लड़की पर अमित क्यो प्रभावित था ?-भाग 1

लिली की बिंदास पहल ने अमित को मुश्किल में डाल दिया. एक दिन वह हंस कर बोली, ‘‘क्या तुम मुझसे दोस्ती करना पसंद करोगे?’’

उस रोज अमित  झेंप गया. उसे कोई जवाब नहीं सू झा. बस, मुसकरा दिया.

रातभर वह लिली के ही बारे में सोच रहा था. कल जब उस से मुलाकात होगी, तो वह क्या जवाब देगा? क्या उस के प्रस्ताव को ठुकरा देगा?

लिली पहली लड़की थी, जिस ने उसे प्रपोज किया. एक अदने से शहर  से जब वह मुंबई नौकरी करने  आया था, तब सिवा नौकरी के उसे

कुछ नहीं पता था. न ही यहां की लड़कियों के तौरतरीके, न ही इस शहर का मिजाज.

लिली अमित को एक रैस्टोरैंट में मिली थी, जहां वह अकसर खाना खाने जाता था. यहीं से दोनों में जानपहचान शुरू हुई.

लिली ने उसे अपना ह्वाट्सएप का नंबर दिया और कहा, ‘‘अगर हां हो, तो जरूर संदेश देना.’’

लिली खूबसूरत थी. छोटे शहर की लड़कियों से अलग उस का रूपरंग बहुत अच्छा. वह फैशनेबल थी.

अमित के लिए यह बिलकुल नया अनुभव था. सोचविचार कर उस ने फैसला लिया कि वह लिली की पहल को नहीं ठुकराएगा.

अगले दिन जब अमित रैस्टोरैंट गया, तो सब से पहले उस की नजर लिली की चेयर पर गई. यही समय होता था लिली के आने का.

अमित ने चारों तरफ नजरें दौड़ाईं, मगर वह नहीं दिखी. वह बेचैन हो गया. आज उस के दिल में एक खालीपन का अनुभव हुआ. कुरसी पर बैठ कर वह खाने का इंतजार करने लगा. रहरह कर उस की नजर दरवाजे पर चली जाती.  तभी लिली आती दिखी. अमित का चेहरा खिल गया.

लिली ने मुसकरा कर उसे विश किया. उस के बाद अपनी चेयर पर बैठ कर लिली मोबाइल पर उंगलियां फेरने लगी. अमित से रहा न गया. उस ने तत्काल उसे मैसेज दिया, ‘शाम को खाली हो?’

लिली ने मैसेज का तुरंत जवाब दिया, ‘हां.’

इस तरह दोनों ने शाम को साथ बिताने का फैसला लिया. एक तय जगह पर दोनों मिले. मोटरसाइकिल पर बैठ कर मरीन ड्राइव पर आए. समुद्र के किनारे लगे चबूतरे पर बैठ कर दोनों आपस में बातचीत करने लगे.

‘‘तुम किस कंपनी में हो?’’ लिली ने पूछा.

‘‘मैं यहीं एक सौफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी में इंजीनियर हूं.’’

‘‘अकेले हो? मेरा मतलब शादी से है,’’ लिली ने पूछा.

‘‘अभी कुंआरा हूं,’’ कह कर अमित हंसा.

कुछ सोच कर अमित ने लिली से भी यही सवाल किया. जवाब में लिली ने बतलाया कि वह कुंआरी है. एक कुरियर कंपनी में नौकरी करती है.

इस तरह जब भी समय मिलता, वे दोनों एकदूसरे के साथ बिताना पसंद करते. धीरेधीरे दोनों के संबंध गाढ़े  होते गए.

एक रोज लिली गले में सुंदर सी चेन पहन कर आई थी. अमित ने देखा, तो तारीफ किए बिना न रह सका.

‘‘मां ने दी है. आज मेरा बर्थडे है,’’ लिली की इस बात से अमित को शर्मिंदगी हुई. बौयफ्रैंड होने के नाते यह हक सब से पहले उसे जाता था. काश, पहले पता होता, तो वह निश्चय  ही लिली को सरप्राइज दे कर निहाल  कर देता.

अमित कुछ सोच कर बोला, ‘‘देर से ही सही, आज तुम्हारा बर्थडे मेरे फ्लैट पर धूमधाम से मनेगा. मां से बोल दो कि आने में देर होगी.’’

अमित बहुत खुश था. लिली के साथ वह एक अच्छी सी दुकान में गया. वहां उस की पसंद के सोने के  झुमके दिलवाए. 40,000 रुपए का बिल चुकता किया.

लिली ने मना किया, मगर अमित के लिए अपने पहले प्यार का तोहफा था. उस के बाद केक और पिज्जा ले कर अपने फ्लैट पर आया. दोनों ने खूब मजे किए. रात 11 बजने को हुए. ‘‘अच्छा तो मैं चलती हूं,’’ कह कर लिली ने अपना पर्स संभाला.

अमित का मन तो नहीं था उसे छोड़ने का, मगर कैसे कहे. जुमाजुमा चार दिनों की मुलाकात थी. कहीं वह बुरा न मान ले.

लिली अमित के करीब आई. उस के गालों को हलके से चूम लिया. अमित का रोमरोम खिल उठा.

लिली के जाने के बाद अमित उस के ही ख्वाबों और खयालों में डूबा रहा. रहरह कर गालों पर अपनी उंगलियां फेरता तो ऐसा लगता लिली अब भी उस के करीब है. एक अजीब सी मादकता उस के ऊपर हावी हो गई. तभी मोबाइल फोन की घंटी बजी. फोन लिली का था.

‘‘पहुंच गई?’’ अमित ने पूछा.

‘हां,’ लिली का जवाब था, ‘क्या कर रहे हो? सोए नहीं?’ उस ने पूछा.

‘‘नींद नहीं आ रही,’’ अमित का जवाब था.

‘रात के 2 बज रहे हैं. औफिस नहीं जाना है?’

‘‘यार, तुम तो अभी से मेरी चिंता करने लगी?’’

‘क्या करूं. दिल के हाथों मजबूर हूं.’

‘‘ऐसा क्या देखा मु झ में?’’ पूछ कर अमित हंसा.

लिली सोच कर बोली, ‘कभीकभी भावनाओं के आगे शब्द कम पड़ जाते हैं,’ वह आगे बोली, ‘तुम ने मु झ में क्या देखा?’

अमित थोड़ा शरमाते हुए बोला, ‘‘तुम्हारे होंठ. जब गुलाबी लिपस्टिक लगा कर आती हो, तो ऐसा लगाता है मानो गुलाब की 2 पंखुडि़यां एकदूसरे को चूम रही हों.’’

‘ऐसा था तो पहल क्यों नहीं की?’ लिली ने शरारत की.

‘‘डरता था, कहीं तुम बुरा न मान जाओ.’’

‘मन तो नहीं कर रहा, पर क्या करें नौकरी जो करनी है. अच्छा, गुडनाइट,’ लिली ने मोबाइल का स्विच औफ कर दिया.

आज लिली सफेद कपड़े पर गुलाब रंग के फूल बने छींटे वाला पहन कर आई थी. बालों को खास तरीके से गूंथा था. लट चेहरे पर  झूल रही थी. गोरा रंग उस पर सुर्ख गुलाबी होंठ कयामत ढा रहे थे. अमित उसे देखता ही रह गया.

आज शाम दोनों ने फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाया. सिनेमाघर का सन्नाटा पा कर अमित की भावनाएं कुछ ज्यादा उबाल लेने लगीं. रहा न गया तो उस के होंठों को चूम लिया. लिली पहले तो सकपकाई, पर बाद में सहज हो गई.

यह सिलसिला अब ऐसे ही चलता रहा. अब दोनों के बीच कुछ भी परदा नहीं रहा.

एक रोज लिली परेशान थी. अमित ने उस की परेशानी की वजह पूछी, तो वह बोली, ‘‘मु झे 50,000 रुपए की सख्त जरूरत है.’’

यह पहला मौका था, जब लिली ने उस से रुपयों की डिमांड की. इज्जत का सवाल था, इसलिए वह मना न कर सका. तुरंत उस के खाते में 50,000 रुपए ट्रांसफर कर दिए.

अब लिली खुश थी. तकरीबन  2 महीने हो गए दोनों की दोस्ती को. बातोंबातों में लिली ने बताया था कि वह मुंबई में अकेली रहती है. मातापिता पूना में रहते हैं. क्यों न हम एकसाथ रहें?

अमित को यह अटपटा लगा. इस से अच्छा है कि दोनों शादी कर लें.  अमित यही चाहता था, मगर लिली तैयार नहीं हुई.

‘‘अमित, शादी कोई गुड्डेगुड्डी का खेल नहीं. पहले हम एकदूसरे को सम झ लें, फिर शादी कर लेंगे. लिव इन रिलेशनशिप में रहेंगे, तो एकदूसरे को सम झने में आसानी होगी,’’ दोटूक कह कर लिली ने अपनी मंशा जाहिर कर दी.

अब अमित को फैसला लेना था कि वह इसे स्वीकार करता है या नहीं.

अमित लिली को खोना नहीं चाहता था, वहीं उस के संस्कार बिना शादी किसी लड़की के साथ रहने की इजाजत नहीं दे रहे थे.

‘‘यह कैसा संबंध लिली? बिना शादी हम एकदूसरे के साथ रहें? क्या रह जाएगा हमारेतुम्हारे बीच? ऐसे ही  साथ रहना है, तो शादी कर लेने में क्या बुराई है?’’

‘‘कैसी दकियानूसी बात कर रहे हो? मैं बर्फ  नहीं, जो तुम्हारे साथ रह कर पिघल जाऊंगी? साल 6 महीने साथ  रह लेंगे तो क्या बिगड़ जाएगा?’’  लिली ने उलाहना दिया, ‘‘तुम कौन  सी दुनिया में रह रहे हो अमित. यह  नई दुनिया है. पुराने रिवाज टूट रहे  हैं,’’ लिली के प्रस्ताव के आगे  अमित ने हाथ खड़े कर दिए.

लिली कुछ कपड़े और एक सूटकेस ले कर अमित के पास रहने चली आई. लिली रविवार को अपने मांबाप से मिलने पूना जाती थी. अमित भी जाना चाहता था, मगर वह मना कर देती. पर क्यों, यह उस की सम झ से परे था.

लिली के रूपरंग में पूरी तरह डूबे अमित को लिली के सिवा कुछ नहीं सू झता. आहिस्ताआहिस्ता लिली अमित के हर मामले में दखल देने लगी. अमित पूरी तरह से लिली पर निर्भर हो गया.

अपने महीने की तनख्वाह लिली के हाथ में सौंप कर अमित निश्चिंत रहता. एक दिन लिली पूना गई, तो 3 दिन  बाद लौटी.

अमित परेशान हो गया. लिली को फोन लगाता, तो स्विच औफ  मिलता.  3 दिनों के बाद लिली लौट आई.

अमित ने शिकायत भरे लहजे में उस से हुई देरी की वजह पूछी, तो वह नाराज हो गई. वह बोली, ‘‘अमित, मैं तुम्हारी बीवी नहीं हूं. हम दोस्त हैं. बेहतर होगा, मेरे बारे में ज्यादा खोजबीन न किया करो.’’

यह सुन कर अमित को बुरा लगा. मगर यह सोच कर चुप रहा कि लिली ने सही कहा कि वे सिर्फ  दोस्त हैं.

अमित के बिगड़े मूड को लिली ने भांप लिया. सो, गलती सुधारने की नीयत से वह अमित के करीब आ कर बैठ गई. उस के बालों पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘डार्लिंग, नाराज मत होना. मां की तबीयत ठीक नहीं थी. उन्होंने रोक लिया, तो रुकना पड़ा.’’

लिली की सफाई पर अमित का मूड बदल गया.

‘‘तुम नहीं जानती कि मैं कितना परेशान था,’’ बच्चे सरीखा बरताव था अमित का. लिली उस की कमजोरी जानती थी.

सुबह दोनों अपनेअपने काम पर निकल गए. शाम को दोनों ने फिर से बाहर खाने की योजना बनाई. रात 10 बजे लौट कर आए. जैसे ही आराम करने के लिए बिस्तर पर गए, तभी लिली के मोबाइल फोन की घंटी बजी. वह बरामदे में आई. वह 15 मिनट बाद वापस आई. आते ही बिस्तर पर पड़ गई.

थोड़ी सी जमीं थोड़ा आसमां: जिंदगी की राह चुनती स्त्री- भाग 1

कविता ने ससुराल में कदम रखते ही अपनी सास के पैर छुए तो वह मुसकरा कर बोलीं, ‘‘बेटी, अपने जेठजी के भी पैर छुओ.’’

कविता राघव के पैरों पर झुक गई तो वह अपने स्थान से हटते हुए बोले, ‘‘अरे, बस…बस कविता, हो गया, तुम थक गई होगी. जाओ, आराम करो.’’

राघव को देख कर कविता को याद आ गया कि जब दोनों भाई उसे देखने पहली बार आए थे तो उस ने राघव को ही रंजन समझा था. वह तो उसे बाद में पता चला कि राघव रंजन का बड़ा भाई है और उस की शादी राघव से नहीं रंजन से तय हुई है. कविता की इस गलत- फहमी की एक वजह यह भी थी कि देखने में रंजन अपने बड़े भाई राघव से बड़ा दिखता है. उस के चेहरे पर बड़े भाई से अधिक प्रौढ़ता झलकती है.

ससुराल आने के कुछ दिनों बाद ही कविता को पता चला कि उस के जेठ राघव अब तक कुंआरे हैं और उन के शादी से मना करने पर ही रंजन की शादी की गई है.

एक दिन कविता ने पूछा था, ‘‘रंजन, जेठजी अकेले क्यों हैं? उन्होंने शादी क्यों नहीं की?’’

तब रंजन ने कविता को बताया कि मेरे पिताजी का जब देहांत हुआ तब राघव भैया कालिज की पढ़ाई पूरी कर चुके थे और मैं स्कूल में था. राघव भैया पर अचानक ही घर की सारी जिम्मेदारी आ गई थी. जैसेतैसे उन्हें नौकरी मिली, फिर भैया ने पत्राचार से एम.बी.ए. किया और तरक्की की सीढि़यां चढ़ते ही गए. उन्होंने ही मुझे पढ़ायालिखाया और अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल बनाया. जब उन की शादी की उम्र थी तब वह इस परिवार की जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त थे और जब उन्हें शादी का खयाल आया तो रिश्ते आने बंद हो चुके थे. बस, फिर उन्होंने शादी का इरादा ही छोड़ दिया. कविता राघव भैया के सम्मान को कभी ठेस न पहुंचाना.’’

यह सब जानने के बाद तो कविता के मन में राघव के लिए आदर के भाव आ गए थे.

एक दिन कविता राघव को चाय देने गई तो देखा कि वह कोई पेंटिंग बना रहे हैं. कविता ने पूछा, ‘‘भैया, आप पेंटिंग भी करते हैं?’’

राघव ने हंस कर कहा, ‘‘हां, इनसान के पास ऐसा तो कुछ होना चाहिए जो वह सिर्फ अपनी संतुष्टि के लिए करता हो. बैठो, तुम्हारा पोटे्रट बना दूं, फिर बताना मैं कैसी पेंटिंग करता हूं.’’

कविता बैठ गई, फिर अपने बालों पर हाथ फिराते हुए बोली, ‘‘क्या आप किसी की भी पेंटिंग बना सकते हैं?’’

राघव ने एक पल को उसे देखा और कहा, ‘‘कविता, हिलो मत…’’

उन की बात सुन कर कविता बुत बन गई. उसे खामोश देख कर राघव ने पूछा, ‘‘कविता, तुम चुप क्यों हो गईं?’’

कविता ने ठुनकते हुए कहा, ‘‘आप ने ही तो मुझे चुपचाप बैठने को कहा है.’’

राघव ने जोरदार ठहाका लगाया तो कविता बोली, ‘‘जानते हैं, कभीकभी मेरा भी मन करता है कि मैं फिर से डांस करना और लिखना शुरू कर दूं.’’

राघव ने आश्चर्य से कहा, ‘‘अच्छा, तो तुम डांसर होने के साथसाथ कवि भी हो. अच्छा बताओ क्या लिखती हो?’’

‘‘कविता.’’

राघव ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारा नाम नहीं पूछा.’’

‘‘मैं ने भी अपना नाम नहीं बताया है, बल्कि आप को यह बता रही हूं कि मैं कविता लिखती हूं.’’

राघव ने कहा, ‘‘कुछ मुझे भी सुनाओ, क्या लिखा है तुम ने.’’

कविता ने सकुचाते हुए अपनी एक कविता राघव को सुनाई और प्रतिक्रिया जानने के लिए उन की ओर देखने लगी, तो वह बोले, ‘‘कविता, तुम्हारी यह कविता तो बहुत ही अच्छी है.’’

कविता ने खुश होते हुए कहा, ‘‘आप को सच में अच्छी लगी?’’ फिर अचानक ही उदास हो कर वह बोली, ‘‘पर रंजन को तो यह बिलकुल पसंद नहीं आई थी. वह तो इसे बकवास कह रहे थे.’’

राघव कविता के सिर पर स्नेह से हाथ फिराते हुए बोले, ‘‘वह तो पागल है, तुम उस की बात पर ध्यान मत दिया करो और मैं तो कहूंगा कि तुम लिखो.’’

रात को कविता ने रंजन से कहा, ‘‘तुम मेरी कविताओं का मजाक बनाते थे न, पर जेठजी को तो बहुत पसंद आईं, देखो, उन्होंने मेरा कितना सुंदर स्केच बनाया है.’’

रंजन ने बिना स्केच की ओर देखे, फाइलें पलटते हुए कहा, ‘‘अच्छा है.’’

कविता नाराज होते हुए बोली, ‘‘तुम्हें तो कला की कोई कद्र ही नहीं है.’’

रंजन हंस कर बोला, ‘‘तुम और भैया ही खेलो यह कला और साहित्य का खेल, मुझे मत घसीटो इस सब में.’’

रंजन की बातों से कविता की आंखों में आंसू आ गए तो वह चुपचाप जा कर लेट गई. थोड़ी देर बाद कविता के गाल और होंठ चूमते हुए रंजन बोला, ‘‘तुम्हारी कविता…और वह स्केच…दोनों ही सुंदर हैं,’’ इतना कहतेकहते उस ने कविता को अपने आगोश में ले लिया.

अगले दिन रंजन आफिस से जाते समय कविता से बोला, ‘‘सुनो, बहुत दिनों से हम कहीं घूमने नहीं गए, आज शाम को तुम तैयार रहना, फिल्म देखने चलेंगे.’’

पति की यह बात सुन कर कविता खुश हो गई और वह पूरे दिन उत्साहित रही, फिर शाम 5 बजे से ही तैयार हो कर वह रंजन का इंतजार करने लगी.

राघव ने उसे गौर से देखा, धानी रंग की साड़ी में कविता सचमुच बहुत सुंदर लग रही थी. वह पूछ बैठे, ‘‘क्या बात है कविता, आज कहीं जाना है क्या?’’

कविता मुसकरा कर बोली, ‘‘आज रंजन फिल्म दिखाने ले जाने वाले हैं.’’

धीरेधीरे घड़ी ने 6 फिर 7 और फिर 8 बजा दिए, पर रंजन नहीं आया. कविता इंतजार करकर के थक चुकी थी. राघव ने देखा कि कविता अनमनी सी खड़ी है, तो पल भर में उन की समझ में सारा माजरा आ गया. उन्हें रंजन पर बहुत गुस्सा आया. फिर भी वह हंस कर बोले, ‘‘कोई बात नहीं कविता, चलो, आज हम दोनों आइसक्रीम खाने चलते हैं.’’

कविता ने भी बेहिचक बच्चों की तरह मुसकरा कर हामी भर दी.

राघव ने चलतेचलते कविता से कहा, ‘‘तुम रंजन की बातों का बुरा मत माना करो, वह जो कुछ कर रहा है, सब तुम्हारे लिए ही तो कर रहा है.’’

कविता व्यंग्य से बोली, ‘‘वह जो कर रहे हैं मेरे लिए कर रहे हैं? पर मेरे लिए तो न उन के पास समय है न मेरी परवा ही करते हैं. अगर मैं ही न रही तो उन का यह किया किस काम आएगा?’’

कविता के इस सवाल का राघव ने कोई जवाब नहीं दिया. शायद वह जानते थे कि कविता सही ही कह रही है.

वे दोनों आइसक्रीम खा रहे थे कि एक भिखारी उन के पास आ कर बोला, ‘‘2 दिन से भूखा हूं, कुछ दे दो बाबा.’’

राघव ने जेब से 10 रुपए निकाल कर उसे दे दिए.

वह आशीर्वाद देता हुआ बोला, ‘‘आप दोनों की जोड़ी सलामत रहे.’’

कविता ने एक पल को राघव की ओर देखा और अपनी नजरें झुका लीं.

दोनों घर पहुंचे तो देखा कि रंजन आ चुका था. कविता को देखते ही रंजन भड़क कर बोला, ‘‘कहां चली गई थीं तुम? कितनी देर से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं, अब जल्दी चलो.’’

कविता ने भी बिफर कर कहा, ‘‘मुझे पूरी फिल्म देखनी थी, उस का अंत नहीं. मैं बहुत थक गई हूं, अब मुझे कहीं नहीं जाना है.’’

रंजन की आंखें क्रोध से दहक उठीं, ‘‘क्या मतलब है इस का? नहीं जाना था तो पहले बतातीं, मैं अपना सारा काम छोड़ कर तो नहीं आता…’’

कविता की आंखों में आंसू छलक आए, ‘‘काम, काम और बस काम…मेरे लिए कभी समय होगा तुम्हारे पास या नहीं? मैं 5 बजे से इंतजार कर रही हूं तुम्हारा, वह कुछ नहीं…तुम्हें 5 मिनट मेरा इंतजार करना पड़ा तो भड़क उठे?’’

गुस्से से पैर पटकते हुए रंजन बोला, ‘‘तुम्हारी तरह मेरे पास फुरसत नहीं है और फिर यह सब मैं तुम्हारे लिए नहीं तो किस के लिए करता हूं?’’

कविता ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मैं तुम से बस, तुम्हारा थोड़ा सा समय मांगती हूं, वही दे दो तो बहुत है, और कुछ नहीं चाहिए मुझे,’’ इतना कह कर कविता अपने कपड़े बदल कर लेट गई.

राघव ने उन दोनों की बातें सुन ली थीं, उन्हें लगा कि दोनों को अकेले में एकदूसरे के साथ समय बिताना बहुत जरूरी है, अगले दिन शाम को जब राघव आफिस से आए तो बोले, ‘‘मां, मैं आफिस के काम से 15 दिन के लिए बनारस जा रहा हूं, तुम भी चलो मेरे साथ, रास्ते में तुम्हें मौसी के पास इलाहाबाद छोड़ दूंगा और लौटते हुए साथ ही वापस आ जाएंगे.’’

राघव की बात पर मां तैयार हो गईं. कविता ने जब यह सुना तो एक पल को वह उदास हो गई. वह मां से बोली, ‘‘मैं  अकेली पड़ जाऊंगी मां, आप मत जाओ.’’

मां ने कविता को समझाते हुए कहा, ‘‘रंजन तो है न तेरा खयाल रखने के लिए, अब कुछ दिन तुम दोनों एकदूसरे के साथ बिताओ.’’

अगले दिन राघव और मां चले गए. रंजन आफिस जाने लगा तो कविता अपने होंठों पर मुसकान ला कर बोली, ‘‘आप आज आफिस मत जाओ न, कितने दिन हो गए, हम ने साथ बैठ कर समय नहीं बिताया है.’’

रंजन बोला, ‘‘नहीं, कविता, आज आफिस जाना बहुत जरूरी है, पर मैं शाम को जल्दी आ जाऊंगा, फिर हम कहीं बाहर खाना खाने चलेंगे.’’

पहेली : कौन था नव्या का कातिल? – भाग 2

इसी उधेड़बुन में वे नव्या के मायके पहुंचे. नव्या के मांबाप फिर मुकुल का नाम ले कर शोर मचाने लगे. राघव ने उन को समझाया.

‘‘देखिए हम मुलजिम को जरूर पकड़ेंगे लेकिन जल्दबाजी किसी निर्दोष को फंसा सकती है, इसलिए हमारा सहयोग कीजिए.’’

नव्या के पिता ये सुन कर शांत हुए. उन्होंने हर तरह से सहयोग देने की बात कही.

राघव ने पूछा, ‘‘नव्या का मुकुल के अलावा किसी से कोई विवाद था?’’

‘‘नहीं इंसपेक्टर साहब.’’ नव्या के पिता बोले, ‘‘उस की तो सब से दोस्ती थी, बैंक में भी सब उस से खुश रहते थे.’’

‘‘और विमल से उस का क्या रिश्ता था?’’ राघव ने उन के चेहरे पर गौर से देखते हुए सवाल किया. वे इस पर थोड़ा अचकचा गए.

‘‘व…वो…वो…दोस्ती थी उस से भी… मुकुल बेकार में शक किया करता था उन के संबंध पर.’’

राघव ने इस समय इस से ज्यादा कुछ पूछना ठीक नहीं समझा. वो वहां से निकल गए. अगले कुछ दिन इधरउधर हाथपैर मारते बीते. उन्होंने नव्या के बैंक जा कर उस के बारे में जानकारियां जुटाईं. सब ने साधारण बातें ही बताई. कोई नव्या और विमल के रिश्तों के बारे में कुछ कहने को तैयार नहीं था.

राघव ने नव्या के उस शाम बैंक से निकलते समय की सीसीटीवी फुटेज निकलवा कर देखी. वह अकेली ही अपनी कार में बैठती दिख रही थी. राघव की अन्य कर्मचारियों से तो बात हुई, लेकिन विमल से मुलाकात नहीं हो सकी, क्योंकि वह नव्या की मौत के बाद से ही छुट्टी पर चला गया था.

उन्होंने उस का पता निकलवाया और अपनी टीम के साथ उस के घर जा धमके. वह उन को देख कहने लगा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, मैं खुद बहुत दुखी हूं नव्या के जाने से, पागल जैसा मन हो रहा मेरा, मुझे परेशान मत करिए.’’

विमल की हकीकत क्या थी?

‘‘हम भी आप के दुख का ही निवारण करने की कोशिश में हैं विमल बाबू.’’ राघव ने अपना काला चश्मा उतारते हुए कहा, ‘‘आप भी मदद करिए, हम दोषियों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे डालना चाहते हैं.’’

‘‘पूछिए, क्या जानना चाहते हैं आप.’’ वो सोफे पर निढाल होता बोला. सवालजवाब का दौर चलने लगा. विमल ने बताया कि उस ने उस दिन नव्या को औफिस के बाद अपने घर बुलाया था. लेकिन उस ने मना कर दिया कि पति से झगड़ा और बढ़ जाएगा. वह अपनी कार से निकल गई थी. उस ने अगले दिन किसी पारिवारिक कारण से औफिस न आने की बात की थी. हां, विमल ने भी ये नहीं स्वीकारा कि नव्या से उस की बहुत अच्छी दोस्ती से ज्यादा कोई नाता था.

‘‘ठीक है, विमल बाबू.’’ राघव ने उठते हुए कहा, ‘‘आप का धन्यवाद. फिर जरूरत होगी तो याद करेंगे… बस आप ये शहर छोड़ कर कहीं मत जाइएगा.’’

‘‘जी जरूर.’’

राघव की जीप वहां से चल दी. अब तक इस केस में कुछ भी ऐसा हाथ नहीं लग पाया था जिस से तसवीर साफ हो. उन्होंने अपने मुखबिरों के माध्यम से भी पता लगाना चाहा कि नव्या की हत्या के लिए क्या किसी लोकल गुंडे ने सुपारी ली थी. लेकिन ऐसा भी कुछ मालूम नहीं हो सका. किसी गैंग की भी ऐसी कोई सुपारी लेने की बात सामने नहीं आ पा रही थी.

शाम को राघव घर जाने के लिए निकलने ही वाले थे कि सिपाही ने एक लिफाफा ला कर दिया और बोला, ‘‘साब, ये अभी आया डाक से… लेकिन भेजने वाले का कोई नाम, पता नहीं लिखा.’’

राघव ने लिफाफे को खोला. उस में एक सीडी और चिट्ठी थी. उन्होंने उसे पढ़ना शुरू किया. उस में लिखा था, ‘‘इंसपेक्टर साहब, आप को नव्या के बैंक में जो सीसीटीवी फुटेज दिखाई गई, वो पूरी नहीं थी. विमल ने उस में पहले ही एडिटिंग करा दी थी. नव्या की मौत वाली शाम विमल उस के साथ उस की ही कार में निकला था. आप को इस बात का सबूत इस सीडी में मिल जाएगा.’’

चिट्ठी पढ़ते ही राघव की आंखों में चमक आ गई. उन्होंने जल्दी से उसे अपने लेपटौप पर लगाया. वाकई वीडियो में विमल उस शाम नव्या की कार में अंदर बैठता दिख रहा था. राघव को अपना काम काफी हद बनता लगा. वे सिपाहियों के साथ सीधे विमल के घर पहुंचे. देखा कि वह कहीं जाने के लिए पैकिंग कर रहा था. राघव पुलिसिया अंदाज में उस से बोले, ‘‘कहां चले विमल बाबू? आप को शहर से बाहर जाने को मना किया था न?’’

वो उन्हें वहां पा कर घबरा गया और हकलाने लगा.

‘‘म…मैं क…कहीं नहीं जा रहा. बस सामान सही कर रहा था.’’

‘‘इस की जरूरत अब नहीं पड़ेगी.’’ राघव ने फिर कहा, ‘‘चल थाने, वहीं सब सामान मिलेगा तुझे.’’

विमल कसमसाता रहा, खुद को निर्दोष बताता रहा लेकिन सिपाहियों ने उसे जीप में डाल लिया. लौकअप में राघव के थप्पड़ विमल को चीखने पर मजबूर कर रहे थे. वह किसी तरह बोला, ‘‘सर, मैं ने कुछ नहीं किया, हां मैं उस के साथ निकला जरूर था लेकिन रास्ते में उतर गया था, वो आगे चली गई थी.’’

‘‘तो हम से ये बात छिपाई क्यों?’’ राघव ने उसे कड़कदार 2 थप्पड़ और लगाते हुए पूछा.

‘‘म्म्म मैं घब…घबरा गया था साहब कि कहीं मेरा नाम शक के दायरे में न आ जाए.’’

राघव ने उस के सैंपल लैब में भिजवा दिए जिस से नव्या के गुप्तांगों और कपड़ों पर मिले वीर्य से उस का मिलान करा के जांच की जा सके. रिपोर्ट तीसरे दिन ही आ गई. सचमुच नव्या के जिस्म से जितने लोगों के वीर्य मिले थे, उन में एक विमल से मैच कर गया.

राघव ने मारमार के विमल की देह तोड़ दी. उन्होंने उस से पूछा, ‘‘बोल, बोल तूने नव्या को क्यों मारा?’’

विमल ने खोला भेद, लेकिन अधूरा

‘‘साब मैं ने कुछ नहीं किया.’’ वो जोरजोर से रोते हुए बोला, ‘‘हां मैं ने कार में उस के साथ जिस्मानी संबंध जरूर बनाए थे लेकिन उस को मारा नहीं… मैं सैक्स कर के उतर गया था उस की गाड़ी से.’’

‘‘स्साला.’’ राघव का गुस्सा बढ़ता जा रह था. वे उस पर गरजे, ‘‘रुकरुक के बातें बता रहा है. जैसेजैसे भेद खुलता जा रहा है वैसेवैसे रंग बदल रहा है. तू मुझ से करेगा होशियारी?’’

उन्होंने फिर से मुक्का ताना लेकिन विमल बेहोश होने लगा था. वे उसे वहीं छोड़ कर बाहर निकले.

‘‘इस को तब तक कुरसी से मत खोलना जब तक ये पूरी बात न बता दे.’’ शर्ट पहनतेपहनते उन्होंने सिपाही को आदेश दिया. वहां नव्या के मायके वाले भी आए हुए थे. विमल के बारे में जान कर उन्हें मुकुल पर लगाए अपने आरोपों पर बहुत पछतावा हो रहा था.

‘‘इस ने अपना जुर्म कबूल किया क्या इंसपेक्टर साहब?’’ नव्या के पिता ने जानना चाहा.

‘‘नहीं, अभी तक अपनी बेगुनाही का रोना रो रहा है. चालू चीज लगता है ये.’’ राघव ने लौकअप की ओर देख के उत्तर दिया. नव्या के मांबाप सीधे मुकुल के घर पहुंचे.

‘‘बेटा, हम को माफ कर देना, हम ने आप पर शक किया.’’ नव्या की मां उस से बोली. मुकुल ने धीरे से मुसकरा के सिर हिलाया. तब तक उस की मां चायपानी ले आई थी. कुछ दिन बीत गए. राघव ने विमल से सच जानने के लिए पूरा जोर लगा रखा था लेकिन वह यही दोहराता रहता कि वो निर्दोष है. उस के वकील के आ जाने से अब उस पर सख्ती करना भी मुश्किल लग रहा था.

एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें