घर का चिराग: क्या बेटे और बेटी का फर्क समझ पाई नीता

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मैं अहम हूं- भाग 3: शशि की लापरवाही

फिर उस के कमाने से क्या फायदा हुआ, सिवा इस के कि घर का खर्चा पहले से बढ़ गया. सब कपड़े धोबी को जाने लगे और कपड़ों का नुकसान भी ज्यादा होने लगा. अब महरी को भी काम बढ़ जाने से ज्यादा पैसे देने पड़ते थे. आटो का खर्च अलग, इस प्रकार मासिक खर्च बढ़ ही गया. इस के अलावा घर और बच्चे अव्यवस्थित हो गए सो अलग. सास बेचारी दिनभर काम में पिसती रहती. और जब  नहीं कर पाती तो बड़बड़ाती रहती. इन्हीं 2 महीनों में घर की शांति भंग हो गई. जिस पर उस ने जो कल्पना की थी कि अपनी तनख्वाह से घर की सजावट के लिए कुछ खरीदेगी, उसे कार्यरूप से परिणत करना कितना मुश्किल है, यह उसे तुरंत पता लग गया. उसे कुछ कहने में ही झिझक हो रही थी. कहीं अजय यह न समझ ले कि उस ने सिर्फ इन दिखावे की चीजों के लिए ही नौकरी की है. अजय के मन में हीनभावना भी आ सकती है. पर यह सब उसे पहले क्यों नहीं सूझा? खैर, अब तो सुध आई. ‘बाज आई ऐसी नौकरी से,’ उस ने मन ही मन सोचा, ‘बच्चे जरा बड़े हो जाएं तो देखा जाएगा.’

अगले दिन उस ने अजय के चपरासी के हाथों एक महीने का नोटिस देते हुए अपना त्यागपत्र तथा एक दिन के आकस्मिक अवकाश की अरजी भेज दी. अजय ने यही समझा कि शायद तबीयत खराब होने से 1-2 दिन की छुट्टी ले रखी है. बादल उमड़घुमड़ रहे थे और बारिश की हलकीहलकी बूंदें भी पड़नी शुरू हो चुकी थीं. बहुत दिनों बाद उस रात को दोनों चहलकदमी को निकले. अजय ने पूछा, ‘‘क्यों, अचानक तुम्हारी तबीयत को क्या हो गया, तुम ने कितने दिन की छुट्टी ले ली है?’’

शशि बोली, ‘‘हमेशा के लिए.’’ अजय परेशान सा उस की ओर देखने लगा, ‘‘सच, शशि, सच, अब तुम नहीं जाओगी स्कूल? चलो, अब कमीजपैंट में बटन नहीं टांकने पड़ेंगे. धोबी को डांटने का काम भी अब तुम संभाल लोगी. हां, अब रात को थके होने का बहाना भी नहीं कर सकतीं. पर यह तो बताओ, नौकरी छोड़ क्यों दी?’’

शशि उस के उतावलेपन को देख कर हंसते हुए मजा ले रही थी. उसे पति पर दया भी आई, बोली, ‘‘हां, मुझे नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए थी, जनाब दरजी तो बन ही जाते. अजीब आदमी हो, कम से कम एक बार तो मुंह से कहा होता कि शशि, तुम्हारे स्कूल जाने से मुझे कितनी परेशानी होती है.’’ डियर, हम तो शुरू से कहना चाहते थे, पर हमारी बात आप को तब जंचती थोडे़ ही. हम ने भी सोचा कर लेने दो थोड़े मन की, अपनेआप सब हाल सामने आएगा तो जान जाएगी. पर यह उम्मीद नहीं थी कि तुम इतनी जल्दी नौकरी छोड़ने को तैयार हो जाओगी. खैर, तुम ने अपनी परिस्थिति पहचान ली तो सब ठीक है,’’ फिर थोड़ा रुक कर बोले, ‘‘हां, शशि सद्गृहिणी बनना कितना कठिन है. तुम जब अपने इस दायित्व को अच्छे से निभाती हो तो मुझे कितना गर्व होता है, मालूम है? यह मत सोचो कि मैं तुम्हें घर से बांधने की कोशिश कर रहा हूं. मेरी ओर से पूरी छूट है, तुम पढ़ोलिखो, कुछ नया सीखो, पर अपने दायित्व को समझ कर.’’

फिर कुछ दूर दोनों मौन चलते रहे. अजय को लग रहा था कि शशि कुछ पूछना चाह रही है, पर हिचक रही है. 2-3 बार उस ने शशि की ओर देखा, मानोे हिम्मत बंधा रहा हो. ‘‘इंदु को देख कर आप को यह नहीं लगता कि वह कितनी लायक औरत है, उस ने अपना घर कैसे सजा लिया है. तब आप को मुझ में कमी नहीं लगती?’’ आखिर शशि ने पूछ ही लिया. अजय इतना खुल कर हंसे कि राह के इक्कादुक्का लोग भी मुड़ कर उन की ओर देखने लगे. आखिर हंसने का यह कैसा और कौन सा मौका है, शशि समझ न पाई. जब उन की हंसी रुकी तो बोले, ‘‘तुम को क्या लगता है कि मनोज बहुत खुश है. वह क्या कह रहा था मालूम है? ‘यार, जबान का स्वाद ही चला गया. मनपसंद चीजें खाए अरसा हो गया. श्रीमतीजी दफ्तर से आ कर परांठे सेंक देती हैं, बस. इतवार के दिन वे छुट्टी के मूड में रहती हैं. देर से उठना, आराम से नहानाधोना, फिर होटल में खाना, पिक्चर, बस. यार, तू बड़ा सुखी है. यहां तो हर महीने मांबाप को रुपए भेजने पर टोका जाता है. आखिर मांबाप के प्रति कुछ फर्ज भी तो है कि नहीं?

‘‘और सुनोगी? उस दिन हमारे बच्चों को देख कर बोला, ‘यार, तुम्हारे बच्चे कितने सलीके से रहते हैं. इच्छा तो होती है कि इंदु को बताऊं कि देखो, इन बच्चों को शिष्टचार की कोई सीख कौन्वैंट या पब्लिक स्कूल से नहीं, बल्कि मां के सिखाने से मिली है.’

‘‘मैं ने यह सुन कर कैसा अनुभव किया होगा, तुम अनुमान लगा सकती हो, यही तुम्हारी जीत थी, और तुम्हारी जीत यानी मेरी जीत. इंदु की आधी तनख्वाह तो अपनी साडि़यों, मेकअप, होटल और सैरसपाटे में खर्च हो जाती है. बेटे को छात्रावास में रखने का खर्च अलग. उस में अहं की भावना है, और ‘मेरे’ की भावना से ग्रस्त वह यही समझती है कि उस के नौकरी करने से ही घर में इतनी चीजें आई हैं. जहां यह ‘मेरे’ की भावना आई, घर की सुखशांति नष्ट समझो.’’ कुछ रुक कर अजय बोले, ‘‘चलो, शशि, अब घर चलें, काफी दूर निकल आए हैं,’’ फिर धीरे से बोले, ‘‘आज के बाद रात को थकान का बहाना न चलेगा.’’

शशि को गुदगुदी सी हुई और बहुत दिनों बाद उस के मन में बसी बेचैनी दूर जाती लगी.

बयार बदलाव की- भाग 3 : नीला की खुशियों को किसकी नजर लग गई थी

‘चलोचलो उठो, तुम्हारी नहीं, मेरी मम्मी हैं. पूरे महीने मु?ो मम्मी के पास नहीं फटकने दिया. खुद ही चिपकी रहीं,’’ छेड़ता हुआ रमन उसे धकेलने लगा. नीला और भी बांहें फैला कर मम्मी की गोद से चिपक गई. देख कर रमन हंसने लगा.

शाम को जाने की सारी तैयारी हो गई. वे दोनों मम्मीपापा को छोड़ने एयरपोर्ट चले गए. एयरपोर्ट के बाहर मम्मीपापा को छोड़ने का समय आ गया. वह दोनों को नमस्कार कर उन के गले लग गया. उस का खुद का मन भी बहुत उदास हो रहा था. पर उसे पता था वह तो कल से काम में व्यस्त हो जाएगा पर नीला को मम्मीपापा की कमी शिद्दत से महसूस होगी.

पापा से गले लग कर नीला मम्मी के गले से चिपक गई. मम्मी ने भी प्यार से उसे बांहों में भींच लिया. वह थोड़ी देर तक अलग नहीं हुई तो वह सम?ा गया कि भावुक स्वभाव की नीला रो रही है. मम्मी की आंखें भी भर आई थीं. नीला को अपने से अलग कर उस की आंखें पोंछती हुई प्यार से बोलीं, ‘‘जल्दी आएंगे बेटा. अब तुम आओ छुट्टी ले कर,’’ रमन भी पास में जा कर खड़ा हो गया. नीला के इर्दगिर्द बांहों का घेरा बनाते हुए बोला, ‘‘जी मम्मी, जल्दी ही आएंगे.’’

‘‘अच्छा बेटा,’’ मम्मीपापा ने दोनों के गाल थपके और सामान की ट्रौली धकेलते, उन्हें हाथ हिलाते हुए एयरपोर्ट के अंदर चले गए. रमन और नीला भरी आंखों से उन्हें जाते हुए देखते रहे. रमन सोच रहा था, बदलाव की बयार तो बहनी ही चाहिए चाहे वह मौसम की हो या विचारों की, तभी जीवन सुखमय होता है.

’’ मां उस के चेहरे पर मुसकराती नजर डाल कर बोलीं, ‘‘अभी वह बच्ची है. कल को बच्चे होंगे तो कई बातों में वह खुद ही परिपक्व हो जाएगी.’’

‘‘जी मम्मी, मैं भी यही सोचता हूं.’’

‘‘और बेटा, आजकल लड़की क्या और लड़का क्या, दोनों को ही समानरूप से गृहस्थी संभालनी चाहिए. वरना लड़कियां, खासकर महानगरों में, नौकरियां कैसे करेंगी जहां नौकरों की भी सुविधा नहीं है.’’

‘‘जी मम्मी, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा.’’

थोड़ी देर दोनों चुप रहे, फिर एकाएक रमन बोल पड़ा, ‘‘मम्मी, सच बताऊं तो मैं नहीं सोच पा रहा था कि आप नीला की पीढ़ी की लड़कियों के रहनसहन की आदतों व पहननेओढ़ने के तरीकों को इतनी स्वाभाविकता से ले लेंगी, इसलिए…’’ कह कर उस ने नजरें ?ाका लीं.

‘‘इसीलिए हमें आने के लिए नहीं बोल रहा था,’’ मम्मी हंसने लगीं, ‘‘तेरे मातापिता अनपढ़ हैं क्या?’’

‘‘नहीं मम्मी, आप की पीढ़ी तो पढ़ीलिखी है. मेरे सभी दोस्तों के मातापिता उच्चशिक्षित हैं पर पता नहीं क्यों बदलना नहीं चाहते.’’

‘‘बदलाव बहुत जरूरी है बेटा. समय को बहने देना चाहिए. पकड़ कर बैठेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे? रिश्ते भी ठहर जाएंगे, दूरियां भी बढ़ेंगी…’’

‘‘यह सम?ा सब में नहीं होती मम्मी,’’ यह बोला ही था कि तभी उस के पापा आ गए. नीला भी आंखें मलतेमलते उठ कर आ गई और मम्मी की गोद में सिर रख कर गुडमुड कर लेट गई. मम्मी हंस कर प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरने लगीं.

‘‘चलोचलो उठो, तुम्हारी नहीं, मेरी मम्मी हैं. पूरे महीने मु?ो मम्मी के पास नहीं फटकने दिया. खुद ही चिपकी रहीं,’’ छेड़ता हुआ रमन उसे धकेलने लगा. नीला और भी बांहें फैला कर मम्मी की गोद से चिपक गई. देख कर रमन हंसने लगा.

शाम को जाने की सारी तैयारी हो गई. वे दोनों मम्मीपापा को छोड़ने एयरपोर्ट चले गए. एयरपोर्ट के बाहर मम्मीपापा को छोड़ने का समय आ गया. वह दोनों को नमस्कार कर उन के गले लग गया. उस का खुद का मन भी बहुत उदास हो रहा था. पर उसे पता था वह तो कल से काम में व्यस्त हो जाएगा पर नीला को मम्मीपापा की कमी शिद्दत से महसूस होगी.

पापा से गले लग कर नीला मम्मी के गले से चिपक गई. मम्मी ने भी प्यार से उसे बांहों में भींच लिया. वह थोड़ी देर तक अलग नहीं हुई तो वह सम?ा गया कि भावुक स्वभाव की नीला रो रही है. मम्मी की आंखें भी भर आई थीं. नीला को अपने से अलग कर उस की आंखें पोंछती हुई प्यार से बोलीं, ‘‘जल्दी आएंगे बेटा. अब तुम आओ छुट्टी ले कर,’’ रमन भी पास में जा कर खड़ा हो गया. नीला के इर्दगिर्द बांहों का घेरा बनाते हुए बोला, ‘‘जी मम्मी, जल्दी ही आएंगे.’’

‘‘अच्छा बेटा,’’ मम्मीपापा ने दोनों के गाल थपके और सामान की ट्रौली धकेलते, उन्हें हाथ हिलाते हुए एयरपोर्ट के अंदर चले गए. रमन और नीला भरी आंखों से उन्हें जाते हुए देखते रहे. रमन सोच रहा था, बदलाव की बयार तो बहनी ही चाहिए चाहे वह मौसम की हो या विचारों की, तभी जीवन सुखमय होता है.

मां की उम्मीद- भाग 2 : क्या कामयाब हो पाया गोपाल

गोपाल डर से कांप रहा था और उस के दिल की धड़कन तेज होती जा रही थी. पर जैसे ही उन लड़कों के हाथ उस की चोटी पर पहुंचते कि क्लास टीचर आते हुए दिख गए. उन्हें देखते ही सब लड़के अपनीअपनी डैस्क की ओर भाग गए और उस की जान बच गई.

क्लास टीचर ने सब की हाजिरी लगाई और पूछा, ‘‘आज नया लड़का कौन आया है क्लास में?’’

कुछ देर पहले हुई घटना से गोपाल अभी भी डरा हुआ था. डरतेडरते उस ने अपना हाथ उठाया था. मास्टरजी ने अपने मोटे चश्मे को नाक के ऊपर चढ़ाया और उस की ओर कुछ पल ध्यान से देखा, मानो उस का परीक्षण कर रहे हों, फिर बोले, ‘‘गणित में पक्के हो?’’

गोपाल को समझ में नहीं आया कि क्या जवाब दे. मास्टरजी ने एकाएक उस पर सवालों की बौछार कर दी थी, ‘‘खड़े हो जाओ और जल्दीजल्दी बताओ कि 97 और 83 कितना हुआ?’’

गोपाल ने एक पल सोचा और बोला, ‘‘180.’’

‘‘सोलह सत्ते कितना?’’

‘‘एक सौ बारह,’’ गोपाल ने तुरंत जवाब दिया.

‘‘तेरह का पहाड़ा बोलो,’’ टीचर ने आगे कहा.

‘‘तेरह एकम तेरह,

तरह दूनी छब्बीस, तेरह तिया उनतालीस… तेरह नम एक सौ सत्रह, तेरह धाम एक सौ तीस,’’ गोपाल एक ही सांस में तेरह का पहाड़ा पढ़ गया.

‘‘उन्नीस का पहाड़ा आता है?’’

‘‘जी आता है. सुनाऊं क्या?’’ गोपाल का आत्मविश्वास अब बढ़ रहा था.

‘‘नहीं रहने दो,’’ टीचर की आवाज अब कुछ नरम हो गई थी.

‘‘तुम्हें पहाड़े किस ने सिखाए?’’

‘‘मां ने घर पर ही सिखाए हैं,’’ गोपाल ने दबी आवाज में जवाब दिया था.

‘‘तुम्हारी मां कितनी पढ़ीलिखी हैं?’’ मास्टरजी की आवाज में अविश्वास था.

‘‘नहीं गुरुजी, मां पढ़ीलिखी नहीं हैं.  उन्होंने तो मुझे सिखाने के लिए मेरे बड़े भाई से पहाड़े सीखे थे.’’

‘‘हम्म… बैठ जाओ,’’ मास्टरजी की आवाज में गोपाल को कुछ तारीफ के भाव दिखे और वह बैठ गया. लगा, तनाव अब कुछ कम हो गया था.

मास्टरजी क्लास टीचर होने के अलावा बच्चों को गणित भी पढ़ाते थे. वे बहुत लायक मास्टर थे, बहुत मेहनत से छात्रों को पढ़ाते थे और उन से ऊंची उम्मीद भी रखते थे. उम्मीद पूरी न होने पर उन का पारा चढ़ जाता था और गुस्सा उतरता था बच्चों की हथेलियों पर, उन की छड़ी की लगातार मार से. और इस छड़ी की मार से सभी बच्चे बहुत डरते थे. उन का मकसद तो बस इतना था कि उन का कोई छात्र गणित में कमजोर न रह जाए.

ऐसे ही धीरेधीरे एक महीना निकल गया. उन 3 शैतानों की तिगड़ी गोपाल को परेशान करने का और मजाक बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी. कभी उस के बालों का मजाक तो कभी उस के कपड़ों का. असहाय सा हो कर गोपाल सब सहता था, इस के अलावा उस के पास और कोई चारा भी तो नहीं था.

वे 3 थे, शारीरिक रूप से बलशाली थे और शहर के दबदबे वाले परिवारों से थे. वे तीनों तो स्कूल भी रोज कार से आते थे और उन का ड्राइवर उन का बस्ता और खाने का डब्बा क्लास तक छोड़ कर जाता था.

उन की तुलना में तो गोपाल एक बेहद गरीब परिवार से था, जिसे स्कूल की फीस देना भी मुश्किल लगता था, अपनी साइकिल चला कर 5 किलोमीटर दूर से आता था. खाने के डब्बे में तो बस 2 नमकीन रोटी और अचार होता था.

यों ही दिन निकलते गए और तिमाही इम्तिहान का समय आ गया था. तिमाही इम्तिहान के नंबर बहुत अहम थे, क्योंकि उस के 25 फीसदी सालाना इम्तिहान के नतीजे में जुड़ते थे, इसीलिए सभी छात्रों से यह उम्मीद होती थी कि वे इन इम्तिहानों को गंभीरता से लें.

इम्तिहान होने के तकरीबन एक हफ्ते बाद जब मास्टरजी हाथ में 35 कापियां लिए घुसे, क्लास में सन्नाटा सा छा गया था. मास्टरजी ने कापियां धम्म से मेड़ पर पटकीं, अपनी छड़ी ब्लैकबोर्ड पर टिकाई और हुंकार भरी,

‘मुरकी वाले…’’

‘‘जी मास्टरजी,’’ गोपाल डर के मारे स्प्रिंग लगे बबुए की तरह उछल कर खड़ा हो गया था.

‘‘यह तुम्हारी कौपी है?’’

‘‘जी

मास्टरजी,’’ गोपाल की जबान डर से लड़खड़ा गई थी.

‘‘इधर आओ,’’ मास्टरजी की रोबदार आवाज कमरे में गूंजी तो गोपाल के हाथपैर ठंडे होने

लगे और वह धीरेधीरे मास्टरजी की मेज की तरफ बढ़ा.

‘‘अरे, जल्दी चल. मां ने खाना नहीं दिया क्या आज?’’

गोपाल तेजी से भाग कर मास्टरजी की मेज के पास पहुंच गया. मन ही मन वह खुद को मास्टरजी की बेंत खाने के लिए भी तैयार कर रहा था.

मास्टरजी ने गोपाल को दोनों कंधों से पकड़ा और क्लास की तरफ घुमा दिया. उस के कंधों पर हाथ रखेरखे मास्टरजी बोले, ‘‘यह लड़का छोटा सा लगता है. रोज साइकिल चला कर गांव से स्कूल आता है,

पर पूरी क्लास में बस एक यही है जिस के 100 में से 100 नंबर आए हैं. शाबाश मेरे बच्चे, तुम ने मेरा दिल खुश कर दिया,’’ कहते हुए मास्टरजी ने गोपाल की पीठ थपथपाई तो उसे चैन की सांस आई.

अब मास्टरजी ने आखिरी बैंच की ओर घूर कर देखा और आवाज लगाई, ‘‘ओए मोटे, ओ मंदबुद्धि, अरे ओ अक्ल के दुश्मन… तीनों इधर आगे आओ. तुम तीनों तो मेरी क्लास के लिए काले धब्बे हो. तीनों को अंडा मिला है.’’

अब जो हुआ, वह तो गोपाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. मास्टरजी ने उसे अपनी छड़ी पकड़ाई और कहा, ‘‘तीनों के हाथों पर 10-10 बार मारो. तभी इन को अक्ल आएगी.’’

गोपाल अकबका कर खड़ा रह गया. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करे. एक लड़के ने फुसफुसा कर कहा, ‘‘धीरे से… नहीं तो…’’

गोपाल ने धीरे से उस लड़के की हथेली पर छड़ी मारी तो मास्टरजी की ऊंची आवाज कान में पडी, ‘‘जोर से मारो, नहीं तो डबल छडि़यां तुम्हारे हाथों पर पड़ेंगीं.’’

यह सुन कर तो गोपाल की हवा सरक गई और अगले 5 मिनट तक छडि़यों की आवाज कमरे में गूंजती रही.

और इस तरह से छोटे से गांव का वह छोटा सा लड़का अपनी क्लास का बेताज का बादशाह बन गया था. आने वाले 4 सालों में उस का सिक्का चलता रहा था. उसे समझ आ गया था कि पढ़ाई में सब से ऊपर रह कर ही वह अपने आत्मसम्मान को बचा सकता था.

अचानक होस्टल की बिजली चली गई और गरमी का एहसास गोपाल को अतीत से वर्तमान में खींच लाया. उठ कर वह कमरे के बाहर आ गया और बरामदे की दीवार पर बैठ गया. जून का महीना था, सुबह के 11 बज चुके थे और हवा गरम थी. पूरा होस्टल खाली पड़ा था. तकरीबन सभी छात्र गरमियों की छुट्टी में घर चले गए थे, पर वह वहीं रुक गया था. घर जा कर क्या करता, यहां रह कर लाइब्रेरी से किताबें ले कर वह आने वाली प्रतियोगात्मक परीक्षाओं की तैयारी कर सकता था.

आज सोमवार था और लाइब्रेरी बंद थी, इसलिए गोपाल बरामदे की दीवार पर बैठा नीले आकाश की ओर देख रहा था जहां कुछ पक्षी ऊंची उड़ान भर रहे थे. क्या वह भी कभी ऐसी उड़ान भर पाएगा? सोचतेसोचते ध्यान फिर से अतीत की गलियों में भटक गया.

4 साल पहले, देहरादून में माता वाले बाग के पास वह एक छोटा सा कमरा जहां गोपाल और उस के बड़े भाई रहते थे. रात का समय था. कमरे में बान की 2 चारपाइयां पड़ी थीं. उन के बीच एक लकड़ी का फट्टा रखा था और उस फट्टे पर मिट्टी के तेल वाली एक लालटेन रखी थी, जिस से दोनों को रोशनी मिल रही थी.

गोपाल इंटरमीडिएट इम्तिहान की तैयारी कर रहा था और बड़े भैया एमए की. दोनों भाई अपनीअपनी चारपाई पर पालथी मार कर बैठे हुए थे, किताब गोद में थी और इम्तिहान की तैयारी चल रही थी. कमरे में सन्नाटा था,

बस कभीकभी पन्ना पलटने की आवाज आती थी.

लालटेन की लौ अचानक भभकने लगी.

‘‘चलो, अब सो जाते हैं. लगता है लालटेन में तेल खत्म हो रहा है,’’ बड़े भैया ने चुप्पी तोड़ी.

‘‘पर मेरी पढ़ाई तो पूरी नहीं हुई है,’’ गोपाल ने दबा हुआ सा विरोध किया.

‘‘समझा करो न. घर में और तेल नहीं है. अगर कल ट्यूशन के पैसे मिल गए तो मैं तेल ले आऊंगा. अब किताबें रख दो और सो जाओ. मैं भी सो रहा हूं.  और कोई तरीका नहीं है,’’ कहते हुए बड़े भैया ने किताबें जमीन पर रख दीं और करवट बदल कर लेट गए.

लालटेन की लौ एक बार जोर से भड़की और लालटेन बुझ गई. कोठरी में पूरी तरह अंधकार छा गया था.

गोपाल ने अंधेरे में ही किताबें उठाईं और दबे पैर कमरे के बाहर निकल गया.

ताईजी: भाग 2- गलत परवरिश

पिछली रात जब वे दोनों बातें करने बैठी थीं तो विक्की के उन के पास आ कर चिपट कर बैठने पर रिचा ने उसे वहां से भगाने की चेष्टा की थी. पर वह वहां से जाना नहीं चाहता था. तब रिचा फूट पड़ी थी, ‘‘देखा दीदी, यह तो मेरी जान का दुश्मन बना हुआ है, कभी किसी से दो बातें नहीं कर सकती. देखिए, कैसे मुंह से मुंह जोड़ कर बैठा हुआ है. यहां सब बातें सुनेगा और वहां जा कर मांजी व अपने पिता से एक की दस लगाएगा. हर बात में अपनी टांग अड़ाएगा. मेरी छोटी बहन आई थी, तब भी इस ने बातें नहीं करने दीं. पीहर भी जाती हूं तो मां, बहनों, भाभी व सहेलियों से जरा भी बात नहीं करने देता. सच कहती हूं, बड़ी परेशान हो गई हूं, अब तो इस के मारे कहीं जाने का मन भी नहीं करता.’’

‘‘ठीक है, ठीक है. मैं आप के पास रहना ही कब चाहता हूं. मैं तो अब बड़े ताऊजी के पास बरेली जा रहा हूं. पिताजी ने उन से बात कर ली है,’’ विक्की बेफिक्री से बोला.

‘‘अरे, यह बरेली जाने की क्या बात है?’’ विभा ने पूछा.

‘‘दीदी, यह इतना बिगड़ता जा रहा है, इसी कारण हम लोग इसे बड़े भैया के पास भेजने की सोच रहे हैं.’’

‘‘वहां कोई अच्छा स्कूल है क्या?’’

‘‘न सही, पर उन का अनुशासन तो रहेगा ही. हमारी तो सुनता नहीं है, उन की तो सुनेगा. अब तो 7वीं कक्षा में आ गया है.’’

‘‘मतलब, अपनी बला औरों के सिर डालने से है? जब तुम सारा दिन बच्चे के सामने यही राग अलापती रहोगी कि हमारी तो सुनता नहीं, हमारी तो सुनता नहीं है, तो वह क्यों सुनेगा तुम्हारी?’’ विभा कुछ नाराजगी के साथ बोली.

‘‘दीदी, आप तो हर बात का दोष मुझे ही दे देती हो, बस.’’

‘‘रिचा, समझने की कोशिश तो करो. बच्चे प्यार के भूखे होते हैं. यों थोड़ीबहुत सख्ती कर लो, पर हर समय उसे सुनाते रहना, ताने देना, व्यंग्य कसना, बातबात पर डांटना, मारना, हर एक से उस की बुराई करना, किसी मां को शोभा नहीं देता. दूसरे के पास भेज तो दोगी, पर वे भी इस के साथ क्या सख्ती बरत सकेंगे? और यदि सिखाने के लिए सख्ती करेंगे तो कल को तुम्हें ही नागवार गुजरेगा. इस से तो अच्छा है कि किसी अच्छे होस्टल में इसे डाल दो.’’ ‘‘पहली बात तो यह है कि इसे इतने कम नंबरों पर किसी अच्छे स्कूल में दाखिला मिलेगा ही नहीं, फिर अच्छे महंगे स्कूलों के होस्टलों में ‘ड्रग्स’ का कितना चलन हो गया है आजकल, यह तो कुछ भी कर सकता है. दीदी, आप को पता नहीं है, इसे तो केवल मैं ही समझ सकती हूं. अभी से अपने पास पर्स रखता है, वह भी रुपयों से भरा होना चाहिए, नहीं तो रोनाधोना मचा देता है. इस से बाजार से सब्जी मंगवाती हूं तो बाकी के रुपए वापस नहीं करता. एक मुसीबत है क्या इस लड़के के साथ… अब मैं इस से लिख कर हिसाब मांगती हूं,’’ रिचा सिसकती हुई बोली.

‘बच्चे को मेरे प्रश्न से कितना आघात लगा है,’ सोच कर विभा अनमनी सी हो आई. बच्चे का कोमल हृदय दुखाने के लिए उस ने यह सब नहीं पूछा था, वह तो केवल यही जानना चाहती थी कि बच्चे की मानसिक दशा कैसी है? क्यों वह इस प्रकार का अभद्र व्यवहार अपनी मां के साथ करता है? विभा वहां अपने पति के साथ 8-10 दिन के लिए आई हुई थी. रिचा उस की सब से छोटी देवरानी थी. आयु में भी वह विभा से काफी छोटी थी. इस कारण विभा उस पर अपना अधिकार जमा लेती थी. विभा बहुत समझदार थी और पूरे परिवार में उस का बड़ा मान था. रिचा भी उस से परामर्श लेने हेतु उसे अपने मन की सब बातें बता दिया करती थी. दोनों भाइयों में भी बहुत स्नेहभाव था.

विक्की रिचा के विवाह के कई वर्षों के बाद हुआ था. इस से पूर्व उस के 2 बेटे जन्मते ही जाते रहे थे. सो, विक्की से परिवार के सब ही लोगों का असीम स्नेह था. रिचा हर समय अपने इकलौते बेटे के भविष्य के लिए चिंतित रहती थी. संयुक्त परिवार होने के कारण वह अपने मनोनुकूल अधिक कर नहीं पाती थी. पिछले 2-3 वर्षों से विक्की बिगड़ने लगा था, बड़ों के अत्यधिक लाड़प्यार ने उसे जिद्दी और चटोरा तो बनाया ही था, साथ ही अपनी बात मनवाने के लिए वह झूठ भी बोलने लगा था.

ऐसे में रिचा का दुख क्रोध के रूप में बाहर निकलता था. पति तो बच्चे की शिक्षा पर तनिक भी ध्यान केंद्रित नहीं करते थे, अधिक से अधिक ट्यूटर लगा दिया. पुत्र को अपने पिता द्वारा जिस व्यवहार, शिष्टाचार, शिक्षा, मार्गदर्शन, स्नेह और दुलार की अपेक्षा होती है, विक्की उस से पूर्णतया वंचित रहा था. हां, बच्चे के प्रति उन के लाड़प्यार में कोई कमी नहीं थी, उस की मुंहमांगी वस्तु उसे तत्क्षण प्राप्त हो जाती थी. इस कारण वह और भी अधिक ढीठ और आलसी होता जा रहा था. घर के किसी भी कार्य की आशा उस से नहीं की जा सकती थी, हर समय उस के पीछे होहल्ला मचा ही रहता. एक दिन विभा के काफी समझाने पर रिचा ने बेटे को वह टेपरिकौर्डर दे दिया. तब वह दौड़ता हुआ विभा के पास आया और उन के दोनों गालों की पप्पी लेते हुए बोला, ‘‘धन्यवाद, ताईजी. देखिए, मां ने मुझे टेपरिकौर्डर दे दिया है. सुनेंगी?’’

इतना कह कर विक्की ने टेपरिकौर्डर चला दिया. टेप में से उस की सुमधुर आवाजें सुनाई देने लगीं.

‘‘अरे विक्की, यह तो तुम्हारी आवाज है? तो तुम्हें गाना भी आता है?’’ विभा ने प्रसन्न होते हुए अचरज से पूछा.

‘‘देख लीजिए ताईजी,’’ विक्की मटकते हुए बोला. उस की सुंदर आंखों में उस समय विचित्र चमक भर उठी थी. विभा ने टेपरिकौर्डर को हाथ में ले कर देखा, नन्हा सा लाल रंग का वह जापानी रिकौर्डर बहुत ही प्यारा था. तब विभा को समझ में आया कि बच्चा उसे अपना गायन सुना कर प्रभावित करने के लिए ही टेपरिकौर्डर लेने की जिद कर रहा था. पर रिचा ने मां हो कर भी इस तथ्य को नहीं समझा. वह सोचने लगी, ‘आखिर इतना छोटा भी तो अब विक्की नहीं है, 11 वर्ष का हो चला है.’

विभा को सुबहशाम घूमने की आदत थी. वहां की सड़कों के विषय में अधिक जानकारी न होने के कारण उस ने पहले दिन अपने साथ विक्की को ले लिया था. उस के बाद उस के वहां रहने तक एक दिन भी उसे विक्की को साथ चलने के लिए कहना नहीं पड़ा था. वह स्वयं ही उन के साथ दौड़ा चला आता. विक्की को बिना बताए भी वह घर से निकल पड़ती, तो भी वह जाने कहां से सूंघ लेता और झटपट साथ हो लेता. तब विभा को बराबर लगता रहता था कि विक्की केवल प्यार का भूखा है. यदि उस के साथ प्यार व समझदारी से व्यवहार किया जाए तो वह हर बात मानने व करने को तैयार रहेगा. विभा एवं ताऊजी की तो वह हर बात बड़े ही ध्यान से सुनता था, केवल सुनता ही नहीं, बल्कि उस पर अमल भी करता. जैसे ही कोई काम उसे बताते, वह झटपट कर देता तब क्यों अपनी मां एवं घर के अन्य सदस्यों की बातों की वह इतनी अवहेलना करता है? क्यों सब को इतना छकाता है, इतना परेशान करता है? विभा बारबार सोचती. उधर मांजी कहतीं, ‘‘अरे, क्या बताऊं विभा, रिचा को तो विक्की फूटी आंखों नहीं सुहाता. रातदिन इस के पीछे हाथ धो कर पड़ी रहती है. कभी प्यार से बात नहीं करती. देखो, कब से वह ‘नाइटसूट’ बनवाने को कह रहा है, सारे पजामे फट गए हैं, पर यह है कि कपड़ा घर में ला कर रखा हुआ है, तो भी दरजी को नहीं दे रही, न ही अखिल को बाजार से बनेबनाए सूट लाने देती है. कहती है कि मैं स्वयं सिलूंगी, 6 महीने तो हो गए हैं ऐसे ही कहते…अब तू ही देख कि कितना परेशान हो रहा है बेचारा विक्की, इतनी घोर गरमी में भी पैंट पहन कर सोता है.’’

आई हेट हर – भाग 2 : मां से नाराजगी

गूंज दूसरी क्लास में थी. उस की फ्रैंड हिना का बर्थडे था. वह स्कूल में पिंक कलर की फ्रिल वाली फ्रौक पहन कर आई थी. उस ने सभी बच्चों को पैंसिल बौक्स के अंदर पैंसिल, रबर, कटर और टौफी रख कर दिया था. इतना सुंदर पैंसिल बौक्स देख कर वह खुशी से उछलतीकूदती घर आई और मां को दिखाया तो उन्होंने उस के हाथ से झपट कर ले लिया,’’कोई जरूरत नहीं है इतनी बढ़िया चीजें स्कूल ले जाने की, कोई चुरा लेगा.‘’

वह पैर पटकपटक कर रोने लगी, लेकिन मां पर कोई असर नहीं पड़ा था.

कुछ दिनों के बाद वह एक दिन स्कूल से लौट कर आई तो मां उस पैंसिल बौक्स को पंडित के लड़के को दे रही थीं. यह देखते ही वह चिल्ला कर  उन के हाथ से बौक्स छीनने लगी,”यह मुझे मिला था, यह मेरा है.”

इतनी सी बात पर मां ने उस की गरदन पीछे से इतनी जोर से दबाई कि उस की सांसें रुकने लगीं और मुंह से गोंगों… की आवाजें निकलने लगीं… वह बहुत देर तक रोती रही थी.

लेकिन समय सबकुछ भुला देता है.

वह कक्षा 4 में थी. अपनी बर्थडे के दिन नई फ्रौक दिलवाने की जिद करती रही लेकिन फ्रौक की जगह उस के गाल थप्पड़ से लाल हो गए थे. वह रोतेरोते सो गई थी लेकिन शायद पापा को उस का बर्थडे याद था इसलिए वह उस के लिए टौफी ले कर आए थे. वह स्कूल यूनीफौर्म में ही अपने बैग में टौफी रख कर बेहद खुश थी. लेकिन शायद टौफी सस्ती वाली थी, इसलिए ज्यादातर बच्चों ने उसे देखते ही लेने से इनकार कर दिया था. वह मायूस हो कर रो पड़ी थी. उस ने गुस्से में सारी टौफी कूङेदान में फेंक दी थी.

लेकिन बर्थडे तो हर साल ही आ धमकता था.

पड़ोस में गार्गी उस की सहेली थी. उस ने आंटी को गार्गी को अपने हाथों से खीर खिलाते देखा था. उसी दिन से वह कल्पनालोक में केक काटती और मां के हाथ से खीर खाने का सपना पाल बैठी थी. पर बचपन का सपना केक काटना और मां के हाथों  से खीर खाना उस के लिए सिर्सफ एक सपना ही रह गया .

वह कक्षा 6 में आई तो सुबह मां उसे चीख कर जगातीं, कभी सुबहसुबह थप्पड़ भी लगा देतीं और स्वयं पत्थर की मूर्ति के सामने बैठ कर घंटी बजाबजा कर जोरजोर से भजन गाने बैठ जातीं.

वह अपने नन्हें हाथों से फ्रिज से दूध निकाल कर कभी पीती तो कभी ऐसे ही चली जाती. टिफिन में 2 ब्रैड या बिस्कुट देख कर उस की भूख भाग जाती. अपनी सहेलियों के टिफिन में उन की मांओं के बनाए परांठे, सैंडविच देख कर उस के मुंह में पानी आ जाता साथ ही भूख से आंखें भीग उठतीं. यही वजह थी कि वह मन ही मन मां से चिढ़ने लगी थी.

उस ने कई बार मां के साथ नजदीकी बढ़ाने के लिए उन के बालों को गूंथने और  हेयरस्टाइल बनाने की कोशिश भी की थी मगर मां उस के हाथ झटक देतीं.

मदर्सडे पर उस ने भी अपनी सहेलियों के साथ बैठ कर उन के लिए प्यारा सा कार्ड बनाया था लेकिन वे उस दिन प्रवचन सुन कर बहुत देर से आई थीं. गूंज को मां का इतना अंधविश्वासी होना बहुत अखरता था. वे घंटों पूजापाठ करतीं तो गूंज को कोफ्त होता.

जब मदर्सडे पर उस ने उन्हें मुस्कराते हुए कार्ड दिया तो वे बोलीं,”यह सब चोंचले किसलिए? पढोलिखो, घर का काम सीखो, आखिर पराए घर जाना है… उन्होंने कार्ड खोल कर देखा भी नहीं था और अपने फोन पर किसी से बात करने में बिजी हो गई थीं.

वह मन ही मन निराश और मायूस थी साथ ही गुस्से से उबल रही थी.

पापा अपने दुकान में ज्यादा बिजी रहते. देर रात घर में घुसते तो शराब के नशे में… घर में ऊधम न मचे, इसलिए मां चुपचाप दरवाजा खोल कर उन्हें सहारा दे कर बिस्तर पर लिटा देतीं. वह गहरी नींद में होने का अभिनय करते हुए अपनी बंद आंखों से भी सब देख लिया करती थी.

रात के अंधेरे में मां के सिसकने की भी आवाजें आतीं. शायद पापा मां से उन की पत्नी होने का जजियाकर वसूलते थे. उस ने भी बहुत बार मां के चेहरे, गले और हाथों पर काले निशान देखे थे.

पापा को सुधारने के लिए मां ने बाबा लोगों की शरणों में जाना शुरू कर दिया था… घर में शांतिपाठ, हवन, पूजापाठ, व्रतउपवास, सत्संग, कथा आदि के आयोजन आएदिन होने लगे था. मां को यह विश्वास था कि बाबा ही पापा को नशे से दूर कर सकते हैं, इसलिए वे दिनभर पूजापाठ, हवनपूजन और उन लोगों का स्वागतसत्कार करना आवश्यक समझ कर उसी में अपनेआप को समर्पित कर चुकी थीं. वैसे भी हमेशा से ही घंटों पूजापाठ, छूतछात, कथाभागवत में जाना, बाबा लोगों के पीछे भागना उन की दिनचर्या में शामिल था.

अब तो घर के अंदर बाबा सत्यानंद का उन की चौकड़ी के साथ जमघट लगा रहता… कभी कीर्तन, सत्संग और कभी बेकार के उपदेश… फिर स्वाभाविक था कि उन का भोजन भी होगा…

पापा का बिजनैस बढ़ गया और उस महिला का तबादला हो गया था, जिस के साथ पापा का चक्कर चल रहा था. वह मेरठ चली गई थी… मां का सोचना था कि यह सब कृपा गुरूजी की वजह से ही हुई है, इसलिए अब पापा भी कंठी माला पहन कर सुबहशाम पूजा पर बैठ जाते. बाबा लोगों के ऊपर खर्च करने के लिए पापा के पास खूब पैसा रहता…

इन सब ढोंगढकोसलों के कारण उसे पढ़ने और अपना होमवर्क करने का समय ही नहीं मिलता. अकसर उस का होमवर्क अधूरा रहता तो वह स्कूल जाने के लिए आनाकानी करती. इस पर मां का थप्पड़ मिलता और स्कूल में भी सजा मिलती.

वह क्लास टेस्ट में फेल हो गई तो पेरैंट्स मीटिंग में टीचर ने उस की शिकायत की कि इस का होमवर्क पूरा नहीं रहता और क्लास में ध्यान नहीं देती, तो इस बात पर भी मां ने उस की खूब पिटाई की थी.

ट्रस्ट एक कोशिश: भाग 2- क्या हुआ आलोक के साथ

उफ, बाऊजी ने मुझे इतनी अच्छी परवरिश दी थी लेकिन लानत है मुझ पर जो आखिरी समय उन की सेवा न कर सकी. वह लाड़ करते  हुए मुझ से कहते थे कि किसी ने सच ही कहा है कि बेटी सारी जिंदगी बेटी ही रहती है. लेकिन मैं ने क्या फर्ज पूरे किए बेटी होने के?

आलोक ने मुझे बहुत समझाया कि इस सब में मेरी कोई गलती नहीं थी. हमें यदि समय पर खबर की जाती और तब भी न पहुंचते तब गलत था. उन की बातें ठीक थीं लेकिन दिल को कैसे समझाती.

बहुत गुस्सा था मन में भाइयों के लिए. बाऊजी की क्रिया थी. पगड़ी की रस्म के बाद आलोक किसी जरूरी काम से चले गए पर मैं वहीं रुकी थी. जब सब लोग चले गए तो मैं जा कर भाइयों के पास बैठ गई.

‘भैया, आप लोगों ने मुझे खबर क्यों नहीं की? बाऊजी आखिरी समय तक मेरी राह देखते रहे.’

‘नैना, जो बात करनी है, हम से करो,’ तीखा स्वर गूंजा तो मैं चौंक पड़ी. सामने दोनों भाभियां लाललाल आंखों से मुझे घूर रही थीं.

मैं थोड़ी सी अचकचा कर बोली, ‘भाभी, क्या बात हो गई. आप सब मुझ से नाराज क्यों हैं?’

‘पूछ रही हो नाराज क्यों हैं? पता नहीं तुम ने बाबूजी को क्या पट्टी पढ़ा दी कि उन्होंने हमारा हक ही छीन लिया,’ जवाब में छोटी भाभी बोलीं तो मैं तिलमिला गई.

बस, फिर क्या था, दोनों भाभियों ने मुझे खूब खरीखोटी सुनाईं और उस का सार था कि बाऊजी ने मेरे बहकावे में आ कर मकान में मेरा भी हिस्सा रखा था. बाऊजी के इलाज पर खर्चा उन लोगों ने किया, सेवा उन लोगों ने की इसीलिए केवल उन लोगों का ही मकान पर हक बनता था.

मैं ने भाइयों की ओर देखा तो बडे़ भाई विजय मुझ से नजरें चुरा रहे थे. इस का मतलब था कि मकान के गुस्से में आ कर इन लोगों ने मुझे बाऊजी के बीमार होने की खबर नहीं की थी.

मैं ने बाऊजी की तसवीर की ओर देखा, वह मुसकरा रहे थे. इस से पहले कि मैं कुछ बोल पाती, छोटी भाभी ने ऐसी बात कह दी कि मेरे पांव तले की जमीन खिसक गई. उन्होंने कड़वाहट से कहा, ‘पता नहीं बाबूजी को बाहर वालों पर इतना तरस क्यों आता था. न जात का पता न मांबाप का, बस, ले आए उठा कर.’

मुझ से और नहीं सुना गया. मैं उठ खड़ी हुई. मेरे दोनों बडे़ भाई एकदम से मेरे पास आ कर बोले, ‘नैना, दरअसल हम पर बहुत उधार है और मकान बेच कर हम यह उधार चुकाएंगे, इसलिए ये दोनों परेशान हैं. हम ने तो इन से कहा था कि नैना को हम अपनी परेशानी बताएंगे तो वह हमारे साथ रजिस्ट्रार आफिस जा कर ‘रिलीज डीड’ पर साइन कर देगी. ठीक कहा न?’

सच क्या था, मैं अच्छी तरह समझती थी. मैं मरी सी आवाज में केवल यही पूछ पाई कि कब चलना है, और अगले ही दिन हम रजिस्ट्रार आफिस में बैठे हुए थे.

मेरे आगे कई कागज रखे गए. मैं एकएक कर के सब कागजों पर अंगूठा लगाती गई और अपने हस्ताक्षर भी करती गईर्र्र्र्. हर हस्ताक्षर पर भाई का प्यारदुलार, मेरा रूठना उन का मनाना मेरी आंखों के आगे आता चला गया. वहीं बैठे एक आदमी ने जब मुझ से उन कागजों को पढ़ने के लिए कहा, तो मेरा मन भर आया था. क्या कहती उस से कि मेरा तो मायका ही सदा के लिए छिन गया. बाऊजी क्या गए सब ने मुंह ही फेर लिया. भाभियां तो फिर पराई थीं लेकिन भाइयों की क्या कहूं. वे भी पराए हो गए.

भाइयों को जो चाहिए था वह उन्हें मिल गया लेकिन मेरा सबकुछ छिन गया. मेरे बाऊजी, मेरा मायका, मेरा बचपन. लगा, जैसे अनाथ तो मैं आज हुई हूं.

शायद मैं यानी नैना, जिस पर बाऊजी कितना गर्व करते थे, उस रोज टूट गई थी. घर पहुंची तो आलोक कहीं फोन मिला रहे थे.

‘कहां चली गई थीं तुम? पता है कहांकहां फोन नहीं किए?’ वह चिल्ला पडे़ लेकिन मेरी हालत देख कर कुछ नरम पड़ते हुए पूछा, ‘नैना, कहां थीं तुम?’

क्या कहती उन्हें. वह मेरे पास आए और बोले, ‘तुम्हारे वर्मा चाचाजी ने यह पैकेट तुम्हारे लिए भिजवाया था.’

मैं चुपचाप बैठी रही.

वह आगे बोले, ‘लाओ, मैं खोल देता हूं.’

वह जब पैकिट खोल रहे थे तो मैं अंदर कमरे में चली गई.

कुछ देर बाद वह भी मेरे पीछेपीछे कमरे में आ गए और बोले, ‘नैना, आखिर बात क्या हुई. कल से देख रहा हूं तुम हद से ज्यादा परेशान हो.’

कब तक छिपाती उन से. वैसे छिपाने का फायदा क्या और बताने में नुकसान क्या. रिश्ता तो उन लोगों ने लगभग तोड़ ही दिया था. मैं ने आलोक को एकएक बात बता दी.

वह कुछ देर के लिए सन्न रह गए. कुछ देर बाद बोले, ‘नैना, कितना सहा तुम ने. तुम्हें क्या जरूरत थी उन लोगों के साथ अकेले रजिस्ट्रार आफिस जाने की. मुझे इस लायक भी नहीं समझा. कल रात से मैं तुम से पूछ रहा था लेकिन तुम ने कुछ नहीं बताया. वहां से इतना कुछ सुनना पड़ा फिर भी उन लोगों की हर बात मानती चली गईं. द फैक्ट इज, यू डोंट ट्रस्ट मीं. सचाई तो यह है कि तुम्हें मुझ पर भरोसा ही नहीं है,’ कह कर वह दूसरे कमरे में चले गए.

जेहन में जैसे ही भरोसे की बात आई मुझे लगा जैसे किसी ने झकझोर कर मुझे जगा दिया हो. मैं अतीत से निकल वर्तमान में आ गई.

‘‘आलोक, क्या कह रहे हैं आप. मैं आप पर भरोसा नहीं करती.’’

एक थी मां- भाग 2: कहानी एक नौकरानी की

पिताजी कभी मना करते, तो उलटे मां उन्हें ही उन की औकात याद दिलाने लगती थीं. पिताजी चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाते थे. आखिर वे अभी तक अपने पिता के कमाए पैसों पर ही तो जीते आ रहे थे.

अब हम दोनों भाईबहन स्कूल जाने के लायक तो हो गए थे, मगर पैसे की तंगी और मांपिताजी के आपसी झगड़े के चलते हम दोनों स्कूल नहीं जा पा रहे थे.

पिताजी से जब मां का रोजरोज का झगड़ा सहा नहीं गया, तो उन्होंने घर के नजदीक वाले मंदिर के पास ही एक पूजा सामग्री और फूल माला की दुकान खोल ली थी. दुकान खोलने के लिए पिताजी ने अपने कुछ जानपहचान वालों से ही पैसे उधार लिए थे.

पिताजी अब अपने काम में ज्यादा बिजी रहने लगे थे. चोरी के डर से रात में भी वे दुकान पर ही सो जाते थे. इधर मां का रहनसहन और चालढाल बहुत तेजी से बदलता जा रहा था.

अब उन्होंने एक मोबाइल फोन भी खरीद लिया था. पिताजी ने जब मोबाइल फोन के बारे में पूछा था, तो अपने मायके से मिला हुआ बता कर पिताजी को डांट कर चुप करा दिया था.

मां अब दिनभर खुद कमरे में सोई रहती थीं और घर का सारा काम हम दोनों भाईबहन से कराने लगी थीं. स्कूल जाने की उम्र में हम दोनों भाईबहन अब हमेशा घर के कामों में उलझे रहने लगे थे. अब तो बातबात पर मां हम दोनों को पीटने भी लगती थीं.

एक रात की बात है. मैं और मेरा भाई अमर साथ ही सोए हुए थे. हम दोनों बचपन से ही साथ सोते आ रहे थे. अचानक आधी रात को मेरे भाई के पेट में दर्द होने लगा था. मुझ से जब उस का दर्द देखा नहीं गया, तो मैं मां के कमरे की ओर उन्हें बुलाने चल पड़ी थी, यह सोच कर कि शायद उन के पास कोई दवा होगी.

बहुत बार दरवाजा खटखटाने और चिल्लाने के बाद मां ने गुस्से में दरवाजा खोला था. जब मैं ने उन्हें अमर के पेटदर्द के बारे में बताया, तो वे मुझे ही गाली देने लगी थीं.

उन की एकएक बात मुझे आज भी याद है, जो मां ने अपने बेटे के लिए कही थी, ‘तुम्हारा भाई पेटदर्द से मर नहीं जाएगा. दिनभर चोरी करकर के तो खाता रहता है, फिर पेटदर्द तो उस का करेगा ही न…’

मैं चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाई थी. कैसी मां थीं वे. मैं चुपचाप अपने नसीब को कोसती हुई कमरे की ओर जाने के लिए अभी मुड़ी ही थी कि तभी मैं ने मां के कमरे में एक अजनबी आदमी को देखा था.

मैं ठीक से चेहरा नहीं देख पाई थी. मां भांप गई थीं कि मैं ने कमरे के अंदर के आदमी को देख लिया था. वे उस समय बोली कुछ नहीं, सिर्फ तेजी से दरवाजा बंद कर लिया था.

भाई के पेटदर्द के चलते मैं बहुत परेशान थी, इसीलिए उस ओर मैं ज्यादा ध्यान नहीं दे रही थी. अमर अभी भी कमरे में जमीन पर लेटा पेट पकड़े दर्द से कराह रहा था. पिताजी तो दुकान पर ही रात में सोते थे, इसीलिए मैं उन को बुला भी नहीं सकती थी.

मैं अमर को पेट के बल लिटा कर उस की पीठ सहलाने लगी. मेरे ऐसा करने से उसे राहत मिलने लगी और कुछ ही देर के बाद उस का पेटदर्द कम हो गया था.

अगले दिन सुबह जब पिताजी घर आए, तो वे पहली बार बहुत खुश दिखाई दे रहे थे. उन्होंने दुकान के लिए लिया हुआ कर्ज चुकाने के लिए पूरा पैसा जमा कर लिया था. वे कल ही जा कर महाजन को पैसा देने की बात कर रहे थे. अब वे हम दोनों भाईबहन को भी स्कूल में दाखिल कराने के लिए बोल रहे थे.

पता नहीं क्यों उस समय मां पिताजी की बात सुन कर भी अनसुना करते हुए कहीं और खोई हुई थीं. वे थी तो पास में ही बैठीं, पर कुछ बोल नहीं रही थीं.

उसी दिन पहली बार पिताजी ने हम सभी को होटल में ले जा कर खाना खिलाया था. उस रात पिताजी हम दोनों भाईबहन के पास ही सो भी गए थे. हम तीनों ने उस रात बहुत सारे सपने देखे थे.

मगर कुदरत को तो कुछ और ही मंजूर था. सुबह जब उठे तो एक बुरी खबर को सुन कर हम सब के पैर तले की जमीन खिसक गई थी. पिताजी की दुकान में रात में आग लग गई थी. सारा सामान जल कर राख हो गया था. महाजन को देने के लिए रखा हुआ पैसा, जिसे पिताजी ने अपनी मेहनत से एकएक पाई जोड़ कर जमा किया था, वह भी आग में जल गया था. मां भी उस दिन बहुत रोई थीं, मगर शायद वह भी उन का दिखावा था.

पिताजी फिर से टूट गए थे. हम सब का देखा हुआ सपना एक ही बार में बिखर गया था.

दुकान जलने के कुछ ही दिन के बाद मां ने मुझे अपने दूर के एक रिश्तेदार के कहने पर बलिया में एक साहब के यहां घर का काम करने और उन के 4 साल के बच्चे की देखभाल के लिए भेज दिया था.

पिताजी ने मां को बहुत समझाया कि अभी कश्मीरा 10 साल की बच्ची है, भला कैसे किसी के यहां नौकरानी का काम कर पाएगी? मगर मां ने एक न सुनी. मैं यानी कश्मीरा बलिया में अपने मालिक साकेत भारद्वाज के यहां नौकरानी बन कर आ गई.

मेरा भाई मुझ से दूर नहीं होना चाहता था. वह भी मेरे साथ ही बलिया आने की जिद पर अड़ गया था, मगर मां ने उसे कमरे में बंद कर दिया था. मैं भी यह सोच कर कि मेरे कमाए पैसे से शायद पिताजी द्वारा लिया हुआ दुकान का कर्जा जमा हो जाएगा, बलिया आ गई थी.

मेरे मालिक साकेत सर और मालकिन मेघना मैडम का बलिया में खुद का घर था. साहब एक औफिस में बड़े पद पर थे. मैडम भी एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी करती थीं. दोनों का एक 4 साल का बेटा था गौरव भारद्वाज, जिसे प्यार से सभी ‘गोलू’ कहते थे.

पहले साहब की अपनी बहन साथ में रहती थीं. वे ही बच्चे की देखभाल भी करती थीं, मगर उन की इसी साल शादी हो गई थी और वे यहां से चली गई थीं, जिस के चलते ही इस घर में अब मुझे लाया गया था.

पहले ही दिन से साकेत सर के यहां मुझे इतना प्यार मिला कि अपने घर से भी अच्छा यह घर लगने लगा. मैं सर और मैडम के कहने पर ही उन्हें ‘अंकल’ और ‘आंटी’ कहने लगी थी. गोलू भी मुझे दीदी कहने लगा था. वह तुरंत मुझ से घुलमिल गया था. वह हमेशा मेरे पास ही रहता था.

मैं अहम हूं- भाग 2: शशि की लापरवाही

उस के व्यावहारिक होने का थोड़ा अंदाजा तो बाहर से ही मिल रहा था. जब अंदर जा कर देखा तो एलईडी टैलीविजन, कंप्यूटर, चमचमाता महंगा फर्नीचर ओह, क्याक्या गिनाए. शशि की हैरानी को इंदुशायद भांप गई थी. बड़े गर्व से, गर्व के बजाय घमंड कहना ही उचित होगा, बोली, ‘यह सब मेरी मेहनत का फल है. यदि विकी को छात्रावास में न रखती तो इतने आराम से नौकरी थोड़े ही की जा सकती थी. उस को देखने के लिए आया, नौकर रखो, फिर उन नौकरों की निगरानी करो, अच्छा सिरदर्द ही समझो. अब मुझे कोई फिक्र नहीं. हर महीने 70 हजार रुपए कमा लेती हूं. काम भी अच्छा ही है. एक मल्टीनैशनल कंपनी में कंसल्टैंट के तौर पर काम करती हूं. जरा ढंग से संवर के रहना, लोगों से मिलना और मुसकान बिखेरते रहना. संवर के रहना किस औरत को अच्छा नहीं लगेगा. अरे, मैं तो बोले ही जा रही हूं. आप भी कहेंगी, अच्छी मिली. आइए, मैं आप को पूरा घर दिखाऊं.’

शयनकक्ष तो बिलकुल फिल्मी था. बढि़या सुंदर डबलबैड और उस पर बिछी चादर इतनी सुंदर कि हाय, शशि कल्पना में अपनेआप को उस पर अजय के साथ देखने लगी. सिर को झटक कर उस विचार को तुरंत निकाल देने की कोशिश की. बाहर के कमरे में आने पर अजय बोला, ‘चलो शशि, क्या यहीं रहने का इरादा है?’

इंदु ने अजय से कहा, ‘आप इन्हें कभीकभी यहां ले आया करिए. इन का मन भी बहला करेगा. आप को समय न हो तो मनोज को फोन कर दिया कीजिए, हम खुद ही इन्हें ले आएंगे.’ शशि की इच्छा तो हुई कि कहे, जब आप लेने आएंगी तो वहीं, मेरे घर पर बातचीत हो सकती है. पर उस का मन इतना भारी हो रहा था कि लग रहा था कि अगर एक बोल भी मुंह से निकला तो वह रो देगी. वह समझ रही थी कि इंदु सिर्फ अपने धन का दिखावा भर दिखाना चाहती थी. घर लौटते हुए आधे रास्ते तक दोनों चुप रहे. फिर अजय एकदम बोला, ‘मनोज की पत्नी भी खूब है.’ वह आगे कुछ बोले, इस से पहले शशि ने टोक दिया, ‘हां, मुझ जैसी बेवकूफ थोड़ी है.’

उस की आवाज रोंआसी थी. अजय ने आश्चर्य से उस की ओर देखा और प्यार से बोला, ‘शशि, कैसी बेवकूफों सी बातें करती हो?’ फिर उस ने एकदम दांतों तले जीभ दबा ली. यह वह अनजाने में क्या बोल गया, मानो शशि की कही हुई बात का समर्थन कर दिया हो. एकदम बात बदलते हुए बोला, ‘बहुत देर हो गई, बच्चे शायद सो भी गए होंगे.’ पर शशि की आग्नेय दृष्टि देख कर फिर वह रास्ते भर चुप ही रहा.

घर पहुंचने पर शशि सिरदर्द का बहाना कर के बिना कुछ खाएपिए लेट गई. पर रातभर उसे इंदु के बैडरूम के ही सपने आते रहे. इंदु की अलमारी में सजी साडि़योें की इंद्रधनुषी छटा रहरह कर आंखों के सामने नाच रही थी. ओह, कितनी साडि़यां, रोज एकएक पहने तो साल में उसे 3 या 4 बार से अधिक पहनने का मौका न आए. अब तो उन की दूसरी कार भी आने को है. वैसे तो कई लोगों के अच्छे व बड़े घर, कार सब देख चुकी है. खुद उस के भाईसाहब के पास कार है पर वे बहुत बड़े इंजीनियर हैं. अपने पति की बराबरी में तो जो भी हैं, सब का रहनसहन करीबकरीब एकसा ही है. शशि ने यह नहीं सोचा था कि उस की बेचैनी एक दिन उसे नौकरी करने पर मजबूर कर देगी. आवेदन देने के पहले कई दिन तक ऊहापेह में पड़ी रही. ढाई साल का बबलू, उसे कौन संभालेगा? सासूमां बूढ़ी हैं. अजय से जब राय मांगी तो उन्होंने भी यही कहा, ‘भई, परिस्थितिवश नौकरी करना बुरी बात नहीं, पर तुम्हें नौकरी की क्या जरूरत पड़ गई? कम से कम बबलू ही कुछ बड़ा हो कर स्कूल जाने लगे तो ठीक है. फिर आगे तुम्हारी इच्छा.’

सासससुर ने भी कहा, ‘बहू, बबलू को तो हम संभाल लेंगे. हमारा और है ही कौन. पर तुम्हारा शरीर भी तो दोनों भार को सहन कर सके तब न. जो भी करो, सोचसमझ कर करो.’’ पर उस के सिर पर तो जैसे जनून सवार था. 6-7 दिन तक तो स्कूल में बबलू की खूब याद आती थी, फिर ठीक लगने लगा. पर रोज स्कूल से लौट कर जब घर में कदम रखती तो घर की कुछ अव्यवस्थता मन को खटकती. एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो घर में कोई मेहमान आए हुए थे. कामवाली घर पर नहीं थी तो नीलू उन को पानी दे रही थी. नीलू को देखते ही उस का गुस्सा सातवें आसमान पर आ पहुंचा. बाल बिखरे हुए, फ्रौक की तुरपन उधड़ी हुई, हाथ में पेंटिंग कलर लगे हुए थे, अजीब हाल बना रखा था. नीलू को बगल से पकड़ कर खींचते हुए वह अंदर ले गई. उस का तमतमाता चेहरा देख कर वहां का वातावरण एकदम बोझिल हो गया. नीलू सुबकती हुई एक कोने में खड़ी हो गई.

उस समय शशि को अपनी गलती का खयाल नहीं आया, बल्कि उसे सब पर गुस्सा आया कि सब उस से खार खाए बैठे हैं और जानबूझ कर उस का अपमान करना चाहते हैं. पर आज लगता है, वास्तव में उस ने अपनी नौकरी के आगे बाकी हर बात को गौण समझ लिया. पहले वह अजय के मोजे, रूमाल देख कर रख दिया करती थी, उस के कपड़ों पर प्रैस, बटन आदि का भी ध्यान रखती थी. दोपहर के समय बच्चों के पुराने कपड़ों को बड़ा करना, मरम्मत करना आदि काफी कुछ काम कर लेती थी. अब तो अजय अपने हाथ से बटन लगाना आदि छोटीमोटी मरम्मत कर लेता है, पर मुंह से कुछ नहीं बोलता. बबलू भी इन 2 ही महीनों में कुछ दुबला हो गया है. दादी दूध दे सकती हैं, खिला सकती हैं, प्यार भी बहुत करती हैं, पर मां की ममता व आरंभिक शिक्षा और कोई थोड़े ही दे सकता है.

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