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Family Story: दिस इज टू मच: आखिर क्यों उन दोनों को सजा मिली?

Family Story: ‘दिस इज टू मच’ ये शब्द शूल की तरह मेरे हृदय को भेद रहे हैं. मानो मेरे कानों में कोई पिघला शीशा उड़ेल रहा हो. मेरा घर भी अखबारों की सुर्खियां बनेगा, यह तो मैं ने स्वप्न में भी न सोचा  था. हमारे हंसतेखेलते घर को न जाने किस की हाय लग गई. हम 4 जनों का छोटा सा खुशहाल परिवार – बेटा बीटैक थर्ड ईयर का छात्र और बेटी बीटैक फर्स्ट ईयर की. कोरोना संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए जब सभी कालेजों और स्कूलों से विद्यार्थियों को घर वापस भेजा जाने लगा और मेरा भी विद्यालय बंद हो गया तो मैं प्रसन्न हो गई कि बरसों बाद अपने बच्चों के साथ मुझे समय बिताने का मौका मिलेगा.

कानपुर आईआईटी में पढ़ने वाला मेरा बेटा और बीबीडी इंजीनियरिंग कालेज लखनऊ में पढ़ने वाली मेरी बेटी जब घर आए तो मेरा घर गुलजार हो गया.

बच्चे घर पर नहीं थे, तो नरेंद्र अपनी पुलिस की ड्यूटी निभाने में व्यस्त रहते थे और मैं कोश्चन पेपर बनाने, वर्कशीट बनाने और पढ़नेलिखने में. बस, यही व्यस्त दिनचर्या रह गई थी हमारी.

जब बच्चे घर आए तो उन से बातें करते, मिलजुल कर घर के काम करते, और साथ बैठ कर टीवी देखते तथा मजे करते  दिन कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चलता.  पर मेरी यह खुशी ज्यादा दिन न टिक पाई.

सौरभ और सुरभि ने कुछ दिनों तो मेरे साथ खुशीखुशी समय बिताया, फिर बोर होने लगे, बातों का खजाना खाली हो गया और घर का काम बोझ लगने लगा, उमंग और उल्लास का स्रोत सूखने लगा. दोनों अपनेअपने कमरों में अपनेअपने मोबाइल व लैपटौप के साथ अपनी ही दुनिया में मग्न रहते.

मैं 5 बजे उठ कर सोचती कि 5 बजे न सही, कम से कम 6-7 बजे तक ही उठ कर दोनों मेरे साथ एरोबिक्स या कोई ऐक्सरसाइज करें. हम साथसाथ मिल कर काम करें और साथसाथ बैठ कर मूवी देखें और समय बिताएं. मैं उन की पसंद का नाश्ता बना कर उन के उठने का इंतजार करती. पहले उन्हें प्यार से उठाती, फिर चिल्लाती. पर उन दोनों के कानों पर तो जू तक न रेंगती.

बेटी को उठाती तो वह कहती, ‘आप मेरे ही पीछे पड़ी रहती हो, पहले भैया को उठाओ जा कर.’ और बेटे को कहती तो वह कहता, ‘मां, दिस इज टू मच. चैन से सोने भी नहीं देती हो. अब मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूं.’ मैं अपना सा मुंह ले कर रह जाती.

जिंदगी की भागदौड़ में 21 बरस कैसे बीत गए, पता ही न चला. लगता है जैसे कल की ही बात हो जब मेरा सौरभ अपनी शरारतों से हम सब के बीच आकर्षण का केंद्र बना रहता था. उस से 2 साल छोटी सुरभि जब ठुमकठुमक कर चलती थी तो मानो खूबसूरत बार्बी डौल चल रही हो. उन्हें देख कर हम फूले नहीं समाते थे.

नरेंद्र मंत्रमुग्ध हो कहते, ‘मैं अपने बेटे को पुलिस कमिश्नर बनाऊंगा और बेटी को जज.’ ऐसे ही न जाने कितने सपने सजाए हम दिलोजान से उन्हें अच्छी परवरिश देने में लगे थे. मैं सुबह 5 बजे उठ कर सब का नाश्ता तैयार करती. नरेंद्र यदि घर पर होते तो बच्चों को तैयार करने में मेरी सहायता करते. बच्चों को बसस्टौप पर छोड़ कर अपने स्कूल के लिए भागती.

बच्चों की छुट्टी 2 बजे हो जाती थी. इसलिए वे स्कूल से सीधे अपनी नानी के घर चले जाते थे. मैं जब साढ़े 3 बजे स्कूल से लौटती तो अपने साथ घर वापस ले आती. घर आ कर उन दोनों को रैस्ट करने के लिए कहती और खुद भी थोड़ी देर आराम करती. 5 बजे उन्हें उठा कर होमवर्क कराने बैठाती और साथ ही, घर के काम भी निबटाती जाती.

जीवन की आपाधापी में समय कब पंख लगा कर उड़ गया, पता ही न चला. नरेंद्र की 24 घंटे की पुलिस की नौकरी और हजारों तरह की कठिनाइयों के बाद भी वे मुझे और बच्चों को समय देने और हमारा ध्यान रखने की पूरी कोशिश करते. उन्हें अपने दोनों बच्चों पर बड़ा गर्व था.

सौरभ का जब आईआईटी कानपुर में सेलैक्शन हो गया तब उन्होंने अपने पूरे स्टाफ को मिठाई बांटी और रिश्तेदारों को पार्टी दी. सौरभ के होस्टल जाने के बाद मैं कितना रोई थी. उस के सेलैक्ट होने की खुशी तो थी पर घर से जाने का गम भी बहुत ज्यादा था. कुछ भी बनाती, तो उस की याद आती. डाइनिंग टेबल पर उस की खाली कुरसी देख कर मैं रो पड़ती कि मेरा बेटा होस्टल का रूखासूखा खाना खा रहा होगा.

उस के 2 वर्षों बाद ही सुरभि को भी बीबीडी इंजीनियरिंग कालेज, लखनऊ में ऐडमिशन मिल गया और वह भी चली गई. उस के जाने के बाद ऐसा लगा जैसे घर से खुशियां ही चली गई हों.

धीरेधीरे इस सन्नाटे की हमें आदत हो गई. अकसर 10 दिनों के लिए बच्चे हवा के झोंकों की तरह घर आते और चले जाते. कोरोना के कहर ने सारे संसार को आतंकित कर रखा है. मैं कोरोना से भयभीत तो थी पर मुझे खुशी थी कि जीवन की इस आपाधापी में मुझे बरसों बाद अपने बच्चों के साथ समय बिताने को मिलेगा.

अफसोस, समय तो तेरे हाथ से न जाने कब का फिसल चुका था. बच्चों को अब मेरी जरूरत नहीं थी. उन्हें उन की दुनिया में मेरा प्रवेश दखलंदाजी लगता था. रोज अखबारों और टीवी में लोगों द्वारा परिवार के साथ मिलजुल कर समय बिताने की खबरें मेरे हृदय को विचलित कर रही थीं. मेरे पति कोरोना के खिलाफ जंग में एक योद्धा के रूप में अपना कर्तव्य निभा रहे थे और बच्चों का संसार उन के कमरों तक सिमट गया था.

उस दिन जब मैं ने सौरभ और सुरभि को समझाना चाहा तो वे मुझ पर बरस पड़े, ‘‘सारी जिंदगी तो आप को हमारे लिए फुरसत मिली नहीं, अब आप चाहती हो कि हम आप के साथ बैठें.’’ सुरभि बोली, ‘‘किया ही क्या है आप ने हमारे लिए. आप तो अपनी ही दुनिया में मग्न रहती थीं. वह तो नानी ही थीं जो हमारा ध्यान रखती थीं. आप से ज्यादा तो हम नानी से अटैच्ड हैं.’’

मैं ने उन्हें समझाना चाहा कि मैं ने नौकरी इसलिए की थी जिस से उन्हें अच्छे स्कूल में पढ़ा सकूं और उन की ख्वाहिशें पूरी कर सकूं. उन के पापा की सैलरी में यह संभव नहीं था. इस पर सौरभ भड़क उठा, ‘‘दिस इज टू मच, डोंट इंटरफेयर इन अवर लाइफ.’’

‘‘झूठ मत बोलिए, पापा की सैलरी इतनी भी कम नहीं थी कि हमारी जरूरतें पूरी न हो पातीं. नौकरी तो आप ने अपने शौक पूरे करने के लिए की थी और एहसान हम पर लाद रही हो,’’ सुरभि गुस्से से पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई और मैं अपने कमरे में आ कर आंसू बहाने लगी.

रात को साढ़े 11 बजे जब नरेंद्र थकेहारे वापस लौट कर आए तो मेरी सूजी हुई आंखें देख कर बड़े प्यार से उन्होंने पूछा, ‘‘डार्लिंग, यह फूल सा चेहरा मुरझाया हुआ क्यों है?’’ उन की यह बात सुन कर मेरी आंखों से गंगाजमुना बहने लगी. मैं बोली, ‘‘मैं ने सारी जिंदगी तुम्हारा घर और बच्चे संभालने में बिता दी. पर न तुम्हारे पास मेरे लिए वक्त है और न तुम्हारे बच्चों के पास.’’

इस के बाद शाम को घटी सारी घटना मैं ने उन्हें सुना दी. यह सुन कर वे क्रोध से आगबबूला हो उठे और सीधे सौरभ और सुरभि के कमरे की ओर गए. सुरभि सो रही थी और सौरभ मोबाइल में व्यस्त था. उन्होंने उसे डांटा, ‘‘तुम्हें बिलकुल तमीज नहीं है, कोई अपनी मां से इस तरह बात करता है. यह मोबाइल मैं ने तुम्हें तुम्हारे जरूरी काम करने के लिए दिलवाया था, न कि फालतू समय बरबाद करने के लिए.’’

इस पर सौरभ बोला, ‘‘दिस इज टू मच, पापा. इन को तो आदत है तिल का ताड़ बनाने की. आप भी इन के बहकावे में आ कर मुझे ही डांट रहे हैं. इन से कह दें, अपने काम से काम रखें, हमारे काम में दखल न दें.’’

वे बोले, ‘‘बदतमीज, जबान लड़ाता है, अपनी मां के लिए अपशब्द बोलता है.’’ उन्होंने उसे 2 थप्पड़ जड़ दिए. इस पर उस ने उन का हाथ पकड़ लिया. उन का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया. उन्होंने उस का मोबाइल छीन कर फेंक दिया. सौरभ गुस्से से चीखनेचिल्लाने लगा. नरेंद्र चुपचाप अपने कमरे में चले गए और बिना कुछ खाएपिए ही सो गए.

अगले दिन मैं रोज की तरह सुबह 5 बजे सो कर उठी. सिर भारी हो रहा था. आदतवश दोनों बच्चों के कमरों में झांका. सौरभ के कमरे में झांका तो मेरी चीख निकल गई और मैं मूर्च्छित हो कर गिर गई. मेरी चीख सुन कर नरेंद्र और पड़ोस वाले शर्माजी दौड़े हुए आए और सौरभ को फांसी पर झूलते हुए देख कर उन के होश उड़ गए.

दूसरे दिन मेरा घर अखबारों की सुर्खियों में था. बड़ेबड़े अक्षरों में लिखा था, ‘एक पुलिस इंस्पैक्टर के बेटे ने पिता द्वारा मोबाइल के लिए डांटने पर फांसी लगा ली.’ मेरा खुशियों का संसार पलभर में ही उजड़ गया. मैं समझ नहीं पा रही हूं कि दोषी कौन है – मैं, नरेंद्र, सौरभ या मोबाइल. उस के शब्द मेरे कानों में गूंज रहे हैं, ‘‘दिस इज टू मच, डोंट इंटरफेयर इन माय लाइफ.’’ मेरा हृदय छलनी हुआ जा रहा है.

Family Story: कागज के चंद टुकड़ों का मुहताज रिश्ता

Family Story, लेखिका- मीनाक्षी सिंह

रोहिणी और नमित की शादी को 10 साल पूरे होने को थे. दांपत्य के इस मोड़ पर रोहिणी द्वारा तलाक के लिए अर्जी देना सब को अचंभित कर रहा था. कभी तलाक नमित भी चाहता था और रोहिणी किसी भी शर्त पर उसे तलाक देने के पक्ष में नहीं थी.

2 साल तक रोहिणी की शादी के लिए लड़का तलाश करने के बाद जब नमित के पापा ने मनचाहा दहेज देने के लिए रोहिणी के पापा द्वारा हामी भरे जाने पर शादी के लिए हां की, तो एक बेटी के मजबूर पिता के रूप में रोहिणी के पिता रमेश बेहद खुश हुए.

अपनी समझदार व खुद्दार बेटी रोहिणी की शादी नमित के साथ कर के रमेश अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री समझ कर पत्नी के साथ गंगा स्नान को निकल गए इन सब बातों से बेखबर कि उधर ससुराल में उन की लाड़ली को लोगों की कैसी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ रहा है.

शादी में चेहरेमोहरे पर लोगों द्वारा छींटाकशी तो आम बात है, लेकिन जब पति भी अपनी पत्नी के रंगरूप से संतुष्ट न हो, तो पत्नी के लिए लोगों के शब्दबाणों का सामना करना बड़ा मुश्किल हो जाता है.

रोहिणी सोच से बेहद मजबूत किस्म की लड़की थी. तानोंउलाहनों को धीरेधीरे नजरअंदाज करते हुए उस ने घर की जिम्मेदारी बखूबी संभाल ली थी.

कुछ महीने बाद, शादी के पहले, शिक्षक के लिए दी गई प्रतियोगिता परीक्षा का रिजल्ट आया, जिस में रोहिणी का चयन हुआ और रोहिणी एक शिक्षक बनने की दिशा में आगे बढ़ गई.

इस खुशखबरी और रोहिणी के अच्छे व्यवहार से उस के प्रति घर वालों का नजरिया बदलने लगा था. नमित भी अब रोहिणी से खुश रहने लगा था. पैसा अपने अंदर किसी के प्रति किसी का नजरिया बदलवाने का खूबसूरत माद्दा रखता है. यही अब उस घर में दृष्टिगोचर हो रहा था.

शादी के 5 साल पूरे होने को थे और रोहिणी की गोद अभी तक सूनी थी. यह बात अब आसपास और परिवार के लोगों को खटकने लगी थी, तो नमित तक भी यह खटकन पहुंचनी ही थी.

शुरू में नमित ने मां को समझाने की कोशिश की, पर दादी शब्द सुनने की उम्मीद ने एक बेटे के समझाते हुए शब्दों के सामने अपना पलड़ा भारी रखा और नमित की मां इस जिद पर अड़ी रहीं कि अब तो उन्हें एक पोता चाहिए ही चाहिए.

कहते हैं कि अगर किसी बात को बारबार सुनाया जाए, तो वही बात हमारे लिए सचाई सी बन जाती है, ठीक उसी तरह लोगों द्वारा रोहिणी के मां न बनने की बात सुनतेसुनते नमित को लगने लगा कि अब रोहिणी को मां बनना ही चाहिए और उस के दिमाग पर भी पिता बनने की ख्वाहिश गहराई से हावी होने लगी. उस ने रोहिणी से बात की और उसे चैकअप के लिए ले गया.

रोहिणी की रिपोर्ट नौर्मल आई, इस के बावजूद काफी कोशिश के बाद भी वह पिता नहीं बन सका. अब रोहिणी भी नमित पर दबाव डालने लगी कि उस की सभी रिपोर्ट नौर्मल हैं, तो एक बार उसे भी चैकअप करवा लेना चाहिए, लेकिन नमित ने उस की बात नहीं मानी. वह अपना चैकअप नहीं करवाना चाहता था, क्योंकि उस के अनुसार उस में कोई कमी हो ही नहीं सकती थी.

मां चाहती थीं कि नमित रोहिणी को तलाक दे कर दूसरी शादी कर ले. वह खुल कर तो मां की बात का समर्थन नहीं कर रहा था, पर उस के अंतर्मन को कहीं न कहीं अपनी मां का कहना सही लग रहा था. एक पति पर पिता बनने की ख्वाहिश पूरी तरह हावी हो चुकी थी.

धीरेधीरे उम्मीद की किरण लुप्त सी होने लगी थी. अब उस घर में सब चुपचुप से रहने लगे थे. खासकर रोहिणी के प्रति सभी का व्यवहार कटाकटा सा था. घर वालों के रूखे व्यवहार ने रोहिणी को भी काफी चिड़चिड़ा बना दिया था.

एक दिन नमित ने रोहिणी को समझाने की कोशिश की, ‘‘देखो रोहिणी, वंश चलाने के लिए एक वारिस की जरूरत होती है और मुझे नहीं लगता कि अब तुम इस घर को कोई वारिस दे पाओगी. इसलिए तुम तलाक के कागजात पर साइन कर दो.

‘‘और यकीन रखो, तलाक के बाद भी हमारा रिश्ता पहले जैसा ही रहेगा. हमारा रिश्ता कागज के चंद टुकड़ों का मुहताज कभी नहीं होगा. भले ही हम कानूनी रूप से पतिपत्नी नहीं रहेंगे, पर मेरे दिल में हमेशा तुम ही रहोगी.’

‘‘नाम के लिए कागज पर मेरी पत्नी, मेरे साथ काम कर रही रोजी होगी, परंतु उस से शादी का मेरा मकसद बस औलाद प्राप्ति होगा. तुम्हें बिना तलाक दिए भी मैं उस से शादी कर सकता हूं, पर तुम तो जानती हो कि हम दोनों की सरकारी नौकरी है और बिना तलाक शादी करना मुझे परेशानी में डाल कर मेरी नौकरी को खतरे में डाल सकता है.’’

‘‘तुम अपना चैकअप क्यों नहीं करवाते हो, नमित. मुझे लगता है कि कमी तुम में ही है. एक बात कहूं, तुम निहायत ही दोगले इंसान हो, शरीफ बने इस चेहरे के पीछे एक बेहद घटिया और कायर इंसान छिपा है.

‘‘कान खोल कर सुन लो, मैं तुम्हें किसी शर्त पर तलाक नहीं दूंगी. तुम्हें जो करना हो, कर लो. सारी परेशानियों को सहते हुए मैं इसी परिवार में रह

कर तुम सब के दिए कष्टों को सह

कर तुम्हारे ही साथ अपने बैडरूम

में रहूंगी.’’

‘‘नहीं, मुझ में कोई कमी नहीं हो सकती, और तलाक तो तुम्हें देना ही होगा. मुझे इस खानदान के लिए वारिस चाहिए, चाहे वह तुम से मिले या किसी और से.

‘‘अगर तुम सीधेसीधे तलाक के पेपर पर हस्ताक्षर नहीं करती हो, तो मैं तुम पर मेरे परिवार वालों को परेशान करने और बदचलनी का आरोप लगाऊंगा,’’ नमित के शब्दों का अंदाज बदल चुका था.

कुछ दिनों बाद नमित ने कोर्ट में रोहिणी पर इलजाम लगाते हुए तलाक की अर्जी दाखिल कर दी.

अब रोहिणी बिलकुल चुप सी रहने लगी थी, लेकिन तलाक मिलने तक अपने बैडरूम पर कब्जा नहीं छोड़ने के अपने फैसले पर अडिग थी.

2 महीने बाद ही उसे पता चला कि वह मां बनने वाली है. यह खबर मिलते ही नमित ने तलाक की दी हुई अर्जी वापस ले ली.

उस के अगले ही दिन रोहिणी अपना बैग पैक कर के मायके चली गई. सारी बातें सुन कर मातापिता ने समझाने की कोशिश की कि जब सबकुछ ठीक

हो रहा है, तो इस तरह की जिद सही नहीं है.

‘‘अगर आप लोगों को मेरा आप के साथ रहना पसंद नहीं है, तो मैं जल्दी ही कहीं और रूम ले कर रहने चली जाऊंगी. आप लोगों पर ज्यादा दिन बोझ बन कर नहीं रहूंगी.’’

बेटी से इस तरह की बातें सुन कर दोनों चुप हो गए.

अगले दिन शाम को घंटी बजने पर रोहिणी ने दरवाजा खोला सामने नमित था. बिना जवाब की प्रतीक्षा किए वह अंदर आ कर सोफे पर बैठ गया, तब तक रोहिणी के मातापिता भी आ चुके थे.

बात की शुरुआत नमित ने की, ‘‘रोहिणी हमारी गोद में जल्दी ही एक खूबसूरत संतान आने वाली है, तो तुम अब यह सब क्यों कर रही हो.

‘‘जब मैं ने तुम्हें तलाक देना चाहा था, तब तो तुम किसी भी शर्त पर तलाक देने को तैयार नहीं थीं, फिर अब क्या हुआ. अब जब सबकुछ सही हो रहा है, सब ठीक होने जा रहा है, तो इस तरह की जिद का क्या औचित्य?’’

‘‘नमित, तुम्हें क्या लगता है, यह बच्चा तुम्हारा है? तो मैं तुम्हें यह साफसाफ बता दूं कि यह बच्चा तुम्हारा नहीं, मेरे कलीग सुभाष का है, जो इस तलाक के बाद जल्दी ही मुझ से शादी करने वाला है.

‘‘तुम ने मुझ पर चरित्रहीनता के झूठे आरोप लगाए थे न, मैं ने तुम्हारे लगाए हर उस आरोप को सच कर के दिखा दिया. और साथ ही, यह भी दिखा दिया कि मुझ में कोई कमी नहीं, कमी तुम में है. तुम एक अधूरे मर्द हो जो अपनी कमी से पनपी कुंठा अब तक अपनी पत्नी पर उड़ेलते रहे. विश्वास न हो तो जा कर अपना चैकअप करवाओ और फिर जितनी चाहे उतनी शादियां करो.

‘‘तुम्हारे घर में तुम्हारी मां और बहन द्वारा दिए गए उन सारे जख्मों को मैं भुला देती, अगर बस तुम ने मेरा साथ दिया होता. औरत को बच्चे पैदा करने की मशीन मानने वाले तुम जैसे मर्द, मेरे तलाक नहीं देने के उस फैसले को मेरी एक अदद छत पाने की लालसा समझते रहे और मैं उसी छत के नीचे रह कर अपने ऊपर होते अत्याचारों की आंच पर तपती चली गई, अंदर से मजबूत होती चली गई. ऐसे में मुझे सहारा मिला सुभाष के कंधों का और उस ने एक सच्चा मर्द बन कर, सही मानो में मुझे औरत बनने का मौका दिया.

‘‘अब तुम्हारे द्वारा लगाए गए उन झूठे आरोपों को मैं सच्चा साबित कर के तुम से तलाक लूंगी और तुम्हें मुक्त करूंगी इस अनचाहे रिश्ते से, तुम्हें अपनी मरजी से शादी करने के लिए, जो तुम्हारे खानदान को तुम से वारिस दे सके जो मैं तुम्हें नहीं दे पाई.

‘‘अब तुम जा सकते हो. कोर्ट में मिलेंगे,’’ बिना नमित के उत्तर की प्रतीक्षा किए रोहिणी उठ कर अपने कमरे में चली गई.

Family Story: संयुक्त खाता – आखिर वीरेन अंकल क्यों बदल गये?

Family Story: दोपहर का समय था. मैं औफिस में लंच टाइम में खाना खा कर के जल्दीजल्दी अपनी फाइलें इकट्ठी कर रही थी.

बस, 15 मिनट में एक जरूरी मीटिंग अटैंड करनी थी. इतने में फोन की  घंटी बजी.

‘उफ, अब यह किस का फोन आ गया?’ परेशान हो कर मैं ने फोन उठाया, तो उधर से कमला आंटी की आवाज सुनाई पड़ी.

कमला आंटी के साथ हमारे परिवार का बहुत पुराना रिश्ता है. उन के पति और मेरे पिता बचपन में स्कूल में साथ पढ़ते थे.

आंटी की आवाज से मेरा माथा ठनका. आंटी कुछ उदास सी लग रही थीं और मैं जल्दी में थी. पर फिर भी आवाज को भरसक मुलायम बना कर मैं ने कहा, ‘‘कहिए आंटी, बताइए कैसी हैं आप?’’

‘‘बेटा, मैं तो ठीक हूं पर तुम्हारे अंकल की तबीयत काफी खराब है. हम लोग 10 दिनों से अस्पताल में ही हैं,’’ बोलतेबोलते उन का गला भर्रा गया, तो मुझे भी चिंता हो गई.

‘‘क्या हुआ आंटी? कुछ सीरियस तो नहीं है?’’

‘‘सीरियस ही है बेटी. उन को एक हफ्ते पहले दिल का दौरा पड़ा था और अब… अब लकवा मार गया है. कुछ बोल भी नहीं पा रहे हैं. डाक्टर भी कुछ उम्मीद नहीं दिला रहे हैं,’’ कहते हुए उन का गला रुंध गया.

‘‘आंटी, आप फिक्र मत कीजिए. अंकल ठीक हो जाएंगे. आप हिम्मत रखिए. मैं शाम को आती हूं आप से मिलने,’’ एक तरफ मैं उन्हें दिलासा दिला रही थी, वहीं दूसरी तरफ अपनी घड़ी देख रही थी.

मीटिंग का समय होने वाला था और मेरे बौस देर से आने वालों की तो बखिया ही उधेड़ देते हैं. किसी तरह भागतेभागते मीटिंग में पहुंची, पर मेरा दिमाग कमला आंटी और वीरेन अंकल की तरफ ही लगा रहा.

मीटिंग समाप्त होतेहोते शाम हो गई. मैं ने सोचा, घर जाते हुए अस्पताल की तरफ से निकल चलती हूं. वहां जा कर देखा, तो अंकल की हालत सचमुच काफी खराब थी. डाक्टरों ने लगभग जवाब दे दिया था. अस्पताल से निकलते हुए मैं ने कहा, ‘‘आंटी, किसी चीज की जरूरत हो तो बताइए.’’ कमला आंटी पहले तो कुछ हिचकिचाईं, पर फिर बोलीं, ‘‘बेटी, एक हफ्ते से अंकल अस्पताल में पड़े हैं. अब तुम से क्या छिपाना? मेरे पास जितना पैसा घर में था, सब इलाज पर खर्च हो गया है. इन के अकाउंट में तो पैसा है, परंतु निकालें कैसे? ये तो चैक पर दस्तखत नहीं कर सकते और एटीएम कार्ड का पिन, बस, इन्हें ही पता है. इन का खाता तुम्हारे ही बैंक में है. यह रही इन की पासबुक और चैकबुक. क्या तुम बैंक से पैसे निकालने में कुछ मदद कर सकती हो?’’ कहते हुए आंटी ने पासबुक और चैकबुक दोनों मेरे हाथ में रख दीं. आंटी को पता था कि मैं उसी बैंक में नौकरी करती हूं.

‘‘आंटी, आप का भी अंकल के साथ जौइंट अकाउंट तो होगा न? आप चैक साइन कर दीजिए, मैं कल बैंक खुलते ही आप के पास पैसे भिजवा दूंगी.’’

‘‘नहीं बेटी, नहीं. वही तो नहीं है. तुम्हें तो पता ही है, मैं तो इन के कामों में कभी दखल नहीं देती. इन्होंने कभी कहा नहीं और न ही मुझे कभी जरूरत महसूस हुई. बैंक का सारा काम तो ये खुद ही करते थे. पर पैसे तो इन के इलाज के लिए ही चाहिए. तुम तो बैंक में ही नौकरी करती हो. किसी तरह पैसा बैंक से निकलवा दोगी न?’’ आंटी ने इतनी मासूमियतभरी उम्मीद से मेरी ओर देखा, तो मुझे समझ न आया कि मैं क्या कहूं. बस चैक ले कर सोचती हुई घर आ गई.

घर आ कर चैक फिर से देखा और बैंक की शाखा का नाम पढ़ा तो याद आया कि वहां का मैनेजर तो मुझे अच्छी तरह से जानता है. झटपट मैं ने उसे फोन किया और सारी स्थिति समझाई. उस ने तुरंत मौके की नजाकत समझी और मुझे आश्वासन दिया, ‘‘कोई बात नहीं. मैं वीरेन साहब को अच्छी तरह जानता हूं. उन के सारे खाते हमारी ब्रांच में ही हैं. सुबह बैंक खुलते ही मैं खुद वीरेन साहब के पास अस्पताल चला जाऊंगा और उन के दस्तखत करवा कर पैसे उन के पास भिजवा दूंगा.

‘‘आप बिलकुल फिक्र मत कीजिए. बैंक के निर्देशों के अनुसार, यदि कोई खाताधारी किसी कारण से दस्तखत करने की हालत में नहीं होता है तो कोई अधिकारी अपने सामने उस का अंगूठा लगवा कर उस के खाते से पैसे निकालने के लिए अधिकृत कर सकता है.’’

वह मैनेजर बैंक के निर्देशों से भलीभांति अवगत था, और वीरेन अंकल की मदद करने के लिए भी तैयार था, यह जान कर मुझे बहुत तसल्ली हुई और मैं चैन की नींद सो गई.

सुबह दफ्तर जाने के बजाय मैं ने कार अस्पताल की ओर मोड़ ली. मुझे बहुत खुशी हुई, जब 9 बजते ही बैंक का मैनेजर भी वहां पहुंच गया. उस के हाथ में विड्राअल फौर्म था, जामुनी स्याही वाला इंकपैड भी था. बेचारा पूरी तैयारी से आया था. आते ही उस ने वीरेन अंकल से खूब गर्मजोशी से नमस्ते की, तो अंकल के चेहरे पर भी कुछ पहचान वाले भाव आते दिखे.

फिर मैनेजर ने कहा, ‘‘वीरेन साहब, आप के अकाउंट से 25,000 रुपए निकाल कर आप की पत्नी को दे दूं?’’ जवाब में जब अंकल ने अपना सिर नकारात्मक तरीके से हिलाया, तो मैनेजर समेत हम सब सकते में आ गए.

उस ने फिर कहा, ‘‘वीरेन साहब, आप के इलाज के लिए आप की पत्नी को पैसा चाहिए. आप के अकाउंट से पैसे निकाल कर दे दूं?’’ जवाब फिर नकारात्मक था. बेचारे मैनेजर ने 3-4 बार प्रयास किया, पर हर बार वीरेन अंकल ने सिर हिला कर साफ मना कर दिया. उस ने हार न मानी और फिर कहा, ‘‘वीरेन साहब, आप को पता है कि यह पैसा आप के इलाज के लिए ही चाहिए?’’

वीरेन अंकल ने अब सकारात्मक सिर हिलाया, परंतु पैसे देने

के नाम पर जवाब में फिर न

ही मिला. हालांकि, यह अकाउंट वीरेन अंकल के अपने अकेले के नाम पर ही था, उन्होंने उस पर कोई नौमिनेशन भी नहीं कर रखा था. बैंक मैनेजर ने आखिरी कोशिश की, ‘‘वीरेन साहब, आप की पत्नी को इस अकाउंट में नौमिनी बना दूं?’’ जवाब अब भी नकारात्मक था.

‘‘आप का अकाउंट कमलाजी के साथ जौइंट कर दूं?’’ जवाब में फिर नहीं. ताज्जुब की बात तो यह थी कि वीरेन अंकल, जो कल तक न कुछ बोल रहे थे और न ही समझ रहे थे, बैंक से पैसे निकालने के मामले में आज सिर हिला कर साफ जवाब दे रहे थे.

मैनेजर ने मेरी ओर लाचारी से देखा और हम दोनों कमरे के बाहर आ गए. खाते से पैसे निकालने में मैनेजर ने अपनी मजबूरी जाहिर कर दी, ‘‘मैडम, अच्छा हुआ, आप यहां आ गईं, नहीं तो शायद आप मेरा भी विश्वास नहीं करतीं. आप ने खुद अपनी आंखों से देखा है. वीरेन साहब तो साफ मना कर रहे हैं. ऐसे में कोई भी उन के अकाउंट  से पैसे निकालने की अनुमति कैसे दे सकता है?’’

मैनेजर की बात तो सोलह आने सही थी. बैंक मैनेजर तो वापस बैंक चला गया और मैं अंदर जा कर कमला आंटी को उस की लाचारी समझाने की व्यर्थ कोशिश करने लगी.

अस्पताल से लौटते समय मैं उन्हें अपने पास से 10,000 रुपए दे आई. साथ ही, आश्वासन भी कि जितने रुपए चाहिए, आप मुझे बता दीजिएगा, आखिर अंकल का इलाज तो करवाना ही है.

शाम को बैंक से लौटते हुए मैं कमला आंटी के पास फिर गई. वे अभी भी दुखी थीं. मैं ने भी उन से पूछ ही लिया, ‘‘आंटी, आप ने कभी अंकल को अकाउंट जौइंट करने के लिए नहीं कहा क्या?’’

‘‘कहा था बेटी. कई बार कहा था, पर वे मेरी कब मानते हैं? हमेशा यही कहते हैं कि मैं क्या इतनी जल्दी मरने जा रहा हूं? एक बार शायद यह भी कह रहे थे कि यह मेरा पैंशन अकाउंट है, जौइंट नहीं हो सकता.’’

‘‘नहींनहीं आंटी, शायद उन्हें पता नहीं है. अब तो पैंशन अकाउंट भी जौइंट हो सकता है. चलो, अंकल ठीक हो जाएंगे, तब उन का और आप का अकाउंट जौइंट करवा देंगे और नौमिनेशन भी करवा देंगे,’’ कह कर मैं घर आ गई.

रास्तेभर गाड़ी चलाते हुए मैं यही सोचती रही कि वीरेन अंकल वैसे तो आंटी का इतना खयाल रखते हैं, पर इतनी महत्त्वपूर्ण बात पर कैसे ध्यान नहीं दिया?

कुछ दिन और निकल गए. वीरेन अंकल की तबीयत और बिगड़ती गई. आखिरकार, लगभग 10 दिनों बाद उन्होंने अंतिम सांस ले ली और कमला आंटी को रोताबिलखता छोड़ हमेशाहमेशा के लिए चले गए.

पति के जाने के अकथनीय दुख के साथसाथ आंटी के पास अस्पताल का बड़ा सा बिल भी आ गया. उन का अंतिम संस्कार होने तक आंटी के ऊपर कर्जा काफी बढ़ गया था.

घर की सदस्य जैसी होने के नाते मैं लगभग रोज ही उन के पास जा रही थी और मैं ने जो पहला काम किया, वह यह कि वीरेन अंकल के सभी खाते बंद करवा कर उन्हें कमला आंटी के नाम करवाए. इन कामों में बहुत से फौर्म भरने पड़ते हैं, पर बैंक में नौकरी करने की वजह से मुझे उन सब की जानकारी थी. आंटी को सिर्फ इन्डेमिनिटी बौंड, एफिडेविट, हेयरशिप सर्टिफिकेट आदि पर अनगिनत दस्तखत ही करने पड़े थे, जो मुझ में पूरा भरोसा होने के कारण वे करती चली गईं और रिकौर्ड टाइम में मैं ने वीरेन अंकल के सभी खाते आंटी के नाम पर करवा दिए. आंटी ने चैन की सांस ली और सारे कर्जों का भुगतान कर दिया. अपने खातों में उन्होंने नौमिनी भी मनोनीत कर लिया. अंकल के शेयर्स, म्यूचुअल फंड्स आदि का भी यही हाल था.

सब को ठीक करने में कुछ समय अवश्य लगा, पर मुझे यह सब काम पूरा कर के बहुत ही संतोष मिला.

वीरेन अंकल सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे. अब आंटी की फैमिली पैंशन भी आनी शुरू हो गई थी. और तो और, उन्होंने एटीएम से पैसे निकालना, चैक जमा करना और पासबुक में एंट्री कराना भी सीख लिया था. सार यह कि उन का जीवन एक ढर्रे पर चल पड़ा था.

इस बात को कई महीने बीत गए, पर एक बात मेरे दिल को बारबार कचोटती रही कि ऐसा क्या था कि अंकल ने अपने अकाउंट से पैसे नहीं निकालने दिए. फिर एक बार मौका निकाल कर मैं ने आंटी से पूछ ही लिया.

यह सुन कर आंटी सकपका कर चुपचाप जमीन की ओर देखने लगीं. मुझे लगा कि शायद मुझे यह सवाल नहीं पूछना चाहिए था, पर कुछ क्षण पश्चात आंटी जैसे हिम्मत बटोर कर बोलीं, ‘‘बेटी, क्या बताऊं? पैसा चीज ही ऐसी है. जब अपने ही सगे धोखा देते हैं, तब शायद आदमी के मन से सभी लोगों पर से विश्वास उठ जाता है. इन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.’’

मैं चुपचाप आंटी की ओर देखती रही. मेरी उत्सुकता और अधिक जानने के लिए बढ़ गई थी.

आंटी आगे बोलीं, ‘‘जब तुम्हारे अंकल मैडिकल की पढ़ाई कर रहे थे, उन के पिता यानी मेरे ससुरजी बहुत बीमार थे. पैसों की जरूरत पड़ती रहती थी. इसलिए उन्होंने अपनी चैकबुक ब्लैंक साइन कर के रख दी थी. मेरे जेठ के हाथ वह चैकबुक पड़ गई और उन्होंने अकाउंट से सारे पैसे निकाल लिए. न ससुरजी के इलाज के लिए पैसे बचे और न इन की पढ़ाई के लिए. मेरी सास पैसेपैसे के लिए मुहताज हो गईं. फिर अपने जेवर बेच कर उन्होंने इन की मैडिकल की पढ़ाई पूरी करवाई और साथ ही, यह सीख भी दी कि पैसे के मामले में किसी पर भी विश्वास न करना, अपनी बीवी पर भी नहीं.

‘‘तुम्हारे अंकल ने शायद अपनी जिंदगी के उस कड़वे सत्य को आत्मसात कर लिया था और अपनी मां की सीख को भी. इसीलिए वे पैसे पर अपना पूरा नियंत्रण रखते थे और उस लकवे की हालत में भी उन के अंतर्मन में वही एहसास रहा होगा.’’

अब सबकुछ शीशे की तरह साफ था, पर आंटी तनाव में लग रही थीं. मैं ने बात बदली, ‘‘चलिए छोडि़ए आंटी, मैं आप को चाय बना कर पिलाती हूं.’’ समय बीतता गया, कमला आंटी की मनोस्थिति अब लगभग ठीक हो गई थी और अपने काम संभालने से उन में एक नए आत्मविश्वास का संचार भी हो रहा था. वैसे तो कमला आंटी पढ़ीलिखी थीं, हिंदी साहित्य में उन्होंने स्नातकोत्तर स्तर तक पढ़ाई की थी, परंतु पिछले 40 सालों में केवल घरबार में ही विलीन रहने से उन का जो आत्मविश्वास  खो सा गया था, धीरेधीरे वापस आने लगा था.

मैं जब भी उन से मिलने जाती, मुझे यही खयाल बारबार सताता था कि हरेक व्यक्ति भलीभांति जानता है कि उसे एक दिन इस दुनिया से जाना ही है. बुढ़ापे की तो छोड़ो, जिंदगी का तो कभी कोई भरोसा नहीं है. पर फिर भी अपनी मृत्यु के पश्चात अपने प्रियजनों की आर्थिक सुरक्षा के बारे में कितने लोग सोचते हैं? छोटीछोटी चीजें हैं जैसे कि अपना बैंक खाता जौइंट करवाना, अपने सभी खातों, शेयर्स, म्यूचुअल फंड आदि में नौमिनी का पंजीकरण करवाना आदि. साथ ही, वसीयत करना भी तो कितना महत्त्वपूर्ण काम है. पर इन सब के बारे में ज्यादातर लोग सोचते ही नहीं हैं?

अब कमला आंटी को ही ले? लीजिए. उन बेचारी को तो यह भी पता नहीं था कि वे फैमिली पैंशन की हकदार हैं, अंकल के पीपीओ वगैरह की जानकारी तो बहुत दूर की बातें हैं. लोग जिंदा रहते हुए अपने परिवार का कितना खयाल रखते हैं, परंतु कभी यह नहीं सोचते कि उन के मरने के बाद उन का क्या होगा?

धीरेधीरे समय निकलता गया और कमला आंटी के जीवन में सबकुछ सामान्य सा हो गया. उन के घर मेरा आनाजाना भी कम हो गया. पर अचानक एक दिन आंटी का फोन आया, ‘‘बेटी, शाम को दफ्तर से लौटते हुए कुछ देर के लिए घर आ सकती हो क्या?’’

‘‘हां, हां, जरूर आंटी. कोई खास बात है क्या?’’

‘‘नहीं, कुछ खास नहीं, पर शाम को आना जरूर,’’ आवाज से आंटी खुश लग रही थीं.

शाम को जब मैं उन के घर पहुंची, तो उन्होंने मेरे आगे लड्डू रख दिए. चेहरे पर बड़ी सी मुसकान थी.

‘‘लड्डू… किस खुशी में आंटी?’’ मैं ने कुतूहलवश पूछा, तो एक प्यारी सी मुसकान उन के चेहरे पर फैल गई.

‘‘पहले लड्डू खाओ बेटी,’’ बहुत दिन बाद कमला आंटी को इतना खुश देखा था. दिल को अच्छा लगा. लड्डू बहुत स्वादिष्ठ थे. एक के बाद मैं ने दूसरा भी उठा लिया. तब तक आंटी अंदर के कमरे में गईं और लौट कर सरिता मैगजीन की एक प्रति मेरे हाथ में रख दी.

‘‘यह देखो, तुम्हारी आंटी अब लेखिका बन गई है. मेरी पहली कहानी इस में छपी है.’’

‘‘आप की कहानी…? वाह आंटी, वाह, बधाई हो.’’

‘‘हां, कहानी क्या, आपबीती ही समझ लो. मैं ने सोचा कि क्यों न सब लोगों को बताऊं कि पैसे के मामले में पत्नी के साथ साझेदारी न करने से क्या होता है और संयुक्त खाता न खोलने से उस को कितनी परेशानी हो सकती है? वैसे ही कोरोना वायरस इतना फैला हुआ है, क्या पता किस का नंबर कब लग जाए. तुम्हारी मदद न मिलती, तो मैं पता नहीं क्या करती. जैसा मेरे साथ हुआ, ऐसा किसी के साथ न हो,’’ कहतेकहते कमला आंटी की आंखें नम हो चली थीं और साथ में मेरी भी.

घर जा कर चैक फिर से देखा और बैंक की शाखा का नाम पढ़ा तो याद आया कि वहां का मैनेजर तो मुझे अच्छी तरह से जानता है. झटपट मैं ने उसे फोन किया और सारी स्थिति समझाई. उस ने तुरंत मौके की नजाकत समझी और मुझे आश्वासन दिया.

Family Story: नजरिया बदल रहा – क्या अपर्णा का सपना पूरा हुआ?

Family Story: ‘‘देख अपर्णा, इधर आ जल्दी.’’ ‘‘क्या है मम्मा?’’ अपर्णा वीडियो पौज कर मोबाइल हाथ में लिए चली आई थी.

‘‘वह देख, पार्थ नीचे खड़ा अपने गमलों को कितने प्यार से पानी दे रहा है. सादे कपड़ों में भी कितना हैंडसम दिखता है.’’

अपर्णा ने मां रागिनी को घूर कर देखा.

‘‘यह देख, कितना हराभरा कर दिया है उस ने यह बगीचा. अभी आए कुल 2 महीने ही तो हुए हैं इन लोगों को यहां,’’ वह फुसफुसा कर बताए जा रही थी.

‘‘मम्मा, आप तो पीछे ही पड़ जाते हो. बस, कोई लड़का दिख जाना चाहिए आप को. उस की खूबियां गिनाने लग जाती हो. बोल दिया न, मु?ो नहीं करनी शादीवादी, वह भी एक सरकारी नौकरी वाले से कतई नहीं. शगुन दी की शादी की थी न सरकारी डाक्टर से. बेचारी आज तक वहीं बनारस में अटकी अस्पताल, मंदिर और घाटों के दर्शन कर रही हैं.’’

‘‘तेरी प्रौब्लम क्या है. स्मार्ट है, हैंडसम है पार्थ, दिल्ली विश्वविद्यालय में बौटनी का लैक्चरर है. उस का अपना घर है. उस पर से अकेला लड़का है, एक बहन है, बस.’’

‘‘हां, एक बहन है, जिस की शादी हो चुकी है. बड़े भले लोग हैं. पिता डिग्री कालेज में इंग्लिश के प्रोफैसर थे, रिटायर हो चुके हैं. मां स्कूल टीचर थीं, रिटायर हो चुकीं. अपनी ही जाति के हैं…और कुछ? मम्मा कितनी बार बताओगे मु?ो यही बातें,’’ वह खीझी सी एक सांस में सब बोल कर ही ठहरी थी और रागिनी को खींच कर अंदर ले आई थी.

‘‘अभीअभी नौकरी लगी है उस की, रिश्तों की भरमार है उस के लिए, कमला बहनजी बता रही थीं. कोई रुका थोड़े ही रहेगा तेरे लिए,’’ रागिनी ने कहा.

‘‘हां, तो किस ने कहा है रुकने के लिए. मैट्रिमोनियल में देखो, हजार मिलेंगे एक से एक, यूएस, इंग्लैंड में वैल सैटल्ड, हैंडसम लड़के. प्रिया, शिखा, रूबी, जया मेरी सारी खास सहेलियां कोई अमेरिका, आस्ट्रेलिया तो कोई कनाडा, लंदन की उड़ानें भर रही हैं या तैयारी में हैं. किसी की शादी हो चुकी है तो किसी की इंगेजमैंट. आप को तो मालूम है, प्रिया तो पिछले महीने ही शादी कर लंदन चली गई. मु?ो तो वर्ल्ड के बैस्ट प्लेस जाना है यूएसए, उस में भी न्यूयौर्क.’’

‘‘हम से इतनी दूर जाने की सोच रही है, अप्पू. तेरे और शगुन के अलावा कौन है हमारा. पास है तो शगुन कभीकभी आ जाती है. कभी हम भी मिल आते हैं. तू आसपास भारत में ही कोई ढूंढ़. तेरे लिए व हमारे लिए, यही सही रहेगा. शगुन तो सम?ादार है, सब संभालना जानती है. दुनियादारी का पता है उसे. तु?ो तो कुछ भी नहीं मालूम. बस, तेरे परीलोक जैसे सपने. मैट्रिमोनियल से अनजाने लोगों से रिश्ता कर तु?ो परदेस भेज दें, कुछ गड़बड़ हुई तो… न्यूज तो देखतीपढ़ती है न?’’

‘‘शीर्ष की तो याद होगी आप को, जो मेरे साथ बीएससी में था. जिस ने एक दिन हमें अपनी कार में लिफ्ट दी थी, आप का पैर मुड़ गया था मार्केट में, जोर की मोच आ गई थी आप को. इतने सालों बाद वह कुछ समय पहले अचानक मु?ो मौल में मिल गया था. उस की कंपनी उसे यूएस भेज रही है वह भी सीधा न्यूयौर्क. 3 साल का असाइनमैंट है. अपने पेरैंट्स को मना रहा था. वे नहीं चाहते कि जाए और यदि जाना ही है तो शादी कर के जाए. पर वह चला गया.

‘‘मु?ा से बोल रहा था. ‘वहीं कोई दूसरी कंपनी जौइन कर लूंगा. पागल हूं जो इतनी अच्छी जगह छोड़ इंडिया वापस रहने आऊंगा. हां, शादी जरूर भारत की लड़की से करूंगा ताकि घर का काम बढि़या हो सके और घर का खाना भी मिल सके. हाहा वह रुक कर हंसा था, फिर बोला. तब तक तुम अपनी पीएचडी पूरी कर लो. अगर वेट किया मेरा, तो शादी तुम्हीं से करूंगा. मेरी पहली पसंद तो तुम ही थीं. यह बात और है मैं ने कभी जाहिर नहीं किया.’ कह कर वह मुसकरा रहा था. मैं आप को बताने ही वाली थी.’’

‘‘अरे, तु?ो बना रहा है. वह भी कैसा लड़का है जैसे मांबाप से कोई मतलब नहीं, उन्हें भी ले जाने की बात कहता तो भी बात सम?ा आती. वह तेरी क्या कद्र करेगा.’’

‘‘नहीं मम्मा, फोन नंबर दिया है उस ने मु?ो, उस पर उस से मेरी कई बार बात भी हुई है. कई बार उस के फोन भी आ चुके हैं. उस ने प्रौमिस किया है, 6 महीनों में लौटने वाला है, तब आप सब से मिलेगा अपने मम्मीपापा के साथ, शादी की बात करने.’’

‘‘वाह, कब आएगा, कब बात करेगा. इतना ही था तो उन्हें हम से मिलवा कर क्यों नहीं गया? एक नंबर का फेंकू लगता है. पापा से बात करती हूं, ला, पता दे उस का. हम खुद ही जा कर उस के मांबाप से बात करते हैं.’’

‘‘मैं कभी घर नहीं गई उस के, न ही उस से कभी पता पूछा. शायद कालकाजी में घर है उस का.’’

‘‘कमाल है, घरपरिवार भी देखा नहीं. और इतना बड़ा फैसला ले लिया. सच में बच्चों वाला दिमाग है तेरा. कब आएगा, कब बात करेगा वह. 27 की हो चली है तू. धीरगंभीर स्थिर चित्त, पार्थ जैसा ही कोई संभाल सकता है तु?ो, जान रही हूं.’’ उन्हें कुछ इसी थीम पर गिरीश कर्नाड और शबाना आजमी की ‘स्वामी’ फिल्म याद हो आईर् थी. जिद्दी चंचल लड़की और गंभीर लड़का…

‘‘एक बार फिर अच्छी तरह सोच ले. फिर कहूंगी पार्थ तेरे लिए बिलकुल फिट है. वे लोग भी तु?ो पसंद करते हैं.’’

‘‘कहां हो भई दोनों मांबेटी. देखो कुमार के घर का बना गरम इडलीसांभर फिर दे गए और मेरी प्रिय मखाने की खीर भी. विश्व में बढ़ रहे करोना संकट के लिए टीवी पर प्रधानमंत्री क्या बोलते हैं. यहां भी लौकडाउन होना तो तय है.’’ पापा नंदन कुमार की आवाज पर दोनों टीवी रूम में चली आईं.

21 दिनों का लौकडाउन हुआ, फिर 19 दिनों का. सभी बताए नियमों का पालन कर रहे थे. पार्थ और अपर्णा की भी छुट्टी हो गईर् थी. तालीथाली, दीयाबत्ती अभियान में अपर्णा ने पूरी बिल्ंिडग में सब से अधिक जोरशोर से हिस्सा लिया. नीचे पार्थ के घर होहल्ला न सुन कर अपर्र्णा मुंह बिचकाती रही. जरा भी जज्बा नहीं देश के लिए. कैसा अजीब आदमी है, अकड़ू खां बना बैठा होगा कहीं, प्रवक्ता पार्थ. अंधेरे में अपनी उन किताबों में भी तो नहीं खो सकता इस समय. कुमार साहब ने दीप बाहर रख दिए थे, तो थाली वाले दिन मिसेज कुमार ने मंदिर की घंटी टुनटुना दी थी. बस, हो गया देशप्रेम. अपर्णा को खल रहा था. पार्थ तो वैसे भी कम ही बाहर निकलता. उसे यह सब बचकाना लगता. हां, सब्जीफल, दूध लाने के लिए जरूर जाता, मांपापा को जाने नहीं देता.

एक दिन कुमार फिर घर आए, बोले, ‘‘भाईसाहब, बहनजी, आप भी पार्थ से ही मंगा लिया कीजिए. आप क्यों जाएंगे, यह ही ले आया करेगा न. बुजुर्गों और छोटे बच्चों को ही ज्यादा खतरा है कोरोना से.’’

तो रागिनी ने घूमने को उतावली अपर्णा को सामान लाने के बहाने पार्थ के साथ भेज दिया. एक पंथ दो काज. शायद, पार्थ को पसंद ही करने लगे.

सामान ले कर अपर्णा पार्थ की कार में पहले ही आ बैठी. पार्थ अभी लाइन में था. तब तक उस ने शीर्ष को फोन लगा दिया. इतने दिनों से फोन लग नहीं रहा था. आज कौल कनैक्ट हो गई. तो उस ने शीर्ष की पूरी खबर ली. बहुत दिनों से फोन नहीं आया, न मिला तुम्हारा फोन. अधिक बिजी हो या मु?ो भूल गए. किसी और के चक्कर में तो नहीं पड़ गए. क्या हाल है वहां? न्यूज में तो तुम्हारा न्यूयौर्क सब से अधिक कोरोना की चपेट में है. दिल घबरा रहा था, और तुम हो कि फोन ही नहीं उठा रहे. तुम सेफ तो हो?’’

‘‘अरे, यहां सब मजे में हैं. छुट्टियां हो गई हैं. अपार्टमैंट से ही काम होता है औनलाइन. मु?ो क्या होना है. स्टैच्यू औफ लिबर्टी के साथ हूं. और तुम सब?’’

‘‘ठीक है सब. छुट्टियां यहां भी हो गई हैं. अच्छा, तुम्हारे पेरैंट्स तो ठीक हैं? कौन है उन के पास? कैसे कर रहे होंगे मैनेज. उन का घर का पता, फोन नंबर दो, तो कभी जरूरत पर मदद को परमिशन ले कर पहुंचा जा सकता है. मम्मा को सब बता दिया, वे मिलना भी चाहती हैं.’’

‘‘पापा की तो डेथ हो गई.’’

‘‘ओह, वैरी सैड ऐंड पेनफुल. कब? कैसे?’’

‘‘10 दिन तो हो ही गए, कोरोना से. मम्मी को भी आइसोलेशन में रखा गया है. रिश्तेदारों को भी जाने नहीं दे रहे. यहां से जाना ही पौसिबल नहीं था. सारी फ्लाइटें बंद. मामा लोग उन से फोन से कनैक्टेड हैं और मैं भी. क्या कर सकता हूं.’’

‘‘फिर क्या कह रहे थे, मैं मजे में हूं?’’

‘‘तो, मैं तो ठीक ही हूं. फादरमदर की वैसे भी उम्र थी ही, जाना तो वैसे भी था, फिर मैं इंडिया आ कर भी क्या कर लेता, न देख सकता न छू सकता. अच्छा है यहां सेफ हूं. कुछ हुआ तो बैस्ट इलाज हो जाएगा. चिल्ल… डोंट वरी फौर मी.’’

‘‘तुम अपने फादरमदर के लिए ही बोल रहे हो न?’’ अपर्णा को आश्चर्य हो रहा था. ऐसा निर्मोही, स्वार्थी बेटा कैसे हो सकता है? क्या फायदा ऐसे एडवांस शहर, ऊंचे स्तर और पैसों का जो ऐसे समय भी मांबाप के पास न रह सके, न आ सके और फिर उन के प्रति मन में ऐसी भावना रखे.

‘‘क्या सोचने लगी भई, कोई तुम्हें तो नहीं मिल गया? अरे दोचार महीनों की बात है. सबकुछ नौर्मल हो जाएगा. वैज्ञानिक लगे हुए हैं, दवावैक्सीन जल्द ही ढूंढ़ निकालेंगे ये लोग. शादी कर के तुम्हें भी यहां ले आऊंगा. फिर अपनी तो घरबाहर ऐश ही ऐश होगी. हाहा, ओके, औनलाइन काम का वक्त हो गया. रखता हूं, बहुत काम है. ट्वेंटी डेज से पहले कौल नहीं कर पाऊंगा. ओके, बाय, लव यू स्वीटहार्ट.’’ उस के फ्लाइंग किस के साथ ही फोन कट गया था.

अपर्णा इधरउधर देखने लगी, कहां रह गया पार्थ. वह भी जाने कितना सामान ले रहा है पागल सा. रोज ही तो आता है मार्केट, फिर भी. उस ने नजरें दूर घुमाईं तो पार्थ नजर आया. वह मास्क लगाए, गरीब बच्चों में दूध की थैली, केले, बिस्कुट और ब्रैड बांट रहा था. तभी किसी गरीब बूढ़ी महिला ने उस से हाथ जोड़े कुछ कहा तो वह फिर राशन की दुकान में घुस गया. लौट कर उस ने लाई आटेचावल की थैलियां महिला के सिर पर अपनी मदद से रखवा दीं. महिला ने हाथ जोड़ कर हाथ ऊपर उठाए तो अपर्णा सम?ा गई कि जरूर गरीब महिला उसे दुआएं दे रही है. अपना सामान ला कर पार्थ ने गाड़ी में रखा.

‘‘एक मिनट,’’ कह कर उस ने जा रहे ठेले से साग खरीदा और कूड़े में खाना ढूंढ़ती कमजोर गाय को खिला कर वापस चला आया, ‘‘सौरी, थोड़ा टाइम लग गया.’’

‘‘आप रोज ही ऐसे इतना सब…’’ वह हैरान थी. दिल भी भर आया था उस का.

‘‘इतनाउतना कुछ नहीं. बहुतथोड़ा ही कर पाता हूं. दुनिया की जरूरत के आगे यह तो नगण्य ही है.’’

अपर्णा ने पहली बार पार्थ के चेहरे को ध्यान से देखा था, ‘जज्बा भी, जज्बात भी और सुंदर, सही सोच भी, मतलब सोने जैसा दिल. शीर्ष के दिल, दुनिया से कितना अलग, निर्मल…शायद मम्मी सही ही कह रही थीं. मु?ो अब उन की ही बात मान लेनी चाहिए. नजरिया बदलने लगा था. उस ने एक बार ऊपर से नीचे किन्हीं खयालों में गुम ड्राइव करते पार्थ को देखा और मन ही मन मुसकरा उठी.

Family Story: मेरा घर – क्या स्मिता ने रूद्र को माफ किया?

Family Story: स्पीच के बाद कुछ लोगों से मिलने के उपरांत स्मिता ने जैसे ही प्लेट उठाई, पीछे से एक धीमी, चिरपरिचित आवाज आई, जिसे वह वर्षों पहले भूल चुकी थी- ‘हैलो स्मिता.’

यह सुनते ही स्मिता चौंक कर

मुड़ी, तो सामने रुद्र था. वह बोला, ‘‘कैसी हो स्मिता? अब तो घर लौट आओ, प्लीज.’’

रुद्र को इतने सालों बाद अपने सामने देख स्मिता को ऐसा लगा जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. उस के जख्म फिर हरे हो गए और वह समारोह बीच में ही छोड़ वहां से निकल गई. सारे रास्ते वह विचारों में खोई रही. इतने सालों बाद रुद्र का इस प्रकार उस के समक्ष आना और घर वापस चलने को कहना, उस का मन कंपित हो उठा.

समारोह में सम्मिलित सभी गणमान्य और प्रतिष्ठित लोगों के बीच केवल एक ही नाम की चर्चा थी और वह नाम था स्मिता, जो एक बिजनैस टायकून और ‘फैशन द रिवौल्यूशन’ कंपनी की मालकिन थी. हर कोई उसे देखने और सुनने को आतुर था, क्योंकि आज का यह समारोह स्मिता को सम्मानित करने के लिए आयोजित किया गया था. आज स्मिता को बिजनैस वुमन औफ द ईयर से सम्मानित किया जाना था. सभी की निगाहें स्मिता पर ही टिकी हुई थीं.

स्मिता के सशक्त और भावपूर्ण उद्बोधन के पश्चात भोज का भी प्रावधान रखा गया था, जब रुद्र उसे मिला था.

घर पहुंचते ही वह सीधे अपने कमरे में जा, सारी बत्तियां बुझा आराम कुरसी पर बैठ कर झूलने लगी. वह रुद्र और अपने जीवन के उन पन्नों को पलटने लगी, जिन को वह अपनी जीवनरूपी किताब से हमेशा के लिए फाड़ कर फेंक देना चाहती थी, पर वह ऐसा कर न सकी, क्योंकि इस अध्याय से उसे काव्या जैसे अनमोल मोती की प्राप्ति भी हुई थी, जिस की रोशनी आज भी उस के जीवन को जगमगा रही है.

‘स्मिता, तुम अपनी यह कंपनी ‘फैशन द रिवौल्यूशन’ बंद क्यों नहीं कर देतीं? क्या जरूरत है तुम्हें अपनी यह छोटी सी कंपनी चलाने की जब मेरा खुद का इतना बड़ा बिजनैस है.’’

‘नहीं रुद्र, नहीं, यह कंपनी मेरा सपना है, इसे मैं ने अपनी कड़ी मेहनत से खड़ा किया है और फिर मैं इसे शादी के पहले से रन कर रही हूं और उस वक्त तो तुम्हें इस बात से कोई एतराज भी नहीं था, फिर आज ऐसा क्या हुआ कि तुम मुझे कंपनी बंद करने को कह रहे हो और फिर मैं घर पर बैठ कर करूंगी क्या…?’

‘क्या मतलब, करूंगी क्या? इतनी सारी औरतें घर पर बैठ कर क्या करती हैं? अपना घर संभालती हैं, पूजापाठ करती हैं, किटी पार्टी करती हैं, तुम भी वही करो,’ रुद्र ने गुस्से से कहा.

स्मिता घर पर किसी तरह का कोई झगड़ा नहीं चाहती थी, इसलिए वह शांत भाव से बोली, ‘रुद्र, मैं फैशन डिजाइनिंग में ग्रैजुएट हूं. मुझे पूजापाठ, सत्संग में कोई दिलचस्पी नहीं है और मैं जब घर बहुत अच्छी तरह से संभाल रही हूं, तो फिर मैं अपनी कंपनी क्यों बंद करूं?’

स्मिता के इतना कहते ही रुद्र का गुस्सा ज्वालमुखी की तरह फूट पड़ा और चीखते हुए कहने लगा, ‘तुम इस दुनिया की कोई पहली फैशन डिजाइनिंग में ग्रैजुएट या पढ़ीलिखी औरत नहीं हो. मां को देखो, वे अपने समय की ग्रैजुएट हैं, लेकिन उन्होंने अपना सारा जीवन इस चारदीवारी में पूजापाठ व सत्संग में गुजारा है. कभी इस तरह के प्रपंच में वे नहीं पड़ी हैं और न ही तुम्हारी तरह पापा के संग बातबात पर तर्क करती थीं. ऐसी होती है आदर्श नारी, तुम्हारी तरह बदजबान नहीं,’ कहता हुआ रुद्र चला गया.

स्मिता जड़वत सी खड़ी रही. उस की जबान पर यह बात आ कर ठहर गई कि मां ग्रैजुएट नहीं पोस्ट ग्रैजुएट हैं और वह भी संगीत विश्वविद्यालय से, लेकिन मां ने शादी के बाद गाना तो दूर वे अपने दिल के जज्बात भी कभी किसी से बयां नहीं कर पाईं, क्योंकि हमारा घर, हमारा समाज, पुरुषप्रधान है, जहां एक स्त्री को अपने मन के भावों को व्यक्त करने का कोई अधिकार नहीं. तभी मां ने स्मिता के कंधे पर धीरे से अपना हाथ रखा, तो वह मां के गले लग बिफर कर रो पड़ी.

रिश्तों में विभाजन की सीलन और गंध बढ़ती जा रही थी. रोज रुद्र कोई न कोई बहाना बना कर घर को कुरुक्षेत्र बनाने पर आमादा रहता. स्मिता घर और अपने बिखर रहे रिश्ते को समेटने का असफल प्रयास करने लगी.

अचानक कुछ समय बाद रुद्र में आ रहे परिवर्तन से स्मिता चकित थी. उसे ऐसा महसूस होने लगा कि रुद्र एकाएक उस के प्रति केयरिंग और कुछ बहुत ज्यादा ही कंसंर्ड रहने लगा है, जिस का कारण उस की समझ से परे था.

सहसा एक दिन रुद्र स्मिता को अपनी बांहों के घेरे में लेते हुए कहने लगा, ‘स्मिता, मैं चाहता हूं कि अब हमें 2 से 3 हो जाना चाहिए. अब परिवार को बढ़ाने का समय आ गया है.’

यह सुन स्मिता हैरान रह गई, अपनेआप को रुद्र से अलग करती हुई बोली, ‘रुद्र, इतनी जल्दी क्या है? शादी को अभी केवल सालभर ही तो हुआ है. अभी तो मुझे अपनी कंपनी को विस्तार देने का समय है और मुझे यह मौका भी मिल रहा है. मैं अभी

1-2 साल बच्चे के लिए तैयार नहीं हूं.’

स्मिता के इतना कहते ही रुद्र स्मिता पर बरस पड़ा. रोजरोज के क्लेश से बचने और अपना घर बचाने के लिए स्मिता ने हार मान ली. परिवार बढ़ाने के लिए वह राजी हो गई और फिर काव्या जैसी परी स्मिता की गोद में आ गई, जिस से स्मिता की जिम्मेदारी में बढ़ोतरी के साथ उस की दुनिया खुशियों से भी भर गई.

लेकिन रुद्र के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया, बल्कि अब वह बारबार काव्या और उस की देखभाल को ले कर स्मिता से झगड़ता, उसे अपनी कंपनी बंद करने को कहता, और स्वयं काव्या की जिम्मेदारी संभालने से पीछे हट जाता.

मां यदि कुछ कहतीं या स्मिता का पक्ष लेतीं तो वह मां को भी झिड़क देता. यह देख मां चुप हो जातीं. स्मिता अब समझ चुकी थी कि क्यों रुद्र को परिवार बढ़ाने की जल्दी थी. असल में वह मातृत्व की आड़ में स्मिता की प्रगति पर अंकुश लगाना चाहता था.

स्मिता घर, परिवार और बेटी काव्या के उत्तरदायित्व के साथ ही साथ बिजनैस भी बखूबी संभाल रही थी. व्यापारी वर्ग में स्मिता अपनी पहचान और एक विशेष स्थान बनाने में कामयाब होने लगी थी, जो रुद्र और उस के पुरुषत्व को नागवार गुजरने लगा और एक दिन रुद्र बेवजह अपना फ्रस्ट्रेशन, अपनी नाकामयाबी पर अपने पुरुषत्व और अहम का रंग चढ़ा स्मिता से कहने लगा, ‘अगर तुम्हें कुछ करने का इतना ही शौक है तो छोटीमोटी कोई टाइमपास 9 से 5 बजे वाली जौब क्यों नहीं कर लेतीं? क्या जरूरत है इस कंपनी को चलाने की. और सुनो, कंपनी का नाम ‘द रिवौल्यूशन’ रखने से कोई रिवौल्यूशन नहीं होने वाला, समझीं? यह मेरा घर है और यदि तुम्हें इस घर में रहना है तो मेरे अनुसार रहना होगा, वरना इस घर से निकल जाओ.’

यह सुनते ही स्मिता के सब्र का बांध टूट गया और उस ने आज रुद्र को समझाने की कोई कोशिश नहीं की. उस ने केवल इतना कहा, ‘‘यदि यह घर सिर्फ तुम्हारा है और मुझे इस घर में रहने के लिए कठपुतली की तरह तुम्हारे इशारों पर नाचना होगा तो बेहतर है कि मैं अभी इसी वक्त यह घर छोड़ दूं,’’ इतना कह कर स्मिता ने काव्या के संग उस रात घर छोड़ दिया और मां भी स्मिता के साथ हो लीं.

सारी रात स्मिता अतीत की काली स्याही में डूबी रही. दरवाजे पर हुई आहट से वह यथार्थ में लौटी.

‘‘मैडम, आप की कौफी,’’ स्मिता की मेड ने कहा.

‘‘हूं… यहां रख दो. काव्या और मां जाग गए?’’ स्मिता ने अपनी मेड से पूछा. पूरी रात जागने की वजह से स्मिता की आंखें लाल और स्वर में थोड़ा भारीपन था.

मेड ने बड़े अदब से दोनों हाथों को बांधे और सिर झुका कर जवाब दिया, ‘‘मैडम, मांजी को काफी समय हो चुका जागे. उन के स्टूडैंट्स भी आ गए हैं और मांजी संगीत की क्लास ले रही हैं, और काव्या बेबी सो रही हैं.’’

‘‘ठीक है, तुम जाओ,’’ कह कर स्मिता अपनी कौफी खत्म कर काव्या के कमरे में जा कर वहां सो रही काव्या के सिर और बालों में अपनी उंगलियां फेरती व उस के माथे को चूमती हुई बोली, ‘‘हैप्पी बर्थ डे टू माई डियर स्वीटहार्ट. आज मेरी डौल को उस के एटीन्थ बर्थ डे पर क्या चाहिए.’’

काव्या स्मिता से लिपटती हुई बोली, ‘‘मम्मा… मुझे मेरी कंप्लीट फैमिली चाहिए. मैं चाहती हूं कि पापा भी हमारे साथ रहें.’’

तभी स्मिता का फोन बजा. फोन रुद्र का था. स्मिता के फोन रिसीव करते ही रुद्र बोला, ‘‘आई एम सौरी स्मिता, मैं बहुत अकेला हो गया हूं. तुम सब प्लीज घर लौट आओ.’’

स्मिता ने सौम्य भाव से कहा, ‘‘रुद्र, मैं तुम्हें माफ कर सकती हूं, लेकिन मेरी एक शर्त है कि मैं तुम्हारे घर आ कर नहीं रहूंगी, तुम्हें मेरे घर आ कर हम सब के साथ रहना होगा.’’

रुद्र खुशीखुशी मान गया और कहने लगा, ‘‘तुम सब के चले जाने के बाद ही मुझे यह एहसास हुआ कि ईंटपत्थरों से बनी इस चारदीवारी में मेरा घर नहीं है, जहां तुम सब हो, जहां मेरा पूरा परिवार रहता है, वही मेरा घर है.’’

Hindi Story: सौतेला बरताव – जिस्म बेचने को मजबूर एक बेटी

Hindi Story: चंपा को देह धंधा करने के आरोप में जेल हो गई. वह रंगे हाथ पकड़ी गई थी. वह जेल की सलाखों में उदास बैठी हुई थी. चंपा के साथ एक अधेड़ औरत भी बैठी हुई थी. थोड़ी देर पहले पुलिस उसे भी इस बैरक में डाल गई थी. चंपा जिस होटल में देह धंधा करती थी, उसी होटल में पुलिस ने छापा मारा था और उसे रंगे हाथ पकड़ लिया था. आदमी तो भाग गया था, मगर पुलिस वाला उसे दबोचते हुए बोला था, ‘चल थाने.’

‘नहीं पुलिस बाबू, मुझे माफ कर दो…’ वह हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘अब नहीं करूंगी यह धंधा.’

‘वह आदमी कौन था ’ पुलिस वाला उसी अकड़ से बोला था.

‘मुझे नहीं मालूम कि वह कौन था ’ वह फिर हाथ जोड़ते हुए बोली थी.

‘झूठ बोलती है. चल थाने, सारा सच उगलवा लूंगा.’

‘मुझे छोड़ दीजिए.’

‘हां, छोड़ देंगे. लेकिन तू ने उस ग्राहक से कितने पैसे लिए हैं ’

‘कुछ भी नहीं दे कर गया.’

‘झूठ कब से बोलने लगी  चल थाने ’

‘छोड़ दीजिए, कहा न कि अब कभी नहीं करूंगी यह धंधा.’

‘करेगी… जरूर करेगी. अगर करना ही है, तो लाइसैंस ले कर कोठे पर बैठ. फिर हम तुझ से कुछ नहीं कहेंगे…’ हवलदार थोड़ा नरम पड़ते हुए बोला था, ‘तुझे छोड़ सकता हूं, मगर अंटी में जितने पैसे हैं, निकाल कर मुझे दे दे.’

‘साहब, आज तो मेरी अंटी में कुछ भी नहीं है,’ वह बोली थी.

‘ठीक है, तब तो एक ही उपाय है… जेल,’ फिर वह पुलिस वाला उसे पकड़ कर थाने ले गया था. चंपा दीवार के सहारे चुपचाप बैठी हुई थी. वह अधेड़ औरत न जाने कब से उसे घूर रही थी.आखिरकार वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘ऐ लड़की, तू कौन है ’’

तब चंपा ने अपना चेहरा ऊपर कर उस अधेड़ औरत की तरफ देखा, मगर जवाब कुछ नहीं दिया.

वह अधेड़ औरत जरा नाराजगी से बोली, ‘‘सुना नहीं  बहरी है क्या ’’

‘‘हां, पूछो ’’ चंपा ने कहा.

‘‘क्या अपराध किया है तू ने ’’

‘‘मैं ने वही अपराध किया है, जो तकरीबन हर औरत करती है ’’

‘‘क्या मतलब है तेरा गोलमोल बात क्यों कर रही है, सीधेसीधे कह न,’’ वह अधेड़ औरत गुस्से से बोली.

‘‘मुझे देह धंधा करने के आरोप में पकड़ा गया है.’’

‘‘शक तो मुझे पहले से ही था. अरे, जिस पुलिस वाले ने तुझे पकड़ा है, उस के मुंह पर नोट फेंक देती.’’

‘‘अगर मेरे पास पैसे होते, तो उस के मुंह पर मैं तभी फेंक देती.’’

‘‘तुम ने यह धंधा क्यों अपनाया ’’

‘‘क्या करोगी जान कर ’’

‘‘मत बता, मगर मैं सब जानती हूं.’’

‘‘क्या जानती हैं आप ’’

‘‘औरत मजबूरी में ही यह धंधा अपनाती है.’’

‘‘नहीं, गलत है. मैं मजबूरी में वेश्या नहीं बनी, बल्कि बनाई गई हूं.’’

‘‘कैसे अपनी कहानी सुना.’’

‘‘हां सुना दूंगी, मगर आप इस उम्र में जेल में क्यों आई हो ’’

‘‘मेरी बात छोड़, मेरा तो जेल ही घर है,’’ उस अधेड़ औरत ने कहा.

‘‘आप आदतन अपराधी हैं ’’

‘‘यही समझ ले…’’ उस अधेड़ औरत ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘फिर भी सुनना चाहती है तो सुन. मैं अफीम की तस्करी करती थी. अब सुना तू अपनी कहानी.’’

चंपा की कहानी कुछ इस तरह थी: चंपा के पिता मजदूर थे. उन का नाम मांगीलाल था. उन्होंने रुक्मिणी नाम की औरत से शादी की थी.

शादी के 2 साल गुजर गए थे. एक दिन पिता मांगीलाल को पता चला कि रुक्मिणी मां बनने वाली है. उन की खुशियों का ठिकाना न रहा.

रुक्मिणी को बांहों में भरते हुए वे बोले थे, ‘पहला बच्चा लड़का होना चाहिए…’

‘यह मेरे हाथ में है क्या ’ रुक्मिणी उन्हें झिड़कते हुए बोली थी. 9 महीने बाद जब चंपा पैदा हुई, तो 4 दिन बाद उस की मां मर गई. पिता के ऊपर सारी जवाबदारी आ पड़ी. रिश्तेदार कहने लगे कि पैदा होते ही यह लड़की मां को खा गई. तब मौसी ने उसे पाला. मां के मरने पर पिता टूट गए थे. वे उदासउदास से रहने लगे थे. तब अपना गम भुलाने के लिए वे शराब पीने लगे थे. रिश्तेदारों और उन के बड़े भाई ने खूब कहा कि दोबारा शादी कर लो, मगर वे तैयार नहीं हुए थे. धीरेधीरे चंपा मौसी की गोद में बड़ी होती गई. जब वह 5 साल की हो गई, तब उसे स्कूल में भरती करा दिया गया. पिता को दोबारा शादी के प्रस्ताव आने लगे. चारों तरफ से दबाव भी बनने लगा. एक दिन पिता के बड़े भाई भवानीराम और उन की पत्नी तुलसाबाई आ धमके. आते ही भवानीराम बोले, ‘ऐसे कैसे काम चलेगा मांगीलाल ’

‘क्या कह रहे हैं भैया ’ मांगीलाल ने पूछा.

‘सारी जिंदगी यों ही बैठे रहोगे ’ भवानीराम ने दबाव डालते हुए कहा.

‘आप कहना क्या चाहते हो भैया ’

‘अरे देवरजी…’ तुलसाबाई मोरचा संभालते हुए बोली, ‘देवरानी को गुजरे 6-7 साल हो गए हैं. अब उस की याद में कब तक बैठे रहोगे. चंपा भी अब बड़ी हो रही है.’ ‘भाभी, मेरा मन नहीं है शादी करने का,’ मांगीलाल ने साफ इनकार कर दिया था. ‘मैं पूछती हूं कि आखिर मन क्यों नहीं है ’ दबाव डालते हुए तुलसाबाई बोली, ‘यों देवरानी की याद करने से वह वापस तो नहीं आ जाएगी. फिर शादी कर लोगे, तो देवरानी के गम को भूल जाओगे.’

‘नहीं भाभी, मैं ने कहा न कि मुझे शादी नहीं करनी है.’

‘क्यों नहीं करनी है  हम तेरी शादी के लिए आए हैं. और हां, तेरी हां सुने बगैर हम जाएंगे नहीं,’ भैया भवानीराम ने हक से कहा, ‘हम ने तेरे लिए लड़की भी देख ली है. लड़की इतनी अच्छी है कि तू रुक्मिणी को भूल जाएगा.’

‘नहीं भैया, मैं चंपा के लिए सौतेली मां नहीं लाऊंगा,’ एक बार फिर इनकार करते हुए मांगीलाल बोला.

‘कैसी बेवकूफों जैसी बातें कर रहा है. जिन की औरत भरी जवानी में ही चली जाती है, तब वे दोबारा शादी नहीं करते हैं क्या ’

‘अरे देवरजी, यह क्यों भूल रहे हो कि चंपा को मां मिलेगी. कब तक मौसी उस की देखरेख करती रहेगी  इस बात को दिमाग से निकाल फेंको कि हर मां सौतेली होती है. जिस के साथ हम तुम्हारी शादी कर रहे हैं, वह ऐसी नहीं है. चंपा को वह अपनी औलाद जैसा ही प्यार देगी ’ ‘भाभी, आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए हो ’

‘बिना औरत के आदमी का घर नहीं बसता है और हम तेरा घर बसाना चाहते हैं. लड़की हम ने देख ली है. एक बात कान खोल कर सुन ले, हम तेरी शादी करने के लिए आए हैं. इनकार तो तुम करोगे नहीं. बस, तैयार हो जाओ,’ कह कर भवानीराम ने बिना कुछ सुने फैसला सुना दिया. मांगीलाल को भी हार माननी पड़ी. भैयाभाभी ने जो लड़की पसंद की थी, उस का नाम कलावती था. मान न मान मैं तेरा मेहमान की तरह कलावती के साथ उस की शादी कर दी गई. जब तक कलावती की पहली औलाद न हुई, तब तक उस ने चंपा को यह एहसास नहीं होने दिया कि वह उस की सौतेली मां है. मगर बच्चा होने के बाद वह चंपा को बातबात पर डांटने लगी. उस का स्कूल छुड़वा दिया गया. वह उस से घर का सारा काम लेने लगी. पिता भी नई मां पर ज्यादा ध्यान देने लगे. इस तरह नई मां ने पिता को अपने कब्जे में कर लिया. धीरेधीरे चंपा बड़ी होने लगी. लड़के उसे छेड़ने लगे.

कलावती भी उसे देख कर कहने लगी, ‘लंबी और जवान हो गई है. कब तक हमारे मुफ्त के टुकड़े तोड़ती रहेगी. कोई कामधंधा कर. कामधंधा नहीं मिले, तो किसी कोठे पर जा कर बैठ जा. तेरी जवानी तुझे कमाई देगी.’ चंपा के पिता जब शादी की बात चलाते, तब सौतेली मां कहती, ‘कहां शादी के चक्कर में पड़ते हो. चंपा अब बड़ी हो गई है. साथ ही, जवान भी. रूप भी ऐसा निखरा है कि अगर इसे किसी कोठे पर बिठा दो, तो खूब कमाई देगी.’ तब पिता विरोध करते हुए कहते, ‘जबान से ऐसी गंदी बात मत निकालना. क्या वह तुम्हारी बेटी नहीं है ’

‘‘मेरी पेटजाई नहीं है वह. आखिर है तो सौतेली ही,’ कलावती उसी तरह जवाब देती. पिता को गुस्सा आता, मगर वह उन्हें भी खरीखोटी सुना कर उन की जबान बंद कर देती थी. इस गम में पिता ज्यादा शराब पीने लगे. रातदिन की चकचक से तंग आ कर चंपा ने कोई काम करने की ठान ली. मगर सौतेली मां तो उस से देह धंधा करवाना चाहती थी. आखिर में चंपा ने भी अपनी सौतेली मां की बात मान ली. जिस होटल में वह धंधा करती थी, वहीं सौतेली मां ग्राहक भेजने लगी. ग्राहक से सारे पैसे सौतेली मां झटक लेती थी. चंपा ने उस अधेड़ औरत के सामने अपना दर्द उगल दिया. थोड़ी देर के सन्नाटे के बाद वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘तेरी कहानी बड़ी दर्दनाक है. आखिर सौतेली मां ने अपना सौतेलापन दिखा ही दिया.’’

चंपा कुछ नहीं बोली.

‘‘अब क्या इरादा है  तेरी सौतेली मां तुझे छुड़ाने आएगी ’’ उस अधेड़ औरत ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं तो अब जेल में ही रहना चाहती हूं. उस सौतेली मां की सूरत भी नहीं देखना चाहती हूं.’’

‘‘तू भले ही मत देख, मगर तेरी सौतेली मां तुझ से पैसा कमाएगी, इसलिए तुझे छुड़ाने जरूर आएगी,’’ अपना अनुभव बताते हुए वह अधेड़ औरत बोली.

‘‘मगर, अब मैं घर छोड़ कर भाग जाऊंगी ’’

‘‘भाग कर जाएगी कहां  यह दुनिया बहुत बड़ी है. यह मर्द जात तुझे अकेली देख कर नोच लेगी. मैं कहूं, तो तू किसी अच्छे लड़के से शादी कर ले.’’ ‘‘कौन करेगा मुझ से शादी बस्ती के सारे बिगड़े लड़के मुझ से शादी नहीं मेरा जिस्म चाहते हैं. वैसे भी मैं बदनाम हो गई हूं. अब कौन करेगा शादी ’’ ‘‘हां, ठीक कहती हो…’’ कह कर वह अधेड़ औरत खामोश हो गई. कुछ पल सोच कर वह अधेड़ औरत बोली, ‘‘हम औरतों के साथ यही परेशानी है. देख न मुझे भी मेरी जवानी का फायदा उठा कर तस्करी का काम दिया, ताकि औरत देख कर कोई शक नहीं करे. मगर जब पैसे मिलने लगे, तब धंधा मुझे रास आ गया. इस का नतीजा देख रही हो, आज मैं जेल में हूं.’’ फिर दोनों के बीच काफी देर तक सन्नाटा पसरा रहा. तभी एक पुलिस वाले ने ताला खोलते हुए कहा, ‘‘बाहर निकल. तेरी मां ने जमानत दे दी है.’’ चंपा ने देखा कि उस की मां कलावती खड़ी थी. वह गुस्से में बोली, ‘‘तू चुपचाप धंधा करती रही और मुझे बदनाम कर दिया. सारी बस्ती वाले मुझ पर थूक रहे हैं. आखिर मैं तेरी सौतेली मां हूं न, बदनाम तो होना ही है. वैसे भी सौतेली मां तो बदनाम ही रहती है.

‘‘चल, निकल बाहर. अब कभी धंधा किया न, तो तेरी खाल खींच लूंगी. मां हूं तेरी, भले ही सौतेली सही. मैं ने जमानत दे दी है.’’ चंपा कुछ नहीं बोली. वह अपनी सौतेली मां के साथ हो ली. वह जानती थी कि यह केवल लोकलाज का दिखावा है. अब यह कैसी साहूकार बन रही है. उलटा चोर कोतवाल को डांट कर.

Hindi Story: दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा-सुगमा की कशमकश

Hindi Story: वह पेट से थी. कोख में किस का बच्चा पलबढ़ रहा था, ससुराल वाले समझ नहीं पा रहे थे. सब अंदर ही अंदर परेशान हो रहे थे.

पिछले 2 साल से उन का बड़ा बेटा जुबैर अपने बूढ़े मांबाप को 2 कुंआरे भाइयों के हवाले कर अपनी बीवी सुगरा को छोड़ कर खाड़ी देश कमाने गया था. शर्त के मुताबिक उसे लगातार 2 साल नौकरी करनी थी, इसलिए घर आने का सवाल ही नहीं उठता.

इसी बीच जुबैर की बीवी सुगरा कभी मायके तो कभी ससुराल में रह कर समय काट रही थी. 2 साल बाद उस के शौहर का भारत आनाजाना होता रहेगा, यही बात सोच कर वह खुश थी.

सुगरा जब भी मायके आती तो हर जुमेरात शहर के मजार जाती. उस मजार का नाम दूरदूर तक था. कई बार तो वह वहां अकेली आतीजाती थी.

एक शहर से दूसरे शहर में ब्याही गई सुगरा ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. उस ने शहर के एक मदरसे में तालीम पाई थी. सिलाईकढ़ाई और पढ़ाई सीखतेसीखते मदरसे के हाफिज से उस की जानपहचान हो गई थी. वह हाफिज से हंसतीबोलती, पर प्यार मुहब्बत से अनजान थी.

मदरसे में पढ़तेपढ़ते सुगरा के अम्मीअब्बू ने रिश्तेदारी में अच्छा रिश्ता पा कर उस की शादी करने की सोची.

‘सुनोजी, रिश्तेदारी में शादी करने से आपस में बुराई होती है. हालांकि वह हमारी खाला का बेटा है. रोजगार की तलाश में है. जल्द लग नौकरी जाएगी,  पर…’ सुगरा की मां ने कहा था.

‘पर क्या?’ सुगरा के अब्बू ने पूछा था.

‘कल को कोई मनमुटाव हो गया या लड़के को लड़की पसंद न आई तो…’ सुगरा की अम्मी बोली थीं.

‘सुना है कि लड़का खाड़ी देश में कमाने जा रहा है. नौकरी वाले लड़के मिलते ही कहां हैं,’ सुगरा के अब्बू ने कहा था.

दोनों परिवारों में बातचीत हुई और उन का निकाह हो गया. पर मदरसे के हाफिज को सुगरा अब भी नहीं भुला पाई थी.

आज मुर्शिद मियां का परिवार जश्न मना रहा था. एक तो उन के बेटे जुबैर की नौकरी खाड़ी देश में लग गई थी, दूसरी उन के घर खूबसूरत सी बहू आ गई.

‘सुगरा, तुम जन्नत की परी जैसी हो. तुम्हारे आने से हमारा घर नूर से जगमगा गया,’ कह कर जुबैर ने सुगरा को अपने सीने से लगा लिया था.

उन दोनों के बीच मुहब्बत की खुशियों ने डेरा जमा लिया था. पूरा परिवार खुश था.

एक महीने का समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला. जुबैर खाड़ी देश जाने की तैयारी करने लगा. सुगरा को उदासी ने घेर लिया था. उस के दिल से आह निकलती कि काश, जुबैर उसे छोड़ कर न जाता.

‘सिर्फ 2 साल की ही तो बात है,’ कह कर जुबैर सुगरा को आंसू और प्यार के बीच झलता छोड़ कर नौकरी करने खाड़ी देश चला गया था.

सुगरा की मायूसी देख उस की सास ने अपने शौहर से कहा था, ‘इन दिनों सुगरा घर से बाहर नहीं निकलती है. बाबा के मजार पर हाजिरी देने के लिए उसे देवर रमजान के साथ भेज दिया करें, ताकि उस का मन बहला रहे.’

वे हंसे और बोले, ‘जुबैर के गम में परेशान हो रही होगी. भेज दिया करो. जमाना बदल रहा है. आजकल के बच्चे घर में कैद हो कर नहीं रहना चाहते,’ अपनी बात रखते हुए सुगरा के ससुर मुर्शिद मियां ने इजाजत दे दी थी.

सुगरा मजार आने लगी थी. उस की खुशी के लिए देवर रमजान उस से हंसताबोलता, मजाक करता था, ताकि वह जुबैर की याद भुला सके.

जुबैर को गए 2 महीने हो गए थे लेकिन सासससुर की खुली छूट के बाद भी सुगरा की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आया था.

इसी बीच सुगरा के अब्बू आए और उसे कुछ दिनों के लिए घर ले गए. सुगरा ने अम्मी से आगे पढ़ने की बात कही, ताकि उस का मन लगा रहे और वह तालीम भी हासिल कर सके.

मायके में सुगरा के मामा के लड़के को तालीम देने के लिए बुलाया गया. अब सुगरा घर पर ही पढ़ने लगी थी.

एक दिन मजार पर हाफिज ने सुगरा की खूबसूरती की तारीफ क्या कर दी, उस के दिल में हाफिज के लिए मुहब्बत पैदा हो गई.

शादीशुदा सुगरा जवानी का सुख भोग चुकी थी. वह खुद पर काबू नहीं रख पाई और हाफिज की तरफ झाकने लगी.

‘कल मजार पर मिलते हैं…’ आजमाने के तौर पर हाफिज ने कहा था, ‘शाम 7 बजे.’

यह सुन कर सुगरा शरमा गई.

‘ठीक है,’ सुगरा ने कहा था.

ठीक 7 बजे सुगरा मजार पर पहुंच गई. दुआ मांगने के बाद वह हाफिज के साथ गलियारे में बैठ कर बातें करने लगी.

हाफिज ने सुगरा को बताया कि मजार पर दुआ मांगने से दिल को सुकून मिलता है, मनचाही मुराद मिलती है.

अब वे दोनों रोजाना शाम को मजार पर मिलने लगे थे. उन के बीच के फासले कम होने लगे थे.

तकरीबन 4 महीने का समय बीत गया. एक दिन ससुराल से देवर आया और सुगरा की मां को अपनी अम्मी की तबीयत खराब होने की बात कह कर सुगरा को अपने साथ ले गया.

ससुराल में सुगरा जुबैर की याद में डूबी रहने के बजाय हाफिज की दीवानी हो गई थी. वह उस से मिलने को बेकरार रहने लगी थी.

धीरेधीरे सुगरा की सास ठीक हो गईं. सुगरा अब शहर के मजार पर जा कर हाफिज से मिलने की दुआ मांगती थी.

समय की चाल फिर बदली.

‘मैं कालेज में एक पीरियड में हाजिरी लगा कर आता हूं, तब तक तुम मजार पर रुकना,’ कह कर सुगरा को छोड़ उस का देवर कालेज चला गया.

इसी बीच सुगरा ने फोन पर हाफिज को मजार पर बुलाया. उन की मुलाकात दोबारा शुरू हो गई.

देवर के जाने के बाद मजार के नीचे पहाड़ी पर सुगरा अपनी जवानी की प्यास बुझाती और लौट कर मजार से दूर जा कर बैठ जाती. ससुराल में रह कर हाफिज से अपनी जवानी लुटाती सुगरा की इस हरकत से कोई वाकिफ नहीं था.

शहर की मसजिद में हाफिज को बच्चों को तालीम देने की नौकरी मिल जाने से अब सुगरा और उस के बीच की दूरियां मिट गईं. सुगरा को भी सासससुर से सिलाई सैंटर जा कर सिलाई सीखने की इजाजत मिलने की खुशी थी.

जुबैर को खाड़ी देश गए सालभर से ऊपर हो गया था.

‘तकरीबन 4-5 महीने की बात है,’ उस की अम्मी ने सुगरा से कहा था.

‘हां अम्मी, तब तक वे आ जाएंगे,’ सुगरा बोली थी.

पर सुगरा को अब जुबैर की नहीं हाफिज की जरूरत थी. सुगरा और हाफिज के बीच अब कोई दीवार नहीं थी. हाफिज की मसजिद वाली कोठी में वे बेफिक्री से मिलते थे.

सुगरा भी दिल खोल कर हाफिज के साथ रंगरलियां मनाने लगी थी और नतीजा…

सुगरा की तबीयत अचानक खराब होने पर उस की सास उसे अस्पताल ले कर गईं.

डाक्टर ने बताया, ‘आप की बहू मां बनने वाली है.’

घर लौट कर सास मायूसी के साए में डूब गईं. सोचा कि जब जुबैर डेढ़ साल से सुगरा से नहीं मिला तो फिर बहू के पैर भारी कैसे हो गए?

सुगरा ने जुबैर को फोन पर पूरी बात बताई.

जुबैर ने कहा, ‘दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा.’

जुबैर समझ गया था कि मामला क्या है, पर वह यह भी जानता था कि हल्ला मचाने पर वही बदनाम होगा. उसे अभी कई साल खाड़ी देश में काम करना था. एक बच्चा उस के नाम से रहेगा तो उसे ही अब्बा कहेगा न.

Hindi Story : गणपति का जन्म – विकृत बच्चे को देख क्या हुआ

Hindi Story : फूलचंद ने फटा हुआ कंबल खींचखींच कर एकदूसरे के साथ सट कर सो रहे तीनों बच्चों को ठीक से ओढ़ाया और खुद राख के ढेर में तब्दील हो चुके अलाव को कुरेद कर गरमी पाने की नाकाम कोशिश करने लगा.

जाड़े की रात थी. ऊपर से 3 तरफ से खुला हुआ बरामदा. सांयसांय करती हवा हड्डियों को काटती चली जाती थी. गनीमत यही थी कि सिर पर छत थी.

अंदर कमरे में फूलचंद की बीवी सुरना प्रसव वेदना से तड़प रही थी. रहरह कर उस की चीखें रात के सन्नाटे को चीरती चली जाती थीं. पड़ोसी रामचरन की घरवाली और सुखिया दाई उसे ढाढ़स बंधा रही थीं.

मगर फूलचंद का ध्यान न तो सुरना की पीड़ा की ओर था, न ही उस के मन में आने वाले मेहमान के प्रति कोई उल्लास था. सच तो यह था कि अनचाहे बोझ को ले कर वह चिंतित ही था.

परिवार की माली हालत पहले से ही खस्ता थी. जब तक मिल चलती रही तब तक तो गनीमत थी. मगर पिछले 8 महीने से मिल में तालाबंदी चल रही थी और अब वह मजदूरी कर के किसी तरह परिवार का पेट पाल रहा था.

लेकिन रोज काम मिलने की कोई गारंटी न थी. कई बार फाकों की नौबत आ चुकी थी. कर्ज था कि बढ़ता ही जा रहा था. ऐसे में वह चौथा बच्चा फूलचंद को किसी नई मुसीबत से कम नजर नहीं आ रहा था. लेकिन समय के चक्र के आगे बड़ेबड़ों की नहीं चलती, फिर फूलचंद की तो क्या बिसात थी.

तभी सुरना की हृदय विदारक चीख उभरी और धीरेधीरे एक पस्त कराह में ढलती चली गई. फूलचंद ने भीतर की आवाजों पर कान लगाए. अंदर कुछ हलचल तो हो रही थी. मगर नवजात शिशु का रुदन सुनाई नहीं पड़ रहा था. अब फूलचंद को खटका हुआ, ‘क्या बात हो सकती है?’ कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई? मगर पूछूं भी तो किस से? अंदर जा नहीं सकता.

फूलचंद मन मार कर बैठा रहा. अब तो दोनों औरतों में से ही कोई बाहर आती, तभी कुछ पता चल पाता. हां, सुरना की कराहें उसे कहीं न कहीं आश्वस्त जरूर कर रही थीं.

प्रतीक्षा की वे घडि़यां जैसे युगों लंबी होती चली गईं. काफी देर बाद सुखिया दाई बाहर निकली. फूलचंद ने डरतेडरते पूछा, ‘‘सब ठीक तो है न?’’

‘‘हां, लड़का हुआ है,’’ सुखिया ने निराश स्वर में बताया, ‘‘मगर…’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ फूलचंद व्यग्र हो उठा.

‘‘अब मैं क्या कहूं. तुम खुद ही जा कर देख लो.’’

इस के बाद सुखिया तो चली गई, लेकिन फूलचंद की उलझन और बढ़ गई, ‘ऐसी क्या बात है, जो सुखिया से नहीं बताई गई? कहीं बच्चा मरा हुआ तो नहीं? मगर यह बात तो सुखिया बता सकती थी.’

कुछ देर बाद रामचरन की घरवाली भी यह कह कर चली गई, ‘‘कोई दिक्कत आए तो बुला लेना.’’

अब फूलचंद के अंदर जाने में कोई रुकावट नहीं थी. वह धड़कते दिल से अंदर घुसा. सुरना अधमरी सी चारपाई पर पड़ी थी. बगल में शिशु भी लेटा था.

सुरना ने आंखें खोल कर देखा. मगर फूलचंद की कुछ पूछने की हिम्मत न हुई. हां, उस की आंखों में कौंधती जिज्ञासा सुरना से छिपी न रह सकी. उस ने शिशु के मुंह पर से कपड़ा हटा दिया और खुद आंखें मूंद लीं.

आंखें तो फूलचंद की भी एकबारगी खुद ब खुद मुंद गईं. सामने दृश्य ही ऐसा था. नवजात शिशु का चेहरा सामान्य शिशुओं जैसा न था. माथा अत्यंत संकरा और लगभग तिकोना था. आंखें छोटीछोटी और कनपटियों तक फटी हुई थीं. कान भी असामान्य रूप से लंबे थे. सब से विचित्र बात यह थी कि शिशु का ऊपरी होंठ था ही नहीं. हां, नाक अत्यधिक लंबी हो कर ऊपरी तालू से जा लगी थी.

फूलचंद जड़ सा खड़ा था, ‘यह कैसी माया है? हुआ ही था तो अच्छाभला होता. नहीं तो जन्म लेने की क्या जरूरत थी. मुझ पर हालात की मार पहले ही क्या कम थी, जो यह नई मुसीबत मेरे सिर आ पड़ी. क्या होगा इस बच्चे का? अपना यह कुरूप ले कर इस दुनिया में यह कैसे जिएगा? क्या होगा इस का भविष्य?’

फूलचंद ने डरतेडरते पूछा, ‘‘इस की आवाज?’’

‘‘पता नहीं,’’ सुरना ने कमजोर आवाज में बताया, ‘‘रोया तक नहीं.’’

‘हैं,’ फूलचंद ने सोचा, ‘क्या यह गूंगा भी होगा?’

सुरना पहले ही काफी दुखी प्रतीत हो रही थी. इसलिए फूलचंद ने और कोई सवाल न किया. बस, अपनेआप को कोसता रहा और बाहर सोए तीनों बच्चों को ला ला कर अंदर लिटाता रहा. फिर खुद भी उन्हीं के साथ सिकुड़ कर लेटा रहा.

मगर उस की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था. रहरह कर नवजात शिशु का चेहरा आंखों के आगे नाचने लगता था. तरहतरह की आशंकाएं मन में उठ रही थीं. फूलचंद ने सुना था कि उस तरह के बच्चे कुछ दिनों के ही मेहमान होते हैं. मगर वह बच्चा अगर जी गया तो…?

इसी तरह की उलझनों में पड़े हुए फूलचंद ने बाकी रात आंखों में ही काट दी.

सुबह होतेहोते रामचरन की घरवाली के माध्यम से यह बात महल्ले भर में जंगल की आग की तरह फैल गई कि फूलचंद के यहां विचित्र बालक का जन्म हुआ है.

बस, फिर क्या था. तमाशबीन औरतों के झुंड के झुंड आने शुरू हो गए. उन का तांता टूटने का नाम ही नहीं लेता था. वह एक ऐसी मुसीबत थी जिस की फूलचंद ने कल्पना तक नहीं की थी. मगर चुप्पी साधे रहने के सिवा कोई दूसरा चारा भी नहीं था.

तभी तमाशबीन औरतों के एक झुंड के साथ भगवानदीन की मां राधा आई. उस ने सारा वातावरण ही बदल कर रख दिया. राधा ने बच्चे को देखते ही हाथ जोड़ कर प्रणाम किया. फिर जमीन पर बैठ कर माथा झुकाया और साथ आई औरतों को फटकार लगाई, ‘‘अरी, ऐसे दीदे फाड़फाड़ कर क्या देख रही हो? प्रणाम करो. यह तो साक्षात गणेशजी ने कृपा की है सुरना पर. इस की तो कोख धन्य हो गई.’’

साथ आई औरतें अभी तक तो राधा के क्रियाकलाप अचरज से देख रही थीं. किंतु उस की बात सुनते ही जैसे उन की भी आंखें खुलीं. सब ने शिशु को प्रणाम किया. सुरना की कोख को सराहा और हाथ में जो भी सिक्का था, वही चारपाई के सामने अर्पित करने के बाद जमीन पर माथा टेक दिया.

अब राधा बाहर फूलचंद के पास दौड़ी आई. वह थकान और चिंता के कारण बाहर चबूतरे पर घुटनों में सिर डाले बैठा था. राधा ने उसे झिंझोड़ कर उठाया, ‘‘अरे, क्या रोनी सूरत बनाए बैठा है यहां. तुझे तो खुश होना चाहिए, भैया. सुरना की कोख पर साक्षात ‘गणेशजी’ ने कृपा की है. तेरे तो दिन फिर गए. और देख, वह तो माया दिखाने आए हैं अपनी. वह रुकेंगे थोड़ा ही. जब तक हैं, खुशीखुशी उन की सेवा कर. हजारों वर्षों में किसीकिसी को ही ऐसा अवसर मिलता है.’’

फूलचंद चमत्कृत हो उठा, ‘‘यह बात तो मेरे दिमाग में आई ही नहीं थी, काकी.’’

‘‘अरे, तुम लोग ठहरे उम्र व अक्ल के कच्चे,’’ राधा ने बड़प्पन झाड़ा, ‘‘तुम्हें ये सब बातें कहां से सूझें. और हां, लोग दर्शन को आएंगे तो किसी को मना न करना, बेटा. उन पर कोई अकेले तेरा ही हक थोड़ा है. वह तो साक्षात ‘परमात्मा’ हैं, वह सब के हैं, समझा?’’

फूलचंद ने नादान बालक की तरह हामी भरी और लपक कर अंदर पहुंचा. दरअसल, अब वह शिशु को एक नई नजर से देखना चाहता था. मगर चारपाई के पास पड़े पैसों को देख कर वह एक बार फिर चक्कर खा गया. सुरना से पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘वही लोग चढ़ा गए हैं,’’ सुरना ने बताया, ‘‘काकी कहती थीं, गणेशजी…’’

‘‘और नहीं तो क्या,’’ फूलचंद में जैसे नई जान पड़ने लगी थी, ‘‘न तो तेरी मति में यह बात आई, न ही मेरी. मगर हैं ये साक्षात गणेशजी ही.’’

‘‘हम लोग उन की माया क्या जान सकें. अपनी माया वही जानें.’’

फूलचंद को एकाएक शिशु की चिंता सताने लगी, ‘‘यह तो हिलताडुलता भी नहीं. देख सांस तो चलती है न?’’

सुरना ने कपड़ा हटा कर देखा. सांसें चल रही थीं.

फूलचंद को अब दूसरी चिंता हुई, ‘‘भला एकआध बार दूधवूध चटाया या नहीं?’’

सुरना ने तनिक दुखी स्वर में कहा, ‘‘दूध तो मुंह में दाब ही नहीं पाता.’’

‘‘ओह,’’ फूलचंद झल्लाया, ‘‘क्या इसे भूखा मारोगी? देखो, मैं रुई का फाहा बना कर देता हूं. तुम उसी से दूध इस के मुंह में टपका देना. गला सूखता होगा.’’

शिशु का गला सींचने का यह उपक्रम चल ही रहा था कि कुछ और लोग कथित गणेशजी के दर्शनार्थ आ पहुंचे. इस बार औरतों के अलावा मर्द भी आए थे. दूसरी खास बात यह थी कि कुछ लोगों के हाथों में फूल और फल भी थे. फूलचंद ने लपक कर प्रसन्न मन से सब का स्वागत किया, ‘‘आइए आइए, आप लोग भी दर्शन कीजिए.’’

दोपहर ढलतेढलते कथित गणेशजी के जन्म की खबर पासपड़ोस के महल्लों तक फैल गई. श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी. मिठाई, फल, मेवा, फूल आदि जो बन पाता, लिए चले आ रहे थे. उस के अलावा नकदी का चढ़ावा भी कम न था.

शाम को किसी पड़ोसी ने सलाह दी, ‘‘कुछ परचे छपवा कर बांट दिए जाएं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को खबर हो जाए और वे दर्शन का लाभ प्राप्त कर सकें.’’

फूलचंद को वह सलाह जंची. पता नहीं, कब उस की भी यह दिली इच्छा हो आई थी कि जितने ज्यादा लोग दर्शन का लाभ उठा लें, उतना ही अच्छा.

आननफानन मजमून बनाया गया और एक पड़ोसी ने खुद आगे बढ़ कर परचे छपवा कर अगले ही दिन मुहैया कराने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली.

रात करीब 10 बजे दर्शनार्थियों का तांता टूटा. तब फूलचंद ने दर्शन बंद होने की घोषणा की. उस रात फूलचंद के परिवार ने बहुत दिनों बाद तृप्ति भर सुस्वाद भोजन का आनंद उठाया था. दूसरे दिन परचे बंटे और एक स्थानीय अखबार के प्रतिनिधि आ कर बच्चे की तसवीर खींच ले गए. अखबार में बच्चे की तसवीर और विचित्र बालक के जन्म की खबर छपते ही, शहर में जैसे आग सी लग गई. दूरदराज के महल्लों से भी लोग दर्शन के लिए टूट पड़े.

फूलचंद के घर के सामने मेला सा लग गया. पता नहीं, कहां से फूल आदि ले कर एक माली बैठ गया. उस के अलावा महल्ले के हलवाई को दम मारने की फुरसत न थी. उस भीड़ को व्यवस्थित ढंग से दर्शन कराने के लिए फूलचंद को अपने कमरे का दूसरा दरवाजा (जो अभी तक बंद रखा जा रहा था) खोलना पड़ा. अब लोग कतार बांधे एक दरवाजे से अंदर आते थे और दर्शन कर के दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाते थे.

फूलचंद और उस के बच्चे सुबहसुबह ही नहाधो कर साफसुथरे कपड़े पहन लेते और दर्शन की व्यवस्था में जुट जाते. घर में अब न तो पहले जैसा तनाव था, न ही कुढ़न. सभी जैसे उल्लास की लहरों में तैरते रहते थे.

फूलचंद थोड़ीथोड़ी देर बाद सुरना के पास आ कर उस के कान में शिशु को रुई के फाहे से दूध चटाते रहने की हिदायत देता रहता था. इस बहाने वह अपनेआप को आश्वस्त भी कर लेता था कि शिशु अभी जीवित है.

रात को भी वह कई बार शिशु को देखता और उस की सांसें चलती देख कर चैन से सो जाता. सब कुछ सामान्य ढंग से चल रहा था. कहीं कोई समस्या न थी. हां, एक समस्या यह जरूर पैदा हो गई थी कि चढ़ावे में चढ़ी मिठाई का क्या किया जाए. उसे उपभोग के लिए ज्यादा दिन बचाए रखना संभव न था. यों फूलचंद ने महल्ले में अत्यंत उदारतापूर्वक प्रसाद बांटा था. फिर भी मिठाई चुकने में न आती थी.

लेकिन उस समस्या का हल भी निकल आया. रात में मिठाई फूलचंद के यहां से उठा कर हलवाई के हाथों बेच दी जाती, फिर सुबह श्रद्धालुओं के हाथों में होती हुई दोबारा फूलचंद के यहां चढ़ा दी जाती.

छठे दिन भोर में ही सुरना ने फूलचंद को जगाया और घबराई हुई आवाज में कहा, ‘‘देखो, इस को क्या हो गया?’’

फूलचंद ने हड़बड़ा कर शिशु को उघाड़ दिया. झुक कर गौर से देखा. उस की सांसें बंद हो चुकी थीं. हताश हो कर सुरना की ओर देखा, ‘‘खेल खत्म हो गया.’’ सुरना की रुलाई खुद व खुद फूट पड़ी. मगर फूलचंद ने उसे रोका, ‘‘नहीं, रोनाधोना बंद करो. इस को ऐसे ही लेटा रहने दो. देखो, किसी से जिक्र न करना. थोड़ी देर में लोग दर्शन के लिए आने लगेंगे.’’

सुरना ने रोतेरोते ही कहा, ‘‘मगर यह तो…’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ फूलचंद ने कहा, ‘‘यह तो वैसे भी न तो रोता था, न ही हिलताडुलता था. लोगों को क्या पता चलेगा? हां, शाम को कह देंगे कि भगवान ने माया समेट ली.’’ और फिर जैसे सुरना को समझाने के बहाने फूलचंद अपनेआप को भी समझाने लगा, ‘कोई हम ने तो भगवान से यह स्वरूप मांगा न था. यह तो उन्हीं की कृपा थी. शायद हमारी गरीबी ही दूर करने आए थे. आज दिन भर लोग और दर्शन कर लेंगे तो कुछ बुरा तो नहीं हो जाएगा.’

सुरना घुटनों पर माथा टेके सिसकती रही. फूलचंद ने फिर समझाया, ‘‘देखो, अब ज्यादा दुख न करो. ज्यादा दिन तो इसे वैसे भी नहीं जीना था. और जी जाता तो क्या होता इस का. उठो, तैयार हो कर रोज की तरह बैठ जाओ. लोग आने ही वाले हैं.’’ सुरना बिना कुछ बोले तैयार होने के लिए उठ गई. थोड़ी देर बाद ही वहां दर्शनार्थियों का तांता लगना शुरू हो गया और भेंट व प्रसाद के रूप में फूलों, मिठाइयों एवं सिक्कों के ढेर लगने लगे.

Hindi Story: राजकुमारी- क्या पूरी हो सकी उसकी प्रेम कहानी

Hindi Story: उस का नाम ही राजकुमारी था. वैसे तो वह कहीं की राजकुमारी नहीं थी, लेकिन वह सचमुच राजकुमारी लगती थी. उस की खूबसूरती, रखरखाव, बातचीत करने का अंदाज और उस की शाही चाल उसे वाकई राजकुमारी बनाए हुए थे, जबकि वह एक मामूली घर की लड़की थी. जब उस ने पहले दिन दफ्तर में कदम रखा, तो न केवल कुंआरों के, बल्कि शादीशुदा लोगों के दिलों की धड़कनें भी तेज हो गई थीं. ‘चांदी जैसा रूप है तेरा सोने जैसे बाल, एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल’, जैसी गजल उन के सामने आ गई थी. सपनों की हसीन शहजादी उन के सामने थी.

दफ्तर की दूसरी लड़कियों और औरतों ने भी जलन और तारीफ भरी नजरों से देखा था उसे. वह सब से अलग नजर आ रही थी. उस पर जवानी ही कुछ ऐसी टूट कर बरस रही थी कि दफ्तर में सभी चौंक पड़े थे. लंबा कद, घने बाल, भरी छातियां, पतली कमर और चाल में कोमलता. लेकिन वह वहां नौकरी करने आई थी, इश्क करने नहीं. उसे औरों से ज्यादा अपने काम से लगाव था. उस ने किसी की तरफ नजर भर कर मुसकरा कर भी नहीं देखा. उस के चेहरे पर खामोशी छाई रहती थी और आंखों में चिंता तैरती रहती थी. ऐसा लगता था कि वह बहुत सी परेशानियों से एकसाथ लड़ रही है. वह एक मामूली साड़ी बांधे हुए थी, लेकिन दूसरी औरतों और लड़कियों के मुकाबले उस की वह मामूली साड़ी भी खूब जंच रही थी उस पर. कई दिन बीत गए. वह सिर्फ अपने काम से काम रखती.

यदि वह किसी की माशूका न होती तो किसी न किसी को अपना दिल दे बैठती. खूबसूरत नौजवानों की इस दफ्तर में भी कमी नहीं थी. आमतौर पर उस तरह की खूबसूरत लड़कियां सहयोगियों पर दाना फेंक कर अपना काम निकालती हैं, पर राजकुमारी उन में से न थी. यह ऐसा सैंटर था, जिस में छोटीछोटी सैकड़ों मेजें लगी थीं. इस कंपनी का मालिक था निर्मल कुमार. अच्छीखासी दौलत होने के बावजूद उस ने अभी तक शादी नहीं की थी. अपनी पसंद की लड़की उसे अभी तक नहीं मिली थी. वह रोशन खयाल और गहरी सोच रखने वाला इनसान था. उस की उम्र 32 साल की थी. वह लंदन से पढ़ कर लौटा था.  उस ने आज तक वहां काम कर रही किसी लड़की की ओर ध्यान नहीं दिया था.

तकरीबन 4 साल से बड़ी सूझबूझ और लगन से वह कंपनी को चला रहा था. उस की कई दोस्त थीं, पर वह किसी से भी प्रेम नहीं करता था, क्योंकि उस की सब दोस्त लड़कियां खुले विचारों की थीं और कितनों के साथ रह चुकी थीं. निर्मल कुमार खुद भी कभी किसी के साथ नहीं सोया था उसे ऐसी लड़की चाहिए थी, जो कहीं भी मुंह मार ले. निर्मल कुमार ने जब पहली बार राजकुमारी को देखा था, तो उस का दिल भी धड़का था. आखिर वह उस के हुस्न की खुशबू से कैसे बच सकता था? वह लाखों में एक थी. निर्मल कुमार पहले मर्द था, मालिक बाद में. राजकुमारी जब भी किसी काम से निर्मल कुमार के सामने जाती, तो वह दो नजर भर देखे बगैर नहीं रह सकता था. इस से पहले भी उस की मुलाकात कई खूबसूरत पढ़ीलिखी ऊंचे घराने वालियों से होती रही थी. लंदन और मुंबई में भी वह कई हसीन लड़कियों से मिल चुका था, लेकिन उस ने उन में से किसी एक के लिए भी अपने दिल में तड़प महसूस नहीं की थी. उसे लगा कि राजकुमारी उतनी ही साफ थी जितना दिखती थी.

उस ने कभी काम के अलावा कुछ बात करने की कोशिश नहीं की, जबकि उस के स्टार्टअप में हर लड़की हर दूसरेतीसरे हफ्ते कोई पर्सनल प्रौब्लम लिए खड़ी होती थी. राजकुमारी में उस ने जैसे कोई खास बात महसूस की थी. वह दिन में 2-3 बार उसे जरूर बुलाता. राजकुमारी की मौजूदगी उसे तड़पाने लगती थी. जब वह कमरे से चली जाती तो उस की पीड़ा और बढ़ जाती. वह अपनी मेज  पर सिर टेक देता और आंखें बंद हो जातीं. फिर वह सोचता कि यह उसे क्या  होता जा रहा है, वह क्यों दीवानगी के खयाल पालने लगा है? इसी तरह कई हफ्ते बीत गए. राजकुमारी को भी अब महसूस होने लगा था कि निर्मल कुमार उस में दिलचस्पी लेने लगा है. लेकिन वह जल्दी ही दिमाग से यह बात निकाल देती. वह अपने और निर्मल कुमार के बीच के फासले को जानती थी.

वह 12,000 रुपए पाने वाली मामूली नौकर थी और निर्मल कुमार करोड़ों का मालिक था. उस के दिल में निर्मल कुमार को पाने या अपनाने की कोई ख्वाहिश नहीं थी, क्योंकि उस का राजकुमार तो राजेश था, जो उस के दिल का मालिक था. उस का और राजेश का साथ उसी समय से था, जब वह 10वीं में पढ़ती थी. लगभग 10 साल पहले की सी ताजगी थी. फिलहाल दोनों ही अपनीअपनी जिंदगी की परेशानियों में उलझे हुए थे. इसी कारण वे अपने सपनों की दुनिया को आबाद नहीं कर सके थे. राजेश भी बहुत सुंदर और गठीला नौजवान था. वह जहां काम करता था, वहां उस की बड़ी इज्जत थी. फैक्टरी का मालिक भी उस पर बहुत मेहरबान था. राजकुमारी और राजेश रोजाना शाम को किसी छोटे से ढाबे या पार्क में मिलते थे. वे देर तक बातें करते रहते थे. हर रोज एक ही परेशानी उन के सामने होती थी.

वे दोनों बातें कर के दिल की भड़ास निकाल लेते थे और अपने दुखों को जैसे बांट लेते थे.  ऐसा करने से उन को बड़ी शांति मिलती थी. कभीकभार जब मौका मिलता, तो दोनों एकदूसरे के साथ रातभर रहते, पर दोनों ने वादा कर रखा था कि वे पक्का शादी करेंगे. दोनों एक ही जाति के थे और घर वाले मंजूर कर लेंगे. यह भी उन्हें मालूम था. निर्मल कुमार ने एक रोज अपने दफ्तर के साथी लोगों को रात के खाने की दावत दी. नवंबर का महीना था. सर्दी शुरू हो चुकी थी. राजकुमारी पार्टी में आई, तो बादामी रंग की साड़ी पहने हुए थी. उस पर चौकलेटी रंग का शाल देखने वालों को बड़ी भली मालूम हो रही थी.  उस के अंगअंग से जवानी उबल रही थी. जब वह हंसती थी तो देखने वालों का कलेजा मुंह को आ जाता था.

चारों ओर एक आह सी निकलती महसूस होती थी. पार्टी में जितने भी लोग थे, सभी उसी को घूर रहे थे. दावत खत्म होने के बाद निर्मल कुमार जब अपने कमरे में पहुंचा तो खुद को बहुत थकाथका सा महसूस करने लगा. उसे बिस्तर पर पड़ेपड़े बहुत देर हो गई. करवटें बदलतेबदलते रात के 3 बज गए. रहरह कर उसे राजकुमारी का मासूम चेहरा दिखाई देता. आज उसे अपने अंदर अधूरेपन का एहसास हो रहा था. बहुतकुछ होते हुए भी वह अपनेआप को बहुत गरीब समझ रहा था. उस की यह गरीबी एक औरत ही दूर कर सकती थी. और वह मालदार औरत थी राजकुमारी.

उस के दिल में कहीं से एक सदमे की लहर आई, जिस ने उसे अपने लपेटे में ले लिया. उसे ऐसा लगा जैसे वह इस दुनिया में अकेला है. उसे कोई चाहने वाला नहीं, प्यार करने वाला नहीं, उस की जवानी को अपनी बांहों में भरने वाला कोई नहीं है. निर्मल कुमार अपनेआप को एक बड़े कैदखाने में बंद पा रहा था, जिस से बाहर निकलने का एक ही रास्ता था, लेकिन वह भी बंद था. फिर उसे अपनेआप में शोर सुनाई देने लगा. पहली बार यह शोर गूंजा था. कितनी ही देर वह इस शोर को सुनता रहा.

क्या राजकुमारी को वह अपना जीवनसाथी बना सकता है? वह सोच रहा था, ‘वह इनकार तो नहीं कर देगी? वह किसी और से तो प्यार नहीं करती? अगर वह किसी से मुहब्बत करती है तो क्या हुआ, मेरे पास तुरुप के पत्ते हैं. मैं अपना सबकुछ उस हुस्न की मलिका के कदमों में डाल दूंगा.’  सोचतेसोचते वह बिस्तर पर लेट गया. अब वह बहुत खुश था. जैसे उस ने राज को पा लिया हो.  अगले दिन उस ने राजकुमारी का शाम को अपनी गाड़ी में पीछा किया. वह रिकशे में 10 लोगों के साथ जहां उतरी, वह कच्चेपक्के मकानों की बस्ती थी. दूसरे दिन पार्क की बैंच पर बैठते हुए राजेश ने कहा, ‘‘कल कहां थी राज? तुम घर पर भी नहीं थी.’’ ‘‘हां, मैं परसों तुम को बताना भूल गई थी… हमारे मालिक ने दफ्तर के तमाम लोगों को खाने पर बुलाया था,’’ राजकुमारी ने राजेश की ओर देखते  हुए कहा. ‘‘अरे भई, निर्मल सेठ?है, जवान है. उस की पार्टी हो तो हमारी गुंजाइश कहां, हम ठहरे गरीब आदमी…’’ सुन कर राजकुमारी ने फौरन कहा, ‘‘यह बात तो है… निर्मल बहुत अमीर है, लेकिन उस में जरा सा भी घमंड नहीं है.’’

राजेश ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘फिर मैं ऐसा समझूं कि मेरी 3,650 दिनों की तपस्या बेकार गई, कहीं तुम्हारा इरादा…’’ ‘‘नहीं…’’ राजकुमारी बोली, ‘‘सब से पहली बात तो यह है कि कहां निर्मल कुमार और कहां मैं. मेरा उस के बारे में सोचना ही बेकार है.’’ ‘‘तुम कितनी मालदार हो, तुम्हें नहीं मालूम…’’ राजेश बोला, ‘‘बस एक बात है, 100 साल पहले मुझे तुम से प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा…’’ राजकुमारी ने खड़े होते हुए कहा, ‘‘मालूम है बाबा, अब उठो.’’ अगले दिन जब निर्मल कुमार के कमरे में राजकुमारी आई, तो वह अपनी कुरसी से खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आओ राजकुमारी, मैं तुम्हें बुलाने ही वाला था.’’  वह उसे कुरसी की ओर इशारा करते हुए आगे बोला, ‘‘बैठोबैठो.’’ निर्मल कुमार के इस तरह बोलने पर वह जरा हैरान हुई और ‘जी’ कहती हुई बैठ गई. ‘‘कहो, तुम्हें हमारी पार्टी कैसी लगी?’’

निर्मल कुमार की आंखों में एक खास चमक देखते हुए राजकुमारी ने कहा, ‘‘पार्टी बहुत शानदार रही.’’  वह सोच रही थी कि राजेश उस के दिल में बसा हुआ है तो क्या हुआ, खूबसूरत मर्द तो अपने अंदर चुंबक का असर रखते हैं. वह निर्मल कुमार को गौर से देखने लगी. फिर आंखें झुका कर वह बोली, ‘‘जी कहिए, क्या हुक्म है?’’ ‘‘हुक्म नहीं, गुजारिश है… वह यह है कि आज शाम मैं तुम से एक खास बात करना चाहता हूं. तुम कल साढ़े  7 बजे होटल डिलाइट में मुझ से मिलना. अब तुम जा सकती हो. लेकिन ध्यान रहे, मुलाकात का किसी को पता न चले, समझीं?’’ राजकुमारी ‘ठीक है’ कहते हुए कमरे से बाहर चली गई. उस के दिमाग में कितने ही सवाल उठ खड़े हुए. उसे महसूस हो गया था कि निर्मल कुमार उस पर डोरे डाल रहा है.  उस पार्टी की रात की पार्टी में भी वह उस की निगाहों के इशारे को पढ़ चुकी थी. और उसे वह यकीन भी हो गया कि उस का मालिक ऐयाश नहीं है.

वह अपनी जवानी की आग नहीं बुझाना चाहता, वह जीवनसाथी चाहता है. फिर एक और डर भी उसे परेशान कर रहा था कि अमीर मर्द एक गरीब लड़की को अपनी बीवी कैसे बना सकता है?  शाम को वह राजेश से मिली, तो कुछ खिंचीखिंची सी थी. राजेश ने उस का मन रखने को कहा ‘‘चलो, तुम्हारे कमरे में चलते हैं. वहां बैठ कर बात करेंगे.’’ उधर निर्मल कुमार बेचैन था, पर अगले दिन का इंतजार नहीं करना चाहता था. वह उसी बस्ती तक चला गया और राजकुमारी के कमरे के सामने भी चाय की दुकान में बैठ कर राजकुमारी के दर्शन का इंतजार करने लगा. उस ने उन 2-3 घंटों में बहुतकुछ देख लिया, पर उस का राजकुमारी ने प्रति लगाव कम नहीं हुआ था.

जब अगले दिन दोनों शाम को मिले, तो राजकुमारी ने सिर उठाया और उस से कोई बात नहीं छिपाई. लेकिन जानबूझ कर राजेश के बारे में कुछ नहीं बताया. बाकी सबकुछ सचमुच बता दिया कि मातापिता हैं, 2 बहनें हैं, मकान गिरवी रखा है, दोनों बहनों की शादी बड़ी उलझन बनी हुई है, क्योंकि शादी करने के लिए रकम नहीं है, और हजारों रुपए का कर्ज भी चढ़ा हुआ है, जिसे अपनी पगार से बचा कर वह उतारने की कोशिश कर रही है. उस की कहानी सुन कर निर्मल कुमार वैसे तो दिल ही दिल में बहुत खुश हुआ. पर अब उसे राजेश के बारे में पता करना था. इस हुस्न की मलिका को खरीदने के लिए वह ज्यादा जरूरी था. उस ने बड़ी आसानी से राजेश के बारे में पता कर लिया था. फिर भी उसे भरोसा था कि राजकुमारी और राजेश की सिर्फ दोस्ती है और वह उस की अच्छी साथी बन सकती है, चाहे गरीब घर की क्यों न हो.

बहनों की बात को ले कर उस ने राजकुमारी से पूछा, ‘‘सीधी सी बात है कि बहनों की शादी के बाद तुम शादी करोगी. करोगी न…?’’ राजकुमारी ने एक मीठी सी मुसकान के साथ कहा, ‘‘जी हां.’’ ‘‘यह तो तुम देख रही हो कि मैं ने अब तक शादी नहीं की. तुम्हें देखने के बाद शादी करना चाहता हूं. मुझे एक ऐसी ही पत्नी की तलाश थी.’’ ‘‘मुझ से…? मैं तो…’’ राजकुमारी का गला सूख गया. निर्मल कुमार ने मुसकराते हुए आगे कहा, ‘‘जब तुम मेरी बीवी बन जाओगी, तो जोकुछ मेरा है, वह तुम्हारा होगा. एक शानदार जिंदगी तुम्हारे सामने है. तुम्हारे लिए कोई परेशानी बाकी नहीं रहेगी.

मकान छुड़ा लेना, बहनों की शादी पर जितना चाहे खर्च करना, मुझे कोई एतराज नहीं होगा.’’ राजकुमारी ने फौरन हामी नहीं भरी और इनकार भी नहीं किया. निर्मल कुमार ने उसे देखते हुए कहा, ‘‘इस बात का जवाब आराम से देना…’’ ‘‘हांहां, सोच लो, आराम से सोचो और तब मुझे बताओ. वैसे, मेरा यकीन है कि मेरी बात को तुम ठुकराओगी नहीं, मंजूर कर लोगी. अच्छा, चलो तुम्हें छोड़ते चलते हैं.’’ घर आ कर राजकुमारी रातभर सो नहीं सकी. वह बारबार बिस्तर से उठती और पानी पीती… इसी तरह सवेरे के  6 बज गए.  एक तरफ राजेश था, जिस से वह बेहद प्यार करती थी. वह रातोंरात चाहे राजेश के साथ रही हो, पर उस ने कभी भी जिस्मानी संबंध नहीं बनाए थे.

वह निर्मल कुमार से कम उम्र का भी था और सुंदर भी. वह उसे बहुत चाहती थी.  पर राजेश के साथ भी लगभग यही परेशानियां थीं. इन दोनों ने शादी इसीलिए नहीं की थी कि इस से घर वालों पर असर पड़ता था.  दूसरी ओर निर्मल कुमार एक करोड़पति था. उस की सारी उलझनें चुटकी बजाते ही हल हो सकती थीं. दूसरे दिन वह दिनभर इन्हीं खयालों में गुम रही. वह दफ्तर भी नहीं गई.  2-3 रोज बाद जब राजेश से मिली, तो उसे सारी बातें बता दीं.  राजेश उन दिनों काफी बिजी रहने लगा था. वह कहता था कि शादी के लिए पैसा जमा करने के लिए उस ने  2 पार्टटाइम नौकरियां पकड़ी हैं. राजेश ने पूछा, ‘‘फिर, तुम ने क्या फैसला किया?’’ राजकुमारी ने जमीन की ओर नजरें करते हुए कहा, ‘‘मैं सोच रही हूं, अपने परिवार के लिए यह कुरबानी दे ही दूं… तुम्हें कोई एतराज तो नहीं होगा?’’ सुनते ही राजेश का चेहरा पीला पड़ गया. लेकिन जल्दी ही उस ने अपनेआप पर काबू पा लिया.

राजकुमारी किसी मुजरिम की तरह नजरें नीचे किए बैठी थी, इसलिए वह राजेश का चेहरा नहीं देख पाई थी. राजेश ने धीरे से कहा, ‘‘मुझे भला क्या इनकार हो सकता है? इस ‘सच’ को मान लेना चाहिए तुम्हें.’’ राजकुमारी बोली, ‘‘लेकिन, मैं ने फैसला कर लिया है, जो मैं तुम्हें 2-3 रोज में बताऊंगी. प्लीज, उस दौरान मुझ से कुछ पूछना नहीं.’’ ‘‘छोड़ो इन बातों को,’’ राजेश हंसते हुए बोला, ‘‘तुम निर्मल कुमार की बात मान लो. मेरा क्या, मां कहीं से गांव की लड़की पकड़ कर ब्याह कर देगी.’’ दोनों जब उठे तो राजकुमारी एक फैसले पर पहुंच चुकी थी. राजकुमारी निर्मल कुमार की होने को तैयार हो गई थी और दोनों अपनीअपनी मंजिल की ओर चल पड़े. उस रात वह बहुत खुश थी. फिर भी करवटें बदलती रही. दूसरे दिन भी वह दफ्तर नहीं गई. उसे बुखार हो गया. इसी तरह 4 दिन बीत गए. छठे दिन जब वह दफ्तर जा रही थी, तो उस के दिमाग में हलचल मच गई.

उसे आज निर्मल कुमार को अपना फैसला सुनाना था.  निर्मल कुमार को लगा कि वह राजेश के लिए कहीं चली न गई हो. उस के घर पर जा कर देखा, तो राजकुमारी का कमरा खुला दिखा.  एक घंटे तक न कोई आया और न कोई गया तो वह चुपचाप घर चला गया. राजकुमारी किसी भी कीमत पर राजेश को खोना नहीं चाहती थी. उस की मुहब्बत के आगे निर्मल कुमार की दौलत कुछ भी नहीं थी. उस के दिल की धड़कन तेज हो गई और राजेश की मुहब्बत रंग लाने लगी.  उस ने जब दफ्तर में प्रवेश किया, तो पता चला कि निर्मल साहब आ चुके हैं. वह उन के कमरे में गई और थोड़ी मुसकान के बाद बोली, ‘‘सर, आप बहुत महान हैं कि आप ने मुझे अपनाने का फैसला किया था. पर, मैं अपना दिल तो राजेश को दे चुकी हूं. मैं आप से शादी नहीं कर सकती. यह मेरा इस्तीफा है. मैं राजेश से शादी करूंगी.’’ निर्मल कुमार बोला, ‘‘तुम उस राजेश से बात कर रही हो न, जो इंपैक्ट इंडस्ट्री में काम करता है. उस के मालिक ने अपनी सांवली लड़की के लिए राजेश को तैयार कर लिया था. पर, मैं ने उन्हें बता दिया है कि राजेश और तुम कितनी ही रातें एक कमरे में गुजार चुके हो.

उन के पास तुम्हारे घर के वीडियो पहुंच चुके हैं. उन्होंने आज ही राजेश को धक्के दे कर नौकरी से निकल दिया है.  ‘‘राजेश तुम्हें धोखा देता रहा है. तुम जैसी लड़की से मैं भी अब शादी करने से इनकार करता हूं. इंपैक्ट इंडस्ट्री के मालिक ने राजेश को मेरे भेजे वीडियो के आधार पर उस के खिलाफ मुकदमा भी कर दिया है. वह अब जेल में है. जाओ, जेल में मिल आओ.’’ राजकुमारी उस से आगे एक लफ्ज भी नहीं सुन सकी. उस के हाथ से कागज छूट कर गिर पड़े. राजकुमारी की दुनिया उजड़ चुकी थी. न निर्मल साथ रहा, न राजेश. Hindi Story

Hindi Story: मुराद-सास बिना ससुराल, बहू हुई बेहाल

Hindi Story: बचपन में एक लोक गीत ‘यह सास जंगल घास, मुझ को नहीं सुहाती है, जो मेरी लगती अम्मां, सैयां की गलती सासू मुझ को वही सुहाती है…’ सुन कर सोचा शायद सास के जुल्म से तंग आ कर किसी दुखी नारी के दिल से यह आवाज निकली होगी. कालेज में पढ़ने लगी तो किसी सीनियर को कहते हुए सुना, ‘ससुराल से नहीं, सास से डर लगता है.’ यह सब देखसुन कर मुझे तो ‘सास’ नामक प्राणी से ही भय हो गया था. मैं ने घर में ऐलान कर दिया था कि पति चाहे कम कमाने वाला मिले मंजूर है, पर ससुराल में सास नहीं होनी चाहिए. अनुभवी दादी ने मुझे समझाने की कोशिश की कि बेटी सुखी जिंदगी के लिए सास का होना बहुत जरूरी होता है, पर मम्मी ने धीरे से बुदबुदाया कि चल मेरी न सही तेरी मुराद तो पूरी हो जाए.

शायद भगवान ने तरस खा कर मेरी सुन ली. ग्रैजुएशन की पढ़ाई खत्म होते ही मैं सासविहीन ससुराल के लिए खुशीखुशी विदा कर दी गई. विदाई के वक्त सारी सहेलियां मुझे बधाई दे रही थीं. यह कहते हुए कि हाय कितनी लकी है तू जो ससुराल में कोई झमेला ही नहीं, राज करेगी राज.

लेकिन वास्तविक जिंदगी में ऐसी बात नहीं होती है. सास यानी पति की प्यारी और तेजतर्रार मां का होना एक शादीशुदा स्त्री की जिंदगी में बहुत माने रखता है, इस का एहसास सब से पहले मुझे तब हुआ जब मैं ने ससुराल में पहला कदम रखा. न कोई ताना, न कोई गाना, न कोई सवाल और न ही कोई बवाल बस ऐंट्री हो गई मेरी, बिना किसी झटके के. सच पूछो तो कुछ मजा नहीं आया, क्योंकि सास से मिले ‘वैल्कम तानों’ के प्लाट पर ही तो बहुएं भावी जीवन की बिल्डिंग तैयार करती हैं, जिस में सासूमां की शिकायत कर सहानुभूति बटोरना, नयनों से नीर बहा पति को ब्लैकमेल करना, देवरननद को उन की मां के खिलाफ भड़काना, ससुरजी की लाडली बन कर सास को जलाना जैसे कई झरोखे खोल कर ही तो जिंदगी में ताजा हवा के मजे लिए जा सकते हैं.

क्या कहूं और किस से कहूं अपना दुखड़ा. अगले दिन से ही पूरा घर संभालने की जिम्मेदारी अपनेआप मेरे गले पड़ गई. ससुरजी ने चुपचाप चाभियों को गुच्छा थमा दिया मुझे. सखियो, वही चाभियों का गुच्छा, जिसे पाने के लिए टीवी सीरियल्स में बहुओं को न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. कहते हैं न कि मुफ्त में मिली चीज की कोई कद्र नहीं होती. बिलकुल ठीक बात है, मेरे लिए भी उस गुच्छे को कमर में लटका कर इतराने का कोई क्रेज नहीं रहा. आखिर कोई देख कर कुढ़ने वाली भी तो होनी चाहिए.

मन निराशा से भर उठता है कभीकभी तो. गुस्से और झल्लाहट में कभी बेस्वाद खाना बना दिया या किसी को कुछ उलटापुलटा बोल दिया, तो भी कोईर् प्रतिक्रिया या मीनमेख निकालने वाला नहीं है इस घर में. कोई लड़ाईझगड़ा या मनमुटाव नहीं. अब आप सब सोचो किसी भी खेल को खेलने में मजा तो तब आता है जब खेल में द्वंद्वी और प्रतिद्वंद्वी दोनों बराबरी के भागीदार हों. एकतरफा प्रयास किस काम का? अब तो लगने लगा है लाइफ में कोई चुनौती नहीं रही. बस बोरियत ही बोरियत.

एक बार महल्ले की किसी महान नारी को यह कहते सुना था कि टीवी में सासबहू धारावाहिक देखने का अलग ही आकर्षण है. सासबहू के नित्य नए दांवपेच देखना, सीखना और एकदूसरे पर व्यवहार में लाना सचमुच जिंदगी में रोमांच भर देता है. उन की बातों से प्रभावित हो कर मैं ने भी सासबहू वाला धारावाहिक देखना शुरू कर दिया. साजिश का एक से बढ़ कर एक आइडिया देख कर जोश से भर उठी मैं पर हाय री मेरी किस्मत आजमाइश करूं तो किस पर? बहुत गुस्सा आया अपनेआप पर. अपनी दादी की बात याद आने लगी मुझे. उन्होंने मुझे समझाने की कोशिश की थी कि बेटा सास एक ऐसा जीव है, जो बहू के जीवनरूपी स्वाद में चाटमसाले का भूमिका अदा करता है, जिस से पंगे ले कर ही जिंदगी जायकेदार बनाईर् जा सकती है. काश, उस समय दादी की बात मान ली होती तो मजबूरन दिल को यह न गाना पड़ता, ‘न कोई उमंग है, न कोई तरंग है, मेरी जिंदगी है क्या, सासू बिना बेरंग है…’

मायके जाने का भी दिल नहीं करता अब तो. क्या जाऊं, वहां बैठ कर बहनें मम्मी से जहां अपनीअपनी सास का बखान करती रहती हैं, मुझे मजबूरन मूक श्रोता बन कर सब की बातें सुननी पड़ती हैं. बड़ी दीदी बता रही थीं कि कैसे उन की सास ने एक दिन चाय में कम चीनी डालने पर टोका तो दूसरे दिन से किस तरह उन की चाय में डबल चीनी मिला कर उन्होंने उन का शुगर लैवल बढ़ा दिया. लो अब पीते रहो बिना चीनी की चाय जिंदगी भर. मूवी देखने की शौकीन दूसरी बहन ने कहा कि मैं ने तो अपनी सास को सिनेमाघर में मूवी देखने का चसका लगा दिया है. ससुरजी तो जाते नहीं हैं, तो एहसान जताते हुए मुझे ही उन के साथ जाना पड़ता है मूवी देखने. फिर बदले में उस दिन रात को खाना सासू अम्मां ही बनातीं सब के लिए तथा ससुरजी बच्चों का होमवर्क करवाते हैं. यह सब सुन कर मन में एक टीस सी उठती कि काश ऐसा सुनहरा मौका मुझे भी मिला होता.

अब कल की ही बात है. मैं किट्टी पार्टी में गई थी. सारी सहेलियां गपशप में व्यस्त थीं. बात फिल्म, फैशन, स्टाइल से शुरू हो कर अंतत: पति, बच्चों और सास पर आ टिकी. 4 वर्षीय बेटे की मां मीनल ने कहा, ‘‘भई मैं ने तो मम्मीजी (सास) से ऐक्सचेंज कर लिया है बेटों का. अब उन के बेटे को मैं संभालती हूं और मेरे बेटे को मम्मीजी,’’ सुन कर कुढ़ गई मैं.

सुमिता ने मेरी तरफ तिरछी नजर से देखते हुए मुझे सुनाते हुए कहा, ‘‘सुबह पति और ससुरजी के सामने मैं अपनी सास को अदरक और दूध वाली अच्छी चाय बना कर दे देती हूं फिर उन के औफिस जाने के बाद से घर के कई छिटपुट कार्य जैसे सब्जी काटना, आटा गूंधना, चटनी बनाना, बच्चों को संभालने में दिन भर इतना व्यस्त रखती हूं कि उन्हें फुरसत ही नहीं मिलती कि मुझ में कमी निकाल सकें. शाम को फिर सब के साथ गरमगरम चाय और नमकीन पेश कर देती हूं बस.’’

उस के इतना कहते ही एक जोरदार ठहाका लगाया सारी सखियों ने.

बात खास सहेलियों की कि जाए तो पता चला कि सब ने मिल कर व्हाट्सऐप पर एक गु्रप बना रखा है, जिस का नाम है- ‘सासूमां’ जहां सास की खट्टीतीखी बातें और उन्हें परास्त करने के तरीके (मैसेज) एकदूसरे को सैंड किए जाते हैं, जिस से बहुओं के दिल और दिमाग में दिन भर ताजगी बनी रहती है, पर मुझ जैसी नारी को उस गु्रप से भी दूर रखा गया है अछूत की तरह. पूछने पर कहती हैं कि गु्रप का मैंबर बनने के लिए एक अदद सास का होना बहुत जरूरी है. मजबूरन मनमसोस कर रह जाना पड़ा मुझे.

अपनी की गई गलती पर पछता रही हूं मैं, मुझे यह अनुभव हो चुका है कि सास गले की फांस नहीं, बल्कि बहू की सांस होती है. बात समझ में आ गई मुझे कि सासबहू दोनों का चोलीदामन का साथ होता है. दोनों एकदूसरे के बिना अधूरी और अपूर्ण हैं. कभीकभी दिल मचलता है कि काश मेरे पास भी एक तेजतर्रार, दबंग और भड़कीली सी सास होती पर ससुरजी की अवस्था देख कर यह कहने में संकोच हो रहा है कि पापा एक बार फिर घोड़ी पर चढ़ने की हिम्मत क्यों नहीं करते आप?

नई लड़कियों और अविवाहित सखियो, मेरा विचार बदल चुका है. अब दिल की जगह दिमाग से सोचने लगी हूं मैं कि पति चाहे कम कमाने वाला हो पर ससुराल में एक अदद सास जरूर होनी चाहिए. जय सासूमां की. Hindi Story

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