कोई शर्त नहीं: ट्रांसफर की मारी शशि बेचारी

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अपने घर में: सास-बहू की जोड़ी-भाग 3

“अरे नहीं बेटा. जिस के पास तेरे जैसी बेटी और इतनी प्यारी पोतियां हैं उसे क्या चिंता? और फिर मेरी पोती डाक्टर बनेगी. इस से ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है?”

अगले दिन ही कमला देवी ने पोती की पढ़ाई के लिए रुपयों का इंतजाम कर दिया.

वक्त इसी तरह गुजरता रहा. सागर के जीवन में अब कुछ नहीं बचा था. श्वेता कई सालों से औफिस के किसी कलीग के साथ अफेयर चला रही थी. इधर सागर अब और भी ज्यादा शराब में डूबा रहने लगा था. छोटीछोटी बात पर वह मां पर भी बरस जाता.

कमला देवी का दिल कई दफा करता कि सबकुछ छोड़ कर चली जाए. पर बेटे का मोह कहीं न कहीं आड़े आ जाता. जितनी देर श्वेता और सागर घर में रहते, झगड़े होते रहते. कमला देवी का घर में दम घुटता. उन की उम्र भी अब काफी हो चुकी थी. वे करीब 80 साल की थीं. उन से अब ज्यादा दौड़भाग नहीं हो पाती. नीरजा के पास भी वे कईकई दिन बाद जा पातीं.

एक दिन उन्हें अपने पेट में दर्द महसूस हुआ. यह दर्द बारबार होने लगा. एक दिन कमला देवी ने बेटे से इस का जिक्र किया तो बेटे ने उपेक्षा से कहा, “अरे मां, तुम ने कुछ उलटासीधा खा लिया होगा. वैसे भी, इस उम्र में खाना मुश्किल से ही पचता है.”

“पर बेटा, यह दर्द कई दिनों से हो रहा है.”

“कुछ नहीं मां, बस, गैस का दर्द होगा. तू अजवायन फांक ले,” कह कर सागर औफिस के लिए निकल गया.

अगले दिन भी दर्द की वजह से कमला देवी ने खाना नहीं खाया. पर सागर को कोई परवा न थी. दोतीन दिनों बाद जब कमला देवी से रहा नहीं गया तो उन्होंने फोन पर बहू नीरजा को यह बात बताई. नीरजा एकदम से घबरा गई. वह उस समय औफिस में थी, तुरंत बोली, “मम्मी, मैं अभी औफिस से छुट्टी ले कर आती हूं. आप को डाक्टर को दिखा दूंगी.”़

“अरे बेटा, औफिस छोड़ कर क्यों आ रही है? कल दिखा देना.”

“नहीं मम्मी, कल शनिवार है और वे डाक्टर शनिवार को नहीं बैठते. मैं अभी आ रही हूं.”

एक घंटे के अंदर नीरजा आई और उन्हें हौस्पिटल ले कर गई. बेटे और बहू के व्यवहार में अंतर देख कर उन का दिल भर आया. डाक्टर ने ऊपरी जांच के बाद कुछ और टैस्ट कराने को लिख दिए.

नीरजा ने फटाफट सारे टैस्ट कराए और जो बात निकल कर सामने आई वह किसी ने सोचा भी नहीं था. कमला देवी को पेट का कैंसर था.

डाक्टर ने साफसाफ बताया कि कैंसर अभी ज्यादा फैला नहीं है. पर इस उम्र में औपरेशन कराना ठीक नहीं रहेगा. कीमोथेरैपी और रेडिएशन से इलाज किया जा सकता है.

नीरजा ने तुरंत अपने औफिस में 15 दिनों की छुट्टी की अरजी डाल दी और सास की तीमारदारी में जुट गई. मिनी ने भी अपने संपर्कों के द्वारा दादी का बेहतर इलाज कराना शुरू किया. कीमोथेरैपी लंबी चलनी थी, सो, नीरजा ने औफिस जौइन कर लिया. मगर उस ने कभी सास को अकेला नहीं छोड़ा. उस की दोनों बेटियों ने भी पूरा सहयोग दिया.

सागर एक दोबार मां से मिलने आया, पर कुछ मदद की इच्छा भी नहीं जताई. नीरजा सास को कुछ दिनों के लिए अपने घर ले आई और दिल से सेवासुश्रुषा करती रही. अब कमला देवी की तबीयत में काफी सुधार था.

एक दिन उन्होंने नीरजा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, मैं चाहती हूं कि तू उस घर में वापस चले.”

नीरजा ने हैरानी से सास की ओर देखते हुए कहा, “आप यह क्या कह रही हैं मम्मी? आप जानती हो न, अब मैं सागर के साथ कभी नहीं रह सकती. कुछ भी हो जाए, मैं उसे माफ नहीं कर सकती.”

“पर बेटा, मैं ने कब कहा कि तुझे सागर के साथ रहना होगा. मैं तो बस यही चाहती हूं कि तू अपने उस घर में वापस चले.”

“पर वह घर मेरा कहां है मम्मी? वह तो सागर और श्वेता का घर है. मैं उन के साथ… यह संभव नहीं मम्मी.”

“बेटा, वह घर सागर का नहीं. तू भूल रही है. वह घर तेरे ददिया ससुर ने मेरे नाम किया था. उस दोमंजिले, खूबसूरत, बड़े से घर को बहुत प्यार से बनवाया था उन्होंने और अब उस घर को मैं तेरे नाम करना चाहती हूं.”

“नहीं मम्मी, इस की कोई जरूरत नहीं है. सागर को रहने दो उस घर में. मैं अपने किराए के घर में ही खुश हूं.”

“तू खुश है, पर मैं खुश नहीं, बेटा. मुझे अपने घर में रहने की इच्छा हो रही है. पर अपने बेटे के साथ नहीं बल्कि तेरे साथ. मैं तेरे आगे हाथ जोड़ती हूं, मुझे उस घर में ले चल. वहीं मेरी सेवा करना. उसी घर में मेरी पोतियों की बरात आएगी. मेरा यह सपना सच हो जाने दे, बेटा.”

नीरजा की आंखें भीग गईं. वह सास के गले लग कर रोने लगी. सास ने उसे चुप कराया और सागर को फोन लगाया, “बेटा, तू अपना कोई और ठिकाना ढूंढ ले. मेरा घर खाली कर दे.”

“यह तू क्या कह रही है मां? घर खाली कर दूं? पर क्यों?”

“क्योंकि अब उस में मैं, नीरजा और अपनी पोतियों के साथ रहूंगी.”

“अच्छा, तो नीरजा ने कान भरे हैं. भड़काया है तुम्हें.”

“नहीं सागर, नीरजा ने कुछ नहीं कहा. यह तो मेरा कहना है. सालों तुझे उस घर में रखा, अब नीरजा को रखना चाहती हूं. तुझे बुरा क्यों लग रहा है? यह तो होना ही था. इंसान जैसा करता है वैसा ही भरता है न बेटे. तुम दोनों पतिपत्नी तब तक अपने लिए कोई किराए का घर ढूंढ लो. और हां, थोड़ा जल्दी करना. इस रविवार मुझे नीरजा और पोतियों के साथ अपने घर में शिफ्ट होना है बेटे. ”

अपना फैसला सुना कर कमला देवी ने फोन काट दिया और नीरजा की तरफ देख कर मुसकरा पड़ीं.

कोई शर्त नहीं: ट्रांसफर की मारी शशि बेचारी- भाग 3

‘‘साहब, मुझे बचा लो… यह राक्षस मुझे मार डालेगा,’’ कहतेकहते राधा फिर बेहोश हो गई.

कुलदीप ने औफिस से छुट्टी ले ली और सारा दिन राधा के सिरहाने बैठे रहे. 2 बार जा कर जोरावर सिंह को भी देख आए, मगर वह अभी तक नहीं लौटा था.

3-4 घंटे बाद राधा को पूरी तरह से होश आ गया तो उस ने बताया कि जोरावर सिंह अकसर शराब पी कर उस से मारपीट करता है.

शादी के इतने साल बाद भी बच्चा न होने की वजह भी वह राधा को ही मानता है, मगर सच यह है कि जोरावर सिंह ही नामर्द है.

पहली पत्नी के भी उसे कोई बच्चा नहीं था, मगर जोरावर सिंह को खुद में कोई कमी नजर नहीं आती. वह अपनेआप को मर्द मानता है और इस तरह अपनी मर्दानगी दिखाता है.

कुलदीप ने राधा को पेनकिलर की गोली दे दी, तो थोड़ी देर बाद ही वह कुलदीप से ऐसे चिपक कर सो गई जैसे कोई बच्चा अपनी मां के आंचल में निश्चिंत हो कर सिमट जाता है. कुलदीप ने भी उसे अपने से अलग नहीं किया.

2 दिन बाद जोरावर सिंह आया तो कुलदीप ने उसे बहुत लताड़ लगाई और समझाया भी कि अगर राधा ने पुलिस में शिकायत कर दी तो उस की नौकरी जा सकती है और उसे जेल भी जाना पड़ सकता है.

इस का असर यह हुआ कि अब जोरावर सिंह ने राधा पर हाथ उठाना काफी कम कर दिया था, मगर फिर भी कभीकभार उस के अंदर का मर्द जाग उठता था और तब डरी हुई राधा कुलदीप से लिपट जाती थी…

कुलदीप की छुअन जैसे उस के सारे दर्द की दवा बन चुकी थी. एक अनाम सा रिश्ता बन गया था इन दोनों के बीच जिस में कोई शर्त नहीं थी… कोई वादा नहीं था… किसी तरह के हक की मांग नहीं थी…

देखते ही देखते 2 साल बीत गए. कुलदीप को अपने ट्रांसफर की चिंता सताने लगी. पहली बार उन्होंने चाहा कि उन का ट्रांसफर न हो. वे राधा से दूर नहीं जाना चाहते थे. हालांकि दोनों के बीच कोई जिस्मानी रिश्ता नहीं था, मगर एकदूसरे को देख कर उन की मानसिक भूख शांत होती थी.

जब कुलदीप ने राधा को अपने ट्रांसफर की बात बताई तो राधा एकदम से कुछ नहीं बोल पाई, चुप रही.

2 दिन बाद राधा ने कुलदीप से कहा, ‘‘साहब, आप का जाना तो रुक नहीं सकता… आप मुझे अपनी कोई निशानी दे कर जाओ.’’

‘‘क्या चाहिए तुम्हें?’’ कुलदीप ने उस के दोनों हाथ अपने हाथों में कसते हुए पूछा.

‘‘दे सकोगे?’’

‘‘तुम मांग कर तो देखो…’’

‘‘मर्द की जबान है तो तुम पलटना मत…’’

‘‘कभी नहीं…’’ कह कर कुलदीप ने उस से वादा किया कि वह जो मांगेगी, उसे मिलेगा.

आखिर जिस बात का डर था, वही हुआ… कुलदीप के ट्रांसफर और्डर आ गए. उन्हें 4 दिन बाद यहां से जाना था.

उन्होंने राधा से कहा, ‘‘तुम ने कुछ मांगा नहीं…’’

‘‘मुझे आप से बच्चा चाहिए, ‘‘राधा ने उन की आंखों में देखते हुए कहा.

यह सुन कर कुलदीप चौंक गए और बोले, ‘‘तुम होश में तो हो न…?’’

कुलदीप को मानो बिजली के नंगे तार ने छू लिया.

राधा उन के आगे कुछ नहीं बोली. चुपचाप वह पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदती रही.

आज शाम से ही तेज बारिश हो रही थी. जोरावर सिंह अपनी पीने की तलब मिटाने के लिए आबू गया हुआ था. कल दोपहर तक शशि भी आने वाली

थी. राधा रात का खाना बना कर जा चुकी थी.

कुलदीप खाना खा कर बैडरूम में जा ही रहे थे कि जोरजोर से दरवाजा पीटने की आवाज आई. उन्होंने बाहर की लाइट जला कर देखा तो राधा खड़ी थी.

कुलदीप का दिल जोरजोर से धड़कने लगा. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या हुआ, इतनी रात को क्यों आई हो?’’

‘‘आप की निशानी लेने आई हूं.’’

कुलदीप दरवाजा नहीं खोल सके. सामाजिक मान्यताओं ने उन के पैर में बेडि़यां डाल दीं. बाहर राधा खड़ी रही… भीगती रही… भीतर कुलदीप के दिल और दिमाग में जंग छिड़ी थी…

आखिर इस जंग में दिल की जीत हुई. कुलदीप राधा को बांहों में भर कर भीतर ले आए. राधा ने उन्हें अपना सबकुछ सौंप दिया… और कुलदीप के प्यार को सहेज लिया अपने भीतर… हमेशा के लिए… मानो कोई मोती फिर से सीप में कैद हुआ हो…

राधा को पहली बार प्यार के इस रूप का अहसास हुआ था. पहली बार उस ने जाना कि मर्दऔरत का रिश्ता इतना कोमल, इतना मखमली होता है… और कुलदीप ने भी शायद पहली बार ही सही माने में मर्दऔरत के रिश्ते को जीया था… इस से पहले तो सिर्फ शरीर की प्यास ही बुझती रही थी… मन तो आज ही तृप्त हुआ था.

कुलदीप बारबार सर्वेंट क्वार्टर की तरफ देख रहे थे, मगर राधा कहीं नजर नहीं आ रही थी.

पत्नी शशि जयपुर से आ गई थी और आज का खाना भी उस ने ही बनाया था.

शाम होतेहोते एक नजर राधा को देखने की लालसा मन में ही लिए कुलदीप चले गए अपनी नई पोस्टिंग पर… मगर वह नहीं आई… उस के बाद राधा से उन का कोई संपर्क नहीं रहा.

10 साल बाद वक्त का पहिया घूम कर फिर से कुलदीप को सिरोही ले आया.

इस बार उन की पोस्टिंग आबू में हुई थी. दोनों बच्चे अपनीअपनी लाइफ में सैट हो चुके थे, इसलिए शशि उन के साथ ही आ गई थी.

एक दिन औफिस में किसी ने बताया कि पिंडवाड़ा वाले जोरावर सिंह की जहरीली शराब पीने से मौत हो गई है.

औफिस का पुराना कर्मचारी होने के नाते सामान्य शिष्टाचार निभाने के लिए कुलदीप ने भी अफसोस जताने के लिए उस के घर जाना निश्चित किया.

यादों के शीशे पर जमी वक्त की गर्द थोड़ी साफ हुई… उन के दिमाग में राधा का चेहरा घूम गया… 10 साल एक लंबा अरसा होता है… कैसी दिखती होगी अब वह…

पुराना बंगला कुलदीप को बहुत कुछ याद दिला गया. अभी वे सर्वेंट क्वार्टर की तरफ जा ही रहे थे कि 8-9 साल का एक बच्चा दौड़ता हुआ उन के सामने से गुजरा. हुबहू अपना अक्स देख कर कुलदीप चौंक गए…

तभी राधा वहां आई. उस ने फीकी हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘यह आप की निशानी है साहब.’’

कुलदीप यह सुन कर जड़ हो गए… मगर राधा अब भी मुसकरा रही थी… उस की मुसकराहट कुलदीप को आश्वस्त कर रही थी… नहीं, कभी कोई शर्त नहीं थी इस रिश्ते में… आज भी नहीं…

बेटे की चाह : भाग 3

2-2 बेटियां गायब हो चुकी थीं, पर ऐसा लगता कि उन के गायब होने का दुख मंगलू को नहीं था, खाना खाता और खर्राटे मार कर सोता.

मंगलू की पत्नी को यह बात खटकती थी कि ऐसा भी क्या हो गया कि यह आदमी 2 जवान बेटियों के गायब हो जाने पर भी पुलिस में रिपोर्ट न करे और न ही उन्हें ढूंढ़ने की कोई कोशिश करे.

एक दिन की बात है. मंगलू ने अपनी पत्नी से कहा, ‘‘आज मेरा खाना मुन्नी से खेत पर ही भिजवा देना. काम बहुत है. मैं सीधा शाम को ही घर आ पाऊंगा.’’

दोपहर हुई तो मंगलू की पत्नी ने खाना बांध कर मुन्नी को खेत की तरफ भेज दिया, पर आज मां ने मुन्नी को अपनी आंखों से ओझल नहीं होने दिया और हाथ में एक हंसिया ले कर वह मुन्नी का पीछा करने लगी.

मुन्नी सीधा खेत जा पहुंची. मंगलू ने उस से खाना ले कर खाया और पानी पिया, उस के बाद मुन्नी की पीठ पर हाथ फेरते हुए उसे अपने साथ ले कर चल दिया.

‘यह मुन्नी को कहां ले कर जा रहा है? यह तो हमारे घर का रास्ता नहीं है, बल्कि यह तो गांव के बाहर जाने का रास्ता है,’ सोचते हुए रमिया की मां भी दबे पैर मंगलू के पीछेपीछे चलने लगी.

मंगलू चलते हुए अचानक रुक गया और एक छोटी सी झोंपड़ी में मुन्नी को ले कर घुस गया.

रमिया की मां भाग कर उस झोंपड़ी के पास पहुंची और दरवाजे की झिर्री में अपनी आंख गड़ा दी.

अंदर का मंजर देख कर उस का कलेजा मुंह को आ गया. झोंपड़ी के अंदर एक दाढ़ी वाला बाबा बैठा हुआ था, जो शायद तांत्रिक था. उस के एक तरफ किसी देवी की मूर्ति बनी हुई थी, जिस के आसपास खून बिखरा हुआ था. ऐसा लग रहा था कि किसी जानवर की बलि दी गई है.

इतने में उस तांत्रिक की आवाज गूंजी, ‘‘हां तो मंगलू, यह तुम्हारी बेटी है.’’

‘‘हां, महाराज.’’

‘‘घबराओ नहीं, अब वह दिन दूर नहीं, जब तुम्हारी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी,’’ तांत्रिक ने यह कह कर मुन्नी के माथे पर एक तिलक लगा दिया.

रमिया की मां अनपढ़ जरूर थी, पर अंदर का सीन देख कर वह इतना जरूर समझ गई थी कि दाल में जरूर कुछ काला है और जल्दी ही कुछ न किया तो कुछ गलत भी हो सकता है. ऐसा सोच कर वह फिर से गांव की तरफ मदद लेने भागी.

सब से पहले फौजी शमशेर सिंह की कोठी पड़ती थी और फौजी अपनी कोठी के बाहर अपनी जीप की सफाई करवा रहा था.

रमिया की मां ने फौजी को देख मदद की गुहार लगाई और एक ही सांस में सारी कहानी कह सुनाई.

फौजी दिल का अच्छा था. वह तुरंत ही उस तांत्रिक की झोंपड़ी की तरफ भाग चला और तांत्रिक की झोंपड़ी का दरवाजा खोला तो वहां पर तांत्रिक ने मुन्नी के मुंह और आंखों पर पट्टी बांधी हुई थी. मंगलू भी वहां मौजूद था.

फौजी और अपनी पत्नी को देख मंगलू भी चौंक पड़ा.

‘‘क्या हो रहा है यहां पर और इस मुन्नी के मुंह और आंखों पर पट्टी क्यों बांध रखी है?’’ फौजी ने कड़क आवाज में पूछा.

तांत्रिक घबरा गया था और मंगलू भी. फौजी ने जब उन्हें घबराया देखा तो उसे समझते देर न लगी कि हो न हो, यह तांत्रिक सही आदमी नहीं है, इसलिए फौजी ने तांत्रिक को पुलिस के हवाले करने की बात कही तो तांत्रिक मौका देख कर भाग निकला, जिसे फौजी ने दौड़ कर पकड़ लिया.

सख्ती से पूछताछ करने पर तांत्रिक ने बताया कि मंगलू ही उस के पास आया था और उसे तंत्रमंत्र से एक लड़के का बाप बना देने की बात कही थी, जिस पर तांत्रिक ने मंगलू को बताया कि उस पर देवी का कोप चल रहा है, इसलिए अगर वह अपनी लड़कियों की बलि देवी को चढ़ा दे, तो देवी खुश हो कर उसे एक लड़के की प्राप्ति का आशीर्वाद देगी और इसीलिए मंगलू बारीबारी से अपनी दोनों लड़कियों को मेरे पास लाया था.

तड़ाक… फौजी का एक जोरदार तमाचा तांत्रिक के चेहरे पर पड़ा. वह धूल चाटने लगा और फौजी को गुस्से में देख घबरा उठा था.

‘‘क्या तुम ने दोनों लड़कियों को मार दिया…?’’ फौजी गुर्राया.

‘‘नहींनहीं, मैं ने उन्हें मारा नहीं, क्योंकि बलि देने के हिसाब से वे लड़कियां बढ़ी थीं, इसलिए मैं ने उन्हें शहर में बेच दिया,’’ तांत्रिक बोला.

‘‘क्या… तुम ने मुझे भी धोखा दिया. मुझ से कहते रहे कि मेरे बलि देने से देवी खुश हो रही है और अब तुम को लड़का होगा और तुम ने मेरी लड़कियों का सौदा किया,’’ इतना कह कर मंगलू तांत्रिक को मारने उठा और तांत्रिक की दाढ़ी पकड़ ली.

पर यह क्या… दाढ़ी तो मंगलू के हाथ में ही रह गई यानी वह तांत्रिक तो नकली ही था, जो तंत्रमंत्र और गांव वालों की धार्मिक कमजोरी का नाजायज फायदा उठा कर लड़कियों को देह धंधे में धकेलने के लिए शहर में बेच देता था.

फौजी ने अब तक पुलिस बुला ली थी और पुलिस ने उस नकली तांत्रिक को गिरफ्तार कर लिया.

कुछ ही देर में रसीली भी और गांव वालों को ले कर वहां आ गई थी.

रसीली ने मंगलू की तरफ नफरत से देखा और बोली, ‘‘मैं तो अकेली थी, इसलिए किसी दूसरे मर्द के शरीर का सहारा लिया, पर तुम्हारे पास तो सब था… एक बीवी, 3 बेटियां, पर फिर भी तुम रूढि़वादी लोगों के चक्कर में फंस कर एक बेटे की चाह में कितना गिर गए…’’

सिबली ने सारा माजरा समझते हुए कहा, ‘‘अरे फौजी साहब तो बहुत अच्छे आदमी निकले और हम सब तो उन को ही गलत समझ रहे थे.’’

उस की यह बात सुन कर फौजी  चौंक गया, पर बिना मुसकराए नहीं रह सका.

अब रमिया की मां सरोज की बारी थी. वह भी धीमी आवाज में बोली, ‘‘लड़के की चाह हम को भी थी, पर जब हमारी कोख से लड़कियों ने जन्म लिया, तब हम ने इन्हें ही अपना सबकुछ मान लिया, पर तुम ने तो हद ही कर दी. अरे, भला कोई अपनी लड़कियों को लड़के के लिए दांव पर लगाता है क्या?

‘‘अब तो समय बदल गया है रमिया के पापा, फिर भी तुम ने ऐसा किया. मेरी रमिया और श्यामा कहां और किस हाल में होंगी…’’

‘‘आप घबराइए नहीं, आप की बेटियां जहां भी होंगी, हम सब मिल कर उन्हें ढूंढ़ निकालेंगे,’’ फौजी शमशेर सिंह बोला.

सब की निगाहें मंगलू की तरफ थीं, जो एक बेटे की चाह में अपनी 2 बेटियों को गंवा बैठा था और अब अपने किए पर पछता रहा था, पर अब शायद बहुत देर हो चुकी थी.

लाली : क्या रोशन की हुई लाली ? – भाग 3

अब रोशन को लाली से मिलने के लिए पंडितजी की इजाजत लेनी पड़ती और पंडितजी को बिलकुल भी पसंद नहीं था कि कोई फुटपाथ का आदमी रोज उन के घर आए पर लाली की इच्छा का खयाल रखते हुए वह कुछ देर के लिए इजाजत दे देते. धीरेधीरे लाली की लोकप्रियता बढ़ने लगी और घटने लगा रोशन को दिया जाने वाला समय. रोशन इस अचानक आए बदलाव को समझ नहीं पा रहा था. वह लालिमा शास्त्री के सामने खुद को छोटा पाने लगा था.

एक दिन उस ने एक निर्णय लिया और लाली से मिलने उस के घर चला गया.

‘लाली, मेरा यहां मन नहीं लग रहा. चलो, वापस गांव चलते हैं,’ रोशन ने लाली की ओर देखते हुए कहा.

‘क्यों, क्या हुआ? मन क्यों नहीं लग रहा तेरा,’ लाली ने सोचते हुए कहा, ‘लगता है, मैं तुझ से मिल नहीं पा रही हूं, इसी कारण मन नहीं लग रहा तेरा.’

‘नहीं…सच तो यह है कि पंडितजी यही चाहते हैं कि मैं तुझ से न मिलूं और मुझे लगता है कि शायद तू भी यही चाहती है. तुझे लगता है कि मैं तेरे संगीत की शिक्षा में रुकावट हूं,’ रोशन ने गुस्से में कहा.

‘अरे, नहीं, यह बात नहीं है. रियाज और बाकी काम होने के कारण मैं तुम से मिल नहीं पाती,’ लाली ने समझाने की कोशिश की.

लेकिन रोशन समझने को तैयार कहां था, ‘सचाई यह नहीं है लाली. सच तो यह है कि पंडितजी की तरह तू भी नहीं चाहती कि गंदी बस्ती का कोई आदमी आ कर तुझ से मिले. तू बदल गई है लाली, तू अब लालिमा शास्त्री जो बन गई है,’ रोशन ने कटाक्ष किया.

‘सच तो यह है रोशन कि तू मेरी सफलता से जलने लगा है. तू पहले भी मुझ से जलता था जब मैं ट्रेन में तुझ से ज्यादा पैसे लाती थी. सच तो यह है, तू नहीं चाहता कि मैं तुझ से आगे रहूं. मैं नहीं जा रही गांव, तुझे जाना है तो जा,’ लाली के होंठों से लड़खड़ाती आवाज निकली.

रोशन आगे कुछ नहीं बोल पाया. बस, उस की आंखें भर आईं. जिस की सफलता के लिए उस ने अपने शरीर को जला दिया आज उसी ने अपनी सफलता से जलने का आरोप उस पर लगाया था. ‘खुश रहना, मैं जा रहा हूं,’ यह कह कर रोशन कमरे से बाहर निकल आया.

रोशन गांव तो चला गया पर गांव में पुलिस 1 साल से उस की तलाश कर रही थी. आश्रम वालों ने उस के खिलाफ नाबालिग लड़की को भगाने की रिपोर्ट लिखा दी थी. गांव पहुंचते ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया और कोर्ट ने उसे 1 साल की सजा सुनाई.

इधर 1 साल में लालिमा शास्त्री ने लोकप्रियता की नई ऊंचाइयों को छुआ. उस के चाहने वालों की संख्या रोज बढ़ती जा रही थी और साथ ही बढ़ रहा था अकेलापन. रोशन के लौट आने की कामना वह रोज करती थी.

जेल से छूटने के बाद रोशन खुद को लाली से और भी दूर पाने लगा. उस की हालत उस बच्चे की तरह थी जो ऊंचाई में रखे खिलौने को देख तो सकता है मगर उस तक पहुंच नहीं सकता.

उस ने बारूद के कारखाने में फिर से काम करना शुरू कर दिया. वह सारा दिन काम करता और शाम को चौराहे पर पीपल के पेड़ के नीचे निर्जीव सा बैठा रहता. जब भी अखबार में लाली के बारे में छपता वह हर आनेजाने वाले को पढ़ कर सुनाता और फिर अपने और लाली के किस्से सुनाना शुरू कर देता. सभी उसे पागल समझने लगे थे.

रोशन ने कई बार मुंबई जाने के बारे में सोचा लेकिन बस, एक जिद ने उसे रोक रखा था कि जब लाली को उस की जरूरत नहीं है तो उसे भी नहीं है. कारखाने में काम करने के कारण उस की तबीयत और भी खराब होने लगी थी. खांसतेखांसते मुंह से खून आ जाता. उस ने अपनी इस जर्जर काया के साथ 4 साल और गुजार दिए थे.

एक दिन वह चौराहे पर बैठा था, कुछ नौजवान उस के पास आए, एक ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘अब तेरा क्या होगा पगले, लालिमा शास्त्री की तो शादी हो रही है. हमें यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर तेरे रहते वह किसी और से शादी कैसे कर सकती है,’ यह कह कर उस ने अखबार उस की ओर बढ़ा दिया और सभी हंसने लगे.

अखबार देखते ही उस के होश उड़ गए. उस में लाली की शादी की खबर छपी थी. 2 दिन बाद ही उस की शादी थी. अंत में उस ने फैसला किया कि वह मुंबई जाएगा.

वह फिर मुंबई आ गया. वहां 12 साल में कुछ भी तो नहीं बदला था सिवा कुछ बहुमंजिली इमारतों के. आज ही लाली की शादी थी. वह सीधे पंडितजी के बंगले में गया. पूरे बंगले को दुलहन की तरह सजाया गया था. सभी को अंदर जाने की इजाजत नहीं थी. सामने जा कर देखा तो पंडितजी को प्रवेशद्वार पर अतिथियों का स्वागत करते पाया.

‘पंडितजी,’ आवाज सुन कर पंडितजी आवाज की दिशा में मुड़े तो पागल की वेशभूषा में एक व्यक्ति को खड़ा पाया.

‘पंडितजी, पहचाना मुझे, मैं रोशन… लाली का दोस्त.’

पंडितजी उसे अवाक् देखते रहे, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था वह क्या करें. पिछले 5-6 साल के अथक प्रयास के बाद वह लाली को शादी के लिए मना पाए थे. लाली ने रोशन के लौटने की उम्मीद में इतने साल गुजारे थे लेकिन जब पंडितजी को शादी के लिए न कहना मुश्किल होने लगा तो अंत में उस ने हां कर दी थी.

‘पंडितजी, मैं लाली से मिलना चाहता हूं,’ इस आवाज ने पंडितजी को झकझोरा. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें, अगर रोशन से मिल कर लालिमा ने शादी से मना कर दिया तो? और पिता होने के नाते वह अपनी बेटी का हाथ किसी पागल जैसे दिखने वाले आदमी को कैसे दे सकते हैं. इसी कशमकश में उन्होंने कहा.

‘लालिमा तुम से मिलना नहीं चाहती, तुम्हारे ही कारण वह पिछले 5-6 साल से दुख में रही है, अब और दुख मत दो उसे, चले जाओ.’

‘बस, एक बार पंडितजी, बस एक बार…मैं फिर चला जाऊंगा,’ रोशन ने गिड़गिड़ाते हुए पंडितजी के पैर पकड़ लिए.

पंडितजी ने हृदय को कठोर करते हुए कहा, ‘नहीं, रोशन. तुम जाते हो या दरबान को बुलाऊं,’ यह सुन कर रोशन बोझिल मन से उठा और थोड़ी दूर जा कर बंगले की चारदीवारी के सहारे बैठ गया. पंडितजी उसे वहां से हटने के लिए नहीं कह पाए. वह रोशन की हालत को समझ रहे थे लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी.

रोशन की जब आंख खुली तो उस ने लाली को दुलहन के लिबास में सामने पाया. उसे लगा जैसे वह सपना देख रहा हो. आसपास देखा तो खुद को अस्पताल के बिस्तर में पाया. उस ने पिछली रात की बात को याद करने की कोशिश की तो उसे याद आया उस की छाती में काफी तेज दर्द था, 1-2 बार खून की उलटी भी हुई थी…उस के बाद उसे कुछ भी याद नहीं था. शायद उस के बाद उस ने होश खो दिया था. पंडितजी को जब पता चला तो उन्होंने उसे अस्पताल में भरती करा दिया था.

लाली ने रोशन के शरीर में हलचल महसूस की तो खुश हो कर रोशन के चेहरे को छू कर कहा, ‘‘रोशन…’’ और फिर वह रोने लगी.

‘‘अरे, पगली रोती क्यों है, मैं बिलकुल ठीक हूं. अभी देख मेरा पूरा चेहरा लाल है,’’ खून से सने अपने चेहरे को सामने दीवार पर लगे आईने में देखते हुए उस ने कहा, ‘‘अच्छा है, तू देख नहीं सकती नहीं तो आज मेरे लाल रंग को देख कर तू मुझ से ही शादी करती.’’

यह सुन कर लाली और जोर से रोने लगी.

‘‘मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं तुझे दुलहन के रूप में देखूं, आज मेरी यह इच्छा भी पूरी हो गई,’’ अब रोशन की आंखों में भी आंसू थे.

‘‘रोशन, तू ने बहुत देर कर दी…’’ बस, इतना ही बोल पाई लाली.

इस के बाद रोशन भी कुछ नहीं बोल पाया. बस, आंसू भरी निगाहों से दुलहन के लिबास में बैठी, रोती लाली को देखता रहा.

आंखों में सफेद पट्टी बांधे लाली अस्पताल के एक अंधेरे कक्ष में बैठी थी. रोशन को गुजरे 12 दिन हो गए थे. जातेजाते रोशन लाली को अपनी आंखें दान में दे गया था. आज लाली की आंखों की पट्टी खुलने वाली थी, लेकिन वह खुश नहीं थी, क्योंकि उस के जीवन में रोशनी भरने वाला रोशन अब नहीं था. डाक्टर साहब ने धीरेधीरे पट्टी खोलना शुरू कर दिया था.

‘‘अब आप धीरेधीरे आंखें खोलें,’’ डाक्टर ने कहा.

लाली ने जब आंखें खोलीं तो सामने पंडितजी को देखा. पंडितजी काफी खुश थे. वह लाली को खिड़की के पास ले गए और बोले, ‘‘लालिमा, यह देखो इंद्रधनुष, प्रकृति की सब से सुंदर रचना.’’

लाली को इंद्रधनुष शब्द सुनते ही रोशन की इंद्रधनुष के बारे में कही बातें याद आ गईं. उस ने ऊपर आसमान की तरफ देखा तो रंगबिरंगी आकृति आसमान में लटकी देखी, और सब से सुंदर रंग ‘लाल’ को पहचानते देर नहीं लगी उसे. आखिर वह इंद्रधनुष रोशन की आंखों से ही तो देख रही थी.

उस की आंखों से 2 बूंद आंसू की निकल पड़ीं.

‘‘पिताजी, उस ने बहुत देर कर दी आने में,’’ यह कह कर लालिमा ने पंडितजी के कंधे पर सिर रख दिया और आंखों का बांध टूट गया.

काले घोड़े की नाल: आखिर क्या था काले घोड़े की नाल का रहस्य ?- भाग 3

रानी ने महसूस किया कि मुखियाजी के हाथों में कितनी वासना और लिजलिजाहट महसूस होती है… बहुत अंतर था इन दोनों के स्पर्श में.

उस दिन रानी वापस तो आई, पर उस का मन जैसे कहीं छूट सा गया था. बारबार उस के मन में आ रहा था कि वह जा कर चंद्रिका से खूब बातें करे, उस के साथ में जीने का एहसास पहली बार हुआ था उसे.

इस बीच रानी कभीकभी अकेले ही अस्तबल चली जाती. एक दिन उस ने चंद्रिका का एक अलग ही रूप देखा.

“बस, कुछ दिन और बादल… मुझे बस इस माघ मेले में होने वाली दौड़ का इंतजार है, जिस में मुखिया से मेरा हिसाब बराबर हो जाएगा… मुझे इस मुखिया ने बहुत सताया है.”

”ये चंद्रिका आज कैसी बातें कर रहा है? कैसा हिसाब…? और मुखियाजी ने क्या सताया है तुम्हें?” एकसाथ कई सवाल सुन कर घबरा गया था चंद्रिका.

“जाने दीजिए… हमें कुछ नहीं कहना है.”

“नहीं, तुम्हें बताना पड़ेगा… तुम्हें हमारी कसम,” चंद्रिका का हाथ पकड़ कर रानी ने अपने सिर पर रखते हुए कहा था. न चाहते हुए भी चंद्रिका को बताना पड़ा कि वह अनाथ था. मुखियाजी ने उसे रहने की जगह और खाने के लिए भोजन दिया. उन्होंने ही चंद्रिका की शादी भी कराई और फिर चंद्रिका को बहाने से शहर भेज दिया और उस के पीछे उस की बीवी की इज्जत लूटने की कोशिश की, पर उस की बीवी स्वाभिमानी थी. उस ने फांसी लगा ली… बस, तब से मैं हर 8 साल बाद होने वाले माघ मेले का इंतजार कर रहा हूं, जब मैं बग्घी दौड़ में इसे बग्घी से गिरा कर मार दूंगा और इस तरह से अपनी पत्नी की मौत का बदला लूंगा.

रानी को समझते देर न लगी कि ऊपर से चुप रहने वाला चंद्रिका अंदर से कितना भरा हुआ है. वह कुछ न बोल सकी और लौट आई. रानी के मन में चंद्रिका की मरी हुई पत्नी के लिए श्रद्धा उमड़ रही थी. अपनी इज्जत बचाने के लिए उस ने अपना जीवन ही खत्म कर दिया.

इस के जिम्मेदार तो सिर्फ मुखियाजी हैं… तब तो उन्हें सजा जरूर मिलनी चाहिए… पर कैसी सजा…? किस तरह की सजा…? मुखियाजी को कुछ ऐसी चोट दी जाए, जिस का दंश उन्हें जीवनभर झेलना पड़े… और वे चाह कर भी कुछ न कर सकें… आखिरकार रानी को उस के पति से अलग करने का जुर्म भी तो मुखियाजी ने ही किया है.

एक निश्चय कर लिया था रानी ने. अगली सुबह रानी सीधा अस्तबल पहुंची और चंद्रिका से कुछ बातें कीं, जिन्हें सुन कर असमंजस में दिखाई दिया था चंद्रिका.

वापस आते हुए रानी चंद्रिका से काले घोड़े की नाल भी ले आई थी… ये कहते हुए कि देखते हैं कि तुम्हारे इस अंधविश्वास में कितनी सचाई है और वो काले घोड़े की नाल उस ने मुखियाजी के कमरे के बाहर टांग दी थी.

रात में रानी ने घर का सारा कीमती सामान और नकदी एक बैग में भरी और अस्तबल पहुंच गई. रानी और चंद्रिका दोनों बादल की पीठ पर बैठ कर शहर की ओर जाने वाले थे, तभी चंद्रिका ने पूछा, “पर, इस तरह तुम को भगा ले जाने से मेरे प्रतिशोध का क्या संबंध…?”

“मैं ने अपने पति को एक पत्र लिखा है, जिस में उसे अपनी पत्नी का ध्यान न रख पाने का जिम्मेदार ठहराया है… वह तिलमिलाया हुआ आएगा और मुखियाजी से सवाल करेगा… दोनों भाइयों में कलह तो होगी ही, साथ ही साथ पूरे गांव में मुखियाजी की बहू के उन के घोड़ों के नौकर के साथ भाग जाने से उन की आसपास के सात गांव में जो नाक कटेगी, उस का घाव जीवनभर रिसता रहेगा… ये होगा हमारा असली प्रतिशोध,” रानी की आंखें चमक रही थीं.

रानी ने उसे ये भी बताया कि माना कि मुखियाजी को चंद्रिका मार सकता है, पर भला उस से क्या होगा? एक झटके में वह मुक्त हो जाएगा और फिर चंद्रिका पर हत्या का इलजाम भी लग सकता है और फिर मुखिया भले ही बहुत बुरा आदमी है, पर मुखियाइन का भला क्या दोष? उस के जीवित रहने से उस का जीवन जुडा हुआ है और फिर उसे मार कर बेकार पुलिस के पचड़े में पड़ने से अच्छा है कि उसे ऐसी चोट दी जाए, जो उसे जीवनभर सालती रहे.

“और हां… अब तो मानते हो न कि तुम्हारी वो बुरे वक्त से बचाने वाली काले घोड़े की नाल वाली बात एक कोरा अंधविश्वास के अलावा कुछ भी नहीं है… क्योंकि मुखियाजी का बुरा वक्त तो अब शुरू हुआ है, जिसे कोई नालवाल बचा नहीं सकती,” रानी की बात सुन कर एक मुसकराहट चंद्रिका के चेहरे पर फैल गई. उस ने बड़ी जोर से ‘हां‘ में सिर को हिलाया और बादल को शहर की ओर दौड़ा दिया.

अपने घर में : सासबहू की बेमिसाल जोड़ी-भाग 2

नीरजा ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली थी. सैटरडे, संडे उस की छुट्टी होती थी. उस दिन कमला देवी जरूर आतीं. उस के और अपनी पोतियों के साथ समय बितातीं. उन की हर समस्या का हल निकालतीं और फिर शाम तक अपने घर लौट जातीं.

इधर, दूसरी शादी के बाद जब भी सागर ने मिनी और गुड़िया से मिलना चाहा, तो मिनी ने साफ इनकार कर दिया. अब उसे अपने पापा से बात करना भी पसंद नहीं था. उस ने पापा के बिना जीना सीख लिया था और गुड़िया को भी सिखा दिया था. वह उस पापा को कभी माफ नहीं कर पाई जिस ने उस की सीधीसादी मां को छोड़ कर किसी और के साथ शादी कर ली थी.

वक्त इसी तरह निकलता गया. नई शादी से सागर को कोई संतान नहीं हुई थी. दिनोंदिन श्वेता के नखरे बढ़ते जा रहे थे. सागर का जीना मुहाल हो गया था. दोनों के बीच अकसर झगड़े होने लगे थे. श्वेता अकसर घर से बाहर निकल जाती. सागर भी देर रात शराब पी कर घर लौटता.

कमला देवी यह सब देखसमझ रही थीं. पर वह अपने बेटे के स्वार्थी रवैए से भी अच्छी तरह परिचित थीं, इसलिए उन्हें बेटे पर तरस नहीं बल्कि गुस्सा आता था.

कमला देवी को अकसर वह समय याद आता जब पति से तलाक के बाद उन की जिंदगी का एक ही मकसद था और वह था सागर को पढ़ालिखा कर काबिल बनाना. इस के लिए उन्होंने अपनी सारी शक्ति लगा दी थी. स्कूल टीचर की नौकरी करते हुए बेटे को ऊंची शिक्षा दिलाई, काबिल बनाया. मगर अब एहसास होने लगा था कि कितना भी काबिल बना लिया, वह रहा तो अपने बाप का बेटा ही जो बाप की तरह ही शराबी, स्वार्थी और बददिमाग निकला.

इधर कमला द्वारा नीरजा को अपनाने और हर जगह उस की तारीफ किए जाने की वजह से नातेरिश्तेदारों का व्यवहार भी नीरजा के प्रति काफी अच्छा बना रहा. सागर के चचेरेममेरे भाईबहनों के घर कोई भी आयोजन होता तो नीरजा और उस की बेटियों को परिवार के एक महत्त्वपूर्ण सदस्य की तरह आमंत्रित किया जाता और उन की पूरी आवभगत की जाती. यही नहीं, सागर के विवाहित दोस्त भी नीरजा को अवश्य बुलाते. यह सब देख कर सागर और श्वेता भुनभुनाते हुए घर लौटते.

श्वेता चिढ़ कर कहती, “देख लो तुम्हारी रिश्तेदारी में हर जगह अभी भी मुझ से ज्यादा नीरजा की पूछ होती है. लगता है जैसे मैं जबर्दस्ती पहुंच गई हूं. तुम्हारी मां भी जब देखो, नीरजा और उस की बेटियों से ही चिपकी रहती हैं.”

सागर समझाने के लिहाज से कहता, “बुरा तो मुझे भी लगता है पर क्या करूं श्वेता? नीरजा के साथ मेरी बेटियां भी हैं न. बस, इसीलिए चुप रह जाता हूं.”

एक दिन तो हद ही हो गई. सागर के एक दोस्त के बेटे की बर्थडे पार्टी थी. आयोजन बहुत शानदार रखा गया था. सागर के सभी दोस्त वहां मौजूद थे. सागर ने इधरउधर नजरें दौड़ाईं. उसे नीरजा कहीं भी नजर नहीं आई.

सागर ने चैन की सांस लेते हुए श्वेता को कुहनी मारी और बोला, “शुक्र है, आज नीरजा नहीं है.”

श्वेता मुसकरा कर बच्चे को गिफ्ट देने लगी. तभी दरवाजे से नीरजा और उस की दोनों बेटियों ने प्रवेश किया. नीरजा ने खूबसूरत सी बनारसी साड़ी पहन रखी थी और बाल खुले छोड़े थे. उस के आकर्षक व्यक्तित्व ने सब का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया. श्वेता जलभुन गई और सागर पर अपना गुस्सा निकालने लगी.

कुछ देर बाद जब पार्टी उफान पर थी तो सागर किनारे खड़े अपने दोस्तों के ग्रुप को जौन करता हुआ बोला, ‘यार, यह थोड़ा अजीब लगता है कि तुम लोग अब तक हर आयोजन में नीरजा को जरूर बुला लेते हो. तुम लोग जानते हो न, कि मैं नीरजा से अलग हो चुका हूं. अब उसे बुलाने की क्या जरूरत?”

एक दोस्त गुस्से में बोला, “क्या बात कह दी यार, तू अलग हुआ है भाभी से. पर हम तो अलग नहीं हुए न. उन से हमारा जो रिश्ता था वह तो रहेगा ही न.”

“पर क्यों रहेगा? जब वह मेरी पत्नी ही नहीं, तो तुम लोगों की भाभी कैसे हो गई?” सागर ने गुस्से में कहा तो एक दोस्त हंसता हुआ बोला, “ठीक है यार, भाभी नहीं तो दोस्त ही सही. यही मान ले कि अब एक दोस्त की हैसियत से हम सब उन्हें बुलाएंगे. रही बात तेरी, तो ठीक है. तेरी वर्तमान बीवी यानी श्वेता को भी हम न्योता भेज दिया करेंगे, मगर नीरजा को नहीं छोड़ेंगे. समझा?”

इस बात पर काफी देर तक उन के बीच तूतू मैंमैं होती रही. श्वेता पास खड़ी सबकुछ सुन रही थी. अंदर ही अंदर उसे नीरजा पर गुस्सा आ रहा था. उसे महसूस हो रहा था जैसे नीरजा उस की खुशियों के आगे आ कर खड़ी हो जाती है. सागर और उस के बीच कहीं न कहीं नीरजा अब भी मौजूद है. घर लौटते समय भी पूरे रास्ते श्वेता हमेशा की तरह सागर से लड़तीझगड़ती रही.

एक दिन शनिवार को जब कमला देवी बहू और पोती के साथ थीं, तो दोपहर में उछलतीकूदती मिनी घर में घुसी. आते ही उस ने मां और दादी के पैर छुए. नीरजा ने खुशी की वजह पूछी, तो मिनी खुशी से चिल्लाई, “मम्मा मैडिकल एंट्रेंस टैस्ट में मेरे बहुत अच्छे नंबर आए हैं और मुझे यहां के सब से बेहतरीन मैडिकल कालेज में दाखिला मिल रहा है.”

“सच बेटी?” दादी ने खुशी से पोती को गले लगा लिया.

मगर नीरजा थोड़ी उदास स्वर में बोली, “बेटा, यहां दाखिले में और उस के बाद पढ़ाई में कुल खर्च लगभग कितना आएगा?”

अब मिनी भी सीरियस हो गई थी. सोचते हुए उस ने कहा, “मम्मा, मेरे खयाल से लगभग दोढाई लाख रुपए तो लग ही जाएंगे. इस से ज्यादा भी लग सकते हैं.”

“पर बेटा, इतने रुपए मैं कहां से लाऊंगी?”

“मम्मा, मेरी शादी वाली जो एफडी आप ने रखी है न, बस, उसे तोड़ दो.”

“पागल है क्या? नहीं नीरजा, तू वैसा कुछ नहीं करेगी. पढ़ाई का खर्च मैं उठाऊंगी मिनी,” कमला देवी ने कहा.

“पर कैसे मम्मी? आप के पास इतने रुपए कहां से आएंगे?”

“बेटा, मैं ने अपनी नौकरी के दौरान कुछ रुपए बचा कर अलग रखे थे. वे रुपए मैं ने कभी सागर को भी नहीं दिए. अब उन्हें अपनी मिनी के मैडिकल की पढ़ाई के लिए खर्च करूंगी. इस का अलग ही सुख होगा.”

“नहीं मम्मी, उन्हें आप न निकालें. वैसे भी, इस उम्र में आप को पैसे अपने पास रखने चाहिए. कल को सागर ने कुछ गलत व्यवहार किया या बिजनैस डुबो दिया तो आप…?”

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