बदलाव : क्या उर्मिला को मिला उस का पति?

गांव से चलते समय उर्मिला को पूरा यकीन था कि कोलकाता जा कर वह अपने पति को ढूंढ़ लेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कोलकाता में 3 दिन तक भटकने के बाद भी पति राधेश्याम का पता नहीं चला, तो उर्मिला परेशान हो गई.

हावड़ा रेलवे स्टेशन के नजदीक गंगा के किनारे बैठ कर उर्मिला यह सोच रही थी कि अब उसे क्या करना चाहिए. पास ही उस का 10 साला भाई रतन बैठा हुआ था.

राधेश्याम का पता लगाए बिना उर्मिला किसी भी हाल में गांव नहीं लौटना चाहती थी. उसे वह अपने साथ गांव ले जाना चाहती थी.

उर्मिला सहमीसहमी सी इधरउधर देख रही थी. वहां सैकड़ों की तादाद में लोग गंगा में स्नान कर रहे थे. उर्मिला चमचमाती साड़ी पहने हुई थी. पैरों में प्लास्टिक की चप्पलें थीं.

उर्मिला का पहनावा गंवारों जैसा जरूर था, लेकिन उस का तनमन और रूप सुंदर था. उस के गोरे तन पर जवानी की सुर्खी और आंखों में लाज की लाली थी.

हां, उर्मिला की सखीसहेलियों ने उसे यह जरूर बताया था कि वह निहायत खूबसूरत है. उस के अलावा गांव के हमउम्र लड़कों की प्यासी नजरों ने भी उसे एहसास कराया था कि उस की जवानी में बहुत खिंचाव है.

सब से भरोसमंद पुष्टि तो सुहागसेज पर हुई थी, जब उस के पति राधेश्याम ने घूंघट उठाते ही कहा था, ‘तुम इतनी सुंदर हो, जैसे मेरी हथेलियों में चौदहवीं का चांद आ गया हो.’ उर्मिला बोली कुछ नहीं थी, सिर्फ शरमा कर रह गई थी.

उर्मिला बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक गांव की रहने वाली थी. उस ने 19वां साल पार किया ही था कि उस की शादी राधेश्याम से हो गई.

राधेश्याम भी गांव का रहने वाला था. उर्मिला के गांव से 10 किलोमीटर दूर उस का गांव था. उस के पिता गांव में मेहनतमजदूरी कर के परिवार का पालनपोषण करते थे.

उर्मिला 7वीं जमात तक पढ़ी थी, जबकि राधेश्याम मैट्रिक फेल था. वह शादी के 2 साल पहले से कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में चपरासी था.

शादी के लिए राधेश्याम ने 10 दिनों की छुट्टी ली थी, लेकिन उर्मिला के हुस्नोशबाब के मोहपाश में ऐसा बंधा कि 30 दिन तक कोलकाता नहीं गया.

जब घर से राधेश्याम विदा हुआ, तो उर्मिला को भरोसा दिलाया था, ‘जल्दी आऊंगा. अब तुम्हारे बिना काम में मेरा मन नहीं लगेगा.’

उर्मिला ?ाट से बोली थी, ‘ऐसी बात है, तो मु?ो भी अपने साथ ले चलिए. आप का दिल बहला दिया करूंगी. नहीं तो वहां आप तड़पेंगे, यहां मैं बेचैन रहूंगी.’

उर्मिला ने राधेश्याम के मन की बात कही थी. लेकिन उस की मजबूरी यह थी कि 4 दोस्तों के साथ वह उर्मिला को रख नहीं सकता था.

सच से सामना कराने के लिए राधेश्याम ने उर्मिला से कहा, ‘तुम 5-6 महीने रुक जाओ. कोई अच्छा सा कमरा ले लूंगा, तो आ कर तुम्हें ले चलूंगा.’

राधेश्याम अंगड़ाइयां लेती उर्मिला की जवानी को सिसकने के लिए छोड़ कर कोलकाता चला गया.

फिर शुरू हो गई उर्मिला की परेशानियां. पति का बिछोह उस के लिए बड़ा दुखदाई था. दिन काटे नहीं कटता था, रात बिताए नहीं बीतती थी.

तिलतिल कर सुलगती जवानी से उर्मिला पर उदासीनता छा गई थी. वह चंद दिन ससुराल में, तो चंद दिन मायके में गुजारती.

साजन बिन सुहागन उर्मिला का मन न ससुराल में लगता, न मायके में. मगर ऐसी हालत में भी उस ने अपने कदमों को कभी बहकने नहीं दिया था.

पति की अमानत को हर हालत में संभालना उर्मिला बखूबी जानती थी, इसलिए ससुराल और मायके के मनचलों की बुरी कोशिशों को वह कभी कामयाब नहीं होने देती थी. ससुराल में सासससुर के अलावा 2 छोटी ननदें थीं. मायके में मातापिता के अलावा छोटा भाई रतन था.

उर्मिला ने जैसेतैसे बिछोह में एक साल काट दिया. मगर उस के बाद वह पति से मिलने के लिए उतावली हो गई. हुआ यह कि कोलकाता जाने के 6 महीने तक राधेश्याम ने उसे बराबर फोन किया. मगर उस के बाद उस ने फोन करना बंद कर दिया. उस ने रुपए भेजना भी बंद कर दिया.

राधेश्याम को फोन करने पर उस का फोन स्वीच औफ आता था. शायद उस ने फोन नंबर बदल दिया था.

किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर राधेश्याम ने एकदम से परिवार से संबंध क्यों तोड़ दिया?

गांव के लोगों को यह शक था कि राधेश्याम को शायद मनपसंद बीवी नहीं मिली, इसलिए उस ने घर वालों व बीवी से संबंध तोड़ लिया है.

लेकिन उर्मिला यह बात मानने के लिए तैयार नहीं थी. वह तो अपने साजन की नजरों में चौदहवीं का चांद थी.

राधेश्याम जिस कंपनी में नौकरी करता था, उस का पता उर्मिला के पास था. राधेश्याम के बाबत कंपनी वालों को रजिस्टर्ड चिट्ठी भेजी गई.

15 दिन बाद कंपनी का जवाब आ गया. चिट्ठी में लिखा था कि राधेश्याम 6 महीने पहले नौकरी छोड़ चुका था.

सभी परेशान हो गए. कोलकाता जा कर राधेश्याम का पता लगाने के सिवा अब और कोई रास्ता नहीं था. उर्मिला का पिता अपंग था. कहीं आनेजाने में उसे काफी परेशानी होती थी. वह कोलकाता नहीं जा सकता था.

उर्मिला का ससुर हमेशा बीमार रहता था. जबतब खांसी का दौरा आ जाता था, इसलिए वह भी कोलकाता नहीं जा सकता था.

हिम्मत कर के एक दिन उर्मिला ने सास के सामने प्रस्ताव रखा, ‘अगर आप कहें, तो मैं अपने भाई रतन के साथ कोलकाता जा कर उन का पता लगाऊं?’ परिवार के लोगों ने टिकट खरीद कर रतन के साथ उर्मिला को हावड़ा जाने वाली ट्रेन में बिठा दिया.

राधेश्याम जिस कंपनी में काम करता था, सब से पहले उर्मिला वहां गई. वहां के स्टाफ व कंपनी के मैनेजर ने उसे साफ कह दिया कि 6 महीने से राधेश्याम का कोई अतापता नहीं है.

उस के बाद उर्मिला वहां गई, जहां राधेश्याम अपने 4 दोस्तों के साथ एक ही कमरे में रहता था. उस समय 3 ही दोस्त थे. एक गांव गया हुआ था.

तीनों दोस्तों ने उर्मिला का भरपूर स्वागत किया. उन्होंने उसे बताया कि 6 महीने पहले राधेश्याम यह कह कर चला गया था कि उसे एक अच्छी नौकरी और रहने की जगह मिल गई है. मगर सचाई कुछ और थी.

‘कैसी सचाई?’ पूछते हुए उर्मिला का दिल धड़कने लगा.

‘दरअसल, उसे किसी अमीर औरत से प्यार हो गया था. वह उसी के साथ रहने चला गया था,’ 3 दोस्तों में से एक दोस्त ने बताया.

उर्मिला को लगा, जैसे उस के दिल की धड़कन बंद हो जाएगी और वह मर जाएगी. उस के हाथपैर सुन्न हो गए थे, मगर जल्दी ही उस ने अपनेआप को काबू में कर लिया.

उर्मिला ने पूछा, ‘वह औरत कहां रहती है?’

तीनों में से एक ने कहा, ‘यह हम तीनों में से किसी को पता नहीं है. सिर्फ गणपत को पता है. उस औरत के बारे में हम लोगों ने उस से बहुत पूछा था, मगर उस ने बताया नहीं था.

‘उस का कहना था कि उस ने राधेश्याम से वादा किया है कि उस की प्रेमिका के बारे में वह किसी को कुछ नहीं बताएगा.’

‘गणपत कौन…’ उर्मिला ने पूछा.

‘वह हम लोगों के साथ ही रहता है. अभी वह गांव गया हुआ है. वह एक महीने बाद आएगा. आप पूछ कर देखिएगा. शायद, वह आप को बता दे.’

‘मगर, तब तक मैं रहूंगी कहां?’

‘चाहें तो आप इसी कमरे में रह सकती हैं. रात में हम लोग इधरउधर सो लेंगे.’ मगर उर्मिला उन लोगों के साथ रहने को तैयार नहीं हुई. उसे पति की बात याद आ गई थी.

गांव से विदा लेते समय राधेश्याम ने उस से कहा था, ‘मैं तुम्हें ले जा कर अपने साथ रख सकता था, मगर दोस्तों पर भरोसा करना ठीक नहीं है.

‘वैसे तो वे बहुत अच्छे हैं. मगर कब उन की नीयत बदल जाए और तुम्हारी इज्जत पर दाग लगा दें, इस की कोई गारंटी नहीं है.’ उर्मिला अपने भाई रतन के साथ बड़ा बाजार की एक धर्मशाला में चली गई.

धर्मशाला में उसे सिर्फ 3 दिन रहने दिया गया. चौथे दिन वहां से उसे जाने के लिए कह दिया गया, तो मजबूर हो कर उसे धर्मशाला छोड़नी पड़ी.

अब उर्मिला अपने भाई रतन के साथ गंगा किनारे बैठी थी कि अचानक उस के पास एक 40 साला शख्स आया.

पहले उस ने उर्मिला को ध्यान से देखा, उस के बाद कहा, ‘‘लगता है कि तुम यहां पर नई हो. कहीं और से आई हो. काफी चिंता में भी हो. कोई परेशानी हो, तो बताओ. मैं मदद करूंगा…’’

वह शख्स उर्मिला को हमदर्द लगा. उस ने बता दिया कि वह कहां से और क्यों आई है.

वह शख्स उस के पास बैठ गया. अपनापन जताते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम अवधेश सिंह है. मेरा घर पास ही में है. जब तक तुम्हारा पति मिल नहीं जाता, तब तक तुम मेरे घर में रह सकती हो. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी.

‘‘मेरी जानपहचान बहुतों से है. तुम्हारे पति को मैं बहुत जल्दी ढूंढ़ निकालूंगा. जरूरत पड़ने पर पुलिस की मदद भी लूंगा.’’

कुछ सोचते हुए उर्मिला ने कहा, ‘‘अपने घर ले जा कर मेरे साथ कुछ गलत हरकत तो नहीं करेंगे?’’

‘‘तुम पति की तलाश करना चाहती हो, तो तुम्हें मुझ पर यकीन करना ही होगा.’’

‘‘आप के घर में कौनकौन हैं?’’

‘‘यहां मैं अकेला रहता हूं. मेरा बेटा और परिवार गांव में रहता है. मेरी पत्नी नहीं है. उस की मौत हो चुकी है.’’

‘‘तब तो मैं हरगिज आप के घर नहीं रह सकती. अकेले में आप मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं.’’ अवधेश सिंह ने उर्मिला को हर तरह से समझाया. उसे अपनी शराफत का यकीन दिलाया.

आखिरकार उर्मिला अपने भाई रतन के साथ अवधेश सिंह के घर पर इस शर्त पर आ गई कि वह उस के घर का सारा काम कर दिया करेगी. उस का खाना भी बना दिया करेगी.

अवधेश सिंह के फ्लैट में 2 कमरे थे. एक कमरा उस ने उर्मिला को दे दिया. शुरू में उर्मिला अवधेश सिंह को निहायत ही शरीफ समझाती थी, मगर 10 दिन होतेहोते उस का असली रंग सामने आ गया.

अवधेश सिंह अकसर किसी न किसी बहाने से उस के पास आ जाता था. यहां तक कि जब वह रसोईघर में खाना बना रही होती, तो वह उस के करीब आ कर चुपके से उस का अंग छू देता था. कभीकभी तो उस की कमर को भी छू लेता था.

उर्मिला को यह समझाते देर नहीं लगी कि उस का मन बेईमान है. वह उस का जिस्म पाना चाहता है.

एक बार उर्मिला का मन हुआ कि वह उस का घर छोड़ कर कहीं और चली जाए, मगर इस विचार को उस ने यह सोच कर तुरंत दिमाग से हटा दिया कि वह जाएगी तो कहां जाएगी? क्या पता दूसरी जगह कोई उस से भी घटिया इनसान मिल जाए.

गणपत के गांव से लौट आने तक उर्मिला को कोलकाता में रहना ही था. उस ने मीठीमीठी रोमांटिक बातों से अवधेश सिंह को उलझ कर रखने का फैसला किया.

एक दिन उर्मिला रसोईघर में काम कर रही थी, अचानक वह वहां आ गया. उसी समय किसी चीज के लिए उर्मिला झाकी, तो ब्लाउज के कैद से उस के उभारों का कुछ भाग दिखाई पड़ गया.

फिर तो अवधेश सिंह अपनेआप को काबू में न रख सका. झट से उस ने कह दिया, ‘‘मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूं. तुम मेरी बन जाओ.’’

सही मौका देख कर उर्मिला ने अवधेश सिंह पर अपनी बातों का जादू चलाने का निश्चय कर लिया.

उर्मिला ने भी झट से कहा, ‘‘मैं भी अपना दिल आप को दे चुकी हूं.’’

अवधेश सिंह खुशी से झम उठा. उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘सच कह रही हो तुम?’’

‘‘आप तो अच्छे आदमी नहीं हैं. मैं तो आप को शरीफ समझ कर अपना दिल दे बैठी थी, मगर आप ने तो मेरा हाथ पकड़ लिया.’’

अवधेश सिंह ने तुरंत हाथ छोड़ कर कहा, ‘‘तो क्या हो गया?’’

‘‘मेरी एक मुंहबोली भाभी कहती हैं कि किसी का प्यार कबूल करने से पहले कुछ समय तक उस का इम्तिहान लेना चाहिए.

‘‘वे कहती हैं कि जो आदमी झट से हाथ लगा दे, वह मतलबी होता है. प्यार का वास्ता दे कर जिस्म हासिल कर लेता है. उस के बाद छोड़ देता है, इसलिए ऐसे आदमियों के जाल में नहीं फंसना चाहिए.’’

‘‘तुम मुझे गलत मत समझे उर्मिला. मैं मतलबी नहीं हूं, न ही मेरी नीयत खराब है. तुम जितना चाहो इम्तिहान ले लो, मुझे हमेशा खरा प्रेमी पाओगी.’’

‘‘तो फिर हाथ क्यों पकड़ लिया?’’

‘‘बस यों ही दिल मचल गया था.’’

‘‘दिल पर काबू रखिए. जबतब मचलने मत दीजिए. एक बात साफ बता देती हूं. ध्यान से सुन लीजिए.

‘‘अगर आप मेरा प्यार पाना चाहते हैं, तो सब्र से काम लेना होगा. जिस दिन यकीन हो जाएगा कि आप मेरे प्यार के काबिल हैं, उस दिन हाथ ही नहीं, पैर भी पकड़ने की छूट दे दूंगी. तब तक आप सिर्फ बातों से प्यार जाहिर कीजिए. हाथ न लगाइए.’’

‘‘वह दिन कब आएगा?’’ अवधेश सिंह ने पूछा.

‘‘कम से कम एक महीना तो लगेगा.’’

उर्मिला की चालाकी अवधेश सिंह समझ नहीं पाया और उस की शर्त को मान लिया.

अवेधश सिंह सरकारी अफसर था. कोलकाता में वह अकेला ही रहता था. जब तक उस की पत्नी जिंदा थी, वह साल में 4-5 बार गांव जाता था. पत्नी की मौत के बाद उस ने गांव जाना ही छोड़ दिया था.

बात यह थी कि पत्नी की मौत के बाद उस ने दूसरी शादी करने का निश्चय किया, जिस का उस के बेटों ने पुरजोर विरोध किया था.

अवधेश सिंह के 2 बेटे थे. दोनों ही शादीशुदा थे. गांव में खेतीकिसानी करते थे. बेटों ने दूसरी शादी का विरोध किया, तो उस ने उन से रिश्ता ही तोड़ लिया.

दरअसल, अवधेश सिंह औरत के बिना नहीं रह सकता था. वह वासना का भेडि़या था. भोलीभाली और गरीब लड़कियों को बहलाफुसला कर वह अपने घर लाता था, फिर तरहतरह का लोभ दिखा कर उन के साथ मनमानी करता था.

अवधेश सिंह सुबहसवेरे कभीकभी गंगा स्नान के लिए भी जाता था. उस दिन सुबह 8 बजे गए, तो उर्मिला पर उस की नजर चली गई. वह समझ गया कि उर्मिला कहीं दूर देहात की है. वह उस के चाल में जल्दी आ जाएगी. वह उसे अपने घर ले जाने में कामयाब भी हो गया.

अवधेश सिंह उर्मिला को निहायत ही भोलीभाली समझाता था, पर वह उस की चालाकी सम?ा नहीं पाया. उसे लगा कि वह उर्मिला की बात मान लेगा, तो वह राजीखुशी उस का बिस्तर गरम कर देगी.

फिर तो वह उर्मिला का दिल जीतने के लिए जीतोड़ कोशिश करने लगा. उस की हर जरूरत पर ध्यान देने लगा. महंगे से महंगा गिफ्ट भी वह उसे देने लगा.

इस तरह 10 दिन और बीत गए. इस बीच उर्मिला को राधेश्याम की कोई खबर नहीं मिली.

उस के बाद एक दिन अचानक उर्मिला ने पति राधेश्याम को छोड़ अवधेश सिंह के साथ एक नई जिंदगी की शुरुआत करने का फैसला किया. हुआ यह कि एक दिन अवधेश सिंह दफ्तर से लौट कर रात में घर आया. उस समय रतन सो चुका था.

आते ही उस ने उर्मिला को अपने कमरे में बुलाया. उर्मिला कमरे में आई, तो अवधेश सिंह ने झट से दरवाजा बंद कर दिया.

वह उर्मिला से बोला, ‘‘तुम मान जाओगी, तो जो कुछ कहोगी, वह सबकुछ करूंगा. तुम चाहोगी तो तुम से शादी भी कर सकता हूं.’’

उर्मिला उलझन में पड़ गई. बेशक, वह गांव से पति की तलाश में निकली थी, मगर शहरी चकाचौंध ने पति से उस का मोह भंग कर दिया था.

अब वह गांव की नहीं, शहरी जिंदगी जीना चाहती थी.

अवधेश सिंह के प्रस्ताव पर वह यह सोचने लगी कि उस का पति मिल भी गया तो क्या वह अवधेश सिंह की तरह ऐशोआराम की जिंदगी दे पाएगा?

अवधेश सिंह की उम्र भले ही उस से ज्यादा थी, मगर उस के पास दौलत की कमी नहीं थी. उस ने अवधेश सिंह का प्रस्ताव स्वीकार करने का फैसला किया.

अवधेश सिंह अपनी बात से मुकर न जाए, इसलिए उर्मिला ने लिखवा लिया कि वह उस से शादी करेगा. उस के बाद उर्मिला ने अपनेआप को उस के हवाले कर दिया.

उर्मिला को पा कर अवधेश सिंह की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने अगले हफ्ते ही उस से शादी करने का फैसला किया. उर्मिला भी जल्दी से जल्दी अवधेश सिंह से शादी कर लेना चाहती थी.

2 दिन बाद ही उस ने अपने भाई रतन को गांव जाने वाली ट्रेन में बिठा दिया. उस से कह दिया कि वह गांव लौट कर नहीं जाएगी. अवधेश सिंह के साथ शहर में ही रहेगी.

शादी के 2 दिन बाकी थे, तो अचानक राधेश्याम के रूममेट राघव के फोन पर उर्मिला को बताया कि गणपत गांव से आ गया है.

उर्मिला हर हाल में अवधेश सिंह से शादी करना चाहती थी, इसलिए वह राधेश्याम का पता लगाने नहीं गई. तय समय पर उस ने अवधेश सिंह से शादी कर ली. एक महीने बाद अवधेश सिंह की गैरहाजिरी में राधेश्याम उर्मिला से मिला.

‘‘कहां थे इतने दिन…?’’ उर्मिला ने पूछा.

‘‘गांव से आने के बाद मैं एक अमीर विधवा औरत के प्रेमजाल में फंस गया था. अब मैं उस के साथ नहीं रहना चाहता.

‘‘गणपत से मुझे जैसे ही पता चला कि तुम अवधेश सिंह के घर पर हो, मैं यहां चला आया. अब मैं तुम्हारे साथ गांव लौट जाना चाहता हूं.’’

‘‘आप ने आने में बहुत देर कर दी. मैं ने अवधेश सिंह से शादी कर ली है. अब मैं आप के साथ नहीं जा सकती.’’

राधेश्याम सबकुछ समझ गया. उस ने उर्मिला से फिर कुछ नहीं कहा और चुपचाप वहां से लौट गया.

बदनाम बस्ती : धंधे वाली पर आया सुमित का दिल

बदनाम बस्ती के मोड़ पर पहुंचते ही सुमित का दिल जोरजोर से धड़कने लगा. उस ने चोर निगाहों से इधरउधर देखा. आसपास किसी को न देख उस ने एक रिकशा वाले से धीमी आवाज में पूछा, ‘‘बदनाम बस्ती चलोगे?’’

‘‘चलूंगा, पर 20 रुपए लूंगा,’’ रिकशा वाला बोला.

‘‘अरे भाई, रुपए की तुम चिंता क्यों करते हो? पहले जल्दी यहां से चलो तो सही,’’ सुमित रिकशा पर बैठता हुआ बोला.

कुछ पल बाद ही रिकशा बदनाम बस्ती की तरफ चल पड़ा. तकरीबन 15 मिनट बाद रिकशा रुका.

‘‘उतरिए साहब,’’ रिकशा वाला गमछे से पसीना पोंछते हुए बोला.

सुमित जल्दी से नीचे उतरा. रिकशा वाले को 20 रुपए का नोट थमाया और तेजी से बदनाम बस्ती में चला गया. कच्ची सड़क के दोनों किनारों पर कई झोंपडि़यां थीं. उन के बाहर लड़कियां सजधज कर बैठी थीं.

कभीकभी सुमित चोर निगाहों से उन लड़कियों की तरफ देख लेता. नजर मिलते ही लड़कियां उस को इशारे से अपने पास बुलातीं, पर सुमित उन के मनमोहक इशारों को नजरअंदाज करता हुआ आगे बढ़ता रहा. वह सीधा सुचित्रा की झोंपड़ी के पास रुका. झोंपड़ी के बाहर सुचित्रा को न देख हौले से आवाज दी.

अगले ही पल मामूली साड़ी अपने जिस्म पर लपेटे एक जवान लड़की उस झोंपड़ी से बाहर निकली. सुमित पर नजर पड़ते ही उस के होंठों पर मुसकान बिखर गई.

सुचित्रा बला की खूबसूरत थी. गोरा, लंबा चेहरा, बड़ीबड़ी आंखें और लंबाई भी अच्छी. उस की देह में एक कशिश थी. बड़े उभार, पतली कमर जैसे तराशा हुआ बदन.

‘‘तुम आ गए सुमित, तुम्हारे इंतजार में मैं बेकरार हो जाती हूं,’’ सुचित्रा वापस अपनी झोंपड़ी में घुसते हुए बोली.

झोंपड़ी में घुसते ही फूलों की भीनीभीनी खुशबू सुमित के दिलोदिमाग में समाती चली गई.

‘‘देखो सुमित, आज मैं ने तुम्हारे लिए अपनी झोंपड़ी को फूलों से सजाया है,’’ सुचित्रा चारपाई पर बैठते हुए बोली.

सुमित उस के पास बैठ गया. सुचित्रा की हथेलियों को अपने हाथों में ले कर वह एकटक उस के चेहरे को देखने लगा.

‘‘आज तुम मुझे इस तरह क्यों देख रहे हो?’’ सुचित्रा चेहरे पर आ गई लटों को समेटती हुई बोली.

‘‘पिछले कई दिनों से मैं तुम से एक बात पूछना चाहता था, पर पूछ नहीं पाया,’’ सुमित बोला.

‘‘क्या पूछना चाहते थे? पूछो न हिचकिचाहट कैसी? तुम तो जानते ही हो कि तुम से मिलने के बाद मैं सिर्फ तुम्हारी हूं… और तुम्हारी ही रहूंगी.’’

‘‘मैं यह पूछना चाहता था कि तुम इस बस्ती में कैसे आ गई? तुम्हारी क्या मजबूरियां थीं, जो तुम्हें यहां खींच लाईं? क्या तुम शौक से…?’’ सुमित ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘नहीं सुमित, कोई लड़की शौक से अपना जिस्म नहीं बेचती, इस पेशे से जुड़ने के पहले मैं भी एक भोलीभाली और शरीफ लड़की थी. मेरा गांव नदी के किनारे बसा था. मेरे पिताजी एक अच्छे किसान थे. एक बार अचानक मेरा गांव बाढ़ की चपेट में आ गया और हमारा सबकुछ बह गया.

‘‘मेरे मांबाप भी बाढ़ के पानी में हमेशा के लिए बह गए. किसी तरह मैं बच गई, पर मैं अनाथ हो चुकी थी. मांबाप के गुजरने के बाद मुझे किसी ने सहारा नहीं दिया.

‘‘मैं सड़कों पर भटकने लगी. पढ़ीलिखी तो थी नहीं कि कोई नौकरी ढूंढ़ लेती. फिर भी कई लोगों से मैं ने काम मांगा, पर किसी ने भी मुझे काम नहीं दिया. हर कोई मेरे जिस्म को ही घूरता, मानो मैं कोई खूबसूरत पंछी हूं और वे लोग शिकारी.

‘‘मैं ने इज्जत की रोटी खाने की बहुत कोशिश की, पर कामयाब न हो सकी. हवस के पुजारियों ने मुझे इज्जत से जीने नहीं दिया. मेरी खूबसूरती, मेरी जवानी, मेरी इज्जत नीलाम हो गई. मैं कुछ न कर सकी. घायल पंछी की तरह सिर्फ फड़फड़ा कर रह गई.

‘‘अब जिंदा रहने के लिए रोटी की जरूरत तो होती ही है न. जब मेरी इज्जत ही खत्म हो गई, तो इज्जत की रोटी खाने कौन देता? मैं मजबूर हो कर इस बस्ती में आ गई,’’ सुचित्रा की आंखों में आंसू भर आए थे.

सुचित्रा की दर्दभरी कहानी सुन कर सुमित की आंखें भी डबडबा आईं. कुछ देर तक झोंपड़ी में खामोशी छाई रही.

‘‘सुचित्रा, मैं तुम्हें ऐसी घटिया जिंदगी नहीं जीने दूंगा. मैं तुम से शादी करूंगा. क्या तुम मेरा साथ दोगी?’’ सुमित ने खामोशी तोड़ी.

सुचित्रा कुछ न बोली, सुमित ने फिर पूछा, ‘‘बोलो सुचित्रा, क्या तुम मुझ से ब्याह करोगी?’’

‘‘नहीं सुमित, मैं तुम्हारे काबिल नहीं. मैं तो अपना सबकुछ गंवा बैठी हूं. मैं तो कोयले की तरह काली हो चुकी हूं. उस पर कितना ही साबुन रगड़ो, कालिख धुल नहीं सकती,’’ सुचित्रा मायूस हो कर बोली.

‘‘पर सुचित्रा, फूल तो आखिर फूल ही होता है. उस की खूबसूरती को कोई नहीं छीन सकता. उस की खुशबू को कोई खत्म नहीं कर सकता. जानती हो, जब मैं तुम से पहली बार मिला था तो उसी दिन मैं ने तुम्हें अपना जीवनसाथी बनाने का फैसला कर लिया था. पर बारबार मेरे मन में यही सवाल उठता था कि तुम इस बस्ती में क्यों आई? कैसे आई? आज मुझे उन सवालों के जवाब मिल गए हैं.’’

‘‘पर, क्या तुम्हारे घर वाले इस शादी के लिए राजी हो जाएंगे? क्या तुम्हारा समाज यह बरदाश्त कर सकेगा?’’

‘‘मुझे उन सब की परवाह नहीं. कोई कुछ भी कहे, मेरा फैसला बदलने वाला नहीं. सिर्फ तुम ‘हां’ कर दो. बस, नौकरी मिलते ही मैं तुम्हें डोली में बैठा कर यहां से हमेशाहमेशा के लिए ले जाऊंगा. हमारा अपना घर होगा. वहां सिर्फ हम दोनों होंगे और होगा हमारा प्यार,’’ सुमित खयालों में खो गया.

‘‘मुझे ऐसे सपने न दिखाओ सुमित. मैं खुशी से पागल हो जाऊंगी,’’ सुचित्रा उस से लिपट गई.

‘‘यह सपना नहीं है पगली. मैं सचमुच तुम से ब्याह करूंगा,’’ सुमित ने सुचित्रा को अपनी बांहों में कस लिया.

‘‘सुमित, देखो बाहर कैसी चांदनी छिटकी हुई है? कितना खूबसूरत नजारा है,’’ सुचित्रा सुमित की बांहों से निकल कर झोंपड़ी के बाहर देखती हुई बोली.

‘‘तेरे चेहरे से तो नजर ही नहीं हटती, बाहर का नजारा मैं क्या देखूं? अच्छा, अब मैं चलता हूं,’’ कह कर सुमित चारपाई से उठ खड़ा हुआ और झोंपड़ी से बाहर निकल कर तेजी से कच्ची सड़क पर आगे बढ़ने लगा.

सुचित्रा मुसकराते हुए सुमित को जाते हुए देखती रही. कुछ ही मिनटों में सुमित उस की आंखों से ओझल हो गया.

समय अपनी रफ्तार से सरकता रहा. सुमित रोज सुचित्रा से मिलने आता. सबकुछ भूल कर दोनों प्यार के सागर में खो जाते.

फिर एक दिन सुमित को नौकरी भी मिल गई. वह बहुत खुश हुआ. सुचित्रा को यह खुशखबरी देने वह तेजी से बदनाम बस्ती की तरफ चल पड़ा. खुशी के मारे उस के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. वह बदनाम बस्ती कब पहुंच गया, उसे कुछ पता ही न चला.

सुचित्रा की झोंपड़ी के पास लड़कियों की भीड़ देख कर वह सकपका गया. तकरीबन दौड़ता हुआ वह झोंपड़ी के भीतर घुस गया. वहां का नजारा देखते ही उस का दिल दहल गया. सुचित्रा खून से लथपथ पड़ी थी. पास ही खून से सनी शराब की टूटी हुई बोतल पड़ी थी. आसपास कांच के टुकड़े बिखरे पड़े थे. वह मौत से लड़ रही थी.

सुमित सुचित्रा के सिरहाने बैठ गया. उस के सिर को अपनी गोद में रख कर उस के माथे पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘यह क्या हो गया सुचित्रा? आज तो मैं तुम्हें अपनी नौकरी की खुशखबरी देने आया था, पर…’’ उस की आंखों से टपटप आंसू गिरने लगे.

सुचित्रा आखिरी सांसें गिन रही थी. वह टूटे हुए शब्दों में बोली, ‘‘मुझे… माफ… कर देना सुमित. मैं… तुम्हारे सपनों को… पूरा… न कर…’’ अचानक सुचित्रा की आवाज बंद हो गई और उस का सिर सुमित की गोद में लुढ़क गया.

सुमित फफकफफक कर रो पड़ा. कभी वह इधरउधर बिखरे कांच के टुकड़ों को देखता तो कभी खून के धब्बों कोे. घूमफिर कर उस की नजर सुचित्रा के मासूम चेहरे पर अटक जाती. किसी तरह उस ने अपनेआप को संभालते हुए एक लड़की से पूछा, ‘‘सुचित्रा की यह हालत कैसे हुई?’’

वह लड़की बोली, ‘‘अभी कुछ देर पहले नशे में झूमता हुआ एक आदमी यहां आया था. उस के हाथ में शराब की बोतल थी. सुचित्रा की झोंपड़ी में घुस गया. फिर हम लोगों को झोंपड़ी से शोरगुल सुनाई दिया.

‘‘शायद सुचित्रा उसे अपना जिस्म सौंपने से इनकार कर रही थी. धीरेधीरे आवाज तेज होती चली गई. फिर अचानक सुचित्रा की चीख गूंज उठी. जब हम लोग यहां पहुंचे, तो सबकुछ खत्म हो चुका था. सुचित्रा खून से लथपथ पड़ी थी. शराबी का कहीं पता न था.’’

सुचित्रा का अंतिम संस्कार कर के सुमित जब श्मशान से लौटा, तो उस के कदम शराब की दुकान की तरफ बढ़ चले. दुकान के पास पहुंचते ही वह अचानक ठिठक गया, ‘नहींनहीं, मैं अपना गम भुलाने के लिए कभी भी शराब नहीं पीऊंगा. इसी शराब के नशे में उस जालिम ने मेरी सुचित्रा को मार डाला. अगर वह नशे में न होता तो शायद…? नहीं, मैं कभी भी शराब को हाथ नहीं लगाऊंगा,’ मन ही मन फैसला कर के सुमित वापस मुड़ गया.

छोटू की तलाश : एक रसोइया की कहानी

सु बह का समय था. घड़ी में तकरीबन साढे़ 9 बजने जा रहे थे. रसोईघर में खटरपटर की आवाजें आ रही थीं. कुकर अपनी धुन में सीटी बजा रहा था. गैस चूल्हे के ऊपर लगी चिमनी चूल्हे पर टिके पतीलेकुकर वगैरह का धुआं समेटने में लगी थी. अफरातफरी का माहौल था.

शालिनी अपने घरेलू नौकर छोटू के साथ नाश्ता बनाने में लगी थीं. छोटू वैसे तो छोटा था, उम्र यही कोई 13-14 साल, लेकिन काम निबटाने में बड़ा उस्ताद था. न जाने कितने ब्यूरो, कितनी एजेंसियां और इस तरह का काम करने वाले लोगों के चक्कर काटने के बाद शालिनी ने छोटू को तलाशा था.

2 साल से छोटू टिका हुआ, ठीकठाक चल रहा था, वरना हर 6 महीने बाद नया छोटू तलाशना पड़ता था. न जाने कितने छोटू भागे होंगे.

शालिनी को यह बात कभी समझ नहीं आती थी कि आखिर 6 महीने बाद ही ये छोटू घर से विदा क्यों हो जाते हैं?

शालिनी पूरी तरह से भारतीय नारी थी. उन्हें एक छोटू में बहुत सारे गुण चाहिए होते थे. मसलन, उम्र कम हो, खानापीना भी कम करे, जो कहे वह आधी रात को भी कर दे, वे मोबाइल फोन पर दोस्तों के साथ ऐसीवैसी बातें करें, तो उन की बातों पर कान न धरे, रात का बचाखुचा खाना सुबह और सुबह का शाम को खा ले.

कुछ खास बातें छोटू में वे जरूर देखतीं कि पति के साथ बैडरूम में रोमांटिक मूड में हों, तो डिस्टर्ब न करे. एक बात और कि हर महीने 15-20 किट्टी पार्टियों में जब वे जाएं और शाम को लौटें, तो डिनर की सारी तैयारी कर के रखे.

शालिनी के लिए एक अच्छी बात यह थी कि यह वाला छोटू बड़ा ही सुंदर था. गोराचिट्टा, अच्छे नैननक्श वाला. यह बात वे कभी जबान पर भले ही न ला पाई हों, लेकिन वे जानती थीं कि छोटू उन के खुद के बेटे अनमोल से भी ज्यादा सुंदर था. अनमोल भी इसी की उम्र का था, 14 साल का.

घर में एकलौता अनमोल, शालिनी और उन के पति, कुल जमा 3 सदस्य थे. ऐसे में अनमोल की शिकायतें रहती थीं कि उस का एक भाई या बहन क्यों नहीं है? वह किस के साथ खेले?

नया छोटू आने के बाद शालिनी की एक समस्या यह भी दूर हो गई कि अनमोल खुश रहने लग गया था. शालिनी ने छोटू को यह छूट दे दी कि वह जब काम से फ्री हो जाए, तो अनमोल से खेल लिया करे.

छोटू पर इतना विश्वास तो किया ही जा सकता था कि वह अनमोल को कुछ गलत नहीं सिखाएगा.

छोटू ने अपने अच्छे बरताव और कामकाज से शालिनी का दिल जीत लिया था, लेकिन वे यह कभी बरदाश्त नहीं कर पाती थीं कि छोटू कामकाज में थोड़ी सी भी लापरवाही बरते. वह बच्चा ही था, लेकिन यह बात अच्छी तरह समझाता था कि भाभी यानी शालिनी अनमोल की आंखों में एक आंसू भी नहीं सहन कर पाती थीं.

अनमोल की इच्छानुसार सुबह नाश्ते में क्याक्या बनेगा, यह बात शालिनी रात को ही छोटू को बता देती थीं, ताकि कोई चूक न हो. छोटू सुबह उसी की तैयारी कर देता था.

छोटू की ड्यूटी थी कि भयंकर सर्दी हो या गरमी, वह सब से पहले उठेगा, तैयार होगा और रसोईघर में नाश्ते की तैयारी करेगा.

शालिनी भाभी जब तक नहाधो कर आएंगी, तब तक छोटू नाश्ते की तैयारी कर के रखेगा. छोटू के लिए यह दिनचर्या सी बन गई थी.

आज छोटू को सुबह उठने में देरी हो गई. वजह यह थी कि रात को शालिनी भाभी की 2 किट्टी फ्रैंड्स की फैमिली का घर में ही डिनर रखा गया था. गपशप, अंताक्षरी वगैरह के चलते डिनर और उन के रवाना होने तक रात के साढे़ 12 बज चुके थे. सभी खाना खा चुके थे. बस, एक छोटू ही रह गया था, जो अभी तक भूखा था.

शालिनी ने अपने बैडरूम में जाते हुए छोटू को आवाज दे कर कहा था, ‘छोटू, किचन में खाना रखा है, खा लेना और जल्दी सो जाना. सुबह नाश्ता भी तैयार करना है. अनमोल को स्कूल जाना है.’

‘जी भाभी,’ छोटू ने सहमति में सिर हिलाया. वह रसोईघर में गया. ठिठुरा देने वाली ठंड में बचीखुची सब्जियां, ठंडी पड़ चुकी चपातियां थीं. उस ने एक चपाती को छुआ, तो ऐसा लगा जैसे बर्फ जमी है. अनमने मन से सब्जियों को पतीले में देखा. 3 सब्जियों में सिर्फ दाल बची हुई थी. यह सब देख कर उस की बचीखुची भूख भी शांत हो गई थी. जब भूख होती है, तो खाने को मिलता नहीं. जब खाने को मिलता है, तब तक भूख रहती नहीं. यह भी कोई जिंदगी है.

छोटू ने मन ही मन मालकिन के बेटे और खुद में तुलना की, ‘क्या फर्क है उस में और मुझ में. एक ही उम्र, एकजैसे इनसान. उस के बोलने से पहले ही न जाने कितनी तरह का खाना मिलता है और इधर एक मैं. एक ही मांबाप के 5 बच्चे. सब काम करते हैं, लेकिन फिर भी खाना समय पर नहीं मिलता. जब जिस चीज की जरूरत हो तब न मिले तो कितना दर्द होता है,’ यह बात छोटू से ज्यादा अच्छी तरह कौन जानता होगा.

छोटू ने बड़ी मुश्किल से दाल के साथ एक चपाती खाई औैर अपने कमरे में सोने चला गया. लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. आज उस का दुख और दर्र्द जाग उठा. आंसू बह निकले. रोतेरोते सुबकने लगा वह और सुबकते हुए न जाने कब नींद आ गई, उसे पता ही नहीं चला.

थकान, भूख और उदास मन से जब वह उठा, तो साढे़ 8 बज चुके थे. वह उठते ही बाथरूम की तरफ भागा. गरम पानी करने का समय नहीं था, तो ठंडा पानी ही उडे़ला. नहाना इसलिए जरूरी था कि भाभी को बिना नहाए किचन में आना पसंद नहीं था.

छोटू ने किचन में प्रवेश किया, तो देखा कि भाभी कमरे से निकल कर किचन की ओर आ रही थीं. शालिनी ने जैसे ही छोटू को पौने 9 बजे रसोईघर में घुसते देखा, तो उन की त्योरियां चढ़ गईं, ‘‘छोटू, इस समय रसोई में घुसा है? यह कोई टाइम है उठने का? रात को बोला था कि जल्दी उठ कर किचन में तैयारी कर लेना. जरा सी भी अक्ल है तु?ा में,’’ शालिनी नाराजगी का भाव लिए बोलीं.

‘‘सौरी भाभी, रात को नींद नहीं आई. सोया तो लेट हो गया,’’ छोटू बोला.

‘‘तुम नौकर लोगों को तो बस छूट मिलनी चाहिए. एक मिनट में सिर पर चढ़ जाते हो. महीने के 5 हजार रुपए, खानापीना, कपड़े सब चाहिए तुम

लोगों को. लेकिन काम के नाम पर तुम लोग ढीले पड़ जाते हो…’’ गुस्से में शालिनी बोलीं.

‘‘आगे से ऐसा नहीं होगा भाभी,’’ छोटू बोला.

‘‘अच्छाअच्छा, अब ज्यादा बातें मत बना. जल्दीजल्दी काम कर,’’ शालिनी ने कहा.

छोटू और शालिनी दोनों तेजी से रसोईघर में काम निबटा रहे थे, तभी बैडरूम से अनमोल की तेज आवाज आई, ‘‘मम्मी, आप कहां हो? मेरा

नाश्ता तैयार हो गया क्या? मुझे स्कूल जाना है.’’

‘‘लो, वह उठ गया अनमोल. अब तूफान खड़ा कर देगा…’’ शालिनी किचन में काम करतेकरते बुदबुदाईं.

‘‘आई बेटा, तू फ्रैश हो ले. नाश्ता बन कर तैयार हो रहा है. अभी लाती हूं,’’ शालिनी ने किचन से ही अनमोल को कहा.

‘‘मम्मी, मैं फ्रैश हो लिया हूं. आप नाश्ता लाओ जल्दी से. जोरों की भूख लगी है. स्कूल को देर हो जाएगी,’’ अनमोल ने कहा.

‘‘अच्छी आफत है. छोटू, तू यह

दूध का गिलास अनमोल को दे आ.

ठंडा किया हुआ है. मैं नाश्ता ले कर आती हूं.’’

‘‘जी भाभी, अभी दे कर आता हूं,’’ छोटू बोला.

‘‘मम्मी…’’ अंदर से अनमोल के चीखने की आवाज आई, तो शालिनी भागीं. वे चिल्लाते हुए बोलीं, ‘‘क्या हुआ बेटा… क्या गड़बड़ हो गई…’’

‘‘मम्मी, दूध गिर गया,’’ अनमोल चिल्ला कर बोला.

‘‘ओह, कैसे हुआ यह सब?’’ शालिनी ने गुस्से में छोटू से पूछा.

‘‘भाभी…’’

छोटू कुछ बोल पाता, उस से पहले ही शालिनी का थप्पड़ छोटू के गाल पर पड़ा, ‘‘तू ने जरूर कुछ गड़बड़ की होगी.’’

‘‘नहीं भाभी, मैं ने कुछ नहीं किया… वह अनमोल भैया…’’

‘‘चुप कर बदतमीज, झठ बोलता है,’’ शालिनी का गुस्सा फट पड़ा.

‘‘मम्मी, छोटू का कुसूर नहीं था. मुझ से ही गिलास छूट गया था,’’ अनमोल बोला.

‘‘चलो, कोई बात नहीं. तू ठीक तो है न. जलन तो नहीं हो रही न? ध्यान से काम किया कर बेटा.’’

छोटू सुबक पड़ा. बिना वजह उसे चांटा पड़ गया. उस के गोरे गालों पर शालिनी की उंगलियों के निशान छप चुके थे. जलन तो उस के गालों पर हो रही थी, लेकिन कोई पूछने वाला नहीं था.

‘‘अब रो क्यों रहा है? चल रसोईघर में. बहुत से काम करने हैं,’’ शालिनी छोटू के रोने और थप्पड़ को नजरअंदाज करते हुए लापरवाही से बोलीं.

छोटू रसोईघर में गया. कुछ देर रोता रहा. उस ने तय कर लिया कि अब इस घर में और काम नहीं करेगा. किसी अच्छे घर की तलाश करेगा.

दोपहर को खेलते समय छोटू चुपचाप घर से निकल गया. महीने की 15 तारीख हो चुकी थी. उस को पता था कि 15 दिन की तनख्वाह उसे नहीं मिलेगी. वह सीधा ब्यूरो के पास गया, इस से अच्छे घर की तलाश में.

उधर शाम होेने तक छोटू घर नहीं आया, तो शालिनी को एहसास हो गया कि छोटू भाग चुका है. उन्होंने ब्यूरो में फोन किया, ‘‘भैया, आप का भेजा हुआ छोटू तो भाग गया. इतना अच्छे से अपने बेटे की तरह रखती थी, फिर भी न जाने क्यों चला गया.’’

छोटू को नए घर और शालिनी को नए छोटू की तलाश आज भी है. दोनों की यह तलाश न जाने कब तक पूरी होगी.

 

बदलती दिशाएं : माही की बेहाल दशा का कौन था जिम्मेदार

माही बेहाल पड़ी थी. पूरे शरीर पर मारपीट के निशान पड़ चुके थे. रहरह कर दर्द की एक टीस उभरती तो वह कराह उठती. मारते समय कभी सोचता भी तो नहीं था उस का पति निहाल सिंह.

निहाल सिंह कभी माही को बालों से पकड़ कर खींचता तो कभी मारने के लिए छड़ी उठा लेता. शराब पीने के बाद तो वह बिलकुल जानवर बन जाता. फिर तो उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि उस के बच्चे अब बड़े हो चुके हैं. जब कभी उस की बेटी रूबी अपनी मां को बचाने के लिए आगे आती तो वह भी पिट जाती.

2 दिन पहले जब निहाल सिंह शराब पी कर घर में ऊलजुलूल बोलने लगा तो माही ने उसे समझाते हुए कहा था, ‘बस कीजिए, अब खाना खा लीजिए. सुबह काम पर भी जाना है.’

माही के इतना बोलने की ही देर थी कि निहाल सिंह चीखते हुए बोला, ‘अब तू रोकेगी मुझे… अभी बताता तुझे,’ फिर तो उस का हाथ न रूका.

आखिर में रूबी दोनों के बीच में आ गई और उस का हाथ पकड़ कर झटकते हुए बोली, ‘पापा, अब बस कीजिए. गलती तो आप की है, मम्मी को क्यों मार रहे हो?’

‘कितनी बार कहा है कि तू बीच में न बोला कर,’ रूबी को पीछे धकेलता हुआ निहाल सिंह फिर चीखा, ‘निकल जाओ मेरे घर से.’

माही घबरा गई. इस से पहले भी तो निहाल सिंह कई बार उसे घर से बाहर निकाल चुका था. लड़खड़ाता हुआ वह बिस्तर पर गिरा और बड़बड़ाता हुआ सो गया.

रूबी ने अपनी मां को उठाया और दूसरे कमरे में ले गई. उस के जख्मों पर दवा लगाते हुए वह बोली, ‘मम्मी, बहुत हो गया अब. पापा नहीं सुधरेंगे. ये रोजरोज के झगड़े हमें जीने नहीं देंगे.’

दर्द से कराहते हुए माही बोली, ‘हां रूबी, मैं भी अब थक चुकी हूं. मुझे समझ में आ गया है. अब मैं इन्हें कभी माफ नहीं करूंगी. ये कितना भी रोएं या गिड़गिड़ाएं, मैं इन की बातों में भी नहीं आऊंगी.’

अपने सिर पर लगी चोट को सहलाते हुए माही मन पक्का कर के बोली, ‘तुम बुलाओ पुलिस को, मैं दूंगी बयान इन के खिलाफ.’

रूबी ने झट से पुलिस का नंबर डायल किया और सारी घटना बता दी.

माही और निहाल सिंह की लव मैरिज हुई थी. घर वालों के खिलाफ जा कर माही ने निहाल सिंह का हाथ थामा था. दोनों भारत से यूरोप आ कर बस गए थे. शुरू में जब माही ने काम करना चाहा, तो निहाल सिंह ने उस से कहा था, ‘तुम मेरे घर की रानी हो, तुम घर संभालो. मैं बाहर संभालता हूं.’

माही ने इसे निहाल सिंह का अपने प्रति गहरा लगाव समझ था, मगर धीरेधीरे माही को महसूस होने लगा कि निहाल सिंह का स्वभाव दिन ब दिन बदलता जा रहा है. काम से आते ही वह शराब पीने लग जाता. तब तक उन के बच्चे भी हो चुके थे. माही ने खुद को बच्चों में बिजी कर लिया था.

जब कभी माही निहाल सिंह को बाहर जाने को कहती, तो वह मना कर देता. निहाल सिंह अब छोटीछोटी बातों पर माही पर शक करने लगा था. जब कभी काम का दबाव बढ़ जाता तो वह झल्ला कर कहता, ‘मुझ से नहीं होता इतना काम. मैं नहीं उठा सकता इतना बोझ.’

जब कभी माही नौकरी करने को कहती, तो वह उसे पीटने लगता. शराब पी कर मारपीट करना तो उस के लिए रोज की ही बात हो गई थी. बच्चे डरते हुए मां के पीछे छिप जाते थे. वे अब थोड़े बड़े भी हो गए थे. उन का स्कूल में दाखिला करवाना जरूरी हो गया था.

खर्चा बढ़ गया था तो माही ने निहाल सिंह को किसी तरह अपनी नौकरी के लिए मना लिया. वह घर का सारा काम निबटा कर ही नौकरी पर जाती और वापस आते ही बच्चों और घर को संभालने लग जाती.

माही ने कभी किसी से अपने साथ हुई मारपीट का जिक्र नहीं किया था. हां, कभीकभार उस के घर से आती मारपीट और चीखनेचिल्लाने की आवाजों से परेशान हो कर पड़ोसी खुद ही पुलिस में रिपोर्ट कर देते थे. पुलिस आती तो माही झूठ बोल कर निहाल सिंह को बचा लेती. ऐसे ही समय निकल रहा था.

निहाल सिंह प्यार भी उसे अपनी मरजी से करता, नहीं तो आधी रात को उसे मारपीट कर कमरे से निकाल देता. माही अपनी तकदीर को कोसती बच्चों के पास आ कर सो जाती.

इतना सबकुछ होने के बावजूद वह निहाल सिंह का पूरा ध्यान रखती. हर काम समय से करती. सुबह उठते ही सब से पहले उस का टिफिन तैयार करती. किसी तरह उस ने निहाल सिंह को मना कर बच्चों को साथ वाले बड़े शहर में पढ़ने के लिए भेज दिया था, ताकि वे दोनों पढ़लिख कर अच्छी नौकरी पर लग सकें. असल बात तो यह थी कि माही

उन दोनों पर पिता की गलत हरकतों का असर नहीं पड़ने देना चाहती थी.

1-2 बार पहले भी किसी बात पर गुस्सा हो कर निहाल सिंह ने माही को आधी रात में घर से बाहर निकाल दिया था. माही की मौसी का बेटा इसी शहर में रहता था. उस ने उसे फोन किया और वह माही को ले कर अपने घर चला गया. उस ने भी माही को समझाया कि यह ऐसे कभी नहीं सुधरेगा, तुम कब तक इस की मारपीट बरदाश्त करोगी.

उस ने आगे बढ़ कर पुलिस में उस की रिपोर्ट लिखवा दी. जब पुलिस निहाल सिंह को घर से उठा कर ले गई, तब माही डर गई और उस ने भाई को रिपोर्ट वापस लेने के लिए कहा. जब ऐसा 2-3 बार हुआ, तो भाई भी पीछे हट गया.

माही इसे अपनी किस्मत समझ कर समझाता कर रही थी. उसे पता था कि निहाल सिंह गुस्सैल है, पर उस के बच्चों का पिता है. वह भले ही अब उसे पहले जैसा प्यार नहीं करता, मगर उस के लिए तो आज भी वही उस का प्यार है.

तभी एक दिन निहाल सिंह काम से आते समय अपने साथ एक जवान औरत को घर ले आया. माही ने उसे देखते ही निहाल सिंह से उस के बारे में पूछा कि यह कौन है, तो उस ने बताया, ‘यह प्रीत है. इस का पति मेरे साथ काम करता था. ज्यादा शराब पीने से वह मर गया. मैं इस की मदद कर रहा हूं, क्योंकि उस के बीमा और पैंशन के बारे में इसे कुछ नहीं पता.’

माही भोली थी. वह बोली, ‘अच्छा है. आप इन की मदद कर रहे हो, वरना कौन बेगाने देश में किसी की मदद करता है.’

अब तो जब भी प्रीत का फोन आता, निहाल सिंह भागाभागा उस के पास पहुंच जाता.

एक दिन माही काम से वापस आई, तो घर का दरवाजा खोलते ही बैडरूम से किसी के हंसने की आवाज आई. अंदर अंधेरा था. बिजली का स्विच औन करते ही माही की आंखें खुली रह गईं. उस ने उन दोनों को बैड पर आपत्तिजनक हालत में देखा. लेकिन शर्मिंदा होने के बजाय दोनों हंसने लगे. इस के बाद तो माही के सामने ही सबकुछ चलने लगा.

माही का दिल टूट चुका था. इतना सब होने के बावजूद उस ने कभी नहीं सोचा था कि निहाल सिंह उसे इस तरह धोखा देगा. वह फूटफूट कर रो पड़ी. अब उस को समझ में आया कि वह क्यों उस पर शक करता था. उस ने किसी तरह खुद को संभाला और अब वह सोच में पड़ गई.

एक दिन माही को पास बिठा कर निहाल सिंह बोला, ‘तू हां करे, तो मैं इसे भी अपने साथ रख लूं?’

निहाल सिंह किस हद तक गिर गया था, माही यह सोचने को मजबूर हो गई. बच्चे पढ़लिख कर अब अच्छी नौकरी पर लग चुके थे. सिर्फ छुट्टियों में ही घर आते थे. वे मां को अपने साथ चलने को कहते, मगर वह जानती थी कि निहाल सिंह बीमारी का शिकार है. उस के खानेपीने का ध्यान उस ने ही रखना है, इसलिए वह सबकुछ बरदाश्त कर के भी उसी के साथ रह रही थी.

आजकल छुट्टियों में रूबी घर आई हुई थी. कल की हुई मारपीट के बाद माही ने रूबी को निहाल सिंह और प्रीत के संबंधों के बारे में भी बता दिया. यह सुनते ही उस का खून खौल उठा. उस ने अपने पिता के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी थी.

थोड़ी ही देर में पुलिस आ गई. रूबी और माही ने बयान दे दिया. माही की चोटें उस के साथ हुए जोरजुल्म की साफ गवाही दे रही थीं. माही ने यह भी बताया कि जब वह पेट से थी, तब निहाल सिंह ने उसे बहुत बार पीटा था.

रिपोर्ट को मजबूत बनाने के लिए पुलिस ने माही की चोट की तसवीरें खींच कर साथ लगा दीं. पुलिस निहाल सिंह को साथ ले गई. वहां 2 दिन उसे हिरासत में रखा, फिर उस को वार्निंग दे कर छोड़ दिया गया कि वह माही के आसपास भी नही फटकेगा. अगर उस ने माही को तंग किया, तो उस पर कार्यवाही की जाएगी और 2 साल की जेल भी हो सकती है. उसे एक अलग घर में रहने के लिए कहा गया.

निहाल सिंह फोन कर के बारबार माही से माफी मांगने लगा. उसे पता था कि माही का दिल पिघल जाता है. वह उसे अब भी प्यार करती है. मगर रूबी ने मां को साफसाफ कह दिया, ‘‘मम्मी, इस बार अगर तुम ने पापा को माफ किया, तो मैं कभी तुम से बात नहीं करूंगी.’’

माही ने निहाल सिंह का फोन उठाना भी बंद कर दिया.

रूबी पिता को फोन पर धमकी देते हुए बोली, ‘‘आज के बाद अगर आप ने मम्मी को फोन किया, तो आप को

2 साल की जेल हो जाएगी. आप यह बात भूलिएगा मत कि वे अब अकेली नहीं हैं. आज तक जो आप ने उन के साथ किया, उस के लिए हम तीनों आप से कोई रिश्ता नहीं रखेंगे और उन्हें इंसाफ दिलवा कर ही रहेंगे.’’

पहले निहाल सिंह गिड़गिड़ाया, फिर बेशर्मी से बोला, ‘‘मैं भी तुम लोगों से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता. आज तक मैं ने तुम दोनों की पढ़ाई पर जो भी खर्चा किया, वह मुझे वापस कर दो.’’

यह सुनते ही रूबी की आंखों में आंसू आ गए. उस का बाप इतना गिर सकता है, उस ने कभी सोचा भी नहीं था, मगर फिर भी वह हिम्मत कर अपने आंसुओं को रोकते हुए बोली, ‘‘पैसा तो हम दे देंगे, लेकिन इतने सालों तक आप ने मम्मी को जो दुख दिया है, क्या वे दिन वापस लौटा देंगे?’’ कहते हुए रूबी ने फोन रख दिया और माही की तरफ देखा, जिस की आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी.

रूबी ने झट से मां को अपने गले से लगा लिया. मगर उन्हें चुप नहीं कराया, बल्कि सालों का जो जमा सैलाब था, उसे बहने दिया.

सुरक्षाबोध: कहानी नए प्यार की

लड़के ने लड़की को मैसेज किया सुंदर से गुलाब के फूल के साथ, जिस की पंखुडि़यों पर ओस की बूंदें थीं. उस के हाथ जुड़े हुए थे और उस पर लिखा था, ‘‘बीते साल में हम से कोई गलती हुई हो तो माफ कीजिएगा. यह साथ नए वर्ष में भी बना रहे.’’

उस मैसेज को पढ़ कर लड़की ने हंसते हुए अनेक इमोजी दाग दिए.

‘‘अरे, ऐसा तो मैं ने कुछ नहीं कहा कि इतना हंसा जाए,’’ बेचारा हैरान सा हो कर रह गया. अभी सोच ही रहा था कि उधर से हंसी वाले इमोजी की एक कतार और टपक पड़ी. अगले दिन जब मुलाकात हुई तो उस ने पूछ ही लिया, ‘‘भला ऐसा क्या था मेरे मैसेज में जो तुम को हंसी आ गई, जोक तो नहीं भेजा था मैं ने.’’

लड़की फिर भी लगातार हंसे जा रही थी. उस ने थोड़ा झुक कर पेट पकड़ लिया था और दोहरी हुई जा रही थी. लड़की की विस्मय से आंखें फटी जा रही थीं.

‘‘तुम ने जोक नहीं सुनाया, यह तो सही है मगर तुम ने माफी किस बात की मांगी, यह तो बताओ,’’ लड़की ने कहा.

‘‘ऐसे ही, जानेअनजाने गलती हो जाती है. बस, इसीलिए मैं ने इंसानियत के नाते माफी मांग ली.’’

18 साल की वह लड़की देखने में पूरी तरह मौडर्न कही जा सकती थी. मिनी स्कर्ट के साथ पिंक स्लीवलैस टौप उस पर खूब फब रहा था. कंधे तक कटे बाल उस पर बहुत सूट कर रहे थे. आंखों में लगे मोटेमोटे काजल ने उन्हें और बड़ा बना दिया था. वह इतनी अदा से बोल रही थी कि लड़के की नजर उस के चेहरे से हट ही नहीं रही थी. लड़का कुछ कम स्मार्ट हो, ऐसा नहीं था. अच्छाखासा कद, चौड़े कंधे, स्टाइलिश बाल, उसे देख कर कोई भी लड़की उस पर फिदा हो सकती थी.

वे दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. कालेज औफ कैंपस था. आसपास का माहौल भी ऐसा था कि बिगड़े और कुछ लफंगे लड़के ही नजर आते थे. कालेज में सुबह से शाम तक हलचल रहती थी और किसी न किसी बात पर होहल्ला भी होता रहता था.

वे दोनों कैंटीन में थे. लड़की चल कर बड़ी टेबल तक पहुंच गई. लड़का भी उस के पीछेपीछे चला जा रहा था जैसे सूई के पीछे धागा. लड़की ने टेबल पर अपना पर्स उलट दिया, छोटेछोटे कई सामान गिर पड़े, ब्रेसलेट, ईयर रिंग, रूमाल आदि. उस ने ब्रेसलेट हाथ में उठाया और लड़के की नाक के पास ले गई. लड़के को लगा था माथे पर मारेगी तो थोड़ा पीछे हटा, लेकिन, लड़की नहीं मानी, वह उतना ही आगे झुक गई.

‘‘यह ब्रेसलेट मुझे उस ने दिया,’’ लड़की ने कहा.

‘‘हकलाते हुए उस ने बोला, ‘‘किस ने?’’

‘‘वह जो फर्स्ट रौ में सब से लास्ट में बैठता है.’’

‘‘अच्छाअच्छा वह तो…’’ लड़के ने राहत की सांस ली. लेकिन अगले ही पल लड़की ने परफ्यूम उठा लिया और दाएंबाएं शीशी नचाने लगी. पास आते हुए बोली, ‘‘यह मुझे उस ने दिया.’’

‘‘किस ने?’’ लड़का फिर घबरा गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि उस की सांस क्यों तेज चल रही है.

‘‘वही जिस के बाजू पर टैटू है,’’ लड़की बोली, ‘‘और कुछ कहा भी, सुनना चाहोगे?’’

लड़का हकलाने लगा था, ‘‘हां, ब…ब… बताओ… क क क्या कहा था उस ने?’’

‘‘न्यू ईयर गिफ्ट जानेमन,’’ लड़की ने बताया.

लड़के की आंखों की पुतलियां फैल गईं, ‘‘उस ने ऐसा कहा?’’

लड़की अब एक के बाद एक आइटम उठाउठा कर लड़के की आंखों के सामने नचा रही थी और देने वाले का बखान भी कर रही थी.

फिर, लड़की एकदम गंभीर हो गई.

‘‘तुम लड़के क्या समझते हो? मित्रता क्या है?’’

लड़का मौन था. जैसे सांप सूंघ गया हो. उसे लड़की की ओर देखने के अलावा कुछ और सूझ नहीं रहा था. न सूझने के कारण ही वह अवाक था. ऐसा लगने लगा जैसे उस की आंखें 2 बटन की तरह लड़की के चेहरे पर टांक दी गई थीं.

लड़की अब तटस्थ हो चली थी, ‘‘तुम लड़के हम से मित्रता करते ही क्यों हो? क्योंकि यह एक अच्छा टाइमपास है?’’ उस ने अपना मुंह दूसरी ओर घुमा लिया.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है,’’ लड़का मुश्किल से बस इतना ही बोल पाया.

‘‘तो फिर बताओ,’’ लड़की अब काफी नजदीक आ गई थी. उस का चेहरा फिर लड़के के चेहरे के बिलकुल सामने था जैसे कि उस की आंखें लड़के की आंखों में कूदी जा रही थीं.

‘‘तुम ने कभी इन सब को रोका क्यों नहीं, तुम तो जानते थे कि ये सब मुझे तंग करते हैं या नहीं, जानते थे. बोलो?’’ उस के हाथ से चुटकी बजी.

‘‘हां, थोड़ा तो…’’ लड़के ने जवाब दिया.

‘‘तो फिर?’’ लड़की ने उसे घूरते हुए कहा.

‘‘सौरी,’’ लड़का झिझकते हुए बोला.

‘‘सौरी क्यों बोल रहे हो,’’ लड़की ने आश्चर्य से उस की ओर देखते हुए कहा.

‘‘मुझे इन सब के बारे में पता नहीं था लेकिन जब मैं उन सब को तुम्हारी तरह देखता, तो मुझे लगता था जैसे तुम्हें यह अटैंशन अच्छी लगती है.’’

‘‘क्या, सच में?’’

‘‘हां, पर सच अब जान पाया हूं और गलती का एहसास हो रहा है.’’

लड़के को फिर से कुछ सूझ नहीं रहा था. कुछ न सूझने की यह बीमारी उस की एकदम नई थी. बेचारा सही अर्थों में मिट्टी का माधो हो गया था. वैसे लड़का था मेधावी. हमेशा मैरिट लिस्ट में रहता था. स्कूल के दिनों में ऐथलीट भी रहा. लेकिन इधर कालेज में आने के बाद किताबी कीड़ा हो गया था. पिता की बेकरी शौप पर भी कभीकभी बैठ लेता था. ग्राहकों से मिठयामिठया कर बोलता. वैसे कोई ऐब नहीं था लड़के में. बस, दिन में 2-4 मैसेज वह लड़की को कर ही देता था. उस का हालचाल पूछता, गुडमौर्निंग और गुडनाइट के अलावा फलानेढिमकाने दिवस की शुभकामनाएं देता रहता और हां, उस की डीपी को एकांत में जूम कर के देखा करता.

शायद लड़का लड़की को मन ही मन चाहता था पर बेचारा बोलने से घबरा जाता. उसे लगता, कहीं जितनी बात होती है वह भी बंद न हो जाए.

इधर लड़की को भी लड़के की संजीदगी पसंद थी. लड़की के सामने आने पर वह मुसकरा कर रह जाता, कभीकभी हाय बोलता. कभी अधिक बात नहीं करता था. यही उस की एक बात थी जो लड़की को अच्छी लगती थी. वह चाहती थी इस घोंचू से कुछ कहे, मगर क्यों कहे, क्या उसे खुद नहीं दिखाई देता?

जब परफ्यूम वाले लड़के ने परफ्यूम गिफ्ट किया था और जानेमन कहा था तो सातों समंदर उस के अंदर खौल पड़े थे, फिर भी वह ऊपर से शांत पानी थी. लहर का कोई निशान नहीं. निर्भया के साथ क्या हुआ इधर हैदराबाद में वेटेरिनरी डाक्टर का भी कैसा हाल हुआ था. उन्नाव में भी… तभी उसे उस लड़की का चेहरा याद आ गया. वह किसी से मदद नहीं मांग सकती. हां, यह लड़का है न, कुछ और नहीं तो कम से कम उस के साथ चल तो सकता है, उन से बात कर सकता है समझा सकता है. लेकिन लड़के ने ऐसा कुछ नहीं किया. वह किसी तरह व्हाट्सऐप नंबर पा गया था और इतने में ही खुश था. लड़की ने लंबी सांस ली और बताया, ‘‘मैं अब क्लासेस अटैंड नहीं करूंगी.’’

‘‘क्यों?’’ लड़के ने पूछा.

‘‘डर लगता है कहीं मैं भी… निर्भया…डाक्टर… उन्नाव… समझ गए न? मुझे इस माहौल में डर लगता है कभीकभी.’’

‘‘चुप,’’ न जाने कैसे लड़के का हाथ लड़की के मुंह तक चला गया. लड़की की आंखों में 2 बूंदें आंसू की छलक आई थीं. इस बार सातों समंदर में एकसाथ ज्वार आया था.

‘‘मैं वादा करता हूं,’’ लड़का अब तक स्वयं को संतुलित कर चुका था. ‘‘तुम्हारी सुरक्षा अब मेरी जिम्मेदारी है. तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा. तुम्हें अब से कोई तंग नहीं करेगा,’’ कहते हुए लड़का एक समझदार वयस्क की तरह पेश आ रहा था.

लड़की अब सुबकने लगी थी. उस ने लड़के का हाथ अपने मुंह से हटा दिया, ‘‘मगर वे तुम्हें कुछ करेंगे तो नहीं? झगड़ा मत करना प्लीज’’ लड़की को अब एक अलग तरह का डर सताने लगा था.

‘‘मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा,’’ उस ने लड़की का हाथ अपने हाथ में ले लिया, ‘‘मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे साथ रहूंगा, देखूंगा तुम्हें कोई तंग न करे, तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा, बस.’’

‘‘सच?’’ लड़की खुश थी. उस ने लड़के के कंधे को अपने सिर से हलका धक्का दिया, ‘‘जाओ, अब माफ किया.’’

‘‘हैं?’’ लड़का फिर हैरान था.

‘‘नए साल में अगर मुझ से कोई गलती हो गई हो तो प्लीज मुझे माफ करना. यह साथ यों ही बना रहे,’’ कहते हुए लड़की के मुंह से फूल और सितारे झड़ रहे थे जो सीधे धरती से आकाश तक फैल गए थे. लड़का लड़की को खुश देख कर खुश था.

बस, और नहीं : क्या रीमा कभी समझ पाई शादीशुदा जिंदगी को

रीमा के ब्याह को 2 साल होने जा रहे थे, लेकिन आज तक वह खुद को इस सोच से बाहर नहीं निकाल पाई थी कि आखिर उस का पति रोशन उस से प्यार करता भी है या नहीं या फिर सिर्फ प्यार और पति धर्म निभाने की महज ऐक्टिंग ही करता है, क्योंकि अगर रोशन सचमुच उस से प्यार करता, तो कभी भी वह छोटीछोटी बातों पर उसे खरीखोटी नहीं सुनाता, जराजरा सी बात पर वह अपना आपा नहीं खोता.

कभीकभार की बात होती तो शायद रीमा के मन में यह विचार आता ही नहीं, लेकिन अब आएदिन गालीगलौज, लड़ाई?ागड़ा यह सब तो रोशन की आदत में ही शुमार हो गया था.

अपने पति से प्यार पाने की चाह में रीमा ने क्याकुछ नहीं किया. उस ने वह सब किया, जो अकसर ज्यादातर पत्नियां कभी खुशी से, तो कभी मजबूरी में किया करती हैं.

रीमा ने भी घर की सुखशांति, पति का प्यार और अपनी शादीशुदा जिंदगी को खुशहाल बनाने के लिए पूजा, हवन, व्रत जिस ने जो कहा, जैसा करने को कहा, इन 2 सालों में वह सारे जतन कर डाले, लेकिन नतीजा ज्यों का त्यों ही बना रहा. रोशन के बरताव में रत्तीभर भी कोई बदलाव नहीं हुआ.

अलबत्ता, समय के साथसाथ रोशन का बरताव रीमा के संग और ज्यादा खराब होने लगा था. रीमा भी इसे अपनी किस्मत मान कर सम?ाता करती चली जा रही थी. वह रोशन के जोरजुल्म को चुपचाप सहती जा रही थी.

आमतौर पर देखा गया है कि हर दुख, जोरजुल्म सहने के बाद भी औरतें अपने पति के खिलाफ आवाज नहीं उठाती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उन का बसाबसाया घर टूट जाएगा, उन की जगहंसाई होगी और इस समाज में उन का इज्जत से जीना दूभर हो जाएगा.

रीमा पढ़ीलिखी और कामकाजी होने के बावजूद इसी सोच के तले दबी हुई थी और यही वजह थी कि वह रोशन की जीवनसंगिनी और बराबर की हकदार होने के बावजूद रोशन के लिए पैर की जूती से ज्यादा कुछ नहीं थी.

रोशन का जब मन करता, वह रीमा पर चीखनेचिल्लाने लगता. यहां तक कि कभीकभार वह हाथ चलाने से भी गुरेज न करता, लेकिन इतना था कि हाथापाई के दौरान अगर कभी रीमा को चोट लग जाती या कभी अचानक उस की तबीयत खराब हो जाती, तो वह रीमा को फौरन डाक्टर के पास ले कर जाता, उस की मरहमपट्टी कराता, उस का पूरा इलाज कराता. रीमा का पूरा खयाल रखता.

इसे देख कर आसपड़ोस के लोग कहते, ‘रीमा का पति भले ही गुस्से वाला है, लेकिन रीमा का कितना ध्यान रखता है, उस से कितना प्यार करता है.’

आसपास के लोगों की बातें सुन कर रीमा खुद भी यह मान बैठती कि उस का पति चाहे उस पर कितना भी जुल्म क्यों न करता हो, पर खयाल भी तो वही रखता है. उस से प्यार भी करता है.

रीमा के मन में जब भी ऐसे विचार आते, तब उस का दिमाग उस से कहता, ‘तेरा पति तु?ो से कैसा प्यार करता है? उस का जब जी चाहता है, गालीगलौज करता है, मारतापीटता है. रात को तेरा मन रहे या न रहे, पर वह अपनी मर्दानगी तुझ पर दिखाता है, तु?ो नोंचताखसोटता है.

‘छि:… क्या इसे ही प्यार कहते हैं. अगर यही प्यार है तो वह तु?ो प्यार न करे, वही अच्छा है. प्यार करना और खयाल रखना दोनों अलगअलग है…’

रीमा के दिल और दिमाग के सामने यह सवाल फन फैलाए खड़ा हो जाता कि उस का पति उस से प्यार करता भी है या नहीं?

आज सुबहसुबह घर के सारे काम निबटा कर रीमा आईने के सामने खड़ी स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी कि अचानक रोशन उस के सामने आ खड़ा हुआ और उस पर चिल्लाने लगा, ‘‘तुम स्कूल में बच्चों को पढ़ाने जाती हो या फैशन परेड में… या फिर अपने जिस्म की नुमाइश करने? इतना ज्यादा चेहरे को लीपपोत कर और बनठन कर स्कूल जाने की जरूरत ही क्या है? किस को दिखाने के लिए यह सारा ताम?ाम है?’’

रोशन से यह सब सुन कर रीमा कुछ सम?ा ही नहीं पाई कि वह क्या कहे. वह तो रोज ऐसे ही तैयार होती है, फिर आज ऐसा क्या हो गया?

रीमा शांत भाव से बोली, ‘‘क्यों, क्या हुआ…? मैं तो रोज ऐसे ही स्कूल जाती हूं.’’

रीमा का इतना कहना था कि रोशन उस पर भड़क गया और रीमा के सिर के बालों को अपनी मुट्ठी में लेते हुए बोला, ‘‘वही तो मैं कह रहा हूं कि तुम रोज इतना मेकअप कर के स्कूल क्यों जाती हो?’’

रीमा खुद को छुड़ाते हुए बोली, ‘‘अरे, कैसी बातें करते हैं? मैं ने कहां मेकअप किया है. वर्क प्लेस में थोड़ा तो प्रैजेंटेबल दिखना पड़ेगा न. ऐसे ही मुंह उठा कर तो मैं स्कूल नहीं जा सकती न.’’

रोशन शायद रीमा से यही सुनना चाहता था, क्योंकि रीमा के ऐसा कहते ही रोशन बोला, ‘‘अगर वर्क प्लेस में प्रैजेंटेबल दिखना जरूरी है, तो तुम नौकरी छोड़ क्यों नहीं देती हो? मैं अच्छाखासा कमाता हूं, तो तुम्हें नौकरी करने की क्या जरूरत है?’’

शादी के बाद से ही रोशन लगातार इसी बात पर जोर दे रहा था कि रीमा अपनी नौकरी छोड़ दे, लेकिन रीमा अपनी जिद पर अड़ी हुई थी कि वह किसी भी हालत में नौकरी नहीं छोड़ेगी. आज इसी बात को ले कर दोनों के बीच फिर ?ागड़ा छिड़ गया और रोशन गालीगलौज पर उतर आया था.

स्कूल के लिए देरी हो रही थी, इसलिए रीमा इस समय बेकार के ?ागड़े में पड़ कर अपना समय खराब नहीं करना चाहती थी और रोशन के हाथों को ?ाटक कर वह घर से स्कूल के लिए निकल गई. रोशन चिल्लाता रह गया.

सारे रास्ते रीमा का मन बस उसे यही सम?ाने में लगा हुआ था कि आखिर उस की नौकरी कौन सी सरकारी है? वह प्राइवेट स्कूल में एक टीचर ही तो है, फिर घर की शांति और पति से बढ़ कर नौकरी थोड़े होती है. वह नौकरी छोड़ क्यों नहीं देती? वह क्यों बेकार में नौकरी करने की हठ पकड़े हुए है? नौकरी थोड़े ही घर पर आएदिन हो रहे ?ागड़ों पर रोक लग जाएगी और वह सुकून से जिंदगी जी पाएगी.

बारबार रीमा का मन नौकरी छोड़ने का कर रहा था, इसलिए हार कर रीमा ने नौकरी से इस्तीफा देने का मन बना लिया. उस ने सोचा कि अगर नौकरी छोड़ने से घर की शांति, मन का सुकून और पति का प्यार सब मिल सकता है, तो हायहाय कर के नौकरी करने का क्या फायदा?

नौकरी से इस्तीफा देने का फैसला ले कर रीमा स्कूल पहुंची. जब वह स्टाफरूम पहुंची, तो उस ने पाया कि सभी टीचर अपनीअपनी क्लास लेने जा चुके हैं. केवल रीमा की पक्की सहेली श्रावणी बैठी हुई थी, क्योंकि उस का क्लास ब्रेक था.

रीमा को देखते ही श्रावणी को यह सम?ाने में समय नहीं लगा कि रीमा का अपने पति के संग ?ागड़ा हुआ है.

रीमा के बैठते ही श्रावणी बोली, ‘‘चेहरे पर बारह क्यों बजे हैं? आज फिर हो गया क्या पति से ?ागड़ा?’’

श्रावणी के ऐसा कहने पर लंबी सांसें लेते हुए रीमा बोली, ‘‘अब मैं तु?ो क्या बताऊं यार, आज फिर रोशन बेवजह मु?ा पर नाराज होने लगे, गालीगलौज करने लगे और मेरे बालों को पकड़ कर

इतना जोर से खींचा कि अब तक मेरे सिर में दर्द हो रहा है. मैं तो सम?ा ही नहीं पाती हूं कि आखिर रोशन मु?ा से चाहते क्या हैं?

‘‘लेकिन, अब मैं ने भी सोच लिया है कि इस रोजरोज के ?ां?ाट से छुटकारा पाने का बस एक ही रास्ता है कि मैं यह नौकरी ही छोड़ दूं. कम से कम रोशन से मेरा रिश्ता तो सुधर जाएगा.’’

रीमा की बातें सुन कर श्रावणी ने अपना सिर पकड़ लिया और उसे डांटते हुए बोली, ‘‘तेरा दिमाग तो ठिकाने पर है न… नौकरी छोड़ने की बात तेरे दिमाग में आई तो आई कैसे… और, तु?ो क्या लगता है कि तू नौकरी छोड़ देगी, तो तेरा पति तु?ो गाली देना बंद कर देगा? तु?ो पीटना छोड़ देगा? तू अपने पति की प्रेमिका बन जाएगी?

‘‘ऐसा कुछ भी नहीं होगा. अभी भी समय है कि अपनी आंखें खोल. अपने साथ हो रही इस नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठा. इस तरह कब तक तू अपने पति के हाथों की कठपुतली बनी रहेगी?’’

श्रावणी के इतना सब कहने के बावजूद रीमा पर इस का कोई असर नहीं हुआ और वह अपनी शादीशुदा जिंदगी को बचाए रखने के लिए नौकरी छोड़ने के लिए तैयार थी.

असल में रीमा के दिलोदिमाग में अपनी मां की कही वे बातें बैठी हुई थीं, जो सालों से सुनती आ रही थी, ‘‘अपने घरपरिवार के लिए औरत को सबकुछ सहना ही पड़ता है. घर उसी औरत का बनता है, जो अपनी खुशियों को छोड़ कर हर तरह के दुखों और मुसीबतों को सहती है.’’

रीमा पढ़ीलिखी, कामकाजी और अपने पैरों पर खड़ी होने के बावजूद सदियों से खींची गई उस लक्ष्मण रेखा को लांघ नहीं पा रही थी, जो समाज द्वारा केवल और केवल औरत को अपने काबू में रखने के लिए बनाई गई थी.

शाम को जब रीमा घर पहुंची, तो रोशन शराब के नशे में चूर उस के स्कूल से लौटने का इंतजार कर रहा था, क्योंकि रीमा सुबह उस का हाथ ?ाटक कर जो घर से निकल गई थी.

रीमा के घर के भीतर आते ही रोशन उस पर भड़क उठा, उसे भलाबुरा कहने लगा और गंदीगंदी गालियां देने लगा.

कुछ देर तक तो रीमा सुनती रही, लेकिन जब उस के बरदाश्त से बाहर हो गया, तो वह भी पलट कर जवाब देने लगी और दोनों के बीच ?ागड़ा बढ़ता चला गया. तभी अचानक रोशन रीमा को उस के बालों से पकड़ कर खींचता हुआ घर के आंगन में ले आया, उसे भद्दी और गंदी गालियां देने लगा, जिसे सुन कर आसपड़ोस के लोग वहां इकट्ठा हो गए, जिन में कुछ बड़ी, तो कुछ छोटी लड़कियां भी थीं.

कुछ ही देर बाद देखते ही देखते रोशन ने अपनी बैल्ट निकाल ली और रीमा को पीटने लगा, जिसे देख कर वहां खड़ी लड़कियां सहम गईं. उन की आंखों में डर साफ नजर आ रहा था.

यह देख कर अचानक रीमा ने रोशन के हाथों से बैल्ट छीन ली और रोशन पर पलटवार कर दिया, क्योंकि रीमा वहां पर खड़ी डरीसहमी लड़कियों के सामने यह उदाहरण पेश नहीं करना चाहती थी कि पति चाहे जो करे, सहना करना पत्नी का धर्म है.

रोशन की पिटाई होते देख वहां जमा छोटीबड़ी लड़कियों की आंखों में चमक आ गई और कुछ ऐसी औरतें जो मर्दों के जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने में खुद को कमजोर पाती थीं, के होंठों पर भी दबी हुई मुसकान उभर आई.

कई मर्दऔरत ऐसे भी वहां मौजूद थे, जो रीमा की इस हरकत पर बुदबुदा रहे थे, कानाफूसी कर रहे थे, रीमा को बेशर्म और न जाने क्याक्या कह रहे थे, लेकिन रीमा उन सभी की परवाह किए बगैर आज अपने पति रोशन के जोरजुल्म के खिलाफ पूरे दमखम के साथ खड़ी थी.

साथ ही साथ, रीमा अब यह फैसला भी ले चुकी थी कि वह रोशन के लिए, अपने घरपरिवार को एकतरफा बचाने की जद्दोजेहद और समाज द्वारा बनाए गए दकियानूसी नियमों को बस और नहीं सहेगी और न ही इन सभी के लिए अपनी नौकरी छोड़ेगी. वह अब दुनिया को एक मजबूत औरत बन कर दिखाएगी.

हवेली : गीता के दम तोड़ते एहसास

‘साड्डा चिडि़यां दा चंबा वे… बाबुल, असां उड़ जाना…’ यानी हे पिता, हम लड़कियों का अपने पिता के घर में रहना चिडि़यों के घोंसले में पल रहे नन्हे चूजों के समान होता है, जो जल्द ही बड़े हो कर उड़ जाते हैं. हे पिता, हमें तो बिछुड़ जाना है.

लोग कहते हैं कि हमारे लोकगीतों में जिंदगी के दुखदर्द की सचाई बयान होती है, मगर गीता के लिए इस लोकगीत का मतलब गलत साबित हुआ था. आसपास की सभी लड़कियां ससुराल जा कर अपनेअपने परिवार में रम गई थीं, मगर गीता ने यों ही सारी जिंदगी निकाल दी. इस तनहा जिंदगी का बोझ ढोतेढोते गीता के सारे एहसास मर चुके थे. कोई अरमान नहीं था. अपनी अधेड़ उम्र तक उसे अपने सपनों के राजकुमार का इंतजार रहा, मगर अब तो उस के बालों में पूरी सफेदी उतर चुकी थी. आसपड़ोस के लोगों के सहारे ही अब उस के दिन कट रहे थे.

एक वक्त था, जब इसी हवेली में गीता का हंसताखेलता भरापूरा परिवार था. अब तो यहां केवल गीता है और उस की पकी हुई गम से भरी जवानी व लगातार खंडहर होती जा रही यह पुरानी हवेली. गीता की कहानी इसी खस्ताहाल हवेली से शुरू होती है और उस का खात्मा भी यहीं होना तय है.

‘साड्डी लंबी उडारी वे… बाबुल, असां उड़ जाना…’ यानी हमारी उड़ान बहुत लंबी है. ससुराल का घर बहुत दूर लगता है, चाहे वह कुछ कोस की दूरी पर ही क्यों न हो. हे पिता, हमें बिछुड़ जाना है.

गीता की शादी बहुत धूमधाम से हुई थी. बड़ेबड़े पंडाल लगाए गए थे. हजारों की तादाद में घराती और बराती इकट्ठा हुए थे. ऐसेऐसे पकवान बनाए गए थे, जो फाइवस्टार होटलों में भी कभी न बने हों. 10 किस्म के पुलाव थे, 5 किस्म के चिकन, बेहिसाब फलजूस, विलायती शराब की हजारों बोतलें पीपी कर लोग सारी रात झूमते रहे थे.

एक हफ्ते तक समारोह चलता रहा था. दनादन फोटो और वीडियो रीलें बनी थीं, जिन में गर्व से इतराते जवान दूल्हे और शरमाई दुलहन के साथ सभी रिश्तेदार खुशी से चिपक कर खड़े थे. गीता को तब पता नहीं था कि एक साल के अंदर ही उस की बदनामी होने वाली है.

‘कित्ती रोरो तैयारी वे… बाबुल, असां उड़ जाना…’ यानी शादी होने के बाद मैं ने बिलखबिलख कर ससुराल जाने की तैयारी कर ली है. हर किसी की आंखों में आंसू हैं. हे पिता, हमें बिछुड़ जाना है.

गीता का चेहरा शर्म से लाल सुर्ख हुआ जा रहा था और वह अंदर से इतनी ज्यादा खुश थी कि एक बहुत बड़े रईस परिवार से अब जुड़ गई थी. 2 महीने बाद उसे अपने पति के साथ लंदन जाना था. लड़के के परिवार वाले भी बेहद खुश दिख रहे थे. दूल्हा बड़ी शान से एक सजे हुए विशाल हाथी पर बैठ कर आया था. फूलों से लदी एक काली सुंदर चमचमाती लंबी लिमोजिन कार गीता की डोली ले जाने के लिए सजीसंवरी उस के पीछेपीछे आई थी.

लड़के का पिता अपने इलाके का बहुत बड़ा जमींदार था. उस ने भारी रोबदार लहजे में गीता के पिता से कहा था, ‘मेरे लिए कोई खास माने नहीं रखता कि तुम अपनी बेटी को दहेज में क्या देते हो. हमारे पास सबकुछ है. हमारी बरात का स्वागत कुछ ऐसे तरीके से कीजिएगा कि सदियों तक लोग याद रखें कि चौधरी धर्मदेव के बेटे की शादी में गए थे.’ लोग तो उस शानदार शादी को आसानी से भूल गए थे. आजकल तकरीबन सभी शादियां ऐसी ही सजधज से होती हैं. पर गीता को कुछ नहीं भूला था. उस के दूल्हे ने पहली रात को उसे हजारों सब्जबाग दिखाए थे.

शादी के बाद एक महीना कैसे बीता, पता ही नहीं चला. गीता के तो पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे. वह पगलाई सी उस रस के लोभी भंवरे के साथ भारत के हर हिल स्टेशन पर घूमती रही, शादी को बिना रजिस्टर कराए. गीता के पति को एक दिन अचानक लंदन जाना पड़ा. कुछ महीनों बाद तक यह सारा माजरा गीता के परिवार वालों की समझ में नहीं आया. गीता तो कुछ ज्यादा ही हवा में थी कि विदेश जा कर यह कोर्स करेगी, वह काम करेगी.

कुछ दिनों तक गीता मायके में रही. ससुराल से कोई खोजखबर नहीं मिल पा रही थी. गीता का पति जो फोन नंबर उसे दे गया था, वह फर्जी था. लोगों को दो और दो जोड़ कर पांच बनाते देर नहीं लगती. अखबारों को भनक लगी, तो उन्होंने मिर्चमसाला लगा कर गीता के नाम पर बहुत कीचड़ उछाला. पत्रकारों को भी मौका मिल गया था अपनी भड़ास निकालने का. कहने लगे कि लालच के मारे ये

मिडिल क्लास लोग बिना कोई पूछताछ किए विदेशी दूल्हों के साथ अपनी लड़कियां बांध देते हैं. ये एनआरआई रईस 2-3 महीने जवान लड़की का जिस्मानी शोषण कर के फुर्र हो जाते हैं, फिर सारी उम्र ये लड़कियां विधवाओं से भी गईगुजरी जिंदगी बसर करती हैं. आने वाले समय में जिंदगी ने जो कड़वे अनुभव गीता को दिए थे, वे उस के लिए पलपल मौत की तरफ ले जाने वाले कदम थे. उस के मातापिता ने शादी में 25 लाख रुपए खर्च कर दिए थे और क्याकुछ नहीं दिया था. एक बड़ी कार भी उसे दहेज में दी थी.

खैर, 2-3 महीने बाद एक नया नाटक सामने आया. गीता के बैंक खाते में पति ने कुछ पैसे जमा किए. अब वह उसे हर महीने कुछ रुपए भेजने लगा था, ताकि पैसे के लिए ही सही गीता उस के खिलाफ कोई होहल्ला न करे. गीता के पिता ने कुछ रिश्तेदारों को साथ ले कर उस की ससुराल जा कर खोजबीन की.

पता चला कि लड़का तो लंदन में पहले से ही शादीशुदा है. यह बात उस ने अपने मांबाप से भी छिपाई थी. कुछ अरसा पहले उस ने अपनी मकान मालकिन से ही शादी कर ली थी, ताकि वहां का परमानैंट वीजा लग जाए. बाद में उस से पीछा छुड़वा कर वह गीता से शादी करने से 7 महीने पहले एक और रूसी गोरी मेम से कोर्ट में शादी रचा चुका था. गीता के साथ तो उस ने अपने मांबाप को खुश रखने के लिए शादी की थी, ताकि वह सारी उम्र उन की ही सेवा में लगी रहे.

इस मामले में गीता के घर वाले उस की ससुराल वालों को फंसा सकते थे, मगर यह इतना आसान नहीं था. गीता के मांबाप ने उस के ससुराल पक्ष पर सामाजिक दबाव बढ़ाना शुरू किया और अदालत का डर दिखाया, तो वे 5 लाख रुपए दे कर गीता से पीछा छुड़ाने का औफर ले कर आ गए. गीता की शादी भारत में रजिस्टर नहीं हुई थी और इंगलैंड में उस की कोई कानूनी मंजूरी नहीं थी, इसलिए गीता के घर वाले उस के पति का कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे, जिस ने गीता के साथ यह घिनौना मजाक किया था.

गीता के ससुराल वाले चाहते थे कि एक महीने तक उन के बेटे को जो गीता ने सैक्स सर्विस दी थी, उस का बिल 5 लाख रुपए बनता है. वह ले कर गीता दूसरी शादी करने को आजाद थी. वे बाकायदा तलाक दिलाने का वादा कर रहे थे. अब गीता का पति उन के हाथ आने वाला नहीं था.

तब गीता की ससुराल वालों ने उस के परिवार को एक दूसरी योजना बताई. गीता का देवर अभी कुंआरा ही था. उन्होंने सुझाया कि गीता चाहे तो उस के साथ शादी कर सकती है. ऐसा खासतौर पर तब किया जाता है, जब पति की मौत हो जाए. गीता की मरजी के बिना ही उस की जिंदगी को ले कर अजीबअजीब किस्म के करार किए जा रहे थे और वह हर बार मना कर देती. कोई उस के दिल के भीतर टटोल कर नहीं देख रहा था कि उसे क्या चाहिए.

फिर कुछ महीनों बाद गीता की ससुराल वालों का यह प्रस्ताव आया कि गीता के परिवार वाले 10 लाख रुपए का इंतजाम करें और गीता को उस के पति के पास लंदन भेज दें. शायद गीता के पति का मन अपनी विदेशी मेम से भर चुका था और वह गीता को बीवी बना कर रखने को तैयार हो गया था. गीता के सामने हर बार इतने अटपटे प्रस्ताव रखे जाते थे कि उस का खून खौल उठता था. शुरू में तो गीता को लगता था कि उस के परिवार वाले उस के लिए कितने चिंतित हैं और वे उस की पटरी से उतरी हुई गाड़ी को ठीक चढ़ा ही देंगे, मगर फिर उन की पिछड़ी सोच पर गीता को खीज भरी झुंझलाहट होने लगी थी.

गीता अपने दुखों का पक्का इलाज चाहती थी. समझौते वाली जिंदगी उसे पसंद नहीं थी. वह हाड़मांस की बनी एक औरत थी और इस तरह का कोई समझौता उस की खराब शादी को ठीक नहीं कर सकता था. अब गीता के मांबाप के पास इतना पैसा नहीं था कि वे उसे लंदन भेज सकें, ताकि गीता उस आदमी को पा सके. मगर पिछले 3 साल से वह भारत नहीं आया था और ऐसा कोई कानून नहीं था कि गीता के परिवार वाले उसे कोई कानूनी नोटिस भिजवा सकें.

गीता के मांबाप ने कोर्ट में केस दायर कर दिया था. वे अपने 25 लाख रुपए वापस चाहते थे, जो उन्होंने गीता की शादी में खर्च किए थे. गीता के लिए तो यह सब एक खौफनाक सपने की तरह था. वह पैसा नहीं चाहती थी. वह अपने बेवफा पति को भी वापस नहीं चाहती थी.

गीता क्या चाहती थी, यह उस की कच्ची समझ में तब नहीं आ रहा था. हर कोई अपनी लड़ाई लड़ने में मसरूफ था. किसी ने यह नहीं सोचा था कि गीता की उम्र निकलती जा रही है, उस के मांबाप बूढ़े होते जा रहे हैं. कोई सगा भाई भी नहीं है, जो बुढ़ापे में गीता की देखभाल करेगा.

अदालत के केस में फंसे गीता के पिता की सारी जमापूंजी खत्म हो गई. गीता की ससुराल वालों के पास खूब पैसा था. केस लटकता जा रहा था और एक दिन गीता के पिता ने तंग आ कर खेत में पेड़ से लटक कर जान दे दी. मां ने 3-4 साल तक गीता के साथ कचहरी की तारीखें भुगतीं, मगर एक दिन वे भी नहीं रहीं.

अब अपनी लड़ाई लड़ने को अकेली रह गई थी अधेड़ गीता. खेतों से जो पैदावार आती थी, वह इतनी ज्यादा नहीं थी कि लालची वकीलों को मोटी फीस दी जा सके. थकहार कर गीता ने कचहरी जाना ही छोड़ दिया. वह अपनी ससुराल वालों की दी गई हर पेशकश या समझौते को मना करती रही. एकएक कर के गीता के साथ के सभी लोग मरखप गए.

हवेली का रंगरूप बिगड़ता गया. अब इस कसबे में नए बाशिंदे आ कर बसने लगे थे. सरकार ने जब इस क्षेत्र को स्पैशल इकोनौमिक जोन बनाया, तो आसपास के खेतों में कारखाने खुलने लगे. उन में काम करने वालों के लिए गीता की हवेली सब से सस्ती जगह थी. गीता किराए के सहारे ही हवेली का थोड़ाबहुत रखरखाव कर रही थी. अपने बारे में तो उस ने कब से सोचना छोड़ दिया था.

ऐसा लग रहा था कि गीता और हवेली में एक प्रतियोगिता चल रही थी कि कौन पहले मिट्टी में मिलेगी.

हम बेवफा न थे : अख्तर के दिल की आवाज

‘‘अरे, आप लोग यहां क्या कर रहे हैं? सब लोग वहां आप दोनों के इंतजार में खड़े हैं,’’ हमशां ने अपने भैया और होने वाली भाभी को एक कोने में खड़े देख कर पूछा.

‘‘बस कुछ नहीं, ऐसे ही…’’ हमशां की होने वाली भाभी बोलीं.

‘‘पर भैया, आप तो ऐसे छिपने वाले नहीं थे…’’ हमशां ने हंसते हुए पूछा.

‘काश हमशां, तुम जान पातीं कि मैं आज कितना उदास हूं, मगर मैं चाह कर भी तुम्हें नहीं बता सकता,’ इतना सोच कर हमशां का भाई अख्तर लोगों के स्वागत के लिए दरवाजे पर आ कर खड़ा हो गया.

तभी अख्तर की नजर सामने से आती निदा पर पड़ी जो पहले कभी उसी की मंगेतर थी. वह उसे लाख भुलाने के बावजूद भी भूल नहीं पाया था.

‘‘हैलो अंकल, कैसे हैं आप?’’ निदा ने अख्तर के अब्बू से पूछा.

‘‘बेटी, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ अख्तर के अब्बू ने प्यार से जवाब दिया.

‘‘हैलो अख्तर, मंगनी मुबारक हो. और कितनी बार मंगनी करने की कसम खा रखी है?’’ निदा ने सवाल दागा.

‘‘यह तुम क्या कह रही हो? मैं तो कुछ नहीं जानता कि हमारी मंगनी क्यों टूटी. पता नहीं, तुम्हारे घर वालों को मुझ में क्या बुराई नजर आई,’’ अख्तर ने जवाब दिया.

‘‘बस मिस्टर अख्तर, आप जैसे लोग ही दुनिया को धोखा देते फिरते हैं और हमारे जैसे लोग धोखा खाते रहते हैं,’’ इतना कह कर निदा गुस्से में वहां से चली गई.

सामने स्टेज पर मंगनी की तैयारी पूरे जोरशोर से हो रही थी. सब लोग एकदूसरे से बातें करते नजर आ रहे थे. तभी निदा ने हमशां को देखा, जो उसी की तरफ दौड़ी चली आ रही थी.

‘‘निदा, आप आ गईं. मैं तो सोच रही थी कि आप भी उन लड़कियों जैसी होंगी, जो मंगनी टूटने के बाद रिश्ता तोड़ लेती हैं,’’ हमशां बोली.

‘‘हमशां, मैं उन में से नहीं हूं. यह सब तो हालात की वजह से हुआ है…’’ निदा उदास हो कर बोली, ‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि वह लड़की कौन है जो तुम लोगों को पसंद आई है?’’

‘‘हां, क्यों नहीं. वह देखो, सामने स्टेज की तरफ सुनहरे रंग का लहंगा पहने हुए खड़ी है,’’ हमशां ने अपनी होने वाली भाभी की ओर इशारा करते हुए बताया.

‘‘अच्छा, तो यही वह लड़की है जो तुम लोगों की अगली शिकार है,’’ निदा ने कोसने वाले अंदाज में कहा.

‘‘आप ऐसा क्यों कह रही हैं. इस में भैया की कोई गलती नहीं है. वह तो आज भी नहीं जानते कि हम लोगों की तरफ से मंगनी तोड़ी गई?है,’’ हमशां ने धीमी आवाज में कहा.

‘‘मगर, तुम तो बता सकती थीं.

तुम ने क्यों नहीं बताया? आखिर तुम भी तो इसी घर की हो,’’ इतना कह कर निदा वहां से दूसरी तरफ खड़े लोगों की तरफ बढ़ने लगी.

निदा की बातें हमशां को बुरी तरह कचोट गईं.

‘‘प्लीज निदा, आप हम लोगों को गलत न समझें. बस, मम्मी चाहती थीं कि भैया की शादी उन की सहेली की बेटी से ही हो,’’ निदा को रोकते हुए हमशां ने सफाई पेश की.

‘‘और तुम लोग मान गए. एक लड़की की जिंदगी बरबाद कर के अपनी कामयाबी का जश्न मना रहे हो,’’ निदा गुस्से से बोली.

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं?है. मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि मम्मी की कसम के आगे हम सब मजबूर थे वरना मंगनी कभी भी न टूटने देते,’’ कह कर हमशां ने उस का हाथ पकड़ लिया.

‘‘देखो हमशां, अब पुरानी बातों को भूल जाओ. पर अफसोस तो उम्रभर रहेगा कि इनसानों की पहचान करना आजकल के लोग भूल चुके हैं,’’ इतना कह कर निदा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और आगे बढ़ गई.

‘‘निदा, इन से मिलो. ये मेरी होने वाली बहू के मम्मीपापा हैं. यह इन की छोटी बेटी है, जो मैडिकल की पढ़ाई कर रही है,’’ अख्तर की अम्मी ने निदा को अपने नए रिश्तेदारों से मिलवाया.

निदा सोचने लगी कि लोग तो रिश्ता टूटने पर नफरत करते हैं, लेकिन मैं उन में से नहीं हूं. अमीरों के लिए दौलत ही सबकुछ है. मगर मैं दौलत की इज्जत नहीं करती, बल्कि इनसानों की इज्जत करना मुझे अपने घर वालों ने सिखाया है.

‘‘निदा, आप भैया को माफ कर दें, प्लीज,’’ हमशां उस के पास आ कर फिर मिन्नत भरे लहजे में बोली.

‘‘हमशां, कैसी बातें करती हो? अब जब मुझे पता चल गया है कि इस में तुम्हारे भैया की कोई गलती नहीं है तो माफी मांगने का सवाल ही नहीं उठता,’’ निदा ने हंस कर उस के गाल पर एक हलकी सी चपत लगाई.

कुछ देर ठहर कर निदा फिर बोली, ‘‘हमशां, तुम्हारी मम्मी ने मुझ से रिश्ता तोड़ कर बहुत बड़ी गलती की. काश, मैं भी अमीर घर से होती तो यह रिश्ता चंद सिक्कों के लिए न टूटता.’’

‘‘मुझे मालूम है कि आप नाराज हैं. मम्मी ने आप से मंगनी तो तोड़ दी, पर उन्हें भी हमेशा अफसोस रहेगा कि उन्होंने दौलत के लिए अपने बेटे की खुशियों का खून कर दिया,’’ हमशां ने संजीदगी से कहा.

‘‘बेटा, आप लोग यहां क्यों खड़े हैं? चलो, सब लोग इंतजार कर रहे हैं. निदा, तुम भी चलो,’’ अख्तर के अब्बू खुशी से चहकते हुए बोले.

‘‘मुझे यहां इतना प्यार मिलता है, फिर भी दिल में एक टीस सी उठती?है कि इन्होंने मुझे ठुकराया है. पर दिल में नफरत से कहीं ज्यादा मुहब्बत का असर है, जो चाह कर भी नहीं मिटा सकती,’ निदा सोच रही थी.

‘‘निदा, आप को बुरा नहीं लग रहा कि भैया किसी और से शादी कर रहे हैं?’’ हमशां ने मासूमियत से पूछा.

‘‘नहीं हमशां, मुझे क्यों बुरा लगने लगा. अगर आदमी का दिल साफ और पाक हो, तो वह एक अच्छा दोस्त भी तो बन सकता है,’’ निदा उमड़ते आंसुओं को रोकना चाहती थी, मगर कोशिश करने पर भी वह ऐसा कर नहीं सकी और आखिरकार उस की आंखें भर आईं.

‘‘भैया, आप निदा से वादा करें कि आप दोनों जिंदगी के किसी भी मोड़ पर दोस्ती का दामन नहीं छोड़ेंगे,’’ हमशां ने इतना कह कर निदा का हाथ अपने भैया के हाथ में थमा दिया और दोनों के अच्छे दोस्त बने रहने की दुआ करने लगी.

‘‘माफ कीजिएगा, अब हम एकदूसरे के दोस्त बन गए हैं और दोस्ती में कोई परदा नहीं, इसलिए आप मुझे बेवफा न समझें तो बेहतर होगा,’’ अख्तर ने कहा.

‘‘अच्छा, आप लोग मेरे बिना दोस्ती कैसे कर सकते हैं. मैं तीसरी दोस्त हूं,’’ अख्तर की मंगेतर निदा से बोली.

निदा उस लड़की को देखती रह गई और सोचने लगी कि कितनी अच्छी लड़की है. वैसे भी इस सब में इस की कोई गलती भी नहीं है.

‘‘आंटी, मैं हमशां को अपने भाई के लिए मांग रही हूं. प्लीज, इनकार न कीजिएगा,’’ निदा ने कहा.

‘‘तुम मुझ को शर्मिंदा तो नहीं कर रही हो?’’ अख्तर की अम्मी ने पलट कर पूछा.

‘‘नहीं आंटी, मैं एक दोस्त होने के नाते अपने दोस्त की बहन को अपने भाई के लिए मांग रही हूं,’’ इतना कह कर निदा ने हमशां को गले से लगा लिया.

‘‘निदा, आप हम से बदला लेना चाहती?हैं. आप भी मम्मी की तरह रिश्ता जोड़ कर फिर तोड़ लीजिएगा ताकि मैं भी दुनिया वालों की नजर में बदनाम हो जाऊं,’’ हमशां रोते हुए बोली.

‘‘अरी पगली, मैं तो तेरे भैया की दोस्त हूं, दुख और सुख में साथ देना दोस्तों का फर्ज होता है, न कि उन से बदला लेना,’’ निदा ने कहा.

‘‘नहीं, मुझे यह रिश्ता मंजूर नहीं है,’’ अख्तर की अम्मी ने जिद्दी लहजे में कहा.

तभी अख्तर के अब्बू आ गए.

‘‘क्या बात है? किस का रिश्ता नहीं होने देंगी आप?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘अंकल, मैं हमशां को अपने भाई के लिए मांग रही हूं.’’

‘‘तो देर किस बात की है. ले जाओ. तुम्हारी अमानत है, तुम्हें सौंप देता हूं.’’

‘‘निदा, आप अब भी सोच लें, मुझे बरबाद होने से आप ही बचा सकती हैं,’’ हमशां ने रोते हुए कहा.

‘‘कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हो. मैं तो तुम्हें दिल से कबूल कर रही हूं, जबान से नहीं, जो बदल जाऊंगी,’’ निदा खुशी से चहकी.

‘‘हमशां, निदा ठीक कह रही हैं. तुम खुशीखुशी मान जाओ. यह कोई जरूरी नहीं कि हम लोगों ने उस के साथ गलत बरताव किया तो वह भी ऐसी ही गलती दोहराए,’’ अख्तर हमशां को समझाते हुए कहने लगा.

‘‘अगर वह भी हमारे जैसी बन जाएगी, तब हम में और उस में क्या फर्क रहेगा,’’ इतना कह कर अख्तर ने हमशां का हाथ निदा के भाई के हाथों में दे दिया.

‘‘निदा, हम यह नहीं जानते कि कौन बेवफा था, लेकिन इतना जरूर जानते हैं कि हम बेवफा न थे,’’ अख्तर नजर झुकाए हुए बोला.

‘‘भैया, आप बेवफा न थे तो फिर कौन बेवफा था?’’ हमशां शिकायती लहजे में बोली. उस की नजर जब अपने भैया पर पड़ी तो देख कर दंग रह गई. उस का भाई रो रहा था.

‘‘भैया, मुझे माफ कर दीजिए. मैं ने आप को गलत समझा,’’ हमशां अख्तर के गले लग कर रोने लगी.

सच है कि इनसान को हालात के आगे झुकना पड़ता है. अपनों के लिए बेवफा भी बनना पड़ता है.

घुटन : शमा की भाभी ने ऐसा क्या देख लिया था

आसिफ को ऐसी घुटन में जीने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, उस ने इस की कभी कल्पना भी नहीं की थी. इस घुटन ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया था. रहरह कर आसिफ को अपनी पहली बीवी मुमताज की याद आ रही थी.

आज आसिफ की नई बीवी शमा उस पर शब्दों की ऐसी चोट करती थी, जिस का असर सीधे उस के दिल पर होता था, जबकि उस ने अपनी नई बीवी शमा और उस के बच्चों कैफ और आइजा को अपनी सगी औलाद से भी ज्यादा चाहा था और शमा से निकाह इसलिए ही किया था कि किसी बेवा और यतीमों का सहारा बन कर उन्हें दुनिया की हर खुशी देने की कोशिश करेगा. पर शमा लोगों के बहकावे में आ कर शब्दों की ऐसी चोट करती थी कि घर में ?ागड़ा शुरू हो जाता था.

आसिफ के अपनी पहली बीवी से

3 बच्चे फातिमा, आयशा और काशिफ थे. जब आसिफ की दूसरी शादी हुई थी, उस समय फातिमा की उम्र 10 साल, आयशा की उम्र 8 साल और काशिफ की उम्र महज 3 साल थी. शमा की बेटी आइजा की उम्र 10 साल और बेटे कैफ की उम्र 6 साल थी.

आसिफ ने डोनेशन दे कर आइजा और कैफ का एक अच्छे से इंगलिश मीडियम स्कूल में दाखिला करा दिया था, जबकि अपनी बेटी आयशा को साधारण स्कूल में ही रहने दिया था, क्योंकि उस के पास इस समय इतनी रकम नहीं थी कि एकसाथ 3-3 बच्चों के दाखिले के लिए डोनेशन दे सके.

शादी का एक साल प्यारमुहब्बत में गुजर गया और शमा को एक बेटा भी हो गया, जिसे पा कर पूरे घर में खुशी का माहौल था. सब बच्चे अपने छोटे भाई को पा कर खुश थे.

पर, जैसेजैसे समय अपनी रफ्तार से कटता गया, वैसेवैसे शमा में बदलाव आता गया. वह आसिफ की छोटी से छोटी बात पकड़ने लगी और उसे जलील करने लगी.

एक दिन शमा के भाईभाभी घर आए हुए थे. आसिफ का बेटा काशिफ खाना नहीं खा रहा था, तो आसिफ ने उसे पकड़ कर एक निवाला उस के मुंह में डाल दिया.

शमा की भाभी ने यह सब देख लिया और उस ने शमा के कान में जहर घोल दिया.

रात को जब आसिफ थकहार कर घर आया और अपने कमरे में गया, तो शमा मुंह फुलाए बैठी थी. आसिफ को देख वह गुस्से में बोली, ‘‘तुम काशिफ को अपने हाथ से खाना खिला रहे थे. मेरी भाभी ने अपनी आंखों से देखा और मु?ा से कहा कि आसिफ अपनी औलाद को तो अपने हाथ से खाना खिलाता है, पर तुम्हारे बच्चों को कभी ऐसे खाना नहीं खिलाता. भाभी को और मु?ो तुम्हारा बच्चों में यह फर्क करना बहुत बुरा लगा.’’

आसिफ शमा को प्यार से सम?ाते हुए बोला, ‘‘तुम ही मु?ा से कितनी बार शिकायत करती हो कि तुम्हारे 2 छोटे बच्चों को खिलाना मेरे बस की बात नहीं है. ये बच्चे मेरे हाथ से खाना नहीं खाते हैं खासकर काशिफ. आज भी काशिफ खाने में नखरे कर रहा था, तो मैं ने एक निवाला उस के मुंह में डाल दिया.’’

शमा बिगड़ते हुए बोली, ‘‘तो एक टुकड़ा मेरे बच्चों के मुंह में भी डाल देते.’’

आसिफ ने उसे सम?ाया, ‘‘काशिफ अभी बहुत छोटा है. मैं ने सिर्फ उसे ही एक निवाला खिलाया था.’’

लेकिन शमा पर आसिफ की इस दलील का कोई असर नहीं पड़ा और वह अपनी बात पर अड़ी रही.

कुछ दिनों बाद आसिफ काशिफ के लिए एबीसीडी लिखने वाली एक नोटबुक ले आया. जैसे ही उस ने वह नोटबुक शमा को दी और कहा कि इस में काशिफ को लिखना सिखाओ, जल्दी सीख जाएगा.

नोटबुक देखते ही शमा आगबबूला हो गई और नोटबुक को फेंकते हुए बोली, ‘‘सिर्फ अपने बच्चे के लिए ही लाए हो. मेरा भी तो बेटा कैफ है, उस के लिए क्यों नहीं लाए?’’

आसिफ को शमा की यह हरकत बहुत बुरी लगी. वह बोला, ‘‘कैफ तीसरी क्लास में है, उसे इस की क्या जरूरत है, जबकि काशिफ को तो अभी कुछ नहीं आता. उसे सीखने की जरूरत है. वह अभी 3 साल का ही तो है.’’

शमा चिल्ला कर बोली, ‘‘हांहां, सब तुम्हारे बच्चे के लिए ही जरूरी है.

वही तो पढ़ कर इंजीनियर बनेगा न… मेरा बच्चा कुछ न बने… सब अपने बेटे के लिए ही लाओ.’’

आसिफ को शमा से ऐसी उम्मीद न थी. उस ने जरा सी बात का बतंगड़ बना दिया. न आसिफ को खाना दिया और न उस से बात की.

आसिफ ने वह नोटबुक फाड़ दी, तब कहीं जा कर शमा का गुस्सा

शांत हुआ.

आसिफ को अब अपने ही घर में घुटन होने लगी थी. उस का घर में मन नहीं लगता था, इसलिए वह देर से घर आता था. वह जानता था कि उस की कोई न कोई बात पकड़ कर शमा ?ागड़ा करेगी और वह चाह कर भी अपने छोटे बेटे को गले नहीं लगा सकता, क्योंकि एक बार ऐसा करने पर घर में क्लेश हो गया था.

एक रात की बात है. आसिफ और शमा सोए हुए थे. रात को काशिफ की नींद खुली और वह ‘अम्मीअब्बू’ कहता हुआ आसिफ के पास आ गया. केवल आसिफ और शमा ही डबलबैड पर सोए हुए थे.

काशिफ बोला, ‘‘अब्बा, मैं आप के पास सोऊंगा.’’

आसिफ ने काशिफ को सम?ाया, तो वह रोने लगा. बच्चे का रोना सुन कर शमा बोली, ‘‘लिटा लो न अपने पास.’’

आसिफ ने शमा की बात सुन कर काशिफ को अपने पास लिटा लिया, पर अभी उसे लेटे हुए आधा घंटा ही

हुआ था कि शमा ने गुस्से में अपना तकिया उठाया और दूसरे कमरे में सोने चली गई.

आसिफ ने देखा कि शमा बिस्तर पर नहीं है, तो वह उठ कर दूसरे कमरे में गया. वहां उस ने देखा कि शमा मोबाइल देख रही थी.

आसिफ शमा से बोला, ‘‘तुम यहां क्यों आ गई?’’

शमा बोली, ‘‘नींद नहीं आ रही थी, इसलिए आ गई.’’

आसिफ सम?ा गया था कि जो इतनी देर से नींद आ रही है कह कर सो गई थी, उस की अचानक नींद कैसे गायब हो गई.

आसिफ बोला, ‘‘सचसच बताओ कि क्या बात है?’’

शमा गुस्से में बोली, ‘‘जाओ, अपनी औलाद को चिपका कर सुलाओ. यहां क्या करने आए हो? मु?ो सोने दो. मु?ो नहीं आना तुम्हारे पास. अपनी औलाद को गले से लगा कर सो जाओ, वही तुम्हारे लिए सबकुछ है.’’

आसिफ शमा की ऐसी बेरुखी देख कर हैरत में पड़ गया और उसे सम?ाते हुए बोला, ‘‘अरे बाबा, मैं काशिफ को नीचे सुला देता हूं.’’

आसिफ ने काशिफ को बिस्तर से उठा कर नीचे सुला दिया, पर शमा फिर भी नहीं आई. वह गुस्से में मुंह फुलाए दूसरे कमरे में पड़ी रही.

कई दिन तक शमा का मुंह फूला रहा और आसिफ घुटता रहा.

एक बार घर पर शमा के मेहमान आए थे. उन के बच्चों ने काशिफ की साइकिल तोड़ दी. इस के बाद शमा के बेटे कैफ की भी साइकिल खराब हो गई. उस ने आसिफ से कहा, ‘‘मेरी साइकिल ठीक करा दो.’’

आसिफ ने बोला, ‘‘कल करा दूंगा.’’

पर, अगले दिन आसिफ को ध्यान नहीं रहा और वह काम पर चला गया. फिर क्या था. शमा ऐंठ गई. आसिफ ने सम?ाया कि काशिफ की भी साइकिल उस ने ठीक नहीं कराई है, पर शमा ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई.

एक बार आसिफ की बेटी आयशा की तबीयत काफी खराब हो गई थी. आसिफ ने तुरंत उस का इलाज करा दिया था, पर जब शमा की बेटी आइजा को पीलिया हो गया, तो आसिफ ने उस का भी इलाज अच्छे डाक्टर के क्लिनिक में कराया, पर वहां शमा के रिश्तेदारों ने कान भर दिए कि तेरे ही बच्चे क्यों बीमारी का शिकार होते हैं.

शमा का यह सुनना था कि उस का गुस्सा फूट पड़ा आसिफ पर. वह बोली, ‘‘मेरे बच्चों का ध्यान नहीं रखते हो, न ही ढंग से इलाज कराते हो. अगर आज इन का असली बाप होता, तो यह इतनी बीमार न होती.’’

आसिफ बोला, ‘‘ऐसा कौन सा घर नहीं है, जहां बच्चे बीमार नहीं होते हैं. मैं सगा बाप नहीं तो क्या मैं ने इलाज कराने में कोई कमी की?’’

इतना सुनना था कि शमा और ज्यादा भड़क गई. वह अपने बच्चों को ले कर मायके चली गई. आसिफ हैरान सा उसे जाते देखता रहा.

सच के पैर: क्या थी गुड्डी के भैया-भाभियों की असलियत

बूआजी आएंगी फलमिठाई लाएंगी, नई किताबें लाएंगी सब को खूब पढ़ाएंगी…’ छोटी गा रही थी.

‘बूआजी आते समय मेरे लिए नई ड्रैसेज जरूर ले आना,’ दूसरी की मांग होती. इस तरह की मांगें हर साल गरमी की छुट्टियां आते ही भाइयों के बच्चों की होती. जिन्हें गुड्डी मायके जाते ही पूरा करती. मगर एक बार जब वह मायके गई, तो बड़े भैयाभाभी की बातचीत सुन उस के पांव तले की जमीन ही जैसे खिसक गई.

‘‘बड़ी मुश्किल से दोनों का तलाक कराया,’’ भाभी कह रही थीं.

‘‘और क्या, अगर तलाक नहीं होता तो क्या गुड्डी हमें इतना देती? देखना, बड़ी की शादी में कम से कम 10 लाख उस से लूंगा,’’ भैया कह रहे थे.

‘‘बदले में क्या देते हैं हम लोग? हर साल एक मामूली साड़ी पकड़ा देते हैं. वह इतने में भी अपना सर्वस्व लुटा रही है,’’ हंसते हुए उस की भाभी ने कहा तो वह जैसे धड़ाम से जमीन पर आ गिरी. सच में उस का शोषण तीनों भाइयों ने किया है. उसे याद आ गई 20 वर्ष पूर्व की घटना. उस के विवाह के लिए लड़का देखा जा रहा था. पिताजी तीनों बेरोजगार बेटों की लड़ाई व बहुओं की खींचतानी झेल न पाए और गुजर गए. फिर तो उस की शादी के लिए रखे क्व5 लाख वे सब खूबसूरती से डकार गए.

उस का विवाह उस से लगभग दोगनी उम्र के व्यक्ति रमेश से कर दिया गया और दहेज तो दूर सामान्य बरतनभांडे तक उसे नहीं दिए गए. यह देख मां से न रहा गया. वे बोल पड़ीं, ‘‘अरे थोड़े जेवर और जरूरी सामान तो दो, लोग क्या कहेंगे?’’ ‘‘आप चुप रहें मां. हमें अपनी औकात में शादी करनी है. सारा इसे दे देंगे, तो मेरी बेटियों की शादी कैसे होगी?’’ बड़ा भाई डांट कर बोला तो वे चुप रह गईं. फिर तो गुड्डी ससुराल गई और उस के बाद उस की पढ़ाई और नौकरी तक इन सबों ने कभी झांका तक नहीं. रमेश पत्नी को पढ़ाने के पक्षधर थे, इसलिए उन के सहयोग से उस ने बीए की परीक्षा पास की. उस के कुछ दिनों बाद बैंक की क्लैरिकल परीक्षा पास कर ली, तो बैंक में नौकरी लग गई. रमेश पढ़ीलिखी पत्नी चाहते थे परंतु कमाऊ पत्नी नहीं. अत: जैसे ही उस की नौकरी लगी उन्होंने समझाने की कोशिश की, ‘‘क्या तुम्हारा नौकरी करना इतना जरूरी है?’’

‘‘हां क्यों न करें. इतनी औरतें करती हैं. फिर बड़ी मुश्किल से लगी है,’’ उस ने सरलता से जवाब दिया.

‘‘फिर बच्चे होंगे, तो कौन पालेगा?’’

‘‘क्यों, दाई रख लेंगे. आजकल बहुत से लोग रखते हैं. मैं भविष्य की इस छोटी सी समस्या के लिए नौकरी नहीं छोड़ सकती.’’ इस दोटूक जवाब पर रमेश कुछ नहीं बोले. पर उन का जमीर इस बात को स्वीकार न कर सका कि लोग उन्हें जोरू का गुलाम या जोरू की कमाई खाने वाला कहें. इधर उस के मायके के लोग उस की नौकरी की खबर सुनते ही मधुमक्खी के समान आ चिपके. पतिपत्नी की लड़ाई में हमेशा मायके वाले फायदा उठाते हैं. यहां भी यही हुआ. मायके वालों के उकसाने पर वह तलाक का केस कर नौकरी पर चली गई. बाद में आपसी सहमति पर तलाक हो भी गया. इस के बाद इस दूध देती गाय का भरपूर शोषण सब ने किया. कभी बड़े भैया की लड़की का फार्म भरना है तो कभी किसी की बीमारी में इलाज का खर्च, तो कभी कुछ और. ऐसा कर के हर साल वे सब इस से अच्छीखासी रकम झटक लेते थे.

उस वक्त गुड्डी का वेतन 30 हजार था. उस में से सिर्फ 10 हजार किराए के मकान में रहने, खानेपीने वगैरह में जाते थे. बाकी भाइयों की भेंट चढ़ जाता था. मगर उस दिन की भैयाभाभी की बातचीत ने उस के मन को हिला कर रख दिया. उस के बाद वह 4 दिन की छुट्टियां ले कर किसी काम से मधुबनी गई थी, तो वहां संयोगवश उस के पति साइकिल पर फेरी लगाते दिख गए. ‘‘ये क्या गत बना रखी है?’’ औपचारिक पूछताछ के बाद उस ने पहला प्रश्न किया.

‘‘कुछ नहीं, बस जी रहे हैं, तुम कैसी हो?’’ उन्होंने डबडबाई आंखों को संभालते हुए प्रश्न किया.

‘‘मैं ठीक हूं, आप की पत्नी और बच्चे?’’ उस का दूसरा प्रश्न था.

‘‘पत्नी ने मुझे छोड़ कर नौकरी का दामन थामा, तो बिन पत्नी बच्चे कहां से होते?’’ उन्होंने जबरदस्ती हंसने का प्रयास करते हुए कहा.

‘‘गांव में कौनकौन है?’’ पिताजी का निधन तुम्हारे सामने हो गया था. तुम्हारे जाने के 1 साल बाद मां गुजर गईं और सभी भाइयों ने परिवार सहित दूसरे शहरों को ठिकाना बना लिया,’’ उन का सीधा उत्तर था.

‘‘और आप?’’

इस प्रश्न पर वे थोड़ा सकुचा गए. फिर बोले, ‘‘मैं यहीं मधुबनी में रहता हूं. सुबह से शाम ढले तक कारोबार में लगा रहता हूं. सिर्फ रात में कमरे में रहता हूं.’’ ‘‘मुझे अपने घर ले चलिए,’’ कह कर वह जबरदस्ती उन के साथ उन के घर में गई. वहां एक पुरानी चारपाई, एक गैस स्टोव व जरूरत भर का थोड़ा सा सामान था. उसे बैठा कर वे सब्जी व जरूरी समान की व्यवस्था करने गए तब तक उस ने सारे समान जमा दिए. उन के लौट कर आते ही सब्जीरोटी बना कर उन्हें खिलाई और खुद खाई. उस रात वह उन के बगल में लेटी तो उन के सिर पर उंगलियां फेरते उस ने पूछा, ‘‘आप ने दूसरी शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘क्यों, क्या एक शादी काफी नहीं है? जब पहली पत्नी ने ही साथ नहीं दिया, तो दूसरी की बात मैं ने सोची ही नहीं.’’ इस जवाब से वह टूट गई. दोनों रात में एक हो गए. आंसुओं ने नफरत के बांध को तोड़ दिया.

अगले दिन चलते समय उस ने कहा, ‘‘आप मेरे साथ चल कर वहीं रहिए.’’ ऐसा न जाने किस जोश में आ कर वह बोल उठी थी. पर रमेश ने बात को संभाला, ‘‘यह ठीक नहीं होगा. हम दोनों तलाकशुदा हैं वैसी दशा में मेरा तुम्हारे साथ रहना…’’

‘‘ठीक है, मैं दरभंगा में रहती हूं. आप महीने में 1 बार वहां आ सकते हैं?’’ उस ने पूछा. ‘‘मिलने में कोई बुराई नहीं है,’’ रमेश ने फिर बात को संभाला. फिर बस स्टैंड तक जा कर बस में बैठा आए और हाथ में 200 रख दिए. प्यार की भूखी गुड्डी इस व्यवहार से गदगद हो गई. दूसरी ओर अपने सगे भैयाभाभी की कही बात उसे तोड़ रही थी. सच कड़वा होता है मगर यह इतना कड़वा था कि इसे झेल पाना मुश्किल हो रहा था. उस के यही सब सोचते जब उस के मोबाइल की घंटी बजी तो वह वर्तमान में लौटी.

‘‘क्यों इस बार छुट्टी में नहीं आ रही हो?’’ उस के बड़े भैया का स्वर था.

‘‘नहीं, इस बार आना नहीं हो सकता,’’ उस ने विनम्रता से जवाब दिया.

‘‘क्यों, क्या हो गया?’’

‘‘कुछ नहीं भैया, बस जरूरी काम निबटाने हैं.’’ इस जवाब पर फोन कट गया. इस के बाद वह कई महीने मायके तो नहीं गई पर हर माह मधुबनी हो आती थी. रमेश उसे प्यार से घर लाते, उस का पूरा ध्यान रखते और भरपूर सुख देते. उन के साथ रात गुजारने में उसे असीम सुख मिलता था. वह इस प्यार से गदगद रहती. उस के जाते वक्त हर बार रमेश 100-200 या साड़ी हाथ में अवश्य रखते. फिर प्रेम से बस में चढ़ा आते. सब से बड़ी बात यह कि उन्होंने आज तक यह नहीं पूछा था कि अब वह किस पद पर है वेतन कितना मिलता है?

‘‘क्यों आप को मेरे बारे में कुछ नहीं जानना?’’ एक बार उस ने पूछा था.

‘‘जानता तो हूं कि तुम बैंक में हो,’’ उन्होंने सहज भाव से जवाब दिया. उन की सब से बड़ी बात यह थी कि वे अपने ऊपर 1 पैसा भी नहीं खर्च करने देते थे, इसलिए स्वाभाविक रूप से वह उन की ओर झुकती चली गई. एक दिन अचानक बहुत दिनों से मायके न जाने पर उस की मां, बड़े, मझले और छोटे भैयाभाभी सभी आए. मझले को मैडिकल में लड़के का ऐडमिशन कराने हेतु 1 लाख चाहिए थे, वहीं बड़े भैया बड़ी लड़की की शादी हेतु पूरे 5 लाख की मांग ले कर आए थे. इसी प्रकार छोटा भी दुकान हेतु पुन: 2 लाख की मांग ले कर आया था. उन सब की मांग सुन कर वह फट पड़ी, ‘‘क्यों आप लोग अपना इंतजाम खुद नहीं कर सकते, जो जबतब आ जाते हैं? मेरी भी शादी हुई थी, तब आप तीनों ने क्या दिया था?’’

इस पर सब सकपका गए मगर छोटा बेहयाई से बोला, ‘‘हमारे पास नहीं था, इसलिए नहीं दिया. तुम्हारे पास है तभी न ले रहे हैं.’’ ‘‘कुछ नहीं, पहले पिछला हिसाब करो. मुझ से जो लिया लौटाओ. मेरे पास सब लेनदेन लिखा है.’’ तभी उस के पति का फोन आ गया. ‘‘क्यों क्या हुआ, कैसे हैं आप?’’

‘‘बस 2 दिन से थोड़ा सा बुखार है. तुम्हारी याद आ रही थी, इसलिए फोन कर दिया.’’ पति का थका स्वर सुन कर वह तुरंत बोली. ‘‘रात की बस पकड़ कर मैं आ रही हूं आप चिंता न करें.’’ फिर वह फोन रख कर जल्दीजल्दी जाने का समान पैक करने लगी.

‘‘क्या हुआ अचानक कहां चल दीं?’’ मां ने घबरा कर पूछा.

‘‘जा रही होगी गुलछर्रे उड़ाने,’’ मझला भाई बोला. ‘‘सुनो, अपनी औकात में रह कर बोला करो. ये मेरे पति का फोन था.’’ यह सुन कर सभी की आंखें फटी रह गईं.

‘‘तलाकशुदा पति से तेरा क्या मतलब?’’ उस की मां बोलीं.

‘‘मां, मतलब तो शादी के बाद भाइयों का भी बहन की आमदनी या जायदाद से नहीं होता पर मेरे भाई तो बहन को दूध देती गाय समझ पैसा लूटते रहे. जब वापस देने की बारी आई तो बहाने करने लगे.’’ उस का यह रूप देख सब भौचक्के थे.

‘‘और हां मां, आप सब ने मिल कर मेरी शादी इसलिए तुड़वाई ताकि मेरे पैसे पर ऐश कर सकें.’’

‘‘बेटा, तुम गलत समझ रही हो,’’ मां ने फिर समझाना चाहा. ‘‘सच क्या है मां यह तुम भी जानती हो. पूरे 5 लाख जो पापा ने मेरी शादी के लिए रखे थे, इन तीनों ने डकार लिए थे. एक फटा कपड़ा तक नहीं दिया था. फिर 4 साल तक हाल नहीं पूछा. लेकिन जैसे ही नौकरी मिली चट से आ कर सट गए और तुम मां हो कर हां में हां मिलाती रहीं.’’ यह कड़वा सच उन सब के कानों में सीसे की तरह उतर रहा था. ‘‘आप लोग जाएं क्योंकि मुझे रात की बस से उन के पास जाना है. जब मेरा पूरा पैसा देने लायक हो जाएं तो आइएगा.’’ इतना कह कर वह तैयार हो कर घर से निकली, तो वे सब हाथ मलते ऐसे पछता रहे थे जैसे कारूं का खजाना हाथ से निकल गया हो और वह तेजी से बस स्टैंड की ओर बढ़ती जा रही थी.

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