सरस सलिल विशेष

एकदूसरे के घर आतेजाते तसलीम और तौसीफ एकदूसरे को चाहने लगे. तसलीम खूबसूरत थी, तो तौसीफ भी कम सुंदर न था. वह कमाता भी था. इसलिए तसलीम भी तौसीफ को पसंद करने लगी थी.

घर आतेजाते तसलीम भी मुसकराते हुए तिरछी निगाहों से तौसीफ अहमद को निहारने लगी थी. एक अजीब सा आकर्षण दोनों को एकदूसरे की ओर खींचने लगा. लेकिन नजरें बेईमान थीं. वे एकदूसरे को ढूंढती थीं, निहारती भी थीं. लेकिन पकड़े जाने पर अनजान बनने का नाटक करती थीं.

धीरेधीरे स्थिति यह आ गई कि बिना एकदूजे को देखे चैन नहीं मिलता था. फिर भी व्यवहार ऐसा करते थे, जैसे उन्हें एकदूसरे से कोई मतलब नहीं.

छिपछिप कर देखने में ही दोनों एकदूसरे को हद से ज्यादा चाहने लगे. साथ ही बेहतर भविष्य बनाने के सपने भी संजोने लगे. मगर अपनेअपने दिल की बात कहने की हिम्मत दोनो में नहीं थी. तसलीम जहां नारी सुलभ लज्जा के कारण खामोश थी, तो वहीं तौसीफ अहमद यह सोच कर अपने प्यार का इजहार नहीं कर पा रहा था कि कहीं दिल की बात कहने पर तसलीम नाराज न हो जाए.

गुजरते वक्त के साथ दोनों की मूक मोहब्बत परवान चढ़ती गई. तसलीम तौसीफ को अपने दिल की बात कहने के लिए उतावली थी. नजरों ही नजरों में बात कर लेने से तौसीफ का मन नहीं भरता था. वह चाहता था कि तसलीम से अपने दिल की बात कह कर मोहब्बत का इजहार करे. लेकिन इस के लिए वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

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