जोड़ियों का चलन अब भोजपुरी फिल्मों को नुकसान पहुंचा रहा है. वजह, अब हीरो अपनी जोडि़यों के बीच ही ज्यादातर फिल्में करना चाहते हैं. इस वजह से नई हीरोइनों को बड़े हीरो के साथ काम नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में वे साइड रोल कर रही हैं.

नई हीरोइनें जब काम की तलाश में प्रोड्यूसर, डायरैक्टर या प्रोडक्शन हाउस से संपर्क करती हैं, तो उन से पूछा जाता है कि उन्होंने किसी बड़े हीरो के साथ काम किया है या नहीं?

दरअसल, ज्यादातर भोजपुरी फिल्मों में कहानी या डायरैक्शन के लैवल पर प्रयोग नहीं किया जाता है. ऐसे में जो फिल्म हिट होती है, उसी लीक पर दूसरी फिल्में बनने लगती हैं. यही वजह है कि फिल्मों की कहानी में नए प्रयोग नहीं होते हैं.

भोजपुरी फिल्म उद्योग में साल में सौ से ज्यादा फिल्में बनती हैं. इस के बाद भी कलाकारों से जिस तरह के प्रोफैशनल बरताव की यहां जरूरत है, वह पूरी तरह से नदारद है.

ज्यादातर कहानियां हीरो की छवि को सामने रख कर लिखी जाती हैं. इस वजह से नई कहानियों पर फिल्में नहीं बन रही हैं.

दर्शकों को लुभाने के लिए जाति और धर्म को ले कर ज्यादा फिल्में लिखी जाती हैं. इस में बहुत ही सतही लैवल पर बातों को दिखाया जाता है. कहानी में नएपन की कमी को पूरा करने के लिए इन में भड़काऊ डांस, दोमतलब के गाने ठूंसठूंस कर भरे जाते हैं. इस के चलते फिल्म में कहानी की जरूरत मानो खत्म सी हो जाती है.

कास्टिंग में भेदभाव

हिंदी फिल्मों में कलाकारों का चुनने का काम कास्टिंग डायरैक्टर करता है. भोजपुरी फिल्मों में यह काम हीरो की पसंद से होने लगा है.

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