Hindi Story: गली के कुत्ते

Hindi Story: रा के तकरीबन साढ़े 10 बज रहे थे. शहर की सड़कों पर हलकीहलकी ठंड उतर आई थी. सड़क किनारे बंद होती दुकानें. झिलमिलाती स्ट्रीट लाइट्स. बीचबीच में भागते आटोरिकशा और मोटरसाइकिलें. यह वही शहर था, जो कभी पूरी तरह सोता नहीं था. बस, कुछ घंटों के लिए आंखें मूंद लेता था.
आर्या औफिस से लौटते हुए बस से उतर कर पैदल घर की ओर बढ़ रही थी. बस स्टौप से घर तक का रास्ता मुश्किल से 10 मिनट का था. पर इन 10 मिनट में वह रोज जाने कितनी दुआएं पढ़ लेती थी.
आर्या के कानों में ईयरफोन नहीं थे. मोबाइल भी हाथ में नहीं था, क्योंकि उस ने बहुत पहले सीख लिया था कि रात की सड़कें सजग रहने वालों का इम्तिहान लेती हैं.

उस गली में कदम रखते ही आर्या ने हलकी सी सीटी बजाई. सीटी की आवाज सुनते ही गली के कोने से
3-4 कुत्ते निकल आए. ये कोई नए कुत्ते नहीं थे. ये वही थे जिन्हें वह महीनों से जानती थी. औफिस से लौटते वक्त वह अकसर उन के लिए बिसकुट ले आती थी. वीकैंड पर उन्हें रोटी खिलाए बिना उस के दिन की शुरुआत नहीं होती थी. जब भी महल्ले के डौग लवर्स उन कुत्तों को टीका लगवाने का इंतजाम करते, आर्या भी बढ़चढ़ कर उन की मदद करती. कुत्तों के इलाज और देखभाल में अकसर वह सब से आगे रहती. बरसात में उन के लिए टिन की शैड बनवाने का विचार भी उसी का था. उस छोटे से इंतजाम ने सर्दी और बारिश में गली के कुत्तों को बड़ी राहत दी थी. यही वजह थी कि वे आर्या की आहट पहचानते थे. उसे अपना मानते थे.

आर्या भी जानती थी कि ये कुत्ते भरोसेमंद हैं, क्योंकि ये अपनी हद जानते हैं. हवस की आग में ये पागल हो कर इधरउधर नहीं भटकते और सब से जरूरी बात यह कि ये गली को अपना घर मानते थे. इन दिनों कुत्तों को ले कर शहर में खूब विवाद चल रहा था. अखबारों में सुर्खियां थीं. टीवी डिबेट में शोर था. कोई कहता था सड़क के कुत्ते खतरनाक हैं. कोई उन्हें हटाने की मांग कर रहा था. पर आर्या जानती थी कि असल खतरा दांतों से नहीं, नीयत से होता है. गली के एक बुजुर्ग अकसर कहते थे, ‘‘बेटा, जिस कुत्ते को रोज खाना मिलता है और इलाज होता है, वह गली का पहरेदार बन जाता है.’’ उन की यह बात आर्या के दिल में उतर गई थी.

जैसे ही वह थोड़ा आगे बढ़ी, पीछे से बाइक का इंजन दहाड़ा. 2 लड़के थे. सिर पर हैलमैट नहीं. चेहरे पर बेहूदा आत्मविश्वास. एक ने कहा, ‘‘ओए देख, नाइट शिफ्ट वाली रही है.’’ दूसरा हंसा, ‘‘चल, मजे लेते हैं.’’ आर्या का दिल जोर से धड़कने लगा. उस ने कदम तेज कर दिए. पीछे से फिर आवाज आई, ‘‘डर क्यों रही हो जानेमन, हम तो आशिक हैं तुम्हारे. इन कुत्तों से कितना दिल लगाओगी, थोड़ा हम से भी लगा लो. कसम से मजा बहुत आएगा.’’ आर्या के मन में एक वाक्य कौंध गया, ‘गली का कुत्ते गली के इन वहशी लड़कों से कहीं बेहतर होते हैं. वे कम से कम इज्जत की हद जानते हैं.’ उस ने फिर से सीटी बजाई. इस बार आवाज तेज थी. कुत्ते तुरंत उस के चारों ओर गए. एक आगे. 2 पीछे. एक बगल में. बाइक जैसे ही पास आई, कुत्तों ने एक साथ भौंकना शुरू कर दिया. तेज, आक्रामक, चेतावनी भरी लहजे में.
एक लड़का घबरा गया, ‘‘अबे चल, ये काट लेंगे.’’ दूसरा भी बोला, ‘‘छोड़ यार, आज नहीं.’’

बाइक लड़खड़ाई और वापस मुड़ गई. गालियां देते हुए वे दोनों अंधेरे में गायब हो गए. आर्या वहीं खड़ी रह गई. उस के हाथ कांप रहे थे. पर इस बार डर से ज्यादा गुस्सा था. उस ने ?ाक कर कुत्तों के सिर पर हाथ फेरा. वह पूंछ हिलाने लगे. जैसे कह रहे हों, ‘तुम निश्चिंत रहो, यह हमारी गली है और हम तुम्हारे साथ हैं.’
घर पहुंचते ही मां ने पूछा, ‘‘आज फिर देर हो गई.’’ आर्या बोली, ‘‘हां मां, कुछ छिछोरे कुत्ते पीछे लग गए थे.’’ मां ने पूछा, ‘‘सब ठीक तो है ?’’ आर्या ने कहा, ‘‘हां मां, गली के कुत्ते साथ थे.’’ मां हलकी मुस्कुराईं, ‘‘अच्छा है. आजकल इनसानों से ज्यादा वही भरोसेमंद हैं.’’ अगले दिन औफिस में आर्या ने जब यह सारी घटना सुनाई. किसी ने कहा, ‘‘समाज के लिए असली खतरा ये 2 टांगों वाले कुत्ते ही हैं, जो
दुनिया को अपनी हवस के चश्मे से देखते हैं.’’

किसी ने कहा, ‘‘नगरनिगम को इन कुत्तों पर भी नकेल कसने की योजना लानी चाहिए. सड़क पर घुमते वहशी जानवर सोसाइटी के लिए बड़ा खतरा हैं.’’ आर्या शांत स्वर में बोली, ‘‘सच में, खतरनाक वे कुत्ते नहीं हैं जिन्हें रोटी नहीं मिलती, बल्कि खतरनाक वह ठरक है जिसे संस्कार मिलता है, सही इलाज.’’
उस दिन से कुत्तों के लिए आर्या के मन में इज्जत बढ़ गई थी. गली के कुत्तों के लिए अब और लोग आगे आने लगे थे. सही देखभाल मिलने पर कुत्तों का बरताव और संतुलित हो गया. धीरेधीरे गली बदलने लगी. मनचले गायब हो गए. रातें थोड़ी सुरक्षित हो गईं. आर्या अब निडर हो कर घर लौटती है. वह जानती है. इस गली में कुत्ते सिर्फ जानवर नहीं हैं. वे पहरेदार हैं. दोस्त हैं और कई बार इनसानों से ज्यादा इनसान हैं.
इस सड़क पर आज भी 2 तरह के कुत्ते हैं. एक वे जो भूख में भौंकते हैं और दूसरे वे जो हवस में नोंचने को दौड़ते हैं. पहले वाले गली की शान हैं, दूसरे समाज का कलंक.                   

Hindi Kahani: अधेड़ को सबक


Hindi Kahani. ए अधेड़ आदमी ट्रेन में सफर कर रहा था. उस के आसपास कई औरतें बैठी हुई थीं. वह ट्रेन लोकल थी, इसलिए छोटेछोटे स्टेशनों पर भी रुक रही थी. जब भीड़ बढ़ जाती तो उस अधेड़ आदमी का हाथ गलत काम के लिए हरकत में जाता. कभी नींद के बहाने तो कभी ऐसे ही वह औरतों को छू देता था.

एक स्टेशन पर उस अधेड़ के आसपास की सीटें खाली हो गईं, लेकिन थोड़ी ही देर में लड़कियों का एक दल गया. जहां भी जगह मिली, लड़कियां बैठने लगीं. वे खिलाड़ी लग रही थीं और शायद कहीं खेलने जा रही थीं. ट्रेन आगे बढ़ रही थी और वे लड़कियां खिलखिला रही थीं.
वह अधेड़  अपने काले चश्मे के अंदर से उन्हें घूर रहा था. उस के पास एक काफी स्मार्ट लड़की बैठी थी. उस लड़की के बगल में एक पहलवान किस्म की उस की सहेली कविता बैठी थी, जो मर्दों की तरह बातें कर रही थी.

अपनी आदत के मुताबिक, अधेड़ दोबारा उस स्मार्ट लड़की से सटने लगा. उस ने अपना हाथ लड़की की जांघ पर रखा और फिरसौरीकह कर हटा लिया. इस के बाद भी वह छेड़छाड़ की लगातार कोशिश कर रहा था. अचानक कविता का ध्यान अधेड़ की हरकतों की ओर गया. वह बड़े ध्यान से उस की कारगुजारी देखने लगी. कुछ देर बाद उस ने जगह बदल ली. अब वह अधेड़ के पास बैठ गई.

एक स्टेशन पर भीड़ बढ़ी. कई ग्वाले दूध के डब्बे ले कर चढ़ आए. लोगों का ध्यान बंटा तो अधेड़ का हाथ दोबारा हरकत में गया. कभी हाथ कविता की जांघ पर पड़ता तो कभी कंधे पर. लेकिन कुछ देर बाद वह अधेड़ वहां से उठ गया और कुछ दूर सिंगल वाली सीट पर जा कर बैठ गया.

अरे, यह क्या? दर्द से उस के आंसू निकल आए थे. उस ने चश्मा उतार कर रूमाल से आंसू पोंछे. उस की हरकतें कविता देख कर मंदमंद मुसकरा रही थी. अधेड़ भी एक बेचारे की तरह कविता को देख रहा था.
बाकी किसी को कुछ पता नहीं था कि उन दोनों के बीच क्या हुआ. किसी का ध्यान भी उस ओर नहीं था, क्योंकि कोई शोरशराबा नहीं हुआ था.

अधेड़ बारबार अपनी जांघ सहला रहा था. वह खुद से सवाल कर रहा था, ‘क्या कोई देख रहा है? यह लड़की कौन है? क्या इसे पता चल गया था? अब कभी नहीं करूंगा ऐसा…’कुछ देर बाद वह अधेड़ उठा और दूर जा कर बैठ गया. अब उसे वह पहलवान टाइप की लड़की कविता नहीं दिखाई दे रही थी. वह मन ही मन उसे कोस रहा था. अब भी वह कुछ औरतों के पासही बैठा था, लेकिन उस का हाथ कहीं और नहीं, अपनी जांघ पर ही था. वह धोती के ऊपर से अपनी जांघ सहलारहा था,

जैसे बहुत दर्द हो रहा हो.कुछ देर बाद कविता अपनी सीट से उठी और उस अधेड़ की खोज में निकल पड़ी. एक सीट पर दुबका वह अधेड़ उसे दिखाई पड़ गया कविता ने मुसकरा कर मजाकभरे लहजे में उस अधेड़ से धीरे से पूछा, ‘‘क्या हुआ अंकल?’’ अधेड़ कुछ नहीं बोला. उस ने नजरें झुका लीं. कविता भी आगे कुछ नहीं बोली और वह अपनी सीट पर लौट आईवह अब भी मंदमंद मुसकरा रही थी.

कुछ देर बाद उन लड़कियों का स्टेशन गया. ट्रेन रुकी तो वे सब जल्दीजल्दी उतरने लगीं.
कविता उतरते समय अधेड़ से बोली, ‘‘बाय अंकल. जांघ में हल्दीप्याज गरम कर के लगा लीजिएगा.’’
कविता ट्रेन से उतर गई तो अधेड़ ने राहत की सांस ली. अभी इस सवाल का जवाब बाकी है कि अधेड़ ने अपनी सीट क्यों छोड़ी और पहलवान टाइप लड़की कविता ने उस का क्यों मजाक उड़ाया?
कविता ने फुरसत के पलों में खिलखिलाते हुए अपनी सहेलियों को बताया, ‘‘आज ट्रेन में बहुत मजा
आया. एक मनचले बुढ़ऊ को जम कर मजा चखाया.’’

‘‘कब? किसी को कुछ पता नहीं चला?’’ सहेलियों में से एक ने पूछा.‘‘हां. चुपचाप मजा चखाया. वह गोल्डी को छेड़ रहा था. मेरी नजर पड़ी तो मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं उसे डांट भी सकती थी, लेकिन उस के पास बैठ कर चुपचाप उस की जांघ पर बोरा सिलने वाले इस सूए के पिछले भाग को इतनी जोर से चुभाया कि उस के आंसू निकल आए.‘‘पोल खुलने के डर से वह कुछ कह भी नहीं सका. पूरा दर्द सह गया. असली मर्द होगा तो दोबारा ऐसी हरकत नहीं करेगा.’’

लड़कियां खूब जोर से हंसीं. गोल्डी बोली मुझे भी बहुत गुस्सा रहा था, लेकिन मैं कुछ बोली नहीं, पर तुम ने उसे सबक सिखा ही दिया.’’ ‘‘हां. मैं यह सूआ लिए रहती हूं और नुकीले भाग से नहीं, पीछे के हिस्से से
ही मनचलों की चीख निकाल लेती हूं. यह मेरा कारगर हथियार है. खून नहीं निकलता, लेकिन जान निकाल लेता है. इस सूए से मेरे पिता तेंदूपत्ते से भरे बोरे सिला करते थे. काम ऐसा करो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी टूटे,’’ 

कविता ने कहा.बाकी लड़कियां उस की तारीफ कर रही थीं. सुरेखा ने कहा, ‘‘बढि़या रहा सबक सिखाने का तुम्हारा तरीका. ये अधेड़ और बूढ़े लोग भी शर्मनाक काम करते हैं. अपनी मर्यादा भूल जाते हैं.’’

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