Superstition : औलाद की चाह में फंस रही औरतें

Superstition: भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में काफी तरक्की की है. जहां देश ने चांद पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाबी पाई है, वहीं एआई, रोबोट तकनीकी और पेट से न होने की समस्या से जूझ रही औरतों के लिए संतान पाने के इलाज के नए और सफल तरीके भी ईजाद हुए हैं.

आज मैडिकल के क्षेत्र में इलाज के कई नए तरीके मौजूद हैं, जिन की मदद से सालों से बच्चे का इंतजार कर रहे दंपतियों को भी मातापिता बनने में मदद मिल रही है.

इस सब के बावजूद भारत के हजारों गांवों, कसबों और छोटे शहरों में आज भी बच्चा न होने पर सब से पहले औरत को ही दोष दिया जाता है. डाक्टर से इलाज कराने के बजाय उसे ओझा, तांत्रिक या झाड़फूंक करने वाले बाबा के पास ले जाया जाता है. यहीं से उस की परेशानी शुरू होती है. कई बार इस के नाम पर पैसे ठग लिए जाते हैं, औरत के साथ गलत हरकत होती है, उस की बदनामी होती है और कभीकभी तो उस की जान तक चली जाती है.

दुख की बात यह है कि ऐसी घटनाओं को अकसर सिर्फ अंधविश्वास कह कर छोड़ दिया जाता है. औरतों के साथ होने वाला यह अपराध  केवल झाड़फूंक और शोषण से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह उस दकियानूसी सोच की कहानी है, जिस ने आज भी औरत की पहचान को उसकी कोख से जोड़ रखा है. शादी के कुछ साल बाद अगर संतान न हो तो परिवार, रिश्तेदार और समाज की उंगलियां सब से पहले औरत की ओर उठती हैं. उस के दर्द से पहले उस के चालचलन, नसीब और जिस्म का फैसला सुना दिया जाता है. यही सामाजिक दबाव उसे उन लोगों के सामने असहाय बना देता है जो धर्म, आस्था और चमत्कार के नाम पर अपराध का कारोबार चलाते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन और माहिर डाक्टरों का कहना हैं कि पेट से न होने का मसला केवल औरत से जुड़ा नहीं होता, बल्कि अनेक मामलों में कारण मर्द ही होते हैं, कई बार दोनों में कमी होती है और कई बार कारणों का पता भी नहीं चल पाता. इलाज

के नए तरीकों में जांच और दवा के साथ आईयूआई, आईवीएफ और आईसीएसआई जैसे तरीके भी शामिल हैं. इन से लाखों दंपतियों को बच्चा होने में मदद मिली है. इस के बावजूद समाज में सब से पहले यही कहा जाता है कि कमी बहू में है.

इसी मसले से जुड़ी एक घटना उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से जुड़ी है, जहां शादी के लगभग 10 साल बाद भी जब अनुराधा की गोद नहीं भरी तो परिवार उम्मीद की तलाश में एक तथाकथित तांत्रिक तक पहुंचा. परिजनों के आरोप के मुताबिक तांत्रिक ने संतान दिलाने का भरोसा दिया और इस के बदले बड़ी रकम मांगी.

झाड़फूंक के दौरान अनुराधा के साथ बहुत बुरा सुलूक किया गया. उस का गला दबाया गया, उसे बुरी तरह मारापीटा गया और कथिततौर पर नाले का गंदा पानी तक पिलाया गया. जब उस की हालत बिगड़ी तो उसे अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल पहुंचने पर डाक्टरों ने कहा कि अनुराधा की मौत हो चुकी है.

उत्तर प्रदेश के हाथरस में घटी घटना और भी डरावनी तसवीर सामने लाती है. शादी के 3 साल बाद भी संतान न होने से परेशान एक जवान औरत अपने पति और ननद के साथ एक तांत्रिक के पास पहुंची. उसे भरोसा दिलाया गया कि विशेष अनुष्ठान के बाद उस की गोद भर जाएगी.

तांत्रिक ने पति को मंदिर में बैठाए रखा और औरत को खेत में ले जा कर गुप्त पूजा के नाम पर उस के साथ गलत काम किया. बाद में जब औरत ने हिम्मत जुटा कर हकीकत बताई तो पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया.

जांच के दौरान एक और चौंकाने वाली बात सामने आई. औरत की ननद ने भी सालों पहले इसी तांत्रिक से झाड़फूंक कराई थी. आरोप है कि उस दौरान वह भी उस के जिस्मानी शोषण का शिकार हुई थी.

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में भी लगभग यही कहानी दोहराई गई. संतान न होने से परेशान औरत को किसी ने एक बाबा के बारे में बताया. बाबा ने दावा किया कि तंत्रमंत्र से उस की गोद भर जाएगी. औरत विश्वास कर बैठी.

इस के बाद कथित अनुष्ठान के नाम पर उस के साथ गलत किया गया और चुप रहने के लिए जान से मारने की धमकी दी गई. आखिरकार पीडि़ता ने हिम्मत दिखाई और पुलिस तक पहुंची, जिस के बाद आरोपी गिरफ्तार हुआ.

इन तीनों घटनाओं में राज्य अलग हैं, पात्र अलग हैं, लेकिन अपराध की पटकथा एक जैसी है. पहले औरत की सब से बड़ी पीड़ा को पहचानो, फिर उसी पीड़ा को चमत्कार के नाम पर हथियार बना कर उसका शोषण करो.

उत्तर प्रदेश के महोबा की एक घटना बताती है कि अंधविश्वास सिर्फ औरतों की इज्जत को ही नहीं, उन की जिंदगी को भी नुकसान पहुंचाता है. पेट से हुई एक औरत की तबीयत अचानक बिगड़ी. बच्चा होने से पहले की तकलीफ में हर मिनट कीमती होता है और डाक्टर की सलाह यही कहती है कि ऐसे हालात में तत्काल अस्पताल पहुंचना चाहिए. लेकिन परिवार ने इलाज कराने के बजाय झाड़फूंक का रास्ता चुना और उस औरत को एक तथाकथित तांत्रिक के पास ले जाया गया.

उस पाखंडी तांत्रिक द्वारा घंटों तक मंत्र, तावीज और झाड़फूंक का सिलसिला किया गया. लेकिन झाड़फूंक के चलते उस औरत की हालात बहुत नाजुक हो गई तब जा कर उसे अस्पताल ले जाने का फैसला लिया गया. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और अस्पताल पहुंचने से पहले ही औरत की मौत हो गई.

राजस्थान के बांसवाड़ा की घटना इस से भी ज्यादा विचलित करने वाली है. पेट से हुई एक औरत को दिमागी और शारीरिक परेशानी होने पर यह मान लिया गया कि उस पर भूतप्रेत का साया है. उपचार की जगह उसे लोहे की जंजीरों से बांध दिया गया. घंटों तक झाड़फूंक, मारपीट और तथाकथित तांत्रिक अनुष्ठान चलते रहे. जब तक उसे अस्पताल पहुंचाया गया, तब तक औरत और उस के पेट में पल रहे बच्चे की मौत हो चुकी थी.

य  ह केवल किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं थी. यह उस रूढि़वादी सोच का डरावना चेहरा था जिस में पेट से हुई औरत भी मरीज नहीं, बल्कि किसी दैवीय शक्ति का शिकार मान ली जाती है.

औरतों के मसले पर काम करने वाली माधुरी का कहना है देश के अलगअलग हिस्सों से लगातार सामने आने वाली ऐसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि अंधविश्वास का सब से बड़ा बोझ  औरतों  पर पड़ता है. कभी उन्हें डायन घोषित कर दिया जाता है, कभी ऊपरी साए का शिकार तो कभी बांझ  कह कर उन की सामाजिक पहचान ही खत्म करने की कोशिश की जाती है.

माधुरी ने आगे बताया कि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़े इस भयावह तसवीर की पुष्टि करते हैं.  साल 2020 में जादूटोना और डायन प्रथा से जुड़े 88 हत्या के मामले दर्ज हुए और साल 2022 में इस मामले में 85 लोगों की हत्या हुई. साल 2023 में यह संख्या 74 रही और साल 2024 में भी 54 हत्याएं दर्ज की गईं.

माहिरों का अंदाजा है कि पिछले 2 दशकों में देश में 2,500 से ज्यादा औरतों की जान जादूटोना, डायन प्रथा और अंधविश्वास से जुड़े मामलों में जा चुकी है. इन में बड़ी संख्या गरीब, दलित, आदिवासी, अकेली रहने वाली या सामाजिक रूप से कमजोर औरतों की थी.

इ न आंकड़ों का सब से दुखद पहलू यह भी है कि इन में दर्ज ज्यादातर घटनाएं केवल हत्या की नहीं हैं, बल्कि इन के पीछे महीनों और सालों तक चली लोगों की ज्यादती, सबके सामने बेइज्जती, पैसे की लूट, औरत के साथ गलत हरकत और मन को पहुंचाई गई तकलीफ छिपी होती है.

झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश लंबे समय से डायन प्रथा से जुड़े अपराधों के लिए चर्चा में रहे हैं. लेकिन अब उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों से भी झाड़फूंक और तंत्रमंत्र के नाम पर औरतों के शोषण की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. इस का मतलब है कि समस्या किसी एक क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि बदलते रूप में पूरे देश में मौजूद है.

यदि किसी दंपति को संतान नहीं होती, तो सब से पहले औरत को दोषी ठहरा दिया जाता है. यदि कोई औरत अवसाद, चिंता, मिर्गी, सिजोफ्रेनिया या किसी अन्य दिमागी बीमारी से जूझ रही हो तो उसे डाक्टर के पास ले जाने के बजाय ऊपरी हवा का शिकार मान लिया जाता है.

यदि किसी विधवा के पास थोड़ी सी जमीन हो, यदि वह संपत्ति में अपना अधिकार मांगे या सामाजिक रूप से अकेली हो, तो उसे डायन घोषित करना आसान समझ जाता है.

यदि कोई औरत परिवार के ज्यादती का विरोध करे तो उसे देवी का प्रकोप या बुरी आत्मा का डर दिखा कर चुप करा दिया जाता है यानी अंधविश्वास और पाखंड सिर्फ धर्म से जुड़ी गलत सोच नहीं है, बल्कि कई बार इस का इस्तेमाल औरतों को दबाने और उन्हें अपने काबू में रखने के लिए भी किया जाता है.

हमारे समाज में लंबे समय से मां बनना औरत की सब से बड़ी जिम्मेदारी माना जाता रहा है. औरत के लिए मां बनना खुशी और सम्मान की बात है. लेकिन जब किसी औरत की कीमत सिर्फ इस बात से तय होने लगे कि वह मां बनी है या नहीं, तो यही सम्मान उस के लिए दबाव बन जाता है.

शादी के कुछ साल बाद अगर घर में बच्चे की किलकारी न गूंजे तो सब से पहले बहू से ही सवाल किए जाते हैं. रिश्तेदार तरहतरह की सलाह देने लगते हैं और पड़ोसी ताने मारने लगते हैं. कई बार पति की जांच कराने की बात तक नहीं होती. यहीं सब से बड़ी गलती होती है.

जिला चिकित्सालय बस्ती में चिकित्सक डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि मैडिकल साइंस साफतौर पर कहती है कि गर्भधारण न होने के मामलों में केवल औरत ही जिम्मेदार नहीं होती. मर्दों में बच्चा पैदा करने की क्षमता से जुड़ी दिक्कत, हार्मोन से जुड़ी दिक्कतें. इंफैक्शन, लाइफ स्टाइल और कई दूसरे कारण भी समान रूप से जिम्मेदार हो सकते हैं.

अनेक मामलों में दोनों की जांच जरूरी होती है. आज के मैडिकल साइंस के पास इस का उपचार भी है, इस के बावजूद समाज विज्ञान पर नहीं, अंधविश्वास पर भरोसा करता है.

इसी मानसिकता का फायदा उठा कर कथित तांत्रिक औरतों  को विश्वास दिलाते हैं कि उन के ऊपर किसी आत्मा का साया है, किसी ने जादूटोना कर दिया है, पूर्वज नाराज हैं या विशेष पूजा के बिना संतान संभव नहीं है.

इस के बाद शुरू होता है शोषण का वह सिलसिला जिस में पहले पैसे लिए जाते हैं, फिर औरत को परिवार से अलग कर के गुप्त अनुष्ठान कराए जाते हैं, बाद में यही गुप्त अनुष्ठान जिस्मानी शोषण का जरीया बन जाता है.

औरतों के साथ होने वाली इस ज्यादती में उस के अपने परिवार के लोग भी जानेअनजाने में इन बाबाओं के सहयोगी बन जाते हैं. वे खुद ही पत्नी, बेटी या बहू को ऐसे लोगों के पास ले कर जाते हैं, क्योंकि उन्हें भी लगता है कि यही आखिरी उम्मीद है. अपराधी किस्म के यह तांत्रिक इसी विश्वास का सब से ज्यादा फायदा उठाते हैं और शुरू होता है औरत के शोषण का खेल.

माधुरी आगे बताती हैं कि आज झाड़फूंक केवल दूरदराज के गांव तक सीमित नहीं रह गई है. उस ने आधुनिक तकनीक का चोला भी पहन लिया है. फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और सैकड़ों वैबसाइटों पर कथित तांत्रिक खुलेआम विज्ञापन करते दिखाई देते हैं. संतान प्राप्ति की गारंटी, सौ प्रतिशत सफल तंत्र, पतिपत्नी में प्रेम, विदेश जाने का उपाय, हर समस्या का समाधान  जैसे दावे लोगों की आस्था नहीं, उन की मजबूरी को निशाना बनाते हैं.

सब से ज्यादा निशाने पर वे औरतें  होती हैं जो सालों से संतान न होने की पीड़ा झोल रही होती हैं. कई बार उन से कहा जाता है कि उन पर किसी आत्मा का साया है, किसी ने जादूटोना कर दिया है या पूर्वज नाराज हैं. इस के बाद शुरू होती है महंगी पूजा, विशेष अनुष्ठान, गुप्त साधना और तंत्रमंत्र. इस के बाद औरत के परिजनों से हजारों से ले कर लाखों रुपए तक वसूले जाते हैं.

सा  माजिक कार्यकर्ता माधुरी कहती हैं कि सब से बड़ी समस्या अंधविश्वास नहीं, बल्कि जानकारी की कमी है. उन के अनुसार, यदि शादी के बाद लंबे समय तक संतान न हो तो परिवार का पहला कदम किसी बाबा के पास जाना नहीं, बल्कि महिला और पुरुष दोनों की मैडिकल जांच कराना होना चाहिए.

आधुनिक मैडिकल साइंस आज अधिकांश कारणों की पहचान कर सकता है और अनेक मामलों में उपचार भी उपलब्ध है. लेकिन जब समाज पहले ही औरत को दोषी मान लेता है, तब वह उपचार के बजाय अपराधियों के जाल में फंस जाती है.

माधुरी का आगे कहना है कि गांवों में सेहत से जुड़े जागरूकता अभियान केवल गर्भवती औरतों तक सीमित नहीं रहने चाहिए. लोगों को यह भी बताया जाना चाहिए कि बांझपन किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं होता. पुरुषों की जांच उतनी ही जरूरी है जितनी औरतों की. यदि यह संदेश समाज तक पहुंच गया, तो हजारों औरतें  ढोंगी तांत्रिकों के चंगुल में फंसने से बच सकती हैं.  Superstition

Love and Sacrifice Story : हां, अनि : रोजी ने ठुकराया सुनील का प्यार

Love and Sacrifice Story : सीमा के संदर्भ में मैं ने एक कविता संग्रह ‘आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें’ शीर्षक से लिखा था, जिस की याद अब मुझे आ रही है और अनिता अक्षरश: उसे सुनाने लगी. मेरे अपने ही शब्द आज मुझे कितने भोथरे महसूस हो रहे हैं.

‘‘जितनी जल्दी हो सके…आओ इस जर्जर घड़ी को बदल डालें. वरना हरगिज माफ नहीं करेंगी हमें…आने वाली हमारी नस्लें…’’

सीमा, यानी अनिता की पुरानी सहेली, इतनी जल्दी वह घर आ धमकेगी, वह भी मेरी गैरमौजूदगी में, यह तो बिलकुल न सोचा था. कल शाम को बाजार में शौपिंग करते हुए अचानक वह मिल गई तो मैं चौंक उठा, जबकि उस के चेहरे पर ऐसा कोई भाव न उभरा था.

‘‘सुनील, यह सीमा है,’’ अनिता ने परिचय दिया, ‘‘मेरी प्रिय सखी.’’ ‘‘बड़ी खुशी हुई आप से मिल कर,’’ औपचारिकता के नाते कहना पड़ा. कड़वा सच एकदम से उगला भी तो नहीं जाता.

‘‘किसी हसीन लड़की से साली का रिश्ता जुड़ जाने पर भला कौन खुश नहीं होगा,’’ निसंकोच सीमा ने कहा और हंस पड़ी. वही 3 साल पुराना चेहरा, वही रूपरंग, कातिल अदा, मोतियों से चमकते दांत, कुदरती गुलाबी होंठ और उसी तरह गालों को चूमती 2 आवारा लटें, कुछ भी तो न बदली थी वह. हां, उस का यह नाम जरूर पहली बार सुना और अपनी बात पर स्वयं ही खिलखिला उठना कतई न सुहाया. मन में दबी नफरत की चिंगारी भड़क उठी और ‘साली का संबोधन’ अंगारे की तरह अंदर जलाता चला गया.

‘‘अच्छा, मैं चलूं, अनिता,’’ सहसा वह बोली.

मैं उस से पूछना चाहता था कि इतना कह देने भर से ही क्या तुम छूट जाओगी और मेरी यादों के कैनवास पर से तुम्हारे चरित्र के दाग मिट जाएंगे?

‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है,’’ अनिता ने कहा, ‘‘इतने बरसों बाद तो मिली हो, घर चलो, आराम से बैठ कर बातें करेंगे.’’ ‘‘फिर कभी आऊंगी, अभी जल्दी में हूं, अपना पता दे दो.’’

अनिता ने उसे अपना विजिटिंग कार्ड थमा दिया था.

रात भर मैं यही सोचता रहा कि उस ने अनिता के सामने ऐसा क्यों जताया कि हम पहली बार मिले हैं. क्या वह मुझे उस पत्र से ब्लैकमेल करना चाहती है, जिस में प्रेम के साथसाथ मैं ने उस से विवाह करने की इच्छा भी जाहिर की थी? ऐसी लड़कियों का भरोसा ही क्या? आज सारा दिन आफिस में भी दिमाग अशांत रहा. शाम को थकाहारा घर लौटा तो अनिता ने ठंडे पानी के साथ गरमागरम खबर दी, ‘‘दोपहर में सीमा आई थी.’’

सुनते ही मैं सोफे पर से उछल पड़ा, कई सवाल दिमाग में कौंधे…क्यों वह मेरे शांत व सुखी घरेलू जीवन में तूफान लाने पर तुली है अनिता, अब तक मां नहीं बन सकी तो क्या हुआ, दोनों में अच्छा तालमेल तो है.

‘‘रहने की तलाश में है बेचारी,’’ अनिता ने बताया, ‘‘अपने पड़ोस में खाली पड़ा मकान तय करवा दिया है और कह रही थी, प्लीज जीजाजी से सिफारिश कर के कहीं काम पर रखवा देना.’’

मैं बोला, ‘‘देखूंगा.’’ ‘‘देखूंगा नहीं,’’ अनिता ने जोर दिया, ‘‘उसे सर्विस दिलानी है, वह आप की बहुत प्रशंसा कर रही थी.’’

‘‘क्या कह रही थी?’’ ‘‘ऐसा नेक पति भाग्य से मिलता है,’’ पत्नी के होंठों पर मंदमंद मुसकान देख…मेरा चोर मन बोला कि निश्चय ही यह सबकुछ जान कर…अब मजा ले रही है.

‘‘शोख और चंचल है ना, इसलिए मजाक भी कर रही थी.’’ ‘‘क्या?’’

‘‘जानेमन, शादी से पहले अगर जनाब को देख लेती तो तुम्हारी जगह आज मैं होती,’’ शुक्र है, लेकिन तभी अनिता ने यह कह कर मुझे फिर झटका दिया, ‘‘मैं देख रही हूं…कल शाम से आप कुछ अपसेट हैं?’’

‘‘नहीं, मैं ठीक हूं,’’ स्वयं को संभालते हुए मैं ने कहा, ‘‘एक बात कहूं अनि, मानोगी?’’ ‘‘कहो.’’

‘‘सीमा से अब तुम्हारा मेलजोल बढ़ाना ठीक नहीं.’’ ‘‘क्यों?’’ वह सकपका गई, ‘‘क्या दोष है उस में?’’

दोष, यह पूछो, क्या दोष नहीं है उस में? पर इतना कह न पाते हुए मैं बोला, ‘‘हमारा स्तर उस से…’’

‘‘यह तो कोई बात न हुई,’’ अनिता ने एकदम से कहा, ‘‘आखिरकार वह मेरी पुरानी दोस्त है.’’

इस विषय को बदलने के लिए मैं कपड़े बदल कर हाथ में रिमोट ले कर टीवी खोलता हूं, पर यह क्या? हर चैनल पर सीमा मौजूद है. झल्ला कर रिमोट, मेज पर रखते हुए अपनी एक पत्रिका उठा लेता हूं, उस के पन्नों पर भी वही चेहरा दिखता है तो हार कर पत्रिका मेज पर पटक देता हूं और अपने दोनों पैर मेज पर फैला कर व सिर सोफे पर टिकाते हुए पलकें मूंद लेता हूं, तो सीमा, नहींनहीं, रोजी का चेहरा सजीव होने लगता है.

मुंबई के ‘प्रिंस’ होटल की रजत जयंती का मौका था. उस रात होटल में नृत्य का एक विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ था. कार्यक्रम शुरू होने में अभी कुछ देर थी. मैं डिनर ले कर अपनी मेज पर अकेला ही काफी पीने लगा. सहसा 2 नारी स्वरों ने चौंका दिया. कनखियों से उधर देखा तो बस, देखता ही रह गया. वहां 2 नव- युवतियां एक मेज पर बैठी नजर आईं, उन में एक सांवली सी गदराए बदन की बिल्लौरी आंखों वाली सामान्य लड़की थी, जिस ने कत्थई रंग की मैक्सी पहन रखी थी.

दूसरी, पहली बार में ही असामान्य लगी. गुलाबी साड़ीब्लाउज में सजासंवरा उस का मदमस्त यौवन लोगों के दिलों पर कहर ढा रहा था. कुछेक क्षणों के लिए तो मेरा दिल भी थम सा गया. यों लगा मानो वह नृत्य प्रोग्राम के बजाय, किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने आई हो.

बीयर के जाम पर नाचती हुई उस की उंगलियां देख कर किसी नाजुक टहनी पर अधखिली कलियों के मंदमंद हवा में हिलने का भ्रम हुआ. उस ‘गुलाबी सुंदरी’ को अपनी सखी के साथ इस तरह अकेले बीयर पीते देख मैं ने उसे किसी बड़े घराने की माडर्न लड़की ही समझा. वह जितनी सुंदर उतनी ही चंचल लगी. मेरा ध्यान  अब तक उधर क्यों नहीं गया? इस का अफसोस तो हुआ ही, साथ में यह ताज्जुब भी कि वे दोनों डांस में मुझे अपना पार्टनर बनाने को आतुर हैं.

प्रोग्राम शुरू होने जा रहा है, जिन के पास निजी पार्टनर नहीं हैं, वे हाल में बैठे लोगों में से  अपना मनपसंद पार्टनर ढूंढ़ने लगे. कत्थई मैक्सी वाली को एक मनचले युवक ने आमंत्रित कर लिया, ‘गुलाबी रूपसी’ को उस का आफर ठुकराते देख मुझे एक अनजानी खुशी महसूस हुई.

सहसा तभी होटल मैनेजर ने स्टेज पर ताली बजाते हुए लोगों का ध्यान खींचा और माइक में बोला, ‘लेडीज एंड जेंटल मैन, जैसा कि आप सब जानते हैं, आज हम इस पिं्रस होटल की सिल्वर जुबली मनाने जा रहे हैं. पिछले अनेक सालों से निरंतर हमें आप का जो अपार स्नेह व भरपूर सहयोग मिलता रहा है, उस के लिए यह होटल आप सब का आभारी है, और आशा नहीं, पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में भी हमें आप सब का इसी तरह सहयोग मिलता रहेगा.

‘आज के स्पेशल डांस प्रोग्राम में सर्वप्रथम आप बाल रूम डांस का लुत्फ उठाएंगे, फिर टैब डांस का और अंत में आर्केस्ट्रा की धुन में तेजी आ जाएगी, जो हर पल बढ़ती ही रहेगी. आखिर तक इस तीव्र धुन पर नाचने वाला जोड़ा, आज के डांस प्रोग्राम का विनर प्राइज हासिल करेगा.’

हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

नृत्य आरंभ हो गया. आर्केस्ट्रा की धीमी व मीठी धुन हाल में रस घोलने लगी. चारों तरफ एक अजीब सा उन्माद छा गया. जवान क्या, बूढे़ भी एकदूसरे की कमर में बांहें डाल थिरकते हुए डांसिंग फ्लोर पर आ गए, धीमी गति के नृत्य का मधुर समां देखते ही बनता था.

रात के उस दौर में शराब और शबाब का अनूठा मेल पा कर मेरा सूफी मन भी उस में डूब जाने को मचल उठा. उस ‘गुलाबी प्रिया’ को यथावत बैठी देख मैं प्रसन्नता से झूमता चला गया.

‘आई एम सुनील कुमार,’ नाम बताते हुए उस से बोला, ‘क्या आप मेरे साथ डांस करेंगी?’

‘श्योर,’ वह मुसकरा दी, ‘मुझे रोजी कहते हैं.’ ‘वेरी गुड,’ मैं चहका, ‘आप के पेरेंट्स ने बहुत सोचसमझ कर यह नाम रखा होगा?’

‘नहीं, ऐसा नहीं है,’ रोजी पुन: मुसकराने लगी और उठ कर अपना खूबसूरत एवं नाजुक हाथ बढ़ाते हुए बोली, ‘आइए, डांस करें.’

कहीं फिर न चूक जाऊं, इसलिए प्यार से उस का हाथ पकड़ते हुए मैं ने ‘थैंक्यू’ कहा. नृत्य में वह इस कदर खुल कर पेश आई मानो हम पहले से एकदूसरे को जानते हों. खैर, उस रात विशेष डांस प्रोग्राम में रोजी के साथ मुझे ही ‘ताजमहल’ मिला, लेकिन विदा होते समय जब उसे प्राइज सौंपा तो वह उदास लगी, मानो उस की उम्मीदों पर मैं खरा नहीं उतरा.

इस के बाद रोजी कई बार क्लब, होटल, सिनेमा, समंदर के किनारे आदि जगहों पर मिली लेकिन वह हमेशा जल्दी में होती जबकि मैं निरंतर महसूस करता कि वह जानबूझ कर ऐसा करती है. उस की चेष्टा कतरा जाने में रहती है. अचानक ही सामने आ जाने से उस के चेहरे पर नागवारी के जो भाव उभरते उन्हें आसानी से मैं पढ़ लेता. उसे मानो मेरा मिलना अखरता हो.

वह मेरे होशोहवास पर इस तरह छा गई कि मैं एकांत में छटपटा उठता और तब मुझे ऐसा लगता कि उस के बगैर वजूद अधूरा है. प्राय: मैं सोचता, ज्यों ही वह मिलेगी तो फौरन उस के आगे पे्रम का इजहार कर दूंगा, लेकिन रोजी की व्यस्तता और जल्दबाजी…कुछ कहने का मौका न देती.

एक दिन सोचा कि बात ऐसे नहीं बनेगी, अत: रोजी के वास्ते मैं ने एक पत्र लिखा, जिस में प्रेम के साथसाथ उस से विवाह रचाने की इच्छा भी प्रकट की और अब वह पत्र सदा जेब में रहता, ताकि मिलते ही उसे थमा दूं.

सहसा एक दिन शाम को वह सड़क पर भीड़ में जाती दिखाई दी. मैं ने जोर से नाम ले कर उसे पुकारा. उस ने चौंक कर पीछे देखा. मैं ने झट से गाड़ी फुटपाथ के साथ ले जा कर रोक दी तो उसे नजदीक आना ही पड़ा.

‘हाय, रोजी.’ ‘हाय…’ मुसकराने के बावजूद उस के चेहरे पर बेरुखी उभर आई. सफेद पैंट और टौप पर खुली केश राशि में वह बिजलियां गिराती नजर आई.

मैं कह उठा, ‘आओ, जुहू पर टहलें.’ ‘सौरी, आज फिर बिजी हूं,’ खेद भरे स्वर में वह बोली.

‘आओ तो सही, जहां कहोगी वहां उतार दूंगा.’ दिल की बात कहने के लिए इतना सफर ही बहुत होगा.

‘बेकार आप को परेशान…’ ‘मैं फुरसत में हूं,’ उतावलेपन से मैं उस की बात बीच में काटते हुए बोला तो उस से इनकार करते न बन पड़ा.

कार का अगला गेट खोलते हुए वह चुपचाप मेरी बाजू में आ कर बैठ गई. उस के बदन का मधुर स्पर्श पाते ही बात कहां से शुरू करूं समझ में न आया और कुछेक क्षण यों ही निकल गए.

‘मुझे यहीं उतरना है,’ रोजी ने कहा. ‘ठहरो रोजी.’

जातेजाते वह पलटी. मैं ने पत्र निकाल कर उसे देते हुए भारी स्वर में कहा, ‘एकांत में इसे जरूर पढ़ लेना.’

रोजी उसे ले कर भीड़ में समा गई. मैं ने देखा, वह क्लब के सामने उतरी है.

अगली मर्तबा मिलते ही रोजी खिलखिला कर हंस पड़ी.

मैं अवाक् सा मोतियों की भांति चमकते उस के दांत देखता रह गया. हंसतेहंसते उस की आंखें नम हो गईं. थोड़ी देर बाद अपनी हंसी पर काबू पाते हुए वह बोली, ‘बस, इतनी सी बात के लिए कागज रंग डाला. कितनी बार तो मिली हूं? कभी भी कह दिया होता.’

‘तुम्हारी व्यस्तता और जल्दबाजी ने मौका ही कब दिया?’

एकाएक रोजी गंभीर हो गई. माथा सिलवटों से भर गया. मानो किसी उलझन में फंस गई हो…हां…कहेगी या ना? सोचते हुए मैं ने उसे टोका, ‘जवाब दो, रोजी.’

उस की चंचलता पुन: लौट आई और वह अपने आंसू इतनी सफाई से पी गई कि मैं देख कर दंग रह गया. ‘बेकार शादी के लफड़े में क्यों पड़े हो?’ जबरन हंसते हुए उस ने कहा, ‘मैं तो यों ही तुम्हारी बन जाने को तैयार हूं, चलो, कहां ले जाना चाहते हो मुझे?’

रोजी, अश्लीलता की सारी हदें पार कर गई थी. निर्लज्जता से भरा यह निमंत्रण पा कर मन में आया कि एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दूं, लेकिन कुछ सोचते हुए दुख, आश्चर्य व क्रोध से कसमसा कर रह गया.

‘मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी, रोजी.’ ‘गलती की, जो एक सेक्स वर्कर से आप कोई दूसरी उम्मीद कर बैठे.’

रोजी ने मानो पिघला हुआ शीशा कानों में उड़ेल दिया हो. सहज ही उस के शब्दों पर विश्वास न हुआ और मैं पागलों की भांति उसे देखता रह गया. यह खूबसूरत लड़की…बाजारू माल कैसे हो सकती है? नहीं…नहीं…पर जो पहले से था, उस पर यकीन करना ही पड़ा. उस के मुख से यह कड़वा सच सुन प्यार के साथसाथ अब उस के प्रति सहानुभूति भी उमड़ आई. जीवन में इस अंधेरी राह पर जाने के पीछे अवश्य कोई मजबूरी रही होगी. उसे जानने की इच्छा से ही मैं कातर स्वर में बोला, ‘इतनी सुंदर, पढ़ीलिखी और समझदार हो कर भी तुम ने यह लाइन क्यों पकड़ी, रोजी?’

‘अरे, तुम तो भावुक हो गए,’ वह उपहास उड़ाते हुए खिलखिला उठी, जबकि मैं उसे अपनी आंतरिक वेदना पर हंसी का लबादा ओढ़ते हुए साफसाफ देख रहा था.

‘मजाक नहीं रोजी, मैं अब भी तुम्हें अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं,’ सचमुच भावुकता के वेग में मैं बहता ही चला गया, ‘तुम्हारे अतीत से मुझे कोई सरोकार नहीं…और न ही भविष्य में कभी कुछ पूछूंगा, मैं तो सिर्फ…तुम्हें इस अंधेरे से उजाले में ले जा कर एक नए जीवन की शुरुआत करना चाहता हूं, जहां हम दोनों और हमारी खुशियां होंगी.’

‘तुम्हारे विचार और भावनाओं की मैं कद्र करती हूं, सुनील,’ वह यथार्थ के कठोर धरातल से चिपकी रह कर ही बोली, ‘मगर अफसोस, तुम्हारा औफर ठुकराने पर मजबूर हूं, मेरे हालात ऐसे हैं कि लाख चाहने पर भी मैं उन के खिलाफ कोई फैसला नहीं ले सकती.’

‘मुझ पर भरोसा करो, रोजी,’ मैं ने तहे दिल से कहा, ‘हम हर मुश्किल आसान कर लेंगे, प्लीज, बताओ तो सही.’

‘यह नामुमकिन है, सुनील,’ कह कर उस ने एक गहरी सांस ली और फिर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख कर बोली, ‘अच्छा, मैं अब चलूं.’

लेकिन जातेजाते ठहर गई. उसी कातिल अदा से पलट कर देखा और हंस कर बोली, ‘यों रास्ते में अचानक ही घेर कर मेरा धंधा खराब मत किया करो. पहले दिन भी तुम्हें अपना ग्राहक समझा था मैं ने और मेरी वह रात बेकार गई. खैर, कोई बात नहीं, तुम से मुझे न जाने क्यों अजीब सा लगाव हो गया है और उसे मैं कोई नाम नहीं देना चाहती. हां, अगर तुम चाहो तो हफ्ते में एक नाइट तुम्हारे साथ मुफ्त गुजार दिया करूंगी.’

‘‘रोजी…’’ ‘‘क्या हुआ?’’ अनिता किचन से बाहर आ गई, ‘‘क्यों चिल्ला रहे हो? तबीयत ठीक तो है?’’

‘‘हां, मैं ठीक हूं,’’ कह कर माथे से पसीना पोंछते हुए बोला, ‘‘आज चाय नहीं दोगी?’’ ‘‘एक मिनट, अभी लाई,’’ और वह लौट गई.

मैं फिर रोजी के बारे में सोचने लगा.

रोजाना आफिस आतेजाते सड़कों पर या जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी वे सारे ठिकाने देख डाले पर रोजी नहीं मिली. फिर अचानक एक दिन भीड़ में वह नजर आ गई. फौरन कार फुटपाथ के एक ओर रोक कर मैं पैदल ही उस के पीछे हो लिया.

‘रोजी…’ हांफते हुए मैं ने पुकारा. पर वह अनजान सी आगे बढ़ती रही. मुझ से रहा न गया तो दौड़ कर उसे पकड़ लिया और फुटपाथ पर खींच लिया.

‘आखिर तुम चाहते क्या हो?’ पलटते ही वह एकदम गुर्राई, ‘क्यों हाथ धो कर मेरे पीछे पड़े हो?’ ‘आई लव यू, रोजी.’

उस ने सहम कर इधरउधर देखा, फिर बोली, ‘देखो, मैं चिल्ला उठी तो यहां लोग जमा हो जाएंगे और वे सब तुम्हें इश्क का मतलब समझा देंगे, पुकारूं?’

मैं यह सोच कर सिर से पांव तक सिहर गया कि वह मेरे साथ ऐसा भी कर सकती है. उस की बांह पर कसा मेरा हाथ दूसरे ही क्षण ढीला पड़ता चला गया.

‘आइंदा यह हरकत मत करना, वरना…’ चेतावनी देते हुए उस ने हाथ छुड़ाया और भीड़ में खो गई, मैं पागलों की तरह खड़ा रह गया.

उस के बाद रोजी कभी नहीं मिली और न ही मन में कभी उस से मिलने का खयाल आया. जब कभी उसे ले कर मन घृणा से भरता तो मैं कविता के सहारे उसे हलका कर लेता.

काशीपुर में दीदी की ससुराल है. वह अकसर फोन करती रहतीं कि तेरे लिए एक लड़की देखी है, कभी आ कर हां, ना बता जा. मातापिता के बरसों पहले गुजर जाने के बाद इस जहान में वही तो हैं, उन की यह बात न रखी तो वह भी मुंह मोड़ लेंगी. सो, मैं एक माह की छुट्टियां ले कर काशीपुर आ गया.

कांता दीदी ने मेरी पसंद को ध्यान में रखा था. लड़की देखते ही रिश्ता पक्का हो गया. जीजाजी तो मानो पहले से ही पूरी तैयारियां किए बैठे थे. अनिता के साथ चट मंगनी, पट ब्याह होते ही मैं अनिता को ले कर हनीमून मनाने के लिए नैनीताल जा पहुंचा. ऊंचीऊंची पर्वत श्रेणियों से घिरा नैनीताल का सुंदर इलाका, सुंदरतम झील और हरीभरी वादियों में पता ही न चला कि छुट्टियां कब गुजर गईं. हम दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ गए, जैसे बचपन से साथ रहे हों. नैनीताल से काशीपुर, 2 दिन दीदी के यहां रह कर हम मुंबई आ गए.

उन्हीं दिनों की बात है, जब गुप्ता इंटरप्राइजेज ने पुणे में भी अपनी शाखा खोली. चूंकि कंपनी के मालिक मेरी कार्यकुशलता व ईमानदारी से पूरी तरह संतुष्ट थे. इसलिए यहां की जिम्मेदारी भी मुझे ही सौंपी गई. यहां मुंबई के मुकाबले मुझे ज्यादा सुविधाएं मिलीं.

अनिता के साथ पिता न बन पाने के बावजूद चैन से हूं. उस की बच्चेदानी में इंफैक्शन है. डाक्टर का कहना है, शीघ्र ही उसे आपरेशन द्वारा निकाला नहीं गया तो अनिता की जान को खतरा हो सकता है.

कल शाम से सीमा ने हमारे दांपत्य जीवन में हलचल मचा दी. समझ में नहीं आ रहा कि आखिर वह चाहती क्या है? ऐसी बाजारू लड़कियों का भरोसा ही क्या? अपनी इज्जत तो नीलाम करती ही हैं, दूसरे की भी मिट्टी में मिला देती हैं. सीमा अगर अनि से कह दे कि 3 साल पहले मैं ने उसे न केवल पत्नी बनाना चाहा था, बल्कि उस के द्वारा विवाह का प्रस्ताव ठुकरा देने पर बुरी तरह अपमानित भी हुआ था, तो क्या मैं उस की निगाह में ठहर पाऊंगा? अगर सीमा ने कहीं अनिता को वह पत्र दिखा दिया तो क्या जवाब दूंगा? अगर उस ने यह भेद छिपाने की कीमत मांग ली तो कैसे अदा करूंगा? उफ.

‘‘बेशर्म, कमीनी,’’ क्रोध में मैं बड़बड़ा उठा.   ‘‘किसे विभूषित किया जा रहा है, महोदय?’’ चायनाश्ता टे्र में लाते हुए अनिता ने पूछा तो मैं हड़बड़ा गया, मानो रंगेहाथों चोर पकड़ा गया हो.

‘‘क्षमा करें, बंदी से भूल हो गई,’’ अपने खास लहजे में उस ने चोट की. ‘‘सौरी.’’

‘‘भविष्य में ध्यान रहे,’’ वह महारानियों की तरह मुसकराई.

चाय से पहले, मुंह में चिप्स डाला तो मन में यह खयाल आया कि क्यों न अनिता को अपने अतीत के बारे में बता दूं और अपराधबोध से मुक्त हो जाऊं? यह तो मुझे अच्छी तरह समझती है. मेरी कविताओं की सहृदय पाठक ही नहीं, बल्कि समालोचक भी है. हां, इसी के सहयोग व प्रेरणा से तो ‘कायर नहीं हैं हम’ और ‘आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें’ कविता संग्रहों का प्रकाशन हुआ है.

‘‘सीमा को तुम कब से जानती हो, अनि?’’ रहस्योद्घाटन से पहले टोह लेना चाहा.

‘‘बचपन से,’’ उस ने बताया, ‘‘बाजपुर में उस का परिवार हमारे पड़ोस में ही रहता था, 9वीं में वह अपने मम्मीपापा के साथ वाराणसी चली गई थी. कुछ समय तक हमारे बीच फोन पर बातचीत होती रही, फिर वे लोग, भैया की शादी में नहीं आए, तो फोन आना बंद हो गया. उस के बाद वह कल शाम ही मिली, क्यों?’’

‘‘उसे नौकरी पर लगवाने के लिए पूछ रहा हूं. उस की योग्यता क्या है?’’

‘‘अंगरेजी से बी.ए. फाइनल नहीं कर सकी थी.’’ ‘‘क्यों?’’

‘‘हीरोइन बनने की गरज से अपने प्रेमी के साथ मुंबई भाग आई थी, फिर स्टूडियो के चक्कर लगातेलगाते हताश हो कर उस ने घर लौट जाने का फैसला कर लिया था. उस का वह प्रेमी उस के गहने व रुपए ले कर चंपत हो गया और जातेजाते उसे लड़कियों से जबरन धंधा कराने वाले एक गिरोह के एजेंट को बेच गया जिस के बौस के पास कई पुरुषों के साथ बेहोशी में शूट की गई उस की ब्लू फिल्म थीं.’’

‘‘कंप्यूटर तो जानती होगी?’’ ‘‘हां, प्लीज…कोई जगह खाली हो तो उसे रख लो,’’ अनिता ने आग्रह किया.

‘‘मैं हंसा,’’ वह भी फ्री में… ‘‘उस के पास देने को है भी क्या?’’

‘‘है, जो हमारे पास नहीं है.’’ ‘‘मतलब?’’ अनिता चौंकी थी.

‘‘कोख.’’ वह भी हंसी, ‘‘तो पापा बनने को व्याकुल हो. मैं जानती हूं.’’

‘‘अनि…क्या तुम उसे स्वीकार कर सकोगी. कहीं वह मुझ पर अधिकार न जता ले?’’

‘‘‘सीमा के संदर्भ में’ आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें, संग्रह की शीर्षक कविता याद आ रही है मुझे,’’ और वह अक्षरश: उसे सुनाने लगी.

दीवार घड़ी में थरथर कांप कर, आगे बढ़ती हुई सुइयों को निहारते हुए चुपचाप मैं सुनता रहा…उस की आवाज…और अंत में बोला, ‘‘स्पष्ट करो.’’

‘‘सीमा एक सेक्स वर्कर है, यह जान कर भी आप उसे अपनाने को तैयार हो गए थे, तो…’’

मैं दंग रह गया, ‘‘यानी…’’ मुख से बमुश्किल निकला. ‘‘हां, आज दोपहर सीमा…सबकुछ बता गई.’’

अपराधबोध से मैं दब गया.

‘‘लेकिन उस ने आप को ठुकरा  दिया क्यों? कभी सोचा आप ने.’’ ‘‘हां, कई बार सोचा था,’’ पर किसी नतीजे पर न पहुंच सका.

‘‘दरअसल, वह आप से बेहद प्रभावित हुई थी,’’ अनिता बोली, ‘‘उसे एक अजीब सा लगाव हो गया था आप से, जिसे वह कोई नाम नहीं देना चाहती थी. एक और बात थी कि आप की भलाई भी उस के पांव की जंजीर बन गई.’’

अनिता ने एक नया रहस्य खोला तो मैं बोला, ‘‘उसे और स्पष्ट करो.’’

‘‘लड़कियों की नजरबंदी के लिए तैनात सुरक्षा गार्ड, अगर आप को सीमा के इर्दगिर्द ज्यादा समय तक देख लेते तो आप की जान चली जाती और इसीलिए जानबूझ कर सीमा ने आप के मन में अपने प्रति नफरत भर दी ताकि आप उस से दूर हो जाएं.’’

मैं आश्चर्य से भर कर पत्नी को देखने लगा तो वह आगे बोली.

‘‘यह तो समूचा विपक्ष एक हो जाने पर पिछले दिनों सरकार को उन दरिंदों के खिलाफ काररवाई करने के लिए पुलिस को सख्त आदेश देने पड़े. तब कहीं वह मुक्त हो पाई और घर जा सकी.

‘‘अंकल, सीमा के भाग जाने का आघात बरदाश्त न कर पाते हुए पहले ही चल बसे थे. उस पर बदनामी का दंश…बेचारी कब तक झेलती रहती? छोटे भाईबहन और बीमार मां के साथ तंग आ कर आखिर में वह वाराणसी से पूना चली आई.’’

‘‘पगली, इतना बड़ा त्याग कर डाला, सिर्फ मेरे लिए? क्या लगता हूं मैं उस का? मैं तो आज तक उस से घृणा करता रहा…उसे गलत समझता रहा… छि…छि…छि…’’

‘‘अब तो यही हो सकता है कि हम कुछ करें, सीमा जैसी लड़कियों के लिए,’’ अनिता ने मानो अंदर झांक लिया हो.

‘‘हां, अनि,’’ ये दो शब्द अनंत गहराइयों से निकले पर मुझे नहीं मालूम था कि यह फैसला सही है या गलत. अगर बच्चा हो गया तो क्या उसे अनिता स्वीकार करेगी. और क्या सीमा वास्तव में बच्चे को और मुझे छोड़ कर जाएगी. मैं ने गहरी सांस ली और सब कुछ अनिता पर छोड़ दिया. Love and Sacrifice Story

Blind Faith Story : रंपो

Blind Faith Story. साधु की बात सुन कर रंपो परेशानी में पड़ गई. क्या करे वह? पति को अच्छा करना है, तो साधु की बात माननी पड़ेगी. इज्जत चली जाएगी, लेकिन पति तो बच जाएगा.

साधु ने उस का हाथ पकड़ लिया और पूछा, ‘‘क्या सोच रही है?’’

रंपो अपनी कलाई को उस के हाथ से छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली, ‘‘आप की बात मान रही हूं बाबा, पर मेरा पति अच्छा हो जाना चाहिए.’’

साधु ने उस के गले में बांहें डालते हुए कहा, ‘‘हम खुश तो देवता खुश. तू चिंता मत कर. तेरा पति पूरी तरह ठीक हो जाएगा.’’

रंपो को साधु की बात पर पूरी तरह यकीन हो गया. वह मंदिर में ही लेट गई. उस ने अपना जिस्म साधु को सौंप दिया.

अपनी वासना का शिकार बनाने के बाद साधु बोला, ‘‘अब जा. कोई आ गया, तो गड़बड़ हो जाएगी.’’

रंपो खड़ी होते हुए बोली, ‘‘बाबा, देवता से सच्ची प्रार्थना करना.’’

साधु उसे हलका सा बाहर की ओर धकेलते हुए बोला, ‘‘जा, अब जल्दी जा यहां से. तू चिंता मत कर.’’

रंपो मंदिर से बाहर निकल आई. भीतर की तरह बाहर भी वैसा ही अंधेरा था. वह अपने पति के पास आ गई. वह सो रहा था. रंपो भी उस के बगल में जा कर लेट गई. उस का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. उसे बारबार अपने किए पर पछतावा हो रहा था. पर फिर सोचा कि कल की सुबह नई रोशनी ले कर आएगी. सालों से बीमार पड़ा उस का पति ठीक हो जाएगा.

रंपो तो अपने पति को यहां ठीक कराने लाई थी. उसे क्या पता था कि देवता भी उस की जाति वालों से फर्क करते हैं. उस की आंखों में एकएक कर वह नजारा साफसाफ घूम रहा था.

उस ने तो साधु के पैरों में पड़ कर मंदिर के देवता के दर्शन की भीख मांगी थी, लेकिन साधु मंदिर की सीढि़यों पर खड़ा हो कर उसे दुत्कारते हुए बोला था, ‘बेहूदा औरत, दूर हट. यह देवता का मंदिर है. सीढि़यां मत चढ़ जाना. तेरा पति बीमार है, तो ठीक हो जाएगा. ले, भभूत ले जा, पर देवता के दर्शन तू नहीं कर पाएगी. देवता तो ऊंची जाति वालों के हैं.’

रंपो और उस का पति दोनों गांव के लोगों के कपड़े धो कर गुजारा करते थे.

रंपो दोनों हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘देवता तो सभी के हैं. वे किसी जाति से बंधे हुए नहीं होते. मेरे पति दर्द से मरे जा रहे हैं. दर्शन कर लेने दो. हो सकता है, देवता सुन लें. मेरे पति को इस दर्द से छुटकारा मिल जाए, तो मैं आप का एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी.’

रंपो का पति भी गुजारिश भरी नजरों से उस साधु की ओर देख रहा था, पर साधु का उस ओर कोई ध्यान नहीं था.

चमकते लंबे काले बाल, गले में रुद्राक्ष की माला, गेरुए रंग का चमकता कुरताधोती, साधु के चेहरे पर अपने बड़े होने का दंभ साफ रूप से नजर आ रहा था.

साधु रंपो से फिर बोला, ‘तू तो विधवा होगी ही, हम को भी खाएगी. तेरे पति की पीठ में कैंसर का फोड़ा है. वह बच नहीं सकता. क्यों मेरी जान के पीछे पड़ी है? मैं ने तुझे मंदिर में आने दिया, तो समाज मुझे नहीं छोड़ेगा.’

‘मुझ पर रहम करो बाबा. मुझे  देवता के दर्शन कर लेने दो. मुझे  पूरा भरोसा है कि देवता मेरी अर्जी जरूर सुन लेंगे,’ रंपो ने गुजारिश की.

रंपो की बातों से साधु का दिल पिघलता नजर आया. वह बोला, ‘अभी थोड़ी देर रुक जा. दिन डूबने को है. जब सब चले जाएं, तब तू दर्शन कर के जाना, तब तक बाहर बैठ.’

साधु के कहने से रंपो को हिम्मत बंध गई थी. वह अपने पति रामहेत का हाथ पकड़ कर मंदिर से दूर ले गई.

वह साधु को मन ही मन दुआ देने लगी. महंगे इलाज की इस दुनिया में इतना पैसा उस के पास कहां था कि डाक्टरों से औपरेशन करा सके. अब तक छोटेमोटे डाक्टरों से ही उस ने बहुत इलाज कराया था. रुपए लगातेलगाते वह कंगाल हो गई थी, पर कैंसर में कोई फर्क नहीं पड़ा था.

रंपो के बच्चे अभी छोटे थे. लड़का 10 साल का और दोनों लड़कियां 5 साल और 7 साल की थीं. अब वह माली रूप से बुरी तरह टूट चुकी थी. लोगों ने सलाह दी थी कि अगर देवता ने उस की सुन ली, तो वे रामहेत को ठीक कर सकते हैं. इन देवता ने इस से पहले कई लोगों की बीमारी ठीक की है.

रंपो भी यही चाहती थी कि देवता उस की सुन लें, इसीलिए वह यहां उन के दर्शन करने आई थी. मगर यहां उस की जाति आड़े आ गई. निचली जाति में पैदा होने की वजह से साधु उसे मंदिर में घुसने नहीं दे रहा था.

रंपो ने कपड़ों की गठरी में से एक मैली सी चादर निकाली और रामहेत के नीचे बिछा दी.

रामहेत बोला, ‘दर्द से मरा जा रहा हूं रंपो. अब सांस लेना भी दूभर हुआ जा रहा है. या तो आज रात देवता सुन लेंगे, नहीं तो कल सुबह का सूरज मुश्किल से देख पाऊंगा.’

दिन ढल चुका था. मंदिर से लोगों की भीड़ कम होती जा रही थी. धीरेधीरे आसमान में तारे दिखाई देने लग गए थे. चारों ओर सन्नाटा था. मंदिर के बगल वाले कमरे में वह साधु भी कुछ देर बाद सो चुका था.

रंपो से अब नहीं रुका गया. वह वहां से चुपचाप उठी और मंदिर की ओर चल दी. साधु खर्राटे भर रहा था. उस ने सोचा कि यह अच्छा समय है अंदर जाने का. वह बेधड़क मंदिर की सीढि़यां चढ़ गई. मंदिर का दरवाजा खुला था.

रंपो देवता को मन ही मन धन्यवाद देने लगी, ‘हे ऊपर वाले, आज तो ठीक वैसा ही दिन है मेरे लिए, जैसे कृष्ण के जन्म के समय वसुदेव और देवकी के लिए था. वसुदेव के गोकुल जाते समय अपनेआप दरवाजे खुल गए और पहरेदार सो गए थे. उसी तरह तुम ने अपने दर्शन के लिए साधु को गहरी नींद में सुला दिया.

‘तुम्हारे दर्शन पा कर अब तो मेरे पति जल्दी ही ठीक हो जाएंगे,’ यह सोचती हुई वह मंदिर में घुस गई.

मंदिर में घोर सन्नाटे के अलावा कुछ नहीं था. रंपो अंदाज से टटोलती हुई देवता के पास पहुंच गई. मन में डर था, पर उस ने जल्दी से अपने पति के अच्छे होने की प्रार्थना की. फिर धूनी से भभूत ली और सीढि़यों से नीचे उतर गई.

रामहेत अब भी दर्द से कराह रहा था. रंपो ने भभूत उस के फोड़े के चारों ओर डाली और बोली, ‘हे देवता, सारा दर्द तुरंत बंद कर दो. आप के नाम के बताशे बांटूंगी.’

‘तू मंदिर में कैसे घुस गई?’ रामहेत ने हैरानी से पूछा.

‘हां, देवता की हम पर कृपा है. साधु खर्राटे भर रहा है. मंदिर के दरवाजे खुले पड़े हैं,’ रंपो फुसफुसाई.

‘फिर तो चमत्कार हो गया.’

‘गरीबों की देवता सुन लेते हैं. उन्होंने खुद यह चमत्कार किया है. तुम आज ही अच्छे हो जाओगे.’

दोनों की देवता के प्रति अटूट श्रद्धा थी, पर बीमारी के लिए देवता भला क्या करता? कुछ देर तक तो दर्द कम रहा, पर फिर बढ़ गया.

रात काफी बीत चुकी थी. रामहेत से जब दर्द नहीं सहा गया, तो वह बोला, ‘तू एक बार और मंदिर से भभूत ले आ.’

‘वह साधु जाग गया तो…’ रंपो ने शक जाहिर किया. ‘वह नहीं जागेगा,’ रामहेत बोला.

रंपो को देवता पर विश्वास तो पक्का था, पर इस बार उस का दिल किसी अनजान डर से कांप रहा था. साधु के खर्राटे इस बार बंद हो गए थे.

रंपो फिर धीरेधीरे मंदिर की ओर गई. मंदिर की सीढ़ी चढ़ कर दरवाजे तक आई ही थी कि कड़क आवाज में किसी ने कहा, ‘कौन है वहां?’

रंपो ठिठक कर वहीं सिमट गई. वह थरथर कांप उठी. सीढि़यों से नीचे उतर कर वह बोली, ‘मैं हूं… रंपो.’

‘मंदिर में घुस रही है कमबख्त. तुझे  से मना कर दिया, फिर भी,’ साधु यह कहते हुए उस के पास पहुंच गया.

रंपो ने चालाकी से काम लिया. वह बोली, ‘नहीं महात्माजी, आप ने कह नहीं दिया था कि जब यहां कोई नहीं हो, तब आना, इसलिए आई थी. अब तो यहां कोई नहीं है. मुझ  पर कृपा करो. मेरे पति को ठीक कर दो.’

‘ठीक कर देंगे, मगर एक शर्त पर.’ ‘कौन सी शर्त?’ ‘थोड़ी देर के लिए अपनी देह मुझे  सौंप दे,’ साधु बेशर्मी से बोला और रंपो का हाथ कस कर पकड़ लिया.

रंपो सुन कर हैरान रह गई और बोली, ‘तुम महात्मा हो महाराज, ऐसी बातें करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती.’

रंपो ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रही.

साधु बोला, ‘रंपो, अब तू बच नहीं पाएगी. अगर गांव वालों को पता चल गया कि तू मंदिर में आई थी, तो वे मारमार कर तेरी हालत खराब कर देंगे.’ रंपो ने आखिरकार साधु की बात मान ली थी.

रंपो यादों से बाहर निकल आई थी. रामहेत सो चुका था. रंपो को भी नींद आ गई. सुबह 4 बजे रंपो अचानक जागी, तो रामहेत जोरजोर से सांस ले रहा था.

‘‘क्या परेशानी है?’’ रंपो हड़बड़ा कर उठ बैठी. रामहेत घुटनों के बल बैठ गया और बोला, ‘‘लगता है, देवता ने हमारी सुन ली. मेरा जी निकल रहा है.’’

उस की बातें सुन कर रंपो ठगी सी रह गई.

रामहेत बोला, ‘‘रंपो, देवीदेवता सब बेकार की बातें हैं. तू देवता के दर्शन कर आई, पर कुछ हुआ तो नहीं. तू दर्शन नहीं कर पाती, तो तेरे भी मन में कसक रह जाती. अब मैं बच नहीं सकता.’’

रंपो ने उसे अपनी गोद में भर लिया. पर यह क्या, वह तो उस की गोद में ही जड़ हो चुका था.

Hindi Crime Story : पिंजरे का पंछी – झूठी ख्वाहिशों का दलदल

Hindi Crime Story. कामिनी दरवाजे के बाहर खड़ी थी. खूब सजधज कर. सामने उसे एक अधेड़ उम्र का आदमी आता दिखाई दिया. उसे लगा कि वह उस की ओर चला आ रहा है. पर यह क्या? वह उस के बगल में खड़ी लड़की के पास चला गया और उस से बातें करने लगा. कामिनी सोचने लगी, ‘अब मेरी जवानी ढलने लगी है, शायद इसीलिए लड़के तो दूर अधेड़ भी मेरे पास आने से कतराने लगे हैं. आज भी मैं कुछ कमा नहीं पाई. अब मैं दीदी को क्या जवाब दूंगी? यही हाल रहा तो एक दिन वे मुझे यहां से निकाल बाहर करेंगी.’

इस के बाद कामिनी पुरानी यादों में खो गई. कामिनी के मातापिता गरीब थे. उस की मां लोगों के बरतन साफ कर के घर का खर्चा चलाती थी.

मातापिता ने कामिनी को अपना पेट काट कर पढ़ाना चाहा और उसे शहर के एक स्कूल में भरती किया. उन का सपना था कि कामिनी भी पढ़लिख कर समाज में नाम कमाए.

एक दिन स्कूल से छुट्टी होने के बाद कामिनी घर आने के लिए आटोरिकशा का इंतजार करने लगी. तभी उस के सामने एक कार आ कर रुकी. उस कार से एक अधेड़ आदमी बाहर आया. वह कामिनी से बोला, ‘बेटी, यहां क्यों खड़ी हो?’

‘मुझे घर जाना है. मैं आटोरिकशा का इंतजार कर रही हूं.’  ‘बेटी, तुम्हारा घर कहां है?’ वह आदमी बोला. ‘देवनगर,’ कामिनी बोली. ‘मुझे भी देवनगर जाना है. हमारे साथ कार में बैठ जाओ.’

उस आदमी की बात सुन कर कामिनी उस की कार में बैठ गई. कार में 2 आदमी और भी बैठे थे.

कार को दूसरी तरफ अनजानी जगह पर जाते देख कामिनी हैरानी से बोली, ‘अंकल, आप कह रहे थे कि आप को देवनगर जाना है, पर आप तो…’

‘बेटी, मुझे जरूरी काम याद आ गया. मैं किसी दोस्त से मिलने जा रहा हूं. तुम्हें ये लोग तुम्हारे घर छोड़ देंगे,’ कामिनी की बात पूरी होने से पहले ही वह आदमी बोला.

कार आगे दौड़ने लगी. कार को दूसरी दिशा में जाते देख कामिनी बोली, ‘अंकल, यह तो देवनगर जाने का रास्ता नहीं है. आप मुझे कहां ले जा रहे हैं?’

‘बेटी, हम तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे. उस से पहले हम तुम से एक बात करना चाहते हैं. हम कोई गैर नहीं हैं. हम तुम्हें और तुम्हारे मातापिता को अच्छी तरह से जानते हैं.

‘एक दिन हम ने तुम्हें अपनी सहेली से कहते सुना था कि तुम हीरोइन बनना चाहती हो. तुम चाहो तो हम तुम्हें किसी फिल्म में हीरोइन का रोल दिला देंगे. तब दुनियाभर में तुम्हारा नाम होगा. तुम्हारे पास इतनी दौलत हो जाएगी कि तुम अपने मांबाप के सारे सपने पूरे कर सकोगी.

‘हीरोइन बनने के बाद तुम अपने मातापिता से मिलने जाओगी, तो सोचो कि वे कितने खुश होंगे? कुछ दिनों के बाद तुम्हें फिल्म में रोल मिल जाएगा, तब तक तुम्हें अपने मातापिता से दूर रहना होगा.’

कामिनी की आंखों में हीरोइन बनने का सपना तैरने लगा. वह ख्वाब देखने लगी कि उसे बड़े बैनर की फिल्म मिल गई है. पत्रपत्रिकाओं और टैलीविजन के खबरिया चैनलों में उस के नाम की चर्चा हो रही है. समाज में उस के मातापिता की इज्जत बढ़ गई है. उस के पुराने मकान की जगह पर अब आलीशान कोठी है. सब उसी में रह रहे हैं.

‘बेटी, क्या सोच रही हो?’ उस आदमी के सवाल ने कामिनी का ध्यान भंग किया. ‘अंकल, मैं फिल्म में हीरोइन बनने को तैयार हूं,’ कामिनी ने कहा.

2-3 घंटे के सफर के बाद वह कार शहर से दूर एक इलाके में पहुंच गई. कामिनी को इस जगह के बारे में पता नहीं था. कार से उतर कर वे दोनों आदमी कामिनी को ले कर एक मकान में गए.

दरवाजे पर खटखट करने पर एक मोटी औरत बाहर आई. वहां आसपास खड़ी लड़कियां उसे ‘दीदी’ कह कर पुकार रही थीं.

उन आदमियों को देख कर वह औरत बोली, ‘ले आए तुम नई को?’

‘बेटी, तुम्हें कुछ दिन यहीं रहना है. उस के बाद हम तुम्हें फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे,’ एक आदमीने कहा और वे दोनों वहां से चले गए.

दीदी ने कामिनी के रहने का इंतजाम एक अलग कमरे में कर दिया. वहां सुखसुविधाएं तो सभी थीं, पर कामिनी को वहां का माहौल घुटन भरा लगा.

3 दिन के बाद दीदी कामिनी से बोली, ‘आज हम तुम्हें एक फिल्म बनाने वाले के पास ले चलेंगे. वे जो भी कहें, सबकुछ करने को तैयार रहना.’

कुछ देर बाद एक कार आई. उस में 2 आदमी बैठे थे. दीदी के कहने पर कामिनी उस कार में बैठ गई. एक घंटे के सफर के बाद वह एक आलीशान कोठी में पहुंच गई. वहां वे आदमी उसे एक कमरे में ले गए.

उस कमरे में एक आदमी बैठा था. उसे वहां के लोग सेठजी कह रहे थे. कामिनी को उस कमरे में छोड़ वे दोनों आदमी बाहर निकले. जाते समय उन में से एक ने कामिनी से कहा, ‘ये सेठजी ही तुम्हारे लिए फिल्म बनाने वाले हैं.’

सेठजी ने कामिनी को कुरसी पर बिठाया. इंटरव्यू लेने का दिखावा करते हुए वे कामिनी से कुछ सवालपूछने लगे. इसी बीच एक आदमी शरबत के 2 गिलास ले कर वहां आया. एक गिलास सेठजी ने पीया और दूसरा गिलास कामिनी को पीने को दिया.

शरबत पीने के बाद कामिनी पर बेहोशी छा गई. उसे जब होश आया, तो उस ने अपने सामने सेठजी को मुसकराते हुए देखा. वह दर्द से कराह रही थी. ‘मेरे साथ धोखा हुआ है. मैं तुम सब को देख लूंगी. मैं तुम्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दूंगी,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तुम्हारे साथ कोई धोखा नहीं हुआ है. तुम फिल्म में हीरोइन बनना चाहती थीं. लो, देख लो अपनी फिल्म,’ कह कर सेठजी ने कंप्यूटर में सीडी डाल कर उसे दिखा दी.

सीडी को देख कर कामिनी सन्न रह गई. उस फिल्म में सेठजी उस की इज्जत के साथ खेलते दिखाई दिए. ‘वैसे तो यह फिल्म हम किसी को नहीं दिखाएंगे. अगर तुम ने हमारी शिकायत पुलिस से की, तो हम इसे सारी दुनिया में पहुंचा देंगे,’ कंप्यूटर बंद करते हुए सेठजी बोले.

कमिनी को इस घटना से सदमा पहुंच गया. वह बेहोश हो गई. कुछ देर बाद वे दोनों आदमी कामिनी को कार में बैठा कर दीदी के पास ले गए. कामिनी गुमसुम रहने लगी. वह न कुछ खाती थी, न किसी से बातें करती थी.

एक दिन दीदी कामिनी के कमरे में आ कर बोली, ‘देखो, यहां जो भी लड़की आती है, वह अपनी इच्छा से नहीं आती. वह कुछ दिनों तक तेरी तरह गुमसुम रहती है, बाद में खुद को संभाल लेती है. इस दलदल में जो एक बार पहुंच गई, वह चाह कर भी वापस नहीं जा सकती.

‘अगर तुम यहां से चली भी गई, तो तुम्हारा समाज तुम्हें फिर से नहीं अपनाएगा, इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम अब यहीं के समाज में रहने का मन बनाओ. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’

दूसरे दिन दीदी ने कामिनी को कार में बिठा कर दूसरे आदमी के पास भेजा. अब वह इसी तरह कामिनी को इधरउधर भेजने लगी. एक दिन दीदी ने कामिनी से कहा, ‘तुझे इधरउधर जाते हुए काफी समय हो गया है. अब मैं तुझे एक नया काम सिखाऊंगी.’

‘नया काम… मतलब?’ कामिनी चौंकते हुए बोली. ‘मतलब यह है कि अब तुझे किसी सेठ के पास नहीं जाना है. तुझे यहीं दुकान में रह कर ग्राहकों को अपनी ओर खींचना है.’ ‘किस दुकान में?’ ‘यहीं.’ ‘लेकिन यह तो मकान है, दुकान कहां है?’

‘यही मकान तुम्हारे धंधे की दुकान है. जैसे शोरूम में अलगअलग डिजाइन के कपड़े सजा कर रखे रहते हैं, वैसे ही तुम्हें यहां सजधज कर आधे कपड़ों में रहना है. तुम्हें कुछ नहीं करना है. बस, यहां से गुजरने वाले मर्दों को ललचाई नजरों से देखना है.’

दीदी के समझाने पर कामिनी सोचने लगी, ‘यहां रहने वाली सभी लड़कियां इस शोरूम की चीजें हैं. शोरूम में रखी चीजों को ग्राहक देख कर पसंद करता है. खरीदने के बाद वे चीजें उसी की हो जाती हैं. ग्राहक उस चीज की इज्जत करता है. हम जिस्म के सौदे की वे चीजें हैं, जिन्हें ग्राहक कुछ देर के लिए खरीद कर मजा ले कर चला जाता है

‘वासना के भूखे दरिंदे हमारे पास आ कर अपनी भूख मिटाते हैं. हम भी चाहते हैं कि हमारा दिल किसी के लिए धड़के. वह एक हो. वह हम पर मरमिटने को तैयार हो. हम भी समाज के रिश्तों की डोर से बंधें.’

पिंजरे में बंद पंछी की तरह कामिनी का मन फड़फड़ा रहा था.

एक दिन कामिनी ने सोच लिया कि वह इस दुनिया से बाहर आ कर रहेगी. ज्यादा से ज्यादा इस कोशिश में उस की जान चली जाएगी. जिस्म के शोरूम की चीज बने रहने से अच्छा है कि वह मौत को गले लगा ले. अगर वह बच गई, तो समाज का हिस्सा बन जाएगी.

कामिनी ने दीदी को भरोसे में ले लिया. अपने बरताव और काम से उस ने दीदी पर असर जमा लिया. दीदी को यकीन हो गया था कि कामिनी ने खुद को यहां की दुनिया में ढाल लिया है.

एक दिन मौका देख कर कामिनी वहां से भाग गई और ट्रेन में बैठ कर अपने घर चली गई. इतने सालों के बाद कामिनी को देख कर उस के भाई खुश हो गए. उन्होंने कामिनी को बताया कि मातापिता की मौत हो चुकी है. वह अपने भाई विनोद और सोहन के साथ रहने लगी.

भाइयों को दुख न पहुंचे, यह सोच कर उस ने अपने बीते दिनों के बारे में कुछ नहीं बताया. कामिनी का भाई विनोद एक कंपनी में काम करता था. उस कंपनी का मालिक रवींद्र नौजवान था. एक दिन वह विनोद के जन्मदिन की पार्टी में उस के घर आया. विनोद ने उस से कामिनी का परिचय कराया. उसे कामिनी पसंद आ गई. धीरेधीरे रवींद्र और कामिनी के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

एक दिन दोनों ने प्रेमविवाह कर लिया. रवींद्र और कामिनी एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे. शादी के बाद कामिनी रवींद्र के साथ शहर में किराए के मकान में रहने लगी. एक दिन रवींद्र की कंपनी में बैठक चल रही थी. रवींद्र को याद आया कि उस की जरूरी फाइल तो घर पर ही रह गई है. रवींद्र ने सुपरवाइजर प्रदीप को वह फाइल लेने अपने घर भेज दिया.

रवींद्र के घर पहुंच कर प्रदीप ने दरवाजे पर खटखट की. थोड़ी देर बाद कामिनी बाहर आ गई. ‘कामिनी, तू यहां? तू ने मुझे पहचाना?’ कामिनी को देख कर प्रदीप बोला. ‘नहीं तो,’ कामिनी बोली. ‘वहां मैं तुम्हारे पास कई बार आया करता था. क्या तुझे यहां साहब किराए पर लाए हैं?’

प्रदीप की बात सुन कर कामिनी चुप रही. प्रदीप कामिनी को बांहों में भरने लगा. वह उसे चूमने की कोशिश करने लगा. ‘परे हट जाओ मेरे सामने से,’ कामिनी चिल्लाई. ‘जानम, मैं ने तुम्हें कई बार प्यार किया है. आज यहां तू और मैं ही तो हैं. मेरी इच्छा पूरी नहीं करोगी?’ ‘नहीं, तुम्हें मुझ से तमीज से बात करनी चाहिए. मैं तुम्हारे साहब की बीवी हूं,’ कामिनी चिल्लाई.

‘तमीज से?’ प्रदीप हंस कर बोला. ‘मैं साहब को तुम्हारे बारे में सबकुछ बता दूंगा,’ प्रदीप बोला. ‘नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगे. मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी.’

‘ठीक है. अगर तुम अपनी जिंदगी बरबाद होने से बचाना चाहती हो, तो मैं जब चाहूं तुम्हें मेरी इच्छा पूरी करनी होगी. तुम्हें यह काम आज और अभी से करना होगा. जिस दिन तुम ने मेरा कहा नहीं माना, मैं तुम्हारी पूरी कहानी साहब को बता दूंगा,’ जातेजाते प्रदीप कामिनी से बोला.

अब प्रदीप रवींद्र की गैरहाजिरी में समयसमय पर कामिनी से मिलने आने लगा.

एक दिन किसी काम से रवींद्र अपने घर समय से पहले आ गया. उस ने प्रदीप और कामिनी को एकसाथ देख लिया. उस ने प्रदीप और कामिनी को बुरी तरह डांटा. उस ने प्रदीप को नौकरी से हटाने की धमकी दी. प्रदीप ने रवींद्र को कामिनी के बारे में सबकुछ बता दिया. रवींद्र ने कामिनी का साथ छोड़ दिया. कामिनी के बारे में जब उस के भाइयों को पता चला, तो उन्होंने भी उसे अपने साथ रखने से मना कर दिया.

कामिनी के पास फिर उसी दुनिया में लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं रह गया था. ‘‘कामिनी, आज भी कुछ कमाया या नहीं?’’ दीदी की बात सुन कर कामिनी यादों से बाहर आ गई. Hindi Crime Story

VIP Culture : हवा होते सपने

VIP Culture. सपना एयरपोर्ट के मेन गेट पर खड़ीखड़ी थक गई थी. यहां तो उस ने सुना था कि सभी काम समय पर होते हैं, मगर वह जिन नेता के इंतजार में खड़ी की गई थी, उन का कहीं अतापता नहीं था.

कोई बलदेव भाई किसी मशीन की तरह अलर्ट मोड में खड़े थे जैसे. कहीं कोई कमी न रह जाए, इस बात का बलदेव को खास खयाल था. उन्हीं ने करुणा चाची को फोन किया था कि तकरीबन आधा घंटे में एक सजीधजी लड़की चाहिए.

यह सुन कर करुणा चाची सपना के पास सुबहसुबह ही आ धमकी थीं. वे बोली थीं, ‘‘थोड़ी देर की तो बात है. बस जो मेहमान हैं, उन पर फूल की पंखुडि़यां बिखेरनी हैं, टीका लगाना है, आरती उतारनी और और माला पहनानी है. इसी के 2,000 रुपए मिल रहे हैं, तो क्या बुरा है. बस, शर्त यही है कि तुझे आधा घंटे में ही तैयार हो कर निकल लेना है.’’

‘‘ठीक है, मैं आज कालेज नहीं जाऊंगी…’’ सपना थोड़ा कशमकश में थी, ‘‘लेकिन किसी के स्वागत के लिए मैं ऐसे ही कैसे चली जाऊं? माना कि मुझे वहां जा कर कुछ खास नहीं करना है. लेकिन ऐसे हर काम के पहले मुझे ब्यूटीपार्लर जाना होता है. किसी के स्वागत में लोग मुझसे से क्या उम्मीद रखते हैं, उस का तो मुझे खयाल रखना ही होगा न?’’

‘‘उन के पास समय नहीं है. वे बड़े लोग हैं. उन्हें मना नहीं करना चाहिए…’’ करुणा चाची गिड़गिड़ाईं, ‘‘तुम वैसे ही बहुत खूबसूरत हो. कुछ भी पहन लोगी, तो खूबसूरत ही लगोगी. वैसे, तुम्हारे पास जो गुलाबी रंग का घाघराचोली है, वह पहन लेना और कुछ मेकअप कर लेना. इमिटेशन वाले आभूषण तो तुम्हारे पास ढेर सारे हैं ही. कुछ ढंग का पहन लेना.

‘‘राधिका भी तो साथ जा ही रही है.  जाओ, जल्दी तैयार हो जाओ. गाड़ी आती ही होगी. मैं ने तुम्हारी तरफ से हां कर दिया है.’’ अब आधा घंटे में कोई कैसे तैयार हो सकता है. वह तो गनीमत है कि सपना कालेज जाने के लिए नहा चुकी थी. कोई बात नहीं, वह तैयार हो लेगी. घर बैठे काम मिले, तो दिक्कत क्या है. उस के लिए तो यह अच्छा ही है.

जल्दीजल्दी तैयार हो कर सपना चौराहे के पास गाड़ी का इंतजार कर ही रही थी कि थोड़ी देर में ही गाड़ी भी आ गई थी.

सपना को एक तरह से खुशी ही हुई. आमतौर पर शादीब्याह, रिसैप्शन वगैरह में वह यही काम करती थी. किसी सजीधजी गुडि़या की तरह मेन गेट पर खड़ी रहो और लोगों पर फूल की पंखुडि़यां छितरा कर उन्हें टीका लगाओ. इसी काम के उसे 1,000 रुपए मिल जाते थे, तो उसे लगता था कि यह बहुत बड़ी नेमत है.

पड़ोस की करुणा चाची ने सपना को पहलेपहल यह काम दिलवाया था कि तू तो बड़ी खूबसूरत है और पार्टियों में तो ऐसे ही चेहरों की डिमांड रहती है. करना क्या है, बस सजधज कर खड़ी रहना है. मेहमानों को जरा मुसकरा कर देखना है, ताकि वे खुश हो जाएं. इन पार्टियों या रिसैप्शन में चायनाश्ता और रात का राजसी भोजन अलग से मिलता है. क्या पता, कोई खुश हो कर टिप भी दे दे.

करुणा चाची शहर की जानीमानी समाज सेविकाओं में गिनी जाती थीं. तकरीबन रोज ही उन का कहीं न कहीं आनाजाना लगा रहता था. अब तो वे राजनीतिक सभाओं और सम्मेलनों में भी जाती थीं. उन का शाही खर्च ऐसे ही नहीं चलता.

करुणा चाची के कहने पर सपना महंगी चीजें खरीदती थी. पहले तो वह किराए के कपड़ों से काम चलाती थी, मगर इधर उस ने कुछ अच्छे कपड़े खरीद भी लिए थे. बहुत मन था कि उस के पास अपना बढि़या घाघराचोली हो. कुछ संयोग ऐसा लगा कि उसे पिछले सीजन में लगातार काम मिले, तो उस की

अच्छी कमाई हो गई. तब उस ने पूरे 10,000 रुपए में गुलाबी रंग का सलमेसितारों से टंका घाघराचोली खरीद लिया था. अच्छे कपड़े रहने से एक फायदा यह तो है ही कि डिमांड बढ़ जाती है. फिर उस के किराए के पैसे बच जाते थे. दूसरे लौटाने की हड़बड़ी नहीं रहती. न यह डर कि कहीं फट जाए, तो दुगनाचौगुना जुर्माना भरो.

आमतौर पर इस काम में ब्यूटीपार्लर का भी खर्च शामिल रहता है. यह अलग बात है कि सपना पार्टियों से ब्यूटीपार्लर के खर्च का चार्ज अलग से लेती है.

अब वह इस पर खर्च क्यों करे. उसे सजनाधजना आता है. कुछ ब्यूटीपार्लर के टिप्स उस ने देखसुन कर सीख भी लिए हैं. सो, अपनी अलमारी में वह कुछ लिपस्टिक, पाउडर, स्नो, क्रीम वगैरह रखती भी है. ये सब इतने महंगे भी हैं कि उन के दाम सुन कर कलेजा मुंह को आता है. मगर अब जरूरी है, तो है. खरीदना तो पड़ेगा ही.

इमिटेशन के आभूषणों के अनेक सैट सपना के पास हैं. जब वह तैयार हो कर निकलती है, तो कितना कुछ सुनना भी तो पड़ता है उसे. मगर अब उस ने इसे नजरअंदाज करना सीख लिया है. इस में गलत क्या है. वह खूबसूरत है तो है. वह इस के बदले कीमत वसूल करती है, तो क्या बुरा है.

करुणा चाची ने बताया था कि आज के मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए कोई नेता दिल्ली से आने वाले हैं, जिन के स्वागत के लिए उसे एयरपोर्ट जाना होगा, तो वह खुश हो गई थी. उन नेता का नाम क्या है, वे कहां के रहने वाले हैं, इस से उसे कोई मतलब नहीं. करोड़ों में खेलने वाले इन नेताओं का नामपता जान कर करना भी क्या है.

दरअसल, उन नेता को अंदाजा नहीं था कि उन्हें मंत्रिमंडल में लिया जाएगा, इसलिए अपनी रिश्तेदार की शादी में शामिल होने के लिए वे दिल्ली चले गए थे. एक दिन पहले ही पार्टी हाईकमान से खबर मिली कि उन्हें मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होना है, तो वे भागेभागे चले आए थे हवाईजहाज से. उन के समर्थकों की तो पौबारह हो गई. जब उन का आदमी मंत्री बनेगा, तभी तो उन को मलाई और मिठाई रूपी ठेका और सप्लाई का काम मिलेगा.

आननफानन में नेता के स्वागत की तैयारी होने लगी थी और यह एयरपोर्ट से ही शुरू होना था. उस कालेकलूटे, गोभी के पकौड़े जैसे बड़े नाक, थुलथुल काया वाले नेता का स्वागत एयरपोर्ट पर कोई सुंदरी करे, तो दिन बेहतर होगा और इसी के लिए सपना का नाम आया था.

फट से करुणा चाची का संदेश सपना के पास गया था और वह तैयार हो कर लगभग भागते हुए गाड़ी से 8 बजे सुबह ही यहां आ पहुंची थी. अब वह यहां चाय मांगे, तो किस से? चाय पीने के चक्कर में लिपस्टिक बिगड़ भी तो सकती है.

आज तक सपना एयरपोर्ट नहीं आई थी. उस का भी बहुत मन करता था कि वह देखे कि हवाईजहाज कैसे उड़ता है और जमीन पर कैसे उतरता है. इसी बहाने आज उस की सालों की साध भी पूरी हो जाएगी.

एयरपोर्ट को देख कर तो सपना एकदम से दंग रह गई. राधिका भी इसी काम के लिए उसी के साथ आई थी. दरअसल, पहले तो एक लड़की ही को बुलाया गया था, मगर दल के नेता ने फरमान जारी किया कि 2 लड़कियां सम्मान करेंगी, तो ज्यादा अच्छा होगा, इसलिए आननफानन सपना को भी बुला लिया गया था.

लड़की को तैयार होने में देर तो लगेगी ही. तब और, जब किसी के स्वागत के लिए सजनासंवरना हो. और यहां एयरपोर्ट पर इतनी साफसफाई और सजावट. लकदक करती कुरसियां और सोफा सैट. ऊंची छतों पर लगे भव्य ?ाड़फानूस और दीवारों पर टंगी खूबसूरत बड़ीबड़ी पेंटिंग्स.

सुबह होने के बावजूद वहां भीड़ थी. हो भी क्यों नहीं. नई सरकार बनने की खुशी में या हड़बड़ी में वीआईपी लोगों का आनाजाना जारी था. चार्टर्ड हवाईजहाजों के बीच पब्लिक हवाईजहाज से उतरने वाले शायद वे आखिरी नेता थे.

10 बजे हवाईजहाज को उतरना था. मगर वीआईपी को लाने वाली फ्लाइट को प्राथमिकता दी जा रही थी. ऐसे में पब्लिक फ्लाइट हवा में ही मंडराती रही. उन नेता का हवाईजहाज कभी बनारस, तो कभी गया की ओर हवा में ही चक्कर काटता रहा.

साढ़े 11 बजे हवाईजहाज उतरा, तो वे नेता बेहद हड़बड़ी में थे. एयरपोर्ट के मेन गेट पर सपना से उन्होंने जल्दीजल्दी टीका लगवाया, माला पहनी. राधिका ने उन की जल्दीजल्दी आरती उतारी. नेताजी ने उतनी ही तेजी से माला उतारी और उसे नोंच कर किनारे फेंक कर बाहर की ओर भागे.

सुबह के 11 बजे से कार्यक्रम शुरू होना था और अभी यहीं साढ़े 11 बज रहे थे. मुख्यमंत्री से भी लेट पहुंचेंगे क्या वे नेता राजभवन? इस तुनकमिजाज मुख्यमंत्री का कोई भरोसा नहीं. कहीं देरी का बहाना कर मंत्रिमंडल में शामिल करने से इनकार कर दे, तो कोई क्या कर लेगा.

इन लोगों ने आज भारी अफरातफरी मचाई पटना एयरपोर्ट पर. नीचे उतरने ही नहीं दिया पब्लिक फ्लाइट को, इसलिए तो देर हो गई न. मुसाफिरों को लिए हवाईजहाज डेढ़ घंटे चक्कर काटता रहा हवा में, आसमान में. कभी मुजफ्फरपुर के आसमान में, तो कभी गया या बक्सर के आसपास.

भारी अफरातफरी के बीच मेन हाईवे को भी रोक दिया गया था. यह कोई बात नहीं. मगर किसी को आसमान में भी यों रोका जाता है क्या. गाड़ी में बैठ कर छूमंतर होते ही उन के समर्थकों की भीड़ भी दूसरी गाडि़यों में बैठ कर छूमंतर हो गई थी.

सपना और राधिका को पता नहीं था कि जिन नेता की उन्होंने आरती उतारी है, चंदन का टीका लगाया है, गुलाब की पंखुडि़यां उन पर निछावर की हैं, उन का नाम क्या है. एक खतरनाक से दिखने वाले आदमी ने सपना को बताया था कि यही हैं नेताजी. इन्हें टीका लगाओ, माला पहनाओ.

सपना और राधिका ने वह कर दिया था. ताबड़तोड़ तसवीरें भी ली गई थीं. पर हड़बड़ी में उन्होंने घर से अपना पर्स भी नहीं लिया था, जिस से उन के हाथ खाली थे. अब घर वापसी के लिए शेयर आटोरिकशा के लिए भी तो कुछ पैसे चाहिए न.

अचानक उन दोनों को वह आदमी बलदेव दिखा. वह अपनी बुलेट में किक मार रहा था कि राधिका ने उसे जा पकड़ा और पैसे मांगे. ‘‘तुम्हारे पैसे बाद में मिल जाएंगे…’’ बलदेव बोला, ‘‘अभी जल्दी है. मुझे राजभवन जाना है. अभी मुझे जाने दो.’’

‘‘अरे, हमारा मेहनताना बाद में देना,’’ मुंहफट राधिका तुरंत बोली, ‘‘हमें इतनी जल्दी सुबहसुबह आप लोगों ने बुला लिया. हम अपना पर्स भी नहीं ले पाई हैं. सुबह से मुंह में एक दाना नहीं डाला, चाय का एक कप भी नहीं. पर कोई बात नहीं. लेकिन हमें घर जाने का किराया तो दे जाओ. हम 10 किलोमीटर दूर पैदल तो अपने घर नहीं जा सकती हैं न.’’

बलदेव ने तुरंत अपनी जेब को टटोला और 50 रुपए का एक नोट निकाल कर उन की ओर उछाल दिया. बुलेट की ‘फटफट’ आवाज के बीच वे दोनों एकदूसरे का मुंह देख रही थीं. इज्जत करने वालों की इसी तरह बेइज्जती होती है शायद.

पैसे वाले और पैसा बनाते जाएंगे और उन जैसे लोग इसी तरह चंद रुपयों के लिए रौंदे जाते रहेंगे. सामंतवाद और पूंजीवाद का यही बिगड़ा रूप है. काम खत्म होने के बाद भी मेहनताने की गारंटी नहीं. चाय का एक प्याला तक उन्हें इस एयरपोर्ट पर पीने को नहीं मिला. फिर भी उन्हें इस पूंजीवादी सामंतवाद की इसी तरह आरती उतारनी होगी, टीका लगाना होगा, फूलों की पंखुडि़यां निछावर करते हुए माला पहनाते समय मुसकराना होगा. बदले में वे देंगे नफरत भरा बरताव और वे मुंह से उफ तक नहीं कर पाएंगी. VIP Culture

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