Relationship Story in Hindi : अवंतिका

Relationship Story in Hindi. बिजनौर की अवंतिका की शादी मेरठ के पौश इलाके गंगानगर के रहने वाले रिटायर्ड जेलर दीपचंद्र सिंह चहल के बड़े बेटे राहुल से तय हुई तो वह खुशी से  झूम उठी. उस की ससुराल वालों का खूब नाम था. पैसे की कोई कमी न थी. बहुओं को सास का बड़ा डर सताता है, यहां तो सास ही नहीं थी. वे बहुत पहले इस दुनिया से कूच कर गई थीं. हां, उस का एक देवर जरूर था लेकिन उसे तो घर की बड़ी बहू बनने का मौका मिल रहा था.

जेलर दीपचंद्र का ज्यादातर समय जेल की कोठरियों को देख कर बीता था. उन की सोच अभी भी जेलर वाली ही थी. इस की  झलक उन के बड़े मकान में दिखाई पड़ती थी. उनके दुमंजिले मकान में जेल की कोठरियों की तरह कमरे ही कमरे थे. घर की मेन एंट्री पर एक बड़ा मजबूत सा लोहे का गेट लगा था. कोई अजनबी उस मकान में घुस जाए तो उसे भूलभुलैया ही सम झ बैठे. उन्होंने उस मकान में किराएदारों को भी ऐसे ही ठूंसठूंस कर रखा हुआ था जैसे जेल में कैदी. हर कमरे में किराएदार ही किराएदार.

जेलर दीपचंद्र ने वहीं बीच में एक औफिसनुमा कमरा बना रखा था जहां से वे पूरे मकान और किराएदारों पर नजर रखते थे. उसी कमरे में वे सुबह नाश्ता पानी करने के बाद बैठ जाया करते थे. किराएदारों वाला रजिस्टर चैक करते थे कि किस का किराया आया और किस का नहीं. वहीं पर वे अपने मेहमानों या दूसरे लोगों से मिला करते थे. सुबह और शाम को पूरे मकान का एक राउंड वे जरूर ही लगाया करते थे.

उन्होंने अपने दोनों बेटों राहुल और सागर को दवाओं के कारोबार में लगा रखा था. एक बड़ा मैडिकल स्टोर मेन रोड पर खुलवा रखा था. उन का बड़ा बेटा राहुल अल्ट्रामौडर्न था. दोस्तों के संग कौकटेल पार्टी, हुक्का पार्टी करना उस का शौक था. पैसे की कोई कमी थी नहीं इसलिए राहुल की मौजमस्ती में भी कोई कमी आड़े नहीं आती थी.

अवंतिका राहुल को पहली ही नजर में भा गई थी. दीपचंद्र का नाम इतना बड़ा था कि उन की शोहरत की आड़ में राहुल के सब ऐब ढक गए थे. जब किसी रिश्तेदार ने अवंतिका के पिता को इशारों ही इशारों में बताया था कि राहुल शराब पीता है तो उन्होंने तपाक से कहा, ‘‘अरे भाई, आजकल शराब कौन नहीं पीता? ये तो बड़े लोगों के शौक हुआ करते हैं.’’

लेकिन यह बात उन्होंने अवंतिका से जानबू झ कर छिपाई. उन्हें डर था कि उन की बेटी की शादी एक अमीर परिवार में हो रही है, राहुल के शराब पीने की बात पर कहीं कोई अड़चन पैदा न हो जाए.

अवंतिका और राहुल की शादी मेरठ के एक बड़े होटल में बड़ी धूमधाम के साथ हो गई. बड़ी नामीगिरामी हस्तियां इस शादी समारोह में शामिल हुईं. पुलिस महकमे के आला अफसर वरवधु को आशीर्वाद देने के लिए पधारे.

अवंतिका को तो अपनी इस शादी पर बड़ा गुमान हो रहा था कि उस का शादी समारोह कितने शानदार ढंग से हो रहा है.

लेकिन सुहागरात को ही अवंतिका के सपने तब चकनाचूर हो गए जब राहुल नशे की हालत में उस के पास पहुंचा. वह बहकीबहकी बातें कर रहा था और होशोहवास में नहीं था. वह तो उस की हालत को देख कर ही घबरा उठी. वह बैड के एक कोने में सिमट कर बैठ गई और वह नशेडि़यों की तरह हरकतें करता रहा और फिर बेसुध हो गया.

सुहागरात को ही अवंतिका के सारे अरमान ताश के पत्तों की तरह बिखर गए. हालांकि, नशा उतरते ही सुबह के समय राहुल ने उस से माफी मांग ली लेकिन अब माफी मांगने से कोई फायदा होने वाला नहीं था. एक लड़की जिस रात को अपनी जिंदगी की सब से खास रात मानती है, वह तो गुजर चुकी थी.

राहुल ने इस की भरपाई करने की बहुत कोशिश की. वह अवंतिका को एक लंबे टूर पर गोवा और अंदमान निकोबार द्वीप समूह ले कर गया. उस की हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश की. अवंतिका ने भी उसे दिल से माफ कर दिया और जीवन में मधुर रस घोलने की कोशिश की. कुछ खट्टेमीठे अनुभवों के साथ 2 साल गुजर गए और वह एक बेटी सान्वी की मां भी बन गई.

अवंतिका के कहने से राहुल ने शराब पीना कम तो कर दिया था, लेकिन बंद नहीं किया था. किसीकिसी दिन तो वह यारदोस्तों के संग इतनी पी लेता था कि उसे संभालना तक मुश्किल हो जाता था. तब अवंतिका को लगता था कि उस की जिंदगी नरक बन गई है.

कोई भी औरत अपने आदमी को बिस्तर पर कभी भी बेसुध देखना नहीं चाहती. उस की भी तो अपनी इच्छाएं होती हैं. एक ओर भरा बंधा यौवन और दूसरी ओर बेसुध पड़ा आदमी. दिनभर का रोमांटिक मूड पलभर में स्वाह. आखिर कौन औरत ऐसा चाहेगी?

लेकिन नशे की आदत कुत्ते की टेढ़ी दुम की तरह होती है. न दुम सीधी होती है और न ही नशा छूटता है. राहुल के साथ भी ऐसा ही था. आएदिन वह नशे की हालत में घर पहुंचता. उस का छोटा भाई सागर ही उसे उठा कर बिस्तर तक लाता. कभीकभी अवंतिका को भी नशे में चूर राहुल को उठाने में सागर की सहायता करनी पड़ती. उस समय सागर के हाथों का स्पर्श उसे अलग ही आनंद देता था.

एक दिन अवंतिका ने सागर से कहा, ‘‘देवरजी, ऐसा कब तक चलेगा? आप अपने भाई को शराब पीने से रोकते क्यों नहीं? इन्हें सम झाते क्यों नहीं?’’

‘‘भाभी, मैं तो बहुत मना करता हूं लेकिन भैया मानते ही नहीं. शाम होते ही इन पर न जाने कौन सा फुतूर सवार हो जाता है कि पिए बिना रहते ही नहीं.’’

‘‘देवरजी, ऐसे काम नहीं चलने वाला. कितनी ही रातें तुम्हारे भैया के चक्कर में मु झे जाग कर गुजारनी पड़ती हैं.’’

‘‘तो भाभी, आप जागती क्यों हो? सो जाया करो.’’

‘‘इन्हें इस हालत में छोड़ कर देवरजी, आप सम झो तो सही मु झे नींद ही कैसे आएगी?’’

धीरेधीरे इन बातों का दायरा बढ़ने लगा. अवंतिका को अपने देवर सागर से बातें करने में अजीब सा सुकून मिलता. इस सुकून का दायरा भी धीरेधीरे बढ़ कर बांहों की पनाह तक पहुंच गया. सागर का कमरा बराबर में ही था. जब राहुल बिस्तर पर नशे में चूर पड़ा होता था तब अवंतिका सागर की बांहों में असीम सुकून पा रही होती थी.

ससुर दीपचंद्र को जब इस की भनक लगी तो उन्होंने चुप रहना ही बेहतर सम झा. ये हालात देख कर उन्होंने अपने औफिस को ही अपना बैडरूम बना लिया. घर के अंदर आना कम से कम कर दिया मानो ऐसा कर के वे अवंतिका और सागर के संबंधों को अपनी मौन स्वीकृति दे रहे हों. अब वे अपना ज्यादातर समय वहीं गुजारने लगे.

राहुल को जब अवंतिका और सागर के संबंधों का पता चला तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई लेकिन वह क्या करे गलती खुद उस की थी. लेकिन कौन मर्द होगा जो अपनी पत्नी को दूसरों की बांहों में होने की बात सुन कर चुप रह जाए. वह तो अंदर ही अंदर सुलग रहा था और मौका मिलते ही भड़क उठा, ‘‘अवंतिका, ऐसा नीच काम कोई गिरी हुई औरत ही कर सकती है जो तुम कर रही हो.’’

अवंतिका भी इस लांछन को सुन कर चुप रहने वाली नहीं थी. वह भी फट पड़ी, ‘‘मु झे नीच औरत कहने में तो तुम्हें शर्म नहीं आती लेकिन ये हालात पैदा किस ने किए? रात में शराब के नशे में चूर बिस्तर पर आ कर पड़ जाते हो उस का क्या?’’

‘‘तो तुम यह सब करोगी क्या?’’

‘‘मैं ब्याहता हूं कोई संन्यासिनी नहीं. मेरे बदन को भी भूखप्यास लगती है. अगर नशे में ऐसे ही चूर रहना था तो शादी ही क्यों की?’’

ऐसा कह कर अवंतिका अपनी बिटिया सान्वी को ले कर किचन में चली गई और राहुल सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया. इस बेवफाई से वह बुरी तरह टूट गया. अब तो वह अपना गम भुलाने के लिए कभी भी पीनी शुरू कर देता. न वह दिन देखता, न रात.

अब उस का मन किसी काम में भी नहीं लगता. सारी दुनिया उसे बेगानी सी लगती. हर समय वह अवंतिका को  झिड़कता रहता. उसे दुत्कारता रहता. न जाने क्याक्या बड़बड़ाता रहता. अवंतिका भी उस के प्रति ढीठ बन गई थी. उस ने राहुल की चिंता ही करनी छोड़ दी. वह जोकुछ भी कहता उसे वह एक कान से सुनती दूसरे से निकाल देती.

राहुल को लगता था जैसे उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो. उसे पता था कि घर में वह 24 घंटे अपनी पत्नी की निगरानी नहीं कर सकता. सागर की जगह कोई और होता तो शायद वह उसे गोली से ही उड़ा देता, लेकिन छोटे भाई पर वह गोली कैसे चलाए? उस पर गोली चलाने की बात सोच कर ही उस की रूह कांप जाती.

जिस भाई के साथ उस ने इतने साल इतने प्रेम से गुजारे, आज वह उस पर गोली चला कर उस की जान लेले… नहींनहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता. इस से बेहतर तो यही है कि वह खुद अपनी जान देदे. अब उस के जीवन में हताशा और निराशा के सिवा कुछ नहीं बचा था.

दीपचंद्र सबकुछ जान कर भी अनजान बने हुए थे. वे घर की बात को घर में ही रखना चाहते थे. वे जानते थे कि ये हालात इतने खतरनाक और काबू से बाहर हो चुके हैं कि कभी भी कुछ भी हो सकता है.

उन्हें पता था कि राहुल ने अगर शराब पीनी नहीं छोड़ी तो अवंतिका अब कभी उस की नहीं हो सकेगी. राहुल के सामने यही बड़ी समस्या थी कि वह शराब के नशे का दास बन चुका था और दासत्व की बेडि़यों में जकड़ा आदमी कभी कुछ नहीं कर सकता.

दीपचंद्र सोचते बहुत थे, लेकिन करते कुछ नहीं थे. यहां तक कि उन्होंने अवंतिका से भी इस मसले पर कभी खुल कर बात नहीं की. वे तो सागर के लिए आने वाले रिश्तों को भी इसीलिए टालते रहे कि पता नहीं आगे क्या हो.

एक दिन राहुल ने अवंतिका और सागर को एक साथ देख लिया. वह उस समय भी नशे में था लेकिन उन दोनों को साथ देख कर उस का नशा काफूर हो गया. वह अपने ऊपर से कंट्रोल खो बैठा और घर में रखी लाइसैंसी बंदूक उठा लाया.

वह अवंतिका को गोली मारना चाहता था लेकिन सागर के बीच में आ जाने से उस का निशाना चूक गया. फिर भी कुछ छर्रे अवंतिका को लग ही गए.

सागर और दीपचंद्र अवंतिका को तुरंत अस्पताल ले कर गए जहां डाक्टरों ने कड़ी मशक्कत से उस के शरीर में घुसे छर्रों को निकाला. पुलिस केस भी दर्ज हुआ, लेकिन दीपचंद्र ने अपने असर और पैसे से केस ही बदलवा दिया.

अब केस यह बना कि अवंतिका घर की सफाई करते समय बंदूक को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रख रही थी तभी लापरवाही से बंदूक का ट्रिगर दब गया और गोली चल गई, जिस के कारण कुछ  छर्रे अवंतिका को लगे. इस तरह से पुलिस केस रफादफा हो गया.

लेकिन लोग इतने भोले नहीं थे. सच्चाई धीरेधीरे सब को पता चल रही थी. अवंतिका ने सबकुछ हिम्मत से सहन किया. वह अभी भी इस इंतजार में थी कि राहुल संभल जाए तो वह अपने देवर की शादी किसी और से करा दे, लेकिन वह इतनी होशियार भी थी कि अगर उस का पति नहीं सुधरता है तो वह देवर को अपना बना कर रखेगी और उस की शादी में अड़ंगे लगाएगी. किसी भी सूरत में वह उस की शादी नहीं होने देगी.

इस तरह से वह अपने जीवन को सुरक्षित रखेगी भले ही दुनिया कुछ भी कहे. वह सागर को अपने पति की तरह ट्रीट करने लगी थी. कोई क्या कह रहा था उस ने इस की चिंता करनी बंद कर दी थी.

राहुल ने जब से उन दोनों को साथ देखा था तब से वह और ज्यादा टूट गया था. वह खुद को संभाल नहीं पा रहा था. अब दुनिया में उस का एक ही सहारा था और वह थी शराब. अब वह हर समय नशे में डूबा रहता.

उस ने बाहर आनाजाना भी छोड़ दिया था. नशा उतरते ही उस की आंखों के सामने वही घातक दृश्य घूमने लगता जिस में उस ने अपनी पत्नी को सागर के साथ गलबहियां करते देखा था. यह उस के लिए असहनीय था. इस के बाद वह फिर से जाम पर जाम चढ़ाने लगता और अवंतिका को गंदीगंदी गालियां बकने लगता.

अवंतिका पर इन गालियों का रत्तीभर भी असर नहीं होता, बल्कि वह इन गालियों को सुन कर खुद को और मजबूत कर रही होती. उसे तो इस लाचार ओर शराबी आदमी पर तरस ही आता. उसे पता था कि वह शराब पीने और गालियां बकने के अलावा कुछ नहीं कर सकता.

दीपचंद्र ने इन हालात का आकलन कर के मन में बहुतकुछ सोच लिया था. इसी आधार पर वे न तो राहुल को कुछ सम झाते और न ही उसे डाक्टर के पास ले कर जाते. इस मामले में वे बिलकुल निष्क्रिय हो गए थे और अवंतिका के साथ मजबूती से खड़े थे. उन्हें पता था कि राहुल पूरी तरह से बरबाद हो चुका है और इस के लिए वह खुद जिम्मेदार है. उस का इस दुनिया में रहना न रहना बराबर है. इस के लिए उन्होंने अपने कलेजे पर पत्थर रख लिया था, आखिर बेटा तो वह उन्हीं का था.

ज्यादा शराब पीने के चलते आखिरकार राहुल का जिगर जवाब दे गया. अवंतिका और परिवार के दूसरे सदस्यों को इस का अंदाजा पहले से ही था. जब वे उसे अस्पताल ले कर गए तो वह मरने की हालत में पहुंच चुका था. उस का चैकअप कर डाक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर दिए. घर पहुंचते ही वह मर गया. वह हड्डियों का ढांचा मात्र बचा था.

दिखाने के लिए सब रोए, लेकिन मन ही मन सब ने चैन की सांस ली कि एक मुसीबत टली. कुदरत ने आखिरकार अपना अनोखा फैसला कर ही दिया था. कमजोर को जाना है, मजबूत को जीवन का आनंद लेना है. प्रकृति की नजर में राहुल कमजोर साबित हुआ और अवंतिका मजबूत.

अब अवंतिका के लिए कोई रोकटोक नहीं थी. राहुल का जाना अवंतिका के लिए ही नहीं सब के लिए अंदरूनी खुशियां ले कर आया था. खराब और कमजोर किसी को बरदाश्त नहीं चाहे परिवार हो समाज हो या कुदरत. दुनिया में रहना तो काबिल बनना ही होगा. नकारा लोग खुद ब खुद हाशिए पर चले जाते हैं.

राहुल की तेरहवीं होते ही दीपचंद्र ने अवंतिका के मातापिता को बुला कर उन से बात की. अवंतिका और सागर से उन्होंने पहले ही बात कर ली थी. सब यही चाहते थे कि घर की दौलत और सम्मान के साथ घर में ही रहे.

दीपचंद्र ने सम झदारी दिखाते हुए एक सादा समारोह आयोजित कर के अवंतिका और सागर को शादी के बंधन में बांध दिया, लेकिन कोर्ट में कानूनी कार्यवाही करना वे नहीं भूले. उन की शादी का रजिस्ट्रेशन करवा कर सर्टिफिकेट हासिल किया जिस से भविष्य में कोई अड़चन न आए.

अवंतिका की जिंदगी में फिर से इतनी मुसीबतों के बाद खुशियों की बहार आ गई थी. वह जिंदगी के नए सवेरे में ताजगी और उमंग भरने के लिए सागर के साथ दिल्ली एयरपोर्ट से स्पेन के लिए उड़ चली जहां उसे अपना हनीमून मनाना था. पुरानी जिंदगी और यादों को दफन करना था और नई जिंदगी को गुलाबों की बगिया की तरह महकाना था. Relationship Story in Hindi

Story in Hindi : देश की माटी पुकारे

Story in Hindi. कई सालों के बाद मुझे विदेश जाने का मौका मिला था. जाहिर है कि बाहर भी देशी आदतें दिलोदिमाग पर छाई हुई थीं. अपने देश की मिट्टी की बात ही निराली है और उस से ज्यादा निराले इस मिट्टी के लोग. हमारा तो कतराकतरा इस से बना हुआ है. देश की मिट्टी और यहां के लोगों को खूब याद किया.

आप कहेंगे कि इस में खास बात क्या है. आदमी घरपरिवार, राज्य, गांवखेड़े, कसबेशहर, देश से दूर जाएगा, तो इन की याद तो आएगी ही. वैसे ही जैसे पत्नी से दूर जाओ, तो उस की याद आती ही है.

यह बात अलग है कि पतिपत्नी साथसाथ ज्यादा देर बिना खटपट के रह नहीं सकते हैं. उस समय तो ऐसा लगता है कि कुंआरे रह कर अलग ही रहते, तो अच्छा रहता. यह हम अपनी नहीं आप की बात कर रहे हैं. हमारी तो शादीशुदा जिंदगी बहुत सुखी है. वैसे, हर आम पति यही सोचता है, आप भी और मैं भी. अब परदेश में देश की याद कैसेकैसे आई, यह थोड़ा सुन लें, तो आप के परदेश जाने पर काम आएगा.

परदेश में 15 दिन बीत गए थे. हमें यूरोप में एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला, जो सड़क पर कहीं खड़े हो कर देशी ढंग से हलका हो रहा हो. कहां अपने देश में हर गलीनुक्कड़ में ऐसे लोगों के चाहे जब दर्शन हो जाते थे और यहां एक अदद आदमी का टोटा पड़ा था.

हम ने सोचा कि सच में भारत ऐसे ही ‘विश्व गुरु’ नहीं कहलाता है. ये देश भले ही अपने को धनी समझते हों, लेकिन कई मामलों में कितने दरिद्रनारायण हैं. यहां हमारे वहां जैसा एक भी आदमी नहीं है.

यहां के रेलवे स्टेशन का खालीपन देख कर जी भर आया. आदमी नहीं दिख रहे थे. रेलें खाली चलती थीं. एक कंपार्टमैंट में मुश्किल से 4-5 लोग मिलते थे. वे भी ऐसे बैठते थे कि एकदूसरे से कोई मतलब नहीं. जैसे दुश्मन देशों के नागरिक हों.

यह देख कर हम तो अंदर से टूट से गए. अपने यहां तो मूंगफली, पौपकौर्न बेचने वाले, कागज के टुकड़ों, बीड़ीसिगरेट के ठूंठों, पानी की खाली बोतलों, गुस्से से भरे लोगों से ठसाठस भरी ट्रेन में धक्कामुक्की करते, लड़तेभिड़ते, फिर दूसरे पल आपस में प्यार करते, बतियाते, ठहाके लगाते, सरकार को कोसते लोग हर जगह मिलते हैं.

हम ने देखा कि ट्रेन में टीटीई के पीछे एक भी आदमी नहीं भाग रहा था. सोचा कि यह टीटीई कैसे अपना व बच्चों का पेट पालता होगा. वैसे, हमारे पास टिकट था, लेकिन हम खुद को रोक नहीं पाए. हम ने अपने बटुए से सौ डौलर का एक नोट निकाल कर ऐसे हवा में लहराया कि उस की नजर पड़ जाए और वह आ कर अपना काम कर जाए, लेकिन वह तो उलटा नाराज हो गया.

हम ने किसी तरह अपनेआप को इस आफत से छुटकारा दिलाया.यहां की सड़कों पर घूमे तो मायूसी हुई. न चाट के ठेले, न पानसिगरेट के, न चाय के, न पापड़ बेचने वाला, न चना जोर गरम बाबू वाला कोई और. कोई भीड़भाड़ भी नहीं.

हमारे यहां जब तक भीड़ का रैला न दिखे, किसी रैली में सड़क जाम में न फंसे, तब तक मजा ही नहीं आए.

और तो और, ट्रैफिक सिगनल 2 मिनट का भी हो, तो कोई उसे तोड़ते हुए अपने यहां जैसा नहीं दिखा. पूरे 2 मिनट तक आराम से इंतजार करता. हम तो बड़े मायूस हुए.

यहां के लोग जानवर प्रेमी बिलकुल नहीं लगे. वजह, किसी सड़क पर कुत्ते, बकरियां, गायभैंस, बैल यहां तक कि सूअर भी नहीं मिले. जानवरों की इतनी अनदेखी हम ने नहीं देखी. हमारे लोग तो स्टेशन व बस स्टैंड पर बिना इन के रह ही नहीं सकते. ‘पीटा’ वाले पता नहीं, हमें अवार्ड देने में इतनी देर क्यों कर रहे हैं. असली ‘एनीमल लवर’ हम ही हैं.

वहां के बाजार में मुर्दनी छाई सी लगी. कोई खास भीड़ नहीं. कोई खुला सामान नहीं. हर सामान डब्बाबंद. कुछ खरीदो या कुछ दाम कम करने की बात करो, तो अजीब सा मुंह बनाए सेल्समैन. मजा ही नहीं आया खरीदारी करने में.

सर्दीखांसी होने पर हम एक मैडिकल स्टोर में दवा लेने गए, तो उस ने बिना डाक्टर की परची के दवा देने से इनकार कर दिया. हमें तुरंत अपने वतन की दुकानें याद आईं. चाहे जो दवा बिना परची के झट से ले लो और कैमिस्ट भी डाक्टर की कमी अपनी सलाह दे कर पूरी कर देता था. हम ने मन में फिर दोहराया कि हम यहां नहीं रह पाएंगे.

यहां के एक दफ्तर में हमें एक काम से जाना पड़ा, तो बड़ा अजीब सा लगा. यहां के साहब के कमरे के बाहर कोई चपरासी नहीं मिला, जो कान में पैन डाल कर मैल निकाल रहा हो या तंबाकू मलते पंजे बजा रहा हो. दफ्तरों में कहीं भी न कोई कागज दिखा, न फाइलों के अंबार, न टैग उलझे हुए, न धूल खाते बस्ते. न पान की पीक का निशान ही दिखा.

हम ने सोचा, ‘बहुत बंदिशें लगा रखी हैं. यहां जरूर तनाव में खुदकुशी के मामले ज्यादा तादाद में होते होंगे. हमारे यहां तो कोई बंदिश नहीं है, जिस को जो आता है, वह करने से उसे रोका नहीं जाता.

‘पान की पीक थूकने की, हलका होने की, गालीगलौज करने की, नाककान में उंगली डालने की, बाल व खोपड़ी खुजलाने की, सरकार व महंगाई को कोसने की कोई मनाही नहीं है.’

हम 20 दिन में ही विदेश से ऊब गए. सड़क के न तो बीचोंबीच में और न ही किनारे कहीं धार्मिक स्थल दिखे और न बतियाने वाले लोग. हम ने तो मन भर जाने से टिकट कैंसिल कर हफ्ते भर पहले का टिकट बनवा लिया और अपनी माटी की ओर लौट चले.

दिल्ली एयरपोर्ट से उतर कर हम ने अपने शहर की ट्रेन पकड़ने की सोची. दिल्ली स्टेशन पर पहुंचते ही भीड़ देख कर हमारा दिल बागबाग हो गया. रात में घर पहुंचे, तो और बागबाग हो गया. ट्रेन के चूहों ने सूटकेस में 2 जगह छेद कर अपनी भूख शांत कर ली थी. हमारा बटुआ भी किसी ने पार कर ‘वैलकम बैक’ की परची जेब में उस की जगह रख दी थी. हम अपने देश जो आ गए थे. story in hindi

Funny Hindi Story : हाईटैक

Funny Hindi Story. जयपुर को ‘गुलाबी नगरी’ के रूप में जाना जाता है. गरीब दास को इस गुलाबी नगरी का एक और रंग नजर आया और वह रंग सुनहरा है. यह रंग कोई साधारण रंग नहीं, बल्कि हाईटैक रंग है.

हुआ यों कि कल वे दफ्तर से घर जा रहे थे. किंग्स रोड से गुजरते हुए एक ट्रैफिक पुलिस ने उन्हें रुकने का इशारा किया.

गरीब दास ने अपनी मोटरसाइकिल को सड़क किनारे ला कर खड़ा किया.

‘‘क्या बात है?’’ उन्होंने सिपाही से पूछा. ‘‘आप की मोटरसाइकिल की रफ्तार इतनी ज्यादा क्यों थी?’’ उस सिपाही ने सवाल के जवाब में सवाल किया.

‘‘रफ्तार तो ज्यादा नहीं थी. मैं खुद ही ज्यादा रफ्तार से नहीं चलता. हो सकता है, थोड़ी ज्यादा हो गई हो. दरअसल, मोटरसाइकिल का स्पीडोमीटर आज ही खराब हो गया है,’’ गरीब दास ने वजह बताई.

‘‘निकालो 8 सौ रुपए,’’ सिपाही ने आदेश किया. गरीब दास को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा. 8 सौ रुपए तो क्या, उन के पास सौ रुपए का ही एक नोट था.

‘‘सिपाहीजी, मुझे माफ कीजिए. अभी ट्रैफिक कम है, इसलिए थोड़ी रफ्तार बढ़ गई होगी. मैं आगे से ध्यान रखूंगा,’’ गरीब दास मिमियाए.

‘‘जाओ, साहब से बात करो,’’ सिपाही ने एक ओर इशारा किया. गरीब दास ने देखा कि साहब वरदी में सजे जिप्सी से सटे हुए खड़े थे.

गरीब दास साहब के पास पहुंचे और अपनी समस्या बता कर माफ करने को कहा. साहब ने उन्हें अपने पीछे आने को कहा और जिप्सी के पीछे ले जा कर उस में बैठे एक और सिपाही के जिम्मे कर दिया.

सिपाही ने उन्हें पहले तो घूरा और जिप्सी में रखे कंप्यूटर के स्क्रीन पर देखने को कहा. गरीब दास ने स्क्रीन पर देखा. उन्होंने स्क्रीन पर खुद को मोटरसाइकिल से आते हुए देखा.

वे इस नजारे को देख कर सपनों में जाने ही वाले थे कि सिपाही ने स्क्रीन के उस भाग को दिखाया, जो उन की मोटरसाइकिल की रफ्तार को दिखा रहा था. उन की मोटरसाइकिल 42 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से जा रही थी, जबकि तय रफ्तार 40 किलोमीटर प्रति घंटा थी.

उस सिपाही ने गरीब दास से पूछा, ‘‘आप की मोटरसाइकिल की रफ्तार तय रफ्तार से ज्यादा क्यों है?’’

‘‘लेकिन यह तो सिर्फ 2 किलोमीटर ही ज्यादा है. आगे से मैं खयाल रखूंगा,’’ गरीब दास बोले.

इस बीच गरीब दास ने देखा कि कुछ मोटरसाइकिलें तो इतनी तेज रफ्तार से जा रही थीं कि उन की रफ्तार किसी भी हाल में 60 किलोमीटर प्रति घंटा से कम न होगी. पर पता नहीं क्यों उन को रोकने की जरूरत वे पुलिस वाले नहीं समझ  रहे थे.

इस के अलावा कई गाडि़यां बहुत ज्यादा धुआं भी छोड़ रही थीं. कुछ गाडि़यां तो ट्रैफिक के सही ढंग से चलने में रुकावट भी पहुंचा रही थीं, पर इस से भी ट्रैफिक वालों पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.

उन की निगाहें 2 तरह के लोगों पर ज्यादा टिकी थीं. पहले वे दोपहिया चलाने वाले, जो हैलमैट नहीं पहने थे और वे कार चालक, जो सीट बैल्ट नहीं बांधे हुए थे. इस तरह के लोग उन के लिए आमदनी का अच्छा जरीया थे.

गरीब दास हैलमैट पहने हुए थे. इस के बावजूद उन्हें रोका गया था, तो शायद इस की वजह उन की मोटरसाइकिल का नंबर था, जो किसी और राज्य का था, जहां से गरीब दास तबादला हो कर आए थे. बाहरी राज्य के सवार भी ट्रैफिक पुलिस के लिए आसान शिकार होते हैं.

‘‘अब आप का चालान होगा और कोर्ट से आप गाड़ी छुड़ा लेना,’’ सिपाही ने कहा.

यह सुन कर गरीब दास बेचैन हो गए. कोर्ट का चक्कर? बाप रे बाप, अब क्या किया जाए?

उन की दिमागी हालत को देख कर सिपाही समझ  गया कि लोहा गरम हो गया है, हथौड़ा चलाने का यही सही समय है.

‘‘4 सौ रुपए निकालो, चालान भी नहीं करूंगा और सारे रिकौर्ड्स भी डिलीट कर दूंगा,’’ सिपाही ने कहा.

‘‘पर मेरे पास 4 सौ रुपए नहीं हैं,’’ रोंआसा होते हुए गरीब दास ने कहा.

‘‘अच्छा, चलो 2 सौ रुपए दे दो,’’ सिपाही झुंझला कर बोला. उसे दूसरे ग्राहकों को भी देखना था, जो अपना नंबर लगाए खड़े थे.

‘‘लेकिन मेरे पास तो सौ रुपए का एक नोट है,’’ गरीब दास ने कहा. सिपाही खीज कर बोला, ‘‘चलो, वही दो और दफा हो जाओ.’’

गरीब दास ने झिझकते हुए पर्स से सौ रुपए का एकलौता नोट निकाला और उस सिपाही के हवाले कर दिया. उस सिपाही ने गरीब दास को मोटरसाइकिल ले जाने की इजाजत दे दी.

गरीब दास सिर पर पांव रख कर भागे, पर रिश्वतखोरी में हाईटैक को देख कर हैरान रह गए. उन्होंने सुना था कि ट्रैफिक पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इस तरह के वाहन को ‘इंटर्सेप्टर’ कहते हैं. सरकारी खजाने को जाने वाले कोष को ये ‘इंटर्सेप्ट’ कर अपनी जेब में रख कर इस नाम को सच साबित कर रहे थे.

सब से खास बात यह कि इस ‘इंटर्सेप्टर ह्वीकल’ को ऐसी जगह पर रखा जाता था, जहां भीड़ कम हो और वाहन चालक थोड़ी ज्यादा रफ्तार से गाड़ी चलाए. साथ ही, ऐसे मोड़ पर किनारे कर इस ह्वीकल को खड़ा किया जाता कि वाहन चालकों की निगाह उस ओर न जाए.

घर पहुंचने पर गरीब दास की पत्नी ने पूछा, ‘‘लाइटर लाए?’’

‘‘नहीं. दरअसल, पैसे एक हाईटैक शो देखने में खत्म हो गए,’’ गरीब दास ने जवाब दिया.

पत्नी कुछ समझ तो नहीं पाईं, पर गरीब दास के चेहरे पर शाम 6 बजे ही 12 बजते देख कर चुप रहीं.

Hindi Story: पीता हूं सरकार चलाने को

Hindi Story ‘तू अपना जिगरी यार है. तू रोज पीने का कोई कोई नया बहाना क्यों ढूंढ़ता रहता है?’ मैं जबतब उसे समझाता हूं, ‘ मेरे जिगरी दोस्त, पी, लेकिन बहुत मत पी. लिमिट में पी. जैसेजैसे सरकार सुरा महंगी कर रही है, तू उतनी ही और पी रहा है. सरकार और तुझ में कोई कनैक्शन है क्या? तेरी बीवी और मेरी भाभी से अब तुझ से पहले मुझे जूते पड़ने लगे हैं कि कैसा दोस्त पाल रखा है?

देख दोस्त, तेरी सेहत भी अब अलाऊ नहीं करती. जब तू सुरापान किए सरकार की तरह बारबार गिरता हुआ बड़ी मुश्किल से संभलता है , तो मुझे अपने पर बहुत दया आती है. पर एक तू है कि मानता ही नहीं. जब देखो, अपने बारे में सोचना बंद कर सरकार के बारे में ही सोचता रहता है.
अरे, जब कोई भी सरकार तेरे बारे में नहीं सोचती तो तू उस के बारे में क्यों सोचता है? बेकार का सरकारवादी कहीं का…’

मेरा वह दोस्त मेरे बारबार पीने से रोकने पर मेरा महंगाई से सिकुड़ा सीना पीटता हर बार यही कहता है, ‘देखो दोस्त, मैं उन की तरह सरकार का खासमखास सरकार फरामोश नहीं जो जहां से देखो, जब देखो, चटी सरकार को भी चाटने में लगे रहते हैं. सुरापानी उसी का, सरकार जिस की.
यह जो मैं सीना ठोंक कर पीता हूं , मैं अपने लिए कतई नहीं पीता. जितना पीता हूं सब सरकार के लिए पीता हूं. यह जो मैं पीता हूं , मैं अपने लिए  हरगिज नहीं पीता. टोटली सरकार के फायदे के लिए पीता हूं.
अच्छा बता, मैं पिऊंगा नहीं तो सरकार को रेवैन्यू कहां से जैनेरेट होगा? हर महकमा तो घाटे में है. जहां देखो, खाने वालों की फौज. ऐसे में मैं भी नहीं पिऊंगा तो सरकार का रेवैन्यू हो गया जीरो? अगर रेवैन्यू नहीं आएगा तो वह अपने अमले को कहां से पिलाएगीखिलाएगी? रोतीचीखती जनता की परवाह किए बिना उन को मौज कहां से कराएगी?

यह जो मैं इधरउधर से उधार ले कर ठेके के चक्कर पर चक्कर लगाता हूं , अगर जो मैं ये चक्कर लगाने बंद कर दूं तो बता, वे जनहित के बहाने विदेशों के दौरे कैसे करेंगे?
दोस्त, समुद्र मंथन के वक्त शिव ने सृष्टि बचाने के लिए तो बस एक बार ही गरल पिया था, पर मैं तो सरकार बचाने के लिए दिन में दसदस बार हलाहल पीता हूं. बता, मैं बड़ा कि शिव?
कोई मेरी सही से कीमत लगाए, तो मेरा त्याग शिव से बीस ही होगा दोस्त.
मैं पीने वालों का सीना पीटपीट कर कहता हूं कि सरकार की आमदनी का सब से बड़ा कोई सोर्स है तो वह केवल और केवल मैं हूं. बता दे कोई दूसरा माई का लाल जो मेरे नाली में गिरने पर, कुत्तों से अपना मुंह चटवाते हुए मुझ से ज्यादा सरकार को इनकम देता हो? बाकी सब तो बस खाने वाले हैं.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 महीने से पैंशनरों की पैंडिंग पैंशन कहां से देगी?
दोस्त, मैं पिऊंगा नहीं तो वह दिन में 10-10 बार एरियर के लिए रो रहे एरियर वालों को बकाया एरियर कहां से देगी?

दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 सालों से बीमारों के मैडिकल बिलों का भुगतान कहां से करेगी? अपनी जेब से देने से तो वह रही.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो विनाशसौरीसौरीविकास का रास्ता बंद हो जाएगा.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार को टीएडीए कहां से मिलेगा? मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार की तनख्वाह कहां से आएगी? दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो 100 ग्राम की फाइल अपने चपरासी से उठवाने वालों का बोझ कहां जाएगा?
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकारी गाड़ी में अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल छोड़ सरकारी स्कूल के बच्चों को प्लानिंग पर प्लानिंग करने वालों की गाड़ी का पैट्रोल कहां से आएगा?
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो यार बेलियों की मौजमस्ती पर क्या ताला नहीं लग जाएगा? ऐसे में हर पियक्कड़ सरकार भक्त का फर्ज बनता है कि वह अपनी सेहत की परवाह किए बिना सरकार की सेहत के हित में पिए,डट कर पिए, बढ़ते रेट की परवाह किए बिना पिए.

यहां सवाल अपनी सेहत का नहीं, सरकार की सेहत का है. सरकार की सेहत पर मेरी सारी सेहतें कुरबान. बुरे वक्त में जब सरकार के चचेरेममेरे ही उस का साथ नहीं देते, तो ऐसे में मैं सरकार का साथ नहीं दूंगा तो और कौन देगा? डियर, मैं पी कर गिर जाऊं तो गिर जाऊं, पर सरकार को किसी भी सूरत में गिरने नहीं दूंगा. इतनी ताकत तो अभी भी है मेरे पास. यह मेरा वादा है अपने आप से.
बोल, अब समझा, मैं क्यों पीता हूं? मैं पी कर अपने गिरने की परवाह किए बिना सरकार को गिरने से बचाने के लिए पीता हूं,’ उस ने कहा और मेरे सामने ही सरकार हित में एक पैग और खींचा तो मैं ने उस के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘गुरु, सरकार के बारे में सोचना अच्छी बात है, पर सरकार को भी तो चाहिए कि वह तुम्हारे हित का ध्यान रखते हुए शराब और महंगी करे. अपने खर्चे के साथसाथ तो तुम्हारी जेब का भी ध्यान रखे.’

अरे दोस्त, यहां मेरे सिवा दूसरों के बारे में सोचता ही कौन है? यहां सस्ता है ही क्या? दोस्ती तो पहले ही सस्ती नहीं थी, अब तो यहां दुश्मनी तक सस्ती नहीं. कमेटी का हफ्ते में एक दिन आने वाला पानी तक पिछले साल के मुकाबले इस साल 4 गुना महंगा हो गया है. अस्पताल में टैस्ट महंगे हो गए हैं. रैस्टहाउसों के रैस्ट महंगे हो गए हैं. पर जो कल को सरकार की इनकम बंद गई तो पता है, जाने कितने भरे पेटों के खाली दिमागों में चूहे कूदने लग जाएंगे? जनता तो वे हैं नहीं जो भूखे पेट भी भजन करने में मस्त रहें.
देख दोस्त, कुलमिला कर कहूं तो मुझे पीने का शौक नहीं, मैं पीता हूं तो सरकार चलाने कोजीना तो है उसी का जिस ने यह राज जाना, है काम हर वोटर का, कुरसी के काम आना. तू क्या समझता है कि मैं ने पी रखी है?’

पिएं तेरे दुश्मनपर दोस्त, जो वैष्णव से वैष्णव जीव और कुरसी को एक बार कुछ भी पीने की लत लग जाए तो वह किसी तंत्र में भी नहीं छूटती…’ अब मुझे लग गया था कि वह सुराड़ी से कथावाचक होने लगा है, तो मैं ने झट आरती शुरू कर दी, ताकि वह अपनी सुराकथा खत्म करे.
प्रभुधन्य हो ऐसा सरकार हितैषी, जो हर कहीं पिए हुए भी गिरता सरकार खड़ी रखने में जुटा है.
हे सरकार, आप से मेरी विनम्र रिक्वैस्ट हैहो सके तो मेरे जिगरी यार को किसी खास मौके पर सम्मानित जरूर करें. देशभक्तों की खालों वाले सियारों को तो मौके और बेमौके पर आप उन के देश के लिए किए झूठे त्याग को ले कर सम्मानित करते ही रहे हैं. ऐसा करने से सुरापानी कौम में आप के प्रति और इमोशन जगेंगे और वह अपना सबकुछ बेच कर आप का साथ देने के लिए बेचैन हो उठेगी. ऐसा सरकार का हमदर्द आप को अपनों के बीच भी चिराग ले कर शायद ही मिले.       

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें