Funny Hindi Story : हाईटैक

Funny Hindi Story. जयपुर को ‘गुलाबी नगरी’ के रूप में जाना जाता है. गरीब दास को इस गुलाबी नगरी का एक और रंग नजर आया और वह रंग सुनहरा है. यह रंग कोई साधारण रंग नहीं, बल्कि हाईटैक रंग है.

हुआ यों कि कल वे दफ्तर से घर जा रहे थे. किंग्स रोड से गुजरते हुए एक ट्रैफिक पुलिस ने उन्हें रुकने का इशारा किया.

गरीब दास ने अपनी मोटरसाइकिल को सड़क किनारे ला कर खड़ा किया.

‘‘क्या बात है?’’ उन्होंने सिपाही से पूछा. ‘‘आप की मोटरसाइकिल की रफ्तार इतनी ज्यादा क्यों थी?’’ उस सिपाही ने सवाल के जवाब में सवाल किया.

‘‘रफ्तार तो ज्यादा नहीं थी. मैं खुद ही ज्यादा रफ्तार से नहीं चलता. हो सकता है, थोड़ी ज्यादा हो गई हो. दरअसल, मोटरसाइकिल का स्पीडोमीटर आज ही खराब हो गया है,’’ गरीब दास ने वजह बताई.

‘‘निकालो 8 सौ रुपए,’’ सिपाही ने आदेश किया. गरीब दास को जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा. 8 सौ रुपए तो क्या, उन के पास सौ रुपए का ही एक नोट था.

‘‘सिपाहीजी, मुझे माफ कीजिए. अभी ट्रैफिक कम है, इसलिए थोड़ी रफ्तार बढ़ गई होगी. मैं आगे से ध्यान रखूंगा,’’ गरीब दास मिमियाए.

‘‘जाओ, साहब से बात करो,’’ सिपाही ने एक ओर इशारा किया. गरीब दास ने देखा कि साहब वरदी में सजे जिप्सी से सटे हुए खड़े थे.

गरीब दास साहब के पास पहुंचे और अपनी समस्या बता कर माफ करने को कहा. साहब ने उन्हें अपने पीछे आने को कहा और जिप्सी के पीछे ले जा कर उस में बैठे एक और सिपाही के जिम्मे कर दिया.

सिपाही ने उन्हें पहले तो घूरा और जिप्सी में रखे कंप्यूटर के स्क्रीन पर देखने को कहा. गरीब दास ने स्क्रीन पर देखा. उन्होंने स्क्रीन पर खुद को मोटरसाइकिल से आते हुए देखा.

वे इस नजारे को देख कर सपनों में जाने ही वाले थे कि सिपाही ने स्क्रीन के उस भाग को दिखाया, जो उन की मोटरसाइकिल की रफ्तार को दिखा रहा था. उन की मोटरसाइकिल 42 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से जा रही थी, जबकि तय रफ्तार 40 किलोमीटर प्रति घंटा थी.

उस सिपाही ने गरीब दास से पूछा, ‘‘आप की मोटरसाइकिल की रफ्तार तय रफ्तार से ज्यादा क्यों है?’’

‘‘लेकिन यह तो सिर्फ 2 किलोमीटर ही ज्यादा है. आगे से मैं खयाल रखूंगा,’’ गरीब दास बोले.

इस बीच गरीब दास ने देखा कि कुछ मोटरसाइकिलें तो इतनी तेज रफ्तार से जा रही थीं कि उन की रफ्तार किसी भी हाल में 60 किलोमीटर प्रति घंटा से कम न होगी. पर पता नहीं क्यों उन को रोकने की जरूरत वे पुलिस वाले नहीं समझ  रहे थे.

इस के अलावा कई गाडि़यां बहुत ज्यादा धुआं भी छोड़ रही थीं. कुछ गाडि़यां तो ट्रैफिक के सही ढंग से चलने में रुकावट भी पहुंचा रही थीं, पर इस से भी ट्रैफिक वालों पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.

उन की निगाहें 2 तरह के लोगों पर ज्यादा टिकी थीं. पहले वे दोपहिया चलाने वाले, जो हैलमैट नहीं पहने थे और वे कार चालक, जो सीट बैल्ट नहीं बांधे हुए थे. इस तरह के लोग उन के लिए आमदनी का अच्छा जरीया थे.

गरीब दास हैलमैट पहने हुए थे. इस के बावजूद उन्हें रोका गया था, तो शायद इस की वजह उन की मोटरसाइकिल का नंबर था, जो किसी और राज्य का था, जहां से गरीब दास तबादला हो कर आए थे. बाहरी राज्य के सवार भी ट्रैफिक पुलिस के लिए आसान शिकार होते हैं.

‘‘अब आप का चालान होगा और कोर्ट से आप गाड़ी छुड़ा लेना,’’ सिपाही ने कहा.

यह सुन कर गरीब दास बेचैन हो गए. कोर्ट का चक्कर? बाप रे बाप, अब क्या किया जाए?

उन की दिमागी हालत को देख कर सिपाही समझ  गया कि लोहा गरम हो गया है, हथौड़ा चलाने का यही सही समय है.

‘‘4 सौ रुपए निकालो, चालान भी नहीं करूंगा और सारे रिकौर्ड्स भी डिलीट कर दूंगा,’’ सिपाही ने कहा.

‘‘पर मेरे पास 4 सौ रुपए नहीं हैं,’’ रोंआसा होते हुए गरीब दास ने कहा.

‘‘अच्छा, चलो 2 सौ रुपए दे दो,’’ सिपाही झुंझला कर बोला. उसे दूसरे ग्राहकों को भी देखना था, जो अपना नंबर लगाए खड़े थे.

‘‘लेकिन मेरे पास तो सौ रुपए का एक नोट है,’’ गरीब दास ने कहा. सिपाही खीज कर बोला, ‘‘चलो, वही दो और दफा हो जाओ.’’

गरीब दास ने झिझकते हुए पर्स से सौ रुपए का एकलौता नोट निकाला और उस सिपाही के हवाले कर दिया. उस सिपाही ने गरीब दास को मोटरसाइकिल ले जाने की इजाजत दे दी.

गरीब दास सिर पर पांव रख कर भागे, पर रिश्वतखोरी में हाईटैक को देख कर हैरान रह गए. उन्होंने सुना था कि ट्रैफिक पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले इस तरह के वाहन को ‘इंटर्सेप्टर’ कहते हैं. सरकारी खजाने को जाने वाले कोष को ये ‘इंटर्सेप्ट’ कर अपनी जेब में रख कर इस नाम को सच साबित कर रहे थे.

सब से खास बात यह कि इस ‘इंटर्सेप्टर ह्वीकल’ को ऐसी जगह पर रखा जाता था, जहां भीड़ कम हो और वाहन चालक थोड़ी ज्यादा रफ्तार से गाड़ी चलाए. साथ ही, ऐसे मोड़ पर किनारे कर इस ह्वीकल को खड़ा किया जाता कि वाहन चालकों की निगाह उस ओर न जाए.

घर पहुंचने पर गरीब दास की पत्नी ने पूछा, ‘‘लाइटर लाए?’’

‘‘नहीं. दरअसल, पैसे एक हाईटैक शो देखने में खत्म हो गए,’’ गरीब दास ने जवाब दिया.

पत्नी कुछ समझ तो नहीं पाईं, पर गरीब दास के चेहरे पर शाम 6 बजे ही 12 बजते देख कर चुप रहीं.

Hindi Story: पीता हूं सरकार चलाने को

Hindi Story ‘तू अपना जिगरी यार है. तू रोज पीने का कोई कोई नया बहाना क्यों ढूंढ़ता रहता है?’ मैं जबतब उसे समझाता हूं, ‘ मेरे जिगरी दोस्त, पी, लेकिन बहुत मत पी. लिमिट में पी. जैसेजैसे सरकार सुरा महंगी कर रही है, तू उतनी ही और पी रहा है. सरकार और तुझ में कोई कनैक्शन है क्या? तेरी बीवी और मेरी भाभी से अब तुझ से पहले मुझे जूते पड़ने लगे हैं कि कैसा दोस्त पाल रखा है?

देख दोस्त, तेरी सेहत भी अब अलाऊ नहीं करती. जब तू सुरापान किए सरकार की तरह बारबार गिरता हुआ बड़ी मुश्किल से संभलता है , तो मुझे अपने पर बहुत दया आती है. पर एक तू है कि मानता ही नहीं. जब देखो, अपने बारे में सोचना बंद कर सरकार के बारे में ही सोचता रहता है.
अरे, जब कोई भी सरकार तेरे बारे में नहीं सोचती तो तू उस के बारे में क्यों सोचता है? बेकार का सरकारवादी कहीं का…’

मेरा वह दोस्त मेरे बारबार पीने से रोकने पर मेरा महंगाई से सिकुड़ा सीना पीटता हर बार यही कहता है, ‘देखो दोस्त, मैं उन की तरह सरकार का खासमखास सरकार फरामोश नहीं जो जहां से देखो, जब देखो, चटी सरकार को भी चाटने में लगे रहते हैं. सुरापानी उसी का, सरकार जिस की.
यह जो मैं सीना ठोंक कर पीता हूं , मैं अपने लिए कतई नहीं पीता. जितना पीता हूं सब सरकार के लिए पीता हूं. यह जो मैं पीता हूं , मैं अपने लिए  हरगिज नहीं पीता. टोटली सरकार के फायदे के लिए पीता हूं.
अच्छा बता, मैं पिऊंगा नहीं तो सरकार को रेवैन्यू कहां से जैनेरेट होगा? हर महकमा तो घाटे में है. जहां देखो, खाने वालों की फौज. ऐसे में मैं भी नहीं पिऊंगा तो सरकार का रेवैन्यू हो गया जीरो? अगर रेवैन्यू नहीं आएगा तो वह अपने अमले को कहां से पिलाएगीखिलाएगी? रोतीचीखती जनता की परवाह किए बिना उन को मौज कहां से कराएगी?

यह जो मैं इधरउधर से उधार ले कर ठेके के चक्कर पर चक्कर लगाता हूं , अगर जो मैं ये चक्कर लगाने बंद कर दूं तो बता, वे जनहित के बहाने विदेशों के दौरे कैसे करेंगे?
दोस्त, समुद्र मंथन के वक्त शिव ने सृष्टि बचाने के लिए तो बस एक बार ही गरल पिया था, पर मैं तो सरकार बचाने के लिए दिन में दसदस बार हलाहल पीता हूं. बता, मैं बड़ा कि शिव?
कोई मेरी सही से कीमत लगाए, तो मेरा त्याग शिव से बीस ही होगा दोस्त.
मैं पीने वालों का सीना पीटपीट कर कहता हूं कि सरकार की आमदनी का सब से बड़ा कोई सोर्स है तो वह केवल और केवल मैं हूं. बता दे कोई दूसरा माई का लाल जो मेरे नाली में गिरने पर, कुत्तों से अपना मुंह चटवाते हुए मुझ से ज्यादा सरकार को इनकम देता हो? बाकी सब तो बस खाने वाले हैं.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 महीने से पैंशनरों की पैंडिंग पैंशन कहां से देगी?
दोस्त, मैं पिऊंगा नहीं तो वह दिन में 10-10 बार एरियर के लिए रो रहे एरियर वालों को बकाया एरियर कहां से देगी?

दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 सालों से बीमारों के मैडिकल बिलों का भुगतान कहां से करेगी? अपनी जेब से देने से तो वह रही.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो विनाशसौरीसौरीविकास का रास्ता बंद हो जाएगा.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार को टीएडीए कहां से मिलेगा? मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार की तनख्वाह कहां से आएगी? दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो 100 ग्राम की फाइल अपने चपरासी से उठवाने वालों का बोझ कहां जाएगा?
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकारी गाड़ी में अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल छोड़ सरकारी स्कूल के बच्चों को प्लानिंग पर प्लानिंग करने वालों की गाड़ी का पैट्रोल कहां से आएगा?
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो यार बेलियों की मौजमस्ती पर क्या ताला नहीं लग जाएगा? ऐसे में हर पियक्कड़ सरकार भक्त का फर्ज बनता है कि वह अपनी सेहत की परवाह किए बिना सरकार की सेहत के हित में पिए,डट कर पिए, बढ़ते रेट की परवाह किए बिना पिए.

यहां सवाल अपनी सेहत का नहीं, सरकार की सेहत का है. सरकार की सेहत पर मेरी सारी सेहतें कुरबान. बुरे वक्त में जब सरकार के चचेरेममेरे ही उस का साथ नहीं देते, तो ऐसे में मैं सरकार का साथ नहीं दूंगा तो और कौन देगा? डियर, मैं पी कर गिर जाऊं तो गिर जाऊं, पर सरकार को किसी भी सूरत में गिरने नहीं दूंगा. इतनी ताकत तो अभी भी है मेरे पास. यह मेरा वादा है अपने आप से.
बोल, अब समझा, मैं क्यों पीता हूं? मैं पी कर अपने गिरने की परवाह किए बिना सरकार को गिरने से बचाने के लिए पीता हूं,’ उस ने कहा और मेरे सामने ही सरकार हित में एक पैग और खींचा तो मैं ने उस के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘गुरु, सरकार के बारे में सोचना अच्छी बात है, पर सरकार को भी तो चाहिए कि वह तुम्हारे हित का ध्यान रखते हुए शराब और महंगी करे. अपने खर्चे के साथसाथ तो तुम्हारी जेब का भी ध्यान रखे.’

अरे दोस्त, यहां मेरे सिवा दूसरों के बारे में सोचता ही कौन है? यहां सस्ता है ही क्या? दोस्ती तो पहले ही सस्ती नहीं थी, अब तो यहां दुश्मनी तक सस्ती नहीं. कमेटी का हफ्ते में एक दिन आने वाला पानी तक पिछले साल के मुकाबले इस साल 4 गुना महंगा हो गया है. अस्पताल में टैस्ट महंगे हो गए हैं. रैस्टहाउसों के रैस्ट महंगे हो गए हैं. पर जो कल को सरकार की इनकम बंद गई तो पता है, जाने कितने भरे पेटों के खाली दिमागों में चूहे कूदने लग जाएंगे? जनता तो वे हैं नहीं जो भूखे पेट भी भजन करने में मस्त रहें.
देख दोस्त, कुलमिला कर कहूं तो मुझे पीने का शौक नहीं, मैं पीता हूं तो सरकार चलाने कोजीना तो है उसी का जिस ने यह राज जाना, है काम हर वोटर का, कुरसी के काम आना. तू क्या समझता है कि मैं ने पी रखी है?’

पिएं तेरे दुश्मनपर दोस्त, जो वैष्णव से वैष्णव जीव और कुरसी को एक बार कुछ भी पीने की लत लग जाए तो वह किसी तंत्र में भी नहीं छूटती…’ अब मुझे लग गया था कि वह सुराड़ी से कथावाचक होने लगा है, तो मैं ने झट आरती शुरू कर दी, ताकि वह अपनी सुराकथा खत्म करे.
प्रभुधन्य हो ऐसा सरकार हितैषी, जो हर कहीं पिए हुए भी गिरता सरकार खड़ी रखने में जुटा है.
हे सरकार, आप से मेरी विनम्र रिक्वैस्ट हैहो सके तो मेरे जिगरी यार को किसी खास मौके पर सम्मानित जरूर करें. देशभक्तों की खालों वाले सियारों को तो मौके और बेमौके पर आप उन के देश के लिए किए झूठे त्याग को ले कर सम्मानित करते ही रहे हैं. ऐसा करने से सुरापानी कौम में आप के प्रति और इमोशन जगेंगे और वह अपना सबकुछ बेच कर आप का साथ देने के लिए बेचैन हो उठेगी. ऐसा सरकार का हमदर्द आप को अपनों के बीच भी चिराग ले कर शायद ही मिले.       

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