Manoranjak Kahanhi : नाता

Manoranjak Kahanhi. छमिया ने गीले कपड़े निचोड़ कर छत पर बंधे तार पर डालने के लिए नजर उठाई, तो भरेभरे बदन के सांवले श्यामू को अपनी ओर ताकते पाया.

हालांकि छमिया के देखने पर श्यामू थोड़ा असहज जरूर हुआ और उस ने अपने बालों को इस तरह झटका दिया, जैसे उस की नजर अभी छमिया पर है और वह उस से नजरें हटा भी रहा है, मगर सच बात की चुगली उस की झेंपी नजरें कर रही थीं.

छमिया की जिन झील जैसी आंखों में डूबने को मन उतावला था, उन की एक हिलोर ही श्यामू को मेमना बना गई थी. भरेपूरे बदन पर जवानी का वसंत खिलाए छमिया ने तो उस से कुछ कहा भी नहीं था, पर श्यामू चाहने पर भी उसे दोबारा देखने की हिम्मत न जुटा सका.

वह तो कहो, अकेलेपन से ऊबी छमिया ने ही बात संभाल ली और कहा, ‘‘तुम तो लड़कियों की तरह शरमाते हो. अरे, मुझे  ही देख रहे थे न? कोई बात नहीं. अब मुंह क्यों छिपाते हो?’’

गांव में इतनी खुली हंसी हंस कर ऐसी बात कहने वाली औरत के बारे में श्यामू ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. वह तो शहर से इम्तिहान दे कर आया था और गांव में बोरियत से बचने के लिए शाम को छत पर बैठ गया था. पास के मिले घर की छत पर आई छमिया पर उस की नजर पड़ गई और पहली नजर में ही उस के मन की हालत जाने क्याक्या होने लगी.

छमिया की बात ने श्यामू को कुछ भरोसा दिया. वह हकलाते हुए बोला, ‘‘म…म… मैं ने सोचा कि तुम बुरा मान गई हो.’’

‘‘यह लो, सालभर बाद तो तुम नजर आए और मैं बुरा मान कर बैठ जाऊं. फिर बुरा किस बात का? हम लोग तो देवरभाभी ठहरे, जिन में हंसीमजाक होता ही रहता है. तुम्हारा नाम जरूर श्यामू है, पर तुम में कृष्ण वाले कोई गुण नहीं हैं. हां, राधा की तरह शरमाते जरूर हो,’’ छमिया श्यामू को निगाहों में तौलते हुए मुसकरा कर बोली.

‘‘कृष्ण बनूंगा तो किसी गोपी की भी जरूरत पड़ेगी न,’’ किसी तरह हिम्मत बांध कर श्यामू कह गया.

‘‘क्या इतने बड़े इलाहाबाद में तुम्हें कोई गोपी ही नहीं मिली?’’ छमिया की आंखें मुसकरा रही थीं और देह में मस्ती दिख रही थी.

‘‘अगर मिली होती, तो तुम्हें क्यों ताकता?’’ छमिया के खुलेपन ने श्यामू को ढीठ बना दिया था.

‘‘तो कब आ रहे हो माखनदही चुराने?’’ यह कहते हुए छमिया की आंखों में न्योता था.

पासपड़ोस के लोग ज्यादा दिनों बाद गांव आते हैं, तो घरघर में उन का मेहमान जैसा स्वागत होता है. वैसे तो श्यामू भले ही न जाता, पर अब तो जाना उस के मन की मजबूरी बन गया.

‘‘दहीमाखन के बजाय चाय ही मिल जाए, तब आ जाऊं,’’ कह कर श्यामू मुसकरा उठा. उस के चेहरे पर हसरत बरस रही थी.

‘‘तो अभी आ जाओ, लेकिन दरवाजे से आना, ताकि तुम्हारी चाची कुछ और न सोचने लगें. अभी वे दरवाजे पर अन्ना दीदी को बैठा कर गई हैं. जैसे मैं अकेली रहूंगी, तो भाग जाऊंगी,’’ छमिया हंसी, तो श्यामू रीझ  कर रह गया.

छमिया का पति सुशील 7 साल से बाहर कमाई कर रहा था. यही देख कर तो छमिया की मां ने कहा था, ‘बेटी राज करेगी, लड़का बड़ा कमाऊ है.’

मां की बात तो ठीक थी. सुशील ठेके पर काम ले कर अच्छी कमाई कर के घर बनवाने के अलावा 2 एकड़ खेत भी खरीद चुका था. दरवाजे पर 2 भैंसें भी बंधी थीं. जब वह गांव आता, तो छमिया के लिए बढि़या कपड़े और छोटामोटा जेवर भी लाता. घर में खानेपीने की कमी नहीं थी. पर पेट के अलावा भी तनमन में कोई भूख जगती है. इस बात को सुशील भले न जानता हो, पर छमिया उस से अनजान नहीं है.

जाड़े की रातें, सावनभादों की झाड़ी, गरमी की लंबी दोपहरें क्या तनमन को बेचैन नहीं करती हैं? पर यह क्या छमिया के कहने की बातें हैं? अंधे के आगे रोने से क्या फायदा?

एक बार तो छमिया ने सुशील से कहा भी था, ‘अब बाहर कमाने की जरूरत नहीं है. यहां खानेखर्चने भर को खेत हैं ही. उन्हीं में पसीना बहाएंगे, तो धरती माता दुखी नहीं रहने देंगी. तुम्हारे बिना अकेला घर काट खाता है.’

‘क्यों, घर में अम्मां और दीदी नहीं रहतीं? चौपाल पर बापू तो रहते ही हैं,’ कहते हुए सुशील हंसा था.

‘तुम हंसते हो. इन सब की नजरें कोतवाल की नजरें हैं. औरत का खयाल रखने वाली नजर तो अपने आदमी की ही होती है,’ छमिया ने गंभीर हो कर कहा था. यह सुन कर सुशील ने उस के गले में अपनी बांहें डाल दी थीं.

सुशील बोला था, ‘घर बैठ कर मैं तुम्हें देखूं और तुम मुझे देखो, तो हो चुकी कमाई. जवानी में कमाया हुआ ही जिंदगीभर काम आता है.’

छमिया का मन हुआ कि कह दे अगर जवानी ही रीती बीत गई, तो कमाई में क्या आग लगाई जाएगी. मगर कह न सकी. उस के मन में आया कि कह दे कि जब और कोई देखने लगेगा, तब तुम्हारी आंखें खुलेंगी.

आज सजीली कदकाठी के श्यामू को देख कर छमिया का मन खुशी से झूमने लगा. वैसे वह बात ही क्यों करती. बातें भी तो इच्छाओं की खिड़कियां होती हैं.

10 मिनट बाद श्यामू ने दरवाजे पर बैठी अन्ना दीदी के पैर छुए और ‘चाचीचाची’ कहता हुआ सीधे आंगन में चला गया. चाची यानी छमिया की सास के बारे में उसे पता था कि वे हैं नहीं, पर बहाने के लिए ही सही, कुछ तो कहना ही था.

छमिया रसोई में पकौड़े तल रही थी. चाय तैयार हो चुकी थी.

श्यामू को अपनी ओर आता देख कर छमिया ने अपने कमरे की ओर इशारा कर दिया.

छमिया का सजाधजा कमरा उस की सुरुचि की गवाही दे रहा था. श्यामू को खुशी हुई. वह कोने में रखी कुरसी पर बैठ गया.

जब छमिया चायनाश्ता ले कर आई, तो वह बोली, ‘‘यह लो, अजनबियों की तरह किनारे बैठ गए. सीधे पलंग पर आ जाओ. यहां तो देवरभाभी ही हैं… है न? इतनी दूरी ठीक नहीं होती है. न आओ, तो मैं बांह पकड़ कर उठाऊं.’’

श्यामू को लगा, अगर उस ने देर की, तो छमिया बांह पकड़ ही लेगी. वह उठ कर पलंग पर बैठ गया.

श्यामू ने पकौड़ों की तारीफ की, तो छमिया बोली, ‘‘मुझे बनाओ मत. अच्छे होते, तो 2 पकौड़ों में ही हाथ न जोड़ जाते.’’

‘‘तुम्हें बनाने की मेरी कूवत कहां है? पर जिस ने बनाया है, फुरसत में बनाया है. फिर तुम्हारे पकौड़े क्यों न अच्छे होंगे?’’ श्यामू ने उस की आंखों में झांक कर कहा.

‘‘सच कहना. तुम्हारे भैया ने तो कभी यह नहीं कहा,’’ लाज की गुलाबी लाली छमिया के गोरे मुंह में घुल कर बिखर गई.

‘‘भैया यही जानते तो बाहर क्यों पड़े होते? हीरे की कदर तो जौहरी ही जानता है,’’ श्यामू ने हंस कर कहा.

बात छमिया के मन में उतर गई. श्यामू इतना प्यारा उसे पहले कभी नहीं लगा था. उस का मन तन को भी पिघला रहा था. पर छमिया बहू थी, जिस पर अपनी नहीं, समाज की बेडि़यां हैं. दरवाजे पर बैठी 40 साल की विधवा ननद की नजरें, सास की नजरें, ससुर की मर्यादा उस के मन की लहरों पर भारी पड़ रही थीं. वह पकौड़े खाना भूल गई थी.

श्यामू ने कहा, ‘‘मेरी बात बुरी लगी हो, तो माफ करना. तुम तो पकौड़े खाना तक भूल गई हो. अब मैं भी नहीं खाऊंगा.’’

श्यामू उठने को हुआ, तो अनजाने ही छमिया ने हाथ पकड़ कर उसे बैठा लिया. अब श्यामू से न रहा गया. उस ने छमिया के मुंह में पकौड़ा ठूंसते हुए कहा, ‘‘तुम न खाओगी, तो मैं भी नहीं बैठूंगा.’’

छमिया को मुंह खोलना पड़ा. एक पल में बेतकल्लुफी बढ़ गई और वह श्यामू की ओर ऐसे अपनेपन से देखने लगी, जिस का अनुभव श्यामू ने सारी जिंदगी नहीं किया था. उसे लगा कि ऊपर से सुखी छमिया भाभी के मन में जाने कितनी सावनभादों की घटाएं हैं, जो बरसने को बेचैन हैं.

श्यामू को जाना अच्छा नहीं लग रहा था, पर छमिया की मर्यादा की खातिर उठने लगा, तो कमरे के दरवाजे तक आई छमिया ने कहा, ‘‘रात 11 बजे आना. मेरे कमरे की कुंडी खुली रहेगी. और हां, छत पर पैर न रखना. मुंडेरमुंडेर ही आना, नहीं तो दारोगा साहब यानी तुम्हारी दीदी कुत्ते की नींद सोती हैं, तूफान मचा देंगी,’’ उस ने श्यामू का हाथ पकड़ लिया.

श्यामू ने अपनी बांहें उस के गले में डाल कर आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘और अगर दीदी अपने बाहरी कमरे का दरवाजा खोल कर आंगन में इधरउधर झांकीं तो?’’

‘‘इतना डरते हो? आंगन की तरफ से कुंडी बंद कर लूंगी. वे बाहर भले ही चली जाएं, अंदर आने का रास्ता ही न रहेगा,’’ छमिया ने श्यामू का शक दूर करते हुए उसे विदा किया.

कई दिन बीत जाने पर अन्ना दीदी को लगा कि छमिया आजकल बहुत खिली सी रहती है. खानेपीने की चीजें अच्छी बनती हैं. उन की कुटिल बुद्धि ने सोचा कि हो न हो, दाल में कुछ काला है. उन्हें लगा कि श्यामू के आने के बाद से ही यह बदलाव हुआ है. वह पता लगाएंगी. यों भी उन्हें नींद कम ही आती थी, पर उस रात तो वे सोई नहीं.

रात के 11 बजे अन्ना दीदी को लगा जैसे कोई छत से नीचे उतरा है. वे बोलीं, ‘‘बहू, यह आवाज किस की थी?’’

‘‘बिल्ली कूदी है. दूधमट्ठा खा कर इस पर जवानी चढ़ी है न. दिनभर काम में मरोखपो, बाद में ये नींद में खलल करें,’’ छमिया ने जवाब दिया.

अन्ना दीदी ने चुप रहना ही ठीक समझा. वे ननद हैं, पर मायके पर बहू जैसा उन का हक कैसे होगा. यह बेटे की बहू है, तभी झल्लाती है. होगी बिल्ली, उन्हें क्या? वे तो चोरचकार के मारे बोली थीं.

वे अनमनी हो कर लेट गईं. तब तक उन के कानों में श्यामू की हंसी गूंजी.

वह धीरे से बोला, ‘‘उलटा चोर कोतवाल को डांटे.’’

‘‘कोतवाली सहतेसहते प्राण घुट गए हैं,’’ छमिया की आंखों में आंसू थे.

अब अन्ना दीदी से रहा न गया. उन्होंने कुछ सुना, कुछ न सुना. पर उन के मन का शक बढ़ गया. मरदानी हंसी के होने का शक बढ़ गया. अजीब बात है, दरवाजा उन के कमरे से ही है. कोई है, तो आया कहां से? पूछने पर बहू गुर्राती है.

वे दरवाजा खोल कर खुद नजर डाल लेंगी, इसी सोच से आंगन की ओर का दरवाजा खोला, पर वह खुल न सका. खुलता भी कैसे? छमिया ने उस में कुंडी जो लगा दी थी.

दीदी के दरवाजा भड़भड़ाने पर छमिया बोली, ‘‘दिनभर हाड़ जला कर काम करो, रात में बारबार दरवाजा मुझ से न खोला जाएगा.’’

‘‘तुम ने दरवाजा बंद ही क्यों किया?’’ दीदी ने अपना सब से बड़ा दांव चल दिया.

‘‘अब मैं अपने घर में दरवाजा भी बंद नहीं कर सकती. तुम्हारे कमरे में आ कर आवारा कुत्ते बंद रह जाते हैं. सवेरे उन की गंदगी क्या मेरा बाप साफ करेगा?’’ बात इतने ताव में कही गई थी कि अन्ना दीदी सन्न रह गई थीं.

अब उन के पास यही चारा था कि भाई से कह कर जी हलका करें, ताकि उन पर समय रहते चेताने का दोष न लगे. घर में एक मोबाइल फोन है, वह इन्हीं रानी के पास रहता है. पड़ोस के मोबाइल वालों के मोबाइल पर हर बात कही नहीं जा सकती है.

फिर भी उन्होंने भाई को फोन किया और वह आया भी. दीदी ने उस से अपने कमरे में ही कहासुना भी.

जब त्योरी चढ़ाए सुशील कमरे में घुसा, तो छमिया टपटप आंसू बहा रही थी. वह बोला, ‘‘रोओ नहीं, साफसाफ बताओ?’’

‘‘मेरी मानोगे? मैं तो यहां पराई हाड़ हूं. और तो सब तुम्हारे अपने ही हैं. उन की सुनो. मुझे  मेरे मायके छोड़ दो या जहर की गोलियां ला दो. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी,’’ छमिया ने सुशील के गले में बांहें डाल कर कहा. उस की हिचकियां बंध गई थीं.

सुशील सोच में पड़ गया. हो सकता है, दीदी को धोखा हुआ हो, पर इसे दरवाजा तो अंदर से बंद न रखना चाहिए था. वह बोला, ‘‘अच्छा, तुम ने आंगन का दरवाजा अंदर से बंद क्यों किया था?’’

‘‘अब मेरा मुंह मत खुलवाओ,’’ छमिया आंसू पोंछते हुए बोली.

‘‘क्यों, क्या बात है?’’ यह कहते हुए सुशील सकते में आ गया.

‘‘यह जांघ खोलो तो अपनी लाज जाती है, वह खोलो तो…’’ आगे की बात उस ने अधूरी सी छोड़ दी.

‘‘साफसाफ कहो, पहेली न बुझाओ,’’ सुशील सुनने को बेचैन था.

‘‘इन के कमरे में जाने कौनकौन आता है और क्याक्या होता है. यह देखने से अच्छा है, मैं इधर का दरवाजा ही बंद कर लेती हूं. सुनोगे, तो हैरान रह जाओगे. इन का क्या बिगड़ेगा? तुम जेल में होगे या फिर मैं इन्हीं की तरह विधवा हो जाऊंगी. ये तो यही चाहती हैं.

‘‘अब या तो मुझे मायके छोड़ दो या अपने साथ लिए चलो. जिस इज्जत के लिए तुम रातदिन एक किए हो, उस का उछलना मैं न देख सकूंगी,’’ सुशील के गले में बांहें डाल कर सिसकसिसक कर छमिया ने कहा.

सुशील ने अपने हाथों से उस के आंसू पोंछ कर कहा, ‘‘मायके जाने का नाम न लो. यहां तुम्हारे जिम्मे घर की मर्यादा है. मैं खुद अब यहीं रहूंगा, कमाई बहुत हो गई. हराम का खाखा कर झूठमूठ का लांछन लगाने वालों की असलियत मैं भी देखूंगा.’’

दरवाजे की ओट से सबकुछ सुनती अन्ना दीदी के तो होश उड़ गए. वे सोच नहीं पा रही थीं, किस जगह जमीन फटे और वे समा जाएं.

इस ठगिनी के इस ढंग से समझने के बाद क्या सुशील उन की बात सुनेगा या मानेगा? वे खुद अपनी ससुराल के झोपड़े में रहेंगी, लेकिन यह लांछन न सहेंगी. औरत के सामने बकरा बने आदमी से बहस करना बेकार है.

और छमिया सोच रही थी, ‘पहले ही यह अक्ल आ जाती, तो यह नौबत ही क्यों आती. खैर, मैं आगे से श्यामू को मना कर दूंगी. श्यामू कोई मेरा मर्द तो है नहीं, जिस से कोई नाता हो.’ Manoranjak Kahanhi

–मदनमोहन पांडेय

Hindi Superstition Story : अशुभ

Hindi Superstition Story. मेरी नानी कहती हैं कि अगर सुबह दूध गिर जाए, तो बहुत अशुभ होता है. अम्मां खड़ीखड़ी पैर से ले कर सिर तक थरथर कांप रही थीं. मैं ने देखा कि उन के हाथ से सुबहसुबह आधा लिटर दूध गिर कर बहने लगा था.

दरअसल, अम्मां लो ब्लडप्रैशर की मरीज थीं. उन्हें चक्कर आना, दिल घबराना, पूरा जिस्म हिलना जैसी तमाम शिकायतें थीं. वे इतनी पतलीदुबली थीं कि  झटका खाते ही गिर जाएं.

महीनेभर से अम्मां की तबीयत ज्यादा खराब थी. कमजोरी के चलते उन के हाथ से दूध का डब्बा गिर गया था.

अम्मां को अपनी जानकारी के मुताबिक मैं ने लंबाचौड़ा फलसफा सुनाया कि दूध गिरना बुरा नहीं है, बुरे तो इनसान के खयालात होते हैं.

अम्मां थोड़ी शांत हुईं, लेकिन तभी पीछे से नानी ने 5 नंबर चप्पल से मेरी पीठ पर निशाना लगाया.

मैं ने पीछे पलट कर देखा. नानी खतरनाक शिकारी बिल्ली की तरह कड़े तेवर लिए मु झे घूर रही थीं.

‘‘नानी…’’ मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि उन्होंने एक जोरदार तमाचा मेरे गाल पर रसीद कर दिया.

‘‘बेहया, तु झे पता नहीं है कि दूध गिरना कितना अशुभ होता है. हाय…हाय, अब क्या होगा? कलमुंही, तु झे कितना सम झाया करूं,’’ नानी ने अम्मां को घूरते हुए कहा.

मेरे पिता बड़ेबड़े शहरों में बने मकानों की पुताई करते थे. वे साल में 1-2 बार आ कर हमारे ऊपर प्यार की बरसात कर देते थे. फिर मु झे और अम्मां को अपनी चहेती दकियानूसी सास के पास छोड़ कर चले जाते थे.

मैं जहर का घूंट पी कर रह गया. नानी कह रही थीं, ‘‘ऐसे ही मियांजी की पोती के हाथ से दूध गिर गया था और मियांजी का एकलौता बेटा मर गया था.’’

मियांजी के परिवार के साथ हुआ वह हादसा मैं भी कहां भूला था. बेचारी बीना को कितनी कठोर सजा भुगतनी पड़ी थी. उस हादसे को गुजरे 4 महीने बीत चुके थे, मगर लगता था कि कल की ही बात हो.

मेरी नानी के इस पक्के घर के अलावा इस गांव में सिर्फ 12-13 पक्के घर और थे. 50-60 घर कच्ची मिट्टी के बने हुए थे, जिन में से एक घर मियांजी का भी था. वे अपने छोटे से परिवार के साथ हंसीखुशी से रहते थे. उन के परिवार में उन की बीवी, एक बेटा, बहू और पोती बीना थी.

मियांजी बुजुर्ग थे. उन की सू झबू झ के पूरे गांव में चर्चे होते थे. मैं भी उन की सम झदारी का कायल था.

एक दिन मैं किसी काम से मियांजी के घर गया था. मियांजी ने बड़ी इज्जत से मु झे आंगन में बैठाया और अपनी जवान पोती से कहा, ‘‘बीना, जल्दी से बाबू के लिए दूध ले कर आओ. यह हमारे यहां कभीकभार ही आता है.’’

मियांजी ने मेरा नाम बेहद अपनेपन से ले कर कहा, तो मैं बहुत खुश हो गया था.

फिर 2-3 मिनट बाद अंदर से कुछ गिरने की आवाज आई, तभी बीना की मां और दादी लपक कर अंदर गईं. थोड़ी देर बाद भीतर से रोने की आवाज भी आने लगी. मैं घबरा गया और तुरंत मियांजी के साथ अंदर गया.

‘‘बीना, यह तू ने क्या किया?’’ बीना की मां बेदर्दी से उसे पीट रही थीं. दादी उसे कोस रही थीं.

‘‘यह आप क्या कर रही हैं?’’ मैं ने बीना की मां से कहा. दर्द से बेहाल बेचारी बीना बुरी तरह रो रही थी.

मियांजी ने जल्दी से दूध लाने को क्या कहा कि बीना हड़बड़ा गई. इसी जल्दबाजी में बीना का पैर ऊंचीनीची जगह पर आ गया और दूध के साथ नीचे आ गिरी. उस के दाएं पैर में मोच आ गई थी.

मियांजी बिना कुछ कहे कमरे से निकल कर चले गए. उन्होंने अपनी बीवी को सम झाने की जरा भी कोशिश नहीं की. मु झे लगा कि इन औरतों से ज्यादा तो मियांजी अंधविश्वासी हैं.

मैं अपना सा मुंह ले कर घर लौट आया.

शाम को मैं ने अम्मां से कहा, ‘‘अम्मां, चाय के साथ पकौड़े भी बना दो. मु झे भूख लग रही है.’’

‘‘अम्मां… भूख,’’ मैं ने दोबारा लाड़ से अम्मां का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की.

‘‘चुप रहो. 3 दिन तक रसोई में न कड़ाही चढ़ेगी, न सब्जी में किसी तरह का तड़का लगेगा,’’ अम्मां के बजाय नानी ने आ कर मु झे 8-10 साल के बच्चे की तरह लताड़ दिया.

‘‘क्यों नानी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘किस दुनिया में रहता है. कुछ खबर है. मियांजी का एकलौता बेटा बस हादसे में मर गया.

‘‘अरे, बस हादसे का नाम है. उसे तो दूध गिरने के अशुभ ने खा लिया. बेचारे मियांजी कितने गरीब हैं. 2 हजार रुपए मौलवी को दे दिए थे इस अशुभ को उतरवाने के वास्ते, लेकिन दूध का घोर अशुभ उतरा ही नहीं,’’ नानी पिघला हुआ लोहा मेरे कानों में उड़ेल कर अम्मां को साथ लिए मियांजी के घर चली गईं.

अब मु झे बीना की चिंता होने लगी. ये बेदर्द समाज बीना को कहां छोड़ने वाला था. मैं ने बीना को बचाने की खातिर एक फैसला ले लिया.

मैं ने उस बस हादसे की पूरी छानबीन कर डाली और मियांजी को सम झाने की हर मुमकिन कोशिश की कि नशे में धुत्त ड्राइवर तेज बस चला रहा था. मगर मेरे लाख सम झाने पर भी किसी ने मेरी बात नहीं मानी.

दूध गिरना अशुभ नहीं था, लेकिन बीना को 2 दिन तक खाना नहीं दिया गया, वह यकीनन अशुभ था.

अब मैं ने तय कर लिया था, यह घटना मैं दोबारा नहीं होने दूंगा. बीना 2 दिन तक भूख  झेल गई, मगर मेरी अम्मां इतनी बीमार थीं कि शाम तक ही मर जातीं और मेरे लिए यह सब से बड़ा अशुभ दिन होता.

तब मैं ने कड़े तेवर अपनाते हुए नानी से कहा, ‘‘खबरदार, जो मेरे बाप की मेहनत की कमाई किसी  झोलाछाप, पाखंडी मौलवी के आगे डाली. अगर आप ने मेरी बात नहीं मानी और मेरी अम्मां के साथ जुर्म किया या उन्हें किसी तरह परेशान किया, तो हम आप को इस उम्र में छोड़ कर चले जाएंगे. फिर शायद आप की जिंदगी का यह सब से बड़ा अशुभ दिन होगा.’’

मैं अम्मां को अपने साथ लिए कमरे में आ गया. उन्हें खाट पर लिटा कर चादर ओढ़ाई. जैसे ही मैं पलटा, हैरानी के कई  झटके खातेखाते बचा.

तावीज के बजाय नानी कसबे के अस्पताल की लेडी डाक्टर के साथ खड़ी थीं. कब्रिस्तान में धकेल देने वाली नानी अब सुखशांति के बौर्डर पर खड़ी लग रही थीं. मु झे लगा कि मौके पर दी गई धमकी अब निशाने पर जा लगी थी.

डाक्टर ने चैकअप कर के दवा लिखी और परची नानी के हाथ में थमा कर चली गईं.

मैं ने खुश हो कर नानी से कहा, ‘‘अच्छा हुआ, आप सुधर गईं, वरना…’’ इस से आगे मैं कुछ और कहता कि नानी ने फिर जोरदार थप्पड़ से मेरा गाल लाल कर दिया.

‘‘मु झे छोड़ कर मत जाना. मैं किसी को नहीं भड़काऊंगी,’’ इतना कह कर नानी रोने लगीं.

आग या पानी, मैं नानी को सम झ नहीं पाया. पहले गुस्सा, फिर रोना. खैर, मैं ने नानी को कंधे से थाम लिया, क्योंकि वे सुधर जो गई थीं.  Hindi Superstition Story

Hindi Story : हवेली का सन्नाटा

Hindi Story. पिछले 2 साल से अपने पति से दूर याशिका सिंह गांव की हवेली संभाल रही थी. साथ था उन का नौकर अंशु. एक रात याशिका ने अंशु को अपने कमरे में बुलाया और…

पूर्वांचल के ईश्वरपुर गांव में फैली 100 बरस पुरानी हवेली दूर से ही अपनी पहचान दर्ज कराती थी. ऊंची मेहराबें, चौड़े बरामदे, पार्क में खिले रंगबिरंगे फूल सब मिल कर हवेली की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

इस हवेली के मालिक थे जमींदार शिवकांत सिंह, जो अब बूढ़े हो चले थे और उन का एकलौता बेटा डाक्टर आर्यवर्त सिंह पिछले 2 साल से इंगलैंड में था.

गांव में इस विशाल हवेली को जिंदा रखने वाले केवल 2 लोग थे, डाक्टर आर्यवर्त सिंह की पत्नी याशिका सिंह और हवेली की देखभाल में लगा 25 साल का बांका जवान अंशु.

याशिका सिंह पढ़ीलिखी और खूबसूरत औरत थी. शादी के बाद कुछ ही दिनों में उस का पति विदेश चला गया था. धीरेधीरे 2 साल बीत गए… संदेश आते, वीडियो काल कभीकभार होती, पर दूरी का सन्नाटा कहीं ज्यादा अखरता था.

हवेली जितनी विशाल थी, उतनी ही अकेली. लंबे बरामदे, खाली कमरे, भोर का धीमा उजाला और रात का गहरा अंधेरा, सब मिल कर याशिका सिंह के भीतर एक गहरी चुप्पी उतारते जा रहे थे.

याशिका सिंह अकसर सोचती, ‘क्या सचमुच शादी केवल एक रिश्ता है या एक ऐसा साथ जिसे दूरी खा जाती है?’

इधर अंशु अपना काम ईमानदारी से करता था. उस की हर हरकत में एक सादगी थी. वह बोलता कम, काम ज्यादा करता. जब वह आंगन में झाड़ू लगाता, तो जैसे हवेली भी किसी पुराने दिन को याद कर के मुसकराने लगती.

याशिका सिंह ने कई बार खुद को उसे देखते हुए पाया और हर बार खुद को झिड़क दिया. पर हवेलियों की चुप दीवारें मन पर भी अपना असर डालती हैं. जो बात मन टालना चाहे, वही बात आंखें ढूंढ़ने लगती हैं.

दिन बीतते गए. याशिका सिंह को लगा कि अंशु का होना हवेली के सन्नाटे को थोड़ा हलका कर देता है. वह कभी जरूरत पड़ने पर आंगन से आवाज लगाती और अंशु झट से हाजिर हो जाता. उस की आवाज में, चाल में, बरताव में एक ऐसी विनम्रता थी, जो किसी के भी मन को छू ले.

लेकिन वही विनम्रता अंशु के भीतर डर भी जगाती थी. वह अकसर सोचता, ‘मालकिन की नजरों में कहीं मैं गलत न समझ लिया जाऊं. थोड़ सी भी चूक हुई, तो बरबादी पक्की है.’

पर मन को कौन रोक पाता है? इनसान चाहे कितना भी सावधान हो, भीतर कहीं एक कोना रहता है, जो चुपचाप किसी की ओर खिंचना सीख जाता है, बिना इजाजत के, बिना ऐलान के.

एक रात को हलकी ठंड हवेली में सरक रही थी. बरामदे की लालटेन कांपती लौ के साथ डोल रही थी. अंशु गौशाला से लौट कर कमरे में ही पहुंचा था कि ऊपर से याशिका सिंह ने पुकारा, ‘‘अंशु, सुनो.’’

अंशु एकदम से चौंका. रात के इस समय मालकिन का पुकारना असाधारण था. वह धीमे कदमों से ऊपर चढ़ा. कमरे का दरवाजा आधा खुला था. अंदर पीतल का दीपक जल रहा था, जिस की नरम रोशनी कमरे के कोनों में गिर रही थी.

याशिका सिंह पलंग पर बैठी थी. चेहरे पर थकान थी, आवाज में विनती, ‘‘मेरा पैर बहुत दर्द कर रहा है. प्लीज, जरा दबा दो.’’

अंशु झिझक गया, ‘‘मालकिन यह काम तो.’’

याशिका सिंह ने बीच में ही धीमी पर मजबूत आवाज में कहा, ‘‘यह आदेश नहीं, एक आग्रह है.’’

अंशु ने सिर झुकाया और सावधानी से मालकिन के पैर दबाने लगा. पर कमरे में कुछ बदल रहा था, दीया टिमटिमा रहा था, हवा भारी हो गई थी और हवेली का पुराना सन्नाटा जैसे अचानक करीब आ कर खड़ा हो गया था.

अंशु के हाथ कांप रहे थे, क्योंकि उसे डर था… अपने हाथों से कम अपने धड़कते दिल से ज्यादा. उधर याशिका सिंह अपने भीतर की उस तनहाई से लड़ रही थी, जो इतने महीनों से जमा होतीहोती भारी हो गई थी.

अचानक, बिना चेतावनी, याशिका सिंह ने अंशु की कलाई पकड़ ली. अंशु एकदम कठोर हो गया, जैसे अचानक किसी ने उसे बर्फ में धकेल दिया हो. उस की सांसें अटक गईं.

‘‘अंशु…’’ याशिका सिंह की आवाज धीमी, भारी और अनसुनी सी थी, ‘‘हम तुम्हें चाहते हैं.’’

यह सुनते ही अंशु का चेहरा सफेद पड़ गया. वह कांपती आवाज में बोला, ‘‘मालकिन, अगर मालिक को मालूम हो गया, तो वे मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

याशिका सिंह ने अंशु के डर को अपने हाथों में समेटने जैसा कहा, ‘‘तुम डरो मत. हम हैं न.’’

उस पल उन दोनों के बीच खामोशी उतर आई… एक ऐसी खामोशी जिस में हवेली का सन्नाटा भी अपनी सांस रोक ले.

अंशु अपनी सारी हिचक और डर भूल बैठा. उस रात का सन्नाटा हवेली की दीवारों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. बिना शोर के, बिना शब्द के, पर गहरा.

उन दोनों ने उस रात को खूब भोगा.

अगली सुबह अंशु आंगन में बैठा था. चेहरा बुझा  हुआ, आंखों में बेचैनी. उसे खुद से डर लग रहा था. वह डर और उलझन से भरा था.

याशिका सिंह ने बरामदे से उतरते हुए कहा, ‘‘अंशु, कल जो हुआ उस से डरने की कोई जरूरत नहीं.’’

पर अंशु के भीतर का तूफान किसी भी आश्वासन से शांत नहीं हो सकता था, ‘‘मालकिन, हम से पाप हुआ है. हम इस हवेली में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.’’

याशिका ने उसे स्थिर नजरों से देखा और कहा, ‘‘पाप वही है जिसे मन स्वीकार न करे. हम दोनों अकेले थे हालात ने हमें मजबूर किया.’’

लेकिन अंशु जानता था कि समाज हालात नहीं देखता, वह केवल सीमाएं देखता है.

Hindi Story – तरकीब : झुमरी की जवानी हासिल कर पाया रतन

Hindi Story. रतन सिंह की निगाहें पिछले कई दिनों से झुमरी पर लगी हुई थीं. वह जब भी उसे देखता, उस के मुंह से एक आह निकल जाती. झुमरी की खिलती जवानी ने उस के तनमन में एक हलचल सी मचा दी थी और वह उसे हासिल करने को बेताब हो उठा था.

वैसे भी रतन सिंह के लिए ऐसा करना कोई बड़ी बात न थी. वह गांव के दबंग गगन सिंह का एकलौता और बिगड़ैल बेटा था. कई जरूरतमंद लड़कियों को अपनी हवस का शिकार उस ने बनाया था. झुमरी तो वैसे भी निचली जाति की थी.

झुमरी 20वां वसंत पार कर चुकी एक खूबसूरत लड़की थी. गरीबी में पलीबढ़ी होने के बावजूद जवानी ने उस के रूप को यों निखारा था कि देखने वालों की निगाहें बरबस ही उस पर टिक जाती थीं. गोरा रंग, भरापूरा बदन, बड़ीबड़ी कजरारी आंखें और हिरनी सी मदमस्त चाल.

इस सब के बावजूद झुमरी में एक कमी थी. वह बोल नहीं सकती थी, पर उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वह अपनेआप में मस्त रहने वाली लड़की थी.

झुमरी घर के कामों में अपनी मां की मदद करती और खेत के काम में अपने बापू की. उस के बापू तिलक के पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा था, जिस के सहारे वह अपने परिवार को पालता था. वैसे भी उस का परिवार छोटा था. परिवार में पतिपत्नी और 2 बच्चे, झुमरी और शंकर थे. अपनी खेती से समय मिलने पर तिलक दूसरों के खेतों में भी मजदूरी का काम कर लिया करता था.

गरीबी में भी तिलक का परिवार खुश था. परंतु कभीकभी पतिपत्नी यह सोच कर चिंतित हो उठते थे कि उन की गूंगी बेटी को कौन अपनाएगा?

झुमरी इन सब बातों से बेखबर मजे में अपनी जिंदगी जी रही थी. वह दिमागी रूप से तेज थी और गांव के स्कूल से 10 वीं जमात तक पढ़ाई कर चुकी थी. उसे खेतखलिहान, बागबगीचों से प्यार था.

गांव के दक्षिणी छोर की अमराई में झुमरी अकसर शाम को आ बैठती और पेड़ों के झुरमुट में बैठे पक्षियों की आवाज सुना करती. कोयल की आवाज सुन कर उस का भी जी चाहता कि वह उस के सुर में सुर मिलाए, पर वह बोल नहीं सकती थी.

झुमरी की इस कमी को रतन सिंह ने अपनी ताकत समझा. उस ने पहले तो झुमरी को तरहतरह के लालच दे कर अपने प्रेमजाल में फांसना चाहा और जब इस में कामयाब न हुआ, तो जबरदस्ती उसे हासिल करने का मन बना लिया.

रात घिर आई थी. चारों तरफ अंधेरा हो चुका था. आज झुमरी को खेत से लौटने में देर हो गई थी. पिछले कई दिनों से उस की ताक में लगे रतन सिंह की नजर जब उस पर पड़ी, तो उस की आंखों में एक तेज चमक जाग उठी.

मौका अच्छा जान कर रतन सिंह उस के पीछे लग गया. एक तो अंधेरा, ऊपर से घर लौटने की जल्दी. झुमरी को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि कोई उस के पीछे लगा हुआ है. वह चौंकी तब, जब अमराई में घुसते ही रतन सिंह उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

‘‘मैं ने तुम्हारा प्यार पाने की बहुत कोशिश की…’’ रतन सिंह कामुक निगाहों से झुमरी के उभारों को घूरता हुआ बोला, ‘‘तुम्हें तरहतरह से रिझाया. तुम से प्रेम निवेदन किया, पर तू न मानी. आज अच्छा मौका है. आज मैं छक कर तेरी जवानी का रसपान करूंगा.’’

रतन सिंह का खतरनाक इरादा देख झुमरी के सारे तनबदन में डर की सिहरन दौड़ गई. उस ने रतन सिंह से बच कर निकल जाना चाहा, पर रतन सिंह ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. उस ने झपट कर झुमरी को अपनी बांहों में भर लिया.

झुमरी ने चिल्लाना चाहा, पर उस के होंठों से शब्द न फूटे. झुमरी को रतन सिंह की आंखों में वासना की भूख नजर आई. रतन सिंह झुमरी को खींचता हुआ अमराई के बीचोंबीच ले आया और जबरदस्ती जमीन पर लिटा दिया. इस के पहले कि झुमरी उठे, वह उस पर सवार हो गया.

झुमरी उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. दूसरी ओर वासना में अंधा रतन सिंह उस के कपड़े नोचने लगा. उस ने अपने बदन का पूरा भार झुमरी के नाजुक बदन पर डाल दिया, फिर किसी भूखे भेडि़ए की तरह उसे रौंदने लगा.

झुमरी रो रही थी, तड़प रही थी, आंखों ही आंखों में फरियाद कर रही थी, लेकिन रतन सिंह ने उस की एक न सुनी और उसे तभी छोड़ा, जब अपनी वासना की आग बुझा ली.

ऐसा होते ही रतन सिंह उस के ऊपर से उठ गया. उस ने एक उचटती नजर झुमरी पर डाली. जब उस की निगाहें झुमरी की निगाहों से टकराईं, तो उस को एक झटका सा लगा.

झुमरी की आंखों में गुस्से की चिनगारियां फूट रही थीं, पर अभीअभी उस ने झुमरी के जवान जिस्म से लिपट कर जवानी का जो जाम चखा था, इसलिए उस ने झुमरी के गुस्से और नफरत की कोई परवाह नहीं की और उठ कर एक ओर चल पड़ा.

इस घटना ने झुमरी को झकझोर कर रख दिया था. वह 2 दिन तक अपने कमरे में पड़ी रही थी. झुमरी के मांबाप ने जब उस से इस की वजह पूछी, तो उस ने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया था.

कई बार झुमरी के दिमाग में यह बात आई थी कि वह इस के बारे में उन्हें बतला दे, पर यह सोच कर वह चुप रह गई थी कि उन से कहने से कोई फायदा नहीं. वे चाह कर भी रतन सिंह का कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे, उलटा रतन सिंह उन की जिंदगी को नरक बना देगा.

इस मामले में जो करना था, उसे ही करना था. रतन सिंह ने उस की इज्जत लूट ली थी और उसे इस के किए की सजा मिलनी ही चाहिए थी. पर कैसे? झुमरी ने इस बात को गहराई से सोचा, फिर उस के दिमाग में एक तरकीब आ गई.

रात आधी बीत चुकी थी. सारा गांव सो चुका था, पर झुमरी जाग रही थी. वह इस समय अमराई से थोड़ी दूर बांसवारी यानी बांसों के झुरमुट में खड़ी हाथों में कुदाल लिए एक गड्ढा खोद रही थी.

तकरीबन 2 घंटे तक वह गड्ढा खोदती रही, फिर हाथ में कटार लिए बांस के पेड़ों के पास पहुंची. उस ने कटार की मदद से बांस की पतलीपतली अनेक डालियां काटीं, फिर उन्हें गड्ढे के करीब ले आई.

डालियों को चिकना कर उन्हें बीच से चीर कर उन की कमाची बनाईं, फिर उन की चटाई बुनने लगी. अपनी इच्छानुसार चटाई बुनने में उसे तकरीबन 3 घंटे लग गए.

चटाई तैयार कर झुमरी ने उसे गड्ढे के मुंह पर रखा. चटाई ने तकरीबन एक मीटर दायरे के गड्ढे के मुंह को पूरी तरह ढक लिया. यह चटाई किसी आदमी का भार हरगिज सहन नहीं कर सकती थी.

सुबह होने में अभी चंद घंटे बचे थे. हालांकि बांसों के इस झुरमुट की ओर गांव वाले कम ही आते थे और दिन में यह सुनसान ही रहता था, फिर भी झुमरी कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती थी. उस ने जमीन पर बिखरे बांस के सूखे पत्तों को इकट्ठा कर उन का ढेर लगा दिया.

इस काम से निबट कर झुमरी ने बांस की चटाई से गड्ढे का मुंह ढका, पर उस पर पत्तों को इस तरह डाल दिया, ताकि चटाई पूरी तरह ढक जाए और किसी को वहां गड्ढा होने का एहसास न हो. गड्ढे से निकली मिट्टी को उस ने अपने साथ लाई टोकरी में भर कर गड्ढे से थोड़ी दूर डाल दिया.

काम खत्म कर झुमरी ने एक निगाह अपने अब तक के काम पर डाली, फिर अपने साथ लाए बड़े से थैले में अपना सारा सामान भरा और थैला कंधे पर लाद कर घर की ओर चल पड़ी.

7 दिनों तक झुमरी का यह काम चलता रहा. इतने दिन में उस ने 7 फुट गहरा गड्ढा तैयार कर लिया था. गड्ढे में उतरने और चढ़ने के लिए वह अपने साथ घर से लाई सीढ़ी का इस्तेमाल करती थी. काम पूरा कर उस ने पत्ते डाले, फिर अपने अगले काम को अंजाम देने के बारे में सोचती.

रतन सिंह ने झुमरी की इज्जत लूट तो ली थी, परंतु अब वह इस बात से डरा हुआ था कि कहीं झुमरी इस बात का जिक्र अपने मांबाप से न कर दे और कोई हंगामा न खड़ा हो जाए. परंतु जब 10 दिन से ज्यादा हो गए और कुछ नहीं हुआ, तो उस ने राहत की सांस ली. अब उसे रात की तनहाई में वो पल याद आते, जब उस ने झुमरी के जवान जिस्म से अपनी वासना की आग बुझाई थी. जब भी ऐसा होता, उस का बदन कामना की आग में झुलसने लगता था.

इस बीच रतन सिंह ने 1-2 बार झुमरी को अपने खेत की ओर जाते या आते देखा था, परंतु उस के सामने जाने की उस की हिम्मत न हुई थी. पर उस दिन अचानक रतन सिंह का सामना झुमरी से हो गया. वह विचारों में खोया अमराई की ओर जा रहा था कि झुमरी उस के सामने आ खड़ी हुई. उसे यों अपने सामने देख एकबारगी तो रतन सिंह बौखला गया था और झुमरी को देखने लगा था.

झुमरी कुछ देर तक खामोशी से उसे देखती रही, फिर उस के होंठों पर एक दिलकश मुसकान उभर उठी. उसे इस तरह मुसकराते देख रतन सिंह ने राहत की सांस ली और एकटक झुमरी के खूबसूरत चेहरे और भरेभरे बदन को देखने लगा.

इस के बावजूद जब झुमरी मुसकराती रही, तो रतन सिंह बोला, ‘‘झुमरी, उस दिन जो हुआ, उस का तुम ने बुरा तो नहीं माना?’’ झुमरी ने न में सिर हिलाया.

‘‘सच…’’ कहते हुए रतन सिंह ने उस की हथेली कस कर थाम ली, ‘‘इस का मतलब यह है कि तू फिर वह सब करना चाहती है?’’ बदले में झुमरी खुल कर मुसकराई, फिर हौले से अपना हाथ छुड़ा कर एक ओर भाग गई.

उस की इस हरकत पर रतन सिंह के तनमन में एक हलचल मच गई और उस की आंखों के सामने वो पल उभर आए, जब उस ने झुमरी की खिलती जवानी का रसपान किया था. झुमरी को फिर से पाने की लालसा में रतन सिंह उस के इर्दगिर्द मंडराने लगा. झुमरी भी अपनी मनमोहक  अदाओं से उस की कामनाओं को हवा दे रही थी.

झुमरी ने एक दिन इशारोंइशारों में रतन सिंह से यह वादा कर लिया कि वह पूरे चांद की आधी रात को उस से अमराई में मिलेगी. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. उस की चांदनी चारों ओर बिखरी हुई थी. ऐसे में रतन सिंह बड़ी बेकरारी से एक पेड़ के तने पर बैठा झुमरी का इंतजार कर रहा था.

झुमरी ने आधी रात को यहीं पर उस से मिलने का वादा किया था, परंतु वह अब तक नहीं आई थी. जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे रतन सिंह की बेकरारी बढ़ रही थी. अचानक रतन सिंह को अपने पीछे किसी के खड़े होने की आहट मिली. उस ने पलट कर देखा, तो उस का दिल धक से रह गया. वह झटके से उठ खड़ा हुआ. उस के सामने झुमरी खड़ी थी. उस ने भड़कीले कपड़े पहन रखे थे, जिस से उस की जवानी फटी पड़ रही थी.

जब झुमरी ने रतन सिंह को आंखें फाड़े अपनी ओर देखा पाया, तो उत्तेजक ढंग से अपने होंठों पर जीभ फेरी. उस की इस अदा ने रतन सिंह को और भी बेताब कर दिया.

रतन सिंह ने झटपट झुमरी को अपनी बांहों में समेट लेना चाहा, लेकिन झुमरी छिटक कर दूर हो गई. ‘‘झुमरी, मेरे पास आओ. मेरे तनबदन में आग लगी है, इसे अपने प्यार की बरसात से शांत कर दो,’’ रतन सिंह बेचैन होते हुए बोला.

झुमरी ने इशारे से रतन सिंह को खुद को पकड़ लेने की चुनौती दी. रतन सिंह उस की ओर दौड़ा, तो झुमरी ने भी दौड़ लगा दी. अगले पल हालत यह थी कि झुमरी किसी मस्त हिरनी की तरह भाग रही थी और रतन सिंह उसे पकड़ने के लिए उस के पीछे दौड़ रहा था.

झुमरी अमराई से निकली, फिर बांस के झुरमुट की ओर भागी. वह उस गड्ढे की ओर भाग रही थी, जिसे उस ने कई दिनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया था. वह जैसे ही गड्ढे के नजदीक आई, एक लंबी छलांग भरी और गड्ढे की ओर पहुंच गई.

झुमरी के हुस्न में पागल, गड्ढे से अनजान रतन सिंह अचानक गड्ढे में गिर गया. उस के मुंह से घुटीघुटी सी चीख निकली. कुछ देर तक तो रतन सिंह कुछ समझ ही नहीं पाया कि क्या हो गया है. वह बौखलाया हुआ गड्ढे में गिरा इधरउधर झांक रहा था, पर जैसे ही उस के होशोहवास दुरुस्त हुए, वह जोरजोर से झुमरी को मदद के लिए पुकारने लगा. परंतु उधर से कोई मदद नहीं आई.

झुमरी की ओर से निराश रतन सिंह खुद ही गड्ढे से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा. उस ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर गड्ढे के किनारे को पकड़ना चाहा, परंतु वह उस की पहुंच से दूर था.

रतन सिंह ने उछल कर बाहर निकलने की 2-4 बार नाकाम कोशिश की. आखिरकार वह गड्ढे का छोर पकड़ने में कामयाब हो गया. उस ने अपने बदन को सिकोड़ कर अपना सिर ऊपर उठाया. उस का सिर थोड़ा ऊपर आया, तभी उस की नजर झुमरी पर पड़ी. उस के हाथों में कुदाल थी और उस की आंखों से नफरत की चिनगारियां फूट रही थीं.

इस के पहले कि रतन सिंह कुछ समझता, झुमरी ने कुदाल का भरपूर वार उस के सिर पर किया. रतन सिंह की दिल दहलाने वाली चीख से वह सुनसान इलाका दहल उठा. उस का सिर फट गया था और खून की धारा फूट पड़ी थी. गड्ढे का किनारा रतन सिंह के हाथ से छूट गया और वह गिर पड़ा था.

गड्ढे में गिरते ही रतन सिंह ने अपना सिर थाम लिया. उस की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था और उस पर बेहोशी छाने लगी थी. उस के दिमाग में एक विचार बिजली की तरह कौंधा कि यह झुमरी का फैलाया हुआ जाल था, जिस में फंसा कर वह उसे मार डालना चाहती है.

तभी रतन सिंह के सिर पर ढेर सारी मिट्टी आ गिरी. उस ने अपनी बंद होती आंखें उठा कर ऊपर की ओर देखा, तो झुमरी टोकरी लिए वहां खड़ी थी. अगले ही पल वह बेहोशी के अंधेरों में गुम होता चला गया.

झुमरी ने मिट्टी से पूरा गड्ढा भर दिया, फिर उस पर पत्तियां डाल कर उठ खड़ी हुई. उस ने सिर उठा कर ऊपर देखा. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. थोड़ी देर बाद झुमरी कंधे पर थैला लादे अपने घर को लौट रही थी. Hindi Story

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