दबंग कर रहे दलित दूल्हों की दुर्गति

Society News in Hindi: यह घटना इसी साल के जून महीने की है. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के छतरपुर (Chhatarpur) में चौराई गांव का रितेश अपनी शादी पर जैसे ही घोड़ी पर चढ़ा, गांव के कुछ लोगों ने इस बात का विरोध किया. हंगामा बढ़ा, तो पुलिस आई. लेकिन पुलिस की मौजूदगी में ही बरात पर पत्थरबाजी शुरू हो गई. दरअसल, रितेश अहिरवार दलित था. उस की बरात पर पत्थरबाजी इसलिए हुई कि कैसे कोई दलित घोड़ी पर चढ़ कर अपनी बरात ले जा सकता है? इस पूरे मामले में सरकारी काम में बाधा डालने, मारपीट करने और हरिजन ऐक्ट (Harijan Act) के तहत एफआईआर हुई थी. देश का संविधान (constitution) कहने को ही सभी को बराबरी का हक देता है, लेकिन एक कड़वा और अकसर देखा जाने वाला सच यह है कि जो दलित दूल्हा घोड़ी चढ़ने की हिमाकत या जुर्रत करता है, दबंग लोग उस की ऐसी दुर्गति करते हैं कि कहने में झिझक होती है कि वाकई देश में कोई लोकतंत्र वजूद में है, जिस का राग सरकार, नेता, समाजसेवी, राजनीतिक पार्टियां और पढ़ेलिखे समझदार लोग अलापा करते हैं.

छुआछूत दूर हो गई, जातपांत का भेदभाव खत्म हो गया और अब सभी बराबर हैं, ये कहने भर की बातें हैं. हकीकत यह है कि यह प्रचार खुद दबंग और उन के कट्टरवादी संगठन करते रहते हैं, जिस से समाज की अंदरूनी हालत और सच दबे रहें और वे दलितों पर बदस्तूर सदियों से चले आ रहे जुल्मोसितम ढाते हुए ऊंची जाति वाला होने का अपना गुरूर कायम रखें.

जड़ में है धर्म

किसी भी गांव, कसबे या शहर में देख लें, कोई न कोई छोटा या बड़ा बाबा पंडाल में बैठ कर प्रवचन या भागवत बांचता नजर आएगा. ये बाबा लोग कभी बराबरी की, छुआछूत दूर करने की या जातपांत खत्म करने की बात नहीं करते. वजह सिर्फ इतनी भर नहीं है कि धार्मिक किताबों में ऐसा नहीं लिखा है, बल्कि यह भी है कि इन की दुकान चलती ही जातिगत भेदभाव से है.

अपनी दुकान चमकाए रखने के लिए धर्म की आड़ में समाज में पड़ी फूट को हवा दे रहे बाबा घुमाफिरा कर दबंगों को उकसाते हैं और दलितों को उन के दलितपने का एहसास कराते हुए नीचा दिखाने में लगे रहते हैं. इन पर न तो कोई कानून लागू होता है, न ही कोई इन की मुखालफत कर पाता है, क्योंकि मामला धर्म का जो होता है.

फसाद की असल जड़ धर्म और उस के उसूल हैं, जिन के मुताबिक शूद्र यानी छोटी जाति वाले जानवरों से भी गएबीते हैं. उन्हें घोड़ी पर बैठ कर बरात निकालने का हक तो दूर की बात है, सवर्णों के बराबर बैठने का भी हक नहीं है, इसलिए आएदिन ऐसी खबरें पढ़ने में आती रहती हैं कि दलितों को पानी भरने से रोका, वे नहीं माने तो उन की औरतोंबच्चों को बेइज्जत किया, मर्दों को पीटा और इस पर भी नहीं माने तो गांव से ही खदेड़ दिया.

यही वजह है कि करोड़ों दलित दबंगों के कहर का शिकार हो कर घुटन भरी जिंदगी जी रहे हैं, पर उन की सुनने वाला कोई नहीं.

इस पर तुर्रा यह कि हम एक आजाद लोकतांत्रिक देश की खुली हवा में सांस लेते हैं, जिस में संविधान सभी को बराबरी का हक देता है. यह मजाक कब और कैसे दूर होगा, कोई नहीं जानता.

चिंता की बात यह भी है कि दलितों पर जोरजुल्म लगातार बढ़ रहे हैं, जिन की तरफ किसी राजनीतिक पार्टी, नेता या समाज के ठेकेदारों का ध्यान नहीं जो बड़ीबड़ी बातें करते हैं, रैलियां निकालते हैं और दलितों को बरगलाने के लिए बुद्ध और अंबेडकर जयंतियां मनाते हैं. इस साजिश को, जो धर्म और राजनीति की देन है, दलित समझ पाएं तभी वे इज्जत और गैरत की जिंदगी जी पाएंगे.

Acid Attack जिंदगी सिमट नहीं जाती चमड़ी के सिकुड़ने से

Acid Attack News in Hindi: शनिवार का दिन था. रात के साढ़े 8 बजे थे. माला कर्मकार ‘सियालदहडायमंड हार्बर’ लोकल ट्रेन(Local Train) से दफ्तर से घर लौट रही थीं. उस समय लेडीज कंपार्टमैंट में कुछ गिनीचुनी औरतें ही थीं. एकाध स्टेशन के बाद उन में से 1-1 कर के और भी 4-5 औरतें उतर गईं. अब माला कर्मकार समेत 3 औरतें रह गईं. कल्याणपुर स्टेशन (kalyanpur Station) से कुछ सवारियों को उतार कर जब ट्रेन चली, तो अचानक चलती हुई ट्रेन की खिड़की के सामने एक नकाबपोश आया और उस ने खिड़की पर बैठी माला कर्मकार पर एसिड (Acid) फेंक दिया. यह वह घड़ी थी, जब माला की पूरी जिंदगी ही बदल गई. दरअसल, एक जमीन को ले कर स्वरूप हलदार नामक एक बिल्डर (Builder) के साथ माला कर्मकार के घर वालों का झगड़ा था. बिल्डर जमीन चाहता था और माला का परिवार जमीन बेचने को राजी नहीं था. बिल्डर स्वरूप हलदार कई बार माला कर्मकार के परिवार वालों को नतीजा भुगतने की धमकी दे चुका था. आखिरकार उस ने माला पर एसिड फेंक कर अपनी धमकी को पूरा कर ही दिया. अब वह हवालात में है. उस की जमानत (Bail) नहीं हो पा रही है.

एक और वाकिआ. मनीषा पैलान सुबहसवेरे जब नींद से जाग कर अपना चेहरा आईने में देखती हैं, तो एसिड से झुलसे चेहरे में गाल, आंखें, उस से नीचे गले और छाती की बीभत्सता से उन का पूरा बदन कांप जाता है.

एक मग एसिड ने मनीषा की दुनिया को पूरी तरह झुलसा कर रख दिया है.

मनीषा पैलान का सपना था कि वे अच्छी तरह पढ़लिख कर सब्जी बेचने वाले अपने पिता मुन्नाफ पैलान का सहारा बनें. वे अपने छोटे भाईबहन की पढ़ाई का खर्च जुटाना चाहती थीं, ताकि परिवार सिर ऊंचा कर के जी सके, इसीलिए पढ़ाई के साथसाथ वे नर्सिंग ट्रेनिंग, कंप्यूटर कोर्स, ब्यूटीशियन कोर्स भी कर रही थीं.

रूढ़िवादी मुसलिम परिवार में जनमी मनीषा पैलान कुछ भी कर के अपने पिता और परिवार की लड़खड़ाती जिंदगी को संभालने की कोशिश कर रही थीं.

साल 2015 में मनीषा पैलान ने अपने बचपन के प्यार सलीम हलदार से घर से भाग कर शादी कर ली. लेकिन कुछ समय बाद ही मनीषा के मन में अपने पैरों पर खड़ा हो कर पिता की मदद करने का सपना कुलबुलाने लगा.

मुसलिम परिवार में ऐसा सपना देखने की सख्त मनाही थी. जाहिर है, पतिपत्नी में अनबन होने लगी. मनीषा पैलान ने तलाक लेने का फैसला किया. मनीषा के मुताबिक, सलीम भी तलाक के लिए तैयार था, लेकिन वह इसे मन से स्वीकार नहीं कर पाया.

17 नवंबर, 2015. सर्दी की एक शाम. मनीषा कंप्यूटर क्लास से घर लौट रही थीं. सलीम अपने कुछ दोस्तों के साथ अचानक सामने आया और एक मग एसिड फेंक कर फरार हो गया. मनीषा से अलग होने का गुस्सा उस ने एसिड हमला कर के निकाला था.

सलीम से अलग होने के बाद मनीषा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन के लिए एक बहुत बड़ी लड़ाई इंतजार कर रही है. लगातार थाना, पुलिस और अदालत के चक्कर लगाने के साथसाथ अपनी लड़ाई लड़ने के लिए वे मन को तैयार करती चली गईं.

एसिड हमले की वारदात और पुलिस की कार्यवाही के बाद सलीम समेत दूसरे 5 आरोपी जमानत पर खुलेआम घूम रहे हैं, धमकियां दे रहे हैं और मामला उठा लेने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं.

आखिरकार मनीषा को अपना कसबा छोड़ कर कोलकाता आना पड़ा. यहां मनीषा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने 17 जुलाई को राज्य सरकार को मनीषा को 3 लाख रुपए हर्जाने के तौर पर दिए जाने का आदेश दिया.

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में एसिड हमले के पीडि़तों को 3 लाख रुपए हर्जाना देने का कानून है. इस कानून के तहत हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया. इतना ही नहीं, जमानत पर खुलेआम घूम रहे पांचों आरोपियों को भी हाईकोर्ट ने फिर से गिरफ्तारी के साथ जांच का भी आदेश दिया.

सलीम फरार है. बाकियों को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है. जहां तक 3 लाख रुपए के हर्जाने का सवाल है, तो 21 साला मनीषा कहती हैं कि अगर काबिलीयत से उन्हें कोई नौकरी मिल गई, तो कुछ सालों में 3 लाख रुपए जमा कर लेना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है. सिर्फ चमड़ी ही तो जल कर सिकुड़ गई है. इस से जीने का रास्ता तो बंद नहीं हो जाता है न? नौकरी कर के अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए चिकनी चमड़ी होना एकलौती काबिलीयत नहीं हो सकती है.

इलाज के दौरान जब पूरे चेहरे पर पट्टियां बंधी थीं, तब अस्पताल के बिस्तर पर लेटी मनीषा ने खुद को दिलासा दी थी कि जिंदगी यहीं खत्म नहीं हो जाती. इस के आगे भी दुनिया है. पर उस के लिए खुद को ही तैयार करना होगा.

मनीषा बताती हैं कि लोकल ट्रेन में उन की आपबीती सुन कर एक मुसाफिर ने यहां तक पूछ लिया था कि सिर्फ एसिड ही फेंका था या रेप भी हुआ था? ऐसी दुनिया से रूबरू होने के बाद भी वे आत्मविश्वास से लबालब हैं. उन का मानना है कि उन का जला चेहरा समाज का आईना है.

मनीषा को जब अस्पताल से छुट्टी मिली, तब उन्हें पता चला कि हमलावर जमानत पर छूट कर महल्ले में लौट आए हैं और छाती फुला कर उन के घर के आसपास घूम रहे हैं.

उसी समय मनीषा ने ठान लिया था कि पूरी हिम्मत के साथ उन्हें समझा देना है कि तुम्हारा एसिड मेरा कुछ भी नहीं जला पाया है. मेरे सपने को, मेरी चाह को जला नहीं सका है.

यही वजह है कि आज भी मनीषा गानों पर थिरकती हैं. ब्यूटीशियन का कोर्स कर के वे महल्ले की औरतों को सजातीसंवारती हैं.

इसी तरह मैत्री भट्टाचार्य द्वारा नाजायज संबंध बनाने से इनकार करने की सजा एसिड हमले से दी गई.

पश्चिम बंगाल के वर्दमान जिले के रानाघाट स्टेशन पर एक जानपहचान के लड़के ने मैत्री के चेहरे को निशाना बना कर एसिड फेंका. इस हमले में मैत्री का चेहरा तो झुलसा ही, साथ ही एक आंख भी जाती रही. लेकिन उन का मनोबल आज भी नहीं टूटा है.

वे कोलकाता मैडिकल कालेज में अपना इलाज करा रही हैं. उन के कंधे और दाहिने हाथ की चमड़ी ही नहीं, मांसपेशियां तक गल गई थीं और वहां सैप्टिक हो गया था. फिर भी वे दम साध कर कुसूरवारों को सजा दिलाने और एसिड हमले की पीडि़तों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ने का संकल्प ले रही थीं. वे एसिड पीडि़तों को संदेश देना चाहती हैं कि जिंदगी सिमट नहीं जाती चमड़ी की सिकुड़न से.

मैत्री भट्टाचार्य कहती हैं कि बलात्कार के विरोध में लोग सड़कों पर उतरते हैं, लेकिन एसिड हमले का देश में सख्ती से कोई विरोध नहीं करता, इसीलिए वे इसे एक लंबी लड़ाई मानती हैं. इस लड़ाई में वे आम लोगों का साथ भी चाहती हैं.

आंकड़ों की जबानी

‘एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन औफ इंडिया’ के आंकड़े कहते हैं कि एसिड हमले की वारदातें हमारे देश में बड़ी तेजी से बढ़ रही हैं. साल 2011 में एसिड हमले की जहां महज 106 वारदातें सामने आई थीं, वहीं साल 2015 में 802 वारदातें दर्ज हुई हैं.

जाहिर है, यह चिंता की बात है. वैसे, फरवरी, 2013 से पहले हुए एसिड हमले के आंकड़े पुख्ता आंकड़े नहीं माने जा सकते. वजह, तब तक हमारे देश में एसिड हमले जैसी वारदातों के लिए भारतीय आपराधिक कानून में अलग से कोई धारा नहीं थी.

फरवरी, 2013 को भारतीय दंड विधान में संशोधन किया गया. 326ए और 326बी को गैरजमानती धारा के तहत ऐसे अपराध को चिह्नित किया गया. अपराध साबित होने पर कम से कम 7 साल और ज्यादा से ज्यादा 10 साल की सजा का प्रावधान किया गया.

इस तरह देखा जाए, तो एसिड हमले के पुख्ता आंकड़े साल 2014 में ही उपलब्ध हो पाए. नई धारा के तहत पूरे देश में एसिड हमले के 225 मामले दर्ज हुए और साल 2015 में यह आंकड़ा बढ़ कर 249 तक पहुंच गया.

सरकार की अनदेखी

पश्चिम बंगाल की बात करें, तो पिछले कुछ सालों से राज्य में एसिड हमले की वारदातें लगातार बढ़ती जा रही हैं. साल 2013 से ले कर अब तक राज्य में ऐसी घटनाएं आएदिन हो रही हैं. उन्हें देख कर साफ लगता है कि एसिड मामलों में पुलिस प्रशासन और सरकार उदासीन है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं कि बीते 5 सालों में राज्य में 131 मामले दर्ज हुए, वहीं साल 2014 और साल 2015 में 41-41 मामले दर्ज हुए. पर किसी भी आरोपी को सजा नहीं हुई है.

‘एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन औफ इंडिया’ के विक्रमजीत सेन का मानना है कि गैरजमानती धारा में आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ही ये जमानत पर छूट जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि पुलिस पुख्ता चार्जशीट तैयार नहीं करती है.

सलफ्यूरिक, नाइट्रिक और हाइड्रोक्लोरिक एसिड खरीदनेबेचने में कंट्रोल के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिन के तहत राज्य सरकार ने 31 मार्च, 2014 को एसिड बिक्री से संबंधित कुछ नियम बनाए थे. मसलन, दुकानदारों को एसिड खरीदारों का एक अलग रजिस्टर रखना होगा और उस रजिस्टर में खरीदार का पूरा नामपता दर्ज करना होगा.

साथ ही, यह भी कहा गया था कि ऐक्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट जितनी हैसियत वाला कोई अफसर, सबइंस्पैक्टर की हैसियत वाला पुलिस औचक दौरा कर के एसिड विक्रेताओं के रजिस्टर की जांच कर सकता है.

कानूनी पचड़े में पीड़ित

पश्चिम बंगाल सरकार के मौजूदा नियम के मुताबिक, एसिड पीड़ित को अधिकतम 2 लाख रुपए हर्जाने व बतौर माली मदद के रूप में दिए जाने का प्रावधान है. उधर साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी कर के कहा था कि एसिड पीड़ित को 15 दिनों के भीतर राज्य सरकार 3 लाख रुपए दे.

पिछले साल जून में एसिड हमले की पीड़िता मनीषा पैलान ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने सरकार को 3 लाख रुपए का हर्जाना देने का निर्देश दिया. लेकिन सरकार अभी तक मनीषा को रकम नहीं दे पाई है.

हालांकि इस बारे में गृह विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, इस देरी की वजह कानूनी अड़चन है. दरअसल, वित्त विभाग की मंजूरी मिलने के बावजूद कानून विभाग से कानून में बदलाव की इजाजत अभी तक नहीं मिली है. इस के कारण मामला अधर में लटका हुआ है.

जाहिर है, राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार हर्जाना नहीं दे पा रही है. सुप्रीम कोर्ट का निर्देश मान कर 3 लाख रुपए का हर्जाना देने के लिए राज्य सरकार को वित्त विभाग की इजाजत चाहिए और वित्त विभाग इस रकम की मंजूरी दे चुका है. लेकिन कानून विभाग द्वारा पुराने कानून में संशोधन किए बिना राज्य सरकार पीड़िता को वह रकम नहीं दे सकती.

पश्चिम बंगाल में एपीडीआर जैसे मानवाधिकार संगठनों और स्वयंसेवी संगठनों के लगातार दबाव बनाने के बाद हुआ सिर्फ इतना है कि सरकारी अस्पतालों में पीड़िता के मुफ्त इलाज का निर्देश सरकार ने जारी कर के छुट्टी पा ली है.

एक मिसाल यह भी

एसिड हमला न केवल पीड़िता के चेहरेमोहरे को बिगाड़ देता है, बल्कि उस के पूरे वजूद को झकझोर कर रख देता है. लेकिन यह एक नाकाम कोशिश होती है. ‘नाकाम कोशिश’ इसलिए है, क्योंकि इस तरह का हमला पीड़ित को कमजोर नहीं बनाता, बल्कि सब से डट कर मुकाबला करने का माद्दा ही पैदा करता है.

आगरा के फतेहाबाद रोड पर गेटवे होटल के ठीक सामने शिरोज हैंगआउट इसी बात का सुबूत है. इस कैफेटेरिया को एसिड हमले की पीड़ित लड़कियां व औरतें चलाती हैं. एसिड ने भले ही इन के चेहरे को बिगाड़ दिया है, लेकिन इन के चेहरे पर हजारों वाट की मुसकराहट है.

एसिड अटैक सर्वाइवल को दोबारा बसाने का अपनी ही तरह का देश में यह पहला प्रोजैक्ट है, बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि एसिड सर्वाइवल द्वारा चलाया जाने वाला यह देश का पहला कैफेटेरिया है. बिगड़े चेहरे, समाज की अनदेखी, आसपड़ोस के लोगों की हमदर्दी, हंसीमजाक, डर को अंगूठा दिखा कर ये लड़कियां शिरोज हैंगआउट चला रही हैं.

साल 2014 में अकेले उत्तर प्रदेश में एसिड हमले के 186 मामले पुलिस ने दर्ज किए थे. इस के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दिल्ली की एक स्वयंसेवी संस्था ‘छांव फाउंडेशन’ की मदद से इन लड़कियों के पुनर्वास की योजना बनाई.

मजेदार बात यह है कि इस कैफेटेरिया में चायकौफी और स्नैक्स के साथ कम्यूनिटी रेडियो सुनने का लुत्फ और लाइब्रेरी में बैठने की भी सहूलियत है. इस के अलावा समयसमय पर यहां आर्ट वर्कशौप और एग्जिबिशन भी कराई जाती हैं.

यह कैफेटेरिया आगरा में न केवल लोकल लोगों के बीच, बल्कि देशीविदेशी सैलानियों के बीच कम समय में ही मशहूर हो गया. इस की मशहूरी को देखते हुए लखनऊ में भी इस की एक शाखा खोल दी गई?है. जाहिर है, उत्तर प्रदेश की यह मिसाल उम्मीद जगाती है, पर इस में सरकार और समाज का साथ मिलना भी बेहद जरूरी है.

बुढ़ापे में बेटों से चाहत : सही या गलत?

Society News in Hindi: समाचारपत्र (News Paper) में हर रोज नकारात्मकता और विकृत सचाई से रूबरू होना ही होता है. एक सुबह खेल समाचार पढ़ते हुए पन्ने पर एक समाचार मन खराब करने वाला था. अवकाशप्राप्त निर्देशक का शव बेटे की बाट जोहता रह गया. एक समय महत्त्वपूर्ण पद (Important Post) पर आसीन व्यक्ति, जिस की पत्नी मर चुकी थी, आज वृद्धाश्रम (Oldage Home) में रह रहा था. उन का एकमात्र बेटा विदेश में जा बसा था. उसे खबर ही एक दिन बाद मिली और उस ने तुरंत आने में असमर्थता जाहिर की. देश में बसे रिश्तेदारों ने भी अंतिम क्रियाकर्म करने से इनकार कर दिया. आश्रम के संरक्षक ने शवदहन (Crimination) किया. एक समय पैसा, पावर और पद के मद में जीता  व्यक्ति अंतिम समय में वृद्धाश्रम में अजनबियों के बीच रहा और अनाथों सा मरा.

आखिर लोग कहां जा रहे हैं? बेटे की निष्ठुरता, रिश्तेदारों की अवहेलना ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर जीवन का गणित कहां गलत हुआ जो अंत ऐसा भयानक रहा. दुनिया में खुद के संतान होने के बावजूद अकेलेपन का अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा. जवानी तो व्यक्ति अपने शारीरिक बल और व्यस्तता में बिता लेता है पर बुढ़ापे की निर्बलता व अकेलापन उसे किसी सहारे के लिए उत्कंठित करता है.

विदेशों से इतर हमारे देश में सामाजिक संरचना ही कुछ ऐसी है कि परिवार में सब एकदूसरे से गुथे हुए से रहते हैं. मांबाप अपने बच्चों की देखभाल उन के बच्चे हो जाने तक करते हैं. अचानक इस ढांचे में चरमराहट की आहट सुनी जाने लगी है. संस्कार के रूप में चले आने वाले व्यवहार में तबदीलियां आने लगी हैं. बच्चों के लिए संपूर्ण जीवन होम करने वाले जीवन के अंतिम वर्ष क्यों अभिशप्त, अकेलेपन और बेचारगी में जीने को मजबूर हो जाते हैं? इस बात की चर्चा देशभर के अलगअलग प्रांतों की महिलाओं से की गई. सभी ने संतान के व्यवहार पर आश्चर्य व्यक्त किया.

लेखक, संपादक, संवाद, व्हाट्सऐप ग्रुप पर व्यक्त विचार इस समस्या पर गहन विमर्श करते हैं. आप भी रूबरू होइए :

अहमदाबाद की मिनी सिंह ने छूटते ही कहा, ‘‘अच्छा है कि उन के कोई बेटा नहीं है, कम से कम कोई आस तो नहीं रहेगी.’’ पटना की रेनू श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘यदि बेटी होती तो शायद ये दिन देखने को न मिलते. बेटे की तुलना में बेटियां संवेदनशील जो होती हैं.’’ वहीं रानी श्रीवास्तव ने इस बात को नकारते हुए कहा, ‘‘बात लड़का या लड़की की नहीं, बल्कि समस्या परिवेश व परवरिश की है. समस्या की जड़ में भौतिकवाद और स्वार्थीपन है.’’

मुंबई की पूनम अहमद ने माना, ‘‘कुछ बेटियां भी केयरलैस और स्वार्थी होती हैं, जबकि कई बहुएं सास के लिए सब से बढ़ कर होती हैं.’’ अपने अंतर्जातीय विवाह का उदाहरण देते हुए वे कहती हैं, ‘‘उन की सास से उन का रिश्ता बहुत ही खास है. बीमार होने पर उन की सास उन के पास ही रहना पसंद करती हैं.’’ पूनम अहमद के एक ऐक्सिडैंट के बाद उन की सास ने ही सब से ज्यादा उन का ध्यान रखा. उन का कहना है, ‘‘पेरैंट्स को प्यार और सम्मान देना बच्चों का फर्ज है चाहे वे लड़के के हों या फिर लड़की के.’’

कौन है जिम्मेदार

सही बात बेटा या बेटी से हट, सोच के बीजारोपण में है. हम बच्चों को शुरू से जीवन की चूहादौड़ में शामिल होने के लिए यही मंत्र बताते हैं कि जीवन में सफल वही होता है जिस के पास अच्छी पदवी, पावर और पैसा है. हम उन्हें भौतिकवाद की शिक्षा देते हैं. बच्चों पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का इतना दबाव होता है कि वे दुनियावी और व्यावहारिक बातों में पिछड़ जाते हैं. किताबी ज्ञान भले ही बढ़ता जाता है पर रिश्तों की डोर थामे रखने की कला में वे अधकचरे रह जाते हैं.

सरिता पंथी पूछती हैं, ‘‘बच्चों को इस दौड़ में कौन धकेलता है? उन के मांबाप ही न, फिर बच्चों का क्या दोष?’’ रेणु श्रीवास्तव सटीक शब्दों में कहती हैं, ‘‘भौतिक सुखों की चाह में मातापिता भी तो बच्चों को अकेलापन देते हैं उन के बचपन में, तो संस्कार भी तो वही रहेगा.’’ वे कटाक्ष करती हैं, ‘‘रोपा पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय.’’ इस पर मुंबई की पूनम अहमद कहती हैं, ‘‘इसी से क्रैच और ओल्डहोम दोनों की संख्या में इजाफा हो रहा है.’’

अजमेर में रहने वाली लीना खत्री कहती हैं, ‘‘हमें अकसर बच्चों की बातें सुनने का वक्त नहीं होता है. यही स्थिति हमारे बूढ़े हो जाने पर होती है जब बच्चे जिंदगी की आपाधापी में उलझ जाते हैं और उन के पास हमारे लिए वक्त नहीं होता है.’’

नीतू मुकुल कहती हैं, ‘‘उक्त घटना हृदयविदारक और चिंतनीय है. मेरे हिसाब से इस समाचार का एक पक्षीय अवलोकन करना सही नहीं. हम बच्चों को पढ़ाने में तो खूब पैसा खर्च करते हैं पर उन के लिए क्या कभी समय खर्च करने की सोचते हैं. केवल अच्छा स्कूल और सुविधाएं देना ही हमारी जिम्मेदारी नहीं है.’’

इंदौर की पूनम पाठक कहती हैं, ‘‘मशीनों के साथ पलता बच्चा मशीन में तबदील हो गया है. उस के पास संवदेनाएं नहीं होती हैं, होता है तो सिर्फ आगे बढ़ने का जनून और पैसा, पावर व सफलता पानी की जिद. इन सब के लिए वह सभी संबंधों की बलि देने को तैयार रहता है.’’

पटना की रेणु अपने चिरपरिचित अंदाज में कहती हैं, ‘‘यह घटना आधुनिक सभ्यता की देन है जहां हृदय संवेदनशून्य हो कर मरुभूमि बनता जा रहा है.’’

ये सभी बातें गौर फरमाने के काबिल हैं. बच्चों के साथ बातें करना, वक्त गुजारना हमें उन के मानस और हृदय से जोड़े रखता है. दिल और मानस को वार्त्तालाप के पुल जोड़ते हैं और उस वक्त हम अपने भावों व संस्कारों को उन में प्रतिरोपित करते हैं. अंधीदौड़ में भागना सिखाने के साथ बच्चों को रिश्तों और जिम्मेदारियों का भी बचपन से ही बोध कराना आवश्यक है. बड़े हो कर वे खुदबखुद सीख जाएंगे, ऐसा सोचना गलत है. पक्के घड़े पर कहीं मिट्टी चढ़ती है भला?

बेरुखी का भाव

बच्चे तो मातापिता के व्यवहार का आईना होते हैं. कई युवा दंपती खुद अपने बुजुर्गों के प्रति बेरुखी का भाव रखते हैं. उन के लिए बुड्ढेबुढि़या या बोझ जैसे अपशब्दों का प्रयोग करते हैं. अपनी पिछली पीढ़ी के प्रति असंवेदनशील और लापरवाह दंपती अपनी संतानों को इसी बेरुखी, संवेदनहीनता और कर्तव्यहीनता की थाती संस्कारों के रूप में सौंपते हैं. फिर जब खुद बुढ़ापे की दहलीज पर आते हैं तो बेचारगी और लाचारी का चोला पहन अपने बच्चों से अपने पालनपोषण के रिटर्न की अपेक्षा करने लगते हैं. हर बूढ़ा व्यक्ति इतना भी दूध का धुला नहीं होता है.

मिनी सिंह पूछती हैं, ‘‘क्या मांबाप अपने बच्चे की परवरिश में भूल कर सकते हैं, तो फिर बच्चों से कैसे भूल हो जाती है?’’

इस पर रायपुर की दीपान्विता राय बनर्जी बिलकुल सही कहती हैं, ‘‘जिंदगी की आपाधापी में निश्चित ही हर बार हम  तराजू में तोल कर बच्चों के सामने खुद को नहीं रख पाते. इंसानी दिमाग गलतियों का पिटारा ज्यादा होता है और सुधारों का गणित कम, एक कारण यह है जो बच्चों को भी अपनी जरूरतों के अनुसार ढलने को मजबूर कर देता है. जो मातापिता जिंदगीभर अपने रिश्तेनातों में स्वार्थ व भौतिकता को तवज्जुह देते हैं, अकसर उन के बच्चों में भी कर्तव्यबोध कम होने के आसार होते हैं.’’

जिम्मेदारी का एहसास

शन्नो श्रीवास्तव ने अपने अनुभवों को सुनाते हुए बताया, ‘‘उन्होंने अपने ससुर की अंतिम समय में अथक सेवा की जिसे डाक्टरों और सभी रिश्तेदारों ने भी सराहा. वे इस की वजह बताती हैं अपने मातापिता द्वारा दी गई शिक्षा व संस्कार और दूसरा, अपने सासससुर से मिला अपनापन.’’

कितना सही है न, जिस घर में बच्चे अपने दादादादी, नानानानी की इज्जत और स्नेहसिंचित होते देखते हैं. कल को हजार व्यस्तताओं के बीच वे अपने बुजुर्गों के प्रति फर्ज और जिम्मेदारियों को अवश्य निभाएंगे, क्योंकि वह बोध हर सांस के साथ उन के भीतर पल्लवित होता है.

पूनम पाठक कहती हैं, ‘‘बात फिर घूमफिर वहीं आती है. उचित शिक्षा और संस्कार बच्चों के बेहतर भविष्य का निर्माण तो करते ही हैं, साथ ही उन्हें रिश्तों के महत्त्व से भी परिचित कराते हैं. सो, सही व्यवहार से बेहतर भविष्य व रिश्तों के बीच संवेदनशीलता बनी रहती है.’’

सुधा कसेरा बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, ‘‘हमें स्कूली पढ़ाई से अधिक रिश्तों के विद्यालय में उन्हें पढ़ाने में यकीन करना चाहिए. रिश्तों के विद्यालय में यह पढ़ाया जाता है कि बच्चों के लिए उन के मातापिता ही संसार में सब से महान और उन के सब से अच्छे मित्र होते हैं. दरअसल, रिश्तों को ले कर हमें बहुत स्पष्ट होना चाहिए.

‘‘तथाकथित अंगरेजी सीखने पर जोर देने वाले विद्यालय ने बच्चे को सबकुछ पढ़ा दिया, पर रिश्तों का अर्थ वे नहीं पढ़ा पाए. ऐसे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे, विदेश में नौकरी तो पा लेते हैं और वे विदेश में सैटल भी हो जाते हैं, लेकिन भारत में रहने वाले मातापिता के प्रति वे अपने कर्तव्य को अनदेखा करने से नहीं चूकते. रिटायर्ड बाप और मां किस काम के? विदेश की चमकीली जिंदगी में टूटे दांतों वाला बूढ़ा बाप बेटे के लिए डस्टबिन से अधिक कुछ नहीं रह जाता.’’

‘‘आज खुद मैं आगे पढ़ने के लिए अपने दोनों बच्चों को बाहर भेज रही हूं. अगर उस के बाद मैं यह आस रखूं कि वे मेरी जरूरत के समय वापस भारत आ जाएंगे तो यह मेरी बेवकूफी होगी. हमें उन्हें खुला आकाश देना है तो खुद की सोच में भी परिवर्तन लाना ही होगा,’’ कहना है सरिता पंथी का.

पद्मा अग्रवाल का कहना है, ‘‘मेरे विचार से बच्चों को दोष देने से पहले उन की परिस्थितियों पर भी विचार करना जरूरी है. एक ओर विदेश का लुभावना पैकेज, दूसरी ओर पेरैंट्स के प्रति उन का कर्तव्य, कई बार वे चाहे कर भी कुछ नहीं कर पाते. अपने कैरियर और जिंदगी ले कर भी तो उन की कुछ चाहतें और लक्ष्य होते हैं.’’

‘‘सीमा तय करना हमारी मानसिकता पर निर्भर करता है. जिस प्रकार मातापिता अपने बच्चे के भविष्यनिर्माण के कारण अपने सुखसंसाधनों का परित्याग करते हैं, उसी प्रकार बच्चों को उन के लिए अपने कैरियर से भी समझौता करना चाहिए. नौकरी विदेश में अधिक पैकेज वाली मिलेगी, तो भारत में थोड़े पैसे कम मिलेंगे, बस इतना ही अंतर है. अधिकतर जो लोग रिश्तों को महत्त्व नहीं देते, वे ही विदेश में बसना पसंद करते हैं. वे यह नहीं सोचते कि उन के बच्चे भी बड़े हो कर उन के साथ नहीं रहेंगे तो उन को कैसा लगेगा,’’ ऐसा मानना है सुधा कसेरा का.

पल्लवी सवाल उठाती हैं, ‘‘क्या हम बच्चे सिर्फ अपनी सुखसुविधाओं के लिए ही पालते हैं? क्या वे हमारे नौकर या औटोमेशन टू बी प्रोग्राम्ड हैं? हर व्यक्ति का नितांत अलग व्यक्तित्व होता है. कोई जीवनभर आप से जुड़ा रहेगा, तो कोई नहीं. क्या पता कल को आप के बच्चे इतना समर्थ ही न हों कि वे आप की देखभाल कर सकें. क्या पता कल को वे किसी बीमारी या मुसीबत के मारे काम ही न कर सकें. कहने का तात्पर्य है कि बच्चों पर निर्भरता की आशा आखिर रखें ही क्यों.’’

पहले संयुक्त परिवार होते थे तो बच्चों का दूर जाना खलता नहीं था. आजकल मांबाप पहले से ही खुद को मानसिक रूप से तैयार करने लगते हैं कि बच्चे अपनी दुनिया में एक दिन अपने भविष्य के लिए जाएंगे ही.

संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों का चलन ने ही इस एकाकीपन को जन्म दिया है. पहले बच्चे भी अधिक होते थे. भाईबहन मिल कर मांबाप के बुढ़ापे को पार लगा लेते थे. एकदो अगर विदेश चले भी गए तो कोई फर्क नहीं पड़ता था. अब जब एक या दो ही बच्चे हैं तो हर बार समीकरण सही नहीं हो पाता है जीवन को सुरक्षित रखने का.

एहसान नहीं, प्यार चाहिए

जोयश्रीजी कहती हैं, ‘‘अगर बच्चों को मनपसंद कैरियर चुनने व जीने का अधिकार है तो सीनियर सिटीजंस को भी इज्जत के साथ जीने व शांतिपूर्वक मरने का हक है. यदि बच्चे देखभाल करने में खुद को असमर्थ पाते हैं तो उन्हें मातापिता से भी किसी तरह की विरासत की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए.’’

वास्तविकता के मद्देनजर अगर मातापिता बच्चों को बिना उम्मीद पाले, बिना अपने किए का हिसाब गिनाए कई स्मार्ट विकल्पों पर ध्यान दें, मसलन वृद्धाश्रम या सामाजिक सरोकार वाले आश्रम, तो वे बखूबी अपनी जिंदगी किसी पर थोपने के एहसास से बचा कर अपने ही हमउम्र लोगों के साथ हंसतेमुसकराते कुछ नया करते, सीखते और साझा करते जिंदगी बिता सकते हैं. जब दूसरों को सुधारने की गुंजाइश नहीं रहती है तो खुद को कई बातें सहज स्वीकार करनी होती हैं.

बच्चों को उन के कैरियर और विकास से दूर तो नहीं कर सकते. दूसरी बात, पहले बच्चे अकसर मातापिता के साथ ही रह जाते थे चाहे नौकरी हो या पारिवारिक व्यवसाय. पर अब कैरियर के विकल्प के रूप में पूरा आसमान उन का है. मातापिता कब तक उन के साथ चलें. उन्हें तो थमना ही है एक जगह. बेहतर है कि परिवर्तन को हृदय से स्वीकारें और यह युवा होती पीढ़ी के हम मातापिता अभी से इस के लिए खुद को तैयार कर लें.

क्यों बड़ी उम्र के मर्दों की तरफ आकर्षित होती हैं लड़कियां?

Society News in Hindi: कार्यालय में चर्चा का बाजार कुछ ज्यादा ही गरम था. पता चला कि नेहा ने अपने से उम्र में 15 साल बड़े अधिकारी प्रतीक से विवाह रचा लिया है. एक हफ्ते बाद जब नेहा से मुलाकात हुई तो वह बेहद खुश नजर आ रही थी. अपने से ज्यादा उम्र के व्यक्ति से विवाह (Marriage) करने की कोई लाचारी या बेचारगी का भाव उस के चेहरे पर नहीं था. चूंकि उन के बीच चल रहे संबंधों (Relations) की चर्चा पहले से होती थी, सो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. ऐसे एक नहीं अनेक किस्सों को हम हकीकत में बदलते देखते हैं. विशेषकर कार्यक्षेत्र में तो यह स्थिति अधिक देखने को मिलती है कि लड़कियां अपने से बड़ी उम्र के पुरुषों के प्रति अधिक आकर्षित (Attraction) हो रही हैं. आजकल यह आश्चर्यजनक नहीं, बल्कि सामान्य बात हो गई है.

अकसर नौकरीपेशा लड़कियां या महिलाएं अपने दफ्तर के वरिष्ठ अधिकारी के प्रेमजाल में फंस जाती हैं और जरूरी नहीं कि वे उन के साथ कोई लंबा या स्थायी रिश्ता ही बनाना चाहें, लेकिन कई बार लड़कियां इस चक्कर में अपना जीवन बरबाद भी कर लेती हैं. ऐसे रिश्ते रेत के महल की तरह जल्द ही ढह जाते हैं.

बात जब विवाह की हो तो ऐसे रिश्तों की बुनियाद कमजोर होती है. पर मन की गति ही कुछ ऐसी है, जिस किसी पर यह मन आ गया, तो बस आ गया. फिर उम्र की सीमा और जन्म का बंधन कोई माने नहीं रखता. हालांकि यह स्थिति बहुत अच्छी तो नहीं है, फिर भी कई बार कुछ परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं कि मन बस वहीं ठहर जाता है.

सुरक्षा का भाव

कई बार कम उम्र की लड़कियां अपने से काफी अधिक उम्र के व्यक्ति के साथ अपनेआप को सुरक्षित महसूस करती हैं. ऐसा अकसर तब होता है जब कोई लड़की बचपन से अकेली रही हो. परिवार में पिता या भाई जैसे किसी पुरुष का संरक्षण न मिलने के कारण उसे अपमान या छेड़खानी का सामना करना पड़ा हो तो ऐसी लड़कियां सहज ही अपने से अधिक उम्र के व्यक्ति के साथ अपनेआप को सुरक्षित महसूस करती हैं. कई बार लड़कियों के इस रुझान का फायदा पुरुष भी उठाते दिख जाते हैं.

हालात

कार्यक्षेत्र की परिस्थितियां कई बार ऐसा संपर्क बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं. कई दफ्तरों में फील्डवर्क होता है. काम सीखनेसमझने के मद्देनजर लड़कियों को सीनियर्स के साथ दफ्तर से बाहर जाना पड़ता है. गैरअनुभवी लड़कियों को इस का फायदा मिलता है. धीरेधीरे लड़कियां पुरुष सहयोगियों के करीब आ जाती हैं. काम के सिलसिले में लगातार साथ रहतेरहते कई बार दिल भी मिल जाते हैं.

लालच वाली सोच

पुरुषों की स्वार्थी वृत्ति भी कई बार कम उम्र की लड़कियों को अपने मोहजाल में फंसा लेती है. लड़कियां यदि केवल सहकर्मी होने के नाते पुरुषों के साथ वार्त्तालाप कर लेती हैं, काम में कुछ मदद मांग लेती हैं तो स्वार्थी प्रवृत्ति के पुरुष इस का गलत फायदा उठाने की कोशिश करते हैं और लड़कियां उन के झांसे में आ जाती हैं.

मजबूरियां

कई बार मजबूरियां साथ काम करने वाले अधिक उम्र के सहकर्मी के करीब ले आती हैं. तब मुख्य वजह मजबूरी होती है, संबंधित पुरुष की उम्र नहीं. आजकल कार्यस्थलों पर काम की अधिकता हो गई है, जबकि समय कम होता है. कम समय में अधिक कार्य का लक्ष्य पूरा करने के लिए लड़कियां अपने सहकर्मी पुरुषों का सहयोग लेने में नहीं हिचकतीं, यह जरूरी भी है. किंतु मन का क्या? सहयोग लेतेदेते मन भी जब एकदूसरे के करीब आ जाता है तब उम्र का बंधन कोई माने नहीं रखता.

प्रलोभन

प्रलोभन या लालचवश भी कमसिन लड़कियां उम्रदराज पुरुषों के चंगुल में फंस जाती हैं. कई लड़कियां बहुत शौकीन और फैशनेबल होती हैं. उन की जरूरतें बहुत ज्यादा होती हैं, पर जरूरतों को पूरा करने के साधन उन के पास सीमित होते हैं. ऐसी स्थिति में यदि कोई अधिक उम्र का व्यक्ति, जो साधनसंपन्न है, पैसों की कोई कमी नहीं है, समाज में रुतबा है तो लड़कियां उस की ओर आकर्षित हो जाती हैं. उस समय उन्हें दूरगामी परिणाम नहीं दिखते, तात्कालिक लाभ ही उन के लिए सर्पोपरि होता है.

कई लड़कियां कैरियर के मामले में शौर्टकट अपनाना चाहती हैं और ऊंची छलांग लगा कर पदोन्नति प्राप्त कर लेना चाहती हैं. यह लालच अधिकारी की अधिक उम्र को नजरअंदाज कर देता है.

किसी भी अधिक उम्र के व्यक्ति का अपना प्रभाव, व्यक्तित्व, रुतबा या रहनसहन भी लड़कियों को प्रभावित करने का माद्दा रखता है. राजनीति और कारोबार जगत से जुड़ी कई हस्तियों के साथ कम उम्र की लड़कियों को उन के मोहपाश में बंधते देखा गया है.

बहरहाल, जरूरी नहीं कि ऐसे संबंध हमेशा बरबाद ही करते हों. कई बार ऐसे संबंध सफल होते भी देखे गए हैं. बात आपसी संबंध और परिपक्वता की है जहां सूझबूझ, विवेक और धैर्य की आवश्यकता होती है. फिर असंभव तो कुछ भी नहीं होता.

यह भी एक तथ्य है कि आकर्षण तो महज आकर्षण ही होते हैं और ज्यादातर आकर्षण क्षणिक भी होते हैं. दूर से तो हर वस्तु आकर्षक दिख सकती है. उस की सचाई तो करीब आने पर ही पता चलती है, कई बार यही आर्कषण आसमान से सीधे धरातल पर ले आता है. आकर्षण, प्यार, चाहत और जीवनभर का साथ ये सब अलगअलग तथ्य होते हैं. इन्हें एक ही समझना गलत है. किसी अच्छी वस्तु को देख कर आकर्षित हो जाना एक सामान्य बात है. पर इस आकर्षण को जीवनभर का बोझ बनाना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हो सकता है, क्योंकि हर चमकती चीज सोना नहीं होती.

फिर भी बदलते वक्त की जरूरत कहें या बढ़ती हुई जरूरतों को जल्दी से जल्दी बिना मेहनत किए पूरा करने की होड़, अधिक उम्र के पुरुषों की तरफ लड़कियों का आकर्षित होना एक अच्छी शुरुआत तो नहीं कही जा सकती. इस नादानी में उन का भविष्य जरूर दावं पर लग सकता है.

बच्चों को रखें इंटरनैट से दूर : खतरनाक गेम्स हैं दुश्मन

Society News in Hindi: कुछ वर्षों से सोशल मीडिया (Social Media) यानी सोशल नैटवर्किंग साइट्स ने लोगों के जीवन में एक खास जगह तो बना ली है परंतु इस का काफी गलत प्रभाव पड़ रहा है. इस में कोई शक नहीं कि डिजिटल (Digital) युग में इंटरनैट (Internet) के प्रयोग ने लोगों की दिनचर्या को काफी आसान बना दिया है. पर इस का जो नकारात्मक रूप सामने आ रहा है वह दिल दहलाने वाला है. जानकारों का कहना है कि इंटरनैट और सोशल मीडिया की लत से लोग इस कदर प्रभावित हैं कि अब उन के पास अपना व्यक्तिगत जीवन जीने का समय नहीं रहा. सोशल मीडिया की लत रिश्तों पर भारी पड़ने लगी है. बढ़ते तलाक के मामलों में तो इस का कारण माना ही जाता है, इस से भी खतरनाक स्थिति ब्लूव्हेल (Bluewhale) और हाईस्कूल गैंगस्टर जैसे गेम्स की है. नोएडा में हुए दोहरे हत्याकांड की वजह हाईस्कूल गैंगस्टर गेम बताया गया है. जानलेवा साबित हो रहे इन खेलों से खुद के अलावा समाज को भी खतरा है.

अभिभावकों का कहना है कि परिजनों के समक्ष बच्चों को वास्तविक दुनिया के साथ इंटरनैट से सुरक्षित रखना भी एक चुनौती है. इस का समाधान रिश्तों की मजबूत डोर से संभव है. वही इस आभासी दुनिया के खतरों से बचा सकती है.

पहला केस : दिल्ली के साउथ कैंपस इलाके के नामी स्कूल में एक विदेशी नाबालिग छात्र ने अपने नाबालिग विदेशी सहपाठी पर कुकर्म का आरोप लगाया. दोनों ही 5वीं क्लास में पढ़ते हैं.

दूसरा केस : 9वीं क्लास के एक छात्र ने हाईस्कूल गैंगस्टर गेम डाउनलोड किया. 3-4 दिनों बाद जब यह बात उस के एक सहपाठी को पता चली तो उस ने शिक्षकों और परिजनों तक मामला पहुंचा दिया. परिजनों ने भी इस बात को स्वीकार किया कि बच्चे के व्यवहार में काफी दिनों से उन्हें परिवर्तन दिखाई दे रहा था. समय रहते सचेत होने पर अभिभावक और शिक्षकों ने मिल कर बच्चे की मनोस्थिति को समझा और उसे इस स्थिति से बाहर निकाला.

तीसरा केस : 12वीं कक्षा के एक छात्र की पिटाई 11वीं में पढ़ रहे 2 छात्रों ने इसलिए की क्योंकि वह उन की बहन का अच्छा दोस्त था. यही नहीं, उसे पीटने वाले दोनों भाई विशाल और विक्की उसे जान से मारने की धमकी भी दे चुके थे और ऐसा उन्होंने इंटरनैट से प्रेरित हो कर किया.

चौथा केस : 7वीं कक्षा की एक छात्रा ने मोबाइल पर ब्लूव्हेल गेम डाउनलोड कर लिया. उस में दिए गए निर्देश के मुताबिक उस ने अपने हाथ पर कट लगा लिया. उस की साथी छात्रा ने उसे देख लिया और शिक्षकों को पूरी बात बता दी. कहने के बावजूद छात्रा अपने परिजनों को स्कूल नहीं आने दे रही थी. दबाव पड़ने पर जब परिजनों को स्कूल बुलाया गया तो पता चला कि घर पर भी उस का स्वभाव आक्रामक रहता है. इस के बाद काउंसलिंग कर के उस को गलती का एहसास कराया गया.

एक छात्रा के अनुसार, ‘‘पढ़ाई के लिए हमें इंटरनैट की जरूरत पड़ती है. लगातार वैब सर्फिंग करने से कई तरह की साइट्स आती रहती हैं. यदि हमारे मातापिता साथ होंगे तो हमें अच्छेबुरे का आभास करा सकते हैं. इसलिए हम जैसे बच्चों के पास पापामम्मी या दादादादी का होना जरूरी है.’’

एक अभिभावक का कहना है, ‘‘डिजिटल युग में अब ज्यादातर पढ़ाई इंटरनैट पर ही निर्भर होने लगी है. छोटेछोटे बच्चों के प्रोजैक्ट इंटरनैट के माध्यम से ही संभव हैं. आवश्यकता पड़ने पर उन्हें मोबाइल फोन दिलाना पड़ता है. बहुत सी बातों की तो आप और हमें जानकारी भी नहीं होती. कब वह गलत साइट खोल दे, यह मातापिता के लिए पता करना बड़ा मुश्किल होता है.’’

एक स्कूल प्रिंसिपल का कहना है,  ‘‘एकल परिवार की वजह से बच्चों का आभासी दुनिया के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है. यदि बच्चे संयुक्त परिवार में रहते तो वे विचारों को साझा कर लेते. अभिभावकों को उन की गतिविधियों और व्यवहार पर नजर रखनी चाहिए. हम ने अपने स्कूल में एक सीक्रेट टीम बनाई है जो बच्चों पर नजर रखती है. 14-15 साल के बच्चों में भ्रमित होने के आसार ज्यादा रहते हैं.’’

अपराध और गेम्स

इंटरनैट पर इन दिनों कई ऐसे खतरनाक गेम्स मौजूद हैं जिन्हें खेलने की वजह से बच्चे अपराध की दुनिया में कदम रख रहे हैं. इस का सब से ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है. साइबर सैल की मानें तो विदेशों में बैठे नकारात्मक मानसिकता के लोग ऐसे गेम्स बनाते हैं. इस के बाद वे इंटरनैट के माध्यम से सोशल मीडिया पर गेम्स का प्रचारप्रसार कर बच्चों को इस का निशाना बनाते हैं.

साइबर सैल में कार्यरत एक साइबर ऐक्सपर्ट ने बताया कि हाईस्कूल गैंगस्टर और ब्लूव्हेल जैसे गेम्स से 13 से 18 साल के बच्चों को सब से ज्यादा खतरा है. इस उम्र में बच्चे अपरिपक्व होते हैं. इन को दुनियाभर के बच्चों में स्पैशल होने का एहसास कराने का लालच दे कर गेम खेलने के लिए मजबूर किया जाता है. गेम खेलने के दौरान बच्चों से खतरनाक टास्क पूरा करने के लिए कहा जाता है. अपरिपक्व होने के कारण बच्चे शौकशौक में टास्क पूरा करने को तैयार हो जाते हैं. वे अपना मुकाबला गेम खेलने के दौरान दुनिया के अलगअलग देशों के बच्चों से मान रहे होते हैं. गेम खेलने के दौरान वे सहीगलत की पहचान नहीं कर पाते. गेम के दौरान बच्चों में जीत का जनून भर कर उन से अपराध करवाया जाता है.

एक सर्वेक्षण में शामिल 79 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि इंटरनैट पर उन का अनुभव बहुत बार नकारात्मक रहा है. 10 में से 6 बच्चों का कहना था कि इंटरनैट पर उन्हें अजनबियों ने गंदी तसवीरें भेजीं, किसी ने उन्हें चिढ़ाया इसलिए वे साइबर क्राइम के शिकार हुए.

इन औनलाइन घटनाओं का वास्तविक जीवन में भी गहरा प्रभाव पड़ता है. इंटरनैट पर दी गई व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग होना, किसी विज्ञापन के चक्कर में धन गंवाना आदि बालमन पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं.

मानसिक विकारों के शिकार

सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर अपना खाता खोलने वाले 84 प्रतिशत बच्चों का कहना था कि उन के साथ अकसर ऐसी अनचाही घटनाएं होती रहती हैं जबकि सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर सक्रिय न रहने वाले बच्चों में से 58 फीसदी इस के शिकार होते हैं.

बाल मनोविज्ञान के जानकारों के अनुसार, आज के बच्चे बहुत पहले ही अपनी औनलाइन पहचान बना चुके होते हैं. इस समय इन की सोच का दायरा बहुत छोटा रहता है और इन में खतरा भांपने की शक्ति नहीं रहती. उन का कहना है कि ऐसी स्थिति में बच्चों को अपने अभिभावक, शिक्षक या अन्य आदर्श व्यक्तित्व की जरूरत होती है जो उन्हें यह समझाने में मदद करें कि उन्हें जाना कहां है, क्या कहना है, क्या करना और कैसे करना है. लेकिन इस से भी ज्यादा जरूरी है यह जानना कि उन्हें क्या नहीं करना चाहिए.

सोशल नैटवर्किंग साइट्स का एक और कुप्रभाव बच्चों का शिक्षक के प्रति बदले नजरिए में दिखता है. कई बार बच्चों के झूठ बोलने की शिकायत मिलती है. 14 साल के बच्चों द्वारा चोरी की भी कई शिकायतें बराबर मिल रही हैं. मुरादाबाद के संप्रेषण गृह के अधीक्षक सर्वेश कुमार ने बताया, ‘‘पिछले 2 वर्षों के दौरान मुरादाबाद और उस के आसपास के इलाकों से लगभग 350 नाबालिगों को गिरफ्तार कर संप्रेषण गृह भेजा गया है. इन में से ज्यादा नाबालिग जमानत पर बाहर हैं लेकिन 181 बच्चे अभी संप्रेषण में हैं.’’

आक्रामक होते बच्चे

मनोचिकित्सक डाक्टर अनंत राणा के अनुसार, पहले मातापिता 14 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को काउंसलिंग के लिए लाते थे, लेकिन आज के दौर में

8 साल की उम्र के बच्चों की भी काउंसलिंग की जा रही है. अपराध की दुनिया में कदम रखने वाले बच्चे ज्यादातर एकल परिवार से ताल्लुक रखते हैं. ऐसे परिवारों में मातापिता से बच्चों की संवादहीनता बढ़ रही है, जिस वजह से बच्चे मानसिक विकारों के शिकार हो रहे हैं. ऐसे में वे अपने पर भी हमला कर लेते हैं. काउंसलिंग के दौरान बच्चे बताते हैं कि परिजन अपनी इच्छाओं को उन पर मढ़ देते हैं. इस के बाद जब बच्चे ठीक परफौर्मेंस नहीं दे पाते तो उन्हें परिजनों की नाराजगी का शिकार होना पड़ता है. ऐसे हालात में ये आक्रामक हो जाते हैं.

8 से 12 साल के बच्चों की काउंसलिंग के दौरान ज्यादातर परिजन बताते हैं कि उन के बच्चों को अवसाद की बीमारी है. उन का पढ़ाई में मन नहीं लगता. टोकने पर वे आक्रामक हो जाते हैं और इस से अधिक उम्र के बच्चे तो सिर्फ अपनी दुनिया में ही खोए रहते हैं.

साइबर सैल की मदद लें

आप का बच्चा किसी खतरनाक गेम को खेल रहा है या उस की गतिविधियां मोबाइल पर मौजूद इस तरह के गेम की वजह से संदिग्ध लग रही हैं, तो तुरंत साइबर विशेषज्ञ से सलाह ले सकते हैं. फोन पर भी आप साइबर सैल की टीम से संपर्क कर सकते हैं. इस के लिए गूगल एरिया के साइबर सैल औफिस के बारे में जानकारी लें. वहां साइबर सैल विशेषज्ञ के नंबर भी मिल जाएंगे.

ध्यान दें परिजन

– परिजन बच्चों को समय दें और उन से भावनात्मक रूप से मजबूत रिश्ता बनाएं.

– बच्चे की मांग अनसुनी करने से पहले उस की वजह जानें.

– बच्चों के दोस्तों से भी मिलें ताकि बच्चे की परेशानी की जानकारी हो सके.

– बच्चों को अच्छे व बुरे का ज्ञान कराएं.

– बच्चों को व्यायाम के लिए भी उकसाएं.

– बच्चों से अपनी अपेक्षाएं पूरी करने के बजाय उन की काबिलीयत के आधार पर उन से उम्मीद रखें.

नशाखोरी : हुक्का बार बन गए नशे के अड्डे

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के रहने वाले एक रिटायर्ड पुलिस अफसर को जब पता चला कि 2 महीने से उन के बेटे की ट्यूशन फीस नहीं गई है, तो वे चौंक गए. इस की वजह यह थी कि वे बेटे को समय पर ही फीस दे दिया करते थे. ट्यूटर ने उन्हें यह भी बताया कि उन का बेटा अकसर ट्यूशन पढ़ने नहीं आता है, तो वे समझ गए कि कोई गड़बड़ जरूर है. उन्होंने इस बारे में बेटे से पूछने के बजाय उस की निगरानी शुरू कर दी. दरअसल, वे बेटे की उस हकीकत से रूबरू होना चाहते थे, जो उन से छिपाई जा रही थी. बहुत जल्द ही यह साफ हो गया कि बेटा दोस्तों के साथ घूमता है. बेटे की हरकतों पर उन का शक गहरा गया. एक दिन जब वह घर से निकला, तो उन्होंने उस की तलाश शुरू कर दी. जब वह ट्यूशन सैंटर पर नहीं मिला, तो वे आरडीसी में बने एक साइबर कैफे व हुक्का बार में पहुंच गए.

वहां के नजारे ने उन्हें चौंका दिया. कंप्यूटर तो वहां नाममात्र के ही लगे थे, पर हकीकत में तो बालिग और नाबालिग लड़कों की हुक्का महफिल सज रही थी. उन का बेटा भी वहां मौजूद था. वहां लड़कों को शराब व बीयर भी परोसी जा रही थी. उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दी, तो वहां रेड हो गई. इस के साथ ही हुक्का बार की इस हकीकत ने पुलिस के भी होश उड़ा दिए. दरअसल, उस पौश इलाके में काफी दिनों से हुक्का बार की आड़ में छात्रों को नशा परोसने का काम धड़ल्ले से चल रहा था. सुबह के साढ़े 6 बजे से ले कर रात के 10 बजे तक यह बार खुलता था. छात्र कभी स्कूल, तो कभी ट्यूशन के बहाने वहां पहुंच जाते थे. आलम यह था कि छात्रों की वहां भीड़ लगी रहती थी. इस धंधे ने संचालकों को जल्द ही अमीर भी बना दिया था. वे रोजाना 5 हजार से 15 हजार रुपए कमाते थे. उस रिटायर्ड पुलिस अफसर का बेटा भी ट्यूशन की फीस वहां उड़ा रहा था. उस के जैसे दर्जनों छात्र इस लत का शिकार हो रहे थे.

पुलिस ने नशीली चीजों को जब्त करने के साथ ही उस के संचालक अनुराग सिन्हा और वहां पर काम कर रहे दूसरे मुलाजिमों रवि, शिवम व दीपक को गिरफ्तार कर लिया. यह वाकिआ 21 जुलाई, 2016 का है. गाजियाबाद की यह हकीकत चौंकाने वाली जरूर है, लेकिन एकलौती कतई नहीं. नौजवानों के बीच फैशन बन रहे हुक्का बार छोटेबडे़ शहरों में नशे के नए अड्डों के रूप में कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं, जो नकली चमकदमक के बीच जगमग लाइटों की रोशनी में नौजवान जिंदगी के कीमती वक्त को यों ही धुएं में उड़ा रहे हैं. मेरठ सिटी पुलिस ने भी शिकायत की बिना पर आबू लेन बाजार इलाके में एक हुक्का बार का भंडाफोड़ किया. पुलिस ने उस के मालिक तुषार व दूसरे लोगों को हिरासत में ले लिया. उस में छात्रों को हर तरह का नशा मुहैया कराया जा रहा था.

पुलिस को यहां ड्रग्स और शराब के साथ कई तरह के नशे का दूसरा सामान मिला. पुलिस को नशे का मैन्यू कार्ड भी मिला. हुक्का मैन्यू में 30 तरह के फ्लैवरों का जिक्र था, जिन की कीमत सौ रुपए से ले कर 6 सौ रुपए तक होती थी. पिछले दिनों राजस्थान की अजमेर पुलिस ने भी ऐसे हुक्का बार का भंडाफोड़ किया था, जो आलीशान जगह पर बनाया गया था. पुलिस ने इस के संचालकों समेत 16 लड़कों को हिरासत में ले लिया. उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून पुलिस ने भी छापामारी में हुक्का बार के नाम पर होने वाले नशे का खेल उजागर किया था. कुछ ही सालों में हुक्का पीना नौजवानों के बीच फैशन बनना शुरू हुआ, तो कुछ ने इसे भुनाना शुरू कर दिया. बात सिर्फ फैशन तक ही नहीं सिमटी रही, उस से भी काफी आगे निकल गई.

हुक्का बार अब नशे के नए अड्डे बन गए हैं, जो किशोर बच्चों को अपनी तरफ खींचने लगे हैं. इस के लिए कोई अलग से लाइसैंस नहीं होता, बल्कि ये हर्बल हुक्का बार, कैफे, रैस्टोरैंट, लौज और होटल की आड़ में चलाए जाते हैं. हुक्का पीना कोई अपराध नहीं है. उसे परोसा जा सकता है. लेकिन उस की आड़ में नशा परोसना अपराध है. यह बात अलग है कि कई जगहों पर हुक्का बार उन के संचालकों के अलावा ड्रग माफिया की कमाई का भी बड़ा जरीया बन गए हैं. नशे के सौदागरों के निशाने पर नई उम्र के छात्र होते हैं. यही  वजह है कि वे उन्हें अपने यहां बैठने की आजादी देते हैं. 25 जुलाई, 2016 को देहरादून शहर की पुलिस ने निरंजनपुर में बने एक ब्लैक हैड हुक्का बार में रेड की, तो चौंक गई. वहां पुलिस को15 लड़के लड़कियां नशा करते मिले थे. इन में 2 नाबालिग थे. नशा बांटने वाले बार संचालकों को जेल भेज दिया गया.

कई बार खुद को बड़ा दिखाने की ललक और धुएं के छल्ले उड़ाने की चाहत हुक्का बार तक ले जाती है. दोस्तों को देख कर भी नौजवान इस तरफ खिंच जाते हैं. हुक्का बार में अलगअलग फ्लैवर के हुक्के का स्वाद चखाया जाता है. ऐसी जगहों पर कई तरह के कश होते हैं, जिन्हें हुक्के के पाइप के जरीए मुंह से खींच कर धुआं निकाला जाता है.

इस के एक दर्जन से ज्यादा फ्लैवर टिकिया के रूप में होते हैं, जिन्हें चिलम के बीच रखा जाता है. जैसा फ्लैवर वैसी कीमत. इन में रोज, औरेंज, मिंट, कीवी, पान, स्ट्रौबेरी, स्वीट-16 वगैरह फ्लैवर होते हैं. इन्हीं में तंबाकू व कैमिकल के जरीए नशा मिलाया जाता है. मसलन, हुक्का फ्लैवर सौ रुपए से ले कर 5-6 सौ रुपए तक होते हैं. इन में अगर चरस या गांजा मिलाया जाता है, तो कीमत बढ़ा दी जाती है. नशे के धंधेबाज नशे के सुरूर के किस्से सुना कर भी नौजवानों पर असर डालते हैं. होंठों की गोलाइयों से छल्ले निकालते नौजवानों के फोटो दीवारों पर टांगते हैं. ऐसी जगहों पर चरस, स्मैक, गांजा, शराब, बीयर सबकुछ परोसा जाता है. इस के लिए कीमत थोड़ा ज्यादा चुकानी पड़ती है. ऐसा भी नहीं है कि पुलिस को अपने इलाके में चलने वाले ऐसे नशे के अड्डों की भनक नहीं होती, बल्कि उस की भी गुपचुप रजामंदी होती है. इस के बदले हुक्का संचालक इलाकाई पुलिस को खुश करने के हथकंडे अपनाते हैं. हुक्का बार में कुछ कश मशहूर होते हैं, जिन में ब्रेन फ्रैशर, सिल्वर फोक व ब्रेन फ्रीजर पान का कश भी है. इस कश को लेने वाले का कुछ पलों के लिए दिमाग सुन्न हो जाता है. मिश्री के दानों के समान बार्बी ट्यूरेट ड्रग महंगी और मशहूर है. इस को सिल्वर पेपर पर रख कर नीचे माचिस जला कर सूंघा जाता है या फिर सीधे किसी चीज के साथ खा लिया जाता है.

डाक्टरों की राय में ऐसे ड्रग कब जानलेवा साबित हो जाएं, इस बारे में कोई नहीं जानता. इस का असर सीधे दिमाग पर होता है, जिस से बेहोशी के साथसाथ मौत भी हो सकती है. धुएं के छल्ले उड़ाने वालों में लड़के ही नहीं, लड़कियां भी शामिल होती हैं. देखादेखी व खुद को नए जमाने का हिस्सा बनाने के लिए वे नशे के अड्डों पर पहुंच जाती हैं. नशा बरबादी का दूसरा नाम है. छात्र नासमझी में धीरेधीरे नशे के आदी हो कर जिंदगी को बरबादी की तरफ ले जाते हैं. हुक्का बार संचालकों की इस में मोटी कमाई होती है. कंप्यूटर व साइबर कैफे की आड़ में भी लोग हुक्का बार चलाते हैं. इन लोगों का मकसद नौजवान पीढ़ी को नशे की लत लगाना होता है. वे इस फार्मूले के कायल होते हैं कि नौजवान जितने ज्यादा नशे के आदी होंगे, उन का उतना ही मुनाफा होगा. कई बार संचालक मोटी फीस वसूल कर बड़ी पार्टियां भी कराते हैं, जिन में कोकीन जैसा खतरनाक नशा भी परोसा जाता है. करोड़ों रुपए की नशे की खेप ऐसी जगहों पर खपा दी जाती हैं. पढ़नेलिखने की उम्र में जिस तरह हुक्का बार की आड़ में छात्रों को नशे की लत लगाई जा रही है, चिंताजनक है. नौजवानों को भी समझना चाहिए कि फैशन या शौक में किया गया कोई भी नशा उन्हें उस का आदी बनाने के साथसाथ उन के भविष्य को भी अंधेरे से भर सकता है.

कम उम्र में शादी, जिंदगी की बरबादी

शादी करने का चलन तो बहुत पुराने जमाने से चला आ रहा है. लेकिन आज भी कई राज्यों में बालविवाह व कम उम्र की शादियों का चलन है. कई लोगों का यह मानना है कि बच्चे ऊपर वाले का रूप होते हैं और वे बालविवाह को इसलिए बढ़ावा देते हैं कि बच्चों की शादी कराना ऊपर वाले की शादी कराने जैसा है. पंडेपुजारी भी बालविवाह को ज्यादा अहमियत देते हैं. वे ऐसी शादियों को ले कर तेजी दिखाते हैं. गांवसमाज में बालविवाह के लिए पंडेपुजारी भी ज्यादा जिम्मेदार होते हैं, क्योंकि पहले तो वे धार्मिक प्रथाओं से लोगों को ऐसी शादियों के लिए उकसाते हैं और जब शादी तय हो जाती है, तब रीतिरिवाजों के नाम पर ढेर सारी दानदक्षिणा भी वसूल करते हैं.

लेकिन ऐसी शादियों को ले कर ज्यादातर लोग यह भूल जाते हैं कि वे जिन बच्चों की शादियां करा रहे हैं,  उन की जिंदगी पर कितना बुरा असर  पड़ेगा. अकसर लड़कियां 12 साल की उम्र के बाद से ही अंडाणु बनाने शुरू कर देती हैं और उन की शारीरिक बनावट में भी कई बदलाव आने शुरू हो जाते हैं. पर यह कोई जरूरी नहीं है कि इसी उम्र में उन की शादी कर दी जाए. अगर लड़कियों की शादी इसी उम्र में होती है, तो उन्हें कई परेशानियों से दोचार होना पड़ सकता है. इस उम्र में वे जो अंडाणु पैदा करती हैं, वे पूरी तरह से पुष्ट व विकसित नहीं होते. अगर वे बच्चा पैदा करने की ताकत भी रखती हैं, तो वह बच्चा कमजोर भी हो सकता है. ऐसे में उस में कई जिस्मानी व दिमागी कमजोरियां भी आ सकती हैं, क्योंकि इस उम्र में लड़कियां खुद ही अपने जिस्मानी बदलावों से गुजर रही होती हैं. झारखंड के गिरिडीह जिले की रीना महज 15 साल की उम्र में ही मां बन गई थी, क्योंकि उस की शादी 14 साल की उम्र में हो गई थी.

रीना को बचपन से ही पढ़नेलिखने का शौक था, पर शादी हो जाने के बाद उस की वह इच्छा भी जाती रही. अब तो वह कई जिस्मानी व दिमागी बदलावों के चलते खुद को काफी बीमार महसूस करती है. बिहार के गया जिले के कमरू तूरी की उम्र महज 18 साल है, लेकिन वह 2 बच्चों का पिता है. उस की शादी 15 साल की उम्र में हो गई थी. उस की पत्नी की उम्र महज 16 साल है. अब कमरू हमेशा अपने बीवीबच्चों के लिए मजदूरी करता है. जिस उम्र में उसे पढ़नेलिखने व कुछ करगुजरना था, उस उम्र में उस के ऊपर बीवीबच्चों की जिम्मेदारी आ पड़ी थी  कमरू और रीना की तरह ऐसे कई नाबालिग जोड़े हैं, जो ऐसी परेशानियों का बोझ उठा रहे हैं. बिहार के कटिहार जिले के कविता व प्रकाश ने भी अपने घर वालों की मरजी के खिलाफ शादी की थी. दरअसल, उस वक्त वे दोनों नाबालिग थे, इसलिए घर से भाग कर उन्होंने शादी करने का फैसला किया था.

शादी के बाद भी जब प्रकाश व कविता के घर वाले राजी नहीं हुए, तो वे दोनों रांची श?हर में आ कर रहने लगे. इस बीच कविता जुड़वां बच्चों की मां बन गई थी, इसलिए अब वे दोनों मेहनतमजदूरी करने को मजबूर हैं. झारखंड के सोमलाल मुर्मू व मीना की भी शादी तकरीबन 14 साल की उम्र में हो गई थी. शादी के एक साल बाद ही मीना मां बन गई थी. लेकिन उस का बच्चा बेहद कमजोर था. तमाम इलाज के बाद भी बच्चे को बचाया नहीं जा सका. 2 साल बाद मीना जब दोबारा मां बनी, तो उस की कमजोर बच्चेदानी की वजह से वह अकसर बीमार रहने लगी. वैसे, सरकार ने लड़की की उम्र 18 साल और लड़के की 21 साल से कम उम्र वाली शादियों पर रोक लगा रखी है. लेकिन क्या सरकार इस पहलू पर ठोस कदम उठा पाई है? देखा जाए, तो शहरों के बजाय गांवदेहातों में ऐसी शादियां अकसर देखी जाती हैं. शहर के लोग जहां ऐसी शादियों से बचते हैं, वहीं गांवदेहात के लोगों का मानना है कि लड़के व लड़कियां नासमझी की वजह से  गलत कदम उठा लेते हैं, इसलिए वे उन का बालिग होने का इंतजार नहीं करते.

कुछ नाबालिग जोड़े तो 16 साल की उम्र से ही सारी सीमाएं लांघ रहे हैं. उन में जवानी भी उफान मारने लगती है. अब 18 साल की उम्र की लड़कियों को बालिग मानना सरकार के लिए बड़ी चुनौती हो सकती है, क्योंकि ऐसी कई नाबालिग लड़कियां आप के शहर के पार्कों, सिनेमाघरों, रैस्टोरैंटों और बड़े होटलों के बंद कमरों में सबकुछ करते हुए मिल सकती हैं. इस नए दौर में लड़केलड़कियों में कई बदलाव आने शुरू हो गए हैं. इन बदलावों से कई लोगों की सोच बदल सकती है और वे सरकार का कानून तोड़ कर नाबालिग शादियों पर मुहर लगा सकते हैं. पर ये शादियां कितनी कारगर होंगी, यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा.

शर्मनाक : दलित घोड़ी नहीं चढ़ेगा

Scoiety News in Hindi: राजस्थान सरकार(Rajasthan Goverment) के गृह मंत्री (Home Minister) गुलाबचंद कटारिया (Gulabchand Katariya) ने विधानसभा में बताया कि प्रदेश में पिछले 3 साल में दलित (Schedule Cast) दूल्हों को घोड़ी पर चढ़ने से रोकने के 38 मामलों में मुकदमे दर्ज हुए हैं. सालभर पहले मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के रतलाम से आई एक तसवीर ने भी लोगों को चौंका दिया था. वहां एक दलित दूल्हे को हैलमैट पहन कर घोड़ी पर चढ़ना पड़ा, क्योंकि गांव के ऊंची जाति के लोग नहीं चाहते थे कि वह घोड़ी पर चढ़े. पहले तो उस दलित की घोड़ी छीन ली गई और फिर पत्थर फेंके गए. पत्थरों से दूल्हे को बचाने के लिए जब पुलिस ने हैलमैट का बंदोबस्त किया, तब जा कर बरात निकली.

उत्तर प्रदेश के कासगंज में पुलिस ने आधिकारिक तौर पर कह दिया था कि दलित दूल्हे का घोड़ी पर बैठना शांति के लिए खतरा है. दादरी जिले के संजरवास गांव में पिछले साल जब एक दलित दूल्हे की बरात आई तो राजपूतों ने हमला कर दिया.

इस वारदात में दूल्हे संजय समेत कई बराती और लड़की वाले जख्मी हो गए. हमला करने वालों का कहना था कि दलित दूल्हा घोड़ी पर सवार हो कर नहीं आ सकता, क्योंकि उन्हें इस का हक नहीं है.

उत्तर प्रदेश के रहने वाले संजय जाटव को कासगंज जिले में बरात निकालने की इजाजत नहीं मिली. 2 साल पहले हरियाणा के कुरुक्षेत्र में दलित समाज की एक बरात पर ऊंची जाति वालों ने यह कह कर हमला कर दिया था कि दलित दूल्हा घोड़ी की बग्गी पर सवार हो कर उन के मंदिर में नहीं आ सकता. उसे जाना है तो रविदास मंदिर में जाए. पुलिस की सिक्योरिटी के बावजूद पथराव हुआ.

शादियों के मौसम में तकरीबन हर हफ्ते देश के किसी न किसी हिस्से से ऐसी किसी घटना की खबर आ ही जाती?है. इन घटनाओं में जो एक बात हर जगह समान होती है, वह यह है कि दूल्हा दलित होता है, वह घोड़ी पर सवार होता है और हमलावर ऊंची जाति के लोग होते हैं.

इन घटनाओं के 2 मतलब हैं. एक, दलित समुदाय के लोग पहले घुड़चढ़ी की रस्म नहीं करते थे. न सिर्फ ऊंची जाति वाले बल्कि दलित भी मानते थे कि घुड़चढ़ी अगड़ों की रस्म है, लेकिन अब दलित इस फर्क को नहीं मान रहे हैं. दलित दूल्हे भी घोड़ी पर सवार होने लगे हैं.

यह अपने से ऊपर वाली जाति के जैसा बनने या दिखने की कोशिश है. इसे लोकतंत्र का भी असर कहा जा सकता है, जिस ने दलितों में भी बराबरी का भाव और आत्मसम्मान पैदा कर दिया है. यह पिछड़ी जातियों से चल कर दलितों तक पहुंचा है. दूसरा, ऊंची मानी गई जातियां इसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रही हैं. उन के हिसाब से दूल्हे का घोड़ी पर सवार होना ऊंची जाति वालों का ही हक है और इसे कोई और नहीं ले सकता.

लिहाजा, वे इस बदलाव को रोकने की तमाम कोशिशें कर रहे हैं. हिंसा उन में से एक तरीका है और इस के लिए वे गिरफ्तार होने और जेल जाने तक के लिए भी तैयार हैं. देश में लोकतंत्र होने के बावजूद ऊंची जाति वालों में यह जागरूकता नहीं आ रही है कि सभी नागरिक बराबर हैं.

कई साल पहले पिछड़ी जातियों के लोगों ने जब बिहार में जनेऊ पहनने की मुहिम चलाई थी, तो ऐसी ही हिंसक वारदातें हुई थीं और कई लोग मारे गए थे. दलितों के मंदिर में घुसने की कोशिश अब भी कई जगहों पर हिंसक वारदातों को जन्म देती है.

इसी का एक रूप 3 साल पहले उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में देखने को मिला था. वहां के रेहुआ लालगंज गांव के राजू और ब्रजेश सरोज ने जब आईआईटी का ऐंट्रैंस इम्तिहान पास कर लिया, तो गांव के ऊंची जाति वालों ने उन के घर पर पत्थरबाजी की.

यह तब हुआ जबकि इन भाइयों के आईआईटी ऐंट्रैंस इम्तिहान पास करने का देशभर में स्वागत हुआ था और तब के मानव संसाधन विकास मंत्री ने इन की हर तरह की फीस और खर्च माफ करने का ऐलान किया था.

दलितों को इस तरह सताने के मामलों की तादाद बहुत ज्यादा है जो कहीं दर्ज नहीं होते, नैशनल लैवल पर जिन की चर्चा नहीं होती. दरअसल, एक घुड़चढ़ी पर किया गया हमला सैकड़ों दलित दूल्हों को घुड़चढ़ी से रोकता है, यानी सामाजिक बराबरी की तरफ कदम बढ़ाने से रोकता है.

गांवों का समाज अभी भी वैसा ही है और दलित कई जगहों पर मालीतौर पर ऊंची जाति वालों पर निर्भर हैं इसलिए वे खुद भी ऐसा कुछ करने से बचते हैं, जिस से ऊंची जाति वाले नाराज हों.

इन मामलों को अब तक दलितों को सताने के तौर पर देखा गया है, पर अब जरूरत इस बात की भी है कि इन को ‘सवर्णों की समस्या’ की तरह देखा जाए. कोई बीमार समाज ही किसी दूल्हे के घोड़ी पर चढ़ने या किसी के आईआईटी पास करने पर पत्थर फेंक सकता है.

दुनिया में किसी भी देश में इसे मामूली नहीं माना जाएगा. 21वीं सदी में तो इसे किसी भी हालत में आम घटना के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए.

हावी है पिछड़ापन

यह समझने की कोशिश की जाए कि आधुनिकता और लोकतंत्र के इतने सालों के अनुभव के बाद भी कुछ समुदाय सभ्य क्यों नहीं बन पाए हैं? ऐसी कौन सी चीज है, जिस की वजह से ऊंची जाति वाले यह मानने को तैयार नहीं हैं कि वे भी बाकी लोगों की तरह इनसान हैं और उन्हें कोई जन्मजात खास हक हासिल नहीं हैं और न ही कुछ लोग सिर्फ जन्म की वजह से उन से नीचे हैं.

अगर पुराने दौर में ऊंची जाति वालों को कुछ खास हक हासिल थे भी तो लोकतंत्र में उन्हें यह सुविधा हासिल नहीं है. इसे भारतीय आधुनिकता की समस्या के तौर पर भी देखा जाना चाहिए. यूरोप और अमेरिका में परंपरा की कब्र पर आधुनिकता का विकास हुआ है. जोकुछ सामंती या छोड़ देने लायक था, उसे खारिज करने की कोशिश की गई. चर्च और पादरियों को पीछे हटना पड़ा, तब जा कर बर्बर यूरोप बदला और वहां वैज्ञानिक और औद्योगिक क्रांति हुई.

यूरोप से सीखी हुई आधुनिकता और भारतीय परंपरा के नाम पर जारी नाइंसाफी भारत में गलबहियां कर गईं. जिंदगी जीने का ढर्रा नहीं बदला. यही वजह है कि उपग्रह भेजने की कामयाबी के लिए मंदिर में पूजा को आम बात माना जाता है.

जातिवाद एक बड़ी समस्या का ही हिस्सा है, जहां वैज्ञानिक जागरूकता और लोकतांत्रिक सोच से टकराव हर लैवल पर दिखाई देता है. मसलन, क्या यह धार्मिक मामला है कि दिल्ली में अरबिंदो मार्ग पर आईआईटी के गेट पर शनि मंदिर बनाया गया है जहां टीचर और स्टूडैंट सरसों का तेल चढ़ाते हैं? भारतीय समाज कई मामलों में एक भैंसागाड़ी की तरह है, जिस में इंजन लगा दिया गया हो.

भारत में लोकतंत्र जैसी आधुनिक शासन प्रणाली को तो अपना लिया गया, लेकिन समाज में गोलबंदी का आधार धर्म और जाति बने रहे. संविधान सभा में बाबा साहब अंबेडकर ने इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए भविष्य की सब से बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किया था.

उन्होंने कहा था कि हर शख्स का एक वोट और हर वोट की एक कीमत तो है लेकिन हर लोग समान नहीं हैं. उन्होंने उम्मीद जताई थी कि ये हालात बदलेंगे. लेकिन दलितों की घुड़चढ़ी पर पत्थर फेंकने वाले ऊंची जाति वालों ने भारत के संविधान निर्माताओं को निराश ही किया है.

गांव देहात में मुश्किल हो गया शहनाई बजवाना

Marriage is Big Issue in Village Area: शहरों में अखबारों में शादी के इश्तिहार देने, मैरिज ब्यूरो (Marriage Bureau) , मैट्रिमोनियल साइट (Matrimonial Site) और गैरबिरादरी (Intercaste) में शादीब्याह कराने के बहुत से रास्ते हैं. इन के जरीए शादी के लिए दूल्हादुलहन (Bride and Groom) की तलाश की जा सकती है, पर गांवों में अभी भी केवल परिचितों का ही सहारा है. शहरीकरण का असर बढ़ने से गांव से शहर की तरफ तो लोग जा रहे हैं. गांव के लोगों की गांव में ही शादियां न के बराबर होती हैं. इस वजह से अब गांव में शादी के रिश्ते खोजना मुश्किल होने लगा है.

रामपुर कलां गांव के रहने वाले 70 साल के बुजुर्ग प्रेमपाल कहते हैं, ‘‘समय के साथसाथ गांव की सोच बदली नहीं है, जबकि हालात बदल गए हैं.

‘‘पहले दूरदूर तक नातेरिश्तेदार शादी लायक लड़का या लड़की पर नजर रखते थे. शादी लड़के की पढ़ाईलिखाई से ज्यादा उस के घरपरिवार की हैसियत पर निर्भर करती थी. जिस की खेती अच्छी होती थी उस को ज्यादा अमीर माना जाता था. पर अब नौकरी वाले लड़कों को अहमियत मिलने लगी है.

‘‘शादी के बाद अगर किसी तरह का विवाद होता भी था तो उसे आपस में सुलझा लिया जाता था. अब ऐसे विवाद कोर्ट और पुलिस तक पहुंचने के बाद ही सुलझते हैं. ऐसे में शादी कराने वाले बिचौलिए के रिश्ते खराब होने लगे हैं. वह फालतू के विवाद में नहीं पड़ना चाहता.’’

बिचौलिया वह होता है जो यह बताता है कि शादी के लायक लड़का या लड़की किस घर में है. इस काम को करने वाले लोग हर गांवदेहात में होते थे. नातेरिश्तेदार होने के साथसाथ शादी कराने वाले पंडित तक इस में शामिल होते थे.

शादी कराने के एवज में पंडित को  दक्षिणा मिलने के साथ ही चढ़ावा भी मिलता था. बिचौलिए को किसी तरह का कोई माली फायदा नहीं होता था. शादी में मिलने वाले शगुन और सम्मान में बिचौलिए को खास अहमियत दी जाती थी. यही उस का इनाम होता था.

इन की बढ़ी जिम्मेदारी

अब शादी के लिए रिश्तों की तलाश करने का काम घरपरिवार के लोगों के ही जिम्मे बचा है. अपनी लड़की के लिए दामाद की तलाश कर रहे देव कुमार बताते हैं, ‘‘हम गांव के लोग आपसी जानपहचान के बल पर ही रिश्तों को तलाशने का काम करते हैं. एक शादी करने के लिए कईकई रिश्तों को देखनासमझना पड़ता है. हम अच्छा पढ़ालिखा नौकरी वाला दामाद खोजने की कोशिश करते हैं.

‘‘पहले जहां गांव की खेती, घर और जमीन ही अच्छे रिश्ते का पैमाना होती थी वहीं अब लड़के की नौकरी पहली प्राथमिकता हो गई है. केवल सवर्णों की ही बात नहीं है, बल्कि दलितों और पिछड़ों में भी ऐसे लड़कों को अहमियत दी जाती है जो कामधंधा करते हों.’’

समाजसेवी दिनेश लाल मानते हैं कि आज के समय में गांवों में शादी के लिए रिश्तों को खोजना मुश्किल काम हो गया है. वजह यह है कि रिश्ता खोजने के जितने तरीके शहरों में हैं उतने गांव में नहीं हैं. इस के लिए गांव के लोगों की सोच में बदलाव लाना पड़ेगा. जातिवाद और ऊंचनीच का भेदभाव खत्म करना होगा.

गांव को ले कर लड़कियों की एक यह भी सोच होती है कि गांव में रहने वाले लड़के गालीगलौज, मारपीट और नशा करते हैं, इस वजह से इन से दूर रहो. गांव में कमाई का अहम जरीया खेतीबारी थी, पर अब वह मुनाफे की नहीं रही. गांव के लोग जमीनें बेच कर शहर या कसबों में बसने लगे हैं. ऐसे में गांवदेहात में अच्छे रिश्ते मिलने के मौके कम होते जा रहे हैं.

तरक्की में रुकावट

बहुत से गांव अभी भी ऐसे हैं जहां सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवाओं की पूरी तरह से कमी है. इन गांवों के लोग साफतौर पर कहते हैं कि इन वजहों से गांव में शादी करने वाले लोगों की तादाद लगातार घटती जा रही है. शादी अगर हो भी जाती है तो बाद में विवाद होते हैं.

शादी के बाद होने वाले झगड़ों की वजह से शादी का रिश्ता बताने वाले कम होते जा रहे हैं. लोग शादी के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहते हैं. गांव में तरक्की अगर होती भी है तो सड़क तक दिखती है. सड़क से नीचे उतरते ही उस की पोल खुल जाती है.

जरूरत इस बात की है कि गांव में उद्योगधंधे लगें, जिस से वहां पैसे का आना बढ़ सके, सुविधाएं आ सकें तभी वहां की सोच और हालात बदल सकते हैं. तमाम कोशिशों के बाद भी अभी गांव में शौचालय नहीं बन सके हैं. जहां ये बने भी हैं, वहां उन का इस्तेमाल नहीं होता है.

गांवदेहात के आसपास अभी भी अच्छे डाक्टर नहीं हैं. ऐेसे में झोलाछाप डाक्टर ही वहां इलाज करते हैं. बच्चों की पढ़ाई के लिए अच्छे स्कूलों की भी कमी है. बाजारों में शहरों जैसी चकाचौंध नहीं है. ऐसे में यहां खरीदारी करना भी अच्छा नहीं लगता. इन सब के बीच एक खास वजह यह भी है कि औरतों का सम्मान भी यहां नहीं है. पहले आपसी रिश्तों में औरतों का सम्मान बहुत होता था, पर अब इस में कमी आती जा रही है.

जातिगोत्र की परेशानी

गांव के परिवार अभी भी जातिगोत्र की ऊंचनीच में फंसे हैं. गैरबिरादरी में शादी तो बड़ी दूर की बात है. अपनी ही जाति में काबिल लड़कों की तादाद सब से कम मिलती है. अगर मिलती भी है तो वहां दहेज ज्यादा देना पड़ता है. अब दहेज की मांग इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि काबिल लड़कों की तादाद बहुत कम है. उन के लिए शादी के औफर ज्यादा हैं.

जब बात अपनी जाति की आती है तो यह परेशानी और भी बढ़ जाती है. अपनी ही जाति में मनपसंद लड़के बहुत कम मिलते हैं. काबिलीयत के पैमाने के बाद पर्सनैलिटी के हिसाब से देखें तो भी गांव के लड़के लड़कियों से कमतर दिखते हैं.

गांव के लोगों में गैरबिरादरी में शादी करने का रिवाज नहीं है पर अगर इस चक्कर में शादी की उम्र निकलने लगती है तो बहुत से लोग दूरदराज से शादी कर के लड़की ले आते हैं, जिन की जाति के बारे में किसी को कुछ पता नहीं होता है. धीरेधीरे उन लड़कियों को सामाजिक मंजूरी भी मिल जाती है.

हरियाणा और पंजाब में ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं, जहां बिहार, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और नेपाल की रहने वाली लड़कियां आ जाती हैं. कई लोग तो खरीद कर ऐसी लड़कियों को लाते हैं. इन प्रदेशों में गरीबी ज्यादा है. परिवार में लड़कियों की तादाद ज्यादा होती है. बहुत सारे दलाल शादियां कराने का ठेका लेते हैं.

सावधान! औरत तांत्रिकों का बढ़ता नैटवर्क

भूतप्रेत, टोनाटोटका व पेट से न होने के नाम पर झाड़फूंक की दुकान चलाने वाले ठग तांत्रिकों के निशाने पर ज्यादातर औरतें ही रही हैं, क्योंकि उन को तमाम ऐसी अंदरूनी व दिमागी बीमारियां होती हैं, जिन को ठग तांत्रिक ऊपरी साया बता कर आसानी से बेवकूफ बना देते हैं.

इन पाखंडी तांत्रिकों के जाल में फंस कर औरतें न केवल खुद की सेहत के साथ खिलवाड़ करती हैं, बल्कि अपना पैसा, समय और इज्जत भी गंवा बैठती हैं. कभीकभी ऐसी औरतों के साथ हमबिस्तरी का वीडियो बना कर शातिर तांत्रिक उन्हें ब्लैकमेल भी करते हैं.

झाड़फूंक के नाम पर बाबाओं के पास जाने वाली औरतों में ज्यादातर दलित व पिछड़े तबके की औरतें होती हैं, जिन के मन में बचपन से ही यह भर दिया जाता है कि इन की हर समस्या की वजह ऊपरी साया व टोनाटोटका ही है. ऐसे में ढोंगी तांत्रिकों द्वारा खास तरह की पूजा का ढोंग किया जाता है. इस दौरान ये बाबा औरतों की इज्जत लूटने में कोई गुरेज नहीं करते हैं.

ढोंगी बाबाओं द्वारा इज्जत के साथ खिलवाड़ किए जाने के मामलों में औरतें इसलिए विरोध नहीं कर पाती हैं, क्योंकि उन्हें यह भरोसा होता है कि हो सकता है कि बाबा के साथ हमबिस्तरी से ही उन की गोद भर जाए.

किसीकिसी मामले में लोकलाज के डर से भी औरतें अपने साथ हुई ज्यादती की बात छिपा जाती हैं, लेकिन झाड़फूंक के नाम पर कई औरतों के साथ सैक्स करने की वजह से इन बाबाओं को भी इन्फैक्शन व एड्स जैसी बीमारियां लग जाती हैं, जो औरतों में भी आ जाती हैं.

चूंकि अब झाड़फूंक के नाम पर पाखंडी तांत्रिकों द्वारा औरतों के साथ हमबिस्तरी के कई मामले सामने आ रहे हैं, ऐसे में मर्द अपने घर की औरतों को उन के पास ले जाने में कतराने लगे हैं.

औरतों की तादाद में आई कमी को देखते हुए बाबा भी अपने इस धंधे को चलाने के लिए दूसरा जरीया ढूंढ़ने लगे हैं. वे औरतों को विश्वास में लेने के लिए अपने घर की औरतों या चेलियों को आगे कर उन्हें बड़ा तांत्रिक साबित कर रहे हैं, ताकि धंधा चलता रहे.

औरत तांत्रिकों की तादाद व उन की कमाई में इजाफे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के नामीगिरामी टैलीविजन चैनलों, अखबारों व पत्रपत्रिकाओं में महंगेमहंगे इश्तिहार छपवा कर बड़ी से बड़ी समस्याओं के समाधान का दावा किया जा रहा है.

आसानी से झांसे में

 औरत तांत्रिकों द्वारा पीडि़त औरतों को आसानी से झांसे में ले लिया जाता है, क्योंकि ये तांत्रिक उन से जुड़ी अंदरूनी व घरेलू समस्याओं को आसानी से समझती हैं. यहां तक कि हमबिस्तरी की बातों को भी उगलवाने में वे कामयाब होती हैं. इस के बाद झाड़फूंक के नाम पर पीडि़त औरतों का जिस्मानी, माली व दिमागी शोषण शुरू हो जाता है.

मर्द तांत्रिकों की चाल

झाड़फूंक के नाम पर ठगी की दुकान चलाने वाली औरत तांत्रिकों के पीछे शातिर किस्म के मर्दों का हाथ होता है. ऐसे में जब कोई पीडि़त औरत पेट से न होने की समस्या ले कर इन तांत्रिकों के पास पहुंचती है, तो ये उन के ऊपर दुष्ट आत्मा का साया बता कर उसे नष्ट करने के लिए विशेष पूजा, अनुष्ठान वगैरह कराने की सलाह देती हैं.

अंधविश्वास में जकड़ी औरतें बच्चा पाने की चाह में इन तांत्रिकों पर आसानी से आंखें मूंद कर विश्वास कर लेती हैं और फिर तय समय पर ये तांत्रिक अकेले में अनुष्ठान के नाम पर उन्हें बुलाते हैं.

पेट से होने के लालच में औरत के परिवार वाले भी उसे पूजा के नाम पर अकेला छोड़ देते हैं. इस की वजह यह भी होती है कि झाड़फूंक करने वाली एक औरत होती है, जिस से इज्जत लुटने का खतरा नहीं हो सकता, लेकिन ये औरत तांत्रिक ऐसे अनुष्ठान उन कमरों में करती हैं, जहां घुप अंधेरा होता है.

झाड़फूंक के दौरान पीडि़ता को नशीली दवा मिला कर प्रसाद दे दिया जाता है, जिस से वह अपनी सुधबुध खो बैठती है. इस के बाद हवस के भूखे औरत तांत्रिक के गुरु व परिवार के मर्द उस की इज्जत लूट लेते हैं.

अगर इज्जत लूटने वाले के वीर्य में बच्चा पैदा करने की कूवत होती है, तो वह पीडि़ता पेट से हो जाती है. चूंकि झाड़फूंक के दौरान वह अपने होश में नहीं होती है, ऐसे में उसे यह नहीं पता चल पाता कि उस के पेट से होने का राज क्या है और वह तांत्रिक की चमत्कारी शक्तियों का असर मान कर उस की मुरीद बन बैठती है.

कभी कभार अगर बाबाओं द्वारा इज्जत से खिलवाड़ के मामले में पीडि़ता होश में आ भी जाती है, तो वह इस वजह से खुल कर विरोध नहीं कर पाती कि हो सकता है कि उसे बाबा की वजह से ही बच्चे का सुख मिल जाए और उसे बांझपन के ताने से नजात मिल जाए.

इश्तिहारों पर बेहिसाब खर्च

 झाड़फूंक से होने वाली मोटी कमाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि औरत तांत्रिकों के बड़ेबड़े इश्तिहार टैलीविजन चैनलों, अखबारों व पत्रपत्रिकाओं में दिखाए व छापे जाते हैं, जिस के लिए औरत तांत्रिकों द्वारा भारीभरकम रकम का भुगतान किया जाता है, जो झाड़फूंक के दौरान कई गुना के रूप में वापस आ जाती है.

देश की नामीगिरामी पत्रिका में छपे एक औरत तांत्रिक के इश्तिहार का मजमून इस तरह था: ‘फ्री… फ्री… फ्री…’ समस्या कैसी भी हो, जड़ से खत्म. 5 घंटे में समस्या का समाधान. सौ फीसदी गारंटी.  गुरु मां गायत्री देवी घर बैठे गारंटी समाधान.

एक औरत ही औरत का दुख समझती है. कृपया दुखी माताएं व बहनें ही फोन करें. धोखा नहीं पक्का वादा. मैं कहती नहीं कर के दिखाती हूं केवल एक फोन ही आप के जीवन की दिशा व दशा बदल सकता है, ब्लैक मैजिक व ब्लैकमेलिंग से परेशान अवश्य फोन करें.

लव मैरिज, कारोबार, विदेश में रिश्ता करवाना, सौतन दुश्मन से छुटकारा, जिस को चाहोगे तुरंत वश में कर के दूंगी, काम नहीं होने पर पैसा वापस.

नोट: आप का पति, प्रेमी, बेटा किसी के वश में हो, प्यार में धोखा, निराश प्रेमीप्रेमिका, एक बार अवश्य फोन करें, लाटरी, सट्टा नंबर हासिल करें. स्थायी पता चंडीगढ़ मोबाइल नंबर 0988895×××.

दुख की बात है कि इस तरह के इश्तिहारों में लोग फंस कर लुटने को तैयार बैठे होते हैं.

सभी बनते हैं शिकार

इन औरत तांत्रिकों के पास पढ़ेलिखे व अनपढ़ लोग समान रूप से ठगी का शिकार बनते हैं. क्योंकि इन के मन में बचपन से ही भूतप्रेत व ऊपरी साए के प्रति इस तरह का डर बिठा दिया जाता है, जिसे वे मन से नहीं निकाल पाते हैं.

इस तरह का एक उदाहरण गोंडा व बस्ती जिले की सीमा से लगने वाले मेहदिया ढडौवा गांव में देखने को मिला, जहां दिल्ली से 8 सौ किलोमीटर की दूरी तय कर बीएड पास एक औरत ‘बड़की माई’ नाम से विख्यात किस्मती देवी नाम की अनपढ़ औरत तांत्रिक के पास झाड़फूंक कराने आई थी.

इस औरत की समस्या यह थी कि इसे शादी के 6 साल बाद भी बच्चे नहीं पैदा हो रहे थे. अंधविश्वास की शिकार इस औरत को विश्वास था कि यहां आने से उस की यह मुराद पूरी होगी.

यहां हर सोमवार व शुक्रवार को झाड़फूंक कराने के लिए ऐसे तमाम लोग आते हैं, जो पढ़ेलिखे होते हैं, लेकिन अपनी आंखों पर चढ़े अंधविश्वास के चश्मे के चलते ठगी का शिकार होते हैं.

यहां एक दिन में तकरीबन 50 हजार लोगों की भीड़ इकट्ठा होती है. ऐसे में अगर हर पीडि़ता से 10 रुपए की औसत कमाई को देखा जाए, तो भी यह हफ्ते के 2 दिनों को मिला कर 10 लाख रुपए आसानी से इकट्ठा कर लेती है.

इसी तरह की झाड़फूंक की दुकान चलाने वाली बडगो गांव की पिछड़े तबके की एक अनपढ़ औरत काली माई के नाम पर झाड़फूंक का धंधा चलाती है, जहां रोजाना हजारों की तादाद में लोग बेवकूफ बनने चले आते हैं.

महज कोरी कल्पना

बस्ती जिला चिकित्सालय में डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि भूतपे्रत, तंत्रमंत्र व ऊपरी साया महज कोरी कल्पना है. इस की वजह न तो कभी थी और न है, बल्कि सदियों से पोंगापंथ की दुकान चलाने वाले लोगों ने जनता के मन में इस तरह का वहम बिठा कर उन्हें लूटने का जरीया बनाया है.

डाक्टर वीके वर्मा के मुताबिक, बचपन में भूतप्रेतों की कहानियां, डरावनी फिल्में देखसुन कर लोग मन में यह वहम पाल बैठते हैं कि हमारे आसपास भी बुरी आत्माएं मौजूद होती हैं, जिन की जद में हम कभी न कभी आ ही जाते हैं, लेकिन यह मन का वहम  होता है, क्योंकि बुरी आत्माओं व तंत्रमंत्र का वजूद है ही नहीं.

कैटाटोनिया व साइकोसिस जैसी बीमारियों के चलते औरतें अजीबोगरीब हरकतें करना शुरू कर देती हैं, जिसे घर के लोग आत्माओं का साया मान बैठते हैं. वहीं गर्भाशय में गांठ होना, प्रजनन अंगों में संक्रमण वगैरह के चलते पेट से न होने की समस्या जन्म लेती है, जिसे पाखंडी तांत्रिक भूतप्रेत का साया साबित कर देते हैं.

वकील कृष्ण कुमार उपाध्याय का कहना है कि झाड़फूंक करने वाला चाहे औरत हो या मर्द दोनों ही जुर्म में बराबर के भागीदार होते हैं. ऐसे में लोगों को भूतप्रेत व झाड़फूंक के नाम पर उन का शोषण करना और कभीकभी समस्या के समाधान के लिए तांत्रिकों द्वारा नरबलि के लिए उकसावा देना अपराध की श्रेणी में आता है.

 

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