Social Story: करें हर काम, माहवारी है आम

Social Story: कुछ साल पहले मैं अपने परिवार के साथ जयपुर गया था. वहां टूरिस्ट बस हमें एक मंदिर तक ले गई थी. मेरे साथ वहीं का एक और परिवार भी था.

उस परिवार की एक महिला सदस्य उस मंदिर के अहाते तक तो गईं, पर जहां मूर्ति थी वहां जाने से उन्होंने मना कर दिया. मुझे लगा कि वे पहले कई बार यहां आ चुकी होंगी इसलिए नहीं जा रहीं लेकिन बाद में मेरी पत्नी ने बताया कि उन के ‘खास दिन’ चल रहे हैं इसलिए वे मंदिर में नहीं जाएंगी.

आप ‘खास दिनों’ से शायद समझ गए होंगे कि उस समय वे महिला माहवारी से गुजर रही थीं जिन्हें शारीरिक या मानसिक रूप से तो मुश्किल माना जा सकता है पर अगर उन के नाम पर उन्हें दूसरे आम काम करने से रोका जाए तो यह उन के साथ नाइंसाफी ही कही जाएगी.

क्या है माहवारी

12 से 13 साल की उम्र में अमूमन हर लड़की के शरीर में कुछ ऐसे बदलाव होते हैं जब वह बच्ची से बड़ी दिखने लगती है. इन्हीं बदलावों में से एक बदलाव माहवारी आना भी है. इस में उन्हें हर महीने 4-5 दिन के लिए अंग से खून बहता है जो तकरीबन 50 साल की उम्र तक जारी रहता है.

माहवारी एक सामान्य प्रक्रिया है, पर भारतीय समाज में फैली नासमझी के चलते जब तक महिलाएं माहवारी के चक्र में रहती हैं तब तक उन्हें बहुत से कामों से दूर रखने के कुचक्रों में उलझाए रखा जाता है. कहींकहीं तो इन दिनों के बारे में किसी को बताने से भी परहेज किया जाता है जबकि दक्षिण भारत में तो जब कोई लड़की रजस्वला हासिल करती है तो उत्सव सा मनाया जाता है. रिश्तेदारों को यह खुशखबरी दी जाती है, डंके की चोट पर.

पर हर जगह ऐसा नहीं है तभी तो जब किसी बच्ची को माहवारी आना शुरू होती है तो सब से पहले मां यही कहती सुनी जा सकती है कि बेटी, तुझे इन दिनों मंदिर या रसोईघर में नहीं जाना है. अपनों से बड़ों को खाना बना कर नहीं देना है. अचार को नहीं छूना है. खेलनाकूदना नहीं है.

कुछ घरों में तो कोई सदस्य लड़की को छू नहीं सकता और न ही वह किसी सदस्य को छू सकती है. उन्हें सोने के लिए अलग जगह व अलग बिस्तर तक ऐसे दिया जाता है, जैसे वे उन 4-5 दिनों के लिए अछूत हो गई हैं. यह सब आज 21वीं सदी में भी चालू है.

यह तो माना जा सकता है कि माहवारी के चलते लड़की या औरत के बरताव में बड़ा बदलाव आ जाता है, पर यह कोई हौआ नहीं है या कोई बीमारी भी नहीं जो उन्हें दूसरों से अलग होने का फरमान सुना दिया जाता है. यह तो कुदरत की देन है.

हां, अगर किसी को माहवारी नहीं आती है तो परेशानी की बात होती है, डाक्टर के पास जाने की नौबत आ जाती है क्योंकि अगर माहवारी नहीं आएगी तो शादी के बाद बच्चा पैदा नहीं होगा.

भारत में खासकर उत्तर भारत में माहवारी से जुड़े कई ऐसे अंधविश्वास हैं जिन्हें बिना किसी ठोस वजह के सच मान लिया जाता है. जैसे इन दिनों में उन्हें ज्यादा भागदौड़ या कसरत नहीं करनी चाहिए, जबकि यह सोच गलत है, क्योंकि बेवजह के ज्यादा आराम से शरीर में खून का दौरा अच्छे से नहीं हो पाता और दर्द भी ज्यादा महसूस होता है.

डाक्टर भी मानते हैं कि अगर माहवारी के समय महिलाएं खेलतीकूदती या कसरत करती हैं तो इस से उन के शरीर में खून और औक्सिजन का दौरा अच्छे ढंग से होता है जिस से पेट में दर्द और ऐंठन जैसी समस्याएं नहीं होती हैं.

इन दिनों में घर की बड़ी औरतें हमेशा कहती हैं कि अचार को मत छूना नहीं तो वह खराब हो जाएगा जबकि ऐसा नहीं होता है.

इस की खास वजह यह है कि और दिनों के मुकाबले ज्यादा साफसफाई रखने से माहवारी के दिनों में लड़की के शरीर या हाथों में जीवाणु, विषाणु या कीटाणु नहीं होते हैं तो अचार को छूने से वह खराब कैसे हो जाएगा? और अगर ऐसा होता तो फिर उन की छुई खाने की हर चीज ही जहर हो जानी चाहिए.

पंडितों ने जानबूझ कर औरतों को नीचा दिखाने के लिए माहवारी को पाप का नाम दे दिया और पहले लोगों को लूटने के लिए मंदिर बनवा दिया, फिर औरतों को खास दिनों में आने से बंद करवा कर ढिंढोरा पिटवा दिया कि वह गंदी है.

मतलब, हद है पोंगापंथ की. जिस मंदिर की गद्दी को पाने के लिए पंडेपुजारियों में खूनखच्चर तक हो जाता है या बेजबान पशुओं की बलि दे कर खून बहाया जाता है, वह इस खून से कैसे अपवित्र हो सकता है?

अगर हम मान लें कि कहीं भगवान है और यह दुनिया उसी ने बनाई है तो फिर उस ने ही तो औरतों को माहवारी का वरदान दिया है. फिर भगवान अपनी ही दी हुई चीज से अपवित्र कैसे हो सकता है?

इन ‘खास दिनों’ में एक बात और सुनने को मिलती है कि माहवारी में रसोईघर में जाने से वह अपवित्र हो जाता है. लेकिन यहां एक बात सोचने की है कि अगर उस परिवार में एक ही औरत या लड़की है और उसे माहवारी है तो खाना कौन बनाएगा? सारे घर को बता दिया जाता है कि वह तो इस समय गंदी है.

औरतों को चाहिए कि वे इस के खिलाफ खड़ी हों. माहवारी के दिनों को खराब न समझें. जैसे रोज शौच करने जाते हैं वैसे ही माहवारी है. घर वालों से लड़ें. पंडों से लड़ें. भगवान में विश्वास न करें, पर पंडों से कहें कि वे तो मंदिर में घुसेंगी. वहां पूजा न करें क्योंकि कोई मूर्ति इस लायक नहीं है जो औरतों को नीचा दिखाए.

माहवारी जवानी की निशानी है. इसे मस्ती से जीते हुए सिर ऊंचा कर के चलें.

Sociopolitical: अब इस देश में जवानों का बोलना मना है

Sociopolitical: ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा भारत के प्रधानमंत्री रह चुके लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था. उन्होंने माना था कि देश जवानों और किसानों से चलता है. उस के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ के साथसाथ ‘जय विज्ञान’ को भी जोड़ा यानी टैक्नोलौजी की भी बातें होने लगीं. लेकिन आज ‘जय जवान, जय किसान’ और ‘जय विज्ञान’ से जुड़े तीनों समूहों का हाल बेहाल है.

जवानों को दिमागी रूप से पंगु बना कर उन के वेतनमान में बढ़ोतरी तो की गई, लेकिन उन की हालत भी एक नए गुलामों की तरह ही है. वहीं किसानों और मजदूरों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि उन की हालत और भी खराब होती जा रही है.

हमारे देश के वैज्ञानिकों और विज्ञान के छात्रों की हालत भी कुछ खास ठीक नहीं है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में भौतिक शास्त्र व रसायन शास्त्र के बजाय ज्योतिष शास्त्र पढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.

नई आर्थिक नीति लाने वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान, जय किसान’ के सपनों को मटियामेट कर दिया.

कांग्रेस शासित नरसिंह राव व मनमोहन सिंह द्वारा नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद किसानों की जमीनें पूंजीपतियों को दी जाने लगीं. बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों पर दबाव बनाया गया कि वे नई तरह की खेती करें. इस नई खेती के चलते बहुत से किसान कर्ज के जाल में फंस कर खुदकुशी करने लगे.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 1995 से ले कर अब तक तकरीबन साढ़े 3 लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं, जबकि गैरसरकारी आंकड़े इस से भी ज्यादा हैं. सरकारी नीतियों ने इन किसानों को ‘जय किसान’ की जगह ‘मर किसान’ बना दिया.

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद किसानों की हालत सुधरी नहीं, बल्कि बदतर ही हुई और उन्हीं के शासन में जवानों के शव उठाने वाले ताबूत का घोटाला हो गया.

‘जय विज्ञान’ का नारा देने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने श्रम कानूनों में संशोधन किया और ठेकेदारी प्रथा को लागू किया. मजदूरों को न्यूनतम वेतन से भी आधे पैसों पर काम करना पड़ रहा है और उन की मेहनत की कमाई लूट बन कर ठेकेदारों को मालामाल कर रही है. हालत यह हो गई कि सभी सरकारी दफ्तरों में फोर्थ क्लास के कर्मचारी ठेके पर रखे जाने लगे. यहां तक कि डाक्टर और मास्टर भी ठेकेदारी प्रथा के शिकार हो गए. यही हालत ‘श्रमेव जयते’ की भी है.

मोदी सरकार के आने के बाद देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि जवान ही ‘देशभक्त’ हैं और उन्हीं की बदौलत हम सुरक्षित और जिंदा हैं. आप उन पर कोई सवाल नहीं उठा सकते, क्योंकि इस से उन का मनोबल गिरता है. वहां कोई भ्रष्टाचार नहीं है, जाति और धर्म का भेदभाव नहीं है. नतीजतन, ड्यूटी के बाद बैंक या एटीएम की लाइन में अपनी तकलीफ जाहिर करने पर भी किसी शख्स को ड्यूटी पर तैनात जवानों के साथ जोड़ कर देशभक्ति का पाठ पढ़ाते कुछ सिरफिरे मिल जाते हैं. झूठी देशभक्ति के जज्बे दिखा कर सही सवालों को हमेशा छिपाया गया है.

ऐसा नहीं है कि तेज बहादुर यादव का वीडियो वायरल होने से पहले मंत्रियों, अफसरों, मीडिया वालों को इस तरह के गलत बरताव का पता नहीं था. इस वीडियो के आने से पहले भी जवानों की खुदकुशी, डिप्रैशन, अफसरों के बुरे बरताव, छुट्टियां नहीं मिलने व अपने साथियों पर गोली चलाने की खबरें कई बार आ चुकी हैं. यहां तक कि वीके सिंह ने भी माना है कि सेना का जनरल रहते हुए रक्षा सौदों में उन्हें घूस का औफर मिला था. डीजल बेचने या दूसरे सामान की हेराफेरी के मामले भी आ चुके हैं. दबी जबान में औरतों के साथ होने वाली हिंसा की बातें भी सामने आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव ने अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने के लिए सोशल साइट का इस्तेमाल किया, लेकिन यही बात सीमा सुरक्षा बल के अफसरों को नागवार गुजरी. वे इसे अनुशासनहीनता और तय की गई गाइडलाइंस का उल्लंघन मान रहे हैं.

यहां तक कि सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रह चुके जनरल प्रकाश सिंह का भी कहना है, ‘‘जवान ने नियमों का उल्लंघन किया है. कमांडैंट से शिकायत करनी चाहिए थी. डीआईजी, आईजी से शिकायत की जा सकती थी.’’

पूर्व महानिदेशक जनरल प्रकाश सिंह को यह डर है कि जवान इस तरह से करने लगेंगे, तो अनुशासन छिन्नभिन्न हो जाएगा.

तेज बहादुर यादव का कहना है कि इस की सूचना उस ने अपने कमांडैंट को पहले दी थी और बारबार कहने पर भी ऐक्शन नहीं लिया गया. क्या यही सब बातें ‘अनुशासनहीनता’ में आती हैं?

सीमा सुरक्षा बल के जम्मू फ्रंटियर के आईजी डीके उपाध्याय ने यह बयान दिया है कि वीडियो वायरल करने वाला जवान आदतन अनुशासनहीन है. उस के खिलाफ नशे में धुत्त रहने, सीनियर अफसरों के साथ बदसुलूकी करने, यहां तक कि सीनियर अफसर पर बंदूक तानने की शिकायतें आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव का साल 2010 में कोर्ट मार्शल किया गया था, लेकिन उस के परिवार वालों को ध्यान में रखते हुए बरखास्त करने के बजाय 89 दिनों की कठोर सजा सुनाई गई.

इस तरह के आरोप के जवाब में तेज बहादुर यादव कहता है, ‘‘मुझे गोल्ड मैडल समेत 14 पदक मिल चुके हैं. मैं ने अपने कैरियर में कुछ गलतियां भी की हैं, लेकिन बाद में उन में सुधार भी किए हैं.’’

तेज बहादुर यादव के परिवार वालों का कहना है कि जब भी वे घर आते थे, तो खाने को ले कर शिकायत करते थे. उन की पत्नी शर्मिला यादव अफसरों को कठघरे में खड़ा करते हुए पूछती हैं, ‘‘मेरे पति दिमागी तौर पर बीमार या अनुशासनहीन थे, तो उन को देश के संवेदनशील इलाके में बंदूक क्यों थमाई गई?’’

तेज बहादुर यादव की ही तरह बाड़मेर के जागसा गांव के खंगटाराम चौधरी सीमा सुरक्षा बल में थे, जिन्होंने 30 दिसंबर को वीआरएस ले ली थी.

खंगटाराम कहते हैं, ‘‘जवानों को ऐसा खाना खाने को दिया जाता है, जिसे आम आदमी नहीं खा सकता है. उस खाने को जवान मजबूरी में खाते हैं.’’

खंगटाराम के पिता एसके चौधरी का कहना है, ‘‘पहले खुशी हुई थी कि बेटा फौज में गया है, लेकिन वहां की परेशानियों को देख कर लगता है कि अच्छा हुआ कि वह यहां आ गया है और अब साथ में खेती का काम करेगा, तो कम से कम भरपेट खाना तो खाएगा.’’

तेज बहादुर यादव द्वारा लगाए गए आरोप को जब मीडिया ने लोगों से जानने के लिए बात की, तो श्रीनगर में सुरक्षा बलों के कैंपों के आसपास रहने वाले लोगों ने कहा कि बाजार से आधे रेट पर पैट्रोल, डीजल, चावल, मसाले जैसी चीजें मिल जाती हैं.

फर्नीचर के एक दुकानदार ने बताया कि फर्नीचर खरीदने की जिन लोगों की जिम्मेदारी है, वे कमीशन ले कर उन लोगों को और्डर देते हैं, पैसों के लिए सामान की क्वालिटी से भी समझौता करने को तैयार हो जाते हैं.

तेज बहादुर यादव का वीडियो आने के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, वायु सेना और सेना के जवानों ने भी अपनीअपनी बात रखी.

रोहतक के वायु सेना के एक पूर्व जवान ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख कर मौत की गुहार लगाई है, ताकि उसे जलालत भरी जिंदगी से छुटकारा मिल सके.

इस जवान का आरोप है कि वायु सेना के अफसरों को 14 हजार रुपए नहीं देने पर उसे कई झूठे आरोप लगा कर नौकरी से निकाल दिया.

इसी तरह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, मथुरा के जवान जीत सिंह ने मिलने वाली सुविधाओं में भेदभाव का आरोप लगाया है.

सेना के जवान यज्ञ प्रताप ने वीडियो जारी कर सेना के अफसरों पर आरोप लगाया है कि अफसर सैनिकों से कपड़े धुलवाते हैं, बूट पौलिश कराते हैं, कुत्ते घुमाने और मैडमों के सामान लाने जैसे काम करवाते हैं. यह खबर जब मीडिया में आ रही थी, तो उसी समय यह खबर भी आई कि बिहार के औरंगाबाद में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवान बलवीर कुमार ने इंसास राइफल से अपने सहकर्मियों की हत्या कर दी.

पुलिस अधीक्षक सत्यप्रकाश ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि बलवीर कुमार ने छुट्टी पर जाने के लिए आवेदन किया था. उसे छुट्टी नहीं मिल पाई और दूसरे जवानों ने उस पर तंज कसा, तो गुस्से में आ कर उस ने गोलीबारी कर दी.

उसी दिन पुलवामा जिले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल  का जवान वीरू राम रैंगर ने खुद को गोली मार कर खुदकुशी करने की कोशिश की थी.

सेनाध्यक्ष ने जवानों से कहा है कि वे अपनी बात सोशल मीडिया पर नहीं उठाएं. उस के लिए सेना मुख्यालय, कमान मुख्यालय व निचले स्तर के कार्यालयों में शिकायत पेटी रखने की घोषणा की और कहा कि इन पेटियों के माध्यम से उठाए गए मुद्दों को मैं खुद देखूंगा.

हम सभी जानते हैं कि जेल, थानों या दूसरे दफ्तरों में इस तरह के बौक्स पहले से ही वहा रखे हैं और उन पर भी यही लिखा होता?है कि आप की पहचान गुप्त रखी जाएगी और इस को अधिकारी ही खोलेंगे. लेकिन हम इस तरह के बौक्स के परिणाम को भी जानते हैं.

सेना के दफ्तरों में शिकायत निवारण बौक्स अभी तक क्यों नहीं था? जवानों के दर्द को गृह मंत्रालय ने बेबुनियाद बता कर खारिज कर दिया है यानी कम शब्दों में कहा जाए, तो गृह मंत्रालय और अधिकारी जवानों को झूठा बता रहे हैं.

यह हैरानी की बात है कि तेज बहादुर यादव और इरफान ने वीडियो बना कर जो सुबूत सरकार और जनता तक पहुंचाए हैं, उन को सरकार मानने से इनकार कर रही है. क्या जवानों के साथ इस तरह का बरताव नहीं होता है?

ऐसा सवाल सोशल मीडिया पर आ जाने से पूंजीवादपरस्त मीडिया घराने भी इस मामले को उठाने के लिए मजबूर हुए. सीमा सुरक्षा बल के एक जवान इरफान ने 29 अप्रैल को वाराणसी में प्रैस कौंफ्रैंस कर के बताया था कि भारतबंगलादेश सीमा पर अधिकारी तस्करी कराते हैं और जो जवान मुंह खोलने की बात करता है, उसे फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाता है.

इरफान ने बताया कि 15 जनवरी, 2016 को 50 बंगलादेशी भारत में आना चाहते थे, तो उस ने घुसपैठ कराने से इनकार कर दिया. इसी बीच एक घुसपैठिए ने सीमा सुरक्षा बल के कमांडर को फोन कर के इरफान से बात कराई. कमांडर ने इरफान को सभी घुसपैठियों को आने देने के लिए आदेश दिया.

इरफान ने इस घटना की शिकायत जब अधिकारियों से की, तो उसे चुप रहने की नसीहत दी गई. 19 जनवरी की रात जब गेट खोला गया था, तो उस का वीडियो इरफान ने बनाया था. उस की शिकायत भी अधिकारियों से की गई, लेकिन कोई असर नहीं हुआ.

इरफान ने सीमा की बाड़ को काटते और जोड़ते हुए भी कुछ घुसपैठियों को पकड़ा था. उन लोगों ने भी कमांडर के आदेश पर ऐसा करने की बात कबूली थी. इस का वीडियो भी इरफान ने मीडिया के सामने दिखाया था.

इरफान का कहना है कि सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी सीमा पार तस्करी कराते हैं. साथ ही, उस ने यह भी बताया कि लंगर में बंगलादेशी घुसपैठियों को उस ने काम करते हुए देखा था और पूछने पर उसे बताया गया कि कमांडर ने रखा है.

इरफान आगे बताता है कि जब अधिकारियों के सामने तस्करी की कलई खोली थी, तो उसे कमरे में बंद कर के पीटा गया था और सिगरेट से दागा गया था. उस के बाद इरफान सीमा सुरक्षा बल की नौकरी छोड़ कर अपने गांव आ गया.

इरफान ने बताया कि अधिकारी उस के पीछे पड़े हुए हैं और उसे भगोड़ा घोषित करने की धमकी दे रहे हैं. वह सीमा सुरक्षा बल में नहीं जाना चाहता. उस के बाद इरफान के साथ क्या हुआ, किसी को नहीं पता है.

तेज बहादुर यादव, खंगटाराम, जीत सिंह या इरफान का न तो यह पहला मामला है और न ही आखिरी. ऐसा होता रहा है और होता रहेगा.

जब किसान अपनी खेती की जमीन को तथाकथित तरक्की के लिए पूंजीपतियों को नहीं देना चाहते, तो इन्हीं जवानों को भेजा जाता है कि जाओ तुम ‘देशभक्त’ होने का परिचय दो. मजदूर जब अपनी मांगों को ले कर धरनाप्रदर्शन करते हैं या आदिवासी, दलित अपनी जीविका के साधन की मांग करते हैं, तो इन्हीं ‘देशभक्तों’ द्वारा उन का कत्लेआम कराया जाता है. उस समय इन जवानों को ‘देशभक्त’ का तमगा दे दिया जाता है.

जब यही ‘देशभक्त’ जवान अपनी मांगों को उठाते हैं, तो इन को भगोड़ा, अनुशासनहीन, नशेड़ी बना कर सजा मुकर्रर की जाती है. ये जवान उन्हीं मजदूरकिसान के बेटे हैं, जिन पर अफसरों के कहने पर वे लाठियां और गोलियां बरसाते हैं.

अफसरों का वर्ग अलग होता है. वे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, नौकरशाहों के घरों से आते हैं, जिस की न तो जमीन जाती है और न ही जान. इस समाज में जवान, किसान और विज्ञान से जुड़े तीनों समूहों को मिल कर लड़ना होगा, तभी वे जीत सकते हैं, नहीं तो किसी दिन किसान मारा जाएगा, जवान मारा जाएगा और विज्ञान को टोकरी में फेंक दिया जाएगा.

Social Story: गांव देहात में स्मार्टफोन से बदल रही है जिंदगी

Social Story: पिछले 10 सालों में गांवदेहातों में रहने वालों की जिंदगी में सब से बड़ा बदलाव पहले मोबाइल फोन, फिर स्मार्टफोन के रूप में सामने आया है. साल 2011 की जनगणना के सामाजिक और माली आंकडे़ इस बात के गवाह हैं. तमाम तरह की परेशानियों और गरीबी के बाद भी गांवदेहात में तेजी से मोबाइल फोन का इस्तेमाल बढ़ा है. गरीब प्रदेशों में गिने जाने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों में रहने वाले 88 फीसदी और 84 फीसदी घरों में आज मोबाइल फोन का इस्तेमाल होने लगा है. ये प्रदेश राष्ट्रीय औसत 68 फीसदी से कहीं आगे हैं.

गांवों में इस्तेमाल होने वाले दूसरे संसाधनों से भी तुलना करें, तो मोबाइल फोन का इस्तेमाल सब से ज्यादा किया जा रहा है. कच्चे घरों और झोंपडि़यों में रहने वाले लोग भी मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने लगे हैं.

एक ओर गांवों में बिजली न आने से वहां बिजली से चलने वाले उपकरणों का इस्तेमाल घट रहा है, तो दूसरी ओर बिजली से चार्ज होने वाले मोबाइल फोन पर बिजली न होने का कोई ज्यादा असर नहीं हो रहा है.

आज के समय में मोबाइल फोन केवल बात करने तक सीमित नहीं रह गया है. स्मार्टफोन आने के बाद मोबाइल फोन मनोरंजन का सब से बड़ा साधन बन गया है. स्मार्टफोन में मनपसंद गानों के वीडियो देखे जा सकते हैं. इस के जरीए फेसबुक और ह्वाट्सएप जैसे सोशल मीडिया के साधनों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है.

आज 2 हजार रुपए तक की कीमत से स्मार्टफोन मिलना शुरू हो जाता है. गांव के लोगों को स्मार्टफोन में सब से ज्यादा 2 चीजें पसंद आती हैं, वीडियो पर गाने देखना और सुनना. वे चाहते हैं कि फोन का म्यूजिक सिस्टम तेज हो, जिस से आवाज को दूर तक सुना जा सके. वे अब अपनी जिंदगी के हसीन पलों को कैमरे में कैद करना चाहते हैं, इसलिए कैमरा वाला फोन पसंद करते हैं.

गांवों के बाजार में कम कीमत वाले स्मार्टफोन की मांग है, इसलिए ज्यादातर कंपनियां गांव के बाजार को ध्यान में रख कर फोन बनाने लगी हैं. पहले नोकिया और अब माइक्रोसौफ्ट और सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियां गांव के बाजार में अपना कब्जा जमाने में केवल इसलिए पीछे रह गईं, क्योंकि इन के स्मार्टफोन महंगे थे. इन कंपनियों ने पहले गांव के लिए सस्ते मोबाइल फोन बनाए थे, जिन में रेडियो बजता था, पर गांव के लोग अपने मनपसंद गाने या वीडियो डाउनलोड कर के नहीं सुन सकते थे.

सस्ते फोन बनाने वाली कंपनियों ने गांव के बाजार की बदलती पसंद को पकड़ लिया और कम कीमत पर स्मार्टफोन बना कर गांव के बाजार से बड़ी कंपनियों को बाहर कर दिया.

गांवदेहात के बाजार में बिकने वाले 70 फीसदी फोन सस्ते किस्म के लोकल ब्रांड वाली कंपनियों के होते हैं. बड़ी कंपनियों के पुराने मोबाइल फोन ही यहां खरीदे जाते हैं. ब्रांडेड कंपनियों के मोबाइल फोन इसलिए भी नहीं पसंद किए जाते, क्योंकि इन में गाने धीमी आवाज में सुनाई देते हैं. इन का म्यूजिक सिस्टम तेज आवाज वाला नहीं होता है.

बदलाव की हकीकत

गांव में रोजीरोजगार की कमी है. ऐसे में बहुत सारे लोग कामधंधे की तलाश में दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों और विदेशों तक में मेहनतमजदूरी करने जाते हैं. ये लोग स्मार्टफोन से अपने घरपरिवार और करीबी लोगों से जुड़े रहना चाहते हैं. स्मार्टफोन इस में सब से बड़ा रोल अदा कर रहा है.

अब रेल का टिकट लेना हो या ट्रेन का टाइम पता करना हो, इंटरनैट के जरीए यह आसान काम हो गया है, खासकर ट्रेन में टिकट का रिजर्वेशन कराना फोन के जरीए आसान हो गया है.

कई गांवों में यह रोजगार का साधन बन गया है. इस के अलावा स्मार्टफोन मनोरंजन का सब से बड़ा साधन बन गया है. इस में वीडियो डाउनलोड कर के मनपसंद गानों व फिल्मों को देखा और सुना जा सकता है.

स्मार्टफोन में लगने वाले मैमोरी कार्ड में गाने और फिल्म को बाजार से भी डाउनलोड कराया जा सकता है. इस के जरीए कम पैसे में गानों और फिल्मों का मजा लिया जा सकता है. यही नहीं, शादी और दूसरे मौकों के वीडियो तक इस स्मार्टफोन के जरीए बनाए जाने लगे हैं.

गंदी फिल्मों का शौक रखने वाले लोगों के लिए स्मार्टफोन वरदान जैसा हो गया है. वे गुपचुप तरीके से इन का भरपूर मजा लेने लगे हैं. यही वजह है कि गांव के बाजारों में बिकने वाली बेहूदा और कहानी टाइप की किताबों की बिक्री बंद हो गई है. 20 से 25 रुपए खर्च कर के मैमोरी कार्ड में 3 से 5 फिल्में लोड हो जाती हैं. इतना खर्च कर के केवल 1 या 2 किताबें ही मिल पाती थीं. ऐसी किताबों को दूसरों की नजरों से छिपाना मुश्किल काम होता था, जबकि मोबाइल फोन में कैद इन फिल्मों को छिपाना मुश्किल नहीं है.

स्मार्टफोन के बढ़ने से गांव के मनोरंजन में प्रयोग होने वाले दूसरे साधन भी बंद हो गए हैं. आज मनोरंजन के बाजार में गानों के कैसेट और टेपरैकौर्डर गायब हो गए हैं. इसी तरह से रेडियो भी गांव के बाजार से गायब हो गया है.

कुलमिला कर देखा जाए, तो स्मार्टफोन गांव में बातचीत करने के साथसाथ मनोरंजन का भी बड़ा साधन बन कर उभरा है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने गांवगांव अपनी बात को पहुंचाने के लिए मोबाइल फोन का सहारा लिया था. उस ने बड़ी तादाद में एसएमएस के जरीए अपना प्रचार किया.

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव आ रहे हैं. चुनाव लड़ने वाले लोग स्मार्टफोन के जरीए अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कम समय में पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं.

कई जुझारू किस्म के नौजवानों ने स्मार्टफोन का सहारा ले कर ऐसी वीडियो क्लिप बनाईं, जिन्हें देख कर पुलिस और प्रशासन को कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ा. थाना और तहसील की हकीकत को मोबाइल फोन में कैद कर के शहर के बडे़ अफसरों तक पहुंचाने का काम भी गांव के लोग करने लगे हैं, जिस से वहां के सरकारी नौकर गलत काम करने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर होने लगे हैं.

अगर सरकारी लैवल पर इन साधनों को बढ़ावा दिया जाए और इस तरह से मिलने वाली शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए, तो ये फोन गांव के लोगों के लिए बड़े मददगार साबित हो सकते हैं.

मोबाइल फोन पर इन की राय

 जिस तरीके से सरकारी व्यवस्था कंप्यूटर के हवाले हो रही है, सरकार ईगवर्नैंस पर जोर दे रही है, उस से आने वाले दिनों में स्मार्टफोन का इस्तेमाल बढ़ने ही वाला है. इस से गांव के लोग अपनी शिकायत ऊपर के अफसरों तक पहुंचाने में कामयाब हो रहे हैं. वे इसे मनोरंजन का बेहतर साधन बना रहे हैं. इस के जरीए वे सीधे तमाम लोगों से जुडे़ रहते हैं. जिन लोगों के पास पैसा कम है, गरीब हैं, वे भी मिस काल मार कर अपनी बात को पहुंचाने का जरीया खोज ही लेते हैं. परिवार के लोग भी नातेरिश्तेदारों के संपर्क में पहले से ज्यादा रहने लगे हैं. स्मार्टफोन के चलन में आने के बाद गांव में चिट्ठी से खबरों का आदानप्रदान बंद सा हो गया है. आज लोगों में पढ़ाईलिखाई का लैवल भी बढ़ रहा है. गांव के बच्चे भी मोबाइल फोन चलाना सीख चुके हैं.

– शशिभूषण, समाजसेवी, पानी संस्थान.

 पहले मेरे गाने कैसेट पर आते थे. लोगों को सुनने के लिए टेपरैकौर्डर रखना पड़ता था. जब से मोबाइल फोन में गानों को डाउनलोड कर सुनने का तरीका आ गया है, लोग मेरे गानों को मोबाइल फोन पर डाउनलोड कर लेते हैं. इस तरह से लोग जब चाहे गानों को सुन सकते हैं. कुछ समय से लोगों की यह डिमांड होने लगी कि गाने यूट्यूब पर डाले जाएं. जिस से वहां से फोन पर सीधे डाउनलोड किए जा सकें. कई गानों को वीडियो के साथ देखा जाता है.

स्मार्टफोन आने के बाद से गांव के लोगों की मनोरंजन की दुनिया ही बदल गई है. जब हम कहीं जाते हैं, तो लोग हमारे फोटो अपने मोबाइल फोन से ही लेना चाहते हैं. कुछ लोग तो पूरा वीडियो शूट कर लेते हैं. गांव के लोगों में स्मार्टफोन के प्रति लगाव बढ़ा है. यह अब इन के लिए जरूरत की चीज बन गई है. यह बात गांव में रहने वालों को समझ आ चुकी है.

– खुशबू उत्तम, भोजपुरी गायिका.

 जरूरत एक की, मिलते एक हजार

 मोबाइल फोन के बाजार में भी शहर और गांव का अंतर देखने को मिलता है. गांव के लोगों को केवल एक मोबाइल फोन की जरूरत होती है. इस के बावजूद गांव के बाजार में एक हजार किस्म के मोबाइल फोन मिलते हैं. अलगअलग नामों से बिकने वाले ये फोन करीबकरीब एकजैसी कीमत और फीचर्स वाले होते हैं.

ज्यादातर फोन चाइनीज ब्रांड के सस्ते होते हैं. कुछ लोकल फोन भी गांव के बाजार में अपना प्रचारप्रसार करते हैं. सब से ज्यादा फोन उसी कंपनी के बिकते हैं, जो कंपनी दुकानदार को ज्यादा सुविधाएं और कमीशन देती है.

गांव के लोग जब मोबाइल फोन खरीदने दुकानदार के पास जाते हैं, तो दुकानदार अपनी बातों से उन को वही मोबाइल खरीदने के लिए मजबूर कर देता है, जो वह बेचना चाहता है. अगर ग्राहक किसी दूसरे ब्रांड का मोबाइल फोन मांगता भी है, तो दुकानदार कहता है कि इस फोन की जिम्मेदारी उस की नहीं है.

ऐसे में ग्राहक वही मोबाइल लेता है, जो दुकानदार कहता है. अगर मोबाइल कंपनियां अपने ब्रांड का सही प्रचारप्रसार गांव के लोगों के बीच कर सकें, तो ग्राहक को अपनी जरूरत के हिसाब वाला मोबाइल फोन लेने में सुविधा हो सकेगी.

गांव के लोगों को मोबाइल फोन ऐसा चाहिए, जिस से सही तरीके से बात हो सके. इस के लिए जरूरी है कि मोबाइल फोन नैटवर्क को ठीक से पकड़े. गांव में बिजली की परेशानी रहती है, इसलिए मोबाइल फोन की बैटरी लंबे समय तक चलने वाली हो. यह जल्द चार्ज होने वाली होनी चाहिए.

मोबाइल फोन में अब इंटरनैट का प्रयोग बढ़ रहा है. ऐसे में मोबाइल फोन पर इंटरनैट सही से चलना चाहिए. मोबाइल फोन में कीपैड होना चाहिए. क्योंकि टच स्क्रीन चलना थोड़ा मुश्किल होता है. वीडियो फिल्म और गानों को पसंद करने वाले लोग मोबाइल फोन की बड़ी स्क्रीन पसंद करते हैं. ये लोग चाहते हैं कि मोबाइल फोन में पड़ने वाला मैमोरी कार्ड ज्यादा कैपेसिटी का हो, जिस से ज्यादा से ज्यादा गाने और वीडियो लोड हो सकें.

दुकानदार पर निर्भर हैं ग्राहक

बाजार में जरूरत से ज्यादा मोबाइल फोन मुहैया होने से ग्राहक दुकानदार पर निर्भर हो गए हैं. इस के अलावा गांव के बाजार में बिकने वाले मोबाइल फोन अपना प्रचारप्रसार नहीं करते, जिस से ग्राहक उन के फोन की खासीयत को समझ सकें.

गांव के ग्राहकों को मोबाइल फोन के संबंध में बहुत जानकारी नहीं होती है. ऐसे में वे दुकानदार की बताई बात को मानने को मजबूर होते हैं. कई बार वे अपने आसपास के लोगों के फोन को देख कर फोन खरीदने की कोशिश भी करते हैं, तो दुकानदार उन्हें गारंटी न देने का डर दिखा कर रोक देते हैं.

ग्राहकों को चाहिए कि वे मोबाइल फोन खरीदने से पहले अपनी जरूरतों को समझ लें. मोबाइल फोन की कीमत उस में मौजूद फीचर्स से घटतीबढ़ती है. केवल एक दुकान पर देख कर ही मोबाइल फोन न खरीदें.

मोबाइल फोन को खरीदने के पहले आसपास की दुकानों को देख लें. अगर गांव से शहर ज्यादा दूर न हो, तो शहर की दुकान से मोबाइल फोन खरीद सकते हैं. हर मोबाइल कंपनी अपने फोन की वारंटी देती है. फोन लेने से पहले उस की वारंटी जरूर देख लें. फोन का पक्का बिल भी लें. कई बार पक्का बिल न होने की दशा में दुकानदार अपनी कही बात से मुकर जाता है.

मोबाइल फोन लेने के बाद उस की सिक्योरिटी का खास ध्यान रखें, खासकर स्मार्टफोन पानी वगैरह में गिर जाने से जल्दी खराब हो जाते हैं. इन की स्क्रीन जल्दी खराब हो सकती है. कई बार स्क्रीन पर कुछ लगने से वह टूट जाती है. स्क्रीन को महफूज रखने के लिए स्क्रीन गार्ड जरूर लगवा लें.

Social Story: औलाद के फेर में ओझाओं का शिकार औरतें

Social Story: हर शादी शुदा औरत की यही ख्वाहिश होती है कि उस के भी एक औलाद हो. जिन औरतों को औलाद नहीं होती, तो उस के लिए वे हर तरह की कोशिश करने से बाज नहीं आती हैं. दवा, दुआ, तावीज से ले कर तरह तरह की मन्नतें, यहां तक कि औलाद पाने के चक्कर में वे अपना सबकुछ लुटा देती हैं.

रुक्मिणी की शादी को 7 साल बीत चुके थे, पर उस के कोई औलाद नहीं थी. घर वाले भी औलाद न होने के चलते उस पर ध्यान देना कम कर चुके थे.

रुक्मिणी के गांव के एक लड़के ने बताया कि वह एक ओझा को जानता है. उस के पास सैकड़ों औरतों ने झाड़फूंक कराई और वे मां बन गईं.

रुक्मिणी रिश्ते में उस लड़के की भाभी लगती थी. उस ने यकीन कर लिया और उस के साथ उस ओझा के पास चली गई.

ओझा ने बताया कि मामला गंभीर है, इसलिए रुक्मिणी को एक हफ्ता उस के पास रह कर हवन करना पड़ेगा. उस के रहने का इंतजाम हो जाएगा. ओझा की बात सुन कर रुक्मिणी तैयार हो गई.

एक हफ्ते तक औलाद का लालच दे कर ओझा और उस के एक सहयोगी ने रुक्मिणी का यौन शोषण किया और उस से रुपए भी ऐंठे. हां, रुक्मिणी के बच्चा हो गया, तो वह मुंह बंद कर के पति के साथ रहती रही, पर ओझाओं के चक्कर भी लगाती रही.

इसी तरह फरजाना खातून का निकाह हुए महज 2 साल ही बीते थे कि उस की ससुराल वाले फरजाना खातून के पति पर दबाव बनाने लगे कि इस औरत से बच्चा नहीं होगा, तुम दूसरी शादी कर लो. फरजाना उचित इलाज के लिए कहती रही, पर उस की एक न सुनी गई.

ससुराल वालों ने अपने लड़के की दूसरी शादी कर दी. वह दोनों पत्नियों की झाड़फूंक, दुआ तावीज कराता रहा, पर औलाद न हो सकी.

इसी तरह रीता औलाद पाने के चक्कर में एक ओझा के पास गई. ओझा ने कहा कि रात 12 बजे एक पूजा करनी पड़ेगी. उस पूजा से तमाम औरतों को औलादें हुई हैं.

रीता उस की बातों में आ गई. जब आधी रात हुई, तो उस ओझा ने उस के साथ दुष्कर्म किया और डर की वजह से उस की हत्या कर दी. घर वाले जब उसे खोजने लगे, तो कहीं पता नहीं चला.

पुलिस के पास मामला दर्ज कराया गया. पुलिस ने रीता की जमीन में गड़ी लाश बरामद कर उस ओझा को जेल भेज दिया.

एक गांव में बेटा पाने के लिए यज्ञ कराया गया. वहां हजारों औरतें आईं. रोजाना रात को रंगा रंग कार्यक्रम होता. मौके का फायदा उठा कर बहुत सी औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया गया.

चैत नवमी और दुर्गा पूजा के मौके पर उत्तर प्रदेश में कछौसा शरीफ, बिहार में अमझरशरीफ, मनोराशरीफ समेत कई जगहों पर ‘भूतना मेला’ लगता है. वहां ज्यादातर हिस्टीरिया बीमारी से पीडि़त और औलाद की चाह रखने वाली औरतें जाती हैं और अपना सबकुछ लुटा कर घर लौटती हैं.

डाक्टर विमलेंदु कुमार ने बताया कि  औरतों के बच्चा न होने की कई वजहें  हैं, जिन का सही इलाज होने से ही औलाद पैदा हो सकती है. लेकिन बहुत से लोग उचित इलाज नहीं करा कर ओझागुनी, झाड़फूंक के फेर में पड़ कर अपना समय और पैसे की बरबादी के साथसाथ इज्जत तक भी दांव पर लगा देते हैं.

वहशी प्रेमी से बचें

पूर्वी अफ्रीका का देश केन्या अपनी जंगल सफारी के लिए जाना जाता है. यहां के मशहूर केन्या पर्वत पर ही इस देश का नाम पड़ा है, पर हालिया कुछ घटनाओं ने इस देश को शर्मसार कर दिया है. दरअसल, यहां पर पिछले कुछ समय से लड़कियों और औरतों के प्रति जिस तरह से हिंसा के मामले बढ़े हैं, वे चिंता की बात है.

केन्या के ब्यूरो औफ नैशनल स्टैटिस्टिक्स में साल 2023 के जनवरी महीने में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि केन्या में लड़कियों और औरतों के खिलाफ हिंसा बहुत ज्यादा बढ़ी है. 15 साल की उम्र से ही वे शारीरिक हिंसा की शिकार होती हैं.

हाल में एक और दर्दनाक मामला इस काली लिस्ट में शामिल हो गया है. हैवानियत की शिकार कोई और नहीं, बल्कि पैरिस ओलिंपिक खेलों में हिस्सा लेने वाली एथलीट रेबेका चेपटेगई थीं, जिन्हें उन के बौयफ्रैंड ने आग लगा कर जला दिया था.

वैसे तो रेबेका चेपटेगई मूल रूप से युगांडा की थीं, पर फिलहाल वे केन्या में रहती थीं.

रेबेका चेपटेगई वैस्टर्न नजोए काउंटी इलाके में रहती थीं और वारदात के समय अपने घर में थीं. आसपास के लोगों ने बताया कि रविवार, 1 सितंबर, 2024 को उन का अपने बौयफ्रैंड डिकसन डिमा के बीच ?ागड़ा हो रहा था. जिस जमीन पर वह घर बना है, उसी को ले कर बहस

हो रही थी. दोनों का ?ागड़ा इतना गंभीर था कि उन की आवाजें घर से बाहर आ रही थीं.

इसी बीच गुस्साए प्रेमी ने रेबेका पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी, जिस से वे बुरी तरह झूलस गई. इस वारदात के 3 दिन बाद इलाज के दौरान रेबेका की मौत हो गई.

अब जरा भारत के आशिकों का वहशीपन भी देख लें. मामला उत्तर प्रदेश के उन्नाव का है. बेहटा मुजावर थाना क्षेत्र के एक गांव की रहने वाली 20 साल की एक लड़की की शादी 19 मार्च, 2024 को होनी थी. पर उस लड़की का प्रेम संबंध अपने ही गांव के रहने वाले एक लड़के से चल रहा था.

पुलिस के मुताबिक, प्रेमिका की शादी तय होने से प्रेमी बेहद नाराज था. उस ने अपनी प्रेमिका को मिलने के

लिए खेत पर बुलाया. प्रेमिका खेत पर पहुंची, जहां उन दोनों में झगड़ा हो गया. गुस्साए प्रेमी ने अपनी प्रेमिका का हाथ (पंजा) धारदार खुरपी से काट कर अलग कर दिया.

इसी तरह उत्तर प्रदेश के अयोध्या के गोसाईंगंज इलाके के रेलवे स्टेशन के पास एक खंडहर में प्रेमी ने अपनी प्रेमिका की हत्या कर उस की लाश पर कैमिकल डाल कर जला दिया था.

यह मामला अगस्त, 2024 का है. पुलिस ने प्रेमी को पकड़ लिया था. आरोपी प्रेमी ने पूछताछ में बताया कि वह और उस की प्रेमिका दोनों एकसाथ मुंबई गए थे. बाद में लड़की किसी और लड़के से बात करने लगी थी, जो आरोपी को पसंद नहीं आ रहा था. इसी वजह से उन दोनों का झगड़ा होता था.

आरोपी ने पुलिस को आगे बताया कि उस ने अपनी प्रेमिका को पहले पत्थर से सिर कुचल कर मार डाला, फिर उस की लाश को कैमिकल डाल कर जलाने की कोशिश की, ताकि लाश जल्दी गल जाए और हत्या का सुबूत मिट जाए.

साल 2022 के मई महीने में हुआ श्रद्धा हत्याकांड ऐसा ही एक और मामला था, जिस ने पूरे देश को झकझोर दिया था. शादी का दबाव बनाने के लिए और प्रेमिका पर शक होने के चलते आफताब पूनावाला ने दिल्ली में श्रद्धा वालकर की हत्या कर दी थी. हत्या के बाद उस ने श्रद्धा की लाश के 35 टुकड़े किए थे और उन्हें फ्रिज में रख दिया था. फिर इन टुकड़ों को वह धीरेधीरे अगले कुछ महीनों में महरौली के जंगलों में फेंकता रहा था.

दिल्ली में ही साहिल नाम के एक प्रेमी (बाद में खुलासा हुआ कि पति था) ने अपनी प्रेमिका निक्की की कार के अंदर हत्या कर दी थी और फिर उस  की लाश अपने रैस्टोरैंट के फ्रिज में रख दी थी.

दरअसल, साहिल ने किसी दूसरी लड़की के साथ सगाई कर ली थी और  फिर वह निक्की से मिलने उस के फ्लैट पर गया था. इस दौरान उस की शादी को ले कर कहासुनी हुई, जिस के बाद उसे गुस्सा आ गया और उस ने मोबाइल के केबल से पीडि़ता का गला घोंट दिया था.

पूरी दुनिया में ऐसे मामलों की भरमार है, जहां गुस्साए किसी प्रेमी ने अपनी प्रेमिका पर जानलेवा हमला किया और अपने प्यार को ही शर्मसार कर दिया.

भारत में तो हमेशा से लड़की को दोयम दर्जे का समझ जाता है. वे घर के बाहर ही क्या, भीतर भी खुद को महफूज नहीं मानती हैं और जब उन का प्रेमी ही वहशीपन पर उतर आए तो फिर वे किस से गुहार लगाएं, क्योंकि प्रेमी के साथ

तो वे अच्छी जिंदगी बिताने के सपने देखती हैं.

पर गुस्सैल प्रेमी का क्या किया जाए और उसे कैसे कंट्रोल में रखा जाए, यह बहुत बड़ा सवाल बन जाता है, जबकि गुस्से का जवाब गुस्सा तो बिलकुल नहीं होता है और यहीं से हर मुसीबत की शुरुआत होती है.

अमूमन तो यही कहा जाता है कि अगर प्यार में तकरार न हो तो फिर कैसा प्यार, पर यही तकरार जब गुस्से में बदल जाता है, तो प्रेमी का असली रूप सामने आ जाता है और फिर केन्या हो या भारत, वह वही वहशीपन दिखाता है, जो किसी मासूम लड़की की जान आफत में डाल देता है.

फिर भी कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन पर अमल करने से प्रेमीप्रेमिका के बीच की तल्खी को कम किया जा सकता है, जैसे :

* जब भी लड़की को यह लगे कि उस का प्रेमी अब गुस्से में फट पड़ने वाला है, तो वह सब्र से काम ले. उस की बात का तुरंत जवाब न दे और कड़वे शब्द तो बिलकुल न कहें.

* अगर आप का प्रेमी सच में आप से प्यार करता है, लेकिन गुस्सैल भी है, तो उस की दुखती रग पर हाथ न रखें और माहौल को हलका बनाने के लिए बात को नया रुख दे दें.

* अगर आप को शक है कि प्रेमी किसी तरह की बेवफाई कर रहा है, तो बिना किसी ठोस वजह के नतीजे पर न पहुंचें. अपनी बात को उस के सामने रखें और उस के नजरिए को भी समझे.

* अगर आप को यह डर लगता है कि प्रेमी गुस्से में कुछ भी कर सकता है, तो अकेले में मिलने से बचें और धीरेधीरे उस से दूरी बना लें.

* अगर बात बहुत ज्यादा बिगड़ रही है, तो किसी अपने से मन की बात कहें. ज्यादा ही गंभीर मसला है, तो पुलिस की मदद लेने से भी न झिझकें.

बलि का अपराध और जेल, हैवानियत का गंदा खेल

हमारे देश में सैकड़ों सालों से अंधविश्वास चला आ रहा है. दिमाग में कहीं न कहीं यह झूठ घर करा दिया गया है कि अगर अगर गड़ा हुआ धन हासिल करना है, तो किसी मासूम की बलि देनी होगी, जबकि हकीकत यह है कि यह एक ऐसा झूठा है, जो न जाने कितने किताबों में लिखा गया है और अब सोशल मीडिया में भी फैलता चला जा रहा है. ऐसे में कमअक्ल लोग किसी की जान ले कर रातोंरात अमीर बनना चाहते हैं. मगर पुलिस की पकड़ में आ कर जेल की चक्की पीसते हैं और ऐसा अपराध कर बैठते हैं, जिस की सजा तो मिलनी ही है.

सचाई यह है कि आज विज्ञान का युग है. अंधविश्वास की छाई धुंध को विज्ञान के सहारे साफ किया जा सकता है, मगर फिर अंधविश्वास के चलते एक मासूम बच्चे की जान ले ली गई.

देश के सब से बड़े धार्मिक प्रदेश कहलाने वाले उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में एक तथाकथित तांत्रिक ने 2 नौजवानों के साथ मिल कर एक 8 साल के मासूम बच्चे की गला रेत कर हत्या कर दी गई थी और तंत्रमंत्र का कर्मकांड किया गया था. उस बच्चे की लाश को गड्डा खोद कर छिपा दिया गया था.

ऐसे लोगों को यह लगता है कि अंधविश्वास के चलते किसी की जान ले कर के वे बच जाएंगे और कोई उन्हें पकड़ नहीं सकता, मगर ऐसे लोग पकड़ ही लिए जाते हैं. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ.

अंधविश्वास के मारे इन बेवकूफों को लगता है कि ऐसा करने से जंगल में कहीं गड़ा ‘खजाना’ मिल जाएगा, मगर आज भी ऐसे अनपढ़ लोग हैं, जिन्हें लगता है कि जादूटोना, तंत्रमंत्र या कर्मकांड के सहारे गड़ा धन मिल सकता है.

समाज विज्ञानी डाक्टर संजय गुप्ता के मुताबिक, आज तकनीक दूरदराज के इलाकों तक पहुंच चुकी है और इस के जरीए ज्यादातर लोगों तक कई भ्रामक जानकारियां पहुंच पाती हैं. मगर जिस विज्ञान और तकनीक के सहारे अज्ञानता पर पड़े परदे को हटाने में मदद मिल सकती है, उसी के सहारे कुछ लोग अंधविश्वास और लालच में बलि प्रथा जैसे भयावाह कांड कर जाते हैं जो कमअक्ल और पढ़ाईलिखाई की कमी का नतीजा है.

डाक्टर जीआर पंजवानी के मुताबिक, कोई भी इनसान इंटरनैट पर अपनी दिलचस्पी से जो सामग्री देखतापढ़ता है, उसे उसी से संबंधित चीजें दिखाई देने लगती हैं फिर पढ़ाईलिखाई की कमी और अंधश्रद्धा के चलते, जिस का मूल है लालच के चलते अंधविश्वास के जाल में लोग उलझ जाते हैं और अपराध कर बैठते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता सनद दास दीवान के मुताबिक, अपराध होने पर कानूनी कार्यवाही होगी, मगर इस से पहले हमारा समाज और कानून सोया रहता है, जबकि आदिवासी अंचल में इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं, लिहाजा इस के लिए सरकार को सजक हो कर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए.

हाईकोर्ट के एडवोकेट बीके शुक्ला ने बताया कि एक मामला उन की निगाह में ऐसा आया था, जिस में एक मासूम की बलि दी गई थी. कोर्ट ने अपराधियों को सजा दी थी.

दरअसल, इस की मूल वजह पैसा हासिल करना होता है. सच तो यह है कि लालच में आ कर पढ़ाईलिखाई की कमी के चलते यह अपराथ हो जाता है. लोगों को यह समझना चाहिए कि किसी भी अपराध की सजा से वे किसी भी हालत में बच नहीं सकते और सब से बड़ी बात यह है कि ऐसे अपराध करने वालों को समाज को भी बताना चाहिए कि उन के हाथों से ऐसा कांड हो गया और उन्हें कुछ भी नहीं मिला, उन के हाथ खाली के खाली रह गए.

तलाकशुदा पत्नी से दोबारा शादी

शायद ही कभी किसी ने देखासुना हो कि तलाक के 4 साल और अलगाव व खटपट के 12 वर्षों बाद पतिपत्नी ने दोबारा शादी कर ली. मामला कुछ कुछ विचित्र किंतु सत्य है जिस के बारे में जान कर महसूस होने लगा है कि तलाक के बाद पति पत्नियों की हालत या मानसिकता पर कोई एजेंसी अगर सर्वे व काउंसलिंग करे तो पति पत्नी का दोबारा मिल कर उजड़ी गृहस्थी को संवार लेना एक संभव काम है.

तलाक व्यक्तिगत, कानूनी, सामाजिक, पारिवारिक हर लिहाज से एक तकलीफदेह प्रक्रिया है जिस की मानसिक यंत्रणा के बारे में शायद भुक्तभोगी भी ठीक से न बता पाएं. इस के बाद भी तलाक के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं. इस से यही उजागर होता है कि अकसर पति पत्नी या तो गलतफहमी का शिकार रहते हैं या फिर मारे गुस्से के अपना भलाबुरा नहीं सोच पाते. तलाक में नजदीकी लोगों की भूमिका कहीं ज्यादा अहम हो जाती है जो बजाय बात संभालने के, बिगाड़ते ज्यादा हैं.

यह ठीक है कि कुछ मामलों में तलाक अनिवार्य सा हो जाता है पर अधिकांश मामलों में यह जिद व अहं का नतीजा होता है जो खासतौर से पत्नी के हक में अच्छा नहीं होता. समाज के लिहाज से यह दौर बदलाव का है जिस में महिलाएं पहले सी दोयम दरजे की नहीं रह गई हैं. वे हर स्तर पर समर्थ, सक्षम और जागरूक हुई हैं लेकिन तलाक के बाद ये सभी बातें हवा हो जाती हैं जब उन्हें अपने अकेलेपन का एहसास होता है और वे एक स्थायी असुरक्षा में जीने को मजबूर हो जाती हैं.

मुमकिन है कभी कभी उन्हें लगता हो कि तलाक बेहद जरूरी भी नहीं था. इस से बच कर तलाक के बाद की दुश्वारियों से भी बचा जा सकता था लेकिन बात ‘अब पछताए होत का जब चिडि़या चुग गई खेत’ सरीखी हो जाती है. तलाक का कागज उन्हें नए माहौल और हालत में जीना सिखा देता है, इसलिए चाह कर भी वापस नहीं मुड़ा जा सकता क्योंकि तलाक के बाद पति दूसरी शादी कर नई पत्नी के साथ शान से गुजर कर रहा होता है. वहीं, अधिकांश पत्नियां, जो भारतीय संस्कारों से ग्रस्त ही कही जाएंगी, किसी दूसरे को सहज तरीके से पति मानने या स्वीकारने के लिए खुद को तैयार या सहमत नहीं कर पातीं और जब तक खुद को तैयार कर पाती हैं तब तक उम्र का सुनहरा हिस्सा उन के हाथों से फिसल चुका होता है.

शशिकांत संग वंदना

मध्य प्रदेश के भिंड जिले के इस दिलचस्प मामले को बतौर मिसाल लिया जाए तो तलाकशुदाओं के लिहाज से यह एक अच्छी पहल सिद्ध हो सकती है. वंदना और शशिकांत की शादी साल 2001 में हुई थी. ये दोनों साधारण खातेपीते कायस्थ परिवार के हैं और दोनों के ही पिता पुलिस विभाग में नौकरी करते हैं. शादी के बाद वंदना ससुराल आई तो उसे नया कुछ खास नहीं लगा क्योंकि उस का मायका भी भिंड में ही है. संयुक्त परिवार से संयुक्त परिवार में आने से उसे तालमेल बैठाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आई.

शशिकांत प्राइवेट नौकरी करता था. उस की कोई खास आमदनी नहीं थी. संयुक्त परिवारों में खर्चे का पता नहीं चलता, न ही कोई कमी महसूस होती. देखते ही देखते एक साल गुजर गया और वंदना ने एक बच्ची को जन्म दिया जिस का नाम घर वालों ने प्रिया रखा.

शायद आपसी समझ का अभाव था या फिर संयुक्त परिवार की बंदिशें थीं कि दोनों एकदूसरे से असंतुष्ट रहने लगे और जल्द ही आरोपों प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हो गया जिन में कोई खास दम नहीं था. यह बात वक्त रहते दोनों समझ नहीं पाए, लिहाजा रोज रोज की खटपट शुरू हो गई. पतिपत्नी के बीच का तनाव और विवाद उजागर हुए तो दोनों के घर वालों ने दखल देते समझाया पर बजाय समझने के दोनों भड़कने लगे और आखिरकार अपना फैसला भी सुना दिया कि अब हम साथ नहीं रह सकते. लिहाजा, हमारा तलाक करा दिया जाए.

दोनों ही परिवारों की भिंड में इज्जत है, इसलिए घर वाले कतराए, लेकिन तमाम समझाइशें बेकार साबित हो चुकी थीं. दोनों कुछ समझने को तैयार नहीं थे. एक दिन वंदना प्रिया को ले कर अपने मायके चली गई तो शशिकांत ने भी आपा खो दिया और तलाक का मुकदमा दायर कर दिया.

8 साल मुकदमा चला. तारीखें पड़ीं, पेशियां हुईं और आखिरकार 2012 में तलाक यानी कानूनन विवाह विच्छेद इस शर्त पर हुआ कि पत्नी व बेटी को गुजारे के एवज शशिकांत 2 हजार रुपए महीने देगा जो कि कुछ साल उस ने दिए भी.

2014 में शशिकांत ने अदालत में एक अर्जी दाखिल कर अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते भरणपोषण राशि देने में असमर्थता जताई तो अदालत ने भरणपोषण का आदेश रद्द कर दिया. अब तक घर और समाज वालों की दिलचस्पी इन दोनों से खत्म हो गई थी. वंदना मायके में थी लेकिन सहज तरीके से नहीं रह पा रही थी. उधर, शशिकांत को भी लग रहा था कि जो कुछ भी हुआ वह ठीक नहीं हुआ.

शशिकांत और वंदना दोनों कशमकश की जिंदगी जी रहे थे. बेटी प्रिया का भी कोई भविष्य नहीं था और सब से ज्यादा तकलीफदेह बात दोनों का एकदूसरे को न भूल पाना थी. झूठा अहं, गुस्सा और ठसक दम तोड़ रहे थे. दोनों को ही बराबर से समझ आ रहा था कि वे जाने अनजाने  जिंदगी की सब से बड़ी गलती या बेवकूफी कर चुके हैं, पर अब कुछ हो नहीं सकता था, इसलिए कसमसा कर रह जाते थे.

जब सब्र टूटा

बीती 9 अक्तूबर को वंदना बेटी प्रिया को ले कर भिंड के एएसपी अमृत मीणा के दफ्तर पहुंची और बगैर किसी हिचक के उन से कहा कि अब उस के सामने खुदकुशी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. अमृत मीणा ने सब्र से उस की पूरी बात सुनी और तुरंत शशिकांत को तलब किया. थाने में ही उन्होंने दोनों को साथ बैठा कर चर्चा की. 14 साल की होने जा रही प्रिया का हवाला दिया और जमाने भर की ऊंच नीच समझाई तो वंदना और शशिकांत हद से ज्यादा जज्बाती हो उठे और फिर से साथ रहने को तैयार हो गए.

अमृत मीणा भी अपनी पहल और समझाइश का वाजिब असर देखते उत्साहित थे. लिहाजा, उन्होंने इन दोनों की हिचक दूर करते तुरंत दफ्तर में ही उन की दोबारा शादी का इंतजाम कर डाला. दोनों 14 साल का गुबार और भड़ास निकाल चुके थे, इसलिए दोनों शादी के लिए तैयार हो गए ताकि तलाक और अलगाव का एहसास खत्म हो जाए.

एएसपी के रीडर रविशंकर मिश्रा ने पंडित की भूमिका निभाई और मंत्र पढ़ते हुए दोनों की शादी करा दी. 14 साल बाद इन पतिपत्नी ने दोबारा एकदूसरे को जयमाला पहनाई और शशिकांत वंदना को घर ले कर आ गया. बाकायदा विदाई भी हुई, अमृत मीणा अपनी गाड़ी से दोनों को घर छोड़ कर आए. बहुत कम मौकों और मामलों पर पुलिस वालों का मानवीय पहलू देखने में आता है, जो इस मामले में दिखा. दोबारा विवाह का यह अनूठा मामला था. इस प्रतिनिधि ने बीती 25 नवंबर को वंदना और शशिकांत से बात की. दोनों खुश थे. वे बीती बातें नहीं करना चाहते थे जिन में उन्होंने बेहद तनाव झेला था. वंदना की चहक और शशिकांत की परिपक्वता बता रही थी कि वे इस नई जिंदगी से खुश हैं और चाहते हैं कि दूसरे तलाकशुदा पतिपत्नी भी गुस्सा और पूर्वाग्रह छोड़ कर शादी करें. अगर वे ऐसा करते हैं तो पहले जो खो चुके हैं उसे वे मय ब्याज के हासिल कर सकते हैं.

जल्दबाजी, गुस्सा, अहं, जिद और अपनों के ही भड़काने पर पतिपत्नी तलाक तो ले लेते हैं पर इन में से अधिकांश बाद में पछताते हैं. वजह, दूसरी शादी आसान नहीं होती और अगर हो भी जाए तो तलाक का धब्बा सहज तरीके से जीने नहीं देता और इस पर भी, दूसरे जीवनसाथी के मनमाफिक होने की गारंटी नहीं रहती.

तो फिर तलाक के बाद क्यों न पहले जीवनसाथी की तरफ सुलह का हाथ बढ़ाया जाए, इस अहम सवाल पर वंदना और शशिकांत के मामले से सोचा जाए तो बात बन सकती है.

तलाक के बाद अधिकांश पतिपत्नी अवसाद में ही जीते नजर आते हैं खासतौर से उस सूरत में जब तलाक की कोई ठोस वजह न हो. ज्यादातर तलाकों की वजह बेहद हलकी होती है. ऐसा आएदिन के मामलों से उजागर भी होता रहता है. अगर शादी के बाद एक साल या उस से भी ज्यादा का वक्त पतिपत्नी ने एकसाथ गुजारा है तो एकदूसरे को भुला देना उन के लिए आसान नहीं होता.

तलाक के पहले परिवार परामर्श केंद्र, अदालत और काउंसलर सोचने के लिए वक्त देते हैं लेकिन उस वक्त पतिपत्नी दोनों के दिलोदिमाग में इतना गुस्सा व नफरत का गुबार भरा होता है कि वे सोचते कम, झल्लाते ज्यादा हैं.

तलाक के बाद की दुश्वारियां, अकेलापन, अपनों की अनदेखी वगैरा उन्हें समझ आने लगती हैं. पर चूंकि तलाकशुदा पतिपत्नी की दोबारा शादी की पहल किसी भी स्तर पर नहीं होती, इसलिए सुलह की गुंजाइशें होते हुए भी बात नहीं बन पाती. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि भिंड के इस प्रयोग को दोहराया जाए क्योंकि संभव है पति और पत्नी अपनी गलतियां महसूस करते हुए दोबारा साथ रहना चाहते हों.

राजस्थान : लड़कियों से जबरदस्ती, शर्मसार बार बार

24 दिसंबर, 2016 की रात. राजस्थान के चूरू जिले के एक गांव में एक नाबालिग लड़की को अगवा कर गैंगरेप किया गया. इतने पर भी जी नहीं भरा, तो उस पर मोटरसाइकिल चढ़ा दी गई. इस से उस की रीढ़ की हड्डी टूट गई. उस लड़की की एक आंख फोड़ दी गई. बेंगलुरु, कनार्टक के एमजी रोड पर नए साल की पूर्व संध्या के मौके पर कुछ मर्दों ने लड़कियों के साथ हाथापाई की, जबकि वहां पुलिस मौजूद थी.

जयपुर में वहशीपन

राजस्थान की राजधानी जयपुर में भी वहशीपन की सारी हदें पार कर देने वाले 2 ऐसे मामले सामने आए, जो शर्मसार कर देने वाले हैं. पहले मामले में अलवर से जयपुर आई एक लड़की से 3 लड़कों के साथसाथ एक आटोरिकशा ड्राइवर ने रेप किया और उस के बाद बिना कपड़ों के उसे एमएनआईटी के बाहर फेंक कर फरार हो गए. लड़की ने खुद ही कंट्रोल रूम में फोन पर पुलिस को बताया.

डीसीपी ईस्ट कुंवर राष्ट्रदीप ने बताया कि उत्तर प्रदेश की रहने वाली पीडि़त लड़की जगतपुरा में अपने भाई के साथ रह कर सरकारी नौकरी के इम्तिहान की तैयारी कर रही थी. सुबह वह रेलवे स्टेशन पर उतरी और जगतपुरा में अपने भाई के कमरे तक जाने के लिए आटोरिकशे में बैठ गई. इस दौरान आटोरिकशे में 3 और लड़के भी थे.

लड़की को अकेला पा कर आरोपी लड़कों ने आटोरिकशा को सुनसान जगह पर रुकवाया और लड़की के मुंह पर कपड़ा बांध कर उस के साथ बारीबारी से रेप किया. रेप के बाद तीनों लड़के वहां से फरार हो गए, उस के बाद आटोरिकशा ड्राइवर ने भी उस के साथ रेप किया.

इस वारदात के बाद पुलिस ने शहरभर में नाकाबंदी कराई और लड़की को ले कर सिंधी कैंप बसस्टैंड और रेलवे स्टेशन पहुंची, जहां पीडि़ता से संदिग्ध आटोरिकशा ड्राइवर की शिनाख्त कराई गई. पीड़िता ने पुलिस को बताया कि वे तीनों लड़के हिंदी में बातें कर रहे थे और उस से पूछा कि कहां की रहने वाली हो और यहां क्या करती हो. उस पीडि़ता ने बताया वे तीनों आटोरिकशे में पहले से ही बैठे हुए थे. उन्हें कहां जाना था, इस बारे में वह नहीं जानती.

दूसरा मामला जयपुर के ही सांगानेर थाना इलाके का है. यहां 57 साल के एक टीचर ने अपनी ट्यूशन छात्रा, जिस की उम्र 16 साल बताई जा रही है, के साथ रेप कर दिया. पुलिस ने इस मामले में आरोपी टीचर को गिरफ्तार किया है. सांगानेर थाना पुलिस ने बताया कि नागरिक नगर, सांगानेर की पीडि़त लड़की के परिवार वालों ने मामला दर्ज कराया कि विरेंद्र सारस्वत नाम के टीचर ने यह करतूत की थी.

दरिंदगी की हदें पार

राजस्थान के चूरू जिले में भी दरिंदगी का एक मामला सामने आया.    2 लड़कों ने एक लड़की का रेप कर उस की रीढ़ की हड्डी व पसलियां तोड़ दीं. उन दरिंदों ने पीडि़ता की एक आंख भी फोड़ दी. इस के बाद वह लड़की जयपुर के एसएमएस अस्पताल में कई दिनों तक जिंदगी और मौत से जूझती रही.

यह वारदात बीदासर थाना इलाके के गांव सांरगसर की है. बीदासर थानाधिकारी प्रहलाद राय के मुताबिक, पीडि़ता के पिता ने रिपोर्ट दी है कि 24 दिसंबर, 2016 को 15 साला पीडि़ता अपने घर पर पढ़ाई कर रही थी. रात 11 बजे गांव भोमपुरा का एक बाशिंदा राकेश भार्गव अपने रिश्तेदार के एक लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर आया और वे दोनों पीडि़ता को जबरदस्ती मोटरसाइकिल पर बिठा कर ले गए. आरोपियों ने गांव से एक किलोमीटर दूर चरला रोड पर ले जा कर उस के साथ ज्यादती की.

उस के बाद आरोपियों ने उसे किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी और मोटरसाइकिल चढ़ा कर उस की रीढ़ की हड्डी व पसलियां तोड़ दीं. उस की एक आंख भी फोड़ दी. शरीर के कई हिस्सों पर गहरे घाव कर के उसे लहूलुहान हालत में मौके पर छोड़ कर भाग गए.

25 दिसंबर, 2016 की दोपहर 3 बजे पीडि़ता की मां के पास राकेश के मातापिता आए और उन्होंने लड़की के घायल होने की जानकारी दी. तब घर वालों को पता चला.

परिवार वालों ने पीडि़ता को सुजानगढ़ के अस्पताल में भरती कराया, जहां से उसे गंभीर हालत में पहले बीकानेर और फिर जयपुर भेज दिया गया. पीडि़ता का पिता गुजरात में मजदूरी करता है. घटना का पता चलने पर वह वहां आया और मामला दर्ज कराया.

राजस्थान पुलिस के मुताबिक, साल 2008 में रेप के 568 मामले दर्ज हुए थे. पिछले साल 2016 में यह तादाद बढ़ कर 3,769 हो गई. ये आंकड़े भयावह इसलिए भी हैं, क्योंकि 75 फीसदी आरोपी सुबूतों की कमी में बाइज्जत बरी हो जाते हैं. वैसे, साल 2015 में देशभर में दुष्कर्म के कुल 37,413 मामले हुए. इन में सब से ऊपर मध्य प्रदेश (5,076), राजस्थान (3769), उत्तर प्रदेश (3,467), महाराष्ट्र (3,438) जैसे राज्य ही थे. महानगरों की बात हो, तो दिल्ली (1,813), मुंबई (607), चेन्नई (65), बेंगलुरु (104) और कोलकाता (36) सब से आगे थे.

जयपुर की एक लीगल फर्म के मुताबिक, लापरवाही से की गई जांच, एफआईआर में देरी, आरोपियों के वकील का पीडि़ता के प्रति आक्रामक रुख और अदालतों में संवेदनशीलता की कमी इस की अहम वजह रही हैं. सजा की दर भी इसलिए कम है, क्योंकि ज्यादातर पीडि़ता चुपचाप ज्यादती सह जाती हैं. अगर पीडि़ता समाज के तानों की परवाह न करे, तो उसे पुलिस और कानून से इंसाफ मिलने की उम्मीद कम रहती है. साल 2015 में हुई एक स्टडी के मुताबिक, भारत में पति द्वारा जबरन सैक्स के सिर्फ 0.6 फीसदी यानी 167 में से महज एक केस ही दर्ज होता है.

दिखाया जज्बा

बेंगलुरु में 2 शोहदे एक लड़की से बेशर्मी के साथ छेड़छाड़ करते रहे और आसपास के लोग तमाशबीन और चुप ही रहे, लेकिन राजस्थान के चूरू जिले के राजगढ़ कसबे में जो घटा, वह सजगता की एक मिसाल बन गया है. यह किस्सा महशूर ओलिंपियन एथलीट कृष्णा पूनिया की बहादुरी की भी एक नजीर है.

कृष्णा पूनिया ने बताया कि रविवार की दोपहर दिन के डेढ़ बजे जब वे  सादुलपुर कसबे की कृष्णा बहल रोड से गुजर रही थीं, तो पिलानी रेलवे फाटक बंद था. वहां 3 बदमाश 2 किशोरियों पर फब्तियां कस रहे थे और छेड़खानी कर रहे थे. छेड़छाड़ करते हुए उन बदमाशों ने लड़कियों को जमीन पर गिरा दिया और मोटरसाइकिल से भागने लगे. इस घटना को बहुत से लोग देख रहे थे, लेकिन कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला. सभी तमाशबीन खडे़ थे.

लड़कियां छेड़छाड़ से परेशान थीं और रो रही थीं. कृष्णा पूनिया अचानक कार से उतरीं और उन तीनों बदमाश लड़कों के पीछे दौड़ पड़ीं. उन्होंने 50 मीटर दौड़ने के बाद एक लड़के को धर दबोचा और पुलिस को फोन किया.

लड़कियां कह रही थीं कि अगर उन के घर वालों को इस घटना का पता लगा, तो वे आइंदा उन्हें घर से बाहर नहीं निकलने देंगे. लेकिन कृष्णा पूनिया ने किशोरियों को हौसला दिया और उन्हें उन के घर पर छोड़ कर आईं. वे पुलिस स्टेशन भी गईं और पुलिस अफसरों को नसीहत दी कि आखिर थाने के ठीक पास ही बदमाश इस तरह लड़कियों से कैसे छेड़छाड़ कर रहे हैं.

बीजिंग और लंदन ओलिंपिक में भारत की नुमाइंदगी कर चुकी कृष्णा पूनिया हरियाणा से हैं और चूरू जिले में उन की ससुराल है. इन दिनों वे राजनीति में हैं, लेकिन उन में एक बहादुर खिलाड़ी का जज्बा आज भी बरकरार है.

बेंगलुरु और राजगढ़ की ये दोनों घटनाएं एक ही समय में घटित हुई हैं, लेकिन एक में भीड़ के बीच खड़ी एक हिम्मती खिलाड़ी कृष्णा पूनिया ने पूरे हालात को ही बदल दिया और दूसरी में एक आधुनिक कसबे की जनता का वह तबका शर्मसार है, जो घटना के समय चुप्पी साधे रहा.

हद तो यह है कि बेंगलुरु की इस घटना के बाद कर्नाटक के गृह मंत्री डाक्टर जी. परमेश्वरा ने यह तक कह दिया कि नए साल और दूसरे ऐसे मौकों पर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहा है कि राजस्थान का भी एक पक्ष है, जहां गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने अभी तक कृष्णा पूनिया की तारीफ नहीं की है, क्योंकि वे कांग्रेस से जुड़ी हैं.

सवाल यह उठता है कि क्या यह देश औरतों व लड़कियों के लिए महफूज नहीं है  क्या वे हमेशा यह डर साथ ले कर घर से बाहर निकलें कि कोई न कोई उन के साथ कुछ बुरा सोच कर तैयार बैठा है और वे हमेशा डरती रहें

आखिर हमारी सरकार, पुलिस और समाज का पूरा तबका अपनी सोच कब बदलेगा  ऐसे में यही बेहतर है कि हर लड़की कृष्णा पूनिया की तरह बन जाए और छेड़छाड़ करने वालों को गरदन से दबोच कर पुलिस के हवाले कर दे.

धर्म की बेड़ियों में फंसी औरत

सभी धर्मों, धार्मिक ग्रन्थों और वेदों में, स्त्री के रूप और व्यवहार की जो चर्चा की गई है वह औरत की व्यथा का बयान ही है. कोई भी धर्म महिलाओं के प्रति संवेदनशील नहीं रहा है, तो क्यों कर हम इन धार्मिक पाखंडों का लबादा ओढ़े रखें. अब हम उन धार्मिक नारियों (सीता, द्रौपदी, सावित्री, मेनका आदि) को अपना रोल मौडल मानने से भी इनकार करते हैं जो आजीवन मूक और बधिर बनी रहीं क्योंकि उन्होंने अशिक्षा के कारण पंडों की नजर से देखा, पर आज की महिलाएं शिक्षित हैं, तो अपना भलाबुरा धर्म और इन पंडों की नजरों से क्यों देखें. अपना भलाबुरा पहचानने की हम में अब समझ भी है और परखने की हिम्मत और हौसला भी है.

‘धर्म की बेड़ियां खोल रही है औरत’ पुस्तक में अस्मिता के इन्हीं उद्देश्यों के अनुसार ही धर्म में स्त्री की छवि को दर्शाते हुए उसे धार्मिक आडंबरों से बाहर लाने की कोशिश शब्दों द्वारा की गई है. हमेशा औरत को धर्म का अनुगमन करने पर क्यों विवश किया जाता है. वह आज इस धर्म का पल्ला छोड़ना चाहती है तो ये पंडे, पुजारी, मौलवी क्यों उसे उसी ओर धकेलते हैं. समाज में स्त्री की इस दुर्दशा का कारण धर्म ही है.

इस पुस्तक में पौराणिक और साहित्यिक कथाओं के स्त्रियोचित व्यवहार और विशेष रूप से स्त्रीप्रधान चरित्रों को उजागर करने की संकल्पना की है, जिस से नारी जीवन में प्रेरणा और एक नई सोच की नियति पैदा होती है.

आधुनिक नारी की परिभाषा देते हुए नीलम आधुनिक नारी के विचारों को इस तरह बयां करती हैं : ‘रामायण व महाभारत की स्तुति सैकड़ों वर्षों से इस समाज में इसलिए हो रही है कि स्त्रियां द्रौपदी, गांधारी बनी आंसू बहाती रहें, इन पुरुषों की सत्ता ऐसे ही निर्बाध बनी रहे.’ फिर लड़कियों के स्वर को ऊंचा करती हैं, ‘हमें अपने ये रोल मौडल स्वीकार्य नहीं हैं.’

धर्मों की बात करते हुए हिंदू धर्म में सब से पहले वर्णन सीता का आता है. इस पर डा. उमा देशपांडे सीता को जहां अमर्यादित पुरुष राम की पत्नी बताती हैं वहीं उर्मिला को मौन व खोखली सामाजिक मान्यता का दर्जा डा. नलिनी पुरोहित अपनी कविता ‘उर्मिला का टूटता मौन’ में देती हैं.

इसी तरह हिंदू धर्म की अन्य नारियों जैसे द्रौपदी, सावित्री, सती, तारामती, कुंती, गांधारी, मेनका आदि के उदाहरणों से भी नारी के चरित्र का तार्किक चित्रण उकेरा गया है. इस बात की स्पष्टता इन शब्दों में झलकती है :

‘‘क्यों रहूं घेरे में बंद खींची गई लक्ष्मण रेखा के मध्य मैं भी हूं मजबूत इतनी कि खींच सकती हूं रेखा किसी को रखने के लिए.’’

नीलम कुलश्रेष्ठ (संपादक) अपनी कथा ‘सति इतिकथा’ में सती को चरितार्थ करती हैं कि क्या सती अपने लंबे सुहाग के लिए ही सबकुछ नहीं कर रही थी, तो उस में इस का ही भला निहित था? लेकिन यह भी गलत नहीं है कि धर्मगुरुओं ने ही पति को श्रेष्ठ मानने के लिए एक स्त्री को आमादा किया है और यही धर्मगुरु एक स्त्री के साए से भी घृणा करते हैं. यह स्पष्ट है नीलम के ही आलेख ‘स्वामीनारायण धर्म की शिक्षापत्री और स्त्री’ के शब्दों में :

‘‘स्वामीनारायण धर्म के धार्मिक गुरुओं की संकीर्ण मानसिकता का परिचय मुझे तब मिला जब एक विवाह समारोह में हम स्त्रियों से यह कहा गया कि हम सब स्टेज की तरफ जाने वाले रास्ते की तरफ से मुंह फेर कर खड़ी हो जाएं क्योंकि वरपक्ष के स्वामीनारायण मत के गुरु वरवधू को आशीर्वाद देने आ रहे हैं.’’

स्त्री से इतनी घृणा करने वाले ये धर्मगुरु किस प्रकार समाज का भला कर सकते हैं क्योंकि स्त्री भी समाज का ही एक हिस्सा है. इस पर ये धर्मगुरु भी इन धार्मिक ग्रंथों को गलत मानते हैं. ‘क्या धर्म का प्रचार जरूरी है’ आलेख में गीताबेन शाह के शब्द भी यही स्वीकारते हैं, ‘रामायण, महाभारत व गीता सब राजनीति ही है. यदि हम राम व कृष्ण को भगवान का अवतार मानते हैं तो उन्होंने भी तो राजकुटुंब में जन्म लिया था, किसी राजकुटुंब का काम राजनीति के बिना चल नहीं सकता तो धर्म व राजनीति अलग कहां हुए?’

स्वामीनारायण धर्म की शिक्षापत्री में तो विधवा स्त्री को संक्रामक रोग का दर्जा दिया जाता है तो इस धर्म का लोग, खासकर औरतें क्यों अनुगमन करें.

हर धर्म में स्त्री की तुलना या तो जानवर से की गई है या फिर किसी रोग से. और यह दर्जा देने वाले ये धार्मिक गुरु इन्हीं महिलाओं के कंधों पर धर्म की बंदूक रख कर चला रहे हैं. इन धर्मग्रंथों में अपनी इतनी बुरी स्थिति पाते हुए भी महिलाएं अभी तक क्यों धर्म के भंवर में फंसी हुई हैं? यह सवाल बारबार जेहन को मथता है. अगर इस भंवर से औरतें निकलना चाहती हैं तो सब से पहले खुद को अबला कहना व समझना छोड़ें और फिर अबला बनाने वाले इन पंडों- मौलवियों को इस समाज से बहिष्कृत करें.

इस पुस्तक में कई जगह पर ऐसे धार्मिक पहलुओं पर प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं, जिन से धर्म में स्त्री की क्षतविक्षत दशा का बोध होता है. पुस्तक में खास बात यह भी है कि इस में सभी कुछ (एक कविता को छोड़ कर) स्त्रियों द्वारा ही लिखा गया है. ऐसे में एक पुरुष (कार्तिक साराभाई) का अपनी कविता के माध्यम से पुरुषों पर ही आक्षेप सचमुच सराहनीय है. साथ ही इस में मल्लिका साराभाई, किरण बेदी, मृदुला गर्ग, उमा देशपांडे जैसी हस्तियों ने अपने शाब्दिक हस्ताक्षर दे कर इसे और भी सशक्त बना दिया है.

भिखारी बनाते धर्म के ठेकेदार, अपना भरते घरबार

अगर आप इन दिनों बिहार और झारखंड में होली (या दीपावली के बाद) आएंगे, तो कुछ औरतें और मर्द हाथ में सूप लिए गलीमहल्ले, दुकान, हाटबाजार, बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन, भीड़भाड़ वाली दूसरी जगहों पर घूमते दिख जाएंगे, जो छठ व्रत करने के नाम पर भीख मांग रहे होते हैं. वैसे, स्थानीय लोगों को मालूम रहता है कि ये सब भीख मांगने वाले लोग छठ व्रत बिलकुल भी नहीं करते हैं.

दरअसल, ऐसे लोग छठ व्रत के नाम पर अपनी कमाई करने के लिए भीख मांग रहे होते हैं, क्योंकि साल में 2 बार छठ व्रत होता है, एक तो दीवाली के बाद कार्तिक महीने में और दूसरा होली के बाद चैत महीने में.

हिंदू धर्म के पंडेपुजारियों और ब्राह्मणों द्वारा सदियों से ऐसी बातों को बढ़ावा दिया गया है कि जिन के पास छठ व्रत करने के लिए रुपएपैसे नहीं हैं, तो वे छठ व्रत के दिनों में भीख मांग कर जमा किए गए पैसे से छठ व्रत मना सकते हैं.

पर अब बहुत से लोग इस धार्मिक पाखंड का फायदा उठा रहे हैं और धड़ल्ले से इस व्रत के कुछ दिन पहले से पीले रंग की धोती पहन कर हाथ में सूप ले कर बाजार व गली में घूम कर भीख मांगते देखे जा सकते हैं.

लेकिन सवाल यह उठता है कि धर्म के नाम पर पंडेपुजारियों और पाखंडियों ने भीख मांगने की कुप्रथा क्यों शुरू की है? इस की वजह यह है कि उन की पाखंड की दुकानें बिना रुकावट के चलती रहें.

भीख देने वालों के मन में भी ये बातें भरने की कोशिश की गई हैं कि भीख देने वाले को भी पुण्य मिलता है. बहुत से लोग धर्म के डर के चलते भीख दे देते हैं.

हालांकि, इस से मन में यह सवाल जरूर पैदा होता है कि भीख लेने वाला छठ व्रत करेगा या नहीं करेगा? लेकिन इस से समाज में भीख मांगने की नई कुप्रथा जरूर शुरू होती है, इसलिए कुछ लोगों के लिए यह कमाई का सब से आसान जरीया बनता जा रहा है.

कुछ लोग इस धार्मिक ढकोसले के नाम पर अपना धंधा शुरू कर देते हैं, तभी तो वे बाजारहाट, सड़क के किनारे, रेलवे स्टेशनों पर, यहां तक कि रेल के डब्बों, ट्रैफिक में भी घुस कर सूप ले कर भीख मांगते नजर आ जाते हैं.

छठ व्रत के दिनों में कुछ दानदाता छठ का सामान भी पूरे अंधविश्वासों के साथ बांटते दिखते हैं और जिन के पास छठ करने की हैसियत नहीं होती है, वे उन से सामान ले कर छठ व्रत करते भी हैं. दूसरों की मदद से पूजा करने वालों की तादाद बहुत थोड़ी ही है, जबकि भीख मांगने वालों की तादाद बहुत ज्यादा बढ़ती जा रही है.

सभी धर्मों के लोगों को यह सीख भी फोकट में दे दी जाती है कि पूजापाठ करने के बाद जरूरतमंदों को भीख देने से पुण्य मिलता है.

यह इसलिए किया जाता है कि लगे दानपुण्य करना साथ रहते लोगों की बुरे वक्त में सहायता करना होता है, इसीलिए काफी तादाद में भीख मांगने वाले लोग मंदिर, मसजिद और गुरुद्वारों के आगे हाथपैर से सलामत और हट्टेकट्टे होने के बावजूद भिखारियों की लाइन में बैठे होते हैं. इस से दानपुण्य का बाजार बढ़ता है.

रमजान के दिनों में भी भीख मांगने वालों की तादाद में एकाएक इजाफा हो जाता है. कुछ लोग सड़क पर मक्कमदीना जाने के लिए और चादर चढ़ाने के नाम पर भीख मांगते देखे जा सकते हैं.

जिन के पास खुद मक्कामदीना जाने की हैसियत और समय नहीं होता है, वे भीख मांगने वाले को कुछ सहयोग दे कर पुण्य का फायदा उठाना चाहते हैं.

भीख मांगने वाले धर्म के नाम पर बेवकूफ बनाते हैं. कई लोग साधुमहात्मा का रूप धारण कर भीख मांगते फिरते हैं. ऐसे ढोंगी बाबाओं का तो असल मकसद भीख मांगना ही होता है, लेकिन लोगों को चमत्कार करने या आशीर्वाद देने का स्वांग भी वे भरते हैं. कई बार तो वे सीधेसादे लोगों को लूट भी लेते हैं.

कुछ ढोंगी और शातिर लोग बेजबान जानवरों का इस्तेमाल कर के भी भीख मांगते फिरते हैं, जो कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है. भीख मांगने के नाम पर विकलांग जानवरों को ‘ईश्वर की कृपा’ बता कर और उन्हें सजासंवार कर गाड़ी में भजन और गाने बजा कर जगहजगह पैसे ऐंठने का धंधा फलफूल रहा है.

इतना ही नहीं, हाथी जैसे बेजबान जानवर को भी गलीगली घुमा कर और बीच सड़क पर आनेजाने वालों को रोक कर लोग भीख मांगते देखे जा सकते हैं.

रोहतास जिले के रहने वाले अजय कुमार का इस धार्मिक बुराई पर कहना है, ‘‘दरअसल, हिंदू धर्म में ब्राह्मणों और पंडेपुजारियों ने एक नया हथकंडा अपनाना शुरू कर दिया है, ताकि उन का धंधा दिनोंदिन फलताफूलता रहे. उन्होंने समाज में एक गलत बात फैला दी है कि जिन की छठ व्रत करने की हैसियत न हो, वे भीख मांग कर भी व्रत कर सकते हैं.

‘‘इस का नतीजा यह हुआ कि भीख मांग कर ज्यादा से ज्यादा लोग छठ व्रत करने लगें और पंडेपुजारियों को पूजापाठ कराने में अच्छी आमदनी होने लगे.’’

सब से ज्यादा बुरा तो तब लगता है, जब लोग राह चलते राहगीरों के आगे सूप और थाली फैला कर भीख लेने के लिए गिड़गिड़ाने लगते हैं. कुछ लोग ट्रैफिक में घुस कर सूप ले कर छठ व्रत के नाम पर भीख मांगने लगते हैं.

कई बार दूसरे देशों से भी लोग यहां की संस्कृति से प्रभावित हो कर घूमनेफिरने आते हैं और इस तरह के लोगों को भीख मांगते देख कर यहां के लोगों के प्रति मन में गलत सोच बना लेते हैं, इसीलिए इस प्रदेश के लोगों को गरीब या पिछड़ा मान लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है.

लिहाजा, जरूरी है कि आम लोगों को भी इस तरह की गलत प्रथा का विरोध करना चाहिए. ऐसे लोगों को भीख देने से बचना चाहिए, ताकि अपने देश प्रदेश की पहचान तरक्की और खुशहाली के लिए बने, न कि भीख मांगने के लिए. दानपुण्य भी भीख ही है, पर दान ठसके और रोब जमा कर वसूला जाता है.

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