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Sociopolitical: अब इस देश में जवानों का बोलना मना है

Sociopolitical: ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा भारत के प्रधानमंत्री रह चुके लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था. उन्होंने माना था कि देश जवानों और किसानों से चलता है. उस के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ के साथसाथ ‘जय विज्ञान’ को भी जोड़ा यानी टैक्नोलौजी की भी बातें होने लगीं. लेकिन आज ‘जय जवान, जय किसान’ और ‘जय विज्ञान’ से जुड़े तीनों समूहों का हाल बेहाल है.

जवानों को दिमागी रूप से पंगु बना कर उन के वेतनमान में बढ़ोतरी तो की गई, लेकिन उन की हालत भी एक नए गुलामों की तरह ही है. वहीं किसानों और मजदूरों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि उन की हालत और भी खराब होती जा रही है.

हमारे देश के वैज्ञानिकों और विज्ञान के छात्रों की हालत भी कुछ खास ठीक नहीं है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में भौतिक शास्त्र व रसायन शास्त्र के बजाय ज्योतिष शास्त्र पढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.

नई आर्थिक नीति लाने वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान, जय किसान’ के सपनों को मटियामेट कर दिया.

कांग्रेस शासित नरसिंह राव व मनमोहन सिंह द्वारा नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद किसानों की जमीनें पूंजीपतियों को दी जाने लगीं. बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों पर दबाव बनाया गया कि वे नई तरह की खेती करें. इस नई खेती के चलते बहुत से किसान कर्ज के जाल में फंस कर खुदकुशी करने लगे.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 1995 से ले कर अब तक तकरीबन साढ़े 3 लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं, जबकि गैरसरकारी आंकड़े इस से भी ज्यादा हैं. सरकारी नीतियों ने इन किसानों को ‘जय किसान’ की जगह ‘मर किसान’ बना दिया.

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद किसानों की हालत सुधरी नहीं, बल्कि बदतर ही हुई और उन्हीं के शासन में जवानों के शव उठाने वाले ताबूत का घोटाला हो गया.

‘जय विज्ञान’ का नारा देने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने श्रम कानूनों में संशोधन किया और ठेकेदारी प्रथा को लागू किया. मजदूरों को न्यूनतम वेतन से भी आधे पैसों पर काम करना पड़ रहा है और उन की मेहनत की कमाई लूट बन कर ठेकेदारों को मालामाल कर रही है. हालत यह हो गई कि सभी सरकारी दफ्तरों में फोर्थ क्लास के कर्मचारी ठेके पर रखे जाने लगे. यहां तक कि डाक्टर और मास्टर भी ठेकेदारी प्रथा के शिकार हो गए. यही हालत ‘श्रमेव जयते’ की भी है.

मोदी सरकार के आने के बाद देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि जवान ही ‘देशभक्त’ हैं और उन्हीं की बदौलत हम सुरक्षित और जिंदा हैं. आप उन पर कोई सवाल नहीं उठा सकते, क्योंकि इस से उन का मनोबल गिरता है. वहां कोई भ्रष्टाचार नहीं है, जाति और धर्म का भेदभाव नहीं है. नतीजतन, ड्यूटी के बाद बैंक या एटीएम की लाइन में अपनी तकलीफ जाहिर करने पर भी किसी शख्स को ड्यूटी पर तैनात जवानों के साथ जोड़ कर देशभक्ति का पाठ पढ़ाते कुछ सिरफिरे मिल जाते हैं. झूठी देशभक्ति के जज्बे दिखा कर सही सवालों को हमेशा छिपाया गया है.

ऐसा नहीं है कि तेज बहादुर यादव का वीडियो वायरल होने से पहले मंत्रियों, अफसरों, मीडिया वालों को इस तरह के गलत बरताव का पता नहीं था. इस वीडियो के आने से पहले भी जवानों की खुदकुशी, डिप्रैशन, अफसरों के बुरे बरताव, छुट्टियां नहीं मिलने व अपने साथियों पर गोली चलाने की खबरें कई बार आ चुकी हैं. यहां तक कि वीके सिंह ने भी माना है कि सेना का जनरल रहते हुए रक्षा सौदों में उन्हें घूस का औफर मिला था. डीजल बेचने या दूसरे सामान की हेराफेरी के मामले भी आ चुके हैं. दबी जबान में औरतों के साथ होने वाली हिंसा की बातें भी सामने आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव ने अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने के लिए सोशल साइट का इस्तेमाल किया, लेकिन यही बात सीमा सुरक्षा बल के अफसरों को नागवार गुजरी. वे इसे अनुशासनहीनता और तय की गई गाइडलाइंस का उल्लंघन मान रहे हैं.

यहां तक कि सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रह चुके जनरल प्रकाश सिंह का भी कहना है, ‘‘जवान ने नियमों का उल्लंघन किया है. कमांडैंट से शिकायत करनी चाहिए थी. डीआईजी, आईजी से शिकायत की जा सकती थी.’’

पूर्व महानिदेशक जनरल प्रकाश सिंह को यह डर है कि जवान इस तरह से करने लगेंगे, तो अनुशासन छिन्नभिन्न हो जाएगा.

तेज बहादुर यादव का कहना है कि इस की सूचना उस ने अपने कमांडैंट को पहले दी थी और बारबार कहने पर भी ऐक्शन नहीं लिया गया. क्या यही सब बातें ‘अनुशासनहीनता’ में आती हैं?

सीमा सुरक्षा बल के जम्मू फ्रंटियर के आईजी डीके उपाध्याय ने यह बयान दिया है कि वीडियो वायरल करने वाला जवान आदतन अनुशासनहीन है. उस के खिलाफ नशे में धुत्त रहने, सीनियर अफसरों के साथ बदसुलूकी करने, यहां तक कि सीनियर अफसर पर बंदूक तानने की शिकायतें आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव का साल 2010 में कोर्ट मार्शल किया गया था, लेकिन उस के परिवार वालों को ध्यान में रखते हुए बरखास्त करने के बजाय 89 दिनों की कठोर सजा सुनाई गई.

इस तरह के आरोप के जवाब में तेज बहादुर यादव कहता है, ‘‘मुझे गोल्ड मैडल समेत 14 पदक मिल चुके हैं. मैं ने अपने कैरियर में कुछ गलतियां भी की हैं, लेकिन बाद में उन में सुधार भी किए हैं.’’

तेज बहादुर यादव के परिवार वालों का कहना है कि जब भी वे घर आते थे, तो खाने को ले कर शिकायत करते थे. उन की पत्नी शर्मिला यादव अफसरों को कठघरे में खड़ा करते हुए पूछती हैं, ‘‘मेरे पति दिमागी तौर पर बीमार या अनुशासनहीन थे, तो उन को देश के संवेदनशील इलाके में बंदूक क्यों थमाई गई?’’

तेज बहादुर यादव की ही तरह बाड़मेर के जागसा गांव के खंगटाराम चौधरी सीमा सुरक्षा बल में थे, जिन्होंने 30 दिसंबर को वीआरएस ले ली थी.

खंगटाराम कहते हैं, ‘‘जवानों को ऐसा खाना खाने को दिया जाता है, जिसे आम आदमी नहीं खा सकता है. उस खाने को जवान मजबूरी में खाते हैं.’’

खंगटाराम के पिता एसके चौधरी का कहना है, ‘‘पहले खुशी हुई थी कि बेटा फौज में गया है, लेकिन वहां की परेशानियों को देख कर लगता है कि अच्छा हुआ कि वह यहां आ गया है और अब साथ में खेती का काम करेगा, तो कम से कम भरपेट खाना तो खाएगा.’’

तेज बहादुर यादव द्वारा लगाए गए आरोप को जब मीडिया ने लोगों से जानने के लिए बात की, तो श्रीनगर में सुरक्षा बलों के कैंपों के आसपास रहने वाले लोगों ने कहा कि बाजार से आधे रेट पर पैट्रोल, डीजल, चावल, मसाले जैसी चीजें मिल जाती हैं.

फर्नीचर के एक दुकानदार ने बताया कि फर्नीचर खरीदने की जिन लोगों की जिम्मेदारी है, वे कमीशन ले कर उन लोगों को और्डर देते हैं, पैसों के लिए सामान की क्वालिटी से भी समझौता करने को तैयार हो जाते हैं.

तेज बहादुर यादव का वीडियो आने के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, वायु सेना और सेना के जवानों ने भी अपनीअपनी बात रखी.

रोहतक के वायु सेना के एक पूर्व जवान ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख कर मौत की गुहार लगाई है, ताकि उसे जलालत भरी जिंदगी से छुटकारा मिल सके.

इस जवान का आरोप है कि वायु सेना के अफसरों को 14 हजार रुपए नहीं देने पर उसे कई झूठे आरोप लगा कर नौकरी से निकाल दिया.

इसी तरह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, मथुरा के जवान जीत सिंह ने मिलने वाली सुविधाओं में भेदभाव का आरोप लगाया है.

सेना के जवान यज्ञ प्रताप ने वीडियो जारी कर सेना के अफसरों पर आरोप लगाया है कि अफसर सैनिकों से कपड़े धुलवाते हैं, बूट पौलिश कराते हैं, कुत्ते घुमाने और मैडमों के सामान लाने जैसे काम करवाते हैं. यह खबर जब मीडिया में आ रही थी, तो उसी समय यह खबर भी आई कि बिहार के औरंगाबाद में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवान बलवीर कुमार ने इंसास राइफल से अपने सहकर्मियों की हत्या कर दी.

पुलिस अधीक्षक सत्यप्रकाश ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि बलवीर कुमार ने छुट्टी पर जाने के लिए आवेदन किया था. उसे छुट्टी नहीं मिल पाई और दूसरे जवानों ने उस पर तंज कसा, तो गुस्से में आ कर उस ने गोलीबारी कर दी.

उसी दिन पुलवामा जिले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल  का जवान वीरू राम रैंगर ने खुद को गोली मार कर खुदकुशी करने की कोशिश की थी.

सेनाध्यक्ष ने जवानों से कहा है कि वे अपनी बात सोशल मीडिया पर नहीं उठाएं. उस के लिए सेना मुख्यालय, कमान मुख्यालय व निचले स्तर के कार्यालयों में शिकायत पेटी रखने की घोषणा की और कहा कि इन पेटियों के माध्यम से उठाए गए मुद्दों को मैं खुद देखूंगा.

हम सभी जानते हैं कि जेल, थानों या दूसरे दफ्तरों में इस तरह के बौक्स पहले से ही वहा रखे हैं और उन पर भी यही लिखा होता?है कि आप की पहचान गुप्त रखी जाएगी और इस को अधिकारी ही खोलेंगे. लेकिन हम इस तरह के बौक्स के परिणाम को भी जानते हैं.

सेना के दफ्तरों में शिकायत निवारण बौक्स अभी तक क्यों नहीं था? जवानों के दर्द को गृह मंत्रालय ने बेबुनियाद बता कर खारिज कर दिया है यानी कम शब्दों में कहा जाए, तो गृह मंत्रालय और अधिकारी जवानों को झूठा बता रहे हैं.

यह हैरानी की बात है कि तेज बहादुर यादव और इरफान ने वीडियो बना कर जो सुबूत सरकार और जनता तक पहुंचाए हैं, उन को सरकार मानने से इनकार कर रही है. क्या जवानों के साथ इस तरह का बरताव नहीं होता है?

ऐसा सवाल सोशल मीडिया पर आ जाने से पूंजीवादपरस्त मीडिया घराने भी इस मामले को उठाने के लिए मजबूर हुए. सीमा सुरक्षा बल के एक जवान इरफान ने 29 अप्रैल को वाराणसी में प्रैस कौंफ्रैंस कर के बताया था कि भारतबंगलादेश सीमा पर अधिकारी तस्करी कराते हैं और जो जवान मुंह खोलने की बात करता है, उसे फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाता है.

इरफान ने बताया कि 15 जनवरी, 2016 को 50 बंगलादेशी भारत में आना चाहते थे, तो उस ने घुसपैठ कराने से इनकार कर दिया. इसी बीच एक घुसपैठिए ने सीमा सुरक्षा बल के कमांडर को फोन कर के इरफान से बात कराई. कमांडर ने इरफान को सभी घुसपैठियों को आने देने के लिए आदेश दिया.

इरफान ने इस घटना की शिकायत जब अधिकारियों से की, तो उसे चुप रहने की नसीहत दी गई. 19 जनवरी की रात जब गेट खोला गया था, तो उस का वीडियो इरफान ने बनाया था. उस की शिकायत भी अधिकारियों से की गई, लेकिन कोई असर नहीं हुआ.

इरफान ने सीमा की बाड़ को काटते और जोड़ते हुए भी कुछ घुसपैठियों को पकड़ा था. उन लोगों ने भी कमांडर के आदेश पर ऐसा करने की बात कबूली थी. इस का वीडियो भी इरफान ने मीडिया के सामने दिखाया था.

इरफान का कहना है कि सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी सीमा पार तस्करी कराते हैं. साथ ही, उस ने यह भी बताया कि लंगर में बंगलादेशी घुसपैठियों को उस ने काम करते हुए देखा था और पूछने पर उसे बताया गया कि कमांडर ने रखा है.

इरफान आगे बताता है कि जब अधिकारियों के सामने तस्करी की कलई खोली थी, तो उसे कमरे में बंद कर के पीटा गया था और सिगरेट से दागा गया था. उस के बाद इरफान सीमा सुरक्षा बल की नौकरी छोड़ कर अपने गांव आ गया.

इरफान ने बताया कि अधिकारी उस के पीछे पड़े हुए हैं और उसे भगोड़ा घोषित करने की धमकी दे रहे हैं. वह सीमा सुरक्षा बल में नहीं जाना चाहता. उस के बाद इरफान के साथ क्या हुआ, किसी को नहीं पता है.

तेज बहादुर यादव, खंगटाराम, जीत सिंह या इरफान का न तो यह पहला मामला है और न ही आखिरी. ऐसा होता रहा है और होता रहेगा.

जब किसान अपनी खेती की जमीन को तथाकथित तरक्की के लिए पूंजीपतियों को नहीं देना चाहते, तो इन्हीं जवानों को भेजा जाता है कि जाओ तुम ‘देशभक्त’ होने का परिचय दो. मजदूर जब अपनी मांगों को ले कर धरनाप्रदर्शन करते हैं या आदिवासी, दलित अपनी जीविका के साधन की मांग करते हैं, तो इन्हीं ‘देशभक्तों’ द्वारा उन का कत्लेआम कराया जाता है. उस समय इन जवानों को ‘देशभक्त’ का तमगा दे दिया जाता है.

जब यही ‘देशभक्त’ जवान अपनी मांगों को उठाते हैं, तो इन को भगोड़ा, अनुशासनहीन, नशेड़ी बना कर सजा मुकर्रर की जाती है. ये जवान उन्हीं मजदूरकिसान के बेटे हैं, जिन पर अफसरों के कहने पर वे लाठियां और गोलियां बरसाते हैं.

अफसरों का वर्ग अलग होता है. वे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, नौकरशाहों के घरों से आते हैं, जिस की न तो जमीन जाती है और न ही जान. इस समाज में जवान, किसान और विज्ञान से जुड़े तीनों समूहों को मिल कर लड़ना होगा, तभी वे जीत सकते हैं, नहीं तो किसी दिन किसान मारा जाएगा, जवान मारा जाएगा और विज्ञान को टोकरी में फेंक दिया जाएगा.

Social Story: गांव देहात में स्मार्टफोन से बदल रही है जिंदगी

Social Story: पिछले 10 सालों में गांवदेहातों में रहने वालों की जिंदगी में सब से बड़ा बदलाव पहले मोबाइल फोन, फिर स्मार्टफोन के रूप में सामने आया है. साल 2011 की जनगणना के सामाजिक और माली आंकडे़ इस बात के गवाह हैं. तमाम तरह की परेशानियों और गरीबी के बाद भी गांवदेहात में तेजी से मोबाइल फोन का इस्तेमाल बढ़ा है. गरीब प्रदेशों में गिने जाने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों में रहने वाले 88 फीसदी और 84 फीसदी घरों में आज मोबाइल फोन का इस्तेमाल होने लगा है. ये प्रदेश राष्ट्रीय औसत 68 फीसदी से कहीं आगे हैं.

गांवों में इस्तेमाल होने वाले दूसरे संसाधनों से भी तुलना करें, तो मोबाइल फोन का इस्तेमाल सब से ज्यादा किया जा रहा है. कच्चे घरों और झोंपडि़यों में रहने वाले लोग भी मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने लगे हैं.

एक ओर गांवों में बिजली न आने से वहां बिजली से चलने वाले उपकरणों का इस्तेमाल घट रहा है, तो दूसरी ओर बिजली से चार्ज होने वाले मोबाइल फोन पर बिजली न होने का कोई ज्यादा असर नहीं हो रहा है.

आज के समय में मोबाइल फोन केवल बात करने तक सीमित नहीं रह गया है. स्मार्टफोन आने के बाद मोबाइल फोन मनोरंजन का सब से बड़ा साधन बन गया है. स्मार्टफोन में मनपसंद गानों के वीडियो देखे जा सकते हैं. इस के जरीए फेसबुक और ह्वाट्सएप जैसे सोशल मीडिया के साधनों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है.

आज 2 हजार रुपए तक की कीमत से स्मार्टफोन मिलना शुरू हो जाता है. गांव के लोगों को स्मार्टफोन में सब से ज्यादा 2 चीजें पसंद आती हैं, वीडियो पर गाने देखना और सुनना. वे चाहते हैं कि फोन का म्यूजिक सिस्टम तेज हो, जिस से आवाज को दूर तक सुना जा सके. वे अब अपनी जिंदगी के हसीन पलों को कैमरे में कैद करना चाहते हैं, इसलिए कैमरा वाला फोन पसंद करते हैं.

गांवों के बाजार में कम कीमत वाले स्मार्टफोन की मांग है, इसलिए ज्यादातर कंपनियां गांव के बाजार को ध्यान में रख कर फोन बनाने लगी हैं. पहले नोकिया और अब माइक्रोसौफ्ट और सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियां गांव के बाजार में अपना कब्जा जमाने में केवल इसलिए पीछे रह गईं, क्योंकि इन के स्मार्टफोन महंगे थे. इन कंपनियों ने पहले गांव के लिए सस्ते मोबाइल फोन बनाए थे, जिन में रेडियो बजता था, पर गांव के लोग अपने मनपसंद गाने या वीडियो डाउनलोड कर के नहीं सुन सकते थे.

सस्ते फोन बनाने वाली कंपनियों ने गांव के बाजार की बदलती पसंद को पकड़ लिया और कम कीमत पर स्मार्टफोन बना कर गांव के बाजार से बड़ी कंपनियों को बाहर कर दिया.

गांवदेहात के बाजार में बिकने वाले 70 फीसदी फोन सस्ते किस्म के लोकल ब्रांड वाली कंपनियों के होते हैं. बड़ी कंपनियों के पुराने मोबाइल फोन ही यहां खरीदे जाते हैं. ब्रांडेड कंपनियों के मोबाइल फोन इसलिए भी नहीं पसंद किए जाते, क्योंकि इन में गाने धीमी आवाज में सुनाई देते हैं. इन का म्यूजिक सिस्टम तेज आवाज वाला नहीं होता है.

बदलाव की हकीकत

गांव में रोजीरोजगार की कमी है. ऐसे में बहुत सारे लोग कामधंधे की तलाश में दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों और विदेशों तक में मेहनतमजदूरी करने जाते हैं. ये लोग स्मार्टफोन से अपने घरपरिवार और करीबी लोगों से जुड़े रहना चाहते हैं. स्मार्टफोन इस में सब से बड़ा रोल अदा कर रहा है.

अब रेल का टिकट लेना हो या ट्रेन का टाइम पता करना हो, इंटरनैट के जरीए यह आसान काम हो गया है, खासकर ट्रेन में टिकट का रिजर्वेशन कराना फोन के जरीए आसान हो गया है.

कई गांवों में यह रोजगार का साधन बन गया है. इस के अलावा स्मार्टफोन मनोरंजन का सब से बड़ा साधन बन गया है. इस में वीडियो डाउनलोड कर के मनपसंद गानों व फिल्मों को देखा और सुना जा सकता है.

स्मार्टफोन में लगने वाले मैमोरी कार्ड में गाने और फिल्म को बाजार से भी डाउनलोड कराया जा सकता है. इस के जरीए कम पैसे में गानों और फिल्मों का मजा लिया जा सकता है. यही नहीं, शादी और दूसरे मौकों के वीडियो तक इस स्मार्टफोन के जरीए बनाए जाने लगे हैं.

गंदी फिल्मों का शौक रखने वाले लोगों के लिए स्मार्टफोन वरदान जैसा हो गया है. वे गुपचुप तरीके से इन का भरपूर मजा लेने लगे हैं. यही वजह है कि गांव के बाजारों में बिकने वाली बेहूदा और कहानी टाइप की किताबों की बिक्री बंद हो गई है. 20 से 25 रुपए खर्च कर के मैमोरी कार्ड में 3 से 5 फिल्में लोड हो जाती हैं. इतना खर्च कर के केवल 1 या 2 किताबें ही मिल पाती थीं. ऐसी किताबों को दूसरों की नजरों से छिपाना मुश्किल काम होता था, जबकि मोबाइल फोन में कैद इन फिल्मों को छिपाना मुश्किल नहीं है.

स्मार्टफोन के बढ़ने से गांव के मनोरंजन में प्रयोग होने वाले दूसरे साधन भी बंद हो गए हैं. आज मनोरंजन के बाजार में गानों के कैसेट और टेपरैकौर्डर गायब हो गए हैं. इसी तरह से रेडियो भी गांव के बाजार से गायब हो गया है.

कुलमिला कर देखा जाए, तो स्मार्टफोन गांव में बातचीत करने के साथसाथ मनोरंजन का भी बड़ा साधन बन कर उभरा है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने गांवगांव अपनी बात को पहुंचाने के लिए मोबाइल फोन का सहारा लिया था. उस ने बड़ी तादाद में एसएमएस के जरीए अपना प्रचार किया.

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव आ रहे हैं. चुनाव लड़ने वाले लोग स्मार्टफोन के जरीए अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कम समय में पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं.

कई जुझारू किस्म के नौजवानों ने स्मार्टफोन का सहारा ले कर ऐसी वीडियो क्लिप बनाईं, जिन्हें देख कर पुलिस और प्रशासन को कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ा. थाना और तहसील की हकीकत को मोबाइल फोन में कैद कर के शहर के बडे़ अफसरों तक पहुंचाने का काम भी गांव के लोग करने लगे हैं, जिस से वहां के सरकारी नौकर गलत काम करने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर होने लगे हैं.

अगर सरकारी लैवल पर इन साधनों को बढ़ावा दिया जाए और इस तरह से मिलने वाली शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए, तो ये फोन गांव के लोगों के लिए बड़े मददगार साबित हो सकते हैं.

मोबाइल फोन पर इन की राय

 जिस तरीके से सरकारी व्यवस्था कंप्यूटर के हवाले हो रही है, सरकार ईगवर्नैंस पर जोर दे रही है, उस से आने वाले दिनों में स्मार्टफोन का इस्तेमाल बढ़ने ही वाला है. इस से गांव के लोग अपनी शिकायत ऊपर के अफसरों तक पहुंचाने में कामयाब हो रहे हैं. वे इसे मनोरंजन का बेहतर साधन बना रहे हैं. इस के जरीए वे सीधे तमाम लोगों से जुडे़ रहते हैं. जिन लोगों के पास पैसा कम है, गरीब हैं, वे भी मिस काल मार कर अपनी बात को पहुंचाने का जरीया खोज ही लेते हैं. परिवार के लोग भी नातेरिश्तेदारों के संपर्क में पहले से ज्यादा रहने लगे हैं. स्मार्टफोन के चलन में आने के बाद गांव में चिट्ठी से खबरों का आदानप्रदान बंद सा हो गया है. आज लोगों में पढ़ाईलिखाई का लैवल भी बढ़ रहा है. गांव के बच्चे भी मोबाइल फोन चलाना सीख चुके हैं.

– शशिभूषण, समाजसेवी, पानी संस्थान.

 पहले मेरे गाने कैसेट पर आते थे. लोगों को सुनने के लिए टेपरैकौर्डर रखना पड़ता था. जब से मोबाइल फोन में गानों को डाउनलोड कर सुनने का तरीका आ गया है, लोग मेरे गानों को मोबाइल फोन पर डाउनलोड कर लेते हैं. इस तरह से लोग जब चाहे गानों को सुन सकते हैं. कुछ समय से लोगों की यह डिमांड होने लगी कि गाने यूट्यूब पर डाले जाएं. जिस से वहां से फोन पर सीधे डाउनलोड किए जा सकें. कई गानों को वीडियो के साथ देखा जाता है.

स्मार्टफोन आने के बाद से गांव के लोगों की मनोरंजन की दुनिया ही बदल गई है. जब हम कहीं जाते हैं, तो लोग हमारे फोटो अपने मोबाइल फोन से ही लेना चाहते हैं. कुछ लोग तो पूरा वीडियो शूट कर लेते हैं. गांव के लोगों में स्मार्टफोन के प्रति लगाव बढ़ा है. यह अब इन के लिए जरूरत की चीज बन गई है. यह बात गांव में रहने वालों को समझ आ चुकी है.

– खुशबू उत्तम, भोजपुरी गायिका.

 जरूरत एक की, मिलते एक हजार

 मोबाइल फोन के बाजार में भी शहर और गांव का अंतर देखने को मिलता है. गांव के लोगों को केवल एक मोबाइल फोन की जरूरत होती है. इस के बावजूद गांव के बाजार में एक हजार किस्म के मोबाइल फोन मिलते हैं. अलगअलग नामों से बिकने वाले ये फोन करीबकरीब एकजैसी कीमत और फीचर्स वाले होते हैं.

ज्यादातर फोन चाइनीज ब्रांड के सस्ते होते हैं. कुछ लोकल फोन भी गांव के बाजार में अपना प्रचारप्रसार करते हैं. सब से ज्यादा फोन उसी कंपनी के बिकते हैं, जो कंपनी दुकानदार को ज्यादा सुविधाएं और कमीशन देती है.

गांव के लोग जब मोबाइल फोन खरीदने दुकानदार के पास जाते हैं, तो दुकानदार अपनी बातों से उन को वही मोबाइल खरीदने के लिए मजबूर कर देता है, जो वह बेचना चाहता है. अगर ग्राहक किसी दूसरे ब्रांड का मोबाइल फोन मांगता भी है, तो दुकानदार कहता है कि इस फोन की जिम्मेदारी उस की नहीं है.

ऐसे में ग्राहक वही मोबाइल लेता है, जो दुकानदार कहता है. अगर मोबाइल कंपनियां अपने ब्रांड का सही प्रचारप्रसार गांव के लोगों के बीच कर सकें, तो ग्राहक को अपनी जरूरत के हिसाब वाला मोबाइल फोन लेने में सुविधा हो सकेगी.

गांव के लोगों को मोबाइल फोन ऐसा चाहिए, जिस से सही तरीके से बात हो सके. इस के लिए जरूरी है कि मोबाइल फोन नैटवर्क को ठीक से पकड़े. गांव में बिजली की परेशानी रहती है, इसलिए मोबाइल फोन की बैटरी लंबे समय तक चलने वाली हो. यह जल्द चार्ज होने वाली होनी चाहिए.

मोबाइल फोन में अब इंटरनैट का प्रयोग बढ़ रहा है. ऐसे में मोबाइल फोन पर इंटरनैट सही से चलना चाहिए. मोबाइल फोन में कीपैड होना चाहिए. क्योंकि टच स्क्रीन चलना थोड़ा मुश्किल होता है. वीडियो फिल्म और गानों को पसंद करने वाले लोग मोबाइल फोन की बड़ी स्क्रीन पसंद करते हैं. ये लोग चाहते हैं कि मोबाइल फोन में पड़ने वाला मैमोरी कार्ड ज्यादा कैपेसिटी का हो, जिस से ज्यादा से ज्यादा गाने और वीडियो लोड हो सकें.

दुकानदार पर निर्भर हैं ग्राहक

बाजार में जरूरत से ज्यादा मोबाइल फोन मुहैया होने से ग्राहक दुकानदार पर निर्भर हो गए हैं. इस के अलावा गांव के बाजार में बिकने वाले मोबाइल फोन अपना प्रचारप्रसार नहीं करते, जिस से ग्राहक उन के फोन की खासीयत को समझ सकें.

गांव के ग्राहकों को मोबाइल फोन के संबंध में बहुत जानकारी नहीं होती है. ऐसे में वे दुकानदार की बताई बात को मानने को मजबूर होते हैं. कई बार वे अपने आसपास के लोगों के फोन को देख कर फोन खरीदने की कोशिश भी करते हैं, तो दुकानदार उन्हें गारंटी न देने का डर दिखा कर रोक देते हैं.

ग्राहकों को चाहिए कि वे मोबाइल फोन खरीदने से पहले अपनी जरूरतों को समझ लें. मोबाइल फोन की कीमत उस में मौजूद फीचर्स से घटतीबढ़ती है. केवल एक दुकान पर देख कर ही मोबाइल फोन न खरीदें.

मोबाइल फोन को खरीदने के पहले आसपास की दुकानों को देख लें. अगर गांव से शहर ज्यादा दूर न हो, तो शहर की दुकान से मोबाइल फोन खरीद सकते हैं. हर मोबाइल कंपनी अपने फोन की वारंटी देती है. फोन लेने से पहले उस की वारंटी जरूर देख लें. फोन का पक्का बिल भी लें. कई बार पक्का बिल न होने की दशा में दुकानदार अपनी कही बात से मुकर जाता है.

मोबाइल फोन लेने के बाद उस की सिक्योरिटी का खास ध्यान रखें, खासकर स्मार्टफोन पानी वगैरह में गिर जाने से जल्दी खराब हो जाते हैं. इन की स्क्रीन जल्दी खराब हो सकती है. कई बार स्क्रीन पर कुछ लगने से वह टूट जाती है. स्क्रीन को महफूज रखने के लिए स्क्रीन गार्ड जरूर लगवा लें.

Social Story: औलाद के फेर में ओझाओं का शिकार औरतें

Social Story: हर शादी शुदा औरत की यही ख्वाहिश होती है कि उस के भी एक औलाद हो. जिन औरतों को औलाद नहीं होती, तो उस के लिए वे हर तरह की कोशिश करने से बाज नहीं आती हैं. दवा, दुआ, तावीज से ले कर तरह तरह की मन्नतें, यहां तक कि औलाद पाने के चक्कर में वे अपना सबकुछ लुटा देती हैं.

रुक्मिणी की शादी को 7 साल बीत चुके थे, पर उस के कोई औलाद नहीं थी. घर वाले भी औलाद न होने के चलते उस पर ध्यान देना कम कर चुके थे.

रुक्मिणी के गांव के एक लड़के ने बताया कि वह एक ओझा को जानता है. उस के पास सैकड़ों औरतों ने झाड़फूंक कराई और वे मां बन गईं.

रुक्मिणी रिश्ते में उस लड़के की भाभी लगती थी. उस ने यकीन कर लिया और उस के साथ उस ओझा के पास चली गई.

ओझा ने बताया कि मामला गंभीर है, इसलिए रुक्मिणी को एक हफ्ता उस के पास रह कर हवन करना पड़ेगा. उस के रहने का इंतजाम हो जाएगा. ओझा की बात सुन कर रुक्मिणी तैयार हो गई.

एक हफ्ते तक औलाद का लालच दे कर ओझा और उस के एक सहयोगी ने रुक्मिणी का यौन शोषण किया और उस से रुपए भी ऐंठे. हां, रुक्मिणी के बच्चा हो गया, तो वह मुंह बंद कर के पति के साथ रहती रही, पर ओझाओं के चक्कर भी लगाती रही.

इसी तरह फरजाना खातून का निकाह हुए महज 2 साल ही बीते थे कि उस की ससुराल वाले फरजाना खातून के पति पर दबाव बनाने लगे कि इस औरत से बच्चा नहीं होगा, तुम दूसरी शादी कर लो. फरजाना उचित इलाज के लिए कहती रही, पर उस की एक न सुनी गई.

ससुराल वालों ने अपने लड़के की दूसरी शादी कर दी. वह दोनों पत्नियों की झाड़फूंक, दुआ तावीज कराता रहा, पर औलाद न हो सकी.

इसी तरह रीता औलाद पाने के चक्कर में एक ओझा के पास गई. ओझा ने कहा कि रात 12 बजे एक पूजा करनी पड़ेगी. उस पूजा से तमाम औरतों को औलादें हुई हैं.

रीता उस की बातों में आ गई. जब आधी रात हुई, तो उस ओझा ने उस के साथ दुष्कर्म किया और डर की वजह से उस की हत्या कर दी. घर वाले जब उसे खोजने लगे, तो कहीं पता नहीं चला.

पुलिस के पास मामला दर्ज कराया गया. पुलिस ने रीता की जमीन में गड़ी लाश बरामद कर उस ओझा को जेल भेज दिया.

एक गांव में बेटा पाने के लिए यज्ञ कराया गया. वहां हजारों औरतें आईं. रोजाना रात को रंगा रंग कार्यक्रम होता. मौके का फायदा उठा कर बहुत सी औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया गया.

चैत नवमी और दुर्गा पूजा के मौके पर उत्तर प्रदेश में कछौसा शरीफ, बिहार में अमझरशरीफ, मनोराशरीफ समेत कई जगहों पर ‘भूतना मेला’ लगता है. वहां ज्यादातर हिस्टीरिया बीमारी से पीडि़त और औलाद की चाह रखने वाली औरतें जाती हैं और अपना सबकुछ लुटा कर घर लौटती हैं.

डाक्टर विमलेंदु कुमार ने बताया कि  औरतों के बच्चा न होने की कई वजहें  हैं, जिन का सही इलाज होने से ही औलाद पैदा हो सकती है. लेकिन बहुत से लोग उचित इलाज नहीं करा कर ओझागुनी, झाड़फूंक के फेर में पड़ कर अपना समय और पैसे की बरबादी के साथसाथ इज्जत तक भी दांव पर लगा देते हैं.

तलाकशुदा पत्नी से दोबारा शादी

शायद ही कभी किसी ने देखासुना हो कि तलाक के 4 साल और अलगाव व खटपट के 12 वर्षों बाद पतिपत्नी ने दोबारा शादी कर ली. मामला कुछ कुछ विचित्र किंतु सत्य है जिस के बारे में जान कर महसूस होने लगा है कि तलाक के बाद पति पत्नियों की हालत या मानसिकता पर कोई एजेंसी अगर सर्वे व काउंसलिंग करे तो पति पत्नी का दोबारा मिल कर उजड़ी गृहस्थी को संवार लेना एक संभव काम है.

तलाक व्यक्तिगत, कानूनी, सामाजिक, पारिवारिक हर लिहाज से एक तकलीफदेह प्रक्रिया है जिस की मानसिक यंत्रणा के बारे में शायद भुक्तभोगी भी ठीक से न बता पाएं. इस के बाद भी तलाक के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं. इस से यही उजागर होता है कि अकसर पति पत्नी या तो गलतफहमी का शिकार रहते हैं या फिर मारे गुस्से के अपना भलाबुरा नहीं सोच पाते. तलाक में नजदीकी लोगों की भूमिका कहीं ज्यादा अहम हो जाती है जो बजाय बात संभालने के, बिगाड़ते ज्यादा हैं.

यह ठीक है कि कुछ मामलों में तलाक अनिवार्य सा हो जाता है पर अधिकांश मामलों में यह जिद व अहं का नतीजा होता है जो खासतौर से पत्नी के हक में अच्छा नहीं होता. समाज के लिहाज से यह दौर बदलाव का है जिस में महिलाएं पहले सी दोयम दरजे की नहीं रह गई हैं. वे हर स्तर पर समर्थ, सक्षम और जागरूक हुई हैं लेकिन तलाक के बाद ये सभी बातें हवा हो जाती हैं जब उन्हें अपने अकेलेपन का एहसास होता है और वे एक स्थायी असुरक्षा में जीने को मजबूर हो जाती हैं.

मुमकिन है कभी कभी उन्हें लगता हो कि तलाक बेहद जरूरी भी नहीं था. इस से बच कर तलाक के बाद की दुश्वारियों से भी बचा जा सकता था लेकिन बात ‘अब पछताए होत का जब चिडि़या चुग गई खेत’ सरीखी हो जाती है. तलाक का कागज उन्हें नए माहौल और हालत में जीना सिखा देता है, इसलिए चाह कर भी वापस नहीं मुड़ा जा सकता क्योंकि तलाक के बाद पति दूसरी शादी कर नई पत्नी के साथ शान से गुजर कर रहा होता है. वहीं, अधिकांश पत्नियां, जो भारतीय संस्कारों से ग्रस्त ही कही जाएंगी, किसी दूसरे को सहज तरीके से पति मानने या स्वीकारने के लिए खुद को तैयार या सहमत नहीं कर पातीं और जब तक खुद को तैयार कर पाती हैं तब तक उम्र का सुनहरा हिस्सा उन के हाथों से फिसल चुका होता है.

शशिकांत संग वंदना

मध्य प्रदेश के भिंड जिले के इस दिलचस्प मामले को बतौर मिसाल लिया जाए तो तलाकशुदाओं के लिहाज से यह एक अच्छी पहल सिद्ध हो सकती है. वंदना और शशिकांत की शादी साल 2001 में हुई थी. ये दोनों साधारण खातेपीते कायस्थ परिवार के हैं और दोनों के ही पिता पुलिस विभाग में नौकरी करते हैं. शादी के बाद वंदना ससुराल आई तो उसे नया कुछ खास नहीं लगा क्योंकि उस का मायका भी भिंड में ही है. संयुक्त परिवार से संयुक्त परिवार में आने से उसे तालमेल बैठाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आई.

शशिकांत प्राइवेट नौकरी करता था. उस की कोई खास आमदनी नहीं थी. संयुक्त परिवारों में खर्चे का पता नहीं चलता, न ही कोई कमी महसूस होती. देखते ही देखते एक साल गुजर गया और वंदना ने एक बच्ची को जन्म दिया जिस का नाम घर वालों ने प्रिया रखा.

शायद आपसी समझ का अभाव था या फिर संयुक्त परिवार की बंदिशें थीं कि दोनों एकदूसरे से असंतुष्ट रहने लगे और जल्द ही आरोपों प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हो गया जिन में कोई खास दम नहीं था. यह बात वक्त रहते दोनों समझ नहीं पाए, लिहाजा रोज रोज की खटपट शुरू हो गई. पतिपत्नी के बीच का तनाव और विवाद उजागर हुए तो दोनों के घर वालों ने दखल देते समझाया पर बजाय समझने के दोनों भड़कने लगे और आखिरकार अपना फैसला भी सुना दिया कि अब हम साथ नहीं रह सकते. लिहाजा, हमारा तलाक करा दिया जाए.

दोनों ही परिवारों की भिंड में इज्जत है, इसलिए घर वाले कतराए, लेकिन तमाम समझाइशें बेकार साबित हो चुकी थीं. दोनों कुछ समझने को तैयार नहीं थे. एक दिन वंदना प्रिया को ले कर अपने मायके चली गई तो शशिकांत ने भी आपा खो दिया और तलाक का मुकदमा दायर कर दिया.

8 साल मुकदमा चला. तारीखें पड़ीं, पेशियां हुईं और आखिरकार 2012 में तलाक यानी कानूनन विवाह विच्छेद इस शर्त पर हुआ कि पत्नी व बेटी को गुजारे के एवज शशिकांत 2 हजार रुपए महीने देगा जो कि कुछ साल उस ने दिए भी.

2014 में शशिकांत ने अदालत में एक अर्जी दाखिल कर अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते भरणपोषण राशि देने में असमर्थता जताई तो अदालत ने भरणपोषण का आदेश रद्द कर दिया. अब तक घर और समाज वालों की दिलचस्पी इन दोनों से खत्म हो गई थी. वंदना मायके में थी लेकिन सहज तरीके से नहीं रह पा रही थी. उधर, शशिकांत को भी लग रहा था कि जो कुछ भी हुआ वह ठीक नहीं हुआ.

शशिकांत और वंदना दोनों कशमकश की जिंदगी जी रहे थे. बेटी प्रिया का भी कोई भविष्य नहीं था और सब से ज्यादा तकलीफदेह बात दोनों का एकदूसरे को न भूल पाना थी. झूठा अहं, गुस्सा और ठसक दम तोड़ रहे थे. दोनों को ही बराबर से समझ आ रहा था कि वे जाने अनजाने  जिंदगी की सब से बड़ी गलती या बेवकूफी कर चुके हैं, पर अब कुछ हो नहीं सकता था, इसलिए कसमसा कर रह जाते थे.

जब सब्र टूटा

बीती 9 अक्तूबर को वंदना बेटी प्रिया को ले कर भिंड के एएसपी अमृत मीणा के दफ्तर पहुंची और बगैर किसी हिचक के उन से कहा कि अब उस के सामने खुदकुशी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. अमृत मीणा ने सब्र से उस की पूरी बात सुनी और तुरंत शशिकांत को तलब किया. थाने में ही उन्होंने दोनों को साथ बैठा कर चर्चा की. 14 साल की होने जा रही प्रिया का हवाला दिया और जमाने भर की ऊंच नीच समझाई तो वंदना और शशिकांत हद से ज्यादा जज्बाती हो उठे और फिर से साथ रहने को तैयार हो गए.

अमृत मीणा भी अपनी पहल और समझाइश का वाजिब असर देखते उत्साहित थे. लिहाजा, उन्होंने इन दोनों की हिचक दूर करते तुरंत दफ्तर में ही उन की दोबारा शादी का इंतजाम कर डाला. दोनों 14 साल का गुबार और भड़ास निकाल चुके थे, इसलिए दोनों शादी के लिए तैयार हो गए ताकि तलाक और अलगाव का एहसास खत्म हो जाए.

एएसपी के रीडर रविशंकर मिश्रा ने पंडित की भूमिका निभाई और मंत्र पढ़ते हुए दोनों की शादी करा दी. 14 साल बाद इन पतिपत्नी ने दोबारा एकदूसरे को जयमाला पहनाई और शशिकांत वंदना को घर ले कर आ गया. बाकायदा विदाई भी हुई, अमृत मीणा अपनी गाड़ी से दोनों को घर छोड़ कर आए. बहुत कम मौकों और मामलों पर पुलिस वालों का मानवीय पहलू देखने में आता है, जो इस मामले में दिखा. दोबारा विवाह का यह अनूठा मामला था. इस प्रतिनिधि ने बीती 25 नवंबर को वंदना और शशिकांत से बात की. दोनों खुश थे. वे बीती बातें नहीं करना चाहते थे जिन में उन्होंने बेहद तनाव झेला था. वंदना की चहक और शशिकांत की परिपक्वता बता रही थी कि वे इस नई जिंदगी से खुश हैं और चाहते हैं कि दूसरे तलाकशुदा पतिपत्नी भी गुस्सा और पूर्वाग्रह छोड़ कर शादी करें. अगर वे ऐसा करते हैं तो पहले जो खो चुके हैं उसे वे मय ब्याज के हासिल कर सकते हैं.

जल्दबाजी, गुस्सा, अहं, जिद और अपनों के ही भड़काने पर पतिपत्नी तलाक तो ले लेते हैं पर इन में से अधिकांश बाद में पछताते हैं. वजह, दूसरी शादी आसान नहीं होती और अगर हो भी जाए तो तलाक का धब्बा सहज तरीके से जीने नहीं देता और इस पर भी, दूसरे जीवनसाथी के मनमाफिक होने की गारंटी नहीं रहती.

तो फिर तलाक के बाद क्यों न पहले जीवनसाथी की तरफ सुलह का हाथ बढ़ाया जाए, इस अहम सवाल पर वंदना और शशिकांत के मामले से सोचा जाए तो बात बन सकती है.

तलाक के बाद अधिकांश पतिपत्नी अवसाद में ही जीते नजर आते हैं खासतौर से उस सूरत में जब तलाक की कोई ठोस वजह न हो. ज्यादातर तलाकों की वजह बेहद हलकी होती है. ऐसा आएदिन के मामलों से उजागर भी होता रहता है. अगर शादी के बाद एक साल या उस से भी ज्यादा का वक्त पतिपत्नी ने एकसाथ गुजारा है तो एकदूसरे को भुला देना उन के लिए आसान नहीं होता.

तलाक के पहले परिवार परामर्श केंद्र, अदालत और काउंसलर सोचने के लिए वक्त देते हैं लेकिन उस वक्त पतिपत्नी दोनों के दिलोदिमाग में इतना गुस्सा व नफरत का गुबार भरा होता है कि वे सोचते कम, झल्लाते ज्यादा हैं.

तलाक के बाद की दुश्वारियां, अकेलापन, अपनों की अनदेखी वगैरा उन्हें समझ आने लगती हैं. पर चूंकि तलाकशुदा पतिपत्नी की दोबारा शादी की पहल किसी भी स्तर पर नहीं होती, इसलिए सुलह की गुंजाइशें होते हुए भी बात नहीं बन पाती. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि भिंड के इस प्रयोग को दोहराया जाए क्योंकि संभव है पति और पत्नी अपनी गलतियां महसूस करते हुए दोबारा साथ रहना चाहते हों.

राजस्थान : लड़कियों से जबरदस्ती, शर्मसार बार बार

24 दिसंबर, 2016 की रात. राजस्थान के चूरू जिले के एक गांव में एक नाबालिग लड़की को अगवा कर गैंगरेप किया गया. इतने पर भी जी नहीं भरा, तो उस पर मोटरसाइकिल चढ़ा दी गई. इस से उस की रीढ़ की हड्डी टूट गई. उस लड़की की एक आंख फोड़ दी गई. बेंगलुरु, कनार्टक के एमजी रोड पर नए साल की पूर्व संध्या के मौके पर कुछ मर्दों ने लड़कियों के साथ हाथापाई की, जबकि वहां पुलिस मौजूद थी.

जयपुर में वहशीपन

राजस्थान की राजधानी जयपुर में भी वहशीपन की सारी हदें पार कर देने वाले 2 ऐसे मामले सामने आए, जो शर्मसार कर देने वाले हैं. पहले मामले में अलवर से जयपुर आई एक लड़की से 3 लड़कों के साथसाथ एक आटोरिकशा ड्राइवर ने रेप किया और उस के बाद बिना कपड़ों के उसे एमएनआईटी के बाहर फेंक कर फरार हो गए. लड़की ने खुद ही कंट्रोल रूम में फोन पर पुलिस को बताया.

डीसीपी ईस्ट कुंवर राष्ट्रदीप ने बताया कि उत्तर प्रदेश की रहने वाली पीडि़त लड़की जगतपुरा में अपने भाई के साथ रह कर सरकारी नौकरी के इम्तिहान की तैयारी कर रही थी. सुबह वह रेलवे स्टेशन पर उतरी और जगतपुरा में अपने भाई के कमरे तक जाने के लिए आटोरिकशे में बैठ गई. इस दौरान आटोरिकशे में 3 और लड़के भी थे.

लड़की को अकेला पा कर आरोपी लड़कों ने आटोरिकशा को सुनसान जगह पर रुकवाया और लड़की के मुंह पर कपड़ा बांध कर उस के साथ बारीबारी से रेप किया. रेप के बाद तीनों लड़के वहां से फरार हो गए, उस के बाद आटोरिकशा ड्राइवर ने भी उस के साथ रेप किया.

इस वारदात के बाद पुलिस ने शहरभर में नाकाबंदी कराई और लड़की को ले कर सिंधी कैंप बसस्टैंड और रेलवे स्टेशन पहुंची, जहां पीडि़ता से संदिग्ध आटोरिकशा ड्राइवर की शिनाख्त कराई गई. पीड़िता ने पुलिस को बताया कि वे तीनों लड़के हिंदी में बातें कर रहे थे और उस से पूछा कि कहां की रहने वाली हो और यहां क्या करती हो. उस पीडि़ता ने बताया वे तीनों आटोरिकशे में पहले से ही बैठे हुए थे. उन्हें कहां जाना था, इस बारे में वह नहीं जानती.

दूसरा मामला जयपुर के ही सांगानेर थाना इलाके का है. यहां 57 साल के एक टीचर ने अपनी ट्यूशन छात्रा, जिस की उम्र 16 साल बताई जा रही है, के साथ रेप कर दिया. पुलिस ने इस मामले में आरोपी टीचर को गिरफ्तार किया है. सांगानेर थाना पुलिस ने बताया कि नागरिक नगर, सांगानेर की पीडि़त लड़की के परिवार वालों ने मामला दर्ज कराया कि विरेंद्र सारस्वत नाम के टीचर ने यह करतूत की थी.

दरिंदगी की हदें पार

राजस्थान के चूरू जिले में भी दरिंदगी का एक मामला सामने आया.    2 लड़कों ने एक लड़की का रेप कर उस की रीढ़ की हड्डी व पसलियां तोड़ दीं. उन दरिंदों ने पीडि़ता की एक आंख भी फोड़ दी. इस के बाद वह लड़की जयपुर के एसएमएस अस्पताल में कई दिनों तक जिंदगी और मौत से जूझती रही.

यह वारदात बीदासर थाना इलाके के गांव सांरगसर की है. बीदासर थानाधिकारी प्रहलाद राय के मुताबिक, पीडि़ता के पिता ने रिपोर्ट दी है कि 24 दिसंबर, 2016 को 15 साला पीडि़ता अपने घर पर पढ़ाई कर रही थी. रात 11 बजे गांव भोमपुरा का एक बाशिंदा राकेश भार्गव अपने रिश्तेदार के एक लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर आया और वे दोनों पीडि़ता को जबरदस्ती मोटरसाइकिल पर बिठा कर ले गए. आरोपियों ने गांव से एक किलोमीटर दूर चरला रोड पर ले जा कर उस के साथ ज्यादती की.

उस के बाद आरोपियों ने उसे किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी और मोटरसाइकिल चढ़ा कर उस की रीढ़ की हड्डी व पसलियां तोड़ दीं. उस की एक आंख भी फोड़ दी. शरीर के कई हिस्सों पर गहरे घाव कर के उसे लहूलुहान हालत में मौके पर छोड़ कर भाग गए.

25 दिसंबर, 2016 की दोपहर 3 बजे पीडि़ता की मां के पास राकेश के मातापिता आए और उन्होंने लड़की के घायल होने की जानकारी दी. तब घर वालों को पता चला.

परिवार वालों ने पीडि़ता को सुजानगढ़ के अस्पताल में भरती कराया, जहां से उसे गंभीर हालत में पहले बीकानेर और फिर जयपुर भेज दिया गया. पीडि़ता का पिता गुजरात में मजदूरी करता है. घटना का पता चलने पर वह वहां आया और मामला दर्ज कराया.

राजस्थान पुलिस के मुताबिक, साल 2008 में रेप के 568 मामले दर्ज हुए थे. पिछले साल 2016 में यह तादाद बढ़ कर 3,769 हो गई. ये आंकड़े भयावह इसलिए भी हैं, क्योंकि 75 फीसदी आरोपी सुबूतों की कमी में बाइज्जत बरी हो जाते हैं. वैसे, साल 2015 में देशभर में दुष्कर्म के कुल 37,413 मामले हुए. इन में सब से ऊपर मध्य प्रदेश (5,076), राजस्थान (3769), उत्तर प्रदेश (3,467), महाराष्ट्र (3,438) जैसे राज्य ही थे. महानगरों की बात हो, तो दिल्ली (1,813), मुंबई (607), चेन्नई (65), बेंगलुरु (104) और कोलकाता (36) सब से आगे थे.

जयपुर की एक लीगल फर्म के मुताबिक, लापरवाही से की गई जांच, एफआईआर में देरी, आरोपियों के वकील का पीडि़ता के प्रति आक्रामक रुख और अदालतों में संवेदनशीलता की कमी इस की अहम वजह रही हैं. सजा की दर भी इसलिए कम है, क्योंकि ज्यादातर पीडि़ता चुपचाप ज्यादती सह जाती हैं. अगर पीडि़ता समाज के तानों की परवाह न करे, तो उसे पुलिस और कानून से इंसाफ मिलने की उम्मीद कम रहती है. साल 2015 में हुई एक स्टडी के मुताबिक, भारत में पति द्वारा जबरन सैक्स के सिर्फ 0.6 फीसदी यानी 167 में से महज एक केस ही दर्ज होता है.

दिखाया जज्बा

बेंगलुरु में 2 शोहदे एक लड़की से बेशर्मी के साथ छेड़छाड़ करते रहे और आसपास के लोग तमाशबीन और चुप ही रहे, लेकिन राजस्थान के चूरू जिले के राजगढ़ कसबे में जो घटा, वह सजगता की एक मिसाल बन गया है. यह किस्सा महशूर ओलिंपियन एथलीट कृष्णा पूनिया की बहादुरी की भी एक नजीर है.

कृष्णा पूनिया ने बताया कि रविवार की दोपहर दिन के डेढ़ बजे जब वे  सादुलपुर कसबे की कृष्णा बहल रोड से गुजर रही थीं, तो पिलानी रेलवे फाटक बंद था. वहां 3 बदमाश 2 किशोरियों पर फब्तियां कस रहे थे और छेड़खानी कर रहे थे. छेड़छाड़ करते हुए उन बदमाशों ने लड़कियों को जमीन पर गिरा दिया और मोटरसाइकिल से भागने लगे. इस घटना को बहुत से लोग देख रहे थे, लेकिन कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला. सभी तमाशबीन खडे़ थे.

लड़कियां छेड़छाड़ से परेशान थीं और रो रही थीं. कृष्णा पूनिया अचानक कार से उतरीं और उन तीनों बदमाश लड़कों के पीछे दौड़ पड़ीं. उन्होंने 50 मीटर दौड़ने के बाद एक लड़के को धर दबोचा और पुलिस को फोन किया.

लड़कियां कह रही थीं कि अगर उन के घर वालों को इस घटना का पता लगा, तो वे आइंदा उन्हें घर से बाहर नहीं निकलने देंगे. लेकिन कृष्णा पूनिया ने किशोरियों को हौसला दिया और उन्हें उन के घर पर छोड़ कर आईं. वे पुलिस स्टेशन भी गईं और पुलिस अफसरों को नसीहत दी कि आखिर थाने के ठीक पास ही बदमाश इस तरह लड़कियों से कैसे छेड़छाड़ कर रहे हैं.

बीजिंग और लंदन ओलिंपिक में भारत की नुमाइंदगी कर चुकी कृष्णा पूनिया हरियाणा से हैं और चूरू जिले में उन की ससुराल है. इन दिनों वे राजनीति में हैं, लेकिन उन में एक बहादुर खिलाड़ी का जज्बा आज भी बरकरार है.

बेंगलुरु और राजगढ़ की ये दोनों घटनाएं एक ही समय में घटित हुई हैं, लेकिन एक में भीड़ के बीच खड़ी एक हिम्मती खिलाड़ी कृष्णा पूनिया ने पूरे हालात को ही बदल दिया और दूसरी में एक आधुनिक कसबे की जनता का वह तबका शर्मसार है, जो घटना के समय चुप्पी साधे रहा.

हद तो यह है कि बेंगलुरु की इस घटना के बाद कर्नाटक के गृह मंत्री डाक्टर जी. परमेश्वरा ने यह तक कह दिया कि नए साल और दूसरे ऐसे मौकों पर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहा है कि राजस्थान का भी एक पक्ष है, जहां गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया ने अभी तक कृष्णा पूनिया की तारीफ नहीं की है, क्योंकि वे कांग्रेस से जुड़ी हैं.

सवाल यह उठता है कि क्या यह देश औरतों व लड़कियों के लिए महफूज नहीं है  क्या वे हमेशा यह डर साथ ले कर घर से बाहर निकलें कि कोई न कोई उन के साथ कुछ बुरा सोच कर तैयार बैठा है और वे हमेशा डरती रहें

आखिर हमारी सरकार, पुलिस और समाज का पूरा तबका अपनी सोच कब बदलेगा  ऐसे में यही बेहतर है कि हर लड़की कृष्णा पूनिया की तरह बन जाए और छेड़छाड़ करने वालों को गरदन से दबोच कर पुलिस के हवाले कर दे.

भिखारी बनाते धर्म के ठेकेदार, अपना भरते घरबार

अगर आप इन दिनों बिहार और झारखंड में होली (या दीपावली के बाद) आएंगे, तो कुछ औरतें और मर्द हाथ में सूप लिए गलीमहल्ले, दुकान, हाटबाजार, बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन, भीड़भाड़ वाली दूसरी जगहों पर घूमते दिख जाएंगे, जो छठ व्रत करने के नाम पर भीख मांग रहे होते हैं. वैसे, स्थानीय लोगों को मालूम रहता है कि ये सब भीख मांगने वाले लोग छठ व्रत बिलकुल भी नहीं करते हैं.

दरअसल, ऐसे लोग छठ व्रत के नाम पर अपनी कमाई करने के लिए भीख मांग रहे होते हैं, क्योंकि साल में 2 बार छठ व्रत होता है, एक तो दीवाली के बाद कार्तिक महीने में और दूसरा होली के बाद चैत महीने में.

हिंदू धर्म के पंडेपुजारियों और ब्राह्मणों द्वारा सदियों से ऐसी बातों को बढ़ावा दिया गया है कि जिन के पास छठ व्रत करने के लिए रुपएपैसे नहीं हैं, तो वे छठ व्रत के दिनों में भीख मांग कर जमा किए गए पैसे से छठ व्रत मना सकते हैं.

पर अब बहुत से लोग इस धार्मिक पाखंड का फायदा उठा रहे हैं और धड़ल्ले से इस व्रत के कुछ दिन पहले से पीले रंग की धोती पहन कर हाथ में सूप ले कर बाजार व गली में घूम कर भीख मांगते देखे जा सकते हैं.

लेकिन सवाल यह उठता है कि धर्म के नाम पर पंडेपुजारियों और पाखंडियों ने भीख मांगने की कुप्रथा क्यों शुरू की है? इस की वजह यह है कि उन की पाखंड की दुकानें बिना रुकावट के चलती रहें.

भीख देने वालों के मन में भी ये बातें भरने की कोशिश की गई हैं कि भीख देने वाले को भी पुण्य मिलता है. बहुत से लोग धर्म के डर के चलते भीख दे देते हैं.

हालांकि, इस से मन में यह सवाल जरूर पैदा होता है कि भीख लेने वाला छठ व्रत करेगा या नहीं करेगा? लेकिन इस से समाज में भीख मांगने की नई कुप्रथा जरूर शुरू होती है, इसलिए कुछ लोगों के लिए यह कमाई का सब से आसान जरीया बनता जा रहा है.

कुछ लोग इस धार्मिक ढकोसले के नाम पर अपना धंधा शुरू कर देते हैं, तभी तो वे बाजारहाट, सड़क के किनारे, रेलवे स्टेशनों पर, यहां तक कि रेल के डब्बों, ट्रैफिक में भी घुस कर सूप ले कर भीख मांगते नजर आ जाते हैं.

छठ व्रत के दिनों में कुछ दानदाता छठ का सामान भी पूरे अंधविश्वासों के साथ बांटते दिखते हैं और जिन के पास छठ करने की हैसियत नहीं होती है, वे उन से सामान ले कर छठ व्रत करते भी हैं. दूसरों की मदद से पूजा करने वालों की तादाद बहुत थोड़ी ही है, जबकि भीख मांगने वालों की तादाद बहुत ज्यादा बढ़ती जा रही है.

सभी धर्मों के लोगों को यह सीख भी फोकट में दे दी जाती है कि पूजापाठ करने के बाद जरूरतमंदों को भीख देने से पुण्य मिलता है.

यह इसलिए किया जाता है कि लगे दानपुण्य करना साथ रहते लोगों की बुरे वक्त में सहायता करना होता है, इसीलिए काफी तादाद में भीख मांगने वाले लोग मंदिर, मसजिद और गुरुद्वारों के आगे हाथपैर से सलामत और हट्टेकट्टे होने के बावजूद भिखारियों की लाइन में बैठे होते हैं. इस से दानपुण्य का बाजार बढ़ता है.

रमजान के दिनों में भी भीख मांगने वालों की तादाद में एकाएक इजाफा हो जाता है. कुछ लोग सड़क पर मक्कमदीना जाने के लिए और चादर चढ़ाने के नाम पर भीख मांगते देखे जा सकते हैं.

जिन के पास खुद मक्कामदीना जाने की हैसियत और समय नहीं होता है, वे भीख मांगने वाले को कुछ सहयोग दे कर पुण्य का फायदा उठाना चाहते हैं.

भीख मांगने वाले धर्म के नाम पर बेवकूफ बनाते हैं. कई लोग साधुमहात्मा का रूप धारण कर भीख मांगते फिरते हैं. ऐसे ढोंगी बाबाओं का तो असल मकसद भीख मांगना ही होता है, लेकिन लोगों को चमत्कार करने या आशीर्वाद देने का स्वांग भी वे भरते हैं. कई बार तो वे सीधेसादे लोगों को लूट भी लेते हैं.

कुछ ढोंगी और शातिर लोग बेजबान जानवरों का इस्तेमाल कर के भी भीख मांगते फिरते हैं, जो कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है. भीख मांगने के नाम पर विकलांग जानवरों को ‘ईश्वर की कृपा’ बता कर और उन्हें सजासंवार कर गाड़ी में भजन और गाने बजा कर जगहजगह पैसे ऐंठने का धंधा फलफूल रहा है.

इतना ही नहीं, हाथी जैसे बेजबान जानवर को भी गलीगली घुमा कर और बीच सड़क पर आनेजाने वालों को रोक कर लोग भीख मांगते देखे जा सकते हैं.

रोहतास जिले के रहने वाले अजय कुमार का इस धार्मिक बुराई पर कहना है, ‘‘दरअसल, हिंदू धर्म में ब्राह्मणों और पंडेपुजारियों ने एक नया हथकंडा अपनाना शुरू कर दिया है, ताकि उन का धंधा दिनोंदिन फलताफूलता रहे. उन्होंने समाज में एक गलत बात फैला दी है कि जिन की छठ व्रत करने की हैसियत न हो, वे भीख मांग कर भी व्रत कर सकते हैं.

‘‘इस का नतीजा यह हुआ कि भीख मांग कर ज्यादा से ज्यादा लोग छठ व्रत करने लगें और पंडेपुजारियों को पूजापाठ कराने में अच्छी आमदनी होने लगे.’’

सब से ज्यादा बुरा तो तब लगता है, जब लोग राह चलते राहगीरों के आगे सूप और थाली फैला कर भीख लेने के लिए गिड़गिड़ाने लगते हैं. कुछ लोग ट्रैफिक में घुस कर सूप ले कर छठ व्रत के नाम पर भीख मांगने लगते हैं.

कई बार दूसरे देशों से भी लोग यहां की संस्कृति से प्रभावित हो कर घूमनेफिरने आते हैं और इस तरह के लोगों को भीख मांगते देख कर यहां के लोगों के प्रति मन में गलत सोच बना लेते हैं, इसीलिए इस प्रदेश के लोगों को गरीब या पिछड़ा मान लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है.

लिहाजा, जरूरी है कि आम लोगों को भी इस तरह की गलत प्रथा का विरोध करना चाहिए. ऐसे लोगों को भीख देने से बचना चाहिए, ताकि अपने देश प्रदेश की पहचान तरक्की और खुशहाली के लिए बने, न कि भीख मांगने के लिए. दानपुण्य भी भीख ही है, पर दान ठसके और रोब जमा कर वसूला जाता है.

जब घर का ही कोई करे छेड़छाड़

तकरीबन रोजाना ही अखबारों में आने वाली रेप की घटनाएं हम सभी को परेशान करती हैं. कोई बड़ी घटना घट जाती है, तो बरसाती मेंढक की तरह कैंडल मार्च और रेपिस्ट को सजा देने की मांग तेजी से उठने लगती है, पर समय के साथ सब शांत हो जाता है और ‘जैसे थे’ उसी तरह हम सभी अपनी आदत के मुताबिक सबकुछ भूल कर अपनेअपने काम में लग जाते हैं.

खैर, अखबारों में आए रेप के मामलों में कम से कम रेपिस्ट पकड़ा तो जाता है, बाकी इस तरह की न जाने कितनी घटनाएं घर की चारदीवारी में ही घटती हैं, जिन के बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं चल पाता. पता चलता भी हो तो अपना होने की आड़ ले कर इस तरह के लोग छूट जाते हैं.

घर में ही छेड़छाड़ और बदसलूकी के मामलों में ज्यादातर टीनएजर्स या कम उम्र के बच्चे शिकार होते हैं. अब तो ऐसे मामलों में लड़के भी महफूज नहीं हैं.

छोटे बच्चों के साथ घर का कोई सदस्य इस तरह का बरताव करता है, तो बच्चा किसी से कहने से डरता है. उस के अंदर ‘मेरी बात कोई नहीं मानेगा तो…? मुझे मारेगा तो…?’ इस तरह का डर ज्यादा होता है.
घर में ही सगेसंबंधियों द्वारा की जाने वाली छेड़छाड़ की घटना में जब कम उम्र के बच्चे शिकार होते हैं, तो उन के अंदर इतनी समझ नहीं होती कि उन के साथ उन के अपने ही यह कैसा बरताव कर
रहे हैं.

उन छोटे बच्चों को कुछ गलत होने का अनुभव तो होता है, पर यह गलत क्या है और इस बरताव के बारे में किस से कहा जाए, इस की समझ नहीं होती.

उन्हें इस बात का भी डर होता है कि मांबाप से कहेंगे तो वे नहीं मानेंगे और उलटा उन्हें ही डांट पड़ेगी. कुछ मामलों में यह भी होता है कि खराब बरताव करने वाला ही मांबाप से न कहने के लिए डराताधमकाता है.

ऐसे मामलों में बच्चों के साथ खराब बरताव करने वाले आदमी को जब पता चलता है कि उस के द्वारा किए गए खराब बरताव की शिकायत बच्चे ने मांबाप से नहीं की है, तो उस का हौसला बढ़ जाता है.
यहां केवल रेप की ही बात नहीं है, गलत तरीके से छूना या खराब इशारे भी इस में शामिल होते हैं. मांबाप इस तरह की शिकायत पुलिस से करने से डरते हैं.

एक एनजीओ के मुताबिक, वैसे तो घरेलू छेड़छाड़ के मामलों में ज्यादातर मांबाप ही ढकने का काम करते हैं. कभीकभी इस तरह के मामले में बच्चा बहुत डर जाता है, जिस की वजह से उस के बरताव में काफी बदलाव आ जाता है. तब मांबाप को साइकोलौजिस्ट की मदद लेनी पड़ती है. दूसरी ओर थाने में इस तरह की शिकायतें कम ही पहुंचती हैं. घर की इज्जत बचाने के चक्कर में घरेलू छेड़छाड़ की शिकायतें मात्र 15 फीसदी ही हो पाती हैं.

इस बारे में पुलिस अफसरों का कहना है कि जब मांबाप अपने बच्चों के साथ खराब बरताव करने वाले से कुछ कहने में खुद को काफी असहज महसूस करते हैं, तो थाने आ कर कहने या शिकायत करने की बात तो बहुत दूर है.

जिस तरह घरेलू हिंसा में थोड़ीबहुत हिंसा होती है, तो ‘औरत को थोड़ा सहन तो करना ही पड़ता है’ यह सोच कर लोग शिकायत नहीं करते, उसी तरह छेड़खानी के मामले में भी ‘ठीक है, अब इस बात को ले कर फजीहत नहीं करवानी, संभल कर चलना चाहिए’ यह सोचने वाले लोग ज्यादा हैं. इस बात को बढ़ाने से कोई फायदा नहीं है, इस तरह की सोच वाले लोग पुलिस तक बात को पहुंचने नहीं देते.

ज्यादातर मामलों में तो यह भी होता है कि लोग जानते ही नहीं कि इस तरह के मामलों में सारी पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जाती है, जिस से आगे चल कर कोई परेशानी न हो.

छेड़छाड़ को छिपाने से छेड़छाड़ करने वाले को बढ़ावा ही मिलता है. बच्चे के साथ जब भी कोई घर का आदमी गलत बरताव करता है और बच्चा इस बारे में मांबाप को बताता है, तो उन्हें उस आदमी के खिलाफ कोई न कोई कदम जरूर उठाना चाहिए. उस आदमी को टोकना चाहिए और अगर इस पर भी वह न माने, तो पुलिस में शिकायत करने की धमकी देनी चाहिए.

ऐसा करने पर छेड़छाड़ करने वाला आदमी बदनामी के डर से अपने कदम पीछे खींच लेगा, जबकि मांबाप ऐसे मामलों में बच्चे को छेड़छाड़ करने वाले आदमी से दूर रहने और जो हुआ उसे भूल जाने की सलाह देते हैं.

छेड़छाड़ करने वाला सगा होने की वजह से संबंध बिगड़ेंगे और घर के दूसरे लोगों को पता चल गया तो बात का बतंगड़ बनेगा, इस डर से लोग कुछ कहते नहीं हैं.

मांबाप का यह बरताव बच्चे के दिमाग पर बुरा असर डालता है. बच्चे का अपने मांबाप के ऊपर से विश्वास उठ जाता है, क्योंकि बच्चे को भरोसा होता है कि कम उम्र में अपने साथ होने वाले गलत बरताव से वे उसे बचा लेंगे. अगर ऐसे समय में मांबाप कुछ नहीं करते, तो बच्चा निराश हो जाता है और उस का मांबाप के ऊपर से भरोसा उठ जाता है.

बच्चे के बदले बरताव को समझें. अकसर ऐसा होता है कि बच्चे के साथ जो हो रहा होता है, बच्चा उस बारे में मांबाप से कह नहीं पाता, पर उस के बरताव में यह बात आ जाती है. ऐसे बरताव के बाद बच्चा डराडरा सा रहने लगता है. उस का स्वभाव बदल जाता है. जो आदमी बच्चे के साथ गलत बरताव कर रहा होता है, उस के पास जाने से डरता है. बच्चे के इस बरताव को मांबाप को समझना चाहिए.

टीनएज लड़की या लड़का है, तो उस का भी बरताव बदल जाता है. मातापिता के रूप में अगर आप को अपने बच्चे के बरताव में बदलाव नजर आए, तो उस से प्यार से बात कर के बदलाव की वजह जानने की कोशिश करेंगे, तो यकीनन वह बता देगा.

याद रखिए, घरेलू छेड़छाड़ में बच्चे को अपने मांबाप पर भरोसा होगा तो वह यकीनन उस के साथ क्या गलत हो रहा है, जरूर बताएगा. पर अगर उसे इस बात का डर हुआ कि मांबाप उसे
ही गलत समझेंगे तो वह नहीं बताएगा, इसलिए बच्चे को इस बारे में सही सीख दें.

मोबाइल जेल की गिरफ्त युवाओं की दुनिया

युवाओं की दुनिया आजकल ऐसे आइडल ढूंढ़ने लगी है जो कुछ करतेधरते नहीं हैं. मोबाइल पर रील्स, चुटकुले, गौसिप, एआई जेनरेटड हाफबेक्ड मोटिवेशनल मैसेज, पौर्न या सैमिपौर्न क्लिप्स ने इन्फ्लुएंसर्स की एक नई खेप तैयार कर दी जो राजनीति के लीडरों जैसे हैं जिन में कोई सौलिड बात कहने की न कैपेसिटी है और न ही कोई उन्हें सीरियसली लेता है.

जिन के लाखों फौलोअर्स हैं, वे पैसे तो कमा रहे हैं लेकिन फिल्मस्टारों से भी ज्यादा गए गुजरे हैं क्योंकि उन्होंने मोबाइल डिवाइस पर जो भी भेजा वह आम व्यूअर्स की जिंदगी को संवारने लायक है ही नहीं. कुछ मिनट बीत जाएं, मैट्रो या बस की जर्नी पूरी हो जाए, रैस्तरां में बैठे किसी के इंतजार में 10-15 मिनट बीत जाएं, इन रील्स की बस यही कीमत रह गई है. इन्फ्लुएंसर्स से ज्यादा इर्रिस्पौंसिबल तो वे व्यूअर्स हैं जो अपने समय की कीमत नहीं समझ रहे.

मोबाइल ने आज हर तरह की इन्फौर्मेशन को आप के हाथ में लाना पौसिबल कर दिया है. यह तो उन युवाओं की गलती है जो इस इंटैलिजैंट इन्वैंशन का इस्तेमाल बेवकूफी के कृत्यों में कर रहे हैं. आजकल जिंदगी कौंप्लैक्स होती जा रही है. सरकारों और कौर्पोरेटों का दखल आम जिंदगी में बढ़ रहा है. औनलाइन फैसिलिटीज के चक्कर में हरेक की प्राइवेसी पर बुरी तरह हमले हो रहे हैं.

मोबाइल में आप क्या देखें, यह कुछ लोगों की कंपनियों के हाथ में है. रील्स या मोटिवेशनल मैसेज आप देखते नहीं हैं, ये आप को दिखाए जाते हैं. यह देखने की आप की इच्छा नहीं जो आप देख रहे हैं बल्कि यह दिखाने की उन कंपनियों की इच्छा है जो इन प्लेटफौर्मों को चला रही हैं. हर मोबाइल ऐप आप के बारे में हरेक छोटी सी बात को भी जानना चाहती है.

अगर कभी आप से कोई गलती हो जाए तो आप की पूरी जिंदगी आप की उस गलती को पकड़ने वालों के हाथों में होगी. तब आप कहीं से भी छूट न सकेंगे. आज कुछ भी छिपाना आसान नहीं है. हैकर्स आप की जानकारी जमा कर आप को कभी भी ब्लैकमेल कर सकते हैं. सब से बड़ी बात यह है कि इस औनलाइन इन्फौर्मेशन, एंटरटेनमैंट, मैसेजिंग के पीछे आप को लूटने की साजिश रची गई है.

पहले आप को काफीकुछ मुफ्त में परोस कर मोबाइल पर बने रहने की लत डाली गई, ऐप्स ने लुभावने सपने दिखाए. फिर आप से पैसे मांगे जाने लगे. कुछ पैसों से शुरू कर ये लोग आप से अब सैकड़ों रुपए सालाना लेने लगे हैं. इन प्लेटफौर्मों पर सरकारों का कड़ा कंट्रोल है.

सरकार जब चाहे जिस प्लेटफौर्म की बांह मरोड़ सकती है. इन प्लेटफौर्मों को पैसा कमाना है, उन्हें व्यूअर्स के राइट्स से कोई मतलब नहीं है. वे सरकारों की हर बात मान रहे हैं. मोबाइलों की वजह से 10 साल पहले इजिप्ट में तख्ता पलट गया था. आज दुनियाभर की सरकारें अपने मतलब के लिए मोबाइल तकनीक का मिसयूज कर रही हैं. ओटीपी के चक्करों में आप को फंसा कर आप के समय को बरबाद किया जा रहा है. मोबाइल रिवोल्यूशन की अभी तो शुरुआत है.

एआई यानी आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस के बाद इन्फ्लुएंसर्स भी कंपनियों के नकली लोग होंगे और व्यूअर्स अपनी असली कमाई देने को मजबूर हो रहे होंगे. टैक्नोलौजी कौर्पोरेट्स की तानाशाही शुरू हो चुकी है और उन की बनाई ‘मोबाइल जेलों’ में करोड़ों लोग पहले से ही फंस चुके हैं. आप किस खेत की मूली हैं.

आजादी का अमृतकाल : दलितों पर जुल्मोसितम की हद

देश में जातिवाद का जहर किस तरह ऊंची जाति वालों की नसनस में भरा है, उस के लिए 27 दिसंबर, 2023 का एक मामला देखिए. उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में एक 18 साल की दलित लड़की को सिर्फ इस बात के लिए गरम कड़ाही में धकेल दिया था, क्योंकि वह अपनी इज्जत से खिलवाड़ करने वालों की खिलाफत कर रही थी.

यह घटना बागपत जिले के बिनौली थाना क्षेत्र के एक गांव की है. पीडि़ता बुधवार, 27 दिसंबर, 2023 को गांव के ही एक कोल्हू की कड़ाही पर काम कर रही थी. तभी तीनों आरोपी प्रमोद, राजू और संदीप वहां आए और उस के साथ छेड़छाड़ करने लगे. इस का विरोध करने पर उन्होंने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उस लड़की के साथ गलत बरताव किया. इतना ही नहीं, उन के अंदर इतना गुस्सा भर गया कि पीडि़ता को जान से मारने के इरादे से उसे गरम कड़ाही में फेंक दिया. इस के बाद वे तीनों वहां से भाग गए.

पीड़िता के भाई की शिकायत पर उन तीनों आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 354 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला), 504 (शील भंग करने के इरादे से अपमान), 307 (हत्या का प्रयास) और अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया.

दूसरे मामले ने तो दिल ही दहला दिया. वहां तो एक दलित लड़के से शादी करने पर एक लड़की का बेरहमी से खून कर दिया गया और ऐसा करने का इलजाम लगा दिया लड़की के मांबाप पर.

दरअसल, तमिलनाडु के तंजावुर जिले में पट्टुकोट्टाई के पास पूवालुर का रहने वाला एक दलित लड़का नवीन अपने पड़ोस के नेवाविदुति गांव की 19 साल की एक लड़की ऐश्वर्या से प्यार करता था.

नवीन और ऐश्वर्या बीते 5 सालों से एकदूसरे को जानते थे और पिछले 2 सालों से तिरुपुर जिले में काम कर रहे थे. उन्होंने आवरापलयम के विनयागर मंदिर में 31 दिसंबर, 2023 को शादी भी कर ली थी.

2 जनवरी, 2024 को इस शादी से गुस्साए ऐश्वर्या के मांबाप अपने रिश्तेदारों के साथ तिरुपुर जिले के पल्लाडम पुलिस स्टेशन पहुंचे और पुलिस से इस मामले में दखल देने की मांग की. थाने में मामला दर्ज कर लिया गया और पुलिस ने ऐश्वर्या को उस के मांबाप को सौंप दिया.

7 जनवरी, 2024 को नवीन ने पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराई, जिस में कहा गया कि ‘वह अनुसूचित जाति से आता है और ऐश्वर्या पिछड़ी जाति से. दोनों के बीच कई साल से प्रेम चल रहा था.’

नवीन की शिकायत के मुताबिक, ‘ऐश्वर्या के पिता अपने रिश्तेदारों के साथ पुलिस स्टेशन गए. आधे घंटे बाद ही पल्लाडम पुलिस स्टेशन से ऐश्वर्या को उस के पिता और रिश्तेदारों ने अपने साथ लिया और पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ी एक कार में बैठ कर चले गए.’

नवीन की शिकायत पर पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में कहा गया कि ‘नवीन को सूचना मिली थी कि 3 जनवरी की सुबह ऐश्वर्या की हत्या कर दी गई थी और स्थानीय लोगों से छिपा कर शव को तत्काल श्मशान में जला दिया गया था.’

पुलिस ने भी अपनी जांच में कहा कि ऐश्वर्या को उस के अभिभावकों ने नेवाविदुति गांव में इमली के पेड़ से लटका दिया था.

अगस्त, 2023. मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक दलित नौजवान की पीटपीट कर हत्या कर दी गई थी. आरोपियों ने उस नौजवान को बचाने पहुंची उस की मां को भी पीटा और उन के कपड़े भी फाड़ डाले.

दरअसल, मारे गए उस नौजवान की बहन के साथ कुछ दिनों पहले आरोपियों ने छेड़छाड़ की थी, जिस का केस दर्ज हुआ था. वे आरोपी पीडि़त परिवार पर राजीनामा करने का दबाव बना रहे थे.

यह घटना सामने आने के बाद पुलिस ने 9 नामजद और 4 दूसरे आरोपियों के खिलाफ हत्या समेत दूसरी धाराओं में केस दर्ज किया. पुलिस ने मुख्य आरोपी समेत 8 आरोपियों को गिरफ्तार भी किया.

मारे गए उस नौजवान की बहन ने कहा, ‘गांव के विक्रम सिंह, कोमल सिंह और आजाद सिंह घर पर आए थे. मां से कहने लगे कि राजीनामा कर लो. मां ने कहा कि जब पेशी होगी, तो उसी दिन राजीनामा कर लेंगे, तो उन्होंने कहा कि क्या आप को अपने बच्चों की जान प्यारी नहीं है? ऐसा बोल कर वे धमकी दे गए कि जो हमें जहां मिलेगा, उस को निबटा देंगे.

‘मेरा छोटा भाई बसस्टैंड के पास सब्जी लेने गया था. वह वहां से लौट रहा था. रास्ते में आरोपी उस के साथ मारपीट करने लगे. वह भागने लगा, तो कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया.

‘मम्मी जब बाजार की तरफ गईं तो देखा कि वे भाई के साथ मारपीट कर रहे हैं. मम्मी उस को बचाने पहुंचीं. आरोपियों ने मम्मी को भी पीटा. जब मैं वहां गई और मोबाइल फोन से पुलिस को काल करने लगी, तो उन लोगों ने मेरे साथ भी मारपीट शुरू कर दी. मैं ने हाथ जोड़े, पैर पड़ कर कहा कि मेरे भाई को छोड़ दो, पर उन्होंने नहीं छोड़ा.’

इस मुद्दे पर कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, ‘मध्य प्रदेश के सागर में एक दलित नौजवान की पीटपीट कर हत्या कर दी गई. गुंडों ने उस की मां को भी नहीं बख्शा. सागर में संत रविदास मंदिर बनवाने का ढोंग रचने वाले प्रधानमंत्री मध्य प्रदेश में लगातार होते दलित व आदिवासी उत्पीड़न और अन्याय पर चूं तक नहीं करते. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री केवल कैमरे के सामने वंचितों के पैर धो कर अपना गुनाह छिपाने की कोशिश करते हैं.’

मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना सही है कि प्रधानमंत्री एक तरफ तो संत रविदास का मंदिर बनवाने का ढोंग करते हैं, पर दूसरी तरफ वे उन पर होने वाले जुल्म पर चुप्पी साध लेते हैं. क्या दलितों के पैर धोने से समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा मिल जाएगा? बिलकुल नहीं, क्योंकि जब तक हर दलित को पढ़ने का हक नहीं मिलेगा, तब तक समाज में जातिवाद की खाई और गहरी होती जाएगी.

एक फिल्म से दलित समाज की हकीकत सम झते हैं, जिस का नाम है ‘गुठली लड्डू’. इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह भारतीय समाज में फैली जातिवाद की सड़ांध नाक के बाल जलाती हुई सीधा दिमाग की नसों में बजबजाने लगती है.

‘अस्पृश्यता अपराध है’ और ‘शिक्षा पर सब का समान अधिकार’ के मुद्दे पर बुनी गई यह फिल्म समाज के उस तबके की जहालत, बेबसी और गरीबी को उजागर करती है, जिसे गलीज सम झा जाता है. वह तबका जो दूसरों की गंदगी साफ करता है और जिस के घर का पानी पीना भी बड़ी जाति के लोगों के लिए हराम है.

साल 2023 में आई इस फिल्म की कहानी के 2 मासूम और मेन किरदार हैं गुठली (धनय सेठ) और लड्डू (हीत शर्मा). ये दोनों दोस्त हैं और छोटी जाति के 2 हमउम्र बच्चे भी. गुठली को पढ़ने का शौक है. या यों कहें कि जुनून है, पर चूंकि वह दलित समाज से है तो उसे स्कूल में घुसने तक नहीं दिया जाता है.

इस फिल्म की कहानी तब अचानक मोड़ लेती है, जब लड्डू अपने बापदादा का पुश्तैनी काम मतलब साफसफाई करने की हामी भर देता है और एक दिन गटर में गिरने से उस की मौत हो जाती है. यह देख कर गुठली का बापू उसी दिन से ठान लेता है कि कुछ भी हो जाए, वह अपने बेटे को स्कूल भेजेगा और इस गटर जैसी गंदी जिंदगी से बाहर निकालेगा.

गुठली के बापू की इसी जद्दोजेहद में फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है और इस हकीकत से रूबरू कराती है कि आज भी अनपढ़ दलित की जिंदगी किस नरक में कट रही है और अगर वह अपने हक की बात करता है, तो उसे लतिया दिया जाता है.

गरीब, अनपढ़ दलितों और साफसफाई करने वालों की असली जिंदगी में  झांकें तो उन की हालत भी गुठली और लड्डू से ज्यादा अच्छी नहीं है. भले ही संविधान ने सब को बराबरी का हक दिया है, पर आज भी न जाने कितने गुठली और लड्डू पढ़ाईलिखाई से कोसों दूर हैं और न चाहते हुए भी छोटी जाति का होने की सजा दूसरों की गंदगी साफ कर के पाते हैं.

‘स्वच्छ भारत’ के हल्ले के बीच साल 2023 के मार्च महीने में हरियाणा के पानीपत में नगरनिगम के गटर की सफाई करते हुए 2 मुलाजिमों की मौत हो गई थी. ऐसा पूरे देश में होता है, पर हैरत की बात तो यह है कि हर साल सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई करते हुए मरने वालों का आंकड़ा कम होने

के बजाय बढ़ता ही जा रहा है. सरकार खुद मानती है कि साल 2019 में पूरे देश में सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई करते हुए 110 लोगों की जानें चली गई थीं.

ऊपर से बड़ी जाति वालों का उन्हें नाली का कीड़ा सम झना. उन के हाथ से पैसे तो वे ले लेंगे, पर अगर गलती से वे बड़ी जाति वाले की साइकिल छू देंगे, तो उस साइकिल को कई बार धोने का रोना रोएंगे.

जुल्म की खास वजहें

सब से बड़ी वजह तो यह है कि दलितों को सभ्य समाज का हिस्सा ही नहीं सम झा जाता है. उन्हें धर्म ने अछूत माना है और हर तथाकथित बड़ी जाति वाले के मन में यह गहरे तक पैठ चुका है कि अनुसूचित जाति के लोगों को नीचा दिखाने और उन पर अपना रोब जमाना उन का जन्मजात हक है. तभी तो कोई दलित मूंछ रख ले तो उसे लतिया दिया जाता है. कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढ़ जाए, तो उसे सबक सिखा दिया जाता है.

अनुसूचित जाति की औरतों और लड़कियों को तो सरेआम शर्मिंदा करने की खबरें आएदिन सुर्खियों में बनी रहती हैं. स्कूलकालेज में धमकाया जाता है. छात्रों को ही नहीं, बल्कि दलित समाज के टीचरों और प्रोफैसरों को भी जाति के आधार पर सताया जाता है. दलित समाज पर जोरजुल्म की घटनाओं के पीछे लोगों की छोटी सोच और इंसाफ में देरी की वजह से लोगों में कानून का डर कम हो रहा है.

कोढ़ पर खाज यह कि लाखों मामले ऐसे होते हैं, जिन में केस दर्ज नहीं किया जाता है या मामले दबा दिए जाते हैं. सागर वाले मामले में नौजवान की हत्या इसीलिए हुई थी कि उस का परिवार राजीनामा नहीं कर रहा था.

आजादी के अमृतकाल में समाज का यह घिनौना रूप उन लोगों पर तमाचा है, जो देश के हर जने की भलाई की बात तो करते हैं, पर हकीकत में उन से होता जाता कुछ नहीं.

‘फुलेरा’ के बहाने अंधविश्वास की खुलती पोल

तकरीबन 4 साल पहले आई दीपक मिश्रा के डायरैक्शन में बनी वैब सीरीज ‘पंचायत’ नौजवान तबके द्वारा काफी पसंद की गई थी, क्योंकि इस में फुलेरा गांव के बहाने भारत की देहाती जिंदगी की झलक दिखाई गई थी, जिस से जब पढ़ालिखा नयानया बना शहरी पंचायत सचिव अभिषेक त्रिपाठी (जितेंद्र कुमार) रूबरू होता है, तो हैरान हो उठता है कि गांव की राजनीति में आज भी दबंगों का रसूख चलता है और उस में भ्रष्टाचार भी जम कर होता है.

इसी वैब सीरीज के एक प्रसंग में अंधविश्वासों का भी जिक्र है. होता कुछ यों है कि एक योजना के तहत गांव में सोलर एनर्जी के 11 खंभे लगाने की मंजूरी मिली हुई है. पंचायत की मीटिंग में सभी रसूखदार अपने घरों के सामने खंभा लगाने का प्रस्ताव पास करा लेते हैं.

एक आखिरी खंभा लगने की बात आती है, तो उसे गांव के बाहर की तरफ पेड़ के पास लगाने का प्रस्ताव आता है. पर गांव वाले मानते हैं कि उस पेड़ पर भूत रहता है.

अभिषेक त्रिपाठी चूंकि एमबीए कर रहा है, इसलिए पढ़ाई की अपनी सहूलियत के लिए चाहता है कि आखिरी बचा हुआ खंभा पंचायत औफिस के बाहर लग जाए, जहां वह एक कमरे में रहता है. भूत वाली बात पर उसे यकीन नहीं होता, इसलिए वह उस की सचाई जानने के लिए निकल पड़ता है.

अभिषेक त्रिपाठी को पता चलता है कि कुछ साल पहले गांव के एक सरकारी स्कूल के मास्टर ने अपनी नशे की लत छिपाने के लिए यह झठ फैलाया था, जो इस कदर चला था कि कई गांव वालों को भूत होने का एहसास हुआ था.

कइयों को अंधेरी रात में उस भूत ने पकड़ा और दौड़ाया था. राज खुलता है, तो सभी हैरान रह जाते हैं और खंभा अभिषेक त्रिपाठी की मरजी और जरूरत के मुताबिक लग जाता है.

देश में इन दिनों भूत वाले एक नहीं, बल्कि कई ?ाठसफेद, कालेहरे, पीलेभगवा, नीले सब इफरात से चल नहीं, बल्कि दौड़ रहे हैं. नशेड़ी मास्टर तो सिर्फ भूत होने की बात कहता है, लेकिन कई लोग बताने लगते हैं कि यह भूत उन्होंने देखा है.

कच्चे चावलों की खिचड़ी बनाने का काम इतने आत्मविश्वास से जोरों पर है कि झठ और सच में फर्क कर पाने के मुश्किल काम को छोड़ लोग झठ को ही सच करार देने लगे हैं कि कौन बेकार की कवायद और रिसर्च के चक्कर में पड़े, इसलिए मास्टरजी जो कह रहे हैं, उसे ही सच मान लो और उस का इतना हल्ला मचाओ कि कोई हकीकत जानने के लिए पेड़ के पास जाने की हिम्मत ही न करे.

गलत नहीं कहा जाता कि झठ के पैर नहीं होते. दरअसल, झठ के मीडिया और सोशल मीडिया रूपी पंख होते हैं, जिन के चलते वह मिनटों में पूरा देशदुनिया घूम लेता है और सच कछुए की तरह रेंगता रहता है.

झठ में अगर धर्म, अध्यात्म और दर्शन का भी तड़का लग जाए, तो वह और अच्छा लगने लगता है. आप लाख पढ़ेलिखे हों, लेकिन आग और ऊर्जा में फर्क नहीं कर पाएंगे और जब तक सोचेंगे और उस पर अमल करेंगे, तब तक गंगा और सरयू का काफी पानी बह चुका होगा.

अब से तकरीबन 28 साल पहले साल 1995 में अफवाह उड़ी थी कि मंदिरों में गणेश दूध पी रहे हैं. बस, फिर क्या था. देखते ही देखते गणेश मंदिरों में भक्त लोग दूध का कटोरा ले कर उमड़ पड़े थे.

जिन्हें गणेश के मंदिरों में जगह नहीं मिली, उन्होंने घर में रखी मूर्तियों के मुंह में जबरन दूध ठूंस कर प्रचारित कर दिया कि उन की मूर्ति ने भी दूध पीया. जिन के घर गणेश की मूर्ति नहीं थी, उन्होंने राम, कृष्ण, शंकर और हनुमान तक को दूध पिला दिया.

उस अफरातफरी का मुकाबला वर्तमान दौर की कोई आस्था नहीं कर सकती, जिस के तहत भक्तों के मुताबिक भगवान ने समोसे, कचौड़ी, छोलेभटूरे, जलेबी और बड़ा पाव भी खाए. सार यह है कि मूर्तियों में इंद्रियां होती हैं और प्राण भी होते हैं. समयसमय पर यह बात अलगअलग तरीकों से साबित करने की कोशिश भी की जाती है.

अब मूर्तियां पलक झपकाएं, हंसें और रोएं भी तो हैरानी किस बात की. हैरानी सिर्फ इस बात पर हो सकती है कि 21 सितंबर, 1995 की आस्था असंगठित थी, उस के लिए कोई समारोह आयोजित नहीं करना पड़ा था और न ही खरबों रुपए खर्च हुए थे. बस, कुछ करोड़ रुपए लिटर दूध की बरबादी हुई थी.

तब भी विश्व हिंदू परिषद ने इसे सनातनी चमत्कार कहा था और दुनियाभर के देशों में रह रहे हिंदुओं ने मूर्तियों को दूध पिलाया था. तब भी मीडिया दिनरात यही अंधविश्वास और पाखंड दिखाता और छापता रहा था.

भारत में नागपंचमी पर नाग को दूध पिलाने का रिवाज है, जबकि यह कोरा अंधविश्वास है, क्योंकि सांप दूध पीता ही नहीं है. लोग यह मानते हैं कि इस दिन सांप को दूध पिलाने से उन की हर इच्छा पूरी होगी, पर यह सच नहीं है.

यह विश्वास या आस्था होती ही ऐसी चीज है, जिस में न होने का एहसास कोई माने नहीं रखता. कोई है और आदि से है और अंत तक रहेगा, यह फीलिंग बड़ा सुकून देती है. फिर चाहे वह पेड़ वाला भूत हो या फिर कोई मूर्ति हो, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता.

सच यही है कि यह एक विचार है और रोटी, पानी, रोजगार और दीगर जरूरतों से ज्यादा देश को विचारों की जरूरत है, जिस से दुनिया देश का लोहा माने कि देखो इन्हें भूखेनंगे और फटेहाल हैं, लेकिन इन के विचार बड़े ऊंचे हैं.

इस चक्कर में देश बेचारों का बन कर रह जाए, इस की परवाह जिन को है वे वाकई बेचारे हैं और पत्थर से सिर फोड़ने की बेवकूफी कर रहे हैं. लेकिन यकीन मानें तो यही वे लोग हैं, जो एक न एक दिन अभिषेक त्रिपाठी की तरह अंधविश्वास के भूत के सच उजागर करेंगे.

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