Hindi Funny Story: कुशल साहब, गुस्सा लाजवाब

Hindi Funny Story: कुरसी पर पसरे चाय की चुसकियां लेते हुए. उन के सामने हाथ में डायरी लिए उन का पीए खड़ा था. क्या पता वे कब क्या बक डालें. वैसे तो साहबजी अपनी कुरसी से जरा भी नहीं हिलते और यही वजह है कि हर 2 महीने बाद उन की घिसाई कुरसी बदलनी पड़ती है, पर इन दिनों वे पिछले महीने से रैगुलर धूप में अपनी गोरी चमड़ी काली करने इसलिए आ रहे हैं कि डाक्टर के पास अपने को चैक करवाने के बाद उस ने उन्हें सलाह दी है कि उन की पाचन पावर तो ठीक है, पर उन की हड्डियां पलपल कमजोर हो रही हैं. वे इन्हें मजबूत रखना चाहते हैं, तो उन्हें सरकारी के साथसाथ कुदरती तौर पर भी विटामिन डी लेना होगा, हर दिन कम से कम 3 घंटे अपने औफिस से बाहर धूप में बैठ कर.

बस, यही वजह है कि वे सुबह  10 बजे औफिस में आते ही बाहर धूप में कुरसी पर पसर जाते हैं, लेट आने वालों की तरफ से अपनी आधी आंखें मूंदे अपना हर अंग करवट बदलबदल कर सूरज को  दिखाते हुए.  कई बार उन के इस तरह कुरसी पर पसरे देख सूरज को भी शर्म आ जाती है, पर उन्हें नहीं आती. उन्हें पता है कि हड्डियों में दम है तो जिंदगी छमाछम है. उस वक्त धूप में आराम से कुरसी पर अपना अंगअंग सेंकते औफिस को भूल अचानक उन्हें पता नहीं क्या सूझी कि उन्होंने अपने सामने खड़े पीए को आदेश दिया, ‘‘पीए…’’ ‘‘जी, साहबजी…’’ ‘‘जनता के फायदे के लिए एक मीटिंग रखो.’’

‘‘पर साहबजी, अभी तो आप को विटामिन डी लेते हुए आधा ही घंटा  हुआ है और डाक्टर ने सलाह दी है  कि कम से कम 2 घंटे तक आप को अपना आगापीछा सूरज को हर हाल में दिखाना है.’’

‘‘तो कोई बात नहीं, 2 घंटे बाद एक मीटिंग रखो.’’ ‘‘जनता के किस फायदे को ले कर सर?’’ ‘‘हमें अपनी जनता को गरमियों से बचाने के लिए कल से ही आपदा तैयारियां युद्ध स्तर पर शुरू करनी हैं

जनता के लिए गरमियों वाला टोल फ्री नंबर जारी करना है और… और….’’ ‘‘लेकिन सौरी सर… माफ कीजिएगा… अभी तो जाड़ों के दिन हैं. उस के बाद वसंत आएगा, फिर गरमी का सीजन… तब तक कौन जाने कि कौन राजा हो और कौन प्रजा… इसलिए मेरा निवेदन है कि जो रखनी ही है तो वसंत की आपदा से जनता को बचाने के लिए मीटिंग रख ली जाए सर…’’

‘‘साहब कौन है… तुम कि हम?’’ वे बदन गरम करते सूरज से ज्यादा गरमाए. ‘‘आप साहब.’’ ‘‘तो कायदे से और्डर किस का चलेगा, मेरा कि तुम्हारा?’’ ‘‘आप का सर.’’ ‘‘तो जो मैं कहता हूं वह करो. अभी लंच टाइम में एक मीटिंग रखो. वैसे भी इन दिनों पूरा औफिस कमरे में हीटर जलाए और धूप सेंकने के सिवा  और कुछ नहीं कर रहा है. मतलब, धूप सेंकने की पगार? जनता के पैसे की बरबादी?’’

‘‘नो सर. दिस इज टोटली गलत सर.’’ ‘‘तो जाओ, अभी एक नोटिस निकालो कि सब के साहबजी ने चाहा है कि जनहित में लंच में गरमियों से निबटने के लिए सरकारी तैयारियों पर आपातकालीन बैठक होनी है.’’ ‘‘जी साहब,’’ पीए उन को मन ही मन गालियां देता अपने कमरे में नोटिस टाइप करने चला गया.

हद है यार, ये साहब जात के जीव समझते क्यों नहीं? हड्डियां क्या साहबों की ही कमजोर होती हैं, उन के मातहतों की नहीं? पता नहीं, ये स्वार्थी कब समझेंगे कि साहबों की कमजोर हड्डियों के बिना देश चल सकता है, पर उन के मातहतों की कमजोर हड्डियों के बिना यह देश कतई नहीं चल सकता.  अरे साहबो, देश हित में कभी अपने मातहतों की हड्डियों के बारे में भी सोचो, तो देश का शुद्ध विकास हो. और लंच टाइम में साहब के कमरे के साथ लगते कौंफ्रैंसरूम में उन के अंडर के सारे अफसर, मुलाजिम उन को गालियां देते जुट गए.

पता नहीं क्या साहब है यह. खुद तो चौबीसों घंटे यहांवहां से खाता ही रहता है, पर उन्हें लंच टाइम में भी उन का अपना लाया लंच तक नहीं खाने देता. जब साहब के पीए ने देखा कि सारे औफिस के लोग आ गए हैं तो उस ने साहब से आदेश मांगते पूछा, ‘‘साहबजी, अब सब आ गए हैं तो जो साहबजी का मन हो तो वे मीटिंग शुरू करवाएं,’’

पीए के दुम दबाए पूछने पर उन्होंने अपनी अकड़ी गरदन और अकड़ाई.  जब उन्हें लगा कि इस से ज्यादा वे अपनी गरदन नहीं अकड़ा सकते, तो उन्होंने बड़े ही मार्मिक स्टाइल से गरमी के सीजन में आने वाली जन आपदा की पीड़ा को अपने मन में महसूसते हुए रुंधे गले से कहना शुरू किया,

‘‘हे मेरे औफिस के परम डियरो, लगता है कि गरमी के सीजन में गरमी की किसी भी आपात स्थिति से निबटने के लिए जनता की रक्षा के लिए अब टोल फ्री नंबर जारी कर दिया जाए, क्योंकि मैं हर मौसम से सौ कदम आगे चलने का हिमायती रहा हूं.

‘‘जनता आपदा में है, तो हम हैं, इसलिए मैं ने चाहा है कि मेरे अंडर खाने… सौरी, आने वाले एरिया में अभी से गरमी से निबटने की तमाम सरकारी तैयारियां शुरू कर दी जाएं, ताकि गरमी खराब होने पर हमारा औफिस अलर्ट  पर रहे. इस के बाद भी जो जनता परेशानी में रहे तो हम कर भी क्या  सकते हैं?’’ ‘‘पर सर, अभी तो जनवरी चल रहा है. ये दिन जी भर कर धूप सेंकने के दिन होते हैं सर.

इस के बाद फरवरी आएगा और फिर मार्च. उस के बाद अप्रैलमई, उस के बाद जूनजुलाई में जा कर कहीं गरमी आएगी.  ‘‘आग लगने से पहले कुआं खुदाई क्यों? कोई जो कूद कर उस में खुदकुशी कर गया, तो मीडिया दोष किस के  सिर मढ़ेगा?’’

‘‘देखो दोस्तो, कोई खुदकुशी करे तो सारा दोष कुएं का. रही बात मीडिया की, तो उस को मैं हैंडल कर लूंगा. कुदरत का कुछ पता नहीं. हमें दुश्मनों पर भरोसा करना चाहिए, पर कुदरत पर बिलकुल भी नहीं. वह चाहे तो जनवरी में भी हमें झुलसा सकती है.

वह चाहे तो फरवरी में भी बाढ़ ला सकती है.  ‘‘हमें तब तक जनता को कुदरत के भरोसे बिलकुल नहीं छोड़ना है, जब तक हम उस के भरोसे हैं. इसलिए हम अभी गरमी से बचने के लिए जनता को टोल फ्री नंबर जारी कर रहे हैं.

‘‘यह टोल फ्री नंबर 24 मिनट, नहीं… सौरी… 24 घंटे लगातार चलेगा, हमारे औफिस का नंबर चले या न  चले, तब गरमी से परेशान कोई भी जरूरतमंद किसी भी हालात में इस नंबर पर हमें मदद के लिए मुफ्त में फोन कर सकता है.

‘‘अब मैं साहब, अपने सभी अफसरों और मुलाजिमों को निर्देश देता हूं कि तुम्हारे द्वारा गरमी के मौसम में जनहित में सभी सुविधाएं अभी से सुचारु रखनी शुरू कर दी जाएं. ‘‘मैं शर्माजी को आदेश देता हूं कि वे मेरे एरिया की जनता के लिए जनता के हित के लिए सड़क के दोनों ओर जल्द से जल्द ऐसे पेड़ लगवाएं, जो 4 महीनों में ही जनता को छाया देने लायक हो जाएं, भले ही पेड़ों की जातियां हमें विदेशों से क्यों न लानी पड़ें. इस के लिए मेरा विदेश जाना तय रहेगा, जितनी जल्दी मुमकिन हो. ‘‘वर्माजी को आदेश दिए जाते हैं कि वे गरमी से जनता को नजात दिलाने के लिए अभी से सड़कों पर पंखे, एसी लगवाने की प्रक्रिया शुरू करवा दें. जनता के लिए सड़क के हर मोड़ पर कूलर लगवाने के लिए सड़कों के मोड़ों की तुरंत गिनती कर रिपोर्ट 4 दिनों के भीतर मेरी टेबल पर आ जानी चाहिए.

‘‘और हां आप… आप कल से ही सड़कों पर जेसीबी मशीनों के साथ  24 घंटे खुद तैनात रहेंगे, ताकि गरमी के सीजन में हवा को सड़क से गुजरने में कोई दिक्कत न हो. सड़कों की देखभाल भी आप ही करेंगे, ताकि गरमी से पीडि़त एंबुलैंस बिना रोकटोक सरकारी अस्पताल पहुंच जाए.

‘‘और ठाकुर साहब आप… आप को आदेश दिया जाता है कि आप गरमी में लू से हताहतों के लिए सरकारी अस्पतालों में अभी से बिस्तरों का मोरचा संभाल लें प्लीज. हम नहीं चाहते कि हमारे राज में गरमियों में कोई भी लू से सड़क पर मरे. ‘‘और पीए साहब आप… आप गरमी से लड़ने के लिए अपने औफिस के संसाधनों की लिस्ट अपडेट कीजिए. जोजो हमारे पास सामान कम हो, उस के लिए टैंडर बुलवाइए.

‘‘इस के साथसाथ आप पुलिस विभाग को मेरी ओर से चिट्ठी भेज दीजिए कि वे लोग कल से ही मेरे इलाके में बचे पेड़ों की शीतल हवा की कड़ी निगरानी करते हुए ईमानदारी से हर जरूरतमंद आम आदमी तक ड्रोन से पहुंचाना पक्का करें.

‘‘गरमियों में उन की हवा दूसरे न चुरा लें, इस के लिए वे हवा की सुरक्षा का भी पुख्ता इंतजाम कर हमें समयसमय पर सूचित करेंगे, यह उन को हमारा आदेश है.  ‘‘और हां, मेरी ओर से सूरज को भी एक कड़ी चेतावनी वाली चिट्ठी लिखी जाए कि जो वह गरमियों में हमारी जनता को त्रस्त करने के लिए सरकार द्वारा तय गरमी के पैमाने से इंच भर भी ज्यादा गरम हुआ, तो हम उस के खिलाफ किसी भी हद तक कार्यवाही करने से गुरेज न करेंगे. हो सकता है कि तब हम उस के अपने पर किए अहसान भी भूल जाएं तो भूल जाएं. हमारे लिए जनहित सब से ऊपर है.

‘‘इसी के साथ यह आपातकालीन मीटिंग खत्म होती है. अगले जनहित को ले कर अगली मीटिंग में फिर मिलेंगे जल्दी ही,’’ साहब ने अपना संबोधन यों खत्म किया, ज्यों उन पर कोई आपदा आ गई हो और फिर औफिस के पिछली ओर के लान में बची धूप में आ कर अपनी हड्डियां मजबूत करने कुरसी पर आड़ेतिरछे पसर गए. Hindi Funny Story

Hindi Family Story: कर्मों का फल – कैसे बदली सुनील की जिदंगी

Hindi Family Story: हजारीबाग की हरीभरी वादियों में बसे टनकपुर गांव की गिनती आदर्श गांवों में होती थी. झिलिया नदी के तट पर बसे इस गांव की आबादी तकरीबन सवा सौ परिवारों की थी.अयोध्या राम गांव के अमीर लोगों में से एक थे. मजबूत कदकाठी के चलते उन की अलग पहचान थी. उन के पास खेतखलिहान, नौकरचाकर थे. वर्तमान समय में किसी चीज की कमी नहीं थी. लेकिन पर्वत्योहार के मौके पर उन की स्वर्गीय पत्नी सुलोचना की याद ताजा हो जाती थी, जिन्होंने बेटे सुनील को जन्म देने के बाद अस्पताल में ही दम तोड़ दिया था.सुनील का लालनपालन अयोध्या राम ने खुद किया था. पुत्र मोह में उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी. पता नहीं सौतेली मां कैसी मिलेगी, यह सोच कर उन्होंने अपने लिए आए हर रिश्ते को मना कर दिया था.

टनकपुर में हर साल हाई स्कूल के निकट बने मंदिर में भारी मेला लगता था, जिस में गांवदेहात में बनी चीजों से ले कर शहर में बने फैंसी सामान तक बिकते थे. 3 दिन के इस मेले में झूले, जादू घर, मौत का कुआं, कठ घोड़वा जैसे मनोरंजन के साधन थे, जो मेला देखने वालों के आकर्षण का केंद्र थे. बच्चों के लिए तरहतरह के खिलौने, औरतों के लिए सजनेसंवरने की चीजें भी खूब बिकती थीं. टनकपुर के आसपास के लोग भी मेले में पहुंचते थे. गांव के लोग बहती झिलिया नदी में स्नान कर मंदिर में पूजाअर्चना करते और मेले में से सामान खरीद कर घर लौट जाते. वहीं बगल में मवेशियों का हाट लगा हुआ था, जहां तरहतरह के मवेशी बिकने के लिए आए हुए थे. मेले में भेड़, बैल, बकरा, मुरगा की लड़ाई की प्रतियोगिता भी होती थी. जीतने वाले पशु मालिकों को नकद इनाम आयोजकों द्वारा दिया जाता था. पशुओं की सेहत व सुंदरता की परख भी की जाती थी.

अयोध्या राम अपने बैलों को नहला कर और रंगबिरंगे रंगों से सजा कर सजी हुई बैलगाड़ी में जोत कर मेले में पहुंचे. बैलगाड़ी को एक पेड़ की छाया में खड़ा कर बापबेटा लिट्टी की दुकान पर चले गए और वहां गरमागरम लिट्टीचोखा और हरी मिर्च का स्वाद लिया. लिट्टी खाते समय सुनील की नजर बकरी के एक नटखट खस्सी पर जा पड़ी. उस का सफेद रंग, शीशे जैसी चमचमाती आंखें, खड़़े कान, उस का उछलनाकूदना और मचलना बहुत ही मनभावन था. सुनील अपने पिता से वह खस्सी खरीदने की जिद करने लगा.

अयोध्या राम ने भी सोचा कि बेटा घर में अकेला रहता है. खस्सी का साथ मिलेगा, तो उस का समय अच्छा कट जाएगा. उन्होंने बिना मोलभाव किए उस खस्सी को 1,000 रुपए में खरीद लिया. घर के अहाते में ला कर खस्सी को छोड़ दिया. सुनील खस्सी के साथ इतना घुलमिल गया कि अब वह उसे अपने बिछावन पर सुलाने लगा. देखते ही देखते 4 साल में वह खस्सी बकरा बन गया. सुनील ने उस की निडरता को देख कर उस का नाम शेरा रख दिया था, साथ ही उस के गले में पीतल की एक घंटी भी बांध दी थी.

जब शेरा उछलताकूदता तो घंटी की ‘टनटन’ की मधुर आवाज सब का मन मोह लेती. पूरे गांव में शेरा की चर्चा होने लगी थी. गांव के मंदिर में फिर मेला लगा और उस में मवेशियों की प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिस में शेरा ने भी भाग लिया. उस ने खस्सी मुकाबला, परेड और दौड़ में पहला नंबर पाया. दूसरे खस्सी उस का मुकबला नहीं कर सके. तीनों प्रतियोगिताओं में सुनील को 3,000 रुपए मिले. शेरा की यह बढ़त कई साल तक जारी रही.

अब टनकपुर के लोग शेरा को इतना प्यार करते, जैसे वह उन के घर का सदस्य हो. वह दिनरात सुनील के साथ रहता, उस के साथ खातापीता और घूमता था. इधर सुनील ने अपने गांव के स्कूल से मैट्रिक पास कर ली थी. अयोध्या राम ने उस का दाखिला रांची के नामीगिरामी कालेज में करा दिया था. कालेज के होस्टल में उस के रहने का इंतजाम हो गया था. कालेज में सीधासादा सुनील बुरे लड़कों की संगत में पड़ गया. गबरी गाय का दूधदही खाने वाला सुनील अब कालेज में नशा करने लगा था. इतना ही नहीं, अब सुनील स्मैक की सप्लाई करने लगा था. वह अपनी फुजूलखर्ची को पूरा करने के लिए अपने पिता से और ज्यादा रुपयों की मांग करता था.

सुनील के ड्रग्स लेने की जानकारी कालेज के शिक्षकों द्वारा प्रिंसिपल तक पहुंच गई. नतीजतन, पहले उसे चेतावनी दी गई और बाद में जब वह नहीं माना, तो प्रिंसिपल ने उसे कालेज से निकाल दिया.

सुनील कालेज से अपना सामान समेट कर अपने घर टनकपुर पहुंचा. बेटे को देख कर अयोध्या राम ने कालेज छोड़ने की वजह पूछी, तो सुनील ने उन्हें बताया कि कोरोना काल में कालेज बंद हो गया है. कालेज की पढ़ाई औनलाइन घर पर होगी. इसी बहाने सुनील ने लैपटौप खरीदने के लिए अपने पिता से 65,000 रुपए झटक लिए. पैसा मिलते ही सुनील रांची चला गया. वहां उस ने 15,000 रुपए में एक पुराना लैपटौप खरीदा और बाकी रुपयों की उस ने स्मैक और नशे की गोलियां खरीद लीं.

रांची से लौटने के बाद वह घर में भी नशा करने लगा. जब उसे नशा हो जाता, तो वह शेरा को भी भूल जाता. शेरा को पहले जैसा प्यारदुलार नहीं दे पाता, जिस का आभास शेरा को हो चुका था. जब अयोध्या राम को सुनील के नशेड़ी होने की बात मालूम हुई, तो उन्होंने सुनील के जेबखर्च पर रोक लगा दी. तब सुनील ने अपना लैपटौप पतंग के भाव में बेच डाला. लेकिन, वह पैसा भी खत्म होने के बाद सुनील अपना सिर धुन रहा था कि स्मैक के लिए पैसा कहां से लाए. पास में बैठा शेरा उस को निरीह आंखों से देख रहा था.

गांव के एक कसाई जुम्मन की नजर शेरा पर थी. वह शेरा को खरीदने के लिए मौके की तलाश में था. एक दिन वह सुनील के पास पहुंचा और बोला, ‘‘सुनील बाबू, आप को कुछ पैसे चाहिए क्या?’’ चाहिए तो, पर कौन देगा पैसे? मेरे पास अब बेचने को है ही क्या?’’

सरकार अभी तो आप के पास खजाना है,’’ जुम्मन अपनी चाटुकारिता पर उतर आया. कैसा खजाना? क्यों मजाक करते हो जुम्मन भाई.’’‘हुजूर, शेरा तो आप का खजाना ही है. कहिए तो इस के लिए 12,000 रुपए अभी गिन दूं…’’12,000…’’ यह सुन कर सुनील का मुरझाया मन खिल उठा. उस की नजरें शेरा पर जा कर ठहर गईं. उस ने शेरा को देखा और जुम्मन से बोला, ‘‘अच्छा, लाओ रुपए.’’ जुम्मन ने रुपए निकालने में देर न की. उस ने तुरंत अपनी झोली में हाथ डाला और नोट सुनील के हाथों पर रख दिए.

अब जुम्मन शेरा के पास आया और उस के पुट्ठे पर हाथ फेरा. साथ ही, उस की कमर को ऊपर उठा कर वजन का अंदाजा लगाया. उस ने बिना देर किए शेरा को ले जाने के लिए उस की गरदन में रस्सी बांध कर खींचा, मगर शेरा अपनी जगह से हिला तक नहीं.जब जुम्मन ने पूरा जोर लगा कर शेरा को खींचा, तो वह मिमियाने लगा. पर सुनील को कोई खास फर्क नहीं पड़ा. उस का ध्यान तो जेब में रखे पैसों पर था. लेकिन रात को उसे शेरा की खूब याद आई और वह अगली ही सुबह बाजार में जुम्मन की दुकान पर जा पहुंचा. उस ने अपनी जेब से 12,000 रुपए निकाल कर जुम्मन की तरफ बढ़ाए, तो जुम्मन ने शेरा के कटे हुए सिर व टंगे हुए धड़ को दिखाया.

यह देख कर सुनील बेकाबू हो गया और वह एकाएक जुम्मन पर टूट पड़ा. उस ने जुम्मन का चाकू छीन लिया. उन दोनों में मारपीट होने लगी कि इसी दौरान वे एक दीवार से टकरा गए. दीवार सुनील के ऊपर भरभरा कर गिर पड़ी और वह गंभीर रूप से घायल हो कर बेहोश हो गया.

आसपास के लोगों ने सुनील को मलबे से बाहर निकाला. इस घटना की खबर अयोध्या राम को दी गई. वे एक डाक्टर और पंचायत के मुखिया के साथ वहां पहुंचे. डाक्टर ने सुनील के प्राथमिक उपचार के बाद उसे रांची ले जाने की सलाह दी.

अयोध्या राम की हिम्मत ने जवाब दे दिया. तब मुखियाजी ने एक एंबुलैंस मंगवाई और सुनील को ले कर रांची रवाना हुए.

अस्पताल के बड़े डाक्टर जल्दी ही वहां पहुंचे और स्ट्रैचर पर ही सुनील का चैकअप करते हुए बोले, ‘‘आप लोगों ने लाने में देर कर दी. यह लड़का अब इस दुनिया में नहीं है…’’

इतना सुनते ही उस माहौल में अयोध्या राम के चीखने की आवाज गूंजने लगी. गांव के मुखिया उन्हें समझाने में लगे हुए थे. वे किसी तरह उन्हें ले कर कार में बैठे और गांव जाने के लिए रवाना हो गए. Hindi Family Story

Story In Hindi: हरी चूडियां – सायरा ने क्या-क्या खरीदा

Story In Hindi: अम्मी खुश थीं सायरा को उस के शादी के बाद आए पहले तोहफे दिला कर. सायरा खुश थी अपनी पसंद के तोहफे पा कर. वह कभी हरा और रेशमी गरारा उठा कर देखती, तो कभी सलमासितारों से जड़ी हरी ओढ़नी अपने सिर पर रख कर कहती, ‘‘देखिए अम्मीजान, इस का हरा रंग कितना अलग सा है. इस पर जड़े सितारे तो ऐसे लगते हैं जैसे पूरी कायनात के सितारे मेरी ओढ़नी पर आ कर अपनी महफिल सजा कर बैठे हों.’’

अम्मी बोलीं, ‘‘मेरी बच्ची की ओढ़नी यों ही हरीभरी रहे…’’ फिर दोनों हाथों से सायरा की बलाएं ले कर अपने पान से सुर्ख हो रहे होंठों से उसे चूम लिया.मैं अभी भी किताब में अपना सिर झुकाए चोर नजरों से इन सासबहू का लाड़दुलार देख रहा था. मन ही मन कुढ़ भी रहा था

सायरा से मेरा निकाह हुए 2 महीने हो गए थे. मैं अभी तक उस से अपना जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रहा था. जुड़ाव महसूस भी कैसे करता? कुछ ऐसा महसूस करने के लिए जुड़ना जरूरी होता है. केवल किसी को ‘कबूल’ बोल देने भर से तो वह कबूल नहीं हो जाता.

यह अलग बात है कि काजी साहब के सामने किए इजहार को मैं अपनी जिंदगी के कयामत वाले दिन तक निभाने को तैयार हूं. हां, मगर अभी मुझे वक्त चाहिए खुद को समेटने के लिए. सलमा को भुलाने के लिए.

मैं क्या करूं… नहीं लुभाती सायरा की खूबसूरती, उस की चुलबुली सी अदाएं, उस का चहकना और मचलना मुझे कुछ भी नहीं भाता. मुझे हर वक्त अपने आसपास सलमा का सांवला सा संजीदा चेहरा ही नजर आता है.

मैं मानता हूं कि सायरा रिमझिम बरखा सी है, पर मेरा इश्क मेरी सलमा… वह भी तो भादों से भरी घटा थी.फिर मेरे मिजाज में भी तो यह सब नहीं था. मुझे कभी अच्छा भी तो नहीं लगा बरसात में भीगना. चिढ़ थी मुझे भीगने से और फिर लौट कर अम्मी के तमाम नियमकायदे मानने से. गीले पैर पायदान पर रख कर उसे खिसकाते हुए गुसलखाने तक जाओ, कपड़े का पानी बाहर ही निचोड़ो, यह सब मुझे उकता देता था.

ऊपर से अम्मी का वह जोशांदा काढ़ा… उफ. वह तो मेरे हलक से नीचे ही नहीं उतरता था. जो चीज मेरे दिल से गुफ्तगू करती थी, वह थी घिरी हुई घटाओं के बीच दालान में बैठ कर किताबें पढ़ना.बादलों को एकदूसरे में सिमटते देखना, बादलों का गरजना यों लगता जैसे आसमां अपने भीतर के सारे मनोभाव जमीन से खुल कर कह रहा हो कि किसी से नहीं डरना हमें. हम तो तेरे आशिक हैं.अकसर सोचता एक दिन मैं भी खुशी से सब को बता दूंगा कि मुझे सलमा से मुहब्बत है.

मैं अपनी सोच में खोया हुआ था कि तभी सायरा ने अपने सामान का जखीरा मेरे सामने ला पटका और बोली, ‘‘देखिए साहिर साहब, हमें अम्मीजान ने कितने तोहफे दिलाए हैं. आप भी कुछ दिलाइए…’’

बिना मेरा जवाब सुने ही उस ने फिर से कहना शुरू किया, ‘‘यह हार देखिए, और ये झुमके भी. यह तो उन्होंने अपनी छोटी वाली पेटी से निकाल कर दिए हैं. कह रही थीं कि बड़े बेशकीमती हैं.

‘‘अम्मीजान बता रही थीं कि उन की दुबई वाली खाला ने उन्हें बतौर नजराना दिए थे. आप देखें, आज ये सब अम्मीजान ने हमें दे दिए.’’

मैं ने बड़ी बेतकल्लुफी से उन सब पर बिना नजर डाले ही कहा, ‘‘सब ले लो, आज भी यह सब तुम्हारा ही है. कल भी सब तुम्हारा ही तो होना है. अम्मी का मेरे सिवा है ही कौन?’’

री बात सुन कर बड़ी बेतकल्लुफी से वह बोली, ‘‘यह क्या बात हुई… हम भी तो हैं अम्मी के. साहिर, हम ने कितनी ही सासें देखी हैं. एकलौती बहू को भी अपना सब अपने जीतेजी नहीं सौंप देती हैं. अम्मीजान तो लाखों में एक हैं.

‘‘एक बात सुनें आप… फिर हों भी क्यों न? उन में हमारे सैयद खानदान का ही खून दौड़ रहा है. आखिर वे मेरी फूफी भी तो हैं.’’

मैं चुप हो गया. यह सैयद खानदान की जिद ही तो थी, जिस ने सलमा और मेरे इश्क को परवान नहीं चढ़ने दिया. अम्मी ने अपने एक फैसले से मेरी दुनिया बदल कर रख दी.

बहुत सालों बाद पिछले साल जब अम्मी अपने मायके गई थीं, तब वहीं से सायरा का रिश्ता मांग लाई थीं. बिना मुझ से पूछे, बिना मेरी मरजी जाने और वापस आ कर बस फरमान सुनाया था, ‘‘साहिर, तुम्हें सायरा याद है न? वही मेरे चचा भाई की मंझली बेटी… हम उसे तेरे लिए मांग आए हैं.’’

यह सुन कर बिना घबराए मैं ने बड़े यकीन से अम्मी को अपने दिल का हाल सुनाया था. लेकिन अम्मी ने चंद शब्दों में सारी बात खत्म कर दी, ‘बरखुरदार, हम सैयद खानदान से ताल्लुक रखते हैं. हम जबान दे कर पीछे नहीं हटते हैं. तुम्हें मेरी बात न माननी हो, तो शौक से तुम अपने मामू को फोन कर के मना कर दो.साथ ही साथ यह भी कह देना कि तुम्हारी बेवा मां का इंतकाल हो गया है, तभी तुम यह रिश्ता तोड़ रहे हो.’अम्मी की इस बात के बाद सिवा सेहरा पहनने के मेरे पास कुछ कहने को नहीं था.

सायरा अभी भी अपने तोहफे समेट रही थी, जबकि मैं यादों की बारादरी से गुजर कर वापस भी आ गया. कल सायरा की पहली विदाई है. वह अपने अरमान संजो रही थी.

सुबह ही मैं ने अपने मन में सोच लिया था कि कल कुछ भी कर के मैं सलमा से मुलाकात करूंगा. उस से सब कह दूंगा कि नहीं रहा जाता तुम्हारे बिना… बताओ क्या करूं? कोई तो रास्ता सुझाओ…

मैं अपनी ही उधेड़बुन में था कि तभी सायरा आ कर मेरे गले लग गई और चहक कर बोली, ‘‘आप तो बड़े छिपे रुस्तम हो जी. ये हरी चूडि़यां ले कर आए हो तो मुझे दी क्यों नहीं?’’फिर प्यार से हाथ आगे बढ़ाते हुए वह बोली, ‘‘आप जानते हैं… आप के नाम लिख गई है मेरी कलाई की एकएक नस, तो फिर शरमाना कैसा? चलिए, पहना दीजिए.’’

मैं पसोपेश में पड़ गया. कल सलमा से मुलाकात के लिए लाया हुआ तोहफा सायरा के हाथ में था. उन चूडि़यों की खनक सायरा की आवाज में थी. बिना कुछ भी बोले हुए मैं ने उस की कलाई में वे हरी चूडि़यां सजा दी थीं. वह एकएक चूड़ी को चूम रही थी.

मैं ने खुद को वफा की नजर में तोला तो पाया कि मैं भटक रहा था. खुद को झटकते हुए मैं ने अपने भटकते मन को सीधी राह पर चलाने के लिए नजरबंद कर लिया. मन की दबी हुई सारी काली घटाएं बूंद बन कर पिघलने लगीं. हवाओं का शोर बता रहा था कि बाहर जोर से पानी बरस रहा है. Story In Hindi

Hindi Family Story: खडूस मकान मालकिन – क्या था आंटी का सच

Hindi Family Story: ‘‘साहबजी, आप अपने लिए मकान देख रहे हैं?’’ होटल वाला राहुल से पूछ रहा था. पिछले 2 हफ्ते से राहुल एक धर्मशाला में रह रहा था. दफ्तर से छुट्टी होने के बाद वह मकान ही देख रहा था. उस ने कई लोगों से कह रखा था. होटल वाला भी उन में से एक था. होटल का मालिक बता रहा था कि वेतन स्वीट्स के पास वाली गली में एक मकान है, 2 कमरे का. बस, एक ही कमी थी… उस की मकान मालकिन.

पर होटल वाले ने इस का एक हल निकाला था कि मकान ले लो और साथ में दूसरा मकान भी देखते रहो. उस मकान में कोई 2 महीने से ज्यादा नहीं रहा है.

‘‘आप मकान बता रहे हो या डरा रहे हो?’’ राहुल बोला, ‘‘मैं उस मकान को देख लूंगा. धर्मशाला से तो बेहतर ही रहेगा.’’

अगले दिन दफ्तर के बाद राहुल अपने एक दोस्त प्रशांत के साथ मकान देखने चला गया. मकान उसे पसंद था, पर मकान मालकिन ने यह कह कर उस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया कि रात को 10 बजे के बाद गेट नहीं खुलेगा.

राहुल ने सोचा, ‘मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर देर रात हो जाती है…’ वह बोला, ‘‘आंटी, मेरा तो काम ही ऐसा है, जिस में अकसर रात को देर हो सकती है.’’

‘‘ठीक है बेटा,’’ आंटी बोलीं, ‘‘अगर पसंद न हो, तो कोई बात नहीं.’’

राहुल कुछ देर खड़ा रहा और बोला, ‘‘आंटी, आप उस हिस्से में एक गेट और लगवा दो. उस की चाबी मैं अपने पास रख लूंगा.’’

आंटी ने अपनी मजबूरी बता दी, ‘‘मेरे पास खर्च करने के लिए एक भी पैसा नहीं है.’’

राहुल ने गेट बनाने का सारा खर्च खुद उठाने की बात की, तो आंटी राजी हो गईं. इस के साथ ही उस ने झगड़े की जड़ पानी और बिजली के कनैक्शन भी अलग करवा लिए. दोनों जगहों के बीच दीवार खड़ी करवा दी. उस में दरवाजा भी बनवा दिया, लेकिन दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ.

सारा काम पूरा हो जाने के बाद राहुल मकान में आ गया. उस ने मकान मालकिन द्वारा कही गई बातों का पालन किया. राहुल दिन में अपने मकान में कम ही रहता था. खाना भी वह होटल में ही खाता था. हां, रात में वह जरूर अपने कमरे पर आ जाता था. उस के हिस्से में ‘खटखट’ की आवाज से आंटी को पता चल जाता और वे आवाज लगा कर उस के आने की तसल्ली कर लेतीं.

उन आंटी का नाम प्रभा देवी था. वे अकेली रहती थीं. उन की 2 बेटियां थीं. दोनों शादीशुदा थीं. आंटी के पति की मौत कुछ साल पहले ही हुई थी. उन की मौत के बाद वे दोनों बेटियां उन को अपने साथ रखने को तैयार थीं, पर वे खुद ही नहीं रहना चाहती थीं. जब तक शरीर चल रहा है, तब तक क्यों उन के भरेपूरे परिवार को परेशान करें.

अपनी मां के एक फोन पर वे दोनों बेटियां दौड़ी चली आती थीं. आंटी और उन के पति ने मेहनतमजदूरी कर के अपने परिवार को पाला था. उन के पास अब केवल यह मकान ही बचा था, जिस को किराए पर उठा कर उस से मिले पैसे से उन का खर्च चल जाता था.

एक हिस्से में आंटी रहती थीं और दूसरे हिस्से को वे किराए पर उठा देती थीं. पर एक मजदूर के पास मजदूरी से इतना बड़ा मकान नहीं हो सकता. पतिपत्नी दोनों ने खूब मेहनत की और यहां जमीन खरीदी. धीरेधीरे इतना कर लिया कि मकान के एक हिस्से को किराए पर उठा कर आमदनी का एक जरीया तैयार कर लिया था.

राहुल अपने मांबाप का एकलौता बेटा था. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. नौकरी पर वह यहां आ गया और आंटी का किराएदार बन गया. दोनों ही अकेले थे. धीरेधीरे मांबेटे का रिश्ता बन गया.

घर के दोनों हिस्सों के बीच का दरवाजा कभी बंद नहीं हुआ. हमेशा खुला रहा. राहुल को कभी ऐसा नहीं लगा कि आंटी गैर हैं. आंटी के बारे में जैसा सुना था, वैसा उस ने नहीं पाया. कभीकभी उसे लगता कि लोग बेवजह ही आंटी को बदनाम करते रहे हैं या राहुल का अपना स्वभाव अच्छा था, जिस ने कभी न करना नहीं सीखा था. आंटी जो भी कहतीं, उसे वह मान लेता.

आंटी हमेशा खुश रहने की कोशिश करतीं, पर राहुल को उन की खुशी खोखली लगती, जैसे वे जबरदस्ती खुश रहने की कोशिश कर रही हों. उसे लगता कि ऐसी जरूर कोई बात है, जो आंटी को परेशान करती है. उसे वे किसी से बताना भी नहीं चाहती हैं. उन की बेटियां भी अपनी मां की समस्या किसी से नहीं कहती थीं.

वैसे, दोनों बेटियों से भी राहुल का भाईबहन का रिश्ता बन गया था. उन के बच्चे उसे ‘मामामामा’ कहते नहीं थकते थे. फिर भी वह एक सीमा से ज्यादा आगे नहीं बढ़ता था. लोग हैरान थे कि राहुल अभी तक वहां कैस टिका हुआ है.

आज रात राहुल जल्दी घर आ गया था. एक बार वह जा कर आंटी से मिल आया था, जो एक नियम सा बन गया था. जब वह देर से घर आता था, तब यह नियम टूटता था. हां, तब आंटी अपने कमरे से ही आवाज लगा देती थीं.

रात के 11 बज रहे थे. राहुल ने सुना कि आंटी चीख रही थीं, ‘मेरा बच्चा… मेरा बच्चा… वह मेरे बच्चे को मुझ से छीन नहीं सकता…’ वे चीख रही थीं और रो भी रही थीं.

पहले तो राहुल ने इसे अनदेखा करने की कोशिश की, पर आंटी की चीखें बढ़ती ही जा रही थीं. इतनी रात को आंटी के पास जाने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी, भले ही उन के बीच मांबेटे का अनकहा रिश्ता बन गया था.

राहुल ने अपने दोस्त प्रशांत को फोन किया और कहा, ‘‘भाभी को लेता आ.’’

थोड़ी देर बाद प्रशांत अपनी बीवी को साथ ले कर आ गया. आंटी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था. यह उन के लिए हैरानी की बात थी. तीनों अंदर घुसे. राहुल सब से आगे था. उसे देखते ही पलंग पर लेटी आंटी चीखीं, ‘‘तू आ गया… मुझे पता था कि तू एक दिन जरूर अपनी मां की चीख सुनेगा और आएगा. उन्होंने तुझे छोड़ दिया. आ जा बेटा, आ जा, मेरी गोद में आ जा.’’

राहुल आगे बढ़ा और आंटी के सिर को अपनी गोद में ले कर सहलाने लगा. आंटी को बहुत अच्छा लग रहा था. उन को लग रहा था, जैसे उन का अपना बेटा आ गया. धीरेधीरे वे नौर्मल होने लगीं.

प्रशांत और उस की बीवी भी वहीं आ कर बैठ गए. उन्होंने आंटी से पूछने की कोशिश की, पर उन्होंने टाल दिया. वे राहुल की गोद में ही सो गईं. उन की नींद को डिस्टर्ब न करने की खातिर राहुल बैठा रहा.

थोड़ी देर बाद प्रशांत और उस की बीवी चले गए. राहुल रातभर वहीं बैठा रहा. सुबह जब आंटी ने राहुल की गोद में अपना सिर देखा, तो राहुल के लिए उन के मन में प्यार हिलोरें मारने लगा. उन्होंने उस को चायनाश्ता किए बिना जाने नहीं दिया.

राहुल ने दफ्तर पहुंच कर आंटी की बड़ी बेटी को फोन किया और रात में जोकुछ घटा, सब बता दिया. फोन सुनते ही बेटी शाम तक घर पहुंच गई. उस बेटी ने बताया, ‘‘जब मेरी छोटी बहन 5 साल की हुई थी, तब हमारा भाई लापता हो गया था. उस की उम्र तब 3 साल की थी. मांबाप दोनों काम पर चले गए थे.

‘‘हम दोनों बहनें अपने भाई के साथ खेलती रहतीं, लेकिन एक दिन वह खेलतेखेलते घर से बाहर चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया. ‘‘उस समय बच्चों को उठा ले जाने वाले बाबाओं के बारे में हल्ला मचा हुआ था. यही डर था कि उसे कोई बाबा न उठा ले गया हो.

‘‘मां कभीकभी हमारे भाई की याद में बहक जाती हैं. तभी वे परेशानी में अपने बेटे के लिए रोने लगती हैं.’’ आंटी की बड़ी बेटी कुछ दिन वहीं रही. बड़ी बेटी के जाने के बाद छोटी बेटी आ गई. आंटी को फिर कोई दौरा नहीं पड़ा.

2 दिन हो गए आंटी को. राहुल नहीं दिखा. ‘खटखट’ की आवाज से उन को यह तो अंदाजा था कि राहुल यहीं है, लेकिन वह अपनी आंटी से मिलने क्यों नहीं आया, जबकि तकरीबन रोज एक बार जरूर वह उन से मिलने आ जाता था. उस के मिलने आने से ही आंटी को तसल्ली हो जाती थी कि उन के बेटे को उन की फिक्र है. अगर वह बाहर जाता, तो कह कर जाता, पर उस के कमरे की ‘खटखट’ बता रही थी कि वह यहीं है. तो क्या वह बीमार है? यही देखने के लिए आंटी उस के कमरे पर आ गईं.

राहुल बुखार में तप रहा था. आंटी उस से नाराज हो गईं. उन की नाराजगी जायज थी. उन्होंने उसे डांटा और बोलीं, ‘‘तू ने अपनी आंटी को पराया कर दिया…’’ वे राहुल की तीमारदारी में जुट गईं. उन्होंने कहा, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारे मांबाप जब तक आएंगे, तब तक हम ही तेरे अपने हैं.’’

राहुल के ठीक होने तक आंटी ने उसे कोई भी काम करने से मना कर दिया. उसे बाजार का खाना नहीं खाने दिया. वे उस का खाना खुद ही बनाती थीं.

राहुल को वहां रहते तकरीबन 9 महीने हो गए थे. समय का पता ही नहीं चला. वह यह भी भूल गया कि उस का जन्मदिन नजदीक आ रहा है. उस की मम्मी सविता ने फोन पर बताया था, ‘हम दोनों तेरा जन्मदिन तेरे साथ मनाएंगे. इस बहाने तेरा मकान भी देख लेंगे.’

आज राहुल की मम्मी सविता और पापा रामलाल आ गए. उन को चिंता थी कि राहुल एक अनजान शहर में कैसे रह रहा है. वैसे, राहुल फोन पर अपने और आंटी के बारे में बताता रहता था और कहता था, ‘‘मम्मी, मुझे आप जैसी एक मां और मिल गई हैं.’’

फोन पर ही उस ने अपनी मम्मी को यह भी बताया था, ‘‘मकान किराए पर लेने से पहले लोगों ने मुझे बहुत डराया था कि मकान मालकिन बहुत खड़ूस हैं. ज्यादा दिन नहीं रह पाओगे. लेकिन मैं ने तो ऐसा कुछ नहीं देखा.’’ तब उस की मम्मी बोली थीं, ‘बेटा, जब खुद अच्छे तो जग अच्छा होता है. हमें जग से अच्छे की उम्मीद करने से पहले खुद को अच्छा करना पड़ेगा. तेरी अच्छाइयों के चलते तेरी आंटी भी बदल गई हैं,’ अपने बेटे के मुंह से आंटी की तारीफ सुन कर वे भी उन से मिलने को बेचैन थीं.

राहुल मां को आंटी के पास बैठा कर अपने दफ्तर चला गया. दोनों के बीच की बातचीत से जो नतीजा सामने आया, वह हैरान कर देने वाला था.

राहुल के लिए तो जो सच सामने आया, वह किसी बम धमाके से कम नहीं था. उस की आंटी जिस बच्चे के लिए तड़प रही थीं, वह खुद राहुल था. मां ने अपने बेटे को उस की आंटी की सचाई बता दी और बोलीं, ‘‘बेटा, ये ही तेरी मां हैं. हम ने तो तुझे एक बाबा के पास देखा था. तू रो रहा था और बारबार उस के हाथ से भागने की कोशिश कर रहा था. हम ने तुझे उस से छुड़ाया. तेरे मांबाप को खोजने की कोशिश की, पर वे नहीं मिले.

‘‘हमारा खुद का कोई बच्चा नहीं था. हम ने तुझे पाला और पढ़ाया. जिस दिन तू हमें मिला, हम ने उसी दिन को तेरा जन्मदिन मान लिया. अब तू अपने ही घर में है. हमें खुशी है कि तुझे तेरा परिवार मिल गया.’’ राहुल बोला, ‘‘आप भी मेरी मां हैं. मेरी अब 2-2 मांएं हैं.’’ इस के बाद घर के दोनों हिस्से के बीच की दीवार टूट गई. Hindi Family Story

Hindi Story: मालती – पति के शराब की लत देखकर क्या था मालती का फैसला

Hindi Story: कदमों के लड़खड़ाने और कुंडी खटखटाने की आवाज सुन कर मालती चौकन्नी हो उठी और बड़बड़ाई, ‘‘आज फिर…?’’

आंखों में नींद तो थी ही नहीं. झटपट दरवाजा खोला. तेजा को दुख और नफरत से ताकते हुए वह बुदबुदाई, ‘‘क्या करूं? इन का इस शराब से पिंड छूटे तो कैसे?’’

‘‘ऐसे क्या ताक रही है? मैं… कोई तमाशा हूं क्या…? क्या… मैं… कोई भूत हूं?’’ तेजा बहकती आवाज में बड़बड़ाया.

‘‘नहीं, कुछ नहीं…’’ कुछ कदम पीछे हट कर मालती बोली.

‘‘तो फिर… एं… तमाशा ही हूं… न? बोलती… क्यों नहीं…? ’’ कहता हुआ तेजा धड़ाम से सामने रखी चौकी पर पसर गया.

मालती झटपट रसोईघर से एक गिलास पानी ले आई.

तेजा की ओर पानी का गिलास बढ़ा कर मालती बोली, ‘‘लो, पानी पी लो.’’

‘‘पी… लो? पी कर तो आया हूं… कितना… पी लूं? अपने पैसे से पीया… अकबर ने भी पिला दी… अब तुम भी पिलाने… चली हो…’’

मालती कुछ बोलती कि तेजा ने उस के हाथ से गिलास झपट कर दीवार पर पटकते हुए चिल्लाया, ‘‘मजाक करती है…एं… मजाक करती है मुझ से… पति के साथ… मजाक करती है. …पानी… पानी… देती है,’’ तेजा उठ कर मालती की ओर बढ़ा.

मालती सहम कर पीछे हटी ही थी कि तेजा डगमगाता हुआ सामने की मेज से जा टकराया. मेज एक तरफ उलट गई. मेज पर रखा सारा सामान जोर की आवाज के साथ नीचे बिखर गया. खुद उस का सिर दीवार से जा टकराया और गुस्से में बड़बड़ाता हुआ वह मालती की ओर झपट पड़ा.

मालती को सामने न पा कर तेजा फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लगा.

तेजा के सामने से हट कर मालती एक कोने में दुबकी खड़ी थी. उसे काटो तो खून नहीं. वह एकटक नशे में धुत्त अपने पति को देख रही थी. उस का कलेजा फटा जा रहा था.

तेजा के रोने की आवाज सुन कर बगल के कमरे में सोए दोनों बच्चों की नींद टूट गई. आंखें मलती 10 साल की मुन्नी और उस के पीछे 8 साल का बेटा रमेश पिता की ऐसी हालत देख कर हैरानपरेशान थे.

पिता के इस तरह के बरताव के वे दोनों आदी थे. आज पिता के रोने से उन्हें बड़ी तकलीफ हो रही थी, पर मां के गालों से लुढ़कते आंसुओं को देख कर वे और भी दुखी हो गए.

बेटी मुन्नी मां का हाथ पकड़

कर रोने लगी. रमेश डरासहमा कभी बाप को देखता, तो कभी मां के आंसुओं को.

तेजा को लड़खड़ा कर खड़ा होता देख तीनों का कलेजा पसीज गया.

तभी तेजा मालती पर झपट पड़ा, ‘‘मुझे भूख नहीं लगती क्या?… तुझे मार डालूंगा… तुम ने मुझे नीचे… गिरा दिया और… आंसू बहा रही है… झूठमूठ

के आंसू… तुम ने मुझे मारा… मैं ने

तेरा क्या बिगाड़ा?… एं… क्या बिगाड़ा… बता…?’’

मालती के बाल उस के हाथों

की गिरफ्त में आ गए. वह उन्हें छुड़ाने की नाकाम कोशिश करने लगी. बेटी मुन्नी जोरों से रोने लगी. रमेश अपने पिता का हाथ अपने नन्हे हाथों से पकड़ कर हटाने की नाकाम कोशिश करने लगा.

मालती ने चिल्ला कर रमेश को मना किया, पर वह नहीं माना. इस बीच तेजा ने रमेश को धक्का दे कर नीचे गिरा दिया. उस का सिर फर्श से टकराया और देखते ही देखते खून का फव्वारा फूट पड़ा.

खून देख कर मालती बदहवास हो कर चिल्ला पड़ी, ‘‘खून… रमेश… मेरे बेटे के सिर से खून…’’

खून देख कर तेजा का हाथ ढीला पड़ा.

मालती और मुन्नी दहाड़ें मार कर रोने लगीं. पड़ोसियों ने आ कर सारा माजरा देखा और रमेश को अस्पताल ले जा कर मरहमपट्टी करवाई. खाना रसोईघर में यों ही पड़ा रहा. मालती रातभर रमेश को सीने से लगाए रोती रही. नींद आंखों से गायब थी.

अपनी औलाद के लिए घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर थी मालती. मन ही मन उस ने तेजा से हार मान ली थी. हालात से समझौता कर मालती ने मान लिया था कि यही उस की किस्मत में लिखा है.

पर, तेजा ने शराब से हार नहीं मानी. रात के अंधेरे में तेजा राक्षस बन कर घर में कुहराम मचाता, तो दिन की रोशनी में भले आदमी की तरह मुसकान बिखेरता मालती और बेटीबेटे को लाड़प्यार करता. ऐसा लगता कि जैसे रात में कुछ हुआ ही नहीं. पर अंदर ही अंदर मालती की घुटन एक चिनगारी का रूप लेने लगी थी.

एक दिन तो मालती की खिलाफत ने अजीब रंग दिखाया. उस दिन मालती ने दोनों बच्चों को स्कूल जाने से रोक दिया.

तेजा ने पूछा, ‘‘क्या आज स्कूल बंद है? ये तैयार क्यों नहीं हो रहे हैं?’’

‘‘नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं है. इसी वजह से इन्हें रोक लिया,’’ मालती गंभीर हो कर बोली.

‘‘तो मैं आज काम पर नहीं जाता. तुम्हारे पास रहूंगा. इन्हें जाने दो,’’ तेजा बोला.

‘‘नहीं, ये आज नहीं जाएंगे. मेरे पास ही रहेंगे,’’ मालती बोली.

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी. ज्यादा तबीयत खराब हो, तो मुझे बुलवा लेना. डाक्टर के  पास ले जाऊंगा,’’ तेजा बड़े प्यार से बोला.

मालती और बच्चों को छोड़ तेजा काम पर चला गया.

एक घंटे बाद मालती ने मुन्नी के हाथों शराब की भट्ठी से 4 बोतल शराब मंगवाई. दरवाजा बंद कर धीरेधीरे एक बोतल वह खुद पी गई. फिर मुन्नी व रमेश को पिलाने लगी. मुन्नी ज्यादा पीने की वजह से रोने लगी.

रमेश भी रोता हुआ बड़बड़ाने लगा, ‘‘मम्मी, अच्छी नहीं लग रही है. अब मत पिलाओ मम्मी.’’

‘‘पी लो, थोड़ी और पी लो… देखो, मैं भी तो पी रही हूं…’’ रुकरुक कर मालती बोली और दोनों के मुंह में पूरा गिलास उडे़ल दिया. दोनों ही फर्श पर निढाल हो कर गिर पड़े. मालती ने दूसरी बोतल भी पी डाली और वह भी फर्श पर लुढ़क गई.

थोड़ी देर बाद बच्चे उलटी करने लगे और चिल्लाने लगे.

बच्चों की दर्दभरी कराह और चिल्लाहट सुन कर पड़ोसी दरवाजा तोड़ कर घर में घुसे. वहां की हालत देख कर सभी हैरान रह गए. कमरे में शराब की बदबू पा कर उन्हें समझते देर नहीं लगी कि तेजा की हरकतों से तंग आ कर ही मालती ने ऐसा किया है.

पड़ोसियों ने तीनों को अस्पताल पहुंचाया.

खबर पा कर तेजा अस्पताल की ओर भागा. मालती और बच्चों का हाल देख कर वह पछाड़ खा कर गिर पड़ा और फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘बचा लो भैया… इन्हें बचा लो… मेरी मालती को बचा लो… मेरे बच्चों को बचा लो…’’ कहता हुआ तेजा अपनी छाती पीट रहा था.

‘‘और शराब पियो तेजा… और पियो… और जुल्म करो अपने बीवीबच्चों पर… देख लिया…’’ एक पड़ोसी ने गुस्साते हुए कहा.

‘‘नहीं, नहीं… मैं कुसूरवार हूं… मेरी वजह से ही यह सब हुआ… उस ने कई बार मुझे समझाने की कोशिश की, पर मैं ही अपनी शराब की बुरी आदत की वजह से मामले को समझ नहीं पाया,’’ रोतेरोते तेजा बोला.

करीब एक घंटे बाद डाक्टर ने आ कर बताया कि दोनों बच्चे तो ठीक हैं, पर मालती ने दम तोड़ दिया है. उसे बचाया नहीं जा सका. उस पर शराब के  असर के अलावा दिमागी दबाव बहुत ज्यादा था.

तेजा फूटफूट कर रोने लगा. उसे अक्ल तो आ गई थी, पर इतनी अच्छी बीवी को खोने के बाद. Hindi Story

Story In Hindi: अंधविश्वास का जाल – कैसी थी मनोरमा देवी

Story In Hindi: आज फिर सुबह से घर में उठापटक शुरू हो गई थी. मनोरमा देवी से सब को हिदायत मिल रही थी, ‘‘जल्दीजल्दी सब अपना काम निबटा कर तैयार हो जाओ. आज गुरुजी आएंगे. उन्हें इतनी अफरातफरी पसंद नहीं है.

‘‘और हां, जैसे ही गुरुजी आएं, तब सब उन के चरणों को धो कर चरणामृत लेना और साष्टांग प्रणाम करना. गुरुजी को भी तो पता चले कि मनोरमा देवी अपने बच्चों को कितने अच्छे संस्कार दे रही हैं.’’

मनोरमा देवी के अंदर अहम की भावना कूटकूट कर भरी थी, जो अपने हर काम में किसी न किसी बहाने खुद को ऊंचा रखने की कोशिश में लगी रहती थीं, चाहे वह काम ईमानदारी

का हो या फिर बेईमानी का.

छोटी बहू शिवानी सोच में पड़ गई, ‘गुरुजी के चरणों को धो कर पीना पड़ेगा… नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती. मांजी भी पता नहीं किस दुनिया में जीती रहती हैं. मैं उन से जा कर कह देती हूं कि ऐसा नहीं कर पाऊंगी.

‘पर कहीं मांजी का गुस्सा मेरे ऊपर ही फूट गया तो क्या होगा? मैं उस चरणामृत को फेंक दूंगी…’ और वह घर के कामों में लग गई.

गुरुजी आते हैं. उन के आवभगत में पूरा परिवार लगा हुआ था. गुरुजी अपनी सेवा का आनंद ले रहे थे. मनोरमा देवी अपनी बहुओं पर कड़ी निगरानी रख रही थीं. गुरुजी के स्वागत में कोई कमी न रह जाए.

दोनों बहुएं आपस में कानाफूसी कर रही थीं कि पता नहीं गुरुजी ने क्या जादूटोना कर दिया है मांजी के ऊपर. गुरुजी के कहने पर वे अपना सबकुछ लुटाने को तैयार रहती हैं.

बड़ी बहू ऊषा ने झेंपते हुए कहा, ‘‘मैं यह नाटक कई सालों से देखती आ रही हूं. अब तुम भी झेलो. मेरा मानो तो इस नाटक में तुम भी शामिल हो जाओ, इसी में ही तुम्हारी भलाई है.

‘‘मैं ने एक बार गुरुजी के खिलाफ आवाज उठाई थी, तो मेरे ऊपर किसी देवी की छाया कह कर मेरी बोलती बंद कर दी गई थी, जिस का शिकार मैं आज तक हूं.’’

‘‘ऐसा क्या कहा था आप ने गुरुजी को?’’ शिवानी ने पूछा.

‘‘गुरुजी की आदतें मुझे पसंद नहीं थीं. मैं ने सोहम से बात करने की कोशिश की, पर सोहम मेरी बातों को नहीं माना. सोहम ने मुझे ही समझा दिया था, ‘जब मैं एक बार बीमार पड़ा था, तो जब कोई डाक्टर मुझे ठीक नहीं कर पाया, तो गुरुजी की तंत्र विद्या ने ही मुझे ठीक किया था.’

‘‘इस के बाद गुरुजी और मांजी के कहने पर मुझे गांव से दूर जंगल में ले जा कर गरम चिमटे से मारना शुरू कर दिया गया. मेरी एक भी नहीं सुनी गई. मुझे सख्त हिदायत दी गई कि अगर कभी भी गुरुजी के खिलाफ आवाज उठाई, तो यहीं इस जंगल में ला कर

मार देंगे.

‘‘सच कहूं, तो इतना सब होने के बावजूद गुरुजी की हरकतें मुझे बिलकुल पसंद नहीं आती थीं. वे बारबार मेरे हाथ के बने भोजन की तारीफ करने के बहाने अपने पास बुलाते रहते थे.’’

गुरुजी के बारे में जब भी ऊषा सोहम से कुछ कहती, तो वह उस की बातें टाल देता था. वह अपनी कमी को छिपा कर सोहम ऊषा के बांझ होने की अफवाह फैला रहा था. इस अफवाह से लोग उस से नफरत करते थे. उस का सुबह मुंह देखना पसंद नहीं करते थे.

ऊषा के मुंह से ये सारी बातें सुन कर शिवानी हक्कीबक्की रह गई. वह मन ही मन उधेड़बुन में लग गई और रात का इंतजार करने लगी.

गुरुजी का समय तंत्र विद्या के लिए तय था. गुरुजी के आदेशानुसार पूजा की सारी सामग्री आ गई थी, जिस में एक जोड़ा सफेद कबूतर भी थे, जिन की बलि अगले दिन देनी थी.

यह देख कर शिवानी की रूह कांप गई. भला ये कैसे गुरुजी हैं, जो जीव हत्या को पूजा का नाम दे रहे हैं?

रात में गुरुजी एक कोठरी में आसीन होते थे. वहां सब हाथ जोड़ कर बैठते थे. यह पूजा शिवानी के नाम ही रखी गई थी. शिवानी भी वहां आई.

मनोरमा देवी ने शिवानी का परिचय गुरुजी को देते हुए कहा, ‘‘गुरुजी, यह मेरी छोटी बहू और छोटे बेटे सोहन की पत्नी है. काफी बड़े घराने की है. अच्छी पढ़ीलिखी है. जितनी यह देखने में खूबसूरत है, उतनी ही होशियार भी है. जिस चीज को छू देती है, वह चीज सोना हो जाती है. पर एक ही कमी है कि

यह अभी तक इस घर का चिराग नहीं दे पाई है.’’

शिवानी पसोपेश में पड़ गई कि मांजी उस की तारीफ कर रही हैं या फिर उसे नीचा दिखा रही हैं. लेकिन वह होशियार थी और भांप गई मनोरमा देवी की बातों को.

गुरुजी शिवानी को देख कर मन ही मन न जाने कितने सपनों को बुने जा रहे थे. वे अपनी तंत्र विद्या को भुला कर शिवानी को एकटक देखे जा रहे थे.

इतने में पंखों के फड़फड़ाने की आवाज आने लगी. शिवानी ने नजर दौड़ाई, तो उन कबूतरों पर चली गई.

‘मैं इन्हें मरते हुए कैसे देख सकती हूं. कैसे आजादी दिलाऊं इस जोड़े को ढोंगी से. दीदी सच ही कह रही थीं

इस पाखंडी के बारे में…’ शिवानी सोच रही थी.

पूजा खत्म होने के बाद गुरुजी ने शिवानी के सिर पर हाथ फेरते हुए ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ का आशीर्वाद दे दिया. उन्होंने उस से पूछा, ‘‘तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘मुझे ये कबूतर दे दीजिए. मैं इन्हें खुले आसमान में उड़ाना चाहती हूं.’’

गुरुजी भांप गए कि शिवानी उन की तंत्र विद्या को नाकाम कराना चाहती है.

वे उस से पूछ बैठे, ‘‘क्या तुम्हें मेरा आना यहां पसंद नहीं?’’

शिवानी बोल उठी, ‘‘नहीं गुरुजी, ऐसा कुछ नहीं है, पर मुझे इन बेजबानों की हत्या बरदाश्त नहीं होती.’’

गुरुजी सोच में पड़ गए, फिर वे बोले, ‘‘तुम इस घर की छोटी बहू हो, इसलिए मै तुम्हें अधिकार देता हूं कि तुम इस जोड़े को ले जा सकती हो.’’

शिवानी ने कबूतर के उस जोड़े को आसमान में छोड़ दिया. गुरुजी ने पिंजरे पर सफेद कपड़ा डाल दिया.

सुबह कबूतर के जोड़े को पिंजरे में न देख कर घर वाले काफी हैरान हुए, पर गुरुजी से पूछने की हिम्मत किसी की नहीं हो रही थी.

लड़खड़ाती आवाज में मनोरमा देवी पूछ बैठीं, ‘‘गुरुजी, कबूतर का जोड़ा कहां है?’’

गुरुजी तपाक से बोल उठे, ‘‘तुम्हारे घर में किसी चुड़ैल का वास है, जो हमारी तंत्र विद्या में विघ्न डाल रही है. उस ने बलि दिए जाने वाले जोड़े को अपने हक में ले लिया है. आने वाला समय आप सब के लिए कठिन होगा. इस से बचने के लिए तुम्हें बहुत बड़ा अनुष्ठान करना पड़ेगा.’’

इस के बाद गुरुजी अपने आश्रम की ओर चल दिए. मनोरमा देवी गुरुजी की बात से परेशान रहने लगीं. धीरेधीरे वे बीमार रहने लगीं.

शिवानी से रहा नहीं गया. उस ने बताया, ‘‘हमारे परिवार पर किसी चुड़ैल का साया नहीं है. कबूतर के उस जोड़े को मैं ने आजाद किया था और वह पाखंडी गुरु भी इस बात को जानता था. वह अंधविश्वास के जाल में फंसा कर हमें और ज्यादा लूटना चाहता था. अब हम सब उस की तंत्र विद्या से आजाद हैं.’’

मनोरमा देवी को सारी बात समझ में आ गई थी. वे सब से कहे जा रही थीं, ‘‘मेरी बहू का जवाब नहीं.’’ Story In Hindi

Story In Hindi: मुआवजा – सड़क पर उतरी घर की इज्जत

Story In Hindi: जुलूस शहर की बड़ी सड़क से होता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था. औरतों के हाथों में बैनर थे, जिन में से एक पर मोटेमोटे अक्षरों में लिखा हुआ था, ‘हम जिस्मफरोश नहीं हैं. हमें भी जीने का हक है. औरत का जिस्म खिलौना नहीं है…’

लोग उन्हें पढ़ते, कुछ पढ़ कर चुपचाप निकल जाते, कुछ मनचले भद्दे इशारे करते, तो कुछ मनचले जुलूस के बीच घुस कर औरतों की छातियों पर चिकोटी काट लेते. औरतें चुपचाप सहतीं, बेखबर सी नारे लगाती आगे बढ़ती जा रही थीं.

वे सब मुख्यमंत्री के पास इंसाफ मांगने जा रही थीं. इंसाफ की एवज में अपनी इज्जत की कीमत लगाने, अपने उघड़े बदन को और उघाड़ने, गरम गोश्त के शौकीनों को ललचाने. शायद इसी बहाने उन्हें अपने दर्द का कोई मरहम मिल सके.

उन के माईबाप सरकार को बताएंगे कि उन की बेटी, बहन, बहू के साथ कब, क्या और कैसे हुआ? करने वाला कौन था? उन की देह को उघाड़ने वाला, नोचने वाला कौन था?

औरतों के जिस्म का सौदा हमेशा से होता रहा है और होता रहेगा. ये वे अच्छी तरह जानती हैं, लेकिन वे सौदे में नुकसान की हिमायती नहीं हैं.

घर वाले बतातेबताते यह भूल जाएंगे कि शब्दों के बहाने वे खुद अपनी ही बेटियोंऔरतों को चौराहों पर, सभाओं में या सड़कों पर नंगा कर रहे हैं. उन की इज्जत के चिथड़े कर रहे हैं, लेकिन जुलूस वालों की यह सोच कहां होती है? उन्हें तो मुआवजा चाहिए, औरत की देह का सरकारी मुआवजा.

अखबार के पहले पेज पर मुख्यमंत्रीजी के साथ छपी तसवीर ही शायद उन के दर्द का मरहम हो. चाहे कुछ भी हो, लेकिन लोग उन्हें देखेंगे, पढ़ेंगे और यकीनन हमदर्दी जताने के बहाने उन के घर आ कर उन के जख्म टटोलतेटटोलते खुद कोई चीरा लगा जाएंगे. भीड़ में इतनी सोच और सम झ कहां होती है.

पर मगनाबाई इतनी छोटी सी उम्र में भी सब सम झने लगी थी. लड़की जब एक ही रात में औरत बना दी जाती है, तब न सम झ में आने वाली बातें भी सम झ में आने लगती हैं. मर्दों के प्रति उस का नजरिया बदल जाता है.

15 साल की मगनाबाई 8 दिन की बच्ची को कंधे से चिपकाए जुलूस में चल रही थी. उस के साथ उस जैसी और भी लड़कियां थीं. किसी की सलवार में खून लगा था, कपड़े फटे और गंदे थे. किसी के गले और मुंह पर खरोंचों के निशान साफ नजर आ रहे थे. अंदर जाने कितने होंगे. किसी का पेट बढ़ा था. क्या ये सब अपनीअपनी देह उघाड़ कर दिखाएंगी? कैसे बताएंगी कि उस रात कितने लोगों ने…

मगनाबाई का गला सूखने लगा. कमजोरी के चलते उसे चक्कर आने लगे. लगा कि कंधे से चिपकी बच्ची छूट कर नीचे गिर जाएगी और जुलूस उस को कुचलता हुआ निकल जाएगा. जो कुचली जाएगी, उस के साथ किसी की भी हमदर्दी नहीं होगी.

मगनाबाई ने साथ चलती एक औरत को पकड़ लिया. उस औरत ने मगनाबाई पर एक नजर डाली, उस की पीठ थपथपाई, ‘‘बच्ची, जब इतनी हिम्मत की है, तो थोड़ी और सही. अब तो मंजिल के करीब आ ही गए हैं. भरोसा रख. कहीं न कहीं तो इंसाफ मिलेगा…’’

कहने वाली औरत को मगनाबाई ने देखा. मन हुआ कि हंसे और पूछे, ‘भला औरत की भी कोई मंजिल होती है? किस पर भरोसा रखे? भेडि़यों से इंसाफ की उम्मीद तुम्हें होगी, मु झे नहीं,’ नफरत से उस ने जमीन पर थूक दिया.

कंधे से चिपकी बच्ची रोए जा रही थी. मगनाबाई का मन हुआ कि जलालत के इस मांस के लोथड़े को पैरों से कुचल जाने के लिए जमीन पर गिरा दे. उसे लगा कि बच्ची बहुत भारी होती जा रही है. उस के कंधे बो झ उठाने में नाकाम लग रहे थे. जुलूस के साथ पैरों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया था.

मगनाबाई कुछ देर वहीं खड़ी रही. जुलूस को उस ने आगे बढ़ जाने दिया. सड़क खाली हुई, तो उस की नजर सड़क के किनारे लगे हैंडपंप पर पड़ी. उस ने दौड़ कर किसी तरह बच्ची को गोद में उठाए ही पानी पीया. फिर वह एक बंद दुकान के चबूतरे पर रोती बच्ची को लिटा कर दीवार की टेक लगा कर बैठ गई.

बच्ची ने लेटते ही रोना बंद कर दिया. मगनाबाई को भी सुकून मिला. कुनकुनी धूप उसे भली लगी. वह भी बच्ची के करीब लेट गई. उस की आंखें मुंदने लगीं.

मगनाबाई इस जुलूस के साथ आना नहीं चाहती थी. गप्पू भाई और भोला चाचा ही उसे बिस्तर से घसीट कर जुलूस के साथ ले आए. उस की आंखों के सामने बस्ता ले कर स्कूल जाती चंपा, गंगा और जूही नाच उठीं, लेकिन अब उस का बस्ता छूट गया और बस्ते की जगह इस बच्ची ने ले ली.

गप्पू भाई और भोला चाचा कहते थे कि मगनाबाई पहले की तरह स्कूल जा सकेगी. इस बच्ची को किसी अनाथालय में डाल देंगे. वह फिर पहले की तरह हो जाएगी. बस, मुख्यमंत्री से मुआवजा मिल जाए.

वे दोनों इन औरतों को दलदल से निकालने वाली संस्था के पैरोकार थे. जब भी पुलिस की रेड पड़नी होती थी, वे दोनों और उन की रखैलें इन औरतों के साथ बदसलूकी न हो, इसलिए साथ होते. जब भी वे दोनों साथ होते, तो पुलिस वाले रहम से पेश आते थे. आमतौर पर प्रैस रिपोर्टर भी पहुंचे होते थे. वे दोनों कई बार गोरी चमड़ी वाली लड़कियों को भी लाते थे.

उन दोनों का खूब रोब था, क्योंकि दलालों को अगर डर लगता था, तो उन से ही. उन दोनों ने मुख्यमंत्री के सामने धरनेप्रदर्शन का प्रोग्राम बनाया था और पुलिस से मिल कर जुलूस का बंदोबस्त करा था. क्या मजाल है कि ये मिलीजुली जिस्म बेचने वाली थुलथुल लड़कियां इस तरह बाजार में निकल सकें.

मगनाबाई को कहा गया था कि

वे दोनों मुआवजा मांग रहे हैं. इस से स्कूल खुलवाएंगे. इन की जिंदगी खुशहाल होगी.

तभी मगनाबाई के विचारों को  झटका लगा. मुआवजा किस बात का? किसे मिलेगा? क्या इसलिए कि 9 महीने तक इस बच्ची को बस्ते की जगह पेट में लादे घूमती रही थी? बारीबारी से लोगों का वहशीपन सहती रही थी? या फिर मुआवजे के रूप में गप्पू और भोला की पीठ ठोंकी जाएगी कि उन्होंने बेटी और बहन को अपनी मर्दानगी से परिचित कराया? सरकार उस की भी पीठ ठोंकेगी कि वह स्कूल जाने की उम्र में मां बनना सीख गई?

क्या सरकार उस से पूछेगी कि उसे मां किस तरह बनाया गया? क्या वह बता पाएगी कि उस के भाई ने पहली बार उस के हाथपैर खाट की पाटियों से बांध कर उसे चाचा को सौंप दिया था?

चाचा ने भी इस के बदले भाई को मुआवजा दिया था और फिर भाई ने भी चाचा की तरह वही सब उस के साथ दोहराया था.

यही सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा. उसे डर दिखाया जाता कि अगर किसी से इस बात का जिक्र किया, तो काट कर फेंक दिया जाएगा. मुआवजे के रूप में यह बच्ची उस की कोख में आ गई. पता नहीं, दोनों में से किस की थी? क्या इन तमाम औरतों के साथ भी इसी की तरह…

बच्ची दूध पी कर सो गई थी. तभी किसी ने बाल पकड़ कर मगनाबाई को  झक झोरा, ‘‘तो यहां है नवाबजादी?’’

मगनाबाई ने मुड़ कर देखा. भोला चाचा जलती आंखों से उसे देख रहा था.

‘‘मैं नहीं जाऊंगी. अब मु झ से नहीं चला जाता,’’ मगनाबाई ने कहा.

‘‘चला तो तु झ से अभी जाएगा. चलती है या उतारूं सब के सामने…’’

लोग सुन कर हंस पड़े. वे चटपटी बात सुन कर मजेदार नजारा देखने के इच्छुक थे. उसे लगा कि यहां मर्द नहीं, महज जिस्मफरोश हैं.

डरीसहमी मगनाबाई बच्ची को उठा कर धीरेधीरे उन के पीछे चल दी.

भोला चाचा ने मगनाबाई को पीछे से जोरदार लात मारी. उस के मुंह से निकला, ‘‘हम जिस्मफरोश नहीं हैं. हमारी मांगें पूरी करो… पूरी करो…’’ Story In Hindi

Story In Hindi: एक बार फिर – स्नेहा ने बौस को कठघरे में क्यों खड़ा किया

Story In Hindi: इस मल्टीनैशनल कंपनी पर यह दूसरा कहर ढाया है. इस से पूर्व भी एक बार यह कंपनी अस्तव्यस्त हो चुकी है. उस समय कंपनी की एक खूबसूरत कर्मचारी स्नेहा ने अपने बौस पर आरोप लगाया था कि वे कई वर्षों से उस का यौनशोषण करते आ रहे हैं. उस की बोटीबोटी नोचते आ रहे हैं और यह सब महज शादी का लालच दे कर होता रहा है और अब वे शादी से मुकर रहे हैं. उस का इतना भर कहना था कि सबकुछ सुलग उठा था, धूधू करके.

ऐसा नहीं था कि स्नेहा केवल खूबसूरत ही थी, योग्य नहीं. उस ने बीटैक और एमटैक की डिगरियां ले रखी थीं. वह अपने कार्य में पूर्ण दक्ष थी. वह बहुत ही शोख, खुशमिजाज और बेबाक भी थी. उस ने अपने आकर्षक व्यक्तित्व और भरसक प्रयासों से कंपनी को देश ही में नहीं, बल्कि विदेशों में भी उपलब्धियां अर्जित कराई थीं.

इस प्रकार वह स्वयं भी प्रगति करती गईर् थी. एक के बाद एक प्रमोशन पाती गई थी और उस का पैकेज भी दिनोंदिन मोटा होता जा रहा था. वह बहुत खुश थी. हरदम चहचहाती रहती थी. चेहरे पर रौनक छाई रहती. उस के व्यक्तित्व के आगे अच्छेअच्छे टिक नहीं पाते थे. परंतु अचानक वह बहुत उदास रहने लगी थी. इतनी उदास कि उस से अब छोटेछोटे टारगेट भी अचीव नहीं होते थे.

इसी डिप्रैशन में उस ने यह कदम उठाया था. वह कभी यह कदम न उठाती, लेकिन एक स्त्री सबकुछ बरदाश्त कर सकती है पर अपने प्यार को साझा करना हरगिज नहीं.

जी हां, उस की कंपनी में वैसे तो तमाम सुंदर बालाएं थीं, परंतु हाल ही में एक नई भरती हुई थी. यह उच्च शिक्षित एवं प्रशिक्षित नवयुवती निहायत सुंदर व आकर्षक थी. उस ने सौंदर्य और आकर्षण में स्नेहा को पीछे छोड़ दिया था.

इसी सौंदर्य और आकर्षण के कारण वह अपने बौस की प्रिय हो गईर् थी. बौस दिनरात उसे आगेपीछे लगाए रहते थे. स्नेहा यह सब देख कुढ़ रही थी. पलपल उस का खून   झुलस रहा था.

आखिरकार उस ने आपत्ति की, ‘सर, यह सब ठीक नहीं है.’

‘क्या ठीक नहीं है?’ बौस ने मुसकरा कर पूछा.

‘आप अपने वादेइरादे भूल बैठे हैं.’

‘कौन से वादेइरादे?’

‘मु  झ से शादी के?’

‘नौनसैंस, पागल हो गई हो तुम. मैं ने तुम से ऐसा वादा कब किया? आजकल तुम बहुत बहकीबहकी बातें कर रही हो.’

‘मैं बहक गई हूं या आप? दिनरात उस बिच के साथ रंगरेलियां मनाते रहते हैं…’

बौस ने हिम्मत से काम लिया. अपना तेवर बदला, ‘देखो स्नेहा, मैं तुम से आज भी उतनी ही मोहब्बत करता हूं जितनी कि कल करता था. इतनी छोटीछोटी बातों पर ध्यान मत दो. तुम कहां से कहां पहुंच गई हो. इतना अच्छा पैकेज मिल रहा है तुम्हें.’

‘आज मैं जो कुछ भी हूं, अपनी मेहनत से हूं.’

‘यही तो कह रहा हूं मैं. स्नेहा, तुम समझने की कोशिश तो करो. मैं किस से मिल रहा हूं, क्या कर रहा हूं, क्या नहीं, इस पर ध्यान मत दो. जो कुछ भी मैं करता हूं वह सब कंपनी की भलाई के लिए करता हूं. तुम्हारे मानसम्मान और प्रगति में कोई बाधा आए तो मु  झ से शिकायत करो. खुद लाइफ को एंजौय करो और दूसरों को भी करने दो.’

परंतु स्नेहा नहीं मानी, उस ने स्पष्ट रूप से बौस से कह दिया, ‘मुझे कुछ नहीं पता. मैं बस यह चाहती हूं कि आप वर्षा को अपने करीब न आने दें.’

‘स्नेहा, मुझे अफसोस हो रहा है तुम्हारी सम  झ पर. तुम एक मौडर्न लेडी हो, अपने पैरों पर खड़ी हुई. यू शुड नौट पे योर अटैंशन टू दिस रबिश.’

‘तीन बार आप मुझे हिदायत दे चुके हैं कि मैं इन छोटीछोटी बातों पर ध्यान न दूं. पर मेरे लिए यह छोटी बात नहीं है. आप वर्षा को इतनी इंपोर्टैंस न दें. नहीं तो…’

‘नहीं तो क्या?’

‘नहीं तो मैं चीखचीख कर कहूंगी कि तुम पिछले कई वर्षों से मेरी बोटीबोटी नोचते रहे हो…’

बौस अपना धैर्य खो बैठे, ‘जाओ, जो करना चाहती हो करो. चीखो, चिल्लाओ, मीडिया को बुलाओ.’

और स्नेहा ने ऐसा ही किया. सुबह समाचारपत्रों के पन्ने स्नेहा के बौस की करतूतों से रंगे पड़े थे. टीवी चैनल्स मसाला लगालगा कर कवरेज को परोस रहे थे.

यह मामला बहुत आगे तक गया. कोर्टकचहरी से होता हुआ नारी संगठनों तक. इसी मध्य कुछ ऐसा घटित हुआ कि सभी सकते में आ गए. हुआ यह कि वर्षा का मर्डर हो गया. वर्षा का मर्डर क्यों हुआ? किस ने कराया? यह रहस्य, रहस्य ही रहा. हां, कानाफूसी होती रही कि वर्षा प्र्रैग्नैंट थी और यह बच्चा बौस का नहीं, कंपनी के मालिक का था.

इस सारे प्रकरण से उबरने में कंपनी को एड़ीचोटी एक करनी पड़ी. किसी तरह स्नेहा शांत हुई. स्नेहा के बौस का निलंबन तो पहले ही हो चुका था.

आखिरकार कंपनी ने राहत की सांस ली. उस ने एक नोटिफिकेशन जारी किया कि कंपनी में कार्यरत सारी लेडी कर्मचारी शालीन हो कर कंपनी में आया करें. जींसटौप जैसे अतिआधुनिक परिधान धारण कर के कदापि न आएं. बांहेंकटे जंपर, फ्रौक, ब्लाउज और पारदर्शी आस्तीनों वाले गारमैंट्स से परहेज करें. भड़काऊ मेकअप से बचें.

कंपनी के फरमान में जैंट्स कर्मचारियों के लिए भी हिदायतें थीं. उन्हें भी मौडर्न गारमैंट्स से गुरेज करने को कहा गया. जींसपैंट और टाइट टीशर्ट की मनाही की गई.

इन निर्देशों का पालन भी हुआ. लेडी कर्मचारी बड़ी शालीनता एवं शिष्टता से आनेजाने लगीं. जैंट्स भी सलीके से रहने लगे. सभी बड़ी तन्यमता से अपनेअपने काम को अंजाम देने लगे. परंतु फिर भी कर्मचारियों के मध्य पनप रहे प्रेमप्रंसगों की भनक ऊपर तक पहुंच गई.

एक बार फिर एक अद्भुत निर्णय लिया गया. वह यह कि धीरेधीरे कंपनी से लेडीज स्टाफ को हटाया जाने लगा. गुपचुप तरीके से एकदो कर के जबतब लेडीज कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा. किसीकिसी को अन्यत्र शिफ्ट किया जाने लगा. कुछेक महिलाएं परिस्थितियां भांप कर स्वयं इधरउधर खिसकने लगीं.

दूसरी जानिब लड़कियों के स्थान पर कंपनी में लड़कों की नियुक्ति की जाने लगी. इस का एक सुखद परिणाम यह रहा कि इस कंपनी में तमाम बेरोजगार लड़कों की नियुक्ति हो गई. इस कंपनी की देखादेखी यही कदम अन्य मल्टीनैशनल कंपनियों ने भी उठाया. इस तरह देखते ही देखते नौजवान बेरोजगारों की संख्या कम होने लगी. उन्हें अच्छा इनसैंटिव मिलने लगा. बेरोजगारों के बेरौनक चेहरों पर रौनक आने लगी.

पहले आप इस कंपनी की किसी शाखा में जाते तो रिसैप्शन पर आप को मुसकराती, लुभाती, आप का स्वागत करती हुई युवतियां ही मिलतीं. उन के वुमन परफ्यूम और मेकअप से आप के रोमरोम में सिहरन पैदा हो जाती. आप नजर दौड़ाते तो आप को चारों तरफ लेडीज चेहरे ही नजर आते. कुछ कंप्यूटर और लैपटौप से चिपके, कुछेक इधरउधर आतेजाते, कुछ डीलिंग करते हुए.

परंतु अब मामला उलट था. अब आप का रिसैप्शन पर मुसकराते हुए नौजवानों से सामना होता. ऐसेऐसे नौजवान जिन्हें देख कर आप दंग रह जाते. कुछ हृष्टपुष्ट, कुछ सींकसलाई से. कुछेक के लंबेलंबे बाल बिलकुल लड़कियों जैसे और कुछेक के बहुत ही छोटेछोटे बेतरतीब खड़े हुए.

वे सब आप से बड़े प्यार से बात करते. कंपनी के प्रोडक्ट्स पर खुल कर बोलते. उन की विशेषताएं गिनाते और आप मजबूर हो जाते उन के प्रोडक्ट्स को खरीदने पर.

इन नौजवानों की अथक मेहनत और कौशल से अब यह कंपनी अपने पिछले गम भुला कर धीरेधीरे प्रगति के मार्ग पर अग्रसर थी. नौजवानों ने दिनरात एक कर के, सुबह 10 बजे से ले कर रात 10 बजे तक कंप्यूटर में घुसघुस कर योजनाएं बनाबना कर और हवाई जहाज से उड़ानें भरभर कर एक बार फिर से कंपनी में जान डाल दी थी. अब कंपनी का कारोबार आसमान छूने लगा था.

इसी मध्य एक बार फिर कंपनी को आघात लगा. कंपनी के एक नौजवान ने अपने बौस पर आरोप लगाया कि वे विगत 2 वर्षों से उस का यौनशोषण करते आ रहे हैं.

उस कर्मचारी के बौस भी खुल कर सामने आ गए. कहने लगे, ‘‘हां, हम दोनों के मध्य ऐसा होता रहा है. परंतु यह सब हमारी परस्पर सहमति से होता रहा है.’’

उन्होंने उस कर्मचारी को बुला कर सम  झाया भी, ‘‘यह कैसी नादानी है?’’

‘‘नादानी, नादानी तो आप कर रहे हैं.’’

‘‘मैं?’’

‘‘हां, और कौन? आप अपने वादेइरादे भूल रहे हैं.’’

‘‘कैसे वादेइरादे?’’

‘‘मेरे साथ जीनेमरने के. मु झ से शादी करने के.’’

‘‘नौनसैंस, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है.’’

‘‘दिमाग तो आप का खराब हो गया, जो आप मुझ से नहीं, एक छोकरी से शादी करने जा रहे हैं.’’ Story In Hindi

Story In Hindi: मेरी दोस्त बनोगी – एक अनहोनी का शिकार बनी दिव्या

Story In Hindi: शामका समय था. ठंडीठंडी हवा चल रही थी. दिव्या अपने बगीचे में बैठी थी. चाय की चुसकियों के साथ दिव्या एक उपन्यास पढ़ रही थी. तभी उस के फोन पर सोशल साइट पर फ्रैंड रिक्वेस्ट का नोटिफिकेशन आया. दिव्या ने उपन्यास एक तरफ रखा और मोबाइल देखने लगी.

रोहित नाम के किसी व्यक्ति की रिक्वैस्ट थी. दिव्या ने रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट कर ली. जैसे ही उस ने रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट कर के मोबाइल रखा. तभी उस व्यक्ति यानी रोहित का मैसेज आया, ‘‘हाय.’’

दिव्या ने मैसेज देखा और फिर अपना उपन्यास उठा लिया. उस ने उपन्यास पढ़ना शुरू किया. दोबारा फिर रोहित का मैसेज आया. दिव्या ने अब मैसेज नहीं देखा.

वह उपन्यास पढ़ने में तल्लीन हो गई. तब तक फिर मैसेज का नोटिफिकेशन आया तो उस ने मोबाइल उठा लिया. दिव्या ने देखा रोहित के ही 3 मैसेज थे. पहला मैसेज था, ‘‘मैडम रिप्लाई तो कर दो.’’

उस के बाद फिर उस का मैसेज था, ‘‘मैं अपने मैसेज के रिप्लाई का इंतजार कर रहा हूं.’’

अब दिव्या ने रिप्लाई किया, ‘‘हाय.’’

‘‘मैं चंडीगढ़ से रोहित हूं. मैं एक बिजनैस मैन हूं,’’ रोहित ने मैसेज किया.

‘‘ओके नाइस,’’ दिव्या ने बेमन से उस का जवाब दिया.

‘‘दिव्याजी, क्या आप मेरी फ्रैंड बनेंगी,’’ रोहित ने पूछा.

दिव्या ने कोई रिप्लाई नहीं किया और मोबाइल का नैट औफ कर के उपन्यास पढ़ने लगी. दिव्या एक शादीशुदा महिला थी. वह एक स्कूल में शिक्षिका थी. उस के पति पुणे में एक कंपनी में मैनेजर थे. दिव्या चंडीगढ़ में अकेली रहती थी.

रात को जैसे ही दिव्या ने अपने मोबाइल का नैट औन किया तो उस ने देखा कि रोहित के बहुत सारे मैसेज थे. दिव्या के औनलाइन होते ही उस के मैसेज फिर आने शुरू हो गए.

‘कैसा पागल है यह, इसे कोई काम नहीं है क्या?’ दिव्या सोचने लगी.

‘‘आप को कोई काम नहीं है क्या?’’ दिव्या ने रिप्लाई किया.

‘‘जी काम तो बहुत हैं पर आप के मैसेज के इंतजार में सारे काम रह गए,’’ रोहित ने लिखा.

‘‘कहिए क्या कहना है आप को?’’ दिव्या ने मैसेज किया.

‘‘क्या आप मेरी दोस्त बनेंगी?’’ रोहित ने पूछा.

‘‘बन तो गई हूं तभी तो आप बात कर रहे हैं,’’ दिव्या ने लिखा.

‘‘ऐसे नहीं, आप वादा करो कि आप रोज मु झ से बात किया करेंगी,’’ रोहित ने मैसेज किया.

‘‘ठीक है,’’ दिव्या ने मैसेज किया.

‘‘धन्यवादजी,’’ रोहित ने मैसेज किया.

फिर उस ने दिव्या को एक चुटकुला भेजा. दिव्या चुटकुला पढ़ कर हंसने लगी और उस ने हंसी की इमोजी भेजी. अब रोहित ने उस को और 2-3 चुटकुले भेजे.

उस के चुटकुले पढ़ कर दिव्या को हंसी आ रही थी. अब दिव्या भी रोहित को चुटकुले भेजने लगी. इस तरह उन दोनों के बीच बातों का सिलसिला बन गया. दिव्या को अब रोहित से बात करना अच्छा लगने लगा था. उन दोनों ने एकदूसरे से अपने मोबाइल नंबर भी शेयर कर लिए थे.

जब भी दिव्या को फुरसत मिलती वह रोहित से बात करती रहती. बातों का यह सिलसिला इतना बढ़ा कि दोनों मिलने भी लगे. अब बात सिर्फ दोस्ती तक नहीं थी. दोस्ती से बहुत आगे बढ़ चुकी थी. रोहित दिव्या के घर आनेजाने लगा था और जो उन दोनों के बीच एक सीमा रेखा थी वह भी टूट चुकी थी. रोहित को दिव्या के बारे में सब पता था.

कुछ दिन बाद दिव्या का पति विदेश से आने वाला था. लेकिन रोहित हर दिन उस से मिलने आता था.

एक दिन दिव्या आदित्य से फोन पर बात कर रही थी. उस को एहसास हुआ कि वह

आदित्य से कितना बड़ा विश्वासघात कर रही है. उसे स्वयं से घृणा होने लगी. उस ने सोचा कि अब वह रोहित से मिलना बंद कर देगी.

अगले दिन उस ने रोहित को घर पर आने से यह कह कर मना कर दिया कि कुछ दिनों के लिए उस की रिश्तेदार रहने आ रही है. उस ने रोहित से बात करना भी कम कर दिया. रोहित उसे कौल करता तो वह नहीं उठाती. उस के मैसेज का भी रिप्लाई नहीं करती.

एक दिन अचानक रोहित ने उसे एक वीडियो भेजा. दिव्या वीडियो देख कर अवाक रह गई. रोहित ने उस का और अपना वीडियो उसे भेजा था.

‘‘तुम ने यह वीडियो कब बनाया और क्यों बनाया,’’ दिव्या ने तुरंत उसे कौल कर पूछा.

‘‘क्यों तुम्हें पसंद नहीं आया? देखो हम दोनों कितने अच्छे लग रहे हैं,’’ रोहित बोला, ‘‘और हां वह तुम्हारी रिश्तेदार कहां हैं? उन को भी दिखाओ न यह वीडियो,’’ रोहित हंसते हुए बोला.

‘‘तुम क्या चाहते हो?’’ दिव्या बोली.

‘‘मैं बस तुम्हें चाहता हूं. तुम रोज मु झ से मिलो और मेरे कुछ दोस्त भी तुम से मिलना चाहते हैं,’’ रोहित हंसते हुए बोला.

‘‘रोज तो मिलती हूं अभी 3 दिन से ही तो नहीं मिली हूं,’’ दिव्या ने गुस्से में कहा.

‘‘मैं एक दिन भी तुम्हारे बिना नहीं रह पाता. मु झे तुम्हारी आदत हो गई है,’’ रोहित बोला.

‘‘हां तो किसी पब्लिक प्लेस में मिल लूंगी. पर यह वीडियो डिलीट करो,’’ दिव्या गुस्से में बोली.

‘‘कितने वीडियो डिलीट करूं बेबी? बहुत सारे हैं मेरे दोस्तों ने भी देखे हैं.’’

‘‘तुम्हे शर्म नहीं आई अपना और मेरा वीडियो अपने दोस्तों को दिखाते हुए?’’ दिव्या गुस्से में बोली.

‘‘शर्म आती तो वीडियो क्यों बनाता? छोड़ो ये सब. कल तुम मु झ से मिलने आओ,’’ रोहित एक कड़वी हंसी हंसते हुए बोला, ‘‘एक कौफी शौप में मिलते हैं.’’

दिव्या को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, लेकिन उस ने यह सोच कर मिलने को कह दिया कि एक बार वह रोहित से मिल कर उस के मोबाइल से अपनी सारे वीडियो डिलिट कर देगी.

‘‘नहीं कौफी शौप में नहीं मैं तुम्हारे घर आऊंगा,’’ रोहित बोला.

‘‘नहीं मैं अब घर नहीं मिल सकती,’’ दिव्या ने कहा.

‘‘तो किसी होटल में मिलते हैं. मैं शाम को तुम्हें लेने आ जाऊंगा,’’ रोहित बोला.

‘‘क्यों होटल में क्यों?’’ दिव्या बोली.

‘‘तुम्हें पता नहीं है क्या कि मैं होटल में क्यों बुला रहा हूं?’’ रोहित बोला.

‘‘नहीं, मैं होटल में नहीं आ सकती,’’ दिव्या ने कहा.

‘‘आना तो पड़ेगा मेरी जान नहीं तो तुम्हारे ये वीडियो नैट पर अपलोड हो सकते हैं,’’ रोहित बोला.

‘‘तुम इतने गिरे हुए हो. यदि मु झे यह पता होता तो तुम से बात भी नहीं करती,’’ दिव्या गुस्से में चिल्ला कर बोली.

‘‘नहीं जान, मैं बिलकुल गिरा हुआ नहीं हूं. वह तो मेरे दोस्त ऐसा बोल रहे हैं. अगर तुम कल नहीं आई तो मेरे दोस्त ये वीडियो नैट पर अपलोड कर देंगे,’’ रोहित ठहाका लगाते हुए बोला.

दिव्या ने फोन काट दिया. अब वह सोचने लगी कि वाकई उस से बहुत बड़ी गलती हो गई. वह थरथर कांप रही रही थी कि रोहित के पास उस के वीडियो हैं.

अगर वह रोहित से नहीं मिलेगी तो वह वीडियो नैट पर अपलोड कर देगा. उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था. वह फूटफूट कर रोने लगी.

उस ने अपनी एक दोस्त अर्पिता को फोन किया और उसे सारी बात बताई. अर्पिता ने उसे सम झाया कि तू सुबह ही मेरे घर आ जा, फिर कुछ सोचते हैं. दिव्या ने रात में ही अपने कपड़े और जरूरी सामान पैक किया और सुबह अपनी दोस्त अर्पिता के घर पहुंच गई.

उस ने अर्पिता के घर की डोरबैल बजाई. जैसे ही अर्पिता ने डोर खोला, दिव्या उस से गले लग कर रोने लगी. अर्पिता ने उसे चुप कराया. दिव्या को रोते देख अर्पिता के पति शिवम ने अर्पिता से इशारे में पूछा कि दिव्या क्यों रो रही है? शिवम को दिव्या के बारे में कुछ पता न था.

यह 2 सहेलियों की आपस की बात थी. अर्पिता ने शिवम को कुछ नहीं बताया था. अर्पिता दिव्या को अपने कमरे में ले गई और दोनों बातें करने लगीं.

‘‘दिव्या, तू फोन पर बहुत घबराई हुई थी इसलिए मैं ने यहां बुला लिया. मु झे डर था कि कहीं तू कोई गलत कदम न उठा ले,’’ अर्पिता बोलीप्त

‘‘हां मु झे कुछ सम झ नहीं आ रहा था. मैं सोच रही थी कि मैं कुछ खा कर मर जाऊं,’’ दिव्या रोते हुए बोली.

‘‘ऐसी कायरों वाली बातें मत कर. मरना तु झे नहीं उसे चाहिए और तू ऐसे किसी भी अनजान आदमी से बात मत किया कर, अब फंस गई न,’’ अर्पिता दिव्या को डांटते हुए बोली.

‘‘बस इस बार मु झे इस मुसीबत से निकाल ले. फिर कभी किसी से बात नहीं करूंगी,’’ दिव्या अपने आंसू पोंछते हुए बोली.

‘‘लेकिन तेरे यहां आने से मुसीबत टली नहीं है वह तेरा वीडियो कभी भी अपलोड कर सकता है,’’ अर्पिता ने कहा.

‘‘फिर क्या करूं मैं?’’ दिव्या डरते हुए बोली.

‘‘हमें पुलिस में शिकायत दर्ज करानी पड़ेगी,’’ अर्पिता ने कहा.

‘‘पुलिस? नहींनहीं पुलिस से बात सब जगह फैल जाएगी,’’ दिव्या बोली.

‘‘वह तो वीडियो अपलोड होने के बाद वैसे भी तू कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगी. इस से तो पुलिस में शिकायत करवा दे तो वह पकड़ा जाएगा और किसी को नहीं फंसा पाएगा,’’ अर्पिता ने दिव्या को सम झाया.

‘‘ठीक है पर शिवम को तूने बता दिया क्या?’’ दिव्या ने पूछा.

‘‘नहीं अभी मैं ने कुछ नहीं बताया. लेकिन बताना पडे़गा,’’ अर्पिता ने कहा.

‘‘तू नहा के आ जल्दी. खाना तैयार है. खाना खा कर फिर बात करते है,’’ अर्पिता ने दिव्या से कहा.

दिव्या नहाने चली गई. अर्पिता ने शिवम को दिव्या के बारे में सब बताया. तब तक दिव्या नहा के आ गई थी. सब ने खाना खाया और फिर तीनों पुलिस स्टेशन चल दिए. पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. इधर दिव्या के फोन पर रोहित के फोन बारबार आ रहे थे.

इंस्पैक्टर के कहने पर दिव्या ने रोहित से बात की. पुलिस ने उस का नंबर ट्रैक कर लिया. जल्द ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. रोहित के लैपटौप में पुलिस को लड़कियों के कई वीडियो मिले. पुलिस ने दिव्या का वीडियो डिलीट कर दिया. दिव्या वापस अपने घर आ गई.

दिव्या अब किसी भी अनजान की रिक्वैस्ट ऐक्सैप्ट नहीं करती. कुछ दिनों बाद उस का पति आदित्य घर आ गया.

‘‘आदित्य, अब मैं अकेली नहीं रह सकती,’’ दिव्या ने कहा.

‘‘अब मैं तुम्हें अकेले रहने भी नहीं दूंगा,’’ आदित्य बोला.

‘‘क्यों? क्या मु झे अब अपने साथ ले जाओगे?’’ दिव्या ने खुश होते हुए कहा.

‘‘नहीं. अब मैं यहीं तुम्हारे साथ रहूंगा. अब जब भी कभी जाऊंगा तो तुम्हें साथ ले जाऊंगा,’’ आदित्य ने कहा.

‘‘अच्छा आज अचानक इतना प्यार कैसे आ गया?’’ दिव्या आदित्य को छेड़ते हुए बोली.

‘‘हां अब बहुत दिन हो गए अकेले रहते रहते. अगर ऐसे ही अलगअलग रहे तो हमारे बीच तीसरा कैसे आएगा,’’ आदित्य ने दिव्या को बांहों में भरते हुए कहा.

‘‘मतलब?’’ दिव्या आश्चर्य से बोली.

‘‘अरे मैं हम दोनों के बेबी की बात कर रहा हूं,’’ आदित्य ने बोला और लाइट बंद कर दी. दिव्या आदित्य के साथ थी, लेकिन उस के दिमाग में उथलपुथल हो रही थी. वह रोहित के बारे में आदित्य को सबकुछ बता देना चाहती थी. लेकिन उसे डर था कि कहीं आदित्य और उस के रिश्ते में दरार न पड़ जाए.

अगले दिन सुबहसुबह ही दिव्या आदित्य से बोली, ‘‘आदित्य मु झे तुम से

कोई जरूरी बात करनी है.’’

‘‘क्या बात करनी है बोलो,’’ आदित्य ने कहा.

‘‘आदित्य…’’ दिव्या कहतेकहते रुक गई.

‘‘बोलो न क्या कहना है,’’ आदित्य बोला.

‘‘मु झ से एक गलती हो गई,’’ दिव्या ने कहा और रोहित वाली सारी बात उसे बता दी.

पूरी बात सुनते ही आदित्य गुस्से में चिल्लाया, ‘‘तुम सम झती क्या हो अपनेआप को? तुम कुछ भी करोगी मैं सब सह कर लूंगा. अब जाओ उसी रोहित के पास. मेरी जिंदगी में अब तुम्हारी कोई जरूरत नहीं.’’

‘‘आदित्य मु झ से गलती हो गई. प्लीज मु झे माफ कर दो,’’ दिव्या रोतेरोते बोली.

‘‘यह गलती माफी के लायक नहीं है दिव्या,’’ कह कर आदित्य कमरे से बाहर चला गया.

‘‘आदित्यआदित्य प्लीज,’’ दिव्या आवाज देती रही, लेकिन आदित्य ने नहीं सुना और वह बाहर चला गया. दिव्य रोती रही.

देर रात आदित्य घर आया. दिव्या खाना ले कर उस के पास आई. उस को देखते ही आदित्य ने अपना मुंह मोड़ लिया.

‘‘आदित्य खाना खा लो,’’ दिव्या बोली.

‘‘मु झे नहीं खाना कुछ भी और तुम मु झ

से बात करने की कोशिश भी मत करो,’’

आदित्य बोला.

‘‘आदित्य मु झ से बहुत बड़ी गलती हो गई. एक बार मु झे माफ कर दो प्लीज,’’ दिव्या ने रोते हुए कहा.

‘‘नहीं, अब मु झे तुम से कोई मतलब नहीं रखना है. मैं तुम्हें तलाक दे दूंगा,’’ रोहित गुस्से

में बोला.

‘‘मैं जानती हूं कि मु झ से बहुत बड़ी गलती हुई है, लेकिन तुम्हें तलाक देने की जरूरत नहीं पड़ेगी. मैं खुद ही तुम्हारी जिंदगी से दूर चली जाऊंगी,’’ दिव्या रोतेरोते दूसरे रूम में चली गई. उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. वह सोचने लगी कि अब उस के जीवन का कोई मतलब ही नहीं है. उसे अपना जीवन खत्म कर लेना चाहिए.

इधर कमरे में बैठ कर आदित्य सोच रहा था कि इतनी बड़ी बात हो गई. दिव्या चाहती तो उसे कुछ नहीं बताती. लेकिन उस ने उसे सबकुछ बता दिया. अगर ऐसी गलती आदित्य से हो जाती तो क्या दिव्या उसे छोड़ देती. वह उठा और दिव्या के कमरे की तरफ बढ़ा. उस ने आवाज दी, ‘‘दिव्यादिव्या दरवाजा खोलो.’’

दिव्या कुछ न बोली. आदित्य के बारबार आवाज देने पर भी जब दिव्या की आवाज नहीं आई तो आदित्य ने खिड़की से अंदर  झांक कर देखा तो हैरान रह गया. दिव्या एक साड़ी को पंखे पर डालने की कोशिश कर रही थी.

‘‘दिव्या, दरवाजा खोल, अगर तुम ने ऐसा कुछ किया तो मैं भी मर जाऊंगा,’’ आदित्य बोला.

‘‘दिव्या फिर भी कुछ नहीं बोली और पंखे पर साड़ी डालने की कोशिश करने में लगी रही. उस की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे.

‘‘दिव्या रुको…’’ आदित्य जल्दी से कमरे से दूसरी चाबी ले कर आया. वह कमरा खोल कर अंदर गया और दिव्या को अपने गले से लगा लिया.

‘‘तुम क्या करने जा रही थी. मैं ने गुस्से में तुम्हें तलाक देने को कह दिया था.

लेकिन मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता,’’ आदित्य भी रोते हुए बोला.

‘‘आदित्य मु झे माफ कर दो,’’ दिव्या रोतेरोते बस यही कहे जा रही थी.

‘‘चुप वह सब भूल जाओ कि तुम्हारे साथ ऐसा कुछ हुआ था. तुम मेरी हो और हमेशा मेरी ही रहोगी,’’ कहतेकहते आदित्य भी रो पड़ा.

आदित्य और दिव्या सबकुछ भूल कर अब एक नई जिंदगी की तरफ बढ़ गए थे. एक गलती ने एक हंसताखेलता परिवार तबाही के रास्ते पर ला दिया था. हमें किसी भी अनजान व्यक्ति से बात करते समय पूरी सावधानी बरतनी चाहिए. जहां तक हो सके अनजान लोगों से बात करने से भी बचना चाहिए. Story In Hindi

Hindi Family Story: ब्रह्मराक्षस – रिश्ते पर लगा कलंक

Hindi Family Story: ‘‘आज से हमारा पतिपत्नी का रिश्ता खत्म हो गया.’’

‘‘क्यों? उस में मेरा क्या कुसूर था?’’

‘‘कुसूर नहीं था, पर तुम्हारे दामन पर कलंक तो लग ही गया है.’’

‘‘तुम मेरे पति थे. तुम्हारे सामने ही मेरी इज्जत लुटती रही और तुम चुपचाप देखते रहे.’’

‘‘उस समय तुम्हारे पिता भी तो थे.’’

‘‘उन्होंने तो मु झे तुम्हें सौंप दिया था.’’

‘‘मैं अकेला क्या कर सकता था? वे लोग गिरोह में थे और सब के पास हथियार थे.’’

‘‘तो तुम मर तो सकते थे.’’

‘‘मेरे मरने से क्या होता?’’

‘‘तुम अमर हो जाते.’’

‘‘नहीं, यह खुदकुशी कहलाती.’’

‘‘अब मेरा क्या होगा?’’

‘‘मुझे 10 हजार रुपए तनख्वाह मिलती है. हर महीने 5 हजार रुपए तुम्हें दे दिया करूंगा. इस के लिए तुम्हें कोई कानूनी लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी. तुम चाहो तो दूसरी शादी भी कर सकती हो.’’

‘‘क्या तुम करोगे दूसरी शादी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो फिर तुम मु झे दूसरी शादी करने की क्यों सलाह दे रहे हो?’’

‘‘यह मेरा अपना विचार है.’’

‘‘मैं जाऊंगी कहां?’’

‘‘तुम अपने पिता के साथ मायके चली जाओ.’’

‘‘और तुम?’’

‘‘मैं अकेला रह लूंगा.’’

‘‘क्या, मेरा कलंक अब कभी नहीं मिटेगा?’’

‘‘मिटेगा, जरूर मिटेगा. लेकिन कैसे और कब, नहीं बता सकता.’’

‘‘फिर क्या तुम मु झे अपना लोगे?’’

‘‘यह मेरे जिंदा रहने पर निर्भर करता है. अब तुम मायके जाने की तैयारी करो. बाबूजी तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.’’

तारा अपने पिता के साथ मायके चली गई.

उस के पति विक्रम ने उस के जाने के बाद अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. वह गहरी सोच में पड़ गया.

घर की हर चीज तारा की यादों को ताजा करने लगी थी. तारा की जब इज्जत लूटी जा रही थी, तब विक्रम हथियारों के घेरे में बिलकुल कमजोर खड़ा था.

वह नजर उस के दिलोदिमाग को बो िझल बना रही थी. उसे अपने ठंडे खून पर गुस्सा आ रहा था.

तारा ने ठीक ही कहा था, ‘कम से कम मर तो सकते थे.’

क्यों नहीं मरा? वह मौत से क्यों डर गया था?

बहुत से लोगों को उस ने मरते देखा था, फिर भी मौत के डर से छूट नहीं सका. बलात्कारी परशुराम का अट्टहास करता चेहरा बारबार उस की आंखों के सामने घूम रहा था.

डर की एक तेज लहर विक्रम के भीतर से उठी. वह कांप उठा था. सारा शरीर पसीने से गीला हो गया. उसे ऐसा लगने लगा था कि परशुराम का खौफनाक चेहरा उसे जीने नहीं देगा.

बहुत कोशिशों के बावजूद भी विक्रम की आंखों के सामने से उस का चेहरा हट नहीं रहा था. वह चेहरा जैसे हर जगह उस का पीछा करने लगा था, बलात्कार का वह घिनौना नजारा भी उस के साथ ही उभरने लगा था.

तारा का डर और शर्म से भरा चेहरा भी परशुराम के खौफनाक चेहरे के साथ उभरता रहा. उसे याद आया कि किस तरह तारा मदद के लिए बारबार उस की तरफ देखती और वह हर बार उस से अपनी आंखें चुरा लेता था. परशुराम और उस के साथियों की हंसी अब भी उस के कानों से टकरा रही थी.

तकरीबन एक घंटे बाद बदमाश जा चुके थे. इस के बाद 1-1 कर के धीरेधीरे भीड़ जमा होने लगी थी. सब लोग डरेसहमे बेजान से लग रहे थे. विक्रम पहले की तरह खड़ा रहा, मानो उस के पैर जमीन से चिपक गए हों.

अचानक बाहर शोर सुनाई दिया, तो विक्रम धीरे से उठा. उस ने देखा कि बलात्कारी परशुराम अपने साथियों के साथ फूलमालाओं से लदा मस्ती में जा रहा है.

विक्रम चुपचाप उस भीड़ में शामिल हो गया. कुछ लोगों ने उसे पहचान लिया. उन के चेहरों पर कुटिल हंसी दिखाई दे रही थी.

भीड़ में से एक आदमी बोला, ‘‘इसी की बीवी के साथ बलात्कार हुआ था, इस की आंखों के सामने. और इस के ससुर भी वहीं थे. इस ने अपनी बीवी से संबंध तोड़ लिया है. अब मौज से दूसरी शादी करेगा. इस की बीवी जिंदगीभर अपना कलंक ढोती रहेगी.’’

‘‘पैसे में बड़ी ताकत होती है. पैसे के बल पर ही तो परशुराम को जमानत मिली है.’’

‘‘तारा से ऐसेऐसे सवाल पूछे जाएंगे, जो दूसरे बलात्कार जैसे ही होंगे. एक बार परशुराम ने तारा के पति और पिता के सामने उस के साथ बलात्कार किया, दूसरी बार बचाव पक्ष के वकील भरी अदालत में जज की मौजूदगी में तारा से उलटेसीधे सवाल पूछेंगे, जिस से उसे दूसरे बलात्कार का एहसास होगा.’’

‘‘गवाही देने की भी हिम्मत कौन करेगा? समाज ही तो पालता है परशुराम जैसे लोगों को.’’

जितने मुंह उतनी बातें.

धीरेधीरे भीड़ छंटने लगी थी. परशुराम के घर पहुंचतेपहुंचते थोड़े ही लोग रह गए थे. विक्रम अभी भी सिर  झुकाए उसी भीड़ में चल रहा था. परशुराम को उस के घर पहुंचा कर भीड़ वापस चली गई थी. विक्रम वहीं डरासहमा खड़ा रहा.

परशुराम जैसे ही अंदर जाने लगा, विक्रम ने धीरे से कहा, ‘‘कुछ मेरी भी सुन लो परशुराम दादा.’’

आवाज सुन कर परशुराम पीछे मुड़ा, ‘‘क्या कहना चाहते हो?’’

‘‘यहां नहीं दादा, उस बाग में चलो,’’ विक्रम बोला.

परशुराम ने उसे घूरते हुए कहा, ‘‘वहां क्यों?’’

‘‘दादा, बात ही कुछ ऐसी है.’’

‘‘अच्छा चलो,’’ घमंड से भरा परशुराम विक्रम के साथ बाग तक गया. उस ने सोचा कि यह डरासहमा आदमी उस का क्या कर लेगा.

उस ने अंदर की जेब में रखे अपने कट्टे को टटोला. वहां पहुंच कर उस ने पूछा, ‘‘हां, अब बताओ?’’

‘‘दादा, मैं ने अपनी बीवी को छोड़ दिया है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘वह दागी हो गई थी न दादा.’’

परशुराम के होंठों पर मुसकान उभर आई. वह बोला, ‘‘मु झे तुम से हमदर्दी

है विक्रम, पर क्या करता तुम्हारी बीवी चीज ही ऐसी थी.’’

उस का इतना ही कहना था कि विक्रम गुस्से से तमतमा गया, मानो उस के जिस्म में कई हाथियों की ताकत आ गई हो. उस ने परशुराम को अपने हाथों में उठा लिया और उसे जमीन पर तब तक उठाउठा कर पटकता रहा, जब तक कि वह मर नहीं गया.

आसपास के सभी लोग यह नजारा देखते रहे, मगर कोई भी उसे बचाने नहीं आया.

परशुराम की चीखें चारों तरफ गूंजती रहीं, मगर किसी पर उस का असर नहीं हुआ.

परशुराम की हत्या कर विक्रम सीधे पुलिस स्टेशन पहुंचा, जहां उस ने सारी बातें दोहरा दीं. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

तारा को जब इस बात का पता चला, तो वह उस से मिलने जेल आई. विक्रम ने उसे बड़े ही गौर से देखा और मुसकरा कर कहा, ‘‘तारा, तुम्हारा कलंक मिट गया है. जेल से छूटने के बाद तुम्हें आ कर ले जाऊंगा. मेरा इंतजार करना. करोगी न?’’

‘‘हां, जिंदगीभर,’’ कहतेकहते तारा रो पड़ी. Hindi Family Story

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