Hindi Superstition Story : अशुभ

Hindi Superstition Story. मेरी नानी कहती हैं कि अगर सुबह दूध गिर जाए, तो बहुत अशुभ होता है. अम्मां खड़ीखड़ी पैर से ले कर सिर तक थरथर कांप रही थीं. मैं ने देखा कि उन के हाथ से सुबहसुबह आधा लिटर दूध गिर कर बहने लगा था.

दरअसल, अम्मां लो ब्लडप्रैशर की मरीज थीं. उन्हें चक्कर आना, दिल घबराना, पूरा जिस्म हिलना जैसी तमाम शिकायतें थीं. वे इतनी पतलीदुबली थीं कि  झटका खाते ही गिर जाएं.

महीनेभर से अम्मां की तबीयत ज्यादा खराब थी. कमजोरी के चलते उन के हाथ से दूध का डब्बा गिर गया था.

अम्मां को अपनी जानकारी के मुताबिक मैं ने लंबाचौड़ा फलसफा सुनाया कि दूध गिरना बुरा नहीं है, बुरे तो इनसान के खयालात होते हैं.

अम्मां थोड़ी शांत हुईं, लेकिन तभी पीछे से नानी ने 5 नंबर चप्पल से मेरी पीठ पर निशाना लगाया.

मैं ने पीछे पलट कर देखा. नानी खतरनाक शिकारी बिल्ली की तरह कड़े तेवर लिए मु झे घूर रही थीं.

‘‘नानी…’’ मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि उन्होंने एक जोरदार तमाचा मेरे गाल पर रसीद कर दिया.

‘‘बेहया, तु झे पता नहीं है कि दूध गिरना कितना अशुभ होता है. हाय…हाय, अब क्या होगा? कलमुंही, तु झे कितना सम झाया करूं,’’ नानी ने अम्मां को घूरते हुए कहा.

मेरे पिता बड़ेबड़े शहरों में बने मकानों की पुताई करते थे. वे साल में 1-2 बार आ कर हमारे ऊपर प्यार की बरसात कर देते थे. फिर मु झे और अम्मां को अपनी चहेती दकियानूसी सास के पास छोड़ कर चले जाते थे.

मैं जहर का घूंट पी कर रह गया. नानी कह रही थीं, ‘‘ऐसे ही मियांजी की पोती के हाथ से दूध गिर गया था और मियांजी का एकलौता बेटा मर गया था.’’

मियांजी के परिवार के साथ हुआ वह हादसा मैं भी कहां भूला था. बेचारी बीना को कितनी कठोर सजा भुगतनी पड़ी थी. उस हादसे को गुजरे 4 महीने बीत चुके थे, मगर लगता था कि कल की ही बात हो.

मेरी नानी के इस पक्के घर के अलावा इस गांव में सिर्फ 12-13 पक्के घर और थे. 50-60 घर कच्ची मिट्टी के बने हुए थे, जिन में से एक घर मियांजी का भी था. वे अपने छोटे से परिवार के साथ हंसीखुशी से रहते थे. उन के परिवार में उन की बीवी, एक बेटा, बहू और पोती बीना थी.

मियांजी बुजुर्ग थे. उन की सू झबू झ के पूरे गांव में चर्चे होते थे. मैं भी उन की सम झदारी का कायल था.

एक दिन मैं किसी काम से मियांजी के घर गया था. मियांजी ने बड़ी इज्जत से मु झे आंगन में बैठाया और अपनी जवान पोती से कहा, ‘‘बीना, जल्दी से बाबू के लिए दूध ले कर आओ. यह हमारे यहां कभीकभार ही आता है.’’

मियांजी ने मेरा नाम बेहद अपनेपन से ले कर कहा, तो मैं बहुत खुश हो गया था.

फिर 2-3 मिनट बाद अंदर से कुछ गिरने की आवाज आई, तभी बीना की मां और दादी लपक कर अंदर गईं. थोड़ी देर बाद भीतर से रोने की आवाज भी आने लगी. मैं घबरा गया और तुरंत मियांजी के साथ अंदर गया.

‘‘बीना, यह तू ने क्या किया?’’ बीना की मां बेदर्दी से उसे पीट रही थीं. दादी उसे कोस रही थीं.

‘‘यह आप क्या कर रही हैं?’’ मैं ने बीना की मां से कहा. दर्द से बेहाल बेचारी बीना बुरी तरह रो रही थी.

मियांजी ने जल्दी से दूध लाने को क्या कहा कि बीना हड़बड़ा गई. इसी जल्दबाजी में बीना का पैर ऊंचीनीची जगह पर आ गया और दूध के साथ नीचे आ गिरी. उस के दाएं पैर में मोच आ गई थी.

मियांजी बिना कुछ कहे कमरे से निकल कर चले गए. उन्होंने अपनी बीवी को सम झाने की जरा भी कोशिश नहीं की. मु झे लगा कि इन औरतों से ज्यादा तो मियांजी अंधविश्वासी हैं.

मैं अपना सा मुंह ले कर घर लौट आया.

शाम को मैं ने अम्मां से कहा, ‘‘अम्मां, चाय के साथ पकौड़े भी बना दो. मु झे भूख लग रही है.’’

‘‘अम्मां… भूख,’’ मैं ने दोबारा लाड़ से अम्मां का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की.

‘‘चुप रहो. 3 दिन तक रसोई में न कड़ाही चढ़ेगी, न सब्जी में किसी तरह का तड़का लगेगा,’’ अम्मां के बजाय नानी ने आ कर मु झे 8-10 साल के बच्चे की तरह लताड़ दिया.

‘‘क्यों नानी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘किस दुनिया में रहता है. कुछ खबर है. मियांजी का एकलौता बेटा बस हादसे में मर गया.

‘‘अरे, बस हादसे का नाम है. उसे तो दूध गिरने के अशुभ ने खा लिया. बेचारे मियांजी कितने गरीब हैं. 2 हजार रुपए मौलवी को दे दिए थे इस अशुभ को उतरवाने के वास्ते, लेकिन दूध का घोर अशुभ उतरा ही नहीं,’’ नानी पिघला हुआ लोहा मेरे कानों में उड़ेल कर अम्मां को साथ लिए मियांजी के घर चली गईं.

अब मु झे बीना की चिंता होने लगी. ये बेदर्द समाज बीना को कहां छोड़ने वाला था. मैं ने बीना को बचाने की खातिर एक फैसला ले लिया.

मैं ने उस बस हादसे की पूरी छानबीन कर डाली और मियांजी को सम झाने की हर मुमकिन कोशिश की कि नशे में धुत्त ड्राइवर तेज बस चला रहा था. मगर मेरे लाख सम झाने पर भी किसी ने मेरी बात नहीं मानी.

दूध गिरना अशुभ नहीं था, लेकिन बीना को 2 दिन तक खाना नहीं दिया गया, वह यकीनन अशुभ था.

अब मैं ने तय कर लिया था, यह घटना मैं दोबारा नहीं होने दूंगा. बीना 2 दिन तक भूख  झेल गई, मगर मेरी अम्मां इतनी बीमार थीं कि शाम तक ही मर जातीं और मेरे लिए यह सब से बड़ा अशुभ दिन होता.

तब मैं ने कड़े तेवर अपनाते हुए नानी से कहा, ‘‘खबरदार, जो मेरे बाप की मेहनत की कमाई किसी  झोलाछाप, पाखंडी मौलवी के आगे डाली. अगर आप ने मेरी बात नहीं मानी और मेरी अम्मां के साथ जुर्म किया या उन्हें किसी तरह परेशान किया, तो हम आप को इस उम्र में छोड़ कर चले जाएंगे. फिर शायद आप की जिंदगी का यह सब से बड़ा अशुभ दिन होगा.’’

मैं अम्मां को अपने साथ लिए कमरे में आ गया. उन्हें खाट पर लिटा कर चादर ओढ़ाई. जैसे ही मैं पलटा, हैरानी के कई  झटके खातेखाते बचा.

तावीज के बजाय नानी कसबे के अस्पताल की लेडी डाक्टर के साथ खड़ी थीं. कब्रिस्तान में धकेल देने वाली नानी अब सुखशांति के बौर्डर पर खड़ी लग रही थीं. मु झे लगा कि मौके पर दी गई धमकी अब निशाने पर जा लगी थी.

डाक्टर ने चैकअप कर के दवा लिखी और परची नानी के हाथ में थमा कर चली गईं.

मैं ने खुश हो कर नानी से कहा, ‘‘अच्छा हुआ, आप सुधर गईं, वरना…’’ इस से आगे मैं कुछ और कहता कि नानी ने फिर जोरदार थप्पड़ से मेरा गाल लाल कर दिया.

‘‘मु झे छोड़ कर मत जाना. मैं किसी को नहीं भड़काऊंगी,’’ इतना कह कर नानी रोने लगीं.

आग या पानी, मैं नानी को सम झ नहीं पाया. पहले गुस्सा, फिर रोना. खैर, मैं ने नानी को कंधे से थाम लिया, क्योंकि वे सुधर जो गई थीं.  Hindi Superstition Story

Blind Faith Story : रंपो

Blind Faith Story. साधु की बात सुन कर रंपो परेशानी में पड़ गई. क्या करे वह? पति को अच्छा करना है, तो साधु की बात माननी पड़ेगी. इज्जत चली जाएगी, लेकिन पति तो बच जाएगा.

साधु ने उस का हाथ पकड़ लिया और पूछा, ‘‘क्या सोच रही है?’’

रंपो अपनी कलाई को उस के हाथ से छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली, ‘‘आप की बात मान रही हूं बाबा, पर मेरा पति अच्छा हो जाना चाहिए.’’

साधु ने उस के गले में बांहें डालते हुए कहा, ‘‘हम खुश तो देवता खुश. तू चिंता मत कर. तेरा पति पूरी तरह ठीक हो जाएगा.’’

रंपो को साधु की बात पर पूरी तरह यकीन हो गया. वह मंदिर में ही लेट गई. उस ने अपना जिस्म साधु को सौंप दिया.

अपनी वासना का शिकार बनाने के बाद साधु बोला, ‘‘अब जा. कोई आ गया, तो गड़बड़ हो जाएगी.’’

रंपो खड़ी होते हुए बोली, ‘‘बाबा, देवता से सच्ची प्रार्थना करना.’’

साधु उसे हलका सा बाहर की ओर धकेलते हुए बोला, ‘‘जा, अब जल्दी जा यहां से. तू चिंता मत कर.’’

रंपो मंदिर से बाहर निकल आई. भीतर की तरह बाहर भी वैसा ही अंधेरा था. वह अपने पति के पास आ गई. वह सो रहा था. रंपो भी उस के बगल में जा कर लेट गई. उस का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. उसे बारबार अपने किए पर पछतावा हो रहा था. पर फिर सोचा कि कल की सुबह नई रोशनी ले कर आएगी. सालों से बीमार पड़ा उस का पति ठीक हो जाएगा.

रंपो तो अपने पति को यहां ठीक कराने लाई थी. उसे क्या पता था कि देवता भी उस की जाति वालों से फर्क करते हैं. उस की आंखों में एकएक कर वह नजारा साफसाफ घूम रहा था.

उस ने तो साधु के पैरों में पड़ कर मंदिर के देवता के दर्शन की भीख मांगी थी, लेकिन साधु मंदिर की सीढि़यों पर खड़ा हो कर उसे दुत्कारते हुए बोला था, ‘बेहूदा औरत, दूर हट. यह देवता का मंदिर है. सीढि़यां मत चढ़ जाना. तेरा पति बीमार है, तो ठीक हो जाएगा. ले, भभूत ले जा, पर देवता के दर्शन तू नहीं कर पाएगी. देवता तो ऊंची जाति वालों के हैं.’

रंपो और उस का पति दोनों गांव के लोगों के कपड़े धो कर गुजारा करते थे.

रंपो दोनों हाथ जोड़ते हुए बोली थी, ‘देवता तो सभी के हैं. वे किसी जाति से बंधे हुए नहीं होते. मेरे पति दर्द से मरे जा रहे हैं. दर्शन कर लेने दो. हो सकता है, देवता सुन लें. मेरे पति को इस दर्द से छुटकारा मिल जाए, तो मैं आप का एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी.’

रंपो का पति भी गुजारिश भरी नजरों से उस साधु की ओर देख रहा था, पर साधु का उस ओर कोई ध्यान नहीं था.

चमकते लंबे काले बाल, गले में रुद्राक्ष की माला, गेरुए रंग का चमकता कुरताधोती, साधु के चेहरे पर अपने बड़े होने का दंभ साफ रूप से नजर आ रहा था.

साधु रंपो से फिर बोला, ‘तू तो विधवा होगी ही, हम को भी खाएगी. तेरे पति की पीठ में कैंसर का फोड़ा है. वह बच नहीं सकता. क्यों मेरी जान के पीछे पड़ी है? मैं ने तुझे मंदिर में आने दिया, तो समाज मुझे नहीं छोड़ेगा.’

‘मुझ पर रहम करो बाबा. मुझे  देवता के दर्शन कर लेने दो. मुझे  पूरा भरोसा है कि देवता मेरी अर्जी जरूर सुन लेंगे,’ रंपो ने गुजारिश की.

रंपो की बातों से साधु का दिल पिघलता नजर आया. वह बोला, ‘अभी थोड़ी देर रुक जा. दिन डूबने को है. जब सब चले जाएं, तब तू दर्शन कर के जाना, तब तक बाहर बैठ.’

साधु के कहने से रंपो को हिम्मत बंध गई थी. वह अपने पति रामहेत का हाथ पकड़ कर मंदिर से दूर ले गई.

वह साधु को मन ही मन दुआ देने लगी. महंगे इलाज की इस दुनिया में इतना पैसा उस के पास कहां था कि डाक्टरों से औपरेशन करा सके. अब तक छोटेमोटे डाक्टरों से ही उस ने बहुत इलाज कराया था. रुपए लगातेलगाते वह कंगाल हो गई थी, पर कैंसर में कोई फर्क नहीं पड़ा था.

रंपो के बच्चे अभी छोटे थे. लड़का 10 साल का और दोनों लड़कियां 5 साल और 7 साल की थीं. अब वह माली रूप से बुरी तरह टूट चुकी थी. लोगों ने सलाह दी थी कि अगर देवता ने उस की सुन ली, तो वे रामहेत को ठीक कर सकते हैं. इन देवता ने इस से पहले कई लोगों की बीमारी ठीक की है.

रंपो भी यही चाहती थी कि देवता उस की सुन लें, इसीलिए वह यहां उन के दर्शन करने आई थी. मगर यहां उस की जाति आड़े आ गई. निचली जाति में पैदा होने की वजह से साधु उसे मंदिर में घुसने नहीं दे रहा था.

रंपो ने कपड़ों की गठरी में से एक मैली सी चादर निकाली और रामहेत के नीचे बिछा दी.

रामहेत बोला, ‘दर्द से मरा जा रहा हूं रंपो. अब सांस लेना भी दूभर हुआ जा रहा है. या तो आज रात देवता सुन लेंगे, नहीं तो कल सुबह का सूरज मुश्किल से देख पाऊंगा.’

दिन ढल चुका था. मंदिर से लोगों की भीड़ कम होती जा रही थी. धीरेधीरे आसमान में तारे दिखाई देने लग गए थे. चारों ओर सन्नाटा था. मंदिर के बगल वाले कमरे में वह साधु भी कुछ देर बाद सो चुका था.

रंपो से अब नहीं रुका गया. वह वहां से चुपचाप उठी और मंदिर की ओर चल दी. साधु खर्राटे भर रहा था. उस ने सोचा कि यह अच्छा समय है अंदर जाने का. वह बेधड़क मंदिर की सीढि़यां चढ़ गई. मंदिर का दरवाजा खुला था.

रंपो देवता को मन ही मन धन्यवाद देने लगी, ‘हे ऊपर वाले, आज तो ठीक वैसा ही दिन है मेरे लिए, जैसे कृष्ण के जन्म के समय वसुदेव और देवकी के लिए था. वसुदेव के गोकुल जाते समय अपनेआप दरवाजे खुल गए और पहरेदार सो गए थे. उसी तरह तुम ने अपने दर्शन के लिए साधु को गहरी नींद में सुला दिया.

‘तुम्हारे दर्शन पा कर अब तो मेरे पति जल्दी ही ठीक हो जाएंगे,’ यह सोचती हुई वह मंदिर में घुस गई.

मंदिर में घोर सन्नाटे के अलावा कुछ नहीं था. रंपो अंदाज से टटोलती हुई देवता के पास पहुंच गई. मन में डर था, पर उस ने जल्दी से अपने पति के अच्छे होने की प्रार्थना की. फिर धूनी से भभूत ली और सीढि़यों से नीचे उतर गई.

रामहेत अब भी दर्द से कराह रहा था. रंपो ने भभूत उस के फोड़े के चारों ओर डाली और बोली, ‘हे देवता, सारा दर्द तुरंत बंद कर दो. आप के नाम के बताशे बांटूंगी.’

‘तू मंदिर में कैसे घुस गई?’ रामहेत ने हैरानी से पूछा.

‘हां, देवता की हम पर कृपा है. साधु खर्राटे भर रहा है. मंदिर के दरवाजे खुले पड़े हैं,’ रंपो फुसफुसाई.

‘फिर तो चमत्कार हो गया.’

‘गरीबों की देवता सुन लेते हैं. उन्होंने खुद यह चमत्कार किया है. तुम आज ही अच्छे हो जाओगे.’

दोनों की देवता के प्रति अटूट श्रद्धा थी, पर बीमारी के लिए देवता भला क्या करता? कुछ देर तक तो दर्द कम रहा, पर फिर बढ़ गया.

रात काफी बीत चुकी थी. रामहेत से जब दर्द नहीं सहा गया, तो वह बोला, ‘तू एक बार और मंदिर से भभूत ले आ.’

‘वह साधु जाग गया तो…’ रंपो ने शक जाहिर किया. ‘वह नहीं जागेगा,’ रामहेत बोला.

रंपो को देवता पर विश्वास तो पक्का था, पर इस बार उस का दिल किसी अनजान डर से कांप रहा था. साधु के खर्राटे इस बार बंद हो गए थे.

रंपो फिर धीरेधीरे मंदिर की ओर गई. मंदिर की सीढ़ी चढ़ कर दरवाजे तक आई ही थी कि कड़क आवाज में किसी ने कहा, ‘कौन है वहां?’

रंपो ठिठक कर वहीं सिमट गई. वह थरथर कांप उठी. सीढि़यों से नीचे उतर कर वह बोली, ‘मैं हूं… रंपो.’

‘मंदिर में घुस रही है कमबख्त. तुझे  से मना कर दिया, फिर भी,’ साधु यह कहते हुए उस के पास पहुंच गया.

रंपो ने चालाकी से काम लिया. वह बोली, ‘नहीं महात्माजी, आप ने कह नहीं दिया था कि जब यहां कोई नहीं हो, तब आना, इसलिए आई थी. अब तो यहां कोई नहीं है. मुझ  पर कृपा करो. मेरे पति को ठीक कर दो.’

‘ठीक कर देंगे, मगर एक शर्त पर.’ ‘कौन सी शर्त?’ ‘थोड़ी देर के लिए अपनी देह मुझे  सौंप दे,’ साधु बेशर्मी से बोला और रंपो का हाथ कस कर पकड़ लिया.

रंपो सुन कर हैरान रह गई और बोली, ‘तुम महात्मा हो महाराज, ऐसी बातें करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती.’

रंपो ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, मगर वह नाकाम रही.

साधु बोला, ‘रंपो, अब तू बच नहीं पाएगी. अगर गांव वालों को पता चल गया कि तू मंदिर में आई थी, तो वे मारमार कर तेरी हालत खराब कर देंगे.’ रंपो ने आखिरकार साधु की बात मान ली थी.

रंपो यादों से बाहर निकल आई थी. रामहेत सो चुका था. रंपो को भी नींद आ गई. सुबह 4 बजे रंपो अचानक जागी, तो रामहेत जोरजोर से सांस ले रहा था.

‘‘क्या परेशानी है?’’ रंपो हड़बड़ा कर उठ बैठी. रामहेत घुटनों के बल बैठ गया और बोला, ‘‘लगता है, देवता ने हमारी सुन ली. मेरा जी निकल रहा है.’’

उस की बातें सुन कर रंपो ठगी सी रह गई.

रामहेत बोला, ‘‘रंपो, देवीदेवता सब बेकार की बातें हैं. तू देवता के दर्शन कर आई, पर कुछ हुआ तो नहीं. तू दर्शन नहीं कर पाती, तो तेरे भी मन में कसक रह जाती. अब मैं बच नहीं सकता.’’

रंपो ने उसे अपनी गोद में भर लिया. पर यह क्या, वह तो उस की गोद में ही जड़ हो चुका था.

Hindi Story :अब्बा मान गए

Hindi Story . ‘‘अब्बा, जिसे आप काफिर कह रहे हैं… 6-7 पीढ़ी झांक कर देखिए, हम सब भी तो उस काफिर की औलादें हैं,’’ शबनम अपनी बात रखती हुई अपने अब्बा हामिद शाह से बोली.

‘‘यह तुम क्या कह रही हो शबनम… हम काफिर कैसे हुए?’’

‘‘अरे अब्बा, हमारे पूर्वज कभी हिंदू थे. औरंगजेब ने तलवार के बल पर हम सब को मुसलिम बनाया. तब हमारे पूर्वज हिंदू हुए कि नहीं?’’ अपनी बात पर अड़ती हुई शबनम बोली, ‘‘आज भी कई मुसलिम अपनेआप को हिंदू का पूर्वज मानते हैं. इंडोनेशिया देश के लोग तो श्रीराम को पूर्वज मानते हैं.’’

‘‘बसबस, बहुत हो गया शबनम. काफिर तो काफिर होते हैं.’’

‘‘अब्बा, आप के ऊपर तो अंधविश्वास का परदा पड़ा हुआ है. मुल्लाओं की तरह आप भी कट्टरवादी सोच से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं,’’ एक  बार फिर शबनम अपने अब्बा पर हमला करती हुई बोली.

‘‘बहुत ले लिया तुम ने काफिरों का पक्ष…’’ अब्बा हामिद शाह नाराज हो कर बोले, ‘‘अब मैं तेरी एक भी नहीं सुनना चाहता. मैं मुसकान का निकाह वहीं करूंगा जहां मैं ने तय कर रखा है.’’

‘‘अब्बा सोचिए, मुसकान अब बच्ची नहीं है, उस ने पवन को पसंद किया है और पवन के घर वाले भी मुसकान को अपनी बहू बनाने के लिए तैयार हैं. फिर पवन सरकारी नौकरी वाला है. मुसकान वहां राज करेगी. यह बात आप क्यों नहीं सोचते हैं?’’

‘‘अरे, राज तो वह अब्दुल कबाड़ी के यहां भी करेगी. क्या कमी है वहां?’’

‘‘कमी की बात कर रहे हैं अब्बा, उन का बेटा आवारा और कम पढ़ालिखा है.’’

‘‘अरे, कम पढ़ीलिखा है तो क्या हुआ, कमा रहा है…’’ हामिद शाह बोले, ‘‘कान खोल कर सुन ले शबनम, मैं मुसकान की शादी उस काफिर से नहीं होने दूंगा. मैं अभी अब्दुल कबाड़ी से निकाह की तारीख तय कर के आता हूं,’’ कह कर हामिद शाह गुस्से से नाराज हो कर बाहर निकल गए.

शबनम सोचती रही, ‘अब्बा अपनी जिद के पक्के हैं. जब से अम्मी का इंतकाल हुआ है, तब से वे फैसले लेने में कठोर हो गए हैं. किसी की चलने नहीं देते हैं. वही करते हैं जो उन को कठमुल्ला कहें.’

न चाहते हुए भी शबनम का निकाह उस परिवार में कठमुल्ला के कहने पर हुआ था. उस परिवार को वह नहीं चाहती थी. मगर अब्बा ने उस की एक भी नहीं चलने दी. एक तो वह परिवार दकियानूसी, पिछड़ा हुआ है और जिस की सोच भी बहुत पिछड़ी हुई है. उस का शौहर जावेद भी तो पूरा अंधविश्वासी है. औरत को बुरके में कैद करने वाला. विरोध जताओ तो मारता है, पीटता है. उस की अम्मी उसे शह देती हैं.

कहीं निकलना हो तो बुरका पहन कर जाओ. आंखों के अलावा शरीर का कोई अंग नहीं दिखना चाहिए. पराए मर्द से बात भी नहीं करनी चाहिए. उस की सारी आजादी खत्म हो गई.

जब शबनम कई हिंदू औरतों को देखती तब सोचती, ‘ये कितनी आजादी से घूमती हैं. साड़ी माथे पर बिंदिया, मांग में सिंदूर, नाक में बाली, कानों में झुमके पहन कर रहती हैं.

शबनम यह भी सोचती थी, ‘इस से अच्छा होता है, कि मैं किसी हिंदू के शादी करती, तो आज मैं भी कितनी सुखी रहती. किसी तरह का बंधन नहीं रहता.’

यही सब सोच कर तो शबनम अपनी छोटी बहन मुसकान की शादी हिंदू लड़के पवन से करना चाहती है, ताकि उस की तरह वह कोई दुख नहीं उठाए.

मगर जब अब्बा से यह बात कही, तब पवन को काफिर कह कर नकार दिया. अब्बा ने मना किया सो किया, अब अब्दुल कबाड़ी के घर गए, निकाहकी तारीख तय करने.

तब मुसकान के लिए शबनम क्या करे? क्या चुपचाप मंदिर में जा कर उन दोनों की शादी करवा दे? मगर यह रास्ता तो हर कोई अपनाता है. वह चाहती है कि शादी इस तरह हो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. मगर यह कैसे मुमकिन होगा?

मुसलिम समाज में कौम की कट्टरता बहुत ज्यादा है. वे इस खोल से आसानी से बाहर नहीं निकल सकते हैं.

अब्दुल कबाड़ी का बेटा शाहनवाज आवारा, लोफर और कम पढ़ालिखा है. लोहालंगर का धंधा करता है. मुसकान भी वहां निकाह नहीं करना चाहती है.

‘‘मुसकान, अब्बा ने तो मना कर दिया…’’ शबनम बोली, ‘‘वे तेरा रिश्ता अब्दुल कबाड़ी के लड़के से करने के लिए निकाह की तारीख तय करने गए हैं.’’

‘‘अब क्या होगा दीदी, मैं तो पवन से शादी कर के हिंदू धर्म अपनाना चाहती हूं.’’

‘‘घबरा मत मुसकान मैं हूं न…’’ शबनम बोली, ‘‘तेरी शादी पवन से होगी. मुझे  दूसरा रास्ता ढूंढ़ने दे. हां, यह बता कि शादी के बाद पवन तुझे छोड़ेगा तो नहीं?’’

‘‘नहीं दीदी, वह मुझे कभी नहीं छोड़ेगा. उस का सारा परिवार मुझे चाहता है, मगर अब्बा…’’

‘‘अब्बा की चिंता छोड़…’’ बीच में ही बात काट कर शबनम बोली, ‘‘मैं अब्बा को ऐसी पटकनी दूंगी कि वे चारों खाने चित हो जाएंगे.’’

‘‘वह कैसे होगा दीदी?’’ हैरानी से मुसकान ने पूछा.

‘‘अगर तुझ  में हिम्मत है तो पवन के साथ कहीं भाग कर किसी मंदिर में शादी कर ले.’’

‘‘पर दीदी, भागने को तो मैं भाग जाऊंगी, पवन भी तैयार है. मगर मैं चाहती हूं कि कोई बीच का रास्ता निकले,’’ मुसकान ने यह सुझाव दे कर शबनम को सोचने पर मजबूर किया.

पलभर सोच कर शबनम बोली, ‘‘देख मुसकान, प्यार का सफर कांटों भरा है. फिर यह 2 कौमों का मामला है. कहीं कठमुल्ला सांप्रदायिक रंग न दे दें. हां, एक रास्ता हो सकता है.’’

‘‘कौन सा रास्ता दीदी?’’ मुसकान ने पूछा.

‘‘हमें अब्दुल कबाड़ी के दिमाग में यह बिठाना पड़ेगा कि तुम पवन से शादी कर रही हो. अगर अब्बा ने जबरदस्ती की तब तू पवन के साथ भाग जाएगी.’’

‘‘विचार तो अच्छा है दीदी, अब्दुल कबाड़ी से कौन बात करे… अब्बा तो वहीं फाइनल बात करने गए हैं,’’ अभी मुसकान यह बात कह रही थी कि अब्दुल कबाड़ी की दरवाजे से आवाज आई, ‘‘अरे हामिद भाई, कहां हो?’’

‘‘देखो दीदी, अब्दुल कबाड़ी खुद ही चले आए. दरवाजे से आवाज दे रहे हैं,’’ मुसकान ने जब यह कहा तब शबनम दरवाजे पर आ कर बोली, ‘‘अरे अब्दुल चाचा… हम अभी आप को ही याद कर रहे थे और आप हाजिर.’’

‘‘अरे, हामिद भाई कहां हैं? मैं उन से ही मिलने आया था.’’ ‘‘वे शायद आप के यहां गए हैं. आप को नहीं मिले?’’

‘‘नहीं, अच्छा तो मैं चलता हूं…’’ अब्दुल कबाड़ी बोले, ‘‘वे घर पर मेरा इंतजार कर रहे होंगे.’’

‘‘अब्बा को मैं अभी फोन कर के बुलाती हूं. मुझे आप से कुछ बात करनी है,’’ जब शबनम ने यह कहा, तब अब्दुल कबाड़ी बैठकखाने में आ कर बैठ गए. शबनम ने मुसकान को पानी लाने को कहा.

मुसकान तश्तरी में पानी का गिलास ले कर आई. पानी पी कर अब्दुल कबाड़ी बोले, हां बिटिया बोलो, मुझे  किसलिए याद किया?’’ अब्बा आप के यहां गए हैं. इस मुसकान को आप की बहू बनाने के लिए.’’

‘‘हां, यही बात कहने के लिए तो मैं आया हूं,’’ जब अब्दुल कबाड़ी ने यह बात कहीं तब कुछ पल के लिए शबनम सोचती रही, फिर बोली, ‘‘आप हमारे अब्बा के बराबर हैं. मगर यह मुसकान नहीं चाहती है कि आप की बहू बने.’’

‘‘क्यों नहीं चाहती है?’’ अब्दुल कबाड़ी ने पूछा. ‘‘दरअसल, यह किसी दूसरे से लड़के से शादी करना चाहती है,’’ शबनम ने जब यह कहा, तब अब्दुल कबाड़ी बोले, ‘‘कौन है वह लड़का? और जब यह दूसरे लड़के को चाहती है, तब तुम्हारे अब्बा ने मुझ से बात क्यों की?’’

‘‘दरअसल, अब्बा यह नहीं चाहते हैं कि यह उस लड़के से शादी करे.’’ ‘‘अब्बा की मना करने की कोई वजह होगी?’’ अब्दुल कबाड़ी ने पूछा.

‘‘यह पवन नाम के एक हिंदू लड़के से शादी करना चाहती है.’’ ‘‘अरे, हिंदू के साथ शादी करेगी? अपने अब्बा का नाम डुबाएगी. तुम्हारे अब्बा ने जोकुछ कहा है, सच कहा है…’’ इस बात का समर्थन करते हुए अब्दुल कबाड़ी बोले, ‘‘निकाह अपनी बिरादरी में होते हैं.’’

‘‘क्या आप ऐसे हालात में मुसकान को अपनी बहू बनाओगे?’’ शबनम ने यह कह कर गेंद अब्दुल कबाड़ी के पाले में डाल दी.

कुछ सोच कर अब्दुल कबाड़ी बोले, ‘‘मैं मुसकान को बहू बनाने के लिए आया था. यहां आ कर पता चला कि मुसकान किसी और को चाहती है. तब मैं मुसकान को बहू नहीं बनाऊंगा. मगर बेटी, यह हिंदू के साथ शादी क्यों कर रही है? क्या अपनी बिरादरी में लड़कों की कमी है?’’

‘‘कमी तो नहीं है चाचा…’’ शबनम बोली, ‘‘मगर हिंदू होना कोई गुनाह तो नहीं है.’’ ‘‘तुम गुनाह की बात कह रही हो, बहुत बड़ा गुनाह है,’’ अब्दुल कबाड़ी बोले.

‘‘क्या मुसलिमों की लड़कियां हिंदू लड़कों से शादी नहीं कर रही हैं?’’ शबनम ने पूछा.

‘‘हां, कर रही हैं और वे हिंदू धर्म अपना रही हैं,’’ अब्दुल कबाड़ी ने जब यह बात कही, तब शबनम ने कहा, ‘‘यही बात तो अब्बा को समझ  में नहीं आ रही है…’’ अभी शबनम यह बात कह रही थी कि अब्बा हामिद शाह आ कर बोले, ‘‘अरे अब्दुल भाई, मैं आप के घर गया था. पता चला कि आप मेरे यहां आए हैं.’’

‘‘हां, हामिद भाई…’’ अब्दुल कबाड़ी ने जब यह कहा, तब पलभर रुक कर फिर बोले.

‘‘आप किसलिए गए थे?’’ ‘‘मैं इसलिए गया था अब्दुल भाई कि आप मेरी मुसकान को अपनी बहू बना लें.’’

‘‘बहू बनाने के लिए ही मैं आप के घर आया था, मगर अब…’’ ‘‘अब क्या?’’ अब्दुल कबाड़ी को रुकते देख हामिद शाह बोले.

‘‘मगर मैं अब मुसकान को अपनी बहू नहीं बना सकूंगा.’’ ‘‘क्या खोट है मेरी मुसकान में? पढ़ीलिखी है, सब काम में होशियार है.’’

‘‘मगर मुसकान मेरी बहू नहीं बनना चाहती है…’’ अब्दुल कबाड़ी बोले, ‘‘यह किसी और को चाहती है. और हामिद भाई जिस को मुसकान चाहती है, उसी के साथ इस की शादी कर दो. इसी में इस की और आप की भलाई है, इसलिए इसे मैं ने बहू बनाने से इनकार किया.’’

‘‘मगर मुसकान तो हिंदू के साथ शादी करना चाहती है,’’ हामिद ने कहा.

‘‘क्या हुआ हामिद भाई, क्या हिंदू इनसान नहीं होते हैं? मैं तो कहता हूं कि मुसलिमों से ज्यादा समझदार हिंदू होते हैं. यह तो राजनीति वालों ने अपने वोटों के खातिर भेदभाव कर रखा है वरना हिंदू कई माने में हम से आगे हैं.

‘‘मैं तो कहता हूं, अपनी बिटिया की शादी उस हिंदू से कर दो, जिसे वह चाहती है…’’ अब्दुल कबाड़ी ने अपनी बात कह दी, आगे फिर समझाते हुए बोले, ‘‘अगर आप ने अपनी बिटिया के खिलाफ जा कर जबरदस्ती इस की शादी कराई तो यत ह भी सुखी नहीं रहेगी और न ही अपनी ससुराल वालों को सुखी रहने देगी, इसलिए मैं तो कहता हूं कि अगर वह हिंदू लड़का किसी अच्छे खानदान का है, तो उस से शादी कर देनी चाहिए. वहां मुसकान ज्यादा सुखी रहेगी. मेरी भांजी ने 7 साल पहले एक हिंदू लड़के से शादी की थी, आज वह वहां बहुत सुखी है. क्या सोच रहे हो?’’

‘‘सोच रहा हूं कि आप जैसे लोग क्यों हिंदू की पैरवी कर रहे हो?’’ ‘‘इसे पैरवी करना नहीं कहते हैं. हामिद भाई, बिटिया जहां सुखी रहे, वहां शादी करनी चाहिए. आखिर उस की जिंदगी का सवाल है.’’

‘‘अरे अब्दुल भाई, आप को तो किसी हिंदू के घर में पैदा होना चाहिए था.’’

‘‘आप यह क्यों भूल रहे हो हामिद भाई कि 5-6 पीढ़ी के पहले हम सब हिंदू के वंशज ही तो है,’’ समझाते हुए अब्दुल कबाड़ी बोले.

‘‘चाचा, यही बात तो मैं अब्बा को समझा रही थी. आप ने तो मेरे मुंह की बात कह दी,’’ शबनम बोली.

‘‘अरे बिटिया, तुम्हारे अब्बा ने मजहब का चश्मा पहन रखा है, इसलिए इन को इस के अलावा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है…’’ समझाते हुए अब्दुल कबाड़ी बोले, ‘‘अब सोचो मत हामिद भाई. फिर भी आप अपनी बिटिया की शादी, अपनी ही कौम में करना चाहते है तो करिए. मुझे कोई एतराज नहीं. मगर मैं मुसकान की इच्छा के खिलाफ उसे अपनी बहू नहीं बनाऊंगा,’’ कह कर अब्दुल कबाड़ी उठ कर चले गए.

हामिद शाह कोईर् भी जवाब नहीं दे पाए. उन्हें आगे का रास्ता नहीं सूझा रहा था क्या करें? क्या अब नए सिरे से दूल्हे की खोज करनी पड़ेगी?

‘‘क्या सोच रहे हो अब्बा?’’ शबनम ने पूछा, ‘‘अब मत सोचो. अब्दुल चाचा जैसे कट्टरपंथी ने भी वही बात कही, जो मैं ने कही थी.’’

‘‘मगर बेटी, समाज में हमारी कितनी किरकिरी होगी,’’ समझाते हुए हामिद शाह बोले.

‘‘समाज के डर से क्या हम मुसकान का ऐसे परिवार में निकाह कर दें, जैसा आप ने मेरा किया?’’

आगे समझा ती हुई शबनम बोली,’’ अब्बा, मुसकान की शादी अगर हम पवन से कर देंगे, तो वहां वह खुश रहेगी. यह समाज तो थोड़े दिन तक ताने कसेगा, फिर चुप हो जाएगा. समाज के डर से हम मुसकान को नरक में तो नहीं धकेल सकते.’’

‘‘ठीक है बेटी, तुम इतना ही पक्ष ले रही हो, तब मुझे भी यह शादी मंजूर है…’’  आखिरकार हामिद शाह बोले, ‘‘मैं पवन को अपना दामाद स्वीकार करता हूं. चल बेटी, उस के घर चलते हैं. उस के पिता से रिश्ता मांगते हैं. मैं तैयार हो कर आता हूं,’’ कह कर हामिद शाह तैयार होने भीतर चले गए.

शबनम को जितनी खुशी अब्बा की रजामंदी को ले कर थी, उतनी खुशी उसे अपने मिशन को ले कर भी थी. Hindi Story

Hindi Love Crime Story : फांस

Hindi Love Crime Story. ‘‘अरे, मुझे  दुकान जाने में देर हो रही है. खाना तैयार हुआ कि नहीं?’’ रमेश की बात का कोई जवाब उन की पत्नी लीला दे पातीं, इस से पहले ही फोन जोर से घनघनाया. फोन पर बात करती लीला को बीच में टोकने के लिए जैसे ही रमेश उन के पास पहुंचे, तो उन के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को देख कर चुप हो गए. लीला के चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी.

फोन रख माथे पर आई पसीने की बूंदों को अपने पल्लू से पोंछते हुए लीला बोलीं, ‘‘सुनते हो, गजब हो गया. बड़ी भाभी का फोन था. वे कह रही थीं कि हमारी बेटी किसी यादव के लड़के के साथ घूम रही है. वह जो गांव के बाहर पुराना शिव मंदिर है न, उस के पंडित ने उन्हें कई बार साथ देखा है.’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो लीला? ऐसा कैसे हो सकता है? हमारी बेटी ऐसा कैसे कर सकती है?’’ रमेश को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था.

‘‘भला, बड़ी भाभी झठ क्यों बोलेंगी? उन की हम से कोई दुश्मनी थोड़े ही है,’’ लीला का सब्र जवाब दे रहा था.

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‘‘तुम्हारी लाड़ली है कहां… बुलाओ उसे. अभी सब साफ हो जाएगा. हमारे संस्कारों की इस तरह कैसे वह धज्जियां उड़ा सकती है,’’ रमेश किसी चोट खाए सांप की तरह फुफकार रहे थे.

‘‘वह क्या घर में है, जो उसे बुलाऊं. कब की कालेज जा चुकी है. कह रही थी कि आजकल किसी समारोह की तैयारी चल रही है, इसलिए रोज सुबह जल्दी जा रही है और रात को भी देर से आती है.’’

लीला की यह बात सुन कर रमेश और भड़क उठे, ‘‘यानी कालेज जाने के नाम पर गुलछर्रे उड़ा रही है. बात और फैले, उस से पहले ही उस का घर से निकलना बंद कर दो. मैं जल्दी ही कोई अपनी बिरादरी का लड़का देख कर उस की शादी तय कर देता हूं.’’

अपने कागज संभालते हुए रमेश बिना खाना लिए ही दुकान के लिए निकल गए. बेटा अभी तैयार हो रहा था. रोज की तरह उस के लिए भी नहीं ठहरे.

लीला काफी देर तक अपना सिर पकड़े यों ही बैठी रहीं.

‘‘क्या बात है अम्मां, ऐसे क्यों बैठी हो?’’ महेश ने पूछा. उस के पीछे बहू भी खाने का डब्बा थामे खड़ी थी.

‘‘अम्मां, बाऊजी आज इन के लिए ठहरे नहीं? क्या कहीं और जाना था उन्हें?’’ बहू ने पूछा, तो लीला की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली.

‘‘अब क्या बताऊं तुम दोनों को. आभा ने हमारे मुंह पर कालिख पोत दी है. वह किसी जोगिंदर नाम के यादव के लड़के से मिलतीजुलती है. तुम्हारी ताई का फोन आया था. वे बता रही थीं कि पुराने शिव मंदिर का पंडित यह बात सब से कहता फिर रहा है और उस ने तो पंचायत बुलाने की भी धमकी दी है?’’

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यह सुनते ही महेश एकदम भड़क उठा, ‘‘काट दूंगा उस यादव के बच्चे को. मेरी बहिन की ओर आंख उठा कर देखने की उस की हिम्मत भी कैसे हुई. लगता है, वह अपनी औकात भूल गया है. तुम तो बस आभा को समझाओ. वह अभी नादान है, जरूर यादव के लड़के ने उसे बरगलाया होगा.’’

महेश तो बौखलाता हुआ दुकान के लिए निकल गया, पर घर में तो जैसे मातम छा गया था. इस बीच बड़ी भाभी का फोन फिर आया था. वे बता रही थीं कि उन के पड़ोस में रहने वाली श्यामा काकी को पंडित मिला था और कह रहा था कि आभा और जोगिंदर तो घर से भाग कर शादी करने का प्रोग्राम बना रहे हैं.

यह सुन कर लीला और परेशान हो गई थीं.

शाम को जब आभा घर लौटी, तो घर के माहौल में हुए बदलाव को उस ने साफ महसूस किया.

‘‘आ गई गुलछर्रे उड़ा कर. अपने मांबाप की इज्जत दांव पर लगाते तुझे  शर्म नहीं आई. क्या इसी दिन के लिए तुझे  पालपोस कर बड़ा किया था,’’ लीला आभा के सामने तन कर खड़ी हो गई थीं.

‘‘अब आप को पता लग ही गया है, तो अच्छा ही है. वैसे भी कुछ दिनों बाद मैं आप को बताने वाली थी. जोगिंदर अच्छा लड़का है, पढ़ालिखा है, अच्छा कमाता है. हमारी बिरादरी वालों की तरह आप को दहेज भी नहीं जुटाना पड़ेगा. उसे कुछ नहीं चाहिए.

‘‘वैसे भी शहर में उस की नौकरी लग गई है, हम शादी कर के वहीं चले जाएंगे. इस में आप की नाक कैसे कट गई?’’ आभा का बेबाक जवाब सुन कर सासबहू के सीने पर सांप लोटने लगे.

‘‘और अम्मां, साफ सुन लो, हम कोई गुलछर्रे उड़ाने कहीं नहीं जाते हैं. किस ने कह दिया तुम्हें कि हम गांव के बाहर कहीं जाते हैं. हम दोनों एकदूसरे को चाहते हैं, यह सच है,्र पर अभी मेरा सारा ध्यान पढ़ाई पर है.’’

‘‘बस बहुत हो गई तेरी पढ़ाई. आज से तेरा घर से निकलना बंद. तेरे बाऊजी का हुक्म है यह. और सुन ले, जल्दी ही अपनी बिरादरी के लड़के से हम तेरी शादी कर देंगे. उस जोगिंदर की बात भी मन से निकाल दे. तुम दोनों की शादी नहीं हो सकती,’’ लीला की आवाज में इस बार थोड़ी नरमी थी. वे चाहती थीं कि बात बिना बिगड़े सुलझ जाए. आभा ने खुद को कमरे में बंद कर लिया.

आभा का घर से निकलना बंद हो गया था. रमेश और महेश लगातार जोगिंदर को धमका रहे थे कि वह गांव छोड़ कर चला जाए.

बड़ी भाभी जब लीला से मिलने आईं, तो उन्होंने कहा कि पंडित ने उन्हें आभा के लिए अपनी बिरादरी का एक लड़का सुझाया है. ज्यादा पढ़ालिखा तो नहीं है, लेकिन बात फैले, उस से पहले उसी से आभा को बांध देना ठीक रहेगा.

अपनी बेटी को यों ही किसी के साथ ब्याह देने की बात हालांकि लीला को पसंद नहीं आई, पर जेठानी के सामने वे चुप ही रहीं.

आभा ने जिद पकड़ ली थी कि वह अगर शादी करेगी तो सिर्फ जोगिंदर से, वरना अपनी जान दे देगी.

जोगिंदर पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा था और उस के परिवार वाले भी उसे समझा रहे थे कि वह यह बेवकूफी न करे, पर दोनों मानने को तैयार नहीं थे.

समाज की खोखली परंपराओं और धर्म के नाम पर फैलाए जाने वाले जातिवाद के दोनों ही पक्ष में नहीं थे.

2 दिन बाद एक खेत में दोनों की लाशें मिलीं. सब कह रहे थे कि उन्होंने आत्महत्या कर ली, पर आसपास कहीं सुसाइड नोट नहीं मिला था.

आभा के सिर पर गोली लगी थी और जोगिंदर की कनपटी पर. खबर सुनते ही बड़ी भाभी दौड़ी चली आईं.

‘‘लीला, वह पंडित कह रहा था कि जोगिंदर ने पहले आभा को गोली मारी और फिर अपनी जान ले ली. वे दोनों शायद भागने की तैयारी कर रहे थे, पर किसी ने उन्हें देख लिया था.’’

अपनी बेटी की मौत की खबर से दुखी लीला को समझ  नहीं आ रहा था कि वे अपने दुख में रोएं या घर की इज्जत बच जाने पर राहत की सांस लें. क्या हो जाता, अगर जोगिंदर से आभा की शादी की सब मंजूरी दे देते. वे जोरजोर से रोने लगीं.

लीला इस बात को कैसे किसी को बतातीं कि जिसे लोग आत्महत्या समझ रहे हैं, वह हकीकत में हत्या है. समाज में अपनी इज्जत बचाने और यह साबित करने के लिए हत्या की गई कि धर्म के साथ खिलवाड़ कभी नहीं हो सकता.

तभी बगल वाली रमा चाची उन के कंधे थपथपाते हुए बोलीं, ‘‘दुख न कर लीला, कल ही मैं ने एक चैनल पर सुना था कि बाबा अमृतानंदजी प्रवचन देते हुए कह रहे थे कि मृत्यु का क्या शोक मनाना. जो आया है, वह जाएगा भी.’’

लीला को लगा कि उन के भीतर की फांस की चुभन बढ़ती ही जा रही है.  Hindi Love Crime Story

Hindi Story: दांव

Hindi Story: औफिस के नए मैनेजर मिस्टर आलोक बहुत ज्यादा हैंडसम थे, पर उन की पत्नी रीता एकदम साधरण सी औरत. लोगों को लगा कि मिस्टर आलोक ने दहेज के चक्कर में रीता मैडम से शादी की है, पर मामला एकदम उलट था. क्या था इस बेमेल शादी का राज?

कं पनी के नए मैनेजर के आने की खबर सुन कर सभी मुलाजिम अपनेअपने काम में जुट गए थे. असिस्टैंट मैनेजर नितिन की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा बढ़ गई थी. उन के ऊपर दोहरा दबाव था, एक घर का और दूसरा औफिस का. मैनेजर और असिस्टैंट मैनेजर दोनों के सरकारी मकान अगलबगल थे. इसी वजह से पारिवारिक संबंधों को निभाने की जिम्मेदारी भी नितिन पर पड़ी थी. पुराने मैनेजर मिस्टर कपिल से नितिन के परिवार जैसे संबंध थे. उन के जाने के बाद से नितिन का पड़ोस एकदम सूना हो गया था. अब महीनेभर बाद कल मिस्टर आलोक यह जिम्मेदारी संभालने वाले थे.


मिस्टर आलोक फिलहाल अकेले रहे थे. उन की पत्नी रीता के साथ आने के चलते नितिन का तनाव थोड़ा कम हो गया था. नितिन ने मिस्टर आलोक के आने से पहले ही घर और औफिस दोनों जगह का इंतजाम ठीक करवा दिया था. औपचारिक मुलाकात के लिए शाम की चाय पर उन्हें घर बुलाने की बात भी अपनी पत्नी रेखा से कह दी थी. मिस्टर आलोक दोपहर में घर पहुंच गए. औफिस वालों ने उन के घर को ठीक तरह से सजासंवार दिया था. मिस्टर आलोक इस समय बहुत कम सामान साथ ले कर आए थे. उन्होंने मातादीन के अलावा वहां पर तैनात दूसरे मुलाजिमों को वापस भेज दिया था.


औफिस से कर नितिन को मिस्टर आलोक को घर पर मुलाकात कर उन्हें चाय पर आने का न्योता भी देना था. नितिन ठीक 5 बजे घर पहुंचे. मिस्टर आलोक ने उन्हें आते हुए देख लिया. जरा देर में वे खुद ही नितिन के घर पहुंच गए. उन्होंने डोर बैल बजाई. रेखा ने दरवाजा खोला. उस के कुछ पूछने से पहले ही मिस्टर आलोक ने अपना परिचय भी दे दिया. तभी नितिन की आवाज सुनाई दी, ‘‘कौन है रेखा?’’
रेखा के मुंह से अभी आवाज तक नहीं निकल रही थी. इतनी देर में नितिन वहां गए और बोले, ‘‘सर, आप…’’
‘‘शुक्र है, तुम मु? देख कर
चौंके नहीं.’’
‘‘मैं आप से मिलने आने वाला ही
था सर.’’
‘‘उस से पहले मैं ही चला आया. कायदे से नए पड़ोसी को पुराने
पड़ोसी के घर जाना चाहिए. तुम औपचारिकता निभाने के लिए ही मेरे घर आने वाले थे.’’
‘‘नहीं सर, यह बात नहीं है. आप मेरे बौस हैं. मेरा फर्ज बनता है कि मैं पहले घर पर आप से मिलूं और आप को अपने घर आने का न्योता दूं.’’
‘‘मैं औफिस में तुम्हारा बौस हूं.
घर में हम सिर्फ पड़ोसी हैं,’’ मिस्टर आलोक बोले.
रेखा को मिस्टर आलोक का खुलापन बड़ा भला लग रहा था. लंबेचौड़े, स्मार्ट
और सुडौल देह के स्वामी मिस्टर आलोक बहुत दिख रहे थे. उन का गोरा रंग उन के कालेसफेद खिचड़ी बालों के साथ बहुत मेल खा रहा था.
‘‘बैठिए सर,’’ नितिन ने कहा.
तभी रेखा ने शांताबाई के हाथ पानी भिजवा दिया और खुद भी कर औपचारिकतावश हाथ जोड़ दिए.
‘‘यह मेरी पत्नी रेखा है और ये हमारे कंपनी के नए मैनेजर मिस्टर आलोक हैं,’’ नितिन ने उन दोनों का परिचय भी कराया.


फिर वे दोनों आपस में बातें करने लगे. रेखा किचन की तरह बढ़ गई.
‘‘आप के साथ परिवार के बाकी सदस्य आते तो बहुत अच्छा लगता सर.’’
‘‘मेरी पत्नी रीता, बेटी रोशनी और बेटा राहुल भी जल्दी जाएंगे. अभी जरा वे काम में बिजी थे. वैसे, आप के बच्चे दिखाई नहीं दे रहे…’’ मिस्टर आलोक ने पूछा.
‘‘खेलने गए हैं. वे अभी छोटे हैं सर,’’ नितिन बोले.
कुछ ही देर में शांताबाई चायनाश्ते के साथ हाजिर हो गई.
‘‘इस सब की क्या जरूरत थी? सिर्फ चाय ही काफी थी,’’ मिस्टर आलोक बोले.
तीनों साथ बैठ कर चाय पीने लगे. कुछ देर बाद मिस्टर आलोक ने उन से विदा ली.
‘‘सर स्वभाव से बहुत सरल हैं. उन में बौस जैसी अकड़ नहीं है,’’ मिस्टर आलोक के जाने के बाद नितिन बोले.
अगले दिन मिस्टर आलोक ने औफिस जौइन किया था. उन के स्वभाव से सभी खुश थे. वे बहुत जल्दी सब के साथ घुलमिल गए. अकसर वे शाम को नितिन के पास जाते और खेल से ले कर राजनीति तक की चर्चा करते.
‘‘आप का परिवार कब रहा है?’’ एक दिन नितिन ने पूछा.
‘‘हफ्तेभर के अंदर जाएंगे वे लोग,’’ मिस्टर आलोक बोले.
‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है.’’
तकरीबन एक महीने बाद रीता मैडम के बच्चों के साथ आने की तारीख तय हो गई थी और मिस्टर आलोक ने इस की खबर नितिन को दे दी थी. उन के निर्देश पर मैडम के वैलकम की तैयारी होने लगी. रेखा भी उन के मकान का इंतजाम देख रही थी.
आखिर वह दिन गया और रीता मैम अपने जवान बच्चों के साथ गईं. औफिस के सब लोग सपरिवार मैडम के स्वागत के लिए आए हुए थे.
उम्मीद के उलट रीता मैम को देख कर औफिस के सभी लोग हैरान रह गए और उन की कल्पना एक ?ाटके में बिखर गई.
कंप्यूटर औपरेटर मिनी बोली, ‘‘कहां सर और कहां रीता मैडमदोनों में जमीनआसमान का अंतर है.’’
‘‘ऐसी जोड़ी की तो मैं सपने में
भी कल्पना नहीं कर सकती थी,’’ रिया ने कहा.
रीता मैडम को देख कर सब खुसुरफुसुर कर रहे थे, लेकिन ऊपर से चेहरे पर मुसकान ओढ़े हुए थे.
रेखा ने रीता मैडम को बुके थमा कर कहा, ‘‘वैलकम मैडम.’’
रीता ने एक गहरी नजर रेखा पर डाली लेकिन बोली कुछ नहीं. वह चारों तरफ नजर घुमा कर सब को देख रही थी. उसे पूरा विश्वास था कि इस समय सब उसे देख कर क्या महसूस कर रहे हैं, लेकिन उसे इस बात की कोई चिंता नहीं थी. वजह, वह ऐसी ही प्रतिक्रिया पहले भी कई वैलकम पार्टी में देख चुकी थी. उसे अपने बारे में कोई गलतफहमी
नहीं थी.
रीता मोटी, नाटी और सांवली थी. कहीं से भी उन दोनों का कोई मेल नहीं था. उसे बात करने का सलीका था और ही उठनेबैठने और खानेपीने का. वह एक साधारण औरत की तरह सब
से पेश रही थी, जो मिस्टर आलोक के ओहदे से कहीं भी मेल नहीं खा रहा था. उस से मिल कर सभी को निराशा हुई थी.
जब रीता किसी समारोह में जाती, तो बातें पहले धीमी होतीं, फिर उस के कानों तक पहुंच ही जातीं.
‘‘देखो, वही है…’’
‘‘हां, वही सर की पत्नी
‘‘सम? नहीं आता, सर ने इस में क्या देखा…’’
एक बार किसी औरत ने सीधे पूछ ही लिया, ‘‘रीताजी, आप पहले क्या करती थीं?’’
रीता ने बिना किसी ?ि?ाक के कहा, ‘‘जीना…’’
पूछने वाली औरत थोड़ी असहज हो गई, ‘‘मतलब कोई काम?’’
‘‘काम तो अब भी करती हूं.’’
‘‘कौन सा?’’
‘‘अपने बच्चों का भविष्य संवारने का…’’ रीता ने जवाब दिया.
लोग अकसर रीता मैडम को तौलते थे. तराजू में रखते थे एक पल में.
‘‘ पढ़ीलिखी, सलीकेदार, ही खूबसूरत…’’
रीता को यह अजीब नहीं लगता था. वह जानती थी कि समाज कीमत दिखने वाली चीजों से लगाता है. जिस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि लोग उस की मौजूदगी से असहज हैं, उसी दिन उस ने तय कर लिया था कि वह खुद को हलका साबित नहीं करेगी.
एक सामाजिक कार्यक्रम में किसी सज्जन ने आलोक से हंसते हुए कहा, ‘‘आप की पत्नी बड़ी अलग हैं.’’
आलोक कुछ कहने ही वाले थे,
तभी रीता ने खुद जवाब दे दिया, ‘‘हां, क्योंकि मैं सही समय पर जीना सीख
गई थी.’’
वहां सन्नाटा छा गया. समाज को यही खलता था कि रीता शर्मिंदा नहीं थी. अगर वह सिर ?ाका लेती तो शायदबेचारीकहलाती. अगर रोती तोदयामिल जाती. पर वह रोती थी, ?ाकती थी. वह जानती थी कि समाज के लिए उस की कीमत सिर्फ इतनी थी कि वह किस की पत्नी है, उस से ज्यादा नहीं और कम भी नहीं. उसे यह भी पता था अगर वह खूबसूरत होती तो यही समाज उसेभाग्यशालीसे ज्यादा कुछ कहता.
रीता ने कभी सफाई नहीं दी, क्योंकि सफाई वही देता है जो अपराधी हो. रीता ने सिर्फ एक बात पकड़े रखी,
उस की जगह. आज भी जब लोग उसे देखते हैं, तो सोचते हैं कि यह यहां तक कैसे पहुंची?
समाज की नजर में रीता की कीमत कभी ऊंची नहीं रही, पर उसे अब यह फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि जिस औरत ने अपनी कीमत खुद चुकाई हो, उसे समाज के लेबल की जरूरत नहीं होती.
रेखा सोच रही थी कि एक मैनेजर की पत्नी में जिन गुणों की उम्मीद की जाती है उन में से एक भी रीता में नहीं था. इस से पहले भी 2 मैनेजर उन के बगल के बंगले में रह कर जा चुके थे. उन की पत्नियां बड़ी सुघड़ और सलीकेदार थीं. वह सोचने पर मजबूर हो गई कि हो हो मिस्टर आलोक ने रुपयों की खातिर लालच में पड़ कर रीता मैम जैसी औरत से शादी की हामी भरी होगी.
आज दिनभर चर्चा का विषय रीता मैडम ही थीं.
‘‘मैडम तुम्हें बड़ी तिरछी नजर से देख रही थीं. तुम ने उन की तारीफ नहीं की रेखा.’’
‘‘किस बात की तारीफ करूं नितिन? उन में रूप है और ही कोई खास गुण दिखाई दे रहा था.’’
‘‘बारीकी से देखोगी तो तुम्हें उन में भी कोई खास गुण दिखाई दे जाएगा,’’ नितिन बोले, तो रेखा हंस दी.
मिनी और रिया तो अकसर आलोक सर को देखते ही मैडम की बातें ले कर बैठ जातीं. उन दोनों को बात करने के लिए एक अच्छाखासा टौपिक मिल
गया था.
‘‘तुम्हारा क्या खयाल है कि सर की लव मैरिज है या अरेंज?’’
‘‘जरूर दहेज के लिए घर वालों की मरजी से शादी की होगी, वरना…’’
‘‘यह भी हो सकता है रिया कि उन में कोई ऐसा गुण हो जिस पर सर मोहित हो गए हों. कहते हैं प्यार अंधा होता है.’’
‘‘मु? तो उस की उम्मीद नहीं है,’’ इतना कह कर दिया फाइल ले कर सर के केबिन में चली गई.
रीता से मुलाकात करने के बाद औफिस में अभी उसे ले कर बातों का बाजार गरम था. उसे अपने बारे में
किसी भी तरह का कोई शिकवा नहीं होता था. वह जैसी थी उस से कोई शिकायत नहीं थी और अपनी उपलब्धि पर खुश भी थी.
रीता को लोगों पर हंसी आती जो हरेक का बाहरी रूप देख कर बिना जाने जज करना शुरू कर देते थे. वह जानती थी कि मर्दों को खूबसूरती लुभाती है लेकिन वक्त पड़ने पर इस से उन का कोई लेनादेना नहीं होता. वे तो बस औरत की देह के मोह जाल में फंस
जाते हैं.
मिस्टर आलोक की पसंद हर मामले में अच्छी मानी जाती थी. कारोबार हो या रिश्ते लोग उन की सम? की मिसाल देते थे, लेकिन रीता को ले कर उन से चूक हो गई थी. सब उसे भाग्यशाली कहते, पर रीता भाग्यवादी नहीं थी. उस का मानना था कि भाग्य अपनेआप नहीं बनता, उसे बनाना पड़ता है और उसे बनाने में बहुतकुछ दांव पर भी लगाना पड़ता है.
अपने भविष्य के लिए रीता ने भी बड़ा दांव खेला था और वह दांव उस के हिसाब से सीधा पड़ा था.
लोगों ने रीता को देख कर अपनीअपनी राय बना ली थी. किसी को यकीन था कि वह किसी बड़े बिजनैसमैन परिवार से होगी, तो कोई कहता कि मिस्टर आलोक ने दहेज के लालच में शादी की है.
कोई नहीं जानता था कि यह शादी अरेंज नहीं थी. यह माना जाता है कि प्यार तन से ज्यादा मन की खूबसूरती देखता है. यह आम सोच थी, पर रीता की सोच इस से मेल नहीं खाती थी
उस का अनुभव कुछ और कहता था. वह खुद से कहती, ‘‘एक मर्द पहले तन देखता है, मन और उस की खूबसूरती के बारे में बाद में सोचता है.’’
शायद यही वजह थी कि जब एक साधारण सी औरत ने तन के बल पर सबकुछ हासिल कर लिया, तो उस के मन में यह विश्वास बैठ गया कि
एक खूबसूरत औरत के लिए इस
दुनिया में कुछ भी पाना नामुमकिन
नहीं है.
?ांपड़े में रहते हुए रीता ने बहुतकुछ देखा था. मर्दों की निगाह, उन की कमजोरी, उन का डर. उसे जल्दी सम? गया था कि गरीबी और देह दोनों का सौदा चलता है, फर्क सिर्फ कीमत का होता है. उस ने आलोक को चुना थाइसलिए नहीं कि वह सब से अच्छा आदमी था, बल्कि इसलिए कि वह
सब से असुरक्षित अमीर आदमी था.
रीता एक बहुत गरीब परिवार से थी. उस के पिताजी एक फैक्टरी में मजदूरी करते थे. अब वे नहीं रहे. आलोक खानदानी रईस थे और पढ़ाई करने के लिए परिवार से दूर दिल्ली आए थे. उन्होंने अपने लिए अलग घर ले रखा था. उस के ठीक सामने रीता का ?ांपड़ा था. उस की मां बरसों पहले गुजर गई थी.
4 भाईबहनों में रीता सब से बड़ी थी, जिन की परवरिश की खातिर उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. सब दिन में स्कूल चले जाते और रीता घर पर अकेली रहती. अब उन सब की शादी हो गई और उन के घर बस गए. सब अपने परिवार में खुश थे.
आलोक अकसर अपने घर से रीता के ?ांपड़े की ओर ?ांकते रहते. एक दिन वे रीता को देख कर मुसकराए. बदले में वह भी हंस दी. इशारा मिलते ही अगले दिन आलोक दोपहर में उस के घर गए और मुसकरा कर बोले, ‘‘मेरे घर पर काम करोगी?’’
रीता ने तुरंत हां कह दी. अब तो रोज आनेजाने और मिलने का सिलसिला शुरू हो गया.
एक दिन आलोक ने जैसे ही रीता का हाथ पकड़ा, तो वह सारी लाजशर्म छोड़ कर उन से लिपट गई. उस ने आलोक को कस कर पकड़ लिया.
आलोक आखिर मर्द ही तो थे. जरा सी देर में पिघल गए और उन के बीच की सारी दीवारें टूट गईं.
रीता जानती थी कि वह जो कर रही है उस में बहुत ज्यादा रिस्क है, लेकिन उस के सामने कोई दूसरा उपाय नहीं था. वह गरीबी से परेशान थी और आलोक एक अमीर परिवार के बेटे थे. अगर उस का दांव सीधा पड़ गया, तो जिंदगीभर का आराम था, पर वह गलत भी पड़ता तो उन जैसों पर उस का ज्यादा असर पड़ता.
आलोक पर रीता का नशा चढ़ चुका था. रोज ही वह काम के बहाने आलोक के घर आती और उन के सामने समर्पित हो जाती. 6 महीने तक सबकुछ ठीक चला और फिर एक दिन रीता ने तब जबरदस्त धमाका कर दिया, जब उस ने आलोक को बताया कि वह पेट से है, तो उन के पैरों की नीचे से जमीन खिसक गई.
आलोक एकदम से बोले, ‘‘यह क्या कह रही हो?’’
‘‘मैं सच कह रही हूं. जितनी जल्दी हो सके मु? से शादी कर लो.’’
‘‘शादी और तुम से…’’
‘‘क्या कमी है मु? में?’’
‘‘यह पूछो कि क्या है तुम में?’’
‘‘तो फिर क्यों रोज मेरे सामने गिड़गिड़ाते थे,’’ रीता चीखी तो आलोक नरम पड़ गए.
‘‘इस बच्चे से छुटकारा पा लो. जो मांगोगी मैं तुम्हें देने के लिए तैयार हूं.’’
‘‘यह नहीं हो सकता. बच्चा तो मेरे साथ ही मरेगा यह जान लो और मैं तुम सब को फंसा कर मरूंगी,’’ रीता ने कहा.
मजबूर हो कर आलोक को यह बात अपने घर वालों को बतानी पड़ी. वह किसी के दबाव के आगे नहीं ?ाकी. आलोक लाचार हो गए थे. घर वालों ने फैसला आलोक पर छोड़ दिया. इन्हें अपनाने के लिए वह कुछ भी करने के लिए तैयार थी, पर लाखों रुपयों के लालच में करोड़ का भविष्य छोड़ने को राजी थी.
मजबूर हो कर आलोक को रीता से शादी करनी पड़ी. घर वालों का दबाव अभी भी बना हुआ था. वे अभी भी हर कीमत पर रीता से छुटकारा पाना चाहते थे, पर वह कानून की दुहाई दे कर इन पर अपना दबाव बनाए हुए थी.
तनाव भरे माहौल में पहली बेटी रोशनी का जन्म हुआ. घर वाले अभी भी यही कह रहे थे कि इसे छोड़ दो, लेकिन आलोक जानते थे कि यह इतना आसान नहीं था.
शादी और बेटी के हो जाने पर भी वे नहीं पिघले. रीता भी हार मानने वालों में थी. परिवार और दुनिया दोनों ही जगह उस का जीना मुश्किल हो रहा था और वह सुनहरे भविष्य के खातिर आलोक को छोड़ने को राजी थी.
उस ने अपनी जिंदगी को ले कर बहुत बड़ा दांव खेला था.
रीता की जिद के चलते परिवार की इज्जत खराब हो रही थी. उसी की खातिर उन्होंने रीता को घर में जगह दे दी थी, पर दिल में नहीं. वह खुश थी कि उस की जद्दोजेहद कामयाब हो रही थी. जवान मर्द आखिर क्या करता?


कोई उपाय पा कर आलोक ने हार मान ली और उन दोनों के संबंध सामान्य होने लगे. फिर रीता की गोद में राहुल गया. बेटे के खातिर आलोक ने रीता को माफ कर दिया और इस तरह उसे मिस्टर आलोक के घर और जिंदगी में जगह मिल गई.


राहुल के जन्म के बाद आलोक बदले. पहली बार उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें डर नहीं लगता था?’’
‘‘हर दिन लगता था, पर डर के साथ भूख भी थी,’’ रीता ने कहा. आलोक कुछ नहीं बोले. आज लोग उसे देख कर कहते हैं कि सलीका है, सम?. रीता जानती है कि सलीका उस ने सीखा ही नहीं और सम? उस ने जरूरत से ज्यादा पाली है. वह कोई आदर्श औरत नहीं है और ही कहानी की हीरोइन. वह बस एक औरत है, जिस ने यह तय किया है कि वह हार कर नहीं जिएगी. उस का दांव गलत भी हो सकता था, पर उस ने दांव इसलिए नहीं खेला था कि वह सही साबित हो, उस ने इसलिए खेला था कि पीछे लौटने का रास्ता बंद हो जाए. और जब रास्ता बंद हो जाए तो आदमी चलना सीख ही जाता है.


यह सब किसी फिल्मी कहानी से कम था. क्याकुछ नहीं ?ोला था रीता ने अपनी जिंदगी में. भले ही घर वालों की नजर में इस का ज्यादा मोल था, पर रीता की आपबीती बयां कर रही थी कि आज जोकुछ भी उस के पास है, उस का रास्ता उस ने अपने तन से बनाया था. पति आलोक का खुला बरताव देख कर रीता अकसर सोचती, ‘इनसान का शरीर बूढ़ा होता है, पर मन नहीं. उस की खुशी के लिए वह रोजाना नए उपाय ढूंढ़ता रहता है.’ जिंदगी में रीता ने बड़ी जद्दोजेहद देखी थी. इसी ने उसे नए सिरे से सोचने का एक मौका दे दिया. उसे लगता कि दुनिया में बेकार कुछ भी नहीं है. सब की अपनी उपयोगिता है. बस, सही समय पर उस का इस्तेमाल करना आना चाहिए, लेकिन उस के साथ बहुत ज्यादा जोखिम भी जुड़ा होता है. हरेक के बस का यह ?ोलना नहीं होता, जिस ने जिंदगी में कभी भी बड़ा जोखिम नहीं उठाया था. उस के लिए यह रास्ता जायज नहीं ठहराया जा सकता था.          Hindi Story             

लेखक डा. के. रानी

पराठों के लिए मशहूर है मुरथल के ढाबों पर विदेशी कौलगर्लस का तड़का

जब आप दिल्ली से करनाल जाने वाले जीटी हाईवे पर जाएंगे तो सोनीपत के नजदीक मुरथल में हाईवे के किनारे जगमगाते व सजे हुए अनेक ढाबे दिखाई देंगे. रात में तो इन ढाबों की रौनक देखने लायक होती है.

इन ढाबों के परांठों का स्वाद भारत भर में मशहूर है. तभी तो रात में इन ढाबों की पार्किंग में सैकड़ों गाडि़यां खड़ी रहती हैं. दूरदूर से लोग मुरथल के परांठों का स्वाद लेने आते हैं. एक तरह से इन ढाबों की वजह से मुरथल की भारत भर में पहचान बनी हुई है.

इन्हें भले ही ढाबा कहते हैं लेकिन ये किसी आधुनिक होटल से कम नहीं हैं, लेकिन पैसे कमाने के लालच में कुछ लोगों ने ढाबों की परिभाषा ही बदल दी है. इन ढाबों पर ग्राहकों को मौजमस्ती कराने के लिए कालगर्ल भी बुलाई जाने लगी हैं. जिस से ग्राहकों के खाने के देशी और विदेशी देह का सुख भी मिल सके. अनैतिक देह व्यापार का धंधा भी खूब फलफूल रहा था.

7 जुलाई, 2021 की रात के तकरीबन 8 बजे का वक्त था, जब ढाबे रंगबिरंगी रोशनी से नहाए हुए थे. ढाबों के बाहर वाहनों की कतारें लगी थीं. तभी एक कार एक ढाबे के बाहर आ कर रुकी. उस में से 2 लोग उतरे. पहले उन्होंने अपनी खोजी नजरों से ढाबे का मुआयना किया और फिर आराम से टहलते हुए सीधे काउंटर पर पहुंचे.

काउंटर पर मौजूद मैनेजर ने एक नजर उन पर डालते हुए पूछा, ‘‘कहिए सर, क्या सेवा कर सकता हूं आप की?’’

‘‘हमें स्पैशल परांठे चाहिए.’’ उस ने कुरसियों की तरफ इशारा करते हुए कहा.

‘‘प्लीज आप बैठ कर मेन्यू देख कर और्डर कीजिए, अभी भिजवाता हूं.’’ मैनेजर बोला.

‘‘हमें खाने के नहीं, इस्तेमाल करने वाले परांठे चाहिए.’’ उन की बात सुन कर काउंटर पर बैठा व्यक्ति एक पल के लिए सकपका गया, लेकिन दूसरे ही पल उन दोनों को गहरी नजरों से देखते हुए पूछा, ‘‘मैं आप का मतलब नहीं समझा?’’

‘‘हम ने ऐसी तो कोई बात की नहीं, जो आप समझ न सको. आप के एक पुराने ग्राहक ने ही हमें यह जगह बताई थी, इस भरोसे पर आज मनोरंजन के इरादे से यहां चले आए.’’ आगंतुक ने राजदाराना अंदाज में कहा.

तभी मैनेजर मुसकराते हुए बोला, ‘‘ओह समझ गया, यह बात है तो आप को पहले बताना चाहिए था. दरअसल, बात यह है सर कि पुलिस का भी चक्कर रहता है, इसलिए अंजान लोगों के साथ संभल कर बात करनी पड़ती है हमें. वैसे आप को किस तरह का परांठा चाहिए?’’

‘‘हमें एकदम बढि़या चाहिए, जो दिल खुश हो जाए.’’ एक व्यक्ति बोला.

‘‘यह मैं ने इसलिए पूछा कि हमारे पास देशीविदेशी दोनों तरह के हैं. अब मरजी आप की है, आप जो भी पसंद करें. सर्विस में भी आप को कोई शिकायत नहीं मिलेगी.

‘‘हमारे कई रेग्युलर कस्टमर हैं, जो हमारी शानदार सर्विस से हमेशा खुश रहते हैं. ऐसा करता हूं, मैं आप को फोटो दिखा देता हूं, आप पसंद कर लीजिए.’’ कहने के साथ ही उस ने अपना मोबाइल उन के सामने कर दिया और एकएक कर के फोटो दिखाने लगा.

उस के पास कई सुंदर लड़कियों के अदाओं के साथ खिंचे फोटोग्राफ थे. इन में विदेशी लड़कियां भी शामिल थीं. वास्तव में वह परांठों की नहीं, बल्कि कालगर्ल के बारे में बात कर रहे थे.

‘‘विदेशी का इंतजाम कैसे करोगे?’’

‘‘सर, आप सिर्फ पसंद कीजिए, इंतजाम हमारे कमरों में पहले से है, फिलहाल कुछ लड़कियां आई हुई हैं.’’ उस ने कहा.

आगंतुक ने उन में से एक लड़की को पसंद किया और उस का रेट तय करने के बाद एक 500 का नोट उस की तरफ बढ़ाया, ‘‘ठीक है यह आप एडवांस रख लीजिए, हमारा एक दोस्त भी मस्ती के लिए आने वाला है.’’ कहने के साथ ही आगंतुक ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और किसी को काल कर के कहा, ‘‘दोस्त, जल्दी आ जाओ बढि़या इंतजाम हो गया है.’’

उस के फोन किए अभी 5 मिनट भी नहीं बीते थे कि तभी पुलिस की गाडि़यां वहां आ कर रुकीं. पुलिसकर्मी दनदनाते हुए उस ढाबे में आ गए और मैनेजर को हिरासत में लेने के बाद कमरों की तलाशी लेनी शुरू कर दी.

काउंटर पर बैठा व्यक्ति व अन्य लोग यह सब देख कर सकपका गए, जबकि 2 आगंतुक जो मैनेजर से बातचीत कर रहे थे, वे मंदमंद मुसकरा रहे थे.

वास्तव में वह कोई और नहीं, बल्कि पुलिस के नकली ग्राहक थे. सटीक जानकारी होने के बाद ही पुलिस ने रेड की काररवाई की थी. पुलिस जब कमरों में पहुंची तो हैरान रह गई. कमरों में कई लड़कियां मौजूद थीं, जो पुलिस को देख कर अपना मुंह छिपाने लगीं.

महिला पुलिसकर्मियों ने उन्हें कमरे में ही अपनी निगरानी में ले लिया. सभी लड़कियां हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगीं, ‘‘हमें छोड़ दीजिए प्लीज, वरना हमारी बहुत बदनामी होगी.’’

‘‘क्यों, यह सब खयाल तुम लोगों को पहले नहीं आया.’’ महिला पुलिसकर्मी ने कहा.

‘‘गलती हो गई अब कभी नहीं आएंगे.’’ कई लड़कियां गिड़गिड़ाते हुए बोलीं, लेकिन पुलिसकर्मियों ने उन की गुहार को नजरंदाज कर दिया. एक पुलिस अधिकारी ने अधीनस्थों को निर्देश दिया, ‘‘तुम लोग इन को यहीं रखो, कोई भी यहां से जाने न पाए, हम बाकी जगह को चैक करते हैं.’’ इस के बाद पुलिस ने अन्य 2 ढाबों पर भी रेड की.

दरअसल, यह हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की उड़नदस्ता टीम थी, जिस का नेतृत्व डीएसपी अजीत सिंह कर रहे थे. टीम में सोनीपत की एसडीएम शशि वसुंधरा को भी शामिल किया गया था.

स्पैशल टीम को सूचना मिल रही थी कि मुरथल के कुछ ढाबों पर देह व्यापार, जुएसट्टे व नशे का धंधा जोरों पर चल रहा है. सूचना को पुख्ता करना जरूरी था. इसलिए टीम ने पहले 2 लोगों को नकली ग्राहक बना कर वहां भेजा था. जब उन की बातचीत में सब कुछ साफ हो गया तो उन का इशारा मिलने पर काररवाई की.

पुलिस टीम ने वहां स्थित हैप्पी ढाबा, राजा ढाबा व होटल वेस्ट ढाबों पर रेड की. इस काररवाई में 12 लड़कियों व 5 युवकों को देह व्यापार में जबकि 9 लोगों को जुए के आरोप में गिरफ्तार किया. वे महफिल सजा कर जुआ खेल रहे थे.

वे सभी अच्छे परिवारों से थे, इसलिए उन्होंने पुलिस पर रौब गालिब करने की कोशिश भी की, लेकिन पुलिस उन के प्रभाव में नहीं आई. 9 जुआरियों से पुलिस ने एक लाख 63 हजार रुपए भी बरामद किए.

जिस्मफरोशी के आरोप में गिरफ्तार लोगों में 3 विदेशी लड़कियां भी शामिल थीं. इन में एक लड़की उज्बेकिस्तान, दूसरी तुर्की व तीसरी रूस की रहने वाली थी. बाकी 9 लड़कियां दिल्ली निवासी थीं. गिरफ्तार किए गए युवक सोनीपत, दिल्ली व उत्तर प्रदेश के थे.

पुलिस ने सभी लोगों के मोबाइल व नकदी अपने कब्जे में ले ली. पुलिस की इस काररवाई से ढाबों पर भगदड़ मच गई. पुलिस ने सभी आरोपियों को कस्टडी में ले कर पुलिस वैन में बैठाया और उन्हें ले कर मुरथल थाने पहुंची.

वहां आरोपियों से पूछताछ की तो ढाबों पर चलने वाले अनैतिक धंधे की ऐसी परतें खुलीं, जिस पर हर कोई सोचने पर मजबूत हो जाए. क्योंकि ढाबों पर यह सब होता होगा, ऐसा शायद ही किसी ने सोचा हो.

ढाबों पर अमूमन लोग खाना खाने के लिए ही आते हैं, क्योंकि ढाबे इसी काम के लिए बने होते हैं, लेकिन मुरथल के ढाबों की बात अलग है. उन्होंने जीटी करनाल हाइवे किनारे बने ढाबों की छवि को नया रूप दिया. नाम भले ही ढाबा रखा गया, लेकिन उन्हें आधुनिक होटल का रूप दिया गया.

होटल की तरह ढाबों में रूम तक बनाए गए थे. ग्राहकों को खाने के साथसाथ रुकने की सुविधा भी दी जाने लगी. ढाबों की ख्याति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली एनसीआर सहित दूरदूर से लोग यहां परांठों का स्वाद लेने आते हैं.

मुरथल के ढाबों के ज्यादातर मालिक खुद हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने ढाबे बनाने के बाद वह दूसरे लोगों को किराए पर दे दिए. यानी ढाबे के चलने न चलने से उन का कोई मतलब नहीं होता, उन्हें तो बस महीने में किराए की रकम चाहिए होती है.

वैसे तो ये ढाबे इतने मशहूर हैं कि उन पर न तो कमाई की कमी है और न ही ग्राहकों की, लेकिन कुछ ढाबे वालों को इतने पर भी तसल्ली नहीं हुई, उन्होंने लालच में अपने काम को चमकाने में चारचांद लगाने शुरू कर दिए.

ढाबे वाले वह काम भी कराने लगे जो नैतिक नहीं थे. इन में जुआ, सट्टा या नशा ही नहीं, बल्कि देह व्यापार भी शामिल हो गया. ऐसे लोगों ने यह भी नहीं सोचा कि ढाबों की छवि पर इस का क्या प्रभाव पड़ेगा. ऐसे ढाबों पर देह व्यापार का धंधा संगठित तरीके से चलाया जाने लगा.

ढाबे वालों से ऐसी लड़कियों के संपर्क हो गए, जो पैसे कमाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती थीं. वहां पर ऐसी लड़कियों को सप्ताह 10 दिन के हिसाब से एकमुश्त रकम दे कर बुलाया जाता था. उन की बुकिंग का काम ढाबा संचालक व उन से जुड़े दलाल करते थे. ग्राहकों से वह खुद तयशुदा रकम लेते थे, जिस में कालगर्ल का हिस्सा नहीं होता था.

एकमुश्त रकम लेने के बाद कालगर्ल को उस व्यक्ति के इशारों पर काम करना होता था, जो उन्हें लाता था. लड़कियोें के ठहरने व खाने का खर्च भी उन्हें ही उठाना होता था.

कहते हैं कि गलत काम गुपचुप तेजी से चलता है. ढाबों का देह व्यापार भी कुछ इस तरह चला कि लड़कियां वहां शिफ्टों में काम करती थीं. इन में दिल्ली और उस के आसपास के शहरों के अलावा पश्चिम बंगाल व कोलकाता की लड़कियां भी शामिल होती थीं.

जो विदेशी लड़कियां पकड़ी गईं, वैसे तो वे टूरिस्ट वीजा पर भारत आई थीं, लेकिन देह व्यापार में भी जुट गई थीं. उन के संपर्क कई ऐसे दलालों से थे, जो उन के लिए ग्राहक ढूंढते थे. तयशुदा कमीशन ले कर दलाल उन्हें ग्राहकों को परोसते थे.

देह के धंधे में लिप्त ढाबे वाले औन डिमांड विदेशी लड़कियां बुलाते थे. विदेशी लड़कियों को इतनी कमाई होती थी कि वह ऐसी जगहों पर आनेजाने के लिए अपने साथ पेमेंट पर गाइड भी रखती थीं. गाइड भी उन के लिए ग्राहक ढूंढने में मदद करते थे.

अमूमन कोई भी व्यक्ति सोचता है कि ढाबे तो सिर्फ खाने के लिए होते हैं, इसलिए किसी को शक नहीं होता था कि वहां के कमरों के अंदर क्या कुछ चलता है. इस बात का भी ढाबे वाले जम कर फायदा उठा रहे थे. उन्हें लगता था कि जल्दी से उन पर कोई शक भी नहीं करेगा.

ढाबों पर देह व्यापार के लिए नए ग्राहकों को जोड़ने का काम भी उन्हें औफर दे कर चलता था. ऐसे लोगों को बताया जाता था कि उन के यहां खाने के साथ शबाब का भी इंतजाम है, जो लोग इच्छुक होते थे, उन्हें लड़कियां परोस दी जाती थीं. इसी तरह चेन बनती रही.

देह व्यापार के लिए वाट्सऐप का भी इस्तेमाल किया जाता था. पुलिस से बचने के लिए नेटवर्क से जुड़े लोग वाट्सऐप के जरिए ही बातें किया करते थे और उसी से फोटो भेज कर लड़कियां पसंद कराई जाती थीं.

कई बार लड़कियों को औन डिमांड बुलाया जाता था. विदेशी लड़कियां ज्यादातर औन डिमांड आती थीं. जैसे ही उन्हें फोन किया जाता था, वे टैक्सी से कुछ देर में वहां पहुंच जाती थीं.

पुलिस ने पकड़े गए आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के अगले दिन अदालत में पेश किया. जुए के आरोप में पकड़े गए 9 लोगों व स्थानीय लड़कियों को तो जमानत मिल गई, जबकि तीनोें विदेशी लड़कियों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

हैरानी की बात यह थी ढाबों से मुरथल थाने की दूरी करीब एक किलोमीटर थी, ऐसे में पुलिस की नाक के नीचे ही देह का धंधा आबाद था.

मामला खुलने पर स्थानीय पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई. भला यह कैसे संभव था कि ढाबों पर जुआ, सट्टा व देह व्यापार होता हो और पुलिस को पता तक न हो.

लापरवाही सामने आने पर सोनीपत के एसपी जश्नदीप सिंह रंधावा ने इसे बेहद गंभीरता से लिया और थानाप्रभारी अरुण कुमार को तुरंत लाइन हाजिर करते हुए उन के विरुद्ध विभागीय जांच के आदेश दे दिए.

सुखवीर सिंह को मुरथल थाने का नया प्रभारी बनाया गया. दूसरी तरफ ढाबों की छवि को ले कर मुरथल ढाबा एसोसिएशन के पदाधिकारी भी चिंतित हो गए. ढाबा संचालक अमरीक सिंह, देवेंद्र कादियान आदि का मानना है कि कुछ लोगों की करतूत की वजह से कारोबार प्रभावित हो सकता है.

इसलिए एसोसिएशन ने बैठक कर के तय किया कि उन के द्वारा निगरानी कर के गलत काम करने वालों को बेनकाब किया जाएगा. ऐसे लोग वहां ढाबा संचालन नहीं कर सकेंगे. जल्द ही वह ढाबा संचालन की गाइडलाइन तैयार कर के उस का पालन कराएंगे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फोटो डेमो के तौर पर कहानी की असली फोटो का प्रयोदग नहीं किया गया है.

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