Hindi Story . ‘‘अब्बा, जिसे आप काफिर कह रहे हैं... 6-7 पीढ़ी झांक कर देखिए, हम सब भी तो उस काफिर की औलादें हैं,’’ शबनम अपनी बात रखती हुई अपने अब्बा हामिद शाह से बोली.
‘‘यह तुम क्या कह रही हो शबनम... हम काफिर कैसे हुए?’’
‘‘अरे अब्बा, हमारे पूर्वज कभी हिंदू थे. औरंगजेब ने तलवार के बल पर हम सब को मुसलिम बनाया. तब हमारे पूर्वज हिंदू हुए कि नहीं?’’ अपनी बात पर अड़ती हुई शबनम बोली, ‘‘आज भी कई मुसलिम अपनेआप को हिंदू का पूर्वज मानते हैं. इंडोनेशिया देश के लोग तो श्रीराम को पूर्वज मानते हैं.’’
‘‘बसबस, बहुत हो गया शबनम. काफिर तो काफिर होते हैं.’’
‘‘अब्बा, आप के ऊपर तो अंधविश्वास का परदा पड़ा हुआ है. मुल्लाओं की तरह आप भी कट्टरवादी सोच से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं,’’ एक बार फिर शबनम अपने अब्बा पर हमला करती हुई बोली.
‘‘बहुत ले लिया तुम ने काफिरों का पक्ष...’’ अब्बा हामिद शाह नाराज हो कर बोले, ‘‘अब मैं तेरी एक भी नहीं सुनना चाहता. मैं मुसकान का निकाह वहीं करूंगा जहां मैं ने तय कर रखा है.’’
‘‘अब्बा सोचिए, मुसकान अब बच्ची नहीं है, उस ने पवन को पसंद किया है और पवन के घर वाले भी मुसकान को अपनी बहू बनाने के लिए तैयार हैं. फिर पवन सरकारी नौकरी वाला है. मुसकान वहां राज करेगी. यह बात आप क्यों नहीं सोचते हैं?’’
‘‘अरे, राज तो वह अब्दुल कबाड़ी के यहां भी करेगी. क्या कमी है वहां?’’
‘‘कमी की बात कर रहे हैं अब्बा, उन का बेटा आवारा और कम पढ़ालिखा है.’’
‘‘अरे, कम पढ़ीलिखा है तो क्या हुआ, कमा रहा है...’’ हामिद शाह बोले, ‘‘कान खोल कर सुन ले शबनम, मैं मुसकान की शादी उस काफिर से नहीं होने दूंगा. मैं अभी अब्दुल कबाड़ी से निकाह की तारीख तय कर के आता हूं,’’ कह कर हामिद शाह गुस्से से नाराज हो कर बाहर निकल गए.
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