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Political Humor : नूरजहां की मिस्टेक

Political Humor. किस्सा कुछ इस तरह से है कि जब मुख्यमंत्री कल्लू सिंह अपनी बीवी जलेबी देवी को अपना ताज दे कर तिहाड़ को गए, तो बहुत लोगों के मन में यह शक पैदा हो गया कि उन की पत्नी इतने बड़े पद को संभाल पाएंगी या नहीं. कल्लू सिंह 8वीं जमात से ज्यादा नहीं पढ़ सके थे, पर बोलचाल व वादविवाद में वे सब के गुरु थे.

जलेबी देवी अपने मिडिल पास शिक्षा मंत्री दुखहरन से भी कम पढ़ीलिखी थीं यानी प्राइमरी फेल थीं. पर वे बातव्यवहार, स्टाइल और अंगरेजी में दोनों से सुपीरियर पड़ रही थीं.

जनताजनार्दन या बड़े अफसरों का उन को ‘मैडम’ कहते कहते मुंह नहीं थकता था. वैसे, जलेबी देवी के इस बदलाव में आईएएस पीए संत तुषार देव यानी एसटीडी उर्फ संतू का बहुत बड़ा हाथ था.

पीए संतू जलेबी देवी को चक्करदार राजनीतिक भंवरों, नुकीली संवैधानिक चट्टानों और तूफानी विरोधी थपेड़ों से बचा कर निकाल लेता था. कम ही लोगों को पता था कि मैडम के पास ईयरफोन भी है, जिस से वे अपनी हिदायतें गाहेबगाहे डायल किया करती थीं.

फर्ज कीजिए, किसी सभा में मैडम का भाषण उबाल बिंदु पर उछाल लगाने वाला हो, तभी ईयरफोन में इंस्ट्रक्शन आ जाता ‘डाउनडाउन’ और वे तत्काल नोज डाइव मार कर नीचे आ जातीं. पर काफीकुछ रटाएसिखाए जाने के बावजूद ऐसा होता कि एसटीडी को ‘कटकट’ कह कर पैकअप कराना पड़ता.

जैसे उस दिन जब सरकारी अस्पताल के जच्चाबच्चा विंग के उद्घाटन के मौके पर जलेबी देवी ने यों कहना शुरू किया, ‘‘देवियो और सज्जनो, यहां मैटरनिटी अस्पताल खोल दिया गया है. जितने बच्चे चाहे पैदा कीजिए, कोई डर नहीं.

‘‘दाई से नाल कटवाने की जरूरत नहीं है. इन दाइयों ने हमारे 3 बच्चे मरवा दिए, नहीं तो इस समय हमारे 17 बच्चे होते. है कोई, जो आज के जमाने में इतने…’’ तभी एसटीडी को बड़े जोर से ‘कटकट’ कह कर उन के भाषण को खत्म कराना पड़ा.

शुरूशुरू में तो जलेबी देवी अपने चतुर पीए संतू की बातें मान लिया करती थीं, पर जैसेजैसे दिन बीतते गए और उन्हें अपनी पोजीशन और पावर का एहसास हुआ, तो वे उस की हिदायतें दरकिनार करने लगीं.

भला हो राज्य की भोलीभाली जनता का, जिस ने जलेबी देवी के कहे को कभी कान नहीं दिया. कान दिया तो उन के अच्छे कामों को, जिन में लगान माफी से ले कर तार काटे जाने की माफी भी शामिल थी.

तकरीबन 2 सौ लोगों को उन्होंने गबन, डकैती, बलात्कार, हत्या जैसे मामलों में जेल जाने से बचाया होगा. कितने अपढ़ बेरोजगारों को निगमों का चेयरमैन, कितने ही जाली डिगरी वालों को वाइसचांसलर बना दिया. क्या इन सब का कोई हिसाब है?

पर बुरा हो उन के विरोधियों का, जिन्हें उन के हर अच्छे काम में ऐब नजर आता. और तो और उन की अपनी पार्टी में भी पंचानन राय और तिलकुट यादव जैसे कई जयचंद थे, जिन्हें जलेबी देवी का दबदबा खाए जा रहा था.

पर धन्य हो भेड़ का दूध पीए जलेबी देवी के कलेजे का, जो सभी दांवपेंचों से बेखबर राज्य की खड़बडि़या मोटरगाड़ी को मर्सिडीज बैंज की शान से लहराए चली जा रही थीं.

जैसे आज ही अविश्वास प्रस्ताव के गहराए बादल को दरकिनार कर उन्होंने 3-4 उद्घाटन के फीते काट डाले और लच्छेदार भाषण दे डाले. हर जगह नियमपूर्वक ‘जब तक सूरज चांद रहेगा…’ वाले नारे के साथ तालियां पिटवा दीं.

भाई के दसलखी ‘ब्यूटी पार्लर’ के उद्घाटन के बाद तो उन्होंने बाकायदा अपना कायाकल्प ही करा डाला. पर ‘ब्यूटी पार्लर’ से निकलते ही एक दिक्कत आ गई. नदी पार गंजी गांव में 5 दलितों की हत्या की खबर आई.

यह सुन कर जलेबी देवी का मूड बिगड़ गया. शाम को बांगड़ू गवर्नर की इफ्तार पार्टी में बिरियानी उड़ानी थी. अब पहले गंजी गांव जाना पड़ेगा. वहां से लौटने पर पता नहीं कितना मेकअप बचा रह पाएगा.

वैसे, पुलिस महानिरीक्षक उन के वहां जाने के पक्ष में नहीं थे. पर पार्टी उपाध्यक्ष राम नगीना ने चेतावनी दी, ‘‘आप को हारना हो, तो मत जाइए.’’

जब जलेबी देवी ने अपने पीए संतू की राय ली, तो उस ने कहा, ‘‘वहां जाने में कोई हर्ज नहीं, पर मेकअप डाउन करना पड़ेगा.’’

जलेबी देवी बोलीं, ‘‘इतनी मेहनत से तो मेकअप कराया था, अब सब गंवा दें?’’

सो लेदे कर काफिला गंजी गांव की ओर बढ़ा. रास्ते में पीए संतू ने लाचारी के भाव के बावजूद जलेबी से ‘खून की आखिरी बूंद’ वाला डायलौग बारबार बुलवा कर चैक किया और कई दूसरी हिदायतें भी दीं, जैसे गले से भर्राई आवाज कैसे निकालनी चाहिए.

दोपहर बाद मुख्यमंत्री का दल घटना वाली जगह पर पहुंच गया. वहां हायतोबा मची हुई थी. प्रशासन के खिलाफ भीड़ नारे लगा रही थी. एक जगह माले नेता राम कटार माइक से आग उगल रहे थे.

भीड़ इतनी थी कि पुलिस कोई भी कार्यवाही करने से हिचक रही थी.

राम कटार ने अपना भाषण बीच में रोक कर गरजती आवाज में भीड़ से पूछा, ‘‘पहचानो… ये कौन हैं?

अरे, ये तो नूरजहां हैं.’’ भीड़ के बीच हंसी की एक लहर दौड़ गई.

‘‘बेगम नूरजहां यहां आई हैं, इंसाफ बांटने. समझे? जहांगीरी इंसाफ तो जानते ही हो, कितना मशहूर है. पहले भी नमूना देख चुके हो,’’ राम कटार चुनचुन कर जहर बुझे बाण जनता के दिल में उतार रहे थे.

‘जलेबी देवी हायहाय’ भीड़ ने नारा बुलंद किया. अफसर चौकन्ने हुए और पुलिस की एक टुकड़ी राम कटार को शांत कराने के लिए लपकाई गई, पर राम कटार लातघूंसों की मार के बावजूद माइक छीने जाने तक जलेबी देवी की अच्छी गत बना चुके थे.

‘‘बड़ी पीर है इन के जिगर में. देखते नहीं हो,’’ वे चिल्लाते रहे, ‘‘लिपस्टिकपाउडर सब गवाह हैं… मारे दुख के अपने आधे बाल कटा दिए हैं. जहांगीर होते, तो पूरा सिर मुंड़वा के आते. नूरजहां बीवी होने के नाते आधे पर काम चला रही हैं.’’

थोड़ी देर बाद राम कटार और उन के साथियों का बंदोबस्त हो जाने के बावजूद भीड़ में जोश बढ़ता जा रहा था.

पीए संतू ने राय दी कि मैडम का अब यहां रुकना ठीक नहीं. जल्द से जल्द इन्हें इस झंझट से निकाल बाहर करना चाहिए. पर राम नगीना ने जोर दिया कि यहां आ कर बिना बोले चले जाना ठीक नहीं है. जनता में गलत संदेश जाएगा.

मैडम के बोलते ही भीड़ शांत हो जाएगी, ऐसा उन्हें यकीन था. शोरगुल के बीच उन्होंने जलेबी देवी को माइक पकड़ा दिया और चिल्लाचिल्ला कर भीड़ को बता दिया कि मुख्यमंत्री आप लोगों से कुछ कहना चाहती हैं.

आखिरकार जलेबी देवी ने अभ्यास की गई भर्राई आवाज में कहना शुरू किया, ‘‘प्यारे भाइयो और बहनो…’’

कड़ी धूप में उन के ऊपर की गई कलाकारी का रंग दूरदूर तक चमक रहा था. एक किनारे पोस्टमार्टम के लिए तैयार की गई पांचों लाशें जमीन पर पड़ी थीं और दूसरी ओर…

अचानक एक जूता जलेबी देवी के सिर पर आ गिरा, जिस से उन का चश्मा दूर जा गिरा और बाल बिखर गए. जब तक वे संभलतीं, तब तक और कई जूतेचप्पलों ने उन का बाकी का हुलिया बदल दिया. पुलिस डंडा फटकारते हुए दंगाइयों की ओर बढ़ी.

गंदे नारों से आसमान गूंजने लगा. ‘हत्यारिन, चोर, पापिन…’ चोट और बेइज्जती से तिलमिलाई जलेबी देवी का सारा सब्र जाता रहा. वे गला फाड़ कर चीखीं, ‘‘मार के बिछा दो सबों को… फिर हम देख लेंगे… किसी को पहनेओढ़े नहीं देख सकते हैं… अच्छा हुआ मर गए. और भी मरे होते तो अच्छा था…’’

पीए संतू ने उन के हाथों से माइक छीन कर दूर फेंका और सिक्योरिटी वालों की मदद से उन्हें तत्काल बाहर निकाल कर रवाना किया. पर कई मीडिया वाले जलेबी देवी की चुनिंदा गालियों और उन के दलित प्रेम की बानगी अंत तक रेकौर्ड करते रहे.

शाम की खबरों में इस महाभारत की खबरें प्रसारित हो गईं और 2 सहयोगी पार्टियों की समर्थन वापसी से सरकार गिर गई.

यह अलग बात है कि 6 महीने बाद ही कल्लू सिंह की अद्भुत कुशलता के चलते जलेबी देवी फिर से पद पर आसीन हो कर जनकल्याण में जुट गईं.

लेकिन उन्होंने अपना मिस्टेक को नहीं दोहराया. अब वे खूनी घटना वाली जगहों पर बिना मेकअप वाले रूप में ही जाती हैं. गंजी गांव में तो 5 खून पर ही महाभारत मच गया था, पर अब 12-13 लाशों पर भी उतना कुहराम नहीं मचता. पीए संतू के डायरैक्शन में वे राज्य को और ज्यादा मजबूती और शांति की ओर बढ़ा रही थीं. Political Humor

Religious Exploitation : धर्म का ठेला मेला ही मेला

Religious Exploitation. मैंने बहुत से कारोबार किए, पर कामयाब न हुआ. थकाहारा मैं एक ग्राहक के लिए एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम गोभी तोल रहा था कि एकाएक कहीं से प्रकट हुए बाबा ने मुझ से पूछा, ‘‘सब्जी के ठेले पर एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम तोल कर अपना यह लोक तो छोड़ो, परलोक तक क्यों खराब कर रहे हो कामपाल?’’ मैं ने उन के पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं कामपाल? मैं तो… प्रभु, और क्या करूं? अगर मैं एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम न तोलूं, तो शाम को कमेटी वालों को, इस इलाके के हवलदार को, इनकम टैक्स वाले अफसर को 4-4 किलो मुफ्त सब्जी कहां से दूंगा? अगर न दूंगा, तो कल यहां ठेला कौन लगाने देगा?

‘‘बाबा, अपना तो नसीब ही ऐसा है कि जब भी सिर मुंड़वाने बैठता हूं, तो साफ मौसम में भी पता नहीं कहां से ओले पड़ने लगते हैं. ‘‘जवानी में पहली दफा प्यार के चक्कर में सिर मुंड़वाने बैठा ही था कि शादी कर के वह मेरे गले पड़ गई. और फिर कमबख्त आज तक पता ही नहीं चल पाया कि प्यार किस बला का

नाम है. ‘‘अब आप ही बताइए कि ऐसे में मैं एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम न तोलूं, तो और क्या करूं?’’

‘‘तो सुनो कामपाल, अब तुम्हारे शक्तिवर्धक कैप्सूल खाने के दिन आ गए हैं. कल से तुम्हें यह देश कामपाल के नाम से जानेगा. बाबा का हुक्म है कि कल से तुम सब्जी का पंचर टायरों वाला ठेला लगाना बंद कर के धर्म का ठेला लगाओ.’’ ‘‘धर्म ठेले पर भी बिकता है क्या बाबा? मैं ने तो आज तक धर्म के मौल ही देखे हैं. ऐसे में ठेले पर कौन मुझ से धर्म खरीदने आएगा? ऐसा न हो कि मैं दो वक्त की रोटी से भी जाता रहूं.’’

बाबा मेरी अक्ल पर गुस्सा होते हुए बोले, ‘‘मूर्ख, लगता है कि बीवी ने तुम्हारे दिमाग को चाटचाट कर साफ कर दिया है. इस देश में जितना धर्म बिकता है, उतना और कोई माल नहीं बिकता. धर्म के खरीदार यहां हर तबके के लोग हैं. जिन लोगों के पास आटादाल खरीदने तक को पैसे नहीं हैं, वे भी आटेदाल की परवाह किए बिना धर्म जरूर खरीदते हैं. ‘‘रही बात ठेले पर धर्म बेचने की, तो आज धर्म के जितने भी मौल सजे देख रहे हो न, सब ने ठेले से ही धर्म बेचना शुरू किया था. यह धंधा वह धंधा है, जो दिन दूनी रात सौ गुनी तरक्की करता है. जिस ने भी यह धंधा किया है, वह गंगू तेली से राजा भोज हो गया है.

‘‘मेरा तुझे आदेश है कि जनता में धर्म की स्थापना के लिए तू भी धर्म का ठेला लगा और ठेले से मौल तक पहुंच कर करोड़पति हो जा.’’ ‘‘पर बाबा, मेरे पास तो सब्जी बेचने की ही पुश्तैनी कला है. ऐसे में मैं धर्म को कैसे बेच पाऊंगा? सड़ी सब्जी की गंध मेरी नसनस में बस चुकी है,’’ मैं ने अपने भीतर का दर्द कहा.

बाबा मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले, ‘‘धर्म बेचना सब्जी बेचने से कहीं ज्यादा आसान है. न तराजू, न बट्टे. न लंगोट, न कच्छे. न तेल लगा कर चमकाई गई सड़ी शिमला मिर्च, न ग्रीस मले मुरझाए भुट्टे. कोशिश कर के तो देख. इस धंधे में न गला फाड़ने की जरूरत, न सड़ी बंदगोभी को ताजा बनाए रखने के लिए उस के सड़े पत्ते उखाड़ने की.’’ बाबा की बातों से हैरानपरेशान हो कर मैं गश खा कर गिरतेगिरते बचा. मैं ने टूटी तराजू और सील निकाले बट्टों को परे फेंकते हुए पूछा, ‘‘पर बाबा…’’

‘‘जानता हूं. तुम बरवाला वाले का केस देख कर डर रहे हो. पर बेटा, चांदनी चौक की एक दुकान बंद होने का मतलब पूरे चांदनी चौक का बाजार बंद होना तो नहीं? गरीबी की सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं मौल के 2-4 दिन. घोर कलियुग है, घोर कलियुग. अब धर्म का झंडा उठाने वालों के साथ यहां ऐसा ही होगा, पर तुम डरना मत.’’ ‘‘पर बाबा…’’

‘‘पर क्या… सब्जी का ठेला छोड़ कर कल से धर्म का ठेला लगा और चंद दिनों में ही इसरो से भी कम

लागत में चांद पर पहुंच जा,’’ इतना कह कर बाबा अंतर्ध्यान हो गए.

मुझे बाबा की बात जंच गई. लिहाजा, शाम को ठेले की बची सब्जी के भरभर झोले कमेटी वालों को, इलाके के हवलदार को, इनकम टैक्स वाले अफसर को दे कर घर पर ही धर्म का ठेला लगाने की बात पत्नी से की, तो 10-20 दिन न नहाने वाली बीवी खोली में ही स्विमिंग पूल में तैरने के सपने लेने लगी. खुले में शौच जाने वाली मेरी आंखों के सामने एयरकंडीशंड वाशरूम सज उठा. इधरउधर से गत्ते की पेटियां चुन कर लाने वाली मेरी बीवी की आंखों के आगे मौड्यूलर किचन नाचने लगा. देखते ही देखते मैं ने देखा कि जैसे मैं नामीगिरामी बाबा हो गया हूं.

कुछ भी बकने के लिए मेरे भक्तों ने मेरे लिए सोने का सिंहासन बनवा दिया है. भक्त मेरी बकवास सुनने को बेचैन हैं.

मेरे पास स्वर्ग तक जाने के लिए लिफ्ट मौजूद है. भीतर ही भीतर आई फील दैट स्वर्ग के देवता तक मुझ से चिढ़ने लगे हैं. हजारों की तादाद में मेरे दिमाग और बिना दिमाग वाले भक्त हैं. घर के खाली दालचावल के डब्बों में सोने के गहने, हीरेजवाहिरात भरे पड़े हैं. कल तक जिन्हें मैं हफ्ता दिया करता था, वे सब मेरे पैरों में ‘डेली’ चढ़ाने आ रहे हैं. Religious Exploitation

Humor Story :जुमे का दिन और मिर्जा की मिजाजपुरसी

Humor Story. जुमे का दिन था और मैं भी मूड में था, इसलिए सोचा कि चलो, कुछ देर मिर्जा के साथ गपें लड़ाएं. हो सकता है कि लंच से पहले एक टी पार्टी भी हो जाए.

मैं ने जल्दी से नहाधो कर शेरवानी पहनी, गुलाब का बढि़या इत्र लगाया, पीतल जड़ी नक्काशी वाली बेंत हाथ में ली, सुबह के 11 बजे घर से निकल कर सीधे मिर्जा के घर का रुख किया.

मैं जैसे ही मिर्जा के घर के करीब पहुंचा, तभी मुझ पर अचानक जैसे तड़ाक से बिजली सी गिर गई. दिमाग बिजली की तरह कौंधा और पलभर में हजारों बुरे खयालात दिमाग के एक कोने से दूसरे कोने तक कौंध गए.

देखा कि मिर्जा की बैठक का दरवाजा खुला था. बाहर धूपछांव में एक टूटे से खटोले पर कोई… शायद मिर्जा एक मैली सी चादर ओढ़े लेटे थे. गली के आसपास के दोचार बड़ेबूढ़े भी पास ही बैठे थे.

यह मंजर देख कर मेरी तो जैसे रूह ही निकल गई और टांगें तो जैसे वाइब्रेशन मोड पर आ गई थीं. मेरी बेंत ने मुझ गिरते हुए को सहारा दिया.

मैं ने बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए कांपती आवाज में पूछा, ‘‘यह जनाजा किस… क्या… मिर्जा…?’’

तभी वहां बैठे एक शख्स, जिन्हें गली के लड़के ‘चचा मुकुंदा’ कहते थे और जो चारपाई के सिरहाने बैठे थे, ने अपने मुंह पर उंगली रख कर इशारे से मुझे चुप रह कर बैठने का इशारा किया.

थोड़ी देर बाद वे दबी आवाज में बोले, ‘‘जनाब, आप को खबर भी है कि मिर्जा को चोट लगी है. नींद की दवा दे रखी है, ताकि दर्द का एहसास कम हो.’’

मेरे मुंह से एक हमदर्दी भरी चीख निकलने को हुई, मगर वह जैसे गले में घुट कर रह गई.

मैं ने सवाल पूछा, ‘‘क्या किसी मोटरसाइकिल वाले ने साइड मार दी?’’

‘‘नहीं…’’

‘‘तो क्या फिसल कर सीढि़यों से लुढ़क गए?’’

‘‘नहीं…’’

तभी वहां बैठे सभी लोगों के होंठों पर हलकी सी मुसकान तैर गई. यह देख कर मेरा दिमाग 360 डिगरी पर घूम गया.

‘‘तो क्या माजरा है…’’ मेरे मुंह से निकल पड़ा, ‘‘मिर्जा को चोट लगी है और आप बेशर्मों की तरह मुसकराते हो. कुछ तो शर्म करो. बेशर्मी की भी हद होती है.’’

तभी चचा मुकुंदा ने अपना हाथ मेरी गरदन पर रख कर मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरा कान अपने मुंह के पास ले गए.

मैं डर गया कि शायद कहीं मेरा कान ही न चबा डालें. फिर भी मैं ने न जाने क्यों अपना कान उन के मुंह के सामने कर दिया.

चचा मुकुंदा मेरे कान में कुछ फुसफुसाए, जो बस मुझे ही सुनाई दिया.

मेरे मुंह से निकला, ‘‘क्या… ऐसा हुआ… क्यों?’’

मैं ने पूरे जोश के साथ मिर्जा के कफन… माफ कीजिए चादर को मुंह से पैर तक खींच कर साइड में डाल दिया और मिजाजपुरसी की रस्म अदा करते हुए हमदर्दी के तौर पर उन्हें हिलाया.

मैं ने देखा कि मिर्जा के दाहिने हाथ पर किसी ने बांस की खपच्चियां रख कर पट्टी लपेटी हुई थी. उन की बाईं आंख सूज कर काली पड़ गई थी और भौंह के ऊपर माथे को ढके हुए सिर के चारों तरफ पट्टी लिपटी थी, जिस पर लाल दवा के निशान थे, जो सूख कर काले पड़ने लगे थे.

मिर्जा ने अपनी दाईं आंख धीरे से खोली और एक बेबसी वाला गुस्सा मेरी तरफ बम की तरह फेंका.

मैं ने हमदर्दी दिखाते हुए मिर्जा के सिर के नीचे अपना एक हाथ रखा और दूसरा हाथ उन की कमर के नीचे रख कर सहारा दिया और उन का सिर

अपनी गोद में रख कर उन से पूछा, ‘‘यह सब क्या…’’

मिर्जा का गला रुंध गया और वे कुछ न बोल सके. तब मौके की नजाकत को भांपते हुए मैं ने ही पूछा, ‘‘यार मिर्जा, यह बेलन की बात तो अकसर तुम्हारे साथ होती ही रहती थी, पर ये प्लेटेंगिलास, चम्मच के चौकेछक्के कब से? अगर कहीं तुम्हारी आंख फूट जाती तो…?’’

मिर्जा, जो अब तक कुछ सामान्य हो चुके थे, बोले, ‘‘मैं खाना खा रहा था. गले में निवाला फंस गया था. पानी मांगा था, तभी बेगम ने गुस्से में खाली गिलास मेरे ऊपर फेंका और बोलीं, ‘ले, पी पानी.’

‘‘गिलास से तो मैं ने अपनेआप को साइड में झुक कर बचा लिया, लेकिन निशाना खाली जाने से बेगम तिलमिला गईं और फिर एकदम से एक प्लेट अर्जुन के तीर की तरह फेंकी, जो मेरी आंख पर लग जाती, तो आंख ही फूट गई होती.

‘‘इतने पर भी जब वे नहीं रुकीं, तो जो हाथ में आया फेंक कर मारती गईं. उन के इन तीरों की बौछार से बचने के लिए मैं हड़बड़ा कर बाहर की तरफ भागा कि तभी न जाने कमबख्त कौन से साहबजादे ने केला खाया होगा और छिलका दरवाजे में डाल दिया. मेरा पैर उस पर पड़ा और धड़ाम से जमीन पर. अब कुहनी का फ्रैक्चर न जाने कब ठीक होगा.’’

मैं ने मिर्जा को हिम्मत दी और नकली हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘बस… इतना ही. अरे यार मिर्जा, तुम तो खुशकिस्मत हो, जो बीवी से पिटे… मुबारक हो…’’

तभी मिर्जा के चेहरे पर ऐसे भाव आए, जैसे वे मुझे कच्चा ही चबा जाएंगे, पर बेबस थे.

वे धीरे से बोले, ‘‘ठीक है… तुम भी उड़ा लो मजाक… जिस दिन पिटोगे, तब सब पता चल जाएगा.’’

मैं ने कहा, ‘‘यार मिर्जा, तुम जो गरीबी का रोना रोते हो, वह अब दूर होने वाली है. तुम बड़े आदमी बनने वाले हो. इतने बड़े कि… जैसे…’’

तभी मिर्जा बोल पड़े, ‘‘क्या मैं अमेरिका का राष्ट्रपति बन रहा हूं? क्यों तू मेरे जख्मों पर नमक छिड़क रहा है? एक तू ही तो था, जिस से मैं मन की बात कर लेता था. और अब तू भी… ठीक है, उड़ा ले मेरी हंसी… जिस दिन भाभी की मार पड़ेगी, तब पता चलेगा.’’

मैं ने मिर्जा से ऐसे दिखावटी हमदर्दी जताई, जैसे मैं उन पर दुनिया का सब से बड़ा एहसान कर रहा हूं.

मिर्जा से मुखातिब होते हुए मैं ने कहा, ‘‘नहीं यार मिर्जा, ऐसी बात भूल कर भी अपने दिमाग में मत लाना. मैं तुम्हारा सच्चा हमदर्द हूं. कभी शक की गुंजाइश मत रखना.

‘‘देखो मिर्जा, ध्यान से सुनो. वे हैं न हमारे… अरे, वे ही जनाब अमेरिका के बिल क्लिंटन साहब. क्या वे बड़े आदमी नहीं बने, वे भी ऐसे देश के जो पूरी दुनिया को तिगनी का नाच नचाता है…

‘‘तो…’’ मिर्जा बीच में ही बोल पड़े, ‘‘मेरा मिस्टर बिल से क्या ताल्लुक?’’

मैं ने मिर्जा को टोका, ‘‘यार, यही तो कमी है तुम्हारी सोच में? अबे, वे भी अपनी बीवी से पिट कर ही इतने बड़े आदमी बने हैं. उन पर बीवी की मिसाइलों जैसे गिलासप्लेट, चम्मच से अनेक बार हमले हुए हैं.

‘‘जैसे सोना तप कर और पिट कर कुछ बनता है, ऐसे ही हमारे चचा क्लिंटन साहब भी अपनी बीवी के मिसाइलोंबमों से पिट कर अमेरिका के राष्ट्रपति बने…

‘‘यह तो भला हो उन की सहायक का, जिस ने दुनिया के सभी मर्दों को बड़ा बनने का राज दुनिया के सामने खोल दिया, वरना…’’

यह सुनते ही मिर्जा कुछ देर के लिए शांत हुए और एक लंबी उबासी ली, जैसे सचमुच ही अमेरिका के राष्ट्रपति बनने जा रहे हों. अब तक उन की नींद की गोली का असर शायद खत्म हो चुका था, तभी वे और भड़क उठे और बोले, ‘‘क्या बकवास करते हो… वह अमेरिका है और यह हिंदुस्तान… यहां ऐसा कभी नहीं हो सकता.’’

मैं ने मिर्जा को फिर झूठी तसल्ली देने की कोशिश की और कहा, ‘‘यार, चचा क्लिंटन की बात छोड़ो. अगर तुम गलीमहल्ले के नेता भी बन गए, तो भी तुम गुजरबसर लायक अमीर तो बन ही सकते हो.’’

शायद यह बात मिर्जा को जंच गई थी. उन्होंने राहत की लंबी सांस ली और फिर करवट बदल कर खर्राटे लेने शुरू कर दिए, जैसे अमीरी के ख्वाबों की दुनिया में पहुंच गए हों.

दोपहर के साढ़े 12 बज चुके थे. मैं ने मिर्जा का सिर धीरे से तकिए पर रखा और कहीं दोपहर का खाना खाने के लिए रैस्टोरैंट ढूंढ़ने लगा. मिर्जा के यहां तो लंच की उम्मीद ही नहीं थी. Humor Story

Hindi Story: पीता हूं सरकार चलाने को

Hindi Story ‘तू अपना जिगरी यार है. तू रोज पीने का कोई न कोई नया बहाना क्यों ढूंढ़ता रहता है?’ मैं जबतब उसे समझाता हूं, ‘ऐ मेरे जिगरी दोस्त, पी, लेकिन बहुत मत पी. लिमिट में पी. जैसेजैसे सरकार सुरा महंगी कर रही है, तू उतनी ही और पी रहा है. सरकार और तुझ में कोई कनैक्शन है क्या? तेरी बीवी और मेरी भाभी से अब तुझ से पहले मुझे जूते पड़ने लगे हैं कि कैसा दोस्त पाल रखा है?

‘देख दोस्त, तेरी सेहत भी अब अलाऊ नहीं करती. जब तू सुरापान किए सरकार की तरह बारबार गिरता हुआ बड़ी मुश्किल से संभलता है न, तो मुझे अपने पर बहुत दया आती है. पर एक तू है कि मानता ही नहीं. जब देखो, अपने बारे में सोचना बंद कर सरकार के बारे में ही सोचता रहता है.
‘अरे, जब कोई भी सरकार तेरे बारे में नहीं सोचती तो तू उस के बारे में क्यों सोचता है? बेकार का सरकारवादी कहीं का…’

मेरा वह दोस्त मेरे बारबार पीने से रोकने पर मेरा महंगाई से सिकुड़ा सीना पीटता हर बार यही कहता है, ‘देखो दोस्त, मैं उन की तरह सरकार का खासमखास सरकार फरामोश नहीं जो जहां से देखो, जब देखो, चटी सरकार को भी चाटने में लगे रहते हैं. सुरापानी उसी का, सरकार जिस की.
‘यह जो मैं सीना ठोंक कर पीता हूं न, मैं अपने लिए कतई नहीं पीता. जितना पीता हूं सब सरकार के लिए पीता हूं. यह जो मैं पीता हूं न, मैं अपने लिए  हरगिज नहीं पीता. टोटली सरकार के फायदे के लिए पीता हूं.
‘अच्छा बता, मैं पिऊंगा नहीं तो सरकार को रेवैन्यू कहां से जैनेरेट होगा? हर महकमा तो घाटे में है. जहां देखो, खाने वालों की फौज. ऐसे में मैं भी नहीं पिऊंगा तो सरकार का रेवैन्यू हो गया न जीरो? अगर रेवैन्यू नहीं आएगा तो वह अपने अमले को कहां से पिलाएगीखिलाएगी? रोतीचीखती जनता की परवाह किए बिना उन को मौज कहां से कराएगी?

‘यह जो मैं इधरउधर से उधार ले कर ठेके के चक्कर पर चक्कर लगाता हूं न, अगर जो मैं ये चक्कर लगाने बंद कर दूं तो बता, वे जनहित के बहाने विदेशों के दौरे कैसे करेंगे?
‘दोस्त, समुद्र मंथन के वक्त शिव ने सृष्टि बचाने के लिए तो बस एक बार ही गरल पिया था, पर मैं तो सरकार बचाने के लिए दिन में दसदस बार हलाहल पीता हूं. बता, मैं बड़ा कि शिव?
कोई मेरी सही से कीमत लगाए, तो मेरा त्याग शिव से बीस ही होगा दोस्त.
‘मैं न पीने वालों का सीना पीटपीट कर कहता हूं कि सरकार की आमदनी का सब से बड़ा कोई सोर्स है तो वह केवल और केवल मैं हूं. बता दे कोई दूसरा माई का लाल जो मेरे नाली में गिरने पर, कुत्तों से अपना मुंह चटवाते हुए मुझ से ज्यादा सरकार को इनकम देता हो? बाकी सब तो बस खाने वाले हैं.
‘दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 महीने से पैंशनरों की पैंडिंग पैंशन कहां से देगी?
‘दोस्त, मैं पिऊंगा नहीं तो वह दिन में 10-10 बार एरियर के लिए रो रहे एरियर वालों को बकाया एरियर कहां से देगी?

‘दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 सालों से बीमारों के मैडिकल बिलों का भुगतान कहां से करेगी? अपनी जेब से देने से तो वह रही.
‘दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो विनाश… सौरी… सौरी… विकास का रास्ता बंद हो जाएगा.
‘दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार को टीएडीए कहां से मिलेगा? मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार की तनख्वाह कहां से आएगी? ‘दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो 100 ग्राम की फाइल अपने चपरासी से उठवाने वालों का बोझ कहां जाएगा?
‘दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकारी गाड़ी में अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल छोड़ सरकारी स्कूल के बच्चों को प्लानिंग पर प्लानिंग करने वालों की गाड़ी का पैट्रोल कहां से आएगा?
‘दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो यार बेलियों की मौजमस्ती पर क्या ताला नहीं लग जाएगा? ऐसे में हर पियक्कड़ सरकार भक्त का फर्ज बनता है कि वह अपनी सेहत की परवाह किए बिना सरकार की सेहत के हित में पिए,डट कर पिए, बढ़ते रेट की परवाह किए बिना पिए.

‘यहां सवाल अपनी सेहत का नहीं, सरकार की सेहत का है. सरकार की सेहत पर मेरी सारी सेहतें कुरबान. बुरे वक्त में जब सरकार के चचेरेममेरे ही उस का साथ नहीं देते, तो ऐसे में मैं सरकार का साथ नहीं दूंगा तो और कौन देगा? ‘डियर, मैं पी कर गिर जाऊं तो गिर जाऊं, पर सरकार को किसी भी सूरत में गिरने नहीं दूंगा. इतनी ताकत तो अभी भी है मेरे पास. यह मेरा वादा है अपने आप से.
‘बोल, अब समझा, मैं क्यों पीता हूं? मैं पी कर अपने गिरने की परवाह किए बिना सरकार को गिरने से बचाने के लिए पीता हूं,’ उस ने कहा और मेरे सामने ही सरकार हित में एक पैग और खींचा तो मैं ने उस के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘गुरु, सरकार के बारे में सोचना अच्छी बात है, पर सरकार को भी तो चाहिए कि वह तुम्हारे हित का ध्यान रखते हुए शराब और महंगी न करे. अपने खर्चे के साथसाथ तो तुम्हारी जेब का भी ध्यान रखे.’

‘अरे दोस्त, यहां मेरे सिवा दूसरों के बारे में सोचता ही कौन है? यहां सस्ता है ही क्या? दोस्ती तो पहले ही सस्ती नहीं थी, अब तो यहां दुश्मनी तक सस्ती नहीं. कमेटी का हफ्ते में एक दिन आने वाला पानी तक पिछले साल के मुकाबले इस साल 4 गुना महंगा हो गया है. अस्पताल में टैस्ट महंगे हो गए हैं. रैस्टहाउसों के रैस्ट महंगे हो गए हैं. पर जो कल को सरकार की इनकम बंद गई तो पता है, न जाने कितने भरे पेटों के खाली दिमागों में चूहे कूदने लग जाएंगे? जनता तो वे हैं नहीं जो भूखे पेट भी भजन करने में मस्त रहें.
‘देख दोस्त, कुलमिला कर कहूं तो मुझे पीने का शौक नहीं, मैं पीता हूं तो सरकार चलाने को… जीना तो है उसी का जिस ने यह राज जाना, है काम हर वोटर का, कुरसी के काम आना. तू क्या समझता है कि मैं ने पी रखी है?’

‘पिएं तेरे दुश्मन… पर दोस्त, जो वैष्णव से वैष्णव जीव और कुरसी को एक बार कुछ भी पीने की लत लग जाए न तो वह किसी तंत्र में भी नहीं छूटती…’ अब मुझे लग गया था कि वह सुराड़ी से कथावाचक होने लगा है, तो मैं ने झट आरती शुरू कर दी, ताकि वह अपनी सुराकथा खत्म करे.
प्रभु… धन्य हो ऐसा सरकार हितैषी, जो हर कहीं न पिए हुए भी गिरता सरकार खड़ी रखने में जुटा है.
हे सरकार, आप से मेरी विनम्र रिक्वैस्ट है… हो सके तो मेरे जिगरी यार को किसी खास मौके पर सम्मानित जरूर करें. देशभक्तों की खालों वाले सियारों को तो मौके और बेमौके पर आप उन के देश के लिए किए झूठे त्याग को ले कर सम्मानित करते ही रहे हैं. ऐसा करने से सुरापानी कौम में आप के प्रति और इमोशन जगेंगे और वह अपना सबकुछ बेच कर आप का साथ देने के लिए बेचैन हो उठेगी. ऐसा सरकार का हमदर्द आप को अपनों के बीच भी चिराग ले कर शायद ही मिले.       

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