Hindi Romantic Story: दिल की दहलीज पर

Hindi Romantic Story: ‘‘आहा,चूड़े माशाअल्लाह, क्या जंच रही हो,’’ नवविवाहिता मधुरा की कलाइयों पर सजे चूड़े देख दफ्तर के सहकर्मी, दोस्त आह्लादित थे. मधुरा का चेहरा शर्म से सुर्ख पड़ रहा था. शादी के 15 दिनों में ही उस का रूप सौंदर्य और निखर गया था. गुलाबी रंगत वाले चेहरे पर बड़ीबड़ी कजरारी आंखें और लाल रंगे होंठ…

कुछ गहने अवश्य पहने थे मधुरा ने, लेकिन उस के सौंदर्य को किसी कृत्रिम आवरण की आवश्यकता न थी. नए प्यार का खुमार उस की खूबसूरती को चार चांद लगा चुका था.

‘‘और यार, कैसी चल रही है शादीशुदा जिंदगी कूल या हौट?’’ सहेलियां आंखें मटकामटका कर उसे छेड़ने लगीं. सच में मनचाहा जीवनसाथी पा मानों उसे दुनिया की सारी खुशियां मिल गई थीं. मातापिता के चयन और निर्णय से उस का जीवन खिल उठा था.

‘‘वैसे क्या बढि़या टाइम चुना तुम ने अपनी शादी का. क्रिसमस के समय वैसे भी काम कम रहता है… सभी जैसे त्योहार को पूरी तरह ऐंजौय करने के मूड में होते हैं,’’ सहेलियां बोलीं.

‘‘इसीलिए तो इतनी आसानी से छुट्टी मिल गई 15 दिनों की,’’ मधुरा की हंसी के साथसाथ सभी सहकर्मियों की हंसी के ठहाकों से सारा दफ्तर गुंजायमान हो उठा.

तभी बौस आ गए. उन्हें देख सभी चुप हो अपनीअपनी सीट पर चले गए.

‘‘बधाई हो, मधुरा. वैलकम बैक,’’ कहते हुए उन्होंने मधुरा का दफ्तर में पुन: स्वागत किया.

सभी अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए.

‘‘मधुरा, शादी की छुट्टी से पहले जो तुम ने टर्न की प्रोजैक्ट किया था कैरी ऐंड संस कंपनी के साथ, उस का क्लोजर करना शेष है. तुम्हें तो पता हैं हमारी कंपनी के नियम… जो रिसोर्स कार्य आरंभ करता है वही कार्य को पूरी तरह समाप्त कर वित्तीय विभाग से उस का पूर्ण भुगतान करवा कर, फाइल क्लोज करता है. लेकिन बीच में ही तुम्हारे छुट्टी पर जाने के कारण उन का भुगतान अटका हुआ है. उस काम को जल्दी पूरा कर देना,’’ कह कर बौस ने फोन काट दिया.

मधुरा ने फाइल एक बार फिर से देखी. भुगतान के सिवा और कार्य शेष न था. फाइल पूरी करने हेतु उसे कैरी ऐंड संस कंपनी के प्रबंधक जितेन से एक बार फिर मिलना होगा और फिर वह जितेन के विचारों में खो गई.

शाम को घर लौट कर रात के भोजन की तैयारी कर मधुरा अपने कमरे में हृदय के दफ्तर से लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी. समय काटने के लिए उस ने अपनी डायरी उठा ली. पुराने पन्ने पलटने लगी. पुराने पन्ने उसे स्वत: ही पुरानी यादों में ले गए…

29 जुलाई

आज इंप्लोई मीटिंग में बौस ने मेरे काम की तारीफ की. कितनी खुशी हुई, मेरे परिश्रम का परिणाम दिखने लगा है. नए क्लाइंट कैरी ऐंड संस कंपनी का प्रोजैक्ट भी मुझे मिल गया. इस प्रोजैक्ट को मैं निर्धारित समयसीमा में पूरा कर अपने परफौर्मैंस अप्रेजल में पूरे अंक लाऊंगी.

30 जुलाई

क्या बढि़या दफ्तर है कैरी ऐंड संस कंपनी का. मुझे आज तक अपना दफ्तर कितना एवन लगता था, लेकिन आज उन का दफ्तर देख कर मेरे होश फाख्ता हो गए. इंटीरियर डिजाइनर का काम लाजवाब है. इतने बढि़या दफ्तर में अकसर आनाजाना लगा रहेगा. मजा आ जाएगा.

31 जुलाई

सारे विभाग बहुत अच्छी तरह नियंत्रित हैं और आपस में अच्छा समन्वय स्थापित है. कैरी ऐंड संस कंपनी का आईटी विभाग प्रशंसा के काबिल है. आज अपने काम की शुरुआत की मैं ने. लोगों से मिल ली. किंतु जिन के साथ मिल कर काम करना है यानी जितेन, उन से मिलना रह गया. कल उन से भी मिल लूंगी.

1 अगस्त

मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसे हीरो जैसा बंदा दफ्तर में टकराएगा मुझ से.

उफ, कितना खूबसूरत नौजवान है जितेन. लंबाचौड़ा, सुंदर… लगता है सीधे ‘मिल्स ऐंड बून्स’ के उपन्यासों से बाहर आया है… मेरे सपनों का राजकुमार.

6 अगस्त

आज पूरे हफ्ते भर बाद फिर से जितेन से मुलाकात हुई. वे इतना व्यस्त रहते हैं कि मुलाकात ही नहीं हो पाती. इतने ऊंचे पद पर हैं… अभी तक ठीक से बात भी नहीं हो पाई है. पता नहीं कब हम दोनों को बातचीत करने का मौका मिलेगा. अभी तो मैं जितेन को अपने कार्य के बारे में भी ढंग से नहीं बता पाई हूं.

16 अगस्त

जितना देखती हूं उतना ही दीवानी होती जा रही हूं मैं जितेन की. एक बार मेरी ओर देख भर ले वह… मेरी सांस गले में ही अटक जाती है. लगता है जो बोल रही हूं, जो काम कर रही हूं, सब भूल जाऊंगी. इतना स्वप्निल मैं ने स्वयं को कभी नहीं पाया पहले. यह क्या हो जाता है मुझे जितेन के समक्ष. लेकिन वह है कि मुझे समय

ही नहीं देता. बस 4-5 मिनट कुछ काम के बारे में पूछ कर चला जाता है. कब समझेगा वह मेरे दिल का हाल? क्या मेरी आंखों में कुछ नहीं दिखता उसे?

3 सितंबर

आज घर लौटते समय एफएम, पर ‘सत्ते पे सत्ता’ मूवी का गाना सुना, ‘प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया. कि दिल करे हाय, कोई तो बताए क्या होगा… गाड़ी चलाते समय पूरा गला खोल कर गाना गाने का मजा ही कुछ और है…’ फिर आज तो गाना भी मेरे दिल का हाल बयां कर रहा था. न जाने जितेन के साथ पल दो पल कब मिलेंगे और मैं अपने दिल का हाल कब कह पाऊंगी.

हृदय के कमरे में आने की आहट से मधुरा अतीत की स्मृतियों से वर्तमान में लौट आई.

‘‘कैसा रहा दफ्तर में शादी के बाद पहला दिन?’’ हृदय ने पूछा.

मधुरा को हृदय की यह बात भी बहुत भाती थी कि वह उस की हर गतिविधि, हर भावना, हर बात का खयाल रखता है. दोनों ने बातचीत की, खाना खाया और अगली सुबह के लिए अलार्म लगा कर सो गए.

अगले दिन मधुरा अपने क्लाइंट कैरी ऐंड संस कंपनी पहुंची. आज उस ने फाइल क्लोजर की पूरी तैयारी कर ली थी. फाइनल पेमैंट का चैक देने वह जितेन के कक्ष में पहुंची. उस के हाथों में चूड़े देख जितेन ने उसे बधाई दी, ‘‘मुझे आप की कंपनी से पता चला था कि आप अपनी शादी हेतु छुट्टियों पर गई हैं.’’

कार्य पूरा करने के बाद मधुरा ने अपने दफ्तर लौटने के लिए कैब बुला ली. सारे रास्ते उस के मनमस्तिष्क में जितेन घूमता रहा. किस औपचारिकता से बात कर रहा था आज… उसे याद हो आया वह समय जब जितेन और मधुरा की मित्रता भी हो गई थी और वह ‘सिर्फ अच्छे दोस्त’ की श्रेणी से कुछ आगे भी बढ़ चुके थे.

मधुरा तब कैरी ऐंड संस कंपनी जाने के बहाने खोजती रहती. जितेन भी हर शाम उसे उस के दफ्तर से पिक करता और दोनों कहीं कौफी पीते समय व्यतीत करते. दोनों को ही एकदूसरे का साथ बेहद भाता था. मधुरा के चेहरे की चमक बढ़ती रहती और जितेन कुछ गंभीर स्वभाव का होने के बावजूद उसे देख मुसकराता रहता. जितेन आए दिन मधुरा को तोहफे देता रहता. कभी ‘शैनेल’ का परफ्यूम तो कभी ‘हाई डिजाइन’ का हैंडबैग.

‘‘जितेन, क्यों इतने महंगे तोहफे लाते हो मेरे लिए? मैं हर बार घर और दफ्तर में झूठ बोल कर इन की कीमत नहीं छिपा सकती.’’

‘‘तो सच बता दिया करो न… मैं ने कब रोका है तुम्हें?’’

‘‘तुम तो जानते हो कि हमारी कंपनी में भरती के समय हर मुलाजिम से कौंफिडैंशियलिटी ऐग्रीमैंट भरवाया जाता है. चूंकि तुम एक क्लाइंट हो, मैं तुम्हें न तो डेट कर सकती हूं और न ही तुम से शादी. इतना ही नहीं मैं तुम्हारी कंपनी अगले 2 वर्षों तक भी जौइन नहीं कर सकती हूं… तुम से शादी के बाद मैं नौकरी से त्यागपत्र दे कहीं और नौकरी ढूंढ़ूंगी…’’

‘‘शादी के बाद? हैंग औन,’’ मधुरा की बात को बीच में ही काटते हुए जितेन ने कहा, ‘‘शादी तक कहां पहुंच गईं तुम? हम एक कपल हैं, बस, मैं अभी शादीवादी के बारे में सोच भी नहीं सकता… वैसे भी शादी तो मां अपने सर्कल की किसी लड़की से करवाना चाहेंगी… तुम समझ रही हो न?’’

मधुरा के माथे पर चिंता की लकीरें और चेहरे पर असमंजस के भाव पढ़ कर जितेन ने आगे कहा, ‘‘तुम इस समय का लुत्फ उठाओ न… ये महंगे तोहफे, ये बढि़या रेस्तरां, अथाह शौंपिंग… ये सब तुम्हें खुश करने के लिए ही तो हैं… कूल?’’

उस शाम मधुरा को पता चला कि सामाजिक स्तर का भेदभाव केवल कहानियों में नहीं, अपितु वास्तविक जीवन में भी है. उस ने सोचा न था कि उसे भी इस भेदभाव का सामना करना पड़ेगा. उस के बाद जब कभी जितेन टकराया, बस एक फीकी सी मुसकान मधुरा के पाले में आई. खैर, उस का भी मन नहीं हुआ कि जितेन से बात करे. उस का मन खट्टा हो चुका था.

फिर उस की मम्मी ने उसे रमा आंटी के बेटे से मिलवाया. अच्छा लगा था मधुरा को वह. खास कर उस का नाम-हृदय. शांत, सुशील और विनम्र. घरपरिवार तो देखाभाला था ही, रहता भी इसी शहर में था. चलो, ‘मिल्स ऐंड बून्स’ के हीरो को भी देख लिया और अब वास्तविकता के नायक को भी. पर क्या करें. जीवन तो वास्तविक है. इस में सपनों से अधिक वास्तविकता का पलड़ा भारी रहना स्वाभाविक है.

जब से मधुरा की मुलाकात हृदय से हुई थी तभी से कितने अच्छे और मिठास भरे मैसेज भेजने लगा था वह. हृदय ने उस का मन पिघला दिया था. जल्दी ही हामी भर दी उस ने इस रिश्ते के लिए. उस की मम्मी और आंटी कितनी खुश हुईं. उस का मन भी खुश था. मन की तहों ने जहां एक तरफ जितेन को छाना था वहीं दूसरी तरफ हृदय को भी टटोल कर देखा था. मधुरा जैसी रुचिर, लुभावनी और मेधावी लड़की आगे बढ़ चुकी थी.

हर अनुभव जीवन में कुछ सबक लाता है और कुछ यादें छोड़ जाता है. चलते रहने का नाम ही जीवन है. मधुरा अपने दफ्तर पहुंच चुकी थी. आज वह अपने परफौर्मैंस अप्रेजल में अपने पूरे किए प्रोजैक्ट को भरने वाली थी. Hindi Romantic Story

Romantic Story: दीमक – अविनाश के प्यार में क्या दीपंकर को भूल गई नम्रता?

Romantic Story: ऐंटीटर्माइटका छिड़काव हो रहा था. उस की अजीब सी दुर्गंध सांसों में घुली जा रही थी. एक बेचैनी और उदासी उस फैलते धुएंनुमा स्प्रे के कारण उस के भीतर समा रही थी. उफ, यह नन्ही सी दीमक किस तरह जीवन की गति में अवरोध पैदा कर देती है. हर चीज अस्तव्यस्त…कमरे, रसोई, हर अलमारी और पलंगों को खाली करना पड़ा है…खूबसूरत कैबिनटों पर रखे शोपीस, किताबें सब कुछ इधरउधर बिखरा पड़ा है.

हर 2-3 महीने में यह छिड़काव कराना जरूरी होता है. जब दिल्ली से फरीदाबाद आए थे तो किसे पता था कि इस तरह की परेशानी उस की जिंदगी की संगति को ही बिगाड़ कर रख देगी. अगर अपना मकान बनाना एक बहुत बड़ी सिरदर्दी और टैंशन का काम लगता है तो बनाबनाया मकान लेने की चाह भी चैन छीनने में कोई कसर नहीं छोड़ती है. जबउस में आ कर रहो तभी छूटी हुई खामियां जैसे छिपी दरारें, दरकती दीवारें आदि 1-1 कर सामने आने लगती हैं. पर इस जमाने में दिल्ली में 600 गज की कोठी खरीदना किसी बहुत बड़े सपने से कम नहीं है और आसपास एनसीआर इतने भर चुके हैं कि वहां भी कीमत आसमान रही है. ऐसे में फरीदाबाद का विकल्प ही उन के पास बचा था जहां बजट में कोठी मिल गई थी. तब तो यही सोचा था कि फरीदाबाद कौन सा दूर है, इसलिए यह कोठी खरीद ली थी.

हालांकि वह दिल्ली छोड़ कर आना नहीं चाहती थी, पर उस के पति दीपंकर की जिद थी कि उन्हें स्टेटस को मैंटेन करने के लिए कोठी में रहना ही चाहिए. आखिर क्या कमी है उन्हें. पैसा, पावर और स्टेटस सब है उस का सोसायटी में. फिर जब कारें घर के बाहर खड़ी हैं तो दिल्ली कौन सी दूर है. रोजरोज दिल्ली आनेजाने के झंझट के बारे में सोच उस के माथे पर शिकन उभर आई थी, पर बहस करने का कोई औचित्य नहीं था.

‘‘मैडम, हम ने स्प्रे कर दिया है, पर 3 महीने बाद आप को फिर करवाना होगा. दीमक जब एक बार फैल जाती है, तो बहुत आसानी से पीछा नहीं छोड़ती है जब तक कि पूरी तरह अंदर तक फैली उस की सुरंगें नष्ट न हो जाएं. दीमक लकड़ी में एक के बाद एक सुरंग बनाती जाती है. बाहर से पता नहीं चलता कि लकड़ी को कोई नुकसान पहुंच रहा है, पर उसे वह अंदर से बिलकुल खोखला कर देती है. अच्छा होगा कि आप साल भर का कौंट्रैक्ट हमारी कंपनी के साथ कर लें. फिर हम खुद ही आ कर स्प्रे कर जाया करेंगे. आप को बुलाने का झंझट नहीं रहेगा,’’ स्मार्ट ऐग्जीक्यूटिव, अपनी कंपनी का बिजनैस बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था.

यहीं आने पर पता चला था फरीदाबाद में मेहंदी की खेती होती है, इसलिए दीमक बहुत जल्दी जगहजगह लग जाती है. स्प्रे की गंध उसे अभी भी अकुला रही थी. लग रहा था जैसे उलटी आ जाएगी. भीनीभीनी मेहंदी की सुगंध कितनी भाती है, पर जब उस की वजह से दीमक फैलने लगे, तो उस की खुशबू ही क्या, उस का रंग भी आंखों को चुभने लगता है. एक नन्ही सी दीमक किस तरह से घर को खोखला कर देती है. ठीक वैसे जैसे छोटीछोटी बातें रिश्ते की मजबूत दीवारों को गिराने लगती हैं. वे इतनी खोखली हो जाती हैं कि उस शून्यता और रिक्तता को भरने के लिए पूरी जिंदगी भी कम लगने लगती है.

‘‘ठीक है, आप कौंट्रैक्ट तैयार कर लें. पेपर तैयार कर कल आ जाएं. मैं इस समय बिजी हूं,’’ वह किसी भी तरह से उसे वहां से टालने के मूड में थी.

हर तरफ सामान बिखरा हुआ था और उसे शाम को अवनीश से मिलने जाना था. मेड को हिदायतें दे कर वह थोड़ी देर बाद ही सजधज कर बाहर निकल गई. अवनीश से मिलने जाना है तो ड्राइवर को नहीं ले जा सकती, इसलिए खुद ही दिल्ली तक ड्राइव करना पड़ा. जब से अवनीश उस की जिंदगी में आया था, उस की दुनिया रंगीन हो गई थी. शादी को 2 साल हो गए हैं, पर दीपंकर से उस की कभी नहीं बनी. रोमांस और रोमांच तो जैसे क्या होता है, उसे पता तक नहीं है. वह तो शुरू से ही बिंदास किस्म की रही है. घूमनाफिरना, पार्टियां अटैंड कर मौजमस्ती करना उस की फितरत है. दीपंकर के पास तो कभी उस के लिए टाइम होता ही नहीं है, बस पैसा कमाने और अपने बिजनैस टूअर में बिजी रहता है. हमेशा एक गंभीरता सी उस के चेहरे पर बनी रहती है.

दूसरी तरफ अवनीश है. स्मार्ट, हैंडसम और उसी की तरह मौजमस्ती करना पसंद करने वाला. हमेशा हंसता रहता है. उस की हर बात पर ध्यान देता है जैसे उसे कौन सा कलर सूट करता है, उस का हेयरस्टाइल आज कैसा है या कब उस ने कौन से शेड की लिपस्टिक लगाई थी. यहां तक कि उसे यह भी पता है कि वह कौन सा परफ्यूम पसंद करती है. दीपंकर को तो यह भी पता नहीं चलता कि कब उस ने नई ड्रैस खरीदी है या कौन सी साड़ी में वह ज्यादा खूबसूरत लगती है. हां, पैसे देने में कभी कटौती नहीं करता न ही पूछता कि कहां खर्च  कर रही हो?

‘‘हाय मेरी जान, बला की खूबसूरत लग रही हो…कितनी देर लगा दी. तुम्हारा इंतजार करतेकरते सूख गया मैं,’’ अवनीश की इसी अदा पर तो मरती है वह.

‘‘ट्रैफिक प्रौब्लम… ऐनी वे बताओ आज का क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘शाम ढलने को है, प्रोग्राम क्या होना चाहिए, तुम ही सोचो,’’ अवनीश ने उसे आंख मारते हुए कहा तो वह शरमा गई.

अवनीश अकेला था और कुंआरा भी. अपने दोस्त के साथ एक कमरा शेयर कर के रहता था. दोनों के बीच आपस में पहले से ही तय था कि जब वह नम्रता को वहां ले जाएगा तो वह देर आएगा. अवनीश की बांहों से जब नम्रता मुक्त हुई तो बहुत खुश थी और अवनीश तो जैसे हमेशा उसे पा लेने को आतुर रहता था.

‘‘तुम ने मुझे दीवाना बना दिया है नम्रता. अच्छा आजकल सेल चल रही है, क्या खयाल है तुम्हारा कल कुछ शौपिंग करें?’’

‘‘मेरे होते हुए तुम्हें सेल में खरीदारी करने की क्या जरूरत?’’ कह नम्रता निकल गई और अवनीश उस के लाए हुए परफ्यूम को लगाने लगा.

‘‘सही मुरगी हाथ लगी है तेरे. बहुत ऐश कर रहा है,’’ अवनीश के दोस्त ने परफ्यूम से महकते कमरे में घुसते हुए कहा.

‘‘तू क्यों जल रहा है? फायदा तो तेरा भी होता है. मेरी सारी चीजों का तू भी तो इस्तेमाल करता है?’’ अवनीश बेशर्मी से मुसकराया.

अगले दिन नम्रता ने अवनीश के लिए ढेर सारी शौपिंग की. कुछ और भी

खरीदना है, कह कर उस ने नम्रता से उस का कै्रडिट कार्ड ले लिया. वह जानता था कि नम्रता अपने पति को पसंद नहीं करती है, इसलिए उस की भावनाओं का खूब फायदा उठा रहा था.

पति से नाखुश होने के कारण उस के अंदर संवेदनशीलता की कमी बनी रहती थी, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि अवनीश से उस का साथ छूटे. उसे डर लगा रहता था कि कहीं वह शादी न कर ले. कभीकभी भावुक हो वह उस के सामने रो भी पड़ती थी.

3 महीने बाद जब फिर से ऐंटीटर्माइट स्प्रे करने कंपनी के लोग आए, तो उन्होंने कहा लकड़ी को गीला होने से बचाना चाहिए. उसे पता चला कि  दीमक नमी वाले स्थानों में अधिक पाई जाती है. जहां कहीं भी गली हुई लकड़ी मिलती है, वह तुरंत वहां अपनी पैठ बना लेती है. उस ने तो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया था कि अवनीश धीरेधीरे उस के जीवन में पैठ बना कर उसे खोखला बनाता जा रहा है.

‘‘तुम्हारे पति की बहुत पहुंच है, उन से कह कर मेरे बौस का यह काम करवा दो न,’’ अवनीश ने एक दिन नम्रता के गालों को चूमते हुए कहा तो वह बोली, ‘‘तुम ने कह दिया, समझो हो गया. दीपंकर मेरी कोई बात नहीं टालते हैं. अच्छा चलो आज लंच किसी बढि़या होटल में करते हैं.’’

नम्रता सोचती थी कि अवनीश की वजह से उस की जिंदगी में बहार है…तितली की तरह उस के चारों ओर मंडराती रहती. उस के मुंह से अपनी प्रशंसा सुन बादलों में उड़ती रहती. दूसरी ओर अवनीश की मौज थी. उस का शरीर, पैसा और हर तरह की ऐश की मौज लूट रहा था.

जब नम्रता ने बताया के दीपंकर बिजनैस ट्रिप पर हफ्ते भर के लिए सिंगापुर जा रहा है, तो उस ने भी नम्रता से किसी हिल स्टेशन पर जाने के लिए प्लेन का टिकट बुक कराने के लिए कहा. दोनों ने वहां बहुत ऐंजौय किया, पर पहली बार उसे अवनीश का खुले हाथों से पैसे खर्चना अखरा.

वह समझ ही नहीं पा रही थी कि अवनीश नामक दीमक उस के और दीपंकर के रिश्ते के बीच आ उसे भुरभुरा कर रहा है. उसे क्या पता था कि दीमक अपना घर बनाने के लिए लकड़ी को खोखला नहीं करती है, बल्कि लकड़ी को ही चट कर जाती है और इसीलिए उस के लग जाने का पता नहीं चलता, क्योंकि वह अपने पीछे किसी तरह का बुरादा तक नहीं छोड़ती है. जब तक लकड़ी का वजूद पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाता, दीमक लगने का एहसास तक नहीं हो पाता है. आसानी से उस का पता नहीं लगाया जा सकता, इसलिए उस से छुटकारा पाना भी कभीकभी असंभव हो जाता है. यहां तक कि उसे हटाने के लिए जो छिड़काव किया जाता है, वह उसे भी अपने में समा लेती और अधिक जहरीली हो जाती है.

कुछ दिनों से वह महसूस कर रही थी कि अवनीश की मांगें निरंतर बढ़ती जा रही हैं. जबतब उस का क्रैडिट कार्ड मांग लेता. दीपंकर उस से कहता नहीं है, पर कभीकभी लगता कि मेहनत से कमाए उस के पैसे वह अवनीश पर लुटा कर अच्छा नहीं कर रही है. दीपंकर की सौम्यता और उस पर अटूट विश्वास उसे अपराधबोध से भरने लगा था. माना अवनीश बहुत रोमांटिक है, पर दीपंकर ने कभी यह एहसास तो नहीं कराया कि वह उस से प्यार नहीं करता है. उस का केयर करना क्या प्यार नहीं है और अवनीश है कि बस जब भी मिलता है किसी न किसी तरह से पैसे खर्चवाने की बात करता है. क्या यह प्यार होता है? नहीं अवनीश उसे प्यार नहीं करता है. उस ने कहीं पढ़ा था कि दीमक घास के ऊपर या नमी वाली जमीन पर एक पहाड़ी सी भी बना लेती है जो दूर से देखने में बहुत सुंदर लगती है और एहसास तक नहीं होता कि उसे छूने भर से हाथों में एक अजीब सी सिहरन तक दौड़ सकती है.

पास जा कर देखो तब पता लगता है कि असंख्य दीमक उस के अंदर रेंग रही है और तब एक लिजलिजा सा एहसास मन को घेर लेता है. उसे समझ नहीं आ रहा था कि उस के मन और शरीर पर हावी होती जा रही अवनीशरूपी दीमक पर वह किस स्प्रे का छिड़काव करे… दीपंकर को धोखा देने के कारण मन लकड़ी के बुरादे सा भुरभुरा और खोखला होता जा रहा है…क्षणक्षण कुछ दरक जाता है…न जाने मन के कपाट इस सूरत में कितने समय तक बंद रह सकते हैं. डरती है वह कहीं कपाट खुल गए तो संबंधों की कड़ी ही न ढीली पड़ जाए. जब मजबूती न रहे तो टूटने में बहुत देर नहीं लगती किसी भी चीज को…फिर यह तो रिश्ता है. नम्रता को एहसास हुआ कि अपने पति की कमियों और रिश्ते से नाखुश होने के कारण उस के भीतर से जो संवेदनाओें का बहाव हो रहा है, उस की नमी में दीमक ने अपना घर बना लिया है. अवनीश के सामने उस ने दिल के दरवाजे खोल दिए हैं उस ने भी तो…उस की आंसुओं की आर्द्रता से मिलती नमी में पनपने और जगह बनाने का मौका मिल रहा है उसे.

अचानक उसे महसूस हुआ कि दीमक उस के घर में ही नहीं, उस की जिंदगी में भी लगी हुई है. धीरेधीरे वह किस तरह बिखर रही है…बाहर से सब सुंदर और अच्छा लगता है, पर अंदर ढेरों सुरंगें बनती जा रही हैं, जिन्हें बनने से अभी न रोका गया तो बाहर आना मुश्किल हो जाएगा. दीमक उस के जीवन को किसी बुरादे में बदल दे, उस से पहले ही हर जगह छिड़काव कराना होगा.‘‘दीमक कुछ ज्यादा ही फैल रही है, आप तुरंत किसी को भेजें. मुझे इसे पूरी तरह से हटाना है,’’ नम्रता नेघर में स्प्रे करवाने के लिए कंपनी में समय से पहले ही फोन कर उन्हें आने को कहा. ‘‘पर मैडम, अभी तो स्प्रे किए 2 ही महीने हुए हैं, 3 महीने बाद इसे करना होता है.’’

‘‘आप ऐक्स्ट्रा पैसे ले लेना. दीमक और फैल गई, तो सब बिखर जाएगा. आज ही भेज दो आदमी को, दीमक फैल रही है,’’ फोन तो कब का कट चुका था, पर वह लगातार बुदबुदा रही थी, ‘‘दीमक को फैलने से रोकना ही होगा.’’ उस के मोबाइल पर अवनीश का फोन आने लगा था. यह पहली बार हुआ था जब उस ने दूसरी घंटी भी बजाने दी थी. फिर तो रिंग होती ही रही. मोबाइल हाथ में ही था. जब उसे अहसास हुआ तो 10 मिनट बीत चुके थे. अवनीश की 5 मिस्ड काल्स थीं. उस ने मोबाइल साइलैंट मोड पर कर दिया और कपड़ों की अलमारी से कपड़े निकालने लगी, जो कपड़े अवनीश के साथ खरीदे थे उन में तो बुरी तरह दीमक लग चुकी थी. उन्हें बाहर ले जा कर जला डालना ही ठीक होगा.

Romantic Story: रुक जाओ शबनम

Romantic Story: आज शबनम अब तक अस्पताल नहीं आई थी. 2 बजने को आए वरना वह तो रोज 10 बजे ही अस्पताल पहुंच जाती थी. कभी भी छुट्टी नहीं करती. मैं उस के लिए चिंतातुर हो उठा था.

इन दिनों जब से कोरोना का संकट गहराया है वह मेरे साथ जीजान से मरीजों की सेवा में जुटी हुई थी. मैं डॉक्टर हूं और वह नर्स. मगर उसे मेडिकल फील्ड की इतनी जानकारी हो चुकी है कि कभी मैं न रहूं तो भी वह मेरे मरीजों को अच्छी तरह और आसानी से संभाल लेती है.

मैं आज अपने मरीजों को अकेले ही संभाल रहा था. अस्पताल की एक दूसरी नर्स स्नेहा मेरी हैल्प करने आई तो मैं ने उसी से पूछ लिया,” क्या हुआ शबनम आज आई नहीं. ठीक तो है वह ?”

“हां ठीक है. मगर कल शाम घर जाते वक्त कह रही थी कि उसे आसपड़ोस के कुछ लोग काफी परेशान करने लगे हैं. वह मुस्लिम है न. अभी जमात वाले केसेज जब से बढ़े हैं सोसाइटी के कट्टरपंथी लोग उसे ही कसूरवार मारने लगे हैं. उसे सोसाइटी से निकालने की मांग कर रहे हैं और गद्दार कह कर नफरत से देखते हैं. बेचारी अकेली रहती है. इसलिए ये लोग उसे और भी ज्यादा परेशान करते हैं. मुझे लगता है इसी वजह से नहीं आई होगी.”

“कैसी दुनिया है यह? धर्म या जाति के आधार पर किसी को जज करना कितना गलत है. कोई नर्स रातदिन लोगों की केयर करने में लगी हुई है. उस पर इतना गंदा इल्जाम….?” मेरे अंदर गुस्से का लावा फूट पड़ा.

स्नेहा भी शबनम को ले कर परेशान थी, “आप सही कह रहे हैं सर. शबनम ने तो अपनी जिंदगी मरीजों की देखभाल में लगा रखी है. उस ने तो यह कभी नहीं देखा कि उस के सामने हिंदू मरीज है या मुस्लिम. फिर लोग उस का धर्म क्यों देख रहे हैं? देश को विभाजित करने वाले कट्टरपंथी ही ऐसी गलत सोच को हवा देते हैं.”

तभी मेरा मोबाइल बज उठा. शबनम का फोन था,” हैलो शबनम, ठीक तो हो तुम?” मैं ने चिंतित स्वर में पूछा.

“नहीं सर मैं ठीक नहीं. सोसाइटी के कुछ लोगों ने मेरे निकलने पर रोक लगा दी है. एक तरह से नजरबंद कर के रखा है मुझे. उस पर अभी दोपहर में मैं बाथरूम में गिर गई. अब तो समझ नहीं आ रहा कि दवा लेने भी कैसे जाऊं?”

“तुम घबराओ नहीं. एकदो घंटे आराम करो. मैं खुद तुम्हारे लिए बैंडेज और दवाइयों का इंतजाम करता हूं.” कह कर मैंने फोन रख दिया.

अब मुझे शबनम के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी थी. उस ने आज तक हमेशा मेरा साथ दिया है. मानवता के नाते अब मेरा धर्म है कि मैं उस का साथ दूं.

5 बजे के बाद मरीजों को निबटा कर मैं फर्स्ट ऐड बॉक्स, जरूरी दवाओं और फल सब्जियों के साथ उस के घर पहुंचा. उस की सोसाइटी के बाहर पुलिस खड़ी थी. मेरे डाक्टर होने के बावजूद काफी पूछताछ और स्क्रीनिंग के बाद अंदर जाने दिया गया. शबनम का घर दूसरे माले पर था. मैं ने उस के दरवाजे की घंटी बजाई तो लंगड़ाती हुई वह बाहर निकली और दरवाजा खोला. मुझे देख कर उस के चेहरे पर सुकून भरी मुस्कुराहट की लकीरें खिंच गई.

“डॉक्टर अविनाश आप खुद आ गए ?”

हां शबनम दिखाओ कहां चोट लगी है तुम्हें? ठीक से बैंडेज कर दूं. ”

“जी बैंडेज का सामान मेरे पास था. पट्टी तो बांध ली है मैं ने.”

“ठीक है फिर भी ये कुछ जरूरी दवाइयां अपने पास रखो और फलसब्जियां भी.”

“थैंक यू वेरी मच सर .” शबनम की आंखों में कृतज्ञता के आंसू आ गए तो मैं ने उस के कंधे थपथपाए और बाहर निकलता हुआ बोला,” देखो शबनम, कभी भी किसी भी चीज की जरूरत हो तो मुझे जरूर बताना. वैसे मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हें इस सोसाइटी से ले कर जाऊं. अस्पताल के पास जो मेरा दो कमरे वाला घर है न वहीं तुम्हें ठहरा दूंगा. आजकल मैं भी वहीं रहने लगा हूं क्योंकि अस्पताल पास में और फिर मेरे कारण मेरे परिवार में कोरोनावायरस न फैल जाए यह डर भी रहता है.”

“जी सर जैसा आप उचित समझें” कह कर शबनम ने मुझे विदा किया.

इस के बाद दोतीन बार खानेपीने की और दूसरी चीजें ले कर मैं उस के घर गया.

सोसाइटी वाले मुझे घूरघूर कर देखते थे. एक दिन तो हद ही हो गई जब सोसाइटी वालों के कहने पर एक ऊंची जाति के पुलिस एस आई नीरज शर्मा ने मुझ पर दोतीन डंडे बरसा दिए. मैं चीख पड़ा,” एक डॉक्टर के साथ इस तरह का सुलूक किया जाता है?”

” तुम डॉक्टर हो तो फिर तुम उस मुस्लिम लड़की के घर क्यों आते हो? दोनों मिले हुए हो न? तेरी यार है न वह ? क्या करने वाले हो मिलकर ?”

सर मैं डॉक्टर हूं और वह मेरे साथ काम करने वाली नर्स. इतना ही रिश्ता है हमारा. ऊंची और नीची जाति, हिंदू और मुस्लिम जैसे भेदभाव मैं नहीं मानता.” चिल्लाता हुआ मैं घर आ गया था मगर शबनम को ले कर चिंता बढ़ गई थी.

उस दिन मैं ने तय किया कि अब मैं शबनम को अपने घर ले आऊंगा. अगले दिन सुबहसुबह मैं उसे अपने घर ले आया.

अब शबनम मेरे घर में थी और अस्पताल भी करीब था. इसलिए वह जिद कर के अस्पताल जाने लगी. उसे लंगड़ाते हुए, तकलीफ सहते हुए भी मरीजों के लिए दौड़भाग करते देख मेरे मन में उस की इज्जत बढ़ती जा रही थी.

वह घर में भी मेरे लिए पौष्टिक खाना बनाती. दरअसल मेरे घरवाले मेरे साथ नहीं थे. स्वभाविक था कि मुझे खानेपीने की दिक्कत हो रही थी. ऐसे में मैं अस्पताल के कैंटीन में खा कर गुजारा करता था. मगर जब से शबनम मेरे घर आई उस ने मेरे मना करने के बावजूद किचन की कमान संभाल ली.
अपने पैर की तकलीफ के बावजूद मुझे मेरी पसंद की चीजें बना कर खिलाती. मुझे यह एहसास ही नहीं होने देती कि मैं घर वालों से दूर हूं.

अस्पताल में तो वह मेरी सहायिका थी ही घर में भी मेरी हर जरूरत का ध्यान रखती. हम दोनों बिना कहे ही एक अनजान से बंधन में बनते जा रहे थे. उस का कष्ट मैं महसूस करता था और मेरी तकलीफों का बोझ वह उठाने को तैयार थी. हमारा धर्म अलग था. जाति भी अलग थी. मगर मन एक था. हम एकदूसरे को खुद से बेहतर समझने लगे थे.

इधर आसपड़ोस में हम दोनों को ले कर सुगबुगाहट होने लगी थी. जल्द ही सब को पता लग गया कि शबनम दूसरे धर्म की है. लोगों के दिमाग में यह बात कुलबुलाने लगी कि वह मेरे घर में मेरे साथ क्यों रह रही है? उस के साथ मेरा रिश्ता क्या है?

शबनम की सोसाइटी वालों ने भी मेरे कुछ पड़ोसियों को भड़काने का काम किया. अभी तक सामने आ कर किसी ने मुझे कुछ कहा नहीं था मगर उन की आंखों में सवाल दिखने लगे थे.

फिर एक दिन मैं घर लौटा तो मुझे अपनी तबीयत खराब लगने लगी. गले में खराश के साथ सर दर्द हो रहा था. मैं ने खुद को क्वैरांटाइन कर लिया. मैं ने शबनम से भी चले जाने को को कहा मगर वह कहने लगी कि तबियत खराब में ऐसे छोड़ कर नहीं जा सकती. तब मैं ने उसे अपने कमरे में आने के लिए सख्ती से मना कर दिया. वह दूर से ही मेरा ख्याल रखती रही.

एक दिन दो पड़ोसी मेरे घर आए और शबनम को ले कर पूछताछ करने लगे. मैं ने सब सच बताया. अगले दिन सुबह उठा तो देखा घर के बाहर काफी हलचल है. इधर मेरी तबीयत खराब थी उधर मेरे घर के आगे कट्टरपंथी इकटठे हो कर नारे लगा रहे थे. मुझे गद्दार कहा जा रहा था. शबनम के साथ मेरा नाम ले कर सोसाइटी से निकाले जाने की मांग की जा रही थी.

मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था. काफी देर तक होहल्ला होता रहा. तब तक शबनम अपने कपड़े पैक करने लगी.

वह हड़बड़ाती हुई बोली,” सर अब मैं यहां बिल्कुल नहीं रह सकती. मेरी वजह से आप को भी परेशानी सहनी पड़ रही है. मैं तो कहती हूं आप भी चलिए. आप को अस्पताल में एडमिट हो जाना चाहिए. तबीयत ठीक नहीं है आप की. कहिए तो आप के घर वालों को बुला देती हूं.”

“नहीं नहीं. तुम घर वालों से कुछ मत कहो. वे परेशान होंगे. तुम जाओ. मैं सब संभाल लूंगा.”

“मैं पहले भी कह चुकी हूं. आप को ऐसे अकेले छोड़ कर नहीं जा सकती. वैसे भी ये लोग यहां आप का जीना मुहाल कर देंगे. आप की तबीयत भी ज्यादा खराब हो रही है. मैं डॉक्टर अतुल को फोन कर देती हूं. वे हमें यहां से ले जाएंगे.”

“ओके. जैसा सही समझो.” मैं ने कहा.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. सोसायटी का अध्यक्ष सामने खड़ा था,” मिस्टर अविनाश, हम सबों का फैसला है कि अब आप इस सोसाइटी में नहीं रह सकते.”

“ठीक है. मैं जा रहा हूं. ” लड़खड़ाती आवाज में मैं ने कहा.

शबनम ने जल्दीजल्दी सब इंतजाम किया. किसी तरह हम अस्पताल पहुंच गए और कोरोना के संदेह की वजह से मुझे एडमिट कर दिया गया. टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आई. मेरी तबियत तेजी से खराब होने लगी. मगर शबनम ने न तो मेरा साथ छोड़ा और न आस. वह लगातार मेरा ख्याल रखती रही. मेरे अंदर सकारात्मक उर्जा भरती रही.

लंबे इलाज के बाद धीरेधीरे मैं ठीक हो गया. इस के बाद भी 14 दिन तक मुझे अस्पताल में ही रखा गया. इस दौरान शबनम के लिए एक लगाव मेरे मन में पैदा हो गया था. उसे पूरे समर्पण भाव के साथ मरीजों की और अपनी देखभाल करता देखता तो लगता जैसे इस से बेहतर लड़की मुझे कहीं मिल नहीं सकती.

एक दिन शबनम मुझे दुखी सी नजर आई. मैं ने टोका तो उस ने बताया,” मैं बस आप के ठीक होने का इंतजार कर रही थी. डॉक्टर अब मैं इस इलाके में और नहीं रहना चाहती. बहुत दुत्कारा है लोगों ने मुझे. आप के साथ मेरा नाम जोड़ कर आप को भी बदनाम किया गया. मेरी कोई गलती नहीं थी मगर मेरे पेशे को भी इज्जत नहीं दी गई. मेरा मन भर गया है. मैं तो बस आप की खातिर ही यहां अब तक रुकी रही. अब मुझे जाने की अनुमति दें. मैं अस्पताल छोड़ कर जाना चाहती हूं.”

शबनम की भीगी आंखों के पीछे मेरे लिए छुपा प्यार मैं साफ देख रहा था. मैं ने उसे रोका,”रुक जाओ शबनम. तुम कहीं नहीं जाओगी. जो नाम उन्होंने बदनाम करने के लिए जोड़ा उसे मैं हकीकत में जोड़ना चाहता हूं.”

शबनम ने अचरज से मेरी तरफ देखा. मैं ने मुस्कुराते हुए कहा, क्यों न इसी अस्पताल में हम आज शादी कर लें? देर करने की जरूरत क्या है?”

शबनम ने शरमा कर निगाहें झुका लीं. उस;का जवाब मुझे मिल गया था. अस्पताल में मौजूद दूसरे डॉक्टरों और नर्सों ने झटपट एक बहुत ही सादगी भरी शादी का इंतजाम कर दिया और इस तरह एक हिंदू डॉक्टर और एक मुस्लिम नर्स हमेशा के लिए हमसफर बन गए.

Romantic Story: विश्वास की आन – क्या मृदुला का सिद्धार्थ पर भरोसा करना सही था?

Romantic Story: ‘‘दिल संभल जा जरा, फिर मुहब्बत करने चला है तू…’’ गाने की आवाज से मृदुला अपना फोन उठाने के लिए रसोई से भागी, जो ड्राइंगरूम में पड़ा यह गाना गा रहा था. नंबर पर नजर पड़ते ही उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा. नाम फ्लैश नहीं हो रहा था, पर जो  नंबर चमक रहा था वह उसे अच्छी तरह याद था. वह नंबर तो शायद वह सपने में भी न भूल पाए.

रोहन अपने कमरे से चिल्ला रहा था, ‘‘मौम, आप का फोन बज रहा है.’’

मृदुला ने झटके से फोन उठाया. एक नजर उस ने कमरे में टीवी देखने में व्यस्त ऋषि पर डाली और दूसरी नजर रोहन पर जो अपने कमरे में पढ़ रहा था. वह फोन उठा कर बाहर बालकनी की ओर बढ़ गई.

‘‘हैलो… हाय… क्या हाल हैं?’’

‘‘अब ठीक हूं,’’ उधर से आवाज आई.

‘‘क्यों? क्या हुआ?’’

‘‘बस तुम्हारी आवाज सुन ली बंदे का दिन अच्छा हो गया.’’

‘‘अच्छा, तो यह बात है… अच्छा बताओ फोन क्यों किया? आज मेरी याद कैसे आ गई? तुम अच्छे से जानते हो आज शनिवार है. ऋषि और रोहन दोनों घर पर होते हैं… ऐसे में बात करना मुश्किल होता है,’’ मृदुला जल्दीजल्दी कह रही थी.

‘‘मैं ने तो बस यह बताने के लिए फोन किया कि अब मुझ से ज्यादा सब्र नहीं होता. मैं अगले हफ्ते दिल्ली आ रहा हूं तुम से मिलने. प्लीज तुम किसी होटल में मेरे लिए कमरा बुक करवा दो जहां बस तुम हो और मैं और हो तनहाई,’’ सिद्धार्थ ने अपना दिल खोल कर रख दिया.

‘‘होटल? न बाबा न मैं होटल में मिलने नहीं आऊंगी.’’

‘‘तो फिर हम कहां मिलेंगे? मैं 1500 किलोमीटर मुंबई से दिल्ली सिर्फ तुम्हें मिलने आ रहा हूं ओर एक तुम हो जो होटल तक नहीं आ सकतीं.’’

मृदुला बातों में खोई हुई थी. उसे एहसास ही न हुआ कि कब रोहन अपने कमरे से निकल कर बाहर बालकनी में उस के पीछे आ खड़ा हो गया था.

रोहन पर नजर पड़ते ही मृदुला ने कहा, ‘‘अच्छा, मैं बाद में बात करती हूं,’’ और फिर फोन काट दिया.

‘‘किस का फोन था मौम?’’ रोहन ने पूछा.

‘‘वो… वो मेरी फ्रैंड का फोन था.’’ कह वह फोन ले कर रसोई में चली गई और सब्जी काटने लगी.

वैसे तो वह रसोई में काम कर रही थी पर दिलोदिमाग मुंबई में सिद्धार्थ के पास पहुंच चुका था. दिल जोरजोर से धड़क रहा था. बस एक मिलने की आस में वह पिछले 8 सालों से जल रही थी. अब समझ नहीं पा रही थी कि कहां, कब और कैसे मिलेगी.

जिंदगी में कब कोई आ जाए, इनसान जान ही नहीं पाता. कोई दिल के इतने करीब पहुंच जाता है कि बाकी सब से दूर हो जाता है.

यों तो मृदुला की जिंदगी में कोई कमी न थी. प्यार करने वाला पति ऋषि था. होशियार और समझदार 16 साल का बेटा रोहन था पर फिर सिद्धार्थ, औनलाइन फ्रैंड बन कर उस की जिंदगी में आ गया था और फिर सब उलटपुलट हो गया था.

वह बेटे और पति से छिपछिप कर कंप्यूटर से बहुत मेल और चैट करती थी और फोन भी बहुत करती थी. उस की जिंदगी का हर खुशीगम तब तक अधूरा होता जब तक वह उसे सिद्धार्थ से बांट न लेती.

दोस्ती एक जनून बन गई थी. वह उस से एक दिन भी बिना बात किए न रहती थी. रोज बात करना दोनों की दिनचर्या का अभिन्न अंग था. ऐसा ही कुछ हाल सिद्धार्थ का भी था.

यों तो मृदुला पति के औफिस और बेटे के स्कूल जाने के बाद बात करती थी, फिर भी रोहन गूगल की हिस्ट्री में जा कर कई बार पूछता था कि मम्मी यह सिद्धार्थ कौन है? और वह कुछ जवाब नहीं दे पाती थी सिवा इस के कि पता नहीं.

रोहन को कुछकुछ अंदाजा होता जा रहा था कि मम्मी कुछ ऐसा कर रही हैं, जिसे वे छिपा रही हैं. कई बार गुस्से और आक्रोश में वह अपनी परेशानी का इजहार भी करता पर ज्यादा कुछ कह न पाता.

अब मृदुला क्या करेगी, सिद्धार्थ से मिलने की तमन्ना को दबा लेगी? या फिर होटल जाएगी उस से मिलने? यही सब सोचसोच कर वह परेशान थी.

फिर अचानक उस ने अपना मन बना दिया और सिद्धार्थ को फोन मिला लिया,

‘‘सिद्धार्थ, मैं पहले ही जिंदगी में काफी डरडर कर तुम से बात करती हूं… मैं अब इस डर के साथ और नहीं जीना चाहती. मेरे मन में कोई खोट नहीं है और न ही तुम्हारे मन में, तो क्यों न तुम मेरे घर आ जाओ. मैं तुम से मिलने होटल नहीं आ पाऊंगी और न ही मैं तुम से मिलने का मौका गंवाना चाहती हूं.’’

मृदुला की बात सुन कर सिद्धार्थ हड़बड़ा गया, ‘‘पागल हो गई हो क्या? तुम्हारा पति और रोहन क्या कहेंगे? नहीं यह ठीक नहीं होगा.’’

‘‘क्या ठीक नहीं होगा? क्या यह मेरा घर नहीं है जहां मैं किसी को अपनी मरजी से बुला सकूं? मेरे मन में कोई खोट नहीं है. मैं ने तुम से दोस्ती की तो क्या गलत किया? और अगर ऋषि, रोहन कोई परेशानी हैं तो ठीक है हम इस चैप्टर को अभी हमेशा के लिए बंद कर देते हैं… पर मुझे एक बार तो तुम से मिलना ही है. बहुत बेताब है यह दिल तुम से मिलने को… तुम आओगे न मेरे घर?’’ एक सांस में मृदुला सब बोल गई.

‘‘मुझे थोड़ा वक्त दो सोचने का,’’ उस ने गंभीर होते हुए कहा.

‘‘बस घबरा गए? यों तो बहुत दलीलें देते थे कि मैं तुम्हारे एक बार बुलाने पर दौड़ा चला आऊंगा… अब क्या हुआ? देख ली तुम्हारी फितरत… तुम मुझे होटल में बुला कर मेरा नाजायज फायदा उठाना चाहते थे,’’ उस की आवाज ऊंची हो गई थी.

‘‘चुप करो,’’ सिद्धार्थ बोला, ‘‘ठीक है मैं 20 तारीख को 12 बजे वाली फ्लाइट से

दिल्ली आऊंगा और वह शाम तुम्हारे और तुम्हारी फैमिली के नाम… पर प्लीज, ऋषि मुझे मारेगा तो नहीं?’’

‘‘ठीक है, मैं इंतजार करूंगी,’’ कह कर फोन काट दिया.

मृदुला ने उसे अपने घर बुला तो लिया पर फिर  उलझन में पड़ गई कि ऋषि और रोहन को क्या बताएगी कि सिद्धार्थ कौन है?

ऋषि तो फिर भी समझ जाएगा पर न जाने रोहन कैसे रिएक्ट करेगा… उस की क्या इज्जत रह जाएगी उस के सामने…

इंतजार के 7 दिन एक इम्तिहान की तरह गुजरे जिन में पलपल वह अपने  निर्णय पर अफसोस करती रही, पछताती रही.

मृदुला के अंदर चल रहे तूफान की बाहर किसी को भनक न थी. इन 7 दिनों में मिलने की दिली चाहत को दिमाग में चल रहे प्रश्न ‘अब क्या होगा’ ने दबा दिया था. अब मृदुला को मिलने की तीव्र इच्छा से ज्यादा इस बात की टैंशन थी कि 20 तारीख को वह ऐसा क्या करे ताकि सब अच्छी तरह से निबट जाए?

सुबह उठती तो इसी आस के साथ कि काश 20 तारीख को ऋषि और रोहन अपने दोस्तों से मिलने चले जाएं और वह सिद्धार्थ से बिना टैंशन के मिल सके. पर अकसर लोग जो सोचते हैं वह होता नहीं. उन दोनों का भी ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं बना.

आखिरकार 20 तारीख आ ही गई. इस दौरान वह सिद्धार्थ से कोई बात न कर पाई. सारी रात करवटें बदलतेबदलते निकाल दी उस ने कि कल का दिन न जाने क्या तूफान ले कर आएगा उस की जिंदगी में.

कई मरतबा उस ने अपनेआप को कोसा भी कि क्यों ऐसा निर्णय लिया, पर तीर कमान से निकल चुका था. यह भी नहीं कह सकती थी कि वह न आए.

न जाने किस रौ और विश्वास में बह कर उस ने सिद्धार्थ को इतनी दूर से बुला लिया था. घर में शांति थी. सब अपनेअपने काम में लगे थे. तूफान से पहले ऐसा ही सन्नाटा होता है.

ठीक 3 बजे सिद्धार्थ का फोन आ गया, ‘‘मैं एअरपोर्ट पहुंच चुका हूं.’’

मृदुला का दिल जोरजोर से धड़कने लगा. आंखें खुशी से चमकने लगीं और चेहरा उत्तेजना से लाल हो गया.

‘‘एक बार फिर सोच लो, कहीं और मिल लेते हैं?’’ सिद्धार्थ ने घबराते हुए पूछा.

‘‘नहीं, अब जो होगा देखा जाएगा. मैं पीछे नहीं हटूंगी,’’ कह उस ने उसे मैट्रो से घर आने का रास्ता बताया और फिर फोन काट दिया.

अब मारे घबराहट के उस के हाथपैर फूलने लगे थे. ऋषि और रोहन अपनेअपने कमरे में थे. अचानक घंटी बजी. धड़कते दिल से उस ने दरवाजा खोला तो एक स्मार्ट, आकर्षक, लंबा, सांवला 38 वर्षीय युवक उस के सामने खड़ा था, जिसे देख उस का मुंह खुला का खुला रह गया.

वही चिरपरिचित हाय सुन कर वह चहक उठी और फिर अपने सूखे गले से धीरे से कहा, ‘‘हाय, आओ अंदर आओ.’’

डरतेडरते सिद्धार्थ ने अंदर कदम रखा, तो झट से रोहन अपने कमरे से बाहर ड्राइंगरूम में आ गया.

‘‘बेटा, ये सिद्धार्थ अंकल हैं.’’

मृदुला के मुंह से सिद्धार्थ नाम बड़ी मुश्किल से निकला, जिसे सुन कर रोहन थोड़ा सकपका गया और फिर अपना गुस्सा छिपाता जल्दी से नमस्ते कर के अपने कमरे में चला गया.

अपनी बेचैनी, घबराहट को छिपाते मृदुला ने हलकी मुसकान से सिद्धार्थ को देखा और सोफे पर बैठने को कहा.

ऋषि के कमरे में कोई हलचल नहीं थी. वहां रोज की तरह टीवी चल रहा था. ऋषि टीवी के सामने बैठे थे. वह कमरे में गई और बोली, ‘‘कोई आया है.’’

‘‘कौन?’’

‘‘सिद्धार्थ.’’

‘‘सिद्धार्थ कौन?’’ चौंकते हुए ऋषि ने पूछा.

‘‘मेरा दोस्त,’’ एक झटके में उस ने बोल दिया और अब वह तैयार थी किसी भी परिणाम के लिए. उस ने निर्णय कर लिया था कि अगर ऋषि नहीं चाहेगा तो वह वहां नहीं रहेगी और सिद्धार्थ के साथ तो कतई नहीं. वह जानती थी कि वह उस का अच्छा दोस्त तो हो सकता है पर अच्छा हमसफर नहीं.

10 मिनट तक ऋषि ने न तो कोई जवाब दिया और न ही अपनी जगह से हिला.

मृदुला रसोई में जा कर कौफी बनाने लगी. बीचबीच में अकेले बैठे सिद्धार्थ से भी बतियाती रही.

अचानक रोहन रसोई में आया और अपना आक्रोश निकालते हुए घर से बाहर चला गया.

कौफी बना कर लाई तो मृदुला ने देखा कि ऋषि कमरे से बाहर आया और फिर बड़े आराम से सिद्धार्थ से हाथ मिला कर उस के पास बैठ गया. उस का दिल जोरजोर से धड़कने लगा कि न जाने अब क्या हो. यह उन दोनों के रिश्ते की मजबूती थी कि कभी भी अपने आपसी झगड़े, गलतफहमी और शिकवेशिकायत को किसी के सामने नहीं आने दिया. यह सब कुछ बैडरूम के बाहर नहीं आता था. चाहे कितनी भी लड़ाई हो बैडरूम के बाहर वे नौर्मल पतिपत्नी ही होते थे. 10 मिनट बैठ कर बात करने से माहौल की बोझिलता थोड़ी कम हो गई थी. फिर वह मृदुला और सिद्धार्थ को अकेले छोड़ कर वापस अपने कमरे में चला गया.

पूरी तरह से संभालने में मृदुला को थोड़ा वक्त लगा. जैसेजैसे वक्त बीतता गया. उस का खोया विश्वास लौटने लगा आधे घंटे बाद रोहन वापस आया और सीधा रसोई में चला गया. वह उस के पीछेपीछे रसोई में गई तो देखा रोहन समोसे और जलेबियां ले कर आया था.

मृदुला ने आश्चर्य से उस की तरफ देखा तो वह बोला, ‘‘मां, आप के दोस्त के लिए. जब मेरे दोस्त आते हैं तब आप भी तो बाजार जा कर हमारे लिए पैप्सी और चिप्स लाती हो हमारी पसंद का, तो मैं भी आप की पसंद का आप के फ्रैंड के लिए लाया हूं… क्या आप को हक नहीं है दोस्त बनाने का?’’

मृदुला की आंखों में खुशी के आंसू भर आए और फिर वह खुशीखुशी प्लेट में समोसे और जलेबियां डालने लगी.

करीब 2 घंटे बाद सिद्धार्थ 7 बजे की फ्लाइट से मुंबई लौट गया.

सिद्धार्थ के जाने के बाद मृदुला को डर लग रहा था कि न जाने अब ऋषि क्या बखेड़ा करेगा. डर के मारे वह उस के सामने जाने से कतरा रही थी.

रात का खाना खाने के बाद जब वह बिस्तर पर लेटी तो ऋषि ने पूछा, ‘‘सिद्धार्थ

चला गया?’’

‘‘हां, चला गया.’’

‘‘तुम्हारा सच्चा दोस्त लगता है, तभी इतनी दूर से तुम से मिलने चला आया.’’

‘‘आप को बुरा लगा कि मैं ने एक आदमी से दोस्ती की? मुझे अपना घर दोस्त से ज्यादा प्यारा है और आज की इस हरकत के लिए आप जो चाहो मुझे सजा दे सकते हो.’’

‘‘सजा? कैसी सजा? तुम ने कुछ गलत तो नहीं किया… मैं 1 हफ्ते पहले से ही जानता था कि तुम्हारा दोस्त आने वाला है.’’

मृदुला यह सुन कर चौंक गई. फिर बोली, ‘‘तो आप ने मुझे कुछ कहा क्यों नहीं?’’

‘‘देखो मृदुला, मैं ने 20 साल तुम्हारे साथ काटे हैं… तुम्हारी रगरग से वाकिफ हूं. तुम चाहतीं तो उस से बाहर भी मिल सकती थीं पर तुम ने ऐसा नहीं किया…

कहीं अंदर तुम्हें भी मुझ पर हमारे रिश्ते पर विश्वास था… मैं उन पतियों में से नहीं हूं जो पत्नी को इनसान नहीं समझते… दोस्ती तो किसी से और कभी भी हो सकती है… हफ्ता भर पहले जब तुम ने उसे फोन पर घर आने का न्यौता दिया था तभी मैं ने तुम्हारी सारी बातें सुन ली थीं और मैं तुम्हारे विश्वास को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था. विश्वास की आन तो मुझे रखनी ही थी,’’ पति की बातें सुन कर मृदुला की आंखों से खुशी की आंसू बहने लगे.

‘‘और हां रही बात यह कि एक आदमी और एक औरत कभी दोस्त नहीं हो सकते, उस में मैं समझता हूं कि मैं ने आज तक तो तुम्हें कभी शिकायत का मौका नहीं दिया… क्यों ठीक कह रहा हूं न मैं?’’

पति की आखिरी बात का मतलब समझते हुए मृदुला शर्म से लाल हो गई और फिर लजाती हुई पति की बांहों में समा गई.

Romantic Story: जीती तो मोहे पिया मिले हारी तो पिया संग

Romantic Story: सियाने टक बिजनैस स्कूल हैनोवर से एमबीए किया तो भारी पैकेज के साथ गूगल ने उसे अपने यहां नौकरी दे कर उस के वीजा को ऐक्सटैंड करवा दिया. अब कुछ दिनों के लिए वह इंडिया जा रही थी. मगर इतना कुछ हासिल करने के बावजूद सिया के चेहरे पर गमों के बादल मंडरा रहे थे. आंसुओं के बोझ से पलकें सूज गई थीं. यह भी इत्तफाक ही था कि ठीक 2 साल पहले ही दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर अपनों से दूर होने का शोकाकुल मन इमिग्रेशन के लिए सिया के बढ़ते कदमों को बारबार पीछे खींच रहा था और आज वही मन उस से कितनी निर्दयता से आंखमिचौली करते हुए उसे आगे ही नहीं बढ़ने दे रहा था.

बोस्टन की गलियों में सैम की बांहों में बंधी वह अनमनी सी दिन भर घूमती रही. उस के मन में उमड़ रहे विरहवियोग के समंदर को शांत करता सैम हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ले कर स्टैनफोर्ड के चप्पेचप्पे में उसे घुमाता रहा. सिया के दुबलेपतले नाजुक शरीर को अपनी बांहों में भरते हुए सैम भर्राए कंठ से बोला, ‘‘मुझे ऐसे छोड़ कर मत जाओ सिया, मैं तुम्हारे बिना किसी आईने की तरह टूट कर बिखर जाऊंगा… जिसे तुम जानती तक नहीं उसी की होने के लिए लौट रही हो और जिस ने तुम्हें प्राणों से बढ़ कर चाहा उसे छोड़ रही हो.’’

सैम का इतना कहना था कि सिया किसी लता की तरह उस से लिपट गई. दोनों की आंखों से सावनभादो बरस रहे थे. सैम ने बांहों में भरी सिया को ला कर कार की पिछली सीट पर बैठा दिया. उसे आलिंगन में कसते हुए उस के अश्रुपूरित चेहरे पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. सिया भी प्यार की इस बरसात में बिना किसी प्रतिवाद के भीगती रही. कभी न खत्म होने वाली जुदाई की घडि़यों से घबरा कर दोनों ने प्यार की मर्यादा की सरहद को पार कर लिया. दोनों को कहीं कोई पछतावा नहीं था. दोनों पूर्णता के एहसास में डूबउतरा रहे थे.

एकदूसरे को समर्पित हो कर दोनों का शोकाकुल मन ऊंची लहरों के जाने के बाद किसी समंदर की तरह शांत पड़ चुका था. परम संतुष्टि का एहसास संजोए अभीअभी शादी के बंधन में बंधे नए जोड़े की तरह दोनों घूमते रहे. मतवाला मन पंख लगा कर उड़ा जा रहा था. दोनों एकदूसरे में इतने खोए हुए थे कि हर बार उन की गाड़ी चारों ओर से घूम कर हाईवे पर आ कर रुक रही थी. यह बोस्टन शहर की अपनी विशेषता है.

सैम के गले में अपनी बांहों का हार पहनाते हुए सिया ने कहा, ‘‘सैम, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सारी जिंदगी इसी तरह गोलगोल घूमते रहें?’’ जवाब में सैम ने उसे बांहों में भर लिया. बड़ी जद्दोजहद के बाद दोनों ने अपने उतावलेपन पर काबू पाया. फिर सिया को बांहों में ही लिए भरे मन से सैम ने अपनी गाड़ी हवाईअड्डे की ओर मोड़ दी.

3 घंटे का रिपोर्टिंग टाइम बीत गया था. प्लेन के उड़ान भरने में घंटा भर रह गया था. सैम से गले मिल कर सिया सामान की ट्रौली के साथ झटके से आगे बढ़ तो गई मगर फिर उसी वेग से पीछे लौट कर सैम से लिपट गई. अश्रुपूरित नेत्रों से सिया ने सैम को बाय कहते हुए विदा ली. जब तक आंखों से वह ओझल नहीं हुई हाथ हिलाते हुए सैम उसे निहारता रहा. यह प्यार भी बड़ी खूबसूरत और अजीबोगरीब घटना होती है. जिस ने किया वह ठगा ही रह जाता है. कैसे प्यार के हजारों रंग मिल कर धनक बन कर, धड़कते दिलों में चुपके से उतर कर देश, जाति, धर्म, भाषा की सारी सरहदें चुटकियों में फांद जाते हैं.

‘उदास, बुझा हुआ सैम हैनोवर लौट रहा होगा,’ सोच सिया बेचैन हो उठी. 4 घंटे के सफर में उस के खयालों से शायद ही वह बाहर आ सकी. ‘यह भी बड़ा हसीन इत्तफाक है कि किसी दूसरे देश का वासी उस के सपनों का, अरे नहीं उस के जीवन का राजकुमार बन गया,’ सोच वह एक अजीब ठंड के एहसास से सिहर उठी. फिर शाल को ओढ़ते हुए सैम की छवि को कल्पना में साकार कर उठी कि काश, इस यात्रा में वह भी उस के साथ होता.

एक मीठी सी आह भर कर उस ने आंखें बंद कर लीं. सभी तरह से अनजान सैम चुपकेचुपके उस की धड़कन बन गया… 2 साल पहले के अतीत के सारे पन्ने 1-1 कर उस के समक्ष खुलते चले गए. डाइनिंगहौल में टेबल पर सजी केवल नौनवैज डिशेज को डबडबाई नजरों से देखती असहाय सी वैजिटेरियन सिया. सभी कितने आनंद से खाने का लुत्फ उठा रहे थे. सिया अपने कमरे में प्रवेश कर ही रही थी कि अचानक सैम वहां आ पहुंचा और फिर उसे डाइनिंगहौल में आने को विवश कर दिया.

बटर लगे ब्रैडपीस, दही और कुछ ताजे फलों के साथ सिया को प्लेट थमाई तो उस का मुरझाया चेहरा खिल उठा. दोनों के विषय एवं क्लासेज बिल्डिंग्स अलगअलग थीं फिर भी उस दिन के बाद से सैम उस की आवश्यकता बन कर उस की हर समस्या का समाधान बन गया. 1 साल बाद सभी स्टूडैंट्स होस्टल से बाहर कौटेज ले कर रहते हैं. 3 लड़कियों के साथ सिया के रहने की व्यवस्था सैम ने ही की. सिया के पैसे कम से कम खर्च हों, सैम को हर समय इस की चिंता रहती थी. उस भयानक रात को सिया कैसे भूल सकती है जब बर्फ का तूफान आया था. सारा हैनोवर अंटार्टिका बन गया था. बिजली के जाने से सब कुछ ठप हो गया था. आवागमन के सारे रास्ते बंद हो चुके थे.

इतनी ठंड और बर्फ की परवाह न करते हुए सैम सिया के खानेपीने के सामान के साथ उस के कौटेज आ गया था. उस तूफानी रात को सिया ने सैम को रोक लिया था. उस अंधेरी रात को दोनों ने टौर्च की रोशनी में बिताया था. बिजली की हर गरजना के साथ वह सहम कर सैम की हथेलियों को थाम लेती थी. ऐसा देश जहां सैक्स को भी और चीजों की तरह शारीरिक आवश्यकता समझा जाता है, उसी देश के एक फरिश्ते ने उसे आगोश में बांधे सारी रात गुजार दी पर कहीं असंयमित नहीं हुआ… मर्यादा की सीमा नहीं लांघी.

2 हफ्ते पहले सैम सिया को न्यूजर्सी ले गया था. ‘फारमर्स सन औफ गार्डन सिटी’ का कह कर स्वयं का परिचय देने वाले सैम के महल को सिया अपलक देखती रह गई. दरवाजे पर खड़ी चमचमाती 3-3 गाडि़यां, थोड़ी दूरी पर पार्क किया रिक्रीएशन व्हीकल, जो एक तरह से सारी सुविधाओं से सजा मोबाइल घर होता है, ट्रैक्टर, खेती करने के सारे औजार, स्टैबल में बंधे श्वेतश्याम रंग के तगड़े घोड़े, मुरगीखाना आदि को देख कर सिया को अपने देश के दीनहीन, भूखे किसान और उन के नंगधडं़ग बच्चे याद आ गए. कैसे लुटेरों के हाथों में देश चला गया है कि दिनोंदिन गरीबीबेकारी सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही है. सैम के मम्मीडैडी ने सिया को गले लगा कर प्यार किया. तीनों दिन तक उस की सुखसुविधा का खयाल अच्छी तरह रखने के लिए सैम को आगाह करते रहे. पर रात तक वे नीचे के लिविंग रूम में बैठ कर मूवी देखते रहते और फिर दोनों कितनी शालीनता से गुड नाइट कह अपनेअपने रूम में चले जाते. कोई ताकझांक नहीं.

राबर्ट वुड हौस्पिटल में मैडिसिन की पढ़ाई कर रही सैम की बहन एलिस भी मैमोरियल डे की छुट्टी पर घर आ गई थी. सिया और सैम को देख हंस कर उस ने परफैक्ट पेयर कहा. उस ने सिया को ढेर सारे परफ्यूम, लिपस्टिक और नेलपौलिश दी. सैम की मां ने भी फेयरी जैसे श्वेत परिधान के साथ धवल मोतियों का सैट मुसकराते हुए अंगरेजी में यह कहते हुए सिया को दिया, ‘‘सैम, तुम्हें बहुत चाहता है… हमेशा सुखी व खुश रहो.’’ सिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें देखा और फिर अपनी मिट्टी की परंपरा को निभाते हुए उन के पैरों को छू लिया. मैमोरियल डे के दिन सैम उसे न्यूयौर्क सिटी घुमाने ले गया. पूरा दिन दोनों एकदूसरे में बंधे घूमते रहे.

उस दिन हडसन नदी में अनगिनत बड़े जहाज आए थे. उन जहाजों पर कहीं विमान उतर रहे थे तो कहीं उड़ रहे थे जिन्हें देख कर सिया किसी बच्ची की तरह चहक उठी थी. सारे दर्शनीय स्थल देख कर दोनों थक गए थे. टाइम्स स्क्वायर में सड़क के किनारे बनी गैलरी में बैठ कर दोनों ने थिएटर का आनंद उठाया. वहीं पास के रेस्तरां में डिनर ले कर रौक फेलर सैंटर की विपरीत दिशा में बनी लोहे की बैंच पर बैठ गए.

रात को जब सिया को ठंड लगने लगी तो सैम ने उसे अपनी जैकेट के अंदर ले लिया. दोनों यों ही बैठे एकदूसरे के दिलों की धड़कनें सुनते रहे. सैम की उंगलियां जब सिया के बदन पर बिजली का करंट बन कर प्रवाहित होने लगीं तो वह जैकेट से बाहर आ गई. बड़ी मुश्किल से अपने बेताब मन को समझा सकी. ‘‘यू इंडियन बेबी,’’ कहते हुए सैम ने हंस कर उसे पास खींच लिया.

सड़क किनारे पार्किंग में लगी गाड़ी में दोनों ने सारी रात गुजारी थी. बहकते मन पर काबू पाना कितना मुश्किल लगा था.

मैसी मौल से सिया ने अपने मम्मीपापा, दिव्या व दिया के लिए ड्रैसेज लीं. उस के लाख मना करने के बावजूद सैम ने उन लोगों के लिए कितने उपहार खरीद दिए थे. सिया को तो उस ने अपनी पसंद की सारी चीजों से ढक दिया था.

आज जो भी घटित हुआ वह अचानक था, फिर भी कितना तसल्ली दे गया है मन को. जिसे मन से चाहा उस की समर्पिता भी हो गई. क्या हुआ जो अगर उस के म्ममीपापा अपनी सोच और पारिवारिक मर्यादा के लिए सैम को उस के जीवन में नहीं ला सके. वह अपने होंठों को सी लेगी. उफ तक नहीं करेगी. उन की इच्छा का मान रखते हुए वह राज से ब्याह कर लेगी. प्रीत की गली इतनी संकरी होती ही है कि जहां 2 दिल ही मुश्किल से समाते हैं तो तीसरे के समाने की गुंजाइश ही कहां रह जाती है. इस तन पर राज का अधिकार क्यों न हो जाए दुलहनियां तो सैम की ही रहेगी. अपनी समस्त पीड़ा को, मीठी कसक को आंसुओं से नहला आनंद उगा लेगी. जिस ने भी सच्ची प्रेम पगी इस चुनर को ओढ़ा उस के अंतर में ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोए…’ के बोल प्रतिध्वनि हो उठे.

अतीत को खंगालने में सारा समय सिया ने आंखों में ही बिता दिया. देह की सिहरन उसे आनंद की चरम सीमा पर ले आई थी. बीते पलों की खुमारी उसे खुल कर सांसें भी नहीं लेने दे रही थी. सैम तो नहीं पर उस के परिमल को अपने साथ ले कर आई थी जिसे महसूस कर के उस के प्रेम का मधु पी कर सच में बौरा उठा था सिया का कणकण. जहाज की लैंडिंग की घोषणा हो रही थी.

जैसे ही सिया हवाईअड्डे से बाहर आई दोनों छोटी बहनें दिव्या और दिया दौड़ कर उस से लिपट गईं. मम्मीपापा की छलक आई आंखों को देखते ही वे दौड़ कर दोनों से लिपट गई. ‘‘मां देखो न दीदी कितनी खिल गई है… राज जीजू कितने खुश होंगे दीदी को देख कर… दीदी की उपलब्धियों पर उन्हें कितना गर्व होगा,’’ दिव्या बोली.

‘‘अच्छा तो बड़ी बातें बनाने लगी है तू,’’ कहते हुए सिया बुदबुदाई, ‘‘अरे बावरी सैम जीजू कह.’’

दूसरे दिन ही राज अपने मम्मीपापा के साथ सिया के घर आ गया. उसे देख कर सिया खुश नहीं हुई तो उसे दुख भी नहीं हुआ. सब कुछ उस ने अपनी नियति पर छोड़ दिया था. उस के मम्मीपापा तो उन के समक्ष छिपे जा रहे थे. उन्होंने सिया की टक स्कूल की उपलब्धियों को उन्हें बताया जिन्हें सुन कर वे चुप हो गए. औपचरिकता के लिए भी उन्होंने सिया को बधाई नहीं दी. एकांत पाते ही राज ने सिया के समक्ष अपनी शंका जाहिर करते हुए कहा, ‘‘सुना है अमेरिका में लोग खुलेआम कहीं भी, किसी से भी सैक्स ऐंजौय कर लेते हैं… इतने लंबे समय में तुम ने कभी इस का आनंद लिया या नहीं? अगर नहीं लिया तो तुम परले दर्जे की बेवकूफ हो.

‘‘और कुछ नहीं तो लिप किस तो अवश्य दिया होगा जिसे कोई भी गले लगाते समय अंकित कर के होंठों पर मुहर लगा ही देता है. मुझे नहीं लग रहा है कि तुम इन सब से स्वयं को बचा पाई होगी. क्यों ठीक कहा न? कोई बात नहीं, जब मैं वहां जाऊंगा तो सूद सहित इस की भरपाई कर लूंगा,’’ कहते हुए उस ने सिया की उंगलियों को भींच दिया. दर्द से सिया के मुंह से कराह निकल गई. राज की ओछी मानसिकता पर, उस की गिरी सोच पर घृणा से सिया उस से हाथ छुड़ा कर भागी. कितना फर्क है सैम और राज की छुअन में… एक की जरा सी छुअन सारी ऋतुओं को पल भर में ही पावस और वसंत बना कर रख देती है तो दूसरे के स्पर्श से अनगिनत बिलबिलाते कीड़े उस के शरीर पर रेंग गए… कैसे इस लिजलिजे व्यक्ति के साथ अपना जीवन बिता पाएगी…

इंगेजमैंट से ले कर शादी का सारा इंतजाम सिया के पापा को करना था और ये सब किसी पांचसितारा होटल में होने की बात कह कर उन लोगों ने विदा ली. फेसटाइम कर के सिया ने सारी बातें सैम को बता कर अपने मन को हलका कर लिया था. जैसेजैसे इंगेजमैंट के दिन निकट आ रहे थे, राज के यहां से फरमाइशों की लिस्ट में कोई न कोई नई आइटम जुड़ती जा रही थीं. सिया के पापामम्मी चिंतित से लग रहे थे. उन की खुशियों का दायरा सिमटता जा रहा था.

जब उन्होंने कार की मांग रखी तो सिया के पापा उबल पड़े, ‘‘नहीं करनी हमें सिया की शादी इन लालचियों के यहां. मेरी प्रतिभाशाली बेटी के समक्ष कुछ भी तो नहीं है राज… एक मामूली इंजीनियर जो मेरी बेटी के बल पर अमेरिका जाएगा, फिर इस की मेहरबानियों से एच4 वीजा पर नौकरी करेगा.’’ ‘‘सच पापा,’’ कह कर सिया उन के गले लग गई.

तभी खुसरो की पंक्तियां उस के कानों में रस घोल गईं. ‘‘खुसरो बाजी प्रेम की लागी पी के संग, जीती तो मोहे पिया मिले, हारी तो पिया संग.’’

मारे खुशी के वह पूरी रात सैम से बातें करती प्रेम रस में भीगती रही. सैम से सभी आश्वासन पा कर सिया ने अगले दिन सैम के इतिहास से सभी घर वालों को अवगत करा दिया, जिसे सुन कर सभी सैम के बारे में जानने के लिए उत्सुक हो गए. फिर क्या था, फेसटाइम पर सैम से सभी ने जी खोल कर बातें कीं. सैम के आकर्षक व्यक्तित्व और शालीनता ने सभी को मोह लिया.

बेटी के शानदार चयन पर गौरवान्वित हो पापा और मम्मी की आंखें भर आईं. दिव्या व दिया भी आगे की पढ़ाई अमेरिका में करेंगी. सैम से आश्वासन पा कर सभी भविष्य के सुनहरे सपनों में खो गए. सिया के लिए तो खुशियों की कायनात ही जमीं पर उतर आई थी. जो इश्क आसान नहीं था उसे सिया के धैर्य और अटल विश्वास ने प्राप्त कर लिया था. मीरा बन कर सैम की जोगिन तो हमेशा रहेगी तभी रुक्मिणी और सत्यभामा के जीवन को जी पाएगी.

3 हफ्ते के भीतर सैम अपने परिवार के साथ इंडिया आ गया. पहले रजिस्टर्ड मैरिज और फिर छेड़छाड़ वाली भारतीय परंपराओं वाली ऊटपटांग रस्मों व रिवाज से खूब धूमधाम से शादी हुई. भारतीय दूल्हा बना सैम सब का दुलारा बना हुआ था. उस की मम्मी, पापा और बहन की खुशियां सिया समेट नहीं पा रही थी. श्वेत परिधान और हीरेमोतियों के जेवरों से चमचमाती सिया और सैम के परिवार आपस में जुड़ गए. कहीं जाति, धर्म, देश का आडंबर नहीं था. एकदूसरे के घर के तौरतरीकों को मानसम्मान देते हुए दोनों परिवार खिल उठे थे.

फिर सैम और सिया ने अपना हनीमून अपने परिवार वालों के साथ भारत के सारे दर्शनीय स्थानों को घूमघूम कर मनाया. पंख लगा कर छुट्टी के दिन गुजर गए. अगले हफ्ते ही सिया और सैम को अपनी ड्यूटी जौइन करनी थी. हजारों खूबसूरत सपनों को पलकों में सजाए खुशी के आंसुओं को दामन में समेटे सिया वहां लौट गई जहां एक नया सूर्योदय उस के जीवन को आलोकित करने के लिए बेचैन था.

Romantic Story: खेल खेल में

Romantic Story: शिखा के पास उस समय नीरज भी खड़ा था जब अनिता ने उस से कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारी मम्मी को फोन कर के उन से इजाजत ले ली है.’’

‘‘किस बात की?’’ शिखा ने चौंक कर पूछा.

‘‘आज रात तुम मेरे घर पर रुकोगी.

कल रविवार की शाम मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आऊंगी.’’

‘‘कोई खास मौका है क्या?’’

‘‘नहीं. बस, बहुत दिनों से किसी के साथ दिल की बातें शेयर नहीं की हैं. तुम्हारे साथ जी भर कर गपशप कर लूंगी, तो मन हलका हो जाएगा. मैं लंच के बाद चली जाऊंगी. तुम शाम को सीधे मेरे घर आ जाना.’’

नीरज ने वार्त्तालाप में हिस्सा लेते हुए कहा, ‘‘अनिता, मैं शिखा को छोड़ दूंगा.’’

‘‘इस बातूनी के चक्कर में फंस कर ज्यादा लेट मत हो जाना,’’ कह कर अनिता अपनी सीट पर चली गई.

औफिस के बंद होने पर शिखा नीरज के साथ उस की मोटरसाइकिल पर अनिता के घर जाने को निकली.

‘‘कल 11 बजे पक्का आ जाना,’’ नीरज ने शिखा को अनिता के घर के बाहर उतारते हुए कहा.

‘‘ओके,’’ शिखा ने मुसकरा कहा.

अनिता रसोई में व्यस्त थी. शिखा उन किशोर बच्चों राहुल और रिचा के साथ गपशप करने लगी. अनिता के पति दिनेश साहब घर पर उपस्थित नहीं थे. अनिता उसे बाजार ले गई. वहां एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान में घुस गई. अनिता और दुकान का मालिक एकदूसरे को नाम ले कर संबोधित कर रहे थे. इस से शिखा ने अंदाजा लगाया कि दोनों पुराने परिचित हैं.

‘‘दीपक, अपनी इस सहेली को मुझे एक बढि़या टीशर्ट गिफ्ट करनी है. टौप क्वालिटी की जल्दी से दिखा दो,’’ अनिता ने मुसकराते हुए दुकान के मालिक को अपनी इच्छा बताई.

शिखा गिफ्ट नहीं लेना चाहती थी, पर अनिता ने उस की एक न सुनी. दीपक खुद अनिता को टीशर्ट पसंद कराने के काम में दिलचस्पी ले रहा था. अंतत: उन्होंने एक लाल रंग की टीशर्ट पसंद कर ली.

शिखा के लिए टीशर्ट के अलावा अनिता ने रिचा और राहुल के लिए भी कपड़े खरीदे फिर पति के लिए नीले रंग की कमीज खरीदी.

दुकान से बाहर आते हुए शिखा ने मुड़ कर देखा तो पाया कि दीपक टकटकी बांधे उन दोनों को उदास भाव से देख रहा है. शिखा ने अनिता को छेड़ा, ‘‘मुझे तो दाल में काला नजर आया है, मैडम. क्या यह दीपक साहब आप के कभी प्रेमी रहे हैं?’’

‘‘प्रेमी नहीं, कभी अच्छे दोस्त थे… मेरे भी और मेरे पति के भी. इस विषय पर कभी बाद में विस्तार से बताऊंगी. पतिदेव घर पहुंच चुके होंगे.’’

‘‘अच्छा, यह तो बता दीजिए कि आज क्या खास दिन है?’’

‘‘घर पहुंच कर बताऊंगी,’’ कह कर अनिता ने रिकशा किया और घर आ गईं.

वे घर पहुंचीं तो दिनेश साहब उन्हें ड्राइंगरूम में बैठे मिले. शिखा को देख कर उन के होंठों पर उभरी मुसकान अनिता के हाथ में लिफाफों को देख फौरन गायब हो गई.

‘‘तुम दीपक की दुकान में क्यों घुसीं?’’ कह कर उन्होंने अनिता को आग्नेय दृष्टि से देखा.

‘‘मैं शिखा को अच्छी टीशर्ट खरीदवाना चाहती थी. दीपक की दुकान पर सब से

अच्छा सामान…’’

‘‘मेरे मना करने के बावजूद तुम्हारी हिम्मत कैसे हो गई उस की दुकान में कदम रखने की?’’ पति गुस्से से दहाड़े.

‘‘मुझ से गलती हो गई,’’ अनिता ने मुसकराते हुए अपने हाथ जोड़ दिए, ‘‘आज के दिन तो आप गुस्सा न करो.’’

‘‘आज का दिन मेरी जिंदगी का सब से मनहूस दिन है,’’ कह कर गुस्से से भरे दिनेशजी अपने कमरे में चले गए.

‘‘मैडम, जब आप को मना किया गया था तो आप क्यों गईं दीपक की दुकान पर?’’

आंखों में आंसू भर कर अनिता ने उदास लहजे में जवाब दिया, ‘‘आज मैं तुम्हें 10 साल पुरानी घटना बताती हूं जिस ने मेरे विवाहित जीवन की सुखशांति को नष्ट कर डाला. मैं कुसूरवार न होते हुए भी सजा भुगत रही हूं, शिखा.

‘‘दीपक का घर पास में ही है. खूब आनाजाना था हमारा एकदूसरे के यहां. दिनेश साहब जब टूर पर होते, तब मैं अकसर उन के यहां चली जाती थी.

‘‘दीपक मेरे साथ हंसीमजाक कर लेता था. इस का न कभी दिनेश साहब ने बुरा माना, न दीपक की पत्नी ने, क्योंकि हमारे मन में खोट नहीं था.

‘‘एक शाम जब मैं दीपक के घर पहुंची, तो वह घर में अकेला था. पत्नी अपने दोनों बच्चों को ले कर पड़ोसी के यहां जन्मदिन समारोह में शामिल होने गई थी.’’

अपने गालों पर ढलक आए आंसुओं को पोंछने के बाद अनिता ने आगे बताया, ‘‘दीपक अकेले में मजाक करते हुए कभीकभी रोमांटिक हो जाता था. मैं सारी बात को खेल की तरह से लेती क्योंकि मेरे मन में रत्ती भर खोट नहीं था.

‘‘दीपक ने भी कभी सभ्यता और शालीनता की सीमाओं को नहीं तोड़ा था.

‘‘दिनेश साहब टूर पर गए हुए थे. उन्हें अगले दिन लौटना था, पर वे 1 दिन पहले

लौट आए.

‘‘मेरी सास ने जानकारी दी कि मैं दीपक के घर गई हूं. वह तो सारा दिन वहीं पड़ी रहती है. ऐसी झूठी बात कह कर उन्होंने दिनेश साहब के मन में हम दोनों के प्रति शक का बीज बो दिया.

‘‘उस शाम दीपक मुझे पियक्कड़ों की बरात की घटनाएं सुना कर खूब हंसा रहा था. फिर अचानक उस ने मेरी प्रशंसा करनी शुरू कर दी. वह पहले भी ऐसा कर देता था, पर उस शाम खिड़की के पास खड़े दिनेश साहब ने सारी बातें सुन लीं.

‘‘उस शाम से उन्होंने मुझे चरित्रहीन मान लिया और दीपक से सारे संबंध तोड़ लिए. और… और… मैं अपने माथे पर लगे उस झूठे कलंक के धब्बे को आज तक धो नहीं पाई हूं, शिखा.’’

‘‘यह तो गलत बात है, मैडम. दिनेश साहब को आप की बात सुन कर अपने मन से गलतफहमी निकाल देनी चाहिए थी,’’ शिखा ने हमदर्दी जताई.

‘‘वे मुझे माफ करने को तैयार नहीं हैं. वे मेरे बड़े हो रहे बच्चों के सामने कभी भी मुझे चरित्रहीन होने का ताना दे कर बुरी तरह शर्मिंदा कर देते हैं.’’

‘‘यह तो उन की बहुत गलत बात है, मैडम.’’

‘‘मैं खुद को कोसती हूं शिखा कि मुझे खेलखेल में भी दीपक को बढ़ावा नहीं देना  चाहिए था. मेरी उस भूल ने मुझे सदा के लिए अपने पति की नजरों से गिरा दिया है.’’

‘‘जब आप को पता था कि दिनेश साहब बहुत गुस्सा होंगे, तब आप दीपक की दुकान पर क्यों गईं?’’

शिखा के इस सवाल के जवाब में अनिता खामोश रह उस की आंखों में अर्थपूर्ण अंदाज में झांकने लगी.

कुछ पल खामोश रहने के बाद शिखा सोचपूर्ण लहजे में बोली, ‘‘मुझे दिनेश साहब का गुस्सा… उन की नफरत दिखाने के लिए आप जानबूझ कर दीपक की दुकान से खरीदारी कर के लाई हैं न? मेरी आंखें खोलने के लिए आप ने यह सब किया है न?’’

‘‘हां, शिखा,’’ अनिता ने झुक कर शिखा का माथा चूम लिया, ‘‘मैं नहीं चाहती कि तुम नीरज के साथ प्रेम का खतरनाक खेल खेलते हुए मेरी तरह अपने पति की नजरों में हमेशा के लिए गिर जाओ.’’

‘‘मेरे मन में उस के प्रति कोई गलत भाव नहीं है, मैडम.’’

‘‘मैं भी दीपक के लिए ऐसा ही सोचती थी. देखो, तुम्हारा पति भी दिनेश साहब की तरह गलतफहमी का शिकार हो सकता है. तब खेलखेल में तुम भी अपने विवाहित जीवन की खुशियां खो बैठोगी.

‘‘तुम अपने पति से नाराज हो कर मायके में रह रही हो. यों दूर रहने के कारण पति के मन में पत्नी के चरित्र के प्रति शक ज्यादा आसानी से जड़ पकड़ लेता है. पति के प्यार का खतरा उठाने से बेहतर है ससुराल वालों की जलीकटी बातें और गलत व्यवहार सहना. तुम फौरन अपने पति के पास लौट जाओ, शिखा,’’ अत्यधिक भावुक हो जाने से अनिता का गला रुंध गया.

‘‘मैं लौट जाऊंगी,’’ शिखा ने दृढ़ स्वर में अपना फैसला सुनाया.

‘‘तुम्हारा कल नीरज से मिलने का कार्यक्रम है…’’

‘‘हां.’’

‘‘उस का क्या करोगी?’’

शिखा ने पर्स में से अपना मोबाइल निकाल कर उसे बंद कर कहा, ‘‘आज से यह खतरनाक खेल बिलकुल बंद. उस की झूठीसच्ची प्रशंसा अब मुझे गुमराह नहीं कर पाएगी.’’

‘‘मुझे बहुत खुशी है कि जो मैं तुम्हें समझाना चाहती थी, वह तुम ने समझ लिया,’’ अपनी उदासी को छिपा कर अनिता मुसकरा उठी.

‘‘मुझे समझाने के चक्कर में आप तो परेशानी में फंस गईं?’’ शिखा अफसोस से भर उठी.

‘‘लेकिन तुम तो बच गईं. चलो, खाना खाएं.’’

‘‘आप को शादी की सालगिरह की शुभकामनाएं और कामना करती हूं कि दिनेश साहब की गलतफहमी जल्दी दूर हो और आप उन का प्यार फिर से पा जाएं.’’

‘‘थैंक यू,’’ शिखा की नजरों से अपनी आंखों में भर आए आंसुओं को छिपाने के लिए अनिता रसोई की तरफ चल दी.

शिखा का मन उन के प्रति गहरे धन्यवादसहानुभूति के भाव से भर उठा था.

Hindi Story: वही खुशबू – आखिर क्या थी उस की सच्चाई

Hindi Story: बहुत दिनों से सुनती आईर् थी कि भैरों सिंह अस्पताल के चक्कर बहुत लगाते हैं. किसी को भी कोई तकलीफ हो, किसी स्वयंसेवक की तरह उसे अस्पताल दिखाने ले जाते. एक्सरे करवाना हो या सोनोग्राफी, तारीख लेने से ले कर पूरा काम करवा कर देना जैसे उन की जिम्मेदारी बन जाती. मैं उन्हें बहुत सेवाभावी समझती थी. उन के लिए मन में श्रद्धा का भाव उपजता, क्योंकि हमें तो अकसर किसी की मिजाजपुरसी के लिए औपचारिक रूप से अस्पताल जाना भी भारी पड़ता है.

लोग यह भी कहते कि भैरों सिंह को पीने का शौक है. उन की बैठक डाक्टरों और कंपाउंडरों के साथ ही जमती है. इसीलिए अपना प्रोग्राम फिट करने के लिए अस्पताल के इर्दगिर्द भटकते रहते हैं. अस्पताल के जिक्र के साथ भैरों सिंह का नाम न आए, हमारे दफ्तर में यह नामुमकिन था.

पिछले वर्ष मेरे पति बीमार हुए तो उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा. तब मैं ने भैरों सिंह को उन की भरपूर सेवा करते देखा तो उन की इंसानियत से बहुत प्रभावित हो गई. ऐसा लगा लोग यों ही अच्छेखासे इंसान के लिए कुछ भी कह देते हैं. कोई भी बीमार हो, वह परिचित हो या नहीं, घंटों उस के पास बैठे रहना, दवाइयों व खून आदि की व्यवस्था करना उन का रोज का काम था. मानो उन्होंने मरीजों की सेवा का प्रण लिया हो.

उन्हीं दिनों बातोंबातों में पता चला कि उन की पत्नी भी बहुत बीमार रहती थी. उसे आर्थ्राइटिस था. उस का चलनाफिरना भी दूभर था. जब वह मेरे पति की सेवा में 4-5 घंटे का समय दे देते तो मैं उन्हें यह कहने पर मजबूर हो जाती, ‘आप घर जाइए, भाभीजी को आप की जरूरत होगी.’ पर वे कहते, ‘पहले आप घर हो आइए, चाहें तो थोड़ा आराम कर आएं, मैं यहां बैठा हूं.’

यों मेरा उन से इतनी आत्मीयता का संबंध कभी नहीं रहा. बाद में बहुत समय तक मन में यह कुतूहल बना रहा कि भैरों सिंह के इस आत्मीयतापूर्ण व्यवहार का कारण क्या रहा होगा? धीरेधीरे मैं ने उन में दिलचस्पी लेनी शुरू की. वे भी किसी न किसी बहाने गपशप करने आ जाते.

एक दिन बातचीत के दौरान वे काफी संकोच से बोले, ‘‘चूंकिआप लिखती हैं, सो मेरी कहानी भी लिखें.’’मैं उन की इस मासूम गुजारिश पर हैरान थी. कहानी ऐसे हीलिख दी जाती है क्या? कहानी लायक कोई बात भी तो हो. परंतु यह सब मैं उन से न कह सकी. मैं ने इतना ही कहा, ‘‘आप अपनी कहानी सुनाइए, फिर लिख दूंगी.’’

बहुत सकुचाते और लजाई सी मुसकान पर गंभीरता का अंकुश लगाते हुए उन्होंने बताया, ‘‘सलोनी नाम था उस का, हमारी दोस्ती अस्पताल में हुई थी.’’

मुझे मन ही मन हंसी आई कि प्यार भी किया तो अस्पताल में. भैरों सिंह ने गंभीरता से अपनी बात जारी रखी, ‘‘एक बार मेरा एक्सिडैंट हो गया था. दोस्तों ने मुझे अस्पताल में भरती करा दिया. मेरा जबड़ा, पैर और कूल्हे की हड्डियां सेट करनी थीं. लगभग 2 महीने मुझे अस्पताल में रहना पड़ा. सलोनी उसी वार्ड में नर्स थी, उस ने मेरी बहुत सेवा की. अपनी ड्यूटी के अलावा भी वह मेरा ध्यान रखती थी.

‘‘बस, उन्हीं दिनों हम में दोस्ती का बीज पनपा, जो धीरेधीरे प्यार में तबदील हो गया. मेरे सिरहाने रखे स्टील के कपबोर्ड में दवाइयां आदि रख कर ऊपर वह हमेशा फूल ला कर रख देती थी. सफेद फूल, सफेद परिधान में सलोनी की उजली मुसकान ने मुझ पर बहुत प्रभाव डाला. मैं ने महसूस किया कि सेवा और स्नेह भी मरीज के लिए बहुत जरूरी हैं. सलोनी मानो स्नेह का झरना थी. मैं उस का मुरीद बन गया.

‘‘अस्पताल से जब मुझे छुट्टी मिल गई, तब भी मैं ने उस की ड्यूटी के समय वहां जाना जारी रखा. लोगों को मेरे आने में एतराज न हो, इसीलिए मैं कुछ काम भी करता रहता. वह भी मेरे कमरे में आ जाती. मुझे खेलने का शौक था. मैं औफिस से आ कर शौर्ट्स, टीशर्ट या ब्लेजर पहन कर खेलने चला जाता और वह ड्यूटी के बाद सीधे मेरे कमरे में आ जाती. मेरी अनुपस्थिति में मेरा कमरा व्यवस्थित कर के कौफी पीने के लिए मेरा इंतजार करते हुए मिलती.

‘‘जब उस की नाइट ड्यूटी होती तो वह कुछ जल्दी आ जाती. हम एकसाथ कौफी पीते. मैं उसे अस्पताल छोड़ने जाता और वहां कईकई घंटे मरीजों की देखरेख में उस की मदद करता. सब के सो जाने पर हम धीरेधीरे बातें करते रहते. किसी मरीज को तकलीफ होती तो उस की तीमारदारी में जुट जाते.

‘‘कभी जब मैं उस से ड्यूटी छोड़ कर बाहर जाने की जिद करता तो वह मना कर देती. सलोनी अपनी ड्यूटी की बहुत पाबंद थी. उस की इस आदत पर मैं नाराज भी होता, कभी लड़ भी बैठता, तब भी वह मरीजों की अनदेखी नहीं करती थी. उस समय ये मरीज मुझे दुश्मन लगते और अस्पताल रकीब. पर यह मेरी मजबूरी थी क्योंकि मुझे सलोनी से प्यार था.’’

‘‘उस से शादी नहीं हुई? पूरी कहानी जानने की गरज से मैं ने पूछा.’’

भैरों सिंह का दमकता मुख कुछ फीका पड़ गया. वे बोले, ‘‘हम दोनों तो चाहते थे, उस के घर वाले भी राजी थे.’’

‘‘फिर बाधा क्या थी?’’ मैं ने पूछा तो भैरों सिंह ने बताया, ‘‘मैं अपने मांबाप का एकलौता बेटा हूं. मेरी 4 बहनें हैं. हम राजपूत हैं, जबकि सलोनी ईसाई थी. मैं ने अपनी मां से जिद की तो उन्होंने कहा कि तुम जो चाहे कर सकते हो, परंतु फिर तुम्हारी बहनों की शादी नहीं होगी. बिरादरी में कोई हमारे साथ रिश्ता करने को तैयार नहीं होगा.

‘‘मेरे कर्तव्य और प्यार में कशमकश शुरू हो गई. मैं किसी की भी अनदेखी करने की स्थिति में नहीं था. इस में भी सलोनी ने ही मेरी मदद की. उस ने मुझे मां, बहनों और परिवार के प्रति अपना फर्ज पूरा करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया.

‘‘मां ने मेरी शादी अपनी ही जाति में तय कर दी. बड़ी धूमधाम से शादी हुई. सलोनी भी आई थी. वह मेरी दुलहन को उपहार दे कर चली गई. उस के बाद मैं ने उसे कभी नहीं देखा. विवाह की औपचारिकताओं से निबट कर जब मैं अस्पताल गया तो सुना, वह नौकरी छोड़ कर कहीं और चली गई है. बाद में पता चला कि  वह दूसरे शहर के किसी अस्पताल में नौकरी करती है और वहीं उस ने शादी भी कर ली है.’’

‘‘आप ने उस से मिलने की कोशिश नहीं की?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं,’’ भैरों सिंह ने जवाब दिया, ‘‘पहले तो मैं पगला सा गया. मुझे ऐसा लगता था, न मैं घर के प्रति वफादार रह पाऊंगा और न ही इस समाज के प्रति, जिस ने जातपांत की ये दीवारें खड़ी कर रखी हैं. परंतु शांत हो कर सोचने पर मैं ने इस में भी सलोनी की समझदारी और ईमानदारी की झलक पाई. ऐसे में कौन सा मुंह ले कर उस से मिलने जाता. फिर अगर वह अपनी जिंदगी में खुश है और चाहती है कि मैं भी अपने वैवाहिक जीवन के प्रति एकनिष्ठ रहूं तो मैं उस के त्याग और वफा को धूमिल क्यों करूं? अब यदि वह अपनी जिंदगी और गृहस्थी में सुखी है तो मैं उस की जिंदगी में जहर क्यों घोलूं?’’

‘‘अब अस्पताल में इतना क्यों रहते हैं? और यह कहानी क्यों लिखवा रहे हैं?’’ मैं ने उत्सुकता दिखाई.

भैरों सिंह ने गहरी सांस ली और धीमी आवाज में कहा, ‘‘मैं ने आप को बताया था न कि मैं उस का अधिक से अधिक साथ पाने के लिए उस की ड्यूटी के दौरान उस की मदद करता था, पर दिल में उस की कर्मनिष्ठा और सेवाभाव से चिढ़ता था. अब मुझे वह सब याद आता है तो उस की निष्ठा पर श्रद्धा होती है, खुद के प्रति अपराधबोध होता है. अब मैं मरीजों की सेवा, प्यार की खुशबू मान कर करता हूं और मुझे अपने अपराधबोध से भी नजात मिलती है.’’

भैरों सिंह की आवाज और धीमी हो गई. वह फुसफुसाते हुए से बोले, ‘‘अब मैं सिर्फ एक बात आप को बता रहा हूं या कहिए कि राज की बात बता रहा हूं. इस अस्पताल के समूचे वातावरण में मुझे अब भी वही खुशबू महसूस होती है, सलोनी के प्यार की खुशबू. रही बात कहानी लिखने की, तो मेरे पास उस तक अपनी बात पहुंचाने का कोई जरिया भी तो नहीं है. अगर वह इसे पढ़ेगी तो समझ जाएगी कि मैं उसे कितना याद करता हूं. उस की भावनाओं की कितनी इज्जत करता हूं. यही प्यार अब मेरी जिंदगी है.’’

Hindi Story: बिन फेरे हम तेरे-क्यों शादी के बाद भी अकेली रह गई नीतू

Hindi Story: कहने और सुनने में कुछ अजीब लगता है, लेकिन यह भी एक सच्चा रिश्ता है, दिल का रिश्ता है. जब दिल से दिल जुड़ जाता है, तो चाहे हम साथसाथ न रहें, लेकिन हमें एकदूसरे की फिक्र होती है, एकदूसरे के प्रति लगाव होता है, इसी को प्यार कहा जाता है.

नीतू और सोहन का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है. उन्होंने शादी नहीं की और न ही साथसाथ रहते हैं, लेकिन एकदूसरे की फिक्र रहती है उन्हें, एकदूसरे का खयाल रखते हैं वे.

नीतू और सोहन को आज 20 साल हो गए हैं इस रिश्ते को निभाते हुए. कभी उन्होंने मर्यादा को नहीं तोड़ा है. दुखसुख में हमेशा एकदूसरे के साथ रहे. आज समाज भी उन को इज्जत की नजर से देखता है, क्योंकि सब जान गए हैं कि इन का रिश्ता तन का नहीं, मन का है. इन का रिश्ता दिखावा नहीं, बल्कि सच्चा है.

नीतू एक साधारण परिवार से थी. वह ज्यादा पढ़ीलिखी भी नहीं थी. बड़ी 2 बहनों की शादी हो गई थी. एक भाई भी था सूरज.

सूरज चाहता था कि पहले नीतू की शादी हो जाए, तब वह करेगा. हालांकि, वह नीतू से बड़ा था. अच्छा घरबार देख कर नीतू की शादी कर दी गई.

सूरज का एक बचपन का दोस्त था सोहन. सूरज के घर अकसर उस का आनाजाना होता था. वह नीतू को पसंद करता था और वह भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी, लेकिन किसी में कहने की हिम्मत नहीं थी, क्योंकि सोहन उन की जाति का नहीं था और वे जानते थे कि उन की शादी नहीं हो सकती है. इस बात को न ही घर वाले और न ही गांव वाले स्वीकार करेंगे.

नीतू की ससुराल वालों का असली चेहरा तब नजर आया, जब वह शादी के बाद पग फेरे के लिए नहीं आ पाई, लेकिन जब वह कुछ दिनों के बाद आई, तो उस के चेहरे पर चोटों के निशान

देख कर उस के परिवार वाले दंग रह गए. नीतू ने बताया कि उन्होंने पैसों की  मांग की है.

इस तरह अकसर 10-15 दिनों के बाद नीतू अपनी ससुराल से मार खा कर आती और पैसे ले जाती.

सोहन का अकसर नीतू के गांव किसी न किसी काम से चक्कर लग जाता था. उसे नीतू की मार और पैसों के बारे में भी सब पता लग गया था.

सोहन ने सूरज से बहुत बार कहा, ‘‘सूरज, नीतू को घर वापस ले आ. वे लोग किसी दिन उसे मार देंगे. ऐसे लालची लोगों से क्या रिश्ता रखना…’’

लेकिन सूरज और उस का परिवार नहीं मानते थे. सूरज कहता, ‘‘गांव वाले क्या कहेंगे कि शादीशुदा लड़की को घर में बैठा लिया. तुम्हें तो पता है कि यहां गांव में ऐसा नहीं होता है.’’

एक दिन सोहन जब नीतू के गांव किसी काम से गया, तो न जाने उस के मन में क्यों बेचैनी हो रही थी. वह नीतू के घर चला गया. पहले भी वह सूरज के साथ कभीकभी चला जाता था उस के घर. जब वह वहां पहुंचा, तो वहां का मंजर देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

नीतू के तन के कपडे़ चीथड़े बन चुके थे और चोट लगने की वजह से उस के माथे से खून बह रहा था, लेकिन अभी भी उसे मारा जा रहा था और वह गिड़गिड़ा कर बारबार एक बात कह रही थी, ‘‘मेरा भाई इतने पैसे कहां से लाएगा.’’

‘‘हमें नहीं पता… जहां मरजी से लाओ… हमें तो पैसे चाहिए, वरना अपने घर वापस चली जाओ. हम ने कोई धर्मशाला नहीं खोल रखी है, जो तुम्हें खिलाते रहें…’’ उस की सास चिल्लाई.

सोहन यह मंजर देख कर बौखला गया और नीतू को अपने साथ ले आया. जब नीतू घर पहुंची और सोहन ने सारा किस्सा सूरज को बताया, लेकिन सूरज फिर से वही बात दोहराने लगा, ‘‘हम नीतू को इस घर में नहीं रख सकते. इस की अब शादी हो गई है. इस का जीनामरना अब वहीं पर है. जैसे लाए हो, वैसे ही इसे वापस छोड़ आओ.’’

सोहन नहीं माना और नीतू भी वापस उस नरक में नहीं जाना चाहती थी. सोहन ने नीतू से कहा, ‘‘मेरी अब शादी हो गई है, इसलिए अब हम शादी तो नहीं कर सकते, लेकिन मैं तुम्हें उस नरक में भी वापस नहीं जाने दूंगा.

‘‘शहर में मेरा एक दोस्त है. मैं तुम्हें उस के घर कुछ समय के लिए छोड़ दूंगा और थाने जा कर हम तेरी ससुराल वालों के खिलाफ केस भी करेंगे. तुझे उस से तलाक दिलवा कर तेरी दोबारा शादी करा दूंगा.’’

लेकिन नीतू अब दोबारा शादी नहीं करना चाहती थी. उस का मन तो अभी भी सोहन में बसा हुआ था. वह उसी की यादों के सहारे जिंदगी बिताना चाहती थी.

सोहन नीतू को शहर ले आया और अपने दोस्त के घर ठहरा दिया. उस का दोस्त सबइंस्पैक्टर था. उस के परिवार ने नीतू का बहुत खयाल रखा और उस की हर मुमकिन मदद भी की. नीतू को तलाक दिलवाया और उसे सिलाई का कोर्स भी करवाया.

सोहन ने उसे सिलाई मशीन खरीद कर दे दी, ताकि वह अपना खर्चा खुद उठा सके और किसी पर बोझ न बने. नीतू की खैरियत जानने के लिए वह समयसमय पर शहर आता रहता है. दुखसुख में भी वह हमेशा उस की मदद करता है.

नीतू अपने इस बेनाम रिश्ते से बंधी, बिन फेरों की बिन ब्याही दुलहन की तरह अपनी जिंदगी काट रही है, लेकिन वह खुश है अपने इस रिश्ते से. उन का यह पावन रिश्ता है. कोई कसमें नहीं, कोई वादे नहीं, फिर भी वे एकदूजे के हैं.

Hindi Story: निशि डाक-अंधेरी रात में किसने भूपेश को पुकारा

Hindi Story: आज खेत से लौटने में रात हो गई थी. भूपेश ने इस बार अपने खेत में गेहूं की फसल बोई थी. आवारा जानवरों से फसल को उजड़ने से बचाना था, सो रातरातभर जाग कर रखवाली करनी पड़ती थी. बाड़ लगाने का भी कोई ज्यादा फायदा नहीं था, क्योंकि आवारा पशु उसे भी काट डालते थे. आज तो खेत में पानी भी लगाना था, सो भूपेश को लौटने में बहुत रात हो गई थी.

अगलबगल के खेतों वाले बाकी साथी भी चले गए थे. भूपेश को रात में अकेले ही लौटना पड़ा. घर पर मां इंतजार कर रही थी. रात सायंसायं कर रही थी. खेतोंखेतों होता हुआ भूपेश चला आ रहा था. पीपल, नीम, आम, बबूल के पेड़ों की छाया ऐसी लग रही थी जैसे प्रेतात्माएं आ कर खड़ी हो गई हों. बीचबीच में किसी पक्षी की आवाज सन्नाटे को चीर जाती थी. ‘ऐसी गहरी काली रात में ही अकेले आदमी को प्रेतात्माएं घेरने की कोशिश करती हैं. वे अकसर खूबसूरत औरत का वेश बना कर आती हैं और बड़ी ही मीठी आवाज में बुलाती हैं…

‘अम्मां कहती हैं कि अंधियारी रात में अगर कोई औरत मीठी आवाज में बुलाए तो पीछे मुड़ कर मत देखो, बस सीधे चलते चले जाओ.  ‘प्रेतात्मा 2 बार ही पुकारती है और अगर मुड़ कर देखो भी तो तीसरी आवाज पर मुड़ो, क्योंकि प्रेतात्मा तो  2 बार ही आवाज दे सकती है…’

अम्मां की इस सीख को याद करता हुआ भूपेश चला जा रहा था. नहर की मेंड़ के किनारे झाड़झंखाड़, मूंज और झरबेरी की झाड़ियां उगी हुई थीं. इन जगहों पर सांपबिच्छू, कीड़ेमकोड़े भी रहते थे.  भूपेश के मोबाइल फोन में टौर्च थी, जिस से वह रास्ता देखता जा रहा था. उस की भी बैटरी डिस्चार्ज हो जाने का खतरा था. अपने डर को काबू में करते हुए वह जल्दीजल्दी कदम बढ़ा रहा था.

‘‘क्या आप राजपुर गांव तक जा रहे हैं?’’ पीछे से एक मधुर आवाज आई. राजपुर भूपेश के गांव का ही नाम था. यह सुन कर उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं और चाल तेज हो गई. भूपेश को लगा कि निशि डाक यानी रात की आत्मा उसे आवाज दे रही है. अगर वह उस के चंगुल में फंस गया, तो निशि डाक उसे बंधक बना लेगी, उस के अंदर घुस जाएगी और फिर वह आत्मा का गुलाम बन जाएगा.

‘‘क्या आप राजपुर गांव तक जा रहे हैं?’’ फिर वही मधुर आवाज आई. ‘2 बार आवाज आ गई है. पीछे मुड़ कर नहीं देखना है…’ दिल की तेज धड़कनों के साथ भूपेश चलता जा  रहा था.  तीसरी बार फिर वही आवाज गूंजी, ‘‘क्या आप राजपुर गांव जा रहे हैं?’’

‘आत्मा तो बस 2 बार आवाज देती है. इस ने तीसरी बार भी आवाज दी है, तो इस का मतलब यह आत्मा नहीं है…’ भूपेश ने सोचा और डरतेडरते सिर घुमाया और टौर्च की रोशनी में देखा कि यह तो उसी के गांव की एक लड़की गौरी है… गांव के पंडितजी की बेटी. शहर जाती है. बीए की पढ़ाई कर रही है.

‘‘गौरी, तुम इतनी रात को कहां से आ रही हो?’’ डरी हुई आवाज में भूपेश ने पूछा. अभी उस का अपने डर और घबराहट पर काबू नहीं हुआ था. ‘‘आज मैं कालेज से देर में छूट पाई थी और फिर बस भी देर से मिली, इसी के चलते देर हो गई,’’ गौरी ने बताया. रास्ता तकरीबन कट ही चुका था.

भूपेश और गौरी हंसतेबतियाते घर आ गए थे. भूपेश और गौरी दोनों तकरीबन हमउम्र थे. बचपन में वे एक ही स्कूल में पढ़े थे. साथ खेले, लड़ेझगड़े थे, उन के बीच प्यार का बीज पिछली रात की आत्मा ने बो दिया था. भूपेश के पिता खेतीकिसानी करने वाले एक मेहनती इनसान थे. सामाजिक रूढि़यों और व्यवस्था के मुताबिक वे निचली जाति के कहे जाते थे. गौरी ब्राह्मण परिवार से थी. उस के पिता पंडित गंगाधर शास्त्री पीढि़यों से चला आ रहा पंडिताई का धंधा करते थे. आसपास के गांवों में भी उन का अच्छाखासा सम्मान था.

ग्रेजुएशन कर रहा भूपेश पढ़ाई के साथसाथ पिता की खेतीबारी में भी अपना पूरा योगदान देता था. वह बहुत मेहनती था. कुछ बन कर मातापिता को सुख देना चाहता था. छोटे भाई और बहन को भी पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका मिले, यह उस की दिली तमन्ना थी.

‘‘कुछ पढ़तीलिखती भी हो या बस ऐसे ही मौजमस्ती करने जाती हो कालेज में?’’ एक दिन भूपेश ने गौरी को छेड़ा.  ‘‘अरे, अगर मैं फेल हो गई, तो पिताजी डिगरी भी पूरी नहीं करने देंगे… घर पर बिठा देंगे,’’ गौरी ने कहा, ‘‘और तुम्हारा क्या इरादा है… आगे क्या करोगे?’’ ‘‘ग्रेजुएशन की डिगरी ले कर फिर सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करूंगा. अम्मांबाबूजी को कुछ बन कर दिखाना है. उन्होंने बहुत दुख उठाए हैं मेरे लिए,’’ भूपेश ने कहा.

कुछ समय के बाद भूपेश का रिजल्ट आ गया था. वह फर्स्ट डिवीजन में पास हो गया था और आगे की तैयारी के लिए इलाहाबाद जाने की सोच रहा था.  जब से गौरी को यह बात पता लगी थी, उस की भूखप्यास गायब हो गई थी.  ‘न जाने कब लौटेगा अब वह… तब तक तो पिता और भाई मेरा ब्याह कहीं और करवा देंगे…’ यही सब सोच कर गौरी को घबराहट होती थी.

‘‘तुम इलाहाबाद चले गए, तो पीछे से मेरे घर वाले मेरी शादी करा ही देंगे. वैसे भी मेरे पिता और भाई हमारी शादी को कभी राजी नहीं होंगे,’’ गौरी ने कहा. ‘‘तुम बस अपनी शादी मत होने देना. जब मैं अच्छी नौकरी पा लूंगा, फिर तुम्हारा हाथ मांगूंगा. तब तुम्हारे पिता मना नहीं कर पाएंगे,’’ भूपेश गौरी को दिलासा दे रहा था.

गौरी गांव में ही रह गई और भूपेश इलाहाबाद चला गया. गौरी को आज भी याद थी उस के बचपन की वह घटना, जब गांव के ही रूपेंद्र ठाकुर के परिवार ने अपने ही घर की बेटी को मार कर फांसी पर लटका दिया था, क्योंकि वह गांव के ही एक पासी लड़के से इस कदर दिल लगा बैठी थी कि उस के साथ भाग जाने को भी तैयार हो गई थी.  यह पता चलने पर उस के पिता और भाइयों ने ही उस का गला घोंट कर उसे फंदे से लटका दिया था और पुलिस को घूस दे कर मामला रफादफा करवा  दिया था. वह पासी लड़का और उस का पूरा परिवार ठाकुरों के डर से जान बचा कर गांव छोड़ कर भाग गया था और शहर में मजदूरी करने लगा था.

3 साल बीत गए थे. गौरी ने बीए कर लिया था. उस के लिए वर की तलाश जोरों पर थी. इस बीच भूपेश 1-2 दिन के लिए घर आता और चला जाता. उस ने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा रखा था. परिवार वालों पर पैसे का बोझ न पड़े, इसलिए वह शहर में ट्यूशन पढ़ा कर अपने खर्चे पूरे करता था.

‘‘लो पंडितजी, मिठाई खाओ…’’ एक दिन भूपेश के पिता सारे गांव में लड्डू बांट रहे थे. खुशी उन के चेहरे से छलक रही थी.

‘‘क्या खुशखबरी है भूपेश के बापू?’’ पंडित गंगाधर शास्त्री ने हंस  कर पूछा.

‘‘भूपेश को डिगरी कालेज में पढ़ाने की नौकरी मिल गई है. शुरू में ही 60,000 रुपए महीना मिलेंगे. अपने गांव का पहला लड़का है, जो इतनी बड़ी पोस्ट पर पहुंचा है. अखबार में भी खबर छपी है,’’ बेटे की कामयाबी ने पिता की छाती गर्व से चौड़ी कर दी थी.

यह सुन कर पंडित गंगाधर शास्त्री के मन में जलन ने जन्म ले लिया. दिल से आह सी निकली. पर फिर मन ने यह भी माना कि भूपेश है भी मेहनती और लगनशील, इसीलिए इस मुकाम तक पहुंचा है, वरना उन के दोनों बेटों में से तो एक भी इंटर भी सही से पास नहीं कर पाया था. दोनों को मजबूरन अपने पंडिताई के धंधे में ही उतारना पड़ा था. गौरी ने भी यह खबर सुनी, तो उस के दिल में खुशी की एक लहर दौड़ गई. अब इंतजार था कि कब भूपेश घर वापस आएगा.

भविष्य क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा, पर उम्मीद की एक लौ तो जली ही थी. आखिर वह दिन आ ही गया. भूपेश घर आया, तो उस के परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई. भूपेश अब गौरी के पिता से अपने रिश्ते की बात करने को बेताब था.

‘‘नमस्कार बाबूजी,’’ कहते हुए भूपेश ने पंडित गंगाधर शास्त्री के पैर छुए.

‘‘अरे, आओ भूपेश. बहुत अच्छी नौकरी लग गई है तुम्हारी. सारे गांव का नाम रोशन कर दिया तुम ने तो.’’ ‘‘सब आप के आशीर्वाद का ही फल है बाबूजी,’’ भूपेश ने कहा.

‘‘बहुत बढ़िया. ऐसे ही तरक्की करो जीवन में,’’ इस बार उन का आशीर्वाद दिल से निकला था.

‘‘बाबूजी, एक बात कहनी है आप से,’’ डरतेडरते भूपेश किसी तरह बोल पाया.

‘‘हां, बोलो बेटा… इस में पूछने की क्या बात है,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘अगर आप को मंजूर हो, तो मैं गौरी का हाथ आप से मांगना चाहता हूं. मैं उसे जीवन में कभी कोई दुख नहीं दूंगा,’’ भूपेश किसी तरह बोल पाया. सुनते ही पंडितजी सन्न रह गए. कुछ बोल न फूटे. उन्हें अंदाजा तो था कि गौरी और भूपेश में अच्छी बोलचाल है, पर वे दोनों शादी करना चाहते हैं, उन्होंने इतना नहीं सोचा था. पंडित गंगाधर शास्त्री की चुप्पी को उन की नाराजगी जान कर भूपेश चुपचाप वहां से चला गया. सब कशमकश में थे.

गौरी के दोनों भाई गुस्से से आगबबूला हो रहे थे. ‘‘उस हरामखोर की इतनी हिम्मत… नौकरी लग गई तो अपनी औकात भूल गया… हम से बराबरी करने लगा…’’ बड़ा बेटा कह रहा था.

‘‘आप कहो तो अभी हाथपैर तोड़ कर फेंक आएं…’’ छोटा बेटा हां में हां मिला रहा था. पंडितजी ने उन्हें शांत रहने को कहा. दोनों समझ नहीं पा रहे थे कि पिताजी को क्या हो गया है. एक नीची जाति के लड़के की इतनी हिम्मत कि ब्राह्मणों की बेटी का हाथ मांगे. वे दोनों अपनी बहन को भी कोस रहे थे.

पंडितजी ऊहापोह में थे. ब्राह्मण थे, पर वे एक पढ़ेलिखे और प्रैक्टिकल इनसान भी थे. वे भूपेश की पढ़ाईलिखाई, उस की कामयाबी से खुश थे और उन की बेटी उस के साथ सुखी रहेगी, इस का भी उन्हें यकीन था.  उन की आंखों पर धर्मांधता का परदा नहीं चढ़ा था. उन के दोनों बेटे, जो फुजूल के तेवर दिखा रहे थे, उस का उन्हें एहसास था. उन्होंने भूपेश को अपने पिता के साथ खेतों में मेहनत करते, पीठ पर भारी वजन लादे हुए अनाज ढोते हुए और पढ़ाई करते हुए देखा था.

दिन बीत रहे थे. भूपेश के जाने का दिन आ गया था. जाते समय वह हिम्मत जुटा कर पंडित गंगाधर शास्त्री के पैर छूने गया. ‘‘जा रहा हूं बाबूजी,’’ कह कर वह पंडितजी के पैर छूने के लिए झुका. ‘‘जाओ बेटा, अपना काम मन लगा कर करना. शिक्षा देना एक महान और पवित्र काम है. कभी अपने कर्तव्य से मुंह मत मोड़ना,’’ पंडितजी ने अपना आशीर्वाद दिया और आगे कहा,

‘‘तुम्हारी और गौरी की शादी की बात हम तुम्हारे मातापिता के साथ मिल कर तय कर लेंगे.’’ यह सुन कर भूपेश खुश हो गया था. सब मुरझाए फूल खिल गए थे. खेतों में सरसों फूल रही थी. वसंत आ गया था. निशि डाक यानी रात की आत्मा से शुरू हुई कहानी अपने मुकाम पर पहुंच गई थी.

Hindi Story : अनुभव – गरिमा के साथ परेश को क्या महसूस हुआ

Hindi Story : पहाड़ियों पर कार सरपट भागी जा रही थी. ड्राइवर को शायद घर पहुंचने की ज्यादा जल्दी थी, वरना सांप जैसे टेढ़ेमेढ़े रास्तों पर इस तरह कौन खतरा मोल लेता है? सूरज तेजी से डूबने वाला था. परेश का मन भी शायद सूरज की तरह ही बैठा हुआ था, लेकिन पहाड़ों की जिंदगी उसे बहुत सुकून देती आई थी. जब भी छुट्टी मिलती वह भागा चला जाता था.

परेश की जिंदगी बहुत अजीब थी. नाम, पैसा, शोहरत सब था लेकिन मन के अकेलेपन को दूर करने वाला साथी कोई नहीं था. पहाड़ों पर सूरज छिपते ही अंधेरा तेजी से पसरने लगता है. जल्दी ही रात जैसा माहौल छाने लगता है. अचानक एक मोड़ पर जैसे ही कार तेजी से घूमी, परेश की नजर घाटी की एक चट्टान पर पड़ी. एक लड़की वहां खड़ी थी. इस मौसम में अकेली लड़की की यह हालत परेश को खटक गई.

उस ने ड्राइवर को कार रोकने को कहा. ड्राइवर ने फौरन कार रोक दी. ‘चर्र… चर्र…’ की तेज आवाज पहाड़ों के शांत माहौल को चीर गई. ड्राइवर ने हैरानी से परेश की ओर देखा और पूछा, ‘‘क्या हुआ साहबजी?’’

परेश ने बिना कोई जवाब दिए कार का दरवाजा खोला और बिजली की रफ्तार से उस ओर भागा जहां वह लड़की खड़ी दिखी थी. परेश ज्यों ही वहां पहुंचा लड़की ने नीचे छलांग लगा दी. लेकिन परेश ने गजब की फुरती दिखाते हुए उसे नीचे गिरने से पहले ही पकड़ लिया.

परेश ने फौरन उस लड़की को पीछे खींचा. वह पलटी तो परेश की ओर अजीब सी नजरों से देखने लगी. ‘‘क्या कर रही थी?’’ परेश ने उस लड़की का हाथ पकड़े हुए पूछा.

‘‘कुछ नहीं…’’ लड़की बोली. ‘‘कहां जाना है? इस वक्त सुनसान इलाके में इतनी खतरनाक जगह… क्या करना चाहती थी?’’ परेश ने फिर गुस्से से पूछा.

‘‘अरे, मैं तो सैरसपाटे के लिए… बस यों ही… पैर फिसल गया शायद…’’ कहते हुए लड़की ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया. परेश उस लड़की को अपनी कार की ओर ले आया. लड़की ने कोई विरोध भी नहीं किया. ड्राइवर उस लड़की को शक भरी नजरों से घूरने लगा. परेश की पूछताछ अभी भी जारी थी. थोड़ी देर बाद वह लड़की अपने मन का गुबार निकालने लगी.

परेश यह जान कर हैरान हुआ कि वह घर से भागी हुई थी और किसी भी कीमत पर वापस लौटने को तैयार नहीं थी. उस के अशांत मन का गुस्सा साफ झलक रहा था. ‘‘अब कहां ठहरी हो आप?’’ परेश ने पूछा.

‘‘मैं… अरे, मुझे मरना है, जीना ही नहीं, इसलिए ठहरने की क्या बात आई?’’ इतना कह कर वह लड़की खिलखिला कर हंस पड़ी. ‘‘यह क्या बात हुई. आप को पता है कि आप के मातापिता कितना परेशान होंगे…’’ परेश ने शांत लहजे में उसे समझाते हुए कहा.

‘‘मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ वह लड़की बेतकल्लुफ अंदाज से बोली. ‘‘मैं परेश… लेखक. यहां किताब पूरी करने आया हूं.’’

‘‘अच्छा, आप लेखक हैं? फिर तो मेरी कहानी भी जरूर लिखना… एक पागल लड़की, जिस ने किसी की खातिर खुद को मिटा दिया.’’ ‘‘आप ऐसी बातें न करें. जिंदगी बेशकीमती है, इसे खत्म करने का हक किसी को नहीं,’’ परेश ने कहा.

‘‘मेरा नाम है गरिमा सिंह… एक हिम्मती लड़की जिसे कोई नहीं हरा सकता, पर नकार जरूर दिया.’’ ‘‘आप ऐसा मत कहिए…’’ परेश अपनी बात पूरी करता उस से पहले ही गरिमा ने उस की बात काट दी, ‘‘आप मुझे यहीं उतार दीजिए…’’

‘‘मैं आप को अब कहीं नहीं जाने दूंगा. क्या आप मेरे साथ रहेंगी?’’ गरिमा ने पहले परेश की तरफ देखा, फिर अचकचा कर हंस पड़ी, ‘‘देख लीजिए, कोई नई कहानी न बन जाए?’’

परेश को शायद ऐसे सवाल की उम्मीद न थी. उस की सोच अचानक बदल गई. आखिर था तो वह भी मर्द ही. जोश को दबाते हुए वह बोला, ‘‘कोई नहीं जो कहानी बने, लेकिन अब अपने साथ और खिलवाड़ मत कीजिए.’’ ‘‘मरने वाला कभी किसी चीज से डरा है क्या सर…?’’ इस बार गरिमा की आवाज में गंभीरता झलक रही थी.

अचानक ड्राइवर ने कार रोकी. दोनों ने सवालिया नजरों से उसे देखा. कार में कोई खराबी आ गई थी जिसे वह ठीक करने में जुटा था. अब रात होने लगी थी. तभी ड्राइवर ने परेश को आवाज लगाई, ‘‘साहब, बाहर आइए.’’

परेश हैरानी से कार से बाहर निकला. ड्राइवर बोनट खोले इंजन को दुरुस्त करने में बिजी था. उस ने गरदन ऊपर उठाई और परेश के कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘साहबजी, कार को कुछ नहीं हुआ है. आप को एक बात बतानी थी, इसलिए यह ड्रामा किया.’’ ‘‘क्या?’’ परेश ने पूछा.

‘‘साहबजी, यह लड़की मुझे सही नहीं लग रही. आजकल पहाड़ों में… मुझे डर है कि कहीं आप के साथ कुछ गलत न हो जाए.’’ ‘‘अरे, तुम चिंता मत करो… मैं सब समझता हूं.’’

‘‘ठीक है साहब, आप की जैसी मरजी,’’ ड्राइवर ने लाचारी से कहा. ‘‘अच्छा, हमें ऐसी जगह ले चलो जहां भीड़भाड़ न हो,’’ परेश ने कहा.

सीजन नहीं होने से भीड़भाड़ नहीं थी. शहर से थोड़ा दूर एक बढि़या लोकेशन पर उन्हें ठहरने की शानदार जगह मिल गई. ड्राइवर उन्हें होटल में छोड़ कर वापस चला गया. कमरे में आते ही गरिमा का अल्हड़पन दिखने लगा था. अब ऐसा कुछ नहीं था जिस से लगे कि वह थोड़ी देर पहले जान देने जा रही थी.

रात के 9 बज रहे थे. डिनर आ गया था. गरिमा बाथरूम में थी. थोड़ी देर बाद परेश की ड्रैस पहन कर वह बाहर निकली तो एकदम तरोताजा लग रही थी. उस की खूबसूरती परेश को मदहोश करने लगी. डिनर निबट गया. एक बैड पर लेटे दोनों उस मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे जिस की वजह से गरिमा इतनी परेशान थी.

गरिमा की कहानी बड़ी अजीब थी. कालेज के बाद उस ने जिस कंपनी में काम शुरू किया वहीं उस के बौस ने उसे प्यार के जाल में ऐसा फंसाया कि वह अभी तक उस भरम से बाहर नहीं निकल पा रही थी. अधेड़ उम्र का बौस उसे सब्जबाग दिखाता रहा और उस से खेलता रहा. जब गरिमा के मम्मीपापा को इस बात की भनक लगी तो उन्होंने उसे बहुत समझाया. सख्ती भी की लेकिन एक बार तीर कमान से निकल जाए तो फिर उसे वापस कमान में लौटाना मुमकिन नहीं होता. कुछ परवरिश में भी कमी रही. न पापा को फुरसत और न मम्मी को.

गरिमा को पुलिस का डर नहीं था. वह पहले भी 4 बार ऐसा कर चुकी थी, इसलिए उस के मातापिता अब पुलिस में शिकायत करा कर अपनी फजीहत नहीं कराना चाहते थे. गरिमा सो चुकी थी. परेश उस के बेहद करीब था. उस की सांसों की उठापटक एक अजीब सा नशा दे रही थी. आहिस्ता से उस का हाथ गरिमा की छाती पर चला गया. कोई विरोध नहीं हुआ. कुछ पल ऐसे ही बीत गए.

परेश कुछ और करता, उस से पहले ही गरिमा ने अचानक अपनी आंखें खोल दीं, ‘‘आप की क्या उम्र है सर?’’ ‘‘यही कोई 40 साल…’’ परेश ने जवाब दिया.

‘‘गुड, मैच्योर्ड पर्सन… अच्छा, एक बात बताओ… मैं कैसी लग रही हूं?’’ मुसकराते हुए गरिमा ने पूछा. ‘‘बहुत ज्यादा खूबसूरत,’’ परेश ने जोश में कहा.

इस में कोई शक नहीं था कि गरिमा की अल्हड़ जवानी, मासूमियत से लबरेज खूबसूरती सच में बड़ी दिलकश लग रही थी. ‘‘सच में…?’’

‘‘सच में आप बहुत खूबसूरत हैं,’’ परेश ने अपनी बात दोहराई. ‘‘लेकिन मैं खूबसूरत ही होती तो वह मुझे क्यों छोड़ता… दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किया उस ने…’’

‘‘प्लीज गरिमा, आप हकीकत को मान क्यों नहीं लेतीं? जो हुआ सही हुआ. पूरी जिंदगी पड़ी है आप की. वहां उस के साथ क्या फ्यूचर था, यह भी सोचो?’’ ‘‘इतना आसान नहीं है सर, किसी को भुला देना. प्यार किया है मैं ने…’’

‘‘मान लिया लेकिन तुम में समझ ही होती तो क्या ऐसे प्यार को अपनाती?’’ ‘‘सर, यह सही है कि हम में थोड़ा उम्र का फर्क था लेकिन उस के बीवीबच्चे थे, यह मुझे अब पता चला… धोखा किया उस ने मेरे साथ…’’

‘‘तो फिर तुम उसे अब क्यों याद कर रही हो? बुरा सपना बीत गया. अब तो वर्तमान में लौट आओ?’’ गरिमा ने कोई जवाब नहीं दिया. वह परेश के बहुत करीब लेटी थी. सच तो यह था कि परेश अब बहुत दुविधा में था.

गरिमा का हाथ परेश की छाती पर था. उस का इस तरह लिपटना उसे असहज कर रहा था. उस के अंदर शांत पड़ा मर्द जागने लगा. गरिमा के मासूम चेहरे पर कोई भाव नहीं थे. ‘‘क्या तुम्हें मुझ से डर नहीं लगता?’’ परेश ने पूछा.

‘‘नहीं, मुझे आप पर भरोसा है,’’ गरिमा ने शांत आवाज में जवाब दिया. ‘‘क्यों… मैं भी मर्द हूं… फिर?’’ परेश ने पूछा.

‘‘कोई नहीं सर… अब मैं इनसान और जानवर में फर्क करना सीख गई हूं.’’ गरिमा के जवाब से परेश को ग्लानि महसूस हुई. वह फौरन संभल गया. गरिमा क्या सोचेगी… हद है मर्द कितना नीचे गिर सकता है? परेश का मन उसे कचोटने लगा.

लेकिन गरिमा का अलसाया बदन परेश में भूचाल ला रहा था. गरिमा का खुलापन अजीब राज बन रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था कि इस इम्तिहान में कैसे पास हो… गरिमा अब भी उस से लिपटी हुई थी. उस की आंखों में नींद की खुमारी झलक रही थी.

परेश सोच रहा था कि गरिमा का ऐसा बरताव उस के लिए न्योता था या अपनेपन में खोजता विश्वास… परेश की दुविधा ज्यादा देर नहीं चली. उस की हालत को समझ कर गरिमा बोली, ‘‘अगर आप इस समय मुझ से कुछ चाहते हैं तो मैं इनकार नहीं करूंगी… आप की मैं इज्जत करती हूं… आप ने मुझे आज नई जिंदगी दी है.’’

‘‘अरे नहीं, प्लीज… ऐसा कुछ भी नहीं… तुम दोस्त बन गई हो… बस यही बड़ा गिफ्ट है मेरे लिए,’’ सकपकाए परेश ने जवाब दिया. ‘‘उम्र में छोटी हूं सर लेकिन एक बात कहूंगी… शरीर का मिलन इनसान को दूर करता है और मन का मिलन हमेशा नजदीक, इसलिए फैसला आप पर है…’’

परेश को महसूस हुआ, सच में समझ उम्र की मुहताज नहीं होती. छोटे भी बड़ी बात कह और समझ सकते हैं. 2 दिन सैरसपाटे में बीत गए. परेश की किताब का काम शुरू ही न हो पाया, लेकिन गरिमा अब बिलकुल ठीक थी. वह वापस अपने घर लौटने को राजी हो गई थी. परेश ने फोन नंबर ले कर उस के पापा से बात की. घर से गुम हुई जवान लड़की की खबर पा कर गरिमा के मम्मीपापा ने सुकून की सांस ली.

परेश और गरिमा अब दोस्त बन गए थे. पक्के दोस्त, जिन में उम्र का फर्क तो था लेकिन आपसी समझ कहीं ज्यादा थी. परेश की मेहनत रंग लाई और गरिमा अपने घर वापस लौट गई. कुछ दिन बाद उस की शादी भी हो गई. अब वह अपनी गृहस्थी में खुश थी. परेश के लिए यह सुकून की बात थी. अकसर उस का फोन आ जाता, वही बिंदास, अल्हड़पन लेकिन अब सच में उस ने जिंदगी जीनी सीख ली थी. दिखावा नहीं बल्कि औरत की सच्ची गरिमा का अहसास और जिम्मेदारी उस में आ गई थी.

परेश सोचता था कि गरिमा को उस ने जीना सिखाया या गरिमा ने उसे? लेकिन यह सच था कि गरिमा जैसी अनोखी दोस्त परेश को औरत के मन की गहराइयों का अहसास करा गई.

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