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Story in Hindi : काई

Story in Hindi. मंजू ने राजन की गहरी आंखों में  झांका और लाज से अपनी आंखें बंद कर लीं. उस ने राजन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया… इस नाजायज रिश्ते का क्या नतीजा रहा?

एक दिन अचानक मौसम ने ऐसी करवट ली कि लोग अपने घरों की ओर भागने लगे. सां झ होतेहोते आसमान से ऐसा  झमा झम पानी गिरा कि चारों तरफ ऊधम मच गया. उसी तेज आंधीतूफान के बीच राजन भीगताकांपता हुआ किसी तरह मंजू के घर के सामने से गुजर ही रहा था, तभी अचानक ‘खट’ से दरवाजा खुला.

दरअसल, बनारस के पास एक छोटा सा कसबा है, वहीं राजन अपनी पत्नी सुनीता के साथ रहता था. राजन दिल का बहुत साफ और सीधा इनसान था. वह बरतनों का व्यापार करता था लेकिन माल लाने और पैसों की अदायगी के चक्कर में उसे अकसर हफ्तों शहर से बाहर गुजारने पड़ते थे.

ठीक उन के पड़ोस में मंजू का घर था. मंजू के पति भी दूर सूरत के कपड़ों की एक फैक्टरी में थे, जो सालभर में बस एक ही बार घर लौट पाते थे.

सुनीता की मां को लकवा मार गया था, जिस से वह भी अपने मायके लखनऊ आतीजाती रहती थी. अब दोनों ही अपनेअपने सूने घरों में अकेलेपन से घुट रहे थे. शुरुआत तो बस आतेजाते छोटीमोटी बातचीत से हुई थी. कभी छत पर कपड़े फैलाते हुए, तो कभी गली के मोड़ पर.

पर धीरेधीरे ये मुलाकातें गहरी होती चली गईं. दोनों के बीच एक ऐसा अनकहा सा रिश्ता जुड़ गया, जो इस दुनिया और समाज के नियमों के हिसाब से बिलकुल गलत था.

उस बरसात की शाम को मंजू ने चौखट पर आ कर घबराते हुए कहा, ‘‘अरे राजनजी, बाहर तो कयामत आ गई है. जल्दी से अंदर आ जाइए, नहीं तो पूरा भीग जाइएगा.’’

राजन ने कुछ सोचा नहीं और तुरंत बरामदे के अंदर आ गया. अपनी भीगी कमीज को  झटकते हुए वह बोला, ‘‘हां मंजूजी, मौसम अचानक ऐसा बिगड़ गया कि संभलने का मौका ही नहीं मिला. सोचा था कि किसी तरह भाग कर घर पहुंच जाएंगे, पर यह पानी तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा.’’

थोड़ी देर बाद मंजू रसोई से गरमागरम चाय की 2 प्यालियां ले कर कमरे में आई. बाहर पानी बरस रहा था, पर कमरे के भीतर की खामोशी में एक अजीब सा खिंचाव और बेचैनी तैर रही थी.

मंजू ने चाय का कप आगे बढ़ाया, लेकिन उस की नजरें  झुकी हुई थीं. वह दबी आवाज में बोली, ‘‘राजनजी, यह अकेलापन भी बड़ी जालिम चीज है, इनसान को भीतरभीतर खोखला कर देता है. जब सूने घर में कोई बोलने वाला तक न हो, ता मन एकदम भारी हो जाता है.’’

राजन ने प्याली पकड़ते हुए धीरे से मंजू की कांपती उंगलियों को छू लिया. वह बेहद धीमे से बोला, ‘‘हम तुम्हारी तकलीफ अच्छी तरह सम झ रहे हैं मंजू. हमारा भी हाल कुछ अलग नहीं है. जब मन उदास होता है न, तो बस यही लगता है कि काश कोई ऐसा इनसान पास होता जिस से अपने दिल का सारा दर्द कह पाते.’’

मंजू ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उस की सांसें तेज हो गईं. उस धुंधली शाम, समाज के बनाए कायदेकानून और बदनामी के डर को पीछे छोड़ते हुए दोनों के कदम एकदूसरे की तरफ बढ़ गए.

बाहर सावन की बारिश अब और तेज हो चुकी थी, जैसे बादलों ने सारे बांध तोड़ दिए हों. कमरे के एक कोने में रखी डिबरी की धीमी रोशनी में दोनों एकदूसरे के बेहद पास बैठे थे.

राजन ने आगे बढ़ कर मंजू के चेहरे पर बिखरी भीगी लटों को धीरे से कान के पीछे समेटा और बोला, ‘‘मंजू, आज तुम्हारा यह रूप देख कर सचमुच हमारा जिया बेकाबू हो गया है. ऐसा लगता है जैसे यह सावन सिर्फ हम दोनों को मिलाने के वास्ते ही आया है.’’

मंजू ने शरमा कर अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया और धीमी आवाज में फुसफुसाई, ‘‘अरे राजनजी, ऐसा मत बोलिए. हम को बहुत लाज आती है. यह सब ठीक नहीं है, कोई देख लेगा तो सांपछछूंदर वाला हाल हो जाएगा.’’

राजन ने मंजू की ठुड्डी को धीरे से उठा कर अपनी तरफ किया. उस ने मंजू की आंखों में देखा और धीमे स्वर में कहा, ‘‘आज यहां कोई नहीं है मंजू. बस तुम हो, हम हैं और यह सुहाना मौसम है. सच बताओ, क्या तुम्हारे दिल में हमारे लिए कुछ नहीं है?’’

मंजू ने राजन की गहरी आंखों में  झांका और लाज से अपनी आंखें बंद कर लीं. उस ने राजन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया और कांपती हुई आवाज में बोली, ‘‘हमारा मन बहुत कमजोर पड़ गया है राजन. जब तुम सामने आते हो न, तो हम अपनेआप को एकदम भूल जाते हैं.’’

राजन ने मंजू को अपनी बांहों में भर लिया. तभी हवा के एक  झोंके से कमरे में जल रही डिबरी की लौ बुझ गई. अंधेरे में दोनों के दिलों की गरमी और करीब आती सांसों ने उस सूनेपन को मिटा दिया था. यह सिलसिला कई हफ्तों तक चलता रहा. दोनों भूल गए कि वे काई की तरह एक ऐसी फिसलन भरी राह पर हैं, जहां से लौटना नामुमकिन है.

एक रात, जब पूरा गांव गहरी नींद में सो रहा था, राजन मंजू के घर पर ही था. तभी अचानक मंजू की सास तीर्थयात्रा से लौट आईं, जिस से दोनों बेखबर थे. वे सीधे मेन दरवाजे की तरफ बढ़ीं. आंगन का भारी सा किवाड़ जोरजोर से खटखटाया गया.

मंजू की सास बाहर से चिल्लाईं, ‘‘अरे मंजू, किवाड़ खोलो बहुरिया. हम लौट आए.’’

सास की आवाज सुनते ही मंजू के चेहरे का रंग उड़ गया. डर के मारे उस के पैर थरथराने लगे. उस ने घबरा कर राजन का हाथ कस कर पकड़ लिया और कांपती आवाज में बोली, ‘‘राजन, अब क्या होगा? माताजी आ गईं. अगर वे तुम को यहां देख लेंगी, तो गजब हो जाएगा.’’

राजन ने अपनी गंभीरता बनाए रखी. उस ने मंजू का हाथ थाम कर हिम्मत बंधाई और बोला, ‘‘डरो मत मंजू. अब छिपनेछिपाने से कुछ नहीं होगा. आज नहीं तो कल, इस बात को सब के सामने आना ही था. किवाड़ खोलो, जो होगा हम देख लेंगे.’’

मंजू ने कांपते हाथों से सांकल खोली. सामने लालटेन लिए खड़ी उस की सास की नजर सीधे कमरे के भीतर खड़े राजन पर पड़ी.  झटके में सास के हाथ से लालटेन छूट कर जमीन पर गिर गई. तेल बिखर गया और गांव की उस खामोशी में एक नया तूफान खड़ा हो गया.

सास के सामने यह राज खुलने के बाद बात आग की तरह राजन की पत्नी सुनीता तक पहुंच गई.

सुनीता आपा खो बैठी और सीधे मंजू के घर आ धमकी, जहां राजन और मंजू दोनों मौजूद थे.

सुनीता रोते हुए गुस्से में चिल्लाई, ‘‘अरे राजन, यह क्या सुन रहे हैं हम? तुम हमारी पीठ पीछे यह पाप कर रहे थे? और तुम मंजू, तुम को तनिक भी लाजशरम नहीं आई?’’

राजन ने अपने अंदर छिपे डर को दबाया और बड़ी बेरुखी से बोला, ‘‘सुनीता, चिल्लाओ मत. जो सच है, वह तुम्हारे सामने है. अब हम मंजू के बिना नहीं रह सकते.’’

सुनीता ने अपने आंसू पोंछे और गुस्से में तमतमाते हुए बोली, ‘‘ऐसा कैसे नहीं रहोगे? हम यह गांव और समाज हिला के रख देंगे. कोर्टकचहरी जाएंगे, लेकिन तुम दोनों को जेल भिजवा के ही दम लेंगे,’’ इतना कह कर सुनीता पैर पटकती हुई अपने घर की तरफ चली गई.

सुनीता का यह रौद्र रूप देख कर राजन और मंजू के होश उड़ गए. बंद आंखों से भी उन्हें अपना आने वाला कल अब जेल की काल कोठरी में नजर आने लगा था.

मंजू ने थरथराते हुए राजन का हाथ पकड़ा और घबरा कर बोली, ‘‘राजन, अगर सुनीता पुलिस या पंचायत में गई, तो समाज हम दोनों को जीने लायक नहीं छोड़ेगी. इस तरह बदनाम हो कर घुटघुट के मरने से तो अच्छा है कि…’’

राजन की आंखों में एक अजीब सी हैवानियत उतर आई. उस ने बेहद धीमी और ठंडी आवाज में कहा, ‘‘क्यो न उसी को रास्ते से हटा दिया जाए? तुम ठीक कह रही हो मंजू. अब पानी सिर से ऊपर बह चुका है. उस को हमेशा के लिए चुप कराना ही पड़ेगा.’’

इस के बाद उन दोनों ने मिल कर एक खौफनाक साजिश रच डाली.

गांव की सरहद के पास एक पुराना, गहरा और सूखा कुआं था. अगली रात, राजन ने सुनीता के सामने माफी मांगने का ढोंग रचाया और उसे बहलाफुसला कर रात के सन्नाटे में गांव के बाहर मिलने के लिए मना लिया.

सुनीता सीधे दिल की थी, सो उस की बातों में आ कर वहां पहुंच गई. वहां चारों तरफ सन्नाटा देख कर सुनीता बोली, ‘‘राजन, तुम इस सूनी जगह पर क्यों बुलाए हो? चलो, अब घर चलें.’’

राजन अंधेरे के साए से बाहर निकला और पथराई आवाज में बोला, ‘‘घर अब तुम कभी नहीं जाओगी सुनीता.’’

इस से पहले कि सुनीता कुछ सम झ पाती या शोर मचाती, राजन और मंजू ने चीते की तरह  झपट कर उसे दबोच लिया.

सुनीता ने खुद को छुड़ाने की बहुत कोशिश की, हाथपैर मारे, लेकिन मंजू ने उस का मुंह कपड़े से कस कर दबा दिया था. दोनों ने मिल कर पूरी ताकत लगाई और सुनीता को उस गहरे सूखे कुएं में धकेल दिया.

उस स्याह अंधेरे कुएं से एक आखिरी चीख गूंजी… और फिर सबकुछ हमेशाहमेशा के लिए शांत हो गया.

सुनीता को रास्ते से हटाए एक हफ्ता बीत चुका था. पूरे गांव को यही लग रहा था कि सुनीता गुस्से में अपने मायके चली गई है, लेकिन राजन और मंजू के भीतर एक खौफनाक नरक की शुरुआत हो चुकी थी. जिस आलिंगन में कभी उन्हें सुकून मिलता था, अब वहां सिर्फ एकदूसरे के प्रति अविश्वास और घोर अपराधबोध की ‘काई’ जम चुकी थी.

राजन चौबीसों घंटे इसी बात से घबराता रहता कि कहीं मंजू कमजोर पड़ कर पुलिस के सामने सारा सच न उगल दे. उधर मंजू के मन में भी यह बात घर कर गई थी कि राजन खुद की चमड़ी बचाने के लिए उसे भी रास्ते से हटा सकता है.

इसी अविश्वास और खौफ के साए में, राजन ने मंजू को भी ठिकाने लगाने की एक खतरनाक साजिश रच डाली. वह बाजार से चूहों को मारने वाला एक बेहद तेज जहर खरीद लाया.

रात के सन्नाटे में जब राजन मंजू के घर पहुंचा, तो उस के चेहरे पर एक बनावटी और  झूठी मुसकान थी. वह बोला, ‘‘मंजू, हम लोग को आपस में लड़ना झगड़ना नहीं है. हम तुम्हारे साथ यहां से शहर भागने का पूरा इंतजाम कर लिए हैं. तुम बैठो, हम तुम्हारे लिए रसोई में चाय बना रहे हैं.’’

राजन रसोई में गया और छिप कर मंजू के प्याली में वह तेज जहर मिला दिया. जब वह बाहर आया, मजाक तो उस की धड़कनें तेज थीं. राजन ने प्याली मंजू की तरफ बढ़ाते हुए उतावली आवाज में कहा, ‘‘लो मंजू, गरमगरम चाय पी लो. सारी थकान एकदम गायब हो जाएगी.’’

मंजू ने चाय की प्याली को हाथ में लिया. उस ने पहले प्याली को देखा, फिर अपनी पैनी नजरों से राजन के चेहरे को पढ़ा. उस ने चाय को चुपचाप नीचे रख दिया और उस की आंखों में साफसाफ नफरत तैरने लगी.

मंजू अचानक ठहाका मार कर हंसी और बेहद तीखे लहजे में बोली, ‘‘क्या  राजन बाबू, तुम हम को बेवकूफ समझ रखे हो क्या? हम तुम्हारी नसनस से वाकिफ हैं. तुम्हारा यह कांपता हुआ हाथ और यह  झूठी ममता… हम को सब समझ में आ रहा है. तुम जिसे जहर देने आए न हो, वह पहले ही तुम्हारी खातिर तगड़ा इंतजाम कर चुकी है.’’

राजन का खून जम गया. वह हक्काबक्का हो कर हकलाने लगा, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’

मंजू दो कदम पीछे हटी और तंज कसते हुए बोली, ‘‘मतलब यह कि जब तुम रसोई में चाय में जहर मिला रहे थे, हम यहां खिड़की से दारोगाजी को पहले ही इशारा कर दिए थे. वे लोग बाहर तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं.’’

मंजू के मुंह से यह सुनते ही राजन के पैरों तले की जमीन खिसक गई. ठीक उसी पल, मेन दरवाजा एक  झटके में भरभरा कर टूट गया और पुलिस के भारी जूतों की आवाज से पूरा आंगन गूंज उठा.

लालटेन की पीली रोशनी में दारोगा और सिपाही चमचमाती हथकडि़यां लिए सामने खड़े थे.

राजन ने भागने के लिए पैर बढ़ाए, पर पुलिस ने उसे चारों तरफ से दबोच लिया.

मंजू भी सुबकते हुए घुटनों के बल जमीन पर बैठ गई. वह अच्छी तरह जानती थी कि राजन के साथसाथ जेल की वे काली सलाखें अब उस का भी इंतजार कर रही हैं.

एक नाजायज और फिसलन भरे रिश्ते की काई ने आखिरकार दोनों की जिंदगी को हमेशाहमेशा के लिए गहरे अंधकार में धकेल दिया था.  Story in Hindi

–राजेश प्रसाद

Honor Killing : नाबालिग को दी मौत

Honor Killing. देश की राजधानी दिल्ली के उत्तरी इलाके में बुराड़ी नाम बस्ती बसी हुई है, जिस में ज्यादातर ऐसे लोग रहते हैं, जो दिल्ली से बाहर के हैं और सस्ते मकान के चक्कर में यहां रहते हैं. इन की माली हालत ठीकठाक है, पर  झूठी शान की खातिर ये अपनों का कत्ल करने की वारदात को भी अंजाम दे देते हैं.

मतलब, नाक का सवाल इन के लिए सब से ऊपर है. इस में बड़ेबूढ़े ही नहीं, बल्कि नौजवान भी बराबरी से हिस्सा लेते हैं, तभी तो अपनी चचेरी बहन की हत्या के मामले में गिरफ्तार किए गए 26 साल के अविनाश से जब पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने कई अहम राज खोले.

मामला कुछ यों है कि मरने वाली 17 साल की एक नाबालिग लड़की मूलरूप से बिहार के मुजफ्फरपुर की रहने वाली थी. वहां उस का एक लड़के से प्रेम संबंध था और वह उस लड़के के साथ 2 बार घर से जा चुकी थी. लड़की के परिवार वाले इस रिश्ते से नाखुश थे और लड़की सुधर जाएगी, यह सोच कर उन्होंने उसे दिल्ली भेजने का फैसला किया.

उस लड़की का नाम रोशनी था जो 13 अगस्त को बिहार से दिल्ली आई थी. पुलिस के मुताबिक, दिल्ली आने के बाद भी उस ने अपने प्रेमी से मेलजोल बनाए रखा और उसे दिल्ली बुलाने की बात कर रही थी. इस बात से अविनाश नाराज था. उस ने रोशनी को समझाया था कि अपने प्रेमी से दूरी बना कर रखे, पर वह नहीं मानी. इस के बाद अविनाश ने रोशनी का खून करने की साजिश रची.

पुलिस की जांच में सामने आया कि आरोपित अविनाश ने रोशनी की हत्या की योजना पहले ही बना ली थी और लाश को ठिकाने लगाने के लिए बाकायदा 1,500 रुपए का सूटकेस भी खरीदा था.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, अविनाश ने रविवार, 16 अगस्त की सुबह वह सूटकेस खरीदा था और उसे अपने एक दोस्त की बुराड़ी में बनी दुकान में रख दिया था.

इस के बाद वह बहाना बना कर अपनी चचेरी बहन को अपने साथ दुकान पर ले गया था.

हत्या करने से पहले अविनाश ने पहले अपने दोस्त को किसी बहाने से घर भेज दिया. दोस्त के जाने के बाद आरोपित ने दुकान के अंदर ही गला दबा कर अपनी चचेरी बहन की हत्या कर दी. इस के बाद लाश को सूटकेस में रखा और अजीत विहार इलाके में ले जा कर झाडि़यों में फेंक दिया और मौके से फरार हो गया. Honor Killing

Hindi Suspense Story : एक खौफनाक पार्सल

Hindi Suspense Story. थिंपू को घेरे हुए ‘दुंगशिंग गांग’ की ऊबड़खाबड़ चोटियों पर जिद्दी कोहरे ने रेंगना शुरू कर दिया था. सूरज ढलते ही पहाड़ों की लंबी और डरावनी परछाइयां ताशी पेनजोर के ‘शोंगखांग’ (जनरल स्टोर) पर पसरने लगीं.

ताशी का यह स्टोर जिले की बड़ी और रसूखदार जगहों में गिना जाता था. शाम ठंडी थी. ऐसी शाम जो आमतौर पर सकून लाती है, मगर आज हवा में एक अजीब सी भारी चुप्पी थी.

ताशी अपनी भारी लकड़ी की कुरसी पर बैठा था, जो दुकान के ठीक सामने मशहूर ‘मेटोग’ फूलों की दुकान के सामने रणनीतिक रूप से रखी गई थी. उस ने दिन का अखबार खोला. शांत दुकान में पन्नों की सरसराहट कुछ ज्यादा ही तेज सुनाई दे रही थी.

तभी उस की नजर एक ऐसी सुर्खी पर पड़ी जिस ने शरीर में ठंडी लहर दौड़ा दी, ‘अपर मोतीथांग में अवैध जुए के अड्डे पर पुलिस का छापा’.

खबर में विस्तार से लिखा था कि कैसे ‘रौयल भूटान पुलिस’ ने एक दोपहर दबिश दे कर 8,50,000 न्युल्ट्रम जब्त किए और 5 संदिग्धों को हिरासत में लिया.

तभी फोन की तीखी बीप ने ताशी की एकाग्रता भंग कर दी. यह उस के दोस्त थिनले का संदेश था. वही थिनले, जो एक नामी लौटरी एजेंट था और जिसे सब की टोह लेने और गपशप करने की खतरनाक आदत थी.

‘ओ ताशी, वह जुआ वाला अड्डा पर पुलिस रेड मार दिया रे’ मोबाइल की स्क्रीन चमकी.

ताशी ने अपना बायां हाथ धीरे से फैलाया और पत्थर जैसे भावहीन चेहरे के साथ टाइप किया, ‘तो मैं क्या करूं?’

ताशी ने फिर अपना ध्यान ‘कुनसेल’ अखबार की खबर पर लगाया. रिपोर्ट अब और भी सटीक हो रही थी, ‘संदिग्धों में एक महिला वांगमो (40 साल) और 30 की उम्र के 5 मर्द शामिल हैं, जिन में से 4 आदतन अपराधी हैं.’

फिर बीप हुई. थिनले की जिद दांत के दर्द की तरह चुभने वाली थी, ‘वांगमो अभी पुलिस कस्टडी में है.’

ताशी के माथे पर बल पड़ गए. सीने में हलकी सी जकड़न महसूस हुई, पर चेहरा शांत रहा. उस ने चिढ़ कर जवाब भेजा, ‘इस से मेरा क्या लेनादेना? नो प्रौब्लम, खे मी.’

थिनले का जवाब बिजली की तरह आया, जैसे वह परदे के पीछे इंतजार ही कर रहा हो, ‘पिछला हफ्ता तुम तो उधर गया था न?’

ताशी ठिठक गया. दुकान के भीतर की परछाइयां और गहरी लगने लगीं. उसने टाइप किया, ‘हां, गया था, तो क्या हुआ? साला फालतू आदमी, तुम भी तो वही किया था. तुम्हारा प्रौब्लम क्या है? छोई गी कान्येल गाची मो (तुझे  क्या तकलीफ है?)?’

‘तुम्हारा वांगमो के साथ झगड़ा नहीं हुआ था क्या?’ थिनले का अगला संदेश बिना किसी दोस्ताना लहजे के आया.

ताशी को बेचैनी महसूस होने लगी. उसे वह धुंधला कमरा, सस्ते तंबाकू और ‘के5’ व्हिस्की की गंध याद आई. उसे अपनी ही आवाज की वह चुभती हुई कड़वाहट याद आई जो उस रात निकली थी. अब सब्र का बांध टूटा तो उस ने थिनले को फोन ही लगा दिया, ‘‘अरे भाई, यह सब बोल कर क्या फायदा?’’ ताशी ने पूर्वोत्तर के लहजे में कहा, ‘‘अपुन तो खाली अपना फेवरेट ड्रिंक मांगा था. तुम को तो मालूम है न वह वांगमो कैसा औरत है, कैसा टेढ़ा बात करती है.’’

‘‘हां, मेरे को सब याद है,’’ थिनले ने दूसरी तरफ से कहा, ‘‘मेरे को वह सीन भी याद है जब तुम रिनचेन दोरजी को बोला था कि वह कार्ड्स में बेईमानी कर रहा है. तुम्हारा आवाज इतना जोर था कि बाकी लोग भी गरम हो गया था.’’

‘‘अरे, वह तो कुछ सीरियस नहीं था रे,’’ ताशी ने जवाब दिया, हालांकि उस के पैर ठंडे पड़ रहे थे, ‘‘अपुन लोग तो हमेशा ऐसा करता है न? गेम में ऐसा थोड़ाबहुत चिल्लाना तो चलता है.’’

थिनले का अगला जवाब किसी मौत के फरमान जैसा था, ‘‘लेकिन वांगमो ऐसा नहीं सोचती. तुम को याद है वह क्या बोला था? वह तुम्हारा आंख में आंख डाल कर फुसफुसाया था, ‘मैं तुम सब को देख लूंगी. मेरा लिंक बड़ेबड़े गुंडों के साथ है.’ उस टाइम वह मजाक नहीं कर रही थी ताशी.’’

ताशी का जबड़ा भिंच गया. उस ने कोई जवाब नहीं दिया. उस ने जबरदस्ती अपनी नजरें अखबार पर टिका दीं, पर शब्द पन्ने पर नाच रहे थे. उस की आंखें 2011 के दंड संहिता (संशोधन) अधिनियम पर टिक गईं. जुआ खेलना एक मामूली अपराध था… एक महीने से एक साल तक की जेल. लेकिन दोबारा अपराध करने वालों के लिए यह सजा 3 साल या उस से भी ज्यादा हो सकती थी.

थिंपू की सर्द हवाएं जब ताशी पेनजोर की दुकान के शटरों को ?ाक?ार रही थीं, तब उस के मन में बस एक ही डर कौंध रहा था. क्या वांगमो के वे ‘लिंक्स’ वरदीधारी पुलिस वालों के कान में उस का नाम फुसफुसा चुके होंगे? उस के हाथ में थमा अखबार अचानक किसी भारी पत्थर जैसा लगने लगा.

अगली सुबह घाटी को एक गाढ़े, चिपचिपे कोहरे ने अपने आगोश में ले लिया था, लेकिन यह कोहरा उन अफवाहों की आग को नहीं बुझा सका जिस ने पूरे शहर को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया था. एक नई सुर्खी उभरी थी, जिस ने पिछले दिन के छापे की खबर को भी फीका कर दिया, हिरासत में ली गई वांगमो का सौतेला भाई, रिनचेन दोरजी, शहर के बाहरी इलाके में एक सुनसान और जंग लगे गोदाम के पीछे मरा पाया गया था.

दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला था. शरीर को इतनी बेरहमी से काटा गया  था कि पहचानना नामुमकिन था. और सब से सिहरन पैदा करने वाली बात यह थी कि लाश का सिर पूरी तरह से गायब था.

ताशी पेनजोर अपने ‘शोंगखांग’ की मंद रोशनी में बैठा था और माथे पर ठंडी पट्टी दबाए हुए था. भोर से ही उस की कनपटी में एक न सहन होने वाली टीस मारता सिरदर्द जड़ जमा चुका था, जो दीवार घड़ी की टिकटिक के साथ ताल मिला रहा था. कांच के काउंटर पर रखे उस के फोन में कंपन हुआ. थिनले का संदेश था.

फोन उठाते ही थिनले की आवाज गूंजी, जिस में उस की पुरानी मजाक वाली रंगत गायब थी, ‘‘ओ ताशी, सुना क्या?’’ थिनले हांफते हुए बोला, ‘‘अरे बाबा, वह रिनचेन दोरजी. उस का बौडी मिला पुराना डिपो के पास, पूरा काट डाला है रे. और मारने वाला उस का मुंडी भी साथ ले गया, जैसे कोई ट्रौफी हो.’’

ताशी ने आंखें मूंद लीं, उस की आवाज फटी हुई सी निकली, ‘‘देख थिनले, आज अपुन का यह भूतप्रेत का कहानी सुनने का हिम्मत नहीं है. सिर ऐसा फट रहा है जैसे कोई कुल्हाड़ी मार रहा हो.’’

‘‘गा ची मो (क्या बोला?)?’’ थिनले फुसफुसाया, ‘‘भूत का कहानी नहीं है रे. पुलिस लोग पूरा सड़क पर उतरा है. वे लोग उस को ढूंढ़ रहा है जिस का भी वह फैमिली के साथ लफड़ा हुआ था. और पिछला हफ्ता तुम कैसे चिल्लाया था कार्ड्स को ले कर, सब लोग देखा है तुम को.’’

‘‘अरे, कार्ड्स खेलते वक्त तो सब चिल्लाता है न…’’ ताशी भड़क उठा, हालांकि उस की गरदन पर ठंडे पसीने की एक बूंद लुढ़क गई, ‘‘मेरे को अकेला छोड़ दे. बहुत हो गया तेरा. गोंग बोम मे (माफ कर दे भाई).’’

दोपहर के खाने के वक्त जब दुकान की टिमटिमाती रोशनी बरदाश्त से बाहर हो गई, तो ताशी अपने सहायक वांगदी के भरोसे दुकान छोड़ कर पास ही अपने घर चला गया. उसे लगा जैसे सड़कें पहले से संकरी हो गई हैं और राहगीरों की नजरें उस पर भारी पड़ रही हैं.

ताशी के जाने के कुछ ही देर बाद, एक डिलीवरी वाला, जिस का चेहरा टोपी के नीचे छिपा था, दुकान में दाखिल हुआ. उस ने तेल के धब्बों वाले भूरे कागज में लिपटा एक भारी, चौकोर पार्सल मुख्य काउंटर पर रख दिया, ‘‘तुम्हारा मालिक, पेनजोर ला के वास्ते है,’’ उस आदमी ने बुदबुदाते हुए कहा.

वांगदी एक ग्राहक में बिजी था, उस ने बस सिर हिला दिया, ‘‘उधर टेबल पर रख दे भाई. मालिक आएगा तो देख लेगा.’’

वह पार्सल चावल की बोरियों और कैरोसिन के डब्बों के बीच एक खामोश मेहमान की तरह रखा रहा. उस में से कुछ भी रिस नहीं रहा था, फिर भी उस से एक ऐसी ठंडक फूट रही थी जिस ने आसपास की हवा को बोझिल कर दिया था.

तीसरे पहर तक भारी जूतों की आहट लकड़ी के फर्श पर गूंजी. रौयल भूटान पुलिस के 2 अफसर पहुंचे, उन के चेहरों पर कत्ल की तफतीश की गंभीरता साफ झलक रही थी. उन्होंने वांगमो और उस के भाई से जुड़े हर शख्स से पूछताछ शुरू कर दी थी.

‘‘ताशी पेनजोर ला,’’ बड़े अफसर ने ताशी की आंखों में देखते हुए कहा, जो अभीअभी वापस लौटा था.

‘‘मालूम पड़ा है कि मोतीथांग वाले अड्डे पर तुम्हारा कुछ… अनबन हुआ था? मरने वाले के साथ तुम्हारा कोई बहसबाजी हुआ था क्या?’’

ताशी काउंटर का सहारा ले कर खड़ा हो गया, चेहरा पीला था पर आवाज स्थिर, ‘‘साहब, खेल में तो थोड़ाबहुत खटपट होता ही है न. गुस्से में आदमी क्याकुछ नहीं बोल देता. अभी तुम क्या एक इज्जतदार दुकानदार को यह खूनी खेल के लिए शक करेगा?’’

पुलिस वाले एक घंटे तक गिद्धों की तरह सवाल घुमाते रहे, मगर ताशी के जवाब किसी तराशे हुए पत्थर की तरह चिकने और अभेद्य थे. उन्हें उस की बातों में कोई दरार नहीं मिली. जब वे जाने के लिए मुड़े, तो बड़े अफसर की नजर साइड टेबल पर रखे उस भूरे कागज वाले पार्सल पर पड़ी, ‘‘नया माल आया क्या?’’ उस ने सहज भाव से पूछा.

‘‘हां, साहब,’’ ताशी ने जवाब दिया, उस का दिल अचानक किसी कैद परिंदे की तरह पसलियों से टकराने लगा था.

दरवाजा बंद हुआ और ताशी उस पार्सल के साथ अकेला रह गया. सिरदर्द फिर से तेजी से उभरा था और दुकान में अब ऐसी खामोश पसरी थी जो किसी भारी बोझ  जैसी महसूस हो रही थी.

सूरज पहाड़ों की काली लकीरों के पीछे डूब चुका था, जिस से ‘शोंगखांग’ के भीतर एक अजीब सी खौफनाक उदासी पसर गई थी. ताशी पेनजोर उस पार्सल के ऊपर झुका हुआ था, उस की आंखों में गहरी चिड़चिड़ाहट और शक के बादल थे. दुकान की टिमटिमाती ट्यूबलाइट के नीचे वह तेल के धब्बों वाला भूरा कागज जैसे धड़कता हुआ महसूस हो रहा था.

‘‘यह कौन ले कर आया रे,’’ ताशी की आवाज धीमी पर तीखी थी, जिस ने दुकान के सन्नाटे को चीर दिया.

वांगदी ने बहीखाते से सिर उठाया, उस का चेहरा पीला पड़ चुका था, ‘‘वह एक डिलीवरी वाला आया था पेनजोर ला. उस ने अपना नाम ‘सिंग्ये पासांग’ बताया था शायद.’’

वह नाम ठंडी धुंध की तरह हवा में तैरने लगा. ताशी की उंगलियां कांप रही थीं जब उस ने थिनले को मैसेज करने के लिए फोन निकाला.

‘सिंग्ये पासांग कौन है?’

जवाब तुरंत आया, ‘अपुन को नहीं मालूम.’

ताशी की नब्ज तेज हो गई, उस ने वापस टाइप किया, ‘वांगमो का कोई गुंडा लोग है क्या यह नाम का? मेरे को पक्का यकीन है, एकदम पक्का कि इस पार्सल के अंदर क्या है.’

रिनचेन दोरजी के बिना सिर वाले धड़ की याद उस की आंखों के सामने बिजली की तरह कौंधी. उसे उस भारी पैकिंग के भीतर से खून की लोहे जैसी गंध महसूस होने लगी. कनपटी की टीस अब एक ठंडे और गहरे खौफ में बदल चुकी थी. उस ने तुरंत थिनले और अपने साझ दोस्त न्गावांग को एक गंभीर चर्चा के लिए अपने घर बुलाया.

जब वे पहुंचे, तो ताशी अपनी बैठक के अंधेरे कोने में बैठा था. वह पार्सल उन के बीच एक छोटे मेज पर किसी जिंदा बम की तरह रखा था.

‘‘अरे खोल कर देख न ताशी,’’ न्गावांग फुसफुसाया, हालांकि उस ने खुद उसे छूने की हिम्मत नहीं की.

‘‘हो सकता है कोई तुम से मजाक कर रहा हो.’’

‘‘नहीं,’’ ताशी की आवाज किसी अनजाने डर से भारी हो गई थी. एक ही दोपहर में उस का चेहरा दस साल बूढ़ा लगने लगा था. लकीरें खिंची हुईं और आंखें दहशत से फटी हुई थीं.

‘‘अगर अपुन ने इस को खोला, तो मैं इस डरावने सपने का गवाह बन जाएगा. और अगर पुलिस ने मेरे को इस के साथ पकड़ लिया… जो मेरे को लगता है इस के अंदर है… तो फिर कोई सुनवाई नहीं होगा, सीधा ‘फोर्थ डिगरी’ का सजा मिलेगा.’’

आखिरकार, वे एक खौफनाक सहमति पर पहुंचे. वे इस के अंदर नहीं देखेंगे. वे इस पार्सल को हमेशा के लिए कहीं दफन कर देंगे.

आधी रात के काले साए में, तीनों आदमी गाड़ी ले कर नदी की ओर चल दिए. कार की हैडलाइट्स पहाड़ के घुमावदार कोहरे को चीर रही थीं. वे किसी साजिश करने वाले की तरह हिल रहे थे, कड़ाके की ठंड में उन की सांसें धुएं की तरह निकल रही थीं. पुल पर पहुंच कर उन्होंने एक मोटे औद्योगिक रस्से से पार्सल को एक भारी पत्थर के साथ बांध दिया.

सब ने मिल कर जोर लगाया और उसे शून्य में उछाल दिया. एक दबी हुई आवाज के साथ वह पार्सल नदी के गहरे और उफनते पानी में समा गया.

Hindi Suspense Story

घर लौट कर ताशी पेनजोर अपनी कुरसी पर ढह गया और एक लंबी, कंपकंपाती हुई राहत की सांस ली. वह बोझ, जो 2 दिनों से उस के सीने को कुचल रहा था, आखिरकार नदी की गहराई में समा गया था.

अगली दोपहर थिंपू की हवा कुछ हलकी महसूस हो रही थी, मानो नदी ने न केवल उस पार्सल को, बल्कि पिछले दिनों के उस डरावने माहौल को भी निगल लिया हो.

ताशी पेनजोर के चेहरे की रौनक लौटने लगी थी. उस ने अपनी इलैक्ट्रौनिक की दुकान चलाने वाले पुराने दोस्त दावा वांगचुक से मिलने का मन बनाया.

दावा वांगचुक की दुकान मशीनों की गुनगुनाहट और अमीर ग्राहकों की खास महक से भरी एक सुरक्षित पनाहगाह जैसी थी. ताशी और दावा के बीच करीब एक घंटे तक दिल खोल कर बातें हुईं, आयात की बढ़ती कीमतों से ले कर पहाड़ों के दर्रों पर पिघलती बर्फ और वसंत की खूबसूरती तक. यह वैसी ही बातचीत थी जो किसी भी इनसान को उस की साधारण और सुकून भरी दुनिया से वापस जोड़ देती है.

ज ब ताशी जाने के लिए खड़ा हुआ और एक नए जोश के साथ अपना पारंपरिक ‘घो’ ठीक करने लगा, तभी दावा कांच के काउंटर पर थोड़ा झांकते हुए बोला, ‘‘अरे, रुकोरुको पेनजोर ला,’’ दावा को अचानक कुछ याद आया, ‘‘मैं पूछने ही वाला था, तुम को वह नया वाला ‘सैमसंग’ म्यूजिक सिस्टम मिल गया न? कुछ हफ्ता पहले तुम कितना पीछे पड़ा था उस के लिए.’’

ताशी जैसे वहीं जम गया. पिछले चौबीस घंटों में उस ने शांति का जो महल बड़ी मुश्किल से खड़ा किया था, वह.एक झटके में कांच के आईने की तरह चकनाचूर हो गया. कनपटी की वह पुरानी टीस पहले से कहीं ज़्यादा तेजी से वापस लौटी.

‘‘वह… म्यूजिक सिस्टम?’’ ताशी की आवाज किसी मुरदे जैसी निकली, ‘‘तुम्हारा मतलब है… कोई पार्सल?’’

‘‘हां भाई, वही. अब तुम अपना मनपसंद गाना ब्लूटूथ लगा कर बजा सकता है, जैसा तुम को मांगता था. तुम भूल कैसे गया रे? तुम ही तो बोला था कि तुम्हारा ब्रांड न्यू सैमसंग सिस्टम सैट करने को,’’ दावा एक मददगार मुसकान के साथ बोला. वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि उस के दोस्त के चेहरे पर दहशत की कितनी गहरी परछाईं उतर आई है.

दावा कहता रहा, ‘‘माल कल सुबह ही पहुंचा. मेरा एक नया कामगार लड़का है, गांव से आया है, उसी को बोला था लंच टाइम पर तुम्हारा दुकान पर दे आने को. मैं ने उस को बोला था कि यह स्पैशल और्डर है.’’

ताशी पेनजोर पत्थर का बुत बना खड़ा रहा. उस की आंखों के सामने उस काली गहरी नदी, भारी पत्थर और एलईडी फिटेड साइनबोर्ड्स के मंजर घूमने लगे. उसे तेल के धब्बों वाला वह भूरा कागज याद आया और उस का वो अटूट विश्वास… कि वह रिनचेन दोरजी का कटा हुआ सिर ठिकाने लगा रहा है.

‘‘अच्छा वह लड़का…’’ ताशी फुसफुसाया, उस की आंखें फटी की फटी रह गईं, ‘‘लड़के का नाम क्या है?’’

‘‘अरे, वह तो सीधासादा बच्चा है…’’ दावा ने अपनी ठुड्डी खुजलाते हुए कहा, ‘‘नाम जान कर क्या करेगा? पर तुम इतना पीला क्यों दिख रहा है भाई?’’

ताशी पेनजोर ने कोई जवाब नहीं दिया. वह दरवाजे की ओर मुड़ा, उस के होंठ धीरेधीरे हिल रहे थे, ‘‘वह वांगदी… बेवकूफ. ओह वांगदी. दुकान के शोरशराबे में उस लड़के ने ‘सैमसंग’ बोला होगा और इस गधे ने ‘सिंग्ये पासांग’ सुन लिया.’’

ताशी ने खाली सड़क की ओर देखा, जहां दूर कहीं नदी के बहने का शोर सुनाई दे रहा था. थिंपू घाटी की गहराइयों में कहीं एक ब्रांड न्यू म्यूजिक सिस्टम हमेशाहमेशा के लिए दफन हो चुका था.  Hindi Suspense Story

–गौतम भट्टाचार्य

Murder Mystery : पारो

Murder Mystery. सुबह से ही आसमान में बादल छाए हुए थे. रुकरुक कर बारिश भी हो रही थी, पर जैसेजैसे दिन ढलता जा रहा था, बादल छंटते जा रहे थे.

दुर्गा प्रसाद ने अपनी चारपाई बरगद के पेड़ के नीचे बिछा ली और हुक्का गुड़गुड़ाने लगे.

वे हर रोज इसी पेड़ के नीचे बैठते थे. उन के सामने से गुजरने वाला हर कोई उन्हें ‘नमस्कार’ जरूर करता था.

दुर्गा प्रसाद की पूरे गांव में इज्जत थी. उन के पास कई बुजुर्ग आ कर बैठते थे. यहीं बैठेबैठे देश व समाज की चर्चा होती और सभी हुक्का गुड़गुड़ाते रहते.

दुर्गा प्रसाद खुद को गांव की राजनीति से दूर रखते, लेकिन उन से नाइंसाफी सहन नहीं होती थी. यही खिलाफत गांव के नेता रामप्रकाश को पसंद नहीं थी. इसी वजह से अकसर दोनों में नोकझोंक चलती रहती थी.

शाम ढलने लगी थी. परिंदे अपने घोंसलों में लौटने लगे थे. कल्लन, मुन्ना, चुकनिया और घसीटू अपनी भैंसों के संग लौट आए थे. वे चारों सुबह जाते और शाम को ही लौटते. उन के साथ पारो भी होती थी. वह अपनी दोनों भैंसों और एक बछिया को चराने जाती थी.

हमेशा की तरह उन चारों ने नमस्कार किया, तो दुर्गा प्रसाद ने पूछा, ‘‘क्या बात?है, पारो नजर नहीं आ रही… सुबह तो वह तुम्हारे साथ गई थी?’’

‘‘बाबा, हम ने उसे बहुत आवाजें लगाईं, पर वह कहीं मिली ही नहीं… पता नहीं कहां चली गई? हम उस की भैंसों और बछिया को तो हांक लाए,’’ कल्लन ने कहा और वे चारों आगे बढ़ गए.

दुर्गा प्रसाद को पारो की चिंता सताने लगी. वह सोचने लगे कि न जाने पारो कहां चली गई होगी? रहरह कर उन के दिमाग में उलटेसीधे खयाल आने लगे, ‘गरीब की जवान बेटी पर दुनिया की बुरी नजर रहती?है, कहीं उस पर भी…’ और फिर खुद को समझाते हुए वे सोचते, ‘नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकता.’

चुकनिया जब भैंसों को पारो के घर पहुंचाने गया, तो उस का बाप परेशान हो उठा. पारो की मां भूरो तो यह सुन घबरा ही गई. लेकिन उस के पति जमना प्रसाद ने समझाया, ‘‘घबराओ नहीं, चली गई होगी इधरउधर… थोड़ीबहुत देर में आ जाएगी. क्या पता, अपनी सहेली कल्लो के पास चली गई हो.’’

पारो 16 बरस पूरे कर चुकी थी. परसों ही उस के फूफा रिश्ते की बात पक्की कर गए थे. सुबह मां ने उसे रोका भी था, ‘बेटी, अब तू भैंसें चराने मत जाया कर. 2 महीने बाद ही तेरी शादी है… कहीं ऊंचनीच हो गई, तो हम दुनिया के सामने मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’

‘अरे मां, अगर मैं भैंसें चराने नहीं जाऊंगी, तो ये ढेर सारा दूध नहीं देंगी. घर का खर्च फिर कैसे चलेगा?’ पारो ने शिकायती लहजे में कहा, तो मां कहने लगी, ‘अच्छाअच्छा, ठीक है मेरी अम्मां, तू अब कुछ ज्यादा ही सयानी हो गई है.’

जमना प्रसाद सोच रहा था कि पारो को कहां तलाश करें. उस की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था, तभी नेताजी का नौकर उसे बुलाने आ पहुंचा, ‘‘जमना, तुझे नेताजी ने बुलाया है.’’

‘‘तू जा, मैं थोड़ी देर में आ जाऊंगा.’’

‘‘नहीं. उन्होंने कहा है कि साथ ले कर ही आना.’’

‘‘ठीक है,’’ जमना प्रसाद ने ?ां?ालाते हुए कहा.

‘‘पारो की मां, तू बेटी को कल्लो के घर देख आ… शायद वहीं होगी. तब तक मैं नेताजी से मिल कर आता हूं,’’ कहतेकहते वह बाहर निकल गया.

नेताजी उसे देखते ही चहके, ‘‘अरे आओ जमना, आओ. आज तो तुम सुबह से आए ही नहीं… हम तुम्हारी बाट देखते रहे. आज हमारे साले साहब आए हुए हैं.’’

यह सुनते ही जमना प्रसाद सोचने लगा कि फिर तो आज शराब पीने को मिलेगी.

‘‘सोच क्या रहा है… तेरे लिए हम ने पहले से ही रखी हुई है. यह ले भई, तू हमारा खयाल रखे या न रखे, पर हमें तो तेरा खयाल रखना ही पड़ता है,’’ कहते हुए नेताजी ने जमना के सामने गिलास और शराब की बोतल रख दी.

जल्दी ही जमना प्रसाद 2 गिलास शराब गले से नीचे उतार गया.

नेताजी कहने लगे, ‘‘जमना, ऐसा कर, आज साले साहब के साथ चला जा. इन्हें अभी जाना है…कोई जरूरी काम है. रात का मामला है और रास्ता भी खराब है…

‘‘और हां, इन के गांव में सांग हो रहा है. तू तो सांग का बड़ा शौकीन है… खूब सांग देखना, फिर लौट आना. हां, तुझे कोई काम हो तो हमें बता दे, करवा देंगे.’’

‘‘नहीं सरकार, काम तो कोई नहीं… पर पारो अभी तक घर नहीं आई. उस की मां परेशान हो रही है…बस, उसे ही ढूंढ़ने जाना था.’’

‘‘घर पर उस की मां तो है. मैं किसी को भेज दूंगा… तू चिंता मत कर… बेफिक्र हो कर जा तू.’’

लड़खड़ाता हुआ जमना साले साहब की जीप में जा बैठा. धीरेधीरे शराब का नशा उस पर चढ़ने लगा था. वह भूल गया था कि पारो की मां घर पर उस का इंतजार कर रही है.

नेताजी का साला सुबह का ही आया हुआ था. जब से वह आया था, तभी से नेताजी के खेत वाले मकान में शराब का दौर चल रहा था. आशिकमिजाज साला कोई फरमाइश रखे और नेताजी इनकार करें, ऐसा कभी नहीं हुआ था.

दोपहर को जब उस ने फरमाइश रखी, तो नेताजी सोच में पड़ गए.

तभी उन का मुंहलगा नौकर गणेशी बोला, ‘सरकार, गुस्ताखी माफ हो तो मैं कुछ इंतजाम करूं.’ और वह दौड़ कर पास ही भैंसें चरा रही पारो को बहलाफुसला कर ले आया था.

‘लो सरकार, पारो आ गई. यह अपने जमना प्रसाद की बेटी है,’ गणेशी ने कहा.

पारो की जवानी देख कर दोनों की आंखें फटी की फटी रह गईं. पारो बला की खूबसूरत थी.

नशे में धुत्त नेताजी और उस का साला पागल कुत्तों की तरह पारो पर टूट पड़े. वे बारीबारी से अपनी प्यास बुझाते रहे. पारो चीखतीचिल्लाती रही, पर वहां पर उस की सुनने वाला कोई न था. चीखतेचीखते पारो मर चुकी थी. हवस के दरिंदों ने उसे हमेशाहमेशा के लिए सुला दिया था.

जब नेताजी ने देखा कि वह मर गई है, तो गणेशी को कह कर लाश को पास के ईख के खेत में फिंकवा दिया और खुद घर लौट आए.

पारो की मां भूरो उसे सब जगह तलाश कर आई थी, पर वह कहीं नहीं मिली. फिर वह हांफती हुई दुर्गा प्रसाद के पास पहुंची, जो पेड़ के नीचे बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे. एक वही थे, जो उन के दुखदर्द में काम आते थे.

दुर्गा प्रसाद खुद भी पारो को ढूंढ़ने गए, पर वह कहीं न मिली. उस के बाद वह जमना के घर पहुंचे. वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि जमना भी घर पर नहीं है.

भूरो ने बताया कि नेताजी के यहां यह कह कर गया था कि अभी आ रहा हूं, पर लौटा ही नहीं. एक बच्चे को बुलाने भेजा, तो उस ने आ कर बताया कि नेताजी के यहां तो ताला लगा है. वहां कोई नहीं है.

पारो के गायब होने की खबर सुन कर बहुत से गांव वाले जमना के घर जमा हो गए थे. सब की राय यह बनी  कि पारो को वहीं खोजा जाए, जहां वह भैंसों को चरा रही थी.

कई लोग लाठियां और लालटेन ले कर वहां पहुंचे. इधरउधर तलाशने के बाद खून से लथपथ पारो की लाश एक खेत में पड़ी मिली.

बेटी की लाश को देख कर भूरो फूटफूट कर रोने लगी. पूरे गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई. नेताजी भी वहां आ पहुंचे थे, पर जमना उन के साथ नहीं था.

नेताजी ने बताया कि जमना तो वहां से उसी समय चला आया था, कहीं दूसरी जगह चला गया होगा.

रात को ही थाने में खबर कर दी गई. सुबह पुलिस आई. उस ने रिपोर्ट दर्ज कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. दूसरे दिन लाश गांव वालों को सौंप दी गई, जिस का उन्होंने अंतिम संस्कार कर दिया.

पारो की हत्या हुए पूरा हफ्ता बीत गया था, पर हत्यारा पकड़ में नहीं आया था. दूसरी ओर जमना भी घर से लापता था.

8वें दिन जब जमना शाम को घर पहुंचा, तो बेटी के कत्ल की खबर सुन कर पागल सा हो गया. भूरो तो छाती पीटपीट कर रोए जा रही थी, पर जमना कुछ भी नहीं बोल पा रहा था. गांव वाले उसे ताने दे रहे थे कि वह जाने कहांकहां घूमताफिरता रहता है… अपनी बच्ची की भी सुध नहीं लेता.

थोड़ी देर बाद पुलिस की जीप वहां आ कर रुकी, जिस में से दारोगा और 2 सिपाही नीचे उतरे. दारोगा के इशारे पर पुलिस वालों ने आगे बढ़ कर जमना प्रसाद को हथकड़ी लगा दी.

यह नजारा देख कर सब हैरान रह गए. सब ने इस का विरोध किया. लोगों का कहना था कि जमना ऐसा नीच काम नहीं कर सकता.

दारोगा जोर दे कर कहने लगा, ‘‘तुम्हें मालूम है, यह एक हफ्ते से लापता था. हम ने इसे कहांकहां नहीं तलाश किया, पर यह कहीं न मिला. जब मिला तो तुम लोग कहते हो, इस ने यह काम नहीं किया. इस का फैसला तो अदालत करेगी.’’

वे लोग जमना को घसीटते हुए जीप में ले गए, वह गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन किसी ने उस की एक न सुनी.

जीप जाने के बाद नेताजी मुसकराते हुए वहां पहुंचे.

‘क्या जमाना आ गया है. किसी का पता ही नहीं चलता कि कौन कब क्या कर बैठे. जमना प्रसाद देखने में तो बड़ा भोलाभाला लगता था, पर देखो, उस ने अपनी बेटी को भी नहीं बख्शा,’ गांव की एक बूढ़ी औरत बड़बड़ाए जा रही थी और नेताजी उस के सुर में सुर मिला रहे थे.  Murder Mystery

–अजय कुमार ‘भिंड’

Honor Killing : ग्वालियर में बेटी को मारा

Honor Killing. नंदिनी यादव अपने सपनों को पूरा करने के लिए कर्नाटक गई थी. वह राखी के मौके पर ग्वालियर के पिछोर थाना क्षेत्र के पथरियापुरा गांव में लौटी थी, पर उस की अचानक हुई मौत के बाद इलाके में सनसनी फैल गई.

हैरानी की बात तो यह है कि इस मामले में नंदिनी यादव के ही परिवार के सदस्यों ने उस के पिता भगवान सिंह यादव और चाचा संतोष यादव पर हत्या करने का गंभीर आरोप लगाया है.

साथ ही यह भी कहा गया कि नंदिनी कर्नाटक में एक मौल में काम करती थी. वह राखी के मौके पर अपने घर आई थी. घर लौटने के बाद कर्नाटक में नौकरी करने को ले कर परिवार में झगड़े के हालात बने. पर साथ ही दबी जबान में यह भी सामने आया कि नंदिनी किसी लड़के से फोन पर बातचीत करती थी, जिसे ले कर घर में नाराजगी का माहौल था.

इतना ही नहीं, परिवार के लोगों को उस का रहनसहन और पहनावा भी पसंद नहीं था. वह बौयकट हेयर रखती थी और अपनी पसंद के मुताबिक कपड़े पहनती थी. बताया जा रहा कि उस के बाहर जा कर नौकरी करने को ले कर भी परिवार में नाराजगी थी.

परिवार वाले यह भी बोले कि देर रात झगड़े के बाद नंदिनी के पिता भगवान सिंह यादव और उस के चाचा संतोष यादव ने कथिततौर पर उस की साफी से गला दबा दिया और नंदिनी की मौत हो गई.

मामले में सब से चौंकाने वाली बात यह है कि नंदिनी यादव के भाई, बहन और मां ने ही उस की मौत के लिए उस के पिता और चाचा को जिम्मेदार ठहराया है. उन सब का कहना है कि नंदिनी की मौत सामान्य नहीं थी, बल्कि उस की हत्या की गई है.

पुलिस ने पिता भगवान सिंह यादव को गिरफ्तार कर लिया था, जबकि चाचा संतोष यादव की तलाश जारी थी.  Honor Killing

Crime Story : सरप्राइज गिफ्ट -अवैद्य संबंधों के शक में बीवी की हत्या

Crime Story.19 जून, 2017 की शाम मनोज बेहद खुश था. लेकिन उस के दोस्त अनुज को उस की यह बेवजह की खुशी समझ में नहीं आ रही थी. जब रहा न गया तो अनुज ने पूछ ही लिया, ‘‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना क्यों हो रहा है, कुछ बताएगा भी या यूं ही बकवास करता रहेगा.’’

‘‘बताऊंगा, पर ऐसे नहीं. पहले मिल कर थोड़ा जश्न मनाते हैं. फिर अपनी खुशी का राज जाहिर करूंगा. ये ले पैसे और औफिसर्स चौइस की बोतल, तले हुए काजू, नमकीन और सिगरेट का पैकेट ले आ. सोच ले, आज मैं तुझे अपनी आजादी की पार्टी दे रहा हूं.’’ कह कर उस ने पर्स से 2 हजार रुपए का नोट निकाल कर अनुज को दे दिया.

अनुज की समझ में तो कुछ नहीं आया, लेकिन उस ने मनोज के हाथों से 2 हजार रुपए का नोट ले कर जेब में रखा और शराब के ठेके की ओर चला गया. कुछ देर बाद वह सारा सामान ले आया तो दोनों कमरे में पीने बैठ गए. मनोज ने 2 पैग बनाए और जाम से जाम टकराने के बाद दोनों शराब पीने लगे. जब मनोज पर नशे का सुरूर चढ़ा तो उस ने कहना शुरू किया, ‘‘अनुज, जानते हो मैं आज इतना खुश क्यों हूं.’’

‘‘जब तक तू बताएगा नहीं, तब तक मैं कैसे जानूंगा कि तेरे मन में किस बात को ले कर लड्डू फूट रहे हैं.’’ नशे की झोंक में अनुज उस की ओर देख कर बोला.

Crime Story

‘‘बेटे, आज मैं आजाद हो गया हूं.’’

‘‘पहेलियां न बुझा कर सीधी तरह बता, तेरी इस खुशी का राज क्या है?’’ अनुज ने चौथा पैग पीते हुए उत्सुकता से पूछा.

‘‘मैं ने तेरी भाभी को खुदागंज रवाना कर दिया है. मुझे उस से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया है.’’

मनोज की बात सुन कर अनुज को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब उस ने पूरी बात बताई तो उसे लगा कि हो न हो मनोज ने कोमल की हत्या कर दी है. अनुज का सारा नशा काफूर हो गया. थोड़ी देर तक वह मनोज की बात सुनता रहा, फिर पीना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ और घर में किसी जरूरी काम का बहाना कर के वहां से चला गया.

बाहर आ कर वह कुछ दोस्तों से मिला और मनोज की बात उन्हें बताई. सब ने उसे यही सलाह दी कि इस बात की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए, क्योंकि बाद में वह भी पुलिसिया लफड़े में फंस सकता है. सोचविचार कर उस ने यह सूचना कंझावला थाने की पुलिस को दे दी.

पति द्वारा किसी औरत की हत्या की सूचना मिलते ही कंझावला थाने की पुलिस हरकत में आ गई. जेजे कालोनी सवदा पहुंच कर पुलिस ने मनोज गुजराती को हिरासत में ले लिया. थाने में जब मनोज से पूछताछ शुरू हुई, तब तक उस का नशा कम हो चुका था. पहले तो उस ने एसआई निखिल को बताया कि शराब के नशे में वह यह सब अपने दोस्त पर रौब जमाने के लिए  कह रहा था. लेकिन निखिल का एक करारा थप्पड़ उस के गले पर पड़ा तो उस के होश ठिकाने आ गए.

उस ने बताया कि वह अपनी पत्नी कोमल की हरकतों से बहुत परेशान था. इसलिए उस ने उसे बोंटा पार्क के जंगल में ले जा कर उस की हत्या कर दी है. बोंटा पार्क दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास है. कंझावला थाने से वह काफी दूर था. तब तक काफी रात हो चुकी थी, इसलिए अगली सुबह निखिल कांस्टेबल महेश और नरेश को साथ ले कर उत्तरी दिल्ली के मोरिसनगर थाने पहुंचे और वहां की थानाप्रभारी इंसपेक्टर आरती शर्मा को उन के इलाके के बोंटा पार्क में एक लड़की की हत्या किए जाने की सूचना दी.

17 जून, 2017 को कंझावला पुलिस द्वारा मिली इस सूचना को थाना मौरिसनगर के डीडी नंबर 14 ए में दर्ज करवा कर इंसपेक्टर आरती शर्मा ने अतिरिक्त थानाप्रभारी इंसपेक्टर  वीरेंद्र सिंह को इंसपेक्टर राकेश कुमार, एएसआई बिजेंद्र, हैडकांस्टेबल राजकुमार, सुखवीर, कांस्टेबल श्याम सैनी तथा महिला कांस्टेबल मधु को आरोपी मनोज और कंझावला पुलिस के साथ बोंटा पार्क भेजा.

पुलिस टीम पार्क के गेट नंबर 6 से अंदर दाखिल हुई. अंदर जा कर पुलिस कोमल की लाश की तलाश में जुट गई. मनोज ठीक से उस जगह के बारे में नहीं बता पा रहा था, जहां उस ने अपनी पत्नी कोमल की हत्या कर के उस की लाश छिपाई थी. पुलिस की तलाशी 12 घंटे तक जारी रही, लेकिन कोमल की लाश नहीं मिली. रात घिर आई थी, फिर भी तलाशी चलती रही.

रात के करीब 12 बजे मनोज पुलिस टीम को एक छोटी चट्टान के पास ले कर गया, जहां 22-23 साल की एक लड़की की लाश पड़ी थी. वह गुलाबी रंग का टौप और नीले रंग की जींस पहने थी. लाश की छानबीन करते समय इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह ने देखा कि उस के दाहिने हाथ पर कोमल गुदा हुआ था.

आरोपी मनोज ने लाश की ओर इशारा कर के बताया कि यह उस की पत्नी कोमल की लाश है, जिसे उस ने कल शाम को धोखे से यहां ला कर उस की हत्या कर दी थी. लाश की फोटोग्राफी कराने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए सब्जीमंडी मोर्चरी भेज दिया गया, साथ ही कोमल के घर वालों को फोन कर के उस की लाश की शिनाख्त के लिए सब्जी मंडी मोर्चरी बुला लिया गया.

17 जून को कोमल की बड़ी बहन गौरी सब्जी मंडी पहुंची,जहां लाश देखने के बाद उस ने उस की पहचान अपनी छोटी बहन और मनोज गुजराती की पत्नी कोमल के रूप में कर दी. कोमल की लाश की शिनाख्त होने के बाद गौरी की तहरीर पर उसी दिन कोमल की हत्या का मामला उस के पति मनोज गुजराती के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया गया. इस मामले की विवेचना इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह को सौंपी गई. गौरी के बयान तथा मनोज गुजराती के बयानों के बाद 2 साल की लव मैरिज का जो दर्दनाक वाकया सामने आया, वह इस प्रकार था—

कोमल के पिता चमनलाल का परिवार नांगलोई के चंचल पार्क में रहता था. उन के परिवार में पत्नी कमलेश के अलावा 4 बेटियां तथा 2 बेटे थे. इन में कोमल पांचवे नंबर की थी. घर के लोग उसे प्यार से कमली कह कर पुकारते थे. कोमल के बड़े भाई गंगाराम की शादी 8 साल पहले दिव्या से हुई थी. मनोज गुजराती दिव्या का चचेरा भाई था.

मनोज का परिवार कंझावला इलाके के सावदा गांव में रहता था. उस के परिवार में उस के अलावा इस के पिता राजू गुजराती, मां कमलेश तथा एक बहन परवीन थी. घर के बाहरी कमरे में मनोज की परचून की दुकान थी. दुकान अच्छीखासी चलती थी, जिस की वजह से मनोज की जेब हमेशा भरी होती थी. वह शौकीनमिजाज युवक था और हमेशा बनठन कर रहता था. चूंकि दोनों के परिवार आपस में रिश्तेदार थे, इसलिए समय समय पर उन का एकदूसरे के यहां आनाजाना लगा रहता था.

2 साल पहले एक दिन मनोज अपने दोस्तों के साथ मस्ती करने गुरुग्राम के सहारा मौल पहुंचा. वहां उस की नजर एक लड़की पर पड़ी, जो शक्लसूरत से जानीपहचानी लग रही थी. वह कोमल थी. मौडर्न कपड़ों, गहरे मेकअप और फ्लड लाइट की रंगबिरंगी रोशनी में कोमल बहुत ही सुंदर लग रही थी. दरअसल, कोमल वहां एक पब में नौकरी करती थी.

मनोज ने किसी बहाने से कोमल को अपने पास बुलाया तो दोनों ने एकदूसरे को पहचान लिया. बातोंबातों में मनोज ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया और जल्द ही उस के घर चंचल पार्क आने का वादा किया. कोमल ने मनोज की खूब आवभगत की और उसे अपने साथ काम करने वाली कुछ सहेलियों से भी मिलवाया.

कोमल के लटकेझटके देख कर मनोज पहली ही नजर में उसे दिल दे बैठा. इधर कोमल भी मनोज के प्रति आकर्षित हो गई. उस दिन मनोज घर लौटा तो उस के दिलोदिमाग में कोमल की मनमोहिनी सूरत बसी हुई थी. वह जल्दी से जल्दी उसे अपनी बना लेना चाहता था.

उस दिन के बाद दोनों एकदूसरे को फोन कर के अपने दिल की बातें शेयर करने लगे. कोमल मनोज को हमेशा मौल में आने वाले हाईफाई लोगों के बारे में तरहतरह के किस्से सुनाती, जो मनोज को बहुत अच्छे लगते. वह कोमल को प्रभावित करने के लिए उसे महंगे तोहफे देने लगा. धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों के घर वाले इस सब से कब तक अनजान रह सकते थे. उन्हें भी उन के प्यार की जानकारी हो गई.

मनोज और कोमल के घर वाले यों तो रिश्तेदार थे, लेकिन पता नहीं क्यों उन्हें यह रिश्ता मंजूर नहीं था. कोमल के पिता चमनलाल को लगता था कि मनोज उन की बेटी को ज्यादा दिनों तक खुश नहीं रख पाएगा. मनोज सावदा गांव में रहता था, जहां के लोगों का रहनसहन पुराने जमाने जैसा था.

उधर मनोज के घर वालों की सोच भी कुछ ऐसी ही थी. जब मनोज और कोमल ने अपनेअपने घरों में अपनी पसंद जाहिर की तो उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया. लेकिन प्यार इन बंदिशों को कहां मानता है. वैसे भी दोनों ही अपने पैरों पर खड़े थे. इसलिए 5 जून, 2015 को कोमल ने अपने मम्मीपापा की मर्जी के खिलाफ जा कर तीसहजारी कोर्ट में मनोज से शादी कर ली. शादी के बाद दोनों रघुबीर नगर में किराए का मकान ले कर रहने लगे.

8-10 महीने तो दोनों ने खूब मौजमस्ती की, लेकिन बाद में मनोज को कोमल का सहारा मौल में काम करना बुरा लगने लगा. उस ने कोमल से यह काम छोड़ देने के लिए कहा, पर वह इस के लिए तैयार नहीं थी. उसे मौल में जा कर परफौरमेंस देना और नएनए लोगों से मिल कर हंसनाबोलना अच्छा लगता था. बात आगे बढ़ी तो दोनों के बीच झगड़े शुरू हो गए. पड़ोसियों ने दोनों को समझाया तो कोमल मनोज के घर जेजे कालोनी, सावदा में रहने को तैयार हो गई.

इस के बाद कोमल अपने पति मनोज के साथ सावदा में जा कर रहने लगी. लेकिन घर छोटा होने के कारण उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. मनोज की एक बहन परवीन थी, जिस से उस की कतई नहीं बनती थी. यह देख कर मनोज ने दूसरी जगह किराए पर एक घर ले लिया और दोनों उसी में रहने लगे. कुछ दिनों तक दोनों सुखचैन से रहे. मनोज की जिंदगी में अचानक भूचाल तब आया, जब एक दिन वह कोमल के सूटकेस में रखी उसकी एलबम देख रहा था. एक फोटो में वह एक लड़के के साथ बहुत खुश दिख रही थी.

मनोज ने कोमल को वह फोटो दिखा कर उस लड़के के बारे में पूछा तो कोमल ने बताया कि यह अमित है और उस के साथ सहारा मौल में नौकरी करता था. अमित महज उस का दोस्त है. लेकिन मनोज को कोमल की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उस ने कोमल के जानकारों से अमित के बारे में पूछा तो पता चला कि शादी से पहले अमित कोमल का बौयफ्रैंड था. मनोज को यह जानकारी मिली तो वह परेशान हो गया. कोमल के बारे में यह जानकारी मिलने के बाद मनोज उस से उखड़ाउखड़ा रहने लगा.

कुछ ही दिनों बाद उन के बीच फिर से झगड़े शुरू हो गए. कोमल ने अपने घर में फोन कर के बताया कि मनोज उस से दहेज लाने के लिए दबाव डालता है और मना करने पर उस के साथ मारपिटाई करता है.

एक महीने बाद कोमल मनोज की मारपिटाई से दुखी हो कर अपनी बड़ी बहन किरण के पास रहने के लिए रघुवीरनगर चली गई. मनोज सावदा स्थित अपने घर में अकेला रह गया. एक दिन उसे पता चला कि कोमल फिर से अपने पुराने बौयफ्रैंड अमित से मिलने लगी है. यह जान कर मनोज को चिंता हुई कि कोमल कहीं उस से किनारा न कर ले. यही सोच कर उस ने कोमल के मोबाइल पर बात करने की कोशिश की. कुछ दिन तो कोमल मनोज के फोन को नजरअंदाज करती रही, लेकिन धीरेधीरे दोनों में बातचीत शुरू हो गई.

एक महीना पहले कोमल ने मनोज को बताया कि वह बहन पर बोझ नहीं बनना चाहती, इसलिए उस ने रघुवीरनगर के ही डी ब्लौक में अपने लिए अलग कमरा ले लिया है, जहां रह कर अब वह फिर से जौब पर जाएगी. घर में बैठेबैठे उस का मन नहीं लगता. दूसरे बिना पैसों के जिंदगी भी नहीं चलती. मनोज को उस की यह बात अच्छी नहीं लगी तो उस ने उस के नौकरी करने का विरोध करते हुए वापस घर लौट आने के लिए कहा. इस पर कोमल ने ऐतराज करते हुए मनोज से कहा कि वह उस के साथ गांव में नहीं रहेगी, क्योंकि वह उस के  साथ गालीगलौच करने के साथ मारपीट करता है. ऐसा जीवन वह नहीं जी सकती.

15 जून, 2017 को मनोज अपनी दुकान छोड़ कर कोमल से मिलने उस के घर पहुंचा. मनोज को आया देख कर उस ने उसे और उस के परिवार वालों को बहुत बुराभला कहा. कोमल की बातों से मनोज को लगा कि वह उस के साथ नहीं रहना चाहती. उसे बहुत गुस्सा आया. घर पहुंच कर वह सोचने लगा कि उस ने कोमल से कोर्टमैरिज की है और वह उस की पत्नी है. अगर वह उस के साथ नहीं रहेगी तो वह भी उसे उस की मनमर्जी से नहीं जीने देगा.

अगले दिन सुबह उस ने एक मोबाइल शौप पर जा कर नया सिम खरीदा और एक मैकेनिक के यहां से क्लच वायर ले आया. उसी सिम से उस ने कोमल से बड़े प्यार से बात की. बातोंबातों में उस ने कोमल को घूमने जाने के लिए राजी कर लिया. उस दिन काफी बारिश हुई थी, जिस से मौसम सुहाना हो गया था.

16 जून को मनोज ने कोमल को फिर फोन कर के मिलने के लिए सीमेंट गोदाम के पास बुलाया. कोमल ने कहा कि वह उस के पास पहुंच जाएगी. 2 बजे मनोज अपनी मोटरसाइकिल से सीमेंट गोदाम के पास पहुंचा तो थोड़ी देर बाद कोमल आ गई. उस ने कोमल को मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बिठाया और रिंगरोड होते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी के बोंटा पार्क जा पहुंचा.

पार्क के गेट पर मोटरसाइकिल खड़ी कर के वह कोमल के साथ अंदर चला गया. कोमल को विश्वास में लेने के लिए वह उस से रोमांटिक बातें कर रहा था. वहां झाडि़यों के पास कई युवा जोड़े प्रेमालाप में मग्न थे. यह देख कर कोमल भी रोमांटिक हो गई. कोमल से प्यारीप्यारी बातें करते हुए मनोज उसे एकांत में ले गया, जहां दोनों एक साफसुथरी चट्टान पर बैठ गए. मनोज ने उसे बांहों में ले कर अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी और फिर से ऐसा न करने की कसम खाई तो कोमल खुश हो गई.

जब मनोज को लगा कि मौका एकदम सही है तो उस ने कोमल से कहा, ‘‘तुम अपना मुंह पीछे की तरफ कर लो, मैं तुम्हारे लिए एक सरप्राइज गिफ्ट लाया हूं.’’

कोमल ने खुश हो कर मुंह पीछे की ओर कर लिया. उचित मौका देख कर मनोज ने जेब में रखा क्लच वायर निकाला और कोमल की गर्दन पर लपेट कर कस दिया. कोमल ने मनोज को वायर ढीला करने के लिए कहा, साथ ही बचने के लिए बहुत हाथपैर मारे, जिस की वजह से मनोज के हाथों में खरोंचे भी आ गईं. लेकिन उस ने वायर को ढीला नहीं किया.

कुछ ही पलों में कोमल ने आखिरी हिचकी ली और उस की गर्दन एक ओर लुढ़क गई. कोमल की लाश को परे धकेल कर वह पार्क से बाहर आ गया और अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर घर लौट आया. इस के बाद उस ने अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए अपने दोस्त अनुज के साथ शराब की पार्टी की, जहां कोमल की हत्या का राज उस पर जाहिर कर दिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने 17 जून, 2017 को मनोज को तीसहजारी कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Crime Story

— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

— 2017 में प्रकाशित

Courtroom Drama : इश्क के चक्कर में

Courtroom Drama. मेरे मुवक्किल रियाज पर नादिर के कत्ल का इलजाम था. इस मामले को अदालत में पहुंचे करीब 3 महीने हो चुके थे, पर बाकायदा सुनवाई आज हो रही थी. अभियोजन पक्ष की ओर से 8 गवाह थे, जिन में पहला गवाह सालिक खान था. सच बोलने की कसम खाने के बाद उस ने अपना बयान रिकौर्ड कराया.

सालिक खान भी वहीं रहता था, जहां मेरा मुवक्किल रियाज और मृतक नादिर रहता था. रियाज और नादिर एक ही बिल्डिंग में रहते थे. वह तिमंजिला बिल्डिंग थी. सालिक खान उसी गली में रहता था. गली के नुक्कड़ पर उस की पानसिगरेट की दुकान थी.

भारी बदन के सालिक की उम्र 46-47 साल थी. अभियोजन पक्ष के वकील ने उस से मेरे मुवक्किल की ओर इशारा कर के पूछा, ‘‘सालिक खान, क्या आप इस आदमी को जानते हैं?’’

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‘‘जी साहब, अच्छी तरह से जानता हूं.’’ ‘‘यह कैसा आदमी है?’’

‘‘हुजूर, यह आवारा किस्म का बहुत झगड़ालू आदमी है. इस के बूढ़े पिता एक होटल में बैरा की नौकरी करते हैं. यह सारा दिन मोहल्ले में घूमता रहता है. हट्टाकट्टा है, पर कोई काम नहीं करता.’’

‘‘क्या यह गुस्सैल प्रवृत्ति का है?’’ वकील ने पूछा.

‘‘जी, बहुत ही गुस्सैल स्वभाव का है. मेरी दुकान के सामने ही पिछले हफ्ते इस की नादिर से जम कर मारपीट हुई थी. दोनों खूनखराबे पर उतारू थे. इस से यह तो नहीं होता कि कोई कामधाम कर के बूढ़े बाप की मदद करे, इधरउधर लड़ाईझगड़ा करता फिरता है.’’

‘‘क्या यह सच है कि उस लड़ाई में ज्यादा नुकसान इसी का हुआ था. इस के चेहरे पर चोट लगी थी. उस के बाद इस ने क्या कहा था?’’ वकील ने मेरे मुवक्किल की ओर इशारा कर के पूछा.

‘‘इस ने नादिर को धमकाते हुए कहा था कि यह उसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगा. इस का अंजाम उसे भुगतना ही पड़ेगा. इस का बदला वह जरूर लेगा.’’

इस के बाद अभियोजन के वकील ने कहा, ‘‘दैट्स आल हुजूर. इस धमकी के कुछ दिनों बाद ही नादिर की हत्या कर दी गई, इस से यही लगता है कि यह हत्या इसी आदमी ने की है.’’

उस के बाद मैं गवाह से पूछताछ करने के लिए आगे आया. मैं ने पूछा, ‘‘सालिक साहब, क्या आप शादीशुदा हैं?’’ ‘‘जी हां, मैं शादीशुदा ही नहीं, मेरी 2 बेटियां और एक बेटा भी है.’’

‘‘क्या आप की रियाज से कोई व्यक्तितगत दुश्मनी है?’’ ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.’’

‘‘तब आप ने उसे कामचोर और आवारा क्यों कहा?’’ ‘‘वह इसलिए कि यह कोई कामधाम करने के बजाय दिन भर आवारा घूमता रहता है.’’

‘‘लेकिन आप की बातों से तो यही लगता है कि आप रियाज से नफरत करते हैं. इस की वजह यह है कि रियाज आप की बेटी फौजिया को पसंद करता है. उस ने आप के घर फौजिया के लिए रिश्ता भी भेजा था. क्या मैं गलत कह रहा हूं्?’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. हां, उस ने फौजिया के लिए रिश्ता जरूर भेजा था, पर मैं ने मना कर दिया था.’’ सालिक खान ने हकलाते हुए कहा.

‘‘आप झूठ बोल रहे हैं सालिक खान, आप ने इनकार नहीं किया था, बल्कि कहा था कि आप पहले बड़ी बेटी शाजिया की शादी करना चाहते हैं. अगर रियाज शाजिया से शादी के लिए राजी है तो यह रिश्ता मंजूर है. चूंकि रियाज फौजिया को पसंद करता था, इसलिए उस ने शादी से मना कर दिया था. यही नहीं, उस ने ऐसी बात कह दी थी कि आप को गुस्सा आ गया था. आप बताएंगे, उस ने क्या कहा था?’’

‘‘उस ने कहा था कि शाजिया सुंदर नहीं है, इसलिए वह उस से किसी भी कीमत पर शादी नहीं करेगा.’’

‘‘…और उसी दिन से आप रियाज से नफरत करने लगे थे. उसे धोखेबाज, आवारा और बेशर्म कहने लगे. इसी वजह से आज उस के खिलाफ गवाही दे रहे हैं.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. मैं ने जो देखा था, वही यहां बताया है.’’ ‘‘क्या आप को यकीन है कि रियाज ने जो धमकी दी थी, उस पर अमल कर के नादिर का कत्ल कर दिया है?’’

‘‘मैं यह यकीन से नहीं कह सकता, क्योंकि मैं ने उसे कत्ल करते नहीं देखा.’’ ‘‘मतलब यह कि सब कुछ सिर्फ अंदाजे से कह रहे हो?’’

मैं ने सालिक खान से जिरह खत्म कर दी. रियाज और मृतक नादिर गोरंगी की एक तिमंजिला बिल्डिंग में रहते थे, जिस की हर मंजिल पर 2 छोटेछोटे फ्लैट्स बने थे. नादिर अपने परिवार के साथ दूसरी मंजिल पर रहता था, जबकि रियाज तीसरी मंजिल पर रहता था.

रियाज मांबाप की एकलौती संतान था. उस की मां घरेलू औरत थी. पिता एक होटल में बैरा थे. उस ने इंटरमीडिएट तक पढ़ाई की थी. वह आगे पढ़ना चाहता था, पर हालात ऐसे नहीं थे कि वह कालेज की पढ़ाई करता. जाहिर है, उस के बाप अब्दुल की इतनी आमदनी नहीं थी. वह नौकरी ढूंढ रहा था, पर कोई ढंग की नौकरी नहीं मिल रही थी, इसलिए इधरउधर भटकता रहता था.

बैरा की नौकरी वह करना नहीं चाहता था. अब उस पर नादिर के कत्ल का आरोप था. मृतक नादिर बिलकुल पढ़ालिखा नहीं था. वह अपने बड़े भाई माजिद के साथ रहता था. मांबाप की मौत हो चुकी थी. माजिद कपड़े की एक बड़ी दुकान पर सेल्समैन था. वह शादीशुदा था. उस की बीवी आलिया हाउसवाइफ थी. उस की 5 साल की एक बेटी थी. माजिद ने अपने एक जानने वाले की दुकान पर नादिर को नौकरी दिलवा दी थी. नादिर काम अच्छा करता था. उस का मालिक उस पर भरोसा करता था. नादिर और रियाज के बीच कोई पुरानी दुश्मनी नहीं थी.

अगली पेशी के पहले मैं ने रियाज और नादिर के घर जा कर पूरी जानकारी हासिल  कर ली थी. रियाज का बाप नौकरी पर था. मां नगीना से बात की. वह बेटे के लिए बहुत दुखी थी. मैं ने उसे दिलासा देते हुए पूछा, ‘‘क्या आप को पूरा यकीन है कि आप के बेटे ने नादिर का कत्ल नहीं किया?’’

‘‘हां, मेरा बेटा कत्ल नहीं कर सकता. वह बेगुनाह है.’’ ‘‘फिर आप खुदा पर भरोसा रखें. उस ने कत्ल नहीं किया है तो वह छूट जाएगा. अभी तो उस पर सिर्फ आरोप है.’’

नगीना से मुझे कुछ काम की बातें पता चलीं, जो आगे जिरह में पता चलेंगी. मैं रियाज के घर से निकल रहा था तो सामने के फ्लैट से कोई मुझे ताक रहा था. हर फ्लैट में 2 कमरे और एक हौल था. इमारत का एक ही मुख्य दरवाजा था. हर मंजिल पर आमनेसामने 2 फ्लैट्स थे. एक तरफ जीना था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, 17 अप्रैल की रात 2 बजे के करीब नादिर की हत्या हुई थी. उसे इसी बिल्डिंग की छत पर मारा गया था. उस की लाश पानी की टंकी के करीब एक ब्लौक पर पड़ी थी. उस की हत्या बोल्ट खोलने वाले भारी रेंच से की गई थी.

अगली पेशी पर अभियोजन पक्ष की ओर से कादिर खान को पेश किया गया. कादिर खान भी उसी बिल्डिंग में रहता था. बिल्डिंग के 5 फ्लैट्स में किराएदार रहते थे और एक फ्लैट में खुद मकान मालिक रहता था. अभियोजन के वकील ने कादिर खान से सवालजवाब शुरू किए.

लाश सब से पहले उसी ने देखी थी. उस की गवाही में कोई खास बात नहीं थी, सिवाय इस के कि उस ने भी रियाज को झगड़ालू और गुस्सैल बताया था. मैं ने पूछा, ‘‘आप ने मुलाजिम रियाज को गुस्सैल और लड़ाकू कहा है, इस की वजह क्या है?’’ ‘‘वह है ही झगड़ालू, इसलिए कहा है.’’

‘‘आप किस फ्लैट में कब से रह रहे हैं?’’ ‘‘मैं 4 नंबर फ्लैट में 4 सालों से रह रहा हूं.’’

‘‘इस का मतलब दूसरी मंजिल पर आप अकेले ही रहते हैं?’’ ‘‘नहीं, मेरे साथ बीवीबच्चे भी रहते हैं.’’

‘‘जब आप बिल्डिंग में रहने आए थे तो रियाज आप से पहले से वहां रह रहा था?’’ ‘‘जी हां, वह वहां पहले से रह रहा था.’’

‘‘कादिर खान, जिस आदमी से आप का 4 सालों में एक बार भी झगड़ा नहीं हुआ, इस के बावजूद आप उसे झगड़ालू कह रहे हैं, ऐसा क्यों?’’

‘‘मुझ से झगड़ा नहीं हुआ तो क्या हुआ, वह झगड़ालू है. मैं ने खुद उसे नादिर से लड़ते देखा है. दोनों में जोरजोर से झगड़ा हो रहा था. बाद में पता चला कि उस ने नादिर का कत्ल कर दिया.’’

‘‘क्या आप बताएंगे कि दोनों किस बात पर लड़ रहे थे?’’

‘‘नादिर का कहना था कि रियाज उस के घर के सामने से गुजरते हुए गंदेगंदे गाने गाता था. जबकि रियाज इस बात को मना कर रहा था. इसी बात को ले कर दोनों में झगड़ा हुआ था. लोगों ने बीचबचाव कराया था.’’

‘‘और अगले दिन बिल्डिंग की छत पर नादिर की लाश मिली थी. उस की लाश आप ने सब से पहले देखी थी.’’ एक पल सोच कर उस ने कहा, ‘‘हां, करीब 9 बजे सुबह मैं ने ही देखी थी.’’

‘‘क्या आप रोज सवेरे छत पर जाते हैं?’’ ‘‘नहीं, मैं रोज नहीं जाता. उस दिन टीवी साफ नहीं आ रहा था. मुझे लगा कि केबल कट गया है, यही देखने गया था.’’

‘‘आप ने छत पर क्या देखा?’’ ‘‘जैसे ही मैं ने दरवाजा खोला, मेरी नजर सीधे लाश पर पड़ी. मैं घबरा कर नीचे आ गया.’’

‘‘कादिर खान, दरवाजा और लाश के बीच कितना अंतर रहा था?’’ ‘‘यही कोई 20-25 फुट का. ब्लौक पर नादिर की लाश पड़ी थी. उस की खोपड़ी फटी हुई थी.’’

‘‘नादिर की लाश के बारे में सब से पहले आप ने किसे बताया?’’ ‘‘दाऊद साहब को बताया था. वह उस बिल्डिंग के मालिक हैं.’’

‘‘बिल्डिंग के मालिक, जो 5 नंबर फ्लैट में रहते हैं?’’ ‘‘जी, मैं ने उन से छत की चाबी ली थी, छत की चाबी उन के पास ही रहती है.’’

‘‘उस दिन छत का दरवाजा तुम्हीं ने खोला था?’’ ‘‘जी साहब, ताला मैं ने ही खोला था?’’

‘‘ताला खोला तो ब्लौक पर लाश पड़ी दिखाई दी. जरा छत के बारे में विस्तार से बताइए?’’ ‘‘पानी की टंकी छत के बीच में है. टंकी के करीब छत पर 15-20 ब्लौक लगे हैं, जिन पर बैठ कर कुछ लोग गपशप कर सकते हैं.’’

‘‘अगर ताला तुम ने खोला तो मृतक आधी रात को छत पर कैसे पहुंचा?’’ ‘‘जी, यह मैं नहीं बता सकता. दाऊद साहब को जब मैं ने लाश के बारे में बताया तो वह भी हैरान रह गए.’’

‘‘बात नादिर के छत पर पहुंचने भर की नहीं है, बल्कि वहां उस का बेदर्दी से कत्ल भी कर दिया गया. नादिर के अलावा भी कोई वहां पहुंचा होगा. जबकि चाबी दाऊद साहब के पास थी.’’

‘‘दाऊद साहब भी सुन कर हैरान हो गए थे. वह भी मेरे साथ छत पर गए. इस के बाद उन्होंने ही पुलिस को फोन किया.’’

इसी के बाद जिरह और अदालत का वक्त खत्म हो गया.

मुझे तारीख मिल गई. अगली पेशी पर माजिद की गवाही शुरू हुई. वह सीधासादा 40-42 साल का आदमी था. कपड़े की दुकान पर सेल्समैन था. फ्लैट नंबर 2 में रहता था. उस ने कहा कि नादिर और रियाज के बीच काफी तनाव था. दोनों में झगड़ा भी हुआ था. यह कत्ल उसी का नतीजा है.

अभियोजन के वकील ने सवाल कर लिए तो मैं ने पूछा, ‘‘आप का भाई कब से कब तक अपनी नौकरी पर रहता था?’’ ‘‘सुबह 11 बजे से रात 8 बजे तक. वह 9 बजे तक घर आ जाता था.’’

‘‘कत्ल वाले दिन वह कितने बजे घर आया था?’’ ‘‘उस दिन मैं घर आया तो वह घर पर ही मौजूद था.’’

‘‘माजिद साहब, पिछली पेशी पर एक गवाह ने कहा था कि उस दिन शाम को उस ने नादिर और रियाज को झगड़ा करते देखा था. क्या उस दिन वह नौकरी पर नहीं गया था?’’

‘‘नहीं, उस दिन वह नौकरी पर गया था, लेकिन तबीयत ठीक न होने की वजह से जल्दी घर आ गया था.’’ ‘‘घर आते ही उस ने लड़ाईझगड़ा शुरू कर दिया था?’’

‘‘नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है. घर आ कर वह आराम कर रहा था, तभी रियाज खिड़की के पास खड़े हो कर बेहूदा गाने गाने लगा था. मना करने पर भी वह चुप नहीं हुआ. पहले भी इस बात को ले कर नादिर और उस में मारपीट हो चुकी थी. नादिर नाराज हो कर बाहर निकला और दोनों में झगड़ा और गालीगलौज होने लगी.’’

‘‘झगड़ा सिर्फ इतनी बात पर हुआ था या कोई और वजह थी?’’ मैं ने पूछा. ‘‘यह आप रियाज से ही पूछ लीजिए. मेरा भाई सीधासादा था, बेमौत मारा गया.’’ जवाब में माजिद ने कहा.

‘‘आप को लगता है कि रियाज ने धमकी के अनुसार बदला लेने के लिए तुम्हारे भाई का कत्ल कर दिया है.’’ ‘‘जी हां, मुझे लगता नहीं, पूरा यकीन है.’’

‘‘जिस दिन कत्ल हुआ था, सुबह आप सो कर उठे तो आप का भाई घर पर नहीं था?’’ ‘‘जब मैं सो कर उठा तो मेरी बीवी ने बताया कि नादिर घर पर नहीं है.’’

‘‘यह जान कर आप ने क्या किया?’’ ‘‘हाथमुंह धो कर मैं उस की तलाश में निकला तो पता चला कि छत पर नादिर की लाश पड़ी है.’’

‘‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, नादिर का कत्ल रात 1 से 2 बजे के बीच हुआ था. क्या आप बता सकते हैं कि नादिर एक बजे रात को छत पर क्या करने गया था? आप ने जो बताया है, उस के अनुसार नादिर बीमार था. छत पर ताला भी लगा था. इस हालत में छत पर कैसे और क्यों गया?’’

‘‘मैं क्या बताऊं? मुझे खुद नहीं पता. अगर वह जिंदा होता तो उसी से पूछता.’’ ‘‘वह जिंदा नहीं है, इसलिए आप को बताना पड़ेगा, वह ऊपर कैसे गया? क्या उस के पास डुप्लीकेट चाबी थी? उस ने मकान मालिक से चाबी नहीं ली तो क्या पीछे से छत पर पहुंचा?’’

‘‘नादिर के पास डुप्लीकेट चाबी नहीं थी. वह छत पर क्यों और कैसे गया, मुझे नहीं पता.’’

‘‘आप कह रहे हैं कि आप का भाई सीधासादा काम से काम रखने वाला था. इस के बावजूद उस ने गुस्से में 2-3 बार रियाज से मारपीट की. ताज्जुब की बात तो यह है कि रियाज की लड़ाई सिर्फ नादिर से ही होती थी. इस की एक खास वजह है, जो आप बता नहीं रहे हैं.’’

‘‘कौन सी वजह? मैं कुछ नहीं छिपा रहा हूं.’’

‘‘अपने भाई की रंगीनमिजाजी. नादिर सालिक खान की छोटी बेटी फौजिया को चाहता था. वह फौजिया को रियाज के खिलाफ भड़काता रहता था. उस ने उस के लिए शादी का रिश्ता भी भेजा था, जबकि फौजिया नादिर को इस बात के लिए डांट चुकी थी. जब उस पर उस की डांट का असर नहीं हुआ तो फौजिया ने सारी बात रियाज को बता दी थी. उसी के बाद रियाज और नादिर में लड़ाईझगड़ा होने लगा था.’’

‘‘मुझे ऐसी किसी बात की जानकारी नहीं है. मैं ने रिश्ता नहीं भिजवाया था.’’ ‘‘खैर, यह बताइए कि 2 साल पहले आप के फ्लैट के समने एक बेवा औरत सकीरा बेगम रहती थीं, आप को याद हैं?’’

माजिद हड़बड़ा कर बोला, ‘‘जी, याद है.’’ ‘‘उस की एक जवान बेटी थी रजिया, याद आया?’’

‘‘जी, उस की जवान बेटी रजिया थी.’’ ‘‘अब यह बताइए कि सकीरा बेगम बिल्डिंग छोड़ कर क्यों चली गई?’’ ‘‘उस की मरजी, यहां मन नहीं लगा होगा इसलिए छोड़ कर चली गई.’’

‘‘माजिद साहब, आप असली बात छिपा रहे हैं. क्योंकि वह आप के लिए शर्मिंदगी की बात है. आप बुरा न मानें तो मैं बता दूं? आप का भाई उस बेवा औरत की बेटी रजिया पर डोरे डाल रहा था. उस की इज्जत लूटने के चक्कर में था, तभी रंगेहाथों पकड़ा गया. यह रजिया की खुशकिस्मती थी कि झूठे प्यार के नाम पर वह अपना सब कुछ लुटाने से बच गई. इस बारे में बताने वालों की कमी नहीं है, इसलिए झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है. सकीरा बेगम नादिर की वजह से बिल्डिंग छोड़ कर चली गई थीं.’’

‘‘जी, इस में नादिर की गलती थी, इसलिए मैं ने उसे खूब डांटा था. इस के बाद वह सुधर गया था.’’

‘‘अगर वह सुधर गया था तो आधी रात को छत पर क्या कर रहा था? क्या आप इस बात से इनकार करेंगे कि नादिर सकीरा बेगम की बेटी रजिया से छत पर छिपछिप कर मिलता था? इस के लिए उस ने छत के ताले की डुप्लीकेट चाबी बनवा ली थी. जब इस बात की खबर दाऊद साहब को हुई तो उन्होंने ताला बदलवा दिया था.’’

उस ने लड़खड़ाते हुए कहा, ‘‘यह भी सही है.’’

अगली पेशी पर मैं ने इनक्वायरी अफसर से पूछताछ की. उस का नाम साजिद था. मैं ने कहा, ‘‘नादिर की हत्या के बारे में आप को सब से पहले किस ने बताया?’’

‘‘रिकौर्ड के अनुसार, घटना की जानकारी 18 अप्रैल की सुबह 10 बजे दाऊद साहब ने फोन द्वारा दी थी. मैं साढ़े 10 बजे वहां पहुंच गया था.’’

‘‘जब आप छत पर पहुंचे, वहां कौनकौन था?’’

‘‘फोन करने के बाद दाऊद साहब ने सीढि़यों पर ताला लगा दिया था. मैं वहां पहुंचा तो मृतक की लाश टंकी के पीछे ब्लौक पर पड़ी थी. अंजाने में पीछे से उस की खोपड़ी पर  लोहे के वजनी रेंच से जोरदार वार किया गया था. उसी से उस की मौत हो गई थी.’’

‘‘हथियार आप को तुरंत मिल गया था?’’ ‘‘जी नहीं, थोड़ी तलाश के बाद छत के कोने में पड़े कबाड़ में मिला था.’’ ‘‘क्या आप ने उस पर से फिंगरप्रिंट्स उठवाए थे?’’ ‘‘उस पर फिंगरप्रिंट्स नहीं मिले थे. शायद साफ कर दिए गए थे.’’

‘‘घटना वाली रात मृतक छत पर था, वहीं उस का कत्ल किया गया था. सवाल यह है कि जब छत पर जाने वाली सीढि़यों के दरवाजे पर ताला लगा था तो मृतक छत पर कैसे पहुंचा? इस बारे में आप कुछ बता सकते हैं?’’

जज साहब काफी दिलचस्पी से हमारी जिरह सुन रहे थे. उन्होंने पूछा, ‘‘मिर्जा साहब, इस मामले में आप बारबार किसी लड़की का जिक्र क्यों कर रहे हैं? इस से तो यही लगता है कि आप उस लड़की के बारे में जानते हैं?’’

‘‘जी सर, कुछ हद तक जानता हूं.’’ ‘‘तो आप मृतक की प्रेमिका का नाम बताएंगे?’’ जज साहब ने पूछा. ‘‘जरूर बताऊंगा सर, पर समय आने दीजिए.’’

पिछली पेशी पर मैं ने प्यार और प्रेमिका का जिक्र कर के मुकदमे में सनसनी पैदा कर दी थी. यह कोई मनगढ़ंत किस्सा नहीं था. इस मामले में मैं ने काफी खोज की थी, जिस से मृतक नादिर के ताजे प्यार के बारे में पता कर लिया था. अब उसी के आधार पर रियाज को बेगुनाह साबित करना चाहता था.

काररवाई शुरू हुई. अभियोजन की तरफ से बिल्डिंग के मालिक दाऊद साहब को बुलाया गया. वकील ने 10 मिनट तक ढीलीढाली जिरह की. उस के बाद मेरा नंबर आया. मैं ने पूछा, ‘‘छत की चाबी आप के पास रहती है. घटना वाले दिन किसी ने आप से चाबी मांगी थी?’’

‘‘जी नहीं, चाबी किसी ने नहीं मांगी थी.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि 17 अप्रैल की रात को कातिल रियाज और मृतक नादिर में किसी एक के पास छत के दरवाजे की चाबी थी या दोनों के पास थी. उसी से दोनों छत पर पहुंचे थे. दाऊद साहब, आप के खयाल से नादिर की हत्या किस ने की होगी?’’

दाऊद ने रियाज की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘इसी ने मारा है और कौन मारेगा? इन्हीं दोनों में झगड़ा चल रहा था.’’

‘‘आप ने सरकारी वकील को बताया है कि रियाज आवारा, बदमाश और काफी झगड़ालू है. आप भी उसी बिल्डिंग में रहते हैं. आप का रियाज से कितनी बार लड़ाईझगड़ा हुआ है?’’

‘‘मुझ से तो उस का कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ. मैं ने उसे झगड़ालू नादिर से बारबार झगड़ा करने की वजह से कहा था.’’

‘‘इस का मतलब आप के लिए वह अच्छा था. आप से कभी कोई लड़ाईझगड़ा नहीं हुआ था.’’ ‘‘जी, आप ऐसा ही समझिए.’’ दाऊद ने गोलमोल जवाब दिया.

‘‘सभी को पता है कि 2 साल पहले रजिया से मिलने के लिए नादिर ने छत के दरवाजे में लगे ताले की डुप्लीकेट चाबी बनवाई थी. जब सब को इस बात की जानकारी हुई तो बड़ी बदनामी हुई. उस के बाद आप ने छत के दरवाजे का ताला तक बदल दिया था. हो सकता है, इस बार भी उस ने डुप्लीकेट चाबी बनवा ली हो और छत पर किसी से मिलने जाता रहा हो? इस बार लड़की कौन थी, बता सकते हैं आप?’’

‘‘इस बारे में मुझे कुछ नहीं पता. हां, हो सकता है उस ने डुप्लीकेट चाबी बनवा ली हो. लड़की के बारे में मैं कैसे बता सकता हूं. हो सकता है, रियाज को पता हो.’’

‘‘आप रियाज का नाम क्यों ले रहे हैं?’’ ‘‘इसलिए कि वह भी फौजिया से प्यार करता था या उसे इस प्यार की जानकारी थी.’’

मैं ने भेद उगलवाने की गरज से कहा, ‘‘दाऊद साहब, यह तो सब को पता है कि रियाज फौजिया से शादी करना चाहता था और इस के लिए उस ने रिश्ता भी भेजा था. जबकि नादिर उसे रियाज के खिलाफ भड़काता था. कहीं नादिर फौजिया के साथ ही छत पर तो नहीं था? इस का उल्टा भी हो सकता है?’’

दाऊद जिस तरह फौजिया को नादिर से जोड़ रहा था, यह उस की गंदी सोच का नतीजा था या फिर उस के दिमाग में कोई और बात थी. उस ने पूछा, ‘‘उल्टा कैसे हो सकता है?’’

‘‘यह भी मुमकिन है कि घटना वाली रात नादिर फौजिया से मिलने बिल्डिंग की छत पर गया हो और…’’

मेरी अधूरी बात पर उस ने चौंक कर मेरी ओर देखा. इस के बाद खा जाने वाली नजरों से मेरी ओर घूरते हुए बोला, ‘‘और क्या वकील साहब?’’

‘‘…और यह कि फौजिया के अलावा कोई दूसरी लड़की भी तो हो सकती है? किसी ने फौजिया को आतेजाते देखा तो नहीं, इसलिए वहां दूसरी लड़की भी तो हो सकती थी. इस पर आप को कुछ ऐतराज है क्या?’’

दाऊद ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘भला मुझे क्यों ऐतराज होगा?’’ ‘‘अगर मैं कहूं कि वह लड़की उसी बिल्डंग की रहने वाली थी तो..?’’ ‘‘…तो क्या?’’ वह हड़बड़ा कर बोला.

‘‘बिल्डिंग का मालिक होने के नाते आप को उस लड़की के बारे में पता होना चाहिए. अच्छा, मैं आप को थोड़ा संकेत देता हूं. उस का नाम ‘म’ से शुरू होता है और आप का उस से गहरा ताल्लुक है, जिस के इंतजार में नादिर छत पर बैठा था.’’

मैं असलियत की तह तक पहुंच चुका था. बस एक कदम आगे बढ़ना था. मैं ने कहा, ‘‘दाऊद साहब, नाम मैं बताऊं या आप खुद बताएंगे? आप को एक बार फिर बता दूं कि उस का नाम ‘म’ से शुरू होता है, जिस का इश्क नादिर से चल रहा था और यह बात आप को मालूम हो चुकी थी. अब बताइए नाम?’’

दाऊद गुस्से से उबलते हुए बोला, ‘‘अगर तुम ने मेरी बेटी मनीजा का नाम लिया तो ठीक नहीं होगा.’’

मैं ने जज साहब की ओर देखते हुए कहा, ‘‘सर, मुझे अब इन से कुछ नहीं पूछना. मेरे हिसाब से नादिर का कत्ल इसी ने किया है. रियाज बेगुनाह है. इस की नादिर से 2-3 बार लड़ाई हुई थी, इस ने धमकी भी दी थी, लेकिन इस ने कत्ल नहीं किया. धमकी की वजह से उस पर कत्ल का इल्जाम लगा दिया गया. अब हकीकत सामने है सर.’’

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अगली पेशी पर अदालत ने मेरे मुवक्किल को बाइज्जत बरी कर दिया, क्योंकि वह बेगुनाह था. दाऊद के व्यवहार से उसे नादिर का कातिल मान लिया गया था. जब अदालत के हुक्म पर पुलिस ने उस से पूछताछ की तो थोड़ी सख्ती के बाद उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

नादिर एक दिलफेंक आशिकमिजाज लड़का था. जब फौजिया ने उसे घास नहीं डाली तो उस ने इश्क का चक्कर दाऊद की बेटी मनीजा से चलाया. वह उस के जाल में फंस गई. दाऊद को अपनी बेटी से नादिर के प्रेमसंबंधों का पता चल गया था. नादिर के इश्कबाजी के पुराने रिकौर्ड से वह अच्छी तरह वाकिफ था.

दाऊद ने बेटी के प्रेमसंबंधों को उछालने या उसे समझाने के बजाय नादिर की जिंदगी का पत्ता साफ करने का फैसला कर लिया. वह मौके की ताक में रहने लगा. रियाज और नादिर के बीच लड़ाईझगड़े और दुश्मनी का माहौल बना तो दाऊद ने नादिर के कत्ल की योजना बना डाली.

दाऊद को पता था कि नादिर ने मनीजा की मदद से छत की डुप्लीकेट चाबी बनवा ली है. घटना वाली रात को वह दबे पांव मनीजा के पहले छत पर पहुंच गया. नादिर छत पर मनीजा का इंतजार कर रहा था, तभी पीछे से अचानक पहुंच कर दाऊद ने उस की खोपड़ी पर वजनी रेंच से वार कर दिया.

एक ही वार में नादिर की खोपड़ी फट गई और वह मर गया. उस की जेब से चाबी निकाल कर दाऊद दरवाजे में ताला लगा कर नीचे आ गया.

मैं ने दाऊद से कहा कि वह बिल्डिंग का मालिक था. नादिर को वहां से निकाल सकता था. मारने की क्या जरूरत थी? जवाब में उस ने कहा, ‘‘मैं उस बदमाश को छोड़ना नहीं चाहता था. घर बदलने से उस की बुरी नीयत नहीं बदलती. वह मेरी मासूम बच्ची को फिर बहका लेता या फिर किसी सीधीसादी लड़की की जिंदगी बरबाद करता.’’

इस तरह नादिर को मासूम लड़कियों को अपने जाल में फंसाने की कड़ी सजा मिल गई थी. Courtroom Drama

Crime Story : ब्लैक मेलिंग का फल!

Crime Story. स्वयं को होशियार, ताकतवर और सक्षम समझकर जब लालच के गंदे भंवर में फंस, कोई ब्लैकमेलिंग अर्थात भयदोहन का खेल खेलने लगता है तो अंजाम के रूप में “फल” जेल ही मिलती है.

यह एक बार पुनः छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में घटित एक सच्ची घटना से सिद्ध हो गया. केशकाल थाना क्षेत्र में एक युवती को पचास हजार रुपए ब्लैकमेल कर वसूलने वाले साथ ही दुष्कर्म के नाले में डुबकी लगाने वाले दो लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया.

पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कांकेर जिले के केशकाल के बोरगांव वार्ड क्रमांक 6 में  रात 8 बजे एक युवती अपने दोस्त  के घर की चाबी मांग अपने प्रेमी के संग रुकी थी.

जहां भनक मिलने के बाद तकरीबन रात एक बजे बाजू के रूम में रहने वाले दीपंकर विश्वास ने छुप कर  युवक-युवती का अंतरंग दृश्यों को कैमरे में कैद कर वीडियो बना लिया.

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जिसके बाद दीपंकर विश्वास ने फोन से अपने दोस्त वेंकट विजय को सूचना देकर उसे भी बुला. जिसके बाद दोनों ने दरवाजा खुलवाया और प्रेमी को अपने कमरे में ले जा उसे वीडियो दिखा कर 50 हजार रुपए मोबाइल से अपने खाते में ले लिए और प्रेमी को घर से भगाकर लड़की को वीडियो दिखाकर बारी-बारी से दुष्कर्म किया.

एसडीओपी अमित पटेल ने बताया कि इस बीच प्रेमी ने थाना केशकाल पहुंच घटना की जानकारी दी तो रात्रि पेट्रोलिंग में तैनात पुलिसकर्मियों ने आरोपियों को गिरफ्तार किया.पीड़िता सिमरन (बदला हुआ नाम) ने थाने में बताया कि पास के ही गांव में पुलिया बनाई जा रही है. जिसके ठेकेदार  के साथ वह रात्रि में अपने दोस्त के घर की चाबी लेकर वहां ठहरने गई थी. जहां वे दोनों बात कर रहे थे. इतने में दरवाजा खुलवा दोनों आरोपियों ने ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया और प्रेमी को भगाकर मेरे साथ दुष्कर्म भी किया.

अंतरंग वीडियो और रेप

पहले तो आरोपी ने  युवती सिमरन का अंतरंग दृश्यों का वीडियो बना लिया फिर  50 हजार रूपये ले लिए, यह काम कथित रूप से  दो लोगों जिनमें एक डाक्टर व एक शिक्षक  है ने मिलकर किया. यही नहीं मौका देख कर सिमरन से बलात्कार भी किया. घटना के पश्चात बॉयफ्रेंड के द्वारा सिमरन को हिम्मत बंधाकर  शिकायत दर्ज करवाई गई परिणाम स्वरूप समाज में आदर्श के रूप में प्रस्तुत डाक्टर व शिक्षक को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल के सीखचों में डाल दिया है. महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गिरफ्तार आरोपियों में एक शिक्षक भी है, जबकि इसका मास्टरमाइंड एक कथित डाक्टर है.

पुलिस के मुताबिक सिमरन अक्सर अपने बॉयफ्रेंड के साथ दीपांकर विश्वास के मकान के पास आया करती थी. दीपांकर की निगाह कई दिनों से शिकार पर थी. मौका मिलते ही उसने छुपकर दोनों का निजी क्षणों का दृश्य कैमरे में कैद कर लिया. इसके बाद उसे लगा कि क्यों ना इनसे रूपए ऐंठ लिए जाए. दीपंकर खुद को डाक्टर बताता था और एक क्लिनिक भी चलाता है. युवती का विडियो बनाने वाला झोलाछाप डाक्टर दीपंकर लगातार इस बात की धमकी दे रहा था कि वो इसे वायरल कर देगा, यही नहीं लड़के से मिलने उसके कमरे में आती हो, ये जानकारी परिवारवालों को भी दे देगा.बदनामी के डर से लड़की ने अपने दोस्त की मदद से उस कथित डाक्टर को 50 हजार रूपये दे भी दिये थे. लेकिन डाक्टर मान नहीं रहा था उसकी भूख बढ़ती चली जा रही थी.

एक दिन  जब युवती अपने कमरे में थी, तभी अचानक से कथित डाक्टर दीपंकर अपने शिक्षक साथ वेंकट  के साथ युवती के कमरे में पहुंच गया.दोनों आरोपियों ने लड़की को जान से मारने की धमकी दी और फिर दोनों आरोपियों ने युवती के साथ रेप किया. इस तरह दीपांकर और उसका साथी दोनों अपराध के दलदल में फंसते चले गए और आज जेल की हवा खा रहे हैं. Crime

Hindi Story : जिस्म के सौदागर

Hindi Story. इंटर में पढ़ने वाली प्रिया तो खूबसूरत थी ही, उस की 35 साल मां चंपा भी कम खूबसूरत नहीं थी. वैसे, प्रिया अपने बाप की औलादों में खुद और एक उस का 8 साल का छोटा भाई था.

प्रिया के पिता रामेश्वर के पास खेतीबारी तो कोई खास नहीं थी, पर प्राइवेट नौकरी करने की वजह से घर में किसी चीज की कमी नहीं थी.

रामेश्वर तनख्वाह के पैसे में से ही घर खर्च के लिए भी भेजा करता था और बैंक में जमा भी करता था. वह जानता था कि अगर पैसे नहीं बचाएंगे, तो प्रिया की शादी कैसे कर सकेंगे? उस की शादी में भी तो 5-7 लाख रुपए लग ही जाएंगे.

रामेश्वर के बाहर रहने की वजह से घर पर बेटे और बेटी के साथ चंपा को अकेले रहना पड़ता था. बाजार के लिए भी चंपा को ही जाना पड़ता था, जबकि उस का गांव राज्य के आला मंत्री का गांव था, इसलिए गांव में बिजली, सड़क वगैरह जैसी सुविधाएं शहरों से कम नहीं थीं.

किसी चीज की कमी तो थी नहीं, इसलिए चंपा भी हमेशा शहरी औरतों की तरह ही दिखती थी. उस के बच्चे भी गांव के अच्छे घरानों के बच्चों से कम अच्छे नहीं दिखते थे.

पति से दूर रहने की वजह से गांव के कई जिस्म के सौदागर चंपा पर गिद्ध की नजर लगाए रहते थे. बगल के ही एक नौजवान राकेश को चंपा के यहां आनेजाने से वैसे नौजवान जलतेभुनते भी रहते थे.

लोगों को लगता था कि राकेश रामेश्वर के न होने का नाजायज फायदा जरूर उठाता होगा और तभी चंपा दूसरों के जाल में नहीं फंस रही है. चंपा भी उन लोगों की नीयत को अच्छी तरह समझने लगी थी, इसलिए वह हमेशा सावधान ही रहा करती थी.

पिछले कोरोना काल में जब कंपनी बंद हो गई, तो एकाध महीने तो रामेश्वर गुजरात में जैसेतैसे रहा था, पर जैसे ही सुविधाओं की कमी होने लगी, वैसे ही वह जैसेतैसे घर आ गया था.

रामेश्वर घर तो जरूर आ गया था, पर कोरोना का शिकार हो गया था और अस्पताल ले जाने के समय में ही उस की मौत हो गई थी.

अब तो चंपा पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा था. पर करती भी तो क्या? तनाव में ही किसी तरह जिंदगी बसर करती जा रही थी. बच्चों के भविष्य की चिंता सताती जा रही थी, जिस की वजह से वह हाई ब्लडप्रैशर और दिल की बीमारी का शिकार हो गई थी, जबकि डाक्टरों ने बताया भी था कि अगर आप चिंता छोड़ दें, तो इन बीमारियों से आप को काफी राहत मिल सकती है.

इधर गांव के मनचले नौजवानों को लगने लगा था कि अब तो चंपा घर की समस्याओं से जूझती चली जाएगी. कटी हुई घास आखिर कितने दिनों तक काम आएगी, इसलिए जाल में यकीनन फंस सकती है.

तब तक प्रिया भी जवानी की दहलीज पर पहुंच चुकी थी. वह भी अपनी मां के जैसी ही थी. वैसे लोगों की नजरें कभी मां से गिरतीं, तो बेटी पर अटक जातीं और बेटी से गिरतीं, तो मां पर अटक जातीं, पर कभी दाल गल नहीं पाती थी, जिस की वजह से उन लोगों को काफी चिढ़ भी होती थी.

अगले साल जब फिर कोरोना की दूसरी लहर आई, तो चंपा उस से बच नहीं सकी, क्योंकि दोनों बच्चों को बुखार आया, तो छूटने का नाम ही नहीं ले रहा था, जिस की वजह से चंपा को बारबार कभी डाक्टर, तो कभी कैमिस्ट की दौड़ लगानी पड़ रही थी. उसे बस यही लग रहा था कि किसी तरह दोनों बच्चे ठीक हो जाएं.

वही हुआ भी. बच्चे तो ठीक हो गए, पर चंपा की तबीयत बिगड़ गई. कुछ दिनों तक तो घर पर ही दवा खाती रही, पर बुखार में सुधार नहीं हुआ. उसे देखने एक दिन गांव का मृत्युंजय नामक नौजवान आया और बोला, ‘‘आप लोगों ने नहीं कहा, गांवघर का होने के नाते हम लोगों का भी तो कुछ फर्ज होता है. आखिर गांवघर का आदमी होता है किसलिए? इन्हें ले चलिए. पटना के एक अच्छे अस्पताल में मेरी जानपहचान के कई लोग हैं.

‘‘अच्छा अस्पताल होने की वजह से वहां का चार्ज तो बहुत ज्यादा है, पर मैं चलूंगा तो काफी कम पैसे में इलाज हो जाएगा.’’

ऐसे हालात में चंपा की भी मजबूरी हो गई. भला जान किसे प्यारी नहीं होती, लिहाजा उस नौजवान के साथ चंपा चल दी, तो प्रिया भी साथ हो ली.

मृत्युंजय ने चंपा को अस्पताल में भरती करवा दिया. वह भी वहीं रहने लगा, जबकि प्रिया को कहा गया कि यहां मरीज की देखभाल अस्पताल वाले ही करते हैं, इसलिए आप को वार्ड के बाहर ही रहना पड़ेगा. हां, 24 घंटे में एक बार थोड़ी देर के लिए मिल सकती हो.

प्रिया अस्पताल के बाहर रह रही थी, पर रोज सुबह अपनी मां से मिलने जाती थी. चंपा की हालत में थोड़ा सुधार भी होता जा रहा था.

प्रिया को लगा कि 2-3 दिनों के अंदर ही अस्पताल से छुट्टी हो जाएगी, पर दूसरे दिन जब प्रिया मिलने गई तो देखा कि मां के हाथपैर रस्सी से बंधे हुए थे.

चंपा ने बताया, ‘मेरे साथ 5 लोगों ने बारीबारी से जबरदस्ती की है…’’

प्रिया ने अपनी मां के बयान का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया. अस्पताल वाले सफाई देते रहे कि चंपा की दिमागी हालत अच्छी नहीं थी, इसलिए हाथपैर बांधे गए थे.

चंपा ने प्रिया से कहा, ‘‘बेटी, इस अस्पताल से बाहर निकालो, वरना ये भेडि़ए मुझे नोच खाएंगे. यहां तो जिस्म के सौदागर भरे पड़े हैं.’’

प्रिया ने अपनी मां को दूसरे अस्पताल में ले जाने के लिए कहा, तो अस्पताल वालों ने जो बिल बताया, जिसे  सुन कर उस के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई. उस ने मृत्युंजय को फोन लगाया.

मृत्युंजय ने कहा, ‘‘मैं घर आ गया हूं. मेरे जीजाजी की तबीयत काफी खराब है, इसलिए मैं दिल्ली जा रहा हूं…’’ और फोन काट दिया.

प्रिया को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे. उस रात प्रिया को नींद भी नहीं आई, पर रातभर जागने की वजह से भोर में नींद आ गई थी.

सुबहसुबह अस्पताल से फोन आया कि चंपा की हालत ज्यादा बिगड़ गई थी, इसलिए उसे बचाया नहीं जा सका.

प्रिया की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. वह किसी तरह अपनी मां के बिस्तर के पास पहुंची. जब वह जोरजोर से रोने लगी, तो अस्पताल वालों ने रोने से मना कर दिया.

वैसे तो अस्पताल में मरे मरीज को उस के परिवार वाले के सुपुर्द कर दिया जाता था, पर चंपा की लाश को पहले से ही बाहर खड़ी एंबुलैंस में डाला गया. उस में प्रिया को बैठाया गया. पीछेपीछे पुलिस की गाड़ी थी.

लाश को श्मशान घाट पहुंचाया गया और झटपट दाह संस्कार करवा दिया गया, ताकि प्रिया के पास कोई सुबूत न बचने पाए.      Hindi Story

लेखक : अलखदेव प्रसाद ‘अचल’        

Story In Hindi: शक – क्या केतकी की कम हुई सुगना के लिए जलन

Story In Hindi: रोज इसी समय वह काम से लौटती थी. उस के चारों बच्चे वहीं खेलते हुए मिलते थे. उसे ध्यान आया कि हो सकता है कि उस का पति मंगल आज बच्चों को उस की मां के घर छोड़ कर काम पर चला गया हो. वह कराहते हुए उठी और अपनेआप को घसीटते हुए मां के  घर की ओर चल पड़ी, जो उस के घर से मात्र एक फर्लांग की दूरी पर था. वहां पहुंच कर उस ने पाया कि मां अभी तक काम से नहीं लौटी थीं. उन के घर में भी ताला लगा हुआ था. निराश हो कर वह वापस लौटी और घर के सामने जमीन पर बैठ कर पति और बच्चों का इंतजार करने लगी.

वह रोज सवेरे 4 बजे सो कर उठती. घर का कामकाज निबटा कर पति व बच्चों के लिए दालभात पका कर काम पर निकल जाती थी. पति व बच्चे देर से सो कर उठते थे. मंगल बच्चों को खिलापिला कर उन्हें खेलता छोड़ कर काम पर निकल जाता. जब वह दोपहर में लौट कर आती तो उस के बच्चे घर के सामने गली के बच्चों के साथ खेलते मिलते. आज पहला मौका था कि सुगना को घर बंद मिला और बच्चे नहीं मिले. आसपास पूछताछ करने पर पता चला कि किसी ने भी मंगल व बच्चों को नहीं देखा था. ऐसा लगता था कि मंगल बच्चों को ले कर भोर होते ही कहीं चला गया था. सुगना को बाहर बैठेबैठे 2 घंटे हो गए थे. वह धीरेधीरे सुबकने लगी. आसपास औरतों व बच्चों की भीड़ जमा हो गई.

उस की पड़ोसिन केतकी, ईर्ष्यावश उस से बात नहीं करती थी पर सुगना की दयनीय स्थिति देख कर केतकी  को भी उस पर दया आ गई. उस ने उसे अपने घर के अंदर आ कर कुछ खा लेने व आराम करने को कहा पर सुगना नहीं मानी. उस ने रोतेरोते कहा कि जब तक वह मंगल व बच्चों को नहीं देख लेगी तब तक न तो वहां से कहीं जाएगी और न ही कुछ खाएगी.

केतकी का पति, बसंत अकसर सुगना को निहारा करता था, जिस के कारण वह मन ही मन उस से जलती थी और उस से बात नहीं करती थी. बसंत ही नहीं, बस्ती के सभी पुरुषों की नजरों का केंद्रबिंदु थी सुगना. वह 6 धनी परिवारों में मालिश का काम करती थी. उन घरों की मालकिनों को कुछ काम नहीं था. खाली बैठेबैठे उन के बदन में दर्द होता रहता. सुगना उन के हाथपैरों में मालिश करती. साथ ही, इधरउधर की बातें नमकमिर्च लगा कर सुना कर उन का मनोरंजन करती.

ये रईस स्त्रियां प्रसन्न हो कर सुगना को अपनी उतरी हुई पुराने फैशन की साडि़यां दे देतीं. सुगना जब जार्जेट, रेशम, शिफान, टसर व नायलोन की साडि़यां पहन कर निकलती तो बस्ती की स्त्रियों के सीनों पर सांप लोट जाते और पुरुष आहें भरने लगते. सभी उसे पाना चाहते, उस से बातें करने को लालायित रहते.

शाम घिरने लगी थी. धीरेधीरे बस्ती के पुरुष काम से लौैटने लगे थे. आते ही सभी मंगल और बच्चों की खोज में लग गए. वास्तव में उन्हें खोजने से ज्यादा उन की दिलचस्पी सुगना की कृपादृष्टि पाने में थी.

जब मंगल व बच्चों का कहीं पता नहीं चला तो सब ने सोचा कि शायद वह पास वाले गांव में अपने मातापिता के पास चला गया होगा. इस विचार के आते ही बस्ती के दारूभट्टी के नौजवान मालिक केवल सिंह ने सुगना की सहायता के लिए अपनेआप को पेश कर दिया. बस्ती के सभी पुरुषों के पास वाहन के नाम पर पुरानी घिसीपिटी साइकिलें ही थीं. केवल सिंह ही ऐसा रईस था जिस के पास एक पुरानी खटारा फटफटी थी.

केवल सिंह ने अपनी फटफटी पर एक और नौजवान को बैठाया और मंगल का पता लगाने पास वाले गांव में चला गया. केवल सिंह का सुगना के घर खूब आनाजाना था. मंगल जब दारू पी कर उस की दुकान में लुढ़क जाता तो वह उसे अपनी गाड़ी में लाद कर घर छोड़ने आता. हर रात ऐसा ही होता.

उसे मंगल से कोई लगाव नहीं था, बल्कि सुगना को आंख भर देखने तथा नशे में बेहोश मंगल की सेवा करने के बहाने सुगना के पास बैठने और उस से देर रात तक बतियाने का मौका पाने के लिए वह ऐसा करता था. मंगल का जब नशा टूटता तो वह आधी रात को सुगना को जगा कर खाना मांगता. जरा भी नानुकुर या देर होने पर वह सुगना को बुरी तरह पीटता. रात के सन्नाटे में सुगना की दर्दभरी चीखें महल्ले वाले सुनते पर क्या करते, पतिपत्नी का मामला था.

धुंधलका गहरा होने लगा था. केवल सिंह लौट आया था. मंगल सिंह अपने बच्चों के साथ अपने गांव भी नहीं गया था. इतना बड़ा ताला लगा कर आखिर गया कहां वह?  सब इस गुत्थी को सुलझाने में लगे हुए थे कि तभी किसी को घर के अंदर से बच्चों की दबीदबी सिसकियां सुनाई दीं. सब के कान खड़े हो गए. तुरंत 2 हट्टकट्टे नौजवानों ने दरवाजा तोड़ डाला.

अंदर का मंजर दिल दहलाने वाला था. मंगल का शरीर छत की मोटी बल्ली से लटका हुआ था. गले में बंधी थी सुगना की नाइलोन की साड़ी. वह मर चुका था. चारों बच्चे डरे हुए, सुबक रहे थे. देखते ही सुगना पछाड़ खा कर जमीन पर गिर कर बेहोश हो गई. स्त्रियों ने उस के ऊपर पानी डाला. होश में आते ही वह बच्चों से लिपट कर दहाड़ मार कर रोने लगी.

भीड़ में से ही किसी ने पुलिस को शिकायत कर दी. पुलिस ने आते ही जांचपड़ताल शुरू कर दी. ऐसा लगता था कि शराब के नशे में मंगल ने आत्महत्या कर ली थी. कमरे की एकमात्र खिड़की अंदर से बंद थी. बस्ती वाले मंगल की बुरी आदतों से परेशान तो थे ही. सभी ने उस के विरोध में बयान दिया. किसी पर भी शक की सुई नहीं घूम रही थी. पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि मंगल ने बाहर से ताला लगाया तथा खिड़की से कूद कर अंदर आ गया. अंदर से दरवाजा बंद कर के उस ने आत्महत्या कर ली. उस ने बच्चों को भी मारने की कोशिश की थी. पतीली में बचेखुचे दालभात की जांच से पता चला कि उस में अफीम मिलाई गई थी. मात्रा कम होने के कारण बच्चे बच गए थे.

आत्महत्या का कारण किसी को समझ में नहीं आ रहा था. एक नशेड़ी इतने ठंडे दिमाग से योजनाबद्ध काम करेगा यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. बच्चे कुछ भी बताने में असमर्थ थे. कई दिन तक गहन पूछताछ और जांचपड़ताल के बाद भी पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. सभी के बयान समान थे और केवल मंगल की ओर इशारा करते थे. पुलिस ने भी इस गरीब बस्ती के एक नशेड़ी की मौत के मामले में ज्यादा  सिर खपाने की जरूरत नहीं समझी और आत्महत्या का मामला दर्ज कर तुरंत फाइल बंद कर दी.

मिसेज दिवाकर के यहां सुगना काम करती थी. उन्हें घर के अन्य नौकरों से मंगल की मौत के बारे में पता चला तो उन्हें शराब की भट्ठी के मालिक केवल सिंह पर शक हुआ, क्योंकि वही ऐसा व्यक्ति था जिस का सुगना के यहां अधिक आनाजाना था. वह उस में जरूरत से ज्यादा रुचि भी लेता था. पर उन्होंने इस मामले में अपनी टांग अड़ाना उचित नहीं समझा.

मंगल की मौत को 1 माह ही बीता था कि केवल सिंह ने सुगना को चूडि़यां पहना कर अपनी पत्नी बना लिया. एक दिन की अनुपस्थिति के बाद सुगना सजीसंवरी, नई चूडि़यां खनकाती काम पर आई तथा मिसेज दिवाकर को अपने विवाह की सूचना दी. सुनते ही मिसेज दिवाकर भड़क गईं और बोलीं, ‘‘हाय मरी, तुझे तो रोज रात की मारपीट से मुक्ति मिल गई थी. फिर से क्यों जा पड़ी नरक में उसी मुए के साथ, जिस ने तेरे मंगल को मारा?’’

अनजाने में उन के मुख से उन के अंदर का दबा हुआ शक उजागर हो गया, पर अविचलित सुगना बोली, ‘‘अपने आदमी की मार भी कोई मार होती है. इस से बस्ती में इज्जत बढ़ती है. रही शादी की बात, तो महल्ले के सब बदमाशों से बचने के लिए किसी एक का हाथ थामना अच्छा है. आप क्या जानो, एक औरत का अकेले रहना कितना मुश्किल होता है. बिना आदमी के बस्ती के मनचले दारू पी कर मेरा दरवाजा पीटते थे. रात को सोने नहीं देते थे.’’

मिसेज दिवाकर को कुछ अटपटा सा लगा कि केवल सिंह पर उन के द्वारा लगाए हत्या के इल्जाम को सुन कर भी कोई प्रतिक्रिया उस ने व्यक्त नहीं की थी.

एक वर्ष बीत गया था. सुगना के पांव भारी थे. जच्चगी के लिए अस्पताल जाने से पहले उस ने अपनी छोटी बहन फागुन को घर व बच्चों की देखभाल के लिए बुलवा लिया. जब वह अस्पताल से नवजात बेटे के साथ घर लौटी तो उसे यह देख कर जबरदस्त धक्का पहुंचा कि उस के पति केवल सिंह ने उस की अनुपस्थिति में उस की बहन को चूडि़यां पहना कर अपनी पत्नी बना लिया है.

क्रोधित हो सुगना ने फागुन को बालों से पकड़ कर घसीटा और खदेड़ कर बाहर निकाल दिया. केवल सिंह के ऊपर फागुन का जबरदस्त नशा चढ़ा हुआ था. उसे अपनी नईनवेली पत्नी का अपमान सहन नहीं हुआ. उस ने कोने में  पड़ी हुई  कुल्हाड़ी उठा कर सुगना की टांग पर दे मारी. कुल्हाड़ी मांस फाड़ कर हड्डी के अंदर तक धंस गई. सुगना बेहोश हो कर गिर पड़ी. टांग से बहते खून की धार तथा रोते हुए नवजात शिशु को देख केवल सिंह के मन में पश्चाताप होने लगा. शोरगुल सुन सब पड़ोसी इकट्ठे हो गए. जिस अस्पताल से सुगना थोड़ी देर पहले वापस आई थी फिर वहीं दोबारा भरती हो गई.

केवल सिंह बड़ी लगन से तब तक उस की सेवा करता रहा जब तक वह पूरी तरह स्वस्थ व समर्थ नहीं हो गई. सुगना उस की सेवा से खुश कम थी और दुखी ज्यादा थी क्योंकि केवल सिंह ने फागुन को घर से नहीं निकाला था.

बेचारी दुखी सुगना क्या करती. उस ने अपनी पूरी आशाएं अपने नवजात बेटे पर टिका दी थीं. उस ने निश्चय किया कि वह बेटे को सेना में भरती कराएगी. जब वह लड़ाई में मारा जाएगा तो उसे सरकार लाखों रुपया देगी और उन रुपयों से वह अपनी मालकिनों की तरह ऐशोआराम से रहेगी. इसलिए उस ने अपने बेटे का नाम कारगिल रख दिया.

सुगना की विचित्र निष्ठुर कामना सुन कर मिसेज दिवाकर के रोंगटे खड़े हो गए. बड़ा ही क्रूर लगा उन्हें नवजात शिशु को बड़ा कर उस की मौत की कल्पना करना और अपने ऐशोआराम के लिए उसे भुनाना.

थोड़े ही दिन बीते थे कि एक दिन केवल सिंह अपनी नई  पत्नी फागुन के साथ हमेशा के लिए कहीं चला गया. साथ में ले गया अपना नन्हा पुत्र कारगिल. सुगना का धनपति बनने का सपना धरा रह गया. 2 बार ब्याही सुगना फिर से अकेली रह गई थी.

वर्षा के दिन थे. सुगना की टांग का घाव भर गया था, पर दर्द की टीस अब भी उठती थी. पति और उस की सगी बहन ने मिल कर जो छल उस के साथ किया था उस ने उसे अंदर से भी घायल कर दिया था. एक दिन वर्षा में भीगती सुगना जब मिसेज दिवाकर के यहां पहुंची तो उसे तेज बुखार था. अपनी साइकिल बाहर खड़े उन के ड्राइवर को थमा बड़ी मुश्किल से वह बरामदे तक पहुंची ही थी कि गिर कर बेहोश हो गई. जब वह होश में आई तो मिसेज दिवाकर ने अपने ड्राइवर से उस को कार में ले जा कर डाक्टर गर्ग से दवा दिलवा कर घर छोड़ आने को कहा.

आगे की सीट पर बैठी सुगना का सिर निढाल हो कर ड्राइवर गोपी के कंधे पर लुढ़क गया तो उस ने उसे हटाया नहीं. उसे बड़ा भला सा लग रहा था.

डाक्टर से दवा दिलवा कर गोपी उस को घर पहुंचाने गया. वहां उस को सहारा दे कर अंदर तक ले गया. इस के बाद भी उस का मन नहीं माना. वह उसे देखने उस के घर बराबर जाता तथा यथासंभव उस की सहायता करता. 3 दिन के बुखार में गोपी और सुगना बहुत करीब आ गए थे. चौथे ही दिन गोपी ने सुगना के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा. सुगना सहर्ष तैयार हो गई. गोपी ने उसे चूडि़यां पहना कर अपनी पत्नी बना लिया.

मिसेज दिवाकर को सुगना का पुनर्विवाह तनिक भी नहीं भाया. वह गुस्से से चीखीं, ‘‘कुदरत तुझे बारबार खराब  पुरुषों से मुक्ति दिलाती है, फिर चैन से अकेले क्यों नहीं रहती? अपनी मां के साथ रहने में तुझे क्या तकलीफ है?’’

सुगना बड़ी सहजता से बोली, ‘‘अकेली औरत जात को कोई तो रखवाला चाहिए.’’

मिसेज दिवाकर ने सुगना की समस्या से अपने को अलग रखने की ठान ली.

एक दिन मिसेज दिवाकर ने सुगना से धुले कपड़ों का गट्ठर इस्तरी वाले के ठेले तक अपनी साइकिल पर रख कर पहुंचाने को कहा. गट्ठर बड़ा होने के कारण साइकिल के कैरियर पर ठीक से नहीं बैठ रहा था. यह देख कर मिसेज दिवाकर बोलीं, ‘‘सुगना, तुझे ठीक से गांठ बांधनी भी नहीं आती. कपड़े बाहर निकल रहे हैं.’’

‘‘मांजी, चिंता मत कीजिए. गांठ लगानी मुझे खूब आती है. मंगल के लिए कैसी मजबूत गांठ लगाई थी मैं ने,’’ अकस्मात सुगना के मुंह से निकला.

ऐसा कहते हुए उस ने आंखें ऊपर उठाईं. उस की आंखों में शैतानी चमक देख कर मिसेज दिवाकर सहम उठीं. अंदर दबा हुआ शक उभर कर ऊपर आ गया था. उन्होंने सोचा, ‘तो मेरा शक सही था. मंगल ने आत्महत्या नहीं की थी. सुगना ने ही उसे मारा था.’

स्तब्ध मिसेज दिवाकर अपना सिर दोनों हाथों में थाम कर सोफे पर धम्म से बैठ गईं.

‘सुगना, हत्यारिन मेरे घर में, और मुझे पता ही नहीं चला.’ सोचसोच कर वह हैरान व परेशान थीं.

उन के शरीर में भय से सिहरन दौड़ गई. अब इतने अरसे बाद किस से कहें और किस से शिकायत करें. अपराधी को अपने दुष्कर्म की सजा मिलनी ही चाहिए. पर उन के पास कोई सुबूत भी नहीं था. था केवल शक. कौन सुनेगा उन के शक को? अगर सुगना को सजा दिलवा भी दी तो उस के बच्चों का क्या होगा? सोचते सोचते उन के सिर में दर्द होने लगा.

और सुगना, अनजाने में अपना अपराध प्रकट कर बैठी थी. अपने अपराध के प्रकटीकरण से बेखबर मिसेज दिवाकर के हृदय की हलचल से अनभिज्ञ बढ़ी चली जा रही थी अपने गंतव्य की ओर. Story In Hindi

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