Social Story: जागरूकता स्कूलों पर नजर रखे समाज

Social Story: मध्य प्रदेश में चित्रकूट के पाठा इलाके में जब बारिश होती है, तो पानी सिर्फ खेतों में नहीं गिरता, बल्कि वह स्कूल की छत से टपकता हुआ बच्चों की कौपियों तक पहुंच जाता है. यह कोई एक जगह की कहानी नहीं है. यह उस बड़ी सच्चाई का हिस्सा है, जो देश के कई गांवों में अलगअलग रूप में दिखती है. पिछले कुछ सालों में भारत ने पढ़ाईलिखाई के मामले में काफी तरक्की की है. स्कूल बढ़े हैं, बच्चों का दाखिला बढ़ा है, योजनाएं भी आई हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब मिल कर अच्छी तालीम में बदला है? यहीं सेयोजनाएंऔरहकीकतअलगअलग रास्ते पकड़ लेती हैं. तादाद बनाम असलियत भारत में पढ़ाईलिखाई का सिस्टम बहुत बड़ा है. करोड़ों बच्चे, लाखों स्कूल और बहुत सारे टीचर.

यह अपनेआप में एक उपलब्धि है, क्योंकि इस से पता चलता है कि सरकार ने पढ़ाईलिखाई पर ध्यान दिया है, लेकिन किसी भी सिस्टम को सिर्फ तादाद से नहीं, उस के असर से परखा जाता है. यहीं पहली बड़ी समस्या दिखती है कि स्कूल हैं, लेकिन पढ़ाई नहीं होती. बच्चे आते हैं, लेकिन सीख नहीं पाते. ईसीएआर जैसी रिपोर्टें बारबार बताती रही हैं कि गांवों में पढ़ाईलिखाई की बुनियादी हालत कमजोर है. क्लास 5 के बच्चे क्लास 2 का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते. गणित की हालत उस से भी ज्यादा खराब है. यह सिर्फ बच्चों की कमजोरी नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कमी है, जहां सिर्फ बच्चों को स्कूल तक लाने पर ध्यान है, उन्हें सिखाने पर नहीं. स्कूल तक पहुंच गांवों में पहले सब से बड़ी दिक्कत थी स्कूल तक पहुंच. सरकार ने इस पर काम किया.

हर गांव के पास स्कूल, मुफ्त किताबें, मिड डे मील, स्कौलरशिप दी. इस से बच्चे स्कूल तक तो आने लगे, लेकिन असली फर्क यहां समझ आता है कि स्कूल पहुंच जाना और पढ़ाई हो जाना, 2 अलगअलग बातें हैं.
पाठा जैसे इलाकों में बच्चे स्कूल तो जाते हैं, लेकिन वहां का माहौल, जैसे टूटी छत, कम संसाधन, कम टीचर, उन की पढ़ाई रोक देता है यानी रास्ता बन गया, लेकिन मंजिल अभी दूर है. समस्या सिर्फ दूरी की नहीं अकसर कहा जाता है कि गांवों में दिक्कत इसलिए है, क्योंकि वे दूरदराज बसे हैं. जंगल, पहाड़, खराब सड़कें, लेकिन यह आधी सच्चाई है. अगर सिर्फ दूरी ही वजह होती, तो हर ऐसे इलाके की हालत एकजैसी होती. लेकिन केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य दिखाते हैं कि मुश्किल हालात में भी बेहतर तालीम दी जा सकती है. इस का मतलब साफ है कि समस्या सिर्फ जगह की नहीं, काम करने के तरीके की भी है.

टीचर सब से जरूरी कड़ी किसी भी स्कूल की सब से बड़ी ताकत उस का टीचर होता है. भारत में टीचर हैं, लेकिन सही जगह नहीं हैं. कहीं एक स्कूल में ज्यादा, तो कहीं एक ही टीचर कई क्लास संभाल रहा है.
इस के अलावा उन्हें पढ़ाने के अलावा कई काम दिए जाते हैं जैसे जनगणना, चुनाव ड्यूटी, मिड डे मील की देखरेख. नतीजा यह होता है कि उन का समय पढ़ाने में कम और बाकी कामों में ज्यादा जाता है. सवाल सीधा है कि क्या हम टीचर को टीचर रहने दे रहे हैं? सब से बड़ी दिक्कत यह है कि यह समस्या दिखती नहीं है. स्कूल खुलते हैं, बच्चे आते हैं, इम्तिहान होते हैं सबकुछ सामान्य लगता है, लेकिन जब असली सीखने की बात आती है, तो तसवीर कमजोर निकलती है. यह एक धीमी नाकामी है. कोई शोर नहीं, लेकिन असर गहरा.

डिजिटल तालीम का सच आजकल पढ़ाईलिखाई में तकनीक पर बहुत जोर है, जैसे स्मार्ट क्लास, औनलाइन पढ़ाई. लेकिन सवाल है कि क्या गांव इस के लिए तैयार हैं? जहां बिजली ही ठीक से नहीं आती, इंटरनैट कमजोर है, वहां डिजिटल एजूकेशन सिर्फ एक योजना बन कर रह जाती है. यानी नीति आगे की सोच रही है, लेकिन जमीन अभी पीछे अटकी है. गांवों में पढ़ाईलिखाई सिर्फ स्कूल की बात नहीं है. गरीबी, घर के काम, बाल मजदूरी, सामाजिक दबाव, ये सब बच्चों की पढ़ाई पर असर करते हैं. लड़कियों के मामले में यह और ज्यादा दिखता है यानी तालीम सिर्फ स्कूल की जिम्मेदारी नहीं, समाज की भी है.
योजनाएं क्यों फेल होती हैं भारत में योजनाओं की कमी नहीं है.

समस्या उन के लागू होने में है. योजनाएं एकजैसे मौडल पर बनती हैं, लेकिन भारत एकजैसा नहीं है. जो फार्मूला शहर में काम करता है, वही गांव में काम करे, यह जरूरी नहीं. जब स्थानीय जरूरतों को नजरअंदाज किया जाता है, तो योजनाएं धीरेधीरे असर खो देती हैं. अब क्या किया जाए? समस्या साफ है, तो अब जरूरत है छोटेछोटे, लेकिन पक्के सुधारों की :
* जहां टीचर कम हैं, वहां सही तैनाती हो.
* गांव के लैवल पर निगरानी को मजबूत करना होगा.
* स्कूल के ढांचे को ठीक करना और बच्चों की सीखने की ताकत पर ध्यान देना.
* लेकिन इन सब के बीच सब से जरूरी चीज है ईमानदारी से काम करना.
जब पाठा का बच्चा टपकती छत के नीचे बैठ कर पढ़ता है, तो वह सिर्फ अपनी हालत नहीं दिखा रहा होता, वह पूरे सिस्टम से सवाल पूछ रहा होता है. क्या हम सिर्फ स्कूल खोल कर खुश हो जाएंगे या सच में बच्चों को पढ़ाना भी चाहेंगे, क्योंकि जब तक हर बच्चे को अच्छी और बराबर तालीम नहीं मिलेगी, तब तक विकास की कोई भी बात अधूरी ही रहेगी.

क्या मांबाप चुप रहेंगे गांवदेहात में पढ़ाई की चर्चा अकसर सरकार और सिस्टम तक सीमित रह जाती है, लेकिन एक बड़ा सच यह भी है कि इस में समाज का रोल भी उतना ही अहम है, खासतौर पर मांबाप का.
सरकारी स्कूलों को ले कर गांवों में एक अजीब सी सोच बन गई है. जो है, जैसा है, चलने दो. यहीं सब से बड़ी चूक होती है. कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि सरकारी स्कूलों में भी हर बच्चे पर अच्छाखासा खर्च होता है. फर्क सिर्फ इतना है कि प्राइवेट स्कूल में पैसा मांबाप सीधे देते हैं और सरकारी स्कूल में वही पैसा सरकार के जरीए खर्च होता है यानी पढ़ाई की कीमत दोनों जगह चुकाई जा रही है, बस तरीका अलग है. फिर सवाल उठता है कि अगर खर्च हो रहा है, तो पढ़ाई क्यों नहीं हो रही? इस सवाल का जवाब तभी निकलेगा, जब यह सवाल बारबार पूछा जाएगा.

अगर गांव के 10-20 मांबाप भी मिल कर स्कूल के सामने खड़े हो कर पूछें कि टीचर समय पर क्यों नहीं आते? बच्चों का लैवल इतना कमजोर क्यों है? स्कूल की हालत सुधर क्यों नहीं रही? तो यह सिर्फ शोर नहीं होगा, यह एक संकेत होगा कि अब लोग जाग रहे हैं. अकसर सरकारी स्कूलों में जवाबदेही इसलिए नहीं बनती, क्योंकि कोई पूछने वाला नहीं होता. जहां सवाल नहीं होते, वहां सुधार भी नहीं होता. धरना नहीं, दबाव जरूरी यह बात भी समझनी होगी कि केवल हंगामा करने से स्थायी बदलाव नहीं आता. जरूरी यह है कि मांबाप संगठित और समझदारी से कदम उठाएं, जैसे :
* स्कूल मैनेजमैंट कमेटी को सक्रिय करें.
* बच्चों की पढ़ाईलिखाई का लैवल खुद देखें.
* लिखित शिकायत करें, सिर्फ मौखिक नहीं.
* पंचायत और अफसरों तक बात पहुंचाएं यानी आवाज उठे, लेकिन सही दिशा में.
हर टीचर गलत नहीं होता. कई जगह टीचर भी सिस्टम की कमियों में फंसे होते हैं, कम संसाधन, ज्यादा काम, गलत तैनाती, इसलिए आंदोलन का निशाना किसी एक को बनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरे सिस्टम को बेहतर बनाना होना चाहिए.

सरकारी स्कूल हमारे हैं सब से बड़ा बदलाव सोच में आना चाहिए. प्राइवेट स्कूल में मांबाप अपने पैसे के चलते जागरूक रहते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल में वही मांबाप चुप हो जाते हैं. यहीं फर्क पैदा होता है.
जब तक मांबाप यह नहीं मानेंगे कि यह स्कूल हमारे बच्चों का है और इस की जिम्मेदारी भी हमारी है, तब तक असली बदलाव मुश्किल है. पाठा के स्कूल की टपकती छत सिर्फ एक इमारत की कमजोरी नहीं है, यह समाज की चुप्पी का भी संकेत है. अब सवाल यह नहीं है कि सरकार क्या कर रही है, सवाल यह है कि क्या मांबाप अपने बच्चों के भविष्य के लिए खड़े होने को तैयार हैं?                

Crime Story: धोखाधड़ी-ऐसी भी लूट

Crime Story: रमेश नौकरी की तलाश में था. घर की माली हालत ठीक नहीं होने से अब आगे वह पढ़ते हुए नौकरी करना चाहता था. यहांवहां पूछतेपूछते 2 महीने हो गए थे, लेकिन उसे उस के लायक कहीं काम नहीं मिला.

अचानक रमेश के दिमाग में यह आइडिया कौंध गया, ‘क्यों मैं मोबाइल पर ही यह नौकरी ढूंढ़ लूं?’
गूगल पर सर्च करते ही वर्क फ्रौम होम के जबरदस्त इश्तिहात और वीडियो देख कर रमेश को खुशी हुई.
सिर्फ 2 घंटे मेहनत कर के महीने में एक लाख रुपए कमाओ, कंपनी दे रही है घर बैठे माल, पैंसिल पैकिंग बैस्ट वर्क फ्रौम होम, रिलायंसजिओ में टैलीककौलर की आवश्यताघर से काम करें और कमाएं हजारों रुपए…’

और भी तरहतरह के दसों विज्ञापन स्क्रीन पर उभर आए. रिलायंसजिओ का नाम देख कर रमेश को इस इश्तिहार में दम लगा. उस ने उस की वैबसाइट और औफिस डिटेल्स देख कर कौन्टैक्ट नंबर पर फोन किया. सामने से जवाब संतोषजनक था, ‘रजिस्ट्रेशन के लिए सिर्फ 2,000 रुपए आप को भरना है, हमारा बंदा वहां कर आप को लैपटौप दे जाएगा और साथ ही बताएगा कि घर बैठे कैसे आप को काम करना है?’

रमेश के पास इतने रुपए नही थे. उस ने मांपिता को भी यह बात नहीं बताई, क्योंकि वह जानता था उन के पास इतने रुपए नहीं है और ही बताने पर वे उस की कुछ मदद कर पाएंगेलिहाजा, रमेश ने 2,000 रुपए अपने चाचा से मांगे. चाचा ने उस की जरूरत समझ कर पैसे दे दिए. रमेश ने वे रुपए बैंक जा कर अपने अकाउंट में डाले और फिर जिओ के उस कंपनी अकाउंट पर ट्रांसफर कर दिए.

दूसरे दिन रमेश को फोन आया, ‘आप ने हमारे यहां वर्क फ्रौम होम के लिए रजिस्ट्रेशन किया है. आप को बहुतबहुत बधाई. आप को जल्द से जल्द लैपटौप और अदर एसैसरिज के इंश्योरैंस के लिए 10,000 रुपए भरने होंगे. हम आप से लैपटौप वगैरह का पैसा नहीं ले रहे. ये रुपए इंश्योरैंस कंपनी लेगी. अगर लैपटौप वगैरह खराब होता है, तो यह जिम्मेदारी उन की होगी. आप को जल्द रुपए भरने होंगे वरना आप की फाइल पैंडिंग पड़ी रहेगी.’

रमेश ने कहा, ‘‘सर, मुझे पहले ऐसा नहीं बताया गया था कि इतने रुपए देने होंगे. मैं ने बहुत मुश्किल से उन रुपयों का इंतजाम किया है. आप मेरे रुपए वापस दीजिए प्लीज.’’ जवाब मिला, ‘आप की फाइल बन चुकी है और इसी प्रोसैस के लिए ये रुपए थे. पड़ी है आप की फाइल, हम क्या करें इस फाइल का…’
रमेश ठगा सा रह गया. दिनभर उस का कहीं दिल नहीं लगा, रात में वह बिना खाना खाए ही सो गया.

सिमरन के मोबाइल की घंटी बजी. उसे बताया गया कि फलांफलां प्रतियोगिता में उस के मोबाइल नंबर पर इनाम लगा है, जिस में 50 लाख रुपए कैश उसे मिलने वाले हैं. इस के लिए सिर्फ 3,500 रुपए प्रोसैस फीस उसे देनी है, ताकि जल्द से जल्द प्राइज अमाउंट उस के अकाउंट नंबर पर ट्रांसफर किया जा सके.
सिर्फ 3,500 ही तो देने हैं. मैं अपनी जमा की गई पौकेट मनी में से दे देती हूं,’ यह सोच कर सिमरन मचल उठी थी, लेकिन उस के पिता ने उसे रोक लिया.

गली से आवाज आई, ‘अपना लकी ड्रा खोलें और सिर्फ 3,000 रुपए में पाएं फ्रिज, वाशिंग मशीन…’
संजना ने आवाज सुनी और उसे बुला लिया. उस सेल्समैन ने बताया कि सिर्फ 1,000 रुपए में आप को यह
2 चादरों का एक पैकेट खरीदना है. इस में एक कूपन है. कूपन स्क्रैच करने पर 21 इंच का कलर टीवी, फ्रिज, इंडक्शन सिगड़ी जो भी कूपन पर खुले, उसे 2,000 रुपए दे कर आप को लेना ही पड़ेगा.
मतलब सिर्फ 3,000 रुपए में 2 चादर, फ्रीज या कलर टीवी…’ यह सोच कर संजना ने कूपन लेना तय किया. उसे विश्वास भी था कि लकी ड्रा में इंडक्शन सिगड़ी खुलेगा और हुआ भी यही. 2,000 रुपए में इंडक्शन सिगड़ी उसे लेना ही पड़ा. बिना जरूरत के संजना के 3,000 रुपए खर्च हो गए.

लूट के इन तरीकों में एक नया तरीका सामने आया, जब पता चला कि एक नामचीन मैरिज मैट्रीमोनी का नाम बोल कर किसी ने उस मैट्रीमोनी औफिस के नाम पर 20-25 लोगों से 4 से 5 हजार रुपए ऐंठ लिए.
एक कहावत है किकाली गाय कांटा खाए’. रोजगार की खोज में यहांवहां फंस रहे बेरोजगार नौजवानों के साथ यही हो रहा है. वे नएनए तरह के लालच में फंसते जा रहे हैं. यह साफ करना जरूरी नहीं है कि जो लूट रहे हैं, वे रोजगार नहीं चाहते. हो सकता है उन की भी बुरी हालत हो. भूखे मरने की जगह उन्होंने इस गलत रास्ते को अपना लिया हो.

मतलब यह है कि रोजगार के हालात इतने बदतर हैं कि हर महीने चंद हजार रुपए किए 10-10 घंटे काम करना पड़ रहा है. जरूरत है कि सरकार गांवशहरों में समय के मुताबिक रोजगार के सही रास्ते दिखाने की कोशिश करे और ठगने वालों पर कठोर कानून कार्रवाई करे.  

News Story: एआई समिट, चीनी कुत्ता और भारत की साख

News Story: होली आने वाली थी. अनामिका अपने घर जाना चाहती थी, पर विजय को उसी के साथ होली खेलनी थी. एक दिन जब अनामिका विजय के घर आई, तो विजय ने कहा, ‘‘यार, होली पर घर मत जाओ . अब तो ठंड भी कम हो गई है. मुझे लगता है कि इस बार की होली हम दोनों मस्ती और मजे से मनाएंगे.’’


‘‘पर मैं पिछले 2 साल से अपने घर नहीं गई हूं. मम्मीपापा चाहते हैं कि मैं घर जाऊं उन के पास. अगर तुम्हें मेरे साथ होली खेलनी है, तो साथ चलो. बड़ा मजा आएगा,’’ अनामिका बोली.
‘‘तुम बात को कहां ले जा रही होमम्मी, आप कुछ बोलो …’’ विजय ने अपनी मम्मी को इस मामले में शामिल करते हुए कहा.


‘‘यह तुम दोनों का मामला है. मुझे तो होली वैसे भी ज्यादा पसंद नहीं है. पर एकदूसरे को रंग मलो, फिर उतारते फिरो. इस से तो अच्छा है कि घर पर बैठो और दहीभल्ले, गुजिया, चाय पार्टी करो. पर नहीं, लोगों को तो रंग के साथ भांग का नशा चाहिए. और नहीं तो दारू पार्टी कर के पूरे त्योहार का मजा बिगाड़ देते हैं.
‘‘मुझे तो रंगों से वैसे भी एलर्जी है. मैं इस पचड़े में नहीं फंसना चाहती.
यह तुम दोनों की समस्या है, खुद ही सुलझा,’’ मम्मी ने दो टूक अपनी
बात रखी.


‘‘वाह, बेटे ने मां का साथ मांगा, पर मां ने उसे ही लपेट दिया. अरे यार, हर त्योहार का अपना मजा होता है. तुम्हें रंग पसंद नहीं तो क्या लोग होली खेलना छोड़ दें,’’ इसी बीच पापा ने विजय का साथ दिया.
‘‘वही तो पापा. मम्मी को होली खेलना पसंद नहीं और ये अनामिकाजी अपने घर जा रही हैं. वैसे, जहां तक मम्मी की रंगों से एलर्जी से समस्या है, तो एआई कब काम आएगा,’’ विजय बोला.


‘‘एआई और रंग का क्या तालमेल बना?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘किस दुनिया में जी रही हो. क्या तुम नहीं जानती कि एआई होली की तैयारी में मदद करता है, जैसे कि रंगों की डिजाइनिंग, गानों की रिकमैंडेशन और होली के लिए खास औफर्स.
‘‘इतना ही नहीं, एआई होली के दौरान सुरक्षा को सुनिश्चित करने में मदद करता है, जैसे कि रंगों की पहचान और अवैध गतिविधियों की निगरानी,’’ विजय बोला.
तुम होली मेरे साथ खेलोगे या फिरओरियनरोबोटिक डौग के साथ?’’ अनामिका ने ताना कसा.
‘‘मतलब? यह तुम ने क्यों कहा?’’ विजय ने पूछा.
‘‘तुम ने दिल्ली में फरवरी महीने में हुए एआई समिट में हुए गलगोटियास यूनिवर्सिटी के विवाद का नहीं पढ़ा था क्या खबरों में?’’
‘‘गलगोटियास यूनिवर्सिटी का क्या मामला है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘मैं ने खबर में पढ़ा था कि इस समिट में गलगोटियास यूनिवर्सिटी की एक प्रोफैसर नेहा सिंह ने एक रोबोट डौग को दिखाते हुए कहा कि इस का नामओरियनहै. उन्होंने यह भी कहा कि यह रोबोट उन की यूनिवर्सिटी के सैंटर औफ एक्सीलैंस में बनाया गया है.’’
‘‘तो इस पर विवाद कैसे हुआ?’’ विजय बोला.
‘‘दरअसल, सोशल मीडिया यूजर्स और फैक्ट चैकर्स ने तुरंत पकड़ लिया कि यहयूनिट्री जीओ2’ नाम का चाइनीज रोबोट है. चीन की कंपनी यूनिट्री रोबोटिक्स का ऐसा रेडीमेड प्रोडक्ट जो औनलाइन 2 से 3 लाख रुपए में आसानी से मिल जाता है.


‘‘इस का खुलासा होते ही सोशल मीडिया पर बवाल मच गया. लोग बोले कि यूनिवर्सिटी ने विदेशी प्रोडक्ट को अपना बता दिया,’’ अनामिका ने अपनी बात सम?ाई.
‘‘फिर यूनिवर्सिटी ने क्या कहा?’’ यह सवाल विजय के पापा का था.
‘‘यूनिवर्सिटी ने एक्स (ट्विटर) हैंडल पर बयान जारी किया, जिस में यूनिवर्सिटी की ओर से कहा गया कि गलगोटियास ने यह रोबोट डौग नहीं बनाया है, ही हम ने कभी ऐसा दावा किया है. हम दुनियाभर से (चीन, सिंगापुर, अमेरिका) सब से अच्छी टैक्नोलौजी ला कर छात्रों को एक्सपोजर देते हैं.
‘‘यूनिट्री से लिया गया रोबोट


सिर्फ दिखाने के लिए नहीं है, यह एक चलताफिरता क्लासरूम है. हमारे छात्र इसे इस्तेमाल करते हैं, इस की लिमिट्स टैस्ट करते हैं और अपनी नौलेज बढ़ाते हैं. इनोवेशन की कोई सीमा नहीं होती. लर्निंग की भी नहीं. हमारा मकसद छात्रों को आगे की टैक्नोलौजी से जोड़ना है, ताकि वे भारत में ही ऐसी चीजें डिजाइन, इंजीनियर और मैन्युफैक्चर कर सकें.


‘‘लेकिन यूनिवर्सिटी की इस बात पर भी मामला नहीं सुल? और कहा गया कि यूनिवर्सिटी का दावा गलत और भ्रामक है. वीडियो में प्रोफैसर (नेहा सिंह) ने साफ कहा था कि रोबोट हमारे सैंटर औफ एक्सीलैंस में बना है और नामओरियनदिया है. कई यूजर्स ने कहा कि पहले तो अपना बता दिया, अब क्लैरिफिकेशन में मुकर रहे हैं.’’


‘‘पर यह यूनिट्री रोबोट डौग आखिर बला क्या है?’’ इस बारे में विजय की मम्मी को अच्छी तरह जानना था.
‘‘आंटीजी, जितना मैं ने सम? है, यूनिट्री रोबोटिक्स एक चाइनीज कंपनी है. यह 4 पैरों वाले (क्वाड्रुपैड) रोबोट बनाती है. ये रोबोट असली जानवरों की तरह चलते हैं. ये औब्स्टेकल्स पार करते हैं. इंडस्ट्रियल इंस्पैक्शन करते हैं और मनोरंजन के काम भी आते हैं. यूनिट्री के रोबोट बौस्टन डायनामिक्स के स्पौट से सस्ते और आसानी से मिल जाते हैं,’’ अनामिका बोली.


‘‘मु? लगता है कि गलत या अधूरी जानकारी देने से अच्छा है कि अपना होमवर्क सही से किया जाए. गलगोटियास यूनिवर्सिटी की प्रोफैसर बिना सटीक जानकारी के कैमरे के सामने जोशजोश में ज्यादा बोल गईं,’’ विजय ने कहा.


‘‘गलगोटियास यूनिवर्सिटी ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है. यूनिवर्सिटी ने इस पूरी घटना कोगलतफहमीकरार दिया है. यूनिवर्सिटी ने कहा कि पवेलियन पर तैनात प्रतिनिधि को प्रोडक्ट की तकनीकी उत्पत्ति की सही जानकारी नहीं थी. कैमरे के सामने आने के उत्साह में प्रतिनिधि ने उत्पाद के स्रोत को ले कर गलत और भ्रामक दावे कर दिए.


‘‘लेकिन यह मामला इतना ज्यादा बड़ा हो गया था कि बात बिगड़ती चली गई. सरकार ने इसे नैशनल एम्बैरसमैंट (राष्ट्रीय शर्म की बात) बताया. इस पूरे मामले पर आईटी सैक्रेटरी एस. कृष्णन ने साफ कहा, ‘एग्जिबिटर्स को ऐसे आइटम्स नहीं दिखाने चाहिए जो उन के नहीं हैं.’
‘‘18 फरवरी को गलगोटियास के स्टौल की बिजली काट दी गई और यूनिवर्सिटी को तुरंत एक्सपो खाली करने का आदेश दिया गया.’’


‘‘फिर तो विपक्ष ने केंद्र सरकार को खूब घेरा होगा?’’
‘‘बिलकुल. मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के राज्यसभा सदस्य जौन ब्रिटास ने सोशल मीडिया हैंडलएक्सपर एक पोस्ट में आरोप लगाया कि ग्रेटर नोएडा में बनी गलगोटियास यूनिवर्सिटी कोप्रमुख भाजपा नेताओं का संरक्षण और समर्थनहासिल है.


‘‘शिव सेना (उद्धव ठाकरे) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने इस घटना कोशर्मनाकबताया और कहा कि इस से देश और इस शिखर सम्मेलन की साख को भारी नुकसान हुआ है.
‘‘तृणमूल कांग्रेस के सांसद साकेत गोखले ने कहा, ‘गलगोटियास नामक एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी ने इंडिया एआई समिट में गो2 नामक चीनी रोबोट को अपना आविष्कार बताने की कोशिश की, लेकिन असली शर्मनाक बात यह है कि सरकारी चैनल डीडी न्यूज ने उन का पूरा प्रचार किया. आज डीडी न्यूज और भाजपा एकजैसे हैं. यह चैनल भाजपा का प्रचार माध्यम बन गया है.’
‘‘सही कहूं तो यह मुद्दा बहुत ज्यादा बड़ा बन गया था, जिस से इस एआई समिट की साख को बहुत बड़ा धक्का लगा है,’’ अनामिका बोली.


‘‘पर एक विवाद तो कांग्रेस ने भी खड़ा किया. सुना है कि समिट में कांग्रेस के लोगों ने खूब हंगामा किया था? क्या था पूरा मामला?’’ विजय ने पूछा.
अनामिका ने बताया,

‘‘शुक्रवार, 20 फरवरी को समिट में उस समय अफरातफरी मच गई थी, जब यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने वहां जम कर विरोध प्रदर्शन किया. जानकारी के मुताबिक, कार्यकर्ताओं ने सुरक्षा घेरे को तोड़ कर अंदर प्रवेश किया और नारेबाजी की.

‘‘विरोध प्रदर्शन का जो वीडियो सामने आया, उस में साफ देखा गया कि प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ टीशर्ट उतार कर विरोध जता रहे थे. इन लोगों ने इस समिट, 2026 की आलोचना भी की और पीएम मोदी पर अमेरिका से ट्रेड डील परसम?ाताकरने का आरोप भी लगाया.
‘‘एक बयान में इंडियन यूथ कांग्रेस ने कहा कि उस के कार्यकर्ता एआई समिट में देश की पहचान से सम?ाता करने वाले प्रधानमंत्री के खिलाफ विरोध कर रहे थे. बाद में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया.’’


‘‘अमेरिका की ट्रेड डील से इस एआई समिट का क्या लेनादेना?’’ ‘‘इंडियन यूथ कांग्रेस के एक औफिशियल पोस्ट में कहा गया कि इंडियन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने एआई समिट में देश की पहचान से सम?ाता करने वाले प्रधानमंत्री के खिलाफ अपनी आवाज उठाई और प्रोटैस्ट किया.
‘‘यह विरोध कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के उस बयान के बाद हुआ, जिस में उन्होंने समिट के और्गैनाइजेशन को ले कर सरकार पर हमला किया था. उन्होंने कहा था कि भारत के टैलेंट और डाटा का फायदा उठाने के बजाय, एआई समिट एक बेतरतीब तमाशा हैभारतीय डाटा बिक्री के लिए है, चीनी प्रोडक्ट दिखाए जा रहे हैं.


‘‘कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी एआई समिट में अव्यवस्था का आरोप लगाया था और दावा किया था कि जो भारत के लिए एकशोपीसइवैंट हो सकता था, वहपूरी तरह से अव्यवस्थामें बदल गया.


‘‘मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह भी दावा किया कि खाने और पानी जैसी बेसिक सुविधाओं की कमी के कारण विजिटर्स और एग्जिबिटर्स दोनों कोबहुत ज्यादा परेशानीका सामना करना पड़ रहा है.
‘‘समिट में जिस समय कांग्रेस यूथ कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया उस समय एआई समिट में तमाम दिग्गज और प्रतिनिधि मौजूद थे. यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता पोस्टरबैनर ले कर अंदर पहुंच गए थे.’’
‘‘पर सरकार तो इसे कामयाब समिट बता रही है. ऐसा क्यों? कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन पर सरकार का क्या कहना है?’’ विजय के पापा ने पूछा.


‘‘अंकल, वे लोग तो भड़के हुए थे. भाजपा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के इस प्रदर्शन कोस्टुपिडिटी टू न्यूडिटी’ (मूर्खता से नग्नता) तक का सफर बताया. उन्होंने कहा कि यह देश की उपलब्धियों का अपमान है. वहीं, शहजाद पूनावाला ने इस प्रदर्शन कोएंटी इंडियाऔरचरित्रहीनकरार दिया. भाजपाई समर्थित कई संगठनों ने कांग्रेस के विरोध में खूब प्रदर्शन किए.


‘‘और जहां तक इस समिट के कामयाब होने की बात है, तो भारत सरकार के मुताबिक, ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिटअब तक का सब से बड़ा एआई समिट था. ब्रिटेन, साउथ कोरिया और फ्रांस में यह समिट होने के बाद, पहली बारग्लोबल साउथके किसी देश में यह समिट हुआ.


‘‘21 फरवरी को 88 देशों और अंतराष्ट्रीय संगठनों ने नई दिल्ली एआई इम्पैक्ट समिट डिक्लेरेशन का समर्थन किया. इन में अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, जरमनी और यूरोपियन यूनियन शामिल हैं.
‘‘समिट के दौरान भारत के 3 एआई मौडल को भी लौंच किया गया. इन 3 मौडल के नाम हैंसर्वम, ज्ञानी और भारतजेन. इन मौडल्स का फोकस भारत की भाषाओं के इस्तेमाल पर था.


‘‘साथ ही, समिट के दौरान कई कंपनियों ने भारत में आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस में निवेश करने के वादे भी किए. इस में रिलायंस, माइक्रोसौफ्ट, गूगल जैसी कई कंपनियां शामिल हैं.’’ ‘‘मुझे लगता है कि जब कोई इतना बड़ा समिट होता है, तो वहां विवाद भी होते हैं. पर इस तरह के समिट के होते ही किसी तरह के फैसले पर नहीं पहुंचना चाहिए. कुछ समय देना चाहिए कि समिट में जोकुछ हुआ, उस का नतीजा क्या रंग लाएगा.


‘‘तकनीक से फायदा नुकसान दोनों होता है. यह तो उस को इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर करता है कि वह आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस जैसी तकनीक को किस तरह से अपनी जिंदगी में उतारता है,’’ विजय ने कहा. ‘‘एकदम सही कहा. तकनीक दोधारी तलवार की तरह होती है. इस का इस्तेमाल सोचसम? कर करना चाहिए,’’ अनामिका ने हां में हां मिलाई, ‘‘चलो, हम ने खूब बहस कर ली अब तुम मु? कौफी पिलाओ. बाद में होली पर भी डिस्कस कर लेंगे.’’


‘‘क्यों नहीं. अब कोई रोबोट डौग तो हमारे लिए यहां कौफी लाएगा नहीं,’’ विजय का इतना कहते ही अनामिका खिलखिला कर हंस पड़ी. ‘‘तुम दोनों बैठो, आज कौफी मैं बनाता हूं,’’ विजय के पापा ने कहा तो मम्मी हैरान थीं यह सुन कर.        

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