Editorial: गहरी पैठ – 5 ट्रिलियन डौलर का सपना या एक निरंतर लंबा इंतजार?

Editorial: हमारे यहां कई साल से वादा किया जा रहा है कि हम बस 5 ट्रिलियन वाली इकोनौमी होने वाले हैं. अब यह वादा हर साल आगे का नया साल बता कर दोहरा दिया जाता है पर हो कुछ नहीं रहा. 1978 में चीन बंगलादेश, चाड (अफ्रीका) और मलावी (अफ्रीका) से भी गरीब था और आम अमेरिकी के मुकाबले चीनी की इनकम 65 गुना कम थी.

आज अमेरिका के मुकाबले चीनी एकचौथाई है पर उस का देश दुनिया की दूसरी सब से बड़ी इकोनौमी है चाहे अब उस की जनसंख्या तेजी से कम होने लगी हो. एक आम भारतीय चीनी के मुकाबले 5 गुना कम है.

चीन में यह कमाल डेंग शियाओपिंग के राज में हुआ जिस ने पढ़ीलिखी, अंधविश्वासों से निकली जनता को फैक्टरियों में लगा दिया और आज दुनियाभर में चीनी माल भरभर कर पहुंच रहा है. हम दुनियाभर में अपने धर्म का ढिंढोरा पीट रहे हैं कि विश्वगुरु भारत क्या महान काम कर रहा है.

आज भारत के गांवों को तो छोडि़ए, शहरों की बस्तियों को देख लें. मुंबई का धारावी हो या दिल्ली का पूर्वी हिस्सा, एक नजर में ही 100 साल पुराने युग में जीता नजर आता है जहां जगहजगह कूड़े के ढेर लगे हैं, मकानों पर धूल व काई जमी है, बड़ी सड़कों में पतली गलियां जो 4-5 फुट की हैं, निकलती नजर आती हैं, टेढ़ेसीधे मकान नजर आते हैं जिन में लोग चूहों की तरह अंधेरे बिलों में रह रहे हैं.

इन शहरों के गंदे इलाकों के बारे में किसी को फिक्र नहीं पर बड़े फैले मंदिरों, ऊंचे होते शिखरों, मेलों, पूजाओं, मूर्तियों की बातें लगातार की जा रही हैं. गंदी बस्तियों में भी सुंदर मंदिर बन रहे हैं पर लोगों का रहनसहन वैसा ही बदबूदार माहौल का है.

देश के लोगों की माली हालत तब ठीक होती है जब पूरा देश काम पर लगता है, हर हाथ में काम होता है. कोई निकम्मा नहीं होता, पूजापाठ की फुरसत या जरूरत नहीं होती. देश तब आगे बढ़ता है जब सरकार गलियों को ठीक कराती है, सीवर बनाती है, स्कूल चलाती है, छोटेबड़े अस्पताल बनाती है.

देश तब ठीक होता है जब लोगों को काम के लिए इधर से उधर जाने में सस्ती व आसान सवारी मिलती हैं. जनता को सही खाना मिलता है और खाना उगाने वाले किसानों को सही दाम मिलते हैं.

जब सरकारों का मकसद सिर्फ मंदिर बनाना, ऊंची जातियों को बचा कर रखना, पढ़ाई महंगी करना, अस्पताल महंगे करना, अमीरों के लिए चौड़ी सड़कें बनाना, महंगे स्कूल खोलना हो तो कुछ भी कर लो, देश तरक्की नहीं कर पाएगा. आज देश के लाखों मजदूर काम छोड़ कर भाग रहे हैं, अमेरिका तक पहुंचने वाले घरजमीन बेच रहे हैं, रातदिन जवान बेमतलब के कंपीटिशनों में बैठ रहे हों तो कैसे कहा जा सकता है कि हमारे नेता जो कह रहे हैं, वह हो गया.

चीन पहले हम से गरीब था आज कहीं का कहीं है तो इसलिए कि उस के नेताओं ने धर्म और जाति नहीं फैक्टरियों की चिंता की, उस के नेताओं ने अपने बुत नहीं बनवाए, स्कूल बनवाए, अस्पताल बनवाए.

हम चीन तो क्या आज थाईलैंड, श्रीलंका, फिलीपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया से भी पीछे रह गए हैं, इन सब देशों में धड़ाधड़ मंदिर नहीं बन रहे हैं न.

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पत्नी से न बने तो उसे पीटना या तेजाब पिला देना एक वहशीपन का काम है. दिल्ली की एक अदालत ने 2019 में हुए एक घरेलू मामले में फैसला देते हुए पीडि़ता की सास हसीना, ननद शबनम और खाविंद शमीम को गुनाहगार माना कि उन्होंने आपसी लड़ाई में हदें पार कर दीं.

एक जमाना था जब हिंदू हो या मुसलिम औरतें हर तरह के जुल्म सहती थीं पर अब पिछले दशकों में ऐसे कानून बन गए हैं जिन से औरतों का हक मिले हैं कि चाहे वे शादी न बचा पाएं पर पति या खाविंद को सजा तो दिला ही सकती हैं.

कुछ लोग कहने लगे हैं कि इस से औरतों ने झूठी शिकायतें करनी शुरू कर दी हैं और लड़के अब शादी के नाम से डरने लगे हैं. वे इन कानूनों को हिंदू या मुसलिम कानूनों को हलका दुरुस्त कराना चाहते हैं जिन में औरतों को पैर की जूती माना जाता था और पैर के नीचे दबा कर रखा जाता था.

औरतें पति के खिलाफ पुलिस में तभी जाती हैं जब उन्हें लगता है कि पानी सिर के ऊपर से गुजर गया है. आम औरत जानती है कि एक पति ने उसे छोड़ा तो उस की जिंदगी फिर कभी पटरी पर नहीं बैठेगी.

ज्यादातर औरतें आज भी शौहरों की ज्यादती सहती हैं क्योंकि उन के पास जाने की जगह ही नहीं होती.

यह बिलकुल गलत है कि औरतों को पति को सताने में मजा आता है. आज भी औरतें कमजोर ही हैं और वे अपनेआप कुछ करने लायक खुद को नहीं समझतीं. जो पति के खिलाफ खड़ी हो जाती हैं वे भी वे हैं जिन के मातापिता या भाई साथ देते हैं. आमतौर पर तो मातापिता, भाई औरतों को अपने हाल पर छोड़ देते हैं क्योंकि वे आफत मोल नहीं लेना चाहते.

औरतों के हितों में कांग्रेसी जमाने में कानून न हिंदू धर्म के सुधार के लिए बने थे, न इसलाम में सुधार लाने के लिए. वे तो सिर्फ औरतों के बचाव के लिए बने थे और उन का फायदा भी हुआ पर मर्दों की सोच आज भी वही पुरानी है क्योंकि नए कानूनों के बावजूद प्रवचनों, कीर्तनों, तकरीरों में धर्म के हुक्म को बारबार दोहराया जाता है, वहां भी जहां औरतें भी सुनने वालों में बैठी हों. धर्म औरतों को 15वीं सदी में ले जाना चाहता है. आज भी जबकि कानूनों ने 20वीं सदी में ही उसे 21वीं सदी में ला खड़ा किया था. कानून बनाने वालों को नहीं मालूम था कि 21वीं सदी में घड़ी की सूई उलटी घूमने लगेगी और भारत, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश ही नहीं, अमेरिका में भी औरतों पर कानूनी बंदिशें लगनी शुरू हो जाएंगी.

भारत में यह मांग शुरू हुई है. उत्तराखंड का यूनिफौर्म सिविल कोड औरतों के बहुत से हक छीनता है, देता कोई नहीं है. हालांकि दावा किया जा रहा है यह सब को बराबर मानेगा. औरतों की मारपिटाई, छेड़ाखानी, उन की संपत्ति छीन लेना जैसी बातों के बारे में इस नए कानून में कोई शब्द नहीं मिलेगा.

बदहाली: कोरोना की लहर, टूरिज्म पर कहर

 सावित्री रानी

कोरोना को इस दुनिया में आए 2 साल से ज्यादा का समय हो चुका है. इस की गाज किसकिस पर गिरी, इस ने किसकिस की जिंदगी को तबाह किया, यह जानने के लिए हमें दूर जाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ अपने और अपने आसपास एक नजर डालना ही काफी है.

हर कोई इस नामुराद वायरस का किसी न किसी तरह से शिकार हुआ है, फिर चाहे वह कोई बच्चा हो या बूढ़ा, नौजवान हो या अधेड़, इस नामाकूल ने किसी में भी फर्क नहीं किया. किसी का स्कूल बंद हुआ, तो किसी का कालेज. किसी की सेहत पर अटैक हुआ, तो किसी के रिश्तों पर. किसी की आजादी दांव पर लगी, तो किसी की नौकरी. सभी ने कुछ न कुछ खोया जरूर है.

आज इस दुनिया में एक भी इनसान ऐसा नहीं ढूंढ़ा जा सकता, जो यह कह सके कि कोरोना ने उस की जिंदगी को कहीं से भी नहीं छुआ है. समाज के जिन क्षेत्रों पर इस ने मालीतौर पर सब से ज्यादा असर डाला है, उन में सब से आगे खड़ा है टूरिज्म. इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को जितनी माली चोट सहनी पड़ी है और अभी तक सह रहे हैं, उस की कोई सीमा नहीं है.

आप कल्पना कीजिए कि आप एक नौकरी करते हैं या फिर कोई भी काम करते हैं, जिस से आप का घर चलता है. उसी कमाई के भरोसे पर आप भविष्य की प्लानिंग करते हैं, घर और गाड़ी का लोन लेते हैं, बच्चों को स्कूल भेजते हैं, अपना बुढ़ापा महफूज करने की योजना बनाते हैं, लेकिन एक सुबह आप को पता चलता है कि आज से आप की कमाई जीरो है, क्योंकि आप का काम टूरिस्ट के आने पर निर्भर करता था और आज से नो फ्लाइट्स, नो टूरिस्ट, नो काम, नो पैसा, सब पर फुल स्टौप.

आप ऐसी हालत में क्या करेंगे? और यह हालत कोई 2-4 दिन या महीनों के लिए नहीं है, यह है सालों के लिए या फिर पता नहीं कब तक के लिए. शायद हमेशा के लिए. सोचिए, अगर आप के सुखसुविधा में पले बच्चे अचानक दूध को तरसने लगें, 1-1 खिलौने के लिए सालों इंतजार का लौलीपौप चूसते रहें, तो क्या करेंगे आप?

मैं ऐसे एक इनसान को बहुत करीब से जानती हूं. प्रखर नाम का यह इनसान मेरे परिवार का ही हिस्सा है. मातापिता की असमय मौत ने इसे समय से पहले ही बड़ा कर दिया था.

दिनरात की अथक मेहनत से इस स्वाभिमानी लड़के ने हर मुसीबत का सामना किया. नवंबर, 2019 में उस ने एक छोटा सा घर खरीदा और उस के लिए बैंक से लोन लिया. 4 महीने बाद अपनी अभी तक की सारी जमापूंजी लगा कर बहन की शादी की.

वह बहुत खुश था कि उस की बचत बहन की शादी और घर की डाउन पेमेंट दोनों के लिए काफी थीं. उस की 2 सब से बड़ी जिम्मेदारियां सही समय पर पूरी हो गई थीं.

अपनी परफैक्ट प्लानिंग के भरोसे प्रखर काफी हद तक अपने भविष्य को ले कर निश्चिंत था. उस ने सोचा था कि अभी वह सिर्फ 37 साल का है. अगले 10 साल में वह बैंक का लोन उतार देगा. जब तक उस का 7 साल का बेटा यूनिवर्सिटी जाने लायक होगा, तब तक तो वह बाकी सभी देनदारियों से छुटकारा पा चुका होगा. फिर वह आराम से अपने एकलौते बेटे को अच्छी से अच्छी पढ़ाईलिखाई के लिए माली मदद की अपनी जिम्मेदारी को आसानी से निभा सकेगा.

टूरिज्म के क्षेत्र में फ्रीलांस गाइड के तौर पर काम करने वाला प्रखर तब कहां जानता था कि कुदरत कुछ और ही प्लान कर रही है. प्रखर की नन्ही सी प्लानिंग की भला उस के सामने क्या औकात? कुदरत की प्लानिंग के मुताबिक आया एक छोटा सा वायरस और सबकुछ खत्म. सारी मेहनत, सारी काबिलीयत घर की चारदीवारी में बंद हो कर रह गई.

कोरोना की दूसरी लहर में प्रखर का पूरा परिवार चपेट में आ गया था. बड़ी काटछांट कर के, घर और शादी से बचाई गई उस की बचत का आखिरी टुकड़ा भी इस इलाज की भेंट चढ़ गया.

डाक्टर की महंगी फीस और कई गुना ज्यादा कीमत पर खरीदी गई दवाओं ने उस के बैंक अकाउंट की आखिरी बूंद तक निचोड़ ली.

फिर भी प्रखर ने सोचा कि चलो जान बची तो लाखों पाए. जान है तो जहान  है. ठीक भी है. लेकिन अब उसी जान को इस बेकारी और बेरोजगारी के कोरोना से कैसे बचाएंगे और कब तक बचा पाएंगे?

कोरोना की मेहरबानी से टूरिस्ट के आने के कोई भी आसार दूरदूर तक नजर नहीं आ रहे हैं. टूरिज्म से जुड़े लाखों लोग, जिन की रोजीरोटी इस क्षेत्र से जुड़ी है, वे बेचारे कहां जाएं? एयरलाइंस, ट्रैवल एजेंसी, टूर औपरेटर, होटल, फ्रीलांस गाइड और हौकर्स इन सभी की जीविका की नैया टूरिस्ट द्वारा खर्च किए गए पैसों की नदी पर ही चलती है. अब पता नहीं इस सूखी नदी में पानी आने की आस कब तक इन की सांसों की डोरी को बांध सकेगी?

टूरिस्ट आते थे, तो सब को काम मिलता था. एयरलाइंस और होटल्स पर जब टूरिस्ट के पैसे की बारिश हो चुकती थी, तो छोटीछोटी बौछारें ट्रैवल एजेंसी और हौकर्स यानी छोटे दुकानदारों तक भी पहुंच जाती थीं. इन बौछारों की नन्हीनन्ही बूंदों से लाखों घरों के चूल्हे जलते थे.

टूरिज्म के क्षेत्र से जुड़े सभी लोग टूरिस्ट सीजन का इंतजार बड़ी बेताबी से करते थे और उसी एक सीजन के भरोसे सारे सीजन काट लेते थे. लेकिन अब कैसा टूरिस्ट सीजन, अब तो बस एक ही सीजन बचा है, वह है कोरोना सीजन.

हौकर्स का असली धंधा अगर करोना खा गया तो बचीखुची कसर औनलाइन शौपिंग ने पूरी कर दी. आगे कुआं पीछे खाई, जाएं तो जाएं कहां?

अनिश्चितता तो पहले भी होती थी. अप्रैल से ले कर अगस्त तक का मौसम इन के लिए औफ सीजन होता था, लेकिन अगस्त से अप्रैल तक तो काम मिलेगा, इसी आस के भरोसे ये लोग औफ सीजन का टाइम काट लिया करते थे.

लेकिन अब तो जैसे सबकुछ निश्चित ही हो गया है. न कोरोना के वैरिएंट खत्म होंगे, न टूरिस्ट आएंगे. अब तो बेकारी का यह तोहफा जैसे हमेशा के लिए इन की जिंदगी से जुड़ गया है. अनिश्चित काल तक जीरो इनकम के साथ भला कोई कैसे निभा सकता है?

टूरिज्म पर आसन लगा कर बैठे इस कोरोना से कोई निबटे भी तो कैसे?    

ऐसी हालत में सरकार की तरफ से कोई मदद या सहारा तो दूर इन की इतनी बड़ी परेशानी को रजामंदी तक नहीं मिल रही है. ये बेचारे अपने लोन की ईएमआई कैसे चुकाते होंगे? अपने बच्चों की  स्कूलों की फीस कैसे देते होंगे, जिन स्कूलों में वे जा भी नहीं रहे हैं? बच्चों को तो औनलाइन खुद ही पढ़ना पड़ता है और मोटेमोटे चैक हर महीने स्कूल के नाम काटने पड़ते हैं, वरना स्कूल से नाम कट जाएगा.

क्या सरकार का अपनी इस जनता के प्रति कोई फर्ज नहीं बनता? जिस से टैक्स वसूलते समय एकएक पाई का हिसाब लिया जाता है, उस घर में चूल्हा जला या नहीं, इस का हिसाब कौन रखेगा?

जो नेता वोट मांगने के समय हाथ जोड़े खड़े रहते हैं, वे बेकारी के समय कहां चले जाते हैं? कहां जाएं ये बेकारी के मारे? किस से लगाएं अपने लिए रोजगार मुहैया करवाने की गुहार?

कल तक ये लोग देश के लिए डौलर कमाते थे. इन की सर्विसेज विदेशियों को भारत दर्शन का रास्ता दिखाने में अहम भूमिका अदा करती थीं. आज वह समय एक सपना भर रह गया है. जाने कब आएगा वह सावन और कब जाएगा यह रावण?

जनता तो अब चंदन ही घिसेगी

वर्तमान सरकार की नीतियों से सब गङबङ हो गया, अब तो ऐसा ही लगता है. पहले नोटबंदी ने आम लोगों से ले कर गृहिणियों तक को परेशान किया और फिर जीएसटी के मकङजाल में व्यापारी ऐसे उलझे कि उन्हें इस कानून को समझने में वैसा ही लगा जैसे किसी क्रिकेट प्रेमियों को डकवर्डलुइस के नियम को समझने में लगता है.

नोटबंदी ने मारा कोरोना ने रूलाया

एक के बाद एक लागू कानूनों से पहले सरकार ने मौकड्रिल करना जरूरी नहीं समझा. परिणाम यह हुआ कि देश में असमंजस की स्थिति बन गई. नोटबंदी के समय तो आलम यह था कि लोग अपने ही कमाए पैसे मनमुताबिक निकाल नहीं सकते थे.

तब आर्थिक विशेषज्ञों ने भी माना था कि आगे चल कर देश को इस से नुकसान होगा. निवेश कम होंगे तो छोटे और मंझोले व्यापार पर इस का तगङा असर पङेगा. और हुआ भी यही. छोटेछोटे उद्योगधंधे बंद हो गए या बंदी के कगार पर पहुंच गए. बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई.

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मगर उधर सरकार कोई ठोस नतीजों पर पहुंचने की बजाय धार्मिक स्थलों, मूर्तियों और स्टैचू बनाने में व्यस्त रही.

परिणाम यह हुआ कि निवेश कम होते गए, किसानों को प्रोत्साहन न मिलने से वे खेती के प्रति भी उदासीन होते गए और रहीसही कसर अब कोरोना ने पूरी कर दी.

कोरोना वायरस के बीच देश में लागू लौकडाउन भी सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ गया और इस से सब से अधिक वही प्रभावित हुए जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाते हैं.

विश्व बैंक की रिपोर्ट और भारतीय अर्थव्यवस्था

सरकारी उदासीनता और लापरवाही का नतीजा भारत की अर्थव्यवस्था पर तेजी से पङा. हाल के दिनों में छोटेबङे उद्योगधंधे या तो बंद हो गए या बंदी के कगार पर जा पहुंचे. लाखों नौकरियां खत्म हो गईं. और अब तो भारतीय अर्थव्यवस्था को ले कर विश्व बैंक ने जो कहा है वह चिंता बढ़ाने वाली बात है.

विश्व बैंक ने हाल ही में यह कहा है कि कोरोना संकट से दक्षिण एशिया के 8 देशों की वृद्धि दर सब से ज्यादा प्रभावित हो सकती है, जिस में भारत भी एक है.

40 सालों में सब से खराब स्थिति

विश्व बैंक का यह कहना कि भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देश 40 सालों में सब से खराब आर्थिक दौर में हैं, तो जाहिर है आगे हालात और भी बदतर दौर में बीतेंगे.

‘दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था पर ताजा अनुमान : कोविड-19 का प्रभाव’ रिपोर्ट पेश करते हुए विश्व बैंक ने कहा है कि भारत समेत दक्षिण एशियाई देशों में 40 सालों में सब से खराब आर्थिक विकास दर दर्ज की जा सकती है. दक्षिण एशिया के क्षेत्र, जिन में 8 देश शामिल हैं, विश्व बैंक का अनुमान है कि उन की अर्थव्यवस्था 1.8% से लेकर 2.8% की दर से बढ़ेगी जबकि मात्र 6 महीने पहले विश्व बैंक ने 6.3% वृद्धि दर का अनुमान लगाया था.

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भारत के बारे में विश्व बैंक का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में यहां वृद्धि दर 1.5% से लेकर 2.8% तक रहेगी.

विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया कि 2019 के आखिर में जो हरे निशान के संकेत दिख रहे थे उसे वैश्विक संकट के नकारात्मक प्रभावों ने निगल लिया है.

जाहिर है, इस से आने वाले दिनों में हालात बिगङेंगे ही. उधर सरकार के पास इस से निबटने और आर्थिक प्रगति के अवसर को आगे बढ़ाने में भयंकर दिक्कतों का सामने करना पङ सकता है.

मुश्किल में कारोबारी और मजदूर

कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के उपायों के कारण पूरे दक्षिण एशिया में सप्लाई चैन प्रभावित हुई, तो कामगाज ठप्प पङ गए.

सरकार की खामियों की वजहों से लौकडाउन भी पूरी तरह असफल हो गया. देश में फिलहाल 2 लाख से अधिक कोरोना पीङितों की संख्या है और इस का फैलाव भी अब तेजी से होने लगा है.

उधर भारत में तालाबंदी के कारण सवा सौ करोङ लोग घरों में बंद हैं, करोङों लोग बिना काम के हैं और हालात इतने बदतर होते जा रहे कि कुछ बाजारों के खुलने के बावजूद कारोबार चौपट है. इस से बड़े और छोटे कारोबार बेहद प्रभावित हैं.

शहरों में रोजीरोटी मिलनी मुश्किल हो गई तो लाखों प्रवासी मजदूर शहरों से अपने गांवों को लौट चुके हैं और यह पलायन बदस्तूर जारी है.

विश्व बैंक ने किया आगाह

रिपोर्ट में यह आगाह किया गया है कि यह राष्ट्रीय तालाबंदी आगे बढ़ती है तो पूरा क्षेत्र आर्थिक दबाव महसूस करेगा. अल्पकालिक आर्थिक मुश्किलों को कम करने के लिए विश्व बैंक ने क्षेत्र के देशों से बेरोजगार प्रवासी श्रमिकों का समर्थन करने के लिए वित्तीय सहायता देने और व्यापारियों और व्यक्तियों को ऋण राहत देने को कहा है.

मगर भारत में जहां की राजनीति हर कामों पर भारी पङती है, वहां लोगों व व्यापारियों को आसानी से ॠण मिल जाएगा, इस में संदेह ही है. भारतीय बैंक की हालत पहले ही बङेबङे घोटालों की वजह से पतली है. भ्रस्टाचार ऊपर से नीचे तक है और यह भी सरकार की नीतियों को आगे ले जाने में बाधक है.

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उधर, सरकार के पास कोई माकूल रोडमैप भी नहीं है जिन से बहुत जल्दी देश में आर्थिक असमानता को दूर किया जा सके. सरकार के अधिकतर सांसद व मंत्री एसी कमरों में बैठ कर सरकार चलाना चाहते हैं.

जनता सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं दिखती. पर जैसाकि हमेशा से होता आया है, वही आगे भी होगा. देश को धर्म और जाति पर बांटा जाएगा फिर वोट काटे जाएंगे.

जनता जनार्दन क्या करे, सरकार के पास कहने के लिए तो है ही- प्रभु के श्रीचरणों में रहो, वही बेङापार करेंगे. यानी अब तो सिर्फ चंदन ही घिसते रहो…

भारत के प्रतिभाशाली युवा

कहने को हम दुनिया की सब से तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं, कहने को जगद्गुरु हैं, कहने को यहीं ज्ञान का उदय हुआ था, कहने को यहीं संस्कार, संस्कृति, स्थिरता, सभ्यता है और कहने को यहीं दुनिया का नेतृत्व करने वाला. बस, आज के शासकों को 30-40 साल और राज करने दो. पर असल में, हम दुनिया के मजदूर सप्लायरों में अव्वल हैं. हमारे मजदूर खाड़ी देशों में बड़ा काम कर रहे हैं. जब भी वहां विवाद होता है, हमें वहां से अपने लोगों को लाने के लिए जहाज के जहाज भेजने पड़ते हैं.

कम पढ़ेलिखे भारतीय मजदूर ही नहीं, पढ़ेलिखे एमबीए, इंजीनियर, डाक्टर भी दुनियाभर में नौकरी की भीख मांगतेफिरते हैं. अमेरिका ने अब अपने दरवाजे थोड़े बंद करने शुरू किए हैं तो हमारे युवा आस्ट्रेलिया व कनाडा का रुख कर रहे हैं.

अमेरिका के आंकड़े कहते हैं कि वहां टैक कंपनियों में काम करने वालों में सस्ते भारतीयों की बहुत मांग है. अमेरिका की इमीग्रेशन सर्विस के अनुसार, एच-1बी वीजा लिए विदेशियों की संख्या 5 अक्तूबर, 2018 को वहां 4,19,637 थी. उस में से 3,09,986 तो भारतीय ही थे. ये वे भारतीय युवा हैं जो भारत की महानता को छोड़ कर अमेरिकी कंपनियों में काम करने को तैयार हैं ताकि भारत की गंदगी, गंदी राजनीति, अंधविश्वासभरे नियमकानूनों, सरकारी लापरवाही, अव्यवस्था से छुटकारा पा सकें. अपने मातापिता, भाईबहनों, दोस्तों, संस्कृति, समाज को छोड़ कर ये युवा दूर अमेरिका में जा बसे हैं. वे कभी वहां के नागरिक बन पाएंगे, अब पक्का नहीं है पर चूंकि नौकरी जब तक रहेगी, अच्छा पैसा मिलेगा, तब तक तो ये वहां रहेंगे ही. ये प्रतिभाशाली युवा भारत के विकास में योगदान देने के बजाय अमेरिका चले गए हैं. भारत के मौजूदा शासक का ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा इन को भाया नहीं.

अमेरिका में जहां भारतीय कुल विदेशियों के 74 फीसदी हैं, वहीं हम से ज्यादा आबादी वाले चीन के कुल

11 फीसदी नागरिक ही इस वीजा पर वहां हैं. यह तब है जब 19वीं व 20वीं सदी में हजारों की संख्या में चीनी अमेरिका गए थे और हर बड़े शहर में चाइना टाउन मौजूद हैं जहां चीनी मूल के अमेरिकी बराबरी की हैसियत से रह रहे हैं.

यह हमारी तथाकथित प्रगति की पोल खोलता है जिस में हमारे युवाओं का न योगदान है और न उस में वे अपना भविष्य देखते हैं. हमारी प्रगति आज भी कृषि की प्रगति पर निर्भर है, जिस में अधपढ़े लोग, सरकारी जुल्मों के बावजूद, ज्यादा मेहनत कर भारत को थोड़ाबहुत नाम दिला रहे हैं. हमारे शिक्षा संस्थान या तो बेरोजगार युवा पैदा कर रहे हैं या फिर विदेशों की ओर टकटकी लगाए ऐसे होशियार व समझदार पैदा कर रहे हैं जिन्हें अपने देश पर भरोसा ही नहीं है.

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