Press Release: पटना में सजेगा भोजपुरी सिनेमा का महोत्सव

Press Release: 7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स समारोह का 15 मार्च, 2026 को पटना के बापू सभागार में*

पटना: भोजपुरी सिनेमा के प्रतिष्ठित और बहुप्रतीक्षित 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का आयोजन 15 मार्च को सायं 6 बजे से बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक बापू सभागार में किया जाएगा। यह समारोह भोजपुरी फिल्म उद्योग के लिए एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें सिनेमा जगत की नामचीन हस्तियां शिरकत करेंगी।

इस संबंध में पटना स्थित आई.एम. ए. हाल में आयोजित प्रेस वार्ता में जानकारी देते हुए दिल्ली प्रेस में सरस सलिल के इंचार्ज भानु प्रकाश राणा ने बताया कि यह अवॉर्ड शो अब बिहार की राजधानी पटना में हो रहा है, जो एक नए अध्याय की शुरुआत है. इस बार इसे और भव्य और बड़े स्तर पर किया जाएगा और दर्शकों के लिए यह मनोरंजन का शानदार अनुभव रहेगा।

भानु प्रकाश राणा ने बताया कि इस अवॉर्ड शो में नामांकित फिल्मों और कलाकारों को जूरी द्वारा चयनित कर विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया जाएगा। कार्यक्रम के दौरान रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लाइव म्यूजिकल परफॉर्मेंस और स्टार नाइट मुख्य आकर्षण रहेंगे।

*डिजिटल युग के साथ बदला अवॉर्ड शो का स्वरूप*
भोजपुरी सिनेमा में अपनी जबरदस्त कॉमेडी के जरिए हंसाने वाले अभिनेता रोहित सिंह मटरू ने बताया इस वर्ष के आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका परिवर्तित फॉर्मेट है। बदलते समय और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार को ध्यान में रखते हुए इस बार अवॉर्ड शो को तीन प्रमुख वर्गों में बांटा गया है—सिनेमा (थिएटर रिलीज फिल्में), ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब/टीवी कंटेंट के आधार पर बेस्ट अवॉर्ड्स दिए जाएंगे। आयोजन समिति से जुड़े बृहस्पति कुमार पांडेय ने बताया कि भोजपुरी कंटेंट अब केवल सिनेमाघरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ओटीटी और डिजिटल माध्यमों के जरिए विश्वभर में देखा जा रहा है। ऐसे में इन प्लेटफॉर्म पर कार्य करने वाले कलाकारों और तकनीशियनों को समान मंच देना समय की आवश्यकता है।

*2020 से शुरू हुआ सम्मान का यह सिलसिला*

सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो की शुरुआत वर्ष 2020 में बस्ती जिले से हुई थी जिसका उद्देश्य था भोजपुरी सिनेमा को एक व्यवस्थित और प्रतिष्ठित मंच प्रदान करना। लोकप्रिय पत्रिका सरस सलिल द्वारा शुरू की गई इस पहल ने कुछ ही वर्षों में भोजपुरी फिल्म उद्योग में अपनी विशेष पहचान बना ली।
इसके बाद अयोध्या में 3 बार, बस्ती में 2 बार, इसका आयोजन हुआ था। लगातार इस आयोजन की भव्यता और सहभागिता में वृद्धि होती गई।

*लखनऊ में हुआ था छठा भव्य आयोजन*
पिछले वर्ष ‘छठा सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स’ शो का आयोजन लखनऊ के प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हुआ था। यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यवस्थित समारोह माना गया।
उस समारोह में 50 से अधिक श्रेणियों में पुरस्कार प्रदान किए गए। बेस्ट फिल्म, बेस्ट अभिनेता, बेस्ट अभिनेत्री, बेस्ट निर्देशक, बेस्ट सिंगर, बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर और लाइफटाइम अचीवमेंट जैसी प्रमुख श्रेणियों में कलाकारों को सम्मानित किया गया।

अब तक हुए अवॉर्ड समारोह में यह अवॉर्ड दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, अरविंद अकेला ‘कल्लू’, प्रदीप पांडे ‘चिंटू’, अंजना सिंह, आम्रपाली दुबे, ऋचा दीक्षित, संजय पांडेय, देव सिंह, अवधेश मिश्रा, रक्षा गुप्ता, मनोज टाइगर, प्रियंका सिंह, सीपी भट्ट, संजय कुमार श्रीवास्तव,विजय खरे, केके गोस्वामी, शुभम तिवारी, माही खान, मनोज भावुक, प्रसून यादव, कविता यादव, अनुपमा यादव, अंतरा सिंह ‘प्रियंका’, समर सिंह, सहित कई नामचीन एक्टरों को मिल चुका है।

पिछले वर्ष लखनऊ में हुए अवॉर्ड शो में लोकप्रिय अभिनेता अरविंद अकेला ‘कल्लू’, अभिनेत्री अंजना सिंह, निर्देशक रजनीश मिश्रा सहित कई चर्चित हस्तियों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मान मिला। समारोह में बड़ी संख्या में दर्शकों और मीडिया की उपस्थिति ने इसे ऐतिहासिक बना दिया।

*इस बार पटना में और भी भव्य तैयारी*
अभिनेता और गायक विवेक पांडेय ने पटना में आयोजित हो रहे सातवें संस्करण को और भी भव्य और आकर्षक बनाने की तैयारी की गई है। रेड कार्पेट एंट्री, सेलिब्रिटी इंटरैक्शन, लाइव डांस परफॉर्मेंस और विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए इसे यादगार बनाने की योजना है।
भोजपुरी सिनेमा के चर्चित सितारे, निर्माता-निर्देशक, संगीतकार, गायक और तकनीकी विशेषज्ञ इस समारोह में भाग लेंगे। आयोजकों का कहना है कि यह मंच केवल सितारों को सम्मानित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले तकनीकी कलाकारों को भी बराबर की पहचान देता है।

*क्षेत्रीय सिनेमा को नई ऊंचाई*
आयोजकों ने बताया कि सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का मुख्य उद्देश्य भोजपुरी फिल्म उद्योग के प्रतिभाशाली कलाकारों और तकनीशियनों को प्रोत्साहित करना तथा क्षेत्रीय सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है।
भोजपुरी सिनेमा ने पिछले कुछ वर्षों में कंटेंट, तकनीक और प्रस्तुति के स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ इसकी पहुंच देश-विदेश तक बढ़ी है। ऐसे में यह अवॉर्ड समारोह उद्योग को एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता की दिशा में प्रेरित करता है।

*सिने प्रेमियों से अपील*
आयोजन समिति ने पटना और आसपास के जिलों के सिने प्रेमियों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस भव्य समारोह की शोभा बढ़ाने की अपील की है। जब बापू सभागार में रोशनी, कैमरा और तालियों की गूंज होगी, तब यह केवल कलाकारों का सम्मान नहीं बल्कि पूरी भोजपुरी संस्कृति का उत्सव होगा।

7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो एक बार फिर यह साबित करने जा रहा है कि भोजपुरी सिनेमा अब क्षेत्रीय दायरे से निकलकर राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

दिल्ली प्रेस पिछले 86 वर्षों से भारत का एक अग्रणी प्रकाशन समूह रहा है और इसकी 9 भाषाओं में प्रकाशित होने वाली 30 पत्रिकाओं के जरिए देश-भर के पाठकों तक सीधी पहुंच है। हमारे यहां देश की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली हिंदी पत्रिकाओं ‘सरिता’, ‘गृहशोभा’, ‘चंपक’, ‘सरस सलिल’, ‘मुक्ता’, मनोहर कहानियां’, ‘सत्यकथा’ का निरंतर सफल प्रकाशन किया जा रहा है, जिन्हें करोड़ों पाठक बड़े चाव से पढ़ते हैं।

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Social Story: सोनपुर मेला-दिन पशुओं का रात लड़कियों की

Social Story: रात के तकरीबन 10 बज चुके हैं. गंगा और गंडक के संगम पर बहती हवा में ठंडक है, पर इस ठंडक के भीतर एक अजीब सी बेचैनी तैर रही है. चांद आसमान में अपने पूरे शबाब के साथ मौजूद है, लेकिन लगता है कि उसे भी अंदाजा है कि उस के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसे उजाला भी छूने से डरता है.

सोनपुर मेले का मैदान दूरदूर तक फैला हुआ है. दिन में जहां यही जगह पशुओं की आवाजों से भरी रहती है, वहीं रात का रंग कुछ और ही होता है. आवाजें बदल जाती हैं, ताल बदल जाती है और लोगों की भीड़ किसी और ही चाह में इकट्ठा होने लगती है. ऐसा लगता है जैसे 2 मेलों की 2 दुनिया एक ही धरती पर उगती हैं… एक दिन में और दूसरी रात में. दिन का मेला पशुओं का है, रात का मेला लड़कियों का और इन दोनों दुनिया के बीच कहीं, एक रोशनी से भरा थिएटर खड़ा है, जिस के भीतर कलाकार हैं और बाहर दर्शक. पर जिस दुनिया में वे रहते हैं, वहां कलाकार होना ‘सुख’ नहीं, बल्कि ‘जद्दोजेहद’ का दूसरा नाम है.
सोनपुर, जहां दिन में व्यापार होता है, बूढ़े हाथी बिकते हैं, किसान अपनी जरूरतें खरीदते हैं, व्यापारी अपनी दुकानें सजाते हैं, वहीं रात होते ही एक दूसरी दुनिया उभर आती है. भीड़ के बीच से छनती तेज रोशनियां, लाउडस्पीकरों पर बजते मिक्स गीत, और हर मंच की ओर बढ़ती हजारों आंखें पर इन में से किसी को भी अंदाजा नहीं है कि इस चकाचौंध के पीछे क्या कीमत चुकानी पड़ती है.

आंखों में बसती थकान, मेकअप छिपा नहीं सकता स्टेज पर खड़ी हर लड़की के चेहरे पर मेकअप की कई परतें होती हैं, पर जिंदगी की दरारें इन परतों से नहीं छिपतीं. एक लड़की ने बात ही बात में कहा, ‘‘कपड़ा जितना छोटा, उतना नोट ज्यादा. पूरा शरीर तोड़ डालते हैं पर कहते हैं कि ‘आखिरी तक मुसकराना’. हम भी मुसकराते हैं, क्योंकि रोना किसी को पसंद नहीं आता. ‘‘कपड़े जितने छोटे होते हैं, लोग उतना पैसा लुटाते हैं. हमारी आंखों का रंग भी असली नहीं रहता. स्टेज पर जाने से पहले नीला लैंस लगाती हूं. पीरियड में भी नाचना पड़ता है. लोग कहते हैं कि हम नाचते हैं, क्योंकि हमें यही आता है पर किसी ने यह नहीं पूछा कि हम ने क्या खो कर यह सीखा?’’ मेकअप कर रही 17 साल की एक लड़की बोली, ‘‘हम तो गांव के मेले में नाचते थे. यहां आ गए तो पता चला कि यहां नाच नहीं, तन दिखाना ज्यादा जरूरी है. पहली बार बहुत रोई थी पर घर में खाने को कुछ नहीं था.’’

उस लड़की की आवाज में कोई ड्रामा नहीं, कोई शिकायत नहीं. बस, एक लंबा जमा हुआ सच है. ऐसा सच, जिसे मेले की भीड़ देखने नहीं आती, पर उस की बदौलत ताली जरूर बजाती है. जहां जानवरों का मेला लगता है, वहां लड़कियों का नाच भी दिखाया जाता है. सोनपुर मेला दुनिया का सब से बड़ा पशु मेला है. यह बात हर गाइड, हर पंपलैट, हर इतिहासकार लिखता है और यह सच भी है. दिन में तंबुओं में बंधे हाथी, रस्सी से बंधे घोड़े, चमकदार काठी वाले ऊंट और अनगिनत पालतू जानवरों को देखने हजारों लोग आते हैं. किसान उन का दांत देखते हैं, चाल देखते हैं, वजन देखते हैं, बरताव देखते हैं, लेकिन जैसे ही शाम ढलती है, वही मैदान, वही तंबू किसी और रंग में रंग जाते हैं.

दिन में जहां जानवर बिकते हैं, रात में वहां लड़कियों के नाच बिकते हैं. मजबूरी और जिंदगी की कीमत सोनपुर मेले या किसी दूसरे मेले में नाचने वाली लड़कियों की माली हालत आमतौर पर बेहद कमजोर होती है. ज्यादातर लड़कियां गरीबी, अनाथालय या टूटे परिवार से आती हैं. उन के पास औप्शन बहुत सीमित होते हैं, जैसे स्कूल छोड़ना, घर चलाना या परिवार का पालनपोषण करना. यही वजह है कि वे थिएटर में काम करने को मजबूर होती हैं. हालांकि स्टेज पर उन के नाच के बदले उन्हें पैसे मिलते हैं, लेकिन वह रकम उन की मेहनत, थकान और जोखिम के मुताबिक नहीं होती.

कभीकभी उन्हें सिर्फ खानेपीने, सफर और छोटेछोटे खर्चों के लिए ही भुगतान मिलता है. उन के लिए स्टेज एक ऐसा व्यवसाय है, जो आज जीविका दे सकता है, पर अच्छा भविष्य नहीं. थिएटर मालिकों का रवैया थिएटर मालिक आमतौर पर इन लड़कियों को एक ‘प्रोडक्ट’ के रूप में देखते हैं न कि इनसान के रूप में. स्टेज पर उन की चमक, थिरकन और आकर्षण ही उन की कीमत तय करती है. कुछ मालिक कलाकारों की सिक्योरिटी, भोजन और सेहत का ध्यान रखते हैं, पर ज्यादातर केवल कमाई और दर्शकों की तादाद पर फोकस करते हैं. लड़कियों के दर्द, सेहत और मानसिक हालात को नजरअंदाज किया जाता है. अगर कोई प्रदर्शन में नाकाम होती है या कमजोर पड़ती है, तो उसे धमकाया जाता है, काम से हटा दिया जाता है या अगले शो में जगह नहीं दी जाती है.

इज्जत की हिफाजत, सब से कमजोर कड़ी थिएटर की लड़कियों के लिए सब से बड़ा खतरा उन की इज्जत का होता है. स्टेज पर उन के शरीर को नजरों के सामने लाया जाता है और कई बार दर्शक की छेड़छाड़, गालीगलौज, वीडियो बनाना या स्टेज के पीछे दबाव डालना आम बात हो जाती है. सिक्योरिटी का उपाय तकरीबन नाममात्र होता है और लड़कियां अपनी हिफाजत के लिए अकेली रहती हैं. अकसर वे अपनी इज्जत के लिए चुप रहने को मजबूर होती हैं, क्योंकि विरोध करने पर नौकरी या आमदनी छिन सकती है.
समाज में नजरअंदाज होना समाज में इन लड़कियों की हालत बहुत बुरी है. लोग उन की जद्दोजेहद और मेहनत को नहीं देखते, बस उन्हें ‘नाचने वाली’ के रूप में देखते हैं.

यह पेशा उन्हें इज्जत देने के बजाय बदनाम कर देता है. उन के पास शादी, स्थायी संबंध या सामाजिक सुरक्षा के मौके भी अकसर सीमित हो जाते हैं. समाज उन की मजबूरी को नजरअंदाज करता है और

Hindi Story: सफेद दाग

Hindi Story: शादी के 3 साल गुजर जाने के बाद भी रमतिया की गोद सूनी थी. रमरतिया का पति जागेश्वर उस से दूर भागता था, जबकि रमरतिया अपनी जोबन की आग में झुलस रही थी. पर इस सब की वजह क्या थी?

गां का हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर था, जहां सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें ही रुकती थीं. रमरतिया अपने घर के दरवाजे पर ताला लगा कर शाम के साढ़े 6 बजे वाली पूरब दिशा की ओर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन पकड़ने स्टेशन आई थी. वह अपने मायके जा रही थी. उस के भाई की शादी जो थी. रमरतिया के मायके से उसे लेने के लिए 2-3 बार छोटा भाई आया था, लेकिन उस के पति जागेश्वर ने उसे यह कह कर वापस भेज दिया था कि शादी का दिन नजदीक आने पर एक दिन वह खुद रमरतिया को छोड़ देगा.


पर आजकल करतेकरते शादी को जब 3 दिन रह गए, तो जागेश्वर ने कहा, ‘‘रमरतिया, मु झे तुम्हें मायके छोड़ने की फुरसत नहीं है. तू 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अकेले ही चली जाना. हां, शाम वाली पैसेंजर से मैं भी जाऊंगा, फिर 3-4 दिन ससुराल में ऐश करूंगा,’’ यह कह कर जागेश्वर पश्चिम दिशा की ओर जाने वाली सुबह 7 बजे की पैसेंजर ट्रेन से अपनी ड्यूटी पर चला गया था. जागेश्वर गांव के उस हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पश्चिम दिशा उतर कर एक गांव के स्कूल में क्लर्क की नौकरी करता था, जबकि रमरतिया का मायके गांव के हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पूर्व दिशा की ओर था.


रमरतिया की शादी को 3 साल गुजर गए हैं, पर अभी तक उस की गोद सूनी थी. इस की वजह यह थी कि जागेश्वर उसे बिलकुल पसंद नहीं करता था, क्योंकि उस के शरीर पर जगहजगह सफेद दाग थे. इस वजह से वह उस के पास आने में घिन महसूस करता था. जागेश्वर घर पर केवल भोजन से मतलब रखता था, फिर बिस्तर लपेट कर बगल में दाबे हुए बाहर चला जाता था और मड़ैया में बिछी खाट पर सो जाता था या जब खलिहान में फसल होती, तब खलिहान में सोता था.


सावनभादों की रातें हों या वसंत की चांदनी रातें, रमरतिया अपने जोबन की आग पर काबू कर के किसी तरह अकेली समय काट लेती. वह सोचा करती कि औरत का जन्म पा कर जिस को खूबसूरत शरीर नहीं मिला उस की जिंदगी बेकार है और उन्हीं बेकार औरतों की श्रेणी में एक वह भी है. कभीकभी जब वह अपने पति जागेश्वर को चायपानी देते समय उंगलियों से छू देती या फिर मुसकरा देती, तब वह उसे डांटते हुए बोल उठता, ‘‘मुसे तू अपनी जवानी की प्यास बु झाना चाहती हैमैं तेरी जैसी बदसूरत औरत को भला क्यों भोगूं, मु झे तो खूबसूरत औरतें मिलती रहती हैं. तू जवानी की आग में जल मरे , मैं तब भी तु झे हाथ तक नहीं लगाने वाला.’’


यह सुन कर रमरतिया की आंखों में आंसू छलक आते. वह मन ही मन  जागेश्वर को कोसती हुई बुदबुदाती रहती, ‘‘बाजारू औरतों के चक्कर में पड़ना ठीक तो नहीं होता राजा, लेकिन मैं सम झाऊं भी तो कैसे…’’
प्लेटफार्म पर बनी सीमेंट की लंबी कुरसी पर बैठी रमरतिया अपनी प्लास्टिक की डोलची हाथ में थामे यह सब सोच ही रही थी कि पैसेंजर ट्रेन आने की सूचना हो गई. मुसाफिर अपनी जगह से उठ कर पश्चिम दिशा की ओर  झुक झुक कर रेल की पटरियों को देखने लगे. जागेश्वर के कहे मुताबिक रमरतिया तो सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन ही पकड़ने वाली थी, पर बाल संवारने, नाखून रंगने और पांव को आलता से रंग कर सजनेसंवरने में उसे देर हो गई थी.


सजसंवर कर जब रमरतिया आईने के सामने खड़ी होती, तो किसी अप्सरा से कम थोड़ी लगती, पर उस का आदमी तो उस के शरीर के सफेद दाग से बिदका हुआ रहता. सांचे में ढले उस के बदन के कसाव और उभार पर तो कभी उस की नजर ही नहीं गई. सुहागरात को ही लालटेन की रोशनी में रमरतिया के शरीर के सफेद दाग देख कर जागेश्वर ऐसा बिदका था कि फिर रात में कभी नहीं पास आया. हर समय कहता रहता, ‘‘बेकार लड़की से शादी करा दी. जब जवानी की आग में तड़पेगी तब पता चलेगा कि किसी भोलेभाले लड़के से सफेद दाग वाली बात छिपा कर शादी करने का नतीजा क्या होता है.’’


जागेश्वर शाम को स्कूल से छुट्टी होने पर सीधे स्टेशन आया और अपनी ससुराल तक के स्टेशन का टिकट ले कर शाम वाली पैसेंजर ट्रेन में सवार हो गया. उसे पूरी तरह भरोसा था कि रमरतिया सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अपने मायके पहुंच कर घरपरिवार के माहौल में घुलमिल गई होगी. चलो, रात के 10 बजे तक तो वह भी पहुंच ही जाएगा वहां. शादीब्याह वाले घरों में वैसे भी 10-11 बजे तक चहलपहल रहती ही है. ट्रेन में बैठा हुआ जागेश्वर यह सब सोचतेसोचते कभीकभी  झपकी लेने लगता. बीच के स्टेशनों पर लोग चढ़तेउतरते रहे. उस ने खिड़की से बाहर  झांका, तो पता लगा सूरज डूब चुका था और अंधेरा हो गया था.


अरे, यह तो उस के गांव का स्टेशन तुलसीपुर है. यहां तक आतेआते ट्रेन पूरे डेढ़ घंटे लेट हो गई थी. अब पूरे 8 बज   रहे थे. उसे प्यास लगती महसूस हुई. अगले ही पल वह तुलसीपुर स्टेशन पर हैंडपंप से पानी पीने ट्रेन से नीचे उतर पड़ा, यह सोच कर कि वहां कुछ देर तक तो ट्रेन रुकती ही है. गुलमोहर के पेड़ तले वाला हैंडपंप पास ही तो था. जागेश्वर ने हैंडपंप के हत्थे पर जोर डाल कर चलाया और जल्दी से 8-10 अंजुलि पानी पी डाला. तब तक ट्रेन खुल गई, तो वह दौड़ कर एक बोगी में चढ़ गया. इस बोगी में तो घुप अंधेरा है, कोई बल्ब नहीं जल रहा, शायद इस बोगी में बिजली का कनैक्शन किसी तरह से हट गया है, इसीलिए उस में कोई मुसाफिर भी नहीं चढ़ा था. जागेश्वर अंधेरे में ही बीच की एक लंबी वाली बर्थ पर बैठ गया. ट्रेन तेज रफ्तार से भागी जा रही थी.


एकाएक जागेश्वर को लगा कि उस के सामने वाली लंबी सीट पर कोई औरत लेटी है, क्योंकि उस ने शायद करवट बदली थी, तो चूडि़यों की खनकने की आवाज आई थी. वह सोचने लगा, ‘इस अंधेरी बोगी में जहां हाथ को हाथ नहीं सू रहा और यहां औरतजरूर कोई पागल औरत होगी…’ पर जागेश्वर के मन का शैतान अगले ही पल उछलकूद करने लगा. वह सोचने लगा कि काश, यह औरत उस के मन की मुरादनहींनहींऐसी पागल औरत से जिस्मानी रिश्ता बनाना खतरे से खाली नहीं, एड्स का शिकार हो जाएगा.
मन में यह सम तो जागेश्वर को आई पर अगले ही पल हवस के भेडि़ए ने उस के मन पर कालिख पोत दी और उस की हथेलियां सीट पर कुछ टटोलने लग गईं. अगले ही पल उस औरत के पांव की पायल छू गई, साथ ही चिकनी नरम चमड़ी.


अरे, यह औरत तो कुछ भी नहीं एतराज कर रही, शायद इस का मन भी…’ जागेश्वर का हौसला बढ़ गया. उस ने दोबारा अपनी हथेलियां उस की पिंडलियों तक पहुंचा दीं. वह औरत अभी भी खामोश थी. जागेश्वर को अब पूरा यकीन हो गया कि यह औरत उसे मना नहीं करेगी. जागेश्वर का हौसला बढ़ता गया और उस की हथेलियां एकएक बित्ता ऊपर बढ़ती गईं. औरत खामोश रही. हवस का भेडि़या अगले ही पल मांसपिंड पर टूट पड़ा और स्वाद चख कर शांत हो गया. पैसेंजर ट्रेन बीच के कई स्टेशनों को पार करती जागेश्वर की ससुराल वाले रेलवे स्टेशन पर जा लगी. इस बीच में उस बोगी में अंधेरा देख कर कोई भी मुसाफिर नहीं चढ़ सका था. ट्रेन रुकते ही जागेश्वर स्टेशन पर उतर पड़ा. अभी वह नीचे उतर कर खड़ा ही हुआ था कि वह औरत भी  झटपट उतर पड़ी.


स्टेशन के उजाले में जागेश्वर ने उस औरत को देखा, तो जैसे वह उस से नजरें नहीं मिला पा रहा था. वह हकलाता हुआ बोल पड़ा, ‘‘रेरमरतियातूइस अंधेरी बोगी में…’’ ‘‘हां, मैं रमरतिया ही हूं, सुबह वाली पैसेंजर ट्रेन छूट गई थी. जल्दी में स्टेशन पर इस शाम वाली ट्रेन में चढ़ी तो अंधेरी बोगी मिल गई. ट्रेन जब खुल गई तो मैं ने देखा कि तुम स्टेशन के हैंडपंप से पानी पी कर दौड़ कर इसी बोगी में चढ़ गए थे. ‘‘मैं चुपचाप बोगी के बीच में पहुंच कर एक सीट पर लेट गई. मैं जानती थी कि तुम इसी तरह ट्रेनों में, बाजारों में, गलीकूचों में औरतों की तलाश करते रहते हो और अपनी जवानी की प्यास बु झाते फिरते हो.


‘‘यही सोच कर मैं एक लावारिस औरत की तरह पड़ी रही, ताकि आज इस ट्रेन में तुम से मेल कर के यह एहसास करा सकूं कि शरीर तो एक ही होता है, चाहे वह काला हो, गोरा हो या सफेद दाग से भरा हो.
‘‘अगर मन स्वीकार कर ले तो सारी कमियां दूर हो जाती हैं, क्योंकि हर औरतआदमी के मिलन का सुख एक सा हुआ करता है,’’ यह कह कर रमरतिया खामोश हो गई. जागेश्वर को आज रमरतिया की यह बात बहुत गहरे तक जा लगी. उस ने जो कुछ कहा, आदमी औरत के मिलन की सचाई यही तो है. इतना सुख देने वाली सेहतमंद, कसे बदन वाली पत्नी को मात्र सफेद दाग की वजह से छोड़ कर जागेश्वर इधरउधर भटकते हुए बाजारू औरतों से अपने जिस्म की प्यास बु झाता रहा.


सचमुच, जागेश्वर का मन एक औरत के प्रति क्यों इतनी गलत सोच वाला हो गया. हकीकत तो यही है कि उस की पत्नी दिलदिमाग और बरताव में किसी दूसरी औरत से कमतर तो नहीं. उसे अब बहुत पछतावा होने लगा था. शादी के कई साल बीत गए, पर वे दोनों एक घर में रह कर भी अलगअलग थे. जागेश्वर ने रमरतिया के शरीर के सफेद दाग का इलाज करवाने के लिए भी कभी नहीं सोचा. अब तो कोई भी बीमारी लाइलाज नहीं रही, देश का मैडिकल क्षेत्र बहुत विकसित हो चुका है. वह अपनी चांद सी पत्नी के सफेद दाग का इलाज जरूर कराएगा.


अगले ही पल जागेश्वर ने अंधेरे में खेत की पगडंडी पर अपनी ससुराल वाले गांव की ओर कदम बढ़ाते हुए रमरतिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उस के गाल पर एक गहरा चुंबन जड़ दिया. रमरतिया मुसकरा उठी. जागेश्वर के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘‘मैं ने बहुत बड़ी भूल की है. तुम ने मेरी आंखें खोल दी हैं रमरतिया. मैं अब तुम्हें छोड़ किसी दूसरी औरत की ओर ताकूंगा भी नहीं.’’ Hindi Story

लेखक -कमलेश पांडेय ‘पुष्प’

Hindi Story: चिंता

Hindi Story: रवि अपने कुछ दोस्तों के बहकावे में कर मौजमस्ती करने चकलाघर पहुंच गया. 1,000 रुपए में उस के लिए एक कमरा और एक लड़की तय की गई. उस के बाकी दोस्त भी अलगअलग कमरों में अपनीअपनीमस्तीतलाशने में बिजी हो गए.


कमरे में पहुंच कर रवि पलंग पर बैठ गया. दीवारें सैक्सी तसवीरों से पटी पड़ी थीं. थोड़ी ही देर में कोई 31-32 साल की नेपाली औरत उस के पास कर बैठ गई. अजीब सी हिचक के बीच रवि ने जैसे ही उस का हाथ छुआ, उस का तपता हुआ शरीर उसे चौंकाने लगा. ‘‘अरे, आप को तो तेज बुखार है,’’ रवि बरबस बोल उठा. ‘‘यह सब रोज का धंधा है साहब, आप जल्दी कीजिए. उस के बाद अगले कस्टमर के पास भी जाना है,’’ दर्द को मुसकान में बदलती हुई वह बोली. रवि गंभीर हो गया और बोला, ‘‘बीमार होने पर भी यह सब करती हो. छोड़ क्यों नहीं देती हो यह सब? आखिर क्यों कर रही हो?’’ वह औरत अपने आंसू रोक पाई और बोली, ‘‘बेटी के लिए साहब.’’


‘‘मतलब?’’ रवि ने पूछा. वह औरत कुछ पल चुप रही, फिर टूटी आवाज में बोली, ‘‘नेपाल में मैं एक इज्जतदार परिवार से हूं. मेरे पति का कारोबार था. घरकार, सबकुछ था. मेरी एक 10 साल की बेटी भी है. लेकिन साल 2015 में आए भूकंप ने सब छीन लिया. मेरे पति मलबे में दब कर मर गए. आंखें खोल कर देखा तो बचा था सिर्फ भूकंप का मलबा, भूख, बेबसी और मेरी 8 महीने की बच्ची. ‘‘फिर रोजगार के लिए मैं दरदर भटकी, पर बिना मर्द की औरत खुले खेत जैसी होती है, जिसे कोई भी जानवर बेहिचक चर जाता है. हर जगह मेरे शरीर का शोषण हुआ. फिर भारत में काम दिलाने के नाम पर एक दलाल मु झे यहां बेच गया.’’


उस औरत की कहानी सुन कर रवि का रोमरोम सिहर उठा. वह जिस्म की आग बु झाने आया था, पर सामने किसी मां की तपती मजबूरियां खड़ी थीं. ‘‘लेकिन इस हालत में भी यह सब क्यों?’’ रवि की बात पूरी होने से पहले ही वह औरत बोली, ‘‘बताया तो है कि बेटी के लिए. इसी तपते हुए जिस्म से कमाए पैसों से उस की बोर्डिंग स्कूल की फीस भरती हूं, ताकि पढ़लिख कर वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और उसे मेरी तरह इस जिस्म के बाजार में कभी बिकना पड़े.’’ रवि के भीतर उस औरत के लिए इज्जत उमड़ आई. वह फौरन कमरे से बाहर निकला और गुस्से में चकलाघर चलाने वाली रेशमाबाई के पास पहुंचा.
‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें…’’ रवि फट पड़ा, ‘‘एक औरत हो कर दूसरी औरत की मजबूरी का फायदा उठाती हो. इन्हें जिल्लत की जिंदगी में धकेलती हो.’’


रेशमाबाई ने पान की पीक को पीकदान में फेंकते हुए ठहाका लगाया, ‘‘क्या बात है लल्लालगता है पहली बार आए होयहां चमड़ी का धंधा चलता है, चोंचलेबाजी नहीं. मूड नहीं बना क्या? कुछ कड़क चाहिए तो बोलो पहली बार हो, डिस्काउंट भी दे दूंगी…’’ ‘‘कैसी घटिया औरत हो तुमकोई अपनी मरजी से यह काम करे तो बात और है, पर जबरदस्तीरवि का गुस्सा फूट पड़ा. रेशमाबाई फिर मुसकराई और बोली, ‘‘यह सब यहां चलता रहता है. ज्यादा अक्ल मत लगाओ.’’ रवि जोर से बोला, ‘‘अगर यही मजबूरी तुम्हारी बेटी पर आती तो?’’ रेशमाबाई ठहाका मारते हुए बोली, ‘‘बेटी? अरे चिकने, मैं भी तो अपनी बेटी के लिए ही कर रही हूं यह सब. मेरे बाद यही तो संभालेगी धंधा. क्यों बेटी हसीना?’’


पास  झूले पर बैठी रेशमाबाई की बेटी हसीना ने बालों में उंगली घुमाते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं भी तो इसी इंतजार में हूं अम्मी.’’ उन मांबेटी की बातें सुन रवि हैरान रह गया. वह सम नहीं पा रहा था कि बेटी के भविष्य के लिए कौन ज्यादा चिंतित हैवह नेपाली औरत या फिर रेशमाबाई?  Hindi Story

Hindi Kahani : औरत

Hindi Kahani. रिमझिम शादी के 4 साल में 2 बच्चों की मां बन गई. उस का पति अंजुम शराबी था और मारपीट भी करता था. रिमझिम इस जिंदगी से तंग गई और एक दिन उस ने अंजुम को ही धुन दिया. क्या वह अपनी शादी निभा पाई? उस के बच्चों का क्या हुआ?

कि सिरे से इस कहानी को शुरू करूंऋतुएं अपना वेश बदलती रहती हैं. बादलों के बीच झांकते कई अक्सर भी अपना रूप बदलते रहते हैं और सब से ज्यादा इनसान अपना बरताव बदलता रहता है.
18 साल की उम्र में ब्याह और फिर 20-22 साल की उम्र में 2 बच्चों की मां बन जाना, अल्हड़पन और जवानी रिमझिम के हिस्से में कभी नहीं आई. पति शराबी था. संयुक्त परिवार था. सब की बातों को सुनती, सहती. तानों को सहतेसहते उस का मन सब से उचाट हो गया था.

आज भी रिमझि को याद है ब्याह के चौथे दिन ही पति का गलत बरताव. रात के 11 बज रहे थे. अंजुम अभी तक घर नहीं लौटे थे. घर के सभी सदस्यों से रिमझिम पूछ चुकी थी. सभी का यही कहना था कि जाएगा कुछ देर में. रिमझिम का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. तभी दरवाजे की घंटी बजी. वह बेतहाशा दौड़ी और दरवाजा खोला, सामने अंजुम शराब के नशे में चूर था. उसे कुछ समझ  नहीं आया. रोते हुए बोली, ‘‘आप शराब पी कर आए हैं?’’

‘‘हां, पी कर आया हूं. तेरे बाप के पैसे की नहीं पी कर आया हूं,’’ इतना कह करान्नाटेदार थप्पड़ से रिमझिम का गाल लाल हो गया. रिमझिम की डबडबाई आंखों में अपने मातापिता का स्नेहिल चेहरा धुंधलाने लगा. उसे लगा कि अगर दीवार का सहारा नहीं लिया, तो वह चकरा कर वहीं गिर जाएगी.
तभी ससुर दौड़ कर आए और रिमझिम को सास के पास बैठा कर अंजुम के पास चले गए.
सास ने कहा, ‘‘अब तुम्हें ही इसे संभालना है बहू. बहुत पीताखाता है.’’

‘‘आप लोग जान रहे थे तो इन की शादी क्यों कराई?’’ रिमझिम की बेबसी उस की आंखों से बह रही थी.
‘‘जी छोटा मत करो, कोई कोई रास्ता निकल आएगा. तुम गई हो, अब सब संभाल लोगी,’’ सास
की रुंधी हुई आवाज रिमझिम को असमय ही मैच्योर हो गई. मारपीट, गालीगलौज अब रोज की बात हो गई थी.

एक दिन अंजुम दिन में ही पी कर गया. बच्चे घर में ही थे. रिमझिम बच्चों को ले कर ऊपर के कमरे में
चली गई.कुछ देर बाद अंजुम आया और दहाड़ते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे से बगैर पूछे ऊपर आने की? बकरा लाया हूं. जाओ, उसे पकाओ. और हां, मेरे 4 दोस्त भी साथ में हैं.’’ रिमझिम बच्चों के सामने किसी तरह का बखेड़ा नहीं चाहती थी. वह चुपचाप नीचे चली गई. अंजुम भी साथ में गया और बच्चे भी.

रसोईघर में नम आंखों से रिमझिम प्याज काटने लगी कि तभी अंजुम उसे पकड़ कर बोला, ‘‘रो रही हो? बकरा बनाने को बोल दिया इसलिए?’’ रिमझिम गुस्से से अंजुम को देखने लगी. अंजुम बोला, ‘‘आंखें नीची कर बेशर्म औरत.’’ लेकिन रिमझिम अंजुम को उसी तरह देखती रही.

तभी अंजुम बालों से पकड़ कर रिमझिम को घसीटने लगा. बच्चे सहमे हुए दरवाजे से छिप कर देख रहे थे.
रिमझिम अपने ही बच्चों के सामने यह बेइज्जती सहन नहीं कर पाई. वह अचानक शेरनी की तरह झपटी और अंजुम को वहीं पटक कर घूंसे मारने लगी. वह चिल्लाती जा रही थी, ‘‘देख मेरी हिम्मतदेखना चाहता था . बहुत हो गया तुम्हारा वहशीपन, अब मैं दिखाऊंगी बगैर पीए अपना वही रूप.’’
अंजुम का नशा कपूर की तरह उड़ गया था. सास ससुर, जेठ जेठानी सभी आवाज सुन कर गए. ससुर की कड़कड़ाती आवाज सुनाई दी, ‘‘यही कमीनी है. इसी के चलते घर में कलह हो रही है.’’

इतना सुनते ही रिमझिम दहाड़ उठी, ‘‘अभी तक मैं ही कलह कर रही थीहै ? आप का बेटा संस्कारी है. जब मैं पीटी जाती थी, तब तो आप लोग खामोश रहे और आज जब मैं अपने लिए आवाज उठा रही हूं, तो आप सब की निगाह में कमीनी हो गई.’’

‘‘चुप कर बेशर्म औरत, आज तक तेरे जैसी औरत कहीं नहीं देखी. बेहया कहीं की. अंजुम ठीक करता है. अगर तुम्हारे ऊपर लाठीडंडा चले, तो तुम बेहयाई पर उतर आओगी.’’ तड़प कर रिमझिम उठी और हाथ का डंडा ससुर पर फेंक मारा. सारे लोग अवाक से ताकते रह गए.

‘‘अंजुम, तुम अपना परिवार ले कर अलग हो जाओ. मुझे से अब यह सब बरदाश्त नहीं होगा,’’ ससुर धीमी आवाज में बोले.‘‘एक शर्त पर, घर मेरे नाम पर होगा,’’ रिमझिम की हठी आवाज हवा में तैर गई.
बंटवारा हो गया. अंजुम अपने परिवार के साथ इस घर में गया, पर पीना नहीं छूटा और ही छूटी मारपीट.

जेठ के बेटे की शादी थी. रिश्तेदारों की भीड़ से घर अटा पड़ा था. रात 9 बजे रिमझिम सब को खाना खिला रही थी. अंजुम आया और उस का हाथ पकड़ कर खींचने लगा. रिमझिम ने झटके से
हाथ छुड़ा लिया कि तभी हवा में लहराता हाथ उस के गालों पर पड़ा. वह गुस्से में बदहवास अंजुम पर टूट पड़ी. गुस्से से दांत किटकिटाते हुए बोली, ‘‘संभल जाओ अंजुम, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा.’’ परिवार के कुछ लोग कर रिमझिम को साथ ले गए.

4 सासों के बीच रिमझिम बैठी थी.
‘‘बहू तुम ने अच्छा नहीं किया अपने पति को मार कर. हमारे धर्म में पति पर हाथ उठाना पाप है. जिस पति की लंबी उम्र के लिए तुम तीजत्योहार करती हो उस को तुम कैसे मार सकती होतुम्हें नरक में भी जगह नहीं मिलेगी.’’

‘‘नरक की भी चाह नहीं रही अब मेरी. इस से बुरा और क्या हो सकता है किसी के लिए. 25 साल से जुल्म सहती आई हूं. अब नहीं और कभी नहीं,’’ रिमझिम की मजबूत, लेकिन कांपती आवाज सुनाई दी.
‘‘बेलगाम हो गई है रिमझिम,’’ उस की अपनी सास ने धीरे से कहा.

समय रेत की तरह फिसलता रहा. बच्चों को एक खास माहौल में रखने की जिद में रिमझिम जिद्दी से और जिद्दी होती गई. उस के दोनों बच्चे काबिल थे. अच्छी परवरिश और रिमझिम के दिए संस्कार से बड़ा बेटा डाक्टर और छोटा बीडीओ बन गया.

बच्चों के बड़े पद पर जाते ही सारे रिश्तेदारों की नजरों में रिमझिम के लिए एक खास जगह बन गई. ससुर भी अपनी बहू के कायल हो गए, पर रिमझिम के दिल में किसी के लिए कोई इज्जत नहीं बची थी. वह सब को आदरस्नेह देती थी, पर दिल के अंदर अजीब से भाव भरे हुए थे.

बड़े बेटे की शादी की तैयारी में बिजी रिमझिम खुद सबकुछ कर रही थी. उसे रिश्तेदारों का कोई सहयोग नहीं चाहिए था. बेटे को देखती और बलिहारी जाती. उस के लिए अपने बच्चों की खुशियों से ज्यादा कुछ नहीं था. सास बनने की चाह उस के चेहरे पर अनूठी मुसकान बिखेर रही थी.अंजुम में बदलाव आया था, पर अकड़ अभी भी बाकी थी. शराब कम हुई थी, पर पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी.

रिमझिम नहीं चाहती थी कि बेटे की शादी में कोई भी शराब पी कर माहौल को खराब करे. सब से ज्यादा तो डर उसे अपने पति से ही था. आज शाम बेटे की बरात जानी थी. रिमझिम का मन अजीब सी उथलपुथल से भर रहा था. उस ने मन ही मन एक फैसला लिया.दोपहर के 2 बज रहे थे. रिमझिम अपने पति के पास गई और बोली, ‘‘बारात में कोई शराब पी कर नहीं जाएगा.’’

‘‘तुम बावली हो गई हो क्या? पीनापिलाना हमारी शान है,’’ अंजुम ने कहा. ‘‘पत्नी को पीटना और बच्चों को दुत्कारना भी शायद आप के लिए शान की बात है, है ?’’ ‘‘उन सब बातों को अभी भूल जाओ रिमझिम. वैसे तुम किसकिस को रोकोगीअगर ऐसा करोगी तो शायद कोई बरात में ही नहीं जाए.’’
‘‘ जाए कोई. मुझे  फर्क नहीं पड़ता. पर शराब पीकर कोई नहीं जाएगा और यही मेरा आखिरी फैसला है. बच्चे भी सहमत हैं मुझे से,’’ रिमझिम ने अपनी बात रख दी. अंजुम अजीब उलझन में फंस गया. दोस्त और कई रिश्तेदार बगैर शराब कहीं जाते ही नहीं. दोस्तों तक बात पहुंची. उन्हें ?ाटका लगा.

एक दोस्त ने ताना कसा, ‘‘तुम मेहरारू भक्त हो गए हो क्या अंजुम? तुम उन की बात क्यों मानोगे? मालिक तो तुम हो. तुम जैसा चाहोगे भाभीजी को वैसा ही करना होगा. औरतों का घर पर राज नहीं चलना चाहिए. आओ, पी कर चलते हैं. देखते हैं कि भाभीजी क्या कर लेंगी.’’ दोस्तों की हुंकार के सामने अंजुम भी शेर बन गया और शराब का दौर शुरू हो गया.

इधर शादी का लोकगीत का गीत गाया जा रहा था. रिमझिम की आंखें खुशी से नम थीं. मां को खुश देख कर विनय का भी मन खुशी  था. आज बरसों के बाद मां के चेहरे पर सुकून था. तभी अंजुम आया और दूल्हे के गाड़ी में बैठ गया. रिमझिम तमतमा उठी. अंजुम के मुंह से उठती शराब की बदबू उस की सांसों को मानो रोक रही थी.

अचानक रिमझिम दहाड़ी, ‘‘अंजुम, आप गाड़ी से नीचे उतरिए. आप बरात में नहीं जाएंगे और जिसजिस ने भी शराब पी है, वे अपनेअपने घर चले जाएं.’’
अंजुम गाड़ी से उतरा और तमतमाते हुए बोला, ‘‘बहुत गरमी चढ़ गई है शरीर में. सब उतार दूंगादेखता हूं कि कौन मुझे बैठने नहीं देता है…’’

अंजुम गाड़ी में बैठने गया कि तभी विनय ने गाड़ी का दरवाजा बंद कर लिया और बोला, ‘‘पापा, आप लोग बरात में नहीं जाएंगे.’’ ‘‘मैं तेरा बाप हूं,’’ अंजुम चीखा. ‘‘मैं सिर्फ मां का बेटा हूं.’’‘‘रिमझिम, मान जाओ. तकरीबन सभी ने पी रखी है. अगर तुम्हारी यही जिद रही तो इक्कादुक्का लोग ही बरात में जा पाएंगे और अगर अंजुम नहींगया तो शादी की रस्में कौन निभाएगा?’’ ससुर बोले.

ससुर का कहना भी रिमझिम ने ठुकरा दिया, ‘‘मैं निभाऊंगी. जैसे अभी तक बच्चों की परवरिश करती आई हूं. और रहा सवाल इक्कादुक्का लोगों के बरात में जाने का, तो यही बेहतर है. मेरी बहू के घर कोई भी नशेड़ी या गंजेड़ी नहीं जाएगा.’’ 
रिमझिम दूल्हे की गाड़ी में बैठ गई. गाड़ी रफ्तार पकड़ चुकी थी. सभी हैरान हो कर एक औरत की हिमाकत और हिम्मत देखते रह गए. Hindi Kahani

लेखक – कात्यायनी सिंह             

  

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