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Hindi Short Story : जिस की बीवी काली…

Hindi Short Story. बीवी काली हो या गोरी, यह एक बहस का मुद्दा न हो कर खोज की बात होनी चाहिए, ऐसा खयाल मेरे एक करीबी दोस्त का है. उस की पिछले दिनों नईनई शादी हुई थी. जब भी वह इस मुद्दे पर बात करता है, काली रंगत की जरूरत से ज्यादा वकालत करता है.

एक बार मैं ने कहा, ‘‘यार, तुम भी कमाल के आदमी हो. सारी दुनिया गोरे रंग पर फिदा है और तुम हो कि कालीकलूटी पर जान छिड़कते हो.’’

इस पर वह दोस्त बोला, ‘‘भाई मेरे, काले रंग के कितने फायदे हैं, क्या तुम्हें मालूम है? काली बीवी पाना या ढूंढ़ कर लाना हमारे परिवार में सदियों से चला आ रहा है.

‘‘जब मेरी शादी की बात चली थी, तो पिताजी ने मुझे लड़की देखने के लिए मना कर दिया था. वह जानते थे कि मैं काली को नकार दूंगा.

‘‘शादी से एक महीना पहले ही मुझे काली लड़की की खूबियां सुनाना शुरू कर दिया गया. इस का नतीजा यह हुआ कि मुझे गोरे रंग से नफरत होने लगी.’’

मैं सोचने लगा कि कहीं यह दोस्त पागल तो नहीं हो गया है. ऐसे खयालों वाले कहीं दोचार और मिल जाएं, तो खूबसूरती का सामान बनाने वालों का दिवाला ही निकल जाएगा.

मैं बोला, ‘‘देख यार, काली बीवी को ब्याह कर घर लाने के बावजूद तुम्हें कोई फायदा तो हुआ नहीं. कहीं ऐसा तो नहीं कि अपना ऐब छिपाने के लिए डींगें हांके जा रहे हो?’’

मेरी बात पर वह दोस्त अपना सीना फुला कर बोला, ‘‘देखो भाई, सब से बड़ा फायदा तो यह है कि रोजरोज के फेस पाउडर, क्रीम वगैरह का झंझट ही खत्म हो गया है. नहाने के लिए किसी खास किस्म के साबुन की जरूरत ही नहीं पड़ती. वह तो कपड़े धोने के साबुन से कपड़ों के साथसाथ खुद को भी धो डालती है. काली रंगत पर कोई भी साड़ी मैच नहीं करती, इसलिए हम जो भी साड़ी खरीद कर ला देते हैं, वह चुपचाप पहन लेती है.

‘‘पार्टी में जाने या सैरसपाटे का सवाल ही नहीं उठता. इन्हें साथ ले जाने के खयाल से ही रूह कांपने लगती है. शादी के समय मेरे ससुर ने काफीकुछ दिया था, क्योंकि इस कोयल से कोई शादी ही नहीं कर रहा था.

‘‘जब भी मैं अपनी ससुराल जाता हूं, तो मेरी इतनी खातिरदारी होती है कि मैं एक दिन की जगह एक महीने तक टिका रहता हूं. वापसी के समय मेरा खाली पर्स नोटों से भरा रहता है.’’

थोड़ी देर के लिए वह दोस्त चुप हो गया और देखने लगा कि मैं उस की बातों पर गौर कर रहा हूं या नहीं.

जब उसे यकीन हो गया कि मैं दिल लगा कर उस की बातें सुन रहा हूं, तो उस ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तू मेरा असली दोस्त है. तुझे एक गूढ़ बात बता रहा हूं.

‘‘तुम तो खैर शादी कर चुके हो, इसलिए यह बात तुम्हारे बेटे के काम आएगी.

‘‘जरा सोचो, अगर किसी हसीना के चेहरे पर काला तिल हो, तो वह खूबसूरत कहलाती है और यही तिल सफेद हो, तो वह कोढ़ या सफेद दाग कहलाता है.

‘‘देखा, काले रंग का कमाल. तुम ने भी अमिताभ बच्चन की वह फिल्म तो देखी होगी, जिस में वह गाता है…

‘‘जिस की बीवी काली, उस का भी बड़ा नाम है.

आंखों में लगा लो, सुरमे का क्या काम है.’’

फिर उस दोस्त ने मुझे अपने पास बुलाया. मेरे कान में फुसफुसा कर उस ने कहा, ‘‘काली बीवी का सब से बड़ा फायदा तो यही है कि कोई भी उस से छेड़छाड़ नहीं करता और न ही कोई उसे बहलाफुसला कर भगा ले जाने की जुर्रत करता है.’’

इस तरह उस दोस्त ने मुझे इतनी सारी खूबियां गिनाईं कि मैं दंग रह गया और सोचने लगा कि मैं क्यों गोरी रंगत के चक्कर में पड़ कर उस से शादी कर बैठा. अगर ये सज्जन मुझे शादी से पहले मिले होते, तो यकीनन मैं भी अपनी शादी के लिए कालीकलूटी लड़की ही पसंद करता… Hindi Short Story

 

Short Story in Hindi : बिजली का मारा प्रेमी बेचारा

Short Story in Hindi.नए जमाने के एक प्रेमी ने जब अपनी प्यारी और चुलबुली प्रेमिका के सामने शादी का प्रस्ताव रखा, तो उस की प्रेमिका ने अपनी शर्तों की लिस्ट उस के सामने पेश कर दी. ‘‘ठीक है. मैं तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार करती हूं. लेकिन, क्या तुम मेरी शर्तों के मुताबिक शादी के बाद मुझे खुश और सुखी रखोगे?’’

प्रेमी ने उस के नजदीक सरकते हुए कहा, ‘‘तुम जल्दीजल्दी अपनी शर्तें बताओ. मैं हर हाल में तुम्हें खुश और सुखी रखूंगा.’’

प्रेमिका ने एक मीठी मुसकान अपने गुलाबी होंठों पर लाते हुए कहा, ‘‘मैं नए जमाने की लड़की हूं. मुझे नएनए डिजाइन के बदलते फैशन के कपड़े पहनने का शौक है. क्या तुम मेरा यह शौक पूरा करोगे?’’

‘‘हां, बिलकुल. तुम अपनी दूसरी शर्त बताओ?’’ प्रेमी उतावला हुआ जा रहा था. ‘‘मुझे घूमनेफिरने का भी शौक है. क्या तुम मुझे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर घुमाने ले जाओगे? पैट्रोल पर पैसा खर्च करते वक्त अगर चीखोगेचिल्लाओगे, तो मैं तुम्हारे दिमाग की चकरी यानी पहिया घुमा दिया करूंगी,’’ प्रेमिका के गुलाबी होंठों पर फैली मीठी मुसकान में अब मजाक भी शामिल हो चुका था. ‘‘हांहां, मैं तुम्हें हफ्ते में 2-3 दिन दूर या नजदीक कहीं घुमानेफिराने ले जाया करूंगा. तुम अपनी तीसरी शर्त भी पेश करो?’’ वह बेकरार हुआ जा रहा था.

‘‘सुनो, आगे सुनो. शादी के बाद तुम मुझ से लड़ाईझगड़ा मत करना. गाली तो कभी मत देना. मैं तुम्हारे घर में जा कर कपड़े नहीं धोऊंगी. झाड़ूपोंछा नहीं लगाऊंगी. बरतन साफ नहीं करूंगी. बोलो, मेरी यह शर्त भी मंजूर है?’’ ‘‘डार्लिंग, तुम्हें कपड़े धोने, झाड़ूपोंछा लगाने, बरतन साफ करने का काम नहीं करना पड़ेगा. हमारे घर में ये सब काम एक बाई करती है…

‘‘हां, यह बताओ कि चाय या कौफी बना कर पिला दिया करोगी? खाना बना कर खिला दिया करोगी? कहीं बेलन का इस्तेमाल एक मिसाइल की तरह तो नहीं किया करोगी?’’ ‘‘मेरे महबूब, मैं उन मौडर्न लड़कियों में से नहीं हूं, जिन्हें चायकौफी बनाना नहीं आता. खाना पकाना नहीं आता. जिन का पकाया भोजन खा कर कोई भी बीमार हो जाए.

‘‘मैं ने अपनी मरजी से खाना वगैरह बनाने का काम अच्छी तरह सीखा हुआ है. बड़ेबड़े शैफ भी मेरी मम्मी का मुकाबला नहीं कर सकते.’’ ‘‘यों तो प्यारमुहब्बत में कोई शर्त नहीं होनी चाहिए. खैर… तुम्हारी कोई और शर्त हो, तो वह भी बताओ?’’ अपनी होने वाली सास की तारीफ सुन कर प्रेमी जैसे जलभुन गया था. उस की आवाज ही बदल गई थी. आवाज में खनक जैसे कहीं खो गई थी.

प्रेमिका सतर्क हुई, ‘‘क्या हुआ? अभी से रंग बदलने लगे? मेरी शर्तें सुनसुन कर बेचैन क्यों हो रहे हो? ऐ मेरे जानू, आजकल घर बसाना खालाजी का घर नहीं है कि कोई भी मुंह उठाए इस में घुसा चला आए.’’ प्रेमिका ने चुटकी लेते हुए आगे कहा, ‘‘मेरी अगली शर्त यह है कि मुझे मेकअप करने का बढि़या व महंगा सामान ले कर दिया करोगे या मुझे खुद खरीदने दिया करोगे. मुझे सजनेसंवरने का भी बहुत ज्यादा शौक है. मंजूर है?’’

‘‘तुम अपना यह शौक भी बेफिक्र हो कर हमारे घर में पूरा कर सकती हो. तुम कहोगी, तो मैं आसमान के तारे तोड़ कर तुम्हारी मांग में सजा दिया करूंगा, मेरी जानेमन. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं.’’ ‘‘देखो, फिल्मी डायलौग बोल कर मुझे लुभाने की कोशिश मत करो. यों भी मुझे मक्खनबाजी पसंद नहीं है. इस से दिमाग मोटा हो जाता है. यह तो शादी के बाद ही पता चलेगा कि तुम्हारा मेरे प्रति प्यार और लगाव कितने साल तक पूरे रंग में कायम रहता है.

‘‘कई मर्दों का प्यार घटिया और सस्ते मेकअप के सामान की तरह जल्दी फीका पड़ जाता है, बल्कि ऐक्सपायरी दवा की ऐलर्जी की तरह तड़पाने लगता है, सताने लगता है.’’ ‘‘ऐ मेरी महबूबा, कैसी बातें करती हो? मैं दूसरे मर्दों जैसा नहीं हूं. मुझ पर भरोसा रख कर अपनी अगली शर्त भी लगे हाथ पेश करो?’’

‘‘मुझे लैपटौप और स्मार्ट फोन पर अपनी फ्रैंड्स के साथ चैटिंग करने से न तो तुम रोकोगे और न ही तुम्हारे परिवार का कोई और सदस्य ऐसा करेगा. बोलो, मंजूर है?’’ ‘‘हां, मंजूर है. आगे बोलो?’’ प्रेमी ने पूरा मुंह खोल कर उबासी लेते हुए कहा. अपनी प्रेमिका की शर्तें सुनसुन कर उस के कानों में ‘सांयसांय’ की आवाज गूंजने लगी थी.

‘‘मैं ने अपने घर में रूखासूखा भोजन कभी नहीं खाया. दालें व सब्जियां महंगी होने के बावजूद तुम रोज बदलबदल कर चीजें लाया करोगे. और हां, साथ में अदरक, धनिया, टमाटर व सलाद का सामान भी. बिना सलाद के भोजन का क्या स्वाद?’’ ‘‘हमारा पूरा परिवार बेशक भूखे पेट रहे, लेकिन तुम्हें खानेपीने को मिलेगा.’’

‘‘शाबाश, मेरे प्रेमी. तुम सचमुच मुझे बहुत ज्यादा प्यार करते हो,’’ खुशी में प्रेमिका ने उसे चूम लिया. प्रेमी के मन में तरंगें पैदा हो गईं. पूरे तन में जैसे बिजली का हलका सा करंट दौड़ गया. प्रेमी के प्यार के लोहे को गरम देख कर प्रेमिका ने घर में एयरकंडीशनर फिट कराने की शर्त भी रख दी.

यह शर्त सुन कर प्रेमी के लहू में आया उबाल ठंडा पड़ गया. वह उस के पास से झट उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘तुम्हारी बाकी सभी शर्तें मुझे स्वीकार हैं, लेकिन एयरकंडीशनर फिट कराने वाली शर्त मंजूर नहीं, क्योंकि बिजली इतनी ज्यादा महंगी हो चुकी है कि लोग पंखेकूलर चलाने में भी डरने लगे हैं. ‘‘बिजली के भारीभरकम बिल अदा करने में नाकाम रहने पर मेरे पापा घर छोड़ कर कहीं चले गए हैं. लाख ढूंढ़ने पर भी वे आज तक हमें नहीं मिले. मेरी मम्मी का रोरो कर बुरा हाल हो गया. क्या तुम चाहती हो कि शादी के बाद मैं भी घर छोड़ कर चला जाऊं और फिर कभी वापस न आऊं?’’

अब प्रेमिका का उतरा चेहरा देखने लायक था. Short Story in Hindi

Comedy Story in Hindi : जागो ठेकेदार लगी है कतार

Comedy Story in Hindi. शनिवार की एक रात. रेलवे प्लेटफार्म पर गहमागहमी का माहौल. सैकड़ों लोग ट्रेनों से उतर रहे थे या फिर ट्रेन पकड़ने का इंतजार कर रहे थे. पर एक जगह नजारा कुछ और ही था. वहां लोग कतार लगाए खड़े थे. यह उन के लिए शनि की साढ़ेसाती का प्रकोप था या और कुछ, पता नहीं.

जिस काम के लिए वे सब कतार में खड़े थे, वह ऐसा कुदरती काम है जिसे नित्यक्रिया कहते हैं. मतलब, वे मुंबई सैंट्रल टर्मिनल पर बने एक शौचालय के बाहर खड़े थे.

वैसे, ‘आप कतार में हैं’ की आवाज तभी अच्छी लगती है जब आप सामान्य हालात में होते हैं या फिर कोई मीठी आवाज की औरत ऐसा बोलती है. शौचालय की कतार में खड़े हो कर किसी को यह सुनना अच्छा नहीं लगेगा.

हुआ यों कि शौचालय के मुलाजिम और ठेकेदार रेलवे की चादरें ‘चादर बिछाओ बलमा…’ गीत गाते हुए रेलवे के कंबल ओढ़ कर निद्रा देवी के आगोश में चले गए. इधर शौच के लिए जाने वाले लोग कतार में लगे अपने आगे के लोगों को गिनते रहे और अंकगणित के सवाल हल करते रहे कि अगर एक आदमी को शौच करने में तकरीबन 5 मिनट लगते हैं तो उन के आगे खड़े 7 लोगों को कितना समय लगेगा और उन के लिए वह सुनहरा वक्त कब आएगा जब वे खुद को एक बहुत बड़े तनाव से मुक्त कर सकेंगे.

वे बारबार अपनी जेब में रखा 2 का सिक्का छू कर तसल्ली कर रहे थे कि ऐन वक्त पर छुट्टे न होने के चलते उन्हें फिर से कतार में न लगना पड़े.

चाहे सदी के महानायक कहते रहें कि ‘अब इंडिया शौच करेगा तो दरवाजा बंद कर के’, पर शौचालय के अंदर जा कर कोई दरवाजा बंद कर के ही सो जाए तो इंडिया शौच कैसे करेगा? हांय? ऐसे में तो शौचालय तो शयनालय यानी सोने की जगह बन जाएगा.

बेचारे शौच के मारे मुसाफिरों का ‘तेरे द्वार खड़ा इक जोगी…’ गातेगाते गला बैठ गया. सिक्के को दबातेदबाते हाथ में छाले पड़ गए, पर दरवाजा अली बाबा के खजाने के दरवाजे की तरह खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था.

उस दरवाजे को खोलने का ‘खुल जा सिमसिम’ टाइप कोडवर्ड क्या था, किसी को नहीं पता था. रेलवे के अफसरों से शिकायत करने पर शौच जाने वालों को कभी इस अफसर के पास तो कभी उस अफसर के पास भेजा जाता रहा.

अब सोचिए कि उन भुक्तभोगियों की क्या हालत हो रही होगी. ऐसे विकट हालात में 2-4 कदम चलना भी मुश्किल होता है और उन बेचारों को दरदर की ठोकरें खानी पड़ रही थीं.

अब भैया, कुछ इमर्जैंसी वाले काम ऐसे होते हैं जिन की जरूरत कभी भी पड़ सकती है और हलका होना भी उन में से एक है.

कहा भी गया है कि ग्राहक, मौत और शौच कभी भी आ सकता है. वैसे कहा सिर्फ ग्राहक और मौत के लिए गया है, पर अभी भी देश में विकास पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, इसलिए शौच को मौत के साथ जोड़ कर कहावत का विकास किया गया है.

जब गाड़ी 24 घंटे चलाते हो, मुसाफिर 24 घंटे रेलवे स्टेशन पर आजा सकते हैं, तो शौचालय को कैसे बंद कर सकते हो?

यह कहां का नियम है कि रात के 12 बजे से सुबह के 5 बजे तक शौच नहीं कर सकते? अब लगता है कि शौच घोटाला भी कुछ दिनों में सामने आएगा. शौचालय के ठेकेदार लोग, आप अपनी रोजीरोटी पर खुद क्यों रोक लगा रहे हो?

जिस तरह ‘पैसे लो जूते दो’ की रट दुलहन के देवर लगाते हैं, उसी तरह एक शौच जाने वाले की यही गुजारिश है, ‘वाईफाई ले लो, पर शौचालय दे दो…’  Comedy Story in Hindi

Funny Hindi Story : यहां मना है- ऐसा क्या हुआ साहब के साथ

Funny Hindi Story: हम ने घर के दरवाजे पर खड़े तीनों पुलिस वालों की ओर एक नजर बारीबारी से देखा.

‘‘यों उल्लू की तरह आंखें न घुमा… हमारे साथ थाने चल,’’ नुकीली मूंछों वाले एक कांस्टेबल ने कहा.

‘‘थाने में…’’ हम ने हैरानी से पूछा.

‘‘थाने नहीं तो क्या

हम तुझे होटल ले कर चलेंगे,’’ बड़ी दबंग आवाज में सबइंस्पैक्टर गुर्राया.

‘‘मगर, मेरा कुसूर क्या है?’’ हम ने सवाल किया.

‘‘बताऊं तेरा कुसूर…’’ सबइंस्पैक्टर फिर से गुर्राया.

हमारा कुसूर केवल इतना था कि महेशजी की बात मान कर ‘किराए के लिए खाली’ का बोर्ड लिखवाने के साथसाथ अपने नए मकान के कोने वाली दीवार पर पेंटर से ‘यहां पेशाब करना मना है’ भी लिखवा दिया था. फिर तो मुसीबतों का सिलसिला शुरू हो गया था.

दूसरे दिन जब हम किसी किराएदार की राह ताकने को अपने मकान पर पहुंचे तो देखा कि कोने वाली दीवार के पास की धरती बगैर बारिश के गीली थी. जगहजगह लंबीलंबी धारें बनी हुई थीं.

हम अभी दीवार पर लिखी मनाही वाली चेतावनी पढ़ ही रहे थे कि एक महाशय जल्दी से आए और हम से थोड़ा हट कर पीठ फेर कर बैठ गए.

‘‘अरेअरे रुको… यह क्या कर रहे हो?’’ हम चिल्लाए.

उन्होंने खुद रुकने के बजाय हमें हाथ से रुकने का इशारा किया और कुछ देर बाद काम निबटा कर मुसकराते हुए हमारे सामने खड़े हो गए.

‘‘आप ने पढ़ा नहीं, यह क्या लिखा है?’’ हम ने दीवार की ओर उंगली उठा कर इशारा किया.

‘‘भाई साहब, आप के इस नोटिस बोर्ड को पढ़ कर ही मुझे एहसास हुआ कि मैं ने काफी देर से यह ‘नेक’ काम नहीं किया. इस नोटिस को पढ़ने के बाद मुझे अपनेआप पर काबू रखना मुश्किल हो गया,’’ उन्होंने दांत निकालते हुए बेशर्मी से कहा.

उस दिन हम ने देखा कि न जाने कहांकहां से लोग आआ कर हमारे घर की दीवार की सिंचाई करते रहे. कुछ तो इतने बेशर्म निकले कि रिकशा रुकवा कर हमारी दीवार तर कर गए.

शाम को हम ने महेशजी से इस बारे में बात की, तो वह पेंटर से मिलने फौरन ही चले गए. दूसरे दिन हमारी दीवार पर लिखा था, ‘यहां कुत्ते पेशाब करते हैं’. फिर तो दीवार के सामने कई पालतू और आवारा कुत्ते लाइन में लगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे.

थोड़े ही फासले पर कुछ साहब टाइप लोग अपने हाथों में कुत्तों की जंजीरें लटकाए गपशप कर रहे थे. हमें देखते ही एक साहब हमारे करीब आए और बोले, ‘‘जैंटलमैन, आप ने हम लोगों की बहुत बड़ी समस्या हल कर दी है.’’

‘‘जी… क्या…’’ हम ने कुछ न समझते हुए कहा.

‘‘महल्ले वालों को पार्क में कुत्तों को घुमाने पर बहुत एतराज था, मगर आप ने सब का मुंह बंद कर दिया.’’

हमारा दिल चाहा कि उन के हाथ से कुत्ते का पट्टा छीन कर उन के गले में डाल कर उन को दीवार के पास ले जाएं और कहें कि अपने कुत्ते के साथसाथ आप भी अपना शौक पूरा कर लें. मगर कुत्तों और उन के मालिकों की तादाद देख कर मन मसोस कर रह जाना पड़ा. शाम को हम ने फिर महेशजी के घर का दरवाजा खटखटाया. वे उसी समय अपना स्कूटर निकाल कर पेंटर की दुकान की ओर उड़ चले.

अगले दिन जब हम ने दीवार पर नजर डाली, तो वहां लिखा था, ‘गधे के पूत, यहां मत मूत’.हम महेशजी की अक्ल पर गर्व कर उठे और इस मुसीबत से छुटकारा पा कर दिल ही दिल में खुश होने लगे.

हम पूरी तरह खुश भी न होने पाए थे कि एक हट्टेकट्टे पहलवान टाइप साहब गुस्से से आंखें लाल किए मुंह से झाग छोड़ते हुए आए और हमारी कमीज का कौलर खींच कर बोले, ‘‘तुम ने मुझे गाली क्यों दी?’’

‘‘पहलवानजी, मैं ने तो आप को कभी देखा तक नहीं. आप को गलतफहमी हुई है,’’ कहते हुए हम ने कौलर छुड़ाने के लिए जोर मारा, तो कौलर चर्र से फट गया.

वे साहब हमें कौलर से पकड़ कर खींचते हुए दीवार के पास ले आए और दहाड़े, ‘‘तुम ने मुझे गाली बक कर नहीं, लिख कर दी है,’’ और दीवार पर लिखे नोटिस की ओर इशारा किया.

हम ने एक नजर नोटिस बोर्ड पर और दूसरी दीवार के पास ताजाताजा बनी बलखाती लकीर की ओर डाली. उस के बाद उन की ओर देखा और कहा, ‘‘तो आप यहां बैठे ही क्यों थे? पढ़ेलिखे हो कर जाहिलों जैसी हरकत क्यों की?’’

‘‘पढ़ने की फुरसत किसे थी और जब पढ़ा तो देर हो चुकी थी.’’

‘‘आगे से पहले ही पढ़ लिया करना,’’ हम ने कहा.

‘‘आगे से पढ़ने की नौबत ही नहीं आएगी,’’ उन्होंने कहा. फिर पास पड़ा हुआ ईंट का टुकड़ा उठा कर दीवार पर लिखे नोटिस को रगड़रगड़ कर बिगाड़ने के बाद वे चले गए. हम ‘अरेअरे’ कहते रह गए.

शाम को महेशजी हमारा हाल और अपने ‘नोटिस’ का कमाल जानने के लिए आए और दीवार पर नजर डालते ही सब समझ गए.

उन्होंने हमें स्कूटर के पीछे बिठाया और पेंटर की दुकान की तरफ चल दिए.

अगले दिन दीवार पर नया नोटिस था, जिस में ‘इस जगह पर…’ के साथ कानूनी कार्यवाही करने की धमकी भी लिखी थी. ‘‘अब यहां सब ठीक रहेगा,’’ कह कर महेशजी ने हमारा कंधा थपथपाया.

उसी समय स्कूटर पर सवार कोई अपटूडेट नौजवान आया और स्कूटर को स्टैंड पर लगा कर हमारी और महेशजी की ओर पीठ फेर कर दीवार के पास जा कर चालू हो गया.

हम ने महेशजी का कंधा हिला कर उन्हें उस स्कूटर वाले की ‘हरकत’ दिखाई. वह हमारा हाथ थाम कर उस के स्कूटर के पास जा कर खड़े हो गए.

वह नौजवान मुसकराता हुआ हमारे पास आ कर खड़ा हो गया.

‘‘क्यों भाई, तुम ने वह चेतावनी नहीं पढ़ी?’’ हम ने सख्ती से पूछा.

‘‘तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो सकती है. तुम्हें पुलिस के हवाले किया जा सकता है…’’ महेशजी गुर्राए, ‘‘तुम गिरफ्तार किए जा सकते हो.’’

‘‘भाई साहब, मैं खुद पुलिस में हूं,’’ कह कर वह मुसकराया, ‘‘मैं आप से यह जानना चाहता हूं कि अगर आप किसी ऐसे मुलजिम को हमारे पास ले कर आते हैं, तो हम लोग उस के खिलाफ कौन सी धारा लगाएं?’’

महेशजी हमारी तरफ और हम महेशजी की तरफ ताकने लगे.वह पुलिस वाला अपने स्कूटर को ‘किक’ मार कर सवार हो गया और हाथ हिलाते हुए चल दिया.

‘‘घबराओ नहीं, इस बार ऐसा नोटिस लिखवाऊंगा कि कोई भी आप की दीवार के पास बैठने की जुर्रत नहीं करेगा,’’ कह कर महेशजी ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया.

अगले दिन दीवार पर नया नोटिस था, ‘यहां पर छिपे हुए मूवी कैमरे से आप की फिल्म उतारी जा रही है’. इस नोटिस ने सचमुच कमाल का काम किया. हम ने कई लोगों को दीवार के पास आते, वहां बैठते और फिर नोटिस पर नजर पड़ते ही एकदम से उठ कर भागते हुए देखा. हम लोगों की बदहवासियों पर मुसकराते हुए महेशजी की अक्ल की दाद देने लगे.

‘‘ऐ भाई… क्या सोच रहा है? दरवाजे को ताला लगा और हमारे साथ थाने चल,’’ एक कांस्टेबल ने हमें पुरानी यादों से झकझोरा.

‘‘मगर, मेरा कुसूर क्या है?’’

‘‘कुसूर पूछता है?’’ सबइंस्पैक्टर ने हमारी ओर देखते हुए कहा, फिर अपने साथ खड़े कांस्टेबल की ओर मुंह फेरा, ‘‘मांगेराम, इस का कुसूर बता तो.’’

‘‘तेरा कुसूर यह है…’’ मांगेराम ने कहा, ‘‘कि तू ब्लू फिल्में बनाता है.’’

‘‘ब… ब्लू फिल्में. यह क्या कह रहे हैं आप?’’ हम ने हैरानी से कहा.

‘‘हम नहीं कहते…’’ दूसरे कांस्टेबल ने गरदन हिलाई.

‘‘तो फिर किसी ने आप को सरासर गलत सूचना दी है,’’ हम ने समझाया.

‘‘अरे, गलती किसी और को पढ़ाना. अपने घर की दीवार पर इतना बड़ा इश्तिहार लगवा रखा है और कहता है कि हमें गलत सूचना मिली है. तू थाने चल, तेरी गलती हम सुधारेंगे,’’ कह कर सबइंस्पैक्टर ने हमें धकेल दिया. Funny Hindi Story

Story in Hindi : देश की माटी पुकारे

Story in Hindi. कई सालों के बाद मुझे विदेश जाने का मौका मिला था. जाहिर है कि बाहर भी देशी आदतें दिलोदिमाग पर छाई हुई थीं. अपने देश की मिट्टी की बात ही निराली है और उस से ज्यादा निराले इस मिट्टी के लोग. हमारा तो कतराकतरा इस से बना हुआ है. देश की मिट्टी और यहां के लोगों को खूब याद किया.

आप कहेंगे कि इस में खास बात क्या है. आदमी घरपरिवार, राज्य, गांवखेड़े, कसबेशहर, देश से दूर जाएगा, तो इन की याद तो आएगी ही. वैसे ही जैसे पत्नी से दूर जाओ, तो उस की याद आती ही है.

यह बात अलग है कि पतिपत्नी साथसाथ ज्यादा देर बिना खटपट के रह नहीं सकते हैं. उस समय तो ऐसा लगता है कि कुंआरे रह कर अलग ही रहते, तो अच्छा रहता. यह हम अपनी नहीं आप की बात कर रहे हैं. हमारी तो शादीशुदा जिंदगी बहुत सुखी है. वैसे, हर आम पति यही सोचता है, आप भी और मैं भी. अब परदेश में देश की याद कैसेकैसे आई, यह थोड़ा सुन लें, तो आप के परदेश जाने पर काम आएगा.

परदेश में 15 दिन बीत गए थे. हमें यूरोप में एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला, जो सड़क पर कहीं खड़े हो कर देशी ढंग से हलका हो रहा हो. कहां अपने देश में हर गलीनुक्कड़ में ऐसे लोगों के चाहे जब दर्शन हो जाते थे और यहां एक अदद आदमी का टोटा पड़ा था.

हम ने सोचा कि सच में भारत ऐसे ही ‘विश्व गुरु’ नहीं कहलाता है. ये देश भले ही अपने को धनी समझते हों, लेकिन कई मामलों में कितने दरिद्रनारायण हैं. यहां हमारे वहां जैसा एक भी आदमी नहीं है.

यहां के रेलवे स्टेशन का खालीपन देख कर जी भर आया. आदमी नहीं दिख रहे थे. रेलें खाली चलती थीं. एक कंपार्टमैंट में मुश्किल से 4-5 लोग मिलते थे. वे भी ऐसे बैठते थे कि एकदूसरे से कोई मतलब नहीं. जैसे दुश्मन देशों के नागरिक हों.

यह देख कर हम तो अंदर से टूट से गए. अपने यहां तो मूंगफली, पौपकौर्न बेचने वाले, कागज के टुकड़ों, बीड़ीसिगरेट के ठूंठों, पानी की खाली बोतलों, गुस्से से भरे लोगों से ठसाठस भरी ट्रेन में धक्कामुक्की करते, लड़तेभिड़ते, फिर दूसरे पल आपस में प्यार करते, बतियाते, ठहाके लगाते, सरकार को कोसते लोग हर जगह मिलते हैं.

हम ने देखा कि ट्रेन में टीटीई के पीछे एक भी आदमी नहीं भाग रहा था. सोचा कि यह टीटीई कैसे अपना व बच्चों का पेट पालता होगा. वैसे, हमारे पास टिकट था, लेकिन हम खुद को रोक नहीं पाए. हम ने अपने बटुए से सौ डौलर का एक नोट निकाल कर ऐसे हवा में लहराया कि उस की नजर पड़ जाए और वह आ कर अपना काम कर जाए, लेकिन वह तो उलटा नाराज हो गया.

हम ने किसी तरह अपनेआप को इस आफत से छुटकारा दिलाया.यहां की सड़कों पर घूमे तो मायूसी हुई. न चाट के ठेले, न पानसिगरेट के, न चाय के, न पापड़ बेचने वाला, न चना जोर गरम बाबू वाला कोई और. कोई भीड़भाड़ भी नहीं.

हमारे यहां जब तक भीड़ का रैला न दिखे, किसी रैली में सड़क जाम में न फंसे, तब तक मजा ही नहीं आए.

और तो और, ट्रैफिक सिगनल 2 मिनट का भी हो, तो कोई उसे तोड़ते हुए अपने यहां जैसा नहीं दिखा. पूरे 2 मिनट तक आराम से इंतजार करता. हम तो बड़े मायूस हुए.

यहां के लोग जानवर प्रेमी बिलकुल नहीं लगे. वजह, किसी सड़क पर कुत्ते, बकरियां, गायभैंस, बैल यहां तक कि सूअर भी नहीं मिले. जानवरों की इतनी अनदेखी हम ने नहीं देखी. हमारे लोग तो स्टेशन व बस स्टैंड पर बिना इन के रह ही नहीं सकते. ‘पीटा’ वाले पता नहीं, हमें अवार्ड देने में इतनी देर क्यों कर रहे हैं. असली ‘एनीमल लवर’ हम ही हैं.

वहां के बाजार में मुर्दनी छाई सी लगी. कोई खास भीड़ नहीं. कोई खुला सामान नहीं. हर सामान डब्बाबंद. कुछ खरीदो या कुछ दाम कम करने की बात करो, तो अजीब सा मुंह बनाए सेल्समैन. मजा ही नहीं आया खरीदारी करने में.

सर्दीखांसी होने पर हम एक मैडिकल स्टोर में दवा लेने गए, तो उस ने बिना डाक्टर की परची के दवा देने से इनकार कर दिया. हमें तुरंत अपने वतन की दुकानें याद आईं. चाहे जो दवा बिना परची के झट से ले लो और कैमिस्ट भी डाक्टर की कमी अपनी सलाह दे कर पूरी कर देता था. हम ने मन में फिर दोहराया कि हम यहां नहीं रह पाएंगे.

यहां के एक दफ्तर में हमें एक काम से जाना पड़ा, तो बड़ा अजीब सा लगा. यहां के साहब के कमरे के बाहर कोई चपरासी नहीं मिला, जो कान में पैन डाल कर मैल निकाल रहा हो या तंबाकू मलते पंजे बजा रहा हो. दफ्तरों में कहीं भी न कोई कागज दिखा, न फाइलों के अंबार, न टैग उलझे हुए, न धूल खाते बस्ते. न पान की पीक का निशान ही दिखा.

हम ने सोचा, ‘बहुत बंदिशें लगा रखी हैं. यहां जरूर तनाव में खुदकुशी के मामले ज्यादा तादाद में होते होंगे. हमारे यहां तो कोई बंदिश नहीं है, जिस को जो आता है, वह करने से उसे रोका नहीं जाता.

‘पान की पीक थूकने की, हलका होने की, गालीगलौज करने की, नाककान में उंगली डालने की, बाल व खोपड़ी खुजलाने की, सरकार व महंगाई को कोसने की कोई मनाही नहीं है.’

हम 20 दिन में ही विदेश से ऊब गए. सड़क के न तो बीचोंबीच में और न ही किनारे कहीं धार्मिक स्थल दिखे और न बतियाने वाले लोग. हम ने तो मन भर जाने से टिकट कैंसिल कर हफ्ते भर पहले का टिकट बनवा लिया और अपनी माटी की ओर लौट चले.

दिल्ली एयरपोर्ट से उतर कर हम ने अपने शहर की ट्रेन पकड़ने की सोची. दिल्ली स्टेशन पर पहुंचते ही भीड़ देख कर हमारा दिल बागबाग हो गया. रात में घर पहुंचे, तो और बागबाग हो गया. ट्रेन के चूहों ने सूटकेस में 2 जगह छेद कर अपनी भूख शांत कर ली थी. हमारा बटुआ भी किसी ने पार कर ‘वैलकम बैक’ की परची जेब में उस की जगह रख दी थी. हम अपने देश जो आ गए थे. story in hindi

Funny Hindi Story : एक अनार सौ बीमार

Funny Hindi Story. खातेपीते खुशहाल घरों की सुंदर, स्लिम, स्मार्ट और पूरी दुनिया को ठेंगे पर रखने की कूवत वाली भरीपूरी स्त्रियां स्कूटर या कार चलाना सीखें, इस से अच्छी बात नहीं हो सकती. अपनी श्रीमती की 2 दर्जन से ऊपर कच्चीपक्की सुंदर, सलोनी और चुस्तचालाक सहेलियों को स्कूटर, कायनी और कार सिखाने का श्रेय इस महाबदौलत को जाता है. सब तरफ स्कूटर सीखने की धुन सवार थी और हम में भी अजीब सी सनक थी कि घरबाहर सबकुछ भुला कर चुलबुली व हसीन अप्सराओं को स्कूटर सिखाते रहो, बस.

हमारा तो सिद्धांत था कि न जाने किस भेस में मिल जाएं भगवान. एक लेडी अगर स्कूटर सीखने में दक्ष हो गई तो 2 दिन पहले ही किसी दूसरी जगह से संदेश आ जाता और हम अपना फटीचर सा स्कूटर उठा कर सुबहसुबह उधर लपक लेते. अंधे को और चाहिए भी क्या-2 आंखें. हुस्न का जादू हमारे चारों ओर बिखरा रहता और हमारी आंखें तृप्त रहतीं. जानकार लोग अच्छी तरह जानतेसमझते हैं कि स्कूटर सीखना और सिखाना बहुत मेहनत, लगन और सब्र के काम हैं. सीखने वाली अगर नादान, फक्कड़ और अल्हड़ स्त्री हो तो मामला और भी पेचीदा व जिम्मेदारीवाला हो जाता है.

जरा सी घबराहट, हड़बड़ी या जल्दबाजी सीखने वाली की टांगें या बाहें तुड़वा सकती है. बड़ी सावधानी से हर दिशा में कदम बढ़ाया जाता है. हम 1-2 हफ्ते तक सीखने वाली की तरफ मंदमंद मुसकराहट फेंकते हैं. उस की सुंदरता की तारीफ में ऊंचेऊंचे जुमले फेंकते हैं, जैसे परसों तुम्हारा पीकौक ब्लूसूट गजब ढा रहा था या तुम्हारी नाक पर छोटा सा डायमंड का कोका बहुत जंच रहा है. हैरानी तो हमें तब होती जब वह स्त्री हमारे तारीफ के अनुरूप ही कपड़े व गहने पहनने लगती. और भी कई तरह के टैस्ट हम उन पर करते तब जा कर इश्क में कुछ निखार आता. अब और क्याक्या बताएं. इतने पतले पापड़ बेलबेल कर हमारी कमर टूट जाती मगर कई चुस्त व चंट लेडी ‘थैंक्यू, भाईसाहब’ कह कर ये जा और वो जा, निकल लेती. बहुत बार तो अंधे के पैरों तले बटेर खुद ही आ गिरता और कई बार पहाड़ खोद डालते पर मरा हुआ चूहा भी हाथ न लगता. माया महाठगनि हम जानि.

स्त्रियों में भेड़चाल बहुत होती है. जहां 4 सहेलियां जुड़ीं, वहीं यह प्रश्न उछलता था, ‘अरे मोना, तूने तो कमाल कर दिया. मैं ने सुना कि कल मेघा की किट्टी पार्टी में तू अकेली कायनी चला कर इतनी दूर से आई. तुम्हारे तो पंख लग गए. कोई रोकनेटोकने वाला नहीं. तेरा तो अच्छा सोशल सर्कल बन जाएगा. हम तो ज्यादातर घर में बैठी कुढ़ती रहती हैं. स्कूटर व कायनी तो हमारे घर में भी खड़े हैं मगर कोई चलाना सिखाए तब न? हम तो पति के मुहताज हो कर 2-4 जगह चली भी जाएं तो क्या खाक मजा आता है. तेरी तो समय ही पलट गया. सच्ची बता, तूने कायनी चलाना कब सीखा, किस ने सिखाया, लाइसैंस कहां से बनवाया?’

उत्तर मिलता, ‘अरे, वो हैं न स्वीटी के हस्बैंड, उन की जानपहचान बहुत है. मेरा ड्राइविंग लाइसैंस भी घर बैठे ही बन गया. बहुत प्यार से स्कूटर चलाना सिखाते हैं. हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा. हैं भी बड़े स्मार्ट और समझदार.’ उन सुस्तीभरे सस्ते दिनों में अपने पास एक पुराना सा खटारा स्कूटर था और मन में ढेर सारी बेईमानी व बेशर्मी थी. अपना एक सूत्रीय आदर्श वाक्य था-फालतू का कोई लोचा नहीं. प्यारमुहब्बत के बदनाम पचड़े में हम नहीं पड़ते थे. स्त्री अगर स्कूटर सीखने के दौरान देहस्पर्श के सुख से हमें महरूम न करे तो समझ लो हमारी गुरुदक्षिणा वसूल हो गई. और अगर कोई सडि़यल जलकुकड़ी बातबात पर विरोध व्यक्त करे तो फिर सारी उम्मीदें अगले उम्मीदवार पर रखनी पड़ती हैं.

हमारी श्रीमती ताने देदे कर थक गई, ‘बच्चों के स्कूल की रिपोर्ट देखी है कभी आप ने. मर कर पास होते हैं. मैं सब जानती हूं कि आजकल आप क्याक्या और कहांकहां गुल खिला रहे हैं. घर के काम को छोड़ कर मेरी सहेलियों को स्कूटर सिखाने के बहाने गुलछर्रे उड़ाते फिरते हैं आप. कितनी शर्म आती है मुझे जब लोग ताना देते हैं कि तुम्हारे पति को कोई और कामधंधा नहीं है आजकल. जब देखो गांधी ग्राउंड या नेहरू पार्क में लोगों की पत्नियों को स्कूटर सिखा रहे होते हैं. प्यार अंधा होता है मगर पड़ोसी तो अंधे नहीं होते.’

सबकुछ चुपचाप सहना पड़ता है. प्यार के मामले में कितनी भी गोपनीयता रख लो मगर इश्क और मुश्क कहां छिपते हैं. अब ओखली में सिर दे ही दिया हो तो फिर मूसलों से क्या डरना. उन दिनों नारीमुक्ति आंदोलन अपने चरम पर था. स्त्रीमुक्ति का सब से प्रभावशाली प्रतीक था- स्कूटर. अर्थात घर की चारदीवारी से विद्रोह. स्कूटर सीखने की अदम्य इच्छा रखने वाली नवयौवना का सब से अधिक विरोध उस का पति तथा विशेषरूप से उस की सास करती थी. उन्हें डर था कि स्कूटर सीखा नहीं कि बंद पिंजरे की चिडि़या आजाद हो जाएगी. काबू में नहीं रहेगी. जाएगी कहीं और आ कर बताएगी कि मंदिर गई थी.

जब भी कोई सुकुमारी स्कूटर सीखने की जिद करती तो उसे एक ही रटारटाया उत्तर मिलता था, ‘क्या करोगी इस उम्र में स्कूटर सीख कर? तुम को कौन सा दफ्तर, स्कूल या कचहरी जाना है. वैसे भी तुम्हारे बेटे बबलू को तो चलाना आता ही है. वही ले जाएगा तुम्हें बाजार. फिर तुम्हें स्कूटर सिखाएगा कौन? मालूम है लाइसैंस बनवाने में कितने झंझट हैं. पहले 6 महीने तक कच्चा बनवाओ और फिर डीसी दफ्तर में जा कर पुलिस वालों को टैस्ट दो. बबलू तो ट्यूशन के चक्कर में इधरउधर भटकता है और तुम्हारे पति सुरेश को तो दुकान से ही फुरसत नहीं है. फिर तुम्हें स्कूटर चलाना सिखाएगा कौन?’ पूरे महल्ले में एकमात्र मैं ही ऐसा नायक था जिस के पास इस कौन का उत्तर था और बड़ा संतोषजनक उत्तर था. मैं कोई कमउम्र का लंपट भी नहीं था कि लोगों को बेवजह शक हो. अच्छाखासा इज्जतदार और अधेड़ पक्की हुई उम्र का संजीदा आदमी था मैं. स्त्रियों की राय तो मैं नहीं जानता मगर आसपास और जानपहचान के आदमी मुझे औसतन अच्छी नजर से देखते थे. इसलिए स्त्रियों के मामले में मेरी साख अच्छी थी.

मुझे न तो दफ्तर जाना होता था और न किसी दुकान पर. मांबाप की अच्छीखासी जायदाद थी जहां से अच्छा किराया आ जाता था. इधर मैं ने समय पर ज्योतिष विज्ञान में डिगरी प्राप्त कर ली थी. अच्छे मोटे ग्राहक चंगुल में फंस जाते थे. अपनी व्यस्त दिनचर्या में से स्कूटर सिखाने के लिए समय हम निकाल ही लेते थे.

सिखाने वाला एक था और सीखनेवालियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही थी. एक अनार और सौ बीमार वाली अजीब अटपटी स्थिति थी. फिर भी हम खुश थे. अभी एक शोख हसीना को स्कूटर चलाना सिखा रहे होते तो दूसरी जगह से किसी मित्र या परिचित का फोन आ जाता, ‘यार, मेरी पत्नी कई दिनों से मेरे पीछे पड़ी है. मैं ने उस से वादा किया है कि नया कायनी ले कर दूंगा. तुम्हारे पास वक्त है, स्कूटर चलाना सिखा दो उसे. लाइसैंस भी बनवा देना. खर्चा मैं दे दूंगा. तुम्हें तो पता ही है कि मैं तो टूर पर रहता हूं.’ नारीमुक्ति की इतनी तेज आंधी चल रही थी कि सुबह हम सुनीता को स्कूटर चलाना सिखाते, दोपहर को संगीता को और शाम को अनीता के पहलूनशीं होते. किसी सुपरस्टार हीरो की तरह 3-3 शिफ्टों में काम मिल रहा था हमें. हमारी तो पांचों उंगलियां घी में थीं. दुनिया के सभी गमों से बेखबर हमें बस एक ही धुन थी कि शहर की सभी चुलबुली व तेजतर्रार स्त्रियां स्कूटर चलाना सीख जाएं तथा अपनी गुलामी की जंजीरें हम से खुलवा लें.

इन दिनों हम कार चलाना सिखा रहे हैं. जिनजिन प्यारी सखियों ने हम से स्कूटर चलाना सीखा था वही अब कार चलाना भी सीख रही हैं. कल जब नारीमुक्ति आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा तब उस में हमारा नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा. हमारे कंपीटिशन में 3-4 ड्राइविंग स्कूल हैं मगर हम में और उन में जमीनआसमान का अंतर है. हम मुफ्त में सिखाते हैं और बड़े प्यार व लगन से सिखाते हैं. सारे महल्ले में सब से खटारा कार हमारे पास है. नौसिखिए को नई कार से सीखने कौन देता है भला. हमारा कलेजा और जिगर देखिए- कार हमारी, वक्त हमारा और पैट्रोल भी हमारा. जनून की हद है यह. Funny Hindi Story

Funny Hindi Story : प्राण जाए पर…सामान न जाए

Funny Hindi Story. घुमरी बाबा किसी यजमान के यहां से श्राद्धभोज का खाना खा कर और साथ ही घर वालों के लिए गठरी में खाना बांध कर अपने घर को लौट रहे थे.

उन्होंने भोज में पूरी, सब्जी, दही, लड्डू, जलेबी वगैरह चीजें खूब डट कर खाई थीं. पेट निकल कर मटका हो गया था. हाथपैर भारी लग रहे थे.

घुमरी बाबा गहरी नींद सोते थे. भरपेट खाना खाने के बाद उन की आंखें खुलनी मुश्किल हो जाती थीं. बाबा का कहना था कि ‘मर कर टर जाओ और खा कर पसर जाओ’. उस दिन भी वे रास्ते में एक पेड़ की छांव में सिरहाने गठरी रख कर पसर गए और पलभर में खर्राटे भरने लगे.

घुमरी बाबा अभी कुछ ही देर तक सो पाए थे कि कहीं से एक सांड़ आ गया और बाबा की गठरी के पास पहुंच गया. उस ने गठरी समेत उस में रखा खाना चबा लिया.

गठरी चबाते समय उस में रखी जलेबी का रस बाबा की चुटिया पर गिर गया, इसलिए उस बेशर्म सांड़ ने बाबा की चुटिया भी चबानी शुरू कर दी.

बाबा की नींद खुली, तो सिरहाने सांड़ को देख कर वे घबरा गए और धीरेधीरे गुहार करने लगे, ‘‘दुहाई प्रभु, दुहाई, जान बचा लो…’’

सांड़ ने शायद बाबा की गुहार सुन ली. उस ने चूसी हुई चुटिया को उगल दिया व अलग हट कर खड़ा हो गया.

सांड़ के अलग हटते ही बाबा उसे कोसने लगे, ‘‘यह नीच सांड़ नहीं, कुत्ता है. सांड़ जाति के लिए कलंक है.’’

सांड़ कुछ ही देर बाद पागुर करने लगा. बाबा अब वहां से खिसकने की ताक में लग गए. उन्होंने देखा कि सांड़ का सारा ध्यान पागुर करने में लगा हुआ है. घुमरी बाबा धीरे से उठ कर खिसकते हुए गांव वाले रास्ते की ओर बढ़ते गए. कुछ देर बाद बाबा ने पलट कर देखा, तो सांड़ को अपनी ओर पीछेपीछे आता हुआ पाया.

घबरा कर बाबा दौड़ने लगे. वे दौड़ भी रहे थे और पलटपलट कर बारबार पीछे देख भी रहे थे. तभी अचानक वह एक कुएं में गिर पड़े.

बाबा काफी डर गए. उन्हें लगा कि अब बचना मुश्किल है. वे किसी तरह से हाथपैर मार कर अपने को बचाने की कोशिश करने लगे.

कुएं के आसपास कुछ किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे. कुएं में किसी के गिरने की आवाज सुन कर वे गुहार लगाते हुए वहां आ पहुंचे.

गांव के और लोग भी वहां कुएं के पास पहुंच गए. कुएं का पानी काफी ऊपर तक था. उस में से हाथ बढ़ा कर भी घुमरी बाबा को खींचा जा सकता था.

कुछ लोग बाबा को बांस और रस्सी के सहारे निकालना चाहते थे, मगर कमल काका ने हाथ से खींचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. तब तक बाबा के हाथपैर भी जवाब देने लगे थे.

लोग सोच रहे थे कि अब क्या किया जाए कि तभी नागा सिंह वहां आ पहुंचा. वह काफी लंबातगड़ा था. वह तुरंत घुटनों के बल बैठ गया और कुएं में हाथ लटका कर बोला, ‘‘बाबा, अपना हाथ दो. जल्दी से अपना हाथ दो.’’

नागा सिंह बराबर कह रहे थे, मगर बाबा ने अपना हाथ नहीं दिया. तभी बाबा के एक पड़ोसी को कुछ याद आया.

पड़ोसी ने नागा सिंह से कहा, ‘‘अरे नागा भाई, घुमरी बाबा पुरोहिती करने वाले पंडित हैं. जिंदगीभर उन्होंने केवल लिया है, दिया नहीं. देने के नाम पर उन्हें कंपकंपी छूटने लगती है. वह मर जाएंगे, मगर कुछ देंगे नहीं. उन्हें अगर बचाना है, तो कहो कि बाबा, आप मेरा हाथ लो.’’

नागा सिंह ने कहा, ‘‘बाबा, आप मेरा हाथ लो, जल्दी मेरा हाथ लो…’’ और सचमुच बाबा ने लपक कर नागा का हाथ पकड़ लिया.

नागा सिंह ने सहीसलामत बाबा को कुएं से बाहर निकाल लिया. बाबा ने कुएं में से निकल कर किसी को धन्यवाद नहीं दिया, बल्कि इधरउधर ताकते हुए गाली दी, ‘‘कहां है वह सांड़ का पिल्ला? वह नीच, मेरा सब माल खा गया. पूरी, सब्जी, लड्डू, जलेबी के साथ गमछा भी खा गया.’’ Funny Hindi Story

Story in Hindi : नम: पितरायै – धर्म और कर्म का अजीब खेल

Story in Hindi . एक दिन सुबहसुबह पंडितजी दरवाजे पर आ धमके. उन के हाथ में पोथीपत्रा था. मैं डर गया. दरवाजा खुलते ही उन्होंने तकरीबन डांटते हुए कहा, ‘‘जानते नहीं आज पंचमी है?’’

‘‘पंचमी,’’ यह सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया था, ‘‘पंचमी है, तो क्या हुआ?’’

‘‘इसीलिए मैं कहता हूं घोर कलयुग है, घोर कलयुग. लोगों को अपने पितरों की फिक्र ही नहीं. एक मैं हूं, जो सब को याद दिलाता रहता हूं,’’ वे मुझे घूर रहे थे.

मैं कुछ बोलता, इस से पहले ही वे दोबारा बरस पड़े, ‘‘यह पितर पक्ष है. आज ही के दिन तुम्हारे पिता का ‘स्वर्गवास’ हुआ था, इसलिए आज के दिन तुम्हें श्राद्ध कराना चाहिए.’’

अपनी बात के सुबूत में उन्होंने मुझे पत्रा में वह दिन भी दिखाया, जिस दिन मेरे पिताजी का स्वर्गवास हुआ था. उन के रहने की जगह स्वर्ग में है या नरक में, यह मैं नहीं जानता, पर पंडितजी के पत्रे के पन्ने में पंचमी की तिथि जरूर लिखी थी. 2 महीने पहले ही तो पिताजी की मौत हुई थी.

मैं ने पंडितजी को इज्जत से अंदर बिठाया. सब से पहले उन्हें गरमागरम चाय पिलाई, फिर पूछा, ‘‘पंडितजी, आप तो बड़े ज्ञानीध्यानी हैं, कृपा कर के यह बताइए कि यह श्राद्ध क्यों जरूरी है?’’

‘‘तुम क्या वाकई कुछ नहीं जानते, इस बारे में. पितर की आत्मा इस पखवारे अपने प्रियजनों से भोजनपानी लेने के लिए बेचैन रहती है. पितर पक्ष में श्राद्ध करने से उन्हें शांति मिलती है,’’ पंडितजी ने हाथ नचाते हुए जवाब दिया, जैसे मेरे पितर उन के सामने हवा में दिखाई दे रहे थे.

मैं ने सुन रखा था कि ‘आत्मा’ कभी नष्ट न होने वाली चीज है. यह सभी चीजों से परे है. यह न जलती है, न गलती है, न सूखती है. इस पर किसी चीज का कोई असर नहीं पड़ता. फिर इसे भूखप्यास कैसे लगती है? इसे भोजनपानी की जरूरत क्यों है? यह मैं समझ नहीं पा रहा था. पर पंडितजी से बहस कर के उन्हें और गुस्सा करना नहीं चाहता था.

‘‘तो फिर मुझे क्या करना होगा, पंडितजी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कुछ खास नहीं. पास ही किसी बहती हुई नदी में पितरों की शांति के लिए तर्पण करना होगा. उस के बाद कुछ ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथसाथ दान देना होगा,’’ उन्होंने ऐसे कहा, जैसे यह कुछ भी नहीं है.

‘‘तर्पण के लिए क्या करना होगा?’’

‘‘थोड़ा सा जौ, तिल, दूध, शहद वगैरह ले लो. कुछ सामान मेरे पास है. एक लोटा ले लो और मेरे साथ चलो.’’

मैं ने उन के द्वारा बताई हुई चीजों को आननफानन इकट्ठा किया. तर्पण न कर के मैं पितरों का कोपभाजन नहीं बनना चाहता था. पता नहीं, कोई पितर कुछ नुकसान न कर डाले. जीतेजी तो पिताजी ने मुझे डांटा तक नहीं, पर अब तो उन की ‘आत्मा’ है. ‘आत्मा’ का क्या भरोसा?

खैर, मैं पंडितजी के साथ सामान को लिए नदी की ओर चल पड़ा.

नदी तट पर जा कर पंडितजी ने मुझ से कहा, ‘‘सब से पहले तुम नहा लो, उस के बाद तर्पण का काम करेंगे.’’

नदी का पानी काफी गंदा था. उस में नहाना भले ही मुझे अच्छा नहीं लग रहा था, पर तर्पण के लिए नहाना जरूरी था. किसी तरह आंख, कान और नाक मूंद कर मैं ने डुबकी लगा ही ली.

पानी पर कूड़ाकचरा, गंदगी तैरते हुए मेरे करीब से गुजर रहे थे. पर मैं मजबूर था, नाक भी मूंद नहीं सकता था. इस के बाद पंडितजी ने पानी में मिट्टी घोल कर मेरे बदन पर यहांवहां लेप दी. ऐसा करते समय वह कुछ बुदबुदा भी रहे थे.

‘‘चलो, अब इधर आओ,’’ नदी किनारे बैठते हुए पंडितजी ने कहा.

मेरे वहां आ जाने पर उन्होंने मेरी उंगली में घास की एक अंगूठी पहना दी और कहा, ‘‘यह कुश है. इसे पहनने से मन साफ होता है. इसे पहन कर किए गए वादे जान दे कर भी पूरे करने चाहिए.’’

लोग तो न वादों को निभाते हैं, न ही उन्हें सही फैसला मिलता है. पर लोग एक घास के लिए अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहते हैं. वाह रे घास.

खैर, आगे उन्होंने मुझे जौ के आटे में दूध, शहद और तिल मिला कर लड्डू बनाने को कहा.

मैं ने लड्डू बनाते हुए पूछा, ‘‘पंडितजी, इस का क्या होगा?’’

‘‘इन्हीं से तो तर्पण होगा. तुम्हारे पितरों को ये लड्डू ही मिलेंगे. सब के नाम पर एकएक लड्डू संकल्प कर बालू पर रखने होंगे.’’

ये लड्डू बालू पर ही लुढ़कते रहेंगे या मेरे पितरों के मुंह में जाएंगे, यह मैं नहीं जानता, पर इतना तो कह सकता हूं कि जीतेजी उन्होंने कभी जौ का कच्चा आटा क्या, पका आटा भी नहीं खाया. और यह भी कोई खाना था. अगर मैं जानता कि ये मेरे पितरों के भोजन हैं, तो मैं दालचावल, सब्जी पका कर न ले आता.

अब उन प्यासों को पानी पिलाना था. पंडितजी बोले, ‘‘नदी में कमर भर जल में उतर कर अंजली में भरभर कर पितरों को पानी पिलाओ.’’

यह गंदा पानी पितरों के पीने के लिए है? मुझे संकोच हो रहा था. ऐसे गंदे पानी को पी कर क्या उन्हें हैजा नहीं हो जाएगा? तब उन के लिए डाक्टर कहां मिलेगा? पहले जानता, तो घर से साफ पानी ले आता.

किसी तरह इन सारे कामों से निबटा. पंडितजी ने आगे का कार्यक्रम बताया, ‘‘अब घर जा कर आटा, घी, चीनी, दूध, सब्जी का इंतजाम करो. कुछ रसगुल्ले भी लेते आना. मैं ब्राह्मणों को ले कर दोपहर को तुम्हारे घर पहुंच जाऊंगा.

‘‘याद रखना, तुम जिनजिन पकवानों का भोग लगाओगे, तुम्हारे पितरों को वे ही पकवान वहां यानी स्वर्ग में प्राप्त होंगे.’’

आदेश दे कर पंडितजी चले गए. अब यह गाज गिरी सो गिरी, ऊपर से मनों का मूसल सिर पर झुला दिया. दोपहर को 10 ब्राह्मणों के साथ पंडितजी पधारे. नाक के नथुनों को फुलाफुला कर उन्होंने चारों दिशाओं की हवाओं को समेटा. जब उन की नाक में मन की इच्छानुसार सुगंध न भरी, तो वे कुछ सशंकित हो गए.

मुझे एक कोने में खींच कर ले गए और बोले, ‘‘सबकुछ मंगवा लिया है न? देखो, ब्राह्मणों के भोजन में कोई कसर नहीं रहनी चाहिए. तुम यहां इन्हें जो खिलाओगे, तुम्हारे पितरों को स्वर्ग में वही सब मिलेगा.’’

‘‘पंडितजी, आप चिंता क्यों करते हैं? मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है. आप निश्चिंत रहें,’’ मैं ने उन्हें भरोसा दे कर शांत किया.

थोड़ी देर बाद उन्हें आसन पर बिठा कर पत्तल परोसी गई. मैं वहीं सामने ही खड़ा था. सभी 11 ब्राह्मण बैठ चुके थे. मेरा बेटा एक परात में सूखी रोटियां ले कर उन्हें परोसने लगा और बेटी भी पीछे से आलू और सायोबीन की सब्जी परोस रही थी.

पंडितजी यह सब देख कर आगबबूला हो गए. कहां वे तर माल उड़ाने के लिए अपनी लपलपाती जीभ बारबार होंठों पर फेर रहे थे, और कहां यहां की सूखी रोटी और आलू और सोयाबीन की सब्जी. वे पैर पटकते हुए उठ खड़े हुए.

पंडितजी चिल्ला कर बोले, ‘‘यह क्या मजाक है? यह तो घोर अपमान है हम ब्राह्मणों का. तुम्हारी यह हिम्मत कैसे हुई?’’

मैं ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया, ‘‘शांत पंडितजी, शांत, शांत हो जाइए. मैं ने कोई गलती नहीं की है. जरा मेरी बात तो सुनिए.

‘‘आप ने ही तो कहा था कि ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाओगे, वही मेरे पितरों को मिलेगा.

‘‘पंडितजी, मेरे पिताजी का हाजमा हमेशा कमजोर रहा. वे कभी भी घी पचा नहीं पाए. जिंदगीभर सूखी रोटी ही चबाते रहे. आलू और सोयाबीन की सब्जी उन की पसंद की सब्जी थी. इसलिए मैं ने वही सब्जी बनाई है, ताकि मेरे पिताजी को उन की पसंद का खाना मिल सके.

‘‘अब इस में मेरी गलती कहां है, पंडितजी? यह श्राद्धतर्पण तो मैं अपने पिता के लिए ही कर रहा हूं न. फिर उन की सुविधाअसुविधा का खयाल तो रखना ही पड़ेगा.’’

पंडितजी यह बात सुन कर चुप हो गए. उन्होंने मुझे घूर कर देखा, फिर मजबूरन पत्तल को हाथ लगाया. मन ही मन वे मुझे हजारों गालियां दे रहे होंगे. मुझे बेवकूफ कह रहे होंगे. न जाने शाप ही दे रहे होंगे. क्योंकि उन की जूती उन्हीं के सिर पर जो पड़ गई थी.

भोजन खत्म होने के बाद वे जो भाग खड़े हुए, सो आज तक मेरे दरवाजे पर नहीं आए. वे अपनी दक्षिणा मांगते कैसे? मेरे पितरों को पैसों की जरूरत तो थी ही नहीं. Story in Hindi

Funny Story : नैटेरिया हुआ – गंभीर है ये बीमारी

Funny Story. अंतर्राष्ट्रीय सर्वे में एक गंभीर बीमारी का पता चला, जो अब विश्वव्यापी है. जल्दी ही अगर इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो हालात बद से बदतर हो सकते हैं.

इस के वर्गीकरण, लक्षण, कारण व बचाव पर विस्तृत चर्चा के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं…

– औन्ली मेल नो मिलाप

• लक्षण :  इस रोग से ग्रस्त रोगी को न तो मेल पसंद होता है और न ही फीमेल. उन्हें सिर्फ ईमेल पसंद होता है. बातबात पर ईमेल करते हैं, चाहे उस की आवश्यकता हो या न हो.

• कारण :  इस रोग के रोगी मेलमिलाप में बहुत यकीन रखते हैं उन की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है, ईमेल करना. इन का मानना है कि ईमेल नहीं होता फेल.

• बचाव :  अभी तक आई रिपोर्टों के अनुसार, ये रोग उतना गंभीर नहीं होता है जितना यह महसूस होता है. इस कारण अभी तक इस के लिए कोई वैक्सीन या दवा ईजाद नहीं हुई है. जरा सी सावधानी से ही इस रोग से बचा जा सकता है.

– सैल्फीमेनिया

• लक्षण :  इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति किसी भी स्थान पर अजीबअजीब मुखमुद्राओं और भावभंगिमाओं में पाया जा सकता है. कभी बाल खोल कर, कभी सन ग्लासैस चढ़ा कर, कभी किसी टीले या पेड़ पर चढ़ कर, कभी दरवाजे पर लटक कर तो कभी खिड़की से झांक कर रोगी को सैल्फी लेते हुए पाया जा सकता है.

• कारण :  इस रोग से ग्रस्त रोगी को स्वयं को भिन्नभिन्न मुद्राओं व भावभंगिमाओं में देखना और दिखाना बहुत पसंद आता है. इस पर जमाने को दिखाना है की कहावत चरितार्थ होती है.

• बचाव :  इस रोग से बचाव के लिए अभी शोध चल रहा है, निकट भविष्य में वैक्सीन और दवाएं बनने की संभावनाएं हैं.

– गेम में गुम

• लक्षण :   इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति कभी भी खाली नहीं दिखाई पड़ते हैं. हर वक्त इन की उंगलियां मोबाइल पर नाचती दिखती हैं. गेम जीतने पर इन के चेहरे पर किला फतह करने जैसे भाव साफ दिखाई देते हैं. इन्हें ‘आज मैं आगे, जमाना है पीछे…’ वाले भाव से हर वक्त लबरेज देखा जा सकता है.

• कारण :  इन के पास समय बहुतायत में होता है और करने के लिए बहुतकुछ नहीं होता है. इस कारण ‘डू नथिंग बट लुक बिजी’ नामक ग्रंथि से ये ग्रस्त हो जाते हैं. यही वजह है कि यह रोग इन्हें आसानी से अपनी चपेट में ले लेता है.

• बचाव :  इस रोग से बचाव के लिए जो वैक्सीन बनाई गई है, उस का नाम है बिजी ओ सिन. इस वैक्सीन के प्रभाव से यह रोग धीरेधीरे कम हो कर समाप्त हो जाता है.

– एसएमएस का ओआरएस

• लक्षण :  घर में, औफिस में, रास्ते में, बस में, पार्टी में या एकांत में मोबाइल पर उंगलियां चलाते हुए देख सकते हैं इस रोग से ग्रस्त व्यक्तियों को. इन का स्लोगन है ‘उंगली पर है सारा जमाना.’

• कारण :  अपनी छोटीछोटी चीजों के लिए फोन पर बातें करना इन्हें पसंद नहीं होता और मैसेज के सहारे वे अपना हालेदिल बयान करते हैं.

• बचाव :  ‘टौकोसिन’ नामक वैक्सीन इस रोग के लिए  असरकारी व प्रभावकारी साबित हो सकती है.

– चैटिंग चैंप

• लक्षण :  इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति का किसी भी कार्य में मन नहीं लगता. वह बाहरी दुनिया व समाज से कटाकटा रहता है. इस के लिए चैटिंग बिना ‘जग सूनासूना लागे…’ वाली स्थिति रहती है.

• कारण :  इस रोग के रोगी थोड़े शर्मीले होते हैं जो बोल कर नहीं, बल्कि अपने मनोभावों को चैटिंग के जरिए ही बयान कर सकते हैं, जो धीरेधीरे लत बन जाती है और यह लत कब आदत बन कर इस महारोग में तबदील हो जाती है, इस का पता ही नहीं लग पाता है.

• बचाव :  इस रोग से बचाव के लिए भी ‘टौकोसिन’ नामक वैक्सीन असरकारी साबित हो सकती है.

हमारे कई शोधकर्ता अभी भी इस दिशा में नएनए शोध कर रहे हैं जिन का खुलासा निकट भविष्य में होने की पूरीपूरी संभावनाएं हैं. जय इंटरनैट, जय इंटरनैट…Funny Story

Funny Hindi Story : जान न पहचान ये मेरे मेहमान

Funny Hindi Story . मेरा शहर एक जानामाना पर्यटन स्थल है. इस वजह से मेरे सारे रिश्तेदार, जिन्हें मैं नहीं जानता वे भी जाने कहांकहां के रिश्ते निकाल कर मेरे घर तशरीफ का टोकरा निहायत ही बेशर्मी से उठा लाते हैं. फिर बड़े मजे से सैरसपाटा करते हैं. और हम अपनी सारी, यानी गरमी, दीवाली व क्रिसमस की छुट्टियां इन रिश्तेदारों की सेवा में होम कर देते हैं.

एक दिन मेरे बाप के नाना के बेटे के साले का खत आया कि वे इस बार छुट्टियां मनाने हमारे शहर आ रहे हैं और अगर हमारे रहते वे होटल में ठहरें तो हमें अच्छा नहीं लगेगा. लिहाजा, वे हमारे ही घर में ठहरेंगे.

मैं अपने बाल नोचते हुए सोच रहा था कि ये महाशय कौन हैं और मुझ से कब मिले. इस चक्कर में मैं ने अपने कई खूबसूरत बालों का नुकसान कर डाला. पर याद नहीं आया कि मैं उन से कभी मिला था. मेरी परेशानी भांपते हुए पत्नी ने सुझाव दिया, ‘‘इन की चाकरी से बचने के लिए घर को ताला लगा कर अपन ही कहीं चलते हैं. कभी कोई पूछेगा तो कह देंगे कि पत्र ही नहीं मिला.’’

‘‘वाहवाह, क्या आइडिया है,’’ खुशी के अतिरेक में मैं ने श्रीमती को बांहों में भर कर एक चुम्मा ले लिया. फिर तुरतफुरत ट्रैवल एजेंसी को फोन कर के एक बढि़या पहाड़ी स्टेशन के टिकट बुक करवा लिए.

हमारी दूसरे दिन सुबह 10 बजे की बस थी. हम ने जल्दीजल्दी तैयारी की. सब सामान पैक कर लिया कि सुबह नाश्ता कर के चल देंगे, यह सोच कर सारी रात चैन की नींद भी सोए. मैं सपने में पहाड़ों पर घूमने का मजा ले रहा था कि घंटी की कर्कश ध्वनि से नींद खुल गई. घड़ी देखी, सुबह के 6 बजे थे.

‘सुबहसुबह कौन आ मरा,’ सोचते हुए दरवाजा खोला तो बड़ीबड़ी मूंछों वाले श्रीमानजी, टुनटुन को मात करती श्रीमतीजी और चेहरे से बदमाश नजर आते 5 बच्चे मय सामान के सामने खड़े थे. मेरे दिमाग में खतरे की घंटी बजी कि जरूर चिट्ठी वाले बिन बुलाए मेहमान ही होंगे. फिर भी पूछा, ‘‘कौन हैं आप?’’

‘‘अरे, कमाल करते हैं,’’ मूंछ वाले ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, ‘‘हम ने चिट्ठी लिखी तो थी…बताया तो था कि हम कौन हैं.’’

‘‘लेकिन मैं तो आप को जानता ही नहीं, आप से कभी मिला ही नहीं. कैसे विश्वास कर लूं कि आप उन के साले ही हैं, कोई धोखेबाज नहीं.’’

‘‘ओए,’’ उन्होंने कड़क कर कहा, ‘‘हम को धोखेबाज कहता है. वह तो आप के बाप के नाना के बेटे यानी मेरी बहन के ससुर ने जोर दे कर कहा था कि उन्हीं के यहां ठहरना, इसलिए हम यहां आए हैं वरना इस शहर में होटलों की कमी नहीं है. रही बात मिलने की, पहले नहीं मिले तो अब मिल लो,’’ उस ने जबरदस्ती मेरा हाथ उठाया और जोरजोर से हिला कर बोला, ‘‘हैलो, मैं हूं गजेंद्र प्रताप. कैसे हैं आप? लो, हो गई जानपहचान,’’ कह कर उस ने मेरा हाथ छोड़ दिया.

मैं अपने दुखते हाथ को सहला ही रहा था कि उस गज जैसे गजेंद्र प्रताप ने बच्चों को आदेश दिया, ‘‘चलो बच्चो, अंदर चलो, यहां खड़ेखड़े तो पैर दुखने लगे हैं.’’

इतना सुनते ही बच्चों ने वानर सेना की तरह मुझे लगभग दरवाजे से धक्का दे कर हटाते हुए अंदर प्रवेश किया और जूतों समेत सोफे व दीवान पर चढ़ कर शोर मचाने लगे. मेरी पत्नी और बच्चे हैरानी से यह नजारा देख रहे थे. सोफों और दीवान की दुर्दशा देख कर श्रीमती का मुंह गुस्से से तमतमा रहा था, पर मैं ने इशारे से उन्हें शांत रहने को कहा और गजेंद्र प्रताप व उन के परिवार से उस का परिचय करवाया. परिचय के बाद वह टुनटुन की बहन इतनी जोर से सोफे पर बैठी कि मेरी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई. सोचा, ‘आज जरूर इस सोफे का अंतिम संस्कार हो जाएगा.’

पर मेरी हालत की परवा किए बगैर वह बेफिक्री से मेरी पत्नी को और्डर दे रही थी, ‘‘भई, अब जरा कुछ बढि़या सी चायवाय हो जाए तो हम फ्रैश हो कर घूमने निकलें. और हां, जरा हमारा सामान भी हमारे कमरे में पहुंचा देना. हमारे लिए एक कमरा तो आप ने तैयार किया ही होगा?’’

हम ने बच्चों के साथ मिल कर उन का सामान बच्चों के कमरे में रखवाया.

उधर कुढ़ते हुए पत्नी ने रसोई में प्रवेश किया. पीछेपीछे हम भी पहुंचे. शयनकक्ष में अपने पैक पड़े सूटकेसों पर नजर पड़ते ही मुंह से आह निकल गई. मेहमानों को मन ही मन कोसते सूटकेसों को ऐसा का ऐसा वापस ऊपर चढ़ाया. ट्रैवल एजेंसी को फोन कर के टिकट रद्द करवाए. आधा नुकसान तो यही हो गया.

श्रीमती चाय ले कर पहुंची तो चाय देखते ही बच्चे इस तरह प्यालों पर झपटे कि 2 प्याले तो वहीं शहीद हो गए. अपने टी सैट की बरबादी पर हमारी श्रीमती अपने आंसू नहीं रोक पाई तो व्यंग्य सुनाई पड़ा, ‘‘अरे, 2 प्याले टूटने पर इतना हंगामा…हमारे घर में तो कोई चीज साबुत ही नहीं मिलती. इस तरह तो यहां बातबात पर हमारा अपमान होता रहेगा,’’ उठने का उपक्रम किए बिना उस ने आगे कहा, ‘‘चलो जी, चलो, इस से तो अच्छा है कि हम किसी होटल में ही रह लेंगे.’’

मुझ में आशा की किरण जागी, लेकिन फिर बुझ गई क्योंकि वह अब बाथरूम का पता पूछ रही थीं. साबुन, पानी और बाथरूम का सत्यानाश कर के जब वे नाश्ते की मेज पर आए तो पत्नी के साथ मेरा भी दिल धकधक कर रहा था. नाश्ते की मेज पर डबलरोटी और मक्खन देख कर श्रीमतीजी ने नौकभौं चढ़ाई, ‘‘अरे, सिर्फ सूखी डबलरोटी और मक्खन? मेरे बच्चे यह सब तो खाते ही नहीं हैं. पप्पू को तो नाश्ते में उबला अंडा चाहिए, सोनू को आलू की सब्जी और पूरी, मोनू को समोसा, चिंटू को कचौरी और टोनी को परांठा. और हम दोनों तो इन के नाश्ते में से ही अपना हिस्सा निकाल लेते हैं.’’

फिर जैसे मेहरबानी करते हुए बोले, ‘‘आज तो आप रहने दें, हम लोग बाहर ही कुछ खा लेंगे और आप लोग भी घूमने के लिए जल्दी से तैयार हो जाइए, आप भी हमारे साथ ही घूम लीजिएगा. अनजान जगह पर हमें भी आराम रहेगा.’’

हम ने सोचा कि ये लोग घुमाने ले जा रहे हैं तो चलने में कोई हरज नहीं. झटपट हम सब तैयार हो गए.

बाहर निकलते ही उन्होंने बड़ी शान से टैक्सी रोकी, सब को उस में लादा और चल पड़े. पहले दर्शनीय स्थल तक पहुंचने पर ही टैक्सी का मीटर 108 रुपए तक पहुंच चुका था. उन्होंने शान से पर्स खोला, 500-500 रुपए के नोट निकाले और मेरी तरफ मुखातिब हुए. ‘‘भई, मेरे पास छुट्टे नहीं हैं, जरा आप ही इस का भाड़ा दे देना.’’

भुनभुनाते हुए हम ने किराया चुकाया. टैक्सी से उतरते ही उन्हें चाय की तलब लगी, कहने लगे, ‘‘अब पहले चाय, नाश्ता किया जाए, फिर आराम से घूमेंगे.’’

बढि़या सा रैस्तरां देख कर सब ने उस में प्रवेश किया. हर बच्चे ने पसंद के अनुसार और्डर दिया. उन का लिहाज करते हुए हम ने कहा कि हम कुछ नहीं खाएंगे. उन्होंने भी बेफिक्री से कहा, ‘‘मत खाइए.’’

वे लोग समोसा, कचौरी, बर्गर, औमलेट ठूंसठूंस कर खाते रहे और हम खिसियाए से इधरउधर देखते रहे. बिल देने की बारी आई तो बेशर्मी से हमारी तरफ बढ़ा दिया, ‘‘जरा आप दे देना, मेरे पास 500-500 रुपए के नोट हैं.’’

200 रुपए का बिल देख कर मेरा मुंह खुला का खुला रह गया और सोचा कि अभी नाश्ते में यह हाल है तो दोपहर के खाने, शाम की चाय और रात के खाने में क्या होगा?

फिर वही हुआ, दोपहर के खाने का बिल 700 रुपए, शाम की चाय का 150 रुपए आया. रात का भोजन करने के बाद मेरी बांछें खिल गईं. ‘‘यह तो पूरे 500 रुपए का बिल है और आप के पास भी 500 रुपए का नोट है. सो, यह बिल तो आप ही चुका दीजिए.’’

उन का जवाब था, ‘‘अरे, आप के होते हुए यदि हम बिल चुकाएंगे तो आप को बुरा नहीं लगेगा? और आप को बुरा लगे, भला ऐसा काम हम कैसे कर सकते हैं.’’

दूसरे दिन वे लोग जबरदस्ती खरीदारी करने हमें भी साथ ले गए. हम ने सोचा कि अपने लिए खरीदेंगे तो पैसा भी अपना ही लगाएंगे और लगेहाथ उन के साथ हम भी बच्चों के लिए कपड़े खरीद लेंगे. पर वह मेहमान ही क्या जो मेजबान के रहते अपनी गांठ ढीली करे.

सर्वप्रथम हमारे शहर की कुछ सजावटी वस्तुएं खरीदी गईं, जिन का बिल 840 रुपए हुआ. वे बिल चुकाते  समय कहने लगे, ‘‘मेरे पास सिर्फ

500-500 रुपए के 2 ही नोट हैं. अभी आप दे दीजिए, मैं आप को घर चल कर दे दूंगा.’’

फिर कपड़ाबाजार गए, वहां भी मुझ से ही पैसे दिलवाए गए. मैं ने कहा भी कि मुझे भी बच्चों के लिए कपड़े खरीदने हैं, तो कहने लगे, ‘‘आप का तो शहर ही है, फिर कभी खरीद सकते हैं. फिर ये बच्चे भी तो आप के ही हैं, इस बार इन्हें ही सही. फिर घर चल कर तो मैं पैसे दे ही दूंगा.’’

3 हजार रुपए वहां निकल गए. अब वे खरीदारी करते थक चुके थे. दोबारा 700 रुपए का चूना लगाया. इस तरह सारी रकम वापस आने की उम्मीद लगाए हम घर पहुंचे.

घर पहुंचते ही उन्होंने घोषणा की कि वे कल  जा रहे हैं. खुशी के मारे हमारा हार्टफेल होतेहोते बचा कि अब वे मेरे पैसे चुकाएंगे, लेकिन उन्होंने पैसे देने की कोई खास बात नहीं की.

दूसरे दिन भी वे लोग सामान वगैरह बांध कर निश्ंिचतता से बैठे थे और चिंता यह कर रहे थे कि उन का कुछ सामान तो नहीं रह गया. तब हम ने भी बेशर्म हो कर कह दिया, ‘‘भाईसाहब, कम से कम अपनी खरीदारी के रुपए तो लौटा दीजिए.’’

उन्होंने निश्ंिचतता से कहा, ‘‘लेकिन मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं.’’

आश्चर्य से मेरा मुंह खुला रह गया, ‘‘पर आप तो कह रहे थे कि घर पहुंच कर दे दूंगा.’’

‘‘हां, तो क्या गलत कहा था. अपने घर पहुंच भिजवा दूंगा,’’ आराम से चाय पीते हुए उन्होंने जवाब दिया.

‘‘उफ…और वे आप के 500-500 रुपए के नोट?’’ मैं ने उन्हें याद दिलाया.

‘‘अब वही तो बचे हैं मेरे पास और जाने के लिए सफर के दौरान भी कुछ चाहिए कि नहीं?’’

हमारा इस तरह रुपए मांगना उन्हें बड़ा नागवार गुजरा. वे रुखाई से कहते हुए रुखसत हुए, ‘‘अजीब भिखमंगे लोग हैं. 4 हजार रुपल्ली के लिए इतनी जिरह कर रहे हैं. अरे, जाते ही लौटा देंगे, कोई खा तो नहीं जाएंगे. हमें क्या बिलकुल ही गयागुजरा समझा है. हम तो पहले ही होटल में ठहरना चाहते थे, पर हमारी बहन के ससुर के कहने पर हम यहां आ गए, अगर पहले से मालूम होता तो यहां हमारी जूती भी न आती…’’

वह दिन और आज का दिन, न उन की कोई खैरखबर आई, न हमारे रुपए. हम मन मसोस कर चुप बैठे श्रीमती के ताने सुनते रहते हैं, ‘‘अजीब रिश्तेदार हैं, चोर कहीं के. इतने पैसों में तो बच्चों के कपड़ों के साथ मेरी 2 बढि़या साडि़यां भी आ जातीं. ऊपर से एहसानफरामोश. घर की जो हालत बिगाड़ कर गए, सो अलग. किसी होटल के कमरे की ऐसी हालत करते तो इस के भी अलग से पैसे देने पड़ते. यहां लेना तो दूर, उलटे अपनी जेब खाली कर के बैठे हैं.’’

इन सब बातों से क्षुब्ध हो कर मैं ने भी संकल्प किया कि अब चाहे कोई भी आए, अपने घर पर किसी को नहीं रहने दूंगा. देखता हूं, मेरा यह संकल्प कब तक मेरा साथ देता है. Funny Hindi Story

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