Hindi Story: छोटू

Hindi Story: उका असली नाम तो शायद उस को भी याद नहीं होगा, लेकिन नैशनल हाईवे 48 पर बनेशेर पंजाबढाबे पर वह सिर्फछोटूथा. कद उस का छोटा था, लेकिन फुरती ऐसी कि लोग उसेतूफानीभी कहते थे. ढाबे का मालिक मलखान सिंह, चिल्लाया, ‘‘ओए छोटू, टेबल नंबर 4 पर 2 कड़क चाय और मक्खन मार कर परांठा दे .’’ छोटू एक हाथ में 4 गिलास और दूसरे हाथ में तश्तरी संभाले दौड़ पड़ा. उस के चेहरे पर हमेशा एक टेढ़ी मुसकान रहती, मानो वह दुनिया को बता रहा हो कि भले ही उस की उम्र खेलनेखाने की है, पर उसे गृहस्थी का बोझ उठाने का सलीका पता है.


सुबह के 4 बजे थे. पूरा ढाबा सो रहा था, सिवा छोटू के. वह अपने फटे हुए स्वेटर के छेद से छनती ठंडी हवा को नजरअंदाज करते हुए कोयले की भट्ठी सुलगा रहा था. गीली लकडि़यों और नम कोयले से लड़ते हुए जब धुआं उस की आंखों में भर गया, तो वह मुसकरा कर बोला, ‘‘आज आग भी नखरे कर रही है.’’
उस ढाबे की दीवारों ने बहुतकुछ देखा था, टूटे सपने, अधूरी मंजिलें, थके चेहरे और कभीकभी अनकहे आंसू. लेकिन उन सब के बीच अगर कोई चीज सब से ज्यादा परमानैंट थी, तो वह थी छोटू की मौजूदगी. जैसे ढाबा नहीं, छोटू ही हाईवे पर टिका कोई मील का पत्थर हो.


छोटू की चपलता के चर्चे दूरदूर तक थे. पंजाब से आने वाला संतोख सिंह हो या दक्षिण से आने वाला सुब्रमण्यमहर कोईछोटू की चायका दीवाना था. वह केवल चाय नहीं देता था, बल्कि थके हुए ड्राइवरों को दो पल का ऐसा सुकून देता था, जो उन्हें घर की याद से दूर और मंजिल के करीब ले जाता था.
घर कितने दिन बाद जा रहे हो पाजी?’ ‘अम्मां ठीक हैं?’ ‘इस बार बेटी से बात हो गई अंकल?’ छोटू के
ये सवाल चाय के साथ ऐसे घुलते कि जवाब देतेदेते आंखें भीग जातीं. छोटू के लिए पढ़ाई का मतलब किताबों से कहीं ज्यादाहिसाबकिताबथा. वह स्कूल तो नहीं गया, लेकिन उसे यह बखूबी पता था कि 5,000 में से 2,000 रुपए मां की दवाओं के हैं, 1,500 छोटी बहन राधा की स्कूल ड्रैस और किताबों के और बाकी बचे पैसों में घर का चूल्हा जलना है.


मां की याद आते ही छोटू के हाथ थोड़े धीमे हो जाते. मां, जिस की कमर अब सीधी नहीं रहती थी, जिस की खांसी रातों में ज्यादा बोलती थी. वह जब कभी गांव जाता, मां उस के सिर पर हाथ फेर कर कहती, ‘‘मेरा छोटू सदा सुखी रहे.’’ छोटू हंस देता, ‘‘मैं सुखी हूं मां.’’ जब छोटू ढाबे के जूठे बरतन मांजता, तो स्टील के बरतनों में उसे अपना चेहरा नहीं, अपनी बहनों का भविष्य चमकता हुआ दिखता था. उसे याद था कि उस की छोटी बहन मुन्नी फटी हुई किताब से पढ़ रही थी. पन्ने आधे थे, अक्षर घिसे हुए थे. उस रात वह सोया नहीं था. अगले दिन छोटू ने मलखान सिंह से एक्स्ट्रा काम मांगा, ‘‘मालिक, रात को ट्रक ज्यादा आते हैं, मैं जागूंगा और काम करूंगा. मुझे बस थोड़ी और पगार बढ़ा देना मालिक.’’


मलखान सिंह, जो दिल का बुरा नहीं था, पर थोड़ा सख्त था, बोला, ‘‘नींद नहीं आएगी तुझे?’’ छोटू ने जवाब दिया, ‘‘मालिक, नींद तो उन्हें आती है जिन के सपने पूरे हो चुके हों. मेरे तो अभी पैदा भी नहीं हुए.’’ मलखान सिंह को उस दिन पहली बार लगा कि यह लड़का उम्र से कहीं ज्यादा सीख रखता है.
एक दिन एक महंगी सफेद कार ढाबे के सामने कर रुकी. उस में से एक साहब उतरे. आंखों पर चश्मा, हाथ में चमचमाता आईफोन. उन्होंने चिढ़ते हुए कहा, ‘‘भाई, यहां नैटवर्क नहीं है क्या? और
सुनो, एक ब्लैक कौफी मिलेगी? शुगर फ्री.’’ छोटू ने मासूमियत से सिर खुजलाया, ‘‘साहब, यहां तो चाय मिलती है, जो कलेजे को ठंडक और दिमाग को गरमी देती है.

पी कर देखो, नैटवर्क अपनेआप जाएगा.’’
साहब हंसे, ‘‘चलो, तुम भी क्या याद रखोगे. लाओ, वही पिला दो.’’
छोटू ने जब चाय पेश की, तो साहब ने एक घूंट भरा और दंग रह गए, ‘‘छोटू, क्याक्या डालते हो इस में?’’
छोटू ने आंख मारते हुए कहा, ‘‘थोड़ी अदरक, थोड़ी इलायची और ढेर सारी जिम्मेदारी साहब.’’
उस दिन के बाद वे साहब हर महीने उसी ढाबे पर आने लगे. कभी कुछ
कहते नहीं, बस चाय पीते और छोटू को देखते रहते.
छोटू को शहर जाने का मौका भी मिला था. एक ड्राइवर ने एक बात कही थी, ‘‘मेरे साथ चल, वहां होटल में काम दिला दूंगा.’’


छोटू ने मना कर दिया, ‘‘साहब, यहां की पगडंडियां भी मुझे पहचानती हैं. शहर में तो लोग अपने पड़ोसियों को भी नहीं पहचानते. मैं यहां खुश हूं, क्योंकि यहां मेरी जरूरत है.’’
एक बार ढाबे पर कुछ छात्र आए. उन्होंने मस्ती में पूछा, ‘‘छोटू, टाइम मैनेजमैंट कैसे कर लेते हो?’’
छोटू ने जूठे गिलास समेटते हुए कहा, ‘‘साहब, जब पेट खाली हो और घर की उम्मीदें भारी हों, तो हाथ और पैर अपने आप घड़ी की सूई से तेज चलने लगते हैं.’’
फिर वह रात आई, जब आसमान टूट पड़ा.


लगातार बारिश से हाईवे जाम हो गया. सैकड़ों गाडि़यां ढाबे के सामने कर खड़ी हो गईं. बिजली गुल, राशन खत्म, लोग घबराए हुए. बच्चों का रोना, बुजुर्गों की कराह.
मलखान सिंह ने हाथ खड़े कर दिए, ‘‘ओए छोटू, अब क्या होगा? आटा खत्म है, सब्जी भी नहीं है.’’
छोटू की आंखों में उस समय एक अलग ही चमक थी, ‘‘मालिक, आप परेशान मत होइए. आज ढाबा मैं चलाऊंगा.’’


छोटू ने पीछे के स्टोर से पुराने रखे चने निकाले, सूखी रोटियों को घी में तल करक्रिस्पी स्नैकबनाया. जंगल से लकडि़यां बीन लाया. उस रात उस ने सिर्फ खाना नहीं खिलाया, उस ने हौसला परोसा… ‘डरो मत…’ ‘सब ठीक होगा…’ ‘भूखे मत सोना…’ हर वाक्य में भरोसा था.
उस रात एक कौर्पोरेट महिला, जो घंटों से परेशान थीं, फाइलों और लैपटौप में खोई हुई थीं. वे छोटू को गौर से देखने लगीं.


छोटू बोला, ‘‘दीदी, यह डब्बा (लैपटौप) बंद करो. बाहर बारिश का संगीत सुनो और गरम खिचड़ी खाओ. काम तो कल भी हो जाएगा, लेकिन यह पल हमेशा याद रहेगा.’’ उन महिला की आंखें भर आईं.
एक बूढ़ी औरत ने छोटू का हाथ पकड़ा, ‘‘बेटा, तू थक नहीं रहा?’’ छोटू हंसा, ‘‘दादी, मेरी जिंदगी में थकना नहीं लिखा है. थकते तो वे हैं जो सिर्फ अपना बोझ ढोते हैं.’’ सुबह हुई. जाम खुला. लोग वहां से जाने लगे.
ब्लैक कौफी वाले साहब ने लिफाफा बढ़ाया, ‘‘यह तुम्हारी मेहनत के लिए.’’


छोटू ने हाथ जोड़ लिए, ‘‘अगर देना ही है, तो मेरी बहनों के लिए कुछ पुरानी किताबें लेते आइए साहब.’’
साहब की आंखों में आंसू गए. उन्होंने उस छोटे से बच्चे में एक बहुत बड़े इनसान को देखा था.
आज भीशेर पंजाबढाबा वहीं है. छोटू वह बड़ा हो गया है, लेकिन आज भी लोग उसेछोटूही कहते हैं.     

Hindi Story: इनसानियत

Hindi Story: पूरे गांव में दीनानाथ की थूथू हो रही थी. शादी से पहले ही उन की बेटी लक्ष्मी पेट से हो गई थी. इतने में गांव के एक लड़के प्रकाश ने लक्ष्मी का हाथ थामना चाहा. क्या था यह पूरा मामला? गां के कुछ लोग चौपाल पर बैठे थे. दीनानाथ उन से निगाह चुरा कर आड़ में छिप गए. इस समय शर्म से उन का चेहरा जमीन में गड़ा जा रहा था. वे गांव वालों के किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहते थे.

चौपाल पर बैठा एक आदमी बोला, ‘‘कुछ सुना आप लोगों ने?’’ ‘‘क्या कह रहे हो?’’ दूसरे ने पूछा. ‘‘यह जो दीनानाथ मुंह छिपाए खड़ा है, इस की बेटी लक्ष्मी ने मोड़ीराम के बेटे प्रकाश से गुपचुप मंदिर में जा कर शादी कर ली.’’
‘‘मगर उस की तो सगाई हो चुकी थी, फिर?’’
‘‘हां, सगाई तो हो चुकी थी, मगर लक्ष्मी पेट से है.’’
‘‘उस ने किस के साथ मुंह काला किया?’’
‘‘सुना है कि भवानी शंकर का बिगड़ैल बेटा दिनेश, जो शहर के कालेज में पढ़ रहा है, का पाप लक्ष्मी के पेट में पल रहा है.’’
‘‘अरे धीरे बोल, दीवारों के भी कान होते हैं. बात भवानी शंकर के कानों तक पहुंच गई , तब हमारी खैर नहींछोड़ो ये बातेंवैसे, लक्ष्मी के साथ बहुत बुरा हुआ.’’
‘‘जब उस के ससुराल वालों को पता चलेगा कि लक्ष्मी ब्याह के पहले ही पेट से है, तब कैसे करेंगे वे शादी.’’
‘‘इसलिए तो ताबड़तोड़ प्रकाश से शादी करा दी.’’


आगे दीनानाथ कोई बात सुन सके. वे चुपचाप गरदन नीची कर के वहां से चलते बने. अब तो पूरे गांव को पता चल चुका है कि लक्ष्मी पेट से है और प्रकाश ने उस से शादी कर ली है. प्रकाश ने किन हालात में यह शादी की, किसी को नहीं मालूम. मगर दाई से कब तक वे पेट छिपाते रहेंगे. जहां भी चार आदमी बैठते हैं,
यही चर्चा पूरे गांव में हो रही है. दीनानाथ ऊंचा मुंह कर के चल भी नहीं सकते हैं. उस दिन जब दीनानाथ खेत से घर लौटे, तब उन की पत्नी कावेरी लक्ष्मी पर चिल्ला कर कह रही थीं, ‘‘अरी नासपीटी, बता किस का पाप तेरे पेट में पल रहा है? अब तालू में जबान क्यों चिपक गई है तेरी? बोल कौन है वह? किस के साथ तू ने मुंह काला किया? आग लगे तेरी जबान को.’’


मगर लक्ष्मी कोई जवाब नहीं दे पाई. वह नीचे मुंह किए खड़ी रही. तब दीनानाथ ने कहा, ‘‘अरे कावेरी, क्यों लक्ष्मी पर चिल्ला रही हो?’’ ‘‘पूछो अपनी लाड़ली से, इस ने क्या गुल खिलाया हैं,’’ उसी तरह गुस्से से कावेरी बोलीं. ‘‘क्या गुल खिलाया इस ने, जो इस पर इतनी नाराज हो रही हो?’’ ‘‘अरे, इच्छा तो ऐसी हो रही है कि इसे गला घोंट कर मार दूं. करमजली ने हम को कहीं का नहीं छोड़ा. अब हम समाज में कैसे मुंह दिखाएंगे,’’ कावेरी का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था. दीनानाथ अब भी हालात को नहीं समझ पाए थे. वे कावेरी पर जोर देते हुए बोले, ‘‘अरे, कुछ बताओगी भी या यों ही इस तरह गुस्सा करती रहोगी?’’
‘‘तो सुन लो कान खोल कर, तुम्हारी लाड़ली पेट से है. किस के साथ इस ने काला मुंह किया, बता ही नहीं रही है,’’ यह कहते हुए कावेरी का गुस्सा सातवें आसमान पर था.


यह सुन कर दीनानाथ के होश उड़ गए. उन के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला. तब कावेरी गुस्से से बोलीं, ‘‘अब आप की जबान क्यों बंद हो गई यह सुन कर?’’ ‘‘क्यों बेटी, क्या यह सच है?’’ दीनानाथ ने जब शांत मन से यह पूछा, तब भी लक्ष्मी ने कोई जवाब नहीं दिया. कावेरी फिर गुस्से से बोलीं, ‘‘यही तो मैं पूछ रही हूं, मगर बता ही नहीं रही है.’’ ‘‘बताओ बेटी, घबराओ मतहम तुम्हारी मदद करेंगे,’’ दीनानाथ ने जब यह कहा, तब सिसकती हुई बापू के कंधे पर सिर रखती हुई लक्ष्मी मुश्किल से बोली, ‘‘बापू, भवानी शंकर के बिगड़ैल बेटे दिनेश का.’’


इस बात को सुन कर दीनानाथ और कोवरी को झटका लगा. वे दोनों कुछ बोल सके. भवानी शंकर गांव के सब से अमीर किसान थे. राजनीति में भी उन की अच्छी पकड़ थी. वे गांव के दबंग कहलाते हैं. किसी में भी हिम्मत नहीं है कि उन के खिलाफ कुछ बोले. भवानी शंकर का बिगड़ैल बेटा दिनेश शहर के कालेज में पढ़ रहा है. पढ़ क्या रहा है, वहां गुंडागर्दी कर रहा है. वह गांव में भी जिन गलियों से गुजरता है, औरतें और लड़कियां दरवाजे बंद कर लेती हैं. अगर थाने में भी रिपोर्ट लिखाओ, तब लेदे कर मामला रफादफा हो जाता है. कहने का मतलब यह है कि भवानी शंकर ने सब को खरीद लिया है. दीनानाथ ने लक्ष्मी से पूछा, ‘‘यह सब कैसे हुआ बेटी?’’


‘‘बापू, उस दिन आप शहर गए थे. खेत पर मैं अकेली ही काम कर रही थी. तभी दिनेश खेत पर आया और मुझे पकड़ लिया. मैं ने उस के चंगुल से निकलने की बहुत कोशिश की, मगर निकल सकी. उस ने मुझे जीप में डाल दिया. उस का साथी गाड़ी चला रहा था. वह उस के खेत वाली हवेली में ले गया…’’ आगे लक्ष्मी सिसकियां ले कर रोने लगी. इस समय कावेरी भी चुप हो गईं और दीनानाथ भी कुछ बोल सके. एक डर उन के भीतर बैठ गया, इसलिए उन को यह सच निगलते बन रहा है, उगलते. कावेरी का ऊपर का गुस्सा जरूर ठंडा हो गया, मगर भीतर तो भवानी शंकर के खिलाफ लावा सुलग रहा था. ‘‘अब क्या सोच रहे हो? सारे गांव में यह बात फैले, उस के पहले ही लक्ष्मण सिंह से मिल कर इस की शादी कर दो.’’  ‘‘अरे कावेरी, क्या लक्ष्मण सिंह को पता नहीं चला होगा?’’ दीनानाथ बीच में बात काट कर बोले. ‘‘अरे, आप तो यों ही बैठेबैठे बातें करते रहेंगे. जाओ, जल्दी से जल्दी शादी की तारीख तय कर के आओ,’’ जोर देते हुए कोवरी बोलीं.


‘‘जाता हूं,’’  कह कर दीनानाथ पास के गांव जाने के लिए बसस्टैंड पर कर बस का इंतजार करने लगे.
पूरे 5 घंटे बाद दीनानाथ मुंह लटकाए गांव में वापस आए. कावेरी उन का ही इंतजार कर रही थीं. वे बोलीं, ‘‘तारीख तय कर आए शादी की समधीजी से?’’ दीनानाथ ने कोई जवाब नहीं दिया, तो वे गुस्से से बोलीं, ‘‘अरे, क्या कहा समधीजी ने? यों मुंह लटकाए क्यों खड़े हो? बोलते क्यों नहीं?’’ ‘‘लक्ष्मण सिंह ने यह सगाई तोड़ दी,’’ दीनानाथ बोले. ‘‘क्यों तोड़ दी?’’ गुस्से से उफनती हुई कावेरी बोलीं. ‘‘किसी ने यह बात उन तक पहुंचा दी कि लक्ष्मी पेट से है.’’ ‘‘आग लगे उस को जिस ने यह बात उन तक पहुंचाई,’’ कावेरी बोलीं.
‘‘अब गाली देने से कुछ होगा कावेरी, फिर किसकिस को गाली देगी. इस बात का सभी को पता चल गया है,’’

दीनानाथ समझाते हुए बोले.
  ‘‘अब तो एक ही रास्ता है,’’ कावेरी बोलीं.
‘‘कौन सा?’’ 
‘‘दिनेश से कहें कि वह लक्ष्मी से शादी करे.’’
‘‘यह मुमकिन नहीं होगा कावेरी, वे बड़े लोग हैं.’’
‘‘बड़े हैं, तो इस का मतलब यह नहीं है कि ….’’
‘‘कावेरी, चुप हो जाओ. यह समय गुस्सा करने का नहीं है…’’ बीच में ही बात काट कर दीनानाथ बोले, ‘‘बड़े लोग यह साबित कर देंगे कि…’’
‘‘अरे, उस लक्ष्मी को ढूंढ़ कर लाओ, कहीं गुस्से में कर जान दे बैठे…’’ अचानक बीच में ही बात काटती हुई कावेरी बोलीं, ‘‘बिना कहे कहीं चली गई है.’’
‘‘एक मां हो कर भी तुम जवान लड़की पर अनापशनाप चिल्ला रही थीं, जबकि इतना गुस्सा करना ठीक नहीं है,’’

दीनानाथ बोले. ‘‘अरे, यह समय भाषण देने का नहीं है. जाओ उसे गांव में जा कर ढूंढ़ो. कहां गई है करमजली…’’ कावेरी फिर गुस्से से बोलीं, ‘‘फिर मैं तो उस पर गुस्सा इसलिए कर रही थी कि ऐसी हालत में अब उस से कौन करेगा शादी?’’
‘‘मैं कर रहा हूं लक्ष्मी से शादी,’’ अभी कावेरी की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि मोड़ीराम के बेटे प्रकाश ने कर यह बात कह दी.
‘‘तुम करोगेमोड़ीराम क्या…?’’
‘‘छोड़ो बापू कोवे राजी नहीं होंगे. यही कहना चाहते हैं आप,’’ बीच में ही बात काट कर प्रकाश बोला, ‘‘मगर मैं आप की और लक्ष्मी की इज्जत की खातिर शादी करने को तैयार हूं. आप अपनी रजामंदी दें. मैं पढ़ालिखा हूं. लक्ष्मी भी पढ़ीलिखी है.
‘‘इस में लक्ष्मी का कहां कुसूर है? आएदिन इस देश में कई लड़कियों के साथ ऐसी घटनाएं होती हैं. जो थाने तक पहुंचती हैं, वे तो उजागर हो जाती हैं, मगर मेरा फैसला अटल है.’’
‘‘मगर बेटा, लक्ष्मी घर में नहीं है, कहीं चली गई है,’’ कावेरी ने जब यह बात कही तब प्रकाश बोला, ‘‘मैं लक्ष्मी को यहां से 5 किलोमीटर दूर एक मंदिर में दोस्तों के साथ छोड़ कर आया हूं.’’
‘‘मगर तुम्हें लक्ष्मी मिली कहां?’’ दीनानाथ ने पूछा.
‘‘उसी भवानी शंकर के  कुएं पर खुदकुशी करने जा रही थी. जब मैं ने वजह पूछी, तब उस ने सब सचसच बताया. क्या सोच रहे हैं आप लोग?’’
वे दोनों तत्काल प्रकाश के साथ हो लिए. इस तरह प्रकाश और लक्ष्मी के बीच मंदिर में हुई शादी के वे दोनों सहभागी बने.


‘‘अरे दीनानाथ, किस धुन में जा
रहे हो. तुम्हारा घर तो पीछे छूट गया,’’ जब मानमल ने दीनानाथ से यह कहा
तब वे अतीत से वर्तमान में लौटे. वे पलट कर अपने घर में घुस गए.
घर में घुसते ही कावेरी बोलीं, ‘‘सारे गांव में हमारी थूथू हो रही है.’’
‘‘होने दो कावेरी, थोड़े दिन कह कर लोग चुप हो जाएंगे. मगर इनसानियत अब भी बची है कि प्रकाश ने लक्ष्मी से शादी कर के हमारी इज्जत बचा ली,’’ दीनानाथ ने यह बात कही.
कावेरी कुछ नहीं बोलीं, बल्कि गुमसुम खड़ी रहीं.     Hindi Story  

Hindi Story: हिसाब

Hindi Story: पिता का साया उठते ही मुन्नी का बचपना अचानक बालिग हो गया. परिवार पालने के लिए वह आर्केस्ट्रा में डांसर बनी जहां साहिल ने उस की देह भोगी. भाई भी उसे पसंद नहीं करता था. क्या मुन्नी के बलिदान का हिसाब हुआ?

मुन्नी को कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब बड़ी हो गई. उस के जीवन में उम्र का बढ़ना किसी उत्सव की तरह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह आया, बिना पूछे, बिना रुके. मुन्नी घर की बड़ी बेटी थी. छोटे भाई की बड़ी बहन और मां के लिए एक ऐसा सहारा जो बचपन में ही बालिग बना दिया गया. जब मुन्नी 12 साल की थी, तभी पिता का साया उठ गया. प्राइवेट नौकरी थी उन की, कोई पैंशन नहीं, कोई जमीनजायदाद नहीं.

पिता की मौत के बाद सरकार की अनुकंपा पर मां को नौकरी तो मिली, पर इतनी मामूली कि उस से घर का गुजारा ही बड़ी मुश्किल से हो पाता था. घर में शोक था, पर उस से भी बड़ा बोझ जिम्मेदारी का था. पिता के जाने के कुछ महीनों बाद ही मुन्नी की किताबें धीरेधीरे बंद होने लगीं. 8वीं जमात के बाद स्कूल जाना छूट गया. मां ने कहा नहीं था कि पढ़ाई छोड़ दो, पर हालात ने कह दिया था. किसी ने जोर नहीं डाला, किसी ने रोका भी नहीं. समाज में यह तय था कि लड़की की पढ़ाई रुके तो चलेगा, पर लड़कों की नहीं. मुन्नी ने चुपचाप यह नियम स्वीकार कर लिया.

किशोरावस्था मुन्नी के जीवन में आई ही नहीं. जब उस की सहेलियां सपने बुन रही थीं, तब वह सुबह चूल्हा जलाती, भाई को स्कूल भेजती और मां की थकी आंखों में झांक कर समझ जाती कि शिकायत का कोई मतलब नहीं. वह खुद को भूले चली गई. 18 की उम्र, वही उम्र जब लड़कियां खुद को खोजती हैं, सजती संवरती हैं और भविष्य के सपने देखती हैं, लेकिन मुन्नी के लिए यह उम्र एक डर बन कर आई. समाज की बेरहम नजरें, महल्ले की फुसफुसाहट और हर दिन बढ़ता बोझ.

एक डाक्टर के यहां सेविका की नौकरी मिली, 5,000 रुपए महीना. यह नौकरी मुन्नी के लिए सम्मान नहीं, मजबूरी थी. सुबह से शाम तक काम, फिर घर लौट कर वही जिम्मेदारियां. शरीर थक जाता, मन उस से पहले. यहीं मुन्नी की मुलाकात साहिल से हुई. साहिल सिक्योरिटी गार्ड था, स्मार्ट, आत्मविश्वासी और बातों में चालाक. उस ने मुन्नी से वैसे बात की, जैसे अब तक किसी ने नहीं की थी. दया, आदेश, बस अपनापन.
मुन्नी के जीवन में पहली बार किसी ने उस से पूछा था, ‘‘तुम थक जाती हो ?’’

यह सवाल मुन्नी को भीतर तक छू गया. धीरेधीरे वह साहिल की बातों पर भरोसा करने लगी. उस ने मुन्नी को समझाया कि उस की मेहनत की सही कीमत नहीं मिल रही. उस ने शहर की एक नामी आर्केस्ट्रा कंपनी में काम करने का सुझाव दिया, जहां एक रात में 1,000 से 1,200 रुपए मिलते थे. खाना अलग.
‘‘इस से घर की हालत सुधर जाएगी,’’ साहिल ने कहा. मुन्नी ने ज्यादा नहीं सोचा. वह सोच भी कैसे पाती? उसे बचपन से यही सिखाया गया था कि वह दूसरों के लिए जिए. मां और भाई को बताया गया कि नाइट ड्यूटी है. सच आधा था, झूठ पूरा.

आर्केस्ट्रा कंपनी में मुन्नी की शुरुआतबैक डांसरके रूप में हुई. पहले दिन मंच पर चढ़ते समय उस के पैर कांप रहे थे. तालियों की आवाज अजनबी थी, नजरें और भी ज्यादा. धीरेधीरे उसे तालियों की आदत पड़ गई. फिर कपड़े छोटे हुए, कदम तेज हुए और आत्मसम्मान कहीं पीछे छूटा चला गया. एक साल के भीतर मुन्नी फ्रंट लाइन में थी. आमदनी बढ़ी, पर कीमत भी. पैसा घर जा रहा था, भाइयों की पढ़ाई चल रही थी, इसी ने उसे चुप रखा. साहिल से नजदीकियां बढ़ीं. मुन्नी ने पहली बार भविष्य के सपने देखेशादी, सम्मान, एक सामान्य जीवन. लेकिन हर बार जब वह शादी की बात करती, साहिल टाल देता.

साहिल के लिए मुन्नी कभी सिर्फ एक लड़की नहीं थी, बल्कि वह उस के लिए सुविधा थी, सहारा थी और बिना जवाबदेही का रिश्ता. उसे मुन्नी से वह सब मिला, जिस के लिए किसी भी मर्द को समाज के सामने कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती. मुन्नी के बढ़ते पैसों से साहिल की जिंदगी आसान होती गई. कभी मोबाइल रिचार्ज, कभी कपड़े, कभी दोस्तों के साथ शराबछोटीछोटी जरूरतों के नाम पर वह उस का पैसा लेता रहा और मुन्नी देती रही, क्योंकि उसे यह सिखाया गया था कि प्रेम में हिसाब नहीं होता. जिस देह को साहिल सार्वजनिक मंच पर नाचते देखता था, उसी देह को निजी कमरों में वह बिना किसी वचन, बिना किसी भविष्य के भोगता था.

सब से बड़ा फायदा यह था कि साहिल को कुछ भी साबित नहीं करना पड़ता था. शादी का दबाव, जिम्मेदारी का बोझ, समाज का डर, क्योंकि समाज का नियम सीधा है कि अगर रिश्ता टूटेगा, तो सवाल औरत से होंगे. साहिल जानता था कि मुन्नी  के पास जाने को कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है. उस की मजबूरी ही साहिल की ताकत थी. जब तक मुन्नी उस के लिए उपयोगी थी, भावनात्मक रूप से भी, आर्थिक रूप से भी, तब तक साहिल मुसकराता रहा. और जिस दिन मुन्नी ने सम्मान मांगा, शादी की बात की, भविष्य में बराबरी चाही, उसी दिन साहिल ने समाज का सब से पुराना हथियार उठायाचरित्र.

‘‘तुम जैसी लड़कियों से शादी नहीं की जाती,’’ यह कहते समय साहिल यह भूल गया या जानबूझ कर अनदेखा कर गया कितुम जैसी लड़कीउस ने खुद बनाई थी, अपने फायदे के लिए, अपनी सुविधा के लिए. यह एक वाक्य नहीं था. यह समाज का फैसला था, साहिल के मुंह से निकला हुआ. मुन्नी को लगा जैसे किसी ने उस के भीतर सालों से जमा आत्मसम्मान को एक झटके में कुचल दिया हो. उसे याद आया वही साहिल, जिस ने उसे इस रास्ते पर चलने की सलाह दी थी. वही साहिल, जिस ने उस की देह को चाहा, उस के पैसों से सुविधा पाई और उस के त्याग को चुपचाप इस्तेमाल किया.

आज वही साहिल उसेतुम जैसी लड़कीकह रहा था. उस पल मुन्नी को पहली बार साफ दिखा कि समाज और मर्द, दोनों की नैतिकता एकजैसी होती है. जरूरत पड़ने तक चुप्पी और जरूरत खत्म होते ही चरित्र का सवाल. आर्केस्ट्रा में नाचते समय जिन हाथों ने तालियां बजाई, उन्हीं हाथों ने अब उंगलियां उठाईं. दिन में वही लोग उसे गिरी हुई कहते थे और रात में उसी पर नोट उड़ा कर खुद को सभ्य समझते थे. मुन्नी ने महसूस किया कि उस ने कभी कोई गलत चुनाव नहीं किया, उस के सामने बस गलत औप्शन रखे गए थे. उस की सब से बड़ी गलती यह थी कि उस ने भरोसा किया और इस समाज में एक औरत का भरोसा ही उस का सब से बड़ा अपराध होता है.

उस रात मुन्नी देर तक आईने के सामने बैठी रही. उस आईने में उसे नर्तकी दिखी, प्रेमिका बस एक औरत दिखी, जिसे हर किसी ने अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित किया था. मुन्नी को समझ गया कि औरत की देह जब तक जरूरत है, तब तक मौन स्वीकृति है और जैसे ही वह सम्मान मांगती है, उसे उस के अतीत से सजा दी जाती है. मुन्नी इस दुनिया से निकलना चाहती थी. लेकिन पैसों की कमी, भाई की पढ़ाई और घर का खर्च, सब ने उस के पैरों में बेडि़यां डाल रखी थीं. मुन्नी की उम्र 30 के पार पहुंची. काम मिलने लगा कम. भाई बड़ा हो गया था. उसे सबकुछ समझ आने लगा था, पर उस ने भी आंखें बंद कर लीं. सच देखना आसान नहीं होता खासकर जब सच आप के आराम की कीमत पर हो.

मां की मौत के बाद मुन्नी पूरी तरह अकेली रह गई. मुन्नी का भाई सबकुछ जानता था. वह इतना मासूम था कि सच समझ पाता, इतना नासमझ कि हालात से अनजान रहता. भीतर ही भीतर उसे बहन के काम से नफरत थी, ऐसी नफरत जो बोलती नहीं, बस जलाती रहती है. लेकिन वह चुप रहा. इसलिए नहीं कि उसे सच स्वीकार था, बल्कि इसलिए कि वही सच उन के भविष्य की सीढ़ी बन चुका था. मुन्नी की कमाई से भाई की पढ़ाई चली, किताबें आईं, कपड़े बदले, सपने बड़े हुए. वह घर में उस की ओर
देखता कम था, उस के पैसों की ओर ज्यादा. जब पड़ोस में बातें होतीं, सिर झुका लेता. विरोध नहीं, बस बचाव. क्योंकि विरोध की कीमत होती है और उस कीमत को चुकाने की हिम्मत उस में नहीं थी.

भाई ने अपना घर बसा लिया था. जिस के लिए मुन्नी ने सबकुछ दांव पर लगाया था, वही उस से दूरी बनाने लगा. अब उसे उस के पैसों की जरूरत नहीं थी और समाज में एक औरत की कीमत अकसर उस की जरूरत तक ही होती है. वह उस समय चाहता था कि बहन इस दलदल से बाहर आए, लेकिन बिना यह पूछे कि बाहर आने के बाद वह जिएगी कैसे. उस की चुप्पी में नाराजगी भी थी, अपराधबोध भी, पर उस से ज्यादा सुविधा थी. और यह सुविधा नैतिकता की सब से बड़ी कमजोरी बन गई. आज जब मुन्नी अपने घर में सम्मान से बैठी है, तब उस की चुप्पी और भी गहरी हो गई है. अब बोलने से सिर्फ एक ही सवाल उठेगा किजब तुम्हें नफरत थी, तब तुम ने आवाज क्यों नहीं उठाई?’

मुन्नी उसी एक कमरे में रह गई, खामोश, अकेली, थकी हुई. आज वह समझ रही है कि औरत का जीवन अकसर कर्तव्य औरचरित्रके बीच पिसता है. अगर वह परिवार के लिए जिए, तो त्याग की देवी. अगर अपने लिए कुछ चाहे, तो चरित्र पर सवाल. नाचने वाली औरत को हर मर्द भोगता है, चाहे वह प्रेमी के रूप में हो, भाई के रूप में या समाज के रूप में. आज मुन्नी किसी मंच पर नहीं नाचती. अब उस के जीवन में तालियां नहीं हैं, सिर्फ सन्नाटा है. वह उसी एक कमरे में रहती है, जहां दीवारों पर अब भी बीते सालों की आवाजें टकरा कर लौट आती हैं. कभी मां की थकी सांसें, कभी भाई की पढ़ाई की चिंता, कभी साहिल की मीठी और फिर कड़वी बातें.

मुन्नी अब किसी से शिकायत नहीं करती. शायद इसलिए नहीं कि दर्द कम हो गया है, बल्कि इसलिए कि वह समझ चुकी है कि इस समाज में औरत की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं, जब तक वह मनोरंजन बने.
मुन्नी अपनेआप से पूछती है कि क्या उस का त्याग कभी किसी खाते में दर्ज हुआ? क्या उस की जवानी, उस का श्रम, उस का मौन किसी रजिस्टर में लिखा गया? या फिर औरत का बलिदान हमेशा स्वाभाविक मान कर भुला दिया जाता है? मुन्नी को याद आता है कि जब वह कमाती थी, तब सब चुप थे. जब उस ने सवाल किया, तब सब ने चरित्र देखा. समाज ने उस से कभी यह नहीं पूछा कि उस ने क्या खोया, बस यह गिना कि उस ने क्यागलतकिया.

मुन्नी को इस बात का दुख नहीं है कि उस ने सब के लिए जिया, दुख इस बात का है कि किसी ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि वह भी इनसान थी. आज उस का भाई अपने बच्चों को अच्छे संस्कार सिखाता हैं. उन्हें नाचती औरतें बुरी लगती हैं. मुन्नी यह सोच कर मुसकरा देती है कि शायद उस के जीवन का बलिदान अगली पीढ़ी के लिए उदाहरण बन गया, लेकिन उस के लिए कभी इंसाफ नहीं बन सका. मुन्नी अब यह नहीं पूछती, ‘‘मेरे लिए कौन जिएगा?’’ अब मुन्नी एक और सवाल पूछती है, ‘‘कब तक औरत का बलिदान बिना हिसाब के चलता रहेगा?’’ शायद अब यही  सवाल मुन्नी की नई शुरुआत बने और उसे कुछ सुकून दे.     

पाकिस्तानी हौकी खिलाडि़यों ने आस्ट्रेलिया में धोए बरतन पाकिस्तान की नैशनल हौकी टीम के कप्तान इमाद बट ने आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद लाहौर हवाई अड्डे पर मीडिया से बात करते हुए कहा कि आस्ट्रेलिया में नैशनल टीम के खिलाडि़यों से रसोई, बरतन, कपड़े और बाथरूम साफ करवाए जाते थे. वे अपना खाना खुद पकाते थे और सड़कों पर रहते थे

बरतन धोने और सफाई करने के बाद खिलाड़ी मैच में कैसा प्रदर्शन करेंगे? कप्तान इमाद बट ने पाकिस्तान हौकी फैडरेशन के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए और कहा कि वे मौजूदा टीम मैनेजमैंट के साथ आगे नहीं बढ़ सकते. दरअसल, पिछले कुछ दिनों से आस्ट्रेलिया में खेल रही पाकिस्तानी हौकी टीम के खिलाडि़यों की तसवीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे थे, जिन में उन्हें अपना खाना पकाते और बरतन साफ करते हुए देखा जा रहा था. कई तसवीरों में वे बैग के साथ सड़क किनारे बैठे हुए भी नजर रहे थे.

मुनीष भाटिया

 

Hindi Story: पिघलता सावन

Hindi Story: डो बैल की आवाज सुन कर अमन ने दरवाजा खोला.
‘‘अरे, मंजरी तुम? यहां कैसे अचानक?’’
‘‘अंदर नहीं आने दोगे क्या? सारे सवालों के जवाब यहीं चौखट पर चाहिए?’’
‘‘अरे, नही. आओ, अंदर आओ,’’ अमन ने पानी का गिलास पकड़ाते हुए पूछा, ‘‘यहां कैसे?’’
‘‘तुम एक्सपैक्ट नहीं कर रहे थे मुझे’’
‘‘यों अचानक कैसे कर सकता हूंतुम्हीं बताओ?’’
अभी उन्होंने बात शुरू ही की थी कि अचानक मौसम पलटने लगा. सुरमई घटाओं के साए यहांवहां दौड़ने लगे, हवा ने भी ठंडक से दोस्ती कर ली और बादल भी अपनी धीमी आवाज में ताल छेड़ने लगे. सावन का महीना, कब धूप कब बारिशवैसे भी दिल्ली का अपना कोई मौसम तो है नहीं. आसपास के मौसम में रंग जाता है और बिखर भी जाता है.
‘‘लगता है कि बारिश होगी…’’ अमन ने मंजरी के हाथ से गिलास वापस लेते हुए कहा.
‘‘हां, लगता तो है.’’
‘‘इस से तो तुम्हें वापसी में परेशानी हो सकती है.’’
‘‘तो क्या मैं यहां नहीं रुक सकती?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘फैसला तुम्हारा ही था, रुकने का,’’ अमन ने मंजरी की बु? सी आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें जाना क्यों है? क्यों जाना चाहती हो अपना भरापूरा, बसाबसाया घर छोड़ कर
‘‘सबकुछ तो है तुम्हारे पास. एक बड़ा घर, बैंक बैलेंस, 2 खूबसूरत बच्चे, एक अच्छी नौकरी वाला सच्चा पति और उस पर तुम्हारी इतनी अच्छी जौब. मु? से ज्यादा ही कमाती हो, फिर संतुष्ट क्यों नहीं हो तुम?’’
‘‘हां, मैं संतुष्ट नहीं हूं तुम से.’’
‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ अमन
ने पूछा
‘‘यही कि तुम मु? संतुष्ट नहीं कर पाते हो.’’
अमन पर जैसे बिजली गिरी. कुछ देर चुप्पी छाई रही, फिर अपने अंदर की सारी ताकत जमा करता हुआ वह बोला, ‘‘देखो, मैं एक आम इनसान हूं, कोई सुपरमैन नहीं.’’
‘‘पर मु? सुपरमैन ही चाहिए…’’ मंजरी ने अमन के चेहरे पर नजर गड़ाए हुए कहा, ‘‘जो मु? शारीरिक रूप से संतुष्ट कर सके, चरम सुख का अहसास
करा सके.’’
‘‘वाहियात किस्म की मैगजीन पढ़ कर दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा.’’
‘‘छोड़ो, मैं तुम से किसी बहस में उल?ाना नहीं चाहती.’’
‘‘अगर मु? में कुछ कमी होती तो हमारे ये 2 बच्चे कैसे हो गए?’’
‘‘बच्चे तो हिजड़ों के भी हो जाते हैं,’’ मंजरी की यह बात सुन कर अमन भीतर ही भीतर गुस्से से तमतमाने लगा. उस का दिल चाहा कि 2 थप्पड़ में सारा चरम सुख पानी की तरह बहा दे, लेकिन उस ने खुद पर बड़ी मुश्किल से
कंट्रोल पाते हुए कहा, ‘‘देखो, अभी तुम बहकी हुई हो, सोचसम? कर सही फैसला लो.’’
‘‘अच्छी तरह सोच समझकर लिया है मैं ने यह फैसला. वैसे भी तुम्हारे साथ बहुत समय गंवा दिया है मैं ने. मैं तुम से तुम्हारी दौलत और जायदाद मैं से कोई हिस्सा नहीं मांग रही हूं और ही तुम्हें कोर्टकचहरी में फंसाना चाहती हूं. मैं बस तुम से आजाद हो कर अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बिताना चाहती हूंबिंदास.’’
‘‘चलो, मैं मान लेता हूं कि तुम्हें चरम सुख नहीं दे पाता हूं, मगर ऐसा
प्ले बौय टाइप का आदमी तुम्हें
मिलेगा कैसे और कहां?’’ अमन ने चिंतित आवाज में कहा.
मंजरी मुसकराती हुई अपना बैग उठा कर दरवाजे से बाहर निकल गई.
‘‘हां, फैसला तो मेरा ही था. बच्चे कहां हैं? आज तो संडे है, घर पर ही होना चाहिए,’’ मंजरी ने इधरउधर नजर दौड़ाते हुए कहा.
‘‘बच्चे याद हैं तुम्हें?’’ अमन ने हैरानी से पूछा.
‘‘ताना दे रहे हो?’’
‘‘तुम जो चाहे सम?. तुम्हारा अपना दिमाग है और अपनी सोच.’’
‘‘जन्म तो मैं ने ही दिया था.’’
‘‘काश, जाते समय यह सोच लेती. खैर, छोड़ो मैं भी किन बातों में उल? गयाकौफी पियोगी?’’ अमन ने पूछा.
‘‘तुम ने बच्चों से क्या कहा? उन की मां कहां गई?’’
‘‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं दिल्ली शिफ्ट हो गया हूं?’’ अमन
ने कुरेदा.
‘‘तुम सरकारी नौकर हो, आसानी से पता मिल गया. बच्चों से क्या कहा तुम ने? और बच्चे हैं कहां?’’
‘‘इन सब बातों में क्यों उल? रही हो तुम? वैसे, तुम आई क्यों हो?’’
‘‘बताते क्यों नहींबच्चे कहां हैं?’’
‘‘जैसे मेरा पता किया, बच्चों का भी पता कर लेती…’’
‘‘मतलब तुम नहीं बताओगे?’’
‘‘क्या तुम भी बच्चों की रट
लगा रही होतुम ने कल रात कोई
सामाजिक उपन्यास पढ़ लिया क्या पोर्न मैगजीन की जगह?’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
बादलों की तेज गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी और बारिश होने लगी. अभी बारिश थोड़ी हलकी ही थी,
लेकिन शोर बहुत था पानी काजो पानी कभीकभी गंदगी अपने साथ बहा ले जाता है और ले भी आता है.
बाहर लौन में पानी के ऊपर गंदगी जमा होने लगी. साथ ही बारिश धीरेधीरे तेज होने लगी, लेकिन अब शोर कुछ कम हो गया था.
मंजरी कुछ बोली, बस आंखें बंद किए सोफे से सिर टिकाए रही.
अमन ने उठ कर कौफी बनाई, साथ ही कुछ स्नैक्स भी टेबल पर ला कर रखते हुए बोला, ‘‘कौफी पियो.’’
‘‘तुम तो मेहमान सम? कर खातिरदारी कर रहे हो…’’ मंजरी ने अमन की आंखों में ?ांकते हुए कहा.
‘‘लेकिन मेहमानों से लोग खुश
होते हैं.’’
‘‘पर मेरे आने से तुम खुश नहीं हो.’’
‘‘सच तो यह है कि कोई अहसास ही नहीं हो रहा है.’’
‘‘अगर मैं आती तो?’’
‘‘तो कुछ नहींअब आई हो तो भी कुछ नहींकुछ जिंदा नहीं है.’’
‘‘ठीक कहा तुम ने. हम मर ही तो जाते हैं ख्वाहिशों में घिर कर…’’
‘‘तुम्हारे चरम सुख का अहसास कैसा रहा और अनुभव भी?’’
‘‘कुछ दिन तो अच्छा लगता है, फिर हम थकने लगते हैं.’’
‘‘तो अभी अच्छा लगता है या थक गई हो?’’
‘‘तुम्हें क्या लगता है?’’
‘‘थकावट तुम पर ज्यादा भारी पड़ गई है शायद.’’
‘‘तुम पहले से भी ज्यादा सम?ादार हो गए हो.’’
बारिश अब मूसलाधार हो गई है.
घर के आंगन में थोड़ा पानी ठहरने लगा है. बाहर की सड़कें डूब गई हैं. सारा कूड़ाकचरा पानी पर तैरने लगा है. बारिश के दिनों में दिल्ली बद से बदतर हो
जाती है.
‘‘तुम यहां कहां ठहरी हुई हो? वैसे, मु? पूछना तो नहीं चाहिए था,’’ अमन ने चुप्पी तोड़ी.
‘‘क्या जाने के लिए कह रहे हो?’’
‘‘सम?ादार तो तुम भी बहुत हो,’’ कहते हुए अमन ने खिड़कियों के परदे हटा दिए और कांच वाले पल्ले खोल दिए. अब ड्राइंगरूम में कुछ ताजा हवा आने लगी.
‘‘अभी तो शाम होने में समय है,
जब बरसात रुक जाए तो चली जाना,’’ अमन बोला.
‘‘सैक्स में भी यही होता हैपानी खत्म सैक्स खत्म. बरसात हवस एकजैसे ही हैं, जब तक बरसात कायम है तब तक मौसम सुहाना रहता है, उस के बाद उमस. सैक्स में आकर्षण तो है, पर हमेशा के लिए नहीं.’’
‘‘हमेशा के लिए तो कुछ भी नहीं होता मंजरी.’’
‘‘प्यारहोता है हमेशा के लिए.’’
‘‘अब तुम 40 की हो गई हो. जब
28 की थी तो चरम सुख के लिए भटकी, अब प्यार के लिए? तुम ने जिंदगी को जरूरतों के हिसाब से जीने की कोशिश की, पर जिंदगी आपसी तालमेल और सहयोग से भी जी जा सकती थी,’’ अमन ने कहा.
‘‘उपदेश दे रहे हो?’’
‘‘जब उपदेश देना चाहता था, तब तुम ने सुना नहीं. अब क्या फायदा इन प्रवचनों का?’’
‘‘भूल सुधारी भी जा सकती है और राह से भटका इनसान सही राह पर भी सकता है.’’
‘‘बिलकुल, अगर वह भूल हो तो.’’
‘‘तुम क्या चाहते हो ? मैं पछतावा करूं?’’ मंजरी थोड़ी तेज आवाज में अमन से बोली.
‘‘नहीं. मैं क्यों चाहूंगा? मेरा इस
से क्या सरोकार?’’ अमन ने कहा.
‘‘सरोकार होता तो तुम वह करते जो मैं कहती थी.’’
‘‘मतलबजोश बढ़ाने वाली
दवा? जो तुम मैगजीन में पढ़ कर सजैस्ट करती थी…’’
‘‘पर तुम एक बार कोशिश कर के तो देखते.’’
‘‘मैं जैसा था खुद से सैटिस्फाई था और हूं भी. तुम भी अब सैटिस्फाई
तो होगी? 12 साल से चरम सुख लेने
के बाद?’’
कमरे में खामोशी छा गई. सिर्फ बारिश की आवाज अपने सुरीले अंदाज में आलाप ले रही थी. हवा में थोड़ी और ठंडक बढ़ गई थी और थोड़ा अंधेरा भी बढ़ गया था. ऐसा लगता था सावन आज अपने पूरे जोबन पर है.
‘‘तुम मु? माफ नहीं कर सकते?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘शायद तुम जानती हो कि मैं इस तरह नहीं सोचता. अंधेरा बढ़ रहा है और बारिश भी. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहेगा. बारिश भी रुकेगी और अंधेरा भी छंटेगा. बस, थोड़ा सा समय लगेगा,’’ अमन ने कहा.
‘‘मगर, इस चक्कर में कहीं ज्यादा देर हो जाए?’’
‘‘तुम फिक्र मत करो, मु? खाना बनाना आता है. आज मेरे हाथ का बना खाना खा कर जाना,’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘मैं ने खाने की बात नहीं की. और यह क्या तुम ने जाने की रट सी लगाई हुई है?’’
‘‘तो फिर…’’ अमन बोला.
‘‘मैं कहीं नहीं जाने वाली.’’
‘‘इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी मंजरी.’’
‘‘इस बार भी मेरी ही चलेगी. मैं यहां  तुम्हारे पास मरने आई हूं. मेरा हक है अपने घर में मरना. मैं अभी भी तुम्हारी पत्नी हूं.’’
‘‘कहना क्या चाहती हो?’’
‘‘2 महीने हैं मेरे पास, वे तुम्हारे साथ  बिताना चाहती हूं. यूटरस में कैंसर पड़ गया है.’’
‘‘यूटरस तो निकाला जा सकता है.’’
‘‘तो तुम मु? जिंदा देखना चाहते हो?’’ मंजरी पहली बार खिलखिला
कर हंसी और हंसती ही रही बड़ी देर तक, फिर अचानक मंजरी की हंसी
रुक गई.
अमन ने मंजरी की तरफ देखा. वह एक ओर को लुढ़की हुई थी.
अमन लपक कर उस तक पहुंचा. मंजरी को सीधा कर लिटाया. उस
ने चैक किया, सांसें चल रही थीं.
उस ने जल्दी से पानी के छींटे मुंह
पर मारे.
कुछ ही देर के बाद मंजरी को होश गया. वह थकी हुई आवाज में
बोली, ‘‘लास्ट स्टेज. यूटरस निकलवा चुकी हूं. आपरेशन हो चुका है, पर
कैंसर बाकी हिस्से में फैल चुका है. सिर्फ 2 महीने…’’
बारिश आहिस्ताआहिस्ता कम होने लगी. काली घटाएं छटने लगीं और  अंधेरा भी कम होने लगा था. सड़क का पानी अपने साथ गंदगी बहा कर ले गया. घर का आंगन भी बरसात के पानी से धुल कर चमकने लगा था.
‘‘अब कहो तो मैं चली जाऊं?’’ मंजरी ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘नहीं. इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी,’’ मौसम की नमी अब अमन की आंखों में थी.
मौसम बिलकुल साफ था.      

लेखक – अहमद मुख्तार

Hindi Kahani: लुट गई जोगी तेरे प्यार में

Hindi Kahani: जमीला और शर्मिला पक्की सहेलियां थीं. उन की दोस्ती को देख कर घरपरिवार वाले और पड़ोसी उन्हें दो जिस्म एक जान कहते थे. दोनों सहेलियों ने गांव में ही एकसाथ पढ़ाई की थी. आगे की पढ़ाई के लिए गांव में स्कूल होने, गरीबी और परदा प्रथा की वजह से उन के परिवारों ने आगे दिलचस्पी नहीं दिखाई. नतीजतन, वे दोनों घर पर ही रह कर परिवार के साथ बीड़ी बनाने का काम करने लगीं.
जमीला कब जवान हो गई, उस की सम? में नहीं आया. घर के बड़ेबूढ़े जब उसे टोकते, ‘बड़ी हो गई है तू, ठीक से दुपट्टा ओढ़ कर बाहर निकला कर. अकेले घूमने मत जाना. बहू, इसे नकाब ला कर दे. अब कोई छोटी बच्ची थोड़े ही है, बड़ी हो गई…’


वह सोचती, ‘आखिर मु? में ऐसा क्या हुआ है? जब मैं स्कूल जाती थी, तब कोई कुछ नहीं कहता था.’
शर्मिला की शादी पास के गांव में हो गई और जमीला अकेली रह गई. दिल की बात कहनेसुनने वाला कोई रहा. उस की जिंदगी कैद के पंछी की तरह रह गई. बीड़ी बनाते और घर का काम करतेकरते उस का दम घुटने लगा. समय पंख लगा कर उड़ने लगा. जवानी जमीला को जिंदगी का मजा लूटने की दावत देने लगी. वह अंदर ही अंदर कसमसाने लगी. जब वह जवान जोड़ों को देखती, तो उस की बेचैनी और बढ़ जाती. शहनाई की आवाज सुन कर वह जोश में जाती. ‘‘जमीला के अब्बू, देखनाजमीला को क्या हुआ है…’’ उस की मां ने घबरा कर आवाज दी.


‘‘आया बेगम,’’ बाहर अपने दोस्तों के साथ बैठे जमीला के अब्बू जावेद मियां ने कहा. वे दौड़ेदौड़े बैठक में आए, जहां जमीला अकेली बैठी बीड़ी बनातेबनाते बेहोश हो कर गिर गई थी. ‘‘क्या हुआ बेटी, देखो मु?आंखें खोलोबेगम, पानी लाओइस के मुंह पर पानी के छींटे मारो,’’ जावेद मियां ने कहा. तब तक उन के दोस्त भी अंदर गए थे. ‘‘कैसे हो गया यह सब?’’ मौलाना ने पूछा, जो जावेद के दोस्त थे.
‘‘क्या बताऊंजमीला बैठी बीड़ी बना रही थी कि एकाएक बेहोश हो कर गिर पड़ी,’’ जमीला की मां ने बताया. मौलाना ने ?ाड़फूंक शुरू कर दी. मुंह पर पानी के छींटे मारे, प्याज सुंघाई गई और तकरीबन आधा घंटे बाद जमीला को होश गया. जमीला कुछ थकीथकी सी लग रही थी, इसलिए उसे आराम करने की सलाह दे कर जावेद मियां के दोस्त वहां से चले गए. दूसरे दिन मौलाना ने जावेद मियां के घर पर दस्तक दी. दोनों बैठ कर जमीला की बीमारी पर बातचीत करने लगे.


‘‘देखो जावेद मियां, ऐसे हालात में लड़की की शादी करने में मुश्किल आएगी,’’ मौलवी ने कहा. ‘‘बात तो सही है, पर इस का कोई उपाय तो बताओ? ‘‘जमीला के ठीक होते ही मु? जैसा भी लड़का मिलेगा, मैं उस की शादी कर दूंगा,’’ कह कर जावेद मियां चुप हो गए. ‘‘ठीक है, मैं पता करता हूं, फिर तुम्हें खबर करूंगा…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘अब मैं चलता हूं.’’ तकरीबन हफ्तेभर बाद मौलाना जावेद मियां के घर दोबारा आए. ‘‘आओ मौलाना, काफी दिन बाद आना हुआ,’’ जावेद मियां ने कहा. ‘‘मैं तुम्हारे काम में लगा था. बड़ी मुश्किल से एक शख्स मिला है. उस का कहना है कि वह लड़की को ठीक कर देगा. कुछ वक्त लगेगा, पैसा भी खर्च होगा. जब तक ?ाड़फूंक चलेगी, तब तक यह बात किसी तक पहुंचे, वरना इल्म टूट जाएगा.’’ ‘‘मौलाना, मु? हर शर्त मंजूर है. तुम आज से ही इलाज शुरू करा दो. अपनी बेटी की बेहतरी के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.’’


मौलाना के मन में खोट था. उस ने अपने एक दूर के साले असद से इस पूरे मसले पर पहले ही बात कर ली थी. मौलाना ने उस से कहा था, ‘देखो मियां, मैं ने सौदा पटा लिया है. जावेद मियां की जमीन अपनी जमीन से लगी हुई है. हमें उसे हड़पना है. अब जा कर फंसा है. पहले तो बड़ीबड़ी बातें करता था, खेत जाने का रास्ता बंद कर दिया था, इसलिए मजबूरी में मु? उस से दोस्ती करनी पड़ी. तुम ऐसी चाल चलो कि जावेद की जमीन बिक जाए और वह मु?मिल जाए.’ असद एक शातिर बदमाश था. उस की बीवी उस की हरकतों से तंग कर पिछले 10 सालों से अपने मायके में बैठी थी. गांव के भोलेभाले लोगों को गंडेतावीज बना कर देना, उन से रकम ऐंठना उस का पेशा था. असद ने जावेद मियां के घर कर अपना काम शुरू कर दिया. शुरूशुरू में तो जमीला को कुछ भी अच्छा लगा, लेकिन अकेले में पराए मर्द को पा कर वह धीरेधीरे खुश रहने लगी. जब असद को महसूस हुआ कि जमीला उस की ओर खिंच रही है, तो उस ने जावेद मियां से कहा, ‘‘जावेद साहब, कुछ जरूरी काम से मैं 1-2 दिन के लिए घर जा रहा हूं, लेकिन जल्दी ही वापस जाऊंगा.’’


जाने से पहले मौलाना और असद के बीच साजिश की लंबी बात चली. इसी के तहत वह अचानक अपने घर चला गया. इधर जावेद मियां परेशान हो उठे, क्योंकि जमीला फिर से बारबार बेहोश होने लगी थी.
वे घबरा कर मौलाना के पास गए और असद को जल्द से जल्द बुलाने की गुहार लगाई. मौलाना की खबर पा कर असद वापस आया ही था कि 8-10 मर्द और औरत उसे ढूंढ़ते हुए जावेद मियां के घर जा पहुंचे.
वे सभी गुजारिश करने लगे, ‘जोगी बाबा गांव वापस चलो, हम सब परेशान होने लगे हैं.’ इसी बीच मौलाना ने कर लोगों को सम?ाया कि आप के जोगी बाबा 2 दिन बाद आप के पास जाएंगे. रात में असद उर्फ जोगी बाबा के शरीर में भयानक हलचल होने लगी और वह जोरजोर से हंसने लगा. घर के सभी लोग जाग गए. बाहर से आए उस के चेले दुआ मांगने लगे, परेशानी से बचने के उपाय पूछने लगे. जोगी बाबा का गुस्से से भरा मिजाज देख कर सब डर गए. असद ने बताया कि जावेद के घर के पीछे किसी ने काला जादू कर दिया है, उसे निकाल कर नदी में डाल दो. पर सावधान, किसी की जान जा सकती है. 5 क्विंटल पुलाव बना कर फातिहा दिलाओ और पहले कहीं से काले जादू की पुडि़या ढूंढ़ो.

ज्यादा से ज्यादा लोगों को खाना खिलाओ. जोगी बाबा जो कहे वह करो. सब ठीक हो जाएगा.
काफी मशक्कत के बाद आखिर कपड़े में लिपटी एक पुडि़या मिल गई. उस पुडि़या में हड्डी, काजल, सिंदूर, अनाज, काली चूड़ी वगैरह मिली. शक अब यकीन में बदल गया. ‘‘जावेद मियां, बात को सम?…’’ मौलाना ने कहा, ‘‘बच्ची प्यारी है या जायदाद. तुम ऐसा करो कि मेरे नाम जमीन की रजिस्ट्री कर दो. पूरा खर्चा मैं करता हूं. जब पैसा हो, तो मेरा पैसा लौटा देना और जमीन वापस ले लेना.’’ मौलाना ने अपनी चाल से जावेद को फांस लिया. अंधविश्वास में फंसे जावेद ने मौलाना की बात मान कर जमीन की रजिस्ट्री उन के नाम कर दी. इधर असद उर्फ जोगी बाबा ने ऐसी चाल चली कि जमीला ने अपनेआप को उस के हवाले कर दिया. अब वे दोनों बीमारी की आड़ लेकर जिंदगी का मजा लूटने लगे. ?ाड़फूंक के बहाने अब दोनों को कोई नहीं रोक पाता था. जमीला को जब से पराए मर्द का चसका लगा था, तब से वह खुश रहने लगी थी. उस के मांबाप इसे जोगी बाबा की ?ाड़फूंक का नतीजा मान रहे थे.

धीरेधीरे साल पूरा होने को आया. उस के मांबाप को जमीला की शादी की फिक्र होने लगी और वे
लड़के की तलाश में जुट गए. इस बात की भनक असद को लग गई. वह मौका पा कर वहां से रफूचक्कर हो गया. इसी बीच जमीला की शादी पक्की हो गई, लेकिन एक दिन वह अचानक बेहोश हो कर गिर पड़ी.
लोगों के ?ाक?ोरने पर भी होश नहीं आया, तो उसे अस्पताल ले जाया गया. लेडी डाक्टर ने जांच करने के बाद कहा, ‘‘हम ने बच्ची को देख लिया है. अब वह होश में गई है. आप उस का खयाल रखिए. भारी चीज उठाने दें, क्योंकि आप की बेटी मां बनने वाली है.’’ लेडी डाक्टर की यह बात सुन कर जावेद, उस की बेगम और रिश्तेदारों के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उन की जमीला ढोंगी जोगी के प्यार में लुट चुकी थी.  Hindi Kahani

लेखक  ए. खान

Hindi Story: दीवारों के उस पार

Hindi Story: 2 बच्चों की तलाकशुदा मां रोजी उत्तराखंड से काम के सिलसिले में गुरुग्राम गई. वहां उस की मुलाकात समीर से हुई, जिसे वह उत्तराखंड से ही जानती थी. समीर ने उसे लिवइन रिलेशनशिप में रहने के लिए कहा. क्या चल रहा था उस के मन मेंरोजी ने क्या जवाब दिया?

32  साल की रोजी मूल रूप से उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग की रहने वाली थी और 2 बच्चों की मां थी. उस की जिस लड़के से शादी हुई थी, वह शराब पीने का आदी था. गंदी हरकतें तो उस की रगरग में बसी थीं. रोजी ने भी हर लड़की की तरह सुनहरे सपने संजाए थे कि शादी के बाद वह अपने पति के संग घूमेगीफिरेगी और अपने सपनों को पूरा करेगी, लेकिन जिंदगी को कुछ और ही मंजूर था. रोजी का पति रोजाना शराब पी कर घर आता और जराजरा सी बातों को ले कर ?ागड़ा करता. उस की इन्हीं हरकतों से तंग कर रोजी ने अपने पति को तलाक दे दिया और हरियाणा गुरुग्राम में अपनी छोटी बहन पूजा के पास चली आई.

रोजी की छोटी बहन पूजा की शादी हो चुकी थी और वह अपने पति और बच्चों के साथ आराम से जिंदगी गुजार रही थी. 32 साल की होने के बावजूद रोजी लगती नहीं थी कि वह 2 बच्चों की मां है. उस ने अपने बदन को सलीके से संजोया था. जो भी उसे एक बाद देख ले, उस का दीवाना हो जाएरोजी के होंठ जैसे गुलाब की पंखुड़ी, उस के नुकीले उभार उस की खूबसूरती को चार चांद लगाते थे. रोजी गुरुग्राम के ही एक स्पा सैंटर में काम करने लगी और एक कमरा किराए पर रह कर रहने लगी. दोनों बच्चों को सुबह ही तैयार कर के स्कूल भेजती और फिर अपने काम से निकल जातीहालांकि, रोजी की मां अभी भी रुद्रप्रयाग में ही रहती थीं. पिता की मौत हो चुकी थी, इसलिए बीचबीच में वह अपनी मां का हालचाल जानने के लिए रुद्रप्रयाग चली जाती थी.


उम्र बढ़ने के साथसाथ रोजी की मां को कई तरह की बीमारियां भी साथ लग गई थीं. रोजी ही मां को अस्पताल में ले जाने और दवा का खर्च उठाती थी. एक दिन रोजी ने अपने बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेज दिया और खुद भी तैयार हो कर अपने स्पा सैंटर पर जाने के लिए निकली. रोजी पैदलपैदल ही अपने स्पा सैंटर की ओर जा रही थी कि अचानक से उस के पास एक कार कर रुकी. कार में एक नौजवान सवार था, जो कार को ड्राइव कर रहा था. उस ने कई बार हौर्न बजाया, तो रोजी सड़क पर किनारे हो गई और आगे बढ़ने लगी, लेकिन कार उस के पीछेपीछे रही थी. एक बार को तो रोजी घबरा गई और रुक गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा तो एकदम से हैरान रह गई. कार ड्राइव कर रहा नौजवान कार रोक कर बाहर निकला, तो रोजी के चेहरे पर एक प्यारी सी मुसकान बिखरी. रोजी के मुंह से अचानक निकला, ‘‘समीर, तुम यहां.’’ दरअसल, समीर वही लड़का था, जो रुद्रप्रयाग में रहता था और टैक्सी चलाता था और अकसर रोजी की मां को अस्पताल ले जाने में मदद करता था.


समीर ने इशारा किया तो रोजी कार में बैठ गई. थोड़ी दूर चलने के बाद समीर ने चुप्पी तोड़ी और बोला, ‘‘रोजी, तुम तो बिना बताए यहां चली आई, जिस के बाद रुद्रप्रयाग में मेरा भी मन नहीं लगा और मैं तुम्हारी तलाश में रुद्रप्रयाग से गुरुग्राम चला आया. ‘‘कई महीनों की तलाश के बाद आखिरकार आज तुम हाथ ही लग गई. यहां कर तुमने अपना मोबाइल नंबर भी बदल लिया, इस वजह से तुम्हें ढूंढ़ने में दिक्कत हुई…’’ ‘‘समीर तुम तो जानते हो, रुद्रप्रयाग में रहते हुए मैं कितना परेशान हो गई थी. मैं रुद्रप्रयाग की यादों को फिर से ताजा नहीं करना चाहती हूं.’’ ‘‘सौरी रोजी, मैं तुम्हारा दिल दुखाना नहीं चाहता, लेकिन मैं भी तुम्हारे बिना अकेला हो गया था. तुम मेरी बहुत अच्छी दोस्त हो और जब अच्छा दोस्त ही पास हो तो मन कैसे लग सकता है,’’ समीर ने मायूस हो कर अपनी बात कही. थोड़ी दूर चलने के बाद रोजी ने समीर से गाड़ी रोकने के लिए कहा. कार रुकने के बाद रोजी नीचे उतरी और बोली, ‘‘मैं यहां पर नौकरी करती हूं. मेरी ड्यूटी का टाइम हो गया है. मैं ज्यादा देर तक तुम्हारे साथ नहीं रुक सकती.’’


‘‘ओहो, तो मैडमजी.यहां पर नौकरी कर रही हैं और हम रुद्रप्रयाग की सड़कों पर धक्के खा रहे हैं,’’ समीर ने मजाकिया अंदाज में कहा तो रोजी जोर से हंस दी और बोली, ‘‘आखिर तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आओगे. खैर, मैं चलती हूं, शाम को फ्री हो कर तुम से बात करती हूं.’’ स्पा सैंटर में 2-4 कस्टमरों को देखने के बाद दोपहर होने पर रोजी ने घर से बना कर लाई खाना खाया और एक कुरसी पर आराम से बैठ गई. कब वह पुरानी यादों में खो गई, पता ही नहीं चला. उसे वह दिन याद गया, जब पति से अलग होने के बाद वह रुद्रप्रयाग से देहरादून में नौकरी की तलाश में जा रही थी. रुद्रप्रयाग के बसस्टैंड पर ही रोजी की समीर से मुलाकात हुई थी. दोनों एक ही बस में सवार हुए थे. रोजी विंडो सीट पर बैठी थी तो समीर उस के बगल वाली सीट पर कर बैठ गया था. पहाड़ की घुमावदार सड़क के चलते कई बार ऐसे मौके भी आए, जब दोनों एक दूसरे से बिलकुल सट गए. कई बार तो रोजी समीर के ऊपर गिरने से भी बची.
एक मौका ऐसा भी आया, जब समीर का हाथ रोजी की जांघ पर रखा गया. इस से रोजी पूरी तरह से सिहर उठी. उस के शरीर में एक अजीब तरह की हलचल हुई.


पति से तलाक के बाद किसी मर्द का हाथ रोजी की जांघ पर रखा था. रोजी का पति अकसर उस की जांघ पर हाथ फेर कर उसे प्यार करने के लिए तैयार करता था. खैर, रोजी ने किसी तरह से अपनेआप को संभाला. देहरादून चुका था. दोनों बस से नीचे उतरे और अलगअलग रास्तों पर निकल पड़े.
स्पा सैंटर की मैनेजर आई और ताली बजाई तो रोजी पुरानी यादों से बाहर निकली. करीब 2 महीने बाद रात के 11 बज रह थे. रुद्रप्रयाग से आई एक खबर से उस की आंखों की नींद गायब हो गई. दोनों बच्चों को सुला दिया था और रोजी खुद भी सोने की कोशिश कर रही थी, लेकिन नींद आंखों से काफी दूर थी. बैड पर लेटे हुए 2 घंटे से ज्यादा का समय गुजर चुका था. आधी रात बीत गई. रोजी ने मोबाइल उठाया और कुछ देखने लगी. फोन बुक खोली और जानकारों के नंबर सर्च करने लगी. एक मोबाइल नंबर और नाम पर नजर पड़ी तो रुक गई. यह नंबर समीर का था.


काफी सोचने के बाद रोजी ने नंबर डायल किया, ‘‘हैलो समीर, पहचानारोजी बोल रही हूं…’’ ‘‘मैडमजी, नमस्कार मैं तो आप की आवाज से ही पहचान गया था. फिर मेरे पास आप का नंबर सेव है,’’ समीर ने मजाक की कोशिश की तो रोजी बीच में ही रोकते हुए बोली, ‘‘समीर, मु? तुम्हारी हैल्प चाहिए.’’ ‘‘इतनी रात को क्या हुआ.. सब ठीक तो है .’’ ‘‘हां, सब ठीक है, क्या तुम मेरे साथ रुद्रप्रयाग चल सकते हो?’’ रोजी ने समीर से सवाल किया. ‘‘कब चलना है?’’ समीर ने पूछा. ‘‘अभी मेरी मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई है. उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ सकता है. कल शाम या परसों तक वापस जाएंगे. जितने भी पैसे लगेंगे मैं दे दूंगी,’’ रोजी ने कारण बताया. ‘‘ठीक है. तुम अपनी लोकेशन सैंड मैं, मैं कुछ ही देर में पहुंचता हूं.’’ करीब आधा घंटे के बाद समीर अपनी कार ले कर रोजी के घर पहुंच गया. रोजी ने अपने दोनों बच्चों को उठाया और उन्हें भी साथ ले कर रुप्रप्रयाग के लिए निकल पड़ी. दिन निकलने वाला था और कार रुद्रप्रयाग में एंट्री कर चुकी थी. कुछ ही देर में रोजी अपनी मां के पास पहुंच गई.


समीर ने रोजी की मां को अस्पताल ले जाने से ले कर दवा के खर्च में पूरी मदद की. रोजी की मां की हालत में सुधार हुआ. 1-2 दिन रुद्रप्रयाग में रुकने के बाद रोजी बच्चों को ले कर वापस गुरुग्राम लौट आई.
गुरुग्राम लौटने पर रोजी ने जब समीर से टैक्सी का किराया देने के लिए कहा तो समीर ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘रोजी, हम अच्छे दोस्त हैं और दोस्ती में भी मैं तुम से किराया लूं, तो लानत है मु? पर.’’ इस तरह जब भी रोजी रुद्रप्रयाग जाना होता, तो वह समीर की मदद लेती. उधर, समीर भी सोचता कि वह अपने अम्मीअब्बू की सेवा तो नहीं कर पाता, रोजी की बुजुर्ग मां ही सही. वे भी तो उस की अम्मी जैसी ही हैं. एक दिन समीर ने मौका देख कर अपने दिल की बात रोजी के सामने रख दी. वह बोला, ‘‘रोजी तुम मु? बहुत अच्छी लगती हो. क्या हमारी यह दोस्ती प्यार में बदल सकती है?’’ रोजी ने कोई जवाब नहीं दिया. ‘‘अगर कुछ गलत बोल दिया हो या तुम्हारे दिल को ठेस पहुंची हो तो सौरी.’’ समीर ने फिर से अपनी बात कही.


रोजी कुछ देर के लिए चुप रही और फिर बोली, ‘‘आगे कोई रैस्टोरैंट या ढाबा दिखाई दे तो गाड़ी रोक देना,’’ जिस पर समीर ने सड़क किनारे एक ढाबे पर कार को रोक दिया. कार से उतरते ही रोजी ने समीर से सवाल किया, ‘‘चाय लोगे?’’ समीर नेहांमें जवाब दिया. एक टेबल पर दोनों आमनेसामने बैठे थे. रोजी चाय की चुसकी लेते हुए सोचविचार करने की हालत में नजर रही थी. उस के चेहरे पर एक अजीब तरह का भाव था. समीर उसे बड़े ध्यान से देख रहा था, लेकिन कुछ नहीं बोला. वह सोच रहा था कि शायद रोजी उस की बातों से नाराज हो गई. चाय खत्म हुई तो रोजी ने पैमेंट किया. दोनों कार में सवार हुए और निकल गए. ‘‘मैडमजी, सीट बैल्ट लगा लीजिए, नहीं तो यह बेचारा बिना वजह मारा जाएगा.’’ समीर ने फिर मजाकिया अंदाज में कहा. कार थोड़ा आगे बढ़ी, तो रोजी ने सवाल किया, ‘‘समीर, तुम्हारी शादी हो चुकी है?’’ ‘‘नहीं,’’ समीर ने जवाब दिया. ‘‘मेरे बारे में कितना जानते हो, यही कि मैं भी रुद्रप्रयाग की हूं और
तुम भी…’’ इस से पहले कि रोजी कुछ और बोल पाती, समीर ने बोल पड़ा, ‘‘रोजी, इतने दिन हो गए तुम्हारे साथ दोस्ती कोजानता हूं, तुम तलाकशुदा हो, 2 बच्चों की मां होअपनी मां की देखभाल के साथ अपना और अपने 2 बच्चों का पेट पाल रही हो.


‘‘मां की देखभाल के लिए अपनी जौब की भी परवाह नहीं करती हो. अपनी मां से बहुत प्यार करती हो, इस से ज्यादा मु? जानना भी नहीं है,’’ इतना बोल कर समीर चुप हो गया. कार में पूरी तरह से सन्नाटा छा गया. इस सन्नाटे को रोजी ने ही तोड़ा और बोली, ‘‘ओके.’’ इस के बाद तो समीर और रोजी में रोजाना मोबाइल पर बाते होने लगीं. समीर रोजी से उस की मां के बारे में पूछता तो उसे लगता कि कोई उस का अपना है, जिस से वह अपना दुखदर्द शेयर कर सकती है. एक दिन रोजी अपनी छोटी बहन पूजा से मिलने के लिए उस के घर पहुंची तो पूजा की सास ने नाकमुंह सिकोड़ लिया. रोजी पूजा के पास करीब आधा घंटा रुकी. इस मुलाकात में उस ने अपने और समीर के बारे में सारी जानकारी दे दी. ‘‘दीदी, आप मु? से बड़ी हैं, फिर भी एक बात कहती हूं. जो भी कदम उठाना, सोचसम? कर ही उठाना,’’ पूजा ने रोजी से कहा.
‘‘अभी तक हम अच्छे दोस्त थे, कल ही समीर ने मु? प्रपोज किया है. मां को देखने के लिए कब जाना पड़ जाए, ऐसे में समीर ही काम आता है.’’ रोजी ने जवाब दिया.


थोड़ी देर के बाद रोजी फिर से बोली, ‘‘अभी तक समीर ने कुछ ऐसावैसा भी नहीं किया है. समीर किसी तरह की डिमांड भी नहीं की है और ही उस के हावभाव से लगता है कि वह कुछ गलत काम करेगा.’’
जैसेजैसे दिन गुजरते जा रहे थे, रोजी और समीर एकदूसरे के बेहद करीब आते जा रहे थे. कभीकभी तो पूरी रात ही फोन काल, व्हाटसऐप चैटिंग और वीडियो काल में गुजर जाती थी. एक दिन समीर ने रोजी को फोन किया. ‘‘हां, बोलो.’’ रोजी ने कहा. ‘‘मैं कह रहा था, आज शाम को जल्दी घर पहुंच जाना, रात का खाना एकसाथ करेंगे. दोनों बच्चों को भी तैयार रखना. मैं ठीक साढ़े 7 बजे तुम्हें लेने के लिए जाऊंगा.’’ रोजी नेओकेबोल कर फोन काट दिया. ठीक साढ़े 7 बजे समीर अपनी टैक्सी ले कर रोजी के घर के बाहर पहुंच गया और फोन कर के रोजी को बाहर बुलाया. रोजी सजसंवर कर किसी शादीशुदा औरत से कम नहीं लग रही थी. उस ने अपने फेवरेट ब्लू कलर का सूटसलवार पहना था. होंठों पर लगी हलकी गुलाबी लिपिस्टक उस के चेहरे पर चार चांद लगा रही थी. दोनों बच्चे भी साथ गए. रोजी आगे की सीट पर बैठी, जबकि दोनों बच्चों को पीछे की सीट पर बैठा दिया.


शहर के एक रैस्टोरैंट में पहुंच कर समीर ने खाने का और्डर दिया. खाना लगने में वेटर ने समय मांगा था. इस से पहले बच्चों के लिए आइसक्रीम वगैरह मंगा ली. समीर ने बात शुरू करते हुए कहा, ‘‘रोजी मेरे दिमाग में एक बात चल रही है.’’ ‘‘हां, बोलो…’’ रोजी ने पूछा. ‘‘क्या हम एकसाथ रह सकते हैं?’’ समीर ने अपनी जिज्ञासा जाहिर की. ‘‘मतलब?’’ रोजी ने पूछा. मतलब यही कि अगर हम दोनों लिवइन में रहें तो,’’ समीर ने बताया. समीर की भावनाओं को रोजी तुरंत सम? गई. एक प्यारी सी मुसकान बिखेरते हुए वह बोली, ‘‘इरादा तो ठीक है, लेकिन हम रहेंगे कहां? तुम्हारे पास भी एक ही कमरा है और मेरे पास भी एक ही कमरा है. 2 बच्चे भी हैं. कैसे एडजस्ट करेंगे?’’ ‘‘उस का इंतजाम हो जाएगा. कोई टू रूम सैट घर देख लेंगे दोनों मिल कर एडजस्ट कर लेंगे.’’ ‘‘ठीक है, लेकिन मेरी एक शर्त है…’’ रोजी बोली, ‘‘तुम मेरे साथ कोई शरारत नहीं करोगे.’’ ‘‘ओके मैं सम? गया. मैं वादा करता हूं, जब तक तुम इजाजत नहीं दोगी, तब तक मैं तुम्हें टच भी नहीं करूंगा.’’ समीर ने रोजी को भरोसा दिलाया. वेटर खाना ले कर चुका था. सभी ने भरपेट खाना खाया. समीर ने रैस्टोरैंट में पैमेंट किया और फिर रोजी और बच्चों को गुरुग्राम की सड़कों
पर घुमाया.


रात के तकरीबन 11 बजे समीर ने रोजी और बच्चों को उन के कमरे पर छोड़ कर अपने कमरे पर कर ले गया. आज वह बहुत खुश नजर रहा था. 3-4 दिन के बाद ही उन दोनों ने मिल कर एक टू रूम सैट घर किराए पर लिया और अपनी जिंदगी गुजारने लगे. खाना पकाने से ले कर और दूसरे घरेलू कामों में समीर रोजी की पूरी मदद करता था. रोजी अपने दोनों बच्चों के साथ एक कमरे में सोती थी, तो समीर दूसरे कमरे में. इस तरह से 6 महीने का समय गुजर गया. एक दिन समीर शाम होने से पहले ही अपने कमरे पर पहुंच गया. आज उस की तबीयत कुछ ठीक नजर नहीं रही थी. सिर में दर्द और बदन में अकड़न हो रही थी. कार को पार्क कर के वह अपने कमरे में जा कर लेट गया. शाम को रोजी जब स्पा सैंटर से वापस लौटी तो देखा समीर अपने कमरे में लेटा था. अकसर समीर रोजी के आने के बाद रात को 9 बजे के करीब लौटता था, लेकिन आज उस के जल्दी लौटने और बिस्तर पर लेटे रहने की वजह से रोजी के मन में घबराहट पैदा हुई.


रोजी ने अपना बैग रखा और कमरे में घुसते ही सवाल किया, ‘‘क्या हुआ समीर?’’ ‘‘कुछ नहीं सिर में दर्द है, बदन भी अकड़ रहा है,’’ समीर ने जवाब दिया. ‘‘चलो, खड़े हो, डाक्टर को दिखा देती हूं,’’ रोजी ने जब यह कहा तो समीर ने मना कर दिया और बोला, ‘‘हलका है आराम करने से ठीक हो जाएगा.’’ रोजी उठी और अलमारी से सिरदर्द की एक गोली निकाल कर लाई, पानी ला कर दिया और समीर को गोली खिला दी. इस के बाद बाम ले कर आई और समीर के सिरहाने बैठ कर उस के सिर पर बाम लगाने लगी. इस दौरान रोजी ने थोड़ा रुक कर समीर का सिर उठा कर अपनी गोद में रख लिया और बाम लगाने लगी.
जब रोजी समीर के माथे पर बाम लगा रही थी तो समीर की गरदन भी हिल रही थी. कब समीर का सिर रोजी की जांघ पर पहुंच गया, पता ही नहीं चला. जांघ पर समीर का सिर रखे होने से रोजी के बदन में तरंग सी उठने लगी. ?ाक कर बाम लगाए जाने से रोजी के उभार समीर के माथे से टकराए, तो रोजी के बदन में हलचल बढ़ गई.


धीरेधीरे रोजी के बदन में तरंगें तेज होने लगीं. जांघ पर समीर के सिर की रगड़ लगने के कारण वह धीमी आहें भरने लगी. उस के मुंह से अबसमीरसमीरसमीर…’ निकल रहा था. ‘‘समीर अपनी कसम तोड़ दो, मेरी फीलिंग सम? कुछ करो समीर.’’ यह सुन कर समीर उठ कर बैठ गया. उस का सिरदर्द जैसे अब दूर हो गया हो. समीर ने रोजी की आंखों में आंखें डालीं. वह मुसकरा तो नहीं रही थी, लेकिन उस का चेहरा बता रहा था कि वह मिलन के लिए बेताब है. रोजी से उस के बदन को छूने करने की इजाजत मिलने के बाद समीर ने सब से पहले अपने होंठ रोजी के होंठ पर रख दिए. वह रोजी के एकएक अंग को प्यार से सहलाने लगा, तो रोजी की सांसों में तेजी गई. वह जोश की ओर बढ़ रही थी. दोनों ने अपनेअपने बदन से कपड़े अलग किए. कमरे में रोजी की सिसकारियों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी. कमरे में दोनों के मिलन का जो तूफान पैदा हुआ, वह करीब 10 मिनट बाद जा कर शांत हुआ. रोजी ने खुद को संभाला, जल्दी से कपड़े पहने और बोली, ‘‘अब सिर का दर्द कैसा है?’’ ‘‘जिसे तुम जैसी मदमस्त जवानी का प्यार मिल जाए, उस का सिर का दर्द तो क्या, हर बीमारी दूर हो जाए.’’ समीर ने शरारत करते हुए कहा.


इस के बाद रोजी हाथमुंह धो कर रसोई में गई और 2 कप कड़क चाय बना कर लाई. दोनों चाय की चुसकियां लेते हुए काफी खुश नजर रहे थे. कुछ समय लिवइन रिलेशनशिप में रहने के बाद रोजी और समीर ने शादी करने का फैसला किया. रोजी की मां और छोटी बहन तो इस शादी के लिए तैयार हो गईं, लेकिन समीर के परिवार वाले दोनों की शादी के लिए तैयार नहीं हुए. वे कट्टरवादी सोच के थे. उन्होंने साफ कह दिया कि एक तलाकशुदा और दूसरे धर्म की बहू उन्हें कतई स्वीकार नहीं होगी, पर परिवार के विरोध के बावजूद समीर ने रोजी का अपनाने का फैसला किया. शादी की तारीख तय हुई तो रोजी की तरफ से उस की छोटी बहन और स्पा सैंटर में काम करने वाली कुछ लड़कियां और आसपास के लोग पहुंचे, जबकि समीर की तरफ से उस के 1-2 दोस्त आए. सभी लोग कोर्ट में पहुंचे, जहां रजिस्ट्रार ने दोनों की शादी कराई. कोर्ट के बाहर एक रैस्टोरैंट में छोटी सी पार्टी रखी गई.


इस दौरान रोजी के साथ स्पा सैंटर में काम करने वाली एक लड़की ने चुटकी लेते हुए दोनों से कहा, ‘‘दीदीजीजूवैसे तो आप के बीच में सबकुछ हो चुका है, लेकिन फिर भी सुहागरात मनाना
मत भूलना. असल में आप की आज से नई जिंदगी की शुरूआत हो रही है. यह शुरुआत रोमांटिक और रोमांस से भरी होनी चाहिए. बच्चों की चिंता मत करना, उन्हें मैं अपने साथ ले जाऊंगी.’’ यह बात सुन कर वहां मौजूद सभी लोग जोरजोर से हंसने लगे, वहीं रोजी नजरें नीचे कर के मंदमंद मुसकरा रही थी.
शादी के बाद समीर और रोजी अपने कमरे पर पहुंचे. शाम होने से पहले रोजी और समीर बाजार गए. थोड़ी देर के लिए रोजी से अलग हुई और कुछ जरूरी सामान खरीदने लगी, जिस के बाद दोनों वापस कमरे पर लौट आए.


समीर और रोजी ने रात को खाना खाया, जिस के बाद रोजी ने समीर से सख्त लहजे में कहा, ‘‘मैं दूसरे कमरे में जा रही हूं, मु? परेशान मत करना.’’ रोजी ने दूसरे कमरे में जा कर खुद को बंद कर लिया. समीर कुछ सम? नहीं पाया कि आखिर रोजी में अचानक से यह कैसा बदलाव गया. सोचने लगा कि शायद औरतों संबंधी परेशानी हो गई होगी और इसलिए अलग सोने का फैसला किया. उस के मन में तरहतरह के विचार कौंधने लगे. तकरीबन एक घंटे बाद रोजी ने कमरा खोला और समीर को अंदर बुलाया.
समीर हैरान रह गया. कमरे का रंगरूप बदला हुआ था. बैड पर जहां गुलाब की पंखुडि़यां पड़ी थीं, वहीं मोगरा के फूलों की कलियां भी पड़ी थीं. गुलाब और मोगरा की खुशबू से कमरा पूरी तरह से महक रहा था.
रोजी दुलहन के लिबास में बैड पर बैठी थी. उस ने परफ्यूम लगाया था. उस के बदन से रही खुशबू समीर को दीवाना बनाने वाली थी.


रोजी बोली, ‘‘क्यों हैरान हो रहे हो पतिदेवयह तुम्हारे लिए सरप्राइज है.’’ इस के बाद रोजी ने अपने दोनों हाथ समीर के गले में डाल दिए. समीर ने रोजी के माथे पर किस किया और जांघ पर हाथ फेरने लगा, तो रोजी आहें भरने लगी. उस ने समीर को रोका और बैड से नीचे उतर कर अपने कपड़े उतारे. रोजी आसमानी कलर की ब्रा और पैंटी में थी. स्टाइलिश ब्रापैंटी में रोजी को देख कर समीर मदहोश हो गया
और रोजी को बांहों में भर कर बैड पर लेटा दिया. समीर ने रोजी के बदन पर हाथ फेरा तो वह पूरी तरह से सिहर उठी. देखते ही देखते वे दोनों एकदूसरे में समा गए. यह सिलसिला पूरी रात में कई बार चला.
बच्चे समीर को अबअंकलकी जगहपापाबुलाने लगे. दोनों की जिंदगी में रोमांस की कोई कमी नहीं थी. रोजी भी अब अपने स्पा सैंटर में शादीशुदा की तरह जाती थी. शाम को जब समीर वापस लौटता, तो बच्चों के लिए कुछ कुछ ले कर आता. लेकिन एक दिन समीर के गांव से फोन आया, ‘‘बेटा, तेरी शादी की बात पक्की हो गई है. लड़की बहुत अच्छे घरपरिवार की है. अगले महीने की 15 तारीख रख दी है.’’


समीर सन्न रह गया. वह रोजी को छोड़ने की कल्पना तक नहीं कर सकता था. उस ने मना करने की कोशिश की, लेकिन मां ने साफ कह दिया, ‘‘तू उस तलाकशुदा और दूसरे मजहब की औरत के साथ रहना चाहता है तो हमारा तु? से कोई रिश्ता नहीं रहेगा. हम तेरी परवाह अब और नहीं करेंगे.’’ समीर कई दिनों तक रोजी से यह बात छिपाता रहा, लेकिन बात आखिर रोजी तक पहुंच ही गई. रोजी ने जब यह सुना तो जैसे उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. उस ने बिना कुछ सोचे समीर के गांव जा कर उस के घर वालों से बात करने का फैसला किया. गांव पहुंचते ही रोजी ने समीर के घर के सामने सब के सामने सवाल दाग दिए, ‘‘क्यों? सिर्फ इसलिए कि मैं तलाकशुदा हूं? इसलिए कि मेरे 2 बच्चे हैं? क्या प्यार का हक सिर्फ उन लड़कियों को है, जोकुंआरीकहलाती हैं?’’ गांववाले जमा हो गए. समीर की पिता ने गुस्से में कहा, ‘‘हम अपने खानदान की इज्जत मिट्टी में नहीं मिलने देंगे. या तो वह औरत छोड़ या इस घर से निकल जा.’’


समीर ने रोजी का हाथ थामा और बिना कुछ बोले घर से बाहर निकल गया. दोनों के चेहरे पर आंसू थेएक तरफ मां का प्यार, दूसरी तरफ रोजी का साथ. एक दिन रोजी बच्चों को स्कूल छोड़ कर लौटी तो देखा कि समीर कमरे में बैठा है. उस की आंखों से आंसू टपक रहे थे, ‘‘रोजी, मु? गांव जाना होगा. मां की तबीयत बहुत खराब है. शायद वापस लौट पाऊं या नहीं, कुछ नहीं पता लेकिन एक बात जान लो, तुम मेरी जिंदगी की सब से सच्ची मुहब्बत हो.’’ रोजी ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन गला भर आया. उस ने बस समीर का हाथ पकड़ा और बोली, ‘‘अगर कभी लौटो, तो बताना मत बस, दरवाजे पर खड़े होना. मेरे बच्चे पहचान लेंगे कि उन केपापा गए हैं.’’ समीर चला गया. कई महीने बीत गए. रोजी अब भी स्पा सैंटर में काम करती है, बच्चों को स्कूल भेजती है और शाम को बालकनी में बैठ कर आसमान को देखती है, जहां कभी समीर के साथ बिताए पल तैरते हैं.


रोजी की आंखों से आंसू बहे, लेकिन इस बार वह टूटी नहीं थीमजबूत थी. उस ने खुद को संभाल
लिया था. समीर की याद उस के दिल में अब भी थी, लेकिन अब वह उस की कमजोरी नहीं, ताकत बन चुकी थी. रोजी जानती थी, हर मुहब्बत को मंजिल नहीं मिलती लेकिन कुछ रिश्ते अधूरे हो कर भी दिल में मुकम्मल हो जाते हैं. दूसरी ओर, समीर अपने गांव में मां की बीमारी, परिवार और समाज के दबाव में उल? हुआ था. उस की मां बिस्तर पर थीं और आसपड़ोस के लोग ताने दे रहे थे, ‘अपने खानदान की इज्जत मिटा दी इस ने तलाकशुदा औरत को लाने चला है. शर्म नहीं आती…’ समीर हर बात चुपचाप सुनता रहा, लेकिन उस के मन में रोजी और बच्चों का चेहरा उभरता रहता.


एक दिन रात को मां के सिरहाने बैठा, तो मां ने कमजोर आवाज में समीर से कहा, ‘‘बेटा, अगर तू खुश रहना चाहता है तो अपने दिल की सुन. मैं ने जिंदगीभर जातपांत, समाज की बातें मान कर जिंदगी जी लेकिन अब जब आंखें बंद होने को हैं तो सम? आया कि इनसान का दिल जाति से बड़ा होता है.’’
समीर की आंखों में आंसू गए. उस ने मां का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मां, मैं रोजी और उस के बच्चों से बहुत प्यार करता हूं. वही मेरा घर है वही मेरी दुनिया…’’ मां ने धीमे से कहा, ‘‘तो फिर देर किस बात की, अपने घर को अपना बना ले.’’ कुछ दिन बाद समीर ने पूरे परिवार को बैठा कर अपनी बात रखी, ‘‘मैं सिर्फ रोजी के साथ ही रहूंगा, चाहे वह तलाकशुदा हो, चाहे उस के बच्चे हों वह मेरी जिंदगी है. अगर आप लोग साथ होंगे तो यह मेरी सब से बड़ी ताकत होगी, नहीं तो मैं अकेला ही सही, लेकिन ?ाठ का साथ नहीं दूंगा.’’


समीर के इस फैसले और उस के चेहरे पर ?ालकते सच्चे प्यार ने उस के पिता और भाइयों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया. मां तो पहले ही पिघल चुकी थीं. पिता भी गहरी सांस ली और बोले, ‘‘शायद अब समय गया है कि हम भी अपनी सोच बदलें. अगर तू खुश है, तो हमें क्या हक है तेरी खुशी के बीच खड़े होने का…’’ पूरा परिवार एकमत हो गया. सभी ने रोजी को अपनाने के लिए गुरुग्राम जाने का फैसला किया. शाम का समय था. रोजी बालकनी में बैठी बच्चों को पढ़ा रही थी. तभी नीचे गाड़ी के रुकने की आवाज आई. उस ने ?ांक कर देखा, समीर और उस के पूरे परिवार वाले थे. रोजी कुछ सम? पाती, इस से पहले समीर की मां सीढि़यां चढ़ कर आईं और रोजी के सामने खड़ी हो गईं. रोजी के दिल की धड़कनें तेज हो गईं. उस ने बच्चों को पीछे खींच लिया. उसे अंदाजा नहीं था, क्या होने वाला है. समीर की मां ने उस के पास कर उस का हाथ थाम लिया और कहा, ‘‘बेटी, हमें माफ कर दो. हम ने तु? बिना जाने, बिना सम? ठुकरा दिया. आज सम? आया, तेरे जैसे दिल वाली औरत किसी जाति, किसी धर्म से बंधी नहीं होती. तू तो वह रोशनी है जिस ने हमारे बेटे की जिंदगी में सुकून भरा.’’


रोजी की आंखों से आंसू बह निकले. समीर आगे बढ़ा, दोनों बच्चों को उठा कर बोला, ‘‘चलो घर चलें. अब यही मेरा परिवार हैतुम, बच्चे और ये सब.’’ समीर के पिता ने बच्चों के सिर पर हाथ रखा और बोले, ‘‘अब से तुम हमारे पोते हो हमारा खून सही, लेकिन हमारा अपनापन जरूर होगा.’’ गांव में एक सादा समारोह हुआ, जिस में समीर और रोजी ने समाज की परंपराओं को तोड़ते हुए एकदूसरे को सार्वजनिक रूप से जीवनसाथी स्वीकार किया. जो गांव वाले कभी ताने मारे थे, अब तालियां बजा रहे थे. रोजी की आंखों में खुशी के आंसू थे. उस ने बच्चों को गले लगाया और आसमान की ओर देखा मानो कह रही हो, ‘शुक्र है. इस बार जिंदगी ने मेरा साथ दिया.’  Hindi Story

लेखक महेश कांत शिवा

Hindi Story: उद्धार

Hindi Story: ‘‘  री छमिया, री कहां रह गई. चल, जल्दीजल्दी चल. सब से पहले हमें पहुंचना है. तेरे भाई को मैं ने पहले ही भेज दिया, ताकि वह हमारी जगह रोक कर रखे.’’ ‘‘आई भाभी आई, कोई ढंग का कपड़ालत्ता नहीं मिल रिहा था. फटाफट  दर्जी से यह लहंगा बनवाने लग गई थी. इसी खातिर देर हो गई,’’ छमिया ने कहा.


जैसे ही छमिया लहंगा पहन कर झोपड़े से बाहर निकली, उस की मुंहबोली भाभी बस्ती के मांगेलाल की बहू लाजो बिना पलकें ? झपकाए उसे ही देखे जा रही थी. मानो उस ने कोई अजूबा देख लिया हो.
‘‘भाभी, चालो अब, यह मुझे मुझे टुकुरटुकुर क्या देख रही हो?’’ ‘‘वाह छोरी, मैं ने तो पहचाना ही नहीं, एकदम परी लग रही है आज तोध्यान से रहना वहां, कहीं कोई शहरी बाबू दिल दे बैठे .’’


‘‘क्या भाभी, तुम भी …’’ छमिया ने ऐसा कहते हुए शरमा कर नजरें झुका लीं. झॉ दोनों  उस तरफ चल पड़ीं, जिधर आज बहुत बड़ा पंडाल बना हुआ था. मुफ्त में खाना बंटने वाला था. खाने के साथ हर ?  झोपड़पट्टी वाले को 1-1 कंबल मुफ्त में दिया जाएगा. ऐसी घोषणा 2 दिन पहले हुई थी. कोई नेता रहे थे नारी उद्धार का बीड़ा उठाने. इस बस्ती में वे नारी उद्धार कर के रहेंगे. अब कोई नारी किसी भी वजह से दुखी नहीं रहेगी, इसलिए बस्ती के सभी लोगों को उस पंडाल में जमा होने को कहा गया था. सभी अपनीअपनी फरियाद ले कर पहुंचें, सभी की समस्याओं का हल किया जाएगा. ऐसी अनाउंसमैंट हुई थी.


लाजो और छमिया दोनों को जातेजाते रास्ते में और भी औरतें मिली थीं. बहुत ज्यादा बड़ी बस्ती तो थी नहीं, लेदे कर 400-500 घर ही होंगे उस बस्ती में. घर भी क्या ?ांपड़पट्टी ही कहो. सभी औरतें रास्ते में अपनीअपनी समस्याओं का जिक्र करती जा रही थीं. कोई कहती कि बस्ती में पानी की समस्या का समाधान होना चाहिए, तो कोई कहती कि बस्ती में एक भी डाक्टर नहींअगर कोई बीमार पड़ जाए तो दवादारू के लिए उसे शहर जाना पड़ता है. कभी किसी की हालत ज्यादा खराब हो तो शहर तक जातेजाते रास्ते में ही उस का राम नाम सत्य हो जाता है.


1-2 बार ऐसा हुआ भी था. बस्ती के नाई घसीटामल को सांस की तकलीफ थी. एक बार तकलीफ इतनी बढ़ी कि सांस लेना दूभर हो रहा था. बस्ती का ?ालाछाप डाक्टर भी कुछ नहीं कर पा रहा था. जितना वह इलाज करता, सांस लेने में और दिक्कत आती, इसलिए शहर के डाक्टर के पास जाने की सलाह दी गई.
लेकिन शहर जाते समय रास्ते में घसीटामल की सांस हमेशा के लिए बंद हो गई. इसी तरह के और भी कई केस हुए थे.


इसी तरह सभी औरतें अपनीअपनी समस्याओं के बारे में बातें करते हुए पंडाल में जा पहुंची थीं. तरहतरह के खाने की खुशबू से पंडाल महक रहा था. खुशबू इतनी शानदार थी कि सब के मुंह में पानी गया.
‘‘ भाई, ये साहब लोग कब तक आएंगे? मेरा तो खाना खाने का जी कर रहा है. इतना खुशबूदार खाना आज तक नहीं देखा है. पता नहीं आज क्याक्या मिलेगा खाने को.’’ ‘‘थम जा भाई, अभी जाएंगे. पहले साहब लोगों को खाने देना, फिर आप जितना जी चाहे खा लेना.’’ ‘‘रे बावले, यह जो खाना हम गरीब लोगों के लिए बनाया है, वह साहब लोग थोड़ी खाएंगे. साहब लोगों का खाना तो स्पैशल बनेगा…’’


थोड़ी ही देर में एक लंबी सी गाड़ी कर रुकी. उस के पीछेपीछे कुछ गाडि़यां और भी थीं. लंबी गाड़ी में से सफेद कुरताधोती पहने, सिर पर सफेद टोपी लगाए एक सज्जन निकले और दनदनाते हुए सीधे उस टैंट में घुस गए, जो खास उन के लिए शहर से आए लोगों ने बनाया था. उन के पीछेपीछे कुछ बस्ती वाले भी, जो अपना चौधरपना दिखाना चाहते थे, दुमछल्ले के जैसे पीछे लग लिए, जैसे वे इन मंत्री के सगे वाले हों.
लेकिन टैंट के पास आते ही नेताजी के चमचों ने उन्हें बाहर ही रोक लिया, मगर टैंट के अंदर की एकालक तो देखने को मिल ही गई.


एक शानदार सोफा और सैंट्रल टेबल पर ताजा फूलों से महकता हुआ गुलदस्ता सजा हुआ था. साथ में फलों से भरी हुई छोटी सी खूबसूरत टोकरी रखी हुई थी. और भी जाने क्याक्या पीने के सामान रखे थे, ये वे मासूम बस्ती वाले क्या जानेंखैर, थोड़ी ही देर में जो खाना यहां बना हुआ था उस की एक थाली अंदर टैंट में ले जाई गई और उस के बाद अनाउंसमैंट हुई, ‘‘बस्ती वालो, जो खाना आप लोगों के लिए बनवाया गया है, वही खाना नेताजी को भी दिया गया है, क्योंकि हमारे आदर्श नेता आप सब को अपना भाईबंधु मानते हैं, इसलिए वे भी आप के साथ ही बैठ कर खाना खाना चाहते थे.


‘‘मगर तबीयत खराब होने की वजह से उन का खाना अंदर ही दे दिया गया है और अब आप सब भी खाना शुरू करें. उस के बाद नेताजी खुद कर आप सब के उद्धार के बारे में चर्चा करेंगे.’’ सभी लोग यह सुनते ही खाने वाले पंडाल की तरफ टूट पड़े. आज जाने कितने सालों बाद इतने लजीज खाने की खुशबू सूंघी है. जैसे ही जनता खाने वाले स्टौल की तरफ लपकी, नेताजी का एक चमचा दौड़ कर नेताजी की कार में से टिफिन बौक्स निकाल लाया. हां, इस बस्ती में एक बंदा ऐसा था, जो थोड़ाबहुत सुनसुना कर टूटीफूटी इंगलिश ?ाड़ता था. उस ने नेताजी के बाशिंदे को टिफिन ले जाते देख करा झट से उसे दबोच लिया, ‘‘क्यों सरजी, बट इज इट…’’

‘‘नथिंग, नथिंग, जस्ट मैडिसन…’’
‘‘हांजीक्या बोले जी? अरे, हम पूछिंग, बट इज दिस…’’
‘‘ओह, इस टिफिन में साहब की दवाएं हैं. खाने के साथ लेनी होती हैं, इसलिए ले जा रहा हूं.’’
‘‘ओके, ओके, गो, गो…’’


आप समझ सकते हैं सबकुछ कि टिफिन में कौन दवाएं रखता है. अरे, नेताजी भला वह खाना खाएंगे जो आम लोगों के लिए लंगर चलवाया था? खैरभोजनपानी हो गया. सब लोग पंडाल में गए. नेताजी भी दांतों मेंसे कुछ फंसा हुआ चिकन का पीस
माचिस की तीली से निकालते हुए पधार रहे हैं. चमचों ने सब को शांत हो कर बैठने को कह दिया. सब लोग शांति से बैठ गए.


जिन के छोटे बच्चे थे, वे थोड़ा शोरशराबा करने लगे, तो नेताजी के चमचों ने फरमान सुनाया कि इन बच्चों को उन के दादादादी पंडाल के पीछे के हिस्से में खेलने के लिए ले जाएं, ताकि वे जवान लोगों को उन के उद्धार का तरीका अच्छे ढंग से सम? सकें. औरतें आगे और मर्द पीछे बैठ गए. नेताजी कि नजरें उद्धार करने लायक चेहरे खोजने लगीं. अब हुआ नेताजी का भाषण शुरू.


नेताजी ने सब की शिकायतें सुनीं और अपने एक चमचे को हुक्म दिया कि कागज पर सब की शिकायतें नोट कर लें, ताकि किसी की भी कोई समस्या रह जाए, जिस का समाधान हो. अब नेताजी ने सब को आश्वासन दिया कि सत्ता में आते ही सब की समस्या का समाधान किया जाएगा और इस बस्ती का उद्धार नेताजी कर के रहेंगे. नेताजी ने एक और बहुत बड़ी बात कह दी कि चाहे वे सत्ता में आएं या आएं, लेकिन इस बस्ती का उद्धार तो वे आज से करना शुरू करेंगे, क्योंकि यह बस्ती उन्हें अपने परिवार की तरह है.


जी हां, सामने छमिया जैसी कई सुंदरियां उन्हें अपनी ही लग रही थीं, इसलिए भाषण के बाद उन के टैंट में उन सुंदरियों की भीड़ लग गई, जिनजिन के नाम ले कर उद्धार के लिए बुलाया गया था. नेताजी उन सब सुंदरियों को शहर में अच्छी नौकरी, अच्छा रहनसहन, अच्छा खानपान और शहरी सलीका सिखाने के लिए साथ ले गए. 2 साल बाद छमिया जैसी सभी वे लड़कियां जिन का उद्धार करने के लिए ले जाया गया था, बस्ती में आईं. सब ने बेशकीमती कपड़े और गहने पहने हुए थे. हाथों में पान की छोटी सी डिबिया जिन में से वे पान निकाल कर मुंह में ठूंस कर इधरउधर पीक फेंक रही थीं. उन के परिवारजनों के पास छोटेछोटे पक्के मकान थे. बिजलीपानी की सुविधा थी.


दूसरे  झांपड़पट्टी वालों ने उद्धार की गुहार लगाई, तो उन्हें बताया गया कि शहर में केवल सुंदरियों को ही काम पर रखा जाता है. उन के द्वारा ही उन के परिवारों का उद्धार हो सकता है और इसलिए वे उद्धार करने के लिए ही दूसरी सुंदरियों को चुनने आई हैं.  Hindi Story 

लेखक प्रेम बजाज

Hindi Story: आर्या धोखेबाज दुलहन

Hindi Story: हाथों में मिठाई का डब्बा और शादी का कार्ड थामे विनय को सामने देखना चौंकाने वाला था. ‘‘तुम यहां…’’ मेघना ने हैरान हो कर विनय से पूछा. ‘‘मैं आप से अपनी खुशी बांटने आया हूं मैम,’’ विनय ने कहा. विनय सचमुच खुश था या नहीं, यह तो पता नहीं, मगर पहली मुलाकात की बजाय शांत दिख रहा था. उसे देखा तो 2 साल पहले की मुलाकात मेघना की आंखों में घूम गई.


अक्तूबर, 2023 की बात थी, जब मेघना मीडिया महोत्सव में भाग लेने मुंबई पहुंची थी. मुंबई के बारे में जितना सुना था, वैसा बिलकुल नहीं पाया. कोई भागमभाग नहीं थी और लोग बहुत अच्छे लगे. कोई तो वजह रही होगी, जो इस शहर ने आजादी के पहले ही खुद को मौडर्न कर लिया था. कार्यक्रम मराठा संघ में था और दिन का तीनचौथाई बिता लेने के बाद आराम करने के मकसद से मेघना होटल वापस आना चाहती थी. कैब बुक की तो खुशी का ठिकाना रहा. कैब चालक का नाम विनय था. उस की रेटिंग अच्छी थी.


कैब का किराया कोलकाता से ज्यादा पर हैदराबाद से आधा था. शायद इसी खुशी ने चेहरे पर मुसकान चिपका दी, तो कैब ड्राइवर ने टोका, ‘‘हैलो मैम.’’
‘‘हाय,’’ मेघना ने जवाब दिया.
‘‘कुछ खास है क्यामैं सुबह से कई लोगों को स्टेशन से मराठा संघ ला चुका हूं?’’
‘‘हां, 3 दिनों का मीडिया महोत्सव है,’’ मेघना ने बताया.
‘‘अच्छाऔर इस में क्या होता
है मैम?’’
‘‘सहित्य और मीडिया की एकदूसरे पर निर्भरता और समाज के लिए इन की उपयोगिता पर चर्चा होती है.’’
‘‘अच्छाहमें क्या पता मैमहम तो रोज की रोटीदाल की जद्दोजेहद में जीते हैं. वैसे, आप क्या करती हैं?’’
‘‘मैं कहानीकार हूं.’’
इस से ज्यादा वह सम?ाता नहीं, सो बात खत्म करने के मकसद से मेघना ने कह दिया, मगर यहीं उसे राह मिल गई थी, ‘‘अरे वाह, आप कहानियां लिखती हैं. आप को देख कर कुछ ऐसा ही लग रहा था…’’ उस की बात पर मेघना को हंसी गई, तो मौका पा कर पूछ बैठा, ‘‘क्या आप मेरे मन की बात भी लिख सकती हैं?’’


‘‘बिलकुलबताओ क्या है तुम्हारी कहानी?’’
मेघना ने अपने अनुभव से जो सीखा वही बयां करती आई थी. उसे लगा कि वह भी प्यार की कोई आधीअधूरी दास्तान छेड़ेगा और वह हमेशा की तरह उसे पाठकों तक पहुंचाएगी, मगर उस ने जो कहा वह पूरे 2 साल तक उस के मन में घूमता रहा और अब जबकि उस की कहानी अपने अंजाम तक पहुंची है, तो मेघना ने लिखा
सब से पहले उस ने कैब राजीव गांधी सी लिंक पर चढ़ा दी. रास्ता
लंबा हुआ, तो विनय मन को खोलता चला गया.
‘‘हम 2 भाई हैं. बचपन में ही मातापिता को खो दिया था. छोटे भाई को मौसी साथ ले गईं और पढ़ाने लगीं. मैं ने छोटेछोटे होटलों में बहुत दिनों तक काम किया. खानासोना मुफ्त था, तो तनख्वाह बचा कर भाई को भेजने लगा. फिर कुछ अच्छे लोग मिले तो बेहतर होटल में नौकरी लग गई.
‘‘वहीं मेरी आनंद मेहरोत्रा सर से पहचान हुई. बेचारे बड़े भले आदमी हैं. मु? अपने होटल में हाउसकीपिंग मैनेजर बना दिया. तनख्वाह भी दोगुनी कर दी, तो मैं ने गोवा में एक कमरे का फ्लैट खरीद लिया.


‘‘होटल समुद्र के किनारे होने से हाई क्लास टूरिस्ट ज्यादा आते तो टिप भी अच्छीखासी मिल जाती. तनख्वाह पूरी की पूरी बचने लगी. जेबखर्च ऊपरी कमाई से पूरा हो जाता था.
‘‘सबकुछ बहुत अच्छा जा रहा था कि एक दिन उन के होटल के बैंकवैट हाल में मेरी नजर जिस गोरी पर जा अटकी वह भी जाने क्यों मु? ही देखे जा रही थी. वह आनंदजी के दूर के रिश्ते के बहन की बेटी थी. जिस तरह से उस ने मु? देखा, एक अनाम सा रिश्ता कायम कर लिया था. इस बात की खबर लगते ही आनंदजी ने मेरी खूब तारीफें कर हमारा रिश्ता तय करा दिया.’’
‘‘यह तो बढि़या हुआ. वे सचमुच भले इनसान हैं.’’
‘‘यही सोच कर मैं आंखें मूंदे आगे बढ़ता चला गया, मगर.’’
‘‘मगर क्या?’’ अब मेघना का कौतुहल जाग गया.


‘‘मैं ने शादी के लिए उलटी गिनती शुरू कर दी थी मगर उसे कोई जल्दी नहीं थी. वह स्कूल में पढ़ाती थी तो बच्चों के एग्जाम, रिजल्ट, पीटीएम निबटा कर जब गरमियों की छुट्टियां हुईं तब जा कर मैं घोड़ी चढ़ा.’’
‘‘अंत भला तो सब भला.’’
‘‘नहीनहीं. असली कहानी यहीं से तो शुरु हुई.’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘आप बड़ी हैं. मेरा मां समान हैं, इसलिए बोल देता हूं. शादी के बाद वह हनीमून के लिए राजी ही नहीं हो रही थी, जबकि मैं ने हनीमून के लिए अलग से पैसे जमा कर रखे थे. मैं नहीं चाहता था कि कल को उस के मन में कोई मलाल रह जाए, उस का कोई अरमान अधूरा
रह जाए.
‘‘इस शादी से मैं जितना खुश था वह उतनी ही ठंडी थी. कभी मां की बीमारी, कभी व्रत, कभी पूजापाठ, कभी मेहमानों की आवभगत, तो कभी थकान इसी तरह किसी किसी बहाने से मु? से दूरदूर रहती थी.’’
‘‘शादी उस की मरजी से हुई थी ? मतलब कोई अफेयर वगैरह?’’
‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं था.’’
‘‘फिर बेरुखी क्यों?’’


‘‘यहीक्यों?’ एक दिन मेरे सिर पर भी सवार हो गया. आजकल करते
40 दिन निकल गए तो मैं ने उसे भींच कर सीने से लगा लिया, पर वह फिर से मु? टालने लगी, तब मेरे अंदर का मर्द जाग गया. पहले तो प्यार से डाक्टर के पास चलने के लिए कहा, तो उस ने माहवारी का बहाना बनाया, मगर इस नाम पर पहले ही 7 दिनों तक इंतजार किया था.
‘‘आखिर में गुस्से में मैं ने वह कर डाला जो उस ने सोचा ही नहीं था…’’ यह कहते हुए विनय की नजरें ?ाकी तो मेघना ने भी कुछ पूछा, तो वह खुद कहता चला गया, ‘‘पैड खींचते ही पोल खुल गईवह औरत थी ही नहीं और मर्दमेरे साथ धोखा हुआ.


‘‘पुलिस में शिकायत की बात की तो वह पैरों पर गिर कर मिन्नत करने लगी. उसे अपनी मां की बीमारी बढ़ने की चिंता थी. वह खुद ही उन के साथ रहने चली गई, तो मैं ने पुलिस की मदद ली
‘‘आप पढ़ीलिखी हैं. आप ही बताएं कि मैं ने कहां गलती की और मेरे साथ इतनी बड़ी नाइंसाफी क्यों हुई?’’
‘‘इस बारे में पुलिस क्या कहती है?’’


‘‘वह तो आपसी सहमति से मामला सुलटाने को कहती है.’’ ‘‘मिस्टर आनंद को पकड़ो, क्या पता तनख्वाह बढ़ाने और शादी कराने में उन की ही मिलीभगत हो…’’
‘‘वे तो यह कह कर बच निकले कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी.’’
‘‘तुम क्या चाहते हो?’’
‘‘मैं क्या चाहूंगापरिवार के लिए तरसता रहा तो शादी की.. शादी में हुए खर्चों की किस्त भर रहा हूं और दुलहन भी मेरी नहीं हुई.’’
‘‘क्या लड़की तुम्हारे साथ रहने को तैयार है?’’
‘‘हां…’’ विनय ने कहा.
‘‘तो रख लो…’’ मेघना ने कहा.
‘‘धोखे का क्या? उस ने मु? से खुद कुछ नहीं बताया शादी के पहले, ही बाद में…’’
‘‘कैसे बताती? तुम स्वीकार कर लेते?’’
‘‘तो अब एक धोखेबाज को क्यों स्वीकार करूं?’’
‘‘अगर तुम्हें प्यार है तो निभाओ.’’


‘‘मैम, प्यार तो है और उसे भी है यह जानता हूं, पर ऐसे साथी से सुख की कोई गुंजाइश नहीं.’’
‘‘प्यार के लिए ज्यादा दुखी हो तुम. साथी की जरूरत सभी को होती है. तुम्हें सच पता नहीं था. माना उस के नजदीकी रिश्तेदारों को भी पता नहीं था, मगर वह तो जानती थी, तभी उसे ब्याह की जल्दी नहीं थी. फिर भी शादी करने में और तुम से हकीकत छिपाने में उस का कुसूर तो है और लालच भीहो सकता है कि वह तुम जैसा साथी खोना नहीं चाहती हो. उस की चुप्पी को खोने का डर जानो रुपएपैसों के नुकसान का मत सोचोचोरी हो जाते, लुट जाते तो तुम क्या कर लेते? पैसे तो खर्चने के लिए होते हैं
‘‘मेरी सलाह है कि उसे वापस घर लाओ. कुछ समय साथ में गुजारो.


दूल्हे को दुलहन मिली है यह क्या
कम है. स्नेह का सुख भी कितनों को मिलता है…’’
‘‘मगर शादी का सुख? वंश का सुख?’’
‘‘शारीरिक सुख हासिल करने के परिवार बढ़ाने के कई आर्टिफिशियल तरीके भी हैं.’’
‘‘आप से बात कर मन हलका
हुआ. आप का शुक्रिया किन शब्दों में अदा करूं…’’
‘‘मु? मेरे होटल तक छोड़ कर…’’ मेघना बोली.
और विनय हंस पड़ा था. आज इतने समय बाद उस का ऐसे अचानक सामने आना बिलकुल हैरान करने वाला था. उस ने ही बताया, ‘‘मैम, जब मैं आप से मिला था गहरे डिप्रैशन में था. आप की बातों ने नई दिशा दी तो उसे लेने उस के घर गया, मगर वह मेरे सामने आई ही नहीं. कई बार गया.
‘‘उसे मनाने की कोशिश की तो उस ने रोते हुए कहा कि उसे पहली ही बार में मु? से प्यार हुआ. वह पूरा सच सामने रखना चाहती थी, पर अपनी मां की खुशी के लिए शादी कर ली और अब धोखेबाज दुलहन के रूप में वह मेरा सामना करने के लिए मजबूर है


‘‘मैं यह सब सुन कर रो पड़ा. मैं
उसे किसी हाल में खोना नहीं चाहता था. उसे ले कर किसी काउंसलर के पास जाना चाहता था. मगर वह किसी तरह
भी तैयार हुई तो मैं ने भी सम?ाता कर लिया.
‘‘मैं ने आनंद सर से भी बीचबचाव की बात की. कहा भी कि हमारा प्यार हम दोनो के लिए काफि है मगर उसे मेरा घर बसाने की जिद है. मेरी दूसरी शादी कराने पर आमदा है. उस ने अपनी अनाथ सहेली से मेरा ब्याह तय कर दिया है. मेरी ओर से दिए गए सारे जेवर से मेरी दूसरी दुल्हन को तैयार करेगी और इस के बदले में उसे हमारे बच्चों की बड़ी मां बनना स्वीकार है. आप को यही खुशखबरी देनी थी तो पता लेने मराठा संघ पहुंचा. मेरे सिर पर कोई बड़ा तो है नहीं. आप का आशीर्वाद ले कर मैं नई जिंदगी की शुरुआत करना चाहता हूं.’’


विनय की बातों से उस की धोखेबाज दुलहन के बारे में मेघना ने जितना कुछ सुना, उस के प्रति इज्जत से मन भर आया. सचमुच बदलते समय ने सब बदल डाला है सिवा मुहब्बत के. एक मुहब्बत ही तो है, जो आज भी लोग एकदूसरे की खुशी के लिए क्या कुछ कर गुजरते हैं. कभी एक छत के नीचे तो कभी दूर रह कर जिंदगी में रंग भरते हैं वरना मतलबपरस्त दुनिया में कौन सा रिश्ता सच्चा रह गया है. Hindi Story

Hindi Story: कलम का जादूगर

Hindi Story. ‘‘को आदमी अपनी गाड़ी के सामने गया है,’’ अपने पति मोहन की यह बात सुन कर किसी अनहोनी के डर से गीता का कलेजा कांप उठा.


अभी नीचे उतरने के लिए गाड़ी का दरवाजा खोला ही था कि उस आदमी का चेहरा देख कर गीता चौंक गई. उस ने ?ाट से हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया. वह कोई और नहीं, बल्कि गीता का सालों का खोया हुआ प्यार अजय था, लेकिन गाड़ी की टक्कर से उसे चोट नहीं आई आई थी.
‘‘सर, आप ठीक तो हैं ?’’ मोहन ने ?ाट गाड़ी से नीचे उतर कर अजय को संभालते हुए पूछा.
गीता और मोहन अपने एकलौते बेटे को लेने के लिए दिल्ली के रेलवे स्टेशन जा रहे थे, तभी यह हादसा हुआ था.


‘‘हां, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ अजय ने कहा. ‘‘लेकिन सर, आप यहां कैसे? मोहन ने पूछा.‘‘सर, आज ही मेरी बेटी लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी कर के घर वापस आई थी. उस के यहां घूमने की जिद के चलते मैं यहां था,’’ अजय ने बताया. ‘‘लेकिन आप की बेटी इस समय आप के साथ नहीं है?’’ मोहन ने पूछा. ‘‘वह कुछ खरीदारी करने गई थी, आती ही होगी,’’ जवाब में अजय ठहाका मार कर हंस पड़ा, तो गीता भी उस के साथ मुसकरा उठी. काफी अरसे बाद वे दोनों साथ हंस रहे थे, लेकिन अजय को इस बात की जानकारी नहीं थी.


देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ जमा होने लगी. सब की आंखें अजय पर टिकी हुई थीं. लेकिन गीता की समझ में कुछ नहीं रहा था. तभी उस भीड़ को चीरती हुई एक बेहद खूबसूरत गाड़ी कर रुकी. उस गाड़ी के सामने गीता की गाड़ी फीकी लग रही थी. उस गाड़ी की ड्राइविंग सीट से एक लड़की उतरी और अजय को देखते हुए बोली, ‘‘पापा, आप यहां क्या कर रहे हैं? सब ठीक तो है ? यहां इतनी भीड़ क्यों जमा है?’’ ‘‘कुछ नहीं बेटाबस ऐसे ही’’ अजय ने कहा. ‘‘तो फिर घर चलें हम?’’ वह लड़की बोली.


‘‘चलता हूं,’’ अजय ने वहां जमा भीड़ की तरफ हाथ जोड़ते हुए कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया. उस के बैठते ही गाड़ी सड़क पर दौड़ने लगी. जब अजय की गाड़ी दूर निकल गई और गीता को यह यकीन हो गया कि अब वह भीड़ की तरफ मुड़ कर देखेगा, तो भी उसे नहीं पहचान पाएगा, लिहाजा वह गाड़ी से नीचे उतर गई. ‘‘कौन था यह आदमी?’’ गीता ने अनजान बनते हुए मोहन से पूछा. ‘‘जादूगर,’’ मोहन ने कहा.


‘‘जादूगर?’’ गीता ने मोहन का यह शब्द बड़े ही जबरदस्त अंदाज में दोहराया. ‘‘हां, कलम का जादूगर. दुनियाभर में इस के लिखे उपन्यास खूब बिकते हैं. फुरसत के पलों में मैं भी इस के उपन्यास बड़े ही चाव से पढ़ता हूं,’’ मोहन ने गीता को बताया. उस समय रात के 2 बज रहे थे, लेकिन गीता की आंखों से नींद कोसों दूर गायब थी. आज उसे रहरह कर पुरानी यादें ताजा हो रही थीं.


गीता अजय की सादगी पर मरमिटी थी. वे दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे और प्यार भी करते थे. लेकिन उन दोनों के प्यार को गीता के भैया की नजर लग गई थी.गीता के भैया नहीं चाहते थे कि वह एक गरीब लड़के से प्यार करे, क्योंकि गीता एक अमीर परिवार से थी, इसलिए उस के भैया की नजर में अजय गरीब होने के साथसाथ एक गंवार और जाहिल लड़का भी था. लेकिन प्यार तो प्यार होता है. एक दिन गीता के भैया ने उन दोनों को एकसाथ देख लिया.

उसी दिन भैया ने गीता की शादी अपने दोस्त के बेटे के साथ तय कर दी. भैया, मैं यह शादी नहीं कर सकती,’ गीता ने कहा. क्यों? क्या बुराई है इस रिश्ते में?’ भैया ने पूछा. कुछ नहीं भैया. बुराई तो आप की बहन में है जो किसी से बेपनाह मुहब्बत कर बैठी है.’ किस से? उस अनपढ़, जाहिल, गंवार लड़के से, जिस के पास कोई ठिकाना नहीं है?’ हां भैया.

आप की यह बहन उस के बगैर जिंदा नहीं रह सकती, इसलिए आप मेरा प्यार मेरी झोली  में अपनी तरफ से भीख समझ कर डाल दीजिए,’ यह कहते हुए गीता ने अपना आंचल भाई के आगे फैलाया ही था कि भाई ने गीता के गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया. थप्पड़ इतना जोरदार था कि गीताधड़ामसे फर्श पर गिर गई. गीता को इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी. आज अपने मांबाप की बहुत कमी खल रही थी कि तभी अजय की आवाज उस के कानों में गूंजी.


देख लीजिए भैया. अजय आज अपने प्यार को छिनते देख कर आप के पास चला आया है.’ मैं इस की हिम्मत का कद्र करता हूं, लेकिन आज यह मेरे हाथों से जिंदा बच कर नहीं जाएगा,’ कहते हुए भैया दीवार पर टंगी हुई म्यान से तलवार खींच कर दरवाजे की तरफ बढ़ गए. नहीं भैया, आप ऐसा नहीं करेंगे. आप जहां चाहेंगे, मैं वहीं शादी करने के लिए तैयार हूं,’ जब गीता ने यह कहा, तो भैया के बढ़ते कदम रुक गए.


तो जा कर उस से कह दो कि तुम इस शादी से खुश हो. साथ ही यह भी बोल देना कि आज के बाद वह
यहां आसपास भी दिखाई दे,’ भैया ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा. अजय गली में खड़ा था. गीता के बाहर आते ही उस ने गीता का हाथ कस कर पकड़ कर कहा, ‘यह मैं क्या सुन रहा हूं…’ तुम ने ठीक सुना है…’ गीता की आवाज कड़क थी, ‘आखिर जिस से मेरी शादी हो रही है, उस के पास सबकुछ है. तुम्हारे पास क्या है?’


क्या तुम ने इसलिए मुझसे से प्यार किया था कि आज मेरी हैसियत का मजाक उड़ा सको?’ गीता ने कुछ नहीं सुना और घर के भीतर चली गई. देखते ही देखते जाने कैसे 25 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला और अजय की याद दिल के कोने में ही दब गई. लेकिन उस की याद गीता में एक टीस पैदा कर देती थी. ‘‘गीता सुबह हो गई, तुम कहां खोई हो?’’ मोहन के कहने पर वह वर्तमान में आई.


‘‘अभी थोड़ी देर में उठती हूं,’’ कह कर गीता ने मोहन से पीछा छुड़ाया. थोड़ी देर में मोहन नहाने के लिए बाथरूम में चले गए. अब मोहन से क्या कहती गीता कि वह कभी अजय से दिलोजान से मुहब्बत करती थी. उस दिन के बाद जब भी वह उस के लिखे गए उपन्यास को पढ़ती है, तो उसे अजय से हुई आखिरी मुलाकात याद जाती है.


गीता रोते हुए अजय से बोल रही थी, ‘अजय, आज मुझे इस बात की उतनी तकलीफ नहीं है कि कल सवेरे हम दोनों एकदूसरे से हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे, जितना मुझे इस बात की तकलीफ है कि मेरे भैया तुम्हें एक अनपढ़, जाहिल, गंवार से ज्यादा कुछ नहीं समझाते हैं, क्योंकि तुम गरीब हो. इसे हमदर्दी मत समझना पर तुम्हें तुम्हारी गरीबी से नजात दिलाने के लिए मैं तुम्हारे लिए एक कलम लाई हूं.

जिस तरह तुम ने मेरे बगैर जीना नहीं सीखा है, उसी तरह तुम इस कलम से सीख लेना और अच्छा लिखना.तुम अपना चेहरा तभी  मुझे दिखाना जब तुम एक कलम का जादूगर बन चुके होगे,’ इतना कह कर अजय की जेब में कलम रख दी और गीता अपने घर की तरफ बढ़ गई. पुलिस से उगाही करने वालों पर लगा मकोका

दिल्ली में पुलिस वालों कोब्लैकमेलकर वसूली करने वाले गैंग को दबोच कर उस पर महाराष्ट्र कंट्रोल औफ और्गैनाइज्ड क्राइम एक्ट लगा दिया गया. क्राइम ब्रांच की एंटी रौबरी एंड स्नैचिंग सैल ने इस मामले में केस दर्ज किया और गिरोह के सरगना राजकुमार उर्फ राजू मीणा को गिरफ्तार कर लिया. उसे दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में पेश किया, जहां से 7 दिन की रिमांड मिली.

पुलिस अफसरों ने बताया कि यह उगाही गैंग दिल्ली नौर्थईस्ट जिले में साल 2018 से सक्रिय था, जो ज्यादातर ट्रैफिक पुलिस वालों को टारगेट करता था. ट्रैफिक स्टाफ से कथिततौर पररिश्वतलेते हुए का वीडियो होने का दावा किया जाता था. इस के बाद वे एक लाख से ले कर 5 लाख रुपए तक मांगते थे. पैसा नहीं देने पर गैंग मैंबर आला अफसरों के साथसाथ सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर कैरियर बरबाद करने की धमकी देते थे. कई पुलिस वाले इस गिरोह के जाल में फंसे, जिन्होंने मोटी रकम दे कर अपना पीछा छुड़ाया.  Hindi Story

लेखक – आनंद कुमार नायक

Hindi Story: चुनौती

Hindi Story: गांव की झाडि़यों में मिली एक बच्ची को बांझ कहे जाने वाली मुनिया ने पालने और कुछ बनाने का फैसला किया. गांव वालों ने मुनिया से किनारा सा कर लिया. जब मुनिया की वह गुडि़या 8वीं जमात में थी, तब मुनिया नहीं रही. क्या गुडि़या अपनी मां के सपनों को पूरा कर पाई?


सुबह सुबह महल्ले में एक सनसनी खबर फैल गई कि ?ाडि़यों में एक नवजात बच्ची मिली है. शायद रात में इसे किसी ने फेंका दिया था. बीचबीच में लड़की के रोने की आवाज भी सुनाई दे रही थी. पूरे महल्ले में चर्चा का आज का मुद्दा यह लड़की ही थी.


पहली औरत दूसरी से बोली, ‘‘यह जरूर किसी किसी का पाप है. पता नहीं कौन जात है. बड़ा खराब जमाना गया है. लोग बच्चे कर के यहांवहां फेंक देते हैं.’’

दूसरी ने पहली की हां में हां मिलाई, ‘‘जात छोड़ो, पता नहीं यह किस धरम की है.’’
शादी के 10 साल बाद भी मुनिया के कोई औलाद नहीं थी. पति ने छोड़ दिया था. किसी तरह लोगों के घर का चौकाबरतन कर के वह अपना पेट पालती थी. उसे इस बच्ची पर रहम गया. उस ने ?ाटपट बच्ची को उठा कर गोद में ले लिया.

मुनिया के एक तो औलाद नहीं थी, पति ने भी बां? होने का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. इस बात से वह डिप्रैशन में चली गई थी. तलाक होने से पहले मुनिया डाक्टर के पास भी गई थी. तब डाक्टर बोली थी, ‘तेरे अंदर कोई कमी नहीं है, बल्कि कमी तो तेरे मर्द में है. तू उसे ले कर किसी माहिर डाक्टर के पास जा. डाक्टर बताएगा इस का इलाज.’’

इधर, फुलिया ने मुनिया से कहा, ‘‘क्या तू इस पाप को पालेगीपता नहीं किस खानदान की है यह लड़की. किस जातिधरम की है. फेंक दे इसे कचरे में. कचरे की चीज कचरे में ही अच्छी लगती है, उसे लोग घर की शोभा नहीं बनाते.’’

मुनिया का दिल मोम का था. उस ने फुलिया को जवाब दिया, ‘‘देख फुलिया, मैं जातपांत को नहीं मानती. मैं धरम में भी यकीन नहीं करती. मैं इनसानियत को मानती हूं. फिर आदमी जातपांत और धर्म का हो कर भी तो अधर्म करता है. जिस की जैसी परवरिश होती है, वह आदमी भी वैसा ही बनता है.
‘‘मैं इसे अपने घर ले जाऊंगी,

इसे खूब पढ़ाऊंगीलिखाऊंगी और अच्छे संस्कार दूंगी. फिर देखती हूं कि कैसे
यह बेराह चलती है. सारा फल अच्छी परवरिश और अच्छे संस्कारों का
होता है.’’

फुलिया ने ललकारा, ‘‘सोच ले, यह तु? भारी भी पड़ सकता है. कहीं कुछ ऊंचनीच हो गई, तो बाद में मत कहना कि चेताया नहीं था. हम लोगों में से किसी ने इसे नहीं उठाया, लेकिन तेरी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि तू ने इस बच्ची को पालने का बीड़ा उठाया है. फिर यह भी तो है कि तू चौकाबरतन कर के कितना कमा लेगी

‘‘नहीं पाल पाएगी तू इस को. फेंक दे इसे वापस कूड़े में. मरती है, तो मरने दे इसे. क्यों किसी के पाप को अपनाने का जोखिम उठा रही है…’’

पर मुनिया बोली, ‘‘मां की ताकत का तु? एहसास नहीं है. गरीब से गरीब मां भी अपने बालबच्चों को रूखासूखा खिला कर पालपोस ही लेती है. फिर मेरे लिए भी तो यह एक चुनौती की तरह है कि मैं किसी और के बच्चे को पाल कर दिखाऊं.’’

फुलिया हवा में हाथ लहराती हुई बोली, ‘‘सोच ले इस से बेवकूफी भरा फैसला कुछ नहीं होगा. लोग हंसेंगे और तेरा जीना हराम कर देंगे.’’

‘‘सोच लिया है. इस समाज को भी तो पता चलना चाहिए कि इनसानियत का रिश्ता जातपांत से ऊपर होता है. समाज के सामने औरत शुरू से ही कमजोर साबित होती रही है, फिर समाज को कैसे पता चलेगा कि औरत चट्टान की तरह मजबूत है. जायज मांग होने पर वह समाज से लोहा भी ले सकती है.


‘‘फिर समाज के डर से किसी को ?ाडि़यों में तो मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता . इस में इस नन्ही सी गुडि़या की क्या गलती…’’

लेकिन फुलिया और समाज के लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था. सब मुनिया को भलाबुरा कहते, उस से कतरा कर निकल जाते. मुनिया भी अपने काम से काम रखती थी. उस का मकसद अब बस इतना था कि वह गुडि़या को किसी तरह से पढ़ालिखा कर कुछ बना दे.

धीरेधीरे समय बीतता गया. गुडि़या बड़ी होती गई. अब वह 8वीं क्लास में पढ़ती थी. मुनिया ने गुडि़या को अच्छे संस्कार दिए थे. गुडि़या भी मेधावी और मेहनती लड़की थी. वह मुनिया की कही बातों को हमेशा मानती थी. गुडि़या 8वीं क्लास पास कर गई थी. एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो देखा कि मां की हालत बेहद खराब है. उसे अस्पताल में भरती करवाया गया, लेकिन मुनिया चल बसी.


मुनिया के मरने के बाद तो जैसे गुडि़या की जिंदगी ही उजड़ गई. फुलिया और महल्ले की दूसरी औरतें अब गुडि़या को ताने मारती थीं कि इस की मां तो इसे बड़ा अफसर बनाने चली थी और खुद ही इस दुनिया से चली गई. मुनिया की एक भतीजी थी शीतल, जो शहर में रहती थी और एक बैंक में क्लर्क थी. उस का तलाक उस के काले रंग की वजह से हो गया था. जिस लड़के से उस की शादी हुई थी, वह पियक्कड़ था.
मरने से पहले मुनिया ने शीतल से अपनी बेटी गुडि़या की बाबत फोन पर सब बातें बता रखी थीं. वह कह चुकी थी कि उस के अलावा गुडि़या का इस दुनिया में कोई नहीं है. अगर उसे कुछ हो जाता है, तो वह गुडि़या की देखभाल करे.


शीतल को गांव में आए हफ्ताभर हो गया था. स्कूल का टीसी बनने में समय लग रहा था. 1-2 दिन में टीसी मिल गया था. गुडि़या शीतल के साथ शहर गई थी, लेकिन शहर में आने के बाद भी गुडि़या को अपनी मां का चेहरा नहीं भूलता था. गांव की भी याद आती थी. गुडि़या किसी भी हाल में अपनी मां के सपनों को पूरा करना चाहती थी. इधर शीतल और गुडि़या को फुलिया और  महल्ले की औरतों की बातें रातों को सोने नहीं देती थीं. शीतल ने उस समय फुलिया और महल्ले की औरतों के तंज का कोई जवाब नहीं दिया था. उसे पता था कि उन को जवाब देने से बेहतर है कि सही समय का इंतजार किया जाए.


धीरेधीरे समय बीतने लगा. गुडि़या और जोरशोर से मेहनत करने लगी थी. अब वह यहां शहर में भी वही काम करती. सुबह उठ कर ?ाड़ूबरतन कर के नहाधो कर नाश्ता तैयार कर देती. शीतल दीदी के लिए भी नाश्ता तैयार कर देती. शहर में गैस का कनैक्शन था, लिहाजा चूल्हा जलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. पानी भर कर बाहर से नहीं लाना पड़ता था, इसलिए गुडि़या का बहुत सा समय बच जाता था. अब वह और मन लगा कर पढ़ाई करने लगी थी.

इधर, शीतल को अपने पति से तलाक लेने के बाद खाली घर काटने को दौड़ता था. गुडि़या के चले आने से उस का भी मन लगने लगा. उस ने घर में रखा हुआ नौकर भी हटा दिया था. गुडि़या आसपड़ोस के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी. 9वीं क्लास में गुडि़या ने पूरे स्कूल में टौप किया था. अब शीतल को भी यकीन हो गया था कि गुडि़या एक एक दिन कुछ बड़ा जरूर करेगी.
10वीं क्लास के इम्तिहान हुए, लेकिन इस बार गुडि़या का नतीजा बहुत बेहतर नहीं था. वह अपने स्कूल में फर्स्ट डिवीजन में पास हुई थी.

गुडि़या घर कर रोने लगी. तब शीतल ने उस को सम?ाया, ‘‘इतनी जल्दी तुम्हें हार मानने की जरूरत नहीं है. तुम पढ़ाई में बहुत अच्छी हो. तुम अगले साल जरूर बहुत अच्छा करोगी.’’


दिन बीतते रहे और गुडि़या दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की करती रही. देखतेदेखते उस ने नीट का इम्तिहान भी पास कर लिया और एक सरकारी कालेज में उसे दाखिला मिल गया. 4-5 साल की कड़ी मेहनत के बाद उस ने एमबीबीएस भी पास कर लिया. अब वह एक डाक्टर बन गई थी. शीतल को भी गुडि़या पर भरोसा था और गुडि़या उस के भरोसे पर खरी उतरी थी. आज शीतल ने अपनी बूआ मुनिया को दिया हुआ वचन पूरा किया था.


शीतल ने इनसानियत के लिए तो गुडि़या की मदद की ही थी, उस का मदद करने के पीछे एक और कारण
था. वह कारण था औरत को कमजोर सम?ाने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना. शीतल को अपने पति को भी जवाब देना था और समाज को भी दिखाना था कि बिना किसी मर्द की मदद के भी औरत आगे बढ़ सकती है. वह अपनी मरजी की खुद मालिक है. तकरीबन 10 साल के बाद एक दिन गुडि़या की पोस्टिंग उस के गांव में हुई थी. उस को प्रमोशन मिल गई थी.


वह अब डाक्टरों की सीनियर थी. अब वह सीएमओ थी. एक दिन गुडि़या अपने केबिन में बैठी परची पर कुछ दवाएं लिख ही रही थी कि नर्स ने अगले मरीज का नाम पुकारा. मरीज का नाम फुलिया
था. नर्स ने जोर से 2 बारफुलियाकह कर पुकारा. थोड़ी देर में गुडि़या के सामने उस के गांव की फुलिया खड़ी थी. गुडि़या को तो एकबारगी अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

गुडि़या ने इशारे से फुलिया को सामने की कुरसी पर बैठने को कहा, ‘‘बैठिए.’’
फुलिया ने इतने दिनों के बाद

गुडि़या को देखा था. वह रोते हुए बोली, ‘‘बेटी, मु? पहचानामैं फुलिया…’’
गुडि़या की भी आंखें भीगने लगी थीं, ‘‘हां चाची, आप को कैसे नहीं पहचानूंगी. आप को मैं कभी भूल ही नहीं सकती. आप के कारण ही मैं आज यहां पर हूं.’’


‘‘बेटी, मु? माफ कर दे. मुनिया के मुंह से निकली एकएक बात सही थी. पापपुण्य कुछ नहीं होता है, बल्कि इनसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. मुनिया भले ही गरीब थी, लेकिन बहुत ही जिद्दी और आत्मविश्वासी औरत थी. मुनिया की परछाईं है बेटी तू तो. जैसा वह चाहती थी, वैसा ही तु? बनाया. आज अगर वह जिंदा होती तो कितना खुश होती.


‘‘मेरा आशीर्वाद है बेटी तु?. मैं फिर से एक बार माफी मांगती हूं बेटी. मु? माफ कर दे. मैं गलत थी, फुलिया ही सही थी. परवरिश, इनसानियत और संस्कार ही सबकुछ होता है बेटी. आज मैं यह अपनी आंखों से देख रही हूं.’’


फुलिया आसमान की तरफ ताकती हुई आगे बोली, ‘‘ मुनिया, आशीर्वाद दे अपनी बेटी को. मैं अपनी गलती मानती हूं. जहां भी तू है री मुनिया, मु? माफ कर
दे बहन.’’ कहां तो गुडि़या फुलिया को मिलने पर उस को और महल्ले की औरतों को खरीखोटी सुनाना चाहती थी और कहां वह भी फुलिया के साथसाथ रोए जा रही थी.  Hindi Story               

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