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Social Issue : धर्म के नाम पर लूट, गरीबों की कमाई चंदा चोरी में गई

Social Issue. राम मंदिर हो या अजमेर की दरगाह सभी धार्मिक अड्डों पर धर्म की आड़ में धन लूटने का खेल चलता है. यहां सैकड़ों लूटने के लिए बैठे हैं और लाखों लुटने के लिए दूरदूर से आते हैं. लूटने वाले लुटेरे नहीं, बल्कि ऊपर वाले के ठेकेदार माने जाते हैं और लुटने वालों को भक्त कहा जाता है. जो जितना लुटता है वह उतना ही बड़ा भक्त घोषित किया जाता है.

इन धार्मिक अड्डों पर बेतहाशा धन को लूटने की बंदरबांट चलती है. राम मंदिर चंदा चोरी का केस कोई नई बात नहीं है. यह सदियों पुराना पैटर्न है जो आज भी चल रहा है. कई मंदिरोंमजारों और मसजिदों के भ्रष्टाचार या चंदा चोरी के उदाहरण सामने हैं.

धर्म सिर्फ आस्था का नाम नहीं, बल्कि लूटने का सब से बड़ा और पुराना धंधा है. गरीब लोग अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा भगवान, पीर, फकीर या मंदिरमसजिद को चढ़ाते हैं. इस उम्मीद में कि कोई ऊपर वाला उन की तकलीफ दूर करेगा, लेकिन हकीकत यह है कि यह पैसा ठेकेदारों, पुजारियों, बोर्ड सदस्यों और नेताओं की जेब में चला जाता है. सदियों पुराना यह खेल आज भी पूरे जोरों पर है.

राम मंदिर में भक्तों के करोड़ों रुपए के चढ़ावे की चोरी का मामला ताजा है. शुरुआती जांच में पता चला कि 40 दिनों में करीब 70 बार चोरी हुई. 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन से 2 करोड़ रुपए तक बरामद हुए. ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और एक ट्रस्टी ने इस्तीफा दे दिया. सीसीटीवी फुटेज गायब हैं. नोटों के बंडल गायब हैं. यह सब लगातार चल रहा था.

राम मंदिर में भक्तों का चढ़ावा गायब

अयोध्या राम मंदिर के लिए देश में क्या राजनीति हुई और इस का खमियाजा किस तरह देश की डैमोक्रेसी को भुगतना पड़ रहा है, यह एक अलग मुद्दा है.

9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बैंच ने अयोध्या जमीन विवाद पर फैसला सुनाया. 

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन राम मंदिर बनाने के लिए और मुसलिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ अलग जमीन मसजिद के लिए देने का फैसला सुनाया. इस ऐतिहासिक फैसले के बाद 5 अगस्त, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में भूमि पूजन किया और मंदिर बनाने का काम बहुत तेजी से शुरू हो गया.

राम मंदिर के लिए देशभर से करोड़ों लोगों ने श्रद्धा के साथ चंदा दिया. बहुत से लोगों ने अपनी बचत से पैसा दिया तो कई गरीब लोगों ने भी अपनी हैसियत के मुताबिक योगदान किया. लोगों का विश्वास था कि उन का पैसा मंदिर बनाने और उस से जुड़े कामों में लगेगा लेकिन चंदा चोरी का खेल तो मंदिर बनने के दौरान ही शुरू हो गया था.

कुछ जगहों पर नकली रसीदें छाप कर लोगों से पैसा लेने के आरोप लगे. कहीं चंदा जुटाने वाले लोगों पर रकम जमा न करने के आरोप लगे. कुछ जमीन सौदों को ले कर भी विवाद हुआ और आरोप लगे कि कुछ जमीनें बहुत कम समय में कई गुना ज्यादा कीमत पर खरीदी गईं. इन आरोपों को ले कर राजनीतिक विवाद हुआ. हालांकि ट्रस्ट ने जमीन घोटाले के आरोपों को खारिज किया और कहा कि सभी खरीदफरोख्त कानून के मुताबिक हुई है.

22 जनवरी, 2024 को राम की नई मूर्ति गर्भगृह में स्थापित की गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूजा की और इसी दिन से मंदिर आम जनता के लिए खुल गया. सिर्फ 2 साल में ही अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और दान की हेराफेरी का मामला सामने आने के बाद पूरे देश की राजनीति में भूचाल आ गया.

उत्तर प्रदेश सरकार को जांच के लिए एसआईटी बनानी पड़ गई. जांच एजेंसियों के मुताबिक चोरी मंदिर के दानपात्र से नहीं, बल्कि दान की गिनती और बैंक में जमा करने के दौरान हुई. श्रद्धालु दानपात्र में नकद दान डालते थे. तय समय पर दानपात्र खोला जाता था और कर्मचारियों की टीम नोटों की गिनती करती थी. गिनती के दौरान कुछ कर्मचारी नोटों की गड्डियों से कुछ नोट निकाल लेते थे.

इस के बाद बैंक में दान की रकम जमा करने के दौरान भी घपला होता था. अब तक इस मामले में 8 लोगों की गिरफ्तारी हुई है और जांच के दौरान चोरी की गई कुछ नकदी भी बरामद हुई है.

राम मंदिर के चंदा चोरी वाले मामले में कितनी राशि की हेराफेरी हुई, किन लोगों का क्या रोल था और क्या किसी बड़े अधिकारी की जिम्मेदारी बनती है, इन सभी सवालों की जांच अभी जारी है. आखिरी सच तो जांच पूरी होने के बाद और अदालत के फैसले के बाद ही नजर आएगा या शायद तब भी नहीं.

तिरुपति देवस्थान में हुई बड़ी चोरी

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम भारत के सब से अमीर मंदिरों में से एक है. सालाना चढ़ावा लगभग 1,880 करोड़ रुपए है और इस की कुल संपत्ति 3 लाख करोड़ से ज्यादा है. यहां भी लगातार चोरियां होती रही हैं.

तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट दुनिया का सब से अमीर मंदिर ट्रस्ट है. यहां रोज हुंडी में ही 4 से 6 करोड़ रुपए आते हैं. पिछले 2-3 साल में 3 बड़े घोटाले सामने आए. हुंडी के पैसे गिनने वाले विभाग में चोरी हुई. सीवी रवि कुमार, क्लर्क पकड़ा गया. इस का काम था रोज दान के पैसे गिनना. अप्रैल, 2023 में सीसीटीवी में दिखा कि यह आदमी तकरीबन 80 हजार रुपए अंडरवियर में छिपा कर ले जा रहा था.

पकड़े जाने पर रवि कुमार ने कुबूल किया कि वह 20 साल से चोरी कर रहा था. चुराई गई रकम से उस ने चेन्नई, तिरुपति, हैदराबाद में तकरीबन 100 करोड़ की प्रोपर्टी बनाई. इस आदमी की सैलरी सिर्फ 40,000 रुपए महीना थी. केस हुआ लेकिन लोक अदालत में सम?ाता कर के केस बंद कर दिया गया. आरोपी ने 7 प्रोपर्टी मंदिर को वापस कर दी. हालांकि साल 2025 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने यह सैटलमैंट रद्द कर के सीआईडी से फिर जांच के आदेश दिए.

यहां सब से बड़ा सवाल यह है कि जिस विभाग में सब से ज्यादा पैसा आता है, वहां सीसीटीवी और औडिट 20 साल तक फेल रहा और पकड़े जाने के बाद भी जेल जाना नहीं हुआ, बल्कि सम?ाता कर लिया गया. क्यों?

वी. पेंचलैया जो तिरुपति में एक आउटसोर्स कर्मचारी था, ने एक साल में 10 से 15 बार सोने के बिसकुट और जूलरी चुराई, लेकिन 100 ग्राम का सोना बिसकुट ट्रौली के पाइप में छिपाते हुए पकड़ा गया.

इन घोटालों के अलावा तिरुपति में रेशमी दुपट्टा घोटाला हुआ. 2015 से 2025 के दौरान भक्तों को प्रसाद में दिए जाने वाले शुद्ध सिल्क दुपट्टे असल में 100 फीसदी पौलिएस्टर थे. एक ही फर्म ने 10 साल तक सप्लाई की. इस घोटाले की कुल रकम 54-55 करोड़ रुपए तक है. 350 रुपए का पौलिएस्टर दुपट्टा, तिरुपति ट्रस्ट से 1,389 रुपए में बिल किया गया. साल 2025 में बैंगलुरु और धर्मवरम लैब में जांच हुई. दोनों में पौलिएस्टर निकला.

इस के अलावा साल 2019 से साल 2024 के बीच लड्डू घोटाला हुआ. इस घोटाले में 68 लाख किलो मिलावटी घी इस्तेमाल हुआ. यह घोटाला तकरीबन 250 करोड़ रुपए का था. यहां तक आरोप लगे कि घी में मछली का तेल, बीफ टैलो, लार्ड की मिलावट की गई.

तिरुपति में पिछले 10 सालों में ही कम से कम तकरीबन 400 करोड़ रुपए के घोटाले सामने आ चुके हैं. 100 करोड़ हुंडी घोटाला, 55 करोड़ दुपट्टा घोटाला और 250 करोड़ घी घोटाला.

अब सवाल यह है कि तिरुपति में रोज 4 से 6 करोड़ गिनने वाले सैंटर में 20 साल तक चोरी चलती रही, तो इस दौरान सीसीटीवी, औडिट, विजिलैंस सब कहां थे? 100 करोड़ की चोरी के बाद लोक अदालत में सैटलमैंट हो गया. क्या सिर्फ एक आदमी इतनी बड़ी चोरी कर सकता है? अगर इस घोटाले में ट्रस्ट की मिलीभगत नहीं थी तो आननफानन में सम?ाता क्यों किया गया? आरोपी को जेल क्यों नहीं हुई?

तिरुपति मंदिर में भक्तों द्वारा चढ़ाए गए कैश, प्रसाद, दुपट्टा, सोना हर चीज में मिलावट या चोरी हुई. 10 साल तक एक ही ठेकेदार को टैंडर दिया गया. क्या बिना अंदर के लोगों की मदद के यह मुमकिन था? सच बात तो यह है कि जहां इतना पैसा और पावर हो, वहां चोरी होगी ही. फर्क सिर्फ इतना है कि छोटी चोरियां पकड़ी जाती हैं और बड़ी चोरियां कभी पकड़ी नहीं जाती हैं.

केरल के सबरीमाला मंदिर में द्वारपालकों की मूर्तियों पर सोने की परत चढ़ाने में घोटाला हुआ. एसआईटी रिपोर्ट के मुताबिक असली सोना हटा कर सस्ती प्लेटिंग लगाई गई. करीब 4.5 किलो सोना गायब कर दिया गया. पुराने काम में भी वजन कम होने के मामले आए. इस मामले कि हाईकोर्ट में जांच चल रही है.

पद्मनाभस्वामी मंदिर के खजाने में भी गड़बड़?ाला हुआ. केरल का यह मंदिर अरबोंखरबों के खजाने के लिए मशहूर है. वाल्ट खोलने पर अकूत दौलत मिली लेकिन मैनेजमैंट में गड़बडि़यां पाई गईं. चोरी के आरोप लगे. कुछ सोने के बरतन गायब होने की खबरें भी आईं.

चंदा चोरी में मुसलिम भी पीछे नहीं

देश के ज्यादातर पुराने मसजिद, मजार, कब्रिस्तान, स्कूल जैसी मुसलिम धर्म की संपत्तियों का रखरखाव और कंट्रोल वक्फ बोर्ड करता है. पूरे देश में 8.72 लाख से ज्यादा वक्फ प्रोपर्टीज हैं जो 38 लाख एकड़ जमीन पर फैली हैं. इन की मार्केट वैल्यू लाखों करोड़ रुपए है लेकिन यह जगजाहिर है की इन में भी भारी भ्रष्टाचार होता है. गरीब मुसलिमों की दान की गई जमीन और चढ़ावे का पैसा लूट लिया जाता है.

कर्नाटक वक्फ बोर्ड स्कैम अब तक का सब से बड़ा लैंड स्कैम था. 2012 में अनवर मणिप्पडी रिपोर्ट ने खुलासा किया कि 27,000 एकड़ वक्फ जमीन, जिस की वैल्यू 2 लाख करोड़ रुपए थी, गायब कर दी गई. इस घोटाले में बोर्ड सदस्य, नेता और रियल एस्टेट माफिया मिले हुए थे.

दिल्ली में वक्फ बोर्ड की सैकड़ों प्रोपर्टीज पर विवाद चल रहा है.

40 हजार से ज्यादा वक्फ से जुड़े केस पैंडिंग हैं जिन में से ज्यादातर बोर्ड के भ्रष्टाचार की वजह से हैं. बोर्ड सदस्य फर्जी दस्तावेज बना कर जमीन बेचते हैं. रिपोर्ट्स कहती हैं कि वक्फ बोर्ड ‘करप्ट लोगों’ का डंपिंग ग्राउंड बन जाते हैं, जहां भाईभतीजावाद और भ्रष्टाचार आम बात होती है.

भ्रष्टाचार किसी एक धर्म की समस्या नहीं है. जहां भी आस्था के नाम पर करोड़ों रुपए का चंदा इकट्ठा होता है वहां लूट, गबन, चोरी और भ्रष्टाचार का होना लाजिमी है, क्योंकि भ्रष्टाचार कोई अलग व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह धर्मों का मूल तत्व होता है. यही कारण है कि मंदिरों की तरह कई दरगाहों, मसजिदों और वक्फ में भी भ्रष्टाचार के मामले उजागर होते रहते हैं.

अजमेर शरीफ दरगाह में भी करोड़ों की चंदा चोरी

अजमेर शरीफ दरगाह में हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं और करोड़ों रुपए का चढ़ावा चढ़ाते हैं. साल 2017 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, दरगाह पर आने वाले चढ़ावे के बड़े हिस्से का कोई रिकौर्ड नहीं रखा जाता था. दान का काफी हिस्सा सीधे कुछ खादिमों की जेब में चला जाता था. लगभग 200 करोड़ रुपए के दान का घोटाला सामने आया था. 2017 में ही दरगाह के नाजिम ने आरोप लगाया कि समिति के कुछ सदस्यों ने लगभग 38 लाख रुपए का गबन किया.

यह मामला भी विवाद का विषय बना. हाल के सालों में सीएजी की रिपोर्टों में भी अजमेर दरगाह समिति से जुड़े भ्रष्टाचार के कई मामलों का जिक्र किया गया. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक तकरीबन 6 करोड़ रुपए से ज्यादा की चोरी हुई.

अजमेर दरगाह में ‘देग’ ठेके में

20 लाख रुपए की हेराफेरी हुई. दरगाह के पूर्व सचिव और ठेकेदार पर मुकदमा चला और करोड़ों के चढ़ावे की चोरी के आरोप लगे. बहरीच की सैयद सालार मसूद गाजी दरगाह में भी राम मंदिर जैसा ही चढ़ावा चोरी का मामला उजागर हुआ. कश्मीर की दरगाह सीर हमदान में डोनेशन बौक्स ही चोरी हो गया.

क्यों और कैसे चलता है चोरी का यह पुराना खेल?

ये तमाम मामले यह साबित करते हैं कि धर्म लूट का जरीया है. मंदिरों में चढ़ावा चोरी होता है और मसजिदों, मजारों और वक्फ में जमीन हड़पने का खेल चलता है.

इस मामले में चर्च, गुरुद्वारे भी पीछे नहीं है. हर जगह अंधभक्तों की आस्था को कैश किया जाता है. धर्म बिना कुछ दिए लूटता है. कंपनियां भी लूटती हैं लेकिन वे कुछ न कुछ उत्पाद तो करती हैं. धर्म बिना कोई उत्पादन किए, बिना मेहनत किए, बिना कुछ दिए सिर्फ डर, आशा और अंधविश्वास के सहारे लोगों को लूटता है.

यह सदियों पुराना धंधा है. कंपनियां कम से कम कुछ बनाती तो हैं. मोबाइल, कार, दवा, कपड़े खाना और टैक्स भी देती हैं लेकिन धर्म क्या करता है? शून्य उत्पादन और शतप्रतिशत लूट. कार बनाने वाली कंपनी सिर्फ अमीरों को लूट सकती है और साइकिल बनाने वाली कंपनी सिर्फ गरीबों को लूट सकती है लेकिन धर्म सभी को उन की औकात से ज्यादा लूटता है. अमीर हो या गरीब सब की जेब कटी जाती है.

अमीर हिंदू पुण्य के नाम पर बड़ेबड़े दान करते हैं और मंदिरों में करोड़ों का चढ़ावा देते हैं तो अमीर मुसलिम भी पुण्य के नाम पर ही वक्फ प्रोपर्टीज में जमीनजायदाद दान करते हैं. इसी पुण्य के लालच में ही राम मंदिर, तिरुपति, सबरीमाला या अजमेर दरगाह पर हर साल करोड़ों रुपए का दान चढ़ावा के रूप में जमा होता है.

अमीरों के नाम से पीआर होता है लेकिन असल पैसा ट्रस्टों, बोर्डों और ठेकेदारों के पास चला जाता है. भक्तों को अपनी जेब खाली करने के बाद भी पुण्य मिले इस की कोई गारंटी नहीं लेकिन यह तय है कि इन अड्डों के ठेकेदारों की तिजोरियों तक यह पुण्य पहुंच जाता है.

वक्फ बोर्ड में अमीर मुसलिमों की दान की गई जमीनें मुतवल्लियों द्वारा हड़पी जाती हैं तो हिंदू अमीर मंदिरों में सोनाहीरा चढ़ाते हैं जो बाद में गायब हो जाता है. इन अमीरों को लगता है वे ऊंचे दर्जे का पुण्य कमा रहे हैं लेकिन असल में वे ऊंचे दर्जे के मूर्ख ही बनाए जाते हैं और यह सब धर्म के नाम पर होता है.

गरीब तो सब से ज्यादा लुटता है. भूखा पेट, बीमारी, नौकरी की तंगी और बुरे हालात में थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद में गरीब मंदिरमसजिदमजार जाता है. 10, 50 या 100 रुपए का चढ़ावा एक गरीब की रोज की कमाई का बड़ा हिस्सा होता है.

तिरुपति में गरीब भक्त अपने बाल तक चढ़ाते हैं, पैसे भी देते हैं. मिडिल क्लास जो न तो बहुत अमीर है न बहुत गरीब, धर्म का सब से बड़ा शिकार यही होता है. सैलरी से ईएमआई कटती है, बच्चों की पढ़ाई का बो?ा और महंगाई की मार सब से ज्यादा यही तबका ?ोलता है और भगवान की कृपा के चक्कर में चढ़ावा, उर्स, कथा और यज्ञ में सब से आगे यही तबका होता है.

लूटने वाले तो लालची हैं लेकिन लुटने वाले खुद अपनी मूर्खता से लुटते हैं. अंधविश्वास में जीने वाली जनता बिना सोचेसम?ो पैसा फेंकती है और यही लोग मनोकामना पूरी होने की उम्मीद में दान पेटियों को भरते चले जाते है. जब चोरी का मामला सामने आता है तो छाती पीटते हैं, लेकिन अगले हफ्ते फिर चढ़ावा चढ़ाने चले जाते हैं.

यह मूर्ख जनता ही है जो धर्म को ताकत देती है. सवाल नहीं पूछती, औडिट नहीं मांगती बस ब्लाइंड फेथ में जीती है. देखा जाए तो धर्म, कंपनियों से भी बदतर है. कंपनी प्रोडक्ट देती है, फेल हुई तो बंद हो जाती है. धर्म कभी फेल नहीं होता क्योंकि यह उत्पादन पर नहीं, सिर्फ आस्था पर टिका है, इसलिए सदियों से बिना टैक्स, बिना जवाबदेही के लूट रहा है.

दान चोरी से सबक

धर्मस्थलों में चोरी की घटनाओं का सब से बड़ा सबक यह है कि ईमानदारी किसी धर्म या आस्था से नहीं आती. अगर ईश्वर के नाम पर करोड़ों रुपए का दान आता है तो इस धन की निगरानी ऊपर वाला क्यों नहीं करता? उस के घर में ही उस के नाम पर चढ़ने वाले धन को बचाने के लिए मजबूत औडिट, निगरानी, डिजिटल रिकौर्ड, लगातार सीसीटीवी और जवाबदेही का इंतजाम क्यों करना पड़ता है?

यह केवल किसी एक मंदिर या मजार में चोरी का मामला नहीं है, बल्कि यह उस सोच का नतीजा है जिस में लोगों को दिनरात यह सम?ाया जाता है कि ऊपर वाले के नाम पर दिए गए पैसे के बदले पुण्य मिलता है, इसलिए उस पर सवाल नहीं उठाने चाहिए. यही सोच धर्म की सब से बड़ी ताकत है और जनता की सब से बड़ी मूर्खता.

धर्म के नाम पर चंदा जुटाना और इस चंदे की बंदरबांट करना कोई नई बात नहीं है. दुनिया के लगभग हर धर्म में चंदा चोरी की यह परंपरा सदियों से चलती आ रही है. अगर जांच में यह साबित भी हो जाए कि दान की रकम में बड़ी हेराफेरी हुई है तो सब से बड़ा नुकसान किस का होगा?

शायद किसी का नहीं क्योंकि यह धन ऊपर वाले का तो है नहीं, पुजारियों का भी नहीं है और जिन करोड़ों श्रद्धालुओं का था उन्होंने उन रुपयों को अपने बच्चों के भविष्य में लगाने के बजाय भ्रष्टाचार के कुएं में फेंक दिया.

किसी गरीब ने 100 रुपए दिए होंगे,  किसी बुजुर्ग ने अपनी पैंशन से दान दिया होगा. ऐसे लोगों की आस्था पर ऐसी छोटीमोटी चोरियों से कोई फर्क नहीं पड़ता. सब से बड़ा सवाल यह नहीं है कि मंदिर का धन लूटा गया, बल्कि सवाल यह है कि जनता आस्था के नाम पर कब तक ऐसे ही लुटती रहेगी?

Social Story: गौसेवा के नाम पर हिंसा और चंदा वसूली

Social Story: पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो देश में गौरक्षा के नाम पर कुछ संगठनों द्वारा हिंसक वारदात को अंजाम दिया जा रहा है, जो चिंता की बात है. अमूमन इन वारदात में मुख्य रूप से मुसलिम ट्रक चालकों और व्यापारियों को निशाना बनाया गया है. ये हिंसक वारदात मवेशी तस्करी या अवैध वध को रोकने के बहाने की गई हैं. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, जम्मूकश्मीर और कर्नाटक सहित कई राज्यों में इन हमलों ने गौरक्षक समूहों द्वारा किए जा रहे हमलों में स्थानीय अधिकारियों, विशेष रूप से पुलिस की भूमिका भी गैरजिम्मेदाराना रही है.
भारत में जिस तरह से हिंदूमुसलिम को बांटने की राजनीति चल रही है,

उस में विभिन्न राज्यों में मुसलिमों के खिलाफ हिंसक हमलों की लहर सी चल रही है. गौरक्षा के नाम पर सक्रिय समूहों ने कानून को अपने हाथ में ले लिया है और गायों की तस्करी या वध के आरोपी मुसलिमों को निशाना बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि गायों की तस्करी और अवैध परिवहन में केवल मुसलिम समाज ही शामिल है, बल्कि हिंदू धर्म के लोग खुद को गाय का हिमायती बता कर सब से ज्यादा गौवंश की तस्करी में शामिल पाए जाते हैं. गौरक्षा दल और दक्षिणपंथी संगठनों के अन्य गौसंरक्षण संगठन के लोग कानून की परवाह किए बिना काम कर रहे हैं. पीडि़त, जो अकसर मवेशी या संबंधित उत्पादों के परिवहन में शामिल मुसलिम होते हैं, अनुचित हमले और धमकियों का शिकार हो रहे हैं.

मध्य प्रदेश के कई छोटे बड़े शहरों में सभी तरह की दुकानों पर गाय की आकृति वाली प्लास्टिक की चंदा जमा करने वाली गुल्लक रखी हुई हैं, जिन में दुकान पर आने वाले ग्राहक चंदे के नाम पर कुछ राशि डालते हैं. ग्राहकों को बताया जाता है कि कमजोर और आवारा गाय को सहारा देने के लिए गौशालाएं पैसा खर्च कर रही हैं, जबकि हकीकत इस से अलग है. गौशालाओं के नाम पर व्यापार किया जा रहा है. ऐसे ही एक दुकानदार से जब पूछा गया, तो उस ने बताया गया कि गौशाला चलाने वाली संस्थाओं के नुमाइंदे इन गुल्लकों को दुकान पर छोड़़ जाते हैं और एक निश्चित समय के बाद दुकान में आ कर उस में डले हुए रुपए निकाल कर ले जाते हैं. गौशाला चलाने वाले ज्यादातर लोग किसी राजनीतिक दल से जुड़े़ लोग होते है, जो स्वयंसेवी संस्था बना कर सरकारी अनुदान का जुगाड़़ करने में माहिर होते हैं.

सड़़को पर आवारा घूमती गायों और इन गुल्लकों को देख कर यह सवाल उठता है कि आखिर गौसेवा के नाम पर उगाहे जा रहे इस चंदे का इस्तेमाल कौन सी गायों की सेवा पर किया जाता है? हालांकि, कुछ ऐसी गौशालाएं आज भी हैं जो बिना चंदे या शासकीय अनुदान के प्रचार से कोसों दूर कमजोर और बीमार गायों की सेवा कर रही हैं. पर दर्जनों संगठन गौसेवा के नाम पर देश में हिंसा फैला रहे हैं, गौरक्षकों की टोली आएदिन सड़़कों पर गायों का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर ड्राइवर और क्लीनर से मारपीट कर उन से चौथ वसूली कर रही है और शासनप्रशासन इन लोगों को खुली छूट दे रहा है. सवाल यह भी उठता है कि गाय का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर उस के ड्राइवर से मारपीट करने वाले इन गौरक्षकों का खून सड़कों पर आवारा घूमती गाय को देख कर क्यों नहीं खोलता? गौहत्या और गौमांस के मुद्दे पर कानों सुनी बातों पर मौब लिंचिंग पर उतारू इन भक्तों की भीड़ को सोचना होगा कि वे गाय को एक तरफ तो मां का दर्जा देते हैं और फिर उन्हें इस तरह सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं.

क्यों? धार्मिक पाखंड है जिम्मेदार दरअसल, गाय की इस हालत के लिए धार्मिक पाखंड सब से ज्यादा जिम्मेदार है. कपोल कल्पित कथा पुराणों में जब यह बताया गया है कि गाय में तैंतीस करोड़ देवताओं को निवास है, तो फिर लोग गाय की पूजा करने के बजाय मंदिरों में भगवान को क्यों तलाशते फिर रहे हैं?
कपोल कल्पित कथाओं से बड़ेबड़े पंडालों में होने वाली धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि दान की गई इसी गाय की पूंछ पकड़ कर स्वर्ग के रास्ते में पड़ने वाली एक वैतरणी नदी को पार करना पड़ता है.
इसी पाखंड की वजह से मध्य प्रदेश की एक महिला मुख्यमंत्री तो सड़क पर अपने काफिले को रोक कर गाय को रोटी खिलाती थीं. आखिर लोगों को यह बात में क्यों नहीं आती कि गाय को हरे चारे और भूसा की जरूरत रोटी से कहीं ज्यादा है? सच बात तो यह है कि गाय सिर्फ और सिर्फ एक पालतू पशु है. धर्म के ठेकेदार पंडेपुजारी अपने फायदे के लिए गाय को दान करने का उपदेश देते हैं.

पापपुण्य का डर दिखा कर लोगों को बताया जाता है कि गौदान करने से आदमी सीधे स्वर्गलोक की टिकट पा? जाता है. सालभर में दान के नाम पर लाखों की संख्या में गायों को दान में दिया जाता है, मगर ये गायें पंडों के घरों में दिखाई नहीं देती हैं. जाहिर है कि दान में मिली गायों को पंडे व्यापारियों को बेच देते हैं या फिर दूध दुहने के बाद सड़कों पर छोड़ देते हैं. हिंदुओ में गाय को तब तक माता माना जाता है तब तक वह दूध देती है. इस के बाद उसे आवारा छोड़ दिया जाता है. गाय को माता मानने वालों का दोहरा चरित्र यह भी है कि वे अपनी बूढ़ी और बेकार गोमाता को कसाई को बेचने में भी संकोच नहीं करते हैं.
गोभक्ति का एक पक्ष यह भी है कि गोमाता के मरने पर वे उस की लाश को नहीं उठाते हैं, यहां तक कि उसे छूते भी नहीं हैं. ऐसा करने पर उन का धर्म भ्रष्ट हो जाता है, इसलिए उसे उठा कर ले जाने के लिए वे दलित बस्ती से उन लोगों को बुला कर लाते हैं, जो मरे पशुओं की खाल उतारने का काम करते हैं. यह भारत की अकेली पाखंडी कौम है, जो अपनी गोमाता को सड़़कों पर भूखा मरने के लिए छोड़़ देती है और मरने पर अपनी मां को कंधा भी नहीं देती है.

सरकारी
कोशिशें दिखावे तक सीमित सरकार गौवंश की रक्षा की बात तो करती है, पर गाय को सड़क से हटाने के लिए कोई ठोस प्रयास अभी तक नहीं कर पाई है. मध्य प्रदेश में गायें सड़कों पर मारीमारी फिर रही हैं और सरकार विदेशों से चीता ला कर उन पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है. मध्य प्रदेश की भगवा सरकार धर्म की दुहाई दे कर गाय को माता तो मानती है, मगर आवारा घूमती गाय की बेचारगी उसे दिखाई नहीं देती. आज मध्य प्रदेश के गांवकसबों और शहरों में सड़क पर आवारा घूमती गाय सरकार के नुमाइंदों को दिखाई नहीं दे रही है. गाय और गौमांस की तस्करी की खबर पर मौब लिंचिंग पर उतारू बजरंग दल के लोगों को सड़क पर भूखीप्यासी गाय दिखाई नहीं देती. दक्षिण अफ्रीका के नामीबिया से कूनोपालपुर नैशनल पार्क में चीते लाए गए हैं, जिन के भोजन के सैकड़ों की तादाद में चीतल सहित दूसरे जंगली जानवरों को हलाल किया जा रहा है.

यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही है कि यह किस तरह का पर्यावरण संरक्षण है, जिस में सैकड़ों की तादाद में जंगली जानवरों की बलि दे कर केवल चीते का संरक्षण किया जा रहा है? मौजूदा दौर में खेती में मशीनीकरण से गौवंश के बैल बेकार होने चाहिए थे, लेकिन दूध देने वाली गाय क्यों बेकार हुई? इस सवाल का जवाब न किसी के पास है, न ही कोई खोजना चाहता है. आज तो छोटे शहर से ले कर दिल्ली तक सरकार की हर लेयर पर कथित गौरक्षा समर्थित दल हैं, तब क्यों नहीं कोई राष्ट्रीय गौनीति लाई जाती?
गौहत्या की चिंता करने वालों को यह चिंता भी करनी होगी कि गाय सड़कों पर अपमानित और मरने के
लिए नहीं आवारा फिरें, बल्कि घरों में जगह पाए. आज भी गांवदेहात में कई परिवारों की आजीविका का स्रोत गाय का दूध और उस से बने उत्पाद दहीमक्खन और घी हैं. गाय के गोबर से बने उपले लाखों घरों के चूल्हों का ईंधन बने हुए हैं, पर वर्तमान में गाय की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. जनवरी, 2022 के आखिरी दिनों में भोपाल के नजदीक बैरसिया में एक महिला भाजपाई नेता की गौशाला में 100 से ज्यादा गायों की मौत हो गई थी.

इस गौशाला में 500 गायें हैं. उस समय गौशाला के नजदीक बने कुएं में 20 गायों के शव और मैदान में 80 से ज्यादा गायों के शव और कंकाल पड़े मिले थे. उस के बाद उन भाजपाई नेता पर पुलिस ने केस दर्ज किया था और प्रशासन ने गौशाला का संचालन अपने हाथ में ले लिया था.
आज भी प्रदेश में खोली गई ज्यादातर गौशालाओं का संचालन राजनीतिक रसूख वाले लोग ही कर रहे हैं. गौशालाओं में हट्टीकट्टी गायें ही रखी जाती हैं, जिन का घी दूध पी कर गौमाता की सेवा करने का ढोंग करते हैं और लाचार, बीमार गायें सड़कों पर आवारा घूमती हैं, उस की फिक्र इन को कभी नहीं रहती.
सरकार को चुनावी फायदे की बात छोड़ कर गाय की लाचारगी की चिंता है तो किसानों को गाय पालने की अनिवार्यता का नियम लागू करना चाहिए. जो किसान गाय का पालन करे, उसे ही सरकारी सब्सिडी और दूसरे फायदे मिल सकें.

मध्य प्रदेश में तो बाकायदा गौसेवा आयोग भी बना कर उस के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया जाता है, पर प्रदेश में गायों की बदहाली गौसेवा आयोग के वजूद पर ही सवालिया निशान लगाती है.
छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले के साहित्यकार, संपादक वरुण सखाजी चर्चा के दौरान बताते हैं कि गौहत्या का विरोध कर के उन्माद में आ कर मरनेमारने पर उतारू लोग भीड़तंत्र का हिस्सा तो बन जाते हैं, पर गायों की आवारगी पर बात नहीं करना चाहते. वे इसे एक तरह की छद्म धार्मिकता और जाहिलपन ही मानते हैं. वे तल्ख अंदाज में कहते हैं, ‘‘हम अपने बब्बा (पिता के पिता) को कोई गाली दे तो गाली देने वाले को मार डालेंगे, लेकिन अपने घर में उसे खुद चाहे दोनों टाइम पीटें, कोई फर्क नहीं पड़ता. यह दोहरापन ठीक नहीं है.’’फसलों को चट कर रहे आवारा पशु  एक दौर था जब पशुपालन किसानों के लिए आमदनी का जरीया हुआ करता था. लोग गायभैंस, बकरी पाल कर इन के दूध, घी, मक्खन को बेच कर घरपरिवार की जरूरतों को पूरा करते थे.

बैल खेती किसानी के कामों में हलबखर चलाते थे. बैलगाड़ी में किसान अपनी उपज मंडियों तक ले जाता था. नई तकनीक आने से अब खेती में कृषि उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ गया है. इस के चलते पशुपालन में अब किसानों की दिलचस्पी कम हो गई है. अब लोग पालतू पशुओं को दूध देने तक घर में रखते हैं, पर बाद में उन्हें छुट्टा छोड़ देते हैं. आजकल गांवकसबों में आवारा पशुओं के चलते फसलों की हिफाजत करना एक बड़ी समस्या बन कर उभर रही है. साल 2023 में देश के पशुपालन और डेयरी विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिस के मुताबिक 20वीं पशुधन गणना से पता चलता है कि देश में 50.21 लाख आवारा मवेशी सड़कों पर घूम रहे हैं. इन में राजस्थान में सब से ज्यादा 12.72 लाख और उत्तर प्रदेश में 11.84 लाख मवेशी सड़कों पर आवारा घूमते हैं. देशभर में आवारा पशुओं को पालने की सालाना लागत 11,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है. मवेशियों की हत्या पर बैन और गौरक्षकों के डर से आवारा पशुओं की समस्या तेजी से बढ़ी है और उत्तर प्रदेश में दूध न देने वाले पशुओं को पालना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है.

लौकडाउन के पहले दतिया के रेलवे स्टेशन पर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता था. ये आवारा गायबैल मुसाफिरों के खानेपीने की चीजों पर पट पड़ते थे. कई बार इन आवारा जानवरों के अचानक रेलवे प्लेटफार्म पर दौड़ लगाने से बच्चे, महिलाएं और बुजुर्गों को चोट भी लग जाती थी. होशंगाबाद जिले के पचुआ गांव में साल 2018 में चरनोई जमीन पर गांव के कुछ रसूख वाले किसानों ने कब्जा कर लिया था, जिस के चलते गांव के आवारा पशु किसानों के खेत में घुस कर फसलों को नुकसान पहुंचाने लगे थे. इस बात को ले कर 2 पक्षों में हो गया था, जिस में एक आदमी की मौत हो गई थी. दूसरे पक्ष के 2 लोग हत्या के आरोप में हवालात में बंद हैं. पिछले कुछ सालों में देश के अलगअलग इलाकों में हुईं ये घटनाएं बताती हैं कि हमारे देश में पशुओं की आवारगी लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है. किसानों की हाड़तोड़ मेहनत से उगाई गई फसल जब आवारा पशु चर लेते हैं, तो वे मनमसोस कर रह जाते हैं.

गांवकसबों में दबंगों के पाले पशु आवारा घूमते हैं और दलितपिछड़ों की जमीन पर उगी फसल चट कर
जाते हैं. दबंगों के डर से इन आवारा पशुओं को रोकने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता. चरनोई जमीन की कमी में आवारा घूमते पशु मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के राज में आवासीय पट्टा देने के लिए सरकारी जमीन के अलावा चरनोई जमीन का भी अलौटमैंट राजस्व महकमे द्वारा दलितों को कर दिया गया था. सरकार के इस कदम से बचीखुची चरनोई जमीन भी खत्म हो गई. इसी तरह गांवदेहात के इलाकों में कृषि उपज मंडी, अस्पताल, स्कूल और दूसरी तरह की सरकारी इमारतों को भी चरनोई जमीन के रकबे पर बनाया जा रहा है. किसानों द्वारा भी वेयरहाउस, पैट्रोलपंप, बरातघर वगैरह भी खेती की जमीन पर बन रहे हैं. कसबों और शहरों में भी खेतीबारी वाली जमीन पर आवासीय कालोनी बना कर प्लाट बेचे जा रहे हैं. गांवों में चरनोई जमीन के अलावा जो पठारी क्षेत्र या सरकारी जमीन बची है, उस पर भी दबंगों का कब्जा है.

आज शहर और गांव की सड़कों पर बनाए बैठे पशुओं की आवारगी की खास वजह भी खत्म होती चरनोई जमीन ही है. गांवदेहात में चरनोई जमीन के नाम पर कुछ नहीं बचा है. ऐसे में वे किसान, जिन के पास खुद की जमीन नहीं है, गायभैंसों को खुला छोड़ देते हैं. चरनोई जमीन नहीं होने से गायें खेतों में घुस कर फसलों को खा जाती हैं और जिन किसानों की फसलों को नुकसान होता है, वे लड़ने पर आमादा हो जाते हैं. गांवों में चरनोई जमीन नहीं होने और गौपालन में किसानों की दिलचस्पी कम होने के चलते शहर की सड़कों में भी गायें आवारा घूमती हैं. लोगों द्वारा प्लास्टिक की पन्नी में फेंकी गई खाने की चीजों को खाने के चक्कर में गायें प्लास्टिक की पन्नी भी खा लेती हैं और गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही हैं. चरनोई जमीन पर कब्जा किए दबंगों के राजनीतिक दबदबे के चलते इन पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है. सरकार चरनोई जमीन को इन दबंगों के चंगुल से छुड़ाने की कोई योजना बनाए तो गायों के लिए चरने के इंतजाम के साथसाथ पशुपालन के प्रति किसानों की दिलचस्पी भी जाग सकती है.

हमारे देश की कानून भी दोहरे मापदंड वाला है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आवारा पशुओं का भी खयाल रखो और अपनी फसलों को भी सहीसलामत रखो. पर यह कैसे मुमकिन है? जमीनी हकीकत
यह है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के इलाकों में नीलगाय, सूअर, गाय, बकरी, भैंस जैसे आवारा पशुओं से फसल बचाने के लिए किसान खेतों में रतजगा कर रहे हैं. आवारा पशुओं को किसान मार भी नहीं सकते, क्योंकि यह गैरकानूनी है. गांवदेहात में खेती करने वाले छोटे किसानों के पास जो जमीन है, उस पर किसी बड़े फार्महाउस जैसी तार की बाड़  नहीं होती है. गरीब और पिछड़े पशुपालक अपने पालतू पशुओं को खुद चराने ले जाते हैं, पर ऊंची जाति के दबंगों के पशु बेखौफ आवारा घूमते हैं. देश का कानून भी उपदेशकों की तरह केवल उपदेश देता है.       

वेणी शंकर पटेल ‘ब्रज’        

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