Social Issue: दलितों ने बेचा दलितों को

Social Issue, लेखक – बलराम सिंह पाल

भारत में पिछड़े दलित तबके के हकों की बात तभी होती है, जब लोकसभा या विधानसभा के चुनाव होते हैं. उस समय टैलीविजन स्क्रीन के हर चैनल पर मीडिया तुरंत दिखाने लगती है कि इस राजनीतिक पार्टी की दलित वोट बैंक में इतनी पकड़, इस क्षेत्र में इतने दलित वोटर, इन का नेता ये, इस पार्टी का दलित वोटर का बैंक इतना, और यह सब होने के बावजूद इस समाज के ये बेचारे पिछड़े लोग ‘जय भीम’ के नारे लगाते हुए इन को वोट भी दे देते हैं. लेकिन चुनाव के बाद इन की हालत फिर भी वैसी की वैसी ही रहती है.

क्या इसी दिन के लिए डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने महात्मा गांधी के साथ साल 1932 में पूना समझौता किया था? इस दलित और पिछड़े तबके के कल्याण का दावा करने के लिए, इन के हक के लिए लड़ने को ले कर कई पार्टियों का गठन हुआ, जिस में सब से प्रमुख कांशीराम की लीडरशिप में बहुजन समाज पार्टी आई.

कांशीराम, जिन्होंने दलित तबके की जद्दोजेहद के लिए सवर्ण तबके के खिलाफ अपने तल्ख तेवर और तीखे नारे ‘ठाकुर, बाभन, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस4’ और ‘तिलक, तराजू और तलवार, इन को मारो जूते चार’ दिए.

इन नारों के दम पर बहुजन समाज पार्टी ने काफी हद तक दलित तबके के दिल में अपनी जगह बना ली थी, लेकिन मायावती ने कांशीराम के जीतेजी साल 1997 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अपनी पौलिसी की उलट सोच वाली भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार चलाने में न केवल समर्थन दिया, बल्कि खुद मुख्यमंत्री बनीं.

एक तरह से बसपा सुप्रीम मायावती ने उस समय दलित तबके का सौदा कर अपनी कुरसी हासिल की. भारतीय जनता पार्टी उस कट्टर पौराणिक हिंदू धर्म की हिमायती है, जो दलितों को पिछले जन्मों के कुकर्मों के लिए फल भोगने वाला मानता है और खुद को श्रेष्ठ पूजापाठी समझता है.

आज अगर उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी है, तो इस की सब से बड़ी वजह है कि बसपा सुप्रीम मायावती का राजनीति से बाहर होना. जिस तरह से पिछले 2 विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी राजनीतिक रूप से जानबू?ा कर निष्क्रिय रही है, उस को देख भारतीय जनता पार्टी ने दोनों हाथों से मौका लपकते हुए दलित समाज के वोट बैंक को अपनी तरफ खींचा है.

इसी तरह लोक जनशक्ति पार्टी, जिस का गठन केंद्रीय मंत्री रह चुके रामविलास पासवान ने साल 2000 में किया था, जो कि खुद पिछड़े दलित समाज से थे और बिहार में दलित तबके में इन की अच्छी पकड़ थी. इन्होंने भी कुरसी के लालच में कई जगह हाथपैर मारे.

साल 2009 के लोकसभा चुनाव में इन्होंने दलित तबके में अपनी अच्छी पकड़ को ले कर समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल के साथ बिहार की 40 और उत्तर प्रदेश की 80 सीट मिला कर 120 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिस में इन को बिहार में 12 सीटें दी गईं और यह गठबंधन पूरी तरह नाकाम हुआ और लोक जनशक्ति पार्टी अपनी सारी 12 सीटें हार गई.

इस के बाद अपने पिछड़े समाज के उसूलों और उन के हक की लड़ाई को पीछे छोड़ लोक जनशक्ति पार्टी ने नई नीति अपनाई और जीत की चाह में साल 2014 में चली मोदी की लहर के साथ हो गई. यह वही भारतीय जनता पार्टी थी, जो कभी केंद्र में कांग्रेस के समय मंत्री रहे रामविलास पासवान की नीतियों का विरोध करती थी.

लेकिन सत्ता के नशे में मोदी लहर में लोक जनशक्ति पार्टी भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल हो गई. जहां साल 2014 के लोकसभा में लोक जनशक्ति पार्टी को बिहार की 40 सीटों में से 7 सीटें दी गईं, जिस में से उस ने 6 सीटें भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से जीतीं.

इसी तरह निषाद पार्टी का गठन साल 2016 में हुआ था. इस पार्टी का गठन निषाद, केवट, बिंद, बेलदार, मल्लाह, साहनी, कश्यप, गोंड समेत तकरीबन 20 समुदायों के सशक्तीकरण के लिए किया गया था, जिन का पारंपरिक व्यवसाय नदियों पर केंद्रित था, जैसे नाविक या मछुआरे.

इस पार्टी के संस्थापक संजय निषाद, जो पहले बहुजन समाज पार्टी के साथ थे, वे खुद उस से अलग हुए और बोले कि इस नाविक और मछुआरे पिछड़े तबके की नुमाइंदगी के लिए एक अलग पार्टी की जरूरत थी, इसलिए इस का गठन किया गया.

लेकिन हुआ क्या, साल 2017 में वे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ खड़े हुए और बुरी तरह से हारे, जिस के बाद सत्ता की चाह में साल 2022 में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ा और 10 में से 6 सीटें जीतीं.

मतलब साफ है कि पहले अपने तबके के लोगों को अपने साथ लाओ, फिर अपनी कुरसी के लिए उन का सौदा कर दो.

इसी तरह अपना दल का भी यही हाल है. इस के संस्थापक सोनेलाल पटेल ने बहुजन समाज पार्टी से अलग हो कर अपना दल पार्टी का गठन किया. कुर्मी और ओबीसी समुदाय में पकड़ रखने का दावा करने वाले और खुद को पिछड़े समुदाय का रखवाला बताने वाले अपना दल ने भी साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन कर लिया.

अपना दल की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल वर्तमान में सासंद हैं और केंद्र सरकार में शानोशौकत से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री का पद संभाल रही हैं.

अगर इन सभी पार्टी के राजनीतिक इतिहास पर एक नजर डालें, तो साफ दिखता है कि इन्होंने अपना गठन तो इस तरह किया जैसे कि ये दलित तबकों की आवाज उठाने, उन को हक दिलाने के लिए सत्ता में आए हैं, लेकिन सचाई यह है कि बहुजन समाज पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी, निषाद पार्टी या अपना दल पार्टी इन सब ने अपनी कुरसी के लिए इस तबके का सौदा ही किया है. इन्होंने ही दलितों को बेचा है. पहले इन की आवाज बनने का नाटक करते हैं, फिर जैसे ही चुनाव में हार मिलती है, उस के तुरंत बाद अपनी विचारधारा से अलग पार्टी से गठबंधन कर लेते हैं.

यह समस्या केवल राजनीतिक पार्टी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आम समाज में भी दिखती है, जहां खुद इस समाज से निकले कुछ बुद्धिमान लोग अपने ही समाज के लोगों को इकट्ठा करते हैं, उन के लिए सहारा बनते हैं, फिर वही लोग बाद में जा कर किसी राजनीतिक दल से जुड़ जाते हैं और अपने इस दलित तबके के लोगों को भी इस राजनीतिक पार्टी से जुड़ने के लिए कहते हैं.

चूंकि इस तबके के लिए बाबा साहब अंबेडकर अहम जगह रखते हैं, इसलिए हर बार चुनाव से पहले इन के गुणगान कर ‘बाबा साहब’ चिल्ला कर ये राजनीतिक पार्टियां इन के मन में यह बैठा देती हैं कि इस पिछड़े दलित तबके के लिए आवाज सिर्फ यही उठा सकते हैं. ये ही इन के मसीहा हैं, चाहे बहुजन समाज पार्टी हो, लोक जनशक्ति पार्टी हो या आजाद समाज पार्टी हो या फिर निषाद पार्टी. लेकिन इन सब के उलट होता कुछ नहीं.

इस पिछड़े दलित तबके की आवाज उठाने या उन को हक दिलाने के मकसद से आई इन पार्टियों ने अपने राज्यों में दलित समाज के लिए कितना काम किया है, उस का अंदाजा इसी से लग जाता है, जहां आरटीआई के जवाब में बताया गया कि अनुसूचित जाति के लोगों के साथ जोरजुल्म के मामलों में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पास साल 2020-21 में 11,917, साल 2021-22 में 13,964, साल 2022-23 में 12,402 और साल 2024 में 9,550 शिकायतें मिलीं.

इस में से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत साल 2022 में 51,656 मामलों में से उत्तर प्रदेश में ही अकेले 12,287 मामले थे. इस के बाद राजस्थान में 8,651, मध्य प्रदेश में 7,732, बिहार में 6,799, ओडिशा में 3,576 और महाराष्ट्र में 2,706 मामले दर्ज किए गए थे. इन आंकड़ों से यह साफ जाहिर होता है कि आज भी इस तबके के खिलाफ जोरजुल्म जारी है.

ये आंकड़े तो वे हैं, जहां पिछड़े तबके के इन लोगों ने ऊंची जाति वालों के खिलाफ हिम्मत कर के शिकायत दर्ज कराई है.

पता नहीं, ऐसे कितने मामले गांवदेहात में यों ही ऊंची जाति वाले लोगों के दबाव में दबा दिए जाते हैं, जो कभी अनुसूचित जाति आयोग की दहलीज तक पहुंच ही नहीं पाए.

ऐसे मामलों में इन पिछड़े तबके के लोगों को अगर ये राजनीतिक दल या इन के नेता बस अनुसूचित जाति आयोग का दरवाजा ही दिखा दें, तब भी ये लोग इंसाफ पा सकते हैं.

इतना ही नहीं, साल 2013 में ‘हाथ से मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन’ कानून आ गया था, लेकिन इस के बावजूद पिछले 5 सालों में साल 2018 से साल 2023 के बीच हाथ से मैला ढोने के चलते 400 लोगों की मौत हुई है और ये 400 लोग किस तबके से ताल्लुक रखते थे, यह सब जानते हैं.

किसी ने भी इन की मजबूरी जानने की कोशिश नहीं की. आखिर कानून आने के बाद भी ये बिना किसी सेफ्टी इक्विपमैंट्स के नदीनालों में कैसे उतर जाते हैं.

दरअसल, कानूनन तो हाथ से मैला ढोने की कुप्रथा पूरी तरह बंद है, इस के बावजूद भी अगर कोई नदीनाला इतना संकरा होता है कि वहां मशीन का जाना मुमकिन ही नहीं है, तो वहां जिस महकमे ने इन्हें किसी नदीनाले की सफाई करने भेजा है, तो वहां उस महकमे के सीनियर अफसर की देखरेख में पूरी सेफ्टी इक्विपमैंट्स के साथ वह मुलाजिम उतरेगा, ऐसा नियम है. लेकिन सवाल यही उठता है कि इन सेफ्टी नियमों का पालन कौन करे और कौन कराए. अगर इन को कुछ हो जाए, तो इन की जान की कीमत ही क्या है.

अब पिछड़ेदलित तबके के ये लोग कोई स्किल तो जानते नहीं, बस हाथ का काम साफसफाई, गटर साफ करना वगैरह जानते हैं. आज भी हम दिल्ली जैसे शहरों में देखते हैं, जहां इस पिछड़े तबके से जुड़े लोग अपनी दिहाड़ी बनाने के लिए हाथ में एक बड़ा लंबा और पतला सा डंडा लिए घूमते रहते हैं और 100-200 रुपए के लिए कभी गटर में उतर जाते हैं, तो कभी अपने डंडे से गटर साफ करते हैं.

यहां पर जहां इन के उत्थान की जरूरत है, ऐसे समय पर सभी राजनीतिक दल गायब हो जाते हैं. सवाल यह उठता है कि इन के नाम पर बने राजनीतिक दल ने अपनेअपने राज्यों में इन के उत्थान के लिए क्या किया?

इस समाज की बड़ी परेशानी शराब, रीतिरिवाज, ?ाड़फूंक है, जिस के खिलाफ ये लोग खड़े होने को तैयार नहीं हैं. इस समाज ने सैकड़ों बाबा, फकीर पाल रखे हैं, जिन पर ये अपनी मेहनत की कमाई खर्च कर देते हैं.

एक तो यह तबका इतना पढ़ालिखा नहीं होता. दूसरा, जो इन के तबके में पढ़ालिखा होता है, वह खुद इन लोगों से दूरी बनाने लगता है. जो राजनीतिक दल इन के चहेते बनने की कोशिश करते हैं, वे खुद इन को जागरूक नहीं करते हैं, क्योंकि वह यह बात बखूबी जानते हैं कि जिस दिन यह तबका जागरूक हो गया, उस दिन इन के पीछे घूमना बंद कर देगा.

हालांकि, इस तबके की तरक्की और इन के पुनर्वास के लिए ‘नमस्ते’ योजना समेत राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर इतनी योजनाएं चलती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में कुछ नहीं दिखाई पड़ता.

जो पार्टियां चुनाव के समय इन से वोट मांगने आती हैं, अगर वे ही इन के कल्याण से जुड़ी व चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी इन को दे दें, तो इन को हाथ से मैला ढोने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.

मल्लिकार्जुन खड़गे : ‘इंडिया’ का कितना मजबूत दलित चेहरा

वोट के लिहाज से देखें, तो ओबीसी के बाद सब से ज्यादा तादाद दलित वोटर की है. यही वजह है कि ‘इंडिया’ गठबंधन लगातार इस कोशिश में था कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को गठबंधन का हिस्सा बनाया जा सके.

इस पर कांग्रेस में 2 विचार थे. राहुल गांधी चाहते थे कि अखिलेश यादव ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा रहें, वहीं प्रियंका गांधी और उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता चाहते थे कि मायावती को ‘इंडिया’ गठबंधन से जोड़ा जाए.

‘इंडिया’ गठबंधन की दिल्ली में मीटिंग के बाद कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के अपने नेताओं की मीटिंग भी बुलाई थी. इस मीटिंग में कांग्रेस प्रदेश में अपनी जमीनी हालत देखना चाहती थी. प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने 2 बातें प्रमुख रूप से कहीं. पहली यह कि गांधी परिवार के तीनों सदस्य उत्तर प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़ें. दूसरी बात यह कि अखिलेश यादव के मुकाबले मायावती से गठबंधन फायदेमंद रहेगा.

मायावती का अड़ियल रुख

इस मीटिंग से कांग्रेस को लगा कि उत्तर प्रदेश में वह बेहद कमजोर है. बिना गांधी परिवार और गठबंधन के वह आगे नहीं बढ़ना चाहती. मीटिंग में प्रदेश कांग्रेस के एक भी नेता ने यह नहीं कहा कि वह मुख्यमंत्री बनने के लिए मेहनत कर सकता है.

कांग्रेस ने जब उत्तर प्रदेश की तुलना तेलंगाना से कर के देखी, तो लगा कि कांग्रेस वहां भी सत्ता से बाहर थी. इस के बाद भी वहां कांग्रेस के पास 6 नेता ऐसे थे, जो मुख्यमंत्री बनने के लिए मेहनत कर रहे थे.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपनी कमजोरी का पता चल गया. मायावती को ले कर दुविधा यह है कि वे खुल कर बात नहीं करतीं. प्रियंका गांधी उन से मिल कर ‘इंडिया’ गठबंधन में उन्हें लाना चाहती थीं, लेकिन मायावती की तरफ से कोई सिगनल नहीं मिला. चुनाव करीब आने और 3 राज्यों में हार के बाद कांग्रेस दबाव में थी. ऐसे में उस ने यह फैसला कर लिया कि अब मायावती वाला चैप्टर बंद कर दिया जाए.

डर क्या है

अब चुनाव के पहले मायावती ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेंगी. मायावती ने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर के यह जरूर कहा कि ‘राजनीति में संबंध ऐसे रखने चाहिए कि जरूरत पड़ने पर सहयोग लिया जा सके’.

इस का मतलब यह लगाया जा रहा है कि मायावती चुनाव के बाद सीटों के नंबर के मुताबिक अपना साथी चुन सकती हैं.

मायावती के इस ऊहापोह की वजह समाजवादी पार्टी है. 2 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश के स्टेट गैस्ट हाउस कांड की खौफनाक यादें अभी भी उन के मन पर छाई हैं. सामाजिक स्तर पर भी ओबीसी और एससी वोटर के बीच उसी तरह की हालत है. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव और मायावती के बीच सम?ाता हुआ था, पर उस का अंत भी बुरा ही रहा.

मायावती खुद को समाजवादी पार्टी से कमतर नहीं आंकतीं. साल 2019 में जब सपाबसपा गठबंधन हुआ था, तो मायावती ने बसपा के लिए सपा से एक सीट ज्यादा ली थी. ‘इंडिया’ गठबंधन में मायावती के हिस्से सीटें कम आतीं. वे अखिलेश यादव से कमजोर दिखना नहीं चाहतीं. इस वजह से वे ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा नहीं बनीं.

चुनाव बाद के लिए मायावती ने हर समझेते के रास्ते खुले रखे हैं. कहीं न कहीं प्रधानमंत्री पद की इच्छा मायावती के भी मन में है. लिहाजा, मायावती चुनाव के पहले अपने पत्ते नहीं खोलना चाहतीं.

मल्लिकार्जुन कितने मजबूत

मायावती के विकल्प के रूप में ‘इंडिया’ गठबंधन ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम पीएम फेस के रूप में आगे किया है. यह फैसला जिस रणनीति के तहत हुआ, उस पर मेहनत करना ‘इंडिया’ गठबंधन की जिम्मेदारी है. केवल दलित होने के चलते नाम घोषित होने से दलित वोट नहीं मिलने वाले. पंजाब विधानसभा का चुनाव इस का उदाहरण है.

पंजाब में विधानसभा चुनाव के पहले चरनजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना कर कांग्रेस ने सोचा था कि दलित वोट उन को मिल जाएंगे. कांग्रेस ने इस के लिए मेहनत नहीं की. लिहाजा, पंजाब में कांग्रेस चुनाव हार गई.

मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे करने से दलित वोट नहीं मिलेंगे. इस के लिए ‘इंडिया’ गठबंधन को पूरी ईमानदारी के साथ काम करना होगा. केवल कांग्रेस के चाहने से भी यह नहीं होगा.

यह बात सच है कि कांग्रेस मल्लिकार्जुन खड़गे की बहुत इज्जत करती है. कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके और सांसद राहुल गांधी हमेशा खुद मल्लिकार्जुन खड़गे की कार में उन के पीछे बैठते हैं, जिस से पार्टी और लोगों को यह संदेश जाए कि खड़गे ‘डमी कैंडिडेट’ नहीं हैं. पार्टी चलाने में वे आजाद हैं.

दिक्कत यह है कि देश के तमाम राज्यों में कांग्रेस मजबूत नहीं है. ऐसे में वह अपने सहयोगी दलों पर निर्भर है. साल 2024 के आम चुनाव में अगर ‘इंडिया’ गठबंधन सरकार बनाने की हालत में आता भी है, तो राहुल गांधी पीएम नहीं बनेंगे. राहुल गांधी यह सोच कर चल रहे हैं कि अभी उन की उम्र जिस दौर में है, वहां उन के पास पीएम बनने के लिए 10 साल का समय है.

ऐसे में मल्लिकार्जुन खड़गे ही पीएम बनेंगे, यह तय है. ‘इंडिया’ गठबंधन तभी सरकार बना पाएगा, जब कांग्रेस के पास अपने 120 से 150 के बीच सांसद आएं. ऐेसे में मल्लिकार्जुन खड़गे को पीएम का चेहरा बनाने से काम नहीं चलने वाला. उस के लिए ‘इंडिया’ गठबंधन और उस में शामिल हर दल को पूरी ईमानदारी से यह सोच कर मेहनत करनी होगी कि मल्लिकार्जुन खड़गे को प्रधानमंत्री बनाना है.

धर्म के अंधे दलित-पिछड़े भाजपा की जीत की गारंटी

रोहित

यह दोहा 14वीं ईसवी में उत्तर प्रदेश के काशी (बनारस) में जनमे संत रविदास का है. वही रविदास, जो अपने तमाम कथनों में धर्म की जगह कर्म पर विश्वास करते थे और पाखंड के खिलाफ थे. आज की भाषा में अगर उन्हें धार्मिक कट्टरवाद और पोंगापंथ के खिलाफ एक मिसाल माना जाए तो गलत नहीं होगा.

इस दोहे में भी रविदास साफ शब्दों में कहते हैं कि न मुझे मंदिर से कोई मतलब है, न मसजिद से, क्योंकि दोनों में ईश्वर का वास नहीं है.

रविदास निचली जाति से संबंध रखते थे और जूते सिलने का काम करते थे. उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जहां शोषण, अन्याय और गैरबराबरी पर आधारित समाज नहीं होगा, कोई दोयम दर्जे का नागरिक नहीं होगा और न ही वहां कोई छूतअछूत होगा. अपने इस समाज को उन्होंने बेगमपुरा नाम दिया, जहां कोई गम न हो.

समयसमय पर संत रविदास जैसे महापुरुष धर्म पर आधारित सत्ता और पाखंड को चुनौती देते रहे और उन से प्रेरणा लेने वाली दबीशोषित जनता इन पाखंडों के खिलाफ खड़ी होती रही.

जैसे अपनेअपने समय में बुद्ध, कबीर और रविदास ने ब्राह्मणवाद को चुनौती दी, ऐसे ही आधुनिक काल में अय्यंकाली, अंबेडकर और कांशीराम जैसों ने भेदभाव की सोच को इस तरह खारिज किया, जिस से दलितपिछड़ों की आवाज सुनी और बोली जाने लगी.

इतने सालों की कोशिशों और टकरावों के बाद एक ऐसा समय भी आया, जब भले ही दलितपिछड़ों की हालत में बड़ा बदलाव न आया हो, पर देश की राजनीति से ले कर सत्ता तक इन जातियों के प्रतिनिधि संसद, विधानसभा में तो पहुंचे ही, साथ ही सरकार बनाने में भी कामयाब रहे, लेकिन आज हालात वापस पलटते दिखाई दे रहे हैं.

आज रविदास के बेगमपुरा जाने वाले रास्ते में ब्राह्मणवाद की गहरी खाई खुद गई है और इस खाई को खोदने वाले जितने सवर्ण रहे हैं, उस से कई ज्यादा खुद दलितपिछड़े हो गए हैं.

सवर्णों की बेबाकी की चर्चा तो हमेशा की जाती है, लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि दलितपिछड़ों की चुप्पी और भगवाधारियों पर मूक समर्थन की चर्चा की जाए, क्योंकि आज हालात ये हैं कि दलितपिछड़ों की राजनीति और उस के मुद्दे धार्मिक उन्माद के शोर में दब चुके हैं और इस की वजह भी वे खुद ही हैं.

5 राज्यों के चुनाव

10 मार्च, 2022 को 5 राज्यों के चुनावी नतीजे सामने आए. इन 5 राज्यों में से 4 राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भगवाधारी भारतीय जनता पार्टी ने अपनी मजबूत वापसी की, वहीं पंजाब में कुल 117 सीटों में से

92 सीटें जीत कर आम आदमी पार्टी ने राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया.

उत्तर प्रदेश में जहां एक तरफ भाजपा गठबंधन को 403 सीटों में से 273 सीटें, उत्तराखंड में 70 सीटों में से 47 सीटें, मणिपुर में 60 सीटों में से 32 सीटें और गोवा में 40 सीटों में से 20 सीटें मिलीं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इन चुनावों में पूरी तरह से धराशायी हो गया.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने अपने लैवल पर थोड़ीबहुत लड़ाई जरूर लड़ी, पर जिस तरह के कयास भारतीय जनता पार्टी को हराने के लगाए जा रहे थे, वे सब धूल में मिल गए.

उत्तर प्रदेश के अलावा भाजपा न सिर्फ दूसरे 3 राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही, बल्कि उत्तर प्रदेश में तो उस का वोट फीसदी गिरने की जगह बढ़ गया और यह सब इसलिए मुमकिन हो पाया कि दलितपिछड़ों के एक बड़े तबके ने भाजपा को वोट दिए.

दलितपिछड़ा वोटर कहां

पहली बार ऐसा हुआ है कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी को महज एक सीट से संतोष करना पड़ा और उस का कोर वोटर इस अनुपात में किसी दूसरी पार्टी में शिफ्ट हुआ.

चुनाव में बुरी तरह हार का मुंह देखने के बाद बसपा मुखिया मायावती ने मीडिया के सामने कहा, ‘‘संतोष की बात यह है कि खासकर मेरी बिरादरी का वोट चट्टान की तरह मेरे साथ खड़ा रहा. मुसलिम समाज अगर दलित के साथ मिलता तो परिणाम चमत्कारिक होते.’’

यह तो वही बात हुई कि खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे. मायावती मुसलिमों और सपा पर हार का ठीकरा फोड़ने की जगह अगर इस बात को समझने पर जोर देतीं कि उन का कोर दलित वोटर भाजपा की तरफ कैसे खिसक गया तो शायद उन की जीरो होती राजनीति में यह आगे के लिए एक बेहतर कदम साबित होता. पर अपनी हार का सही विश्लेषण करने की जगह उन की टीकाटिप्पणी यही साबित कर रही है कि वे अभी तक यह नहीं समझ पाई हैं कि जिस तरह से बसपा और मायावती ने भाजपा जैसी हिंदूवादी पार्टी के साथ मेलजोल बढ़ाया है और जो अभी भी जारी है, उसी का  नतीजा है कि उस के अपने वोटरों ने भी भाजपा के धर्म के इर्दगिर्द जुड़े मुद्दों और पाखंडों से संबंध बना लिए हैं.

इसी का खमियाजा है कि बसपा को इस विधानसभा चुनाव में महज 12.8 फीसदी ही वोट मिले, जो पिछली बार के 22.9 फीसदी से 10 फीसदी कम हैं. जाहिर है कि ये वोट पूरी तरह से भाजपा के साथ गए. यह दिखाता है कि सवर्णपिछड़ा तबके के वोटों का जितना नुकसान सपा ने भाजपा का किया, उस से ज्यादा वोटों की भरपाई भाजपा ने बसपा के दलित वोटों को पाखंड के जाल में फंसा कर कर ली.

यह सब इसलिए हुआ कि जिस सियासी जमीन पर कभी कांशीराम ने दलित हितों के लिए बहुजन समाज पार्टी की बुनियाद रखी थी, मायावती ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा जैसी दलितों की वैचारिक दुश्मन संस्थाओं के साथ अपने रिश्तों को बढ़ा कर उस बुनियाद को खोखला करने का काम ही किया, जिस का सीधा नतीजा यह है कि वे दलित, जिन्हें सवर्णों के बनाए पाखंडों को चुनौती देनी थी, वे भी उन पाखंडों में रमते चले गए.

यहां तक कि भगवा भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए जहां बसपा को ताकत लगानी चाहिए थी, उसी बसपा ने 122 सीटों पर ऐसे उम्मीदवार खड़े किए, जिन का सीधा टकराव सपा के उम्मीदवारों से ही था. इन में से 91 मुसलिम बहुल और 15 यादव बहुल सीटें थीं. ये ऐसी सीटें थीं, जिन में सपा की जीत की ज्यादा उम्मीद थी, पर इन 122 सीटों में से 68 सीटें भाजपा गठबंधन ने जीतीं.

साफ है कि उत्तर प्रदेश में एक नया और बड़ा तबका भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में आया है. इसी तरह समाजवादी पार्टी को पिछड़ों के एक हिस्से ने भाजपा से अलग हो कर वोट जरूर दिया, पर यह इतना नहीं था कि भाजपा को चोट पहुंचा सके.

बसपा के वोट फीसद और सीटों के रुझान को देखें, तो यह पता चलता है कि भाजपा को पड़े और बढ़े वोट दलितों के ही बसपा से शिफ्ट हुए, जो आगे की राजनीति (लोकसभा चुनाव) में भाजपा के लिए वरदान और दलितपिछड़ों व अल्पसंख्यकों के लिए चिंता का सबब बनेंगे.

पोंगापंथ में फंसे दलितपिछड़े

5 राज्यों के चुनाव खासकर उत्तर प्रदेश के चुनाव से सीधेसीधे समझ आता है कि दलितपिछड़ों का एक बड़ा तबका भाजपा और संघ के पोंगापंथ में फंस चुका है. वह खुद नहीं समझ पा रहा है कि जिस पार्टी का समर्थन कर रहा है, वह न सिर्फ उस की वैचारिक दुश्मन है, क्योंकि संघ और भाजपा ब्राह्मणवादी संस्कृति से प्रभावित रहे हैं, बल्कि जिस हिंदुत्व के लिए वह भाजपा को समर्थन दे रहा है, उस हिंदुत्व की बुनियाद ही दलितपिछड़ों के शोषण पर टिकी हुई है, जो आज नहीं तो कल सामने आने वाला ही है.

यह बहुत हद तक सामने आने भी लगा है, क्योंकि रामराज्य से खुद को जोड़ रहा दलित समाज सरकारी संपत्तियों के बिकने पर अपने आरक्षण की चढ़ती भेंट को नहीं देख पा रहा है. वह यह नहीं समझ पा रहा है कि मंदिर का मुद्दा उस के किसी काम का नहीं है, यह मुद्दा तो बस उसे पाखंड में शामिल करने को ले कर है, ताकि उस के दिमाग में यह बात फिट कर दी जाए कि सारी इच्छाएं, कष्ट सब मोहमाया है, इनसान तो मरने के लिए जन्म लेता है, आत्मा अजरअमर है, इस जन्म में पिछले जन्म का पापपुण्य भोगना पड़ता है, इसलिए जो भूख और तकलीफ है, वह सब पुराने जन्म के कर्मों का फल है, इसलिए ज्यादा इच्छाएं मत पालो, सरकार से सवाल मत पूछो. बस कर्म करो, फल की चिंता मत करो.

जाहिर है कि भाजपा दलितबहुजनों का इस्तेमाल बस अपने एजेंडे के लिए ही करेगी, बाकी इस के आगे अगर हाथ फैलाए तो रोहित वेमुला हत्याकांड, ऊना, सहारनपुर और हाथरस कांड के उदाहरण भी सब के सामने हैं. रविदास, कबीर, नानक, बुद्ध, अंबेडकर, कांशीराम क्या कह गए, यह भले ही दलितों को पता न चले, पर इन के मंदिर और मूर्तियां बना कर उन्हें ही भगवान बना दो, सब सही हो जाएगा.

भाजपा ने अपना पूरा चुनाव हिंदुत्व और कठोर राजकाज के मुद्दे पर लड़ा. ये दोनों मुद्दे ही किसी लोकतंत्र और संविधान के लिए घातक हैं. ऐसे में आने वाले समय में हिंदुत्व की गतिविधियां तेज होंगी, जो खुद दलितपिछड़े समाज के लिए घातक होंगी. आज दलितपिछड़े ऐसे रामराज्य का सपना देख रहे हैं, जिस में नुकसान उन्हीं का होना है.

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