Hindi Suspense Story : एक खौफनाक पार्सल

Hindi Suspense Story. थिंपू को घेरे हुए ‘दुंगशिंग गांग’ की ऊबड़खाबड़ चोटियों पर जिद्दी कोहरे ने रेंगना शुरू कर दिया था. सूरज ढलते ही पहाड़ों की लंबी और डरावनी परछाइयां ताशी पेनजोर के ‘शोंगखांग’ (जनरल स्टोर) पर पसरने लगीं.

ताशी का यह स्टोर जिले की बड़ी और रसूखदार जगहों में गिना जाता था. शाम ठंडी थी. ऐसी शाम जो आमतौर पर सकून लाती है, मगर आज हवा में एक अजीब सी भारी चुप्पी थी.

ताशी अपनी भारी लकड़ी की कुरसी पर बैठा था, जो दुकान के ठीक सामने मशहूर ‘मेटोग’ फूलों की दुकान के सामने रणनीतिक रूप से रखी गई थी. उस ने दिन का अखबार खोला. शांत दुकान में पन्नों की सरसराहट कुछ ज्यादा ही तेज सुनाई दे रही थी.

तभी उस की नजर एक ऐसी सुर्खी पर पड़ी जिस ने शरीर में ठंडी लहर दौड़ा दी, ‘अपर मोतीथांग में अवैध जुए के अड्डे पर पुलिस का छापा’.

खबर में विस्तार से लिखा था कि कैसे ‘रौयल भूटान पुलिस’ ने एक दोपहर दबिश दे कर 8,50,000 न्युल्ट्रम जब्त किए और 5 संदिग्धों को हिरासत में लिया.

तभी फोन की तीखी बीप ने ताशी की एकाग्रता भंग कर दी. यह उस के दोस्त थिनले का संदेश था. वही थिनले, जो एक नामी लौटरी एजेंट था और जिसे सब की टोह लेने और गपशप करने की खतरनाक आदत थी.

‘ओ ताशी, वह जुआ वाला अड्डा पर पुलिस रेड मार दिया रे’ मोबाइल की स्क्रीन चमकी.

ताशी ने अपना बायां हाथ धीरे से फैलाया और पत्थर जैसे भावहीन चेहरे के साथ टाइप किया, ‘तो मैं क्या करूं?’

ताशी ने फिर अपना ध्यान ‘कुनसेल’ अखबार की खबर पर लगाया. रिपोर्ट अब और भी सटीक हो रही थी, ‘संदिग्धों में एक महिला वांगमो (40 साल) और 30 की उम्र के 5 मर्द शामिल हैं, जिन में से 4 आदतन अपराधी हैं.’

फिर बीप हुई. थिनले की जिद दांत के दर्द की तरह चुभने वाली थी, ‘वांगमो अभी पुलिस कस्टडी में है.’

ताशी के माथे पर बल पड़ गए. सीने में हलकी सी जकड़न महसूस हुई, पर चेहरा शांत रहा. उस ने चिढ़ कर जवाब भेजा, ‘इस से मेरा क्या लेनादेना? नो प्रौब्लम, खे मी.’

थिनले का जवाब बिजली की तरह आया, जैसे वह परदे के पीछे इंतजार ही कर रहा हो, ‘पिछला हफ्ता तुम तो उधर गया था न?’

ताशी ठिठक गया. दुकान के भीतर की परछाइयां और गहरी लगने लगीं. उसने टाइप किया, ‘हां, गया था, तो क्या हुआ? साला फालतू आदमी, तुम भी तो वही किया था. तुम्हारा प्रौब्लम क्या है? छोई गी कान्येल गाची मो (तुझे  क्या तकलीफ है?)?’

‘तुम्हारा वांगमो के साथ झगड़ा नहीं हुआ था क्या?’ थिनले का अगला संदेश बिना किसी दोस्ताना लहजे के आया.

ताशी को बेचैनी महसूस होने लगी. उसे वह धुंधला कमरा, सस्ते तंबाकू और ‘के5’ व्हिस्की की गंध याद आई. उसे अपनी ही आवाज की वह चुभती हुई कड़वाहट याद आई जो उस रात निकली थी. अब सब्र का बांध टूटा तो उस ने थिनले को फोन ही लगा दिया, ‘‘अरे भाई, यह सब बोल कर क्या फायदा?’’ ताशी ने पूर्वोत्तर के लहजे में कहा, ‘‘अपुन तो खाली अपना फेवरेट ड्रिंक मांगा था. तुम को तो मालूम है न वह वांगमो कैसा औरत है, कैसा टेढ़ा बात करती है.’’

‘‘हां, मेरे को सब याद है,’’ थिनले ने दूसरी तरफ से कहा, ‘‘मेरे को वह सीन भी याद है जब तुम रिनचेन दोरजी को बोला था कि वह कार्ड्स में बेईमानी कर रहा है. तुम्हारा आवाज इतना जोर था कि बाकी लोग भी गरम हो गया था.’’

‘‘अरे, वह तो कुछ सीरियस नहीं था रे,’’ ताशी ने जवाब दिया, हालांकि उस के पैर ठंडे पड़ रहे थे, ‘‘अपुन लोग तो हमेशा ऐसा करता है न? गेम में ऐसा थोड़ाबहुत चिल्लाना तो चलता है.’’

थिनले का अगला जवाब किसी मौत के फरमान जैसा था, ‘‘लेकिन वांगमो ऐसा नहीं सोचती. तुम को याद है वह क्या बोला था? वह तुम्हारा आंख में आंख डाल कर फुसफुसाया था, ‘मैं तुम सब को देख लूंगी. मेरा लिंक बड़ेबड़े गुंडों के साथ है.’ उस टाइम वह मजाक नहीं कर रही थी ताशी.’’

ताशी का जबड़ा भिंच गया. उस ने कोई जवाब नहीं दिया. उस ने जबरदस्ती अपनी नजरें अखबार पर टिका दीं, पर शब्द पन्ने पर नाच रहे थे. उस की आंखें 2011 के दंड संहिता (संशोधन) अधिनियम पर टिक गईं. जुआ खेलना एक मामूली अपराध था… एक महीने से एक साल तक की जेल. लेकिन दोबारा अपराध करने वालों के लिए यह सजा 3 साल या उस से भी ज्यादा हो सकती थी.

थिंपू की सर्द हवाएं जब ताशी पेनजोर की दुकान के शटरों को ?ाक?ार रही थीं, तब उस के मन में बस एक ही डर कौंध रहा था. क्या वांगमो के वे ‘लिंक्स’ वरदीधारी पुलिस वालों के कान में उस का नाम फुसफुसा चुके होंगे? उस के हाथ में थमा अखबार अचानक किसी भारी पत्थर जैसा लगने लगा.

अगली सुबह घाटी को एक गाढ़े, चिपचिपे कोहरे ने अपने आगोश में ले लिया था, लेकिन यह कोहरा उन अफवाहों की आग को नहीं बुझा सका जिस ने पूरे शहर को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया था. एक नई सुर्खी उभरी थी, जिस ने पिछले दिन के छापे की खबर को भी फीका कर दिया, हिरासत में ली गई वांगमो का सौतेला भाई, रिनचेन दोरजी, शहर के बाहरी इलाके में एक सुनसान और जंग लगे गोदाम के पीछे मरा पाया गया था.

दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाला था. शरीर को इतनी बेरहमी से काटा गया  था कि पहचानना नामुमकिन था. और सब से सिहरन पैदा करने वाली बात यह थी कि लाश का सिर पूरी तरह से गायब था.

ताशी पेनजोर अपने ‘शोंगखांग’ की मंद रोशनी में बैठा था और माथे पर ठंडी पट्टी दबाए हुए था. भोर से ही उस की कनपटी में एक न सहन होने वाली टीस मारता सिरदर्द जड़ जमा चुका था, जो दीवार घड़ी की टिकटिक के साथ ताल मिला रहा था. कांच के काउंटर पर रखे उस के फोन में कंपन हुआ. थिनले का संदेश था.

फोन उठाते ही थिनले की आवाज गूंजी, जिस में उस की पुरानी मजाक वाली रंगत गायब थी, ‘‘ओ ताशी, सुना क्या?’’ थिनले हांफते हुए बोला, ‘‘अरे बाबा, वह रिनचेन दोरजी. उस का बौडी मिला पुराना डिपो के पास, पूरा काट डाला है रे. और मारने वाला उस का मुंडी भी साथ ले गया, जैसे कोई ट्रौफी हो.’’

ताशी ने आंखें मूंद लीं, उस की आवाज फटी हुई सी निकली, ‘‘देख थिनले, आज अपुन का यह भूतप्रेत का कहानी सुनने का हिम्मत नहीं है. सिर ऐसा फट रहा है जैसे कोई कुल्हाड़ी मार रहा हो.’’

‘‘गा ची मो (क्या बोला?)?’’ थिनले फुसफुसाया, ‘‘भूत का कहानी नहीं है रे. पुलिस लोग पूरा सड़क पर उतरा है. वे लोग उस को ढूंढ़ रहा है जिस का भी वह फैमिली के साथ लफड़ा हुआ था. और पिछला हफ्ता तुम कैसे चिल्लाया था कार्ड्स को ले कर, सब लोग देखा है तुम को.’’

‘‘अरे, कार्ड्स खेलते वक्त तो सब चिल्लाता है न…’’ ताशी भड़क उठा, हालांकि उस की गरदन पर ठंडे पसीने की एक बूंद लुढ़क गई, ‘‘मेरे को अकेला छोड़ दे. बहुत हो गया तेरा. गोंग बोम मे (माफ कर दे भाई).’’

दोपहर के खाने के वक्त जब दुकान की टिमटिमाती रोशनी बरदाश्त से बाहर हो गई, तो ताशी अपने सहायक वांगदी के भरोसे दुकान छोड़ कर पास ही अपने घर चला गया. उसे लगा जैसे सड़कें पहले से संकरी हो गई हैं और राहगीरों की नजरें उस पर भारी पड़ रही हैं.

ताशी के जाने के कुछ ही देर बाद, एक डिलीवरी वाला, जिस का चेहरा टोपी के नीचे छिपा था, दुकान में दाखिल हुआ. उस ने तेल के धब्बों वाले भूरे कागज में लिपटा एक भारी, चौकोर पार्सल मुख्य काउंटर पर रख दिया, ‘‘तुम्हारा मालिक, पेनजोर ला के वास्ते है,’’ उस आदमी ने बुदबुदाते हुए कहा.

वांगदी एक ग्राहक में बिजी था, उस ने बस सिर हिला दिया, ‘‘उधर टेबल पर रख दे भाई. मालिक आएगा तो देख लेगा.’’

वह पार्सल चावल की बोरियों और कैरोसिन के डब्बों के बीच एक खामोश मेहमान की तरह रखा रहा. उस में से कुछ भी रिस नहीं रहा था, फिर भी उस से एक ऐसी ठंडक फूट रही थी जिस ने आसपास की हवा को बोझिल कर दिया था.

तीसरे पहर तक भारी जूतों की आहट लकड़ी के फर्श पर गूंजी. रौयल भूटान पुलिस के 2 अफसर पहुंचे, उन के चेहरों पर कत्ल की तफतीश की गंभीरता साफ झलक रही थी. उन्होंने वांगमो और उस के भाई से जुड़े हर शख्स से पूछताछ शुरू कर दी थी.

‘‘ताशी पेनजोर ला,’’ बड़े अफसर ने ताशी की आंखों में देखते हुए कहा, जो अभीअभी वापस लौटा था.

‘‘मालूम पड़ा है कि मोतीथांग वाले अड्डे पर तुम्हारा कुछ… अनबन हुआ था? मरने वाले के साथ तुम्हारा कोई बहसबाजी हुआ था क्या?’’

ताशी काउंटर का सहारा ले कर खड़ा हो गया, चेहरा पीला था पर आवाज स्थिर, ‘‘साहब, खेल में तो थोड़ाबहुत खटपट होता ही है न. गुस्से में आदमी क्याकुछ नहीं बोल देता. अभी तुम क्या एक इज्जतदार दुकानदार को यह खूनी खेल के लिए शक करेगा?’’

पुलिस वाले एक घंटे तक गिद्धों की तरह सवाल घुमाते रहे, मगर ताशी के जवाब किसी तराशे हुए पत्थर की तरह चिकने और अभेद्य थे. उन्हें उस की बातों में कोई दरार नहीं मिली. जब वे जाने के लिए मुड़े, तो बड़े अफसर की नजर साइड टेबल पर रखे उस भूरे कागज वाले पार्सल पर पड़ी, ‘‘नया माल आया क्या?’’ उस ने सहज भाव से पूछा.

‘‘हां, साहब,’’ ताशी ने जवाब दिया, उस का दिल अचानक किसी कैद परिंदे की तरह पसलियों से टकराने लगा था.

दरवाजा बंद हुआ और ताशी उस पार्सल के साथ अकेला रह गया. सिरदर्द फिर से तेजी से उभरा था और दुकान में अब ऐसी खामोश पसरी थी जो किसी भारी बोझ  जैसी महसूस हो रही थी.

सूरज पहाड़ों की काली लकीरों के पीछे डूब चुका था, जिस से ‘शोंगखांग’ के भीतर एक अजीब सी खौफनाक उदासी पसर गई थी. ताशी पेनजोर उस पार्सल के ऊपर झुका हुआ था, उस की आंखों में गहरी चिड़चिड़ाहट और शक के बादल थे. दुकान की टिमटिमाती ट्यूबलाइट के नीचे वह तेल के धब्बों वाला भूरा कागज जैसे धड़कता हुआ महसूस हो रहा था.

‘‘यह कौन ले कर आया रे,’’ ताशी की आवाज धीमी पर तीखी थी, जिस ने दुकान के सन्नाटे को चीर दिया.

वांगदी ने बहीखाते से सिर उठाया, उस का चेहरा पीला पड़ चुका था, ‘‘वह एक डिलीवरी वाला आया था पेनजोर ला. उस ने अपना नाम ‘सिंग्ये पासांग’ बताया था शायद.’’

वह नाम ठंडी धुंध की तरह हवा में तैरने लगा. ताशी की उंगलियां कांप रही थीं जब उस ने थिनले को मैसेज करने के लिए फोन निकाला.

‘सिंग्ये पासांग कौन है?’

जवाब तुरंत आया, ‘अपुन को नहीं मालूम.’

ताशी की नब्ज तेज हो गई, उस ने वापस टाइप किया, ‘वांगमो का कोई गुंडा लोग है क्या यह नाम का? मेरे को पक्का यकीन है, एकदम पक्का कि इस पार्सल के अंदर क्या है.’

रिनचेन दोरजी के बिना सिर वाले धड़ की याद उस की आंखों के सामने बिजली की तरह कौंधी. उसे उस भारी पैकिंग के भीतर से खून की लोहे जैसी गंध महसूस होने लगी. कनपटी की टीस अब एक ठंडे और गहरे खौफ में बदल चुकी थी. उस ने तुरंत थिनले और अपने साझ दोस्त न्गावांग को एक गंभीर चर्चा के लिए अपने घर बुलाया.

जब वे पहुंचे, तो ताशी अपनी बैठक के अंधेरे कोने में बैठा था. वह पार्सल उन के बीच एक छोटे मेज पर किसी जिंदा बम की तरह रखा था.

‘‘अरे खोल कर देख न ताशी,’’ न्गावांग फुसफुसाया, हालांकि उस ने खुद उसे छूने की हिम्मत नहीं की.

‘‘हो सकता है कोई तुम से मजाक कर रहा हो.’’

‘‘नहीं,’’ ताशी की आवाज किसी अनजाने डर से भारी हो गई थी. एक ही दोपहर में उस का चेहरा दस साल बूढ़ा लगने लगा था. लकीरें खिंची हुईं और आंखें दहशत से फटी हुई थीं.

‘‘अगर अपुन ने इस को खोला, तो मैं इस डरावने सपने का गवाह बन जाएगा. और अगर पुलिस ने मेरे को इस के साथ पकड़ लिया… जो मेरे को लगता है इस के अंदर है… तो फिर कोई सुनवाई नहीं होगा, सीधा ‘फोर्थ डिगरी’ का सजा मिलेगा.’’

आखिरकार, वे एक खौफनाक सहमति पर पहुंचे. वे इस के अंदर नहीं देखेंगे. वे इस पार्सल को हमेशा के लिए कहीं दफन कर देंगे.

आधी रात के काले साए में, तीनों आदमी गाड़ी ले कर नदी की ओर चल दिए. कार की हैडलाइट्स पहाड़ के घुमावदार कोहरे को चीर रही थीं. वे किसी साजिश करने वाले की तरह हिल रहे थे, कड़ाके की ठंड में उन की सांसें धुएं की तरह निकल रही थीं. पुल पर पहुंच कर उन्होंने एक मोटे औद्योगिक रस्से से पार्सल को एक भारी पत्थर के साथ बांध दिया.

सब ने मिल कर जोर लगाया और उसे शून्य में उछाल दिया. एक दबी हुई आवाज के साथ वह पार्सल नदी के गहरे और उफनते पानी में समा गया.

Hindi Suspense Story

घर लौट कर ताशी पेनजोर अपनी कुरसी पर ढह गया और एक लंबी, कंपकंपाती हुई राहत की सांस ली. वह बोझ, जो 2 दिनों से उस के सीने को कुचल रहा था, आखिरकार नदी की गहराई में समा गया था.

अगली दोपहर थिंपू की हवा कुछ हलकी महसूस हो रही थी, मानो नदी ने न केवल उस पार्सल को, बल्कि पिछले दिनों के उस डरावने माहौल को भी निगल लिया हो.

ताशी पेनजोर के चेहरे की रौनक लौटने लगी थी. उस ने अपनी इलैक्ट्रौनिक की दुकान चलाने वाले पुराने दोस्त दावा वांगचुक से मिलने का मन बनाया.

दावा वांगचुक की दुकान मशीनों की गुनगुनाहट और अमीर ग्राहकों की खास महक से भरी एक सुरक्षित पनाहगाह जैसी थी. ताशी और दावा के बीच करीब एक घंटे तक दिल खोल कर बातें हुईं, आयात की बढ़ती कीमतों से ले कर पहाड़ों के दर्रों पर पिघलती बर्फ और वसंत की खूबसूरती तक. यह वैसी ही बातचीत थी जो किसी भी इनसान को उस की साधारण और सुकून भरी दुनिया से वापस जोड़ देती है.

ज ब ताशी जाने के लिए खड़ा हुआ और एक नए जोश के साथ अपना पारंपरिक ‘घो’ ठीक करने लगा, तभी दावा कांच के काउंटर पर थोड़ा झांकते हुए बोला, ‘‘अरे, रुकोरुको पेनजोर ला,’’ दावा को अचानक कुछ याद आया, ‘‘मैं पूछने ही वाला था, तुम को वह नया वाला ‘सैमसंग’ म्यूजिक सिस्टम मिल गया न? कुछ हफ्ता पहले तुम कितना पीछे पड़ा था उस के लिए.’’

ताशी जैसे वहीं जम गया. पिछले चौबीस घंटों में उस ने शांति का जो महल बड़ी मुश्किल से खड़ा किया था, वह.एक झटके में कांच के आईने की तरह चकनाचूर हो गया. कनपटी की वह पुरानी टीस पहले से कहीं ज़्यादा तेजी से वापस लौटी.

‘‘वह… म्यूजिक सिस्टम?’’ ताशी की आवाज किसी मुरदे जैसी निकली, ‘‘तुम्हारा मतलब है… कोई पार्सल?’’

‘‘हां भाई, वही. अब तुम अपना मनपसंद गाना ब्लूटूथ लगा कर बजा सकता है, जैसा तुम को मांगता था. तुम भूल कैसे गया रे? तुम ही तो बोला था कि तुम्हारा ब्रांड न्यू सैमसंग सिस्टम सैट करने को,’’ दावा एक मददगार मुसकान के साथ बोला. वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि उस के दोस्त के चेहरे पर दहशत की कितनी गहरी परछाईं उतर आई है.

दावा कहता रहा, ‘‘माल कल सुबह ही पहुंचा. मेरा एक नया कामगार लड़का है, गांव से आया है, उसी को बोला था लंच टाइम पर तुम्हारा दुकान पर दे आने को. मैं ने उस को बोला था कि यह स्पैशल और्डर है.’’

ताशी पेनजोर पत्थर का बुत बना खड़ा रहा. उस की आंखों के सामने उस काली गहरी नदी, भारी पत्थर और एलईडी फिटेड साइनबोर्ड्स के मंजर घूमने लगे. उसे तेल के धब्बों वाला वह भूरा कागज याद आया और उस का वो अटूट विश्वास… कि वह रिनचेन दोरजी का कटा हुआ सिर ठिकाने लगा रहा है.

‘‘अच्छा वह लड़का…’’ ताशी फुसफुसाया, उस की आंखें फटी की फटी रह गईं, ‘‘लड़के का नाम क्या है?’’

‘‘अरे, वह तो सीधासादा बच्चा है…’’ दावा ने अपनी ठुड्डी खुजलाते हुए कहा, ‘‘नाम जान कर क्या करेगा? पर तुम इतना पीला क्यों दिख रहा है भाई?’’

ताशी पेनजोर ने कोई जवाब नहीं दिया. वह दरवाजे की ओर मुड़ा, उस के होंठ धीरेधीरे हिल रहे थे, ‘‘वह वांगदी… बेवकूफ. ओह वांगदी. दुकान के शोरशराबे में उस लड़के ने ‘सैमसंग’ बोला होगा और इस गधे ने ‘सिंग्ये पासांग’ सुन लिया.’’

ताशी ने खाली सड़क की ओर देखा, जहां दूर कहीं नदी के बहने का शोर सुनाई दे रहा था. थिंपू घाटी की गहराइयों में कहीं एक ब्रांड न्यू म्यूजिक सिस्टम हमेशाहमेशा के लिए दफन हो चुका था.  Hindi Suspense Story

–गौतम भट्टाचार्य

Crime Story in Hindi : विश्वासघात

Crime Story in Hindi. दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी. सौम्या उस समय घर में अकेली थी. उस का पति करन दफ्तर जा चुका था.

सौम्या ने जब दरवाजा खोला, तो बाहर खड़े शख्स को देख कर वह चौंक पड़ी,    ‘‘अरे, आप…’’    ‘‘अंदर आने के लिए नहीं कहेंगी,’’ बाहर खड़े नौजवान ने मुसकरा कर कहा.   ‘‘मैं तो भूल ही गई. आइए, अंदर आइए,’’ वह झेपते हुए बोली.

वह नौजवान, जिस के बदन पर कीमती सूट था और बाएं हाथ की 2 उंगलियों में हीरे की अंगूठियां थीं, अंदर आ कर एक कुरसी पर बैठ गया.

‘‘आप कितने दिनों बाद आए हैं. लगता है, आप को हमारी याद ही नहीं आती,’’ सौम्या शिकायत करने लगी.

‘‘ऐसी बात नहीं है भाभीजी…’’ वह नौजवान बोला, ‘‘दरअसल, आप को तो मालूम है कि बाबूजी की मौत के बाद घर और कारोबार की सारी जिम्मेदारी मुझे ही संभालनी पड़ती है.’’ ‘‘मैं आप के लिए चाय बना कर लाती हूं,’’ सौम्या ने कहा.

कुछ देर बाद सौम्या नमकीन और चाय ले कर आ गई.

‘‘करन तो ड्यूटी पर गया होगा?’’ उस नौजवान ने पूछा. ‘‘हां,’’ सौम्या ने उसे चाय का कप पकड़ाते हुए कहा.

‘‘उस से तो मुलाकात हो ही नहीं पाती. काम में मसरूफ रहता हूं. आज दफ्तर मेें ज्यादा काम नहीं था, इसलिए उसे जल्दी निबटा कर यहां आ गया.’’ ‘‘आप रविवार को आइए, करन घर में ही मिलेंगे.’’

इधरउधर की बातें कर के उस नौजवान ने अपने कोट की जेब से एक अंगूठी निकाली और सौम्या की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मेरी तरफ से यह अंगूठी आप के लिए…’’

सौम्या ने खूब मना किया, पर वह नौजवान अंगूठी दे कर ही माना.

‘‘यह तो बहुत कीमती होगी?’’ ‘‘बिलकुल नहीं…’’ वह नौजवान मुसकराते हुए बोला, ‘‘आप के आगे तो यह बिलकुल सस्ती है.’’ सौम्या चाय के खाली कप उठाते हुए बोली, ‘‘खाना खा कर जाना.’’

चाय के कप उठाते समय सौम्या की साड़ी कंधे से नीचे खिसक गई थी. उस नौजवान ने देख लिया था. वह सकपका गई. उस ने फौरन साड़ी का पल्ला दुरुस्त किया.

तभी वह नौजवान खड़ा हो गया और बोला, ‘‘अभी मैं चलता हूं. खाना फिर कभी खाऊंगा.’’

उस 22 साला नौजवान का नाम दीप था. वह करन के बचपन का साथी था. वह बहुत अमीर था, जबकि करन पोस्ट औफिस में क्लर्क था. इस के बावजूद वे दोनों बहुत गहरे दोस्त थे.

करन के मांबाप बहुत पहले ही एक कार हादसे में मर चुके थे. सौम्या के साथ करन ने लव मैरिज की थी.

दुनिया में अच्छी दोस्ती और प्यार से जलने वालों की कमी नहीं है. करन और दीप की दोस्ती भी दुनिया वालों की नजरों में खटकती थी.

करन के घर के सामने वाली पान की दुकान के पास भीड़ का जमावड़ा रहता था. उन में से ज्यादातर लड़के मवालीगुंडे होते थे.

उन्हीं में से एक था राजू, जो अपने 3-4 दोस्तों के साथ अकसर वहां आता था. वह दीप और सौम्या के बारे में उलटीसीधी बातें किया करता था.

आज भी जब दीप करन के घर से निकल कर अपनी कार में बैठ कर जा रहा था, तो राजू पान की दुकान के पास खड़ा पान चबा रहा था.

जब कार आंखों से ओझल हो गई, तो राजू का एक दोस्त बोला, ‘‘राजू, यह लड़का यहां अकसर आता है.’’

‘‘तुझे क्या दिक्कत है?’’ पान चबाते हुए राजू ने एक खास अंदाज में कहा, ‘‘अरे भाई, जिस के यहां माल होगा, उसी के यहां तो चोर आएंगे…’’

उस की बात पर सब हंस पड़े.

रविवार को जब दीप आया, तो करन घर में ही था. उस दिन दोनों ने बैठ कर खूब गपशप की और नाश्ता व खाना भी साथसाथ खाया.

खाना खाते समय दीप ने अगले शुक्रवार को शहर के सब से महंगे होटल में लंच कराने का औफर दिया.

‘‘वह तो बहुत महंगा है. वैसे सौम्या तो कई बार वहां चलने के लिए कह चुकी है, पर… इतने महंगे होटल में मैं नहीं जा सकता,’’ करन ने कहा.

‘‘उस की चिंता तुम क्यों करते हो? अरे, भाभीजी पर कुछ हक मेरा भी तो बनता है. क्या उन की एक ख्वाहिश को भी मैं पूरा नहीं कर सकता?’’ दीप पास खड़ी सौम्या की तरफ प्यार से देखते हुए बोला.

दीप की जिद के आगे करन को उस की बात माननी ही पड़ी.

जब शुक्रवार आया, तो करन को कुछ जरूरी काम पड़ गया और वह बाहर चला गया, लेकिन जाते समय फोन पर दीप से कह गया कि वह सौम्या को खाना खिलाने होटल ले जाए.

दीप सौम्या को ले कर जब उस महंगे होटल में पहुंचा, तो सौम्या की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. यहां आने के बारे में वह न जाने कब से सोच रही थी. दीप उसे होटल के एक शानदार कमरे में ले गया.

‘‘हम यहां कमरे में क्यों आए… लंच तो बाहर…’’ कमरे में पहुंच कर कुछ सोचते हुए सौम्या बोली.

‘‘बाहर भीड़ ज्यादा है और भीड़ में आप का दम घुटता है, इसलिए लंच का प्रोग्राम मैं ने इस कमरे में ही बनाया है. यह कमरा तो मैं ने कल ही बुक करवा दिया था.’’

‘‘तुम तो मेरी पसंदनापसंद को जानते हो,’’ सौम्या हंस कर बोली.

यह सुन कर दीप केवल मुसकरा दिया.

दीप ने एक वेटर को बुला कर लंच कमरे में ही मंगा लिया और शानदार पलंग पर बैठ कर दोनों खाना खाने लगे.

‘‘यह कोल्ड ड्रिंक पता नहीं कैसी… मुझे  चक्कर सा…’’ कोल्ड ड्रिंक पीने के बाद सौम्या अचानक सिर पकड़ कर बोली. ‘‘हां, स्वाद भी कुछ बदलाबदला सा…’’ दीप पलंग से उतरते हुए बोला, ‘‘मैं वेटर से पूछता हूं.’’

अभी दीप पलंग से उतरा ही था कि सौम्या भी पलंग से उतरी और कुछ दूर चलते ही उस के कदम लड़खड़ा गए. अगर दीप ने फौरन पलट कर उसे अपनी बांहों में थाम न लिया होता, तो वह गिर जाती.

उसी समय सौम्या को तेज हिचकी आई और वह ?ाटका खा कर दीप से लिपट गई. दीप ने उसे और कस कर जकड़ते हुए अपने सीने से लगा लिया.

सौम्या के शरीर को अपनी बांहों में जकड़े दीप को अपना शरीर जलता हुआ सा मालूम होने लगा. उसे ऐसा लगा, जैसे शरीर में अंगारे भर गए हों. उस का चेहरा लाल होने लगा.

दीप की बांहों का शिकंजा अपनेआप कसने लगा. 2 जिस्मों की गरमी से पूरा कमरा सुलगने लगा, लेकिन इस से पहले कि आग लग पाती, सौम्या घबरा कर दीप से अलग हो गई.

‘‘हमें घर चलना चाहिए,’’ सौम्या माथे से पसीना पोंछते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोली. दीप भी उस के पीछेपीछे चल पड़ा.

सौम्या को घर छोड़ कर जब दीप बाहर निकला, तो वह काफी परेशान दिख रहा था. उस ने राजू व उस के दोस्तों को अपनी ओर घूरते हुए देखा. वह जल्दी से कार में बैठा और वहां से चला गया.

राजू के चेहरे पर आज कुछ ज्यादा ही खुशी झलक रही थी.

सुबह का समय था. दीप अपने दफ्तर में बैठा एक फाइल मेें उल?ा हुआ था, तभी मेज पर रखा फोन बजा.

‘‘हैलो,’’ दीप ने ही फोन उठाया.  ‘‘हैलो,’’ उधर से एक भारीभरकम आवाज सुनाई दी.

‘‘मैं दीप भारती बोल रहा हूं… आप कौन?’’ दीप ने पूछा.    ‘‘यह मत पूछो कि मैं कौन बोल रहा हूं. मैं ने फोन क्यों किया, यह पूछो?’’

दीप कुछ चौंका, फिर भी उस ने कहा, ‘‘क्यों किया फोन?’’    ‘‘तुम्हारी मेज पर… तुम्हारे बिलकुल ठीक सामने जो फाइल रखी है, उसे खोल कर देखो…’’

अब दीप चक्कर में पड़ गया कि आखिर माजरा क्या है? हकीकत जानने के लिए उस ने एक हाथ बढ़ा कर मेज पर रखी फाइल उठा ली और जब उसे खोल कर देखा, तो उस में एक बड़ा सा लिफाफा रखा था.

जब दीप ने लिफाफा खोल कर देखा, तो उस के पूरे शरीर में करंट सा दौड़ गया. दिल की धड़कनें बढ़ गईं, चेहरे पर पसीने की बूंदें झलकने लगीं.

‘‘क्यों, देख लिया?’’ फोन करने वाले शख्स ने हंस कर पूछा. ‘‘तुम कौन हो? क्या चाहते हो?’’ दीप घबरा गया था.

‘‘अभी भी नहीं समझे. मुझे पैसा चाहिए. अगर तुम चाहते हो कि लिफाफे में रखे तुम्हारे और सौम्या के फोटो तुम्हारे बचपन के दोस्त करन के पास न पहुंचें, तो मु?ो पूरे 20 लाख रुपए दो.’’

‘‘20 लाख…’’ दीप चौंका. ‘‘हां, तुम्हारी घटिया हरकत के मुकाबले यह रकम ज्यादा नहीं है.’’

दीप हिम्मत जुटा कर बोला, ‘‘तुम्हें एक पैसा भी नहीं मिलेगा.’’ ‘‘पैसा, अरे पैसे से क्या होता है आजकल? मुझे पूरे 20 लाख रुपए चाहिए,’’ उधर से धमकी भरी आवाज सुनाई दी.

दीप सोचने लगा, ‘अगर करन ने ये तसवीरें देख लीं, तो वह मेरे और सौम्या के बारे में क्या सोचेगा. उस का बसाबसाया घर बरबाद हो जाएगा. नहीं, यह नहीं होना चाहिए.’

‘‘क्या सोचने लगे?’’ कुछ देर बाद उधर से पूछा गया.

पहले दीप ने सोचा कि फोन काट दे, फिर यह सोच कर कि फोन काट देने से यह समस्या हल नहीं होगी, उस ने पूछा, ‘‘ठीक है, पैसे कहां पहुंचाने हैं?’’

‘‘परसों रात के 11 बजे रुपए तैयार रखना. मैं बता दूंगा कि रुपए कहां पहुंचाने हैं, लेकिन कोई होशियारी नहीं होनी चाहिए.’’

‘‘नहीं होगी, पर उस के नैगेटिव?’’ ‘‘परसों रात को ही मिल जाएंगे.’’

उधर से फोन काट दिया गया. पर दीप 2 दिन बेचैन रहा.

जब तयशुदा समय पर रात के ठीक 10 बजे ब्लैकमेलर का फोन आया और दीप को रुपए ले कर शहर के बिलकुल बाहर सुनसान जगह पर बने खंडहरों में आने के लिए कहा गया, तो दीप, जिस ने रुपए का इंतजाम पहले ही कर लिया था, कार से बताए गए पते की ओर चल पड़ा.

खंडहरों तक पहुंचने में दीप को आधा घंटा लग गया.

दीप ने कार से उतर कर पहले उस खतरनाक जगह का मुआयना किया. वह सूटकेस हाथ में लिए हुए था.

तभी आवाज आई, ‘‘जहां खड़े हो, सूटकेस वहीं रख दो और सामने खड़े बबूल के पेड़ के पास जाओ. तुम्हें वहीं फोटो के नैगेटिव मिल जाएंगे.’’

दीप ने सूटकेस वहीं रख दिया और बबूल के पेड़ की तरफ बढ़ गया. तभी कोई अंधेरे को चीरते हुए आया और सूटकेस उठा ले गया.

‘‘यहां तो कुछ नहीं है,’’ बबूल के पेड़ के पास कुछ न पा कर दीप बौखला गया और चीखा.

‘‘तुम सही कह रहे हो. नैगेटिव वहां नहीं हैं, जहां तुम ढूंढ़ रहे हो.’’ ‘‘फिर कहां हैं?’’ ‘‘दूसरी तरफ देखो.’’

दीप कुछ आगे बढ़ कर जब दूसरी तरफ पहुंचा, तो उसे एक सफेद लिफाफा पड़ा हुआ मिल गया, जिस में नैगेटिव थे.

वह नैगेटिव ले कर घर आ गया. उन्हें चैक किया और जला दिया. जब 2-3 महीने तक ब्लैकमेलर का फोन नहीं आया, तो वह निश्चिंत हो गया.

इसी बीच दीप की शादी तय हो गई. दीप शादी का कार्ड ले कर जब करन के घर पहुंचा, तो उन दोनों को बिस्तर पर बैठा पाया.

दीप ने दरवाजे पर दस्तक दे कर उन का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए जैसे ही हाथ उठाया, तो ठिठक गया. अंदर से आ रही आवाजों ने उसे वहीं रुकने पर मजबूर कर दिया.

‘‘देखा मेरे दिमाग का कमाल,’’ करन कह रहा था. ‘‘इस में मेरा भी तो योगदान है,’’ सौम्या हंसते हुए बोली.

‘‘हां जानेमन…’’ करन उस के गालों को चूम कर बोला, ‘‘तुम अगर अपना रोल ठीक से नहीं निभातीं, तो हम कभी अमीर नहीं बन पाते.’’

‘‘हां, लेकिन तुम ने यह अंदाजा कब लगा लिया था कि दीप हमारे जाल में फंस जाएगा?’’ सौम्या ने पूछा.

‘‘जब पहली बार वह तुम से मिलने आया था,’’ करन ने कहा.

‘‘वैसे, तुम्हारी चाल थी बेहद शानदार. कैसे तुम ने होटल में वेटर को पैसे दे कर कोल्ड ड्रिंक में शराब मिलवा कर भिजवाई. दीप तो शराब को हाथ भी नहीं लगाता है. वह जरा सी शराब में ही बहकने लगा था.

‘‘बहकने की तो मैं ने भी शानदार ऐक्टिंग की. उसे क्या पता कि मु?ो तो शराब पीने का बहुत पहले से शौक रहा है,’’ सौम्या ने कहा.

‘‘फिर छिप कर मैं ने ही तुम दोनों की तसवीरें खींचीं और ब्लैकमेलर बन कर दीप से 20 लाख रुपए भी झटक लिए,’’ इतना कह कर करन जोर से हंसा और उस ने सौम्या को दोबारा चूम लिया.

विश्वासघाती करन की हंसी बाहर खड़े दीप के कानों में पिघले हुए गरम कांच की तरह उतर रही थी.  Crime Story in Hindi

– अनुराग कुमार जीनियस

Hindi Story – तरकीब : झुमरी की जवानी हासिल कर पाया रतन

Hindi Story. रतन सिंह की निगाहें पिछले कई दिनों से झुमरी पर लगी हुई थीं. वह जब भी उसे देखता, उस के मुंह से एक आह निकल जाती. झुमरी की खिलती जवानी ने उस के तनमन में एक हलचल सी मचा दी थी और वह उसे हासिल करने को बेताब हो उठा था.

वैसे भी रतन सिंह के लिए ऐसा करना कोई बड़ी बात न थी. वह गांव के दबंग गगन सिंह का एकलौता और बिगड़ैल बेटा था. कई जरूरतमंद लड़कियों को अपनी हवस का शिकार उस ने बनाया था. झुमरी तो वैसे भी निचली जाति की थी.

झुमरी 20वां वसंत पार कर चुकी एक खूबसूरत लड़की थी. गरीबी में पलीबढ़ी होने के बावजूद जवानी ने उस के रूप को यों निखारा था कि देखने वालों की निगाहें बरबस ही उस पर टिक जाती थीं. गोरा रंग, भरापूरा बदन, बड़ीबड़ी कजरारी आंखें और हिरनी सी मदमस्त चाल.

इस सब के बावजूद झुमरी में एक कमी थी. वह बोल नहीं सकती थी, पर उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वह अपनेआप में मस्त रहने वाली लड़की थी.

झुमरी घर के कामों में अपनी मां की मदद करती और खेत के काम में अपने बापू की. उस के बापू तिलक के पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा था, जिस के सहारे वह अपने परिवार को पालता था. वैसे भी उस का परिवार छोटा था. परिवार में पतिपत्नी और 2 बच्चे, झुमरी और शंकर थे. अपनी खेती से समय मिलने पर तिलक दूसरों के खेतों में भी मजदूरी का काम कर लिया करता था.

गरीबी में भी तिलक का परिवार खुश था. परंतु कभीकभी पतिपत्नी यह सोच कर चिंतित हो उठते थे कि उन की गूंगी बेटी को कौन अपनाएगा?

झुमरी इन सब बातों से बेखबर मजे में अपनी जिंदगी जी रही थी. वह दिमागी रूप से तेज थी और गांव के स्कूल से 10 वीं जमात तक पढ़ाई कर चुकी थी. उसे खेतखलिहान, बागबगीचों से प्यार था.

गांव के दक्षिणी छोर की अमराई में झुमरी अकसर शाम को आ बैठती और पेड़ों के झुरमुट में बैठे पक्षियों की आवाज सुना करती. कोयल की आवाज सुन कर उस का भी जी चाहता कि वह उस के सुर में सुर मिलाए, पर वह बोल नहीं सकती थी.

झुमरी की इस कमी को रतन सिंह ने अपनी ताकत समझा. उस ने पहले तो झुमरी को तरहतरह के लालच दे कर अपने प्रेमजाल में फांसना चाहा और जब इस में कामयाब न हुआ, तो जबरदस्ती उसे हासिल करने का मन बना लिया.

रात घिर आई थी. चारों तरफ अंधेरा हो चुका था. आज झुमरी को खेत से लौटने में देर हो गई थी. पिछले कई दिनों से उस की ताक में लगे रतन सिंह की नजर जब उस पर पड़ी, तो उस की आंखों में एक तेज चमक जाग उठी.

मौका अच्छा जान कर रतन सिंह उस के पीछे लग गया. एक तो अंधेरा, ऊपर से घर लौटने की जल्दी. झुमरी को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि कोई उस के पीछे लगा हुआ है. वह चौंकी तब, जब अमराई में घुसते ही रतन सिंह उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

‘‘मैं ने तुम्हारा प्यार पाने की बहुत कोशिश की…’’ रतन सिंह कामुक निगाहों से झुमरी के उभारों को घूरता हुआ बोला, ‘‘तुम्हें तरहतरह से रिझाया. तुम से प्रेम निवेदन किया, पर तू न मानी. आज अच्छा मौका है. आज मैं छक कर तेरी जवानी का रसपान करूंगा.’’

रतन सिंह का खतरनाक इरादा देख झुमरी के सारे तनबदन में डर की सिहरन दौड़ गई. उस ने रतन सिंह से बच कर निकल जाना चाहा, पर रतन सिंह ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. उस ने झपट कर झुमरी को अपनी बांहों में भर लिया.

झुमरी ने चिल्लाना चाहा, पर उस के होंठों से शब्द न फूटे. झुमरी को रतन सिंह की आंखों में वासना की भूख नजर आई. रतन सिंह झुमरी को खींचता हुआ अमराई के बीचोंबीच ले आया और जबरदस्ती जमीन पर लिटा दिया. इस के पहले कि झुमरी उठे, वह उस पर सवार हो गया.

झुमरी उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. दूसरी ओर वासना में अंधा रतन सिंह उस के कपड़े नोचने लगा. उस ने अपने बदन का पूरा भार झुमरी के नाजुक बदन पर डाल दिया, फिर किसी भूखे भेडि़ए की तरह उसे रौंदने लगा.

झुमरी रो रही थी, तड़प रही थी, आंखों ही आंखों में फरियाद कर रही थी, लेकिन रतन सिंह ने उस की एक न सुनी और उसे तभी छोड़ा, जब अपनी वासना की आग बुझा ली.

ऐसा होते ही रतन सिंह उस के ऊपर से उठ गया. उस ने एक उचटती नजर झुमरी पर डाली. जब उस की निगाहें झुमरी की निगाहों से टकराईं, तो उस को एक झटका सा लगा.

झुमरी की आंखों में गुस्से की चिनगारियां फूट रही थीं, पर अभीअभी उस ने झुमरी के जवान जिस्म से लिपट कर जवानी का जो जाम चखा था, इसलिए उस ने झुमरी के गुस्से और नफरत की कोई परवाह नहीं की और उठ कर एक ओर चल पड़ा.

इस घटना ने झुमरी को झकझोर कर रख दिया था. वह 2 दिन तक अपने कमरे में पड़ी रही थी. झुमरी के मांबाप ने जब उस से इस की वजह पूछी, तो उस ने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया था.

कई बार झुमरी के दिमाग में यह बात आई थी कि वह इस के बारे में उन्हें बतला दे, पर यह सोच कर वह चुप रह गई थी कि उन से कहने से कोई फायदा नहीं. वे चाह कर भी रतन सिंह का कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे, उलटा रतन सिंह उन की जिंदगी को नरक बना देगा.

इस मामले में जो करना था, उसे ही करना था. रतन सिंह ने उस की इज्जत लूट ली थी और उसे इस के किए की सजा मिलनी ही चाहिए थी. पर कैसे? झुमरी ने इस बात को गहराई से सोचा, फिर उस के दिमाग में एक तरकीब आ गई.

रात आधी बीत चुकी थी. सारा गांव सो चुका था, पर झुमरी जाग रही थी. वह इस समय अमराई से थोड़ी दूर बांसवारी यानी बांसों के झुरमुट में खड़ी हाथों में कुदाल लिए एक गड्ढा खोद रही थी.

तकरीबन 2 घंटे तक वह गड्ढा खोदती रही, फिर हाथ में कटार लिए बांस के पेड़ों के पास पहुंची. उस ने कटार की मदद से बांस की पतलीपतली अनेक डालियां काटीं, फिर उन्हें गड्ढे के करीब ले आई.

डालियों को चिकना कर उन्हें बीच से चीर कर उन की कमाची बनाईं, फिर उन की चटाई बुनने लगी. अपनी इच्छानुसार चटाई बुनने में उसे तकरीबन 3 घंटे लग गए.

चटाई तैयार कर झुमरी ने उसे गड्ढे के मुंह पर रखा. चटाई ने तकरीबन एक मीटर दायरे के गड्ढे के मुंह को पूरी तरह ढक लिया. यह चटाई किसी आदमी का भार हरगिज सहन नहीं कर सकती थी.

सुबह होने में अभी चंद घंटे बचे थे. हालांकि बांसों के इस झुरमुट की ओर गांव वाले कम ही आते थे और दिन में यह सुनसान ही रहता था, फिर भी झुमरी कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती थी. उस ने जमीन पर बिखरे बांस के सूखे पत्तों को इकट्ठा कर उन का ढेर लगा दिया.

इस काम से निबट कर झुमरी ने बांस की चटाई से गड्ढे का मुंह ढका, पर उस पर पत्तों को इस तरह डाल दिया, ताकि चटाई पूरी तरह ढक जाए और किसी को वहां गड्ढा होने का एहसास न हो. गड्ढे से निकली मिट्टी को उस ने अपने साथ लाई टोकरी में भर कर गड्ढे से थोड़ी दूर डाल दिया.

काम खत्म कर झुमरी ने एक निगाह अपने अब तक के काम पर डाली, फिर अपने साथ लाए बड़े से थैले में अपना सारा सामान भरा और थैला कंधे पर लाद कर घर की ओर चल पड़ी.

7 दिनों तक झुमरी का यह काम चलता रहा. इतने दिन में उस ने 7 फुट गहरा गड्ढा तैयार कर लिया था. गड्ढे में उतरने और चढ़ने के लिए वह अपने साथ घर से लाई सीढ़ी का इस्तेमाल करती थी. काम पूरा कर उस ने पत्ते डाले, फिर अपने अगले काम को अंजाम देने के बारे में सोचती.

रतन सिंह ने झुमरी की इज्जत लूट तो ली थी, परंतु अब वह इस बात से डरा हुआ था कि कहीं झुमरी इस बात का जिक्र अपने मांबाप से न कर दे और कोई हंगामा न खड़ा हो जाए. परंतु जब 10 दिन से ज्यादा हो गए और कुछ नहीं हुआ, तो उस ने राहत की सांस ली. अब उसे रात की तनहाई में वो पल याद आते, जब उस ने झुमरी के जवान जिस्म से अपनी वासना की आग बुझाई थी. जब भी ऐसा होता, उस का बदन कामना की आग में झुलसने लगता था.

इस बीच रतन सिंह ने 1-2 बार झुमरी को अपने खेत की ओर जाते या आते देखा था, परंतु उस के सामने जाने की उस की हिम्मत न हुई थी. पर उस दिन अचानक रतन सिंह का सामना झुमरी से हो गया. वह विचारों में खोया अमराई की ओर जा रहा था कि झुमरी उस के सामने आ खड़ी हुई. उसे यों अपने सामने देख एकबारगी तो रतन सिंह बौखला गया था और झुमरी को देखने लगा था.

झुमरी कुछ देर तक खामोशी से उसे देखती रही, फिर उस के होंठों पर एक दिलकश मुसकान उभर उठी. उसे इस तरह मुसकराते देख रतन सिंह ने राहत की सांस ली और एकटक झुमरी के खूबसूरत चेहरे और भरेभरे बदन को देखने लगा.

इस के बावजूद जब झुमरी मुसकराती रही, तो रतन सिंह बोला, ‘‘झुमरी, उस दिन जो हुआ, उस का तुम ने बुरा तो नहीं माना?’’ झुमरी ने न में सिर हिलाया.

‘‘सच…’’ कहते हुए रतन सिंह ने उस की हथेली कस कर थाम ली, ‘‘इस का मतलब यह है कि तू फिर वह सब करना चाहती है?’’ बदले में झुमरी खुल कर मुसकराई, फिर हौले से अपना हाथ छुड़ा कर एक ओर भाग गई.

उस की इस हरकत पर रतन सिंह के तनमन में एक हलचल मच गई और उस की आंखों के सामने वो पल उभर आए, जब उस ने झुमरी की खिलती जवानी का रसपान किया था. झुमरी को फिर से पाने की लालसा में रतन सिंह उस के इर्दगिर्द मंडराने लगा. झुमरी भी अपनी मनमोहक  अदाओं से उस की कामनाओं को हवा दे रही थी.

झुमरी ने एक दिन इशारोंइशारों में रतन सिंह से यह वादा कर लिया कि वह पूरे चांद की आधी रात को उस से अमराई में मिलेगी. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. उस की चांदनी चारों ओर बिखरी हुई थी. ऐसे में रतन सिंह बड़ी बेकरारी से एक पेड़ के तने पर बैठा झुमरी का इंतजार कर रहा था.

झुमरी ने आधी रात को यहीं पर उस से मिलने का वादा किया था, परंतु वह अब तक नहीं आई थी. जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे रतन सिंह की बेकरारी बढ़ रही थी. अचानक रतन सिंह को अपने पीछे किसी के खड़े होने की आहट मिली. उस ने पलट कर देखा, तो उस का दिल धक से रह गया. वह झटके से उठ खड़ा हुआ. उस के सामने झुमरी खड़ी थी. उस ने भड़कीले कपड़े पहन रखे थे, जिस से उस की जवानी फटी पड़ रही थी.

जब झुमरी ने रतन सिंह को आंखें फाड़े अपनी ओर देखा पाया, तो उत्तेजक ढंग से अपने होंठों पर जीभ फेरी. उस की इस अदा ने रतन सिंह को और भी बेताब कर दिया.

रतन सिंह ने झटपट झुमरी को अपनी बांहों में समेट लेना चाहा, लेकिन झुमरी छिटक कर दूर हो गई. ‘‘झुमरी, मेरे पास आओ. मेरे तनबदन में आग लगी है, इसे अपने प्यार की बरसात से शांत कर दो,’’ रतन सिंह बेचैन होते हुए बोला.

झुमरी ने इशारे से रतन सिंह को खुद को पकड़ लेने की चुनौती दी. रतन सिंह उस की ओर दौड़ा, तो झुमरी ने भी दौड़ लगा दी. अगले पल हालत यह थी कि झुमरी किसी मस्त हिरनी की तरह भाग रही थी और रतन सिंह उसे पकड़ने के लिए उस के पीछे दौड़ रहा था.

झुमरी अमराई से निकली, फिर बांस के झुरमुट की ओर भागी. वह उस गड्ढे की ओर भाग रही थी, जिसे उस ने कई दिनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया था. वह जैसे ही गड्ढे के नजदीक आई, एक लंबी छलांग भरी और गड्ढे की ओर पहुंच गई.

झुमरी के हुस्न में पागल, गड्ढे से अनजान रतन सिंह अचानक गड्ढे में गिर गया. उस के मुंह से घुटीघुटी सी चीख निकली. कुछ देर तक तो रतन सिंह कुछ समझ ही नहीं पाया कि क्या हो गया है. वह बौखलाया हुआ गड्ढे में गिरा इधरउधर झांक रहा था, पर जैसे ही उस के होशोहवास दुरुस्त हुए, वह जोरजोर से झुमरी को मदद के लिए पुकारने लगा. परंतु उधर से कोई मदद नहीं आई.

झुमरी की ओर से निराश रतन सिंह खुद ही गड्ढे से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा. उस ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर गड्ढे के किनारे को पकड़ना चाहा, परंतु वह उस की पहुंच से दूर था.

रतन सिंह ने उछल कर बाहर निकलने की 2-4 बार नाकाम कोशिश की. आखिरकार वह गड्ढे का छोर पकड़ने में कामयाब हो गया. उस ने अपने बदन को सिकोड़ कर अपना सिर ऊपर उठाया. उस का सिर थोड़ा ऊपर आया, तभी उस की नजर झुमरी पर पड़ी. उस के हाथों में कुदाल थी और उस की आंखों से नफरत की चिनगारियां फूट रही थीं.

इस के पहले कि रतन सिंह कुछ समझता, झुमरी ने कुदाल का भरपूर वार उस के सिर पर किया. रतन सिंह की दिल दहलाने वाली चीख से वह सुनसान इलाका दहल उठा. उस का सिर फट गया था और खून की धारा फूट पड़ी थी. गड्ढे का किनारा रतन सिंह के हाथ से छूट गया और वह गिर पड़ा था.

गड्ढे में गिरते ही रतन सिंह ने अपना सिर थाम लिया. उस की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था और उस पर बेहोशी छाने लगी थी. उस के दिमाग में एक विचार बिजली की तरह कौंधा कि यह झुमरी का फैलाया हुआ जाल था, जिस में फंसा कर वह उसे मार डालना चाहती है.

तभी रतन सिंह के सिर पर ढेर सारी मिट्टी आ गिरी. उस ने अपनी बंद होती आंखें उठा कर ऊपर की ओर देखा, तो झुमरी टोकरी लिए वहां खड़ी थी. अगले ही पल वह बेहोशी के अंधेरों में गुम होता चला गया.

झुमरी ने मिट्टी से पूरा गड्ढा भर दिया, फिर उस पर पत्तियां डाल कर उठ खड़ी हुई. उस ने सिर उठा कर ऊपर देखा. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. थोड़ी देर बाद झुमरी कंधे पर थैला लादे अपने घर को लौट रही थी. Hindi Story

बुझ गई दूसरों की उम्मीदें जगाने वाली ‘ज्योति’

दिल्ली महिला आयोग की काउंसलर रहीं ज्योति की साजिशन हत्या हुई या उन्होंने आत्महत्या की/ रविवार रात आखिरी साढ़े चार घंटे में छिपी है मौत की ये मिस्ट्री. बवाना पुलिस हर पहलू से तफ्तीश कर रही है. 304बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है. ज्योति का सोमवार को पोस्टमौर्टम नहीं हो सका. परिजनों ने आशंका जताई है कि ज्योति का पति संजू खुद बाड़ा हिंदूराव अस्पताल में कार्यरत है, इसलिए मेडिकल बोर्ड की निगरानी में पोस्टमौर्टम की मांग की है. परिवार व जानकार ज्योति की खुदकुशी पर यकीन करने को तैयार नहीं.

जानकारों का कहना है कि औरों के जीवन में उम्मीद की रोशनी बिखरने वाली आखिर खुदकशी कैसे कर सकती है. पुलिस का कहना है कि शादी के बाद से ही पति उसपर शक करता था. मौत के बाद पति अस्पताल लेकर नहीं गया था, बल्कि शव घर पर ही पुलिस को मिला.

परिवार के मुताबिक, रविवार रात ज्योति से वौट्सऐप चैट हुई थी. आखिरी मेसेज 7:09 बजे आया था. आरोप है कि ज्योति ने चैट में बताया था कि अब ये लोग कैश की डिमांड भी कर रहे हैं. उसके बाद अचानक क्या हुआ कि उसने चैट में लिखा ‘प्लीज डोंट रिप्लाई नाउ’. उसके करीब साढ़े तीन घंटे बाद 11:36 पर पति ने ज्योति के परिवार को कौल करके बताया कि वह स्यूसाइड की कोशिश कर रही हैं. फिर 11:46 की कौल में पति ने बताया कि ज्योति ने स्यूसाइड कर लिया है और वो मर गई है. उसके बाद ज्योति के परिवारवालों ने पीसीआर कौल की.

पीसीआर के साथ मायके वाले घर पहुंचे. पुलिस के साथ देखा कि ज्योति का शव बेड पर था. उसका शरीर अकड़ चुका था. आरोप है कि उसके गले पर चोट के निशान थे. जबकि पति व ससुराल वाले पास ही थे. आंबेडकर में मोर्चरी में शव को रखवाया. ज्योति का मोबाइल व मौके से मिले कुछ सामान क्राइम टीम ने जांच के लिए सील कर लिए. गौरतलब है कि ज्योति की मौत पर मायकेवालों ने हत्या का आरोप लगाया है. जबकि पति व ससुराल वालों ने खुदकुशी का दावा किया.

वौट्सऐप पर आखिरी चैट ‘प्लीज डोंट रिप्लाई

एमएसडब्ल्यू (मास्टर इन सोशल वर्क) की डिग्री हासिल कर चुकीं 27 साल की ज्योति सहरावत तीन बहनों में सबसे छोटी थीं. बवाना के दरियापुर में ज्योति का परिवार रहता है. पिता रोहताश एयरफोर्स में औफिसर रैंक से रिटायर्ड हैं, फिलहाल इलेक्ट्रौनिक्स शोरूम है. शुरू से ही यह लोग ओम शांति मिशन से जुड़े हुए हैं.

ज्योति की मां का साढ़े चार साल पहले बीमारी की वजह से निधन हो चुका है. बड़ी बहन आकाश पीएचडी कर रही हैं, छोटी बहन रंजू बैंक में जॉब करती हैं. दोनों बड़ी बहनों ने शादी नहीं की. क्योंकि बड़ी बहन ने पीएचडी की वजह से शादी नहीं की. रंजू भी ओम शांति से जुड़ी हुई हैं. घर में ज्योति और छोटा भाई शक्ति सहरावत की ही शादी हुई है.

बहन रंजू ने बताया कि इसी साल 25 जून को मुंगेशपुर निवासी संजू राणा से शादी हुई थी. मायके और ससुराल में 15 मिनट का फासला है. ज्योति के परिवारवालों ने पुलिस को बताया कि शादी में 50 लाख के आसपास खर्च किया था. ज्योति पिछले पांच साल से आउटर जिले में दिल्ली महिला आयोग में रेप विक्टिम काउंसलर थीं.

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