Hindi Story: दीवारों के उस पार

Hindi Story: 2 बच्चों की तलाकशुदा मां रोजी उत्तराखंड से काम के सिलसिले में गुरुग्राम गई. वहां उस की मुलाकात समीर से हुई, जिसे वह उत्तराखंड से ही जानती थी. समीर ने उसे लिवइन रिलेशनशिप में रहने के लिए कहा. क्या चल रहा था उस के मन मेंरोजी ने क्या जवाब दिया?

32  साल की रोजी मूल रूप से उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग की रहने वाली थी और 2 बच्चों की मां थी. उस की जिस लड़के से शादी हुई थी, वह शराब पीने का आदी था. गंदी हरकतें तो उस की रगरग में बसी थीं. रोजी ने भी हर लड़की की तरह सुनहरे सपने संजाए थे कि शादी के बाद वह अपने पति के संग घूमेगीफिरेगी और अपने सपनों को पूरा करेगी, लेकिन जिंदगी को कुछ और ही मंजूर था. रोजी का पति रोजाना शराब पी कर घर आता और जराजरा सी बातों को ले कर ?ागड़ा करता. उस की इन्हीं हरकतों से तंग कर रोजी ने अपने पति को तलाक दे दिया और हरियाणा गुरुग्राम में अपनी छोटी बहन पूजा के पास चली आई.

रोजी की छोटी बहन पूजा की शादी हो चुकी थी और वह अपने पति और बच्चों के साथ आराम से जिंदगी गुजार रही थी. 32 साल की होने के बावजूद रोजी लगती नहीं थी कि वह 2 बच्चों की मां है. उस ने अपने बदन को सलीके से संजोया था. जो भी उसे एक बाद देख ले, उस का दीवाना हो जाएरोजी के होंठ जैसे गुलाब की पंखुड़ी, उस के नुकीले उभार उस की खूबसूरती को चार चांद लगाते थे. रोजी गुरुग्राम के ही एक स्पा सैंटर में काम करने लगी और एक कमरा किराए पर रह कर रहने लगी. दोनों बच्चों को सुबह ही तैयार कर के स्कूल भेजती और फिर अपने काम से निकल जातीहालांकि, रोजी की मां अभी भी रुद्रप्रयाग में ही रहती थीं. पिता की मौत हो चुकी थी, इसलिए बीचबीच में वह अपनी मां का हालचाल जानने के लिए रुद्रप्रयाग चली जाती थी.


उम्र बढ़ने के साथसाथ रोजी की मां को कई तरह की बीमारियां भी साथ लग गई थीं. रोजी ही मां को अस्पताल में ले जाने और दवा का खर्च उठाती थी. एक दिन रोजी ने अपने बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेज दिया और खुद भी तैयार हो कर अपने स्पा सैंटर पर जाने के लिए निकली. रोजी पैदलपैदल ही अपने स्पा सैंटर की ओर जा रही थी कि अचानक से उस के पास एक कार कर रुकी. कार में एक नौजवान सवार था, जो कार को ड्राइव कर रहा था. उस ने कई बार हौर्न बजाया, तो रोजी सड़क पर किनारे हो गई और आगे बढ़ने लगी, लेकिन कार उस के पीछेपीछे रही थी. एक बार को तो रोजी घबरा गई और रुक गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा तो एकदम से हैरान रह गई. कार ड्राइव कर रहा नौजवान कार रोक कर बाहर निकला, तो रोजी के चेहरे पर एक प्यारी सी मुसकान बिखरी. रोजी के मुंह से अचानक निकला, ‘‘समीर, तुम यहां.’’ दरअसल, समीर वही लड़का था, जो रुद्रप्रयाग में रहता था और टैक्सी चलाता था और अकसर रोजी की मां को अस्पताल ले जाने में मदद करता था.


समीर ने इशारा किया तो रोजी कार में बैठ गई. थोड़ी दूर चलने के बाद समीर ने चुप्पी तोड़ी और बोला, ‘‘रोजी, तुम तो बिना बताए यहां चली आई, जिस के बाद रुद्रप्रयाग में मेरा भी मन नहीं लगा और मैं तुम्हारी तलाश में रुद्रप्रयाग से गुरुग्राम चला आया. ‘‘कई महीनों की तलाश के बाद आखिरकार आज तुम हाथ ही लग गई. यहां कर तुमने अपना मोबाइल नंबर भी बदल लिया, इस वजह से तुम्हें ढूंढ़ने में दिक्कत हुई…’’ ‘‘समीर तुम तो जानते हो, रुद्रप्रयाग में रहते हुए मैं कितना परेशान हो गई थी. मैं रुद्रप्रयाग की यादों को फिर से ताजा नहीं करना चाहती हूं.’’ ‘‘सौरी रोजी, मैं तुम्हारा दिल दुखाना नहीं चाहता, लेकिन मैं भी तुम्हारे बिना अकेला हो गया था. तुम मेरी बहुत अच्छी दोस्त हो और जब अच्छा दोस्त ही पास हो तो मन कैसे लग सकता है,’’ समीर ने मायूस हो कर अपनी बात कही. थोड़ी दूर चलने के बाद रोजी ने समीर से गाड़ी रोकने के लिए कहा. कार रुकने के बाद रोजी नीचे उतरी और बोली, ‘‘मैं यहां पर नौकरी करती हूं. मेरी ड्यूटी का टाइम हो गया है. मैं ज्यादा देर तक तुम्हारे साथ नहीं रुक सकती.’’


‘‘ओहो, तो मैडमजी.यहां पर नौकरी कर रही हैं और हम रुद्रप्रयाग की सड़कों पर धक्के खा रहे हैं,’’ समीर ने मजाकिया अंदाज में कहा तो रोजी जोर से हंस दी और बोली, ‘‘आखिर तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आओगे. खैर, मैं चलती हूं, शाम को फ्री हो कर तुम से बात करती हूं.’’ स्पा सैंटर में 2-4 कस्टमरों को देखने के बाद दोपहर होने पर रोजी ने घर से बना कर लाई खाना खाया और एक कुरसी पर आराम से बैठ गई. कब वह पुरानी यादों में खो गई, पता ही नहीं चला. उसे वह दिन याद गया, जब पति से अलग होने के बाद वह रुद्रप्रयाग से देहरादून में नौकरी की तलाश में जा रही थी. रुद्रप्रयाग के बसस्टैंड पर ही रोजी की समीर से मुलाकात हुई थी. दोनों एक ही बस में सवार हुए थे. रोजी विंडो सीट पर बैठी थी तो समीर उस के बगल वाली सीट पर कर बैठ गया था. पहाड़ की घुमावदार सड़क के चलते कई बार ऐसे मौके भी आए, जब दोनों एक दूसरे से बिलकुल सट गए. कई बार तो रोजी समीर के ऊपर गिरने से भी बची.
एक मौका ऐसा भी आया, जब समीर का हाथ रोजी की जांघ पर रखा गया. इस से रोजी पूरी तरह से सिहर उठी. उस के शरीर में एक अजीब तरह की हलचल हुई.


पति से तलाक के बाद किसी मर्द का हाथ रोजी की जांघ पर रखा था. रोजी का पति अकसर उस की जांघ पर हाथ फेर कर उसे प्यार करने के लिए तैयार करता था. खैर, रोजी ने किसी तरह से अपनेआप को संभाला. देहरादून चुका था. दोनों बस से नीचे उतरे और अलगअलग रास्तों पर निकल पड़े.
स्पा सैंटर की मैनेजर आई और ताली बजाई तो रोजी पुरानी यादों से बाहर निकली. करीब 2 महीने बाद रात के 11 बज रह थे. रुद्रप्रयाग से आई एक खबर से उस की आंखों की नींद गायब हो गई. दोनों बच्चों को सुला दिया था और रोजी खुद भी सोने की कोशिश कर रही थी, लेकिन नींद आंखों से काफी दूर थी. बैड पर लेटे हुए 2 घंटे से ज्यादा का समय गुजर चुका था. आधी रात बीत गई. रोजी ने मोबाइल उठाया और कुछ देखने लगी. फोन बुक खोली और जानकारों के नंबर सर्च करने लगी. एक मोबाइल नंबर और नाम पर नजर पड़ी तो रुक गई. यह नंबर समीर का था.


काफी सोचने के बाद रोजी ने नंबर डायल किया, ‘‘हैलो समीर, पहचानारोजी बोल रही हूं…’’ ‘‘मैडमजी, नमस्कार मैं तो आप की आवाज से ही पहचान गया था. फिर मेरे पास आप का नंबर सेव है,’’ समीर ने मजाक की कोशिश की तो रोजी बीच में ही रोकते हुए बोली, ‘‘समीर, मु? तुम्हारी हैल्प चाहिए.’’ ‘‘इतनी रात को क्या हुआ.. सब ठीक तो है .’’ ‘‘हां, सब ठीक है, क्या तुम मेरे साथ रुद्रप्रयाग चल सकते हो?’’ रोजी ने समीर से सवाल किया. ‘‘कब चलना है?’’ समीर ने पूछा. ‘‘अभी मेरी मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई है. उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ सकता है. कल शाम या परसों तक वापस जाएंगे. जितने भी पैसे लगेंगे मैं दे दूंगी,’’ रोजी ने कारण बताया. ‘‘ठीक है. तुम अपनी लोकेशन सैंड मैं, मैं कुछ ही देर में पहुंचता हूं.’’ करीब आधा घंटे के बाद समीर अपनी कार ले कर रोजी के घर पहुंच गया. रोजी ने अपने दोनों बच्चों को उठाया और उन्हें भी साथ ले कर रुप्रप्रयाग के लिए निकल पड़ी. दिन निकलने वाला था और कार रुद्रप्रयाग में एंट्री कर चुकी थी. कुछ ही देर में रोजी अपनी मां के पास पहुंच गई.


समीर ने रोजी की मां को अस्पताल ले जाने से ले कर दवा के खर्च में पूरी मदद की. रोजी की मां की हालत में सुधार हुआ. 1-2 दिन रुद्रप्रयाग में रुकने के बाद रोजी बच्चों को ले कर वापस गुरुग्राम लौट आई.
गुरुग्राम लौटने पर रोजी ने जब समीर से टैक्सी का किराया देने के लिए कहा तो समीर ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘रोजी, हम अच्छे दोस्त हैं और दोस्ती में भी मैं तुम से किराया लूं, तो लानत है मु? पर.’’ इस तरह जब भी रोजी रुद्रप्रयाग जाना होता, तो वह समीर की मदद लेती. उधर, समीर भी सोचता कि वह अपने अम्मीअब्बू की सेवा तो नहीं कर पाता, रोजी की बुजुर्ग मां ही सही. वे भी तो उस की अम्मी जैसी ही हैं. एक दिन समीर ने मौका देख कर अपने दिल की बात रोजी के सामने रख दी. वह बोला, ‘‘रोजी तुम मु? बहुत अच्छी लगती हो. क्या हमारी यह दोस्ती प्यार में बदल सकती है?’’ रोजी ने कोई जवाब नहीं दिया. ‘‘अगर कुछ गलत बोल दिया हो या तुम्हारे दिल को ठेस पहुंची हो तो सौरी.’’ समीर ने फिर से अपनी बात कही.


रोजी कुछ देर के लिए चुप रही और फिर बोली, ‘‘आगे कोई रैस्टोरैंट या ढाबा दिखाई दे तो गाड़ी रोक देना,’’ जिस पर समीर ने सड़क किनारे एक ढाबे पर कार को रोक दिया. कार से उतरते ही रोजी ने समीर से सवाल किया, ‘‘चाय लोगे?’’ समीर नेहांमें जवाब दिया. एक टेबल पर दोनों आमनेसामने बैठे थे. रोजी चाय की चुसकी लेते हुए सोचविचार करने की हालत में नजर रही थी. उस के चेहरे पर एक अजीब तरह का भाव था. समीर उसे बड़े ध्यान से देख रहा था, लेकिन कुछ नहीं बोला. वह सोच रहा था कि शायद रोजी उस की बातों से नाराज हो गई. चाय खत्म हुई तो रोजी ने पैमेंट किया. दोनों कार में सवार हुए और निकल गए. ‘‘मैडमजी, सीट बैल्ट लगा लीजिए, नहीं तो यह बेचारा बिना वजह मारा जाएगा.’’ समीर ने फिर मजाकिया अंदाज में कहा. कार थोड़ा आगे बढ़ी, तो रोजी ने सवाल किया, ‘‘समीर, तुम्हारी शादी हो चुकी है?’’ ‘‘नहीं,’’ समीर ने जवाब दिया. ‘‘मेरे बारे में कितना जानते हो, यही कि मैं भी रुद्रप्रयाग की हूं और
तुम भी…’’ इस से पहले कि रोजी कुछ और बोल पाती, समीर ने बोल पड़ा, ‘‘रोजी, इतने दिन हो गए तुम्हारे साथ दोस्ती कोजानता हूं, तुम तलाकशुदा हो, 2 बच्चों की मां होअपनी मां की देखभाल के साथ अपना और अपने 2 बच्चों का पेट पाल रही हो.


‘‘मां की देखभाल के लिए अपनी जौब की भी परवाह नहीं करती हो. अपनी मां से बहुत प्यार करती हो, इस से ज्यादा मु? जानना भी नहीं है,’’ इतना बोल कर समीर चुप हो गया. कार में पूरी तरह से सन्नाटा छा गया. इस सन्नाटे को रोजी ने ही तोड़ा और बोली, ‘‘ओके.’’ इस के बाद तो समीर और रोजी में रोजाना मोबाइल पर बाते होने लगीं. समीर रोजी से उस की मां के बारे में पूछता तो उसे लगता कि कोई उस का अपना है, जिस से वह अपना दुखदर्द शेयर कर सकती है. एक दिन रोजी अपनी छोटी बहन पूजा से मिलने के लिए उस के घर पहुंची तो पूजा की सास ने नाकमुंह सिकोड़ लिया. रोजी पूजा के पास करीब आधा घंटा रुकी. इस मुलाकात में उस ने अपने और समीर के बारे में सारी जानकारी दे दी. ‘‘दीदी, आप मु? से बड़ी हैं, फिर भी एक बात कहती हूं. जो भी कदम उठाना, सोचसम? कर ही उठाना,’’ पूजा ने रोजी से कहा.
‘‘अभी तक हम अच्छे दोस्त थे, कल ही समीर ने मु? प्रपोज किया है. मां को देखने के लिए कब जाना पड़ जाए, ऐसे में समीर ही काम आता है.’’ रोजी ने जवाब दिया.


थोड़ी देर के बाद रोजी फिर से बोली, ‘‘अभी तक समीर ने कुछ ऐसावैसा भी नहीं किया है. समीर किसी तरह की डिमांड भी नहीं की है और ही उस के हावभाव से लगता है कि वह कुछ गलत काम करेगा.’’
जैसेजैसे दिन गुजरते जा रहे थे, रोजी और समीर एकदूसरे के बेहद करीब आते जा रहे थे. कभीकभी तो पूरी रात ही फोन काल, व्हाटसऐप चैटिंग और वीडियो काल में गुजर जाती थी. एक दिन समीर ने रोजी को फोन किया. ‘‘हां, बोलो.’’ रोजी ने कहा. ‘‘मैं कह रहा था, आज शाम को जल्दी घर पहुंच जाना, रात का खाना एकसाथ करेंगे. दोनों बच्चों को भी तैयार रखना. मैं ठीक साढ़े 7 बजे तुम्हें लेने के लिए जाऊंगा.’’ रोजी नेओकेबोल कर फोन काट दिया. ठीक साढ़े 7 बजे समीर अपनी टैक्सी ले कर रोजी के घर के बाहर पहुंच गया और फोन कर के रोजी को बाहर बुलाया. रोजी सजसंवर कर किसी शादीशुदा औरत से कम नहीं लग रही थी. उस ने अपने फेवरेट ब्लू कलर का सूटसलवार पहना था. होंठों पर लगी हलकी गुलाबी लिपिस्टक उस के चेहरे पर चार चांद लगा रही थी. दोनों बच्चे भी साथ गए. रोजी आगे की सीट पर बैठी, जबकि दोनों बच्चों को पीछे की सीट पर बैठा दिया.


शहर के एक रैस्टोरैंट में पहुंच कर समीर ने खाने का और्डर दिया. खाना लगने में वेटर ने समय मांगा था. इस से पहले बच्चों के लिए आइसक्रीम वगैरह मंगा ली. समीर ने बात शुरू करते हुए कहा, ‘‘रोजी मेरे दिमाग में एक बात चल रही है.’’ ‘‘हां, बोलो…’’ रोजी ने पूछा. ‘‘क्या हम एकसाथ रह सकते हैं?’’ समीर ने अपनी जिज्ञासा जाहिर की. ‘‘मतलब?’’ रोजी ने पूछा. मतलब यही कि अगर हम दोनों लिवइन में रहें तो,’’ समीर ने बताया. समीर की भावनाओं को रोजी तुरंत सम? गई. एक प्यारी सी मुसकान बिखेरते हुए वह बोली, ‘‘इरादा तो ठीक है, लेकिन हम रहेंगे कहां? तुम्हारे पास भी एक ही कमरा है और मेरे पास भी एक ही कमरा है. 2 बच्चे भी हैं. कैसे एडजस्ट करेंगे?’’ ‘‘उस का इंतजाम हो जाएगा. कोई टू रूम सैट घर देख लेंगे दोनों मिल कर एडजस्ट कर लेंगे.’’ ‘‘ठीक है, लेकिन मेरी एक शर्त है…’’ रोजी बोली, ‘‘तुम मेरे साथ कोई शरारत नहीं करोगे.’’ ‘‘ओके मैं सम? गया. मैं वादा करता हूं, जब तक तुम इजाजत नहीं दोगी, तब तक मैं तुम्हें टच भी नहीं करूंगा.’’ समीर ने रोजी को भरोसा दिलाया. वेटर खाना ले कर चुका था. सभी ने भरपेट खाना खाया. समीर ने रैस्टोरैंट में पैमेंट किया और फिर रोजी और बच्चों को गुरुग्राम की सड़कों
पर घुमाया.


रात के तकरीबन 11 बजे समीर ने रोजी और बच्चों को उन के कमरे पर छोड़ कर अपने कमरे पर कर ले गया. आज वह बहुत खुश नजर रहा था. 3-4 दिन के बाद ही उन दोनों ने मिल कर एक टू रूम सैट घर किराए पर लिया और अपनी जिंदगी गुजारने लगे. खाना पकाने से ले कर और दूसरे घरेलू कामों में समीर रोजी की पूरी मदद करता था. रोजी अपने दोनों बच्चों के साथ एक कमरे में सोती थी, तो समीर दूसरे कमरे में. इस तरह से 6 महीने का समय गुजर गया. एक दिन समीर शाम होने से पहले ही अपने कमरे पर पहुंच गया. आज उस की तबीयत कुछ ठीक नजर नहीं रही थी. सिर में दर्द और बदन में अकड़न हो रही थी. कार को पार्क कर के वह अपने कमरे में जा कर लेट गया. शाम को रोजी जब स्पा सैंटर से वापस लौटी तो देखा समीर अपने कमरे में लेटा था. अकसर समीर रोजी के आने के बाद रात को 9 बजे के करीब लौटता था, लेकिन आज उस के जल्दी लौटने और बिस्तर पर लेटे रहने की वजह से रोजी के मन में घबराहट पैदा हुई.


रोजी ने अपना बैग रखा और कमरे में घुसते ही सवाल किया, ‘‘क्या हुआ समीर?’’ ‘‘कुछ नहीं सिर में दर्द है, बदन भी अकड़ रहा है,’’ समीर ने जवाब दिया. ‘‘चलो, खड़े हो, डाक्टर को दिखा देती हूं,’’ रोजी ने जब यह कहा तो समीर ने मना कर दिया और बोला, ‘‘हलका है आराम करने से ठीक हो जाएगा.’’ रोजी उठी और अलमारी से सिरदर्द की एक गोली निकाल कर लाई, पानी ला कर दिया और समीर को गोली खिला दी. इस के बाद बाम ले कर आई और समीर के सिरहाने बैठ कर उस के सिर पर बाम लगाने लगी. इस दौरान रोजी ने थोड़ा रुक कर समीर का सिर उठा कर अपनी गोद में रख लिया और बाम लगाने लगी.
जब रोजी समीर के माथे पर बाम लगा रही थी तो समीर की गरदन भी हिल रही थी. कब समीर का सिर रोजी की जांघ पर पहुंच गया, पता ही नहीं चला. जांघ पर समीर का सिर रखे होने से रोजी के बदन में तरंग सी उठने लगी. ?ाक कर बाम लगाए जाने से रोजी के उभार समीर के माथे से टकराए, तो रोजी के बदन में हलचल बढ़ गई.


धीरेधीरे रोजी के बदन में तरंगें तेज होने लगीं. जांघ पर समीर के सिर की रगड़ लगने के कारण वह धीमी आहें भरने लगी. उस के मुंह से अबसमीरसमीरसमीर…’ निकल रहा था. ‘‘समीर अपनी कसम तोड़ दो, मेरी फीलिंग सम? कुछ करो समीर.’’ यह सुन कर समीर उठ कर बैठ गया. उस का सिरदर्द जैसे अब दूर हो गया हो. समीर ने रोजी की आंखों में आंखें डालीं. वह मुसकरा तो नहीं रही थी, लेकिन उस का चेहरा बता रहा था कि वह मिलन के लिए बेताब है. रोजी से उस के बदन को छूने करने की इजाजत मिलने के बाद समीर ने सब से पहले अपने होंठ रोजी के होंठ पर रख दिए. वह रोजी के एकएक अंग को प्यार से सहलाने लगा, तो रोजी की सांसों में तेजी गई. वह जोश की ओर बढ़ रही थी. दोनों ने अपनेअपने बदन से कपड़े अलग किए. कमरे में रोजी की सिसकारियों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी. कमरे में दोनों के मिलन का जो तूफान पैदा हुआ, वह करीब 10 मिनट बाद जा कर शांत हुआ. रोजी ने खुद को संभाला, जल्दी से कपड़े पहने और बोली, ‘‘अब सिर का दर्द कैसा है?’’ ‘‘जिसे तुम जैसी मदमस्त जवानी का प्यार मिल जाए, उस का सिर का दर्द तो क्या, हर बीमारी दूर हो जाए.’’ समीर ने शरारत करते हुए कहा.


इस के बाद रोजी हाथमुंह धो कर रसोई में गई और 2 कप कड़क चाय बना कर लाई. दोनों चाय की चुसकियां लेते हुए काफी खुश नजर रहे थे. कुछ समय लिवइन रिलेशनशिप में रहने के बाद रोजी और समीर ने शादी करने का फैसला किया. रोजी की मां और छोटी बहन तो इस शादी के लिए तैयार हो गईं, लेकिन समीर के परिवार वाले दोनों की शादी के लिए तैयार नहीं हुए. वे कट्टरवादी सोच के थे. उन्होंने साफ कह दिया कि एक तलाकशुदा और दूसरे धर्म की बहू उन्हें कतई स्वीकार नहीं होगी, पर परिवार के विरोध के बावजूद समीर ने रोजी का अपनाने का फैसला किया. शादी की तारीख तय हुई तो रोजी की तरफ से उस की छोटी बहन और स्पा सैंटर में काम करने वाली कुछ लड़कियां और आसपास के लोग पहुंचे, जबकि समीर की तरफ से उस के 1-2 दोस्त आए. सभी लोग कोर्ट में पहुंचे, जहां रजिस्ट्रार ने दोनों की शादी कराई. कोर्ट के बाहर एक रैस्टोरैंट में छोटी सी पार्टी रखी गई.


इस दौरान रोजी के साथ स्पा सैंटर में काम करने वाली एक लड़की ने चुटकी लेते हुए दोनों से कहा, ‘‘दीदीजीजूवैसे तो आप के बीच में सबकुछ हो चुका है, लेकिन फिर भी सुहागरात मनाना
मत भूलना. असल में आप की आज से नई जिंदगी की शुरूआत हो रही है. यह शुरुआत रोमांटिक और रोमांस से भरी होनी चाहिए. बच्चों की चिंता मत करना, उन्हें मैं अपने साथ ले जाऊंगी.’’ यह बात सुन कर वहां मौजूद सभी लोग जोरजोर से हंसने लगे, वहीं रोजी नजरें नीचे कर के मंदमंद मुसकरा रही थी.
शादी के बाद समीर और रोजी अपने कमरे पर पहुंचे. शाम होने से पहले रोजी और समीर बाजार गए. थोड़ी देर के लिए रोजी से अलग हुई और कुछ जरूरी सामान खरीदने लगी, जिस के बाद दोनों वापस कमरे पर लौट आए.


समीर और रोजी ने रात को खाना खाया, जिस के बाद रोजी ने समीर से सख्त लहजे में कहा, ‘‘मैं दूसरे कमरे में जा रही हूं, मु? परेशान मत करना.’’ रोजी ने दूसरे कमरे में जा कर खुद को बंद कर लिया. समीर कुछ सम? नहीं पाया कि आखिर रोजी में अचानक से यह कैसा बदलाव गया. सोचने लगा कि शायद औरतों संबंधी परेशानी हो गई होगी और इसलिए अलग सोने का फैसला किया. उस के मन में तरहतरह के विचार कौंधने लगे. तकरीबन एक घंटे बाद रोजी ने कमरा खोला और समीर को अंदर बुलाया.
समीर हैरान रह गया. कमरे का रंगरूप बदला हुआ था. बैड पर जहां गुलाब की पंखुडि़यां पड़ी थीं, वहीं मोगरा के फूलों की कलियां भी पड़ी थीं. गुलाब और मोगरा की खुशबू से कमरा पूरी तरह से महक रहा था.
रोजी दुलहन के लिबास में बैड पर बैठी थी. उस ने परफ्यूम लगाया था. उस के बदन से रही खुशबू समीर को दीवाना बनाने वाली थी.


रोजी बोली, ‘‘क्यों हैरान हो रहे हो पतिदेवयह तुम्हारे लिए सरप्राइज है.’’ इस के बाद रोजी ने अपने दोनों हाथ समीर के गले में डाल दिए. समीर ने रोजी के माथे पर किस किया और जांघ पर हाथ फेरने लगा, तो रोजी आहें भरने लगी. उस ने समीर को रोका और बैड से नीचे उतर कर अपने कपड़े उतारे. रोजी आसमानी कलर की ब्रा और पैंटी में थी. स्टाइलिश ब्रापैंटी में रोजी को देख कर समीर मदहोश हो गया
और रोजी को बांहों में भर कर बैड पर लेटा दिया. समीर ने रोजी के बदन पर हाथ फेरा तो वह पूरी तरह से सिहर उठी. देखते ही देखते वे दोनों एकदूसरे में समा गए. यह सिलसिला पूरी रात में कई बार चला.
बच्चे समीर को अबअंकलकी जगहपापाबुलाने लगे. दोनों की जिंदगी में रोमांस की कोई कमी नहीं थी. रोजी भी अब अपने स्पा सैंटर में शादीशुदा की तरह जाती थी. शाम को जब समीर वापस लौटता, तो बच्चों के लिए कुछ कुछ ले कर आता. लेकिन एक दिन समीर के गांव से फोन आया, ‘‘बेटा, तेरी शादी की बात पक्की हो गई है. लड़की बहुत अच्छे घरपरिवार की है. अगले महीने की 15 तारीख रख दी है.’’


समीर सन्न रह गया. वह रोजी को छोड़ने की कल्पना तक नहीं कर सकता था. उस ने मना करने की कोशिश की, लेकिन मां ने साफ कह दिया, ‘‘तू उस तलाकशुदा और दूसरे मजहब की औरत के साथ रहना चाहता है तो हमारा तु? से कोई रिश्ता नहीं रहेगा. हम तेरी परवाह अब और नहीं करेंगे.’’ समीर कई दिनों तक रोजी से यह बात छिपाता रहा, लेकिन बात आखिर रोजी तक पहुंच ही गई. रोजी ने जब यह सुना तो जैसे उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. उस ने बिना कुछ सोचे समीर के गांव जा कर उस के घर वालों से बात करने का फैसला किया. गांव पहुंचते ही रोजी ने समीर के घर के सामने सब के सामने सवाल दाग दिए, ‘‘क्यों? सिर्फ इसलिए कि मैं तलाकशुदा हूं? इसलिए कि मेरे 2 बच्चे हैं? क्या प्यार का हक सिर्फ उन लड़कियों को है, जोकुंआरीकहलाती हैं?’’ गांववाले जमा हो गए. समीर की पिता ने गुस्से में कहा, ‘‘हम अपने खानदान की इज्जत मिट्टी में नहीं मिलने देंगे. या तो वह औरत छोड़ या इस घर से निकल जा.’’


समीर ने रोजी का हाथ थामा और बिना कुछ बोले घर से बाहर निकल गया. दोनों के चेहरे पर आंसू थेएक तरफ मां का प्यार, दूसरी तरफ रोजी का साथ. एक दिन रोजी बच्चों को स्कूल छोड़ कर लौटी तो देखा कि समीर कमरे में बैठा है. उस की आंखों से आंसू टपक रहे थे, ‘‘रोजी, मु? गांव जाना होगा. मां की तबीयत बहुत खराब है. शायद वापस लौट पाऊं या नहीं, कुछ नहीं पता लेकिन एक बात जान लो, तुम मेरी जिंदगी की सब से सच्ची मुहब्बत हो.’’ रोजी ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन गला भर आया. उस ने बस समीर का हाथ पकड़ा और बोली, ‘‘अगर कभी लौटो, तो बताना मत बस, दरवाजे पर खड़े होना. मेरे बच्चे पहचान लेंगे कि उन केपापा गए हैं.’’ समीर चला गया. कई महीने बीत गए. रोजी अब भी स्पा सैंटर में काम करती है, बच्चों को स्कूल भेजती है और शाम को बालकनी में बैठ कर आसमान को देखती है, जहां कभी समीर के साथ बिताए पल तैरते हैं.


रोजी की आंखों से आंसू बहे, लेकिन इस बार वह टूटी नहीं थीमजबूत थी. उस ने खुद को संभाल
लिया था. समीर की याद उस के दिल में अब भी थी, लेकिन अब वह उस की कमजोरी नहीं, ताकत बन चुकी थी. रोजी जानती थी, हर मुहब्बत को मंजिल नहीं मिलती लेकिन कुछ रिश्ते अधूरे हो कर भी दिल में मुकम्मल हो जाते हैं. दूसरी ओर, समीर अपने गांव में मां की बीमारी, परिवार और समाज के दबाव में उल? हुआ था. उस की मां बिस्तर पर थीं और आसपड़ोस के लोग ताने दे रहे थे, ‘अपने खानदान की इज्जत मिटा दी इस ने तलाकशुदा औरत को लाने चला है. शर्म नहीं आती…’ समीर हर बात चुपचाप सुनता रहा, लेकिन उस के मन में रोजी और बच्चों का चेहरा उभरता रहता.


एक दिन रात को मां के सिरहाने बैठा, तो मां ने कमजोर आवाज में समीर से कहा, ‘‘बेटा, अगर तू खुश रहना चाहता है तो अपने दिल की सुन. मैं ने जिंदगीभर जातपांत, समाज की बातें मान कर जिंदगी जी लेकिन अब जब आंखें बंद होने को हैं तो सम? आया कि इनसान का दिल जाति से बड़ा होता है.’’
समीर की आंखों में आंसू गए. उस ने मां का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मां, मैं रोजी और उस के बच्चों से बहुत प्यार करता हूं. वही मेरा घर है वही मेरी दुनिया…’’ मां ने धीमे से कहा, ‘‘तो फिर देर किस बात की, अपने घर को अपना बना ले.’’ कुछ दिन बाद समीर ने पूरे परिवार को बैठा कर अपनी बात रखी, ‘‘मैं सिर्फ रोजी के साथ ही रहूंगा, चाहे वह तलाकशुदा हो, चाहे उस के बच्चे हों वह मेरी जिंदगी है. अगर आप लोग साथ होंगे तो यह मेरी सब से बड़ी ताकत होगी, नहीं तो मैं अकेला ही सही, लेकिन ?ाठ का साथ नहीं दूंगा.’’


समीर के इस फैसले और उस के चेहरे पर ?ालकते सच्चे प्यार ने उस के पिता और भाइयों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया. मां तो पहले ही पिघल चुकी थीं. पिता भी गहरी सांस ली और बोले, ‘‘शायद अब समय गया है कि हम भी अपनी सोच बदलें. अगर तू खुश है, तो हमें क्या हक है तेरी खुशी के बीच खड़े होने का…’’ पूरा परिवार एकमत हो गया. सभी ने रोजी को अपनाने के लिए गुरुग्राम जाने का फैसला किया. शाम का समय था. रोजी बालकनी में बैठी बच्चों को पढ़ा रही थी. तभी नीचे गाड़ी के रुकने की आवाज आई. उस ने ?ांक कर देखा, समीर और उस के पूरे परिवार वाले थे. रोजी कुछ सम? पाती, इस से पहले समीर की मां सीढि़यां चढ़ कर आईं और रोजी के सामने खड़ी हो गईं. रोजी के दिल की धड़कनें तेज हो गईं. उस ने बच्चों को पीछे खींच लिया. उसे अंदाजा नहीं था, क्या होने वाला है. समीर की मां ने उस के पास कर उस का हाथ थाम लिया और कहा, ‘‘बेटी, हमें माफ कर दो. हम ने तु? बिना जाने, बिना सम? ठुकरा दिया. आज सम? आया, तेरे जैसे दिल वाली औरत किसी जाति, किसी धर्म से बंधी नहीं होती. तू तो वह रोशनी है जिस ने हमारे बेटे की जिंदगी में सुकून भरा.’’


रोजी की आंखों से आंसू बह निकले. समीर आगे बढ़ा, दोनों बच्चों को उठा कर बोला, ‘‘चलो घर चलें. अब यही मेरा परिवार हैतुम, बच्चे और ये सब.’’ समीर के पिता ने बच्चों के सिर पर हाथ रखा और बोले, ‘‘अब से तुम हमारे पोते हो हमारा खून सही, लेकिन हमारा अपनापन जरूर होगा.’’ गांव में एक सादा समारोह हुआ, जिस में समीर और रोजी ने समाज की परंपराओं को तोड़ते हुए एकदूसरे को सार्वजनिक रूप से जीवनसाथी स्वीकार किया. जो गांव वाले कभी ताने मारे थे, अब तालियां बजा रहे थे. रोजी की आंखों में खुशी के आंसू थे. उस ने बच्चों को गले लगाया और आसमान की ओर देखा मानो कह रही हो, ‘शुक्र है. इस बार जिंदगी ने मेरा साथ दिया.’  Hindi Story

लेखक महेश कांत शिवा

Hindi Story: सफेद दाग

Hindi Story: शादी के 3 साल गुजर जाने के बाद भी रमतिया की गोद सूनी थी. रमरतिया का पति जागेश्वर उस से दूर भागता था, जबकि रमरतिया अपनी जोबन की आग में झुलस रही थी. पर इस सब की वजह क्या थी?

गां का हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर था, जहां सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें ही रुकती थीं. रमरतिया अपने घर के दरवाजे पर ताला लगा कर शाम के साढ़े 6 बजे वाली पूरब दिशा की ओर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन पकड़ने स्टेशन आई थी. वह अपने मायके जा रही थी. उस के भाई की शादी जो थी. रमरतिया के मायके से उसे लेने के लिए 2-3 बार छोटा भाई आया था, लेकिन उस के पति जागेश्वर ने उसे यह कह कर वापस भेज दिया था कि शादी का दिन नजदीक आने पर एक दिन वह खुद रमरतिया को छोड़ देगा.


पर आजकल करतेकरते शादी को जब 3 दिन रह गए, तो जागेश्वर ने कहा, ‘‘रमरतिया, मु झे तुम्हें मायके छोड़ने की फुरसत नहीं है. तू 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अकेले ही चली जाना. हां, शाम वाली पैसेंजर से मैं भी जाऊंगा, फिर 3-4 दिन ससुराल में ऐश करूंगा,’’ यह कह कर जागेश्वर पश्चिम दिशा की ओर जाने वाली सुबह 7 बजे की पैसेंजर ट्रेन से अपनी ड्यूटी पर चला गया था. जागेश्वर गांव के उस हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पश्चिम दिशा उतर कर एक गांव के स्कूल में क्लर्क की नौकरी करता था, जबकि रमरतिया का मायके गांव के हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पूर्व दिशा की ओर था.


रमरतिया की शादी को 3 साल गुजर गए हैं, पर अभी तक उस की गोद सूनी थी. इस की वजह यह थी कि जागेश्वर उसे बिलकुल पसंद नहीं करता था, क्योंकि उस के शरीर पर जगहजगह सफेद दाग थे. इस वजह से वह उस के पास आने में घिन महसूस करता था. जागेश्वर घर पर केवल भोजन से मतलब रखता था, फिर बिस्तर लपेट कर बगल में दाबे हुए बाहर चला जाता था और मड़ैया में बिछी खाट पर सो जाता था या जब खलिहान में फसल होती, तब खलिहान में सोता था.


सावनभादों की रातें हों या वसंत की चांदनी रातें, रमरतिया अपने जोबन की आग पर काबू कर के किसी तरह अकेली समय काट लेती. वह सोचा करती कि औरत का जन्म पा कर जिस को खूबसूरत शरीर नहीं मिला उस की जिंदगी बेकार है और उन्हीं बेकार औरतों की श्रेणी में एक वह भी है. कभीकभी जब वह अपने पति जागेश्वर को चायपानी देते समय उंगलियों से छू देती या फिर मुसकरा देती, तब वह उसे डांटते हुए बोल उठता, ‘‘मुसे तू अपनी जवानी की प्यास बु झाना चाहती हैमैं तेरी जैसी बदसूरत औरत को भला क्यों भोगूं, मु झे तो खूबसूरत औरतें मिलती रहती हैं. तू जवानी की आग में जल मरे , मैं तब भी तु झे हाथ तक नहीं लगाने वाला.’’


यह सुन कर रमरतिया की आंखों में आंसू छलक आते. वह मन ही मन  जागेश्वर को कोसती हुई बुदबुदाती रहती, ‘‘बाजारू औरतों के चक्कर में पड़ना ठीक तो नहीं होता राजा, लेकिन मैं सम झाऊं भी तो कैसे…’’
प्लेटफार्म पर बनी सीमेंट की लंबी कुरसी पर बैठी रमरतिया अपनी प्लास्टिक की डोलची हाथ में थामे यह सब सोच ही रही थी कि पैसेंजर ट्रेन आने की सूचना हो गई. मुसाफिर अपनी जगह से उठ कर पश्चिम दिशा की ओर  झुक झुक कर रेल की पटरियों को देखने लगे. जागेश्वर के कहे मुताबिक रमरतिया तो सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन ही पकड़ने वाली थी, पर बाल संवारने, नाखून रंगने और पांव को आलता से रंग कर सजनेसंवरने में उसे देर हो गई थी.


सजसंवर कर जब रमरतिया आईने के सामने खड़ी होती, तो किसी अप्सरा से कम थोड़ी लगती, पर उस का आदमी तो उस के शरीर के सफेद दाग से बिदका हुआ रहता. सांचे में ढले उस के बदन के कसाव और उभार पर तो कभी उस की नजर ही नहीं गई. सुहागरात को ही लालटेन की रोशनी में रमरतिया के शरीर के सफेद दाग देख कर जागेश्वर ऐसा बिदका था कि फिर रात में कभी नहीं पास आया. हर समय कहता रहता, ‘‘बेकार लड़की से शादी करा दी. जब जवानी की आग में तड़पेगी तब पता चलेगा कि किसी भोलेभाले लड़के से सफेद दाग वाली बात छिपा कर शादी करने का नतीजा क्या होता है.’’


जागेश्वर शाम को स्कूल से छुट्टी होने पर सीधे स्टेशन आया और अपनी ससुराल तक के स्टेशन का टिकट ले कर शाम वाली पैसेंजर ट्रेन में सवार हो गया. उसे पूरी तरह भरोसा था कि रमरतिया सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अपने मायके पहुंच कर घरपरिवार के माहौल में घुलमिल गई होगी. चलो, रात के 10 बजे तक तो वह भी पहुंच ही जाएगा वहां. शादीब्याह वाले घरों में वैसे भी 10-11 बजे तक चहलपहल रहती ही है. ट्रेन में बैठा हुआ जागेश्वर यह सब सोचतेसोचते कभीकभी  झपकी लेने लगता. बीच के स्टेशनों पर लोग चढ़तेउतरते रहे. उस ने खिड़की से बाहर  झांका, तो पता लगा सूरज डूब चुका था और अंधेरा हो गया था.


अरे, यह तो उस के गांव का स्टेशन तुलसीपुर है. यहां तक आतेआते ट्रेन पूरे डेढ़ घंटे लेट हो गई थी. अब पूरे 8 बज   रहे थे. उसे प्यास लगती महसूस हुई. अगले ही पल वह तुलसीपुर स्टेशन पर हैंडपंप से पानी पीने ट्रेन से नीचे उतर पड़ा, यह सोच कर कि वहां कुछ देर तक तो ट्रेन रुकती ही है. गुलमोहर के पेड़ तले वाला हैंडपंप पास ही तो था. जागेश्वर ने हैंडपंप के हत्थे पर जोर डाल कर चलाया और जल्दी से 8-10 अंजुलि पानी पी डाला. तब तक ट्रेन खुल गई, तो वह दौड़ कर एक बोगी में चढ़ गया. इस बोगी में तो घुप अंधेरा है, कोई बल्ब नहीं जल रहा, शायद इस बोगी में बिजली का कनैक्शन किसी तरह से हट गया है, इसीलिए उस में कोई मुसाफिर भी नहीं चढ़ा था. जागेश्वर अंधेरे में ही बीच की एक लंबी वाली बर्थ पर बैठ गया. ट्रेन तेज रफ्तार से भागी जा रही थी.


एकाएक जागेश्वर को लगा कि उस के सामने वाली लंबी सीट पर कोई औरत लेटी है, क्योंकि उस ने शायद करवट बदली थी, तो चूडि़यों की खनकने की आवाज आई थी. वह सोचने लगा, ‘इस अंधेरी बोगी में जहां हाथ को हाथ नहीं सू रहा और यहां औरतजरूर कोई पागल औरत होगी…’ पर जागेश्वर के मन का शैतान अगले ही पल उछलकूद करने लगा. वह सोचने लगा कि काश, यह औरत उस के मन की मुरादनहींनहींऐसी पागल औरत से जिस्मानी रिश्ता बनाना खतरे से खाली नहीं, एड्स का शिकार हो जाएगा.
मन में यह सम तो जागेश्वर को आई पर अगले ही पल हवस के भेडि़ए ने उस के मन पर कालिख पोत दी और उस की हथेलियां सीट पर कुछ टटोलने लग गईं. अगले ही पल उस औरत के पांव की पायल छू गई, साथ ही चिकनी नरम चमड़ी.


अरे, यह औरत तो कुछ भी नहीं एतराज कर रही, शायद इस का मन भी…’ जागेश्वर का हौसला बढ़ गया. उस ने दोबारा अपनी हथेलियां उस की पिंडलियों तक पहुंचा दीं. वह औरत अभी भी खामोश थी. जागेश्वर को अब पूरा यकीन हो गया कि यह औरत उसे मना नहीं करेगी. जागेश्वर का हौसला बढ़ता गया और उस की हथेलियां एकएक बित्ता ऊपर बढ़ती गईं. औरत खामोश रही. हवस का भेडि़या अगले ही पल मांसपिंड पर टूट पड़ा और स्वाद चख कर शांत हो गया. पैसेंजर ट्रेन बीच के कई स्टेशनों को पार करती जागेश्वर की ससुराल वाले रेलवे स्टेशन पर जा लगी. इस बीच में उस बोगी में अंधेरा देख कर कोई भी मुसाफिर नहीं चढ़ सका था. ट्रेन रुकते ही जागेश्वर स्टेशन पर उतर पड़ा. अभी वह नीचे उतर कर खड़ा ही हुआ था कि वह औरत भी  झटपट उतर पड़ी.


स्टेशन के उजाले में जागेश्वर ने उस औरत को देखा, तो जैसे वह उस से नजरें नहीं मिला पा रहा था. वह हकलाता हुआ बोल पड़ा, ‘‘रेरमरतियातूइस अंधेरी बोगी में…’’ ‘‘हां, मैं रमरतिया ही हूं, सुबह वाली पैसेंजर ट्रेन छूट गई थी. जल्दी में स्टेशन पर इस शाम वाली ट्रेन में चढ़ी तो अंधेरी बोगी मिल गई. ट्रेन जब खुल गई तो मैं ने देखा कि तुम स्टेशन के हैंडपंप से पानी पी कर दौड़ कर इसी बोगी में चढ़ गए थे. ‘‘मैं चुपचाप बोगी के बीच में पहुंच कर एक सीट पर लेट गई. मैं जानती थी कि तुम इसी तरह ट्रेनों में, बाजारों में, गलीकूचों में औरतों की तलाश करते रहते हो और अपनी जवानी की प्यास बु झाते फिरते हो.


‘‘यही सोच कर मैं एक लावारिस औरत की तरह पड़ी रही, ताकि आज इस ट्रेन में तुम से मेल कर के यह एहसास करा सकूं कि शरीर तो एक ही होता है, चाहे वह काला हो, गोरा हो या सफेद दाग से भरा हो.
‘‘अगर मन स्वीकार कर ले तो सारी कमियां दूर हो जाती हैं, क्योंकि हर औरतआदमी के मिलन का सुख एक सा हुआ करता है,’’ यह कह कर रमरतिया खामोश हो गई. जागेश्वर को आज रमरतिया की यह बात बहुत गहरे तक जा लगी. उस ने जो कुछ कहा, आदमी औरत के मिलन की सचाई यही तो है. इतना सुख देने वाली सेहतमंद, कसे बदन वाली पत्नी को मात्र सफेद दाग की वजह से छोड़ कर जागेश्वर इधरउधर भटकते हुए बाजारू औरतों से अपने जिस्म की प्यास बु झाता रहा.


सचमुच, जागेश्वर का मन एक औरत के प्रति क्यों इतनी गलत सोच वाला हो गया. हकीकत तो यही है कि उस की पत्नी दिलदिमाग और बरताव में किसी दूसरी औरत से कमतर तो नहीं. उसे अब बहुत पछतावा होने लगा था. शादी के कई साल बीत गए, पर वे दोनों एक घर में रह कर भी अलगअलग थे. जागेश्वर ने रमरतिया के शरीर के सफेद दाग का इलाज करवाने के लिए भी कभी नहीं सोचा. अब तो कोई भी बीमारी लाइलाज नहीं रही, देश का मैडिकल क्षेत्र बहुत विकसित हो चुका है. वह अपनी चांद सी पत्नी के सफेद दाग का इलाज जरूर कराएगा.


अगले ही पल जागेश्वर ने अंधेरे में खेत की पगडंडी पर अपनी ससुराल वाले गांव की ओर कदम बढ़ाते हुए रमरतिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उस के गाल पर एक गहरा चुंबन जड़ दिया. रमरतिया मुसकरा उठी. जागेश्वर के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘‘मैं ने बहुत बड़ी भूल की है. तुम ने मेरी आंखें खोल दी हैं रमरतिया. मैं अब तुम्हें छोड़ किसी दूसरी औरत की ओर ताकूंगा भी नहीं.’’ Hindi Story

लेखक -कमलेश पांडेय ‘पुष्प’

Hindi Story: चिंता

Hindi Story: रवि अपने कुछ दोस्तों के बहकावे में कर मौजमस्ती करने चकलाघर पहुंच गया. 1,000 रुपए में उस के लिए एक कमरा और एक लड़की तय की गई. उस के बाकी दोस्त भी अलगअलग कमरों में अपनीअपनीमस्तीतलाशने में बिजी हो गए.


कमरे में पहुंच कर रवि पलंग पर बैठ गया. दीवारें सैक्सी तसवीरों से पटी पड़ी थीं. थोड़ी ही देर में कोई 31-32 साल की नेपाली औरत उस के पास कर बैठ गई. अजीब सी हिचक के बीच रवि ने जैसे ही उस का हाथ छुआ, उस का तपता हुआ शरीर उसे चौंकाने लगा. ‘‘अरे, आप को तो तेज बुखार है,’’ रवि बरबस बोल उठा. ‘‘यह सब रोज का धंधा है साहब, आप जल्दी कीजिए. उस के बाद अगले कस्टमर के पास भी जाना है,’’ दर्द को मुसकान में बदलती हुई वह बोली. रवि गंभीर हो गया और बोला, ‘‘बीमार होने पर भी यह सब करती हो. छोड़ क्यों नहीं देती हो यह सब? आखिर क्यों कर रही हो?’’ वह औरत अपने आंसू रोक पाई और बोली, ‘‘बेटी के लिए साहब.’’


‘‘मतलब?’’ रवि ने पूछा. वह औरत कुछ पल चुप रही, फिर टूटी आवाज में बोली, ‘‘नेपाल में मैं एक इज्जतदार परिवार से हूं. मेरे पति का कारोबार था. घरकार, सबकुछ था. मेरी एक 10 साल की बेटी भी है. लेकिन साल 2015 में आए भूकंप ने सब छीन लिया. मेरे पति मलबे में दब कर मर गए. आंखें खोल कर देखा तो बचा था सिर्फ भूकंप का मलबा, भूख, बेबसी और मेरी 8 महीने की बच्ची. ‘‘फिर रोजगार के लिए मैं दरदर भटकी, पर बिना मर्द की औरत खुले खेत जैसी होती है, जिसे कोई भी जानवर बेहिचक चर जाता है. हर जगह मेरे शरीर का शोषण हुआ. फिर भारत में काम दिलाने के नाम पर एक दलाल मु झे यहां बेच गया.’’


उस औरत की कहानी सुन कर रवि का रोमरोम सिहर उठा. वह जिस्म की आग बु झाने आया था, पर सामने किसी मां की तपती मजबूरियां खड़ी थीं. ‘‘लेकिन इस हालत में भी यह सब क्यों?’’ रवि की बात पूरी होने से पहले ही वह औरत बोली, ‘‘बताया तो है कि बेटी के लिए. इसी तपते हुए जिस्म से कमाए पैसों से उस की बोर्डिंग स्कूल की फीस भरती हूं, ताकि पढ़लिख कर वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और उसे मेरी तरह इस जिस्म के बाजार में कभी बिकना पड़े.’’ रवि के भीतर उस औरत के लिए इज्जत उमड़ आई. वह फौरन कमरे से बाहर निकला और गुस्से में चकलाघर चलाने वाली रेशमाबाई के पास पहुंचा.
‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें…’’ रवि फट पड़ा, ‘‘एक औरत हो कर दूसरी औरत की मजबूरी का फायदा उठाती हो. इन्हें जिल्लत की जिंदगी में धकेलती हो.’’


रेशमाबाई ने पान की पीक को पीकदान में फेंकते हुए ठहाका लगाया, ‘‘क्या बात है लल्लालगता है पहली बार आए होयहां चमड़ी का धंधा चलता है, चोंचलेबाजी नहीं. मूड नहीं बना क्या? कुछ कड़क चाहिए तो बोलो पहली बार हो, डिस्काउंट भी दे दूंगी…’’ ‘‘कैसी घटिया औरत हो तुमकोई अपनी मरजी से यह काम करे तो बात और है, पर जबरदस्तीरवि का गुस्सा फूट पड़ा. रेशमाबाई फिर मुसकराई और बोली, ‘‘यह सब यहां चलता रहता है. ज्यादा अक्ल मत लगाओ.’’ रवि जोर से बोला, ‘‘अगर यही मजबूरी तुम्हारी बेटी पर आती तो?’’ रेशमाबाई ठहाका मारते हुए बोली, ‘‘बेटी? अरे चिकने, मैं भी तो अपनी बेटी के लिए ही कर रही हूं यह सब. मेरे बाद यही तो संभालेगी धंधा. क्यों बेटी हसीना?’’


पास  झूले पर बैठी रेशमाबाई की बेटी हसीना ने बालों में उंगली घुमाते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं भी तो इसी इंतजार में हूं अम्मी.’’ उन मांबेटी की बातें सुन रवि हैरान रह गया. वह सम नहीं पा रहा था कि बेटी के भविष्य के लिए कौन ज्यादा चिंतित हैवह नेपाली औरत या फिर रेशमाबाई?  Hindi Story

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