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Bihar Politics : देहमुक्ति के लिए भी पैसा चाहिए

Bihar Politics. पटना के बांसघाट में बाबा जग्गी वासुदेव का वीआईपी श्मशान गृह बन गया है. इस के लिए 15 एकड़ जमीन 99 साल के लिए एक रुपए की दर से दे दी गई है. हालांकि, इस के व्यवस्थापक भाई विवेक बताते हैं कि सारा कुछ बिहार सरकार का ही है. बस ‘ईशा फाउंडेशन’ को यह 5 साल के लिए व्यवस्था देने के लिए दिया गया है.

हमारे साथी वरिष्ठ पत्रकार कमला पांडे भी इस की तसदीक करते हैं कि यह सारा कुछ निर्माण बिहार सरकार के बुडको यानी बिहार अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डवलपमैंट कौर्पोरेशन लिमिटेड का है.

हम भारत की हर चीज को, हर सेवा को निजी हाथों में जाते हुए देख रहे हैं. अब इनसान की अंतिम यात्रा की व्यवस्था को निजी हाथों में जाते देख रहे हैं. बिहार की राजधानी पटना में इस की शुरुआत हो गई है.

यह पटना के बांसघाट में बना है. स्मार्ट सिटी के नाम पर बुडको ने 89.40 करोड़ में गंगा के किनारे प्रसिद्ध गोलघर के सामने बांसघाट पर एक वीआईपी श्मशान घाट तैयार किया है. इसे बाबा जग्गी वासुदेव की संस्था ‘ईशा फाउंडेशन’ को चलाने के लिए दे दिया गया है.

अगर आप वहां अपने किसी मित्र या परिजन के अंतिम संस्कार के लिए जाते हैं, तो आप को न्यूनतम 3,500 रुपए खर्च करने पड़ेंगे. इस के अलावा आप अगर लकड़ी या गैस का इस्तेमाल करते हैं, तो उस का खर्च अलग है. डोम राजा को 500, पंडित को 250 और नाई को 150 रुपए देने पड़ेंगे, जबकि इस के ठीक बगल में सरकारी विद्युत शवदाह गृह का चार्ज सिर्फ 300 रुपए है.

ऐसा क्यों? यह पूछने पर ‘ईशा फाउंडेशन’ के स्थायी स्वयंसेवक अमरदीप कहते हैं, ‘‘क्योंकि यह दूसरे श्मशान स्थल जैसा नहीं है. यहां आप को किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी. आप के लिए एसी वेटिंग रूम है, जहां आप बैठ कर इंतजार कर सकते हैं. दूसरे श्मशान गृहों में जैसी अव्यवस्था है, वैसी यहां नहीं है.’’

मतलब यह कि ये वीआईपी शवदाह गृह है, इसलिए इस का चार्ज वीआईपी है. स्टाफ के बारे में पूछने पर कहते हैं, ‘‘यहां काफी स्टाफ हैं. लेकिन हमारे मेंटेनैंस का खर्च भी बहुत ज्यादा है, सो चार्ज तो देना ही होगा न. अगर आप गैस से अंतिम संस्कार करना चाहते हैं, तो उस में एक पूरा सिलिंडर खर्च हो जाता है. बिजली का बिल भी आता है. कई तरह के खर्चे हैं.’’

मगर कुलमिला कर देखा जाए तो यह सरकारी पैसे से बना श्मशान घाट है. यह अलग बात है कि इस वीआईपी श्मशान घाट को अलग स्वरूप प्रदान कर इस का संचालन ‘ईशा फाउंडेशन’ करेगा और बिहार के लोगों से मोटी रकम वसूल करेगा. मुमकिन है कि कुछ वीआईपी वहां भीड़भाड़ से बचने जाएं भी. 4 जून, 2026 को शुरू हुए इस श्मशान घाट में अब तक 90 शवों का अंतिम संस्कार हो चुका है.

‘ईशा फाउंडेशन’ पटना में दीघा में एक और ऐसा शवदाह गृह सरकार से लेने जा रहा है. इस के अलावा सिमरिया घाट, भागलपुर और सहरसा में आने वाले दिनों में वह श्मशाम गृह का संचालन शुरू करने जा रहा है. छपरा के लिए बातचीत चल रही है. ‘ईशा फाउंडेशन’ इस से पहले तमिलनाडु में ऐसे 32 श्मशान गृहों का संचालन करता रहा है. तमिलनाडु के बाद उस का अगला ठिकाना बिहार है.

इस चर्चा के दौरान यह भी जानकारी मिली कि बिहार कैबिनेट इस संस्था को एक और लाभ देने की घोषणा करने की तैयारी कर चुकी है. इस फैसले के मुताबिक मुंगेर जिले के तारापुर में प्रसिद्ध तेलडीहा मंदिर के पास की 15 एकड़ जमीन बिहार सरकार ने ‘ईशा फाउंडेशन’ को सिर्फ एक रुपए की दर से 99 साल के लिए लीज पर दिया जाना है.

वरिष्ठ पत्रकार पुष्य मित्र के अनुसार, ‘‘यह हैरत की बात है कि इस जमीन का बिहार सरकार ने इसी साल 2.64 करोड़ खर्च कर के अधिग्रहण किया है. मतलब जिस जमीन का सरकार ने हमारे 2.64 करोड़ की राशि से खरीदा, वह ‘ईशा फाउंडेशन’ को लगभग फ्री में दे रही है. यहां ‘ईशा फाउंडेशन’ आदियोगी की प्रतिमा और योग और आध्यात्मिक केंद्र बनाएगी. तारापुर के तेलडीहा मंदिर में पर्यटन के विकास के लिए पहले ही बिहार सरकार 5.28 करोड़ से अधिक की राशि स्वीकृत कर चुकी है. जाहिर है, इस का लाभ भी ‘ईशा फाउंडेशन’ को मिलेगा.’’

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार ने अपने गृह क्षेत्र में योग केंद्र खोलने का जिम्मा इसे न दे कर तमिलनाडु के ‘ईशा फाउंडेशन’ को दिया है. इस मेहरबानी की वजह बिहार के लोगों को सम झने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए. ऐसा ही चलता रहा, तो जल्दी ही यहां के सारे कर्मकांड वीआईपीनुमा होंगे. बस इस के लिए उन्हें अपनी जेब ढीली करनी होगी.

हालांकि भाई रामस्वरूप के अनुसार, ‘‘वैसे तो जग्गी वासुदेव पर ज्यादा भरोसा नहीं. फिर भी यदि 3,500 में सारे काम हो जाते हैं, तो ठीक है. लकड़ी, पंडित, डोम, नाऊ सब, तो ये तो बहुत बड़ा उपकार रहेगा. पटना में अंतिम संस्कार में मिनिमम खर्चा 7,000 से 15,000 के बीच आता है दाह संस्कार का. वैसे यह खर्च दाहसंस्कार करने आने वाले की वेशभूषा और अन्य बौडी लैंग्वेज से भी अंदाज लगाने की परंपरा रही है.

यहां आग देने के लिए ही 10,000 की मांग होती है, बाकी खर्चा अलग. ऐसे हालात में अगर 3,500 की रकम रखी गई है, तो ये निश्चित रूप से एक ठीक ही डिसीजन है. बशर्ते इस में सारे खर्च शामिल हों.’’

वहीं वरिष्ठ पत्रकार कमलाकांत पांडे जानकारी देते हैं कि बिहार सरकार ने पटना नगरनिगम के माध्यम से बांसघाट, गुलबी घाट, खाजेकलां आदि स्थानों पर 300 रुपए का शुल्क रखा है. हालांकि व्यावहारिक रूप से 350 का भुगतान करना होता है और यह भी बीपीएल वालों के लिए मुफ्त है. जब यहां पटना नगरनिगम के आयुक्त हिमांशु शर्मा थे, तभी पटना के भामाशाह फाउंडेशन ने यह व्यवस्था दी थी कि जो खर्च कर पाने में असमर्थ हैं, उन के शवों के अंतिम संस्कार श्मशान घाटों पर मुफ्त होगा. आमतौर पर यह खर्च 1,500 रुपए का हो सकता है. यह व्यवस्था आज भी है.

‘‘खर्च किस प्रकार के?’’ यह पूछने पर वे बताते हैं, ‘‘मुखाग्नि, ब्राह्मण, नाई, घाट छुड़ाई आदि के कुछ खर्च हैं. मूल खर्च तो लकडि़यों का है, जो 5-7 मन के करीब होता है. आम की लकड़ी 10 रुपए किलो, तो सखुआ की लकड़ी 20 रुपए किलो मिलती है. कुछ अमीर लोग चंदन की लकड़ी की मांग करते हैं, जो 70 रुपए किलो बैठती है.

आमतौर पर लोग इसे चंदन की लकड़ी कहते हैं. लेकिन यह हवन करने वाली देवदार की लकड़ी है. इसी प्रकार जो सखुआ की लकड़ी है, वह रेलवे के स्लीपर होते हैं, जो श्मशान घाट के व्यवसायी रेलवे विभाग से ठेके पर उठाते हैं.’’

बांस घाट के पास से गंगा लगभग 3 किलोमीटर दूर जा चुकी है. वहां कोई व्यवस्था नहीं है. नियम है कि मुखाग्नि देने वाले को पहले मुंडन वगैरह करा कर गंगा में स्नान करना होता है. इस के लिए उसे 3 किलोमीटर दूर गंगा स्नान के लिए कीचड़दलदल आदि से भरे तट को पार कर गंगा तक पहुंचना होता है, जो बेहद कष्टदायक है. और वहीं जग्गी वासुदेव का तथाकथित आलीशान श्मशान घाट है, जिस के लिए लोगों को बड़ी रकम खर्च करनी होगी.

पांडेजी का सवाल है कि जब भामाशाह फाउंडेशन महज 1,500 रुपए खर्च कर सारा कर्मकांड पूरा कर सकता है, तो फिर यह जग्गी वासुदेव के भारीभरकम खर्च को सेवा का नाम दे कर कराने का क्या मतलब है? तब और, जब बिहार सरकार ने उसे मुफ्त में सरकारी संपत्ति दी है, जहां उन्होंने पड़ाव भर डाला.

वे यह भी जानकारी देते हैं कि बांसघाट से गंगा के दूर खिसकने के वजह से हुई परेशानियों के वजह से लोग दीघाघाट चले जाते हैं, जहां गंगा किनारे पर है. हम ने वहां जा कर व्यवस्था देखी.

दीघाघाट पर बना श्मशान घाट ठीक गंगा किनारे है. एक फ्लाईओवर सामने सड़क के ऊपर गुजरते हुए आगे पटना के जेपी सेतु की ओर बढ़ जाता है. एक छोर फ्लाईओवर होते हुए डबलडैकर पुल पार करते सोनपुर की ओर बढ़ जाता है. वहीं नीचे श्मशान घाट हैं. सामने लकडि़यों, कपड़ों और दूसरे साजोसामान की फूस के छप्परों वाली दुकानें हैं.

यहां 2 शैड्स हैं, जिन में शव जलाए जाने की व्यवस्था है. यह अलग बात है कि वहां शव जलाए नहीं जाते. गंगा किनारे जा कर वहीं लकडि़यां सजा कर शवों को जलाने की व्यवस्था परिजन करते दिख रहे थे.

आमतौर पर एक शव के जलने में तकरीबन 3-4 घंटे लगते हैं. और यह समय उन्हें वहीं गुजारना होता है. आश्रय की कोई ठीकठाक व्यवस्था नहीं है. एक शीतल जल की मशीन है, जो खराब पड़ी थी. शौचालय वगैरह हैं, मगर उन की दशा भी ठीक नहीं थी. सो, सरकार को वहां इन सभी की समुचित व्यवस्था और रखरखाव करना चाहिए.

मुख्य सड़क से नदी किनारे आने के लिए भी कुछ पगडंडिया हैं. एक कच्चा ढलाव वाला रास्ता लोगों ने तैयार कर लिया है, जिस से गाडि़यां वहां उतर सकती हैं. खेद है कि सरकार खुद कोई जिम्मेदारी न ले कर बाबाओं को यह सब जिम्मेदारी दे कर मुनाफा कमाने का मौका दे रही है.

पटना का मशहूर गोलघर डीएम आवास के बगल में है. इसी के सामने रोड पार कर दिखता है बांसघाट में बना श्मशान घाट. बुडको ने बेहतरीन तो बनाया ही है, सामने दो सिंहद्वार हैं, मोक्षद्वार और वैकुंठ द्वार. अंदर पार्किंग की समुचित व्यवस्था है.

इसे पार कर अंदर जाने पर लगता नहीं कि आप किसी श्मशान घाट आए हैं. लंबेचौड़े पार्कनुमा परिसर में सजावटी फूलपत्तों के पौधे और वृक्ष लगे हैं. क्रम से विद्युत शवदाह, लकड़ी से जलाने वाले शवदाह और पारंपरिक रूप से शवदाह करने वाले शैड्स हैं, जहां अंतिम संस्कार होते हैं. इस के पीछे 2 विशाल कृत्रिम तालाब हैं, जिन के बीच में विशाल शिव की प्रतिमा दूर से ही दिखाई देती है.

फिलहाल इन तालाबों में पानी नहीं था. पता चला कि इन तालाबों में पाइपों के जरीए गंगा नदी का पानी लाया जाता है. कुछ गड़बड़ी के चलते अभी पानी लीक हो जा रहा है. सो तालाब सूखे हैं और उन में मरम्मत का काम चल रहा है. वैसे शौचालयों की व्यवस्था ठीकठाक तो है ही. पेयजल की भी सुविधा है.

अब वहां से जो जानकारियां आ रही हैं, ऊपरी खर्चे तो आप को करने ही हैं. और वह कितना होगा, पता नहीं. व्यवस्थापक विवेक ने जानकारी दी कि यहां बीपीएल लोगों के लिए मुफ्त शवदाह की व्यवस्था है. मगर पूछने पर कि दूसरे खर्च तो हैं ही, वे अपनी सहमति जाहिर करते हैं. यहां सभी मदों का खर्च फिक्स है, सो  झं झट नहीं है. हां, यहां खर्च तो है ही. वह तो आप की जेब की हैसियत से लगेंगे ही.

वीआईपी मुक्तिधाम है भाई, कोई खेल थोड़े ही है. यहां तो यही मान कर चला जाना है कि यहां जो आए हैं, वे ज्यादातर अमीर ही हैं. ऐसे में इस पीपीपी मोड में आ चुके अंतिम क्रिया को देखनेसम झने की जरूरत आप को नहीं, क्योंकि सरकार फैसला ले चुकी है. बाबा पर विश्वास करना ही होगा. आखिर आस्था का सवाल है. और इस के लिए अपनी जेब ढीली कर भारीभरकम खर्च करने के लिए तैयार रहना ही होगा. Bihar Politics

Bihar Politics : क्या इंसाफ भी जाति देख कर मिलता है

Bihar Politics. किसी भी लोकतंत्र में सरकार की संवेदनशीलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा समाज कितना बड़ा वोट बैंक है. सरकार का काम हर नागरिक के जीवन और सम्मान की रक्षा करना है. संविधान ने किसी नागरिक के वोट की कीमत अलगअलग नहीं तय की है.

बिहार सरकार की ओर से भरत तिवारी के परिवार को मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा के बाद बिहार की राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है.

भरत तिवारी की मौत निश्चित रूप से दुखद और गंभीर घटना है और अगर किसी की मौत पुलिस कार्रवाई में हुई है तो उस के परिवार को इंसाफ, इज्जत और माली मदद मिलनी ही चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि अगर सरकार एक पीडि़त परिवार के दर्द को सम?ा सकती है तो दूसरे पीडि़त परिवारों के दर्द को क्यों नहीं उसी गंभीरता से महसूस करती?

लोगों के बीच यह चर्चा है कि बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार और ब्राह्मण समाज के वोटों के बिखराव ने सरकार को भरत तिवारी के परिवार के प्रति तत्काल संवेदनशील होने के लिए मजबूर किया. यह राजनीतिक चर्चा सही है

या गलत, इस का फैसला जनता करेगी, लेकिन इस चर्चा ने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या बिहार में पीडि़त परिवारों के लिए इंसाफ और मुआवजे का पैमाना भी जाति और चुनावी गणित से तय होने लगा है.

अगर भरत तिवारी के परिवार को मुआवजा और नौकरी देना सरकार की संवेदनशीलता का उदाहरण है तो अरवल के अनिल कुशवाहा के परिवार का क्या? अनिल कुशवाहा को ताड़ी पीने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और उन की मौत पुलिस हिरासत में संदिग्ध हालात में हुई. परिजनों ने पुलिस द्वारा सताने और मारपीट के गंभीर आरोप लगाए.

ए  क नागरिक को किसी अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है, कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन हिरासत में उस की जान चली जाए तो उस की जिम्मेदारी भी राज्य की बनती है. अनिल कुशवाहा के परिवार को इंसाफ और मुआवजा क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्या उन के परिवार का दर्द इसलिए कम है, क्योंकि वे ब्राह्मण नहीं हैं?

भोजपुर जिले के बिहिया ब्लौक की ओसाई पंचायत के गंज गांव के सनोज राम का मामला इस से भी ज्यादा गंभीर है. सनोज राम को शराब पीने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था और उस के बाद से वह गायब हैं. परिवार लगातार अपने बेटे की तलाश कर रहा है.

इस मामले में कोर्ट ने संबंधित पुलिस वालों पर कार्रवाई के निर्देश भी दिए हैं और उन के साथ क्या हुआ, इसे ले कर गंभीर आशंका बनी हुई है.

एक गरीब परिवार का जवान बेटा पुलिस के हाथों गिरफ्तार होता है और फिर उस का कोई पता नहीं चलता. परिवार सालों से जवाब का इंतजार करता है. सवाल यह है कि सनोज राम के परिवार की पीड़ा को कौन सम?ोगा. उन के घर में भी मां होगी, पिता होंगे, पत्नी होगी, बच्चे होंगे. उन की आंखों में भी इंसाफ की उम्मीद होगी. तो फिर उन के परिवार को इंसाफ और माली मदद देने की जिम्मेदारी सरकार की क्यों नहीं है?

बिहारशरीफ में श्रवण पासवान और पिंटू पासवान की हत्या का मामला भी इसी सवाल को सामने लाता है. 2 नौजवानों की हत्या ने कानून व्यवस्था और भीड़ की सोच पर गंभीर सवाल खड़े किए. आरोप पुजारियों और दूसरे लोगों के रोल को ले कर भी सामने आए. अगर किसी की हत्या केवल इसलिए कर दी जाती है कि उस पर चोरी का शक है तो ये कानून के शासन के लिए बेहद खतरनाक हालात हैं.

किसी भी नागरिक को दोषी साबित करने का अधिकार भीड़ को नहीं है. लेकिन जब ऐसे मामलों में गरीब और दलित परिवार इंसाफ के लिए दरदर भटकते हैं तो समाज के मन में यह सवाल उठता है कि क्या उन की जिंदगी की कीमत सत्ता की नजर में उतनी नहीं है जितनी किसी समाज के असरदार शख्स की.

प टना के बंटी यादव की हत्या का मामला भी कई सवालों से घिरा हुआ है. बंटी यादव के परिवार और उन के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने सैक्स स्कैंडल का विरोध किया था और इसी वजह से उन्हें निशाना बनाया गया. दूसरी ओर पुलिस ने हत्या के पीछे दूसरे कारणों की बात कही है.

इ स मामले में आखिरी सच जांच से ही सामने आएगा, लेकिन एक बात साफ है कि एक नौजवान की हत्या हुई और उस के परिवार को इंसाफ की जरूरत है. अगर पुलिस के रोल पर सवाल उठते हैं तो जांच होनी चाहिए और दोषी चाहे कोई भी हो, उस के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. सवाल फिर वही है कि बंटी यादव के परिवार की पीड़ा सरकार के लिए कितनी खास है?

रोहतास की बेटी स्नेहा कुशवाहा बनारस में रह कर पढ़ाई कर रही थी. उस के परिवार ने अपनी बेटी को पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए घर से दूर भेजा था. लेकिन उस की हत्या ने परिवार को तोड़ कर रख दिया. एक बेटी की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं होती. वह उस पूरे समाज की चिंता बन जाती है जहां मातापिता अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए दूसरे शहरों में भेजते हैं.

स्नेहा के परिवार को भी न्याय चाहिए. उन्हें भी यह जानने का अधिकार है कि उन की बेटी के साथ क्या हुआ और उस के लिए जिम्मेदार कौन है. सवाल यह है कि क्या उन की जाति सरकार की संवेदना के रास्ते में बाधा बनेगी?

अ  भी हाल ही में रोहतास जिले के दिनारा ब्लौक के जोगियां मिल्की गांव के चंद्रेश्वर नोनिया की हत्या कर दी गई. एक और परिवार उजड़ गया. एक और घर का चिराग बु?ा गया. एक और मां की गोद सूनी हो गई. एक और परिवार इंसाफ के इंतजार में खड़ा है. लेकिन इन तमाम घटनाओं को एकसाथ देखने पर एक बड़ा सवाल सामने आता है कि क्या बिहार में हर मौत का राजनीतिक वजन बराबर है?

भरत तिवारी के परिवार को मुआवजा और नौकरी मिलती है तो उस का स्वागत होना चाहिए. किसी भी पीडि़त परिवार को मदद मिलना गलत नहीं है. लेकिन यही मदद अगर केवल चुनावी दबाव, जातीय समीकरण या राजनीतिक नुकसान के डर के कारण मिलती दिखाई दे तो सवाल उठेंगे ही. सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए. सरकार को यह साफ करना चाहिए कि पुलिस हिरासत में मौत, पुलिस हिरासत से किसी के गायब होने, भीड़ की हिंसा में हत्या, जातीय हिंसा में हत्या या किसी दूसरे गंभीर अपराध के पीडि़त परिवारों के लिए उस की नीति क्या है.

किसी भी लोकतंत्र में सरकार की संवेदनशीलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा समाज कितना बड़ा वोट बैंक है. सरकार का काम हर नागरिक के जीवन और सम्मान की रक्षा करना है. संविधान ने किसी नागरिक के वोट की कीमत अलगअलग नहीं तय की है. मतदान केंद्र पर ब्राह्मण का वोट भी एक है, कुशवाहा का वोट भी एक है, पासवान का वोट भी एक है, यादव का वोट भी एक है, नोनिया का वोट भी एक है और किसी गरीब मजदूर का वोट भी उतना ही खास है. फिर सरकार की संवेदना में फर्क क्यों दिखाई दे?

क्या भाजपा ब्राह्मण समाज के वोट को सब से खास मानती है और बाकी समाजों के वोट को फौर ग्रांटेड लेती है? क्या गरीब, दलित, पिछड़े और अति पिछड़े समाज के वोट को ऐसा वोट मान लिया गया है जिसे चाहे जितना नजरअंदाज किया जाए, वह कहीं नहीं जाएगा? क्या किसी समाज के वोट को पक्का और किसी दूसरे समाज के वोट को बिकाऊ या मजबूर सम?ाना लोकतांत्रिक राजनीति है?

यह सवाल केवल भाजपा से नहीं बल्कि बिहार की पूरी राजनीतिक व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए. कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में आए, उसे यह साबित करना होगा कि सरकार किसी जाति की नहीं बल्कि नागरिकों की होती है. चुनाव के समय हर वोट की कीमत बराबर बताई जाती है, लेकिन चुनाव के बाद अगर मुआवजा, नौकरी, सुरक्षा और न्याय में जातीय या राजनीतिक असर दिखाई देने लगे तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है.

मुआवजा इंसाफ का औप्शन नहीं है. नौकरी इंसाफ का औप्शन नहीं है. पैसा किसी परिवार के इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए को वापस नहीं ला सकता. किसी मां की गोद नहीं भर सकता. किसी बच्चे को उस का पिता वापस नहीं दे सकता. इसलिए सरकार को केवल मुआवजे की घोषणा कर के अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं माननी चाहिए. असली जिम्मेदारी है निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान, कानून के मुताबिक कार्रवाई और पीडि़त परिवार को इंसाफ दिलाना.

भ रत तिवारी के परिवार को इंसाफ मिले, यह जरूरी है. लेकिन उसी इंसाफ की मांग अनिल कुशवाहा के परिवार को भी है. सनोज राम के परिवार को भी है. श्रवण पासवान और पिंटू पासवान के परिवार को भी है. बंटी यादव के परिवार को भी है. स्नेहा कुशवाहा के परिवार को भी है. चंद्रेश्वर नोनिया के परिवार को भी है.

इन परिवारों के दर्द को जाति की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए. किसी की मौत ब्राह्मण की मौत, कुशवाहा की मौत, पासवान की मौत, यादव की मौत या नोनिया की मौत नहीं है. सब से पहले वह एक इनसान की मौत है.

राज्य का पहला धर्म नागरिक की जिंदगी की हिफाजत करना है और अगर राज्य की व्यवस्था में ही किसी नागरिक की जान चली जाती है तो राज्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है.

बिहार सरकार को चाहिए कि वह सभी ऐसे मामलों की समीक्षा करे जिन में पुलिस हिरासत में मौत हुई है, पुलिस हिरासत से लोग गायब हुए हैं, भीड़ द्वारा हत्या की गई है या किसी परिवार ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं. एक समान नीति बनाई जाए. जिस तरह भरत तिवारी के परिवार के लिए माली मदद और नौकरी की घोषणा की गई है, उसी तरह दूसरे पीडि़त परिवारों के मामलों में भी ऐसी ही व्यवस्था बनाई जाए. इस से यह संदेश जाएगा कि सरकार किसी जाति के दबाव में नहीं, बल्कि इंसाफ के सिद्धांत पर काम करती है.

आज सब से बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार में इंसाफ की भी कोई जाति है? अगर जवाब नहीं है तो फिर किसी परिवार के दर्द को चुनावी गणित से नहीं तोला जाना चाहिए. अगर भरत तिवारी का परिवार सरकार की संवेदना का हकदार है तो अनिल कुशवाहा का परिवार भी उसी संवेदना का हकदार है. अगर एक परिवार को मुआवजा और नौकरी मिल सकती है तो दूसरे परिवारों के लिए भी ऐसी समान नीति होनी चाहिए.

किसी ब्राह्मण की जिंदगी की कीमत ज्यादा नहीं हो सकती और किसी कुशवाहा, पासवान, यादव, नोनिया या दलित की जिंदगी की कीमत कम नहीं हो सकती. लोकतंत्र में किसी नागरिक की कीमत उस की पूरी जिंदगी है.

सरकार को यह साबित करना होगा कि बिहार में इंसाफ वोट देख कर नहीं मिलता. इंसाफ जाति देख कर नहीं मिलता. इंसाफ राजनीतिक असर देख कर नहीं मिलता. इंसाफ मिलना हर नागरिक का हक है और यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है. Bihar Politics

Editorial : गहरी पैठ- बिहार बीजेपपी को चढ़ावे की चिंता

Editorial. जैसी उम्मीद थी, बिहार की भारतीय जनता पार्टी को मंदिरों, पूजापाठ और चढ़ावे की ज्यादा फिक्र है, बजाय दलितों, पिछड़ों, गरीबों, मजदूरों और बिहार से बाहर जाने को मजबूर हुए मजदूरों की कुछ सोचने की. पहली कैबिनेट मीटिंग में 3,615 करोड़ रुपए के प्रौजैक्ट एप्रूव किए गए जिन में मंदिरों तक जाने के रास्ते, मंदिरों की मरम्मत, मंदिरों को नई जगह देने जैसे काम शामिल हैं.

बिहार का गरीब तबका जिस का बड़ा हिस्सा अब पढ़लिख गया है, बगावत न कर दे इस के लिए पुख्ता इंतजाम किया गया है. पुलिस फोर्स को स्कूटर दिए जा रहे हैं, थाने बन रहे हैं, गाडि़यां खरीदी जा रही हैं.

इस सब का मकसद एक ही है. जनताको धर्म के नाम पर लूटते रहो, बहकाते रहो, जो सही बात बोले उसे पकड़ कर बंद कर दो. दलित, अति पिछड़े, मुसहर जैसे लोग जिन के बच्चे पढ़लिख गए वे भी बोले नहीं इस के लिए धर्म के पुजारियों का भी दबाव है, उन के लिए कथा भी कराई जा रही है, धार्मिक जलसों में नाचनेगाने को लगाया जा रहा है पर आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिखाया जा रहा है.

बिहार किसी जमाने में बहुत अमीर राज्य था, दूसरे उत्तर भारत के इलाकों से ज्यादा. तभी वहां नालंदा जैसा विश्वविद्यालय बना जो मीलों में फैला है. यह बात दूसरी है कि नालंदा में कोई नहर या सड़क या मकान या खेती के प्रोडक्शन की बात नहीं होती थी. पर दूसरे इलाकों में तो यह भी नहीं था और तभी कभी ग्रीक, कभी शक, कभी हूण, कभी अफगान, कभी मंगोल कब्जे करते रहते थे. बिहार में पुराने मंदिर नहीं हैं इसलिए वह चमका.

आज मंदिरों की बाढ़ आ रही है जो तराई से आने वाली बाढ़ से भी ज्यादा खतरनाक है. सम्राट चौधरी इसे और बढ़ाएंगे. 20 साल नीतीश कुमार ने इस थोड़ाबहुत कंट्रोल किया था पर भाजपा ने हेरफेर कर के उन्हें धक्का दिया है और अब मंदिरों की बात होगी.

बिहार की आम जनता आज भी सीधी और बेवकूफ है. उसे सदियों से पढ़नेलिखने नहीं दिया गया. कांग्रेसी सरकारों ने गांवगांव में स्कूल खोले पर वहां ऊंची जातियों के पढ़ाने वाले घुस गए जिन्होंने साजिश के तहत दलितों, पिछड़ों को पढ़ने नहीं दिया.

जो थोड़ीबहुत चमक बिहार में दिखती है वह तकनीक की बदौलत है. बिजली पैदा करना आसान है तो हर सड़क पर बत्ती लग सकती है, हर घर में लाइट है. बाकी अंधेरा है. सब से नीचे के पायदान पर रहने वाला बिहार अपने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से पैसों के मामले में आधा है और यह फर्क बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं क्योंकि अब पूजापाठ, पुलिस अत्याचार, बुलडोजर का राज आ गया है जिस में मरेगा गरीब, नीची पिछड़ी जाति का जना जिस की न आवाज है, न सुनवाई.  Editorial

गहरी पैठ: गांवों की जमीनों को हथियाने की साजिश

देश के सब से पिछड़े राज्य बिहार ने हाल में दावा किया है कि उस ने जमीनों की मिल्कीयत का डिजिटल नक्शा एक सौफ्टवेयर के जरीए बना लिया है और जब भी कोई बदलाव मालिक का होगा, यह नक्शा अपनेआप बदल जाएगा और कोई भी विवाद खड़ा न होगा. फरवरी, 2021 में बिहार विधानसभा ने इस बारे में कानून पास किया था और केंचुए की स्पीड से चलने वाली नौकरशाही का दावा है कि अब यह लोगों के लिए लगभग तैयार है.

बिहार में सरकार के हिसाब से कोई 37,000 मामले जमीन की मिल्कीयत को ले कर चल रहे हैं. हर जना जो मेहनत से कमाए पैसे से जमीन खरीदना चाहता है, डरता रहता है कि कहीं उस का मालिक या दावेदार और कोई नहीं निकल आए. वर्षों बाद भी किसी पुराने दस्तावेज को चुनौती दे दी जाती है.

यह काम लोगों के भले के लिए किया जा रहा है, इस में पूरा शक है. असल में शहरों में रहने वालों की नजर अब गांवों की जमीनों पर फिर जा रही है जो पहले कोडि़यों के भावों में बिका करती थीं. अब इन के दाम लाखोंकरोड़ों में होने लगे हैं. रिश्वत या ऊपरी कमाई वाले शहरी बाबू, नेता, माफियाई और पैसे के भंडार वाली कंपनियां अब गांवों की जमीनों पर कब्जा चाहती हैं और उन्होंने कंप्यूटर टैक्नोलौजी को हथियार बनाया है.

बिहार का यह डिजिटल नक्शा करोड़ों की लागत में बना है. 20 जिलों के एरियल ड्रोनों और हवाईजहाजों से फोटो लिए गए, हर खसरे के कागज निकाल कर मिलान किए गए, 5,000 लोग इस काम में लगे ताकि 5,127 गांवों की जमीनों के 22,000 नक्शे तैयार हो सकें. यह सब काम जनता और किसानों के लिए किया गया हो, यह नामुमकिन है.

यह तो कंप्यूटर की मारफत पढ़ेलिखों की साजिश है जो कंप्यूटर नक्शों में हेरफेर आसानी से कर सकेंगे. बैंक उन के आधार पर कर्जदार की जमीन पर कब्जा जमा सकेंगे. बड़ी कंपनियां हजारों एकड़ जमीन खरीद कर इन के आधार पर कर्जदार की जमीन पर कब्जा जमा सकेंगे. बड़ी कंपनियां हजारों एकड़ जमीन खरीद कर अपना हक सुरक्षित रख सकेंगी. दलितों, अधपढ़ों, पिछड़ों को जिन्हें कंप्यूटर सम?ा नहीं आता बरगलाना और आसान हो जाएगा.

कंप्यूटर के रिकौर्डों का फायदा यह भी है कि कोई भी कंप्यूटर जानकार सौफ्टवेयर में हैकिंग कर के रिकौर्ड बदल दे और एक बार बदला गया रिकौर्ड पत्थर की लकीर बन जाता है. शहरी बाबू, शहरी कंप्यूटर ऐक्सपर्ट, शहरी पैसे वाले मनचाहा फैसला कंप्यूटर के हिसाब से ले सकते हैं.

जीएसटी और इनकम टैक्स में ऐसा होने लगा है कि लाखोंकरोड़ों की डिमांड निकल आती है. वर्षों पहले अगर सरकारी अफसरों ने अपने खाते ठीक नहीं किए तो जो गलती रह गई वह कंप्यूटर सौफ्टवेयर बनाने वाले जनता के सिर पर मढ़ देते हैं क्योंकि सरकारी दफ्तर से तो उन्हें मोटी कमाई प्रोग्राम बनाने से हो रही है.

बिहार का कंप्यूटरी नक्शा एक अच्छा कदम है पर इस का जो नुकसान आम लोग सहेंगे यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

देशभर में अगर कंप्यूटरों की बिक्री हो रही है तो उस के पीछे सरकारी वरदहस्त है. आज कमाई करने वाली कंपनियों में कंप्यूटर सौफ्टवेयर कंपनियां हैं जो बिहार जैसे गरीब राज्य से 100-200 करोड़ छोटेछोटे कंप्यूटर प्रोग्रामों के ले जाती हैं. जनता वहीं रह रही है. उस की न बिजली ठीक है, न पानी, न सड़क, न रंगदारी, न रिश्वतखोरी कम. डिजिटल नक्शेबाजी पढ़ों और अधपढ़ों के बीच एक और खाई पैदा करेगी और जमीनों को हड़प करने का एक कदम बनेगी.

राजनीति के मंजे खिलाड़ी साबित हो रहे हैं तेजस्वी यादव

बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही चुनावी सरगर्मी बढ़ गई है. एक तरफ राजग गठबंधन है, तो दूसरी तरफ महागठबंधन. महागठबंधन की अगुआई नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री रह चुके तेजस्वी यादव के हाथ में है. एक तरफ राजग गठबंधन में मंजे हुए राजनीतिबाज हैं तो दूसरी तरफ 30 साल का नौजवान नेता तेजस्वी यादव उन्हें चुनौती देने के लिए मुस्तैदी के साथ खड़ा है.

तेजस्वी यादव वर्तमान में बिहार विधायक दल के नेता प्रतिपक्ष हैं. वे बिहार विधानसभा में राघोपुर से विधायक हैं. वे खासकर नौजवानों के चहेते नेता के रूप में उभरे हैं. उन के ट्विटर हैंडल पर 20 लाख से भी जायद फालोअर हैं. तेजस्वी यादव जैसे नौजवान चेहरे से बिहार के लोगों में एक नई उम्मीद जगी है.

तेजस्वी यादव वर्तमान सरकार के मुखिया नीतीश कुमार और उन के सहयोगी दल भाजपा को हर मुद्दे पर घेरने की कोशिश कर रहे हैं. इस कोरोना काल में हो रहे चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर वे काफी ऐक्टिव हैं. लोगों को अपनी बात सोशल मीडिया और अपने कार्यकर्ताओं के जरीए जनजन तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं.

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कृषि सुधार बिल और बेरोजगारी जैसे मुद्दे को तेजस्वी यादव चुनावी मुद्दा बनाने जा रहे हैं. तेजस्वी यादव का कहना है कि किसानों ने बड़ी उम्मीद के साथ केंद्र में भाजपा की सरकार बनाई थी, लेकिन अब उन के पेट पर ही प्रहार होने लगा है. शिक्षा, स्वास्थ्य के बाद कृषि को भी पूंजीपतियों के हाथों बेचा जा रहा है. किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की बाध्यता खत्म की जा रही है. किसान पूंजीपतियों के खिलाफ कोर्ट नहीं जा सकते. राज्य सरकार ने इस बिल का समर्थन कर के यह साबित कर दिया है कि वह राज्य के 70 फीसदी किसानों का भला नहीं चाहती है. इस सरकार को किसान तबके की जान की रत्तीभर भी परवाह नहीं है.

तेजस्वी यादव ने यह ऐलान कर दिया है कि किसानों के हकों की हिफाजत के लिए राजद का कृषि बिल के खिलाफ संसद से सड़क तक विरोध जारी रहेगा. नए कृषि बिल के जरीए सरकार किसानों को बरबाद करना चाहती है. उन की पार्टी इसे बरदाश्त नहीं करेगी. किसान विरोधी बिल का विरोध करते हुए उन्होंने ट्रैक्टर का स्टेयरिंग थामे हुए विरोध प्रदर्शन किया.

बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर तेजस्वी यादव का कहना है कि बिहार में हर जातिधर्म के नौजवान बेरोजगारी से बेहाल हैं. राजग के लोग नौजवानों और बेरोजगारों को जातिधर्म के जाल में उलझाए रखना चाहते हैं, ताकि उन का सत्ता रूपी रोजगार चलता रहे. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थक चुके हैं. उन पर उम्र का असर साफ दिखाई पड़ रहा है. वे रूढ़िवादी और अहंकारी सोच के चलते बिहार के करोड़ों नौजवानों के सपनों को साकार करने में नाकाम साबित हो रहे हैं.

पिछले दिनों तेजस्वी यादव ने एक मंजे हुए नेता की तरह लोगों से अपील की थी कि अगर 15 साल के लालूराबड़ी शासनकाल में गलतियां हुईं तो वे उस के लिए माफी चाहते हैं. एक बार उन्हें मौका दे कर देखें. अगर मौका मिला तो वे किसी को निराश नहीं होने देंगे.

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बिहार के अवाम से उन्होंने अपील की कि अगर वह एक कदम आगे बढ़ेंगी तो वे चार कदम आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं. उन्हें एक मौका दे कर देखें.

युवा राजद के राष्ट्रीय महासचिव ऋषि कुमार ने दिल्ली प्रैस को बताया कि वर्तमान सरकार से इस प्रदेश की जनता तंग आ चुकी है. वह इसे हर हाल में बदलेगी. तेजस्वी यादव की अगुआई में बिहार का कायाकल्प होगा. तेजस्वी यादव उत्साही, लगनशील और कर्मठ नौजवान हैं. बिहार को आगे बढ़ाने के लिए उन का एक अलग विजन है. बिहार को आगे बढ़ाने में वे हर हाल में खरा उतरेंगे.

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