Hindi Kahani. रामअवतार बरामदे में खाट पर लेटे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे. बहू रामी खाना खाने के बाद हाथपैर धो रही थी.
अपने जमाने में रामअवतार की तूती बोलती थी. वे सरपंच से ले कर ब्लौक प्रमुख तक के सारे चुनाव लड़ कर जीत चुके थे. वह चाहते थे कि उन के बेटे भी उसी लकीर पर चलें, पर सारे के सारे निकम्मे निकले.
उन सभी को सरकारी नौकरी सुहा रही थी, सो पढ़ते रहे. घर का कामधंधा किसी ने नहीं देखा. सिर्फ रामदीन खेतीबारी देख रहा था, लेकिन उस बेचारे की बीवी छोटी उम्र में ही गुजर गई थी.
रामदीन का बेटा रमाशंकर कालेज में जाते ही नेतागीरी करने लगा था, इसलिए रामअवतार की निगाह में वह होनहार था. वह जानामाना युवा नेता था और एमएलसी के लिए जुगत भिड़ा रहा था. रामी रमाशंकर की ही बीवी थी.
दोपहर बाद रामी से गपशप करने के लिए गांव की बहू, बेटियां, भौजाइयां, चाचियां आने लगतीं. बातचीत के दौरान एक औरत ने कहा, ‘‘सुना है, अब तो औरतें भी चुनाव लड़ने लगी हैं.’’ ‘‘शायद 30 फीसदी सीटें औरतों की हैं,’’ दूसरी औरत बोली.
‘‘शाम को दद्दा से पूछ कर बताऊंगी,’’ रामी ने कहा. ‘‘अरे, दद्दा से पूछते लाज नहीं आएगी?’’ रफिया ने सवाल दागा.
‘‘काहे की लाज… वे तो हमारे बुजुर्ग हैं… घर के मुखिया हैं,’’ रामी ने मुसकराते हुए कहा.
उन की बातचीत सुन रहे रामअवतार का सीना खुशी के मारे चौड़ा हो गया. उन के मन में कौंधा, ‘रमाशंकर से पूछना होगा कि क्या रामी भी चुनाव में खड़ी हो सकती है? अगर ऐसा हो जाए, तो पांचों उंगलियां घी में…’
रामअवतार ने जब रामदीन से बात की, तो वह बोला, ‘‘30 फीसदी जगह ले कर भी औरतें क्या कर लेंगी? औरतें घर से कभी बाहर नहीं निकलतीं… उन्हें चूल्हेचौके से ही फुरसत नहीं मिलती है.’’
‘‘तू चुप रह…’’ रामअवतार दहाड़े, ‘‘अपनी खेतीबारी से ही मतलब रख. तू क्या जाने कि चुनाव कैसे लड़े जाते हैं, कैसे जीते जाते हैं… बुला रमाशंकर को.’’
जब रमाशंकर ने सारी बात सुनी, तो वह कुछ देर सोचने के बाद बोला, ‘‘बापू, दद्दा सही कह रहे हैं.’’
‘‘शाबाश बेटा, तू सचमुच श्रवण कुमार है…’’ दद्दा ने उस की पीठ थपथपाई, ‘‘अब तू जल्दी से पता लगा कि अपने गांव की सीट औरतों के लिए है कि नहीं?’’
‘‘इस में पूछना किस से है… यह सीट तो औरतों के लिए ही है.’’ ‘‘अरे नालायक, इतने दिन से बोला क्यों नहीं?’’ रामअवतार ने गुस्से से झिड़का, फिर पलभर रुक कर शांत होते हुए बोले, ‘‘देख बेटा, तू एमएलसी के लिए कोशिश कर रहा है, ब्लौक प्रमुख मैं खुद रहा हूं… अब मैं कब तक इन झंझटों में फंसा रहूंगा.
‘‘इस जायदाद को संभालने के लिए मेरे पीछे भी तो कोई चाहिए… ये सीटें भी जायदाद की तरह हैं. तुम तो नेतागीरी की बरकत जानते ही हो… अब तुम्हारी बहू चुनाव में जरूर खड़ी होगी.’’ ‘‘क्या?’’ बापबेटा दोनों मुंह ताकते रह गए.
‘‘हमतुम दोनों घर बैठे राजकाज संभालेंगे… बहू को तो बस दस्तखत भर करने होंगे.’’
किवाड़ की ओट में खड़ी रामी ने जब यह बात सुनी, तो चौंक उठी और सोचा, ‘सिर्फ दस्तखत?’ तभी दद्दा का हुक्म हुआ, ‘‘बुलाओ बहू को.’’ रामी जैसे सोते से जागी. वह लजाती हुई लंबा सा घूंघट खींच कर दद्दा के सामने जा खड़ी हुई.
‘‘बहू, चुनाव लड़ोगी?’’ दद्दा ने मुसकराते हुए पूछा. ‘‘दद्दा, हम से यह सब कैसे होगा?’’ ‘‘अरे, काम तो हम लोग करेंगे. वैसे तुम भी पढ़ीलिखी, सुशील और समझदार हो. बहुत सी औरतें तुम से सलाहमशवरा करने आती रहती हैं. औरतों के सारे वोट तो तुम्हें ही मिलेंगे.’’
चुनावी परचा भरने से पहले ही रामी के चुनाव में खड़े होने की चर्चा हर तरफ फैल गई थी.
दोपहर बाद बहुत सी औरतें रामी के घर आ जातीं और चुनाव चर्चा शुरू हो जाती. हर तरफ बैनर लग गए थे. रामी ने औरतों में बिंदी, चूड़ी वगैरह बांटना शुरू कर दिया था.
एक दिन बहुत सी औरतें घर में जमा थीं, तभी रामअवतार की भौजाई भी वहां आ पहुंचीं. उन्हें देखते ही रामअवतार ने पैर छुए और खुशामदी के लहजे में बोले, ‘‘अरे भौजी, कुछ काम था, तो हमें बुला लेतीं?’’
‘‘कामकाज कुछ नहीं… हम तो बस यही कहने आए हैं कि बहू को चुनाव में जरूर खड़ा करना… इस की जीत में रत्तीभर भी शक नहीं है.’’ रामअवतार खुशी से चहकते हुए बोले, ‘‘तुम्हारा हुक्म सिरमाथे पर.’’
आखिरी दिनों में रामी ने चुनावी परचा भर दिया. उसी शाम रमाशंकर दद्दा से बोला, ‘‘अब चुनाव लड़ने की तैयारी कैसे होगी?’’ ‘‘तुम इस की चिंता मत करो…’’ दद्दा ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘बहू बहुत होशियार है.’’
‘‘लेकिन चुनाव प्रचार का सामान भी तो इकट्ठा करना होगा.’’ ‘‘आजकल शहर में सारी चीजें मिल जाती हैं,’’ भीतर से रामी की आवाज सुनाई दी.
रमाशंकर चौंकते हुए बोला, ‘‘ज्यादा जबान मत चला… खुद को बहुत बड़ी लीडर समझने लगी है…’’
‘‘बेटा, परेशान होने की जरूरत नहीं है… किसी सुरीले गले वाले से कैसेट भरवा लेंगे… अगर औरत की आवाज हो तो और भी अच्छा होगा… रात को टीवी बाहर रखवा देंगे,’’ रामअवतार ने कहा.
रामी का चुनाव प्रचार पूरे जोरशोर से होने लगा. कैसेट पर पहले फिल्मी गीत बजता, ‘तू चीज बड़ी है मस्तमस्त…’ फिर किसी पेशेवर राजनीतिबाज की भारीभरकम आवाज गूंजती, ‘अपना कीमती वोट श्रीमती रामी देवी को दे कर गांव को तरक्की और खुशहाली के रास्ते पर आगे बढ़ाएं… रामी देवी की जीत आप की अपनी जीत है…’ फिर रामी माइक पर बोली, ‘‘आप की बहू आप से वोट मांगती है…’’
इस के बाद जुलूस के पीछे दौड़ रही बच्चों की टोली में टौफियां, बिसकुट, मिठाई वगैरह बांटी जातीं.
रामी जब चुनाव जीत गई, तो रमाशंकर ने मूंछों पर ताव देते हुए उस से कहा, ‘‘यह मत समझना कि तुम अपनी अक्ल और होशियारी से जीती हो, सारी मेहनत तो मेरी और दद्दा की है.’’ ‘‘सो तो है ही… मुझे भी कहां ऐतराज है.’’ ‘‘ऐतराज कर के तू जाएगी भी कहां?’’
सचमुच रामी ऐतराज कर के जाती भी कहां? औरतों ने रामी की जीत की खुशियां मनाईं, पर अब वे घर के भीतर नहीं घुस सकती थीं, क्योंकि दद्दा ने आंगन में ही तख्त बिछा कर दरबार लगाना शुरू कर दिया था. रामअवतार गिद्ध की तरह हर आनेजाने वाले पर पैनी निगाह रखते थे.
औरतें सोचतीं कि अपनी फरमाइशें और शिकायतें किस से कहें? रामी तो अब बाहर ही नहीं निकलती थी. दद्दा का हुक्का दिनभर गुड़गुड़ाता रहता. एक दिन दद्दा की भौजाई भी फरमाइश ले कर आई थीं, पर उन्हें भी उन्होंने बहाना बना कर बाहर से ही टरका दिया था.
उदासी में डूबी रामी अकसर सोचती, ‘अच्छा ही है कि कोई भी औरत अब मिलने नहीं आती. मैं किसी के लिए कर भी क्या सकती हूं… मैं तो एक मुहरा भर हूं, मुझे तो सिर्फ दस्तखत ही करने होते हैं. सारे कामों पर तो दद्दा कुंडली मार कर बैठ गए हैं.’
एक बार उस ने दबी जबान से किसी सहेली के काम के लिए कहा, तो दद्दा भड़क उठे, ‘‘बहू, अपनी औकात में रहो… मुफ्त में किसी का काम नहीं होता… हमें भी सरकारी अफसरों की जीहुजूरी करनी पड़ती है, उन्हें दावतें देनी पड़ती हैं… दारू और मुरगे के बगैर तो कोई बात ही नहीं सुनता.’’
चुनाव लड़ने के बाद रामी धोखा खा चुकी थी. वैसे चुनाव लड़ने, न लड़ने का फैसला भी उस के हाथ में कहां था. वह तो सिर्फ कठपुतली की तरह पति और दद्दा के इशारों पर नाचती रही थी.
अब वह घर में अकेली बैठी रहती. जो औरतें उस की तारीफ करते थकती नहीं थीं, वे अब बातबात पर उसे कोसती थीं. अब उस का आंगन औरतों के ठहाकों से गुलजार नहीं होता था.
एक दिन बुझे दिल से वह सोचने लगी, ‘शादी के वक्त भी हाईस्कूल फेल मर्द के लिए मैं ही चुनी गई और दद्दा की सियासी हवस पूरी करने के लिए भी मुझे ही चुना गया. मैं ने खुद कब और कहां कोई चुनाव लड़ा…’ Hindi Kahani.
-डा. मीरा दीक्षित




