Editorial. क्या आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस से नौकरियां, खासतौर पर साधारण पढ़ेलिखों की, चली जाएंगी? हां, पर इस से कोई कहर टूटेगा यह जरूरी नहीं है. बस इतना होगा कि आज का निचला तबका, दुनिया के जिस भी देश में रह रहा हो, एक तरह से 19वीं सदी में पहुंच जाएगा और 21वीं सदी का सिर्फ मोबाइल या उस जैसा उस से बढ़ कर टूल उस के हाथों में होगा.
आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस जैसी तकनीक आज उस मोबाइल को बना और चला रही है जो आम आदमी के हाथों में है. यह मोबाइल उसे पहले फुसला कर, अब जबरन उस पर थोपा जा रहा है क्योंकि सरकारें और कंपनियां इसे धर्म जैसा कारगर तरीका मान कर चल रही हैं. धर्मों ने 3,000 सालों से आम आदमियों और उन की बेटियों व औरतों को अपना गुलाम बना रखा है, बस बहलाफुसला कर.
धर्म अपनों पर हुक्म चलाते हैं, दूसरे धर्म के लोग उन के ईश्वरअल्लाह को नहीं मानते तो बेचारे कुछ भी नहीं कर पाते, पर यदि अपने धर्म का कोई अपने धर्म के ईश्वरअल्लाह में खामी निकालने लगे या ईश्वरअल्लाह के बताए गए, पुरोहितोंपंडों के मुंह से रटवाए गए हुक्मों को न माने तो उस की जान लेने को तैयार हो जाते हैं.
आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस यही कर रही है. यह हर जने पर मोबाइल के सहारे थोपी जा रही है. आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस के सहारे पता रहता है कौन कब क्या कर रहा है. वह सरकार, बड़ी कंपनियों या धर्म के खिलाफ कुछ कर, कह, सुन तो नहीं रहा? वह कुछ ऐसा काम तो नहीं कर रहा कि इन मालिकों को आज या कल नुकसान हो. आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस ही चैक कर रहा है कि हर जने को बस उतना मिले कि वह काम कर सके और जी सके. आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस एक तरह से उन जंजीरों की तरह है जो गुलामों को बांधी जाती थीं, आज के कुत्तों और गायभैंसों को बांधी जाती हैं.
मोबाइल पर मजे मिलेंगे कह कर उसे पहले गिरफ्त में ले लिया गया और अब उस पर नजर रखी जा रही है. आर्टिफिशयल इंटैलिजैंस के टूल्स ही उबर, ओला, स्विगी, बिल्किंट जैसी कंपनियां चला रहे हैं जिन में काम करने वाले या जिन्हें सामान सप्लाई करने वाले एक बिलकुल तय किए गए रास्ते पर, तय किए गए तरीके से, नए किए गए काम को ही करेंगे. यह वर्ण व्यवस्था का मोबाइल एडिशन है. यह पूजापाठ का दूसरा नाम है, यह गोरों की चाल है.
पहले वाले गोरों ने बंदूकें ईजाद कर के तीरकमान और लाठी वालों को गुलाम बनाया था, आज आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस और मोबाइल से बन रहा है. नौकरियां नहीं जाएंगी, नौकरियों में आजादी जाएगी और पुरानी गुलामी फिर आ जाएगी. Editorial




