Patriarchy . बिहार का जमुई जिला साल 1991 की 21 फरवरी तारीख को मुंगेर से अलग हो कर बना था. पर आज 2026 में यह जिला किसी और वजह से सुर्खियों में बना हुआ है. यहां एक ऐसा कांड हुआ कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इस की निंदा की है.

राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा, ‘बिहार के जमुई का एक वीडियो बहुत बेचैन करने वाला है. 10वीं क्लास के एक छात्र और छात्रा को रास्ते में जबरदस्ती रोक लिया गया,. उन्हें प्रताड़ित किया गया, अपमानित किया गया और छात्रा के साथ उत्पीड़न किया गया.

‘बच्ची हाथ जोड़ कर उसे जाने देने की विनती करती रही, मगर गुंडे उसे गलत तरीके से छूते और खींचतान करते रहे. इन लोगों को ऐसी बदतमीजी करने का हक किस ने दिया? यह ‘संस्कृति’ नहीं है, यह पैट्रियाकी (पितृसत्ता) है… यह सोच कि किसी भी पुरुष का किसी लड़की के शरीर, उस के आनेजाने और उस की पसंदनापसंद पर नियंत्रण है.

‘जब नियंत्रण को ही संस्कृति मान कर ‘अंधभक्त’ ऐसी सोच को सामान्य ठहराते हैं, तो भीड़ को लगने लगता है कि वही कानून है. उस वीडियो में दिख रहे हर व्यक्ति की पहचान होनी चाहिए और उन अपराधियों पर पोस्को के तहत मुकदमा चला कर उन्हें जल्द से जल्द सजा मिलनी चाहिए.

‘और अगर यह घटना 19 सितंबर की है तो गुनाहगार अब तक सलाखों के पीछे क्यों नहीं हैं? और बिहार सरकार जवाब दे कि शाम 7 बजे कोई लड़की राज्य की सड़कों पर सुरक्षित क्यों नहीं है?’

दरअसल, बिहार के जमुई जिले में ऐसी घटना हुई है जिस ने इनसानियत को शर्मसार कर के रख दिया है. यहां कुछ शरारती युवकों द्वारा एक नाबालिग प्रेमी जोड़े के साथ छेड़खानी करने व गलत बरताव करने का मामला सामने आया है. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है जिस के बाद हंगामा खड़ा हो गया है और लोगों का गुस्सा फूट पड़ा.

जानकारी के मुताबिक, पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए 3 आरोपियों को गिरफ्तार किया है. एसपी विश्वजीत दयाल ने बताया कि गिरफ्तार आरोपी दिखने में 14 से 17 साल की उम्र के लग रहे हैं.

क्या है पूरा मामला?

सोशल मीडिया पर जो वीडियो वायरल हो रहा है वह जमुईलखीसराय बौर्डर पर बने कुंदर डैम का बताया जा रहा है. वीडियो में कथिततौर पर कुछ शरारती तत्व नाबालिग प्रेमी जोड़े के साथ छेड़खानी करते हुए व परेशान करते हुए दिखाई दिए थे. दोनों नाबालिग प्रेमी जोड़े टाउन थाना क्षेत्र के अलगअलग महल्ले के रहने वाले बताए जा रहे हैं.

बताया जा रहा है कि प्रेमीप्रेमिका स्कूटी से घूमने निकले थे. इसी दौरान कुछ युवकों ने उन्हें रोक कर कथिततौर पर छेड़खानी की. घटना के दौरान बनाए गए वीडियो को किसी ने सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया.

दिल्ली के हौजखास इलाके में देर रात घर लौट रही 21 साल की लड़की का बाइक सवार 2 लड़कों ने पीछा किया. पंचशील मैट्रो स्टेशन के पास दोनों ने उस के साथ छेड़छाड़ की और फिर उस की स्कूटी में टक्कर मार दी.

टक्कर इतनी जोरदार थी कि वह लड़की सड़क पर गिर कर तकरीबन 100 से 150 मीटर तक घिसटती चली गई. उसके शरीर पर कई जगह गहरे कट और गंभीर चोटें आईं. डाक्टरों ने बाद में उसे प्लास्टिक सर्जरी कराने की सलाह दी.

पुलिस अफसर ने तफसील से बताया कि वह लड़की साकेत में बने एक दफ्तर में काम करती है. 11 सितंबर, 2026 की रात तकरीबन 12 बजे वह स्कूटी से अपने घर लौट रही थी. तब यह वारदात हुई. इस के तुरंत बाद दोनों लड़के बाइक ले कर फरार हो गए. उस घायल लड़की को कुछ राहगीरों ने अस्पताल पहुंचाया.

अब राहुल गांधी की बात को दोबारा देखते हैं, ‘यह संस्कृति नहीं है, यह पैट्रियाकी (पितृसत्ता) है… यह सोच की किसी पुरुष का किसी लड़के के शरीर, उस के आनेजाने और उस की पसंदनापसंद पर नियंत्रण है…’

पितृसत्तात्मक सोच को आसान भाषा में समझते हैं. दरअसल, यह वह सोच है जिस में परिवार, समाज या व्यवस्था में फैसले लेने की ताकत, संपत्ति, और नाम मुख्य रूप से पुरुष के पास होता है. जैसे ‘बेटा वंश चलाएगा’, ‘लड़की पराया धन है’, ‘मर्द कमाएगा, औरत घर संभालेगी’. यह सोच हर समाज में अलगअलग लैवल पर मिलती है.

इस के क्या नुकसान हैं

इस सोच का लड़कीलड़के दोनों पर असर पड़ता है. लड़की को कहा जाता है कि ‘ज्यादा मत बोलो’, ‘खेलो मत’, ‘कपड़े ढंग से रखो’, ‘ज्यादा उछलोकूदो मत’. और लड़के को कहा जाता है कि ‘रोओ मत, मर्द बनो’. इस से दोनों पर प्रैशर बनता है.

लड़के को यह भरम होने लगता है कि अगर उस की आंखों में नमी दिखी तो उस की मर्दानगी को जज किया जाएगा. फिर उस को लगता है कि मां, बहन और बीवी कमजोर हैं और उन की हर हाल में हिफाजत करनी है, जबकि लड़की को हर हालात में सब से पहले पिता, भाई और पति ही सहारा देने वाले लगते हैं.

जब लड़के को ताकतवर होने का गुरूर होने लगता है तो वह इस गुरूर में दूसरी लड़कियों पर अपना हक जमाने की कोशिश करता है. पर जब वहां उस की दाल नहीं गलती है तो वह अपनी खीज मिटाने के लिए छेड़छाड़ करने पर उतारू हो जाता है.

इतना ही नहीं, लड़की को पढ़ाई, खेल, नौकरी या संपत्ति में बराबर मौका नहीं मिलना भी इसी पितृसत्तात्मक सोच का नतीजा ही है. उन का वजूद घर की मुरगी दाल बराबर वाली सोच का लिहाफ ओढ़ लेता है. और जब लड़की को ‘इज्जत’ से जोड़ दिया जाता है और लड़के को ‘हक’ से, तो लड़की के बाहर निकलने पर ही सवाल उठने लगते हैं.

क्या छेड़छाड़ में इस सोच का हाथ

यह एकलौती वजह नहीं कही जा सकती पर लड़कियों से छेड़छाड़ का इस से सीधा संबंध हो सकता है. रिसर्च और पुलिस केस स्टडीज में 3 पैटर्न मिलते हैं :

ताकत दिखाने की सोच

‘मैं कुछ भी कर सकता हूं, लड़की कुछ नहीं बोलेगी…’ यह बात लड़कों के मन में पितृसत्तात्मक सोच से आती है. कोई लड़की कहीं अकेली है, तो बहुत से लड़कों या मर्दों में यह सोच हिलोरें मारने लगती है कि उस की मदद की जाए, चाहे उसे जरूरत भी न हो. जब वह मना करती है तो बहुतों की मर्दानगी पर यह चोट जैसा असर करती है, फिर वे उसे अपनी बातों के तीरों से घायल करते हैं कि ‘यहां अकेली किस का इंतजार कर रही है?’, ‘तेरा यार आने वाला है क्या?’, हम में क्या कमी है?’

अगर वह लड़की सहम जाती है, तो फिर मनचलों की जबान के साथसाथ हाथ भी चलने लगते हैं. अगर ऐसे मनचले झुंड में हों तो उन की बुजदिल निगाहें लड़की की छाती को छीलने लगती हैं. फिर चुन्नी पर हाथ और फिर बदन पर… अगर जोर चल गया तो लड़की के साथ गैंगरेप का भयावह खेल खेल दिया जाता है.

विक्टिम ब्लेमिंग का नारा बुलंद

‘उस ने ऐसे कपड़े पहने थे, इसलिए हुआ’. मतलब कोई लड़की पहले तो किसी जानवर की दरिंदगी का शिकार हुई, फिर उसी पर सारा दोष मढ़ दिया गया. यह भी उसी पितृसत्तात्मक सोच का हिस्सा है जहां छेड़छाड़ होने की जिम्मेदारी भी लड़की पर डाल दी जाती है.

परिवार द्वारा चुप कराना

बहुत से मामले तो हो ही न, अगर किसी लड़की की शिकायत को उस के घर वाले ध्यान से सुन कर उस का समाधान कर दें. कई बार तो लड़की का परिवार ही कहता है कि ‘बदनामी होगी, चुप रहो’. इस सोच से भी अपराधी का हौसला बढ़ता है.

इतना ही नहीं, ऐसी समस्या तब आती है जब धर्म या जाति के नाम पर बनी पंचायत, रिवाज या परिवारिक नियम लड़की को कमतर बताते हैं, जैसे ऊंचीनीची जाति के नाम पर लड़की की शादी, पढ़ाई या काम पर रोक लगाना. यह धर्म नहीं, बल्कि धर्म और जाति की आड़ में बनी लोकल पितृसत्ता है.

दलित और आदिवासी समुदाय की औरतों और लड़कियों के साथ छेड़छाड़ के केस में कई बार जातिगत दबदबा भी एक फैक्टर होता है यानी ‘तुम्हारी जाति छोटी है इसलिए तुम्हें दबा सकते हैं’. यह भी ताकत का ही रूप है.

पौराणिक काल के उदाहरण

पौराणिक कथाओं में भी इस तरह की घटनाओं का जिक्र है. ‘महाभारत’ में भरी सभा में द्रौपदी चीरहरण. यह सत्ता और अपमान का सब से बड़ा उदाहरण माना जाता है. जुआ खेला मर्दों ने और इज्जत उतरी एक ऐसी औरत की जिसे पता ही नहीं था कि उसे ऐसी सभा में लाया गया है, जहां उस के पतियों की कारगुजारियों की सजा उसे दी जाएगी. सजा देने वाले भी पराए नहीं थे.

युधिष्ठिर खुद को पहले ही हार चुके थे. फिर सवाल खड़ा हुआ कि एक हारा हुआ इनसान किसी दूसरे को वस्तु समझ कर दांव पर कैसे लगा सकता है?

भरी सभा में भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र जैसे सब से ज्ञानी और ताकतवर लोग मौजूद थे. सब ने गलत होते देखा, पर पद, रिश्तेदारी और मजबूरी के चलते चुप रहे. इसीलिए आज भी अदालतों, स्कूलों में द्रौपदी के इस प्रसंग को ‘यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने’ के प्रतीक के तौर पर पढ़ाया जाता है.

इसी तरह अहल्या के एक प्रसंग का जिक्र वाल्मीकि रामायण और पुराणों में किया गया है कि अहल्या महर्षि गौतम की पत्नी थीं, जो अपनी सुंदरता और तप के लिए जानी जाती थीं.

कथा के अनुसार देवराज इंद्र ने गौतम ऋषि का रूप धारण कर के छल से आश्रम में प्रवेश किया. अहल्या को इस छल का पता नहीं चल पाया. जब गौतम ऋषि लौटे तो उन्होंने सच जाना और गुस्से में आ कर दोनों को श्राप दिया… इंद्र को शरीर पर लांछन का और अहल्या को पत्थर समान जड़ होने का.

पर यह बराबर की सजा नहीं थी. छल इंद्र ने किया, पर कठोर और लंबी सजा अहल्या को मिली. इंद्र तो कुछ समय बाद फिर देवलोक चले गए. यानी गलती मर्द ने की और किरदार पर सवाल औरत के उठे.

गौतम ऋषि को किस ने हक दिया था कि वे गुस्से में तुरंत श्राप दे दें, वह भी अहल्या का पक्ष सुने बिना ही?

गलत पहचान, सहमति के बिना संबंध और फिर पीड़िता को ही दोषी ठहरा देना… ऐसा ही कुछ पैटर्न आज भी छेड़छाड़ के केस में दिखता है.

इसी तरह रावण की बहन शूर्पणखा का अपमान हुआ, तो रावण ने बदला लेने के लिए सीता का हरण किया. उस ने सीता को अशोक वाटिका में रखा और शादी के लिए दबाव बनाया, सीता ने मना कर दिया.

इस पूरे घटनाक्रम में रावण की सोच सामने आती है कि ‘मैं सब से ताकतवर हूं, मैं किसी भी औरत को उठा सकता हूं’. ये ताकत का अहंकार है, जो पितृसत्ता का एक रूप है.

सीता हरण क्यों हुआ था? दरअसल, शूर्पणखा पंचवटी में आईं, राम से विवाह का प्रस्ताव रखा. पर एक तरह से उन के प्रस्ताव का मजाक बनाया गया. इसे इस तरह से समझते हैं कि एक औरत ने खुद पहल कर के प्रस्ताव रखा, जो उस दौर में असामान्य था. पुरुषों ने उस का मजाक उड़ाया. वैसे भी प्रस्ताव रखने की सजा के तौर पर अंगभंग करना तो आज के कानून में भी बहुत कठोर सजा मानी जाएगी. तो क्या इसे ‘औरत की इच्छा को अपराध मानने’ वाली सोच से जोड़ा जाए?

आज के हालात

सोशल मीडिया ने जिस तेजी से लोगों के दिमाग पर कब्जा किया है, अब छेड़छाड़ से एक कदम आगे, डिजिटल हिंसा बन गया है. इस के 5-6 कौमन पैटर्न मिलते हैं :

पावर और कंट्रोल

लड़की को दिखाना कि ‘देखो मैं क्या कर सकता हूं’. लड़के को लगता है कि वीडियो बना कर वह लड़की को हमेशा के लिए डरा देगा. ‘अगर तू ने घर में बताया या पुलिस में गई तो वीडियो वायरल कर दूंगा’. यह ब्लैकमेल का हथियार बन जाता है. यही पितृसत्ता वाली सोच का सब से नया रूप है कि पहले लड़कियों को घर में बंद करते थे, अब वीडियो से बंद करते हैं.

बदला और ईगो

कई केस में कहानी ऐसी होती है कि लड़की ने दोस्ती या रिलेशनशिप या फिर शादी से मना किया, तो लड़के को लगा उस की बेइज्जती हो गई. वह ‘सबक सिखाने’ के लिए वीडियो वायरल करता है. छेड़छाड़ के मामले भी भी बहुत बार बदला और ईगो सब से ऊपर होती है कि हम ने जरा सा टच कर दिया तो यह इतना उछल क्यों रही है.

ग्रुप में हीरो बनना

लड़कों को हीरो बनने का कीड़ा सब से पहले काटता है. 4-5 लड़के जा रहे हैं. एक ने लड़की को छेड़ दिया. लड़की ने पलट कर जवाब दे दिया तो लड़के ने हीरोगीरी में उस से बदतमीजी कर दी जो बहुत बार रेप तक जा पहुंचती है.

टीनएज लड़कों में यह ट्रैंड ज्यादा देखा गया है. दोस्तों के व्हाट्सएप ग्रुप में वीडियो डाल कर लाइक, कमैंट बटोरना. उन्हें लगता है इस से उन की ‘मर्दानगी’ साबित होगी. उन्हें अंदाजा नहीं होता कि ये भारतीय न्याय संहिता की धारा 77, 79 और आईटी एक्ट 66ई, 67 के तहत 3 से 7 साल जेल वाला अपराध है.

पैसे और व्यूज का लालच

कुछ लोग बेहूदा वीडियो टैलीग्राम, पोर्न साइट्स पर बेच देते हैं. एक प्राइवेट वीडियो के 2,000 से 10,000 रुपए तक मिल जाते हैं. यह पूरा एक गंदा मार्केट है।

कानून और अंजाम का डर न होना

लड़कों की यह फितरत सब से ज्यादा डराने वाली होती है. उन्हें लगता है कि फेक आईडी से डाल दूंगा, वीपीवीएन लगा लूंगा, कोई पकड़ेगा नहीं. पर अब साइबर क्राइम में आईपी ट्रेसिंग बहुत आसान हो गई है. दिल्ली पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि वायरल वीडियो केस में 85 फीसदी आरोपी 24 घंटे में पकड़ लिए जाते हैं.

पर जिस लड़की के साथ कोई अनहोनी हो चुकी होती है, तो वे इस तनाव को झेल नहीं पाती हैं. उन का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है. वे अपनी पढ़ाई तक छोड़ देती हैं. उन की जिंदगी पर यह वह न दिखने वाला तेजाब होता है, जो उन का भविष्य बीभत्स कर देता है. पौराणिक युग से आज तक यही चलता आ रहा है. पितृसत्ता का दीमक भारत की आधी आबादी को खोखला कर रहा है. Patriarchy

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